रविवार : सत्ताईस दिसम्बर

राजनगर मुम्बई
शनिवार को पुलिस के आर्टिस्ट ने बैंक लुटेरों की कम्पोजिट पिक्चर्स का फाइनल वर्शन पुलिस के हवाले कर दिया था। उसमें जगमोहन की दो तसवीरें थीं; एक में वो फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ के साथ था और दूसरी में क्लीनशेव्ड था। शनिवार को ही एसपी यदुनाथ सिंह ने वो तसवीरें प्रैस को रिलीज कर दी थीं जो कि रविवार के अंक में प्रकाशित हुई थीं।
दिलीप चौधरी ने राजनगर में अपने नये आवास पर क्योंकि अखबार की डिलीवरी का अभी कोई इन्तजाम नहीं किया था—न ही उसे मालूम था कि उस इलाके में अखबार कैसे डिलीवर होता था—इसलिये उस सिलसिले से वो पूरी तरह से बेखबर था। उसको तसवीरों के प्रकाशन की खबर होती तो वो उस घड़ी सोया न पड़ा होता जबकि सुबह साढ़े सात बजे के करीब फ्लैट की कालबैल बजी।
उसकी आँख खुली, उसने बैड स्विच ऑन करके कमरे में रोशनी की। वो बैड में से निकलने को था कि उसे बगल के बैडरूम से भी हलचल की आवाज आयी।
मुग्धा जाग गयी थी—उसने सोचा—देख लेगी कौन आया था इतनी सुबह सवेरे।
वो फिर सो जाने लगा ही था कि एकाएक ठिठका।
कौन हो सकता था आगन्तुक?
अभी तो किसी को ये तक खबर नहीं थी कि वो फ्लैट आबाद था।
फिर किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर वो झपट कर बैड से उठा और बाहर निकला।
मुग्धा को उसने मुख्यद्वार की ओर बढ़ते पाया।
“रुक।”—वो व्यग्र भाव से बोला।
मुग्धा ठिठकी, असमंजसपूर्ण भाव से उसने अपने अंकल की तरफ देखा।
“मुझे देखने दे।”
मुग्धा ने सहमति में सिर हिलाया।
चौधरी लपक कर मुख्यद्वार के समीप पहुँचा, उसने उसमें फिट मैजिक आई में आँख लगाकर बाहर झाँका।
पुलिस!
उसके प्राण काँप गये।
और सब से आगे यदुनाथ सिंह नाम का वो एसपी था जिस के हाथ में चौबीस की शाम को बैंक डकैती के दौरान मौकायवारदात की कमान थी।
जिसके सामने बतौर बन्धक वो पेश हो चुका था।
पलक झपकते तमाम माजरा उसकी समझ में आ गया।
बगूले की तरह वो अपने बैडरूम की तरफ लपका।
“क्या हुआ?”—उसके पीछे लपकती मुग्धा आतंकित भाव से बोली।
“पुलिस।”—वो बोला—“हम गिरफ्तार होने वाले हैं।”
“ओह, नो।”
उसने वार्ड रोब में से यूरो के बाकी बचे चालीस नोट निकाले और उन्हें लेकर किचन की तरफ लपका। वहाँ उसने नोटों को माचिस दिखाई और भस्म होने के लिए सिंक में डाल दिया।
कालबैल फिर बजी।
मुग्धा उसके पीछे वहाँ पहुँच गयी थी, उसके मुँह खोलने से पहले ही चौधरी बोल पड़ा—“कुछ नहीं बोलना। कुछ कबूल नहीं करना। हमारा किसी वारदात से कोई वास्ता नहीं। वो कैसा भी सबूत पेश करें, कैसा भी दबाव डालें, कुछ कबूल नहीं करना, चाहे तबाही आ जाये।”
“नेवीगेटर...”
“सेफ है। उनके हाथ नहीं पड़ने वाला।”
“कहाँ?”
“बताने का टाइम नहीं।”
सारे नोट भस्म हो गये तो उसने सिंक का नलका चला के उन की राख बह जाने दी। जब अच्छी तरह से तसल्ली हो गयी कि राख के कोई अवशेष सिंक में बाकी नहीं थे तो उसने नल बन्द कर दिया।
घण्टी फिर बजी।
इस बार बहुत देर तक।
“तू अपने बैडरूम में जा।”—चौधरी फुसफुसाया—“मैं खोलता हूँ।”
और वो दरवाजे की तरफ लपका।
उसने दरवाजा खोला।
कई पुलिसिये बगूले की तरह फ्लैट में घुस आये।
किसी ने फ्लैट का दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया।
यूँ घुस आये लोगों में दो जने ऐसे भी थे जो पुलिस की वर्दी में नहीं थे। उनमें से एक उसका लैंडलार्ड मेहरोत्रा था और दूसरा—
चौधरी का दिल डूबने लगा।
बेनीवाल था।
वो शख्स जिसने उसे अपनी बीवी को सौंपने के लिए पाँच पाँच सौ यूरो के साठ नोट दिये थे।
एसपी यदुनाथ सिंह ने अपलक अपने सामने खड़े शख्स को देखा और मन ही मन सोचा :
क्या उसके सामने दूसरा बन्धक खड़ा था जिसने कि अपना नाम कपिल सक्सेना बताया था, जो बैंक से निकलते ही सड़क पर ढेर हो गया था और जिसे एक स्ट्रेचर पर लिटा कर पुलिस की सुरक्षा में पहुँचाया गया था?
उस घड़ी माहौल ऐसा था कि उसने उस शख्स की सूरत की तरफ कोई खास तवज्जो नहीं दी थी।
उसके हाथ में उस रोज का रोल किया हुआ अखबार था जिसे कि उसने खोला। उसने अखबार में छपी कम्पोजिट पिक्चर से सामने खड़े व्यक्ति की सूरत का मिलान किया।
लगता तो वही था!
लेकिन उसकी बेहतरीन शिनाख्त जर्मनी रिटर्न्ड बेनीवाल कर सकता था जिसके साथ बैंक के भीतर उसकी गुफ्तगू हुई थी और जिसको साथ लेकर आने की दानिशमन्दी उसने दिखाई थी।
उसने बेनीवाल की तरफ देखा।
बेनीवाल ने दृढ़ता से सहमति में सिर हिलाया।
“मिस्टर दिलीप चौधरी!”—फिर एसपी कड़क कर बोला।
“हाँ।”—चौधरी अपने स्वर को भरसक सुसंयत रखता बोला।
“आप यहाँ अपनी भतीजी के साथ रहते हैं?”
“हाँ।”
“कब से?”
“लैंडलार्ड को साथ ले के आये हैं, इसलिये आपको मालूम है कब से! नहीं मालूम तो उसी से पूछिये।”
“मैं आपसे पूछता हूँ।”
“परसों से।”
“अकेले रहते हैं?”
“मेरी भतीजी मेरे साथ है।”
“क्या नाम है?”
“मुग्धा चौधरी।”
“वो यहीं है?”
“हाँ।”
“बुलाइये।”
लेकिन एक साथ इतने लोगों की आमद से त्रस्त मुग्धा पहले ही बाहर पहुँच गयी थी।
एसपी ने फिर अखबार का मुआयना किया।
फ्रेंच कट दाढ़ी वाले के साथ छूटी बन्धक जो बैगी जींस, ढीला-ढाला कुर्ता और कार्डीगन पहने थी!
लगती तो वही थी।
“मिस्टर चौधरी”—वो पूर्ववत् कड़कता बोला—“यू आर अण्डर अरैस्ट। यू टू मैडम।”
“क्यों?”—चौधरी गुस्से से बोला—“क्या किया है हमने?”
“आपको नहीं मालूम?”
“हमने कुछ नहीं किया।”
“चौबीस तारीख गुरुवार को आपने और आपकी भतीजी ने अपने एक और जोड़ीदार के साथ मिलकर—जो कि सांता क्लाज का बहुरूप बनाकर बैंक में तब घुसा था जब आप दोनों ग्राहक बने पहले से भीतर मौजूद थे—दोपहरबाद सुनामपुर की हडसन रोड पर स्थित गार्जियन बैंक में डाका डाला था।”
“क्या कह रहे हैं आप?”
“वही जो आप सुन रहे हैं। आप इस इलजाम से इंकार करते हैं?”
“सौ बार। हजार बार इंकार करता हूँ।”
“गुरुवार चौबीस तारीख को दोपहरबाद आप कहाँ थे?”
“यहीं था।”
“इस फ्लैट में?”
“राजनगर में। इस फ्लैट में हम परसों आये। पहले ही बोला।”
“राजनगर में कहाँ थे?”
“बन्दरगाह के इलाके में स्थित सी-गार्डन नाम के बार में उस के प्रोपराइटर धीरज परमार के साथ थे।”
“वो इस बात की तसदीक करेगा?”
“बराबर करेगा। क्यों नहीं करेगा?”
“आपकी भतीजी भी तब आपके साथ थी और वहीं थी?”
“हाँ।”
“वहाँ क्या कर रहे थे आप लोग?”
“एक दोस्त का इन्तजार कर रहे थे जो कि हमें वहाँ मिलने वाला था।”
“नाम बोलिये?”
“मोहन बाबू पासवान।”
“वो वाकिफ है आपका?”
“दोस्त है।”
“किसलिये इन्तजार कर रहे वे?”
“कर्जे के तौर पर उससे कुछ रकम हासिल करने के लिए।”
“कितनी रकम?”
“पाँच लाख रुपये।”
“मिले?”
“हाँ।”
“वो शख्स कहाँ रहता हैं? पता बोलिये उसका।”
“फ्लैट नम्बर 401, एलीशिया टावर, लिंक रोड।”
“हासिल रकम का आपने क्या किया?”
“इनको”—चौधरी ने मेहरोत्रा की तरफ इशारा किया—“इस फ्लैट की बैलेंस पेमेंट के तौर पर दी।”
“झूठ!”—मेहरोत्रा आवेशपूर्ण स्वर में बोला।
“क्यों? पेमेंट नहीं दी आपको?”
“दी लेकिन रुपयों में नहीं, यूरो में दी। पाँच-पाँच सौ यूरो के बीस नोट दिये आपने मुझे। दस हजार यूरो दिये आपने...”
“वाट नानसेंस! मेरे पास यूरो के नोटों का क्या काम?”
“मुझे नहीं पता...”
“दिख रहा है आपकी शक्ल से।”
“क्या?”
“जो आपको नहीं पता।”
“अरे, आपने मुझे पाँच-पाँच सौ यूरो के बीस नोट...”
“मैंने आज तक कभी यूरो की शक्ल नहीं देखी।”
“शक्ल हम दिखाते हैं।”—एसपी बोला, उसने वो बीस नोट चौधरी के सामने किये जो कि मेहरोत्रा ने मनीचेंजर को सौंपे थे—“ये वो बीस नोट हैं जो परसों आपने फ्लैट की बैलेंस पेमेंट के तौर पर मिस्टर मेहरोत्रा को दिये थे।”
“इन पर मेरा नाम लिखा है?”
“यही समझिये।”
“क्या मतलब?”
“इन पर आपकी उँगलियों के निशान हैं।”
चौधरी का दिल लरजा, फिर तत्काल वो सँभला।
“क्यों बच्चे पढ़ा रहे हो, एसपी साहब”—फिर वो बोला—“कागज पर से कहीं उँगलियों के निशान उठते हैं!”
“फॉरेंसिक साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है, कई ऐसे नये कैमिकल बने हैं जिन के इस्तेमाल से कागज पर से भी उँगलियों के निशान उठाये जा सकते हैं।”
“आपकी फॉरेंसिक साइंस को बधाई जिसके सदके आप कागज पर निगाह डालते हैं और फतवा दे देते हैं कि इस पर फलां आदमी की उँगलियों के निशान हैं। उँगलियों के निशान न हुए, कैमरा फोटोग्राफ हो गये।”
“अभी आपके निशानों का नमूना ले कर इनसे मिलान किया जायेगा तो...”
“किया जायेगा तो। लेकिन आप तो फतवा दे भी चुके कि इन पर मेरी उँगलियों के निशान हैं। और सिर्फ सिर्फ सिर्फ मेरी उँगलियों के निशान हैं।”
“क्या मतलब?”
“और किसी के तो क्या होंगे? जैसे कि हमारे लैंडलार्ड साहब के, इनके मनीचेंजर के, आपके भी नहीं जो कि कब से, जहाँ तक मुझे दिखाई दे रहा हैं, उँगलियों से ही इन्हें थामे हैं।”
तब एसपी को अपनी चूक का अहसास हुआ।
“काफी चालाक हैं आप!”—वो बोला।
“मैं आपको एक डाकूमेंट दिखाना चाहता हूँ। बैडरूम से लाना पड़ेगा, इजाजत दीजिये।”
“ले के आइये। हवलदार, इनके साथ जाओ।”
एक हवलदार चौधरी के साथ हो लिया।
बैडरूम का दरवाजा खुला था जिसकी वजह चौधरी वहाँ सबको दिखाई दे रहा था।
उलटे पाँव वो वापिस लौटा।
“ये देखिये।”—उसने एक कागज एसपी की आँखों के सामने लहराया।
“क्या है ये?”—एसपी बोला।
“खुद देखिये।”
एसपी ने कागज उसके हाथ से ले लिया।
“ये रसीद है”—चौधरी बोला—“जो मेहरोत्रा साहब ने पाँच लाख रुपयों की एवज में परसों जारी की। रुपये बोला मैं। यूरो नहीं बोला।”
“लेकिन”—मेहरोत्रा ने तुरन्त प्रतिवाद किया—“आपने सौंपे मुझे यूरो ही थे क्योंकि रुपये आपके पास नहीं थे।”
“दस हजार यूरो?”
“हाँ।”
“पाँच लाख रुपयों की एवज में?”
“हाँ।”
“क्यों भला! एक्सचेंज में दस हजार यूरो तो पाँच लाख रुपयों से कहीं ज्यादा होते हैं!”
“आप को कैसे मालूम?”—एसपी तत्काल दखलअन्दाज हुआ।
“क्या कैसे मालूम?”—चौधरी बोला।
“ये कि एक्सचेंज में दस हजार यूरो पाँच लाख रुपये से कहीं ज्यादा होते हैं? अभी तो आप कह रहे थे कि आपने कभी यूरो की शक्ल नहीं देखी?”
“नहीं देखी। एक्सचेंज रेट मुझे यूरो की शक्ल देखे बिना भी मालूम हो सकता है।”
“कैसे मालूम हो सकता है?”
“अखबार में रोज छपता है। डालर, पाउण्ड, यूरो और येन का रेट एक ही जगह अखबार में रोज छपता है। न चाहते हुए भी निगाह पड़ती है। टीवी पर भी दिखाया जाता है।”
“इसलिये आपको मालूम है कि दस हजार यूरो पाँच लाख रुपये से कहीं ज्यादा होते हैं?”
“जी हाँ।”
“होते होंगे।”—मेहरोत्रा तल्खी से बोला—“लेकिन मुझे यूरो पचास रुपये के भाव से ही कबूल था।”
“तो रसीद में रुपये क्यों दर्ज किये? दस हजार यूरो की रसीद क्यों न दी?”
“क्योंकि...क्योंकि...”
“क्योंकि असल में पेमेंट में रुपये ही मिले थे।”
“ये झूठ है। फिर मेरे पास यूरो कहाँ से आये?”
“यही तो मेरा सवाल है। मेरे पास यूरो कहाँ से आये?”
“मेरे से ये गलती हुई कि मैंने रसीद में यूरो का जिक्र नहीं किया...”
“ये नहीं, ये गलती हुई कि आपने सोच लिया कि रसीद सामने नहीं आयेगी, आप रसीद की बाबत कुछ भी बक देंगे।”
“जुबान सँभालकर बात कीजिये।”
“आप मेरे पर बेजा इल्जाम लगाना बन्द कीजिये।”
“आप पहले...”
“आप दोनों खामोश हो जाइये।”—एसपी उच्च स्वर में बोला—“और मिस्टर चौधरी, आप इधर मेरी तरफ तवज्जो दीजिये।”
“फरमाइये।”
“यूरो के ये नोट, कबूल कीजिये, आपको मिस्टर बेनीवाल ने दिये।”
“बेनीवाल! वो कौन है?”
