“शुक्रिया।” मीणा मुस्करा कर बोला- “तुम दौलत लेकर नहीं भागे। ईमानदार हो तुम।”

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।

“तुम जैसे ईमानदार, जुबान के धनी मिलते ही कहाँ हैं...।” मीणा ने पुनः कहा- “मैं किसी को कहूँ कि डकैती मास्टर देवराज चौहान पर आँखें मूंद कर विश्वास कर लो तो वो मेरी बात पर हंसेगा। लेकिन मैंने तुम पर डेढ़ सौ करोड़ की दौलत का भरोसा किया और तुम खरे उतरे। मैं तुम्हें हमेशा याद रखूंगा।”

देवराज चौहान पजेरो चलाता रहा।

“मैं तुम्हें पाँच-दस करोड़ दूंगा देवराज चौहान। मैं...।”

“मैं भीख नहीं लेता। किसी से पैसा छीनता नहीं। डकैतियां अवश्य करता हूँ।”

“तो मुझसे पैसा नहीं लोगे?”

“नहीं...”

“मैं प्यार से दूं तो तब भी नहीं...?”

“नहीं। मैं तुम्हारे साथ इसलिये हूँ कि मुझे तुमसे सहानुभूति है।” देवराज चौहान ने कहा।

“ऐसा इन्सान मुझे पहले कभी नहीं मिला.......।”

“हम मुम्बई-हाइवे पर हैं। अब कहाँ जाना है? वो कॉटेज किधर है?”

“आगे चलते रहो। पाँच-सात मिनट बाद हमें हाईवे छोड़ कर, भीतर कच्चे में मुड़ना पड़ेगा।”

देवराज चौहान पजेरो चलाता रहा। सामने से आते वाहनों की रोशनी रह-रह कर आँखों में पड़ रही थी।

“तुम्हारे साथ कभी धोखा हुआ है देवराज चौहान?”

“मेरे धंधे में धोखेबाजी हो जाना मामूली बात है।”

“मतलब कि तुम्हारे साथ धोखा कई बार हुआ है और क्या तुमने किसी को धोखा दिया है?”

“अपने होशोहवास में नहीं...।”

“मैं जानता हूँ कि तुम सच कह रहे हो।” मीणा सिर हिलाकर कह उठा।

तभी मीणा का मोबाईल बज उठा।

“दूबे होगा।” मीणा ने फोन निकाल कर बात की- “बोल...।”

“गुरू, मैं मुसीबत में पड़ गया हूँ।” दूबे का हड़बड़ाया स्वर कानों में पड़ा।

“क्या हो गया?” मीणा के होठों से निकला।

“मैंने जिन लोगों को पैसे लेकर तैयार कर रखा था कि वो पुलिस पर खामखाह का हमला करेंगे और कुछ देर के लिए उनका ध्यान बैंक से हटा देंगे-वो लोग इस वक्त बैंक के बाहर हैं और हमला करने को मना कर रहे हैं।”

“क्यों?”

“वो कहते हैं पुलिस बहुत ज्यादा है बैंक के बाहर। वे पकड़े जायेंगे।”

“तू उनके पैसे बढ़ा दे। कह, बाहर आकर मैं तुमको और पैसे दूंगा।” मीणा ने कहा।

“बोला है मैंने, परन्तु वो इतनी ज्यादा पुलिस पर हमला करने को तैयार नहीं...।”

“उन्हें तैयार कर किसी तरह।”

“मैंने बीस से ज्यादा बार उन्हें फोन करके तैयार करने की कोशिश की है। हर तरह का लालच दिया है।”

“तो नहीं मान रहे वो...।”

“नहीं। वो लिए पैसों का दस परसेंट काट कर, बाकी वापस देने को तैयार हैं।”

“उनको बोल मेरी लाश के ऊपर डाल देना लिया पैसा।”

मीणा ने गुस्से से कहा

“क्या करूँ अब मैं?”

“तू उन्हें फिर तैयार करने की कोशिश कर...।”

“कोई फायदा नहीं। कोशिश करके मैं हार गया हूँ।” दूबे का बेचैन स्वर, मीणा के कानों में पड़ा।

“मेरे को नम्बर बता उन हरामियों का।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा।

उधर से दूबे ने एक नम्बर उसे बताया।

मीणा ने फोन काट कर वो वाला नम्बर मिलाया और फोन कान से लगा लिया।

देवराज चौहान शांत सा गाड़ी चला रहा था।

“हैलो...।” मीणा के कानों में आवाज पड़ी।

“तुम पुलिस वालों पर हमला क्यों नहीं कर रहे?” मीणा कह उठा।

“कौन हो तुम?”

“बैंक के भीतर जो दूबे फंसा हुआ है, मैं उसी का साथी हूँ। कुछ देर पहले बैंक से बाहर आ गया था। मुझे दूबे ने बताया कि तुम जुबान से पीछे हट रहे हो। ये तो अच्छी बात नहीं है।” मीणा ने कहा।

“दूबे ने हमें पहले नहीं बताया था कि पुलिस पर हमला करना...।”

“तो क्या फर्क पड़ता है इस बात से? सच्चा हमला थोड़े ना करना है। दो-चार मिनट पुलिस वालों को उलझा के रखना, फिर भाग जाना। इतने में ही दूबे बैंक से निकल लेगा।”

“यहाँ बहुत पुलिस वाले हैं। वो हमें पकड़ लेंगे।”

“तेरे को पता है कि मैं भी पुलिस वाला हूँ?”

“क्या?”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ और पुलिस वालों को बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। ये वर्दी का रौब तो बहुत दिखाते है, परन्तु हकीकत में डरपोक होते हैं। तुम शुरू हो जाओ। तब देखना पोजिशन लेने के बहाने वो छिप जायेंगे।”

“मैं ये काम नहीं कर सकता। खतरा है। मेरे साथी भी मना कर रहे हैं।”

“तेरे को दूबे ने इस काम के कितने दिए?”

“25... “

“पैसे की परवाह मत कर। हमने बैंक लूटा है। करोड़ों की दौलत है हमारे पास। मैं तेरे को पैसे से भर दूंगा। तू पुलिस वालों पर यूँ ही हमला कर और उनमें हड़बड़ी पैदा कर दे...कि दूबे वहाँ से निकल सके। तेरे को दस लाख और दूंगा।”

“बेशक बीस लाख दो। हम ये काम करने को तैयार नहीं।” उधर से कहा गया।

“तू दस के, बीस और लेना। ये काम कर।”

“नहीं। हम फंसना नहीं चाहते...।” उधर से कहने के साथ ही फोन बंद कर दिया गया।

मीणा ने गहरी सांस लेकर फोन वाला हाथ नीचे किया और बड़बड़ा उठा-

“उससे कहो कि किसी को बंधक बनाकर वहाँ से निकल जाये...।” देवराज चौहान बोला।

“ओह! ये भी रास्ता है... । मैं तो भूल ही गया था।” मीणा ने कहा और नम्बर मिलाने लगा।

फौरन ही दूबे से बात हो गई।

“वो किसी भी कीमत पर ये काम करने को तैयार नहीं...” मीणा ने कहा।

“मैंने तो पहले ही कहा था कि कोई फायदा...।”

“मेरी बात सुन दूबे, तू घबरा मत। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा, सब ठीक है।”

“क्या...क्या मतलब?”

“तू किसी को बंधक बना और पुलिस वालों से गाड़ी मंगा ले। इस तरह वहाँ से निकल आ...।”

“पुलिस वाले मुझे निकलने देंगे?”

