बरामदे में वो दोनों व्यक्ति घूम रहे थे। आपस में उन्होंने फासला रखा हुआ था। दोनों सामान्य कद-काठी के व्यक्ति थे। एक ने जैकिट और पैंट पहन रखी थी। जैकिट के बटन खुले थे। उसका नंगा सीना नजर आ रहा था। पीठ पर थैला लटका था। जिसमें से लाल और पीली तारें निकलकर हाथ में दबे रिमोट जैसे यंत्र में जा रही थी जिसके एक बटन पर उस व्यक्ति ने अंगूठा रखा था। इस वक्त दिल को धड़का देने वाली जो बात थी, वो ये कि उसके होठों पर चौड़ी टेप लगी थी।
डॉक्टरों वाली सफेद टेप।
मुंह पर टेप लगाने की वजह से वो और भी डरावना लग रहा था।
दूसरा भी ऐसा ही था परन्तु उसने पैंट-कमीज पहन रखी थी। दोनों हद से ज्यादा सतर्क थे कि कोई उनके पास न आ सके।
होटल का बहुत बड़ा बरामदा था जहां वो टहल रहे थे। उनके जूतों की आवाजें रह-रहकर वहां मौजूद पुलिस वालों के कानों में पड़ रही थी। उस विशाल बरामदे में करीब पचास पुलिस वाले थे। जिनके हथियारों का रुख इनकी तरफ था, परन्तु गोली चलाने का खतरा कौन उठाये। इन दोनों ने आते ही लिखा कागज पुलिस वालों को थमा दिया था कि उनकी पीठों पर मौजूद थैलों में शक्तिशाली बारूद भारी मात्रा में है। जिनका रिमोट उनके हाथ में है। अगर किसी ने उन पर हाथ डालते, करीब आने की चेष्टा की तो वो हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाकर, खुद को उड़ा देंगे। परन्तु शक्तिशाली बारूद के फटते ही होटल का ये हिस्सा भी तबाह हो जायेगा। हॉल में मौजूद लोगों में से कोई नहीं बचेगा। पुलिस वालों की भी जान जायेगी। ऐसे में उन्हें छेड़ने की चेष्टा न की जाये।
पन्द्रह मिनट से यहां की स्थिति ऐसी ही थी।
मजबूर हुए पुलिस वाले हथियारों को थामें खड़े थे।
होटल के बाहर से पुलिस सायरनों की आवाजें लगातार कानों में पड़ रही थी। इन पन्द्रह मिनटों में सायरनों की आवाजों में बढ़ोतरी हो जाने की वजह से स्पष्ट था कि बाहर पुलिस की गाड़ियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।
पुलिस वालों के लिये सच में ये तकलीफदेह बात थी। तभी वहां मौजूद ए.सी.पी. दो कदम आगे बढ़ा और ठिठककर ऊंचे स्वर में उन दोनों से कह उठा।
“तुम जानते हो, ये सब करके कितना बड़ा जुर्म कर रहे हो।”
उन दोनों में से एक ठिठका और ए.सी.पी. को देखने लगा।
दूसरा वैसे ही सावधानी से घूमता रहा।
“होठों पर से टेप हटाओ और मेरे से बात करो।” ए.सी.पी. ने कहा- “अनजाने में तुम बहुत बड़ा जुर्म कर रहे हो। जानते हो अगर पकड़े गये तो सारी जिन्दगी, इस जुर्म में जेल में ही बीत जायेगी।”
वो ठिठका-सा ए.सी.पी. को देखता रहा।
दूसरा सावधानी से हर तरफ नजर रखे टहल रहा था।
“ये बात भी अपने दिमाग से निकाल दो कि ये सब करके कानून से बचे रह जाओगे। कभी नहीं-कानून वो चीज है जो किसी अपराधी का पीछा नहीं छोड़ता। बरसों बीत जायें, अपराधी कानून के पंजे मे आकर ही रहता है। अभी भी वक्त है। संभल जाओ। भीतर मौजूद अपने साथियों को भूलकर, कानून का साथ दो। हम तुम दोनों को वायदा माफ़ गवाह बना लेंगे। इनाम भी देंगे। अभी भी वक्त है। समझदारी से काम लो।”
उसने उड़ती निगाह ए.सी.पी. पर डाली और पुन: टहलने लगा।
ए.सी.पी. के चेहरे पर झुंझलाहट के भाव आये।
“होठों से टेप हटाकर बात तो करो हमसे।”
उसने कोई परवाह नहीं की ए.सी.पी. के शब्दों की।
ए.सी.पी. दो कदम और आगे बढ़ा।
वो ठिठका और हाथ में पकड़े रिमोट से उसे पीछे हटने का इशारा किया।
बेबस-सा हुआ ए.सी.पी. पीछे हटता चला गया।
पुलिस सायरनों की आवाजें बराबर कानों में पड़ रही थी। होटल बाहर पुलिस ने अपनी घेराबंदी पूरी तरह कर रखी थी। चंद लोग बरामदे में भी सहमे से, दीवारों के साथ चिपके खड़े थे।
☐☐☐
फुर्ती से काम किया था उन चारों ने।
बीस मिनट में ही शीशे के सब शो-केसों को तोड़कर उसमें से जेवरात निकालकर उस बड़ी चादर में समेट लिए थे। देखते-ही-देखते चादर की मजबूती भरे ढंग से गठरी बना ली।
हॉल की दीवारों के साथ चिपके, हर किसी की निगाह उनकी हरकतों पर थी।
“हमारा काम पूरा हो गया है।” काऊंटर के पास खड़ा व्यक्ति माईक पर कठोर स्वर में कह उठा- “अब तक आप लोग जैसे खड़े हैं। वैसे ही पांच मिनट खड़े रहें। हम लोग जा रहे हैं। पुलिस वालों को खासतौर से कहूंगा कि वे कोई चालाकी दिखाने की चेष्टा न करें।
मैं जानता हूँ मेरी आवाज बाहर प्रवेश द्वार पर खड़े पुलिस वाले भी सुन रहे हैं। उनकी जरा-सी गलत हरकत बहुत महंगी पड़ सकती है। मैंने पहले भी कहा है कि मेरी बात को आजमाना चाहते हैं तो बेशक आजमा लें।”
वहां पैना सन्नाटा छाया हुआ था।
सच बात तो ये थी कि हॉल में दीवारों के साथ चिपके खड़े लोगों की दिली इच्छा थी कि ये सब डकैत जेवरातों के साथ यहां से चलें जायें। उन्हें डर था कि कहीं फायरिंग शुरू न हो जाये। गोली उन्हें न लग जाये।
स्पीकरों पर उस व्यक्ति की आवाज पुनः गूंजी।
“हम लोग जाते वक्त सुरक्षा के नाते यहां से कुछ को अपने साथ ले जायेंगे। अगर किसी ने हमारा पीछा करने की चेष्टा की तो मजबूरी में हमें उसकी लाश बाहर फैंकनी पड़ेगी, जिसे हमने साथ रखा होगा। हम नहीं चाहते कि हमें खून बहाना पड़े। देवराज चौहान का आज तक का रिकार्ड है कि उसने कभी निर्दोषों का खून नहीं बहाया।”
तभी शाहिद खान कह उठा।
“तुम चारों में देवराज चौहान कौन है?”
“ये बताना मैं जरूरी नहीं समझता।” उसकी आवाज कठोर हो गयी- “क्या नाम है तुम्हारा?”
“इंस्पेक्टर शाहिद खान।” शाहिद खान ने होंठ भींचकर कहा।
वो माईक पर अपने आदमियों से सम्बोधित हुआ।
“सुरक्षा के नाते पहले निकलने वाले अपने साथ इंस्पेक्टर शाहिद खान को और किसी बच्चे को ले लो।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान के होंठ भिंच गये।
“बिना कोई चालाकी दिखाये अपनी जेब से, होलेस्टर से, रिवॉल्वर निकालो और नीचे गिराकर, यहां मौजूद लोगों के छोटे से बच्चे को उठाकर मेरे साथियों के पास पहुंच जाओ।”
दांत भींचे शाहिद खान उसे घूरता रहा।
“जल्दी करो।” रिवॉल्वर सीधी करके वो गुर्राया- “तुम अब मजबूर कर रहे हो कि हम गोली चलाएं।”
शाहिद खान जानता था कि इस वक्त इनकी बात मानने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। उसने होलेस्टर से रिवॉल्वर निकालकर एक तरफ फेंकी और चेहरे पर खतरनाक भाव समेटे पास ही दीवार के पास खड़ी एक औरत के बच्चे के पास पहुंचा तो औरत ने कस कर बच्चे को थामा और चीख पड़ी।
“नहीं । मेरे बच्चे को कुछ मत कहो। इसे मत ले जाओ। मैं...”
“बहन।” शाहिद खान का गम्भीर-कठोर स्वर मजबूरी में भरा था- “मुझ पर विश्वास रखो। तुम्हारे बच्चे को कुछ नहीं होगा। कुछ होगा तो पहले मेरे को होगा। समझो, मेरी जान भी अब इसी बच्चे में है।”
“नहीं-मैं अपना बच्चा नहीं दूंगी। मेरा बच्चा नहीं...।”
शाहिद खान ने छीनकर उस बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया। ढाई साल का वो बच्चा भी रोने लगा।
औरत ने चीखकर शाहिद खान की तरफ बढ़ना चाहा, परन्तु पास खड़े उसके पति ने उसकी बांह पकड़ ली। पति के चेहरे पर घबराहट थी, लेकिन उसने संयम रखा हुआ था।
“वो मेरा बच्चा ले जा रहे हैं। आप कुछ करते क्यों नहीं?” औरत रोते हुए गला फाड़ चीखी।
“इस वक्त हर कोई मजबूर है। किसी बच्चे को तो इन्होंने ले जाना ही है। हमारा बच्चा ले लिया ये नहीं हो सकता कि हमारे बच्चे को छोड़कर अब ये किसी दूसरे बच्चे को उठा...।”
“वक्त बरबाद मत करो।” माईक पर वो दहाड़ा- “जल्दी करो इंस्पेक्टर शाहिद खान।”
दिल पर पत्थर रखे शाहिद खान बच्चे के साथ उन चारों के पास जा पहुंचा।
“तलाशी लो इसकी।” माईक वाले का स्वर कठोर था। तलाशी ली गयी। रिवॉल्वर वो पहले ही फैंक चुका था। कोई हथियार नहीं मिला।
“निकल जाओ बाहर इसे लेकर। ध्यान रहे, बाहर पुलिस का तगड़ा घेरा है।” माईक पर वो दरिन्दगी भरे स्वर में कह रहा था- “पुलिस अगर परेशान करे। पीछे आने या घेरने की चेष्टा करे तो पहले बच्चे को शूट करके बाहर फैंक देना। तब भी पुलिस अपनी हरकतों से पीछे न आये तो इस पुलिस वाले को भी गोली मारकर नीचे गिरा देना।”
“नहींऽऽऽ।” बच्चे की मां गला फाड़कर चीख पड़ी- “मेरे बच्चे को कुछ मत कहना।”
एक ने अरबों की गठरी कंधे पर लादी।
दूसरे ने रिवॉल्वर से शाहिद खान को कवर किया। जिसने बच्चा उठा रखा था। बच्चा अभी रो रहा था।
“चलो।” रिवॉल्वर की नाल का दबाव बढ़ाते हुए उसने शाहिद खान को आगे धकेला- “जल्दी करो।”
दांत भींचे शाहिद खान बाहर निकलने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ा।
साथ में एक व्यक्ति गठरी उठाये हुए था। जिसमें अरबों के हीरे-जेवरात थे।
देखते-ही-देखते वो दोनों जेवरातों की गठरी के साथ, शाहिद खान को कवर किए हॉल से बाहर निकल आये। बाहर पुलिस वाले हथियारों को थामें बेहद सतर्क थे। एक-एक की पैनी निगाह उन पर थी। पुलिस सायरनों की आवाजें चारों तरफ गूंज रही थी। दिल की धड़कनों को तेज कर देने वाला माहौल था।
सामने ही दोनों व्यक्ति होठों पर टेप लगाये टहल रहे थे। उन्हें बाहर आते पाकर पल भर के लिये वो ठिठके उसके बाद पुन: पहले की तरह चहल-कदमी करने लगे। अब वे सतर्क हो चुके थे।
“रुक जाओ।” एक पुलिस ऑफिसर ने चीखकर कहा- “खुद को कानून के हवाले कर दो। मैं वादा करता हूं कि तुम लोगों को छोड़ दिया जायेगा। कानून तुम लोगों के साथ नमी से पेश आयेगा।”
जवाब में कोई शब्द नहीं। वे शाहिद खान को कवर किए आगे बढ़ते रहे। शाहिद खान जानता था कि चाहकर भी वो कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि ढाई साल के बच्चे की जिम्मेवारी भी उस पर थी, जो उसने उठा रखा है। कुछ भी करने का मतलब था, सबसे पहले बच्चे की जान जाना। क्योंकि बच्चा खुद को बुरे हालातों में बचा पाने में असमर्थ था।
पीछे वाले ने रिवॉल्वर की नाल उसकी कमर में सख्ती से दबाकर कहा।
“अपने साथी पुलिस वालों को आदेश नहीं दोगे कि वो पीछे नहीं आयें।”
चलते-चलते शाहिद खान ने वहां मौजूद पुलिस वालों को देखते हुए कहा।
“हमारे पीछे न आना ही बेहतर है। मैं इंस्पेक्टर शाहिद खान सब पुलिस वालों से कह रहा हूं कि हमारे पीछे किसी भी स्थिति में न आया जाये। ऐसा हुआ तो सबसे पहले बच्चे की जान जायेगी। चूंकि बच्चा मेरे हाथ में है, ऐसे में मैं कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं हूँ। पीछे कोई न आये। ये बात बाहर घेरा डाले पुलिस वालों को भी समझा दी जाये कि चालाकी से कोई फायदा नहीं होगा, परन्तु नुकसान अवश्य हो जायेगा।”
पलभर के लिये सन्नाटा छा गया। .