“बेनीवाल वो शख्स है जो बैंक में बन्धक था और जिसने आपको अपनी तरह निर्दोष बन्धक समझकर पाँच पाँच सौ यूरो के साठ नोट आगे अपनी बीवी को पहुँचाने के लिए सौंपे थे लेकिन जिन्हें आप खुद हड़प गये थे।”
“बिल्कुल झूठ। ऐसा कोई शख्स है तो वो मेरे मुँह पर ये बात कह के दिखाये।”
“हम आपका ये अरमान अभी पूरा किये देते हैं। मिस्टर बेनीवाल, कहिये जो ये सुनना चाहते हैं।”
“मैंने इस शख्स को बैंक में पाँच पाँच सौ के नोटों की सूरत में तीस हजार यूरो के नोट सौंपे थे...”
“बिल्कुल झूठ।”
“...जिन के नम्बर तक मुझे याद थे और जो मैंने पुलिस को बताये थे।”
तब चौधरी के अन्देशे की तसदीक हुई कि यूरो के नोटों की वजह से पुलिस वहाँ पहुँची थी और मन ही मन उसने अपनी दूरअन्देशी के लिए खुद को ढेर शाबाशी दी कि उसने दस लाख रुपये का लालच नहीं किया था और अपने पास मौजूद यूरो के चालीस नोटों का वजूद मिटा दिया था।
“मैंने”—प्रत्यक्षत: वो बोला—“जिन्दगी में कभी इस आदमी की सूरत नहीं देखी।”
“आप झूठ बोल रहे हैं।”—एसपी गर्जा।
“और आप इतने आला अफसर होते हुए घटिया पुलिसिया पैंतरेबाजी इस्तेमाल कर रहे हैं। मैं क्या जानता नहीं कि कैसे पुलिस वाले कोई सिखाया पढ़ाया गवाह पेश करके चोर बहकाने की कोशिश करते हैं। लेकिन गवाह पेश करना क्या पुलिस को ही आता है!”
“आप भी सिखाया पढ़ाया गवाह...”
“जेनुइन गवाह। बल्कि दो जेनुइन गवाह, जिनके नाम पते मैंने आपको बताये।”
“ये आदमी सरासर झूठ बोल रहा है।”—बेनीवाल भड़क कर बोला—“जिसको मैंने इतनी बड़ी रकम सौंपी, उसकी सूरत को मैं सात जन्म नहीं भूल सकता।”
“मुझे नहीं पता आप कितने जन्म क्या नहीं कर सकते।”—चौधरी भी वैसे ही भड़के लहजे से बोला—“मुझे ये पता है कि मैं चौबीस तारीख को कहाँ नहीं था और कहाँ था! उस तारीख को मैं सुनामपुर में नहीं था और राजनगर में था।”
“आप भूल रहे हैं”—एसपी बोला—“कि अकेले बेनीवाल ही नहीं हैं, जिन्होंने तब आपकी सूरत देखी थी। तब आपकी सूरत देखी होने वाले बैंक के भीतर और बाहर कई लोग मौजूद थे। उन सबके बयानात की बिना पर हमने कम्प्यूटर से आपकी एक कम्पोजिट पिक्चर तैयार कराई है जो कि हूबहू आपसे मिलती है।”
“ऐसा नहीं हो सकता।”—चौधरी दृढ़ता से बोला।
“ऐसा ही हुआ है। वो तसवीर आज के हर छोटे बड़े अखबार में छपी है। ये देखिये।”—एसपी ने हाथ में थामा अखबार खोलकर उसके सामने किया—“इसमें ऐसी आप ही की नहीं, आपकी भतीजी की और आपके जोड़ीदार की भी तसवीर छपी है। देखिये, खुद अपनी आँखों से दोखये।”
चौधरी ने अखबार में छपी तसवीरों पर निगाह डाली तो उसका दिल डूबने लगा। उसकी तसवीर मुकम्मल नहीं तो तीन चौथाई तो शर्तिया उससे मिलती थी। मोहन बाबू की दाढ़ी मूँछ वाली तसवीर भी ऐन वैसे ही उससे मिलती थी अलबत्ता मुग्धा की तसवीर में कसर थी, काफी कसर थी।
अब उसे लगा कि मोहन बाबू को बतौर अपना गवाह पेश करके उसने गलती की थी लेकिन ऐसा करते वक्त उसे कहाँ मालूम था कि उनकी तसवीरें अखबारों में छप चुकी थीं। पता नहीं मोहन बाबू को वो तलाश कर पाते या न कर पाते, अब तो खुद उसी ने अपनी गलतबयानी से उस पर फोकस बना दिया था; उन को उसका लोकल पता ठिकाना तक बता दिया था।
तब तक वो विचलित था, तब पहली बार वो भीतर तक पूरी तरह से हिला।
“ये मेरी तसवीर नहीं।”—प्रत्यशत: वो दिलेरी से बोला—“ये मेरी भांजी की तसवीर नहीं। और ये तीसरा शख्स कौन है, मैं बिल्कुल नहीं जानता।”
“आप लूट के अपने जोड़ीदार को नहीं जानते?”—एसपी बोला।
“मेरा कोई जोड़ीदार नहीं। मैं किसी लूट की बाबत नहीं जानता।”
“आप क्या कहती हैं?”—एसपी मुग्धा की तरफ घूमा।
“मैं क्या कहूँ?”—मुग्धा बोली।
“आप तीसरी तसवीर वाले इस शख्स के साथ थीं। तब इसके चेहरे पर फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ थीं और आँखों पर निगाह का चश्‍मा था। आप कैसे इंकार कर सकती हैं कि आप दोनों बन्धक बने बैंक से निकले थे...”
“मुझे कुछ नहीं मालूम।”—मुग्धा बोली—“मुझे सिर्फ इतना मालूम है कि चौबीस तारीख को मैं अपने अंकल के साथ यहाँ राजनगर में थी और तभी से यहाँ हूँ।”
एसपी ने असहाय भाव से उसकी तरफ देखा।
“हम”—फिर वो बोला—“यहाँ की तलाशी लें तो आपको कोई एतराज?”
“हमें सख्त एतराज है।”—चौधरी बोला—“तलाशी की कोई वजह होनी चाहिये।”
“आप लुटेरे हैं और यहाँ से लूट का माल बरामद हो सकता है। यहाँ से मिस्टर बेनीवाल की मिल्कियत यूरो के वो नोट बरामद हो सकते हैं जो कुल जमा छ: सौ थे और जिनमें से चार सौ अभी भी यहाँ मौजूद हो सकते हैं। आपको तलाशी से एतराज है तो फिर तो तलाशी जरूर होगी।”
“ये धाँधली है।”
“पड़े दुहाई देते रहिये। अपनी भतीजी के साथ उधर एक ओर बैठ जाइये।”
“ये जुल्म...”
“और तब तक हिलने की कोशिश न कीजियेगा जब तक कि तलाशी मुकम्मल न हो जाये।”
चौधरी फिर न बोला।
तलाशी शुरू हुई, सूई तलाश करने के अन्दाज में तलाशी शुरू हुई।
एसपी कुछ क्षण वो सब होता देखता रहा फिर उसने साथ आये इंस्पेक्टर अटल को संकेत किया।
दोनों ड्राइंगरूम के एक कोने में पहुँचे।
“क्या खयाल है?”—एसपी दबे स्वर में बोला।
“अखबार वाली तसवीरें”—इंस्पेक्टर बोला—“इन दोनों से हूबहू तो नहीं मिलतीं!”
“हूबहू कैसे मिलेंगी!”—एसपी तनिक झुँझलाये स्वर में बोला—“अखबार में आर्टिस्ट की बनायी कम्पोजिट पिक्चर्स छपी हैं जोकि गवाहों के बयानात को बुनियाद बनाकर तैयार की गयी हैं, कोई कैमरे से खींची तसवीरें तो नहीं!”
“फर्क है।”
“वो तो...”
“काफी फर्क है। ऊपर से जिस दिलेरी से वो पुलिस का मुकाबला कर रहा है...”
“शातिर मुजरिम दिलेर ही होते हैं। इतनी बड़ी वारदात में शरीक था, दिलेर क्यों न होगा?”
“आप कहते हैं आठ सौ किलो सोना लुटा?”
“हाँ।”
“इतना सोना वो इस छोटे से फ्लैट में रखे होगा?”
एसपी ने हिचकिचाते हुए इंकार में सिर हिलाया।
“फिर तलाशी का मकसद?”—इंस्पेक्टर बोला।
“यूरो के नोट। बोला तो था! जो छ: सौ थे और जिनमें से अभी दो सौ ही सामने आये हैं। वो नोट बरामद हो जायें तो फिर तो यूँ समझो कि इस शख्स के खिलाफ हमारे पास ओपन एण्ड शट केस है।”
“न बरामद हुए तो? तो क्या ये मतलब होगा कि लैंडलार्ड झूठ बोल रहा है?”
“बेनीवाल की गवाही सामने न होती तो मैं इस बात पर विचार कर सकता था। उसने अपने नोटों के सीरियल नम्बर बताये हैं। उन्हीं नम्बरों वाले बीस नोट लैंडलार्ड के पास कैसे हो सकते हैं अगर वो उसे इस शख्स ने नहीं दिये?”
“ठीक।”
“बेनीवाल ने चौधरी की बेझिझक, मजबूत शिनाख्त की है। इसकी गिरफ्तारी के लिए वो शिनाख्त ही काफी है, भले ही यहाँ से कुछ बरामद हो या न हो। फिर बेनीवाल के अलावा और भी कई गवाह हैं जो चौधरी की और उसकी भतीजी की शिनाख्त कर सकते हैं। जैसे उसने बेनीवाल को झुठलाने की कोशिश की, वैसे वो हर एक गवाह को नहीं झुठला पायेगा।”
“मतलब गया काम से?”
“हाँ। रही सही कसर इनके तीसरे साथी के पकड़ाई में आ जाने से पूरी हो जायेगी।”
“ये उसकी बाबत बकेगा?”
“क्यों नहीं बकेगा? भतीजी की वजह से बकेगा?”
“भतीजी की वजह से? वो कैसे?”
“कैसे इंस्पेक्टर हो, भई! कैसे थानाध्यक्ष हो! समझो।”
“ओह!”—इंस्पेक्टर एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“सोना उस तीसरे साथी के कब्जे में हो सकता है?”
“उसी के कब्जे में होगा। मास्टरमाइंड तो वो ही था। सब कुछ तो उसने किया था। ये दोनों तो यूँ समझो कि ग्रेवी ट्रेन के पैसेंजर थे।”
“ठीक।”
“मुझे हैरानी सोने के गायब होने पर नहीं है, हैरानी बैंक की उस बख्तरबन्द गाड़ी के गायब होने पर है जिसमें कि सोना लदा था। मुझे पूरा पूरा यकीन था कि वो गाड़ी सुनामपुर में ही बैंक से दो या तीन किलोमीटर दूर लावारिस खड़ी मिल जानी थी लेकिन वो तो आज तक न मिली। उनके लिए गाड़ी से जल्द-अज-जल्द पीछा छुड़ाना जरूरी था क्योंकि वो गाड़ी ही उनकी गिरफ्तारी का सबब बन सकती थी। सोना उन लोगों ने यकीनन गाड़ी से ट्रांसफर करके किसी और जरिये से ढोया होगा। ऐसा करते वक्त उन्होंने बख्तरबन्द गाड़ी को कहाँ दफन किया, ये एक मेजर सवाल है।”
“अगर ये चाचा भतीजी डकैती में शामिल थे तो फिर तो समझिये कि आप जवाब के करीब हैं।”
“हाँ। ये तलाशी लम्बी चलेगी। उस दौरान मैं चाहता हूँ तुम एक काम करो।”
“क्या? फरमाइये!”
“अपनी एलीबाई के तौर पर इस शख्स ने दो नाम लिये थे। एक धीरज परमार का जोकि बन्दरगाह के इलाके में सी-गार्डन नाम का बार चलाता है और दूसरा मोहन बाबू पासवान का जिससे ये शख्स पाँच लाख रुपया कर्जे के तौर पर हासिल किया बताता है और जो लिंक रोड के एलीशिया टावर के फ्लैट नम्बर 401 में रहता है। याद आया?”
“जी हाँ। बराबर।”
“उन दोनों को यहाँ पकड़ मँगवाओ। फिर देखते हैं उनके सदके चौधरी और उसकी भतीजी की एलीबाई टिकती है या नहीं!”
“आप उन दोनों का एकाएक चाचा भतीजी से आमना सामना कराना चाहते हैं?”
“हाँ।”
“ठीक है। मैं इन्तजाम करता हूँ।”
चिरकुट इनायत दफेदार के सामने मौजूद था।
उसके आजू बाजू बापू बजरंगी और हैदर खड़े थे और पीछे, उनसे थोड़ा परे हट के, डाकी और अट्टा खड़े थे।
“बहुत जल्दी लौटा!”—दफेदार बोला—“मेरे को उम्मीद किधर तू इतनी जल्दी लौट के आयेगा! अब बोल, क्या किया? ठोक दिया?”
“नहीं, बाप।”—चिरकुट विनयशील स्वर में बोला।
“वान्दा नहीं। पता निकाल के लाया? किधर छुपेला है साला हरामी! साला दगाबाज हरामी!”
“बाप, वो क्या है कि...”
“चिरकुट, कहीं तू ये तो नहीं बोलना माँगता कि न तू परदेसी को ठोका और न उसका पता निकाला?”
“ऐसीच है, बाप पण...”
“तो फिर इधर काहे वास्ते आयेला है? साला मेरा टेम खोटी करता है! मेरे को तेरा थोबड़ा देखने के अलावा हैइच नहीं और कोई काम!”
“बाप, मेरी बात तो सुनो। फिरयाद करता है।”
“बात है किधर तेरे पास सुनाने लायक! जब तू उसको ठोका नहीं, उसका पता भी नहीं निकाला तो...”
“बाप, कुछ तो फिर भी किया न! पाँच दिन से फुल टेम धक्के खा रयेला हूँ जमीन आसमान की खाक छान रयेला हूँ कुछ तो किया न!”
“अच्छा, किया?”
“किया न, बाप!”
“क्या किया?”
“बोलता हैं, बाप, पण...”
“अभी भी पण?”
“खाली तुम्हेरे को बोलने का है।”
“क्या?”
“खाली तुम्हेरे को बोलने का है।”
“काहे?”
“ऐसीच बात है।”
“कैसीच बात है? खाली मेरे कान में डालने का है?”
“हाँ। बाप।”
“इन भीड़ू लोगों के सामने बोलने से तेरे को लोचा?”
“हाँ, बाप।”
“साले, फेंक तो नहीं रहा?”
“नक्को, बाप।”
“फट्टा निकला तो मुँडी काट के हाथ में देंगा।”
“मेरे को कबूल, बाप।”
“हूँ। थोड़ा टेम वास्ते तुम सब नक्की करो इधर से। चिरकुट इधर खाली मेरे वास्ते कोई डिरयामा करना माँगता है। चलो। बोले तो आने का है।”
चारों वहाँ से बाहर निकल गये। उनके पीछे दरवाजा बन्द हो गया।
“अब बोल।”—दफेदार बोला।
चिरकुट दफेदार के और करीब सरक आया और फिर राजदाराना लहजे से बोला—“बाप, परदेसी नहीं मालूम मेरे को किधर है, मैं उसका पता भी नहीं निकाल सका...”
“ये सब तू बोला पहले।”—दफेदार चिढ़े स्वर में बोला—“नवां बात बोल।”
“पण मेरे को एक बहुत कांटे की बात पता चली है”—चिरकुट का स्वर और दब गया—“जिस से परदेसी का पता लगाया जा सकता है।”
“क्या बात? जल्दी बोल। एकीच बार में बोल।”
“बाप, अपना हैदर...”
“हाँ।”
“हैदर अली खां।”
“हाँ, हाँ।”
“परदेसी का सगा भाई।”
“क्या!”
