शुक्रा नहीं जानता था कि डॉक्टर वधावन इस वक्त कहां होगा। पहले वो उसके क्लीनिक में गया। वहां से मालूम हुआ कि डॉक्टर साहब अभी नहीं आए। अपने घर पर हैं।
शुक्रा बंगले पर पहुंचा। बाहर दरबान मौजूद था। उसने डॉक्टर वधावन से मिलने को कहा तो दरबान ने स्पष्ट मना कर दिया कि बंगले पर डॉक्टर साहब किसी से नहीं मिलते। और बिना अप्वाइंटमेंट के तो अपने क्लीनिक पर भी किसी से नहीं मिलते।
शुक्रा के जोर देने पर दरबान ने कहा कि वो उसकी कोई सहायता नहीं कर सकता। उसकी नौकरी का सवाल है। शुक्रा समझ गया कि कोई फायदा नहीं होगा। वहां से हटकर, वो डॉक्टर वधावन के बाहर निकलने के इन्तजार में खड़ा हो गया। कुछ दूरी पर उदयवीर की सफेद एम्बैसेडर खड़ी थी।
दो घंटे बाद बंगले का गेट खुला और कार बाहर निकली। सफेद वर्दी पहने ड्राइवर कार चला रहा था। पीछे वाली सीट पर वधावन बैठा था।
कार शुक्रा के सामने, सड़क से निकल गई।
शुक्रा जल्दी से एम्बैसेडर में बैठा और वधावन की कार के पीछे हो गया। रास्ते में कहीं भी ऐसा मौका न मिला कि वधावन की कार को रोक पाता। आधे घंटे बाद कार क्लीनिक के बाहर रुकी तो वधावन कार से उतरकर क्लीनिक में प्रवेश कर गया।
एक तरफ कार रोकते हुए शुक्रा उसे क्लीनिक में जाते देखता रहा।
डॉक्टर की कार एक तरफ पार्किंग में जाकर खड़ी हो गई। शुक्रा जानता था कि वधावन अपने उसूलों का बहुत पक्का है। बिना अप्वाइंटमेंट के नहीं मिलेगा। फिर भी उसने कोशिश की। क्लीनिक के रिसेप्शन पर पहुंचकर, वधावन से मिलने की बात की।
परन्तु बिना अप्वाइंटमेंट के रिसेप्शनिस्ट ने भी मना कर दिया। शुक्रा, पूछने पर भी वजह नहीं बता सका कि वो वधावन से क्यों मिलना चाहता है। वधावन को अगर मालूम हो गया कि वो उससे मिलना चाहता है तो वो स्पष्ट तौर से इन्कार कर देगा।
क्लीनिक से बाहर आकर कुछ देर खड़ा सोचता रहा कि क्या करे ? वधावन से बात करना जरूरी था। शायद वो बेदी का ऑपरेशन करके गोली निकालने को तैयार हो जाए। आखिरकार शुक्रा की नजरें वधावन की कार पर जा टिकीं। नजरें फिर घूमी और कुछ दूर सिगरेट के कश लगा रहे ड्राइवर पर जा टिकी। शुक्रा के चेहरे पर सोच के भाव गहरे हो गए।
तीन घंटे बाद वधावन बाहर निकला। उसे पास आता देखकर ड्राइवर ने फौरन दरवाजा खोल दिया। वधावन भीतर बैठा तो ड्राइवर दरवाजा बंद करके ड्राइविंग सीट पर बैठा। कार स्टार्ट की।
"बंगले पर चलो।" वधावन का स्वर शांत था।
ड्राइवर ने सिर हिलाया और कार आगे बढ़ा दी।
शुक्रा की एम्बैसेडर सड़क के किनारे खड़ी थी और वहीं खड़ी रही। वधावन की कार आगे बढ़ गई। दस मिनट बाद खाली सी सड़क आई तो कार सड़क के किनारे जा रुकी।
"क्या हुआ ?" वधावन ने पूछा।
इंजन बंद कर ड्राइवर ने गर्दन पीछे घुमाई। ड्राइवर की वर्दी में वो शुक्रा ही था।
वधावन उसे देखकर चौंका।
"तुम?" उसके होंठों से निकला।
"मजबूरी में मुझे, आपसे मिलने के लिए ये रास्ता इस्तेमाल करना पड़ा। आपके बंगले पर मिलने गया तो भीतर नहीं जाने दिया गया। क्लीनिक में भी मैं आपसे नहीं मिल सका।" शुक्रा ने सामान्य स्वर में कहा।
"तुम... तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, ये सब करने की।" वधावन के चेहरे पर गुस्सा उभर आया--- "मैं...।"
"मैंने पहले ही कहा है कि मजबूरी में मुझे आपसे मिलने के लिए इस रास्ते का...।"
"तुम लोगों ने मेरी बेटी का अपहरण किया था कि मैं तुम्हारे दोस्त का ऑपरेशन...।"
"वो सब हमारी गलती थी।"
"कमाल है। बहुत शराफत से बात कर रहे हो।" वधावन की आवाज में तीखापन आ गया।
शुक्रा ने कुछ नहीं कहा।
"मेरा ड्राइवर कहां है?"
"आपके क्लीनिक के बाहर मेरी कार खड़ी है। उसमें बेहोश पड़ा है।" शुक्रा ने धीमे स्वर में कहा।
"मैंने तो समझा, उसकी जान ले ली होगी।" कड़वा हो गया था वधावन का स्वर ।
"आपको गलतफहमी हो रही है। हम बुरे लोग नहीं हैं।"
"तुम लोग कितने बुरे हो, मैं जानता हूं। मेरा वास्ता पड़ चुका है तुम लोगों से।" वधावन ने खा जाने वाले स्वर में कहा--- "कार को शराफत से वापस क्लीनिक पर ले चलो।"
"मैं आपसे बात करना चाहता हूं डॉक्टर साहब।"
"बात, क्या बात ?"
"अपने दोस्त विजय के बारे में...वो...।"
"वो... वो जिन्दा है अभी। मरा नहीं...।" वधावन जहरीले स्वर में कह उठा।
"मरने की तैयारी में है।" शुक्रा ने गहरी सांस ली।
"अच्छी बात है। उस घटिया इन्सान के मरने की खबर देने मेरे पास मत आ जाना।" वधावन कड़वे स्वर में कह उठा।
शुक्रा, वधावन को देखता रहा।
"जो भी बात है जल्दी करो। मेरा वक्त खराब हो रहा है।"
"मैं चाहता हूं आप विजय का ऑपरेशन कर दीजिए।" शुक्रा ने गम्भीर धीमे स्वर में कहा।
"बारह लाख ले आओ। ऑपरेशन करा लो। एक पैसा भी कम नहीं होगा।"
"छः लाख हैं। बाकी का छः लाख मैं बहुत जल्दी आपको दे दूंगा।"
"ये बनिए की दुकान नहीं है जहां उधार चलता है। तुम गलत जगह आ गए।"
"बारह लाख पूरा करने में कुछ वक्त लगेगा। तब तक विजय नहीं बचेगा। आपने कहा था कि वो ज्यादा से ज्यादा दो महीने जिन्दा रहेगा और दो महीने पूरे होने में कुछ दिन ही बचे हैं।"
"मेरी तरफ से कल का मरता वो आज मरे।" वधावन का स्वर कड़वा हो गया।
शुक्रा जानता था कि इससे सख्ती करने का कोई फायदा नहीं। आखिरी हद तक ये जिद्दी है। पहले की तरह अब फिर सख्ती की तो, कहीं बारह लाख पर ऑपरेशन करने से इन्कार न कर दे।
कुछ पल ठहर कर शुक्रा बोला।
"मैं वायदा करता हूं कि बाकी का छः लाख जल्दी ही...।"
"तुम क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हो। किसी दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा लो। बहुत कम खर्चा...।"
"विजय जाने क्यों इस वहम में फंसा हुआ है कि कोई दूसरा डॉक्टर ऑपरेशन करेगा, तो ऑपरेशन ठीक नहीं होगा और वो मर जाएगा। । उसे आप पर ही भरोसा है।"
"जो मन में आए करो। मुझसे ऑपरेशन कराना हो तो बारह लाख पूरा लेकर आना।"
"बाकी का छः बहुत जल्दी आपको दे दूंगा। ये छः लाख लेकर...।"
"एक ही बात बार-बार मत करो। पूरे बारह लूंगा और वो भी पहले।" वधावन की आवाज में उखड़ापन आ गया--- "वापस चलो। मेरा वक्त खराब हो रहा है।"
शुक्रा समझ गया कि वधावन अपनी बात से नहीं हटेगा। पहले भी वो कोशिश कर चुका है और अब भी कहना बेकार रहा।
जबरदस्ती करने का भी नतीजा देख चुका है। इस पर किसी तरह की जबरदस्ती नहीं लागू हो सकती। अब फिर पहले जैसी कोई हरकत कर दी तो कहीं गुस्से में, बारह लाख के बावजूद ऑपरेशन करने से इन्कार न कर दे।
वधावन की जिद्द को बर्दाश्त करते हुए कार स्टॉर्ट की और वापस मोड़ दी।
■■■
उन्नीस दिन
"विजय।" शुक्रा का स्वर गम्भीर था।
बेदी ने निगाहें घुमाकर उसे देखा। चेहरे पर शेव बढ़ी हुई थी।
शुक्रा उसके पास ही कुर्सी पर बैठ गया।
उदयवीर एक तरफ खड़ा सिगरेट के कश ले रहा था।
"मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं विजय।" कहते हुए शुक्रा ने व्याकुलता भरी निगाह, उदयवीर पर मारी।
"क्या ?"