“इन्हें कहां तक अपने साथ ले जाओगे?” एक पुलिस वाले ने पूछा।
“ये बात पुलिस वालों पर ही निर्भर है।” गठरी थामें व्यक्ति ने क्रूर स्वर में कहा- “अगर कोई हमारे पीछे नहीं आता तो आधे घंटे में हम इन्हें छोड़ देंगे। हमने खुद को सुरक्षित रखना है। अगर कोई हमारे पीछे आया तो इनकी लाशें सड़कों पर गिरेगी। जरूरत पड़ी तो खुद को बचाने के लिये, राह चलते और लोगों को भी पकड़ लेंगे।
हम नहीं जानते तब कितने मरेंगे। हमारी वैन में फालतू राऊण्ड मौजूद हैं। यानि कि अगर हमारे पीछे आये तो, तब तक लाशें गिरती रहेंगी। जब तक कि हममें जान रहेगी। जल्दी करो निकल चलो यहां से।”
देखते ही देखते शाहिद खान को कब किए वे बाहर की तरफ बढ़ते चले गये। एक ने कंधे पर गठरी डाल रखी थी और दूसरे हाथ में रिवॉल्वर दबी थी।
शाहिद खान ने जिस बच्चे को उठाया हुआ था। वो रह-रहकर रोने लग जाता था। खुद को अजीब-सी स्थिति में महसूस कर रहा था। अगर बच्चा न उठाया होता तो शायद वो कुछ कर गुजरने की सोचता।
तभी तीन पुलिस वाले बाहर की तरफ दौड़े। वो बाहर मौजूद पुलिस वालों को खबर करना चाहते थे कि हालात क्या है और डकैतों का पीछा न किया जाये।
बाहर जहां से पार्किंग शुरू होती थी, वहां दूसरे नम्बर पर सफेद रंग की मारूति वैन पार्क हुई खड़ी थी। करीब और दूर-दूर तक पुलिस नजर आ रही थी। सबकी नजरें उन पर टिक चुकी थी। शाहिद खान को उन्होंने सख्ती से कवर कर रखा था। सबके देखते-ही-देखते मारूति वैन का दरवाजा खुला। अरबों के जेवरातों की गठरी उन्होंने भीतर फेंकी। शाहिद खान को लगभग जर्बदस्ती ही भीतर धकेला और खुद भी साथ बैठकर रिवॉल्वर से उसे अच्छी तरह कवर कर लिया। दूसरे ने ड्राईविंग सीट संभाल ली। चेहरे अभी भी नकाबों से ढंके हुए थे। शाहिद खान बच्चे को पास ही सीट पर बिठाने लगा तो रिवॉल्वर वाला गुर्रा उठा।
“बच्चे को उठाये रखो। इस तरह तुम्हारी बांहें व्यस्त रहेंगी और तुम कोई शरारत करने की सोचोगे भी नहीं।”
वैन स्टार्ट हुई।
पुलिस सायरनों की आवाजें लगातार गूंज रही थी। अब रास्ते में खड़ी पुलिस कारें, एक तरफ होने लगी थी कि वैन को जाने का रास्ता दे दिया जाये।
“वो हमें रास्ता दे रहे हैं।” वैन चलाने वाले ने कहा।
“देना पड़ेगा।” वैन के पीछे शाहिद खान को कवर करने वाला कह उठा- “वरना गिरने वाली लाशों का जवाब ये जनता को कैसे दे सकेंगे। कितने मजबूर हो जाते हैं पुलिस वाले।” आवाज में जहरीलापन आ गया।
शाहिद खान के दांत भिंच गये।
“सतर्क रहना। नजर रखना।” वैन ड्राईवर के होठों से गुर्राहट निकली- “मेरा ध्यान ड्राईविंग पर रहेगा। हमें रास्ता देकर ये हमारे पीछे आ सकते हैं। पुलिस वालों का कोई भरोसा नहीं। मुझे नहीं लगता कि ये हमें आसानी से जाने देंगे।”
पीछे वाले के होठों से गुर्राहट निकली। नजरें हर तरफ घूमने लगी।
रास्ते को घेरे खड़ी पुलिस कारें एक तरफ होती जा रही थीं।
“निकल लो।”
उसने फौरन वैन आगे बढ़ा दी। वो सतर्क था। रिवॉल्वर गोदी में रखी थी।
“नजर रख।” वैन चलाने वाला बोला- “इन सालों का कोई भरोसा नहीं।”
कदम-कदम पर पुलिस वाले मौजूद थे। हाथों में हथियार थे।
नजरें खा जाने वाले अंदाज में वैन पर थी लगता था जैसे कभी भी खून की नदियां बहनी शुरू हो जायेंगी। सांसों को रोक देने वाला वक्त निकल रहा था इस वक्त।
कुछ नहीं हुआ।
मिनट भर लगा उन्हें होटल के गेट से बाहर निकलने में। बाहर भी पुलिस वाले मौजूद थे। परन्तु उन्हें देखकर रह गये।
किसी ने पीछे आने की चेष्टा नहीं की।
“हुर्रे।” वैन चलाने वाला खुशी से चीखा- “मैदान मार लिया।”
“पागल मत बन। पुलिस वाले इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ेंगे। वो अवश्य हम पर नजर रख रहे हैं।” पीछे वाला गुर्राया।
उसने वैन को रफ्तार से दौड़ा दिया।
“ठीक कहता है तू।”वैन चलाने वाला कठोर स्वर में बोला- “तू इस पुलिस वाले पर नजर रख। मैं आगे-पीछे को देखता हूँ। इतनी दौलत पास होने पर हमें पुलिस के हाथ नहीं पड़ना है।”
दोनों पूरी सतर्कता बरत रहे थे।
इंस्पेक्टर शाहिद खान बच्चे को गोद में संभाले खा जाने वाली निगाहों से दोनों को बारी-बारी देख लेता था।
☐☐☐
चादर की गठरी,शाहिद खान और उसके द्वारा उठाई गयी बच्ची को, उन दोनों के साथ हॉल से निकले दो मिनट भी नहीं बीते होंगे कि बाकी दोनों ने वहां से निकलने की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने एक औरत को और दूसरी बीस साल की युवती को रिवॉल्वरों की जद में लेकर कवर कर लिया।
औरत और युवती चीखी-चिल्लाई, परन्तु किसी को आगे न आता पाकर, समझ गयी कि इस वक्त इन डकैतों की बात मान लेने में ही भलाई है।
“चुपचाप हमारे साथ चलो।” एक ने कठोर स्वर में कहा- “अपने बचाव के लिये हम तुम्हें साथ ले जा रहे हैं। जब तक हम तुम दोनों की आड़ में हैं, पुलिस हम पर गोलियां चलाने की गलती नहीं करेगी।”
“म... मुझे मारना मत।” औरत गिड़गिड़ाने वाले स्वर में कह उठी- “मेरे छोटे-छोटे बच्चे...।”
“हमसे डरो मत। मैं देवराज चौहान हूँ।” आवाज कुछ ऊंची हो गयी थी कि लोगों ने भी सुना- “खामख्वाह किसी की जान मैं नहीं लेता। ये बात पुलिस वाले भी जानते हैं। अगर पुलिस वाले मेरे रास्ते में नहीं आये और तुम दोनों ने हमें सहयोग दिया तो, बाद में हम खुद को सुरक्षित पाकर तुम दोनों को छोड़ देंगे। डकैती की दौलत तो यहां से निकल चुकी है। पुलिस को अब मुझ पर हाथ डालकर कोई फायदा नहीं होगा।”
दोनों के चेहरे नकाबों के पीछे छिपे थे।
“जगमोहन।” उसने पुनः कहा।
“हां” पास खड़ा व्यक्ति बोला।
“चलो। हमें यहां से निकल चलना चाहिये। काम हो चुका है।”
“ठीक है, देवराज चौहान।” उसने सिर से रिवॉल्वर सटाये सख्त स्वर में युवती से कहा- “चलो। दरवाजे की तरफ तेजी से बढ़ो। हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है।”
दीवार के साथ सटे खड़े लोगों में मौजूद देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल सब शब्द सुन रहे थे। वो वहीं खड़े थे और उनके नाम पर, उनके सामने ही डकैती हो रही थी। जगमोहन का खून तो सबसे ज्यादा खौल रहा था। एक बार तो बेकाबू सा होकर, उसके होंठों से गुर्राहट निकली। सोहनलाल को लगा कि कहीं जगमोहन उन पर झपट न पड़े। इस विचार के साथ उसने सख्ती से जगमोहन की कलाई पकड़ ली।
जगमोहन ने सोहनलाल को घूरा।
“चिन्ता मत करो। मैं अपने होश में हूं।”
“इन पर झपट मत पड़ना गुस्से में। हमारी भी पोल खुल जायेगी। यहां हर तरफ पुलिस ही पुलिस है।”
“इसी का फायदा तो ये लोग उठा रहे हैं। ये जानते हैं कि हम इस वक्त इन्हें कुछ नहीं कह सकते। कुछ कहा तो हम भी फंस जायेंगे।
अब तो कुछ भी करने का कोई फायदा नहीं। पच्चीस-तीस अरब के हीरे-जेवरात यहां से बाहर निकल चुके हैं।” जगमोहन गुस्से में भरे लुटे-पुटे स्वर में बोला- “लेकिन ये साले जो भी हैं। छोडूंगा नहीं। सारा माल वापस लेकर रहूंगा।”
सोहनलाल ने जगमोहन को देखा फिर गहरी सांस लेकर रह गया।
तभी स्पीकरों से निकलती, उस व्यक्ति की आवाज गूंजी, जो काऊंटर के पास खड़ा था।
“कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा। आपका और हमारा मुसीबत का वक्त निकलता जा रहा है। पांच मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं लगेगा, सब कुछ सामान्य होने में। जहां इतनी देर सब्र किया है। वहां कुछ देर और सही। अगर डकैती मैं स्वयं कर रहा होता तो अब तक दो चार लाशें बिछ चुकी होती। सबका अपना-अपना ढंग होता है काम करने का। चूंकि ये डकैती देवराज चौहान की योजना पर हो रही है, इसलिये लाशें नजर नहीं आ रही। देवराज चौहान का कहना है कि अगर सब काम आराम से होता हो तो फिर खून बहाने की क्या जरूरत है। पहले तो देवराज चौहान की बात से इत्तफाक नहीं रखता था, लेकिन आज इस बात को मान गया। सिर्फ पांच मिनट उसके बाद आप सब पहले की तरफ आजाद होंगे।”
वो दोनों औरत और युवती को रिवॉल्वरों पर रखे हॉल के दरवाजे तक जा पहुंचे थे। फिर देखते ही देखते बाहर निकल गये। पैना सन्नाटा छाया हुआ था वहां उस पांचवे और आखिरी बचे व्यक्ति ने माईक वापस काऊंटर पर रखा और रिवॉल्वर संभाले शांत-पड़े कदमों से उस तरफ बढ़ने लगा, जिधर विवेक बंसल था।
उसे अपनी तरफ आता पाकर विवेक बंसल सावधान हो गया। वो विवेक बंसल के सामने पहुंचकर ठिठका।
नकाब से झांकती उसकी आंखें विवेक बंसल से टकराई।
“वो इंस्पेक्टर शाहिद खान तुमसे बात कर रहा था।” उसने धीमें स्वर में कहा- “पुलिस वाले हो तुम?”
“नहीं।” विवेक बोला, नकाब से झांकती उसकी आंखों में झांके जा रहा था।
“वो इंस्पेक्टर यूं ही तो तुमसे बात नहीं करेगा, इतनी देर।”
“मुझे नहीं जानते?” विवेक बंसल शब्दों को चबाकर कह उठा- “हैरत की बात है कि यहां डकैती कर रहे हो और मुझे नहीं जानते। जो भी सुनेगा, हैरान तो होगा ही।”
“यहां डकैती करने के लिये तुम्हें जानना जरूरी क्यों है?” वो शब्दों को चबाकर क्रूर स्वर में कह उठा।
“यहां के सुरक्षा के इन्तजाम मेरे हवाले हैं। मैं....”