“हैदर और परदेसी माँ जाये भाई हैं।”
“क्या बकता है? हैदर मुसलमान, परदेसी—जेकब परदेसी—क्रिस्तान...”
“वो भी मुसलमान, बाप। असल नाम सफदर अली खां। दोनों सगे भाई हैं।”
कितनी ही देर दफेदार अपलक चिरकुट को देखता रहा, जब वो विचलित न हुआ तो आखिरकार बोला—“सच कह रहा है?”
“सौ टांक सच, बाप।”—चिरकुट दृढ़ता से बोला—“झूठ निकले तो मुँडी से फुटबाल खेलना। खाल निकाल के मशक बनवाना।”
“इतना टेम दोनों ‘भाई’ के लिए काम करते रहे, कभी ये बात न खुली!”
“उन्होंने छुपाकर रखी न!”
“काहे?”
“कोई तो वजह होगी! एक भाई मुसलमान से क्रिस्तान बन गया, सफदर अली खां से जेकब परदेसी बन गया, तो कोई तो वजह होगी!”
“तरे को कैसे मालूम पड़ा?”
“बाप, मरता क्या न करता की तरह एकीच तो काम किया मैं इतने दिन। किधर किधर नहीं भटका! किस किस से नहीं मिला! आखिरकार ये बात मालूम पड़ी।”
“खाली मालूम पड़ी या बात को पक्की भी किया?”
“पक्की भी किया न! उसके बाद ही तो इधर आया।”
“कैसे पक्की किया?”
“हैदर की फैमिली का पता निकाला। माँ आमना, बीवी मेहर, बेटा शफीक करके फैमिली का पता निकाला।”
“किधर है फैमिली?”
“कल्याण में। बनातवाला चाल की एक खोली में।”
“हूँ।”
“उधर आजू बाजू पूछा तो मालूम पड़ा आमना के दो फरजन्द। बाप, खोली में दोनों भाइयों का पुराना फोटू। बिलेक एण्ड वाइट करके। पिलास्टिक के फिरेम में लगा। मैं हैदर को साफ पहचाना। परदेसी को साफ पहचाना।”
“फैमिली के सामने?”
“अरे, नहीं, बाप। फैमिली को मालूम पड़ने देना किधर माँगता था!”
“काफी खुफियापंती किया तू चिरकुट!”
“बाप, जान पर बनी थी। कैसे न करता?”
“ठीक।”
“पर बोले तो अभी ज्यादा किया।”
“और क्या किया?”
“फोटू खिसकाया न!”
“क्या!”
“पिलास्टिक के फिरेम में था। एक बाजू से खींचा, हाथ में आ गया। एक सैकेंड का काम निकला।”
“किधर है फोटू?”
चिरकुट ने गर्व से एक पाँच गुणा सात का ब्लैक एण्ड वाइट प्रिंट पेश किया।
दफेदार ने गौर से तसवीर का मुआयना किया।
“अरे!”—वो बोला—“अपने हैदर के बाजू में ये तो निरा अपना परदेसी है।”
“पण हैदर बोलेगा उसका भाई सफदर है।”
“बरोबर है। पण परदेसी भी है। ये फोटो मैं रखता है।”
“बरोबर, बाप। इसी वास्ते तो निकालकर लाया। ये सबूत लाया न कि मैं कुछ चौकस काम किया।”
“बरोबर किया। चिरकुट, मैं तेरे से खुस।”
“बाप, अभी मेरा जानबख्शी...”
“किया।”
“थैंक्यू बोलता है, बाप।”
“पण बात में लोचा तो तेरी अगली साँस में लोचा।”
“कोई लोचा नहीं, बाप। ऐन सालिड खबर निकाला है। लोचा होता तो मैं इधर आने का हौसला करता?”
“ठीक। अब तू जा और बापू बजरंगी को इधर भेज।”
“अभी, बाप।”
इंस्पेक्टर अटल एसपी युदुनाथ सिंह के पास पहुँचा।
“एक आदमी”—वो बोला—“धीरज परमार मिला है, दूसरे का पता नहीं चल पाया।”
“पता तो था!”
“वो उस पते पर नहीं है। आस पड़ोस से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि एलीशिया टावर का वो फ्लैट अक्सर बन्द रहता है। कभी कभार ही कोई आता है। वो कोई कब से वहाँ नहीं आया, मालूम नहीं हो सका।”
“फिर भी उधर लोगबाग उस फ्लैट के मालिक को जानते पहचानते तो होंगे?”—एसपी उतावले स्वर में बोला—“जानते नहीं तो पहचानते तो जरूर ही होंगे। सूरत की पहचान तो बिन जाने भी हो जाती है!”
“सही फरमाया आपने। इसी वजह से वहाँ मैंने कुछ लोगों को अखबार में छपी तीसरे शख्स की तसवीरें दिखाईं। एसपी साहब, दोनों सूरतों में से क्लीनशेव्ड सूरत की शिनाख्त हुई है, उस बिल्डिंग में रहने वाले कई लोगों ने उस शख्स के चार सौ एक नम्बर फ्लैट का आकूपेंट होने की तसदीक की है।”
“आकूपेंट। यानी कि मोहन बाबू पासवान?”
“हाँ।”
“लुटेरों का तीसरा साथी?”
“ऐसा ही जान पड़ता है।”
“ऐसा ही है। चोर चोर मौसेरे भाई। इसी वजह से बतौर एलीबाई चौधरी ने उसका नाम लिया क्योंकि वो जानता था कि डकैती में उसका जोड़ीदार उससे बाहर नहीं जा सकता था।”
“इस लिहाज से तो एलीबाई देने वाला दूसरा आदमी भी—धीरज परमार भी—इसी थैली का चट्टा-बट्टा होना चाहिये।”
“हो सकता है। कहाँ है वो?”
“बाहर है। जानबूझकर बाहर खड़ा किया ताकि उसका पहले ही चौधरी से आमना सामना न हो जाये।”
“अच्छा किया। बाहर कहाँ?”
“ग्राउण्ड फ्लोर पर। लैंडलार्ड के ऑफिस में।”
“चलो।”
दोनों फ्लैट से निकले और लिफ्ट का इन्तजार करने की जगह सीढ़‍ियाँ उतरने लगे।
“401, एलीशिया टावर का आकूपेंट कभी तो वहाँ लौटेगा!”—रास्ते में एसपी बोला।
“जाहिर है।”
“जाहिर है तो वहाँ उसके स्वागत का कोई इन्तजाम होना चाहिये।”
“सर, ये भी कोई कहने की बात है! मैंने वो इन्तजाम कर दिया है।”
“गुड।”
“मैंने कुछ और भी किया है।”
“क्या?”
“वो आदमी कभी कभार वहाँ आता है तो जाहिर है कि असल में कहीं और रहता होगा। मैंने एक आदमी को तैनात किया है कि वो फ्लैट के पिछले मालिक को ट्रेस करे, वो न मिले तो रजिस्ट्रार के दफ्तर में जाकर फ्लैट की रजिस्ट्री निकलवाये। सर, दोनों ही तरीकों से हमें इस मोहन बाबू पासवान के मूल आवास की खबर लग सकती है।”
“वैरी गुड।”
“लेकिन, सर, इस सिलसिले में एक टैक्नीकल हिच है जिसको आपकी जानकारी में लाया जाना जरूरी है।”
“वो क्या?”
“लिंक रोड का इलाका मेरे थाने के तहत नहीं आता, बन्दरगाह का इलाका भी मेरे थाने के तहत नहीं आता, इसलिये इन कामों के लिए मैं ज्यादा अरसा अपने आदमी स्पेयर नहीं कर सकता। आपको इस बाबत हैडक्वार्टर में बात करनी चाहिये और वहाँ से कोई स्पैशल हैल्प हासिल करनी चाहिये।”
“मैं जरूर करूँगा। सो डोंट यू वरी।”
“थैंक्यू सर।”
वो ग्राउण्ड फ्लोर पर लैंडलार्ड के ऑफिस में पहुँचे। ऑफिस दो भागों में विभक्त था। उसका सामने का का भाग रिसैप्शन की तरह इस्तेमाल किया जाता था और पार्टीशन के पीछे प्रोपराइटर का निजी कक्ष था। वहाँ ऑफिस टेबल के सामने एक विजिटर्स चेयर पर धीरज परमार बैठा था और परे दीवार के साथ लगे एक सोफे पर एक हवलदार मौजूद था। उन्हें देखकर हवलदार उछलकर खड़ा हुआ और इंस्पेक्टर के इशारे पर वहाँ से बाहर निकल गया।
फिर एसपी और इंस्पेक्टर धीरज परमार के आजू बाजू दो कुर्सियों पर बैठ गये।
“हल्लो!”—एसपी मुस्कराता हुआ बोला—“आई एम यदुनाथ सिंह, सुपरिंटेंडेंट आफ पुलिस।”
“हल्लो, सर!”—परमार सशंक भाव से बोला।
“एक केस के सिलसिले में आपसे मामूली पूछताछ करनी है, उम्मीद है आपको एतराज नहीं होगा।”
“मुझे कोई एतराज नहीं।”
“थैंक्यू।”—एसपी ने अखबार को ‘कपिल सक्सेना’ की तसवीर पर से मोड़कर परमार के सामने किया—“ये तसवीर देखिये।”
परमार ने तसवीर देखने का नाटक किया। सुबह का अखबार वो देख चुका था और उसमें छपी तसवीरों को देखकर जो शुरुआती झटका उसे लगा था, उसे वो भूला नहीं था। उसी दौरान उसके उस आदमी का फोन आ गया था जिसे उसने कूपर रोड पर चौधरी के फ्लैट की निगरानी के लिए तैनात किया था और जिसने उसे बताया था कि पुलिस का एक बड़ा अमला चौधरी की ही फिराक में वहाँ पहुँचा था। उसके बाद वो चौधरी और मोहन बाबू से सम्पर्क की किसी जुगत की बाबत अभी सोच ही रहा था कि पुलिस उसके सिर पर आन खड़ी हुई थी।
“आप इस शख्स को पहचानते हैं?”—एसपी ने पूछा।
“जी नहीं।”—परमार बोला।
“इतनी जल्दी जवाब न दीजिये, तसवीर को गौर से देखिये और फिर जवाब दीजिये।”
“मैं नहीं पहचानता।”
“जब एक शख्स दूसरे को जानता हो, तो दूसरे का पहले को जानना स्वाभाविक होता है। नहीं?”
“मैं समझा नहीं आप क्या कहना चाहते हैं?”
“जब ये शख्स आपको जानता है, तो आप इसे क्यों नहीं जानते?”
“ये कहता है ये मुझे जानता है?”
“बराबर कहता है। ये कहता है कि चौबीस तारीख को ये आपके बार में आपके साथ था।”
“गलत कहता है। मैंने इस आदमी को पहले कभी नहीं देखा।”
“इसे आपके रूबरू कराया जा सकता है।”
“मेरा तब भी यही जवाब होगा।”
“क्या?”
“मैं नहीं जानता ये कौन है।”
“आप किसी मोहन बाबू पासवान को जानते हैं?”
“जानता हूँ।”
“कैसे जानते हैं?”
“मेरे बार का रेगुलर है।”
“यहीं राजनगर में रहता है?”
“रहता ही होगा वर्ना रेगुलर कैसे होगा?”
“आपका अन्दाजा है यहीं रहता होगा? पक्की तौर से नहीं जानते?”
“हाँ।”
“नाम कैसे जानते हैं?”
“खुद उसी ने बताया।”
“लेकिन ये न बताया कि रहता कहाँ था?”
“हाँ।”
“आप चाहें तो मालूम कर सकते हैं वो कहाँ रहता है?”
“नहीं।”
“आइये।”—एसपी एकाएक उठ खड़ा हुआ।
“कहाँ?”—परमार सशंक भाव से बोला।
“अभी मालूम पड़ता है।”
लिफ्ट पर सवार होकर वो तीनों पाँचवीं मंजिल पर वापिस लौटे।
एसपी ने परमार को चौधरी के रूबरू कराया।
“आप इन्हें जानते हैं?”—वो बोला।
“जानता हूँ।”—परमार इत्मीनान से बोला।
“जानते हैं?”
“जानता हूँ। इनका नाम दिलीप चौधरी है।”
“लेकिन अभी नीचे तो आपने कहा था कि आप इन्हें नहीं जानते थे?”
“नीचे ये मुझे कब मिले?”
“भई, मैंने आपको इनकी अखबार में छपी तसवीर दिखाई थी।”—एसपी ने फिर तसवीर उसके सामने की—“ये तसवीर?”
“ये तसवीर इन की कहाँ है?”
“तो किसकी है?”
“उसकी जिसका तसवीर के नीचे नाम लिखा है। कपिल सक्सेना की।”
“ये इन्हीं का फर्जी नाम है। एलियास है।”
“होगा लेकिन अखबार में छपी तसवीर इनकी नहीं है...”
“अरे, अँधे को दिखाई देता है...”
“तो अँधे से सवाल कीजिये। मैं तो अँधा नहीं हूँ।”
एसपी हकबकाया-सा उसका मुँह देखने लगा।
“पुलिस से ये रवैया”—फिर बोला—“आपको भारी पड़ेगा।”
“भारी न पड़े इसके लिए क्या करूँ?”—परमार बोला—“झूठ बोलूँ?”
“सच बोलिये।”
“वो तो मैं बोल रहा हूँ लेकिन आप तो खफा हो रहे हैं मेरे सच बोलने से।”
“हूँ। ये दूसरी तसवीर देखिये।”—एसपी ने अखबार में छपी मुग्धा की तसवीर उसके सामने की—“इसे पहचानते हैं?”
“नहीं।”
“पक्की बात?”
“हाँ।”
“मिस्टर चौधरी की भतीजी को जानते हैं?”
“जानता हूँ।”
“ये उसी की तसवीर है।”
“अगर ये मुग्धा है तो मैं मलिका नूरजहाँ हूँ।”
“कहाँ है?”—एसपी ने करीब खड़े एक हवलदार से पूछा।
“बैडरूम में।”—हवलदार बोला।
“बुला के लाओ।”
मुग्धा वहाँ पहुँची।
“अब देखिये।”—एसपी बोला—“ये मुग्धा है, ये अखबार में छपी इसकी तसवीर है।”
“नहीं है।”—परमार बोला—“अखबार में छपी तसवीर कुछ कुछ इस जैसी लगती है लेकिन इसकी नहीं है।”
“कुछ कुछ लगती है।”
“जी हाँ। कुछ कुछ लगती है। काफी कुछ लगती होती तो भी कोई बात थी।”
“आप झूठ बोल रहे हैं।”
“फायदा?”
“आप इन लोगों को एलीबाई देना चाहते हैं।”
“क्यों भला? मुझे क्या सपना आया है कि इन लोगों को एलीबाई की जरूरत है?”
“आप लोगों में इस बाबत पहले से कोई सैटिंग है।”
“आप मालिक हैं। कुछ भी कह सकते हैं।”
“ये लोग गिरफ्तार हैं, दस साल के लिए नपेंगे, झूठ बोलेंगे तो आपका भी मिलता जुलता अंजाम होगा।”
“झूठ बोलूँगा तो न!”
“पुलिस से पैंतरेबाजी अच्छी नहीं होती, मिस्टर परमार।”
“मुझे किसी ने बताई थी ये राज की बात। इसीलिये मैं कभी पुलिस से पैंतरेबाजी नहीं करता।”
“अभी कर तो रहे हैं!”
“खामखयाली है आपकी। मुझे क्या जरूरत है ऐसा करने की?”
“आप बताइये!”
“कोई जरूरत नहीं है। जनाब, मैं बन्दरगाह जैसे बिजी इलाके में बार चलाता हूँ जहाँ सैकड़ों लोग मेरे रूबरू होते हैं, मैं उनके जाती मामलात में दखलअन्दाज होने लगूँ तो पागल हो जाऊँगा।”
“इन लोगों से आपकी कोई खास वाकफियत नहीं? इन्हें आप सिर्फ इसलिये जानते हैं क्योंकि ये लोग बार में आते हैं?”