"तू ऑपरेशन करा ले।"
"वो तो मैं करवाना चाहता हूं लेकिन...।" बेदी ने कहना चाहा।
"वधावन से बारह लाख वाला ऑपरेशन नहीं। किसी और डॉक्टर से करा ले। छः लाख है हमारे पास। इतने पैसों में बढ़िया से बढ़िया डॉक्टर देखकर, ऑपरेशन...।"
"नहीं। मैंने बहुत डॉक्टरों से बात कर ली। कोई भी गारण्टी के साथ ऑपरेशन नहीं करता। लेकिन वधावन सफल ऑपरेशन की गारण्टी देता है। वो मुझे बचा लेगा। दूसरा डॉक्टर...।"
"विजय ये सब वहम है तुम्हारा।" शुक्रा के स्वर में विवशता था--- "मेरी बात को समझने की कोशिश करो। अगर वक्त खराब है तो सब कुछ खराब है। वक्त ठीक है तो सब ठीक...।"
"मैं वधावन से ही ऑपरेशन कराऊंगा।" बेदी बात काटकर, पक्के स्वर में होंठ भींचकर कह उठा।
"वो बारह लाख लिए बिना करेगा नहीं और हमारे पास सिर्फ छः लाख हैं। मौत का खतरा तुम्हारे सिर पर सवार है। दिमाग में, फंसी गोली का जहर कभी भी तुम्हारे मस्तिष्क में फैल सकता है। इससे तो अच्छा है कि किसी दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा लो। न से हां तो होगी। इस बात का अफसोस तो नहीं रहेगा कि जिन्दगी बचाने का रास्ता होते हुए भी, उसे इस्तेमाल नहीं किया। और वो लोग, जो वधावन की मोटी फीस नहीं दे सकते, वो क्या मर जाते हैं। दूसरे डॉक्टरों से ऑपरेशन कराकर बचते नहीं क्या। डॉक्टर वधावन ही गुणी डॉक्टर है क्या हमारे देश में। बाकी क्या यूं ही डॉक्टर बने हुए हैं।" शुक्रा का चेहरा उखड़ेपन के भावों से भर गया था।
बेदी उसे देखे जा रहा था।
उदयवीर गम्भीर था।
"मेरी बात मान ले यार। मैं क्या तेरा बुरा चाहूंगा। तेरे भले के लिए ही कह रहा हूं कि वधावन से ऑपरेशन कराने के लिए बारह लाख पूरे नहीं हो रहे तो, किसी दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले। वो...।"
"शुक्रा ठीक कह रहा है विजय।" उदयवीर कह उठा--- “मान जा इस बात को।"
"नहीं। मैं वधावन से ही ऑपरेशन कराऊंगा। दूसरा डॉक्टर मेरा ऑपरेशन करेगा तो मैं मर जाऊंगा।"
"ये वहम है तुम्हारा।" उदयवीर के होंठ भिंच गए।
"मैं कुछ नहीं जानता।" शुक्रा और उदयवीर की निगाहें मिलीं।
"मैं वधावन के पास गया था कल। उससे मिला। बोला उसे छः लाख पहले ले ले। छः उधार रहे। जल्दी ही इन्तजाम करके दे दूंगा। लेकिन वो नहीं माना। पूरा बारह लाख पहले मांगता है।" शुक्रा शब्दों को चबाते हुए कह उठा--- "उसके दिल में दया-रहम नाम की कोई चीज नहीं है। वो...।"
"वो मेरे साथ जिद कर रहा है। क्योंकि एक बार ऑपरेशन कराने के लिए उसका अपहरण किया। दूसरी बार उसकी बेटी का अपहरण कर लिया। यही वजह है कि अब वो ऑपरेशन के लिए बारह लाख जैसी बड़ी रकम मांगता है और उसे ये भी मालूम है कि इतनी बड़ी रकम का हम इन्तजाम नहीं कर सकते।" बेदी ने गहरी सांस ली--- "लेकिन मैं उसी से ऑपरेशन कराऊंगा।"
"और अगर बारह लाख का इन्तजाम न हुआ तो ? जो कि मुझे नहीं लगता कि होगा। तब क्या करोगे ?”
बेदी सूनी-सूनी निगाहों से उसे देखता रहा। बोला कुछ नहीं।
शुक्रा और उदयवीर के लाख कोशिश करने पर भी, बेदी दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन कराने को तैयार नहीं हुआ।
■■■
अट्ठारह दिन
ये दिन भी सोचो, कशमकश और परेशानी में बीत गया।
कोई नतीजा नहीं निकला।
छः लाख का इन्तजाम कैसे होगा ?
और बेदी सिर्फ डॉक्टर वधावन से ऑपरेशन कराना चाहता था।
■■■
सत्रह दिन
ये भी पहले जैसा ही दिन रहा।
कोई बदलाव नहीं आया। उदयवीर, जबरदस्ती वाले अंदाज में बेदी के सामने खाना रखता और खाने को जोर देता। अपनी मौत के गम में बेदी थोड़ा-बहुत ही खा पाता और चुपचाप पड़ा रहता। बीतते दिन के साथ उसके चेहरे की चमक फीकी पड़ती जा रही थी।
परेशान शुक्रा चुप-चुप ही रहता।
■■■
सोलहवां दिन
"मेरी तो समझ में नहीं आता कि क्या करूं।" उदयवीर ने थके स्वर में कहा--- "विजय की हालत देखी नहीं जाती।"
"हम शायद कुछ कर भी नहीं सकते।" शुक्रा होंठ भींच कर कह उठा।
"सोचो कोई रास्ता निकल आए। कुछ तो करना ही होगा।"
"वही रास्ता तो समझ में नहीं आ रहा।" शुक्रा ने उसे देखा--- "यहां तो मौत से पहले ही, मरघट-सा सन्नाटा फैल चुका है। विजय के सामने पहुंचकर, कुछ कहने के लिए शब्द ही नहीं मिलते। क्या कहें उसे ?"
उदयवीर मुट्ठियां भींच कर रह गया।
"उदय, विजय को समझा। वो दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले।" शुक्रा ने गहरी सांस ली।
"वो बात को समझे, तब कुछ कहूं उसे। फिर भी कोशिश करता हूं।" उदयवीर के स्वर में हार के भाव स्पष्ट झलक रहे थे।
"मैं बाहर जा रहा हूं।"
"कहां ?"
"मालूम नहीं कहां और लौटने का भी कुछ पता नहीं।" शुक्रा गम्भीर था।
"क्या मतलब ?"
"मतलब मत पूछ। मैं खुद नहीं जानता कि मैं क्या करना चाहता हूं।" शुक्रा बाहर निकल गया।
■■■
पन्द्रह दिन
दिन के बारह बज रहे थे। कुछ देर पहले ही बेदी ने ब्रेकफास्ट किया था और अब सिगरेट सुलगाकर परेशान सा उठ खड़ा हुआ। केबिन में टहलने लगा। उसके हाव-भाव-चेहरा, सब कुछ बुझा-बुझा था। मस्तिष्क में एक ही बात थी कि कुछ दिनों के बाद वो मर जाएगा।
तभी उदयवीर ने केबिन में प्रवेश किया। कुछ देर पहले ही एक कार गैराज में ठीक होने आई थी। उदयवीर, छोकरों को समझा कर आया था कि कार में क्या-क्या, कैसे ठीक करना है।
"हिम्मत से काम ले विजय।" उसे टहलते पाकर उदयवीर ने धीमे स्वर में कहा--- "भगवान सब ठीक करेगा।"
जवाब में बेदी गहरी सांस लेकर रह गया।
"कुछ खा लिया कर। तू नहीं खाता तो मेरा भी मन नहीं करता खाने को।" उदयवीर ने दुखी स्वर में कहा।
"जिसे मालूम हो कि वो मरने जा रहा है। उसे भूख भी कहां लगेगी।" बेदी ने बेजान से स्वर में कहा।
"सब ठीक हो जाएगा विजय।"
"हां सब ठीक हो जाएगा। जब मैं ही नहीं रहूंगा तो लोगों की परेशानियां खुद ही खत्म हो जाएंगी।"
"ऐसा मत कह विजय। तू...।"
"शुक्रा कहां है।" बेदी ने बात बदलने वाले लहजे में कहा--- "रात को भी नहीं देखा।"
"मालूम नहीं कल गया था। उसके बाद लौटा नहीं।"
बेदी ने उदयवीर को देखा।
"बताया नहीं कि कहां जा रहा हूं?" बेदी के स्वर में किसी तरह की दिलचस्पी के भाव नहीं थे।
"नहीं।"
■■■
चौदह दिन
शाम को लौटा शुक्रा। चेहरे पर से ही थकान झलक रही थी। कपड़े भी मैले से हो रहे थे। उदयवीर गैराज पर नहीं था। घर गया था। केबिन में प्रवेश करते ही, बेदी को देखकर ठिठका।
बेदी ने उसे देखा।
"परसों से कहां था?" बेदी के स्वर में कोई भाव नहीं था।
"ऐसे ही। इधर-उधर भटक रहा था। " शुक्रा जबरदस्ती मुस्कराया--- "तू कैसा है ?"
