रात के ग्यारह बज रहे थे।

प्रवेश गोदरा नाईट सूट पहने अपने घर पे, बेड पर अधलेटा या होकर उस विदेशी पत्रिका को देख रहा था। जिसके कवर पेज पर रूपा ईरानी के खूबसूरत चेहरे को क्लोज-अप छपा था। सोचों में सिर्फ यही था कि इस खूबसूरत शह को उसने मना कर दिया था कि वो उससे शादी नहीं करेगा। अगर शादी की होती तो आज दौलत और शोहरत में खेल रहा होता। ऐसी खूबसूरत और कीमती औरत का पति बनने का सौभाग्य उसे प्राप्त हो चुका होता। यूँ बीस-पच्चीस हजार की नौकरी में धक्के न खा रहा होता। लेकिन वो वक्त बीत चुका था। तीन साल हो गये थे।

संजना ठीक थी उसके लिये। फोन पर ही उसके घरवालों से शादी पर बात हो गयी थी। एक बार वो संजना के घर गया था। उनके मां-बाप ने उसे देखा हुआ था। एतराज वाली बात कहीं भी नहीं उठी थी। वे कल मन्दिर में शादी करने को तैयार थे। वक्त-स्थान और मन्दिर तय हो गया था। अकेला ही रहा था वो घर में। बहन देवी, पैंतीस लाख के जेवरों के साथ, विनोद खुराना के साथ ऐसी गयी थी कि फिर उसकी कोई खबर नहीं मिली थी। न तो वो आई और न ही उसका फोन। गोदरा चाहता भी नहीं था कि उसकी कोई खबर आये। बच्चों की तरह पाला था देवी को और विनोद खुराना जैसे आवारा मर्द की खातिर, उसकी दौलत ले भागी थी। उसे ही धोखा दे दिया था।

कल संजना से उसकी शादी हो जायेगी।

सोचो में डूबा प्रवेश गोदरा यूं ही मैग्जीन के पन्ने पलटने लगा। रूपा ईरानी के पास जाना था उसे जेवरात बेचने के लिए। उसे सामने पाकर वो कैसा महसूस करेगी। उसके जेवरात तो सारे ही खरीद लेगी। इतनी इज्जत तो उसकी करेगी ही वो। और क्या-क्या बातें करेगी। पति भी होगा उसका वहां। बच्चा भी बच्चे के लिये कोई उपहार ले जाना उचित रहेगा। अब रूपा से वो दूरी बनाकर ही रहेगा। बीता वक्त बीत गया। संजना ही उसकी सब कुछ है। रूपा ईरानी तो हवा का झोंका थी जो उसकी जिन्दगी में आई और चली गयी।

पत्रिका के पन्ने पलटते-पलटते वो ठिठका। भीतरी पन्नों में रूपा ईरानी के बारे में लिखा हुआ था। उसकी मॉडलिंग और शो की तस्वीरें थी। कई पन्नों पर उसका ही जिक्र था। उसकी इन्टरव्यू का खुलासा तौर पर जिक्र था। पढ़ते हुए तस्वीरें देखते हुए गोदरा पन्ने पलट रहा था कि एकाएक ठिठका।

तस्वीर थी पन्ने पर।

आंखें सिकुड़ी। उलझन सी उभरी।

तस्वीर में उसे एक खूबसूरत बंगले के सामने खड़ा दिखाया गया था। वो मुस्करा रही थी। पास ही कार और पीछे दो कारें खड़ी नजर आ रही थी। तस्वीर के नीचे लिखा था कि टैक्सास (अमेरिका) में उसका घर। मुस्कराते हुए उसके नीचे वाले दांतों की लड़ी पूरी नजर आ रही थी। दांतों की लड़ी वाली मुस्कान गोदरा को हमेशा अच्छी लगती थी और मॉडलिंग तथा फैशन शो में भी उसकी इसी मुस्कान का बोल बाला था। शायद यही मुस्कान उसकी कामयाबी का राज था।

लेकिन इस वक्त गोदरा उसकी मुस्कान नहीं देख रहा था।

वो बंगले की एक खिड़की को देख रहा था, जिस ओर कोई खड़ा नजर आ रहा था। खिड़की पीछे थी। दूर थी। छोटी सी नजर आ रही थी। इसलिये उस पर खड़ा व्यक्ति पूरी तरह अस्पष्ट था। फिर भी उसका आकार-प्रकार समझ में आ रहा था। उस पर निगाह टिकने की वजह थी कि गोदरा को पल भर के लिये ऐसा लगा था कि जैसे उस व्यक्ति को कहीं देखा है। कई पलों तक खिड़की पर खड़े अस्पष्ट से नज़र आ रहे व्यक्ति को देखते लगा फिर पन्नों को पलटता हुआ अगले पेजों पर पहुंच गया यूं तो गोदरा मैग्जीन देख रहा था। पन्ने पलट रहा था परन्तु उसकी सोचे रह-रहकर खिड़की पर अस्पष्ट से नजर आ रहे व्यक्ति पर चली जाती। वो उसे पहले देखा, जैसा क्यों लगा? होंठ सिकोड़ कर गोदरा ने पन्ने पलटे और वापस उसी पेज पर आ ठहरा। तस्वीर को देखने लगा, जहां रूपा ईरानी अपने बंगले के सामने खड़ी थी। वो खिड़की पर नजर आ रहे अस्पष्ट से आदमी को देखने लगा। खुली खिड़की पर आधा पर्दा था। बाकी के आधे पर्दे की जगह वो खड़ा शायद तस्वीर खींचने वाले की तरफ देख रहा था।

गोदरा को फिर ऐसा महसूस हुआ जैसे उसे कहीं देखा है।

एकाएक गोदरा उठा और बेड के पास ही साईड टेबल पर रखे टेबल लैम्प के पास पहुंचा और लैम्प को रोशन करके उसकी तेज रोशनी में तस्वीर में खिड़की पर खड़े आदमी को देखने लगा फिर भी उस व्यक्ति का चेहरा स्पष्ट न देख पाया। जबकि उस व्यक्ति की बनावट उसे एहसास करा रही थी कि इसे पहले भी कहीं देखा है। टेबल के पास पड़ी कुर्सी खींचकर उस पर बैठा और टेबल के ड्राअर से वो लेंस निकाला, जिससे वो बारीक हीरों को देखा करता था। सुई के साईज के हीरे भी उस लेंस द्वारा, उन्हें के बड़े रूप में आसानी से देख लेता था।

खिड़की पर नजर आ रहे व्यक्ति के खाके पर उसने लेंस रखा। सेंटर पॉइंट उसका चेहरा ही रखा और आहिस्ता से लेंस को उठाकर, फोकस ठीक बिठाने लगा कि उसका चेहरा देख सके। वो लेंस ऐसा था कि छोटी सी चीज को उभारकर स्पष्ट दिखा देता था। उस तस्वीर को वो ऐसे देखने की कोशिश कर रहा था जैसे बाजरे के दाने के साईज को तरबूज जैसा बड़ा देखना चाहता हो। नन्हा सा खिड़की वाला चेहरा लेंस की वजह से बड़ा नजर आने लगा।

उस चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी थी।

गोदरा मैग्जीन को टेबल लैम्प के और भी करीब ले आया ताकि रोशनी की कमी न रहे। लेंस के माध्यम से दाढ़ी वाले चेहरे को देखने लगा। आधा मिनट बीता-पूरा मिनट बीत गया। गोदरा को विश्वास हो चुका था कि उसे कहीं देखा है। परन्तु पहचान न पा रहा था। गोदरा लेंस के माध्यम से दाढ़ी वाले धुंधले से चेहरे का एक-एक हिस्सा देखने लगा। दोनों आंखों को, नाक, होंठ, कान...वो हीरो का पारखी था। जानता था कि कभी-कभी किसी चीज़ का पहचानने में वक्त लग जाता है। इस काम में थकान महसूस नहीं होनी चाहिये। वरना परखने वाला धोखा खा जाता जब धुंधले से नजर आ रहे तस्वीर के होंठों को लेंस से देख रहा था कि एकाएक उसके मस्तिष्क में बिजली सी कौंधी और दोनों आंखें सख्ती से बंद कर ली। लेंस मैग्जीन पर रख लिया।

कुर्सी की पुश्त से पीठ टिकाकर गहरी-गहरी सांसें लेने लगा जैसे मीलों दौड़ रहा हो। आंखें बंद कर ली। वो खिड़की पर खड़ा वो-वो ही रूपा ईरानी का पति था। उसके अलावा दूसरा कोई उसका पति बन ही नहीं सकता। उसे घर मे उसके नज़र आने का यही मतलब था। रूपा ईरानी और वो, दोनों पति-पत्नी?

विश्वास नहीं आ रहा था प्रवेश गोदरा को?

उसी तरह पड़ा रहा कुर्सी पर, प्रवेश गोदरा।

बंद आंखों के पीछे डकैती का सारा मामला स्पष्ट हो गया था। तीस अरब के जेवरात कहां गये? कौन ले गया उन्हें। किसने गद्दारी की देवराज चौहान से और अपनी योजना बनाकर डकैती कर गया था। जिस बात को पुलिस आज तक नहीं समझ पाई। देवराज चौहान डकैती के मामले की तह तक नहीं पहुंच पाया था कि गड़बड़ कहां हुई? इस बात को वो जान गया था। तब पागल बनकर घूमते रहे थे सब, लेकिन हकीकत उनकी समझ से मीलों दूर रही थी।

अब सब कुछ प्रवेश गोदरा के सामने था।

उसकी समझ में सब कुछ आ गया था।

दस मिनट वो उसी तरह कुर्सी पर आंखें बंद किए बैठा रहा। फिर आंखें खोली। भारी हो रही थी आंखें। थकान सी भी चेहरे पर आ ठहरी थी। डकैती में कब-कहां गड़बड़ हुई, उसने तो सोचा भी नहीं था कि अब कभी मालूम हो पायेगा। तीन साल बीत गये थे। डकैती ऐसा सपना बन चुकी थी कि उसकी यादें भी धुंधली पड़ने लगी थी। गोदरा ने सिगरेट सुलगाई। उठा और कश लेता हुआ फोन के पास पहुँच गया।

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। पास रखी फोन डायरी के पन्ने पलटने लगा। सात-आठ मिनट की कोशिश के बाद एक पेज पर रुका। वहां इंस्पेक्टर वानखेड़े का नम्बर लिखा हुआ था। गोदरा ने रिसीवर उठाया और नम्बर मिलाने लगा। चेहरे पर गम्भीरता गहरी हुई पड़ी थी।

☐☐☐

“हैलो पुलिस हेडक्वार्टर?” लाईन मिलते ही उधर से आवाज आई।

“इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े से बात कराईये प्लीज।” गोदरा ने धीमे स्वर में कहा।

दो पलों की खामोशी के बाद आवाज आई।

“आप कौन हैं?”

“मैं उनकी पुरानी पहचान वाला हूं। तीन साल पहले उन्होंने ये फोन नम्बर दिया था कि –।”

“उनका नम्बर बदल गया है। दो साल हो गये। आप नया नम्बर नोट कर लीजिये।”

नया नम्बर नोट करके, गोदरा ने वहां फोन किया।

वहां फोन उठाने वाले ने कहा कि वानखेड़े साहब नहीं है। जब आयेंगे। मैसेज दे देंगे। आप मैसेज दे दीजिये। उसके बाद प्रवेश गोदरा को बहुत जोर लगाना पड़ा। तब कहीं जाकर उसे वानखेड़े के घर का नम्बर दिया गया।

गोदरा ने उसके घर पर फोन किया।

कई बार बेल बजने पर रिसीवर उठाया गया।

“हैलो।” वानखेड़े की नींद से भरी आवाज कानों में पड़ी।

“नमस्कार वानखेड़े साहब।” प्रवेश गोदरा ने धीमे स्वर में कहा –“मैं गोदरा बोल रहा हूं।”

“कौन-गोदरा?”