“ऐन यही बात है। मेरा बार मेल मुलाकात का बहुत सहूलियत का ठिकाना माना जाता है। वहाँ यूँ लोगों का मिलना-जुलना, एक दूसरे के इन्तजार में बैठे रहना आम बात है।”
“कभी ये भी ऐसा इन्तजार करते रहे थे?”
“हाँ।”
“किसका?”
“मोहन बाबू पासवान का।”
“आपको कैसा मालूम?”
“बार बहुत बड़ा है। इन्होंने खुद मुझे कहा था कि मोहन बाबू पहुँचें तो मैं उन्हें खबर कर दूँ ये कहाँ बैठे हुए थे।”
“इन्हें मालूम था आप मोहन बाबू को पहचानते थे?”
“हाँ।”
“कैसे मालूम था?”
“अब याद नहीं कैसे मालूम था। कभी जिक्र आया होगा।”
“इनसे या मोहन बाबू से आपकी जाती वाकफियत नहीं? बस इतना ही वास्ता है कि आपके बार में आते हैं?”
“हाँ।”
“मोहन बाबू को दोबारा देखें तो पहचान लेंगे या उसमें भी हुज्जत करेंगे?”
“हुज्जत तो मैंने पहले भी नहीं की।”
“जवाब दीजिये।”
“पहचान लूँगा।”
“ये तसवीरें देखिये।”—एसपी ने अखबार की बाकी की दो तसवीरें परमार के सामने कीं—“और बताइये इन में से मोहन बाबू कौन है?”
“कोई भी नहीं।”
“जरा ठीक से देखिये, गौर से देखिये...”
“ये दाढ़ी मूँछ वाली तसवीर कुछ-कुछ मोहन बाबू से मिलती है लेकिन मैंने मोहन बाबू को कभी ऐसी दाढ़ी मूँछ रखे नहीं देखा। और दूसरी, क्लीनशेव्ड और बिना चश्‍मे वाली तो बिल्कुल नहीं मिलती।”
“आप देखिये”—एसपी वो तसवीरें चौधरी के सामने करता बोला—“आप क्या कहते हैं? ये दोनों या इन में से कोई तसवीर आपके उस दोस्त की है जिसने चौबीस तारीख को इन साहब के बार में आपको पाँच लाख रुपये उधार दिये थे?”
“नहीं।”—चौधरी बोला।
“मिस्टर परमार को तो ये दाढ़ी मूँछ वाली तसवीर कुछ-कुछ मोहनबाबू से मिलती लगती है!”
“इनको लगती होगी, मुझे नहीं लगती।”
“कुछ-कुछ भी नहीं?”
“नहीं।”
“आप क्या कहती हैं?”—एसपी मुग्धा से सम्बोधित हुआ—“खासतौर से इस दाढ़ी मूँछ और चश्‍मे वाली तसवीर के बारे में?”
“ये मोहन बाबू की तसवीर नहीं।”—मुग्धा बोली—“ये भी नहीं।”
“लेकिन उस शख्स की है जो चौबीस तारीख को बन्धक बना आपके साथ था...”
“नहीं।”
“...भले ही वो मोहन बाबू नहीं था।”
“नहीं।”
“तो भी नहीं?”
“नहीं। चौबीस तारीख को ऐसा कोई शख्स मेरे साथ नहीं था। पहले भी बोला।”
एसपी ने गहरी साँस ली और असहाय भाव से कन्धे उचकाये।
तभी उसे अहसास हुआ कि तमाम पुलिसिये फिर ड्राईंगरूम में उसके करीब जमा थे।
“सर्च कम्पलीट हो गयी?”—वो बोला।
“जी हाँ।”—एक सब-इन्स्पेक्टर तत्पर स्वर में बोला।
“कुछ मिला?”
“जी नहीं।”
“हूँ। मिस्टर चौधरी!”
“फरमाइये।”—चौधरी संजीदगी से बोला।
“आपको हिरासत में लिया जाता है।”
“किस इलजाम में?”
“आपकी भतीजी को भी।”
“हमने क्या किया है?”
“आपने डकैती में शिरकत की है। अपने एक और साथी के साथ मिलकर पचास करोड़ रुपये कीमत का सोना लूटा है। आपको और आपकी भतीजी को शिनाख्त के लिए मिस्टर बेनीवाल जैसे और गवाहों के सामने पेश किया जायेगा। शिनाख्त न हो सकी तो आप लोगों को छोड़ दिया जायेगा लेकिन मुझे यकीन है ऐसी नौबत नहीं आयेगी।”
“कैसी? कैसी नौबत नहीं आयेगी?”
“आपको छोड़ दिया जाने की नौबत नहीं आयेगी क्योंकि आप एक गवाह को झुठला सकते हैं, दर्जनों गवाहों को नहीं झुठला सकते।”
इरफान और शोहाब विमल के पास पहुँचे।
“तीन दिन से”—इरफान बोला—“कुछ नौजवान लड़कियाँ चैम्बूर में हमारे ठीये पर डेरा डाले हुए हैं।”
“क्या?”
“अच्छे घरों की, कालेज की लड़कियाँ।”—शोहाब बोला।
“क्या चाहती हैं?”
“इंसाफ चाहती हैं।”—इरफान बोला।
“किस से?”
“तेरे से और किस से? पूछता है किस से! इधर का अक्खा निजाम आजकल तू ही तो चला रहा है!”
“अक्खा!”
“अभी कोई कसर है तो पूरी हो जायेगी।”
“प्राब्लम क्या है उनकी?”
“इसी मंगल को उनकी एक हमजमात लड़की को एक रईसजादा अपनी कार से हिट कर गया।”
“दिनदहाड़े!”—शोहाब बोला।
“अरे!”
“हाँ।”—इरफान बोला।
“लड़की बची?”
“शायद बच जाती पण आगे और बड़ा हादसा भी तो हो गया!”
“और क्या हुआ?”
“लड़कियाँ बताती हैं कि उनकी सहेली को रइसजादे की कार ने हिट किया तो वो आठ फुट हवा में उछल गयी। धड़ाम से आकर कार के बोनट पर गिरी, कार फिर भी न रुकी, बल्कि रफ्तार बढ़ा दी। निकल भागने की कोशिश में आगे आड़ी तिरछी चलाते एकाएक ब्रेक लगायी तो लड़की बोनट से उछलकर सड़क पर जा गिरी और दूसरी तरफ से आती बैस्ट की एक बस के पहिये के नीचे आ गयी।”
“वाहे गुरु! रईसजादा भाग गया?”
“हाँ। लेकिन दर्जनों लोगों ने वो हादसा देखा था, दर्जनों लोगों ने उसकी लांसर कार का नम्बर नोट किया था। कइयों ने सौ नम्बर पर पुलिस की फोन लगाया, पुलिस की एक गश्‍ती गाड़ी वहाँ पहुँची, पब्लिक से लांसर का नम्बर जाना, महकमे से कार के मालिक की बाबत दरयाफ्त किया जोकि एक बड़ा जौहरी निकला। कफ परेड पर रहता है। उधर ही शोरूम है। नाम वसदमल अटलानी है। एक ही नौजवान लड़का है। नाम चंदन अटलानी है। दो बार पहले भी एक्सीडेंट कर चुका है, कोई मरा नहीं इसलिये मामला रफा दफा कियेला था उसका अब्बू।”
“तू तो सब जानकारी निकाल भी चुका!”
“अभी और भी निकाला।”
“और क्या?”
“वसदमल अटलानी असल में डायमंड स्मगलर है। उसका जौहरी का धँधा तो खाली ओट है डायमंड स्मगलिंग की।”
“लड़का गिरफ्तार है?”
“क्या बात करता है, बाप! लड़का गिरफ्तार होता तो किस्सा की खत्म न हो जाता! तो कालेज की लड़कियाँ इंसाफ हासिल करने के लिए चैम्बूर में धरना दे रही होतीं?”
“क्या हुआ?”
“पुलिस कफ परेड पहुँची, वसदमल अटलानी ने कबूल किया कि लांसर उसकी थी, एक्सीडेंट की बात कबूल की और उसके लिए जिम्मेदार शख्स को पुलिस के हवाले कर दिया।”
“बढ़‍िया। लेकिन तूने तो कहा कि लड़का गिरफ्तार नहीं है।”
“नहीं है न! तू सुन तो?”
“बोल।”
“जो शख्स गिरफ्तारी के लिए पेश किया गया, वो सेठ का पचास से ऊपर का खंडूस डिरेवर था।”
“ओह!”
“उस डिरेवर ने—हशमत नाम है—कबूल किया कि गाड़ी वो चला रहा था, कि तिलक मार्ग पर सेंट जीसस कालेज के सामने एक्सीडेंट उससे हुआ था लेकिन उसे ये मालूम नहीं था कि उस एक्सीडेंट में कोई जान से गया था। पुलिस उसे गिरफ्तार करके ले गयी। चार-छ: दिन में सेठ उसकी जमानत करा लेगा, पुलिस कोई हल्का-सा चार्ज लगाकर उसे कोर्ट में पेश करेगी। उसे कोई छोटी-मोटी सजा या तो होगी नहीं, होगी तो बड़े ईनाम के लालच में उसे वो काट लेगा। किस्सा खत्म।”
“कमाल है!”
“दर्जन भर लड़कियाँ बैठी हैं चैम्बूर में तुका के घर के सामने जो कहती हैं कार ड्राइवर बूढा खंडूस नहीं, एक नौजवान लड़का था।”
“उन्हें थाने जाना चाहिये था!”
“गयीं। एसएचओ नहीं सुनता। बोलता है उसके पास भी गवाह हैं जिन्होंने बतौर डिरेवर गिरफ्तार भीड़ू की शिनाख्त की है।”
“उन्हें ऊपर पहुँच बनाना चाहिये था!”
“डीसीपी के पास गयी थीं। वो भी नहीं सुनता। बोलता हैं थाने का केस है, थाने में जाओ।”
“असल में क्या हुआ होगा?”
“ऊपर तक सबने रिश्‍वत खायी होगी और क्या हुआ होगा!”
“हमेशा यही होता है।”—शोहाब बोला—“किसी बड़े आदमी की, रसूख वाले आदमी की औलाद की करतूत हो तो ऐसे ही पर्दादारी होती है।”
“इसीलिये तो कहा गया है कि समरथ को नहीं दोष गुसाईं।”
“अभी उस लड़की की सुन जो मरी है।”—इरफान बोला—“वो एक विधवा माँ की बेटी है, जो कमेटी के स्कूल में पानी पिलाने की और झाड़ा-पोंछा करने की हकीर नौकरी करती है, ऐसी गुरबत में भी जो लड़की का कालेज की तालीम पाने का खर्चा उठा रही थी और लड़की की मौत के बाद जिसका अब इस दुनिया में कोई नहीं।”
“और उसकी दुनिया अन्धेरी करने वाला छुट्टा घूम रहा है!”
“ताकि और एक्सीडेंट कर सके, गरीबी हटाना और गरीब हटाना एकीच तो बात है इस मुल्क में! साले हैं भी तो कितने सारे! कीड़े-मकौड़ों की तरह रेंगते हैं, कोई कुचल गया तो क्या आफत आ गयी!”
विमल खामोश रहा।
इरफान भी कुछ क्षण खामोश रहा फिर बदले स्वर में बोला—“लड़का पूरी तरह से बिगड़ा हुआ है। मौज-मस्ती के अलावा उसको कोई काम हैईच नहीं। मैं पता लगाया, दिन में भी घूँट लगाता है। कोई बड़ी बात नहीं, जब एक्सीडेंट किया, तब भी टुन्न हो।”
“अब क्या पता चलेगा? हाथ के हाथ गिरफ्तार होता तो मैडीकल होता।”
“पुलिस की गिरफ्तारी की मर्जी होती तो गिरफ्तार होता, मैडीकल कराने की मर्जी होती तो मैडीकल होता। उन्होंने तो डिरेवर को गिरफ्तार किया और केस हल हो गया मान के राजी राजी लौट गये। अब मरने वाली की सहेलियाँ फिरयाद करती हैं तो करें, उसकी माँ रोती है, तो रोये, छाती कूटती है तो कूटे; रोती, छाती कूटती स्कूल में पानी पिलाये, झाड़ा-पोंछा करे वर्ना खुद भी मरे। जी चाहता है अभी कफ परेड पहुँचूँ और उस छोकरे के मगज में बुलेट गाड़ दूँ।”
“ऐसे मुम्बई की आधी आबादी के मगज में बुलेट गाड़नी होगी। हाथ फिर भी कुछ नहीं आयेगा। बुलेट खत्म हो जायेंगी, जालिम खत्म नहीं होंगे।”
“साला आवा ही खराब है।”
“तकसीम के बाद”—शोहाब बोला—“एक बड़े शायर ने एक बात कही थी जो आज भी मुझे इस मुल्क पर लागू जान पड़ती है।”
“कौन-सी बात?”—विमल बोला।
“काबू में ये फसाद का भंगी न आयेगा, जिस वक्त तक पलट के फिरंगी न आयेगा।”
“बात ऐन माकूल है, लेकिन फिरंगी तो, खुदा न करे कि लौट के आये।”
“पचास पर आठ साल हो गये मुल्क को आजाद हुए”—इरफान बोला—“मुल्क के बाशिंदे की जात औकात न बदली; न गुलामी में, न आजादी में। कोई तब्दीली न आयी। क्या हैं हम लोग?”
“क्या हैं?”
“शोहाब से पूछ, सुन क्या बढ़‍िया बताता है।”
“बोलो, भई।”
“उसी शायर की जुबान में बोलता हूँ।”—शोहाब बोला—“हम दनी (कमीने) हैं; शूम (मनहूस) हैं, आशुफ्ताकार (तंग करने वाले) हैं; लोफर हैं, बदमाश हैं, बेएतबार हैं; शोहदे हैं, बेहया हैं; लफंगे हैं, ख्वार (जलील) हैं; पाजी हैं, बद््गुहर (बद्जुबान) हैं, बद््बख्त (अभागे) हैं, नाहंजार (अयोग्य) हैं।”
“अच्छा!”—गहरी साँस लेकर विमल बोला—“इतनी खूबियों के मालिक हैं हम!”
“इतनी तो उस शायर को मालूम थीं।”—इरफान बोला—“आगे आदमजात की तरक्की भी तो जुड़ी है इस महकमे में।”
“ठीक। अब असल बात पर आओ। आगे क्या करने का है?”
“तू बोल, तू बेहतर जानता है क्या करने का है?”
“घर के अलावा वो लड़का कहाँ मिलता है?”
“शाम को डिस्को में मिलता है।”
“कौन-सा डिस्को?”
इरफान ने बताया।
इनायत दफेदार हैदर के रूबरू था।
“आजकल तेरा भाई कहाँ है?”—दफेदार बोला।
“मेरा भाई?”—हैदर सकपकाया।
“भई, सफदर।”
हैदर के कानों में खतरे की घण्टियाँ बजने लगीं।
“क्यों पूछते हो, बाप?”—वो बोला।
“तेरे को मालूम मेरे को आदमियों का तोड़ा। भरोसे के आदमियों का तो बहुत ही ज्यादा तोड़ा। ‘भाई’ को खल्लास जान कर कुछ खिसक गये, कुछ बोल के छोड़ गये। अभी मैं भरोसे के आदमी किधर से लाये? जिधर से कोई मिलता दिखाई दे, उधर बात करना पड़ता है। नहीं?”
“हाँ, बाप। बरोबर, बाप।”
“इसी वास्ते मैं तेरे को तेरे भाई सफदर का पूछा।”
“बाप, वो इस लेन में नहीं है।”
“इस लेन में नहीं है? तो क्या भेलपूरी बेचता है? बड़ा पाव बेचता है? क्या करता है?”
“बाप, करता तो येहीच कुछ है, पण वो किसी गैंग में नहीं है।”
“अब हो जायेगा।”
“अकेला काम करना पसन्द करता है।”
“मेरी बात तो करा! मैं बदलेगा उसका खयाल। नहीं मानेगा तो नक्की करेगा पण बात तो करा।”
“मेरे को मालूम नहीं आजकल वो कहाँ है!”
“मालूम कर तो सकता है? आखिर तेरा भाई है। सगा। माँ जाया। क्या?”
