वियना में बेघर

प्राचीन इतिहास के प्रतीक, खूबसूरत शहर वियना, ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य की राजधानी, जिसकी शानदार संस्कृति में बीथोविन और मोजार्ट जैसे महान् कलाकारों के संगीत की गूँज थी, की धरती पर एक और नवागत ने कदम रखा, जिसका रंग पीला था, बदन एकदम दुबला-पतला था और चेहरे पर उदासी छाई हुई थी। उम्र थी अठारह साल और नाम था एडोल्फ हिटलर।

वियना एक संगीतमय जीवंत शहर था और वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों की भरमार थी, जो कला-प्रेमी थे और जो उस शहर को अपना घर कहने में खुद को भाग्यशाली समझते थे। फरवरी 1908 में हिटलर अपना बोरिया-बिस्तर लेकर वहाँ चला आया, इस लक्ष्य के साथ कि वह कला अकादमी में भरती होगा और एक बड़ा कलाकार बनेगा।

साठ वर्ष पहले हिटलर के पिता भी अवसर की तलाश में वियना आए थे। उस समय हैप्सबर्ग साम्राज्य पर सम्राट् फ्रांज जोसेफ का शासन था। जब एडोल्फ हिटलर वहाँ पहुँचा, उस समय भी उसी का शासन था, हालाँकि अब वह बूढ़ा और कमजोर हो गया था तथा भ्रष्ट मंत्रियों के प्रभाव में था। ऑस्ट्रिया एवं आसपास के देशों पर सदियों से शासन करनेवाला उसका साम्राज्य अब घोर पतन की ओर चल पड़ा था। वियना फिर भी संभावनाओं का शहर था और पूरे साम्राज्य से भिन्न-भिन्न संस्कृति के लोग वहाँ आते रहते थे।

हिटलर का दोस्त अगस्त कुबिजेक भी लिंज से वियना आ गया और वे दोनों साथ रहने लगे। वियना में हिटलर ने फिर वही आलस्यपूर्ण जीवन-शैली अपना ली, जो उसने स्कूल छोड़ने के बाद लिंज में अपनाई थी। कुबिजेक हिटलर को ‘रात का उल्लू’ कहता था, जो दोपहर तक सोता, फिर बाहर घूमने निकल जाता, सभी दर्शनीय स्थलों को देखता, फिर सामाजिक सुधार से लेकर नगर योजना तक हर चीज के बारे में देर तक अपने विचारों पर चर्चा करता। हिटलर ने एक नियमित नौकरी या काम तलाशने की कोई कोशिश नहीं की। वह खुद को बहुत ऊँचा समझता था। वह एक कलाकार जैसे कपड़े पहनता और रात में एक बेफिक्र युवा भद्र पुरुष की तरह सज-धजकर ओपेरा देखने चला जाता।

कुबिजेक का यह भी कहना था कि हिटलर का रवैया अधिकाधिक ढुलमुल होता जा रहा था और स्वभाव भीषण। कभी-कभी वह बड़ा समझदार लगता था; लेकिन कब वह अचानक गुस्से में बिफर पड़ेगा, इस बात का कुछ भरोसा नहीं था, विशेषकर उस समय जब उसकी किसी बात को गलत कहा जाए। स्त्रियों में उसकी कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वह उनसे दूर रहना अधिक पसंद करता था और अगर कोई स्त्री उसमें कोई दिलचस्पी दिखाती तो वह एक दंभी व्यक्ति की तरह उसे झिड़क भी देता था। सेक्स के बारे में उसके विचार पूरी तरह कैथोलिक सिद्धांतों पर आधारित थे। उसका मानना था कि मर्द और औरत को विवाह होने तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।

हिटलर को अचानक प्रेरणा के झोंके भी आते थे और वह अनेक दिलचस्प विचार भी सुनाया करता था; लेकिन शुरू की गई बात को कभी पूरी नहीं करता था। चाहे अपना ओपेरा रचने की बात हो या वियना नगर की नई रूपरेखा तैयार करने का विचार, वह बड़े जोश और मेहनत से काम शुरू करता; लेकिन अंतत: उसकी दिलचस्पी खत्म हो जाती थी।