“प्रवेश गोदरा। तीन साल पहले हुई, जेवरातों की तीस अरब की डकैती की वजह से हम मिले...।”

“हां।” एकाएक वानखेड़े की आने वाली आवाज से सुस्ती गायब हो गयी थी –“पहचाना। कैसे हो?”

“बढ़िया।”

“तुम रामचंद्र-सूरजमल के यहां काम कर रहे थे।”

“मैं अब भी वहीं काम कर...।”

“फोन क्यों किया?”

“कल मैं शादी कर रहा हूं। शोरूम की एक सेल्स गर्ल पसन्द आ गयी। अब शादी कर लेनी चाहिये मुझे। नहीं तो बूढ़ा हो जाऊंगा।”

“खुशी की बात है। मुझे फोन क्यों किया...?”

“मेरी शादी पर नहीं आयेंगे इंस्पेक्टर साहब। आप आयेंगे तो बढ़िया सा प्रेजेन्ट भी लायेंगे। मुझे जो उपहार मिलेंगे। उससे गृहस्थी चलाने में आसानी होगी। शुरू के सालों में कोई खर्चा नहीं करना...।” बेहद शांत था गोदरा का स्वर।

“कहां कर रहे हो शादी?”

गोदरा ने बताया कि किस मन्दिर में कितने बजे शादी का प्रोग्राम है।

“मैं आऊंगा। बढ़िया-सा उपहार भी लेता आऊंगा।”

“मेहरबानी।”

“अब बताओ, फोन क्यों किया?” वानखेड़े की आवाज कानों में पड़ी।

गोदरा के होंठों से गहरी सांस निकल गयी।

“उस डकैती में कोई नहीं पकड़ा गया था?”

“नहीं।”

“तीस अरब के जेवरातों की भी कोई खबर नहीं लगी?”

“नहीं।”

“मुझे अभी-अभी सब पता चला है कि –।”

“क्या पता चला है?”

“यही कि देवराज चौहान के साथ गद्दारी किसने की। जेवरातों को कौन ले गया था। मैं आपको उन तक पहुंचा सकता हूं।”

“तुम्हें –।” वानखेड़े का हैरानी भरा स्वर कानों में पड़ा –“तुम्हें कैसे पता चला कि –।”

“कल आप मेरी शादी में प्रेजेन्ट लेकर आ रहे हैं ना?”

“हां।”

“तो फेरों के बाद, इस बारे में बातें कर लेंगे। प्रेजेन्ट बढ़िया लाना इंस्पेक्टर साहब। थोड़ा महंगा हो तो बढ़िया रहेगा। कुछ ऐसा कि जरूरत पड़ने पर उसे बेचकर महीना-दो महीना खर्चा चलाया जा सके।”

“गोदरा। तुम मुझे बताओ कि –।”

“कल मिलेंगे। फेरों के बाद बताऊंगा।” गोदरा ने कहा और रिसीवर रख दिया।

कमरे में शान्ति छाई रही।

फोन के पास वैसे ही बैठा रहा वो।

एकाएक उठा और नाईट सूट उतारकर, पैन्ट-कमीज पहनने लगा। गम्भीर हो रहा था उसका चेहरा।

☐☐☐

दरवाजे पर थपथपाहट पड़ते ही जगमोहन चौंका।

रात का एक बज रहा था। अखबार पढ़ते हुए वो देवराज चौहान का इन्तजार कर रहा था। किसी काम से नासिक गया था देवराज चौहान। शाम को फोन आया था कि रात बारह तक वापस आ जायेगा। लेकिन देवराज चौहान को भीतर आने के लिये दरवाजा थपथपाने की जरूरत नहीं थी। वो जानता था कि कैसे भीतर आना है, दरवाजा बंद होने पर।

कौन आया है?

जगमोहन ने आहिस्ता से अखबार रखी। फिर रिवॉल्वर निकाली और दबे पांव दरवाजे की तरफ बढ़ा।

दरवाजा पुनः थपथपाया।

जगमोहन ने अपना हाथ सिटकनी पर रखा। दूसरे में एकदम तैयार रिवॉल्वर दबी थी।

“कौन?” जगमोहन का स्वर बेहद सामान्य था।

“प्रवेश गोदरा।”

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी। करीब तीन साल बाद ये नाम और आवाज सुन रहा था। लेकिन उसने फौरन पहचान लिया था कि ये वो ही प्रवेश गोदरा है, जो कभी तीस अरब की डकैती में उनके साथ था।

“ये इतनी रात को...? अचानक?”

“साथ में कौन है?”

“अकेला हूं।”

जगमोहन ने उसी पल दरवाजा खोला। रिवॉल्वर तैयार की गड़बड़ जैसे वक्त के लिये।

पोर्च में पीछे लाईट जल रही थी। दरवाजे पर प्रवेश गोदरा को खड़े देखा।

दोनों की नज़रें मिली।

“क्यों आये हो?” जगमोहन ने उसे घूरा।

“तीन साल से कभी नहीं आया। अब आया हूं तो यूं ही तो नहीं आया होऊंगा।” गोदरा शांत ढंग से मुस्कराया।

जगमोहन ने सतर्क अंदाज में उसे आने का रास्ता दिया।

वो भीतर आया तो जगमोहन ने दरवाजा बंद किया। तब तक गोदरा बैठने के लिये सोफों तक बढ़ गया था। जगमोहन उसकी पीठ को घूरता रहा फिर रिवॉल्वर जेब में डालकर उसकी तरफ बढ़ा।

गोदरा तब तक बैठ चुका था और सिगरेट सुलगाने लगा।

जगमोहन उसके सामने बैठा।

“कैसे आना हुआ-तेरे को इधर नहीं आना चाहिये था।”

जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।

“देवराज चौहान कहां है?” गोदरा ने विशाल हॉल में नज़रें घुमाई।

“बाहर है। मेरे से बात कर-क्यों?”

“कल मेरी शादी है। खास-खास दो-चार लोगों को बुला रहा हूं। मन्दिर में शादी कर रहा हूं। सोचा तुम लोगों से भी कह दूं। शादी के नाम पर बढ़िया सा तोहफा तो दे ही दोगे।” गोदरा ने मुस्कराने की चेष्टा की।

“अगली बार जब मिलेगा ग्यारह रुपये लिफाफे में डालकर दे दूंगा। सालभर बाद मिलना।”

“साल बाद क्यों?”

“खराब जमाना है। शगुन खराब हो जाता है जब चौथे महीने पता चलता है कि तलाक हो गया। पहले अपनी बीवी के साथ साल भर रह के दिखा। तब एक सौ एक दूंगा। साल में बच्चा भी हो गया तो पांच सौ एक दे दूंगा।”

गोदरा ने जगमोहन के चेहरे पर नज़रें टिका दी।

जगमोहन आंखें सिकोड़े उसे ही देख रहा था।

“बता, क्यों आया यहां?”

“बताया तो शादी...।”

“मुझे विश्वास है तेरे पर कि कल तू सच में शादी कर रहा है।” जगमोहन ने कहा –“मैंने ये तो नहीं कि तू झूठ बोल रहा है। मैंने तो पूछा है कि ये बता, आज तीन साल बाद इधर कैसे आना हआ।”

गोदरा ने कश लिया। गम्भीरता भरे चेहरे को हिलाया।

“उस मामले का क्या हुआ था। मालूम पड़ा कि कौन गद्दार है। तीस अरब के जेवरात कौन ले गया?”

“नहीं।” जगमोहन की आंखें सिकुड़ी –“उस मामले का कुछ पता नहीं चला। डकैती करने वालों की तो हत्या कर दी गयी। उनके पीछे कौन था। किसने उन्हें मारा। वो चालाक आदमी रहा होगा। लेकिन तूने ये बात क्यों पूछी तेरे को लगता है कि वो माल हमने ढूंढ-ढूंढ कर दबा लिया।”

“ये बात नहीं। मैं तो ये बताना चाहता था कि उसके बारे में मुझे दो-तीन घंटे पहले ही पता चला है।”

“किसके बारे में?” जगमोहन के होंठों से निकला।

“जिसने हम लोगों से गद्दारी की।” गोदरा के चेहरे की गम्भीरता बढ़ती जा रही थी- “अगर तीन साल के बाद आज तुम्हें और देवराज चौहान को पता चले कि वो गद्दार कौन था तो तुम लोग क्या करोगे?”

“वहीं करेंगे जो तीन साल पहले करते।” जगमोहन के चेहरे पर कठोरता के भाव आ गये –“कौन है वो?”

“वो दो हैं।”

“दो?”

प्रवेश गोदरा ने उसे देखते हुए कश लेकर गम्भीरता से सिर हिलाया।

“कौन से हैं वो दो?” जगमोहन का चेहरा धधक उठा –“साबित करने के लिये सबूत है तेरे पास कि वो ही गद्दार हैं। या यूं ही...।”

“सबूत है। साबित करूंगा।”

“नाम बता।”

“रूपा ईरानी एक है।” प्रवेश गोदरा मुस्कराया।

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

“दूसरा?”

“उसे खुद देख लेना।”

“क्या मतलब?”

“अगले तीन-चार दिनों में वो दोनों विदेश से हिन्दुस्तान आ रहे हैं। उन्होंने शादी भी कर ली है। साल भर का बच्चा भी।”

“नाम बता उस हरामी का?”

“मैं तुम्हें उसके सामने खड़ा कर दूंगा। नाम जानकर क्या करोगे। उसे देखकर, तुम्हें सबूत मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ये बातें अपने तक ही रखना। बात खुल गयी। गलती से किसी रास्ते उन दोनों तक पहुंच गयी तो वो कभी भी हिन्दुस्तान नहीं आयेंगे। दो-चार दिन की बात है, उन्हें हिन्दुस्तान आ लेने दो।”

“तेरे को कैसे पता चला?”