“मैं...मैं मालूम करेंगा।”
“हैदर, ये काम जरूरी करके करने का है। क्योंकि ये हैइच जरूरी काम। मेरे को लोचा नहीं माँगता। मालूम क्यों?”
“क्यों, बाप?”
“तू मेरा खास है। तेरा भाई क्योंकि तेरा भाई है इसलिये तेरा खास है। अब जो तेरा खास है, वो मेरा खास होयेंगा या नहीं होयेंगा?”
“वो तो बराबर होयेंगा, बाप, पण...”
“क्या पण?”
“मैं बोला न, वो दूसरी तरह का भीड़ू। वो...”
“होयेंगा। होयेंगा। तू बात तो करा। मैं देखेंगा न वो किस तरह का भीड़ू। या तू बात ही नहीं कराना माँगता? क्योंकि मेरे को तपेदिक। तेरे भाई को भी हो जायेंगा।”
“अरे, नहीं, बाप।”
“तो हुज्जत खत्म कर। उसका पता निकाल और उसकी मेरे से बात करा।”
“कराता है, बाप।”
“अब तू जा और बापू बजरंगी को इधर भेज।”
वो चला गया।
एक मिनट बाद बजरंगी वहाँ पहुँचा।
“अभी मैं कुछ बोलता है।”—दफेदार बोला—“तू गौर से सुन। बात तेरे से आगे नहीं जाये।”
“नहीं जायेगी, बाप।”—बजरंगी संजीदगी से बोला।
“चिरकुट खबर लाया है कि हमारे फरार भीड़ू जेकब परदेसी का असली नाम सफदर अली खां है और वो अपने हैदर का सगा भाई है।”
“ऐसा, बाप?”—बजरंगी नेत्र फैला कर बोला।
“हाँ। अभी मैं उसको बोला कि वो अपने भाई सफदर को मेरे पास बुला के लाये क्योंकि मैं उसको उसीच जैसे भरोसे के आदमी के तौर पर अपने गैंग में शामिल करना माँगता था। साला हलकट हिल गया अन्दर से। टालू जुबान बोलने लगा। मैं सख्ती से बोला भाई को इधर ले के आ तो हिला।”
“ले के आयेगा?”
“माथा फिरेला है? ले के आयेगा तो मेरे सामने उसका भाई सफदर खड़ेला होगा कि अपना जेकब परेदसी?”
“किसी और को पकड़ लाया? उसे अपना भाई सफदर बताने लगा तो?”
“वो कर सकता है ऐसा लेकिन पहले वो कुछ और करेगा।”
“क्या करेगा, बाप?”
“अपने भाई को—परदेसी को—खबरदार करेगा।”
“उसे उसकी खबर होगी कि वो कहाँ है?”
“सगा भाई है। उम्मीद तो है कि होगी!”
“अभी पोल खुलती जानकर वो भी भाई की तरह फरार हो गया तो?”
“हाँ, ऐसा हो सकता है। अगर वो समझ गया है कि किसी तरीके से उसके भाई की पोल मेरे पर खुल चुकी है तो वो यहाँ टिका नहीं रह सकता। मेरे को भी उसके खिसक जाने का ही ज्यादा चानस दिखाई देता है क्योंकि उसको अन्देशा होगा कि सीधे वो पता नहीं बतायेगा—यही जिद करेगा कि पता नहीं मालूम था—तो उस पर पिरेशर डाला जायेगा। मेरे को डालने का है न पिरेशर! दगाबाज परदेसी को मैं किधर जिन्दा छोड़ने का है जो साला ‘भाई’ के खिलाफ दुश्‍मन का साथ दिया!”
“और हैदर सब जानते-बूझते खामोश रहा?”
“अभी समझा।”
“बाप, अभी काहे जाने दिया हैदर को? अभी काहे नहीं पिरेशर आजमाया?”
“मैं सोचता है।”
“क्या?”
“शायद उसे अपने भाई की करतूत का कोई इल्म न हो।”
“क्या बात करता है, बाप! सबको मालूम कोई भीतर का भीड़ू ‘भाई’ को टपकाने में दुश्‍मन का हैल्प किया। और वो भीड़ू वो ही हो सकता है जो ऐन मौके पर उधर से फरार हुआ। ऐसा दो ही भीड़ू। एक चिरकुट, दूसरा परदेसी। अभी जब चिरकुट नहीं तो पक्की कि परदेसी। तो फिर ये बात हैदर को काहे नहीं मालूम?”
“ठीक। सब ठीक। पण मैं उसको ढील देना माँगता है। देखना माँगता हैं वो क्या करता है! तू उसके पीछे आदमी लगा। नवें आदमी लगा। ऐसे आदमी लगा जिनको वो जानता न हो। उनको बोल के रख अगर वो खिसकने की फिराक में दिखाई दे तो थाम लें। काबू में न आये तो लुढ़का दें। क्या?”
“बरोबर, बाप। मैं अभी इन्तजाम करता है।”
“बढ़‍िया।”
हैदर परेशान था।
उसका दिल गवाही दे रहा था कि इनायत दफेदार के उसके भाई की बाबत उसके दरयाफ्त करने के पीछे कोई खास ही वजह थी। वो इस बात से कतई मुतमुइन नहीं था कि उसे भरोसे के आदमियों का तोड़ा था इसलिये वो सफदर से मिलना चाहता था। जो बात उसे दफेदार के सामने नहीं सूझी थी, बाद में सूझी थी, वो ये थी कि दफेदार को ये ही कैसे मालूम था कि उसका सफदर नाम का कोई भाई था। जरूर कोई गड़बड़ थी। जरूर किसी तरीके से उसे मालूम हो गया था कि जेकब परदेसी ही सफदर था और उसका भाई था।
किसी गड़बड़ की तसदीक तब हो गयी जब कि उसे अहसास हुआ कि कम से कम चार भीड़ू उसके पीछे लगे हुए थे।
वो इस बात का सबूत था कि दफेदार उसके जरिये उसके भाई तक—जेकब परदेसी तक, जोकि ‘भाई’ के कत्ल के बाद से गायब था—पहुँचना चाहता था।
परेशानी के उस आलम में उसने कल्याण जाने का फैसला किया।
बस पर सवार होकर वो कल्याण पहुँचा।
उसने बड़ी आसानी से भाँप लिया था कि पीछे लगे चार जनों में से दो उसके पीछे बस पर सवार हुए थे और दो एक काली एम्बैसेडर में सवार होकर बस के पीछे लगे थे।
बनातवाला चाल पहुँचने तक उसने एक बार भी पीछे घूमकर न देखा।
सीढ़‍ियाँ चढ़कर वो पहली मंजिल के उस लम्बे गलियारे के दहाने पर पहुँचा जिसमें काफी आगे, बीच में, उनकी खोली थी। वो खोली के दरवाजे पर पहुँचा तो उसने उसको बाहर से कुण्डी लगी पायी। रेलिंग से उसने नीचे झाँका तो बीवी मेहर को दूर कम्पाउण्ड के परले सिरे पर पानी की लाइन में लगी पाया। शाम की उस घड़ी शफीक कहीं खेल रहा हो सकता था और अपनी माँ की बाबत उसे मालूम था कि वो हर सुबह, हर शाम ऊपरली मंजिल की एक खोली में रहती एक हमउम्र औरत के साथ छुपकर हुक्के के कश लगाती थी।
वो दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल हुआ।
भीतर बत्ती जल रही थी, टीवी चल रहा था।
टीवी बन्द करने के लिए वो उसके करीब पहुँचा तो उसकी निगाह उसके ऊपर रखे प्लास्टिक के फ्रेम पर पड़ी जोकि खाली था।
तसवीर कहाँ गयी?
जरूर शफीक ने निकाल के कहीं फेंक दी थी।
उसने तसवीर की तलाश में हर जगह निगाह दौड़ाई लेकिन वो उसे कहीं न मिली।
तभी पानी से भरी प्लास्टिक की दो बाल्टियाँ उठाये उसकी बीवी मेहर वहाँ पहुँची।
“अरे!”—बाल्टियाँ एक ओर रखती, तनिक हाँफती, वो हैरानी से बोली—“कब आये?”
“अभी आया।”—हैदर बोला—“इस फ्रेम में से तसवीर कहाँ गयी?”
“कहाँ गयी?”—वो फ्रेम की तरफ देखती बोली।
“अरे, मैं तेरे से पूछ रहा हूँ।”
“यहीं थी।”
“अब कहाँ गयी?”
“क्या पता कहाँ गयी!”
“कब से नहीं देखी?”
“ध्यान नहीं।”
“अम्मी ने तो नहीं निकाली?”
“वो काहे को निकालेंगी? वो तो कोई तसवीर को हाथ भी लगाये तो डाँटती हैं। जरूर ये शफीक की शरारत है।”
“बुला के पूछ।”
मेहर आठ साल के शफीक को कहीं से पकड़कर लायी।
“तूने इस फ्रेम में से तसवीर निकाली?”—हैदर ने सख्ती से पूछा।
“नहीं, अब्बू।”
“झूठ बोलेगा तो खुदा का कहर टूटेगा।”
“नहीं, अब्बू।”
“जा, खेल जाके।”
शफीक दौड़ गया।
तब हैदर ने मजबूरन एक बड़ा फैसला किया।
“मेहर।”—वो बोला।
“बोलो, जी।”
“तू इधर मेरी तरफ तवज्जो दे और जो मैं कहता हूँ, उसे गौर से सुन।”
“सुनती हूँ। लेकिन कोई बुरी खबर न सुनाना।”
“बुरी नहीं है, लेकिन बुरी जैसी है।”
“क्या?”
“समझ कि फिलहाल यहाँ से दाना पानी उठ गया।”
“हाय अल्लाह!”
“जामनगर जाने की तैयारी कर। इस निगाह से जरूरी सामान समेट कि हो सकता है यहाँ दोबारा कभी लौटना न हो।”
“हाय अल्लाह!”
“अम्मी को तूने समझाना है और एक और सिलसिले में भी तूने दाना बन के दिखाना है। दाना और जिम्मेदार और चौकस बन के दिखाना है। सुन रही है?”
“हाँ।”
“कुछ लोग मेरे पीछे लगे हैं, लेकिन वो मेरे ही पीछे हैं। मैं यहाँ से जाऊँगा तो वो मेरे पीछे यहाँ से कूच कर जायेंगे। फिर भी तूने तसदीक करना है कि यहाँ कि निगरानी के लिए कोई जना पीछे नहीं रह गया है। ऐसा न हो तो बात ही क्या है, हो तो यूँ यहाँ से निकलना है कि उसे तुम लोगों की रवानगी की खबर न लगे, भले ही घर खुला छोड़ना पड़े, भले ही सामान पीछे छोड़ना पड़े। समझ गयी?”
“हाँ।”
“कर लेगी?”
“हाँ।”
“ये कुछ रोकड़ा पकड़। जरूरत पड़ेगी। और अभी मैं जाता हूँ।”
“अरे, दम तो लो! कोई चाय पानी तो पियो!”
“फिर। फिर।”
“फिर पता नहीं कब मुलाकात होगी!”
“बहुत जल्द होगी।”
“अम्मी से तो मिल के जाओ!”
“नहीं। मेरी मौजूदगी में उसे यहाँ से कूच की खबर लगी तो वो सौ सवाल करेगी। जाता हूँ।”
“इतना तो बोल के जाओ कि जो लोग तुम्हारे पीछे लगे हैं, उनकी वजह से तुम्हारी जान को कोई खतरा नहीं है!”
“तू हौसला रख, किसी वजह से मेरी जान को कोई खतरा नहीं है।”
“तो फिर वो लोग क्यों तुम्हारे पीछे हैं? क्यों हमने घर से बेघर होना है?”
“एहतियात के लिए। याद नहीं कैसे अभी हाल में मई के महीने में कुछ लोग मुझे, शफीक को और अम्मी को पकड़ के मुम्बई ले गये थे और तुम लोगों को हम दो भाइयों की फजीहत का नजारा करना पड़ा था।”
“याद है। चौबीस मई, बुधवार का दिन था। लेकिन तब बुरा कुछ नहीं हुआ था। आखिर में सब ठीक हो गया था।”
“अभी भी बुरा कुछ नहीं होगा। जैसे धन्धे में बद्किस्मती से मैं हूँ, उसमें ऊँच नीच होती रहती है लेकिन आखिर में सब ठीक हो जाता है, सब ठीक हो जायेगा।”
“सच कह रहे हो?”
“मैंने पहले तेरे से कभी झूठ बोला है?”
“खाओ मेरे सिर की कसम।”
“तेरे सिर की कसम, मेहर जान, सब ठीक हो जायेगा।”
मेहर ने चैन की साँस ली।
लेकिन साँस ही चैन की ली, पता नहीं क्यों उसके दिल ने चैन न पाया।
डिस्को का नाम कोरल क्लब था और वो बांद्रा की एक बहुखण्डीय इमारत में उसके टॉप फ्लोर पर था। उस इमारत के ग्राउण्ड फ्लोर और बेसमेंट में बहुत बड़ी म्युनी‍सिपल पार्किंग थी और बाकी में सरकारी और गैरसरकारी ऑफिस थे जोकि बड़ी हद सात बजे तक बन्द हो जाते थे। कोई दो चार ऑफिस फिर भी खुले रहते थे तो वो नौ बजे बन्द हो जाते थे।
जिस वक्त विमल, शोहाब और इरफान वहाँ पहुँचे, उस वक्त रात के ग्यारह बजे थे और तब इमारत में कहीं हलचल थी तो कोरल क्लब में ही थी। दोनों फ्लोर की पार्किंग में भी कोई हलचल नहीं थी, वहाँ जो भी हलचल पैदा होती, आधी रात के बाद पैदा होती जबकि डिस्को के बन्द होने का टाइम होता और डिस्को दीवाने अपनी अपनी कारें कलैक्ट करने पार्किंग में पहुँचते।
शोहाब के इमारत के सामने कार को रोकते ही आकरे कहीं ओट में से निकला और कार के करीब पहुँचा।
“क्या खबर है?”—शोहाब ने पूछा।
“वो डिस्को में है। साथ में एक छोकरी है। दस बजे पहुँचा। लगता नहीं जल्दी उधर से हिलेगा।”
“कैसे पहुँचा?”
“अपनी फैंसी बीएमडब्ल्यू कार खुद चलाता पहुँचा।”
“कार किधर है?”—विमल ने पूछा।
“बेसमेंट में।”
“चल के दिखा।”
“अभी, बॉस।”
आकरे कार में सवार हो गया। शोहाब ने कार को गियर में डाला और उसे आगे बढ़ा के बेसमेंट के स्लोप पर पहुँचाया। आगे बेसमेंट इतनी बड़ी थी कि उसमें एक वक्त में दो सौ कारें खड़ी हो सकती थीं लेकिन उस वक्त बीस बाइस से ज्यादा कारें वहाँ मौजूद नहीं थीं।
आकरे के निर्देश पर कार चलाते शोहाब ने कार को एक लाल रंग की बीएमडब्ल्यू के पहलू में ले जाकर खड़ा किया।
सब बाहर निकले।
“बिल्कुल नयी कार।”—विमल बोला।
“पचास लाख से कम की नहीं।”—शोहाब बोला।
“खोल लेगा?”—विमल आकरे से बोला।
“आराम से।”—एक्सपर्ट तालातोड़ आकरे बोला।
“विलायती कार है, पहले देख तो ले ताला कैसा है!”
“जैसा मर्जी हो।”
“इग्नीशन भी ऑन कर लेगा?”
“वो तो फूँक मार के।”
“बढ़‍िया। दिखा अपना कमाल।”
तीन मिनट में आकरे ने कार का ड्राइविंग साइड का लॉक खोल दिया और इग्नीशन ऑन कर दिया।
विमल ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
“क्या इरादा है?”—शोहाब बोला।
“वही इरादा है जिसकी वजह से इधर आये हैं। छोकरे को फिट करने का इरादा है।”
“कैसे?”
“इस कार के जरिये।”
“कैसे?”
“देखना।”
“अभी क्या करने का है?”