“उनका बाप भी निकलने देगा। तेरे को जैसा कहा है वैसा कर। अपने मन में पूरा विश्वास रखना कि तू ये काम कर लेगा। तभी तू इसे कर पायेगा। समझ गया मेरी बात कि नहीं?”

“सम..झा। मेरा मन बहुत घबरा रहा है।”

“घबरा मत। हमारे पास दौलत है। शानदार जिन्दगी बीतेगी हमारी। किसे बंधक बनायेगा?”

“म...मैनेजर को...।”

“नहीं। उसे मत बना। वो जो हनीमून जाने की बात कर रही...”

“मिसेज देसाई...”

“हां, वो ही, उसे बंधक बना के ले चल। घबराना बिलकुल नहीं। समझ गया?”

“हाँ...” दूबे का असंयत स्वर कानों में पड़ा।

“सबसे पहले मैनेजर को बता कि तेरा क्या इरादा है। तू, किसी तरह वहाँ से निकलना चाहता है। वो कमिश्नर को सारी बात बता देगा। तेरे लिए कार भी बाहर आ जायेगी। जैसा तू चाहेगा, वो वैसा ही करेगा।”

“हाँ, मैं मैनेजर से बात करता...।”

“तू जरा मैनेजर को फोन दे, उसे मैं समझाता हूँ।” मीणा

“एक मिनट...”

जल्दी ही मीणा के कानों में मैनेजर की आवाज पड़ी।

“हैलो...”

“कैसा है मैनेजर?” मीणा मुस्कराया- “मुझे भूल तो नहीं गया?”

“याद है।” गुप्ता की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा, वो ही, जिसे बाहर खड़े पुलिस वाले मरा कह रहे हैं और मैं जिन्दा हूँ...”

“मैं तुम्हें कभी भी नहीं भूल सकता।”

“तेरे को पता है अब मेरे पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है मैं इतनी बड़ी दौलत का मालिक हूँ...।”

“मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए?’ गुप्ता का शांत स्वर कानों में पड़ा।

“सुन मैनेजर, तू कमिश्नर को बता कि मेरा साथी बैंक से निकलना चाहता है, वो किसी एक को बंधक बना कर अपने साथ ले जायेगा। उसके लिए फटाफट, बैंक के बाहर कार का इन्तजाम कर दे। कार में पेट्रोल फुल होना चाहिये। कमिश्नर को समझा दे कि कोई चालाकी की तो बंधक मरेगा और वो भी पाँच-सात को मार देगा। कह देना कि उसका पीछा नहीं किया जाये। बैंक के बाहर हमारे साथी मौजूद हैं, अगर कोई गड़बड़ की तो, बोत गड़बड़ हो जायेगी।”

“मैं अभी कमिश्नर से बात करता हूं...।”

“जैसा मैंने कहा है, वैसा ही कहना उसे। सख्ती के साथ।”

“ऐसा ही कहूँगा।”

मीणा ने फोन बंद किया और देवराज चौहान को देखकर बोला- “यहाँ पर मामला जरा सा गड़बड़ हो गया-नहीं तो सब ठीक चल रहा था।”

“ऐसे कामों में आसमानी मुसीबतें इसी तरह आती हैं।”

देवराज चौहान ने कहा।

“दूबे वहाँ से निकल तो आयेगा?” मीणा ने पूछा।

“मुझे नहीं लगता कि वो बच पायेगा।”

मीणा की निगाह देवराज चौहान पर जा टिकी।

“क्या मतलब?”

“पुलिस को इतना भी बेबस मत समझो। मेरे ख्याल में वो दूबे को किसी भी हाल में वहाँ से निकल जाने का मौका नहीं देगी बैंक से बाहर आते ही उसका बुरा वक्त शुरू हो जायेगा।” देवराज चौहान बोला

“दूबे के पास मिसेज देसाई बंधक होगी...।” मीणा ने परेशान स्वर में कहा।

“एक बंधक के दम पर वो ज्यादा देर नहीं बच सकेगा।”

“मैं उसे कह देता हूँ कि ज्यादा बंधकों को...।”

“तब भी कोई फायदा नहीं होगा। पुलिस उसे नहीं छोड़ेगी।”

“तुम्हारा मतलब कि दूबे किसी भी हाल में नहीं बचेगा?” मीणा के होंठ भिंच गये।

“किस्मत तेज हुई तो बच भी सकता है...।”

मीणा गहरी सांस लेकर रह गया। दूबे की उसे चिन्ता थी।

“रास्ते का ध्यान रखो।”

मीणा ने सामने, आस-पास देखा, फिर कह उठा- “रास्ता नहीं कहीं है। रफ्तार कम कर लो।”

देवराज चौहान ने ऐसा ही किया।

मीणा पहचानने वाली निगाहों से आस-पास देख रहा था।

“ये जगह, तुम्हें कैसे पता चली?” देवराज चौहान ने पूछा।

“साल भर पहले, उस कॉटेज पर कुछ लोगों को पकड़ा था, वहाँ ड्रग्स का काम करते थे। छ: महीने पहले मैं यहाँ से निकल रहा था कि यूँ ही उस जगह को देखने जा पहुँचा। तब वो खाली थी। कोई वहाँ नहीं रह रहा था।”

देवराज चौहान कम रफ्तार से पजेरो चलाता रहा।

कुछ देर बाद मीणा कह उठा- “बस, यहीं से, बाएं ले लो। पेड़ों से बचकर। थोड़ा आगे जाकर पेड़ खत्म हो जायेंगे।”

देवराज चौहान ने मीणा के कहे मुताबिक पजेरो को मोड़ लिया। अंधेरा था, परन्तु पजेरो की हैडलाईड से निकलती रोशनी दूर-दूर तक जा रही थी। ऐसे में पजेरो चलाने में देवराज चौहान को कोई दिक्कत नहीं आ रही थी।

“हम सही रास्ते पर चल रहे हैं। पेड़ों के बीच में से इसी तरह गाड़ी निकालते रहो, फिर पेड़ खत्म हो जायेंगे। खाली जगह आ जायेगी। कच्चा रास्ता, वहाँ से वो कॉटेज साफ दिखने लगेगी।”

मीणा की निगाह हर तरफ फिर रही थी।

“पीछे क्या है?” मीणा ने फौरन पीछे की तरफ देखा।

“है तो कुछ नहीं, परन्तु हमने अभी-अभी रास्ता बदला है, पीछे कोई होगा तो उसे देखने का यही मौका है।”

अब मीणा कभी आगे देखता तो कभी पीछे।

पेड़ों को पार कर गये वो।

“मेरे ख्याल में पीछे कोई नहीं है।” मीणा बोला।

“अच्छी बात है।’

पजेरो की हैडलाईट दूर-दूर तक जा रही थी।

उसी रोशनी में काफी आगे मकान जैसा कुछ बना दिखा।

“वो ही है कॉटेज...।” बोला मीणा- “हैडलाईट बंद कर लो। रोशनी देखकर किसी को भी शक हो जायेगा।”

देवराज चौहान ने हैडलाईट बंद कर ली। पजेरो धीरे-धीरे आगे बढ़ाता रहा।

“मुझे यकीन नहीं आ रहा कि एक सौ पचास करोड़ जैसी बड़ी रकम मेरे पास है।”

“अभी तो तुम अपने को जाने कितनी बार यकीन दिलाओगे कि तुम सफल हो चुके हो।” देवराज चौहान बोला।

“ऐसा होता है क्या?”