“समझा। विवेक बंसल हो तुम। गुड...।” उसकी आवाज में जहरीला पन भर आया- “मुझे यहां से निकलने के लिये किसी जिम्मेवार व्यक्ति की ही जरूरत थी। जैसे कि तुम। हाथ ऊपर करो।”
उसे घूरते हुए विवेक बंसल ने दोनों बांहें ऊपर कर ली। उसने कपड़ों की तलाशी में से रिवॉल्वर बरामद की और उसे अपनी जेब में डालकर, विवेक बंसल की बांह पकड़ी और फुर्ती से पीछे की तरफ घुमा दी और रिवॉल्वर उसकी कमर से सटा दी।
विवेक बंसल दांत भींचकर रह गया।
“तो तुम सुरक्षा के इन्तजाम करते हो।” उसने व्यंग और क्रूरता के मिले-जुले स्वर में कहा- “अपनी सुरक्षा के इन्तजाम का ठेका अब मैं तुम्हें देता हूं ठेकेदार साहब। फीस बाद में दूंगा। अब तुमने मुझे यहां से सुरक्षित निकालना हैं। अगर मेरे दिए ठेके को ठीक से पूरा न कर सके तो मेरे साथ-साथ तुम्हारी जान भी जायेगी।”
विवेक बंसल दांत भींचे खड़ा रहा।
“आगे बढ़।” वो विवेक बंसल को धकेलते हुए बोला- “मुझे यहां से निकालना है तूने।”
न चाहते हुए भी विवेक बंसल को कदम आगे बढ़ाना पड़ा।
“अगर पुलिस रास्ते में आई।” एक-एक शब्द को दरिन्दगी भरे अंदाज में चबाता हुआ कह रहा था वो- “तो तेरी जिम्मेवारी होगी। मुझे बचाने का ठेका तेरे पास है तो तेरे को समझदारी से काम लेना है, वरना मेरे साथ-साथ तू भी मरेगा।”
दोनों धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ते जा रहे थे। उसने विवेक बंसल की दायीं बांह घुमाकर, पीछे पीठ पर लगा रखी थी। रिवॉल्वर की नाल सख्ती से, कमर से सटी थी। वो कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं था। मौका मिलता भी तो कुछ नहीं करता शायद। क्योंकि बाहर दो व्यक्ति बारूदे में अटे पड़े थे। अगर उन्होंने खुद को बारूद के साथ उड़ा दिया तो यहां तबाही मच जानी थी। लाशें ही लाशें और मलबा हर तरफ होना था। जबकि वो नहीं चाहता था कि खून-खराबा हो। यहां मौजूद वो और पुलिस चाहते थे कि डकैती न हो। हीरे-जेवरात बाहर न निकल सकें। परन्तु हीरे-जेवरात जा चुके थे बाहर। क्योंकि डकैतों को पकड़ने के फेर में पड़कर कोई भी नहीं चाहता था कि होटल का ये हिस्सा बारूद से उड़े और बेगुनाह लोग मारे जायें या गोलियां चलने पर ऐसा ही हो। अब ये आखिरी बचा था। जिसने उसे कवर कर रखा था। मात्र एक को पकड़ने में गड़बड़ हो जाये। ये ठीक नहीं था। विवेक बंसल का दिल कह रहा था कि इतनी बड़ी डकैती करके ये लोग बचे नहीं रह सकते। जल्दी ही पुलिस के हत्थे चढ़ेंगे।
बाहर निकलने का दरवाजा पास आता जा रहा था।
“तुम्हारे साथी हीरे-जेवरात लेकर जा चुके हैं।” विवेक बंसल बोला।
“मालूम है।” उसने होंठ भींचकर कड़वे स्वर में कहा।
“वो तुम्हें दगा भी दे सकते हैं।”
“फालतू की बकवास मत करो। देवराज चौहान कभी भी अपने साथियों को दगा नहीं देता। सीधा चलते रहो। मुझे बाहर निकालो। स्वर तीखा हो गया- “कोई और होता तो तुम्हारी बात मान लेता। देवराज चौहान के बारे में ऐसी गलत बात मत कहना।”
“बहुत विश्वास है तुम्हें देवराज चौहान पर।”
“जब देवराज चौहान को जान लोगे। उस पर विश्वास भी कर लोगे।”
विवेक बंसल को कवर किए, वो हॉल के दरवाजे से बाहर निकला।
बाहर हथियार थामें पुलिस वाले घेरे के ढंग में फैले हुए थे।
सबकी निगाहें उन पर टिक गयी।
पीठों पर बारूदों वाला बैग लिए, वो दोनों व्यक्ति उन्हें देखकर ठिठके।
“कोई भी हरकत नहीं करेगा।” वो विवेक बंसल को कवर किए गुर्रा उठा- “हम सब बाहर आ चुके हैं। खून-खराबा नहीं हुआ। अच्छा यही है कि अब भी न हो। अभी हॉल में किसी को बाहर नहीं आने देना है। जब ये दोनों आदमी यहां से चले जाये।” उसने पीठों पर बारूद लपेटे व्यक्तियों की तरफ इशारा किया- “तब ही हॉल वालों को बाहर आने देना।”
पुलिस वाले खा जाने वाली निगाहों से उसे घूर रहे थे।
उन दोनों के पास निकलता वो उनसे कह उठा।
“मेरे जाने के पांच मिनट बाद तुम दोनों भी निकल जाना। देवराज चौहान भी निकल चुका है। इन लोगों को समझा देना कि पीछे आये तो तुम लोग पीठ पर लादे बारूद में विस्फोट कर दोगे, रिमोट का बटन दबाकर।” उसके बाद वो ऊंचे स्वर में चिल्लाया- “कोई भी मेरे पीछे न आये। पार्किंग में खड़ी कार में मैं यहां से जा रहा हूं। अगर मुझे जरा भी शक हुआ कि कोई मेरे पीछे है तो ये आदमी, जिस पर रिवॉल्वर रखी है, मरेगा। उसके बाद रास्ते में जो भी मुझे मिलेगा। उसके सिर पर रिवॉल्वर लगा दूंगा। यानि कि तुम (पुलिस) लोगों के लिये हालात नहीं बदलेंगे। खास बात तो ये है कि मेरी मौत के साथ इंस्पेक्टर वानखेड़े भी मारा जायेगा।”
“इंस्पेक्टर वानखेड़े?” वहां मौजूद एक पुलिस वाले के होठों से निकला- “वानखेडे साहब कहां हैं?”
“मेरी कैद में। मैं यहां से निकल गया तो, दो घंटे बाद वो आजाद हो जायेगा। ध्यान रहे, अगर मेरे साथियों के पीछे पुलिस लगी। डकैती के माल को छीनने की चेष्टा की तो जो होगा, वो तो होगा ही, इंस्पेक्टर वानखेड़े भी मरेगा। वैसे देवराज चौहान नहीं चाहता कि वानखेड़े मारा जाये। उसे बचाना या न बचाना तुम पुलिस वालों पर है।”
किसी के होठों से आवाज नहीं निकली।
पुलिस वाले हर तरफ से बेबस होते जा रहे थे।
“चल।” उसने विवेक बंसल को धकेला।
विवेक बंसल बिना किसी एतराज के उसके इशारे पर आगे बढ़ता गया।
होटल के बाहर खड़ी पुलिस सायरनों की आवाजें वहां, सबके कानों में पड़ रही थी
☐☐☐
उस व्यक्ति को विवेक बंसल के साथ बाहर निकले मिनट भर ही हुआ था कि घबराये से दो-चार लोगों ने भी जल्दी से बाहर निकलने की चेष्टा की तो एक पुलिस वाले ने फौरन सामने आकर टोक दिया।
“कोई बाहर नहीं जायेगा।”
“यहां हमें घबराहट हो रही है। डर लग रहा...।”
“खतरा बाहर है। यहां नहीं।” पुलिस वाले ने सख्त स्वर में कहा- “बाहर कुछ भी हो सकता है। गोलियां चल सकती हैं। जब तक बाहर से खबर नहीं आती। तब तक बाहर नहीं निकलना है।”
वहां मौजूद कई लोग इस बात से सहमत दिखाई दिए।
“शर्मा।” प्रवेश गोदरा ने दबे स्वर में कहा।
“बाथरूम में चलकर फ्लश टैंक देखते हैं।”
“रिवॉल्वरों को, जो मैडम ईरानी ने रखी थी।” कमल शर्मा आसपास देखते हुए कह उठा।
“हां देखें तो सही कि...”
अन्य लोगों ने भी अपनी जगह से हिलना शुरू कर दिया था।
“चलो।” ।
दोनों ने सामान्य ढंग से अपनी जगह छोड़ी और बाथरूम की तरफ बढ़ गये। लोगों की हिम्मत वापस आती जा रही थी। डकैती ने उनके होश उड़ा दिये थे। परन्तु अब उनके होश कुछ संभलने लगे थे। उनकी घबराहट भरी आवाजें वहां सुनाई देने लगी थी। अजीब-सा धीमा शोर था वहां, जो कि समझ से बाहर था।
वहां मौजूद मेजर खन्ना और प्रशांत यादव पास-पास पहुंचे।
“मेजर साहब। आप तो कहते थे कि डकैती नहीं हो सकती।”
प्रशांत यादव का स्वर गम्भीर था- “ऐसी सिक्योरिटी में कोई डकैती करने नहीं आयेगा। आयेगा तो फंस जायेगा।”
मेजर खन्ना कुछ कहना चाहकर भी कह न सका।
“ये सीमा का मामला नहीं है कि सीधा अटैक हो और मिल्ट्री वालों को अपने हथियार संभालने का मौका मिल जाये। वैसे भी देवराज चौहान के काम करने का ढंग कमाल का है। देख ही लिया आपने।”
“अगर लोगों की जिन्दगियों का सवाल न होता तो, मैं-मैं उन्हें कामयाब न होने देता। कुछ करता तो...”
“काम निपट जाने के बाद, ये सब बातें कहना फिजूल है। मुझे तो विवेक साहब की चिन्ता हो रही है।” प्रशांत यादव ने दोनों हाथ मलते हुए कहा- “वो उन्हें अपने साथ ले गया है।”
“उनकी चिन्ता करने की जरूरत नहीं।” मेजर खन्ना ने विश्वास भरे स्वर में कहा- “मेरे ख्याल में तो विवेक साहब के रूप में वो मुसीबत
साथ ले गये हैं। वो सिक्योरिटी कम्पनी के मालिक अवश्य हैं, परन्तु उनमें हर वो गुण है, जो किसी समझदार पुलिस वाले में होता है।”
“जब सिर पर रिवॉल्वर लगाकर, गोली चलाई जाती है तो मस्तिष्क में बैठे सारे गुण बिखर जाते हैं।” प्रशांत यादव ने गम्भीर स्वर में कहा- “सर ने अगर कहीं भी गड़बड़ी की तो वो फौरन गोली मार देंगे। अरबों की दौलत का मामला है। वो लोग एक तो क्या बीस लाशें भी बेहिचक तैयार कर सकते हैं।”
मेजर खन्ना होंठ भींचे सोचों में नजर आने लगा।
“खामोश क्यों हो गये मेजर साहब?”
“देवराज चौहान बचेगा नहीं। हम उसे पकड़ लेंगे। डकैती के सारे जेवरात भी।”
“आप जल्दी में ये सब कह रहे हैं।” प्रशांत यादव ने तीखे स्वर में कहा- “हम कुछ नहीं कर सकते। पुलिस हमें पीछे रहने को कह देगी। अब जो करना होगा, पुलिस ही करेगी।”
“पुलिस हमें नहीं रोक सकती। हम अपने तौर पर इस मामले में दखल दे सकते हैं। यहां की सिक्योरिटी हमारे हवाले थी।”
“सिक्योरिटी हमारे हवाले थी। वो वक्त खत्म हो गया। अब इस बात को इन्वेस्टीगेट करना, पुलिस का काम है कि लूटी हुई दौलत कहां है। लूटने वाले कहां है। हमारा काम खत्म।”
मेजर खन्ना ने कठोर निगाहों से उसे देखा।
“ये तुम्हारे विचार हैं कि हमारा काम खत्म हो गया है। मेरा विचार है कि हमारा काम शुरू हुआ है।”
प्रशांत यादव ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं।
देवराज चौहान ने बाथरूम में पहुंचकर फ्लश टैंकों को चैक करना शुरू किया। एक-एक करके पांचों टैंकों के ढक्कन उठाकर देखा। किसी में भी रिवॉल्वरों के पैकिट नहीं थे। यानि कि उसका ख्याल ठीक था कि डकैती करने वालों ने उसके हथियार, उसके नकाब और उसकी ही योजना का इस्तेमाल किया है। डकैती करने वाले उसकी एक-एक बात एक-एक हरकत से वाकिफ थे।
तभी आहट मिली।
देवराज चौहान दरवाजा खोलकर बाहर निकला। ठिठक गया।
प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा सामने थे। नजरें मिली कई पलों तक वे एक-दूसरे को देखते रहे। देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और धीमे स्वर में कह उठा।
“होटल में टिकना ठीक नहीं। इस डकैती के बाद पुलिस ने होटलों को चैक करना है। होटल खाली करके, वहां पहुंचे, जिस जगह के बारे में मैंने बताया था कि डकैती के बाद वहां मिलेंगे।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।
एक बार फिर प्रवेश गोदरा ओर कमल शर्मा ने एक-दूसरे को देखा।
“तुम यहां क्या कर रहे हो?” कमल शर्मा के होठों से निकला।
“रूपा ईरानी ने फ्लश टैंक में जो रिवॉल्वरें रखी थी उन्हें ढूंढ रहा था।” शब्दों को चबाकर कहते हुए देवराज चौहान ने कश लिया।
“मिलीं?”