"मैं... मैं तो मरने का इन्तजार कर रहा हूं। अपनी मौत...।"
"ऐसा मत बोल यार... ।" शुक्रा तड़प सा उठा।
"मत बोल। क्यों न बोलूं।" बेदी ने खा जाने वाली निगाहों से उसे देखा--- "मैं मर रहा हूं। कुछ दिनों की जिन्दगी है मेरी। तेरे को तो मौत का डर नहीं है। तेरे को पता है तू अभी लम्बी जिन्दगी जिएगा। बुरे वक्त का साया भी तूने कभी नहीं देखा, जो मेरे गले में कांटे की तरह फंसा हुआ है। तू आज अपने भविष्य के बारे में सोचता होगा और मैं इस वक्त भी खुली आंखों से अपने मरे हुए शरीर को देख रहा हूं, जिसे तुम लोग उठाकर क्रिया-कर्म के लिए ले जा रहे हो। ताकि पूरी तरह मेरे से छुटकारा पा सको। बहुत परेशान हो चुके हो तुम और उदय मेरे से। मैं भी कितना ढीठ हूं कि तुम दोनों का पीछा ही नहीं छोड़ रहा । छोड़ दूंगा बहुत जल्दी इस दुनिया से चला जाऊंगा। चैन से रह लेना तब। तब...।"
"ये तू क्या कह रहा है ?" शुक्रा अजीब से स्वर कह उठा।
"वाह शुक्रा। अब तेरे को मेरी बातें भी समझ में नहीं आ रहीं।" बेदी कड़वे स्वर में कह उठा--- "कुछ दिन मुझे और बर्दाश्त कर ले। जहां इतना किया है। उसके बाद मैं तेरे को तंग नहीं करूंगा।"
शुक्रा की आंखों में पानी चमक उठा। कुछ कहने की अपेक्षा वो पलटा और बाहर निकलता चला गया। गैराज पार करता हुआ बाहर आ गया। सामने सड़क थी। वाहन आ-जा रहे थे। उसने अपनी गीली आंखें साफ की। चेहरे पर दुःख और व्याकुलता छा चुकी थी। वो समझ नहीं पा रहा था कि विजय के लिए क्या करे? कैसे पैसों का इन्तजाम करे ?
तभी एम्बैसेडर में उदयवीर वहां आ पहुंचा। कार से उतरकर उसके पास आया।
"यहां-कहां खड़ा है। परसों से कहां था ?"
शुक्रा खामोश सा उसे देखता रहा।
उदयवीर ने उसके चेहरे के भावों को महसूस किया।
"क्या हुआ ?"
शुक्रा का मन नहीं किया कुछ कहने का। होंठ नहीं खुल सके।
"भीतर गया। विजय से मिला।"
शुक्रा बिना कोई जवाब दिए सड़क की तरफ बढ़ गया।
पीछे से उलझन में फंसे उदयवीर ने पुकारा। परन्तु वो नहीं रुका। उदयवीर फौरन गैराज के भीतर केबिन में पहुंचा। शुक्रा के व्यवहार से वो कुछ परेशान सा हो उठा था।
"विजय।" केबिन में प्रवेश करते ही उदयवीर बोला--- "शुक्रा आया था क्या ?"
"हां।" बेदी ने सूनी-सूनी निगाहों से उसे देखा।
"क्या हुआ। मैंने उसे बुलाया। पर वो कुछ नहीं बोला। कोई बात हुई क्या ?" व्याकुल से उदयवीर ने पूछा।
"मुझे गुस्सा आ गया था।"
"गुस्सा ? क्यों, शुक्रा ने कुछ कहा तुझे ?"
"नहीं। उसने कुछ नहीं कहा।" बेदी ने होंठ भींच लिए--- "पता नहीं क्यों मुझे गुस्सा आ गया।"
उदयवीर कुछ पलों तक बेदी को देखता रहा फिर गहरी सांस लेकर कुर्सी पर बैठ गया।
"उदय।" बेदी का स्वर बेजान सा हो रहा था--- "मुझे गुस्सा क्यों आ गया था शुक्रा पर ?"
उदयवीर से कुछ कहते न बना।
"तेरी तबीयत ठीक नहीं विजय। शायद इस वजह से गुस्सा आया होगा।" उदयवीर यही कह सका।
बेदी, उदयवीर को देखता रहा। कहा, कुछ भी नहीं।
■■■
तेरह दिन
"उदय। रात शुक्रा नहीं आया।" बेदी ने थके स्वर में कहा।
"नहीं।" उदयवीर गम्भीर था।
"नाराज हो गया मेरे से। मालूम नहीं, मैंने गुस्से में उसे क्या कह दिया था।" बेदी ने अपने गालों पर हाथ फेरा। शेव बढ़ी हुई थी--- "देख उसे कहां है वो ?"
"मैं नहीं जानता वो किधर है। ऐसे में उसे ढूंढूंगा कैसे।"
बेदी की आंखों में आंसू चमक उठे।
"उसे कह कुछ दिन बाद नाराज हो जाए। ज्यादा दिन थोड़े न हूं मैं...।" स्वर में कम्पन था ।
उदयवीर ने कुछ कहने की अपेक्षा चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
■■■
शुक्रा की आंख खुली तो सुबह के आठ बज रहे थे। इस वक्त वो अपने किराए के कमरे में था। परेशानी की वजह से रात ठीक से नींद नहीं ले पाया था। इसी कारण आंखें भारी-भारी सी थी। भारी मन से उसने सिगरेट सुलगाकर कश लिया।
शुक्रा जानता था कि विजय ने उसे जो कुछ भी कहा, यूं ही कहा। पैसों का इन्तजाम न होने के कारण वो अपनी मौत को सामने देखते हुए, बहुत परेशान हुआ पड़ा था। शुक्रा उससे भी ज्यादा व्याकुल था कि शेष छः लाख का इन्तजाम नहीं हो पा रहा था। छः लाख कोई मामूली रकम नहीं थी। शुक्रा को इस बात का पूरी तरह एहसास था। फिर भी जैसे-तैसे इस रकम को पाने के लिए जुगाड़ भिड़ाना चाहता था। उसकी दिली ख्वाहिश थी कि उसका यार किसी तरह बच जाए। उसे मरते हुए देखने का हौसला, शुक्रा में नहीं था।
शुक्रा ने सिगरेट समाप्त की और उठ खड़ा हुआ।
"कुछ करना होगा। कहीं न कहीं से छः लाख का इन्तजाम करना ही होगा।" शुक्रा दांत भींचकर बड़बड़ा उठा--- "विजय को बचाकर ही रहूंगा।" इसके साथ ही वो तैयार होने में लग गया। चेहरे पर सोच उभरी पड़ी थी।
उसके बाद सारा दिन शुक्रा शहर में इधर-उधर भटकता रहा कि छः लाख का इन्तजाम कहां से करे ?
■■■
बारह दिन
दिन के ग्यारह बज रहे थे।
शुक्रा एक बैंक के बाहर खड़ा, बैंक में आने-जाने वाले लोगों को देख रहा था। व्यस्त इलाके में स्थित, बैंक की ये व्यस्तम शाखा थी।
शुक्रा के चेहरे पर सामान्य भाव थे। वो लापरवाह नजर आ रहा था। परन्तु मस्तिष्क तेजी से दौड़ रहा था। करीब एक घंटे बाद शुक्रा अपनी जगह से हिला और जेब में हाथ डालता हुआ बैंक के मुख्य द्वार के पास जा पहुंचा। वहां गनमैन खड़ा था।
शुक्रा भीतर प्रवेश कर गया। भीतर काफी भीड़ थी। हल्का सा शोर हो रहा था। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था। शुक्रा कैश केबिन के पास जा पहुंचा, जहां से लोग कैश पेमेंट लेते थे। शुक्रा ने इस बात को ध्यान से नोट किया कि कोई मोटी पेमेंट तो नहीं ले जा रहा ?
परन्तु लाखों की पेमेंट किसी की नहीं थी।
यहाँ ज्यादा देर खड़ा भी नहीं हो सकता था। कोई भी बैंक कर्मचारी उसके ज्यादा देर इस तरह खड़े होने पर शक कर सकता था। शुक्रा वहां से हिलने लगा कि एक आदमी वहां पहुंचकर केबिन में मौजूद बैंक कर्मचारी से कह उठा।
"शर्मा जी नमस्कार।"
"नमस्कार- नमस्कार।" बैंक कर्मचारी ने कहा।
"आठ लाख की पेमेंट कल लेनी है कितने बजे आऊं।"
"जब भी आ जाइए। आपकी पेमेंट तैयार होगी।"
"मेहरबानी। कल किसी भी वक्त आ जाऊंगा।" कहकर वो चला गया।
शुक्रा ने उसका चेहरा अच्छी तरह याद कर लिया था। वो कल आएगा। आठ लाख की पेमेंट लेने। शुक्रा के चेहरे पर पक्केपन के भाव उभर आए कि कल विजय के लिए पैसों का इन्तजाम हो जाएगा।
■■■
ग्यारह दिन
सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे। शुक्रा तैयार होकर बाहर निकलने ही वाला था कि उदयवीर आ पहुंचा। दोनों की निगाहें मिली। चेहरों पर गम्भीरता थी।
"विजय कैसा है ?" शुक्रा के होंठों से निकला।
"तुम सोच ही सकते हो कि वो कैसा होगा।" उदयवीर ने गहरी सांस ली।
शुक्रा कुछ न कह सका।
"तेरे को याद करता है। मेरे को बोला कि तेरे को लेकर आऊं।" उदयवीर का मन खराब था।
शुक्रा ने होंठ भींच लिए।
"विजय कहता है, गुस्से में तेरे को जाने क्या-क्या कह दिया। उसे नहीं मालूम, वो क्यों गुस्से में आ गया था। क्यों नाराज होता है उससे। वो बहुत परेशान...।"
"मैं विजय से नाराज नहीं हो सकता, उदय...।" शुक्रा भारी मन से कह उठा।
"तो फिर आया क्यों नहीं। मिला क्यों नहीं उससे।"
"तू जा आऊंगा मैं।"
"विजय ने कहा है, तेरे को साथ लेकर आऊं।"
"शाम को आऊंगा। शायद...।"
"क्या शायद।"
"शायद छः लाख भी लेता आऊं।" कहते हुए शुक्रा दूसरी तरफ देखने लगा।
"क्या ?" उदयवीर ने सूखे होठों पर जीभ फेरी--- "कहां से लाएगा छः लाख।"
"शाम को बताऊंगा।" शुक्रा धीमे स्वर में बोला।
उदयवीर कई पलों तक उसे देखता रहा।
शुक्रा ने उसे देखा चेहरे पर अजीब सी मुस्कान उभरी।
"क्या कर रहा है तू ?"