“नये खिलाड़ी को अवश्य ऐसा होता है।”

“नया खिलाड़ी?”

“तुमने पहली बार बैंक लूटा है ना! इस हिसाब से तुम नये खिलाड़ी ही हुए...।”

“मुझे दूबे की चिन्ता हो रही है।” मीणा एकाएक कह उठा। देवराज चौहान धीमी रफ्तार से पजेरो को आगे बढ़ाता रहा। चारों तरफ अंधेरा था। वो कॉटेज अब पास आ गई थी।

कॉटेज के आसपास कई जगह पेड़ थे। खुली जगह थी। हवा चल रही थी। मीणा खुश था यहाँ पहुँच कर।

“अब हम तक पुलिस नहीं पहुंच पायेगी।” मीणा बोला।

“जब तक तुम पूरी तरह सुरक्षित जगह पर नहीं पहुँच जाते, तब तक ये ही सोचो कि पुलिस तुम्हें पकड़ लेगी।”

“सुरक्षित जगह...?”

“हाँ। दौलत के साथ ऐसी जगह पर, कि जहाँ तुम सोच सको कि अब यहीं रहना है। वैसी सुरक्षित जगह...।”

“अब ऐसी किसी जगह का भी इन्तजाम करूँगा।”

“मैं अब जाऊँगा।”

“कहाँ?” मीणा के होंठों से निकला। नजरें अंधेरे में देवराज चौहान पर गई।

“अपने रास्ते। अब तुम्हें मेरी जरूरत नहीं है।”

“क्या कहते हो? तुम्हारी बहुत जरूरत है मुझे। मैं अकेला रह जाऊँगा। दूबे को आ लेने दो।”

“वो वहाँ से सुरक्षित निकल आया तो उसे यहाँ बुला लेना। अब मैं...”

तभी मोबाईल बज उठा, मीणा का।

“बोल...।” मीणा ने बात की।

“अभी तक तो सब ठीक है। मैं बैंक से निकल रहा हूँ। बाहर मेरे लिए सैंट्रो कार खड़ी है।”

“बंधक कितने लिए साथ में?”

“दो। मैनेजर और मिसेज देसाई। मैनेजर कार चलायेगा, देसाई उसके बगल में होगी। मैं रिवाल्वर लिए पीछे वाली सीट पर रहूँगा। ये ठीक रहेगा ना?” उधर से दूबे ने पूछा।

“हाँ, ये ठीक है।” मीणा ने सोच भरे स्वर में कहा।

“अब मैं बैंक से बाहर निकलने वाला हूँ...।”

“दूबे!’’ मीणा गम्भीर स्वर में बोला- “सावधान रहना, पुलिस कोई चालाकी भी कर सकती है।”

“तेरे को क्या लगता है कि चालाकी करेगी पुलिस?”

“पता नहीं, पर तेरे लिए मेरा दिल घबरा रहा है। सुन, जब तू बैंक से निकल आए और रास्ते में तू ठीक समझे तो कार को छोड़ कर खिसक जाना। अंधेरा हो चुका है। इस तरह पुलिस की नजरों से दूर हो जायेगा।”

“तू कहाँ है?”

“मैंने कोई सुरक्षित जगह ढूंढ ली है, जहाँ कुछ घंटे या एक डेढ़ दिन रहा जा सकता है। तू जब पुलिस से पीछा छुड़ा लेना तो मुझे फोन करना, तब तेरे को बताऊँगा कि मैं कहाँ पर हूँ...।”

“देवराज चौहान तेरे साथ ही है?”

“हाँ। तेरे आने तक उसे अपने पास ही रहूंगा। वैसे वो जाना चाहता है।”

“ठीक है, मैं बैंक से निकलता हूँ अब...।”

“सतर्क रहना...” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा और फोन बंद कर दिया

देवराज चौहान स्टेयरिंग सीट पर बैठा आस-पास नजरें दौड़ा रहा । पजेरो कॉटेज के पास पहुँच कर रुक चुकी थी। काटेज अंधेरे में काले पहाड़ की तरह लग रही थी।

“तो दूबे बैंक से बाहर निकलने जा रहा है।” देवराज चौहान ने कहा।

“हाँ...”

“ये वक्त उसके लिए मुसीबत से भरा होगा।” देवराज चौहान ने गभीर स्वर में कहा।

“तुम्हारे ख्याल से पुलिस उसे नहीं छोड़ेगी?” मीणा बे-सब्री से बोला।

“मैंने पहले ही कहा है कि अगर उसकी किस्मत तेज हुई तो बच जायेगा। नहीं तो पुलिस उसे पकड़ लेगी या मार देगी।”

कहने के साथ ही देवराज चौहान ने पजेरो का दरवाजा खोला और बाहर निकालने को हुआ।

“मेरे ख्याल में पहले खाना खा लें...।” मीणा कह उठा।

“मुझे भूख नहीं है।”

“लेकिन मैं खाना खा लेना ही ठीक समझता हूँ। किसी की मौत की खबर सुनने के बाद मैं खाना नहीं खा सकूँगा।”

“किसकी मौत की बात कह उठे?”

“दूबे की...।” मीणा ने कहा और खाने का लिफाफा उठा लिया।

“तुम सच में अजीब इन्सान हो। मैं कॉटेज पर नजर मार कर आता हूँ...।” देवराज चौहान ने दरवाजा बंद किया।

“हमें टार्च लानी चाहिये थी।” मीणा ऊँचे स्वर में बोला। देवराज चौहान कॉटेज की तरफ बढ़ चुका था।

मीणा खाना खाने लगा।

पानी की तीन बोतलें भी साथ लाया था। रात का काम तो चल ही सकता था।

खाना खाने के दौरान मीणा के दिमाग में दूबे ही आ रहा था।

मीणा दुआ कर रहा था कि दूबे बचकर निकल आये।

कॉटेज की तरफ से मीणा ने थोड़ी सी रोशनी चमकती देखी तो मीणा समझ गया कि देवराज चौहान माचिस की तीली जलाकर वो जगह देख रहा होगा। उसे अफसोस हुआ कि टार्च लानी क्यों भूल गया।

अभी आधा खाना नहीं खाया था मीणा ने कि एकाएक उसके शरीर को तीव्र झटका लगा। खाना हाथों से फिसल कर गाड़ी में नीचे जा गिरा। एक हाथ से उसने सख्ती से दिल थाम लिया।

“चल हट! तू बार-बार मुझे तंग कर रहा है।” मीणा गला फाड़ कर चीखा।

उसी पल मीणा को तीव्र झटका पुनः लगा, वो कार के दरवाजे से जा टकराया।

“चला जा कुत्ते तू...।”

तभी मीणा के होठों से दूसरी आवाज निकली

“तू कुत्ता है। तू हरामी है। तूने मेरा...।”

“ओह, आधी जगह तूने आखिर ले ही ली...।’’ मीणा तड़प कर कह उठा।

“तूने क्या सोचा था कि मेरे शरीर पर कब्जा करके, शरीर का मालिक बन जायेगा?” मीणा के होंठों से वो ही नई आवाज निकल रही थी- “मैं तब से ही कोशिश कर रहा हूँ कि अपनी जगह ले सकूँ...।”

“चला जा...मैं तेरे...”