“इत्तेफाक से। विदेशी पत्रिका में रूपा ईरानी की तस्वीर देखी। वो योरोप और अमेरिका की जानी-मानी मॉडल बन चुकी है। हॉलीवुड की दो फिल्मों में काम भी कर लिया। एक तस्वीर में रूपा ईरानी को टैक्सास में, उसके बंगले के बाहर खड़ा दिखाया गया है। उसी तस्वीर में बंगले की खिड़की पर उसका पति खड़ा है। कठिनता से पहचाना उसे। वो-वो ही गद्दार था जिसने हमसे गद्दारी की। उसे देखने के बाद कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं पड़ी। सब कुछ खुद ही समझ में आ गया। तुम भी समझ जाओगे।”

“रूपा ईरानी तो तुमसे शादी करने वाली थी तब। तो...।”

“जो है तुम्हारे सामने ही है। मेरे साथ वो झूठा ड्रामा कर रही थी। हकीकत में तो वो दूसरा ही खेल-खेल रही थी। देवराज चौहान कब आयेगा?” प्रवेश गोदरा ने उसे देखा।

“कभी भी आ सकता है।”

“उसे भी बता देना। सिर्फ तीन-चार दिन की बात है। वो दोनों हिन्दुस्तान की धरती पर होंगे। कल मैं शादी कर रहा हूँ, परन्तु वहां आने की सलाह नहीं दूंगा। तोहफा जो भी देना हो, अगली मुलाकात में दे देना।”

“शादी में क्यों न आयें?”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े वहां मेहमान बनकर आ रहा है।” कहते हुए वो उठ खड़ा हुआ।

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

“तुमने वानखेड़े को भी बताया कि –।”

“इस बारे में जानने का जितना हक तुम लोगों को है। उतना वानखेड़े को भी है।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा –“वो चाहता तो मुझे गिरफ्तार करके, मेरी जिन्दगी बरबाद कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ये उसकी शराफत रही। या उसकी मजबूरी रही। कुछ भी हो। आज मैं उसकी वजह से आजाद रहकर चैन भरी सांस ले रहा हूं। वानखेड़े को बताने के बाद ही, उन गद्दारों के बारे में तुम्हें बताने आया हूं।”

जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।

“चलता हूं। कल शादी कर लूं। उसके बाद मिलता हूं।”

जगमोहन बैठा उसे देखता रहा और गोदरा बाहर निकल गया।

☐☐☐

शादी हो गयी मन्दिर में अगले दिन।

वानखेड़े सादे कपड़ों में मन्दिर में शादी पर पहुंचा था।

गिफ्ट भी दिया था। सादे कपड़ों में, गोदरा दुल्हा बना हुआ था। शादी में सूरजमल और रामचंद भी आये थे। उपहार देकर चले गये। वहां संजना के घर वाले भी थे। संजना दुल्हन में खूब सज रही थी। वहां उसकी तीन-चार सहेलियां भी परियां बनकर घूम रही थी। गोदरा के साथ तीन-चार पहचान वाले लोग थे। उनमें पड़ोस के मियां-बीवी भी थे।

शादी के बाद वानखेड़े, गोदरा को कुछ कदम दूर ले गया।

उनमें बातें होने लगी। दस मिनट तक तो उनके पास कोई नहीं आया फिर उसे पुकारा जाने लगा। गोदरा आता हूं, कहकर बातों में लगा रहा। आखिरकार संजना ही पास पहुंची। हाथ जोड़कर उसने वानखेड़े को नमस्ते की और गोदरा से बोली।

“ये आपकी शादी का दिन है।” वो मुस्करा कर बोली –“इतनी लम्बी बात फिर कर लेना।”

“ये मेरी खास पुरानी पहचान वाले हैं।” गोदरा मुस्करा कर बोला –“शादी शुदा हैं। बता रहे थे कि बीवी को कैसे बस में रखा जाता है।”

“तो पत्नी को बस में रखने का मंत्र जान लिया आपने।” संजना गहरी मुस्कान के साथ बोली।

“कुछ-कुछ।”

“मैं भी मंत्र बता दूं। शायद वो भी आपके काम का हो।”

“कहो-कहो –।”

“पत्नी को बस में रखते हैं, पति की कमाई के नोट। जोकि आप कमाते हैं। इसलिये चिन्ता मत कीजिये। पत्नी आपके बस में है।” कहते संजना खिलखिलाकर हंस पड़ी।

“मतलब कि नोट न हो तो, पत्नी बस में नहीं रहती?”

“नहीं। फिर पति, पत्नी के बस में हो जाता है।” संजना पुनः खिलखिलायी –“चलिये-सब इन्तजार कर रहे हैं।”

प्रवेश गोदरा और वानखेड़े की नज़रें टकराई।

“मुझे कब फोन करोगे?” वानखेड़े मुस्करा कर बोला।

“हालातों को जल्दी बनाना तुम्हारे बस में भी है। मैं तुम्हारे फोन का इन्तजार करूंगा।”

“जल्दी ही जैसे हालात होंगे।”

वानखेड़े चला गया।

गोदरा उस दिन के बाद बेहद व्यस्त हो गया। संजना के प्यार के चक्कर में, काम से ही छुट्टी ले ली। वो और संजना जैसे दुनिया को भूल गये लगते थे।

तीसरे दिन देवराज चौहान उसके घर पहुंचा।

देवराज चौहान को सामने पाकर गोदरा हड़बड़ाया फिर मुस्कराकर उसे भीतर आने को कहा।

☐☐☐

खूबसूरती से घर सजा हुआ था। जब पहले कभी यहां आया था तो साधारण सा घर था। सब संजना का कमाल था। चार दिनों में ही उसने घर को बदलकर रख दिया था।

देवराज चौहान बैठा तो कमीज-सलवार पहने संजना ने वहां प्रवेश किया।

“ये मेरी पत्नी संजना। चार दिन पहले ही शादी हुई है और संजना ये मेरे खास पहचान वाले हैं।”

संजना ने देवराज चौहान ने एक-दूसरे को हाथ जोड़कर नमस्ते की।

“बढ़िया चाय बनाना।”

“जी।” संजना वहां से चली गयी।

गोदरा, देवराज चौहान के पास ही बैठ गया।

“तुम आये थे। जगमोहन से बात की। फिर आने को कहा, लेकिन आये नहीं।” देवराज चौहान बोला।

“शादी के बाद वक्त नहीं मिला।” गोदरा गम्भीर हो गया था।

“तुमने सच कहा कि रूपा ईरानी ने किसी के साथ मिलकर –।”

“हां।”

“कौन रहा उसके साथ?”

“देख लेना।” गोदरा ने उसकी आंखों में झांका –“उसने दाढ़ी-मूंछें रख ली हैं। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि उसे देखते ही तुम पहचान जाओगे। उनके हिन्दुस्तान आते ही –।”

“इस बात का क्या सबूत है कि उन दोनों ने ही –।”

“उन दोनों का इकट्ठे होना ही, इस बात का सबूत है कि वो सब गड़बड़ उन्होंने ही की।”

देवराज चौहान, गोदरा को देखता रहा फिर बोला।

“मुझे वो पत्रिका दिखाओ, जिसके दम पर तुमने, रूपा ईरानी के साथ के पार्टनर को पहचाना।”

प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली फिर उठ खड़ा हुआ। कोने में रखे टेबल के पास पहुंचा और ड्राज से मैग्जीन निकालकर ले आया। पन्ने पलटे और वो पेज निकाल लिया, जहां रूपा ईरानी अपने बंगले के बाहर खड़ी थी। गोदरा ने पीछे छोटी-सी खिड़की पर उंगली लगाकर कहा।

“ये रहा वो आदमी।”

देवराज चौहान ने तस्वीर में, खिड़की पर मौजूद अस्पष्ट से उस व्यक्ति को देखा।

“इसका तो चेहरा ही स्पष्ट नहीं है।” देवराज चौहान ने गोदरा को देखा।

“मेरे पास जेवरातों को परखने वाला लेंस है। वो लेंस छोटी से छोटी चीज को उभारकर स्पष्ट कर देता है। उस लेंस का इस्तेमाल करने से खिड़की पर खड़े व्यक्ति का चेहरा स्पष्ट दिखाई देगा।” गोदरा ने धीमे स्वर में कहा और टेबल की ड्रा’ज से लेंस लाकर देवराज चौहान को थमा दिया।

देवराज चौहान ने उस लेंस से खिड़की पर खड़े व्यक्ति का चेहरा देखा। लेंस से ठीक फोकस बिठाया। कुछ पलों तक लेंस के द्वारा खिड़की पर खड़े उस व्यक्ति को देखता रहा फिर उनके चेहरे पर कठोरता के भाव आने लगे। लेंस को मैग्जीन पर ही वापस रख दिया। नज़रें गोदरा पर गयी जो गम्भीर निगाहों से उसे देख रहा था।

“पहचान लिया उसे?” गोदरा ने पूछा।

“हां।”

“सबूत की जरूरत है?”

“नहीं।” देवराज चौहान ने शब्दों को चबाकर कहा –“तुम –।”

“पहले अपना चेहरा ठीक करो। गुस्सा हटाओ। संजना ने देख लिया तो वो क्या सोचेगी। मेरी नई-नई बीवी है वो।”

देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर चेहरे को ठीक किया।

मुस्करा भी पड़ा।

तभी फोन की बेल बजी।

गोदरा उठकर फोन के पास पहुंचा। बात की। दूसरी तरफ सूरजमल था।

“गोदरा। तेरा हनीमून निपटा कि नहीं।” सूरजमल की आवाज कानों में पड़ी।

“अभी तो रिहर्सल चल रही है। हनीमून तो शुरू भी नहीं हुआ।” गोदरा मुस्करा कर बोला।

“कुछ दिन का ब्रेक लगा भाई। वे मशहूर मॉडल रूपा ईरानी चार दिन से हिन्दुस्तान पहुंची हुई है। अपने ऊटी के बंगले में है वो। कल तेरे को खास-खास जेवरात लेकर उसको दिखाने और पटाने जाना है कि वो जेवरात खरीद ले। मैंने उन खास जेवरातों को तैयार कर लिया है। बता साथ में किसको ले जाना है?”

प्रवेश गोदरा गम्भीर नज़र आने लगा।

“नाराज मत हो। लेकिन ये काम जरूरी है। मैं तेरे को अपने खर्चे पर हिल-स्टेशन भेजूंगा। पहले तू ये काम कर।”

“काम से इंकार नहीं सेठ जी।” गोदरा के होंठ हिले –“कल जेवरातों को लेकर ऊटी जाऊंगा।”

“साथ में किसको ले जाना –।”

“मैं अकेला ही जाऊंगा।”

“संभाल लेगा माल को। उस माल की तगड़ी रकम बनती –।”

“आप फिक्र मत करें। सब कुछ मेरे पर छोड़ दीजिये।”

“तो रूपा ईरानी को फोन करके, कल का टाईम फिक्स कर लूं?” सूरजमल ने बात खत्म करने वाले ढंग में कहा।

“हां। कल दोपहर के बाद का टाईम रखियेगा। सुबह आऊंगा, जेवरात लेने। अपनी कार भी मुझे दीजियेगा। वहां बढ़िया कार पर पहुंचना है। मेरी पुरानी सी मारूति देखकर वो बिदक जायेगी कि –।”

“समझ गया। समझ गया। ड्राईवर भी तैयार रहेगा। सुबह कितने बजे?”

“आपके बंगले पर सात बजे आऊंगा।” गोदरा ने कहा और रिसीवर रख दिया।

वो देवराज चौहान के पास पहुंचा।

“रूपा ईरानी को हिन्दुस्तान आये चार दिन हो चुके हैं। वो ऊटी में अपने बंगले पर है। कल सेठ सूरजमल की तरफ से कीमती जेवरात लेकर उसके पास जाना है। उसने ज्वैलर्स संघ को पहले ही खबर भिजवा दी थी कि वो खास-खास जेवरात खरीदना चाहती है।” गोदरा उसके पास बैठते हुए कह उठा –“मेरे साथ, मेरा आदमी बनकर, इंस्पेक्टर वानखेड़े जायेगा। ये बात तो उसने शादी वाले दिन ही पक्की कर ली थी।”

“वानखेड़े वहां क्या करेगा?”

“मालूम नहीं।” गोदरा ने धीमे स्वर में कहा –“वो जाने।”

देवराज चौहान कुछ कहने लगा कि संजना ट्रे में चाय और खाने का सामान वहां रख गयी। गोदरा ने चाय का प्याला उसे थमाया और दूसरा खुद थाम लिया।

“ऊटी में कहां है, रूपा ईरानी का बंगला?” देवराज चौहान ने सर्द स्वर में पूछा।

“छोटी-सी जगह है ऊटी। मालूम करना कठिन काम नहीं होगा।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा –“तुम क्या करोगे, ये जानकर कि ऊटी में रूपा ईरानी कहां है?”

“जगमोहन ने तुम्हें बता दिया कि उनका क्या होगा?”