अक्तूबर 1908 में हिटलर ने दूसरी बार वियना ललित कला अकादमी में प्रवेश पाने की कोशिश की। किंतु परख परीक्षा में उसके बनाए चित्रों को इतना घटिया माना गया कि उसे औपचारिक परीक्षा में भी बैठने की आज्ञा नहीं दी गई। हिटलर के लिए वह कटु विफलता थी और उसके पास अब वियना में कलाकारों को नजर भर देखने के सिवाय कोई चारा नहीं रह गया था। उसके दोस्त कुबिजेक को वियना संगीतालय में सफलतापूर्वक प्रवेश मिल गया था और वह वहाँ संगीत की पढ़ाई कर रहा था। हिटलर के विपरीत वह अच्छी प्रगति कर रहा था।

हिटलर ने जल्दी ही, कुछ अजीब ढंग से, अपने मित्र का साथ छोड़ दिया। कुबिजेक जब नवंबर 1908 में दो माह का सैनिक प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वापस आया, उसने पाया कि हिटलर उनका साझा फ्लैट छोड़कर चला गया है और अपना अगला पता भी उसने नहीं छोड़ा।

चूँकि हिटलर उसके लिए किसी काम का व्यक्ति नहीं था, उसने उसे दुबारा खोजने का कोई प्रयास नहीं किया। वह अकेले ही रहता रहा, एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा; क्योंकि उसके बचे-खुचे पैसे धीरे-धीरे खत्म हो चले थे और इसके साथ ही उसका रहन-सहन भी गिरता चला गया। धन की आवश्यकता के बावजूद हिटलर ने नियमित रोजगार प्राप्त करने की कोई कोशिश नहीं की। आखिरकार, उसने अपनी सभी चीजें गिरवी रख दीं और हालात यहाँ तक आ पहुँचे कि उसे पार्क की बेंचों पर रात गुजारनी पड़ी और पैसों के लिए भीख का सहारा लेना पड़ा। वह गंदा रहने लगा। उसके कपड़ों से बू आने लगी, दाढ़ी बढ़ गई, कपड़ों के नाम पर चिथड़े रह गए और उसके पास कोई ओवरकोट भी नहीं था। दिसंबर 1909 में ठंड से ठिठुरता और अधभूखा हिटलर एक अनाथालय की शरण में चला गया। वहाँ उसने एक निकटवर्ती कॉन्वेंट से ईसाई भिक्षुणियों द्वारा चलाई जा रही सूप किचन में खाना खाकर अपना पेट भरा।

फरवरी 1910 में उसने एक दरिद्र-गृह में आश्रय लिया और अगले कुछेक वर्षों तक वहीं रहा। हिटलर कभी-कभी दिन में मजदूरी करके कुछ धन कमा लेता था। उसे बर्फ हटाने और रेलवे स्टेशन पर सामान उठाने का काम मिल जाता था। फिर उसने जान लिया कि वह वियना के प्रसिद्ध, दर्शनीय स्थलों की तसवीरें बेचकर, अपने निर्वाह योग्य धन कमा सकता है। वह पोस्ट कार्डों से उन तसवीरों की नकल उतार लेता था। गरीबों के उस आश्रम के एक और निवासी रेन्होल्ड हैनिश ने उसके एजेंट के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वह हिटलर की कलाकृतियों को विभिन्न दुकानों पर पहुँचा देता था, जहाँ उन्हें अधिकतर खाली चौखटों यानी फ्रेमों में लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। हिटलर ने दुकानों की खिड़कियों के पोस्टर बनाने का काम भी ले लिया।

हैनिश के अनुसार, हिटलर अनुशासनहीन और बदमिजाज था। हमेशा गरीब लोगों के घर के चक्कर काटता रहता था, राजनीति पर बहस के लिए हर वक्त तैयार रहता और उस दरिद्राश्रम में रहनेवालों पर अकसर भाषण झाड़ा करता था। अगर कोई उसका विरोध करता तो उसे तुरंत गुस्सा आ जाता। अंत में हिटलर का हैनिश के साथ झगड़ा हो गया। उसने हैनिश पर अपना सामान चोरी करने का आरोप लगाया और अगस्त 1910 में उसने अदालत में उसके खिलाफ झूठी गवाही भी दी, जिसके परिणामस्वरूप हैनिश को आठ दिन के कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। (वर्ष 1938 में हिटलर के हुक्म से हैनिश की हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने हिटलर के बारे में अखबारवालों के सामने जुबान खोलने की हिमाकत की थी)।