“तू कौन होता है कहने वाला कि मैं चला जाऊँ? ये मेरा शरीर है। तू निकल यहाँ से...।” वो ही नई आवाज।

“नहीं।” मीणा दाँत पीस कर बोला- “मैं नहीं जाऊँगा, मैं...मुझे बहुत काम करने....”

“चला जा, ये शरीर मेरा है।” वो ही नई आवाज होंठों से निकली।

“कभी नहीं...।”

“मैं तुझे निकाल के रहूँगा। तेरे को जाना ही होगा।”

“मेरी मर्जी के बिना तू मुझे नहीं निकाल सकता। मैंने अच्छी पकड़ बना रखी है।” मीणा कठोर स्वर में बोला।

“मैं तेरी पकड़ ढीली कर दूंगा। तुझे...।”

“तू बेबस है। मैं तुझे हरा दूंगा।’

“अभी तो जीत मेरी हुई है। मैंने अपनी आधी जगह पा ली है, बाकी भी...”

“देख, पुलिस वाले से पंगा मत ले। बहुत भारी पड़ेगा ये पंगा, तू पछायेगा...” मीणा गुर्राया।

“पुलिस वालों को तो मैंने कभी भी पसन्द नहीं किया। तू मेरे शरीर से बाहर निकल।”

“ये शरीर अब मेरा है। मैं इसी में रहूँगा। इसी शरीर से दुनिया भोगूंगा। इसी शरीर में मरूँगा।”

“मैं तेरे को यहाँ से बाहर निकाल के ही दम लूंगा।”

“भूल है तेरी, मैं तेरे को बाहर निकाल दूंगा।” मीणा गुर्राया- “तू जाता है कि नहीं...।”

“तू क्या सोचता है कि तू पुलिस वाला है तो मैं तेरे से डर जाऊँगा? ये सब कुछ मेरा है। तेरा कुछ भी नहीं है। तू अपना शरीर खो चुका है। मर चुका है तू दुनियाँ के लिए, जब कि सुधीर दामले अभी जिन्दा है। कमीने, तूने मेरे शरीर का इस्तेमाल करके बैंक में डकैती की। तूने तारा को गालियाँ दीं। उसका दिल दुखाया। मैं सब सुनता रहा था...।’

“तू यहाँ से चला जा। किसी और शरीर को गृहण कर ले...।” मीणा ने दाँत भींच कर कहा।

“मैं ऐसा क्यों करूँ? ये मेरा शरीर है। तू इसे छोड़कर चला जा...”

“अब मैं तेरे शरीर को नहीं छोड़ सकता।”

“क्यों?”

“इससे मुझे प्यार हो गया है। ये ही अब मेरा है।” मीणा ने दाँत भींचकर कहा- “तू मुझे मेरा काम करने दे।”

“वाह, कहता तो ऐसे है कि जैसे मैं तेरी बात मान लूंगा! तेरा नौकर हूँ मैं...।”

“तू मुझसे हार जायेगा।”

“मैं हारने वाला नहीं। अपने शरीर से तुझे बाहर निकाल के ही रहूँगा। तेरी नहीं चलने दूंगा।” नई आवाज ने गुस्से से कहा।

“सुधीर दामले...।” मीणा की आवाज निकली होंठों से।

“कह-कह, तेरी ही सुन रहा हूँ...।” सुधीर दामले की आवाज निकली होंठों से।

“मेरे से जिद्द मत कर...”

“जिद्द मैं कर रहा हूँ या तू?” सुधीर दामले की भड़कने वाली आवाज निकली- “तू मेरे शरीर पर कब्जा किए बैठा है। मैं तेरे से प्यार से कहता हूँ कि तू मेरा शरीर छोड़कर चला जा। किसी और के शरीर में...”

“ये नहीं हो सकता...”

“क्यों?” सुधीर दामले का स्वर तीखा हो गया।

“मुझे तेरे शरीर से प्यार हो गया...।”

“बकवास मत कर।” सुधीर दामले का कठोर स्वर निकला होंठों से- “तू पहले ही मेरे शरीर का गलत इस्तेमाल कर चुका है। पुलिस अब मेरे शरीर के पीछे पड़ जायेगी। वो सब भी मुझे देखना पड़ेगा। तूने मेरे शरीर को माध्यम बनाकर बैंक डकैती जैसा काम किया। तूने मेरे शरीर को माध्यम बनाकर, अपने साथी सब-इंस्पेक्टर रंजीत का खून भी कर दिया। तूने मुझे बुरी तरह फंसा दिया। अब मैं तेरे को और कुछ नहीं करने दूंगा, तुम तो...।”

“तू मुझे रोक नहीं सकता...।”

“अब रोक सकता हूँ।” सुधीर दामले ने गुस्से से कहा- “क्योंकि अब मैंने अपने आधे शरीर पर कब्जा पा लिया है। आधे पर तेरा कब्जा है। अब तू अपनी मनमानी नहीं कर सकता। तू...।”

“दामले।” होंठों से मीणा का स्वर निकला- “मेरे पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है।”

“तेरे पास? अब तो मैं बीच में आ गया हूँ...।” दामले के स्वर के भाव कड़वे हो गये थे।

“आधी तू ले लेना।”

“तू मुझे भी अपनी तरह चोर समझता है?”

“बेवकूफ, ये बहुत बड़ी दौलत है।”

“मेरे पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने मुझे देश के प्रति वफादार रहना सिखाया...।”

“आज-कल इन बातों की कोई कीमत नहीं है। पैसे की ही जय है। स्वतंत्रता सेनानी को पूछता ही कौन है? देश के प्रति वफादारी की कीमत ही क्या है? तू कौन से वक्त में जी रहा है तू दामले।”

“मैंने यही सीखा है कि ईमानदारी से जिन्दगी बिताओ।”

“अपने बाप से सीखा?”

“हाँ...”

“क्या करता था वो?”

“बस का कंडक्टर था...।”

हंस पड़ा मीणा।

“इसमें हंसने की क्या बात है?”

“तेरा बाप स्वतंत्रता सैनानी था और बस का कंडक्टर था! इसी से मैं समझ सकता हूँ तू जिन्दगी भर अभावों से जिया है। अपनी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता होगा तुम्हारा परिवार...।”

“अब मैं बहुत बढ़िया नौकरी करता हूँ। पचास हजार कमाता हूँ।”

“मैं तेरे को आधी दौलत, 75 सौ करोड़ दे सकता हूँ। तू राजा-महाराजा बन कर रह सकता...।”

“मुझे बेईमानी का पाठ मत पढ़ा।”

“इसमें बे-ईमानी कहाँ से आ गई?”

“ये सारा पैसा डकैती का है। चोरी का है।”

“पैसा किसी मुहर का मोहताज नहीं होता कि वो चोरी का है या कमाया हुआ है। पैसा सिर्फ पैसा होता है। चोरी का हो तो नोटों का रंग नहीं बदल जाता। सब कुछ वैसा ही रहता है। पैसा ही महान है।”

“लेकिन ये पैसा तेरे किस काम का?”

“मेरे काम का ही तो...।”

“तूने मेरे शरीर पर कब्जा किया है। तेरे पास शरीर तो है नहीं...”

“है ना...तेरा शरीर ही अब मेरा...”

“भूल में मत रह। मेरे शरीर को अब तू इस्तेमाल नहीं कर सकता। पहले तो तूने धोखे ये मेरे शरीर में घुसकर, मेरे शरीर पर कब्जा कर लिया था। लेकिन अब मैंने अपनी जगह पा ली है।”

“हम दोनों दोस्त बनकर इसी शरीर में रहेंगे...।” मीणा का स्वर निकला होंठों से।

“खबरदार...।” सुधीर दामले का गुस्से भरा स्वर होंठों से निकला- “मैं अपने शरीर में तुझे नहीं रहने दूंगा।”

“मैं जाने वाला नहीं...”