गोदरा ने कुछ न कहकर खामोशी से घूंट भरा।

“तुमने कभी बताया था कि ऊटी में बहुत बड़ी जमीन ले रखी है रूपा ईरानी ने। परन्तु वो तो विदेश चली गयी। उसके पीछे बंगला किसने बनाया। किसी ने तो देख-रेख की होगी।”

देवराज चौहान ने उसे देखा।

“देख-देख करने वालों की क्या कमी होगी उन्हें। तीस अरब की दौलत जब उनके पास थी। उनका बंगला तैयार करवाने में अगर कोई एक करोड़ खा भी गया होगा तो उन्हें क्या फर्क पड़ता है।” कड़वे स्वर में गोदरा कह उठा।

देवराज चौहान ने चाय का प्याला खाली किया और खड़ा हो गया।

“जा रहे हो?” प्याला टेबल पर रखकर गोदरा जल्दी से उठा।

“हां।”

“क्या करोगे?” गोदरा के होंठों से निकला।

“तुमने और वानखेड़े ने अपना काम करना है। मैं अपना काम करूंगा।” देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा।

“जिस तरह तुम्हें बताना जरूरी था, उसी तरह इंस्पेक्टर वानखेड़े को बताना जरूरी था।” गोदरा धीमे स्वर में बोला –“इसलिये –।”

“मुझे इस बात से कोई एतराज नहीं कि तुमने वानखेड़े को बताया। उसका भी ये केस अधूरा है और मेरा काम भी तब से अधूरा पड़ा है।” देवराज चौहान के स्वर में सर्द भाव आ गये –“अब मेरा काम पूरा हो जायेगा। यही मेरे लिये बहुत है।” कहने के साथ ही देवराज चौहान पलटा और बाहर निकलता चला गया।

गोदरा की गम्भीर निगाह रूपा ईरानी के मुस्कराते चेहरे पर जा टिकी थी, जो कि टेबल पर मौजूद पत्रिका में छपा नज़र आ रहा था।

☐☐☐

बंगला क्या महल जैसा था वो। चार हजार गज के ठीक बीचों-बीच, दो हजार गज जगह में वो बना हुआ था। स्वीमिंग पूल के अलावा, खुले में बैठने के लिये खूबसूरत बाग था। कुल मिलाकर आराम परस्ती और ऐय्याशी का नमूना थी वो जगह।

हम, गोदरा और वानखेड़े के साथ-साथ भीतर चलते हैं। गोदरा ने अपना नाम बताया, बाहर मौजूद गनमैनों को, कार्ड दिया तो केबिन से गनमैनों ने भीतर बात की फिर उनकी कार भीतर जाने के लिये, लोहे का विशाल-मजबूत गेट खोल दिया। ड्राईवर कार को पोर्च में ले जाता चला गया। पीछे वाली सीट पर गोदरा के साथ बैठे वानखेड़े ने वेश बदल रखा था। रूपा ईरानी उसे जानती थी। सीधे-सीधे उसका चेहरा देखकर सतर्क हो सकती थी। जो उसका पति था वो भी जानता था उसे। पहचानता था। ऐसे में वानखेड़े ने सिर पर विग लगा ली थी। आंखों पर नजर का चश्मा और चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ लगा रखी थी। ये सब करके वानखेड़े का चेहरा बिल्कुल ही बदल गया था।

ऊटी में सर्दी थी।

आज तो कुछ ज्यादा ही ठण्डक पड़ रही थी।

पोर्च में कार रोककर ड्राईवर बाहर निकला और पीछे वाला दरवाजा खोला। गोदरा बाहर निकला। दूसरी तरफ से वानखेड़े खुद ही दरवाजा खोलकर बाहर आ गया था। गोदरा ने हाथ में खूबसूरत कीमती ब्रीफकेस संभाल रखा था। तभी मुख्य द्वार पर खड़ा एक व्यक्ति, जिसने कि सूट पहन रखा था वो पास पहुंचा।

“वेलकम सर। मैडम ईरानी आपका इन्तजार कर रही हैं आर यू मिस्टर गोदरा?”

“यस।”

“आइये।”

वो व्यक्ति आगे चल पड़ा।

गोदरा और वानखेड़े पीछे।

वो ड्राइंग हॉल इतना बड़ा था कि लगता था जैसे वो किसी महल में हो। वहां पर जर्रे-जर्रे पर से झलकती शानो-शौकत देखकर गोदरा दंग रह गया था। खुद को जैसे किसी राजा-महाराजा के महल में महसूस कर रहा था। वहां सजावट के नाम पर इतनी मंहगी-मंहगी चीजें थी कि बयान नहीं किया जा सकता था। कूट-कूट कर पैसा लगाया गया था वहां। देखता रह गया था गोदरा।

वानखेड़े को ऐसा लग रहा था। जैसे वो किसी सेवन स्टार होटल के भीतर हो।

“आप लोग बैठिये। मैडम ईरानी अभी आ रही हैं।” वो व्यक्ति उन्हें बिठाकर चला गया।

जिन सोफों पर वो बैठे थे। वो भी विदेशी थे।

“क्या खूबसूरत जगह है?”

“तीस अरब की दौलत कम नहीं होती गोदरा।” वानखेड़े ने धीमे-कड़वे-तीखे स्वर में कहा –“जब इतना पैसा पास हो तो ये सब शानो-शौकत भी मामूली है। हराम का पैसा कहीं तो ठोकना था इन लोगों ने। यहां सिर्फ करोड़ों में रकम लगी होगी। यानि कि एक अरब भी खत्म नहीं हुआ होगा। उनके पास तो तीस अरब के जेवरात थे।”

“मुझे एक बात समझ नहीं आ रही।” गोदरा ने वानखेड़े को देखा।

“क्या?”

“तीस अरब के जेवरात। एक से एक बेशकीमती इन्होंने लूटे थे। अब इन्हें जेवरात खरीदने की जरूरत –।”

“यही तो खेल है रूपा ईरानी और उसके पति का। जेवरातों की खरीददारी करके वे खुद को दूसरों की निगाहों में सच्चा साबित करना चाहते हैं कि डकैती से उनका कोई वास्ता नहीं। अगर कोई उस पर शक कर रहा हो तो शक न करे। तब की गयी रूपा ईरानी ने अब हिन्दुस्तान में कदम रखा और ज्वैलर्स संघ को अपनी खरीददारी की खबर पहले ही भिजवा दी। ऐसे में कोई नहीं सोचेगा कि डकैती के तीस अरब के जेवरात वो ले आयी थी।”

गोदरा के होंठ भिंच गये।

“अपराधी की चालाकी ही उसे फंसा देती है। रूपा ईरानी इस चालाकी का इस्तेमाल न करती तो वो न तो तुम्हारी नजरों में आती, न तुम्हारे द्वारा पुलिस की निगाहों में।” वानखेड़े ने सपाट स्वर में कहा –“परेशानी तो मुझे ये आ रही है कि मैं रूपा ईरानी के बारे में वे साबित नहीं कर सकता कि उसने डकैती की या तीस अरब के जेवरात किसी तरह हिन्दुस्तान से ले भागी थी।”

गोदरा के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।

“पुलिस ये साबित नहीं कर सकती?”

“नहीं।”

“तो फिर आप क्या करने आये हैं मेरे साथ।” गोदरा ने उसे घूरा।

“देखने-सोचने कि कैसे रूपा ईरानी और उसके हरामी पति को फांसा जा सकता...।”

“मेरे ख्याल में आपको इस बारे में चिन्ता करने की जरूरत नहीं।” प्रवेश गोदरा ने एकाएक मुस्कराकर बेहद, शांत स्वर कहा –“रूपा ईरानी और उसके पति के बारे में देवराज चौहान जान चुका है।”

वानखेड़े चिहुंक उठा।

“जान चुका है कैसे?”

“मैंने बताया। उस वक्त मैं भी उसके साथ डकैती में था। ऐसे में ये खबर उसे देनी जरूरी थी।”

“कहां खबर दी उसे?” वानखेड़े की नज़रें, गोदरा के चेहरे पर जा टिकी।

प्रवेश गोदरा मन ही मन सतर्क हुआ।

“मुझे इस तरह देखने की जरूरत नहीं है इंस्पेक्टर साहब।” गोदरा ने सामान्य स्वर में कहा –“ये इत्तेफाक ही था कि कुछ दिन पहले वो बाजार में मुझे मिल गया। खरीददारी कर रहा था वो। मैंने बता दिया।”

“झूठ मत कहो। तुम जानते हो कि वो कहां रहता–।”

“मैं नहीं जानता। वो मुझे क्यों बतायेगा कि वो कहां रहता है। वो पागल है क्या। हिन्दुस्तान का जाना-माना डकैती मास्टर है वो। मेरा उससे क्या वास्ता जो उसके घर का मुझे पता हो। अलग बात है कि एक बार हालातों से घिर कर मैं उसके साथ डकैती में लग गया था। इसका ये मतलब तो नहीं कि वो अपनी पीठ पर तिल का निशान भी मुझे दिखा देगा। आप समझदार हैं, ये बात तो आप समझ ही सकते –।”

तभी रूपा ईरानी की खनकती आवाज वहां गूंजी।

☐☐☐

“हैलो गोदरा। माई डियर प्रवेश गोदरा। कितना अच्छा लग रहा है तुम्हें देखकर। मैंने तो सोचा भी नहीं था कि कभी हम फिर मिल पायेंगे। सूरजमल ने फोन पर जब मुझे बताया कि जेवरात लेकर प्रवेश गोदरा मेरे पास आ रहा है तो मुझे कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मैं तब से ही तुम्हारा इन्तजार कर रही थी।”

उस पर निगाह पड़ते ही प्रवेश गोदरा खड़ा हो गया।

वानखेड़े भी उठा खड़ा हुआ।

वो पहली मंजिल की सीढ़ियां उतरने के पश्चात उनकी तरफ बढ़ रही थी।

रूपा ईरानी।

बेइंतेहा खूबसूरत हो गयी थी वो। पहले से छरहरी। चेहरा भी आकर्षक ज्यादा था। योरोप और अमेरिका की गिनी-चुनी मॉडलों में से वो एक थी। पैसा पानी की तरह उस पर बरसता था।

प्रवेश गोदरा ठगा-सा खड़ा उसे देखते हुए सोच रहा था कि कभी ये उसकी अपनी हुआ करती थी लेकिन अब कितनी दूर हो चुकी है। बहुत दूर। आज इसके लिये उसके मन में कोई ऐसी भावना नहीं थी कि उस भावना का जिक्र कर सके। वो तो सूरजमल की खातिर, नौकरी की खातिर, वानखेड़े की खातिर यहां आ गया था। वरना दूसरी स्थिति में ये कभी उसकी बगल से निकलती तो शायद मुंह फेर लेता।

रूपा ईरानी पास पहुंचकर ठिठकी। उसके मुस्कराहट में नज़र आ रहे मोतियों जैसे दांत चमक रहे थे।

गोदरा उसे देखे जा रहा था।

“ऐ।” रूपा ईरानी ने उसका गाल थपथपाया –“किधर हो?”