"अपने यार की जान बचाने के लिए आखिरी कोशिश। शायद कामयाब हो जाऊं।"
उदयवीर ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला कि फिर होंठ भींच लिए।
"विजय से कहूं कि तू शाम को आएगा।"
शुक्रा ने सहमति में सिर हिलाया।
उदयवीर ने शुक्रा को देखा। जैसे बहुत कुछ कहना चाहता हो। परन्तु बिना कुछ कहे वहां से चला गया।
■■■
दस बज रहे थे दिन के, बैंक खुल चुका था।
शुक्रा बैंक के बाहर मौजूद, हर उस व्यक्ति को, ध्यान से देख रहा था, जो बैंक के भीतर जा रहा था। उसे उस व्यक्ति का इन्तजार था, जिसने कैशियर से कहा था कि कल वो आठ लाख की पेमेंट लेने आएगा।
वक्त बीतता रहा।
शुक्रा इस विश्वास के साथ खड़ा रहा कि वो आएगा।
और वो व्यक्ति आया भी, करीब बारह बजे। दो पहियों वाले स्कूटर पर वो बैंक पहुंचा था। स्कूटर एक तरफ खड़ा करके, डिग्गी में से मोटे कपड़े का थैला निकाला और उसे बगल में दबाए बैंक में चला गया। शुक्रा का दिल और भी तेजी से धड़कने लगा ये सोच कर कि कुछ देर बाद वो व्यक्ति बैंक से आठ लाख लेकर, बाहर निकलेगा। अगर वो उस व्यक्ति से रुपया हथिया लेने में कामयाब रहा तो विजय की जिन्दगी बच जाएगी। उसका यार जिन्दा रहेगा।
शुक्रा अपनी जगह से हिला और उसी व्यक्ति के स्टेण्ड पर लगे स्कूटर पर जा बैठा और सिगरेट सुलगा ली। मन ही मन खुद को पक्का कर चुका था कि अपने काम को हर हाल में पूरा करना है।
आधे घंटे बाद वो व्यक्ति बैंक से बाहर निकला। शुक्रा का दिल एक बारगी जोरों से धड़का। थैला उसने हाथ में पकड़ रखा था। डोरी से थैले का मुंह बंद कर रखा था। मैला सा थैला था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसमें रुपया होगा। लेकिन बेदी जानता था कि उसमें आठ लाख रुपया है। और ये रुपया विजय की जिन्दगी बचा सकता है। इसे हासिल करना बहुत जरूरी था।
थैला पकड़े वो स्कूटर की तरफ बढ़ा।
शुक्रा लापरवाही से स्कूटर की सीट पर बैठा, इधर-उधर देखने लगा।
वो व्यक्ति पास पहुंचा।
"स्कूटर से उतरना भाई। जाना है।" उसने सामान्य स्वर में कहा।
शुक्रा हौले से मुस्कराया और स्कूटर से उतर गया।
उसने थैला ब्रेक के पास पायदान पर रखा और चाबी लगाकर स्कूटर स्टार्ट करने लगा। वो व्यक्ति कोई खास सावधान नहीं था । शायद इसलिए कि इस तरह रुपया ले जाना उसके लिए सामान्य बात थी।
आठ लाख के रुपयों से भरा थैला, पायदान पर पड़ा था। यही मौका था। शुक्रा ने आस-पास देखा फिर चीते की तरह झपटा और पावदान पर पड़ा थैला उठाकर पूरी ताकत से एक तरफ भाग निकला।
वो व्यक्ति एक पल के लिए तो हक्का-बक्का रह गया। फिर गला फाड़ कर चिल्लाया।
"चोर... चोर.... पकड़ो। लाखों रुपया लेकर भाग रहा है। पकड़ो उसे।" इसके साथ ही वो शुक्रा के पीछे भागा।
शुक्रा ज्यादा से ज्यादा तेज भागने की चेष्टा कर रहा था।
उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर दो व्यक्ति और भी उसके साथ भागने लगे। शुक्रा को इस बात का एहसास था कि पीछे एक-दो लोग आ रहे हैं। कानों में चोर-चोर पकड़ो और चिल्लाने की आवाजें उसके कानों में पड़ रही थी। शुक्रा पीछे आते लोगों से जल्द से जल्द पीछा छुड़ा लेना चाहता था।
इस वक्त उसे उदयवीर की याद आई कि अगर उदय अपनी कार के साथ पास में मौजूद होता तो रुपयों का थैला उसे थमा देता। वो अब तक कार पर रुपया लेकर जा चुका होता।
उसकी सांस फूल रही थी। लगातार भागे जाने की वजह से चेहरा लाल-सा हो रहा था। लेकिन किसी भी हालत में उसका रुकने का इरादा नहीं था। पास से गुजरते लोग उसे इस तरह भागते देखते तो ठिठक जाते। वो आगे निकल जाता। उन लोगों को पीछे से आने वाले लोगों से मालूम होता कि जो उनके पास से निकला था, वो लाखों रुपया छीनकर भाग रहा है तो एक-दो और साथ भागने लगते।
शुक्रा को लग रहा था कि पीछे वाले इसी तरह पीछे आते रहे तो वो जल्दी ही फंस जाएगा। परन्तु पीछे आने वाले लोगों को धोखा देने के लिए कोई रास्ता भी तो नहीं मिल रहा था।
तभी उसके पास ही मोटरसाइकिल आकर रुकी। उस पर दो युवक सवार थे। पीछे बैठा युवक जल्दी से नीचे उतरा और शुक्रा पर झपट पड़ा। शुक्रा जोरों से लड़खड़ाया। भागते-भागते वो इतना थक चुका था कि उसका मुकाबला भी नहीं कर सकता था।
पहला घूंसा पड़ते ही वो हांफते हुए नीचे गिर गया।
उसके बाद युवक ने उठने नहीं दिया। दूसरा युवक भी उसकी सहायता के लिए आ गया।
और मिनट भर में ही पीछे भागते लोग भी पास आ पहुंचे।
रुपयों वाले थैले को लेकर निकल जाना तो दूर, बेदी की जान बचाना तो बहुत दूर, अब तो शुक्रा खुद ही फंस चुका था। लोग उसे ठोक-ठोक कर बुरा हाल कर रहे थे।
शुक्रा की हालत बुरी होने लगी।
तभी एक पुलिसवाला, डण्डा थामे वहां आ पहुंचा।
"क्या हो रहा है ये सब।" पुलिस वाले ने ऊंची आवाज में कहा।
वो सब रुक गए। नीचे पड़ा शुक्रा पीड़ा भरी टूटी-फूटी सांसें ले रहा था।
“ये मेरे लाखों रुपये लेकर भाग रहा था।" थैले को मजबूती से थामे उस व्यक्ति ने कहा।
"लाखों रुपये ?"
"हां। मैंने बैंक से निकाले थे कि बाहर आते ही ये छीनकर भाग खड़ा हुआ।"
"मैंने पकड़ा है इसे।" युवक बोला।
"हम तो कब से इसके पीछे भाग रहे थे।"
"हिम्मत तो देखो, भीड़ भरी जगह पर भी, ऐसा काम करते इसे डर नहीं लगा।"
पुलिस वाला डण्डे से सबको पीछे करते, नीचे पड़े शुक्रा के पास पहुंचा।
शुक्रा के चेहरे पर कई जगह चोट के निशान थे। होंठ खून से सने थे। एक आंख सूज सी गई थी और लोगों की ठुकाई की वजह से कमीज फट गई थी। पेट और छाती पर भी जख्म दिख रहे थे।
"कितना बुरा हाल कर दिया है।" पुलिस वाले ने उसकी हालत देखकर कहा--- "अगर ये मर जाता तो।"
"जो भी हो। मेरा तो आठ लाख रुपया बच गया। मैंने तो इसे नहीं मारा। हाथ भी नहीं लगाया।"
"वाह, हम आपकी सहायता करने की सोचकर आपके साथ हो गए। और अब हमसे पल्ला झाड़ रहे हो।" एक व्यक्ति तीखे स्वर में कह उठा।
"चुप रहो।" पुलिस वाले ने उन लोगों को घूरा।
शुक्रा लगभग बे-दम सा नीचे पड़ा था।
"तुम नोटों वाला थैला लेकर भाग रहे थे।" पुलिस वाला नीचे झुकता हुआ शुक्रा से बोला ।
शुक्रा ने कठिनता से आंख खोली। पुलिस वाले को देखा। चेहरे पर सहमति के भाव थे। पुनः आंखें बंद कर लीं।
■■■
शाम के सात बजे।
अंधेरा कुछ ही देर बाद हो जाना था। काम न होने की वजह से उदयवीर ने छोकरों को छुट्टी दे दी थी। गैराज पर इस वक्त कोई हलचल नहीं थी। केबिन में रोशनी थी। बेदी और उदयवीर कुर्सियों पर बैठे थे। बेदी के चेहरे की शेव बढ़ी हुई थी। आंखें धंसी सी महसूस हो रही थीं। सूनी आंखें। उतरा हुआ चेहरा।
उदयवीर का चेहरा भी उतरा-उतरा लग रहा था। वो इस हद तक परेशान था कि समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। बेदी की हालत उससे देखी नहीं जा रही थी।
"शुक्रा आएगा आज।" बेदी का स्वर धीमा और फीका था।
"हां।" उदयवीर आवाज को सामान्य बनाने की कोशिश करता कह उठा--- "उसने आज शाम पक्का आने को बोला था। कह रहा था कि शायद लाखों रुपयों का इन्तजाम भी कर ले। रुपये भी ले आएगा।"
"बताया नहीं कि क्या कर रहा है वो ?"