“तेरे को बाहर निकाल के ही रहूँगा मैं। पुलिस वाले तो वैसे भी मुझे पसन्द नहीं। चला जा मेरे शरीर से...”

“बच्चों की तरह बातें मत कर। तेरे कह देने भर से मैं जाने वाला नहीं।”

“मार खाकर जायेगा...”

“तू मुझे छू भी नहीं सकता।”

“बेवकूफ, मेरे से क्यों झगड़ा करता है? किसी और के शरीर में तू क्यों नहीं घुस जाता...।”

“मुझे तेरा शरीर ही पसन्द है।”

“तू कुत्ता है। तू धोखेबाज है। मेरे शरीर से चला जा...।” सुधीर दामले गुर्रा उठा।

जवाब में मीणा हंस पड़ा।

“नहीं जाऊँगा...।” हंसते हुए मीणा बोला- “कभी नहीं जाऊँगा।”

“मैं तुझे अपने शरीर से निकाल के रहूँगा। ये मेरा शरीर है, इसका मालिक मैं हैं। तुझे अब...।”

“मैंने अब दुनिया में रहकर दौलत का मजा लेना है।”

“मजा तो तू तब लेगा, जब मैं तुझे लेने दूंगा...।”

“तू चाहता क्या है?” मीणा ने गम्भीर स्वर में पूछा।

“मेरे शरीर को छोड़ के चला जा। मैं दोबारा अपनी पहले जैसी जिन्दगी में लौट जाना चाहता हूँ। तारा मेरे बिना परेशान हो रही होगी। तूने, मेरे शरीर में आकर, तारा को बहुत दुःख दिया है।”

मीणा की आवाज नहीं आई।

“जा रहा है?” सुधीर दामले की आवाज पुनः होंठों से निकली।

“अभी बाईस साल मेरे को और बिताने हैं, इसी दुनिया में...” मीणा की आवाज निकली।

“मुझे तेरी बात से कोई मतलब नहीं। तू मेरे शरीर से निकल जा।”

“ये सम्भव नहीं अब...। मैंने इतनी दौलत लूटी है। अब इसके साथ जिन्दगी भी...”

“मैं बीच में आ गया हूँ, ये बात क्यों भूलता है...।”

“तू मुझे कुछ नहीं करने देगा तो तू भी दुःख उठायेगा। मैं तेरे को कुछ नहीं करने दूंगा।”

कुछ खामोशी के बाद सुधीर दामले का स्वर निकला-

“ये बात तो तेरी ठीक है। पर मैं तुझे अपने शरीर से बाहर निकाल के ही रहूँगा।”

“तेरी इस बात की मुझे जरा भी परवाह नहीं है। मैंने पक्के तौर पर अपनी जगह बना रखी है।”

तभी सामने से, अंधेरे में देवराज चौहान आता दिखा।

“देवराज चौहान आ रहा है।” मीणा की आवाज निकली। देवराज चौहान पास आकर ठिठका और बोला

“अभी कॉटेज के भीतर नहीं रहा जा सकता। गन्दगी बहुत है। दिन का इन्तजार करना होगा। साफ-सफाई के...”

“तू भी बोत हरामी है देवराज चौहान।” सुधीर दामले का स्वर होंठों से निकला।

देवराज चौहान ने चौंक कर मीणा को देखा आवाज बदली हुई थी मीणा की। फिर मीणा के मुँह से ऐसे शब्द निकलने की वजह से वो हैरान हो उठा था।

“ये तू क्या कह रहा है मीणा...।”

“मैं मीणा नहीं, सुधीर दामले हूँ...।”

“सुधीर दामले!” देवराज चौहान पुनः चौंका- “वो, वो तारा नाम की औरत का पति?”

“अब तूने सही पहचाना।” सुधीर दामले की आवाज होंठों से निकली- “वो ही हूँ मैं...।”

“ये क्या मजाक है मीणा...तुम...।”

“ये ठीक कह रहा है।” मीणा की आवाज़ निकली होंठों से इस बार।

देवराज चौहान के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा।

“क्या हो गया है तुझे मीणा...तुम तो...।”

“देवराज चौहान!” मीणा की आवाज में गम्भीरता थी- “इस वक्त तेरा हैरान-परेशान होना लाजिमी है। क्योंकि तेरे को कुछ नहीं पता। इस वक्त जो शरीर तेरे सामने है, उसमें दो लोगों की आत्मा बसी हुई है।”

“नहीं...।” देवराज चौहान के होंठों से निकला।

“ये सच है।” मीणा का स्वर पुनः आया- “तू मुझसे पूछता था ना कि बार-बार मुझे अचानक क्या हो जाता है। दरअसल तब सुधीर दामले की आत्मा वापस अपने ठिकाने पर आने की चेष्टा कर रही...”

“ठिकाने पर आने की चेष्टा?” देवराज चौहान के होंठों से निकला।

“हाँ... । एक दिन मौका पाकर मैंने दामले के शरीर पर कब्जा जमा लिया था।”

“ओह...कैसे?”

“ये बात फिर कभी बताऊँगा।”

देवराज चौहान हक्का-बक्का सा मीणा और दामले के शरीर को देख रहा था।

“हैरानी हो रही है देवराज चौहान?” मीणा बोला

“हाँ।” देवराज चौहान के होंठों से निकला।

“बात है भी हैरान होने वाली कि...।”

“तो तूने दामले के शरीर पर अधिकार कर रखा है।” देवराज चौहान के होंठों से निकला।

“हाँ...”

“परन्तु है तू सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।”

“हाँ...”

“ओह, तभी तुझे मीणा के रूप में कोई नहीं पहचान रहा था। तू मीणा और शरीर दामले का-लेकिन ये कैसे हो सकता है कि...।”

“फिर बताऊँगा, अभी तो...।”

“तू बहुत गलत कर रहा है देवराज चौहान।” इस बार होंठों से सुधीर दामले का स्वर निकला।

“तुम सुधीर दामले हो?” देवराज चौहान के होंठ सिकुड़ गये।

“हाँ। सुधीर दामले हूँ मैं। ये शरीर मेरा है।” सुधीर दामले ने तेज स्वर में कहा।

देवराज चौहान से कुछ कहते ना बना।

“तू खुद को ईमानदार कहता है और इस बे-ईमान का साथ दे रहा है।” दामले की आवाज पुनः निकली।

“मैं समझा नहीं...”

“इस पुलिस वाले ने मेरे शरीर में आकर जो-जो किया, कहा है, मैं सब जानता हूँ। तब मैं सब कुछ सुनता देखता रहा, परन्तु कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं था। अब मैंने अपने आधे शरीर पर कब्जा पा लिया है।”

“ओह...।”

“तू इस बे-ईमान का साथ मत दे।”

“मैंने क्या साथ दिया है?”

“तूने बहुत साथ दिया है। वरना अब तक तो इसे पुलिस पकड़ चुकी होती । तूने ही इसे बचाया और बैंक डकैती सफल करवा दी। तू ना होता तो इसका खेल कब का खत्म हो चुका होता। ये मेरा शरीर छोड़ कर चला गया होता।”

देवराज चौहान को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे!