“ऐसा इन्तजाम करने का हैं कि छोकरा फौरन इधर पहुँचे।”
“पकड़ के लायें?”
“जरूरत नहीं। खुद दौड़ा आयेगा। जाके बोलो उसकी कार की विंड स्क्रीन टूटी पड़ी है।”
“टूटी तो नहीं पड़ी?”
विमल इग्नीशन को ऑन छोड़कर कार से बाहर निकला। उसने दायें बायें निगाह दौड़ाई तो उसे करीब ही फर्श पर एक लोहे की भारी छड़ लुढ़की पड़ी दिखाई दी। उसने छड़ उठा ली, मजबूती से उसे दोनों हाथों से थामा और उसका प्रचण्ड प्रहार बीएमडब्ल्यू की विंड स्क्रीन पर किया।
विंड स्क्रीन के परखच्चे उड़ गये।
“अब क्या कहता है?”
“टूटी पड़ी है।”—शोहाब अपनी हँसी दबाता बोला—“पता नहीं निगाह को क्या हो गया है! पहले पता ही न चला।”
“हो जाता है कभी-कभी ऐसा।”
“आ, भई।”
इरफान शोहाब के साथ हो लिया।
पीछे विमल ने पाइप सुलगा लिया और वापिस कार की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
दस मिनट बाद बढ़‍िया सूट पहने एक युवक बेसमेंट के स्लोप पर प्रकट हुआ। वो थोड़ा और आगे बढ़ा तो विमल आकरे से बोला—“वही है?”
“हाँ।”
“चंदन अटलानी?”
“हाँ।”
“दूसरी कार में जा के बैठ चुपचाप और तमाशा देख।”
“ठीक है।”
चंदन अटलानी आधे रास्ते में था जबकि विमल ने कार को गियर में डाला और एक्सीलेटर दिया।
“अरे!”—युवक जोर से चिल्लाया—“कौन है मेरी कार में? विंड स्क्रीन कैसे तोड़ दी? जान से मार दूँगा, साले।”
कार तोप से छूटे गोले की तरह उसकी तरफ लपकी।
युवक उसकी चपेट में आने से बाल-बाल बचा।
तेज रफ्तार से भागती कार सीधी जाकर आगे की दीवार से टकराई। उसका हुड खुल गया और बम्पर उखड़ कर नीचे लटक गया लेकिन गनीमत थी कि हैडलाइट न टूटी।
विमल ने कार को रिवर्स गियर में डाला और वैसी ही तूफानी रफ्तार से वापिस दौड़ाया।
कार की तरफ लपका चला आता युवक फिर उसकी चपेट में आने से बाल-बाल बचा।
ब्रेकों की चरचराहट से बेसमेंट गूँजी।
विमल ने हाथ बढ़ाकर कार का पैसेंजर सीट की साइड का दरवाजा पूरा खोल दिया, उसको आगे दौड़ाया, उसने खूब रफ्तार पकड़ ली तो उसने स्टियरिंग एक खम्बे की तरफ काटा।
दरवाजा खम्बे से टकराया और उखड़कर परे जा गिरा।
युवक अब थमक कर सिरे की दीवार के करीब खड़ा था और आँखें फाड़े वो सब होता देख रहा था।
विमल ने कार को युवक की तरफ दौड़ाया।
युवक इस कदर हकबकाया हुआ था कि रास्ते से न हट सका।
कार उसको रौंदती हुई गुजर जाने को आमादा थी।
उसने कस कर आँखें बन्द कर लीं।
ब्रेकों की भीषण चरचराहट हुई।
उसने आँखें खोलीं तो पाया कि कार उसके घुटनों से सिर्फ एक इंच दूर थी।
विमल ने फुर्ती से कार को बैक किया, यू टर्न दिया, एक पिछला दरवाजा खोला और पूरी शक्ति से एक्सीलेटर दबाया।
“धड़ाम!”
पिछला दरवाजा भी गया।
पार्किंग के परले सिरे पर पहुँचकर कार फिर उसकी तरफ लपकी लेकिन ऐन उसके करीब आकर रुक गयी।
वैसा तीन बार और हुआ।
आखिरी बार तक कार के चारों दरवाजे और दोनों बम्पर उखड़ कर गायब हो चुके थे।
इस बार कार रुकी तो विमल उसको हैण्ड ब्रेक पर लगा कर बाहर निकला और युवक के करीब पहुँचा जो कि खड़ा खड़ा ही मर गया जान पड़ता था। उसकी पचास लाख की नयी कार तो बर्बाद हो ही चुकी थी, चार बार उसे यूँ लगा था कि जान गयी कि गयी।
“हल्लो!”—विमल मीठे स्वर में बोला।
युवक के मुँह से बोल न फूटा। फटी-फटी आँखों से वो विमल की तरफ देखता रहा।
“कैसा लग रहा है?”
उसके मुँह से बोल न फूटा।
“मैंने तेरी उँगली का नाखून तक नहीं छुआ। ऐन फिट, सालम, वन पीस खड़ा है मेरे सामने। नहीं?... अरे, कुछ हाँ न तो बोल! और कुछ नहीं तो मुण्डी ही हिला!”
वो वो भी न कर सका।
“अभी तेरे में और तेरी मौत में एक साँस का फासला था। तेरी एक साँस लौट आयी और तू बच गया। कोई दूसरा इतना खुशकिस्मत न था। पूछ कौन?”
“क-क-कौ... कौन?”
“वो नौजवान लड़की जिसे तूने तिलक मार्ग पर सेंट जीसस कालेज के सामने अपनी लांसर से हिट किया था। वो हवा में उछल गयी थी और लांसर के हुड पर आकर गिरी थी। तू फिर भी कार दौड़ाता न रहा होता तो वो अस्पताल में होती लेकिन जिन्दा होती। तूने एक नौजवान लड़की को मार डाला। तुझे जीने का क्या अख्तियार है?”
उसके मुँह से बोल न फूटा।
“जैसे तेरी ये फैंसी कार चारों तरफ बिखरी पड़ी है, ऐन वैसे ही तेरा ये एय्याश जिस्म भी पुर्जा पुर्जा हुआ चारों तरफ बिखरा पड़ा हो सकता था। अभी भी बिखरा पड़ा हो सकता है। तू ऐसा चाहता है?”
उसने जल्दी जल्दी इंकार में सिर हिलाया।
“कार तो मिस्त्री काबिल होगा तो फिर जोड़ लेगा, ऐसे ही तू भी फिर जुड़ जायेगा?”
उसने फिर इंकार में सिर हिलाया।
“मुँह से बोल।”
“वो...वो...वो... क-क्या..”
“कितनी उम्र है?”
“ब-बा-बा-बाइस। बाइस।”
“फिर तो कसूर तेरा नहीं, तेरे माँ बाप का है जिन्होंने तेरी लगाम कस के न रखी। पहले उन्हें सजा मिलेगी।”
“क-क्या? क्या?”
“दोनों को शूट कर दूँगा। तेरी आँखों के सामने।”
“नो! नो! नो!”
“क्यों उन्होंने तुझे पैदा किया? पैदा किया तो क्यों लम्बी उम्र की दुआ न की?”
“क-की। की।”
“नहीं की। की होती तो इस घड़ी तू मौत की कगार पर खड़ा होता?”
“म-माफ...माफ कर दो।”
“कर देता हूँ।”
“भ-भूल हुई।”
“कबूल कर।”
“क-क्या?”
“तुझे नहीं मालूम?”
“वो...वो...मैं... मैं...”
“तू अभी मेरे साथ थाने चलेगा और अपनी जुबानी अपना गुनाह कबूल करेगा। अपनी जुबानी कबूल करेगा कि कार ड्राइवर हशमत नहीं, तू चला रहा था; वो एक्सीडेंट हशमत ने नहीं, तूने किया था जिसमें कालेज की छात्रा की जान गयी थी।”
“म-मेरा...ब-बाप...मु-मुझे ऐसा न-नहीं करने दे-देगा।”
“वो अड़ंगा लगायेगा तो तू अपने से पहले उसे मरता देखेगा। मोबाइल है?”
“है।”
“बाप को फोन कर ले और भले ही अपने से पहले उसे फोर्ट थाने बुला ले।”
उसने फोन निकाला।
“फालतू बात नहीं।”—विमल ने चेतावनी दी—“खाली थाने पहुँचने को बोलना है।”
उसने सहमति में सिर हिलाया।
वो फोन कर चुका तो विमल ने उसे इरफान और शोहाब के हवाले कर दिया। वो तीनों उस कार में सवार हो गये जिसमें आकरे वहाँ पहुँचा था। विमल पीछे पार्किंग में खड़ी अपनी कार में सवार हुआ जिसकी एक लाइट जलाकर उसने बड़े यत्न से राजा गजेन्द्र सिंह का बहुरूप धारण किया।
फिर उसने मुम्बई के पुलिस कमिश्‍नर जुआरी को उसके मोबाइल पर काल लगाई।
वो नम्बर कमिश्‍नर ने खुद उसे तब दिया था जब वो पच्चीस मई की रात को होटल एशली क्राउन प्लाजा में ओरियंट होटल्स एण्ड रिजार्ट्स के चेयरमैन रणदीवे की बेटी वैशाली की शादी के फंक्शन में उससे मिला था।
“जुआरी साहब”—वो बोला—“हम राजा गजेन्द्र सिंह बोल रहे हैं, उम्मीद है आप हमें भूले नहीं होंगे।”
“अरे, जनाब, कैसे भूल जायेंगे आपको! आप तो रणदीवे की पार्टी के बाद दोबारा कभी मिले ही नहीं!”
“इत्तफाक ही न हुआ।”
“चलिये, फोन करना तो सूझा। अब बताइये, कैसे याद किया?”
“जुआरी साहब, हमने बहुत संकोच से आपको फोन लगाया है...”
“क्या बात करते हैं! आप रोज फोन लगाइये।”
“...क्योंकि हमारी पहली मुलाकात में आपने हमें छूट दी थी कि बावक्तेजरूरत हम आपको फोन पर डिस्टर्ब कर सकते थे।”
“मुझे कोई डिस्टर्बेंस नहीं। यू आर मोस्ट वैलकम।”
“आपकी खुद की पेशकश थी कि हमें कभी भी आपकी मदद की जरूरत हो तो हम निसंकोच आपको अप्रोच कर सकते थे।”
“बराबर थी। आप कोई मदद चाहते हैं?”
“जी हाँ।”
“बताइये क्या चाहते हैं, मैं आपकी हर मुमकिन खिदमत करूँगा।”
“पहले भी आपने ऐन यही कहा था।”
“क्या चाहते हैं?”
विमल ने बताया।
“ओह!”—सुनकर कमिश्‍नर गम्भीरता से बोला—“मैं फोर्ट थाने पहुँचता हूँ।”
“आप इतनी जहमत न कीजिये, खाली फोन लगा दीजिये।”
“कोई जहमत नहीं। मैं फौरन रवाना हो रहा हूँ। अब वहीं मुलाकात होगी।”
लाइन कट गयी।
आधी रात होने को थी।
हैदर धारावी में एक्रेजी के इलाके में स्थित पास्कल के बार में बैठा था और उस शाम का चौथा पैग उसके सामने था।
उसके पीछे लगे भीड़ूओं में से दो हाल में मौजूद थे और दो पता नहीं कहाँ थे। न जाने क्यों उसे लगता था कि वो इस बात को छुपाने की भी कोशिश नहीं कर रहे थे कि वो उन की निगरानी में था। डेढ़ घण्टा पहले वो उठकर बार के पिछवाड़े में स्थित टायलेट में गया था तो एक भीड़ू टहलता हुआ उसके पीछे वहाँ भी पहुँचा गया था। आधा घण्टा पहले वो फिर टायलेट में गया था तो उसके पीछे कोई नहीं आया था।
ऐसा क्यों हुआ था, ये जल्दी ही उसकी समझ में आ गया था।
उस तरफ से बार से निकासी का कोई रास्ता नहीं था। इसलिये टायलेट जाने वाले का हाल में लौटना लाजमी था।
अपने पीछे लगे भीड़ूओं से उसका पीछ कैसे छूटता, कब छूटता, ये उसके लिए चिन्ता का विषय था लेकिन वो उसके पीछे क्यों पड़े थे, उस बारे में उसे कोई शक नहीं था। अगर वो समझते थे कि उसके पीछे लगे वो उसके भाई तक पहुँच सकते थे तो ये उनकी खामखयाली थी। क्योंकि सफदर वहाँ से दूर, बहुत दूर, पटना में था। जरूर यूँ वो लोग उसे हलकान करना चाहते थे, परेशान करना चाहते वे ताकि वो कोई ऐसा गलत कदम उठाता जिसे कि वो कैश कर पाते।
उसने उनकी मंशा पूरी कर देखने का फैसला किया। अपना तीन चौथाई भरा पैग मेज पर छोड़कर वो उठा और फिर टायलेट की ओर बढ़ा।
पिछले फेरे की तरह इस बार भी वहाँ उसके पीछे कोई न पहुँचा।
वो लघुशंका से निवृत्त हुआ और वहाँ से बाहर निकला।
टायलेट वाले गलियारे में ही, उसे पहले से मालूम था, पास्कल का निजी आफिस था।
क्या आधी रात के करीब की उस घड़ी पास्कल वहाँ होगा!—उसने मन ही मन सोचा—क्या आफिस खुला होगा!
उसने आफिस के दरवाजे को धक्का दिया तो वो निशब्द खुल गया। भीतर ट्यूब लाइट की रोशनी थी जिसमें उसने आफिस टेबल पर पड़ा एक टेलीफोन देखा।
वो कुछ क्षण हिचकिचाया फिर उसने अपने पीछे दरवाजा भिड़का दिया और आगे बढ़कर फोन उठा लिया। उसने रिसीवर उठाकर, कान से लगाकर तसदीक की कि उसमें डायल टोन थी और फिर सफदर के मोबाइल का नम्बर डायल किया।
तुरन्त घण्टी बजने लगी।
एकाएक कोई वहाँ आ जाता—उसने अपने आपको तसल्ली दी—तो वो नशे में होने का बहाना करके जान छुड़ा सकता था।
घण्टी बजनी बन्द हुई।
“हल्लो!”—आवाज आयी।
“छोटे?”—वो व्यग्र भाव से बोला—“मैं बोलता हूँ। हैदर। सुन रहा है?”
“हाँ।”—आवाज आयी—“इस वक्त कैसे फोन किया?”
“दाँव ही इस वक्त लगा।”
“कोई खास बात है?”
“हाँ। बहुत खास बात है। छोटे, इधर दफेदार अपनी ताकत बना रहा है , ‘भाई’ की जगह ‘भाई’ बनने की कोशिश कर रहा है और किसी तरीके से उसे मालूम पड़ गया है कि तू—जेकब परदेसी—मेरा भाई है। बाकी बात खुद समझ।”
“उसने तेरे को थाम लिया?”
“अभी नहीं। थाम लिया होता तो मैं फोन कैसे कर रहा होता! लेकिन हालात साफ ऐसे बन गये हैं कि आखिरकार थाम ही लेगा।”
“माँगता क्या है?”
“तेरे को माँगता है। साफ ऐसा बोला। बोला, आदमियों का तोड़ा इसलिये वो मेरे भाई सफदर को अपने अण्डर में लेना माँगता था। बोला, मैं सफदर को उसके सामने हाजिर करूँ। अभी मैं सफदर को उसके सामने हाजिर करूँगा तो सोच कौन हाजिर होगा?”
“जेकब परदेसी।”
“बरोबर। जो ‘भाई’ की मौत के बाद से ही गायब है और जिसे वो ‘भाई’ की मौत के लिए जिम्मेदार मानता है।”
“मैं मिल गया तो शक्ल बाद में पहचानेगा, लाश पहले गिरायेगा।”
“न मिला तो मेरे को ढेर करेगा।”
“तू क्या करेगा?”
“मैं तो जो करूँगा सो करूँगा, पहले बोल, तू क्या करेगा?”
“तू बोल, क्या करूँ?”
“जिधर है, पहली फुरसत में उधर से निकल ले।”
“कहाँ जाऊँ?”