“नहीं।” देवराज चौहान ने हौले से, इन्कार में सिर हिलाया- “रिवॉल्वरें और उन पर लिपटे नकाब फल्श टैंक में नहीं हैं। स्पष्ट है कि डकैती करने वालों ने हमारे रिवॉल्वरों और हमारी नकाबों के साथ-साथ, ठीक हमारी ही योजना का इस्तेमाल किया।”
“ये कैसे सम्भव है?” प्रवेश गोदरा दांत भींचकर कह उठा।
“इसके बारे में फुर्सत में सोचेंगे कि कैसे ये सब सम्भव हो गया।”
देवराज चौहान की आवाज में सख्ती आ गयी- “यहां से निकलकर वहां पहुंचो, जहां हमें पहुंचना था डकैती के बाद। वहां बात करना जो भी करनी हो।” देवराज चौहान बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोला- “इस वक्त हम बिना वजह के खतरे में मौजूद हैं। हमें यहां से निकल जाना चाहिये।”
देवराज चौहान के जाने के बाद प्रवेश गोदरा ते सिग्रेट सुलगाई।
“गोदरा साहब?”
“मेरे ख्याल में देवराज चौहान की हालत भी हमारे जैसी ही है कि जाने कौन लोग इस योजना पर डकैती कर गये।” शर्मा बोला।
“देवराज चौहान के चेहरे से महसूस तो मुझे भी यही हुआ है।”
प्रवेश गोदरा गम्भीर स्वर में कह उठा।
“मतलब कि कहीं पर भारी गड़बड़ है?”
“अब तो ऐसा ही लगता है।”
देवराज चौहान हॉल में मौजूद भीड़ में खड़ी रूपा ईरानी के पास पहुंचा। वो उतनी ही घबराई हुई थी जितने कि दूसरे लोग। उसके पास पहुंचते ही हड़बड़ाई सी फट पड़ी।
“ये सब क्या हो रहा है। तुम लोग यहां हो और।”
“खामोश रहो।”
उसने फौरन होंठ भींच लिए। नजरें देवराज चौहान पर रही।
“रिवॉल्वरों के पैकिट कहां रखे थे या रखना भूल गई?” देवराज चौहान ने धीमें स्वर में पूछा।
“फ्लश टैंक में रख दिए थे, उसी में, जिसके बारे में तुमने बताया था।” उसने अजीब से स्वर में कहा।
“तुम्हें ऐसा करते किसी ने देखा?”
“नहीं। किसी ने नहीं देखा। मैं इस बात का पूरा ध्यान रखे रही कि कोई मेरी हरकत मत देखे। फिर मैंने तो बाथरूम के दरवाजे को भीतर से बंद करके ये काम किया था देखता कौन?” रूपा ईरानी ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
देवराज चौहान उसकी आंखों में देखता रहा।
“गड़बड़ क्या हो गयी?” रूपा ईरानी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।
“उन रिवॉल्वरों के दम पर कोई और लोग डकैती कर गये हैं।”
देवराज चौहान का स्वर शांत था।
“क्या? ये कैसे हो सकता है?”
“हो चुका है ये।”
“लेकिन।”
“खामोश रहो। ये वक्त इन बातों का नहीं।”
“कौन लोग डकैती कर...”
“मालूम नहीं। खामोश रहो। खुद को इन बातों से दूर रखो। वरना फंस जाओगी।”
रूपा ईरानी ने होंठ भींच लिए।
“अपने काम से मतलब रखना। हमें ढूंढने की कोशिश मत करना।”
“प्रवेश को कहना मुझे-मुझे फोन करें। मिले।”
“क्यों?
“जाने क्यों मेरे को घबराहट हो रही है।” रूपा ईरानी का स्वर कांपा- “प्रवेश को मालूम था कि उसे दौलत मिलने वाली है। अब उसे कुछ नहीं मिलेगा तो उसके दिल पर क्या बीतेगी। उसे इस वक्त हौसले की जरूरत है जो मैं ही दे सकती हूं।”
देवराज चौहान उसके पास से हट गया।
अभी हॉल में लोगों में से कोई भी बाहर नहीं निकला था।
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अब बाहर सिर्फ वो ही दो आदमी बचे थे, जिन्होंने पीठों पर
बारूद का थैला फंसा रखा था और, थैले से निकलती तारें उनकी हाथ में दबे रिमोट कंट्रोल तक पहुंच रही थी।
माईक वाला, विवेक बंसल के सिर पर रिवॉल्वर रखे, पार्किंग से गाड़ी उठाकर वहां से निकल गया था।
सनसनी-सी छाई हुई थी वहां। पुलिस सायरन की आवाजें कानों को चुभती सी महसूस हो रही थी। बेबस हुए पड़े थे सब। अपराधी सामने से निकल रहे थे, परन्तु खुद को बारूद में लपेटे उन व्यक्तियों ने सबके हाथ बांध रखे थे।
अब सब पुलिस वालों का ध्यान उन दोनों व्यक्तियों पर टिक चुका था।
प्रवेश द्वार के पास के बरामदे में वे टहल रहे थे।
विवेक बंसल को साथ लिये उस व्यक्ति को निकले चार मिनट हो चुके थे।
तभी उन दोनों व्यक्तियों की नजरें मिली। आंखों ही आंखों में उन्होंने इशारे किए। उसके बाद वहां मौजूद पुलिस वालों पर नजर मारने के बाद दोनों बाहर की तरफ बढ़ने लगे।
पुलिस वाले समझ गये कि वो यहां से जा रहे हैं।
कुछ पुलिस वाले उनके पीछे बढ़े।
परन्तु उन्होंने ठिठककर, हाथ के इशारे से उन्हें वहीं रुकने का इशारा किया। पुलिस वाले गुस्से में डूबे वहीं रुक गये। दोनों पुनः बाहर की तरफ बढ़ गये। होठों पर अभी भी टेपे चिपका रखी थी।
उसके इशारे के बावजूद भी पुलिस वाले धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ रहे थे लेकिन वो समझ नहीं पा रहे थे कि उन्हें क्या करना है या इस हालत में वे कुछ कर सकते भी हैं या नहीं?
दोनों होटल के मुख्य द्वार से बाहर, साईड में बनी विशाल पार्किंग में पहुंचे। उधर भी चंद पुलिस वाले बिखरे हुए थे। हर किसी की गुस्से से भरी सतर्क निगाह उन पर थी।
तभी एक ने एक कार का दरवाजा खोला और भीतर बैठकर कार स्टार्ट की और कार को आगे बढ़ा दिया। पुलिस वाले और मौजूद अन्य लोग, सब कुछ देख रहे थे।
दूसरा पास ही मौजूद अन्य कार की तरफ बढ़ा। पास पहुंचकर कार का दरवाजा खोलने को हुआ कि पास ही पार्क हुई कार के पीछे छिपे एक हवलदार ने चीते की तरह उछाल ली और उस पर छलांग लगा दी। वेग के साथ उससे जा टकराया और वो व्यक्ति जोरों से उस कार से टकराया। दांये हाथ का अंगूठा उसके हाथ में दबे रिमोट पर ही था। उसी पल झटके के साथ रिमोट पर अंगूठे का दबाव बढ़ा। दबाव बढ़ते ही एकाएक वहां कानों को फाड़ देने वाला विस्फोट हुआ। आग की भयानक लपटें धुएं के साथ आसमान की तरफ लपकी। पास खड़ी कारों के टुकड़े उछले और हवा में फुटबाल की भांति लहराने लगे। वहां धुंआ ही धुंआ और आग के शोलें चमक रहे थे। आसपास खड़ी कई कारों में आग लग गयी थी। उस धुएं और आग की लपटों के पीछे सब कुछ छिपकर रह गया था।
पुलिस वाले और अन्य लोग हक्के-बक्के से रह गये थे ये सब देखकर, उस हवलदार ने अपनी जान की परवाह न करके, बहुत बड़ी हिम्मत का काम करने की कोशिश की थी। नि:स्वार्थ और सच्ची कोशिश। बारूद इतना शक्तिशाली था कि अगर ये विस्फोट होटल के भीतर हुआ होता तो वहां लाशें ही लाशें पड़ी होती।
हर किसी के चेहरे पर दहशत नजर आ रही थी, जिनकी आंखों के सामने ये सब हुआ था।
पीठ पर बारूद लपेटे उस व्यक्ति की कार मात्र सौ-डेढ़ सौ गज ही आगे गई होगी कि जब ये सब हुआ और कानों को सुन्न कर देने वाला विस्फोट हुआ था।
वो कांप-सा गया था विस्फोट की गर्जना सुनकर।
उसका स्टेयरिंग जोरों से हिला और कार साईड में खड़ी पुलिस कार से जा टकराई। टक्कर से उसे तीव्र झटका लगा। परन्तु फौरन ही संभलकर गर्दन घुमाकर पीछे देखने लगा। दूसरे ही पल उसकी आंखों में खौफ ही खौफ नाच उठा। आंखें दहशत से फटकर फैल गयो। भय से मुंह खुला का खुला ही रह गया। दिल दहला देने वाला नजारा उसके सामने था। वो इस वक्त ताजी मिली मौत की बुत की तरह लगने लगा था। उसके होशो-हवास गुम हो गये थे।
ये सब देखकर तो हर कोई होशों को गुम किए था।
परन्तु पांच-छ: कदमों की दूरी पर एक सब-इंस्पेक्टर खड़ा था। उसके देखते-ही-देखते कार, पुलिस कार से टकराकर रुक गयी थी। और उस व्यक्ति को उठते पीछे देखते पाया। चेहरे के भावों को देखकर वो सब-इंस्पेक्टर समझ गया कि खुद को बारूद में लपेटे वो व्यक्ति विस्फोट हुआ पाकर डर के समन्दर में जा डूबा है। एकाएक सब-इंस्पेक्टर के चेहरे पर दरिन्दगी उभर आई। यूं वो इस तरह से खतरों से खुद को दूर ही रखता था। डरता था कि उसे कुछ जाये। क्योंकि पीछे बूढ़े मां-बाप के अलावा पत्नी के अलावा तीन बच्चे भी थे। सारा परिवार उस पर निर्भर था।
परन्तु उस वक्त उसमें जाने कहां से हिम्मत का तूफान आ गया। अपना परिवार भूल गया। यहां तक कि अपनी वर्दी और फर्ज को भी भूल गया। याद रहा तो सिर्फ इतना कि कार में बैठे व्यक्ति को नहीं जाने देना है। उसने फुर्ती के साथ रिवॉल्वर निकाली और छः कदम का फासला जैसे एक ही पल में तय कर लिया। रिवॉल्वर की नाल ड्राईविंग सीट पर बैठे उस व्यक्ति के सिर पर रख दी। उसे इतना भी मौका नहीं मिला कि गर्दन को वापस घुमा पाता।
“अपने साथी की मौत तूने देख ली है।” सब-इस्पेक्टर ने वहशी स्वर में कहा- “क्या तू भी इसी तरह मरना चाहता है। हिलना मत। हाथों को मत हिलाना। दोनों हाथ इसी तरह स्टेयरिंग पर रहें, वरना सारी गोलियां तेरे सिर में उतार दूंगा। लेकिन तेरे को किसी भी कीमत रिमोट का बटन नहीं दबाने दूंगा। बोल-मारूं तेरे को। सारी गोलियां तेरे सिर में...”
“न... नहींऽऽऽ।” वो चीख-सा उठा- “म-मुझे मत-मत मारना।”
“जीना चाहता है?”
“ह-हां।”
सब-इंस्पेक्टर ने फौरन दरवाजा खोला और पुन: फुर्ती रिवॉल्वर की नाल उसके सिर से लगा दी। वो डरा-घबराया सा दोनों हाथ स्टेयरिंग पर रखे, खौफ भरी निगाहों से सब-इंस्पेक्टर को देखे जा रहा था।
अब तक कार के इर्द-गिर्द अन्य पुलिस वाले भी इकट्ठे होना शुरू हो गये थे। उनके हाथों में हथियार दबे थे। परन्तु चेहरे पर डर भी था कि कहीं विस्फोट का ब्लास्ट न हो जाये।
“हिलना मत।” गुर्राकर सब-इंस्पेक्टर ने कहते हुए दूसरा हाथ आगे बढ़ाया और फुर्ती के साथ उसके गोद में पड़ा रिमोट कंट्रोल उठा लिया। बैग से निकलकर रिमोट कंट्रोल तक पहुंचती तार करीब पांच फीट लम्बी थी।
उस व्यक्ति का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“अब रिमोट मेरे हाथ में है।” सब-इंस्पेक्टर क्रूर भरे स्वर में बोला- “दबा दूं बटन?”