“यहीं।” गोदरा ने मुस्करा कर लम्बी सांस ली –“तुम्हें देख रहा हूं।”

“मुझे तो तुम बहुत बार, बहुत अच्छी तरह देख चुके हो।”

वो हंसी।

“पहले से तुम ज्यादा खूबसूरत हो गयी हो।”

“हां।” वो बैठते हुए बोली –“बैठो-विदेशों में मेकअप का सामान अच्छा मिलता है। खूबसूरती बढ़ जाती है।”

गोदरा और वानखेड़े बैठे।

“ये साहब कौन है?” रूपा ईरानी ने वानखेड़े को देखा।

“ये मलिक हैं।” गोदरा जल्दी से बोला –“मेरे साथ काम करता है।”

“तुम्हारे साथ तो कमल शर्मा...।”

“वो हरामी निकला। साला गांव भाग गया।” गोदरा मुस्कराया –“तुम कहो –सुना है शादी कर ली। बच्चा हो गया।”

“किससे सुना?” वो हंसी।

“मैग्जीन में पढ़ा। लगता नहीं कि तुम बच्चे की मां हो। अपने पति से नहीं मिलवा पाओगी क्या?”

“सॉरी।” रूपा ईरानी ने इंकार में सिर हिलाया –“उसे अपने किसी पहचान वाले से मिलाना बेहद कठिन है। वो मुझे पसन्द करता है लेकिन मेरे से मिलने वालों को पसन्द नहीं करता। अजीब, लेकिन अच्छी आदत है। हममें ये तय है कि वो मेरी पहचान वालों से और मैं उसकी पहचान वालों से कोई मतलब नहीं रखेंगे। वो जैसा भी है। पति के तौर पर अच्छा इन्सान है। मैं उसे पसन्द करती हूं।”

गोदरा समझ गया कि उस कुत्ते को ये जानबूझकर सामने नहीं लाना चाहती। उसके सामने आते ही सारा मामला खुल जायेगा कि डकैती के तीस अरब के जेवरात इनके पास ही हैं।

“बहुत पैसे वाली बन गयी हो तुम?” गोदरा ने मुस्करा कर शांत स्वर में कहा।

“हां। जितनी कम चाह रही पैसे की। उतना ही पैसा मेरे पास आया। लेकिन तुम चूक गये गोदरा। आज तुम भी मेरे पति हो सकते थे। लेकिन तुमने ही शादी के लिये इंकार कर दिया। मैं तो तैयार –।”

“सॉरी। मैं यहां, इस जमीन पर इतना बढ़िया बंगला नहीं बनवा सकता था।” गोदरा हंसा।

“तब मैंने ये भी कहा था कि पैसे की परवाह मत करो...।” गोदरा उसे कहना चाहता था कि वो सब उसका ड्रामा था। क्योंकि वो उसकी आदत को जानती थी कि पैसा पास न होने पर वो, उससे शादी नहीं करेगा। साथ ही अपनी योजना बना रखी थी, हिन्दुस्तान से निकल जाने की, उस हरामी के साथ। मुझे बहलाकर कुछ वक्त तो बिताना ही था।

“तुमने पूछा नहीं कि उस सामान का क्या हुआ?” गोदरा ने अचानक कहने वाले ढंग में कहा।

“सामान-कौन-सा सामान?” रूपा ईरानी लापरवाही सी कह उठी।

“वो जिसे मैं नहीं पा सका। कोई नहीं पा सका और तुम फैशन शो पर कोरिया चली –।”

“ओह-समझी। मैं तो भूल ही गयी थी उस बात को।”

“छोड़ो-मुझे क्या कि उसका क्या हुआ...।”

“ये भी ठीक है कि तुम्हें क्या –। तुम तो पैसे वाली बन गयी हो। मशहूर मॉडल हो यारोप और अमेरिका की।” कहने के साथ ही गोदरा ने, वानखेड़े को देखा –“मलिक साहब।”

“जी।” वानखेड़े बोला।

“मैडम ईरानी को जेवरात दिखाईये। बातें तो होती ही रहेंगी।”

“क्यों नहीं गोदरा साहब, मैं तो कब से आपके इशारे का इन्तजार कर रहा हूं।” कहने के साथ ही वानखेड़े ने नीचे रखा ब्रीफकेस उठाकर टेबल पर रखा और खोलने लगा।

रूपा ईरानी को सिकुड़ चुकी आंखें वानखेड़े पर टिक चुकी थी।

“क्या हुआ?” उसके चेहरे के बदले भावों को देखकर गोदरा ने पूछा।

वानखेड़े ने भी नजर उठाकर रूपा ईरानी को देखा।

“वानखेड़े साहब।” रूपा ईरानी गम्भीर स्वर में कह उठी –“आपकी आवाज मैं नहीं भूल सकती।”

वानखेड़े चौंका।

गोदरा हड़बड़ाया सा दिखा।

रूपा ईरानी का चेहरा स्पष्ट तौर पर कठोर हो गया था।

“गोदरा।” रूपा ईरानी ने खा जाने वाली नजरों से उसे देखा –“तुमने इसे अपने साथ लाकर मेरे साथ धोखेबाजी... ।”

“चुप।” गोदरा गुर्रा सा उठा –“धोखा मैंने नहीं तुमने किया। तीस अरब के जेवरात दबाकर बैठ गयी। साथ में वो हराम जादा –।”

तभी वानखेड़े ने रिवॉल्वर निकाल ली। रुख रूपा ईरानी की तरफ था।

ये देखकर ही गोदरा के होंठों में ही शब्द रह गये थे।

रिवॉल्वर इतनी पास देखकर, रूपा ईरानी की आंखें फैल गयी।

“किसी को आवाज लगाने की चेष्टा मत करना मैडम।” वानखेड़े ने दरिन्दगी भरे स्वर में कहा –“मैं जानता हूं उस डकैती की तीस अरब की दौलत, तुम्हारे पास रही। वो जो तुम्हारा पति बना हुआ है उसके पास रही। अभी तक मैं नहीं जानता कि तुम्हारा पति कौन है, गोदरा जानता है। मैंने जोर नहीं मारा, उस हरामी का नाम जानने के लिये। लेकिन इस बात का विश्वास हो गया है कि डकैती के तीस अरब तुम्हारे पास ही हैं। जो नहीं जानता, वो भी पता चल जायेगा। लेकिन इस वक्त मैं तुम्हारा क्या करूं। कानून के नाम पर तुम्हें गिरफ्तार नहीं कर सकता, क्योंकि मेरे पास साबित करने के लिये सबूत नहीं हैं कि तुम्हारे पास ही डकैती की दौलत रही और है। लेकिन तुम्हें छोड़ भी नहीं सकता, क्योंकि तुम अपराधी हो। बताओ क्या करूं तुम्हारा?”

“इसका वो हरामी पति भी...।”

“मैं ये बात दोनों के बारे में कह रहा हूं। कहो मैडम ईरानी क्या करूं तुम्हारा?” वानखेड़े का स्वर बेहद सख्त था।

“तब कुछ करोगे वानखेड़े, जब तुम्हें मौका मिल पायेगा। जो कि अब तो तुम को नहीं मिल पायेगा।”

इस आवाज को सुनकर सब चौंके।

गोदरा और वानखेड़े की निगाहें आवाज की तरफ गई।

रूपा ईरानी ने भी उधर देखा तो उसका बदन कांपकर रह गया। आंखों में खौफ की परछाईयां नाच उठी। चेहरा फक्क होते हुए पीलेपन से भर आया था।

पहली मंजिल पर देवराज चौहान खड़ा था। साथ में गन थामे जगमोहन। ये   शब्द देवराज चौहान ने ही कहे थे। उसके हाथ में दबी रिवॉल्वर की नाल उस व्यक्ति के सिर से लगी थी, जिसकी दाढ़ी-मूंछें थी।

“देवराज चौहान?” वानखेड़े की आंखें सिकुड़ी।

गोदरा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

रूपा ईरानी की खूबसूरती पल भर में ही हवा में गायब हो गयी थी। भय की वजह से वो, एकाएक उम्र से कहीं ज्यादा लगने लगी थी। खौफ से उसकी आंखें, बिना झपके, फटी सी हुई थी।

देवराज चौहान और जगमोहन बारह बजे तक ही ऊटी पहुंच गये थे। रूपा ईरानी का बंगला तलाश करने में उन्हें अवश्य वक्त लगा, क्योंकि पूछताछ उन्होंने दबे अंदाज में की थी।

तीन बजे उसके बंगले के बाहर पहुंचे।

लोहे के विशाल गेट पर दो गनमैन खड़े दिखे। उस जगह के हर तरफ खाली जगह थी। पीछे की तरफ, कुछ दूर से पहाड़ियों की शुरूआत हो रही थी। घंटा भर वो सतर्कता से बंगले के आस-पास का जायजा लेते रहे। तब वो इस नतीजे पर पहुंचे कि वहां सिक्योरिटी खास नहीं है। दो गनमैन सामने गेट पर थे और चार गनमैन बाकी भीतरी खाली हिस्से में, बंगले के चारों तरफ थे। दो पीछे की तरफ एक-एक दायें-बायें।

“बहुत कम सिक्योरिटी है।” जगमोहन बोला।

“रूपा ईरानी अभी-अभी विदेश से लौटी है। सिक्योरिटी ज्यादा रखने का वक्त नहीं मिला होगा और जरूरत भी महसूस नहीं की होगी। वो सोच भी नहीं सकती होगी कि उसके हिन्दुस्तान पहुंचते ही खतरा उसके सिर पर आ सकता है।”

देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा –“मेरे ख्याल में हमें पीछे की तरफ से बंगले में जाना चाहिये। उधर दो गनमैन हैं उन पर आसानी से काबू पाया जा सकता।”

“दायें-बायें तो एक-एक ही है। वहां।”

“दायें-बायें खतरा बढ़ सकता है। दायें-बायें वालों पर आगे-पीछे वालों की नजर भी पड़ सकती है। क्योंकि वो खुले में हैं पीछे वाले गनमैनों की तरफ देर तक भी कोई झांकता नहीं होगा। वो हिस्सा अलग हटकर पड़ जाता है।”

“ये बात तो ठीक है।” जगमोहन ने सिर हिलाया।

“आओ। घेरा काटकर पीछे की तरफ चलें।” देवराज चौहान दूर नजर आ रहे बंगले को देखते हुए कह उठा।

तभी उन्होंने लोहे के गेट के सामने कार रुकती देखी।

दोनों की नज़रें कार पर जा टिकी।

“गोदरा है कार में।” देवराज चौहान के होंठ भिंच गये –“साथ में एक और है। वो पहचान में नहीं आ रहा। लेकिन वो वानखेड़े होगा। गोदरा ने कहा था कि वानखेड़े उसके साथ रहेगा।”

“ये दोनों गड़बड़ करेंगे।” जगमोहन बोला –“वानखेड़े यूं ही तो साथ नहीं आया होगा, गोदरा के –।”

“आओ।” देवराज चौहान बोला –“हम पीछे की तरफ चलें।”

दोनों वहां से हटे और दूर से लम्बा घेरा काटते हुए, महलनुमा बंगले के पीछे की दीवार के पास जा पहुंचे जो कि बारह फीट ऊंची थी और उस पर कांटेदार तारें भी तीन फीट की ऊंचाई पर थी।

देवराज चौहान और जगमोहन की नज़रें मिली।

“गोली नहीं चलनी चाहिये।” देवराज चौहान सतर्क स्वर में बोला –“जरूरत पड़ने पर चाकू का इस्तेमाल कर लेना। यूं ही किसी की जान नहीं लेनी है।”

जगमोहन ने होंठ भींचकर सिर हिलाया फिर दोनों फासला रखते हुए दूर हुए फिर हाथ ऊपर करके छलांग ली और दीवार की मुंडेर थाम ली।