“इसने मेरे शरीर का इस्तेमाल करके एक पुलिस वाले को मारा, बैंक डकैती की, मुझे तो इसने फंसा दिया। मैं दुनिया को कितना भी कहूँ कि तब मेरे शरीर में सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा की आत्मा घुसी हुई थी, वो ही सब कर रही थी, तो क्या कोई मानेगा?”

“नहीं...।” देवराज चौहान के होंठों से निकला

“इसने तो मुझे पूरी तरह फंसा दिया।”

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।

“तू अगर ईमानदार है तो मेरे साथ न्याय कर...”

“क्या?”

“इसे कह कि पुलिस के पास चले और कबूले कि ये सब दामले ने नहीं, इसने किया है।”

तभी होंठों से मीणा के हंसने की आवाज निकली।

“चुप कर...।” दामले कह उठा।

“तू तो बुरा फंस गया दामले।” हंसी रोकते कह उठा मीणा।

“तूने ही मुझे फंसाया है।”

“मैं तेरे शरीर को छोड़कर चला भी जाऊँ, तब भी तू बचने वाला नहीं...”

“तेरी वजह से हुआ है ये सब...।” दामले की गुस्से से भरी आवाज निकली।

देवराज चौहान चुप।

अजीब सी स्थिति में फंसा था वो...।

उसके सामने जो हो रहा था, वो हैरान, परेशान कर देने वाला था।

“बोल, देवराज चौहान...।”

“क्या बोलू?” देवराज चौहान ने होंठ भींच लिए।

“इसे कह कि मेरे साथ पुलिस के सामने जाकर कबूले कि ये सब-इंस्पेक्टर मीणा है। और इसने मेरी मर्जी के बिना गैर कानूनी काम किए...।”

“उससे क्या होगा?” देवराज चौहान बोला

“पुलिस इसके किए कामों से मेरा वास्ता नहीं जोड़ेगी...।”

“ऐसा नहीं होगा...”

“क्या मतलब?”

“पुलिस को आत्मा से कोई मतलब नहीं। उसे तो शरीर से मतलब है। फिंगरप्रिंट से मतलब है। शिनाख्त से मतलब है। तुम्हें डकैती करते सबने देखा है। सब तुम्हें ही जानते हैं।” देवराज चौहान ने कहा।

“तू भी इसकी साईड ले रहा है।...।”

“नहीं। मैं साईड नहीं ले रहा, सच बात कह रहा हूँ। पुलिस को शरीर से मतलब है। पुलिस इन बातों में कभी यकीन नहीं करती कि किसी के शरीर में कोई आत्मा आ घुसी है। पुलिस सबूतों के आधार पर केस बनाकर अदालत में पेश करती है।”

“तुम्हारा मतलब कि सब मुझे ही मुजरिम मान रहे हैं।’ दामले ने तड़प कर कहा।

“सौ प्रतिशत...”

“ये नहीं हो सकता। मैंने कुछ नहीं किया। मेरी मर्जी से कुछ नहीं हुआ...”

“इन बातों को कोई नहीं मानेगा। कानून सिर्फ गवाह और सबूत देखता है।”

“इसका मतलब मैं खुद को बे-गुनाह साबित नहीं कर सकता?”

“नहीं, कभी नहीं...”

“तू तो फंस गया दामले।” मीणा की हंसी से भरी आवाज होंठों से निकली।

“तूने ही मुझे फंसाया है।” दामले गुस्से से कह उठा।

“मैंने जानबूझ कर तुझे नहीं फंसाया, मैं तो...।”

“तेरे को ये साबित करने की क्या जरूरत थी कि तू सब इंस्पेक्टर मीणा है? जब कि तू मर चुका था।”

“जब मैं तेरे शरीर में आया तो कुछ देर के लिए मैं भूल गया कि मौत के बाद, मैंने दूसरे का शरीर पा लिया है। खुद को सब इंस्पेक्टर मीणा ही समझने लगा था, पहले की तरह।” मीणा ने गम्भीर स्वर में कहा- “जब तूने पहली बार बैंक में कोशिश की, वापस शरीर में उस जगह को पाने की तो, तब मुझे ध्यान आया कि मैं किसी और के शरीर में हूँ। लेकिन तब मैं इतना आगे बढ़ चुका था कि रुक नहीं सकता था। फिर मैंने सोच लिया कि इसी

शरीर में रहूँगा और दौलत के दम पर ऐश करूंगा। अभी मुझे बाईस साल इसी दुनिया में और बिताने हैं। सच बात तो ये है कि मैं अपने को किसी भी तरफ से कसूरवार नहीं मानता। मैंने जो किया, वो मेरी जरूरत थी।”

“पर मैं तो फंस गया कमीने...।” दामले गुर्रा उठा।

“फंस गया तो फंस गया। लेकिन मैं तेरे को बचा सकता हूँ दामले।”

“कैसे?”

“तू मेरे से दोस्ती कर ले...”

“दोस्ती?”

“हाँ, तू इस बात पर एतराज ना उठा कि मैं तेरे शरीर में डेरा जमाए हुए हूँ...”

“फिर क्या होगा?”

“फिर हम दोनों मिलकर दौलत का मजा उठायेंगे। किसी दूसरे शहर में रहना शुरू कर देंगे। तेरे को पुलिस नहीं पकड़ पायेगी।”

“तू सच में कमीना है।”

“ऐसा क्या कह दिया मैंने?”

“मेरी पत्नी है, परिवार है, बेटा है, जो पूना में पढ़...।”

“अपने परिवार को भी साथ रख लो...।”

“और जब मैं तारा के पास रात को जाऊँगा तो तू भी मजे लेगा।”

“इतना तो तुझे सहना ही होगा...।”

“ये कभी नहीं हो सकता...मैं...।”

“ठीक है। तब तो पुलिस तेरे को कम से कम उम्रकैद की सजा दिलवा के रहेगी। तू जेल में ही बूढ़ा हो जायेगा और तेरा परिवार बिखर जायेगा। तेरे को कहीं भी चैन नहीं मिलेगा। तेरी जिन्दगी तो बरबाद हो गई...।”

सुधीर दामले की आवाज नहीं आई।

देवराज चौहान ठगा सा दोनों की बातें सुन रहा था। हालातों को समझ रहा था।

शरीर एक और उसमें दो इन्सान मौजूद थे!

देवराज चौहान के लिए ये नये हालात थे। ऐसा उसने पहले न देखा ना सुना था।

“तू मेरा शरीर छोड़ कर चला जा।” दामले का स्वर गम्भीर था।

“उससे क्या होगा?”

“तब मैं सोचूंगा कि मुझे क्या करना है। जब तक तू मेरे शरीर में रहेगा, मैं ठीक फैसला ना कर सकूँगा।”

“मैं नहीं छोड़ सकता तुझे। तेरे शरीर में रहकर ही मैं दौलत के मजे लूंगा और बाईस साल और बिताऊँगा।”

“तो तू मेरा शरीर छोड़कर नहीं जायेगा?”

“नहीं...”

“तो मैं भी देखता हूँ कि तू अपने इरादों में कैसे कामयाब हो पायेगा। मेरी सहायता के बिना तू कुछ नहीं कर पायेगा अब...।”

“ये परेशानी तो तेरे लिए भी है। मैं तेरे को भी तेरी मर्जी है नहीं करने...।”

“चुप रह तू।” सुधीर दामले गुस्से से बोला- “मुझे जरा इस ईमानदार देवराज चौहान से बात करने दे।”

“ईमानदार?” देवराज चौहान के होंठों से निकला।

“तू बड़ा ईमानदार बनता है ना कि दूसरों से इस तरह दौलत नहीं लेता। यूँ ही मीणा की सहायता कर रहा है।”

“तो, इसमें ईमानदारी कहाँ से आ गई? ये अलग बात है।”

“मैं चाहता हूँ कि तू मेरी साईड ले...।”

“कैसी साईड?”