“न-नहीं। ऐसा मत करना मैं-मैं।”
“चुप...” सब-इंस्पेक्टर के चेहरे पर मौत के भाव नाच रहे थे- “नीचे उतर। बाहर निकल।”
उसने उतरने की चेष्टा की। परन्तु उसकी टांगों में हिम्मत खत्म हो चुकी थी।
“साले, बाहर आता है या।”
उसका शरीर जोरों से हिला। टांगें कार से बाहर निकली। वो बाहर निकला। घबराहट के कारण ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा था तो खड़ा रहने के लिये कार का सहारा ले लिया। बुझी-बुझी निगाहों से वो सामने खड़े सब-इंस्पेक्टर को देख रहा था। जिसके एक हाथ में रिमोट और दूसरे में रिवॉल्वर दबी थी।
कुछ फासले पर बिखरें पुलिस वाले सकते की सी हालत में खड़े थे।
“क्या देखता है?” सब-इंस्पेक्टर पुनः गुर्राया।
उसके होंठ हिले। शब्द कोई न निकला।
“कार छोड़कर आगे आ!” रिमोट थामें सब-इंस्पेक्टर पूर्ववत् स्वर में बोला- “पीठ पर रखा, बारूद का बैग उतारकर नीचे रख दे। अगर तूने देर की तो मैं रिमोट का बटन दबा दूंगा।”
बेजान से हुए पड़े उसने तेजी दिखाकर पीठ पर पड़ा, बांहों में फंसा रखा बारूद का बैग जल्दी से नीचे रखा। उसका चेहरा निचुड़ा हुआ पीलेपन से भर गया था।
“रिमोट का बटन मत दबाना।” उसके होठों से सूखा-सा स्वर निकला।
वो कांपती लड़खड़ाती टांगों से आगे बढ़ा और कुछ दूर होकर, जब हिम्मत जवाब दे गयी तो नीचे बैठ गया। कुछ देर पहले वो शेर बना हुआ था और अब उसकी हालत चूहे से भी बुरी हुई पड़ी थी।
“यहां से हट और दूर हो जा। उधर जल्दी कर।”
सच में कानून के हाथ जब अपराधी की गर्दन पर पहुंचते हैं तो तब वो किसी भी काबिल नहीं रहता।
“पकड़ लो इस हरामजादे को।” सब-इंस्पेक्टर गला फाड़कर चिल्लाया।
वहां बुत से बने पुलिस वाले एकाएक झपटे और उसी पल वो व्यक्ति पुलिस के शिकंजे में था।
वो व्यक्ति तो कानून की हद में पहुंचकर बेजान खिलौने जैसा बन चुका था।
सब-इंस्पेक्टर ने हाथ में पकड़े रिमोट को सावधानी से बारूद के बैग के पास रखा और उसके पास पहुंचा।
“नाम बता अपना।” वो गुर्राया।
उसने मुंह खोला। कई पलों तक उसके होंठ हिले फिर खरखराता-सा स्वर बाहर निकला।
“जीवन लाल।”
“काम क्या करता है कुत्ते... कौन से मौहल्ले का कुत्ता है तू?”
“म-मैं बैंक में काम करता हूं। च-चोर-डाकू नहीं हूँ।” उसके होठों से भय भरा कांपता स्वर निकला।
“बैंक में काम?” सब-इंस्पेक्टर के साथ अन्य भी चौंके। चेहरे से वो सच में कोई बदमाश नहीं लग रहा था।
पुलिस वालों ने सख्ती से उसे थाम रखा था।
सब-इंस्पेक्टर रिवॉल्वर जेब में रखकर भिंचे स्वर में कह उठा।
“संभालकर इसे, हैडक्वार्टर ले चलो। ए.सी.पी. साहब के सामने कर देना इसे। इससे हमें बहुत कुछ मालूम होगा, जो अब पुलिस जानना चाहती है। सावधान रहना डकैती डालने वाले रास्ते में इसकी जान भी ले सकते हैं कि ये इनके बारे में मुंह न खोले। उसके साथी, यहां लोगों की भीड़ में मौजूद हो सकते हैं।”
पुलिस वाले जीवन लाल को घेरे में लेकर, सामने मौजूद पुलिस गाड़ी की तरफ बढ़ गये।
कुछ पुलिस वाले अभी भी वहां खड़े थे।
सब-इंस्पेक्टर राना ने बारूद के थैले पर नजर मारकर कहा।
“रिमोट और बारूद का कनैक्शन हटाओ किसी से कहकर। यहां पहरा रखो। डकैतों का कोई साथी पास आकर रिमोट बटन दबा सकता है। ऐसा करके वो तो मरेगा ही साथ में और भी जाने कितने मरेंगे।”
कुछ फासले पर खड़ा इंस्पेक्टर चेहरे पर गम्भीरता समेटे करीब आया।
“इंस्पेक्टर वानखेड़े भी इन लोगों के कब्जे में है वो...”
“जो पकड़ा गया है वो सब बतायेगा।” सब-इंस्पेक्टर राना ने दांत भींचकर कहा- “तोते की तरह बोलेगा।”
“तुमने सच में बहुत बहादुरी वाला काम किया है।” इंस्पेक्टर ने उसका कंधाथपथपाया- “डिपार्टमैंट की तरफ से तुम्हें अवश्य इनाम मिलेगा। मुझे यकीन है कि तुम्हें अब इंस्पेक्टर बना दिया जायेगा। खुश होना चाहिये तुम्हें राना।”
सब-इंस्पेक्टर राना की निगाह उधर गयी, जहां विस्फोट हुआ था। कारें अभी भी जल रही थी। वातावरण में बारूद की और पैट्रोल की मिली-जुली स्मैल फैली हुई थी।
“मुझे ज्यादा खुशी होती अगर हवालदार प्रकाश भी जिन्दा होता -और हम दोनों को इनाम मिलता।” सब-इंस्पेक्टर राना ने अफसोस भरे स्वर में कहा- “वो मर गया। मुझसे ज्यादा हिम्मत उसने दिखाई।”
इंस्पेक्टर ने उसका कंधा थपथपाया और जलती कारों की तरफ बढ़ गया।
सब-इंस्पेक्टर राना को लगा कि उसकी टांगे कांप रही हैं। शायद वो ज्यादा देर खड़ा न हो पाये। आगे बढ़कर वो कार का सहारा लेकर
खड़ा हो गया। आंखें बंद करके गहरी-गहरी सांसें लेने लगा। वो जानता था कि उसने अपनी औकात से कहीं ज्यादा बड़ा कारनामा कर दिया है। पुलिस डिपार्टमैंट का हीरो बन गया है वो। नकद इनाम के साथ वर्दी के स्टार भी बढ़ जायेंगे। परन्तु उसकी आंखों के सामने बापू का सूखा-पतला, हमेशा उखड़ा रहने वाला चेहरा नाचने लगा था। जो उसे हमेशा समझाता रहता था कि पुलिस की वर्दी पहनने का मतलब ये नहीं कि बदमाशों पर बदमाशी झाड़ने लगो। बुरे लोगों से दोस्ती रखते हैं। तभी इस नौकरी में सुरक्षित रहा जा सकता है। जब भी उसने किसी बड़े बदमाश को गिरफ्तार किया, तब-तब घर जाने पर बाबू उसे सामने बिठाकर दो-दो घंटे गुस्से से झाड़ पिलाता था।
उसके घर पहुंचने से पहले ही घर पर ये खबर किसी पुलिस वाले ने दे देनी थी। ऐसे में जब भी उसने घर पहुंचना था, बापू को बाहर गेट पर ही बैठे देखता था, जो उसकी बांह पकड़कर भीतर ले जायेगा और सामने बिठाकर डांटना शुरू कर देगा कि क्या जरुरत थी उस मानव बम को जिन्दा पकड़ने की। उसके पास जाने की। क्यों दिखाई पागल पन से भरी बहादुरी। वहां और भी तो पुलिस वाले थे। वो भी तो आगे आ सकते थे। वो समझदार थे कि पीछे रहे। अगर तेरे को कुछ हो जाता तो परिवार का क्या होता। सरकार जो तनख्वाह दे रही है। बहुत है। थोड़ी बहुत रिश्वत भी मिल जाती है। घर का खर्चा चल तो रहा है। सब-इंस्पेक्टर बन गया है ये क्या कम है। अब तो घर जाने पर बापू के शब्द घंटों तक सुनने पड़ेंगे। उसके बाद पांच-सात दिन बापू ने सीधे मुंह बात नहीं करनी थी। वो जानता कि ये बापू का प्यार है कि वो संभलकर नौकरी करे। बहादुरी दिखाते हुए कहीं उसे कुछ हो न जाये।
“सब-इंस्पेक्टर राना।” वो सोचो से बाहर निकला। सामने कमीश्नर साहब मौजूद थे।
“सर।” उसने फौरन सैल्यूट दिया।
“ठीक है। ठीक है।” कमीश्नर साहब के चेहरे पर मुस्कान थी- “तुमने बहुत बढ़िया काम किया। बहुत ही बढ़िया काम। अगर वो पकड़ा न जाता तो हमारे लिये बहुत कठिनाइयां खड़ी हो जाती। अखबार वालों ने पुलिस का बुरा हाल कर देना था कि एक-एक करके डकैत पुलिस के पास से होकर निकल भागे और पुलिस कुछ न कर सकी। तुम नहीं जानते कि तुमने कितना बड़ा काम किया है।”
“वो-वो-सर यूं ही वो।”
“मैं समझ रहा हूं कि इस वक्त तुम्हारी हालत क्या होगी।” कमीश्नर साहब ने उसके कंधे पर हाथ रखा- “मैं तुम्हें पुलिस डिपार्टमैंट की तरफ से शौर्य पदक ही नहीं, नकद इनाम के साथ तरक्की भी दिलवाऊंगा।”
“थैंक्यू सर।” सब-इंस्पेक्टर राना दायें-बायें सिर हिलाकर कह उठा।
☐☐☐
“पुलिस वाले साहब।” वैन के पीछे रिवॉल्वर थामें वो व्यक्ति खूंखार स्वर में कह उठा- “तुमने बहुत शराफत से काम लिया। हमारा कहना माना। रास्ते में हमें परेशान नहीं किया। हमें तुम जैसे पुलिस वाले पसन्द आते हैं। हम जैसों के साथ सहयोग करने में ही सलामती है।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान बच्चे को कंधे से लगाये उसे खा जाने वाली निगाहों से देख रहा था।
वैन चैम्बूर मार्किट के सामने से गुजरती पृथ्वी थियेटर के सामने से निकल चुकी थी। चौराहा आ रहा था।
“उतार दे इसे नीचे।” रिवॉल्वर वाले ने वैन चलाने वाले से कहा।
उसी पल ही वैन सड़क की साइड में रुकती चली गयी। दोपहर हुई पड़ी थी। ट्रेफिक ठीक-ठाक था। शा और सुबह तो इस सड़क पर वाहनों की लम्बी-लम्बी कतारें रेंगती रहती थी।
वैन रुकते ही, रिवॉल्वर वाले ने वैन का दरवाजा खोला और रिवॉल्वर हिलाकर बोला।
“जल्दी उतर।”
इंस्पेक्टर शाहिद खान ने दांत भींचे वैन के फर्श पर पड़ी गठरी को देखा। जिसमें अरबों के हीरे-जेवरात भरे पड़े थे फिर बच्चे को संभाले वैन से बाहर निकला।
रिवॉल्वर वाले ने फौरन दरवाजा बंद किया।
“इंस्पेक्टर वानखेड़े कहां है?”