देवराज चौहान ने दीवार थामे खुद को ऊंचा किया। भीतर झांका। शरीर का पूरा जोर बांहों पर पड़ रहा था। कुछ पलों बाद ही काले कपड़े पहने गनमैन नजर आया। लापरवाह सा कंधे पर गन लटकाये, कश लेता टहल रहा था। कुछ पलों बाद दूसरा भी नजर आया। वो दूर था। उस तरफ जगमोहन था। देवराज चौहान ने इधर वाले गनमैन पर नजरें टिका दी। उसने हाथ बढ़ाकर काटेदार तार के बीच के हिस्से पर, पंजा जमाया और खुद को ऊंचा करते हुए, पांव दीवार पर रखे और खड़ा हो गया। नजरें उस गनमैन की तरफ उठी। दूर था वो, परन्तु इतना भी दूर नहीं कि, उसके नीचे छलांग लगाने पर आवाज न सुन सके। ज्यादा देर इस तरह दीवार पर खड़ा होना भी ठीक नहीं था। वो देख सकता था।

देवराज चौहान ने आहिस्ता से टांगों को तार से पार किया और तार को दोनों हाथों से थामे नीचे लटक गया हो, नीचे की जमीन पांवों के सात-आठ फीट नीचे रह गयी थी। उसने आहिस्ता से हाथ छोड़े तो जूते न के बराबर आवाज के साथ जमीन पर लगे। रुका नहीं देवराज चौहान वहां। वह दूर पेड़ के तने की तरफ और उसकी ओट ले ली। सिर जरा-सा बाहर निकालकर गनमैन की तरफ देखा।

वो पहले की तरह लापरवाह सा नजर आया। उसके भीतर आ जाने के बारे में उसे महसूस भी नहीं हो पाया था। देवराज चौहान ने सावधानी से हर तरफ नजरें घुमाई। दूसरा गनमैन वहां से काफी दूर था। जगमोहन पर नजर पड़ी जो भीतर आने के लिये दीवार पर चढ़ा हुआ था और देखते ही देखते वो भीतर कूद गया था।

उसी पल देवराज चौहान के होंठ भिंच गये।

जगमोहन के नीचे कूदते ही, दूर वाला गनमैन चौंका। उसने आहट सुन ली थी। गन उसके भी कंधे पर लटक रही थी। देवराज चौहान ने देखा कि गन उसके हाथों में आ गयी और मध्यम-सी आवाज कानों में भी पड़ी।

“कौन है?”

देवराज चौहान ने इधर वाले गनमैन को देखा जो दूर अपने साथी गनमैन की आवाज सुनकर सावधान हो गया था। उसने भी गन हाथ में ली और दूर, गनमैन को देखने लगा था। ज्यादा वक्त नहीं था। इधर वाला गनमैन भी अपने साथी गनमैन की तरफ बढ़ने लगा था।

“क्या हुआ?” उसने इधर से पुकारा।

होंठ भींचे देवराज चौहान, दबे पांव उसकी तरफ बढ़ा।

चंद पलों में ही आहिस्ता से उसके पीछे जा पहुंचा था।

उसे शायद आहट मिल गयी थी पीछे से। गन थामे वो फुर्ती से पलटा। देवराज चौहान से उसकी नजरें मिली। परन्तु गन का इस्तेमाल न कर सका। देवराज चौहान ने बिजली की सी फुर्ती से एक हाथ से गन की बैरल पकड़कर मुंह मोड़ा और दूसरा हाथ उसके सिर के पीछे वाले हिस्से में मारा। उसके होंठों से कराह निकली और घुटने मुड़ते चले गये। गन देवराज चौहान के हाथ में रह गयी। वो नीचे गिरते हुए बेहोश हो गया था। गन थामे देवराज चौहान ने दूसरे गनमैन की तरफ देखा। जगमोहन और उस गनमैन में हाथापाई हो रही थी। देवराज चौहान के दांत भिंच गये कि अगर गोली चल गयी तो कई तरह की परेशानियां खड़ी हो जायेगी। तभी देखते ही देखते जगमोहन ने उस गनमैन के सिर के बाल पकड़े और जोरदार घूंसा उसकी कनपटी पर मारा तो वो पीठ के बल नीचे जा गिरा था। फिर हिला भी नहीं। देवराज चौहान समझ गया कि वो बेहोश हो गया है।

जगमोहन दबे पांव दौड़ता हुआ पास पहुंचा तो देवराज चौहान ने हाथ में पकड़ी गन उसे थमाई और रिवॉल्वर निकालकर उसे पीछे आने का इशारा दिया। वो पीछे की तरफ नज़र आ रहे दरवाजे खिड़कियां देखने लगे कि कोई खुला हुआ मिल जाये और एक खिड़की मिल गयी। खुली हुई थी वो। बीच में ग्रिल नहीं थी।

देवराज चौहान ने फुर्ती से पल्ले खोले और भीतर प्रवेश कर गया।

जगमोहन गन थामे पीछे था।

भीतर कोई भी न दिखा ये बंगले के पीछे वाला हिस्सा था।

सामने छोटी सी घुमावदार सीढ़ी ऊपर जा रही थी। जो कि नौकरों के ऊपरी मंजिल पर जाने के लिये थी।

देवराज चौहान और जगमोहन सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर मंजिल पर जा पहुंचे। एक तरफ रेलिंग था। वहां से नीचे का विशाल हॉल नजर आ रहा था और दूसरी तरफ कमरे की कतार नजर आ रही थी। दोनों की आंखें मिली। वो कमरों की कतारों की तरफ बढ़े। आगे देवराज चौहान रहा। हाथ में रिवॉल्वर थी।

वो हर कमरे का दरवाजा खोलकर भीतर देखने लगे।

पांचवें कमरे का दरवाजा खोलते ही देवराज चौहान के दांत भिंच गये। रिवॉल्वर पर पकड़ मजबूत हो गयी।

वो सामने बैठा था। दाढ़ी वाला। जिसकी धुंधली तस्वीर, गोदरा ने लेंस से दिखाई तो उसे पहचान पाया था कि वो कौन था। पैंट-कमीज पहन रखी थी उसने। पांवों में जूते थे। कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहा था। कि दरवाजा खुलते ही उसने नज़रें इस तरफ उठाई तो देवराज चौहान को वहां खड़े देखकर सकते की सी हालत में रह गया था। हक्का-बक्का सा बुत बन गया था। आंखें भय से फैल गयी थी।

जगमोहन ने उसे देखा तो कड़वे भाव चेहरे पर आ ठहरे अखबार उसके हाथ से छूट गयी थी।

देवराज चौहान के चेहरे पर मौत में डूबे सर्द भाव आ ठहरे।

“उठो।” देवराज चौहान ने रिवॉल्वर हिलाकर इशारा किया –“इधर आओ।”

उसके शरीर में कम्पन हुआ। वो उठा और कांपती टांगों से चलता हुआ पास आया।

“तुमने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि तीस अरब के जेवरात पाने के लिये, मेरे से गद्दारी करके, दोबारा तुम्हें कभी मेरा सामना करना पड़ेगा। मुझे तो तुमने भुला ही दिया होगा।”

“म-मुझे माफ कर दो देवराज चौहान। मैं –।”

देवराज चौहान ने रिवॉल्वर उसके सिर पर रख दी।

उसके शब्द मुंह में ही रह गये।

“माफी की बात तो तब होती, जब तू ही मेरे सामने आया। अपनी धोखेबाजी तूने कबूल की होती। तीस अरब के जेवरात मेरे सामने रख दिए होते। अब तो गोली की बात है। क्योंकि तेरे को तलाश करके, मैं तेरे पास पहुंचा हूं।”

“साला, हरामी।” जगमोहन कड़वे स्वर में कह उठा।

“चल उधर।”

उसके सिर से रिवॉल्वर लगाये देवराज चौहान रेलिंग के पास पहुंचा तो हॉल का दृश्य नजर आया। रूपा ईरानी गोदरा और वानखेड़े बैठे थे। वानखेड़े रिवॉल्वर निकालकर, रूपा ईरानी की तरफ कर चुका था। उसके शब्दों पर तीनों चौंककर ऊपर की तरफ देखने लगे थे।

चल सीढ़ियों की तरफ।” देवराज चौहान उससे रिवॉल्वर सटाये बोला –“नीचे पहुंचना है। वक्त से पहले मरना हो तो शरारत करना।”

“मुझे छोड़ दो।” वो कांपते स्वर में कह उठा –“मैं।”

“चुपकर।” जगमोहन गुर्राया –“नीचे चल।”

रिवॉल्वर से कवर किए उसे नीचे लाये।

रूपा ईरानी का चेहरा लटककर, पीला-सा हो चुका था, जब वे नीचे पहुंचे।

“बहुत चालाकी दिखाई तुमने।” देवराज चौहान खतरनाक स्वर में रूपा ईरानी से कह उठा –“लेकिन झूठ और चालाकी ज्यादा दूर तक साथ नहीं देती। वजह कोई भी रही हो, लेकिन तुम दोनों धोखेबाजों के रूप में हमारे सामने हो।”

रूपा ईरानी के होंठों से कोई बोल न फूटा।

गोदरा दांत भींचे दाढ़ी वाले को देख रहा था।

वानखेड़े के चेहरे पर हैरानी थी। अविश्वास था। एकाएक ही उसके होंठों से निकला।

“भंडारी। रनवीर भंडारी।”

“हां” गोदरा कड़वे स्वर में कह उठा –“साला रनवीर भंडारी ही है ये। दाढ़ी-मूंछे रखकर इसने सोचा कि चेहरा बदल गया। तब हम एक-दूसरे पर ही शक करते रहे। सोच भी नहीं सके कि ये हरामी ही गद्दार है। सोचते भी कैसे। रूपा का और इसका साथ कौन सोचता कि कब ये मिले, कब इनमें बात हुई। कब इन्होंने हेरा-फेरी से भरा चक्रव्यूह रचकर डकैती कर ली। ये साली कोरिया का बहाना करके खिसक गयी। और भंडारी अपना सब कुछ नीलाम होने के बाद चुपचाप हिन्दुस्तान से खिसक गया।”

“मैं भी हैरान था कि डकैती के जेवरात बिकने के लिये बाजार में क्यों नहीं आये। जेवरात ले जाने वाला पकड़ा क्यों नहीं गया। पकड़ा भी कैसे जाता।” दांत भींचकर वानखेड़े बोला–

“रनवीर भंडारी तो खुद जौहरी है। जेवरातों का रंग-रूप बदल देना इसके लिये मामूली सा काम है। तीन साल बाद में ही सही। कानून की गिरफ्त में तो आये ये। मैं –।”

“वानखेड़े।” देवराज चौहान ने सख्त स्वर में कहा –“तुम इन डकैती का मुजरिम नहीं साबित कर सकते। गिरफ्तार करके, केस तैयार किया तो केस ढीला रहेगा। दौलत इनके पास है, जिसके दम पर ये आसानी से बच निकलेंगे।

“क्या मतलब?”