"नहीं।" उदयवीर होंठ भींच कर गहरी सांस ले उठा।
बेदी की आंखों में आंसू चमक उठे।
"मैंने...।" बेदी ने भर्राए स्वर में कहा--- "तुम सबको दुखी कर रखा है।"
"ऐसा मत कह विजय।" उदयवीर तड़प उठा--- "दोस्तों में ही सुख-दुख बांटे जाते हैं।"
"उदय।"
"हां।"
"मैं बच जाऊंगा ?" कहते हुए बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी ।
"हां विजय। भगवान पर भरोसा कर। तू बच जाएगा। हम...।"
"झूठ बोलता है तू। झूठी तसल्ली देता है कि मैं बच जाऊंगा। मैं नहीं बच सकता। सब जानता हूं मैं। कुछ ही दिनों के भीतर मैं मर जाऊंगा। विजय बेदी मर जाएगा।" वो फफककर रो पड़ा।
उदयवीर की आंखें गीली हो गईं। तड़प कर वो केबिन से बाहर निकल गया।
रात के दस बज चुके थे।
"विजय।" उदयवीर ने भारी मन से कहा--- "कुछ खा ले। नहीं तो मैं भी नहीं खा पाऊंगा।"
केबिन के टेबल पर खाना पड़ा था। जिसे कि उदयवीर घर से लाया था। उदयवीर कई बार कह चुका था। लेकिन बेदी ने खाने को देखा तक नहीं था।
"खाना खा ले विजय।"
बेदी ने मुर्झाया चेहरा उठाकर, उदयवीर को देखा। केबिन की रोशनी में बेदी का चेहरा पीला सा लग रहा था। उदयवीर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि यही विजय है।
"शुक्रा नहीं आया ?" बेदी के होंठों से धीमी-सी आवाज निकली।
उदयवीर भी चिन्ता में था कि शुक्रा नहीं आया। जबकि उसने शाम को आने के लिए कहा था कि शायद छः लाख को भी अपने साथ ले आए।
"अभी दस ही बजे हैं, आ जाएगा।" उदयवीर ने इतना ही कहा। परन्तु मन ही मन सोच रहा था कि कहीं शुक्रा छः लाख का इन्तजाम करने के चक्कर में फंस न गया हो।
हर तरफ परेशानी ही परेशानी थी।
"खाना शुरू कर विजय।" उदयवीर ने उसके सामने खाने का थाल सरकाते हुए कहा।
"मन नहीं है।" बेदी की आवाज में बुझापन था।
"कुछ तो खाना ही पड़ेगा विजय। मेरे लिए ही सही। नहीं तो मैं भी रात भर भूखा रहूंगा।" उदयवीर के स्वर में जिद के हल्के भाव आ गए थे।
एकाएक बेदी की आंखों में पानी चमक उठा।
"उदय। मेरी मौत मेरे पास आती जा रही है। दिमाग में फंसी गोली का जहर कभी भी फैल सकता है। मैं मर...।"
"ऐसा मत कह विजय।" उदयवीर ने होंठ भींच लिए।
"बोल उदय।" बेदी की आंखों में आंसू थे--- "मैंने गलत कहा क्या ?"
उदयवीर की आंखों में भी आंसू चमक उठे। उसने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया।
■■■
दस दिन
उदयवीर गैराज पर ही नहा-धोकर तैयार हुआ। आठ बज रहे थे। केबिन में पहुंचा तो बेदी को जगे पाया। सारी रात आंखों ही आंखों में काटी थी बेदी ने। भोर के उजाले पर ही आंख लग सकी।
"उदय ।" उसे देखते ही बेदी धीमे स्वर में बोला--- “शुक्रा ?"
"मैं खुद उसी के बारे में सोच रहा था कि रात उसे आ जाना चाहिए था।" उदयवीर विचलित सा कह उठा--- "उसने पक्का कहा था कि मैं आऊंगा। फिर, आया क्यों नहीं ?"
"उस.... उसने छः लाख लाने को कहा था ?" बेदी की आवाज धीमी थी--- "वो, वो कहीं फंस गया होगा। छः लाख का इन्तजाम नहीं कर पाया होगा। कहीं फंस गया होगा।"
उदयवीर बेबसी भरे अंदाज में होंठ भींच कर रह गया ।
"मालूम कर उदय। देख तो शुक्रा कहां है?" बेदी की आवाज में दम नहीं था।
"उसने नहीं बताया कि वो कहां पर क्या कर रहा है। कल सुबह कहीं जा रहा था, जब मैं उसके पास गया।" उदयवीर ने बेदी को देखा--- "फिर भी देखता हूं, शुक्रा कहां हो सकता है।"
"मेरा दिल कहता है कि वो किसी मुसीबत में फंस गया है।"
उदयवीर, बेदी को देखता रहा। कहा कुछ नहीं।
सुबह का गया उदयवीर, रात दस बजे वापस लौटा। उदयवीर का चेहरा हद से ज्यादा गम्भीर हो रहा था। रह-रहकर उसके होंठ भिंच रहे थे। कभी मुट्ठियां भिंच जाती। केबिन में पहुंचा तो बेदी को कुर्सी पर बैठे पाया। बल्ब की रोशनी और बढ़ी शेव की वजह से उसकी आंखें धंसी सी लग रही थी। उदयवीर को भीतर आते पाकर, निगाह उस पर जा टिकी।
बेदी को देखता उदयवीर खामोश रहा।
"सारा दिन लगा दिया। पता चला शुक्रा के बारे में।" बेदी के स्वर में व्याकुलता थी--- "वो दिन में भी नहीं आया। तेरे को नहीं मिला क्या ?"
"नहीं।" उदयवीर के होंठ हिले ।
"नहीं? तो फिर कहां चला गया ?"
"उसकी खबर मिली है।" उदयवीर ने भारी स्वर में कहा--- "बहुत कठिनता से उसके बारे में मालूम कर पाया हूं। आज सुबह शुक्रा ने एक बैंक के बाहर से, एक आदमी से लाखों रुपया छीना और भाग खड़ा हुआ। परन्तु कुछ देर बाद ही पकड़ा गया और इस वक्त थाने के लॉकअप में है। कल सुबह उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा। मतलब कि उसे कम से कम साल-दो साल की सजा होगी।"
बेदी ने आंखें बंद कर लीं। चेहरा दर्द भरे भावों से भरता चला गया।
"उदय।" बेदी का स्वर भर्रा उठा--- "बहुत बुरा हूं मैं। अपनी मुसीबत तुम दोनों के सिर पर डाल दी। मेरी वजह से अब शुक्रा जेल पहुंच जाएगा। क्या फायदा हुआ। मैंने तो मरना ही है। शुक्रा भी जेल पहुंच गया। ये सब उसने नहीं किया होता तो जिन्दगी के आखिरी वक्त में उससे भी जी भर कर बातें कर लेता। अपने दोनों यारों की बांहों में मरता तो चैन से मरता। अब एक यार पास में है और दूसरा जेल में। चैन से मर भी नहीं पाऊंगा। मैं...।"
आंसुओं भरी आंखों से उदयवीर, बेदी को देखता रहा।
"उदय।"
"आज तो बहुत भूख लग रही है। जा यार खाना ला। पेट भर के खाऊंगा। हम दोनों खाएंगे। शुक्रा बेशक भूखा रहे। लेकिन हम पेट भरके खाएंगे। आज खाने को मन कर रहा है।" बेदी की आंखों में आंसू और आवाज में भर्राहट थी। शुक्रा की खबर पाकर, आज मन और भी उचाट हो गया था।
■■■
नौ दिन
सुबह का वक्त। सात बजे थे। उदयवीर और बेदी लगभग एक साथ ही नींद से उठे थे।
बेदी ने सिगरेट सुलगाई। उदयवीर सीधा होकर बैठता हुआ बोला।
"विजय।" उदयवीर गम्भीर था--- "तेरा क्या ख्याल है, कहीं से छः लाख का इन्तजाम हो जाएगा।"
बेदी के चेहरे पर अजीब सी मुस्कान उभरी।
"क्यों मजाक करता है उदय। अब तो सिर्फ नौ दिन बचे हैं। दो महीने पूरे हो जाएंगे। डॉक्टर वधावन ने कहा था कि मस्तिष्क में गोली फंसी हो तो दो महीने में ही गोली का जहर मस्तिष्क में किसी दिन फैलेगा और तब तक अगले चौबीस घंटों में किसी भी वक्त मैं मर जाऊंगा।" बेदी के स्वर में किसी तरह की आशा की झलक नहीं थी--- "यही नौ दिनों की गिनती करनी बाकी है अब।"
"मैं तो अब तेरे को तसल्ली भी नहीं दे सकता।" उदयवीर ने भारी स्वर में कहा।
बेदी कुछ नहीं बोला।
"विजय। अब तो तू मेरी एक बात मान ले।" उदयवीर बोला।
"क्या ?"
"दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले। सब ठीक रहेगा।"
बेदी ने आंखें बंद कर ली।
"विजय।"
"चुप रह उदय। मुझे आराम करने दे।"
■■■
आठ दिन
"मेरी बात मान जा विजय। दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले।"
■■■
सात दिन
"वक्त नहीं बचा विजय। दूसरे डॉक्टर से ऑपरेशन करा ले। भगवान सब ठीक करेगा। मेरा विश्वास है कि तेरा ऑपरेशन सफल रहेगा। तू बच जाएगा।" उदयवीर समझाने वाले स्वर में कह उठा--- "वधावन से ऑपरेशन कराने के लिए हमारे पास पैसा नहीं है। सब कुछ तेरे सामने तो है।"
बेदी ने उदयवीर के गम्भीर चेहरे को देखा।
"और डॉक्टर कौन-सा है ?" बेदी ने गहरी सांस ली। इस वक्त वो दुनिया का सबसे थका इन्सान लग रहा था।
उदयवीर का चेहरा खुशी से भर उठा।
"तू फिक्र मत कर विजय । मैं अभी जाकर सब मालूम करता हूं। काबिल से काबिल डॉक्टर से ऑपरेशन कराऊंगा तेरा । छः लाख रुपया है हमारे पास। किसी चीज की कमी नहीं होगी, तू ठीक हो जाएगा। मैं अभी जाकर काबिल डॉक्टर के बारे में करता हूं।"
बेदी के चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान फैल गई।
"हौसला रख विजय।" उदयवीर उठते हुए बोला।
"हौसला है। तभी तो बाकी के सात दिन बीतने का इन्तजार कर रहा हूं।" बेदी बड़बड़ा उठा।
शाम को चार बजे उदयवीर लौटा। खुश था वो।
"विजय। सब ठीक हो जाएगा। मैंने बहुत बड़े सरकारी डॉक्टर से बात की है। दिमागी डॉक्टर है वो। माना हुआ सर्जन है। मैंने तसल्ली से उसके बारे में मालूम किया है। बहुत काबिल डॉक्टर है।"
बेदी गहरी सांस लेकर रह गया।
"मैंने उसे बोला, सब ठीक तरह से होना चाहिए। उसके और मेरे में ये बात तय हुई है कि अगर वो ऑपरेशन ठीक करता है। तुम ठीक हो जाते हो तो, मैं उसे चार लाख दूंगा। पहले एक पैसा भी नहीं। वो बिना एतराज के मेरी बात मान गया।" उदयवीर वास्तव में बहुत खुश था--- "सब ठीक हो जाएगा विजय। चिन्ता करने की जरूरत नहीं। चार लाख पाने की खातिर, वो ठीक ऑपरेशन करेगा और दिमाग में फंसी गोली को सावधानी से निकालेगा कि जहर न फैल सके।"
बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी।
"मैंने सब बात कर ली है। तू भला-चंगा हो जाएगा विजय।"
बेदी कुछ कहना चाहकर भी, कह न पाया।
"मालूम है ऑपरेशन कब है ?"
"कब ?" बेदी के होंठों से निकला।
"परसों। सिर्फ कल का दिन बीच में है। परसों तू ठीक हो जाएगा विजय। कल तेरे को मेरे साथ डॉक्टर के पास चलना होगा। वो तेरा चैकअप करेगा। कल की रात तूने हस्पताल में बितानी हो तो, वहां बिता लेना। नहीं तो यहां नींद लेकर सुबह हस्पताल पहुंच जाएंगे। मैंने सब बात कर ली है।"
बेदी, उदयवीर को देखता रहा। कुछ कह नहीं सका।
■■■
छः दिन
उदयवीर, अगले दिन सुबह बेदी को लेकर हस्पताल में डॉक्टर के पास पहुंचा और दोपहर बाद तक, ऑपरेशन के लिए बेदी के टैस्ट होते रहे।
शाम को सात बजे गैराज पर ।
उदयवीर प्रसन्न नजर आ रहा था। जबकि बेदी गम्भीर सा, चुप था।
"क्या हुआ विजय ?" उदयवीर ने टोका।
"कुछ नहीं।"
"अब तो तेरे को खुश होना चाहिए कि कल तेरा ऑपरेशन हो जाएगा और...।"
"वधावन ऑपरेशन कर रहा होता तो, मेरा मन अवश्य हल्का होता।" बेदी ने कहा ।
"इस डॉक्टर पर भी विश्वास कर। सीनियर सर्जन है। हर कोई कहता है, अच्छा डॉक्टर है। अपनी तसल्ली करने के बाद ही, तेरे ऑपरेशन के लिए उस डॉक्टर को चुना है।" उदयवीर ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
कुछ पल चुप रहकर बेदी ने उदयवीर को देखा।
"शुक्रा के बारे में कुछ पता किया? उसकी कोई खबर ?"
उदयवीर की आंखों में परेशानी सी उभरी।
"वक्त नहीं मिला। कल तेरा ऑपरेशन है। परसों मालूम करूंगा उसके बारे में कि वो कैसे हाल में है।"
"उससे मिलकर पूछना कि उसे किसी चीज की जरूरत तो नहीं।" बेदी ने दुखी स्वर में कहा।
उदयवीर सिर हिलाकर रह गया।
"तेरे को विश्वास है कि मेरा ऑपरेशन ठीक होगा? मैं बच जाऊंगा।" बेदी की आवाज में फीकापन था।
"अपने यार पर भरोसा है तो यार की बात पर भी भरोसा रख। तेरे को कुछ नहीं होगा। वो बहुत बढ़िया डॉक्टर है। मेरा दिल कहता है कि तेरे वही, पहले वाले दिन। उससे भी बढ़िया दिन लौट आएंगे।"
■■■
पांच दिन
"आज अपने यार का ऑपरेशन है।" उदयवीर हंसकर कह उठा--- "वधावन को तूने खामखाह ही सिर पर चढ़ा रखा है कि वो ही ऑपरेशन करेगा तो ठीक रहेगा। यूं ही इस वहम को पाल लिया।"
"ये वहम नहीं है।" बेदी ने गहरी सांस ली--- "मैं वधावन से ही ऑपरेशन कराना चाहता हूं। लेकिन उसकी फीस का इन्तजाम नहीं हो सका। इस डॉक्टर से ऑपरेशन कराना मेरी मजबूरी है। पांच दिन का वक्त बचा है दो महीने पूरे होने में। वधावन ने कहा था कि इस तरह दिमाग में गोली फंसी हो तो, ज्यादा से ज्यादा दो महीने तक ही गोली अपनी जगह ठहरेगी। इस दौरान कभी गोली अपनी जगह से हिलेगी और उसका जहर फैल जाएगा फिर...।"
"आज सब ठीक हो जाएगा।"
बेदी और उदयवीर तैयार हो रहे थे। सुबह के छः बजे थे। आठ बजे तक दोनों ने डॉक्टर के पास हस्पताल पहुंचना था। डॉक्टर ने कहा था कि वो नौ बजे ऑपरेशन शुरू करेगा।
"शुक्रा। पास होता तो मुझे हौसला रहता कि तुम दोनों मेरे पास हो।" बेदी ने कहा।
"हां।" उदयवीर ने भारी मन से कहा--- "लेकिन वो तो रुपया छीनने के जुर्म में पकड़ा जा चुका है और मैं उसका हाल भी पूछने नहीं जा सका। वक्त ही नहीं मिला।" उदयवीर ने अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ते हुए अफसोस भरे स्वर में कह उठा।
"आज जाना। ऑपरेशन के बाद, सब ठीक रहा तो उसके पास हो आना।"
करीब सात बजे दोनों एम्बैसेडर कार पर वहां से हस्पताल लिए चल पड़े।
"रोकना।" बेदी ने कहा--- "सिगरेट ले आऊं।"
उदयवीर ने फौरन सड़क के किनारे एम्बैसेडर को रोका। बेदी कार से निकला और सड़क पार करते हुए, सामने नजर आ रही पान की दुकान की तरफ बढ़ गया। उदयवीर ने कार स्टार्ट ही रखी थी। बेदी के ऑपरेशन के लिए 'हां' करते ही, उदयवीर को लगा, जैसे जिन्दगी की सारी परेशानियों से मुक्ति मिल गई हो। और उसे पूरा विश्वास था कि आज ऑपरेशन के बाद विजय, बिल्कुल ठीक हो जाएगा। उसने बेदी को देखा। वो पैकिट लेकर वापस आ रहा था।
तभी उदयवीर की आंखें फैल गई।
एक कार बेदी के सिर पर आ पहुचीं थी। उसे कोई औरत चला रही थी। कार के आगे-पीछे 'एल' लगा हुआ था कि, वो कार चलाना सीख रही है। उदयवीर की निगाह कार चला रही औरत के चेहरे पर थी, उस चेहरे पर घबराहट नाच रही थी कि जिससे ये स्पष्ट था कि सड़क पार करते बेदी को सामने पाकर, वो बौखला गई है कि कार को फौरन कैसे रोके ?