रिवॉल्वर वाला उसके सवाल पर क्रूरता से हंसा। ड्राईविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने वैन आगे बढ़ा दी।
आगे चौराहा आया। तब तक दोनों ने फुर्ती के साथ चेहरे पर पड़ी नकाबें उतार दी थी। एक देखने में खतरनाक सा लग रहा था। जबकि दूसरा शरीफों की जमात का लग रहा था।
चौराहे से उन्होंने वैन को दायीं तरफ मोड़ दिया।
“काम बढ़िया ढंग से हुआ।” वैन चलाने वाला बोला।
“हां।” पीछे वाला गम्भीर स्वर में कह उठा- “सड़कों पर अब तक पुलिस ने नाकाबंदी करवा दी होगी। इस वैन को पुलिस देख चुकी है। खतरा अभी सिर पर है।” कहते हुए उसकी निगाह सड़क के किनारे खड़ी कार पर ज टिकी। जहां पहुंचते-पहुंचते वैन रुकी।
दोनों फर्ती से नीचे उतरे।
“डिग्गी में गठरी आ जायेगी?” रिवॉल्वरें उनकी जेब में पहुंच चुकी थी।
“आ जायेगी।” कहते हुए उसने डिग्गी खोली।
उसके बाद दोनों ने चादर की उस गठरी को उठाकर कार की डिग्गी में रखा और डिग्गी बंद कर ली। वाहन सड़क पर से गुजर रहे थे। परन्तु किसी का ध्यान उनकी तरफ नहीं था। उनमें से एक ने ड्राईविंग सीट संभाली। दूसरा बगल में बैठा। इसके साथ ही कार स्टार्ट हुई और आगे बढ़ गयी।
“ये चोरी की कार थी। जो हमने यहां खड़ी की है। मुझे डर था कि पुलिस इस कार को चोरी की पहचान कर, अपने कब्जे में न कर ले, लेकिन सब ठीक रहा। परन्तु खतरा अभी सिर पर है। जिसकी ये कार है। उसने रिपोर्ट लिखा दी होगी। पुलिस के पास इस कार का नम्बर पहुंच गया होगा। पुलिस हमें रोक सकती है।”
“घबरा मत सब ठीक है।” दूसरे ने तसल्ली भरे स्वर में कहा- “मुसीबत वाला वक्त निकल चुका है। तू तो ऐसे बात कर रहा है, जैसे मुम्बई की सारी पुलिस इसी कार को ढूंढ रही हो।”
‘कुछ पलों तक उनके बीच खामोशी रही। चुप्पी रही।”
“अब किधर का रास्ता लेना है?” बगल में बैठा व्यक्ति बोला।
पृथ्वी स्टूडियो को पार कर-फिर रास्ता बताता हूं। स्पीड सामान्य रखना कार की ट्रेफिक पुलिस चालान के लिये रोक सकती है। इस वक्त हमें किसी तरह की मुसीबत मोल नहीं लेनी है।”
उसने सामान्य गति से कार आगे बढ़ाते हुए बगल में बैठे व्यक्ति को देखा।
“त्रिखा।”
“हां”
“हमारे पास अरबों की दौलत है। पच्चीस तीस अरब की।”
उसकी आवाज में गम्भीरता थी।
त्रिखा ने उसे देखा फिर मुस्कुराकर कह उठा।
“गुलाटी ये सारी दौलत हमारी नहीं है। इसके और भी कई हिस्सेदार हैं।” त्रिखा ने लापरवाही से कहा- “मैं तेरी घटिया नीयत के बारे में बहुत अच्छी तरह जानता हूं। दूसरों के माल पर नजर रखना छोड़ दे।”
“समझदारी से काम ले। ये किसी के बाप का माल नहीं है। लूट का माल है। इसका मालिक वो ही होगा, जिसका इस पर अधिकार हो जायेगा। ये हम दोनों की हो जाये तो सोच हमारी जिन्दगी कितनी शानदार होगी।”
“पागल है तू।” त्रिखा ने गहरी सांस ली।
“क्या मतलब?”
“बांटने के बाद भी हमारा हिस्सा अरबों का होता है। अपने हिस्से से ही हम शानदार जिन्दगी बिता सकते।”
दोनों छ:-सात सालों से इकट्ठे काम कर रहे थे। जैसे तैसे दोनों में अच्छी पट रही थी। त्रिखा अच्छी तरह जानता था गुलाटी की कमीनी नियत को। गुलाटी तो चाहता था कि सारी दुनिया की दौलत सिमटकर उसकी गोद में आ जाये और त्रिखा का सोचना था कि लालच ठीक नहीं।
“पागलों वाली बातें तो तू कर रहा है।” गुलाटी बोला- “होश से काम ले। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते। अगर हम आधा-आधा कर लें तो, जिन्दगी का हर मजा लूट लेंगे, जिसके बारे में हम सोच भी नहीं सकते।”
त्रिखा खामोश रहा।
“क्या सोच रहा है?”
“मैं तेरी तरह बेईमान सोच का नहीं हूं। बुरे कामों में हमेशा ईमानदारी इस्तेमाल करते हैं। हम सबने मेहनत की डकैती करने में। सबने अपनी जान को खतरे में डाला है। बिना हेराफेरी के सबको हिस्सा मिलना चाहिये।” त्रिखा ने एक-एक शब्द चबाकर गम्भीर स्वर में कहा- “मैंने तेरे से कितनी बार कहा है कि बुरे काम तब फलते हैं, जब ईमानदारी से किए जायें। गलत काम करके भी बेईमानी की कुर्सी पर बैठना, बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं। मिल-बांट कर खाने से सब ठीक रहता है। अरबों, का जो हिस्सा मिलेगा। वो ही ठीक है। ज्यादा का लालच मत कर राजेश।”
राजेश गुलाटी ने गर्दन घुमाकर उखड़ी निगाहों से त्रिखा को देखा। आगे पुनः चौराहा आ गया था। उसके बाद पृथ्वी स्टूडियो था। परन्तु उसके बाद छोटा-सा मोड़ काटने पर आगे जाकर कुछ हिस्सा सुनसान-सा आ जाता था। आगे जाकर गुलाटी ने कार उस सड़क पर डाल दी।
“मतलब कि मेरी बात तेरे को मंजूर नहीं?” राजेश गुलाटी का स्वर सामान्य था।
“नहीं मंजूर। इस तरह की हेराफेरी मुझे पसन्द नहीं। सबको बराबर का हिस्सा मिलना चाहिये।”
गुलाटी की आंखों में खतरनाक भाव उभरे। परन्तु वो बोला कुछ नहीं। कार आगे बढ़ती रही। त्रिखा का ध्यान सामने की तरफ था। काम चलता रहना चाहिये।
बायें हाथ से स्टेयरिंग थामें, राजेश गुलाटी ने दरवाजे की तरफ सीट के नीचे दायें हाथ की उंगलियों से टटोला तो उंगलियां चाकू के दस्ते से टकराई। जिसे कि उसने पहले ही वहां टेप से चिपका रखा था। सावधानी से टेप हटाकर दायें हाथ से चाकू के दस्ते की मुट्ठी में पकड़ लिया। चाकू का फल नौ इंच लम्बा और डेढ़ इंच चौड़ा था। वो इतना तेज था कि आसानी से उससे किसी जानवर को काटा जा सकता था।
चाकू हाथ में आते ही गुलाटी की आंखों में मौत के सर्द भाव आ ठहरे थे। सड़क का ये सुनसानी हिस्सा गुजर रहा था।
“त्रिखा। मान ले ये मेरी बात। ये दौलत आधी-आधी कर लेते हैं और निकल भागते हैं कहीं दूर।”
“चुपचाप कार चलाता रहा।” त्रिखा की आवाज में तीखापन आ गया- “ऐसा नहीं होगा जो तू सोच रहा है।”
दांत भिंच गये राजेश गुलाटी के। उसने सड़क के किनारे कार रोक दी।
त्रिखा ने उसे देखा तो होंठ सिकुड़ गये। गुलाठी अपने चेहरे के भावों को छिपा नहीं पाया था। या यूं कहा जाये कि चेहरे पर छाये भावों को छिपाना उसने जरूरी समझा ही नहीं था।
“मेरे इन्कार पर गुस्सा आ गया तेरे को।” त्रिखा ने कड़वे स्वर में कहा- “लेकिन मेरा इन्कार करना अपनी जगह कायम है। इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। कार आगे बढ़ा। ताजी-ताजी डकैती की है। हमारा इस तरह रुकना ठीक नहीं है।”
तभी साइड से राजेश गुलाटी ने चाकू वाला हाथ बाहर निकाला। फौरन त्रिखा की आंखें फैल गयी। अब समझा था वो गुलाठी के चेहरे पर उभरे भावों का मतलब।
“ये क्या कर रहा...।” त्रिखा के होठों से निकलने वाला खरखराता स्वर, उसके मुंह में ही रह गया।
“ये छुरा तेरी ईमानदारी का मैडल है त्रिखा।” इसके साथ ही उस छुरे का पूरा का पूरा फल उसकी कमर में धंसा और पेट की तरफ से बाहर आ गया। जो कि खून से सुर्ख हो रहा था।
त्रिखा के शरीर को तीव्र झटका लगा, दूसरे ही पल वो ठण्डा हो गया। उसका मृत शरीर दरवाजे के साथ जा टिका। आंखें अभी भी हैरानी से फटी पड़ी थी।
इन पलों में कोई भी वाहन वहां से नहीं निकला था। खतरा सिर पर है, इसका एहसास था राजेश गुलाटी को। अरबों की दौलत कार में थी तो साथ में अब लाश भी थी। फांसी तक पहुंचाने का पूरा सामान कार में मौजूद था। इन हालातों में लाश को कार के बाहर फेंकना ठीक नहीं था। दूर से आते किसी वाहन की नजर पड़ गयो तो अरबों को दौलत खतरे में पड़ सकती है।
बिना वक्त गंवाये गुलाटी ने त्रिखा की लाश को हाथ बढ़ाकर गर्दन से पकड़ा और उकडू की मुद्रा में नीचे को झुका दिया। लाश का सिर डैशबोर्ड से टकराया। राजेश गुलाटी ने दूसरा हाथ भी लगाया और लाश को उकडू बनाकर डैशबोर्ड और पायदान के बीच फंसा दिया। अब स्थिति ये थी कि त्रिखा की लाश के पैर पायदान पर थे।
और सिर नीचे को हुआ, गर्दन डैशबोर्ड के पास फंसी, पांवों की तरफ थी बाहर से गुजरता व्यक्ति भीतर देखे तो यही सोचेगा कि किसी चीज की तलाश में नीचे झुका हुआ है। सड़क पर से गुजरते वाहन को झुकी हुई लाश नजर नहीं आयेगी। यानि कि किस्मत साथ दे तो अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है।
गुलाटी ने कार स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। रफ्तार सामान्य ही रखी। खुद को वो असंयत सा महसूस कर रहा था। बांह से माथे पर आने वाले पसीने को बार-बार पौंछता। मिनट भर में दस बार तो ये ख्याल आया कि उसने यूं ही त्रिखा की जान ले ली तो दस बार मन में ये भी आया कि ठीक किया। साले को मर ही जाना चाहिये था। बहुत ईमानदार बनता है, बेईमानों की दुनिया में रहकर डकैती डालता है और बातें संतो जैसी।
लेकिन वो अब क्या करे?
लाश के साथ कार में पच्चीस-तीसअरब की दौलत थी। अकेला ये सब नहीं संभाल सकेगा। पकड़ा जायेगा। दौलत जेवरातों के रूप में थी। इन जेवरातों को यूं बाजार में नहीं बेचा जा सकता। जेवरातों की प्रदर्शनी हुई थी। अखबारों में इनकी तस्वीरें छपी है। इस डकैती के बाद अब तो पुलिस के साथ-साथ हीरे-जेवरातों के व्यापारी भी सतर्क हो गये होंगे कि देखते हैं डकैती के जेवरात ले जाने वाले कहां बेचते हैं?
अगर ये दौलत रुपयों या हीरों में होती तो इतनी परेशानी नहीं थी।
अब क्या करे?
अकेला है वो? दौलत लेकर कहीं खिसका तो पक्का है देर-सवेर में फंस जायेगा। खुद को संभालेगा या अरबों के इन जेवरातों को कम से कम उसे एक साथी की जरूरत अवश्य थी इस मौके पर उसने अपनी पहचान वालों के बारे में सोचा कि ऐसे मौके पर किसको अपने साथ मिलाये? कुछ के बारे में सोच कर किसी को इस मामलों में साथ मिलाने का विचार छोड़ दिया। क्योंकि उसकी तरह सब हरामजादे थे। मालूम नहीं, कब धोखा दे दें, सारी दौलत पाने के लिये उसने एक निगाह त्रिखा की लाश पर मारी फिर सामने देखने लगा।
उसे लगा शायद त्रिखा की जान लेने में उसने जल्दी कर दी?
अब कहां जाये दौलत के साथ?