“सबूत-गवाह नहीं है तुम्हारे पास कि ये मुजरिम हैं। इन्हें न कुछ नहीं कर सकोगे।” मौत से भरा था देवराज चौहान का स्वर।

वानखेड़े की निगाह देवराज चौहान से मिली।

देवराज चौहान ने रनवीर भंडारी की तलाशी ली और जेब से रिवॉल्वर बरामद करके, उसके सिर पर रखी रिवॉल्वर हटाई और दो कदम पीछे हो गया।

रनवीर भंडारी का चेहरा फक्क था।

रूपा ईरानी तो बेजान पुतली बनी खड़ी थी।

“रूपा ईरानी देश की ही नहीं, विदेश की भी मशहूर मॉडल बन चुकी है। अपनी शोहरत की आड़ में, ये डकैती की दौलत को मजे से उड़ा रहे थे। मजे ले रहे थे। कोई शक भी नहीं कर सकता था।” देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबाकर कठोर स्वर में कहा –“ऐसे में तुम इन पर कानून की कोई धारा नहीं ठोक सकते। बचने के रास्ते निकाल लेंगे ये।”

वानखेड़े जानता था कि देवराज चौहान ने सच कहा है।

“अगर तुम्हें लगता है कि तुम इन्हें सजा दिलवाने में कामयाब हो सकते हो तो गिरफ्तार कर लो।” देवराज चौहान बोला।

वानखेड़े ने हाथ में दबी रिवॉल्वर को देखा फिर रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी को देखकर, देवराज चौहान से बोला।

“तुम ठीक कहते हो। मैं इनके जुर्मों को साबित नहीं कर सकता।” वानखेड़े ने कठोर सख्त स्वर में कहा।

“लेकिन मैं इन्हें, अपने से की गई धोखेबाजी की सजा दे सकता हूं।” देवराज चौहान ने दरिन्दगी से कहा।

वानखेड़े के दांत भिंच गये।

“इ-इन बातों को छोड़ो। हम-हम बैठकर बात कर-।” रनवीर भंडारी ने कहना चाहा।

जगमोहन ने उसी पल उसके कंधे पर गन की नाल मारी।

रनवीर भंडारी कंधा पकड़कर कराह उठा।

“बैठकर बात करने की जरूरत नहीं। हमें लालच मत दे।”

वानखेड़े ने रिवॉल्वर जेब में डाल ली।

“खड़े ही ठीक हैं हम।” जगमोहन के होंठों से गुर्राहट निकली।

“तुम्हें यहां से चले जाना चाहिये।” देवराज चौहान ने भिंचे स्वर में वानखेड़े से कहा –“तुम कानून वाले हो। अब जो होगा। उसके बीच तुम्हारी मौजूदगी ठीक नहीं। तुम्हारी वर्दी की गरिमा को ठेस पहुंचेगी वानखेड़े।”

वानखेड़े ने दांत भींचे रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी की देखा। दोनों के चेहरे फक्क और भय के सागर में डूबे हुए थे। उनकी हालत बुरी हो रही थी। वो सोच भी नहीं सकते थे कि उन्हें कभी ऐसे वक्त का सामना करना पड़ेगा।

“गोदरा।” वानखेड़े ने भिंचे स्वर में कहा –“यहां हमारी जरूरत नहीं। हमें चलना चाहिये। जो कानून के हाथों से दूर हो जाये, तो वो यकीनन किसी दूसरे ढंग से सजा पाता है। ऐसा हमेशा मेरा विश्वास रहा है।”

“गोदरा को यही रहने दे।” जगमोहन बोला –“ये हमारे साथ था तब। इन दोनों ने हमारे साथ ही नहीं, गोदरा के साथ भी धोखेबाजी की है। इसे देख लेने दे कि धोखेबाजी का क्या अंजाम होता है।”

वानखेड़े ने गोदरा को देखा।

“मैं सच में इन दोनों को अंत देखना चाहूंगा।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा –“मैं यहीं रहूंगा इंस्पेक्टर साहब।”

“किसी लम्बे चक्कर में मत पड़ जाना। तुम्हारी नई-नई शादी हुई है।”

“मुझे याद है।” गोदरा ने सपाट स्वर में कहा।

वानखेड़े ने देवराज चौहान और जगमोहन को देखा।

“इस बात को कभी मत भूलना कि तुम दोनों भी कानून के मुजरिम हो।”

“अब तुम्हारे साथ जाने का वक्त नहीं आया।” जगमोहन गम्भीर स्वर में बोला।

“वो वक्त कभी भी आ सकता है।” वानखेड़े भी गम्भीर था। कहकर वो पलटा और दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

“कार मत ले जाना।” गोदरा ने पीछे से कहा –“वो सेठ की है, जहां मैं नौकरी करता हूं।”

वानखेड़े बाहर निकल गया।

गोदरा ने खा जाने वाली नजरों से रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी को देखा।

“तुमने –।” रूपा ईरानी हिम्मत करके बोली –“बताया नहीं कि तुमने अभी अभी शादी की है। मैं तुम्हें बहुत कीमती उपहार...”

“चुप कर कमीनी।” गोदरा गुर्राया –“मेरा माल मेरे ही मुँह पर मारना चाहती है।”

रूपा ईरानी ने मुंह फेर लिया।

जगमोहन आगे बढ़ा और गन की नाल रनवीर भंडारी की छाती पर रख दी। चेहरे पर खतरनाक भाव थे।

“बहुत सयाना बना था तब तू।।”

“मजबूरी थी।” रनवीर भंडारी फीके स्वर में कह उठा –“तब मुझे दौलत की ताकत महसूस हुई थी कि दौलत से यारी होना बहुत जरूरी है। दौलत नहीं हुई तो मेरा सब कुछ नीलाम होने जा रहा था तब। नयना, बच्चों को लेकर मुझे छोड़ गयी। बाद में दूसरे से ब्याह कर लिया। मतलब कि दौलत कितनी जरूरी होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ था। तभी मैंने तीस अरब की सारी की सारी दौलत पर हाथ मारने का हौसला इकट्ठा किया। देवराज चौहान की योजना तो मेरे का मालूम थी, मैं इस पर नजर रखने लगा। ये जो तैयारी कर रहा था। मेरे सामने थी। इसकी तैयारी देखकर मैं अपनी तैयारी करता रहा। इसकी योजना पर मैं, अपनी योजना बनाता रहा। इधर मैंने रूपा ईरानी से बात करके इसे शीशे में उतार लिया था। इसके मेरे में ये शर्ते बंध गयी कि सारा काम ठीक रहा तो हम शादी करेंगे। या जो-जो भी करना था। हमने तय कर लिया। मुझ पर कोई शक न करें। इसलिये सब कुछ नीलाम होने दिया अपना। नयना को बार-बार फोन करता रहा। अपना सब कुछ नीलाम हो जाने के बाद पागलों की तरह सड़कों पर फिरता रहा ताकि कोई मुझ पर शक न कर सके। साथ ही भविष्य की तैयारी करता रहा। किसी को क्या मालूम कि रात को मैं क्या तैयारी कर रहा हूं। रात को जेवरातों में जो हीरे निकालता और नौकर बबलू के साथ मिलकर, सोने को गलाकर उनका रूप रंग बदलता।”

“ओह।” गोदरा कह उठा –“बहुत चालाकी से काम लिया तूने। इधर मेरे पास आता रहा कि देवराज चौहान को बोलूँ कि वो तेरा हिस्सा दे दे। ऐसे में तेरे पे कौन शक करता कि गड़बड़ तूने की है।”

“कुछ भी कहो। तब मुझे एहसास हो गया था कि दौलत का पास में होना बहुत कीमती है।” रनवीर भंडारी थके स्वर में कह रहा था –“तभी मैंने देवराज चौहान की नकल पर डकैती कर ली। सफल भी हो गया। मैंने, रूपा के साथ देश छोड़ने का फैसला किया। रूपा ने किसी तरह कोरिया की एक कम्पनी के साथ उनके प्रॉडक्ट पर मॉडलिंग करने का अनुबन्ध कर लिया और इस बहाने वो देश से बाहर निकल गयी। इधर मैं भी एक तिहाई जेवरातों में से हीरे निकाल चुका था। सोने को गलाकर उन्हें दूसरा रूप देकर, नौकर बबलू के द्वारा बाजार में बेचकर दौलत इकट्ठी कर चुका था। पासपोर्ट तो मेरा बना ही हुआ था। हवाला के जरिये अरबों की दौलत मैने कोरिया पहुंचकर पा ली। वहां रूपा मेरे साथ थी। लेकिन हमारी मंजिल तो यहीं पर थी। हिन्दुस्तान में। डकैती के तीन सालों बाद हम हिन्दुस्तान आ गये। ये सोचकर कि मुझे सब भूल चुके होंगे। ऊंटी में आराम से जिन्दगी बिता सकता हूं। शादी हमने अमेरिका में कर ली थी। बच्चा भी हो गया था। वापस लौटते ही कोई रूपा पर शक न करे कि डकैती के जेवरात इसके पास हो सकते हैं। उन्हीं के दम पर ये शान भरी जिन्दगी बिता रही है ऐसे में आने से पहले ही यहां के ज्वैलर्स को, ये खबर भिजवा दी कि रूपा ईरानी कीमती जेवरात खरीदना चाहती है। मशहूर मॉडल है ये। इसके पास दौलत कितनी है। कोई भी नहीं सोच सकता और कोई ये भी नहीं सोचेगा कि डकैती के तीस अरब के जेवरातों से इसका भी वास्ता हो सकता –।”

“ये बंगला कैसे बना?” गोदरा ने दांत भींचकर कहा।

“हिन्दुस्तान छोड़ने से पहले ही इस जमीन पर बंगला बनाने का काम एक ठेकेदार को दे दिया था। नक्शा भी दे दिया था। बबलू अपनी देख-रेख में बंगला बनवाता रहा।”

“तीन साल तूने बहुत ऐश की।” देवराज चौहान कठोर स्वर में बोला –“और तुमने भी।” उसने रूपा ईरानी को देखा –“लेकिन हमसे गद्दारी करने के बदले अब तेरे को सिर्फ मौत ही मिलेगी भंडारी। ये भी मरेगी। तब तेरे को दो अरब का हिस्सा बहुत था तू अपना उधार चुकता करके डेढ़ अरब पास रखकर शान से जिन्दगी बिता सकता था। दौलत से यारी करने का लालच बहुत बुरा होता है। अब –।”

“देवराज चौहान।” सूखे होंठों पर जीभ फेरकर भंडारी जल्दी से बोला –“हमें माफ कर दो। हमें मालूम है हमने तुम्हारे साथ बहुत बे-इन्साफी की।”

“साला, अकेले में हंसता होगा कि देवराज चौहान को बेवकूफ बना दिया।” कड़वे स्वर में कह उठा जगमोहन।

रनवीर भंडारी ने हाथ जोड़कर देवराज चौहान को देखा।

“दो तिहाई जेवरात हमारे पास हैं अभी। वो ले लो। हमें छोड़ दो। हमारी जान बख्श दो।”

देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी।

जगमोहन जल्दी से बोला।

“दो तिहाई जेवरात यानि कि बीस अरब के जेवरात तुम्हारे पास हैं?”

“हाँ।” रूपा ईरानी में जैसे हिम्मत आ गयी हो –“बीस अरब के जेवरात हमारे पास हैं। वो ले लो। हमें छोड़ दो।”

“छोड़ने-पकड़ने की बात मेरे साथ करो।” जगमोहन बोला –“कहां हैं वो जेवरात?”

“मुम्बई में-बबलू के पास।” रनवीर भंडारी कह उठा –“सब ले लो। तुम्हारे जेवरात ही तो हैं।”

“ठीक है चल मुम्बई। बीस अरब के जेवरात हमारे हवाले कर।” जगमोहन कह उठा।

“हमारी जान...।” रनवीर भंडारी ने देवराज चौहान को देखा –“हमें मत मारना। कहीं बाद में –।”

“देवराज चौहान से क्या बात करता है। मेरे से कर।”

जगमोहन जल्दी से बोला –“गारंटी देने का काम-वादे करना मेरे सिर पर है। मैं तेरे को बोलता हूं कि तेरे को नहीं मारेंगे। बीस अरब मेरे को दे।”

“मैं भी।” रूपा ईरानी सूखे स्वर में बोली –“मुझे भी मत मारना।”

“हां-हां, तेरे को भी नहीं मारेंगे। अभी मुम्बई चलो।”

तभी देवराज चौहान बोला।

“तुम दोनों का बच्चा कहां है?”