उदयवीर ने चीख कर बेदी को सावधान करना चाहा।
परन्तु मुंह से आवाज न निकली।
देखते ही देखते वो कार बेदी से टकराई। बेदी का शरीर हवा में उछला और दूर जा गिरा। कार बेकाबू होकर आगे को भागती चली गई। और देखते ही देखते सड़क के बीचो-बीच बने फुटपाथ से जा टकराई।
उदयवीर घबराकर जल्दी से बाहर निकला।
"विजय।" वो सड़क पार करता हुआ, चीखता हुआ बेदी की तरफ दौड़ा।
लोग भी इकट्ठे होने लगे। हालांकि सुबह के वक्त सड़क पर खास भीड़ नहीं थी।
पास पहुंचते ही उदयवीर का चेहरा फक्क सा हो गया।
बेदी बेहोश हुआ पड़ा था। चेहरा खून से भर चुका था। सिर से भी खून बह रहा था। टांगों पर भी चोट के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे।
"इसे कार में डालो।" उदयवीर वहां मौजूद लोगों से चीखकर बोला--- “इसे फौरन डॉक्टर की जरूरत है।"
■■■
उदयवीर, बेदी को उसी हस्पताल में ले गया, जहां उसका ऑपरेशन होना था। इमरजेंसी में मौजूद दोनों डॉक्टरों ने उसे देखा। घाव वगैरह साफ करके बैंडीज दी। इंजेक्शन लगाए। और वहीं उसे बैड पर लिटा दिया। कुछ देर बाद बेदी को होश आया। हालत ज्यादा ठीक नहीं थी। सड़क पर पड़े पत्थर ने सिर में कुछ घाव बना दिया था। कठिनता से खून बहना बंद हुआ था। वैसे डॉक्टर ने कहा था कि खतरे वाली कोई बात नहीं है। शाम तक रहने के बाद, वे घर जा सकते हैं।
"उदय।" बेदी के स्वर में पीड़ा थी--- "अब ऑपरेशन नहीं होगा।"
"मैं... मैं डॉक्टर से बात करके आता हूं।" परेशान सा उदयवीर वहां से चला गया।
एक घंटे बाद वापस आया। चेहरे पर परेशानी और भी बढ़ी हुई थी। हाथों की मुट्ठियां बार-बार खुल-बंद हो रही थीं।
"नहीं होगा ऑपरेशन ?" उसके चेहरे के भाव देखकर, बेदी कह उठा।
"ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर ने उस डॉक्टर से बात की है, जिसने तुम्हारे सिर पर बैंडीज की थी।" उदयवीर धीमे स्वर में कह उठा--- "उसका कहना है कि अगर सिर में चोट न लगी होती, तो वो ऑपरेशन कर देता बेशक टांग की हड्डी ही क्यों न टूटी होती। सिर में चोट लगी होने के कारण, ऑपरेशन नहीं किया जा सकता। जब चोट ठीक हो जाए, अब तब ही ऑपरेशन होगा।"
"तब।" बेदी ने आंखें बंद कर ली--- "तब मैं जिन्दा ही कहां रहूंगा। मैं तो... मैं तो जा चुका होऊंगा।"
उदयवीर के पास शब्द नहीं थे कुछ कहने को।
"विजय।" कुछ देर बाद उदयवीर ने कहा--- "शाम को, यहां से चलेंगे।"
"चल, न चल। कहीं भी ले चल। अब बचा ही क्या है।" बेदी हारे स्वर में कह उठा।
■■■
चार दिन
बीती रात बेदी सोया न सोया वाली हालत में रहा।
सुबह उठा तो आंखें भारी थीं। उदयवीर नहाया-धोया तैयार बैठा था। परन्तु चेहरे पर उखड़ेपन और मजबूरी के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। वो समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे वक्त में बेदी के लिए क्या कर सकता है।
दोनों की निगाहें मिलीं।
बेदी के चेहरे पर हारी हुई मुस्कान फैल गई।
"मैं...।" उदयवीर उठते हुए बोला--- "घर से नाश्ता लेकर आता हूं। तू नहा-धो ले।" कहकर वो बाहर निकल गया।
"चला गया बहाना बनाकर।" बेदी बड़बड़ा उठा--- "तसल्ली देने के लिए शब्द भी तो नहीं बचे।"
■■■
तीन दिन
दोपहर का वक्त।
"उदय।" बेदी की आंखें वीरान सी लग रही थीं।
"हां।"
"शुक्रा मेरे पास नहीं है।" बेदी के स्वर में तड़प थी।
उदयवीर खामोश रहा।
"मालूम तो कर। अपना यार किस हालत में है।"
उदयवीर ने बेदी को देखा और बिना कुछ कहे बाहर निकल गया।
तीन घंटे बाद उदयवीर लौटा।
"शुक्रा ने बिना किसी आनाकानी के अपना जुर्म मान लिया है।" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में कहा--- "उसे जेल भेज दिया गया है और अदालत में उसका केस लग चुका है। पुलिस को विश्वास है कि चार दिन बाद की पेशी में ही शुक्रा को सजा सुना दी जाएगी।"
बेदी दुखी सा उदयवीर को देखता रहा।
"मिलने नहीं गया शुक्रा से ?" कुछ देर बाद बेदी ने पूछा।
"नहीं। मन नहीं किया।" कहने के साथ ही उदयवीर ने आंखें बंद कर लीं।
कुछ पल वहां खामोशी रही।
"दो दिन की बात है। मैं मर जाऊंगा उदय।" एकाएक बेदी की आंखों में आंसू चमक उठे।
उदयवीर ने होंठ भींच लिए।
■■■
दो दिन
अगले दिन सुबह बेदी उठा तो वो चुप-चुप सा था। कोई बात नहीं की उसने। उदयवीर के कुछ कहने पर भी वो, न के बराबर ही बात कर रहा था।
इसी तरह चुप्पी व्याकुलता और परेशानी में दिन बीत गया।
■■■
एक दिन
डॉक्टर वधावन के बताए दो महीनों में से आज का दिन आखिरी था। उसके हिसाब से दिमाग में फंसी गोली को, ज्यादा से ज्यादा आज तक अपनी जगह से हिल जाना चाहिए, जिससे कि गोली का जहर मस्तिष्क में फैलेगा और उसकी मौत हो जाएगी। सिर पर कल वाली बैंडीज हुई पड़ी थी। उदयवीर, रात भर नींद नहीं ले पाया था।
लेकिन जाने कैसे रात भर बेदी गहरी नींद सोया। वो सुबह उठा। उदयवीर को देख कर, परेशानी भरी मुस्कान होंठों पर ले आया फिर शेव की। नहाया। कपड़े बदले।
उदयवीर तड़प भरी निगाहों से बेदी को देखता रहा। रह-रहकर उसकी आंखें गीली हो रही थी। परन्तु कुछ कह पाने की हिम्मत इकट्ठी नहीं कर पा रहा था। कहता भी क्या ?
"उदय। नाश्ता ले आ।" बेदी की आवाज में खोखलापन था।
आंसू रोकते हुए, उदयवीर बाहर निकल गया।
एक घंटे बाद उदयवीर नाश्ता लेकर वापस आया।
"आ। मेरे साथ नाश्ता कर ले।"
उदयवीर आंसू भरी आंखों से बेदी को देखता रहा।
"आज आखिरी बार अपने यार के साथ नाश्ता नहीं करेगा।" बेदी के चेहरे पर झूठी मुस्कान फैल गई।
उदयवीर फफक पड़ा।
बेदी खामोशी से उसे देखता रहा। कुछ देर बाद हाथ-मुंह धोकर उदयवीर ने बेदी के साथ नाश्ता किया। इस दौरान उनके बीच कोई बात नहीं हुई।
उसके बाद बेदी ने केबिन के एक तरफ के फर्श को अच्छी तरह साफ किया। इस सारे काम से फारिग होकर उसने कुर्सी पर बैठे उदयवीर को देखा।
"उदय।" बेदी का स्वर बेहद शांत था।
उदयवीर उसे देखता रहा। हिम्मत नहीं हुई होंठ हिलाने की।
"जो छः लाख हैं न तेरे पास। मेरे किसी काम का नहीं है अब । तू अपना गैराज ठीक कर लेना। काम को कुछ बढ़ा लेना। बाकी का पैसा शुक्रा को दे देना, वो कुछ काम कर लेगा।"
उदयवीर फफक पड़ा।
"रो मत। मैंने अपनी मौत को स्वीकार कर लिया है। जिस चीज को रोकना अपने बस में न हो तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। तेरे को भी ये बात स्वीकार कर लेनी चाहिए। हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी कि सब ठीक हो जाए। मेरा ऑपरेशन हो जाए और मैं बच जाऊं। लेकिन वही होता है जो होना है। जिस पर हम जैसे इन्सानों का जोर नहीं चलता।"
उदयवीर ने रुलाई रोकी और गीली आंखों से बेदी को देखने लगा।
बेदी संयत था। गम्भीर था। दुःख का कोई भाव उसके चेहरे पर नहीं था। शायद इसलिए कि वो जीवन-मृत्यु के सत्य का एहसास पा चुका था।
"जीवन का ये नियम है कि मिलने वाले बिछड़ते हैं। इस दुनिया में जन्म लेकर आना और मृत्यु प्राप्त करके चले जाना, उस शक्ति का ही नियम है उदय, जिसने इस दुनिया को संभाल रखा है। हम चाहकर भी उसके नियम को नहीं तोड़ सकते, क्योंकि वो सर्वशक्तिमान है। लेकिन ये भी सत्य है कि मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात, शीघ्र ही वो आत्मा पुनः इन्सान के रूप में ही जन्म लेती है। मैं भी दोबारा जन्म लूंगा। कहां, ये मैं नहीं जानता।"
उदयवीर देखे जा रहा था बेदी को।
बेदी बहुत शांत नजर आ रहा था। वो अपनी जगह से हिला और साफ कर रखे फर्श पर लेट गया। उदयवीर फौरन उसके पास पहुंचा।
"ये क्या कर रहा है विजय ?"