फिर हिटलर अपने बनाए चित्रों को अधिकतर यहूदी दुकान मालिकों के पास स्वयं पहुँचाने लगा और उस काम में जोसेफ न्यूमैन भी उसकी मदद करने लगा। जोसेफ भी यहूदी था और हिटलर की उससे दोस्ती हो गई थी।

हिटलर को पढ़ने का भूत सवार था। वह उस दरिद्राश्रम में उपलब्ध सारे अखबारों पर कब्जा कर लेता, राजनीति से भरे अनगिनत इश्तहारों को पढ़ता और जर्मन इतिहास एवं पौराणिक कथाओं की पुस्तकें लाइब्रेरी से उधार लेकर पढ़ता रहता था। उसका दिमाग जिज्ञासु तो था, लेकिन शिक्षा की दृष्टि से अप्रशिक्षित था। हव नियंत्शे, हेजिल, फिश्ते, त्रेत्शके और अंग्रेज विचारक हूस्टन एटीवार्ट चैंबरलेन की जटिल दार्शनिक कृतियों की जाँच-परख करता रहता था। हिटलर ने उन कृतियों के कुछ अंशों का अध्ययन किया और कुछ विचारों को ग्रहण किया, जैसे कि नस्लवाद, राष्ट्रवाद और सभी विरोधी विचारधारा। उसकी मानसिकता में इन सब विचारों का मिश्रण था, जो समय गुजरने की साथ-साथ उसके चिंतन और जीवन का पक्का सिद्धांत बन गया। इसका उल्लेख बाद में उसने अपनी किताब ‘मैन कैंफ’ में किया है।

उसकी गरीबी और घोर कंगाली ने भी उसे बहुत प्रभावित किया। उसका स्वभाव अत्यंत रूखा एवं निष्ठुर हो गया। उसकी मानसिकता में दया एवं अनुकंपा के लिए कोई गुंजाइश, कोई जगह नहीं थी—अंत तक उसकी यही मानसिकता रही।

हिटलर जब वियना आया, उसके पहले से ही हिटलर के व्यक्तित्व में समानुभूति का अभाव था। अनेक इतिहासकारों का निष्कर्ष है कि हिटलर मानसिक व्यथा से पीड़ित था, जिसका एक कारण तो उसका दुखी बचपन था, क्योंकि अपने पिता के साथ उसके संबंध मधुर नहीं थे। वह दबंग स्वभाव के थे और कभी-कभी क्रूरता की हद तक पहुँच जाते थे और दूसरी वजह शायद यह थी कि उसे अपनी माँ से अत्यधिक लगाव था, जो उसे बहुत लाड़-प्यार करती थी और उसके बारे में हरदम चिंतित रहती थी।

वियना में, और उसके बाद, हिटलर कई बार अवसाद में डूबा रहता। कभी-कभी उसकी खिन्नता चोटी पर पहुँच जाती और फिर वह वापस अवसाद के गहरे सागर में डूब जाता। यह एक तरह का उन्माद था, जो उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था। जब भी कोई उसे नाखुश करता था, वह पागलों जैसा व्यवहार करने लगता था। बताया जाता है कि उसकी शख्सियत बुनियादी रूप से उस व्यक्ति जैसी थी, जिसे रह-रहकर मिरगी के दौरे पड़ते हैं।

इक्कीस वर्ष की आयु में उसकी दिलचस्पी राजनीति में बहुत बढ़ गई। वह हर वक्त यह देखता और सोचता रहता था कि वियना में उसके चारों ओर क्या घट रहा है।

मजदूरों के एक विशाल-विरोध प्रदर्शन को देखने के बाद वह कामगार पार्टी, सोशल डेमोक्रेट्स की राजनीति का गहन अध्ययन करने में निमग्न हो गया। विशाल रैलियाँ आयोजित करने और प्रचार एवं भय को राजनीति का हथियार बनाकर प्रयोग करने की उनकी सामर्थ्य का वह प्रशंसक बन गया।