“इसने मुझे फंसा दिया है, तू देख ही रहा है कि कानून से बच पाना कठिन हो जायेगा मेरे लिए।”

“हाँ, ये समस्या तो सुधीर दामले के सामने खड़ी हो ही गई...।” देवराज चौहान ने गम्भीरता से कहा।

“इसे कह कि मेरे शरीर से बाहर निकल जाये।”

“मुझे इस मामले में नहीं आना चाहिये।”

“तू मीणा की साइड ले रहा है।” दामले नाराजगी से बोला।

“इस वक्त मैं किसी की साइड नहीं ले रहा। ये मामला मेरी समझ से बाहर है कि एक शरीर में दो लोग कैसे आ सकते हैं। ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा-सुना, ये बात तुम दोनों ही निपटो।”

“तू बेईमानी वाली बात कर...।”

“नहीं दामले। मैं सच कह रहा हूँ, तुम दोनों का मामला मेरी समझ से बाहर है।” देवराज चौहान ने कहा।

“ये तो तेरे को पता चल गया कि ये मेरे शरीर में घुसा पड़ा है।” दामले बोला।

“हाँ, शायद, ऐसा मीणा ने स्वीकारा है।” देवराज चौहान कह उठा।

“ये सच बात है।” मीणा कह उठा।

“तो अब इसे कहो कि मेरे शरीर से बाहर निकल जाये। मेरे शरीर को छोड़ दे।”

देवराज चौहान दो पल चुप रहा, फिर कह उठा- “इस बारे में तुम क्या कहते हो मीणा?”

“मैं इसके शरीर से नहीं जाऊँगा।” मीणा की आवाज होंठों से बाहर निकली।

“क्यों?”

“मुझे इसका शरीर पसन्द आ गया है।”

“ये तो गलत बात है कि तुम किसी और के शरीर पर कब्जा जमाए हुए हो।”

“है तो गलत बात, परन्तु मेरी भी मजबूरी है...।”

“कैसी मजबूरी है?”

“मुझे भी तो शरीर चाहिये। मेरा शरीर तो जला दिया गया है...। अब मैं कहाँ रहूँगा?”

“तुम मर गये थे, इसलिए तुम्हारे शरीर को जलाया गया।” मीणा की आवाज नहीं आई।

“तुम इसके शरीर में आये क्यों?”

“क्योंकि मुझे शरीर की जरूरत थी।”

“मरने के बाद अगर हर किसी को तुम्हारी तरह शरीर की जरूरत पड़े तो एक-एक इन्सान में दो-तीन, आत्माएं रहने लगें।”

“ये बात नहीं। मेरा मामला कुछ हटकर रहा।” मीणा ने कह कर गहरी सांस ली।

“मुझे समझाओ कि मरने के बाद तुम्हारे साथ क्या हुआ जो...”

“अभी नहीं, फिर बताऊँगा।”

“फिर कब?”

“फुर्सत में। अभी तो मैं बहुत व्यस्त हूँ। मुझे दूबे की चिन्ता थी, ऊपर से दामले ने परेशानी खड़ी कर...।”

“दामले...।” देवराज चौहान ने पुकारा।

“हाँ...”

“तुम जानते हो कि मरने के बाद इसके साथ क्या हुआ?”

देवराज चौहान ने पूछा।

“नहीं। इस बारे में मुझे कुछ नहीं पता।” सुधीर दामले ने कहा।

“मीणा!” देवराज चौहान बोला- “तुम्हें दामले का शरीर छोड़कर चले जाना चाहिये।”

“ये नहीं हो सकता। मैं इसी शरीर में रहूँगा।”

“मेरे शरीर में रहेगा तो मैं तेरे काम खराब करता रहूँगा।” दामले कह उठा।

“तूने ऐसा किया तो मैं तेरे काम खराब करूँगा।” मीणा बोला।

“मेरा तो कोई काम है ही नहीं, जो तू खराब...।”

“मैं तुझे, तेरी पत्नी तारा से नहीं मिलने दूंगा। तू उससे मिलना चाहेगा तो मैं दूसरी तरफ कदम बढ़ाऊँगा। इस शरीर पर मेरा भी अधिकार है। मैं तुझे इसी तरह परेशान करता रहूँगा।”

“सुना देवराज चौहान?” दामले ने अफसोस भरे स्वर में कहा।

“हाँ। सुन रहा हूँ।” देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।

“तुम ही बताओ कि मैं क्या करूँ!” दामले बोला- “इसने मुझे मेरे परिवार से जुदा कर दिया। कानून की नजरों में मुझे मुजरिम बना दिया। ये मेरा शरीर छोड़कर जायेगा तो, मेरी असली मुसीबतें तब शुरू होंगी। मैं तो कहीं का नहीं रहा...।”

देवराज चौहान कुछ नहीं कह सका।

“तुम इसकी सहायता कर रहे थे, अब इसे कहो कि तुम्हारी बात मान कर मेरा शरीर छोड़ दे।”

“मैं नहीं जाने वाला।” दामले के होंठों से, मीणा का स्वर निकला।

“ये मामला अभी तक मेरी समझ से बाहर है।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में बोला- ‘दुनिया मरती है, परन्तु इस प्रकार किसी आत्मा को किसी के शरीर में गया नहीं देखा। फिर ये कैसे आ गया तुम्हारे शरीर में?”

“इससे पूछो।” दामले ने कहा।

“मेरे से क्या पूछना है! किस्मत का मारा हूँ। मैं जिन्दा था

तो तब चैन नहीं मिला। मर गया तो और भी बुरा हाल हो गया।”

“तू बताता क्यों नहीं कि मर कर तेरे साथ क्या हुआ?” दामले बोला।

“बाद में बताऊँगा। अभी परेशान हूँ।” मीणा की आवाज दामले के होंठों से निकली- “तू मेरी बात मान क्यों नहीं लेता। हम साथ रहते हैं। मैं तेरे को पुलिस से बचा कर रखूगा।”

“मैं तुझे अपने शरीर में क्यों रखू? मेरा अपना परिवार है। मेरी अपनी जिन्दगी है। उसे मैं बिताऊँगा।”

“ये तो तू जिद्द वाली बात कर रहा है।”

“मेरा शरीर है, मेरी मर्जी, मैं तुझे अपने अन्दर नहीं रखूगा।” “तो मुझे बाहर निकाल के दिखा।” मीणा ने चुनौती भरे स्वर में कहा।

“है तो तू पुलिस वाला, दादागिरी दिखायेगा ही! लेकिन मैं तुझे भगा के ही दम दूंगा।”

“भूल जा। मैंने इस शरीर में अपनी जगह पक्की कर रखी है।” मीणा मुस्करा कर कह उठा।

“मैं तेरे सारे काम खराब करूँगा।” सुधीर दामले ने गुस्स से कहा।

“देवराज चौहान!” मीणा की आवाज दामले के होंठों से निकली।

“बोल...”