“ऊपर कमरे में।” रूपा ईरानी बोली –“उसकी फिक्र मत करो। नौकरानी के पास है।”

☐☐☐

मुम्बई तक कार गोदरा ने ड्राईव की।

देवराज चौहान उसकी बगल में और पीछे रनवीर भंडारी, रूपा ईरानी के बीच, जगमोहन सतर्क सा बैठा था कि दोनों में से कोई चालाकी करने की चेष्टा न करे। अपनी जान बचती पाकर दोनों जैसे राहत भरी सांस ले रहे थे। रनवीर भंडारी के बताये रास्ते पर चलकर बढ़िया कॉलोनी के अच्छे से मकान के सामने गोदरा ने कार रोकी। उसने बताया कि ये मकान हिन्दुस्तान छोड़ने से पहले, बबलू को खरीद कर दे दिया था। कि वो यहां मालिक बन कर रहे। उसके दिए अरबों के जेवरातों की निगरानी करता रहे।

“ये मकान है।” देवराज चौहान ने पूछा।

“हां। इसी में बबलू रहता है। यहीं बीस अरब के जेवरात हैं।” रनवीर भंडारी ने कहा।

“तुम यही रहना।” देवराज चौहान ने गोदरा से कहा फिर जगमोहन के साथ उन दोनों के लिए मकान के भीतर चला गया।

गोदरा कार की ड्राईविंग सीट पर बैठा। उनके आने का इन्तजार करता रहा। चेहरे पर गम्भीरता थी।

पन्द्रह मिनट बाद वे बाहर आये। जगमोहन ने सूटकेस उठा रखा था

चारों कार में बैठे। जगमोहन ने सूटकेस उठा कर कार की डिग्गी में रख दिया था।

प्रवेश गोदरा कार आगे बढ़ाते हुए बोला।

“कहां जाना है?”

“चलो।” बगल में बैठा देवराज चौहान बोला –“रास्ता मैं बता रहा हूं।”

☐☐☐

रात के दो बजे सुनसान सी जगह पर, देवराज चौहान ने कार रुकवाई।

“यहां क्या?” रनवीर भंडारी सूखे से स्वर में बोला –“हमें छोड़ दो। हम –।”

“छोड़ ही रहे हैं।” जगमोहन समझाने वाले स्वर में कह उठा –“दरवाजा खोल। नीचे चल। उधर बात करनी है दोनों से। मैंने वादा किया था कि तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। इस हरामी मैडम को भी कुछ नहीं कहूंगा। मेरा वादा है चलो उतरो।”

वो सब कार से बाहर निकले।

“तुम यहीं बैठे रहना।” देवराज चौहान ने सर्द स्वर में गोदरा से कहा –“हम अभी आ रहे हैं।”

गोदरा ने अंधेरे में चमकती, देवराज चौहान की आंखों में झांका।

देवराज चौहान उनकी तरफ बढ़ा।

“ह-हमें मारोगे तो नहीं?” रूपा ईरानी के होंठों से सूखा-सा स्वर निकला।

“फिर वही बात। मेरी गारंटी है। चिन्ता मत करो। बीस अरब के जेवरात तुमने वापस किए हैं। हमें धोखा दिया-हेराफेरी की तो क्या हुआ। वो सब तो चलता ही है। इधर आओ, कान में बात करते हैं...।”

जगमोहन दोनों की बांहें पकड़े सड़क किनारे ढलान में उतरता चला गया। पीछे देवराज चौहान था।

स्टेयरिंग सीट पर बैठा प्रवेश गोदरा होंठ भींचे अंधेरे में उन्हें सड़क किनारे ढलान पर जाते देखता रहा फिर मुंह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।

चंद पल ही बीते होंगे कि उनके कानों में गोली चलने की आवाज पड़ी। इसके दो पलों बाद रूपा ईरानी के चीखने की आवाज कानों में पड़ी। तभी एक और फायर हुआ। फिर सब कुछ शांत पड़ गया।

गोदरा ने गहरी सांस लेकर स्टेयरिंग पर सिर रख लिया।

रूपा ईरानी। देश-विदेश की मशहूर मॉडल खत्म हो गयी थी। अब वो कभी भी मॉडलिंग नहीं कर सकती थी।

कदमों की आहट सुनकर गोदरा ने स्टेयरिंग से सिर उठाया।

देवराज चौहान और जगमोहन पास आ पहुंचे थे। देवराज चौहान उसकी बगल में बैठा। जगमोहन पीछे वाली सीट पर।

गोदरा ने कार स्टार्ट की तो देवराज चौहान बोला।

“कार को वापस ले लो।”

गोदरा ने कार बैक की और शहर की तरफ मोड़ ली।

“तुमने –।” प्रवेश गोदरा जगमोहन से बोला –“उनसे वादा किया था कि उन्हें जिन्दा छोड़ दोगे।”

“उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया था कि उन हरामियों को जिन्दा छोड़ा जाता। उन दोनों ने हमें बहुत तकलीफ दी थी, जब हमें धोखा देकर डकैती कर ली और तीस अरब की दौलत ले उड़े थे। वो वक्त याद है तुम्हें या भूल गये?”

“याद है।” गोदरा ने गहरी सांस ली।

“वैसे भी उनसे वादा मैंने किया था। देवराज चौहान ने नहीं। मेरे वादे, सामने वाले के हिसाब से चलते हैं कि वो कैसा है। मेरे शब्दों की कीमत तब होती है, जब सामने वाला ईमानदार हो।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

गोदरा ने देवराज चौहान पर निगाह मारी। वो खिड़की से बाहर देख रहा था।

कुछ देर बाद जगमोहन ने सड़क के किनारे कार रुकवाई।

सड़क पर से इक्का-दुक्का वाहन निकल रहे थे। रात के तीन बज रहे थे।

“चल।” पीछे बैठे जगमोहन ने गोदरा का कंधा थपथपाया –“बाहर निकल –।”

“मैं-क्यों?” गोदरा हड़बड़ा उठा –“मुझे क्यों मार रहे –।”

“मार नहीं रहा। बाहर निकल –।” कहते हुए जगमोहन ने दरवाजा खोला और बाहर निकल आया।

उलझन और घबराहट में फंसा गोदरा बाहर निकला।

“डिग्गी खोल।”

गोदरा कार के पीछे वाले हिस्से में आया। दूर से आती स्ट्रीट लाइट की रोशनी में जगमोहन के चेहरे पर नजर मारते हुए, उसने डिग्गी खोल दी।

सामने सूटकेस पड़ा था।

जगमोहन ने सूटकेस खोला तो उसमें पड़े बीस अरब के जेवरात चमक उठे।

उन पर नजर पड़ते ही गोदरा पल भर के लिये हड़बड़ा पड़ा।

“आंखें मत फाड़। जल्दी कर। पुलिस कार सिर पर आ गयी तो नई मुसीबत आ जायेगी।” जगमोहन बोला।

“क-क-क्या करूं?” गोदरा की फटी निगाह सूटकेस पर थी।

“बीस अरब के जेवरात हैं तेरे सामने। एक मुट्ठी भर। मुट्ठी में जितने भर सकता है भर ले। तेरी शादी का तोहफा देना था तेरे को ये तोहफा ही है कि एक मुट्ठी में जितने जेवरात भर सकता है भर ले।”

“वो तो ठीक है। लेकिन मेरा-हिस्सा –।”

“हिस्सा।” जगमोहन स्वर उखड़ गया –“कैसा हिस्सा, हिस्से वाला मामला तो तभी गड़बड़ हो गया था जब डकैती में तीन साल पहले गड़बड़ हो गयी थी। दस अरब के जेवरात तो उन दोनों ने बरबाद कर दिए। बाकी के बीस अरब से तेरे को हिस्सा दूंगा तो मैं कहां जाऊंगा। वैसे भी पहले तुम दो थे। कमल शर्मा तो है नहीं। तू अकेला बचा। मुट्ठी भर कर ले ले। उतना ही खाना चाहिये जितना हजम हो जाये। समझा कि नहीं।”

गोदरा ने खुले सूटकेस में दायां हाथ मारा और उससे ज्यादा से ज्यादा जेवरात भर लिये। तभी उसने दूसरा हाथ सूटकेस में मारा और उसकी भी जेवरातों की आधी मुट्ठी भर ली।

“ये क्या?” जगमोहन जल्दी से बोला –“दूसरा हाथ पीछे कर...”

“थोड़े से हैं। आधी मुट्ठी है।” कहकर गोदरा पीछे हटा और दोनों हाथों में भरे जेवरात कार के भीतर सीट पर डाल दिए। वो खुश था उसकी आंखें चमक रही थी।

“बहुत लालची है। पांच-दस या फिर पन्द्रह करोड़ के जेवरात ले लिए तूने।” जगमोहन सूटकेस बंद करके, उसे डिग्गी से निकालकर सड़क पर रखा और डिग्गी बंद कर दी।

देवराज चौहान कार के बाहर कार से टेक लगाये खड़ा था।

“आधी तो खोट निकल जायेगी। बचेगा क्या?” गोदरा दांत फाड़कर कह उठा।

“दांत बंद कर।”

गोदरा फौरन खामोश हो गया।

“वानखेड़े को मत भूलना। तू इन जेवरातों को बेचते हुए पकड़ा जा सकता...।”

“जेवरातों की शक्ल बदलना मेरा धंधा है।” गोदरा मुस्कराया –“इन्हें तो कोई पहचान भी नहीं पायेगा, जब बेचूंगा।”

तभी देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई।

गोदरा ने देवराज चौहान को देखा।

“हमसे धोखेबाजी करने का अंजाम तो तुमने देख लिया होगा।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

“ह-हां।” गोदरा हड़बड़ाया-”मैंने तुम लोगों के साथ कोई गड़बड़ नहीं –।”

“भविष्य में हमारे साथ गड़बड़ करने की सोचना भी नहीं।” देवराज चौहान का शांत स्वर सामान्य था –“तुम हमारा बंगला जानते हो। देखा हुआ है। उसे भूल जाना। जिन्दगी में कैसी भी आफत आये, लेकिन हमारे पास नहीं आना। तुम्हारा, हमसे रिश्ता आज तक का ही था। आज से सब खत्म।”

“समझ गया। समझो मैं तुम लोगों को भूल गया।” गोदरा ने जल्दी से कहा।

“नहीं भूला तो।” जगमोहन का स्वर सख्त हो गया –“तो तेरा वो हाल होगा कि तेरे को दुनिया भूल जायेगी।”

“म-मैं भूल गया तुम दोनों को।” गोदरा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

जगमोहन ने नीचे रखा सूटकेस उठाया। देवराज चौहान को देखा। देवराज चौहान पास आया तो दोनों पैदल ही सड़क के किनारे आगे बढ़ गये।

तभी उनके कानों में आवाज पड़ी गोदरा की।

“मैं छोड़ देता हूं कार में। पैदल कहां जा रहे हो।”

देवराज चौहान और जगमोहन ठिठके। जगमोहन पलटा।

“तेरे को बोला था कि भूल जाना हमें और तू भूला नहीं।” जगमोहन का सख्त स्वर कानों में पड़ा।

“भूल गया। समझ गया। भूल गया।” गोदरा हड़बड़ाकर बोला। कार में बैठा और स्टार्ट करते हुए तेजी से कार को सड़क पर दौड़ा दिया।

जगमोहन पलटा और अरबों के जेवरातों से भरा सूटकेस थामे देवराज चौहान के साथ सड़क के किनारे-किनारे आगे बढ़ता चला गया।

समाप्त