कोई रास्ता नजर न आया राजेश गुलाटी को। ऐसे मौके पर खुद को अकेला पाकर उसे बहुत बुरा लगा कि आज तक उसने ऐसा इन्सान भी नहीं पाया जिस पर आंखें मूंदकर विश्वास कर सके। जबकि उसके मिलने वाले बहुत थे, परन्तु भरोसे लायक कोई नहीं था।
सोचता रहा राजेश गुलाटी। सोचता रहा।
कार सामान्य रफ्तार से आगे बढ़ती जा रही थी। कार को पुन: वो मुख्य सड़क पर ले आया था। सड़क पर नजरें टिकाये, चेहरे पर गम्भीर नजरें टिकाये वो सोच रहा था। इस बात की परवाह उसे जरा भी नहीं थी कि बगल की सीट पर उसके साथ कार में लाश मौजूद है। चार खून वो पहले कर चुका था। त्रिखा का खून उसकी जिन्दगी का पांचवा खून था।
आखिरकार राजेश गुलाटी ने फैसला ले लिया कि इस वक्त उसे क्या करना चाहिये।
उसने अपने उन साथियों के पास जाने की सोच ली थी, जो डकैती में शामिल थे। जैसी योजना चल रही थी। इस वक्त योजना को वैसे ही चलने देना, उसके लिये सुरक्षित बात थी। सारी दौलत को पाने के लिये क्या करना है। इसका फैसला करने के अभी मिलेंगे। बहुत ही आराम से अपनी इस समस्या का हल निकाल सकता बहुत मौके हैं।
गुलाटी इस वक्त अपने साथियों के पास पहुंचकर खुद को सुरक्षित कर लेना चाहता था। दौलत पास थी। लाश बगल में थी दिल्ली की सड़कों पर दौलत और डकैतों की तलाश में पुलिस का शिकंजा कसता जा रहा होगा। ज्यादा देर खुले में रहना उसे फंसा सकता था और दौलत का मजा लेने के लिये आजाद रहना बहुत जरूरी था।
गुलाटी पृथ्वी थियेटर पार करके उधर कालोनी के एक मकान के गेट के पास उसने कार रोकी। पीले रंग का मकान साधारण सा था। कार से बाहर निकलकर उसने गेट खोला और कार को गेट के भीतर ले जाकर रोका। इंजन बंद किया फिर पलटकर गेट बंद करने के बाद मुख्य दरवाजे के पास पहुंचा।
दोपहर के साढ़े तीन बजने जा रहे थे।
राजेश गुलाटी दरवाजा थपथपाते लगा कि तभी दरवाजा खुला। सामने पचास वर्षीय व्यक्ति खड़ा दिखा। उसके कपड़ों से स्पष्ट हो गया कि जिस डकैत ने हॉल में माईक पकड़ा हुआ था, ये वो ही है।
गुलाटी बिना रुके उसकी बगल से निकला और भीतर चला गया। उस व्यक्ति ने कार पर निगाह मारी। कुछ पलों तक कार को देखता रहा फिर दरवाजा बंद करके पलटा। उसकी तीखी निगाह राजेश गुलाटी पर जा टिकी थी।
“डकैती का माल कहां है?” उसके शब्दों में इस वक्त पैनापन था।”
“चिन्ता क्यों करते हो।” राजेश गुलाटी शांत भाव में मुस्कुराया- “माल कार में पड़ा है भोपाल सिंह।”
“कार में कहां?”
“डिग्गी में।”
तभी पीछे वाले कमरे से दो व्यक्ति वहां पहुंचे। ये दोनों वो थे जो युवती और औरत को ढाल बनाकर वहां से निकल भागे थे।
उन्हें देखते ही राजेश गुलाटी समझ गया कि सब काम ठीक-ठाक से निपट गया है। वे लोग खतरे से बाहर हो चुके हैं। उनमें से कोई पकड़ा नहीं गया।
“त्रिखा कहां है?” भोपाल सिंह बोला- “वो तुम्हारे साथ था।”
“अब भी साथ ही है।” गुलाटी ने गहरी सांस लेकर सिग्रेट सुलगाई- “कार में है। मरा पड़ा है।”
“क्या?” भोपाल सिंह के चेहरे पर भूचाल के भाव उभरे।
उन दोनों व्यक्तियों के चेहरों पर भी हक्के-बक्के भाव आ ठहरे।
“शर्म आ रही है बताते हुए, क्योंकि त्रिखा मेरा पुराना यार था। हमने कई काम इकट्ठे किए थे। मैं तो उस पर आंखें बंद करके विश्वास...”
“बात बोल बात।” भोपाल सिंह के माथे पर बल थे- “हुआ क्या?”
“खास नहीं है बस।” गुलाटी ने कश लेते हुये धीमे स्वर में कहा- “उसके मन में बेईमानी आ गयी थी। वो चाहता था। अरबों के जेवरातों के साथ हम मुम्बई से कहीं दूर निकल जायें। लेकिन मैं उसकी बात मानने से इन्कार कर दिया। उसने पहले से ही कार में छिपा रखा छुरा निकालकर मुझे धमकी दी कि अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी तो वो मेरी जान ले लेगा। मैंने उसे दिखावा किया कि, मैंने उसकी बात मान ली है फिर मौका मिलते ही उसके हाथ से छुरा छीनकर उसे मार दिया। लाश ठिकाने लगाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। पास में दौलत थी। इसलिए सीधा यहीं आ गया।”
भोपालसिंह अजीब-सी निगाहों से गुलाठी को देखने लगा।
उन दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
उनमें से एक का नाम विकास नारंग था जो कि तीस बरस का युवक था और “ताकत प्राप्त करे” जैसे विज्ञापन में काम कर चुका था। दूसरा अभिनव कालरा था। पढ़ा-लिखा बेकार युवक था वो।
“विकास।” अभिनव कालरा बोला- “त्रिखा तो बहुत हरामी निकला।”
“अच्छा हुआ जो मर गया।” विकास नारंग ने कहा- “नहीं तो आने वाले वक्त में हमारे लिये जाने क्या मुसीबतें खड़ी करता। लालच इन्सान को हमेशा ले डूबता है।”
भोपाल सिंह की निगाह अभी भी गुलाटी पर थी।
“तुम मेरे थोबड़े पर क्या देख रहे हो?” गुलाटी ने भोपाल सिंह को देखकर तीखे स्वर में कहा।
“कुछ नहीं देख रहा।” भोपाल सिंह सिर हिलाकर आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठ गया- “त्रिखा के बारे में सोच रहा हूं। त्रिखा से तुम्हारी पहचान अवश्य ज्यादा थी। परन्तु मैं भी उसे जानता था कि वो कैसा है।”
“कैसा था वो?” राजेश गुलाटी का स्वर तीखा हो गया।
“वो हेराफेरी वाला-गद्दार किस्म का इन्सान नहीं था।”
“तुम्हारा मतलब कि जो मैं कह रहा हूं वो गलत है और।”
“मेरा मतलब ये नहीं है जो तुमने फौरन निकाल लिया। गुस्सा कम किया करो।” भोपाल सिंह ने शांत स्वर में कहा- “मैंने तो कहा है कि वो हेराफेरी वाला इन्सान नहीं था। लेकिन दौलत सामने पाकर नियत बदलते देर भी नहीं लगती।”
तभी विकास नारंग कह उठा।
“इन बातों को छोड़ो बाहर खड़ी कार की तरफ ध्यान दो। उसमें अरबों की दौलत और लाश है। कार चोरी की है। इतनी बड़ी डकैती के बाद, पुलिस पूरी मुम्बई में अपना शिकंजा कस लेगी। चोरी के वाहनों के नम्बरों की लिस्ट तो पुलिस हाथ में लेकर घूम रही होगी। मुसीबत में नहीं फंसना है तो दौलत को अन्दर लो और लाश को कार सहित यहां से दूर कर देना चाहिये। जब तक हम ये काम नहीं करेंगे। आराम से बैठकर चाय भी नहीं पी सकेंगे। आने वाले वक्त में अब खतरा बढ़ना है। डकैती से ज्यादा खतरा तो अब होगा।”
विकास नारंग के शब्दों के बाद वहां गहरी चुप्पी छा गयी।
ठीक तभी फोन की बेल बजने लगी।
पलभर के लिये चारों चौंके। नजरें मिली। अभिनव कालरा उठने को हुआ कि भोपाल सिंह ने उसे बैठे रहने का इशारा किया और उठाकर फोन के पास पहुंचा। रिसीवर उठाया। तीनों की निगाह उस पर थी।
“हैलो।” भोपाल सिंह ने सामान्य स्वर में कहा।
“मैं हूं।” दूसरी तरफ मर्द का भारी स्वर उसके कानों में पड़ा।
प्रिय पाठकों, जैसे कि आप देख ही रहे हैं कि देवराज चौहान की सारी योजना उलट-पुलट हो गयी। कैसे हो गया। इस बारे में अभी वो भी नहीं जानता। देवराज चौहान भी उतना ही अंजान है जितने कि आप या मैं। अब कई दिलचस्प सवालों का सिलसिला शुरू होगा जैसे कि देवराज चौहान के नकली बारूद मैन कहां गये। असली कहां से आ गये? देवराज चौहान की डकैती की योजना और उसकी रिवॉल्वरों-नकाबों के दम पर किसने डकैती कर डाली? क्या कोई डकैती की योजना से वाकिफ हो गया था, तो वो कौन था? अगर घर के भेदी का काम है तो, वो भेदी कौन है? इस डकैती में सारी गड़बड़ किसने की? जिसने भोपाल सिंह को फोन किया था। प्रवेश गोदरा की बहन देवी गोदरा जो मन्दिर में विनोद खुराना से शादी करके, नकली नोटों को छोड़कर चौंतीस लाख के जेवरातों के साथ मुम्बई से भाग गयी थी, उन दोनों का कमाल आप इस उपन्यास के आगामी भाग में पढ़ेंगे। जिस पार्टी ने डकैती की, डकैती के बाद उनका एक कारनामा तो त्रिखा की हत्या के साथ सामने है। वो आगे-आगे क्या करते हैं, ये जानना बेहद दिलचस्प है। प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा की अपनी ही सोचे हैं कि किसने डकैती की? मदनलाल बदमाश की कैद में इंस्पेक्टर वानखेड़े। मुम्बई के चप्पे-चप्पे पर पुलिस की नाकाबंदी और अपने ढंग से देवराज चौहान और जगमोहन की भागदौड़ और तफ्तीश। कदम-कदम पर सनसनी के झटके दूसरे भाग में आपके सामने आ रहे हैं। रूपा ईरानी, जो मन ही मन प्रवेश गोदरा को पति मान चुकी थी उसके मानने में उसके प्यार का नशा भी था और उस दौलत का भी जो, डकैती के बाद उन्हें मिल जानी थी। जो कि अब हाथ से निकल गयी थी। परन्तु रूपा ईरानी उन लोगों में से नहीं थी जो दिन गया, बात खत्म वाली बात कहते हैं। यानि कि अब वो चुप नहीं बैठने वाली थी। उधर रनवीर भंडारी डकैती के बाद दौलत मिलने की आस लगाये बैठा था कि मार्किट का उधार चुकाकर, बाजार में गिरती साख फिर से ठीक कर लेगा। लेकिन डकैती कोई दूसरा कर गया था। इन सब बातों के साथ सवाल ये उठता है कि डकैती देवराज चौहान के नाम पर की गयी। वानखेड़े अगर मदनलाल की कैद से आजाद हुआ तो क्या देवराज चौहान तक पहुंच सका। देवराज चौहान मालूम कर सका कि असल मामला क्या है। गड़बड़ कहां हुई? डकैती की अरबों की दौलत का क्या हुआ? इन सब सवालों का जवाब आपको मिलेगा दुर्गा पॉकेट बुक्स के आगामी सैट में प्रकाशित होने वाले देवराज चौहान सीरीज के धमाके दार नये उपन्यास ‘यारी दौलत से’ में।
“ओह आप?” भोपाल सिंह के होठों से निकला- “सब काम ठीक से निपट...”
“मालूम है मुझे।”
“क्या मतलब?”
“भोपाल सिंह। इतना बड़ा मामला संभालना आसान नहीं। हर तरफ नजर रखनी पड़ती है। नजर न रखी जाये तो ऐसे कामों में नुकसान ही नुकसान है। तुमने क्या समझा कि सारा रास्ता तुम्हें दिखाकर, मैंने चादर ओढ़ ली। ताकि तुम लोग कुछ भी कर जाओ। जो तुम्हें डकैती की योजनी का जर्रा-जर्रा थमा सकता है, वो क्या तुम्हारी तरफ से पीठ मोड़ लेगा।”
भोपाल सिंह गहरी सांस लेकर गया।
“एक खबर देनी थी।”
“कहो।”
“दो बारूद मैन में से एक ने खुद को विस्फोट में उड़ा लिया। तब वो होटल की पार्किंग में जाने की तैयारी में था। होटल को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।” आने वाले स्वर में कठोरता आ गयी थी।
“ओह।”
“दूसरे को पुलिस ने जिन्दा पकड़ लिया।”
जिन्दा पकड़ लिया?” भोपाल सिंह हक्का-बक्का सा खड़ा रह गया।
“एक पुलिस वाले ने हिम्मत दिखा दी और वो रिमोट का बटन दबाने की हिम्मत इकट्ठी न कर सका।”
“कौन मरा और कौन...?”
“जीवन लाल पकड़ा गया और सुजीत कुमार मारा गया।”
भोपाल सिंह के होंठ भिंच गये।
“जीवन लाल को हमारी बातों की कितनी जानकारी है?”