"अपनी मौत का इन्तजार।" बेदी ने मुस्कराकर कहा--- "बहुत डरता था मैं मरने से। अपने मरने की सोचकर मैं घबरा जाता था। लेकिन आज मुझे जरा भी डर या दुःख नहीं है। शायद इसलिए कि मैं मौत की सच्चाई को स्वीकार कर चुका हूं। मौत से कोई नहीं बच सकता। जब उसने आना है तो, आना ही है। उससे बचा नहीं जा सकता। फिर भागने से क्या फायदा।"
"तू मुझे और शुक्रा को छोड़कर जा रहा है।" उदयवीर अपनी रुलाई रोक रहा था।
"सबको ही जाना है। कोई पहले जाता है तो कोई बाद में।" कहकर बेदी ने आंखें बंद कर लीं।
सारा दिन उदयवीर परेशान रहा। कभी केबिन में आता तो कभी बाहर जाता। गैराज पर आज काम नहीं हो रहा था। छोकरों को उसने छुट्टी दे दी थी।
पूरा दिन बीत गया।
शाम को उदयवीर ने बेदी को पुकारा। जवाब में बेदी ने आंखें खोली और पुनः बंद कर ली। वो रात उदयवीर की बहुत परेशान हाल में बीती। आंखों में नींद होते हुए भी, नींद में डूबने का मन नहीं था। जब भी नींद आने लगती। तो उठकर वो चहलकदमी करने लगता। सुबह के तीन बजे कुर्सी पर बैठे-बैठे आंख लग गई। सुबह छः बजे के करीब उसकी आंख खुली तो वो हड़बड़ा कर उठ गया। जल्दी से नीचे लेटे बेदी के पास पहुंचा।
"विजय।" उदयवीर ने पुकारा।
बेदी के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई।
उदयवीर का दिल जोरों से धड़का। सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"विजय।" आवाज में हल्का सा कम्पन था। वो नीचे बैठता चला गया।
बेदी का शरीर वैसे ही निश्चल पड़ा रहा।
"विजय।" उदयवीर की आवाज जोरों से कांपी और रोते हुए वो बेदी पर झुक गया--- "ये क्या हो गया विजय। तू चला गया। हमें छोड़ गया। अपने यार को...।"
तभी उदयवीर को लगा। बेदी के शरीर में हरकत हुई है जैसे। फौरन पीछे हटकर बेदी को देखा उसने। बेदी आंखें खोले उसे देख रहा था।
"विजय। तू... तू जिन्दा है।" उदयवीर के होंठों से कंपकंपाता स्वर निकला।
"हां। आंख लग गई थी मेरी।" शांत भाव में कहते हुए बेदी उठ बैठा।
"तू...तू बच गया विजय। देख--छत्तीस दिन बीत गए। तेरे को कुछ भी नहीं हुआ। कुछ भी तो नहीं हुआ तेरे को। मेरा यार जिन्दा है।" उदयवीर का स्वर खुशी से कंपकंपा रहा था। आंखों में आंसू थे ।
"मौत से कोई बच सका है क्या ? आज नहीं तो कल आनी ही है। डॉक्टर वधावन के बताए वक्त में एक-दो दिन ऊपर-नीचे हो सकते हैं।" बेदी का स्वर शांत था।
उदयवीर देखता रहा बेदी को।
"विजय।" उदयवीर के स्वर में दृढ़ता आने लगी--- "यकीन मान मेरे यार। मेरा दिल कहता है तेरे को कुछ नहीं होगा। गोली का जहर नहीं फैलेगा। तू बच जाएगा। बेशक दो-चार दिन और देख ले।"
"जा उदय। खाने को कुछ ले आ। तब तक मैं नहा-धो लेता हूं।" बेदी का स्वर शांत था।
दो दिन बीत गए।
उसके बाद दो दिन और बीत गए।
बेदी को कुछ नहीं हुआ। वधावन के बताए दो महीनों से चार दिन ऊपर हो गए तो बेदी की सोचों में बदलाव आने लगा। काफी हद तक वो सामान्य हो चुका था।
"उदय।" बेदी ने मुस्कराकर उदयवीर को देखा।
"हां।"
"लगता है भगवान ने शायद मुझे मौका दिया है कि खुद को बचा लूं। मुझे मौत नहीं दी।"
"हां विजय। तू बच गया है। तेरे को...।"
"मैं बचा नहीं हूं मुझे मौका मिला है।" बेदी ने बात काटकर कहा--- "बारह लाख इकट्ठे करके डॉक्टर वधावन से ऑपरेशन कराने का मौका। छः लाख हमारे पास है। बाकी के छः लाख का इन्तजाम करना होगा। ताकि सिर पर नाचती मौत से छुटकारा पा सकूं। मेरे दिमाग में फंसी गोली कभी भी अपना जहर फैलाकर मेरी जान ले सकती है। इससे पहले कि गोली का जहर मस्तिष्क में फैले। बारह लाख इकट्ठे करके, ऑपरेशन कराने के लिए मुझे वधावन के पास पहुंच जाना होगा। ये काम मुझे जल्दी से जल्दी करना है।"
"लेकिन छः लाख का इन्तजाम होगा कैसे ? तुम...।"
"कहीं से तो करना ही होगा। भगवान ने मुझे मौका दिया हैं तो वो मेरी सहायता भी करेगा। तू अपना गैराज देख। मैं करूंगा बाकी के छः लाख का इन्तजाम ।"
उदयवीर, बेदी को देखता रहा।
"मैं अपनी मौत को स्वीकार कर चुका हूं कि वो कभी भी आ सकती है। ऐसे में अब मैं सामान्य जीवन बिताऊंगा। पहले की तरह ही और इन्तजाम करूंगा छः लाख का।" बेदी के चेहरे पर मुस्कान और आवाज में दृढ़ता थी।
"मैं भी तेरे साथ हूं विजय।" उदयवीर के चेहरे पर खुशी थी।
"शुक्रा के बारे में मालूम कर वो किस हाल में है।" बेदी ने कहा।
"ठीक है। अपने सिर का जख्म डॉक्टर को दिखा। बैंडीज भी दोबारा नहीं कराई।" उदयवीर बोला।
"तू शक्रा के बारे में मालूम कर। मैं डॉक्टर से बैंडीज बदलवा आता हूँ।" बेदी ने मुस्कराकर उसे देखा।
"ठीक है।"
"उसके बाद मैं छः लाख का इन्तजाम करने के लिए यहां से निकलूंगा।"
उदयवीर दो घंटे बाद जब गैराज पर पहुंचा तो बेदी बैंडिज करवाकर वापस आ चुका था। चेहरे पर सामान्य भाव थे।
"शुक्रा का पता लगा ?" बेदी उसे देखते ही बोला।
"वो जेल में है। कल ही उसे एक साल की सजा हुई है।" उदयवीर के चेहरे पर दुःख था। हाव-भाव में बेचैनी भरी हुई थी।
"ओह।" बेदी के चेहरे पर अफसोस के भाव आ गए।
"मैं शुक्रा से मिलने जेल जाऊंगा। तुम चलो तो...।"
"नहीं। अभी नहीं।" बेदी ने गम्भीर भाव में कहते हुए सिगरेट सुलगा ली--- "अभी मैंने कहीं से छः लाख का इन्तज़ाम करना है। बीच में वक्त मिला तो शुक्रा के पास जाऊंगा।"
"अब कहां जाने की तैयारी में हो ?" उदयवीर के होंठो से निकला।
"मैं नहीं जानता। छः लाख कहीं से हासिल करना है। मालूम नहीं कहां से छः लाख मिलेगा।"
"लेकिन तुम्हारा अकेले जाना ठीक नहीं। दिमाग में फंसी गोली का जहर कभी भी फैल...।"
"अब मैं मौत का डर पीछे छोड़ चुका हूं। जो होगा, वो होना ही है। मैंने सिर्फ अपने कर्म करने हैं। छः लाख का इन्तजाम करके, बारह लाख पूरे करके, ऑपरेशन करवा कर, दिमाग में फंसी गोली को निकलवाना है। अगर इस बीच, गोली का जहर फैलने से मेरी जान चली जाती है तो कोई गम नहीं। क्योंकि, मेरे पास बचने का कोई रास्ता नहीं है।" बेदी मुस्कराया।
उदयवीर कुछ न कह सका।
"छः लाख संभाल कर रखना। बाकी का छः लाख लेकर मैं जल्दी ही आऊंगा।" बेदी ने मुस्करा कर कहते हुए आगे बढ़कर उदयवीर का कंधा थपथपाया फिर गैराज से बाहर आ गया।
बाकी के छः लाख का इन्तजाम करने के लिए।
और उस छः लाख का इन्तजाम जाने किन हालातों में होना था।
इस बात से बेदी बेखबर था।
■■■
0 Comments