कनखियों से वह दो अन्य मुख्य पार्टियों द मैन जर्मन नेशनलिस्ट्स और द क्रिश्‍चियन सोशल पार्टी के कारनामों पर भी नजर रखता था, जिसके फलस्वरूप जर्मन राष्ट्रवाद तथा सामीवाद-विरोध में उसकी दिलचस्पी और बढ़ गई।

वियना नगर की आबादी लगभग 20 लाख थी, जबकि उसमें यहूदियों की जनसंख्या 2 लाख से भी कम थी। परंपरागत पोशाक पहननेवाले प्रजातीय यहूदियों को मिलाकर लिंज में हिटलर कुछ मुट्ठी भर ‘जर्मनीकृत’ यहूदियों को ही जानता था। हिटलर जिस निर्धन आश्रम में रहता था, वह एक यहूदी समुदाय के निकट था।

वियना में मध्य वर्ग में सामी जाति का विरोध करने का रिवाज-सा ही था। मेयर कार्ल लुएजर जो एक जाने-माने सामी-विरोधी थे, क्रिश्‍चियन सोशल पार्टी के सदस्य थे। उस पार्टी के राजनीतिक मंच में सामी-विरोध शामिल था।

लुएजर एक प्रभावशाली राजनीतिज्ञ था और हिटलर उसका प्रशंसक था, क्योंकि लुएजर वक्तृत्व-कला में निपुण था और वह जनमत हासिल करने के लिए प्रचार का कारगर प्रयोग करता था। हिटलर को लुएजर की कैथोलिक चर्च जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं का इस्तेमाल अपना काम निकालने के लिए करने की योग्यता पसंद थी। उसने लुएजर का ध्यान से अध्ययन किया और उससे पाई सीख को अपने व्यवहार में अपना लिया। अखबारों के अड्डों और स्थानीय कॉफी दुकानों पर सामी-विरोधी पत्रिकाएँ और चौपन्ने भी उपलब्ध थे। हिटलर ने अपनी पुस्तक ‘मैन कैंफ’ में दावा किया है कि उन्हें पढ़ने के बाद पहली बार उसे विरक्ति हुई थी—

‘‘...विशेषकर वियतनामी सामी-विरोधी अखबारों का स्वर मुझे एक महान् राष्ट्र की सांस्कृतिक परंपरा के अनुकूल प्रतीत नहीं हुआ।’’

हिटलर ने यहूदियों के बारे में अपनी समझ-बूझ में आए परिवर्तन का भी उल्लेख ‘मैन कैंफ’ में किया है। इसका श्रेय वह संयोगवश हुई मुलाकात को देता है।

‘‘एक बार जब मैं अंदरूनी शहर में टहल रहा था, मेरी नजर अचानक एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी, जिसने काला खफ्तान पहना हुआ था और उसके बाल काले-घुँघराले थे। मेरे दिमाग में पहला सवाल कौंधा, ‘क्या यह एक यहूदी है?’

‘‘क्योंकि वे लिंज में इस तरह के नहीं दिखते थे। मैंने उस व्यक्ति को आँख बचाकर और सावधानी से देखा, लेकिन मैंने उस विदेशी चेहरे पर जितनी नजर गड़ाई, उसके नाक-नक्श को जितने ध्यान से देखने की कोशिश की, मेरे सवाल की शक्ल भी उतनी ही पलट गई, ‘क्या यह जर्मन है?’

अपने सवाल का जवाब पाने के लिए, वह स्वयं सामी-विरोधी साहित्य का अध्ययन करने में डूब गया। फिर वह बाहर चला गया और उसने आते-जाते यहूदियों को गौर से देखा।

‘‘...मैंने जितना अधिक गौर किया, वे मेरी नजर में मुझे शेष मानव जाति से उतने ही अधिक अलग किस्म के लगे।

‘‘मेरे लिए यह अत्यंत आध्यात्मिक उथल-पुथल का समय था, क्योंकि मेरे साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मैं अब एक ढुलमुल प्रवृत्तिवाला विश्‍व नागरिक न रहकर एक सामी-विरोधी बन गया था।’’