भोपाल सिंह के कानों में आवाज पड़ी।
“खास नहीं। वैसे भी उसकी कमजोर नब्ज हमारे हाथों में है। वो कुछ जान भी गया होगा तो मुंह बंद ही रखेगा।” भोपाल सिंह ने सोच भरे स्वर में कहा- “त्रिखा के बारे में बताना चाहता था कि वो मर गया। उसे गुलाटी ने।”
“मालूम है मुझे। सब खबर मेरे पास है।” आवाज भोपाल सिंह के कानों में पड़ रही थी- “अभी इन सब बातों को छोड़कर कार की डिग्गी से दौलत निकालो और उसे सुरक्षित रखकर, बाहर खड़ी चोरी की कार को ठिकाने लगाओ उसमें त्रिखा की लाश भी है। मैं नहीं चाहता कि कामयाबी के बाद मुझे असफलता का मुंह देखना पड़े।”
“हम भी यही सोच रहे थे। ये काम अभी निपटा देते हैं।”
“आंखें कान खुले रखना। डकैती के मामले में पुलिस क्या कर रही है। ये जानकारी हासिल करते रहना। मुझे नहीं लगता कि पुलिस कभी भी हमारा सुराग पा सकेगी। हम जीत चुके हैं भोपाल सिंह।”
आने वाले स्वर में दृढ़ता के भाव थे।
“आप ठीक कह रहे हैं। लेकिन देवराज चौहान के बारे में सोचना है जो...।”
“उसकी फिक्र करने की जरा भी जरूरत नहीं है। कुछ दिन हाथ-पांव मारकर शांत होकर बैठ जायेगा। ध्यान रखना। यहां से बार-बार बाहर मत निकलना। सबको समझा देना। अभी कम से कम दस दिन सावधानी की बहुत जरूरत है। पुलिस और अखबार वालों ने डकैती के मामले को बहुत उछालना है। उसके बाद धीरे-धीरे सब शांत पड़ने लगेंगे।”
“अखबार वालों के अलावा हमें ‘आज तक’ से भी खतरा है।”
भोपाल सिंह बोला।
“आज तक?”
“जी हां। दूरदर्शन का समाचार चैनल “आज तक” ये भीतरी खबरें जाने कैसे खोज लाता है। समाचारों का तेज खोजी चैनल है। कई बार तो अपराधियों तक पहुंचने में, पुलिस को भी पीछे छोड़ देता
“तो फिर आज तक से भी सावधान रहो। इस चैनल के रिपोर्टरों से सतर्क रहो।”
“इस बात का तो मैंने पहले से ही ध्यान रखा था।”
इसके साथ ही फोन बंद हो गया।
भोपाल सिंह रिसीवर रखकर पलटो और गम्भीर निगाहों से सब को देखा।
“हम पर-हमारी हरकतों पर वो आदमी पूरी तरह नजर रख रहा है, जिसने हमें इस काम का ठेका सौंपा था।” भोपाल सिंह ने कहा- “काम हो जाने के बाद दो-दो अरब हमारे और बाकी उसके। अब काम हो चुका है।”
दो पलों के लिये वहां खामोशी छा गयी।
“वो बताने से पहले ही त्रिखा की मौत के बारे में जानता है। चालाक आदमी है वो।”
“भोपाल सिंह।”अभिनव कालराबोला- “सुना है, पच्चीस-तीस अरब के जेवरात हैं। ऐसे में सिर्फ दो-दो अरब की दौलत हमारी और बाकी सब उसकी। मेरे ख्याल में हमें कम मिल रहा है।”
“गलत बात कह रहे हो। मत भूलो वो इस मामले का कर्ता-धर्ता है। उसने इस सारे काम का इन्तजाम किया है। वरना हमारे बस की कहां थी ये डकैती। उस हॉल में प्रवेश करना कठिन था, लेकिन उसने हॉल के भीतर रिवॉल्वरें और नकाब पहुंचा दी कि उसका इस्तेमाल कर सके। हम में से कोई भी डकैती की योजना बनाने के काबिल नहीं। उसने हमें योजना बनाकर दी। जो कि हमारी सफलता का कारण बनी। एक को भी शूट नहीं करना पड़ा।”
“ये देवराज चौहान का क्या चक्कर है?” राजेश गुलाटी ने कहा।
“इस बारे में खास कुछ नहीं पता। उस व्यक्ति ने कहा था कि डकैती के दौरान इस तरह बात करती है कि सुनने वालों को लगे कि डकैती देवराज चौहान कर रहा है या उसके इशारे पर हो रही है। साथ में किसी इंस्पेक्टर वानखेड़े का भी जिक्र करना है, इस तरह कि जैसे वो देवराज चौहान की कैद में हो। हमने ऐसा ही किया।
भोपाल सिंह ने सोच भरे स्वर में कहा- “मेरे ख्याल में देवराज चौहान
का इस मामले से वास्ता है। उससे की बातों से मुझे कई बार स्पष्ट तौर महसूस हुआ कि जैसे देवराज चौहान भी वहां डकैती करने जा रहा हो।”
“पूछना था इस बारे में।”
“क्या जरूरत है।” भोपाल सिंह ने सिर हिलाकर कहा- “ये सारा मामला उस व्यक्ति का है। जिसने हमसे डकैती करवाई है। हम अपने काम में सफल रहे। बात अपने मतलब की न हो तो, ज्यादा कुरेदना भी ठीक नहीं होता। कुछ दिन में मामला ठण्डा हो जायेगा तो अपना-अपना हिस्सा लेकर हम अलग हो जायेंगे।”
“त्रिखा नहीं रहा।” राजेश गुलाटी बोला- “उसका हिस्सा भी हम चारों में बंटेगा।”
“वो तो बंटेगा ही।” अभिनव कालरा फौरन बोला।
भोपाल सिंह ने तीनों पर निगाह मारी फिर बोला।
“लाश और कार को यहां से दूर छोड़ने कौन जायेगा?”
“बाहर जाने का मेरा इरादा नहीं है।” राजेश गुलाटी ने मुंह बनाया- “लाश की कमर में जो छुरा धंसा हुआ है उसकी मूठ पर मेरी उंगलियां के निशान हैं। या तो वहां से उंगलियों के निशान साफ कर देना या छुरा ही वापस ले आना।”
भोपाल सिंह ने विकास नारंग और अभिनव कालरा को देखा।
“तुम में से कौन जायेगा लाश और कार को ठिकाने लगाने?”
विकास नारंग और अभिनव कालरा की नजरें मिली।
“काम में और हिस्सों में हम बराबर के साथी हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं है।” विकास नारंग ने कहा- “तुम ऑर्डर देने वाले ढंग में बातें मत करो और कार-लाश को तुम ही यहां दूर छोड़कर आओ। काम करने की आदत डालो।”
“मैं साथ चल पड़ता हूं।” अभिनव कालरा बोला।
“नहीं।” भोपाल सिंह ने कहा- “जो भी जायेगा। अकेला जायेगा। फंसना हो तो एक फंसे। दो क्यों फंसे।”
“ये भी ठीक है।”
“वापसी पर खाने-पीने का सामान लेते आना।” राजेश गुलाटी ने कहा- “बार-बार बाहर जाना भी ठीक नहीं।”
भोपाल सिंह दरवाजे की तरफ बढ़ा।
“आओ। डिग्गी में से अरबों की दौलत की गठरी निकाल लें। हम लोगों के वहां से निकल आने के बाद जीवन लाल को पुलिस ने सही-सलामत पकड़ लिया है। लेकिन सुजीत कुमार ने विस्फोट से को उड़ा लिया।”
“ओह।” राजेश गुलाटी मुस्कुरा पड़ा- “परवाह नहीं। जीवन लाल पुलिस को हमारे बारे में कुछ नहीं बता सकता।”
बाहर बारूद का विस्फोट हुआ तो कान थर्रा उठे थे जो उस
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हॉल में मौजूद थे।
सब एक-दूसरे को देखने लगे। क्या हुआ? जवाब किसी के पास नहीं था। परन्तु इस बात का एहसास सब को हो चुका था कि कोई अनहोनी बुरी घटना हो गयी है।
उस विस्फोट के दस मिनट बाद प्रवेश द्वार पर पुलिस वाले आ खड़े हुए थे और दस-दस करके लोगों को बाहर निकालना शुरू कर दिया था और साथ में हिदायत देते जा रहे थे कि फौरन होटल से दूर निकल जाये। बाहर रहकर भीड़ न लगाये। इसी बीच ये खबर हॉल के भीतर भी आ पहुंची थी कि बाहर मौजूद जो व्यक्ति पीठ पर बारूद के थैले लटकाए हुए थे, उनमें से एक ने पुलिस को करीब आते पाकर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया था।
ये खबर देवराज चौहान को सकते में डाल देने वाली थी।
देवराज चौहान ने बाहर खड़े रहने के लिये जिन दो आदमियों का इन्तजाम किया था। उनकी पीठ पर मौजूद थैले खाली होने थे। भला उनके पास बारूद कहां से आ गया? एकाएक देवराज चौहान को महसूस होने लगा कि गड़बड़ थोड़ी नहीं बहुत ज्यादा हो चुकी है जिसकी उसे जरा भी खबर नहीं। उसकी योजना पर, किसी ने अपनी योजना का साया डालकर सफलता और क्रूरता भरे ढंग से डकैती को पूरा कर लिया है।
बारी-बारी देवराज चौहान की गम्भीर निगाह जगमोहन सोहनलाल प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा से मिली। विस्फोट की वजह से सब बैचेन नजर आ रहे थे।
तभी पीछे से रूपा ईरानी पास पहुंची। उसकी सांसें तेज-तेज चल रही थी।
“तुम तो कहते थे डकैती में कोई नहीं मरेगा।” उसके स्वर में गुस्सा था- “बाहरवालों की पीठ पर बारूद नहीं, खाली थैले हैं, लेकिन सुनने में आया है कि उनके थैलों में बारूद था। एक ने रिमोट का बटन दबाकर खुद को उड़ा लिया है।”
आसपास चल रहे लोगों की निगाह उनकी तरफ उठी।
रूपा ईरानी के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर देवराज चौहान हड़बड़ा उठा। आंखों में कठोरता आ गयी।
“चुप क्यों हो। जवाब दो। तुम तो।”
“बाद में बात करना।”देवराज चौहान ने अपने स्वर को गम्भीर और सामान्य रखा।
“क्यों? अब क्यों नहीं। तुमने कहा था कि इस डकैती में किसी की जान नहीं जायेगी।”
देवराज चौहान ने दांत भींचकर, गर्दन घुमाते हुए रूपा ईरानी को देखा।
आसपास चलते लोग भी उनकी बातें सुनने लगे थे। पीछे आ रहे पुलिस वाले ने ये सब सुना तो वो फौरन उनके सामने आकर रुक गया। आखिरकार देवराज चौहान को भी रुकना पड़ा। रूपा ईरानी की वजह से नई मुसीबत सामने आ गयी थी। रूपा ईरानी अभी तक गुस्से में और बदहवास थी।
“मुझे बताईये मैडम।” पुलिस वाले का हाथ होलेस्टर में मौजूद रिवॉल्वर पर पहुंच गया- “क्या डकैती में इसका हाथ है।”
रूपा ईरानी के कुछ कहने से पहले ही देवराज चौहान शांत-गम्भीर स्वर में कह उठा।
“होश में रहकर बात करो ऑफिसर । मैं आपको डकैती करने वाला लगता है। मैडम के होश कायम नहीं हैं। इस वक्त असल डकैती के दौरान मैंने इन मैडम को विश्वास दिलाया था कि डकैती में किसी की जान नहीं जायेगी। बाहर जो दो व्यक्ति पीठों पर बारूद लादे हुए हैं,वो थैले खाली हैं। कोरी धमकी दे रहे हैं वे लोग। अब बाहर विस्फोट हुआ तो घबराहट में मैडम अपने होश खो बैठी और गुस्से में इस तरह बात करने लगी जैसे मैं डकैती कर रहा होऊ।”
पुलिस वाले ने देवराज चौहान को घूरा फिर रूपा ईरानी को देखा।
“क्यों मैडम, सच में यही बात थी?”
रूपा ईरानी बेहद घबराई नजर आ रही थी।
“इंस्पेक्टर साहब।” भीड़ में दो कदमों पर खड़ा जगमोहन कह उठा- “ये जनाब ठीक कह रहे हैं। जब डकैती के बीच में ये खुसर-फुसर कर रहे थे तो मैं इनके पीछे ही खड़ा था। तब मैडम घबरा रही थी तो इन जनाब ने ये शब्द कहकर मैडम को तसल्ली दी थी।”
“मैं आपका जवाब सुनना चाहता हूं मैडम।” पुलिस वाले की नजरें रूपा ईरानी पर थी।
रूपा ईरानी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी और सहमति से सिर हिला दिया। पुलिस वाला उनके सामने से हटकर आगे बढ़ गया।
देवराज चौहान ने कठोर निगाहों से बगल में खड़ी रूपा ईरानी को घूरा।
“सा-सॉरी।” रूपा ईरानी के होठों से घबराहट भरा स्वर निकला- “म-मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये सब क्या हो रहा है। -
मैं अपने होश खो बैठी थी। ले-लेकिन ये सब क्या हुआ, ये डकैती...”
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा और लोगों की भीड़ में शामिल होता हुआ आगे बढ़ने लगा कि बाहर निकल सके।
समाप्त
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