“बार्डर क्रॉस कर और काठमाण्डू पहुँच जा। अपना हाजी अरशद आजकल उधर है। वो बाखुशी हमें पनाह देगा।”
“हमें?”
“मौका लगते ही मैं भी तो उधर का ही रुख करूँगा !”
“अम्मी का, भाभी जान का, शफीक का क्या होगा?”
“फिलहाल कल्याण से मैंने उनकी रवानगी का इन्तजाम कर दिया है, आगे वो लोग भी वहीं होंगे, जहाँ हम होंगे।”
“काठमाण्डू पहुँचकर मैं हाजी अरशद को ढूँढ़ूँगा कैसे?”
“वहाँ पहुँचकर 522522 पर भैरव तुलाधर को फोन लगाना और मेरा नाम लेना। आगे जो करना होगा वो करेगा। समझ गया?”
“समझ तो मैं गया लेकिन क्या ये जलावतन जरूरी है?”
“क्या कहना माँगता है?”
“हमने सोहल की इतनी बड़ी खिदमत की, क्या वो हमें पनाह नहीं दे सकता?”
“छोटे, आइन्दा दिनों में जैसा कहर ढाने पर दफेदार आमादा है, उसकी रू में खुद सोहल को पनाह की जरूरत हो सकती है।”
“क्या बात करता है ! क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा!”
“तू मेरा कहना मान। और बहस करने की जगह जैसा मैंने कहा है, वैसा कर। मैंने बहुत जोखिम उठाकर तेरे को ये काल लगायी है, मेरा इस लाइन पर बने रहना न मुमकिन है, न मुनासिब है।”
“ठीक है। जैसा तूने कहा, मैं करता हूँ।”
“शाबाश!”
हैदर ने रिसीवर वापिस क्रेडल पर रख दिया।
पास्कल के बार में उसकी निरन्तर आवाजाही रहती थी जिसकी वजह से वहाँ के हर इन्तजाम से वो पूरी तरह वाकिफ था। वो जानता था पास्कल जब अपने आफिस में मौजूद नहीं होता था तो बाहर हाल में बार काउण्टर पर पड़ा एक टेलीफोन उस लाइन के पैरेलल में चलने लगता था। उसकी लाइन मिलते ही उसने फोन पर एक हल्की-सी क्लिक की आवाज सुनी थी जिसकी वजह से उसे गारण्टी थी कि बाहर वाले फोन के सदके किसी ने उसकी मुकम्मल काल बीच में सुनी थी और ऐसा करने वाला उसके पीछे लगे चार भीड़ूओ में से ही कोई हो सकता था।
बढ़‍िया!—तमाम दिन की दुर दुर के बाद उसने पहली बार राहत महसूस की—बढ़‍िया!
इरफान के निर्देश के मुताबिक मरने वाली की सहपाठिनी तेरह लड़कियाँ आधी रात को थाने के बाहर मौजूद थीं।
भीतर एसएचओ पाटिल के आफिस में उसके साथ वसदमल अटलानी मौजूद था।
उसने अपने बेटे की शक्ल देखी तो वो हक्का-बक्का रह गया।
“तुझे क्या हुआ?”—उसके मुँह से निकला—“तेरे होश क्यों उड़े हुए हैं?”
“कु-कुछ नहीं हुआ, डैडी।”—चंदन अटलानी बड़ी मुश्‍किल से बोल पाया।
“तेरी शक्ल से तो लगता है जैसे भूत देख लिया हो !”
“कुछ नहीं हुआ।”
“मुझे यहाँ क्यों बुलाया?”
“अभी मालूम पड़ता है।”
उसने विमल की ओर देखा।
“हम राजा गजेन्द्र सिंह हैं।”—विमल दबंग स्वर में एसएचओ से सम्बोधित हुआ—“होटल सी-व्यू के मौजूदा मालिक। उम्मीद करते हैं आप हमारे नाम से वाकिफ होंगे।”
एसएचओ पर राजा गजेन्द्र सिंह के रौब और शानोशौकत का प्रत्याशित प्रभाव पड़ा।
“तशरीफ रखिये।”—वो बोला।
“शुक्रिया।”
“क्या चाहते हैं?”
“हम मंगलवार को तिलक मार्ग पर सेंट जीसस कालेज के सामने हुए उस एक्सीडेंट के—जिसमें कि एक नौजवान लड़की की जान गयी थी—मुजरिम को आपकी खिदमत में पेश करना चाहते हैं।”
एसएचओ ने सशंक भाव से वसदमल की तरफ देखा।
“कौन है मुजरिम?”—फिर बोला।
विमल ने चंदन अटलानी की तरफ इशारा किया।
“ये क्या मजाक है?”—वसदमल गुस्से से बोला।
“ये अपनी मर्जी से अपना गुनाह कबूल करना चाहता है।”
“ये कैसे हो सकता है?”—एसएचओ ने हैरानी से पूछा।
“आप खुद पूछिये इससे।”
एसएचओ ने चंदन की तरफ देखा।
“मैं”—चंदन काँपते लहजे से बोला—“अपनी मर्जी से...”
“चड़या है!”—वसदमल बोला—“इतनी पीता है कि नशे में मत मारी गयी तेरी जो अनाप शनाप बक रहा है।”
“डैडी, आप नहीं समझते।”
“क्या नहीं समझता मैं? अरे पुटड़े, तू नहीं समझता तू नशे में बहक रहा है।”
“उस वारदात का मुजरिम पहले से गिरफ्तार है।”—एसएचओ बोला।
“क्यों गिरफ्तार है, आपको मालूम है।”—विमल बोला।
“हमारे पास चार ऐसे गवाह हैं जिन्होंने सेठ जी के ड्राइवर हशमत को वो एक्सीडेंट करते देखा था जब कि वो सेठ जी की इजाजत के बिना इनकी गाड़ी भगाता फिर रहा था।”
“हमारे साथ तेरह ऐसे गवाह हैं जिन्होंने इस लड़के को वो एक्सीडेंट करते देखा था।”
“हशमत अपना गुनाह कबूल कर भी चुका है।”
“ये लड़का अब करेगा।”
“ये एक लफ्ज नहीं बोलेगा।”—वसदमल बोला।
“ये चुप रह के दिखाये।”
“डैडी, आप...”
“चुप रह, कर्मामारे। खबरदार, जो बोला।”
“... समझते नहीं हैं।”
“आवाज न निकले मुँह से।”—फिर वो एसएचओ की तरफ घूमा—“अरे, पाटिल, ये क्या तमाशा है? निकाल बाहर कर इस सरदार को।”
“तमीज से।”—शोहाब कड़क कर बोला—“तमीज से बोल, सेठिया।”
“पाटिल, अब थाने में फौजदारी होगी?”
“कुछ नहीं होगा।”—एसएचओ बोला—“आप तशरीफ ले जाइये, सरदार साहब, आपका यहाँ कोई काम नहीं है।”
“हमारा ही काम है।”
“बहस न कीजिये।”
“हमें तुम्हारे कमिश्‍नर का हुक्म है कि उसकी आमद तक हम यहाँ ठहरें।”
एसएचओ चौंका।
“क्या फरमाया?”—वो अविश्‍वासपूर्ण स्वर में बोला—“कमिश्‍नर और थाने में?”
“हाँ। वर्दी की सिलवटें निकालकर मुस्तैद होकर बैठो और उस रिश्‍वत की जवाबदारी का रिहर्सल कर तो जो तुमने इस शख्स की बिगड़ी और गैरजिम्मेदार औलाद को बचाने के लिए खायी है। किसी एसीपी, डीसीपी ने खायी है तो उसको भी यहाँ बुला लो तो ताकि वो तुम्हारे साथ लीपापोती का ब्लेम शेयर कर सके।”
एसएचओ ने अवाक् विमल की तरफ देखा, फिर उसने वसदमल की तरफ देखा।
“बड़ा बोल बोलता है।”—वसदमल गुस्से से बोला और उठ खड़ा हुआ—“ब्लफ मारता है। पता नहीं कौन है ये आदमी ! ये यहाँ से नहीं टलता तो मैं टलता हूँ। चल, पुटड़े।”
“पुटड़ा नहीं जा सकता।”—विमल बोला—“इसका मुकाम हवालात है।”
“वडी, तू कौन होता है हुक्म चलाने वाला...”
“इंस्पेक्टर साहब”—चंदन बोला—“आई वांट टू कनफैस...”
“लक्ख दी लानत तेरे पर! एक मिनट कोई बात याद नहीं रख सकता। मैं बोला तेरे को कि नहीं बोला चुप कर!”
“दैट्स एनफ।”—इंस्पेक्टर बोला—“आप सब लोग यहाँ से बाहर निकल जाइये वर्ना मैं सबको...”
“नो, दैट्स नाट एनफ।”—एक नयी आवाज आयी—“और यहाँ से कोई नहीं जायेगा।”
सबने आवाज की दिशा में देखा तो कमिश्‍नर को भीतर दाखिल होते पाया।
इंस्पेक्टर चाबी लगे खिलौने की तरह उछलकर खड़ा हुआ, उस ने ठोक कर कमिश्‍नर को सैल्यूट मारा और कमिश्‍नर के लिए अपनी कुर्सी छोड़कर परे हट के खड़ा हो गया।
“वडी, कमिश्‍नर साईं”—वसदमल मक्खन से लिपटे लहजे से बोला—“मैं वसदमल ज्वेलर, कफ परेड वाला...”
“शटअप !”—कमिश्‍नर बोला।
“क्या! वडी, तू मेरे को शटअप बोला?”
“एण्ड स्पीक वैन स्पोकन टु।”
वसदमल अपने आप में सिकुड़ के रह गया।
“तुम थानाध्यक्ष हो?”—कमिश्‍नर इंस्पेक्टर की तरफ घूमा।
“यस, सर।”
“नाम बोलो।”
“पाटिल, सर।”
“राजा साहब की कोई खातिर तवज्जो की?”
“की।”—विमल बोला—“बराबर की। हमें यहाँ से निकल जाने का हुक्म फरमाया।”
“सर! सर!”—बद्हवास पाटिल बोला—“वो क्या है कि...”
“ये लड़का कनफैस करना चाहता है। अपना इकबालिया बयान दर्ज कराना चाहता है। तुमने किया?”
“सर, कोई गड़बड़ है।”
“क्या गड़बड़ है?”
“इसका कनफैशन जेनुइन नहीं हो सकता।”
“क्यों नहीं हो सकता?”
“क्योंकि जिस जुर्म का ये अब इकबाल करना चाहता है, उसको करने वाला तो पहले से गिरफ्तार है ! वो अपना जुर्म कबूल कर चुका है, और एक नहीं, दो नहीं, चार गवाह उसके मुजरिम होने की तसदीक कर चुके हैं।”
“ऐसा?”
“जी हाँ।”
“वो मुजरिम इस वक्त कहाँ है?”
“यहीं है। रिमाण्ड पर है, इसलिये लाकअप में बन्द है।”
“पेश करो।”
ड्राइवर हशमत को लाॅक-अप से निकाल कर वहाँ लाया गया तो वहाँ के माहौल की टेंशन का उसे फौरन अहसास हुआ, उसने खुद पुलिस कमिश्‍नर को वहाँ मौजूद पाया तो उसके होश ही उड़ गये। वो पनाह माँगती निगाहों से कभी एसएचओ को और कभी वसदमल को देखने लगा।
“इधर आ।”—कमिश्‍नर कड़क कर बोला।
थर थर काँपता, मन मन के कदम रखता वो कमिश्‍नर के सामने आकर खड़ा हुआ।
“नाम बोल।”
“हशमत खान।”
“क्या काम करता है?”
“डिरेवर है।”
“किधर ड्राइवर है?”
उसने वसदमल की तरफ इशारा किया।
“कब से ड्राइवर है?”
“अट्ठाइस साल से।”
“सेठ जी के पास कितने सालों से है?”
“अट्ठाइस साल से।”
“अट्ठाइस सालों में कितने एक्सीडेंट किये?”
“एक भी नहीं।”
“एक तो किया, जिसकी वजह से बन्द है !”
“उसके अलावा एक भी नहीं।”
“जब इतना सेफ ड्राइवर है तो वो कैसे किया?”
“हो गया, साहब।”
“एक्सीडेंट के बाद रुका क्यों नहीं?”
“डर गया था, साहब।”
“इसलिये पनाह पाने सेठ जी के पास पहुँच गया?”
“हाँ, साहब।”
“पनाह मिली तो नहीं !”
“वो क्या है, साहब, कि...”
“सिर उठा के, आँख मिला के बात कर।”
उसने सिर उठाया लेकिन आँख न मिलायी।
कमिश्‍नर ने ऐसा झन्नाटेदार थप्पड़ उसके मुँह पर रसीद किया कि उसका सिर फिरकनी की तरह घूमा।
“एक सैकण्ड में कबूल कर तूने कोई एक्सीडेंट नहीं किया था, एक्सीडेंट की बाबत जो बयान तूने दिया उसकी बाबत तुझे पट्टी पढ़ाई गयी थी।”
“हाँ, साहब।”—वो यूँ बोला जैसे विलाप कर रहा हो।
“क्या हाँ साहब?”
“मेरे को बोला गया था।”
“क्या बोला गया था?”
“कि मैं बोलूँ कि एक्सीडेंट मैंने किया था।”
“किसने बोला?”
“सेठ जी ने।”
“चड़या हुआ है।”—वसदमल आवेश से बोला।
“शटअप!”—कमिश्‍नर ने डपटा।
“लेकिन ये...”
“डोंट इण्टरप्ट !”
“कमिश्‍नर साईं, ऐसे जोर जबरदस्ती से तो तुम इससे कुछ कहलवा लोगे !”
“इंस्पेक्टर चित्रे!”—कमिश्‍नर अपने साथ आये अमले में से इंस्पेक्टर से सम्बोधित हुआ।
“सर!”—इंस्पेक्टर तत्पर स्वर में बोला।
“इन्हें ले जा के लॉक-अप में बन्द कर दो।”
“मैं...मैं तो चुप हूँ।”—वसदमल बोला।
“फजीहत तो आपकी हो के रहेगी, अभी फजीहत नहीं करवाना चाहते तो खामोश बैठिये।”
वसदमल फिर न बोला।
“तो”—कमिश्‍नर फिर हशमत की तरफ घूमा—“झूठा बयान देने के लिए तुझे सेठ जी ने बोला था?”
“हाँ, साहब।”
“और किसने बोला था?”
“थानेदार साहब ने।”
“ठहर जा, साले।”
“इंस्पेक्टर पाटिल, स्टे वेयर यू आर।”
“लेकिन, सर, ये...”
“एण्ड कीप क्वाइट। डोंट स्पीक अनटिल यू आर स्पोकन टु। दैट्स एन आर्डर।”
“यस, सर।”
“तुम”—कमिश्‍नर चंदन की तरफ घूमा—“इधर मेरी तरफ देखो।”
चंदन ने देखा।
“सेठ जी के साहबजादे हो?”
“जी हाँ।”
“नाम क्या है?”
“चंदन।”
“तुमने अपने ड्राइवर का बयान सुना?”
“जी हाँ।”
“तुम्हें पहले से मालूम था कि वो झूठा था क्योंकि एक्सीडेंट तो तुमने किया था?”
“जी हाँ।”
“पहले क्यों न बोले?”
“डैडी ने न बोलने दिया।”
“क्योंकि ये समझते थे कि इनकी थैली में इतना दम था कि ये स्याह को सफेद करके दिखा सकते थे?”
“जी हाँ।”
“तुम भी ऐसा समझते थे?”
“जी हाँ।”
“इसलिये खामोश रहे?”
“जी हाँ।”
“लेकिन अब कनफैस करना चाहते हो, अपना इकबालिया बयान दर्ज कराना चाहते हो?”
“जी हाँ।”
“वजह?”
उसने एक सशंक निगाह विमल पर डाली।
विमल ने अपलक उसकी तरफ देखा।
दो सेकण्ड में उसकी निगाह भटक गयी।
“वजह?”—कमिश्‍नर ने अपना सवाल दोहराया।
“कांशस हर्ट करने लगी।”—चंदन बोला।
“एकाएक?”