किंतु, उस समय हिटलर का सामी-विरोध यहूदियों के साथ उसके व्यक्तिगत संबंधों में दिखाई नहीं देता था। वह अब भी यहूदी दुकानदारों के साथ कारोबार करता था, खुद के बनाए चित्र उन्हें बेचता था और जोसेफ न्यूमैन के साथ भी उसकी दोस्ती बनी रही। फिर भी, घृणा के बीज तो पड़ ही गए थे और आगामी घटनाक्रम ने उन्हें बढ़ने दिया। इस तरह पूरी मानव जाति के इतिहास में एक सबसे बड़ी त्रासदी की नींव तैयार होने लगी।

हिटलर ने 24 साल की उम्र में वियना छोड़ दिया, ताकि उसे ऑस्ट्रिया की फौज में अनिवार्य सैनिक सेवा न करनी पड़े और इस तरह उसने बहु-सांस्कृतिक ऑस्ट्रियाई साम्राज्य की सेवा करने से स्वयं को दूर रखा, क्योंकि उस साम्राज्य से हिटलर को नफरत होने लगी थी।

वियना से चले जाने के चौबीस साल बाद एडोल्फ हिटलर की वापसी विजयघोष के साथ, जर्मन राज्य के फ्यूहरर के रूप में हुई। किंतु उन दुर्दिनों की याद हमेशा अमिट रहेगी, जो उसने अपनी किशोरावस्था में देखे थे और उन अभागे दिनों में जिन मनोवृत्तियों एवं विचारों ने उसके मन में घर कर लिया था, वे भी हटने वाले नहीं थे।

मई 1913 में उसने जर्मन पितृभूमि पर कदम रखे और म्यूनिख में बस गया। लेकिन ऑस्ट्रियाई सरकार के लंबे हाथ जनवरी 1914 में हिटलर तक पहुँच गए। सैन्य सेवा से बच निकलने के आरोप में जेल जाने की आशंका को देखते हुए उसने ऑस्ट्रियाई दूतावास को एक पत्र लिखा, जिसमें उसने हाल ही में बिताए अपने दु:ख-भरे दिनों का हवाला देते हुए क्षमा-याचना की।

‘‘मैंने कभी जाना ही नहीं कि जवानी किसे कहते हैं।’’ हिटलर ने अपने पत्र में लिखा।

पत्र की इस अभिव्यक्ति से ऑस्ट्रियाई पदाधिकारी प्रभावित हो गए और उन्होंने हिटलर को सैन्य सेवा से कतराकर भाग जाने की हिमाकत के लिए माफ कर दिया। उसमें आवश्यक मेडिकल परीक्षा है, जिसमें वह आसानी से फेल हो गया और फिर मामला हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया।

म्यूनिख में हिटलर ने चित्रकारी करना फिर शुरू कर दिया और प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक स्थलों के रंगीन चित्र स्थानीय दुकानों को बेचकर निर्वाह योग्य पैसे कमाने लगा। जब एक बार किसी पुराने दोस्त ने उससे पूछा कि वह स्थायी जीविकोपार्जन की व्यवस्था कैसे करेगा, तो हिटलर ने कहा कि इस बात की चिंता उसे नहीं है, क्योंकि शीघ्र ही लड़ाई छिड़ने वाली है।

1 अगस्त, 1914 को एक विशाल उत्साही भीड़ म्यूनिख में एक बड़े सार्वजनिक मैदान में जमा हुई। हिटलर उस जमघट में शामिल था। मौका था जर्मनी की ओर से युद्ध की घोषणा का जश्‍न मनाने का।

दो दिन बाद हिटलर ने जर्मन सेना में शामिल होने की इच्छा जताई और बवेरियन रेजीमेंट में भरती हो गया।

‘‘मेरे लिए हर जर्मन व्यक्ति की तरह मेरे लौकिक अस्तित्व का महानतम एवं अत्यंत अविस्मरणीय समय आरंभ हो गया। इस विराट् एवं गहन संघर्ष की घटनाओं की तुलना में अतीत का सारा घटनाक्रम एकदम नगण्य हो गया।’’ हिटलर ने ‘मैन कैंफ’ में कहा है।

पहली बार युद्ध की खबर सुनते ही हिटलर ने अपने घुटनों के बल झुककर ईश्‍वर का धन्यवाद किया था कि उसे जीवित रखा।