“जी हाँ।”
“इस सिलसिले में तुम्हारे पर किसी का कोई दबाव है?”
“जी नहीं।”
“तुम अपनी मर्जी से अपना गुनाह कबूल कर रहे हो?”
“जी हाँ।”
“तुम कबूल करते हो कि मंगलवार को तिलक मार्ग पर सेंट जीसस कालेज के सामने तुमने कालेज की एक छात्रा को हिट किया था और तुम उसकी मौत की वजह बने थे?”
“जी हाँ।”
“तुम जानते समझते हो न कि इस कनफैशन के बाद तुम्हारी गिरफ्तारी लाजमी है?”
“जी हाँ।”
“ये भी जानते हो कि अभी, यहीं तुम्हारे खिलाफ तेरह चश्‍मदीद गवाह उपलब्ध हैं?”
“जी हाँ।”
“तुम किसी गवाह को, या सबको, चैलेंज करना चाहते हो? ये कहना चाहते हो कि कोई, या सब, झूठी गवाही दे रहे हैं या उनको तुम्हारी शिनाख्त में मुगालता लगा?”
“जी नहीं।”
“मिस्टर चंदन अटलानी।”
“सर!”
“यू आर अन्डर अरैस्ट अन्डर सैक्शन थ्री जीरो फोर ए, विच रीड्स ऐज डैथ ड्यू टु नेग्लीजेंस। ऐनी ऑब्जेक्शन?”
“नो, सर।”
“ये तुम्हारी साफगोई का ईनाम है कि तुम्हें एक बहुत हल्की धारा के तहत बुक किया जा रहा है।”
“आई एम थैंकफुल, सर।”
“इंस्पेक्टर पाटिल!”
“सर।”
“अब तुम क्या कहते हो?”
“सर, मेरे पास खुद अपना गुनाह कबूल करता मुलजिम था, मेरे पास गवाह थे...”
“अपने गवाहों का हवाला देकर तुम अपनी मुश्‍किलें बढ़ा रहे हो। जब मुलजिम झूठा है तो गवाह सच्चे कैसे हो सकते हैं?”
“सर, तब तो मुझे मालूम नहीं था न कि...”
“तुम्हें बराबर मालूम था, क्योंकि इस साजिश में तुम्हारी बराबर की शिरकत है।”
“सर, ये बेजा इलजाम है।”
“ऐसा न होता तो तुमने उन तेरह नौजवान लड़कियों की हाल दुहाई की तरफ तवज्जो दी होती कि एक्सीडेंट करने वाला कार का ड्राइवर एक नौजवान लड़का था न कि कोई बूढ़ा, उम्रदराज शख्स। मुझे पता लगा है कि अपनी गुहार के साथ वो थाने आती थीं तो तुम उन्हें डराकर, धमकाकर, यहाँ तक कि दुत्कार कर, यहाँ से भगा देते थे।”
“सर, ऐसा नहीं है।”
“नहीं है?”
“तेरह की तेरह लड़कियाँ बाहर मौजूद हैं।”—विमल धीरे से बोला—“अभी बुला के सवाल कीजिये।”
“इंस्पेक्टर पाटिल, तुम चाहते हो कि तुम्हारे सामने मैं ऐसा करूँ?”
एसएचओ से जवाब देते न बना।
“इंस्पेक्टर चित्रे!”
“सर!”
“तुम तमाम की तमाम लड़कियों के बयान दर्ज करोगे और पुलिस की हिफाजत में उन्हें उनके घर घर पहुँचाने का इन्तजाम करोगे।”
“यस, सर।”
“और इस शख्स को—हशमत खान को—परजुरी का नया चार्ज लगाकर गिरफ्तार करोगे।”
“यस, सर।”
“इंस्पेक्टर पाटिल!”
“सर!”
“यू आर सस्पेंडिड विद इमीजियेट इफैक्ट।”
“सर, इतना जुल्म न कीजिये।”
“इंस्पेक्टर चित्रे विल टेक चार्ज आफ स्टेशन हाउस फ्रॉम यू।”
“सर, एक मौका और...”
“किस बात का एक मौका और?”—कमिश्‍नर गर्जा—“क्या करने के लिए एक मौका और? तेरह गवाहों की जुबान पर ताला लगाने के लिए? इस लड़के को अपने वालंटियरी कनफैशन से रोकने के लिए? फर्जी मुजरिम को अभी दिये उसके बयान से मुकरने के लिए तैयार करने के लिए? वो न मुकरे तो उसे गायब कर देने के लिए? अपने चार झूठे गवाहों को गायब कर देने के लिए? थैली वाले सेठ की ड्योढ़ी का कुत्ता बनने के लिए? उसका मैला चाटने के लिए? क्या करने के लिए एक मौका और चाहिये तुम्हें?”
“सर, रहम...”
“तुमने किस पर रहम किया? उन तेरह लड़कियों पर रहम किया जो इंसाफ की गुहार लगाती दर दर भटकती रहीं? उस विधवा माई पर रहम किया जिसके जीवन की इकलौती आस टूट गयी? उस वर्दी पर रहम किया रक्षक से भक्षक बन कर जिसे तुमने दागदार किया? अपने इस आला अफसर पर रहम किया जो मुम्बई की पब्लिक को जवाबदेय है और तुम्हारी करतूत जिसकी शर्मिंदगी का बायस है? किस पर रहम किया तुमने?”
एसएचओ का सिर झुक गया।
“एण्ड यू आर नाट ओनली सस्पेंडिड, यू आलसो वेट टु बी अरैस्टिड।”
एसएचओ के चेहरे पर हाहाकारी भाव आये।
“सर, रहम। सर, मैं बाल-बच्चेदार ...”
“उम्दा मिसाल कायम की अपने किरदार की अपने बाल बच्चों के लिए। फख्र से बोलेंगे वो अपने दायें बायें कि उन का मुअज्जिज बाप एक करप्ट, रिश्‍वतखोर पुलिसिया है और बड़े होकर खुद भी ऐसा ही बनेंगे क्योंकि बीज ने तो पेड़ पर ही जाना होता है।”
“सर।”
“गेट आउट आफ माई साइट।”
एसएचओ सिर झुकाये वहाँ से बाहर निकल गया।
“आप भी जाइये।”—कमिश्‍नर वसदमल से बोला।
वसदमल उठकर खड़ा हुआ, उसने कातर भाव से कमिश्‍नर की तरफ देखा।
“कमिश्‍नर साईं”—फिर गिड़गिड़ाता-सा बोला—“मेरे को टेम दे।”
“किसलिये?”—कमिश्‍नर सख्ती से बोला।
“अकेले में मिलने का टेम दे।”
“जो कहना है, यहीं कहिये। अभी कहिये। जल्दी कहिये।”
“साईं, मेरा एक ही बेटा है...”
“जो कि खुशकिस्मती है मुम्बई के पैदल चलने वालों की।”
“साईं, गलती किसी से भी हो सकती है...”
“हो सकती है इसलिये खामियाजा भी किसी को भी भुगतना पड़ सकता है।”
“अब मैं कैसे कहूँ!”
“जो आप कहना चाहते हैं, उसे न ही कहने में भलाई है आपकी। जाइये।”
भारी कदमों से चलता सेठ वहाँ से रुखसत हुआ।
“बाकी सब लोग भी जाइये। राजा साहब दो मिनट यहाँ बैठेंगे।”
कमरा खाली हो गया।
कमिश्‍नर एसएचओ की कुर्सी पर बैठा, उसने मुस्कराते हुए विमल की तरफ देखा।
“राजी?”—वो बोला।
“जी हाँ। बहौत।”—विमल बोला—“इंसाफ होता देखकर कौन राजी नहीं होगा?”
“नाइंसाफी कोई बड़ा वाकया नहीं इस महकमे में, इस शहर में, इस मुल्क में। जब सारा निजाम ही जुल्म, ज्यादती, मतलबपरस्ती, खुदगर्जी और खाऊँ खाऊँ के जेरेसाया चल रहा है तो कोई क्या कर सकता है?”
“करने वाले फिर भी करते हैं।”
“जैसे कि आप?”
“क्योंकि कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाजेसुखन, जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है।”
“आपने मेरी बात की तरफ तवज्जो नहीं दी। आप अपना शुमार उन लोगों में करते हैं जो नाइंसाफी के खिलाफ आवाज उठाकर रहते हैं?”
“जी हाँ।”
“आप, यानी कि राजा गजेन्द्र सिंह, एनआरआई फ्राम नेरोबी?”
विमल सकपकाया, उसने गौर से कमिश्‍नर की तरफ देखा?
कमिश्‍नर के चेहरे पर शिकन न आयी।
“लगता है”—विमल बोला—“आप खास कुछ कहना चाहते हैं।”
“हाँ।”
“क्या?”
“ये वाकया आपकी तवज्जो में क्योंकर आया? कालेज की वो तेरह लड़कियाँ आप तक कैसे पहुँचीं? उन्हें कैसे सूझा कि इस सिलसिले में आप उनकी कोई मदद कर सकते थे? आपका खयाल ही उन्हें क्योंकर आया?”
“वो...वो क्या है कि...”
“मैं जब यहाँ पहुँचा था तो मेरी एक मुख्तसर-सी बात उन लड़कियों से हुई थी। बकौल उनके, वो तो जानतीं भी नहीं कि आप कौन हैं, उन्होंने अपनी गुहार उस शख्स से लगाने की कोशिश की थी जोकि आजकल चैम्बूर का दाता के नाम से मशहूर है और बाज लोग कहते हैं कि और कोई नहीं, खुद सोहल है।”
“अच्छा!”
“आपको नहीं मालूम?”
“ऐसा कुछ सुना तो है हमने लेकिन कभी तवज्जो नहीं दी उस तरफ।”
“आई सी। आप ने बताया नहीं, राजा साहब, कि बात आप तक कैसे पहुँची?”
“बस, पहुँच गयी किसी तरह।”
“लड़के को कनफैशन के लिए कैसे तैयार किया?”
“हमने कहाँ किया! उसने बोला तो था कि कांशस हर्ट करने लगी, उसकी अन्तरात्मा ने उसे अपना अपराध कबूल करने के लिए प्रेरित किया।”
“बान्द्रा के डिस्को से फोर्ट तक तो उसे आप लाये?”
“कोई खुद कबूल करे कि वो अँधा है तो उसे रास्ता तो दिखाना पड़ता है न?”
“ठीक। मैंने बचपन में अमरीकी कथाकार ओ हेनरी की एक कहानी पढ़ी थी जो कि शातिर सेफ क्रैकर जिमी वैलेंटाइन और एक पुलिस के जासूस बैन प्राइस की बाबत थी जो कि सेफ क्रैकर को गिरफ्तार करके जेल की हवा खिलाने का तमन्नाई था। उस पुलिस के जासूस का खौफ खाया वो सेफ क्रैकर वो शहर ही छोड़ के चला जाता है। और इलमोर नाम की एक दूसरी छोटी-सी जगह पर जाकर राल्फ स्पेंसर के नाम से बस जाता हैं जहाँ कि वो स्थानीय बैंक के मालिक की बेटी अनाबेल के प्रेमपाश में बन्ध जाता है। वहाँ उसका एक साल का वक्त गुजरता है तो शादी की नौबत आती है। उन दिनों बैंक मालिक ने, सेफ क्रेकर जिमी के होने वाले ससुर आडम्स ने, बैंक में एक नयी सेफ फिट करवाई होती है जिस पर उसको बड़ा गर्व होता है कि उसको कोई नहीं खोल सकता था क्योंकि उसमें टाइम लॉक लगता था। टाइम लॉक यू नो?”
“हाँ। एक बार वो लॉक लग जाने के बाद एक खास अरसे तक वो सेफ किसी सूरत में नहीं खुल सकती थी।”
“हाँ। ऐसी सेफ में मेहमानों के साथ वहाँ मौजूद एक बच्ची एक दूसरी बच्ची अगाथा को खेल खेल में सेफ में बन्द कर देती है और टाइम लॉक को यूँ स्क्रैम्बल कर देती है कि सेफ खुलने का कोई टाइम सैट ही नहीं हो पाता। तहलका मच जाता है, माँ विलाप करने लगती है और सेफ को तोड़ दिये जाने की गुहार करने लगती है लेकिन सेफ नहीं टूट सकती थी और हवा की कमी के कारण बच्ची का दम घुटकर मर जाना निश्‍चित था। उस घड़ी संयोग से पुलिस का वो जासूस बैन प्राइस वहाँ पहुँच गया होता है जो नाम बदल चुका होने के, काफी हद तक औकात बदल चुका होने के, बावजूद सेफ क्रैकर जिमी को पहचान लेता है और जिमी को भी उसकी वहाँ मौजूदगी की खबर होती है। जिमी ने जिन्दगी में कभी अपनी जुबानी कबूल नहीं किया होता कि वो सेफ क्रैकर था, उस घड़ी वो सेफ को खोलता तो उसकी वो हरकत ही उसके खिलाफ सबूत होती और फिर उसका जेल की हवा खाना निश्‍चित होता। जिमी फिर भी सेफ को खोलता है और मृतप्राय बच्ची अगाथा को सेफ से निकालकर सुरक्षित माँ की बाहों में पहुँचाता है। फिर वो खुद ही अपने आपको गिरफ्तारी के लिए पुलिस के जासूस के सामने पेश कर देता है। जवाब में जानते हो पुलिस का जासूस बैन प्राइस उसे क्या कहता है?”
“क्या कहता है?”
“कहता है, ‘कौन हो, भई? मैं तुम्हें नहीं जानता। तुम्हें मेरे बारे में जरूर कोई मुगालता है’ और सेफ क्रैकर को गिरफ्तार करने के वाहिद मकसद से उसके पीछे लगा बैन प्राइस खाली हाथ वहाँ से रुखसत हो जाता है।”
“अच्छी कहानी है।”
“बराबर है, इसीलिये मुझे आज तक याद रही। राजा साहब, मई में जब हमारी रणदीवे साहब की लड़की की शादी के फंक्शन में होटल ऐशली क्राउन प्लाजा में मुलाकात हुई थी और हमारे बीच सोहल का जिक्र आया था तो मेरा तब भी जी चाहा था कि मैं आपको ये कहानी सुनाऊँ लेकिन तब मैंने सिर्फ इतना कह के सब्र कर लिया था कि कभी फिर सोहल की नजरेइनायत होटल सी-व्यू पर हो तो उसे मेरा ये पैगाम दीजियेगा कि ‘कम्पनी’ के समूल नाश का करिश्‍माई काम कर दिखाने के लिए मुम्बई की पुलिस उसकी अहसानमन्द थी। आपने ये पैगाम उस तक पहुँचाया तो नहीं होगा?”
“नहीं, वो क्या है कि...”
“कभी मुलाकात ही नहीं हुई होगी?”
“जी हाँ। यही बात है। यही बात है।”
“नो प्राब्लम। कभी फिर आगे मुलाकात हो तो उस पैगाम में एक पैगाम और जोड़ दीजियेगा।”
“क्या?”
“हमें उसका चैम्बूर का दाता वाला रोल पसन्द है और हम उसकी ताइद करते हैं।”
“हम बोलेंगे ऐसा।”
“शुक्रिया।”
“आपने वादा किया था कि आप कभी हमारे होटल में तशरीफ लायेंगे और हमें मेहमाननवाजी का मौका देंगे।”
“राजा साहब, हम खामखाह पहुँच जायेंगे तो हमारी लार टपकाऊ फितरत उजागर होगी। इसलिये आमद की कोई वजह होनी चाहिये।”
“वजह है न! नया साल सिर पर है। गुरुवार को न्यू ईयर ईव पर होटल में बहुत धूमधाम होगी। आप तशरीफ लाइयेगा।”
“जरूर।”
“तो अब हम चलें? जिमी वैलेंटाइन बैन प्राइस से रुखसत पाये?”
“जी हाँ, शौक से। जरूर। लगता है कहानी आपको पसन्द आयी।”
“बहुत ज्यादा। हमेशा याद रहेगी।”
“गुड।”
“न्यू ईयर ईव पर मिलते हैं।”
“जरूर।”
“गुड नाइट, सर।”
“गुड नाइट, राजा साहब।”
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