“तू ही इसे समझा कि दोनों भाई बनकर एक ही शरीर में रहेंगे। एक-दूसरे के काम आयेंगे।”

“तेरे को दामले का शरीर छोड़ देना चाहिये।”

“वाह, तो तू अब इसकी बातों में आ गया?”

“जो मुझे ठीक लग रहा है, वो ही कह रहा हूँ। तूने दामले के शरीर पर अधिकार करके गैरकानूनी कामों में इसे फंसा दिया है। वो सब इसे भुगतना होगा। अब तो बस कर। छोड़ दे इसे...।”

“तेरा तो दिमाग खराब हो गया है...।” मीणा बोला

“क्यों?

“ठीक ही कहा है मैंने। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत के मजे लेने हैं अभी मैंने। दामले का शरीर नहीं छोड़ सकता। बाईस साल मैंने अभी इसी दुनियाँ में रहना है। मुझे इसका शरीर पसन्द ...।”

“ये बाईस साल की बात क्या कह रहे...।”

“अभी कुछ मत पूछो। मरने के बाद मेरे साथ बहुत गलत हुआ। कोई भी अपनी जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं। मुझे ही भुगतना...”

“किसकी बात कर रहे हो तुम? कौन नहीं ले रहा जिम्मेवारी?” देवराज चौहान ने पूछा।

जवाब में मीणा की आवाज नहीं आई।

“अब चुप क्यों कर गया?” दामले कह उठा- “बोल, जो पूछा है देवराज चौहान ने...।”

“इस बारे में फुर्सत में बात करूँगा। लेकिन तू सुन दामले...”

“कह...।”

“तेरे को अपनी पत्नी तारा से मिलना है ना?”

“हाँ...”

“तो तुझे मेरा साथ देना होगा। वरना मैं तेरे को तारा से नहीं मिलने दूंगा।”

“मेरे शरीर में रहकर तू मेरे से दादागिरी करेगा?” दामले गुर्राया।

“मजबूरी है। एक बात तेरे को पहले बता देता हूँ कि मैं तेरे शरीर में रहूँगा। कहीं जाने वाला नहीं। दूबे के आने के बाद आधी दौलत उसे देकर, बाकी के साथ मैं इस शहर से चला जाऊँगा और...”

“मैं इस शहर से नहीं जाना चाहता।” दामले तड़प कर कह उठा।

“बेवकूफ! यहाँ रहा तो तुझे पुलिस सब-इंस्पेक्टर रंजीत सिंह की हत्या के इल्जाम में पकड़ लेगी। बैंक डकैती के इल्जाम में पकड़ लेगी। सारी उम्र तेरी जेल में बीतेगी। मेरा कहना मानेगा तो बढ़िया से जिन्दगी बितायेगा।”

“मैं तारा के बिना नहीं रह सकता।”

“तो उसे भी साथ ले चल...”

“वो मेरी पत्नी है। जब-जब मैं उसके पास जाऊँगा, तो साथ में तू भी होगा।”

“इस बात की फिक्र क्यों करता है, तेरे को धीरे-धीरे आदत पड़ जायेगी।”

“ये बात मुझे मंजूर नहीं...।” दामले ने स्पष्ट कहा।

“सुना देवराज चौहान।” दामले के होंठों से मीणा का स्वर निकला- “मैं तो पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि इसके साथ निभा लूं। परन्तु ये मेरी बात जरा भी नहीं मान रहा। मैं तो...।”

“मेरे शरीर में आकर तू निभा रहा है?” सुधीर दामले ने गुस्से से कहा- “तेरे को किसने कहा है निभाने को? मेरा शरीर छोड़ कर चला जा। मैं तेरे को अपने शरीर से बाहर निकाल कर रहूंगा।”

“ये तो फिर झगड़ने लगा।” मीणा ने लम्बी सांस ली।

“हाँ, मैं तेरे से तब तक झगड़ा करता रहूँगा, जब तक तू मेरे शरीर से बाहर नहीं निकला जाता।”

“ये तो हो ही नहीं सकता।”

“देखता हूँ कि तू कैसे मेरी बात नहीं मानता।” दामले बहुत ज्यादा गुस्से में आ गया था।

“देख लो। मैं भी देखता हूँ कि तू मेरा क्या करता है!” मीणा ने हंस कर कहा।

देवराज चौहान गम्भीर निगाहों से सुधीर दामले को देख रहा था। मस्तिष्क में खलबली मची हुई थी। अजीब सा हाल था उसका ये सोच कर कि एक शरीर में दो इन्सान बातें कर रहे हैं। दोनों आपस में झगड़ रहे हैं।

ये सब उसके लिए नया था। वो दोनों की बातें ध्यानपूर्वक सुन रहा था

“देवराज चौहान!” मीणा बोला- “ये बेवकूफ दामले मुझे अपने शरीर से निकाल कर, खुद सारी उम्र उन जुर्मों की वजह से जेल में बिता देना चाहता है, जो इसने किए ही नहीं। बेवकूफ है ना? जबकि मैं इसके साथ रह कर इसे और इसके परिवार को शानदार जिन्दगी दे सकता हूँ। तुम इसे समझाओ कि...।”

तभी दामले की जेब में पड़ा मोबाईल फोन बज उठा।

“दूबे होगा।” मीणा ने जल्दी से मोबाईल जेब से निकाला और बात की- “ठीक-ठाक निकल आया बैंक से?”

“तो तुम अपने साथी का इन्तजार कर रहे थे?” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।

मीणा बुरी तरह चौंका।

“कमिश्नर-तुम?”

देवराज चौहान आँखें सिकोड़ कर दामले को देखने लगा।

“तुम्हारे साथी के फोन से ही बात कर रहा हूँ...।” पाटिल की आवाज पुनः कानों में पड़ी।

“दूबे-दूबे कहाँ है?” मीणा के होंठों से हक्का-बक्का स्वर निकला- “प...पकड़ लिया तुमने?”

“मारा गया। वो पीछे वाली सीट पर अकेला बैठा था और हमारे पास ऐसे निशानेबाज थे कि आसानी से उसका निशाना ले सकें। मार दिया हमने उसे।”

मीणा हक्का-बक्का रह गया, फिर गला फाड़ कर चीखा-

“तूने दूबे को मार दिया? ये नहीं हो सकता! तू बकवास कर रहा...”

“दूबे की लाश मेरे सामने पड़ी है। उसके सिर और चेहरे पर से टोपी उतार दी है। यहाँ लाइट जल रही है। उसकी लाश ले जाने से पहले पुलिस अपनी खाना-पूर्ति कर रही है। कुछ ही देर में लाश का पंचनामा हो जायेगा।”

“ओह...”

“तू कहाँ है?”

मीणा ने कुछ नहीं कहा। होंठ भिंचे रहे।

“डेढ़ सौ करोड़ की दौलत किधर है?”

“मेरे पास...।”

“तुम कहाँ हो?”

“तू क्या समझता है कमिश्नर कि मैं तेरे को बता दूंगा?” मीणा गुस्से से कह उठा।

“हम तुम्हें ढूंढ लेंगे।” कमिश्नर की आवाज कानों में पड़ी।

“पुलिस मुझे कभी नहीं पकड़ सकेगी।”

“तू है कौन, तेरी हकीकत क्या है?”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।”

“नहीं कमिश्नर।” तभी सुधीर दामले की आवाज होंठों से निकली- “ये कमीना है, तुम इसकी बात पर यकीन मत करो, मैं तुम्हें सच बताता हूँ...कि ये मेरे शरीर में घुसा हुआ है। मैं सुधीर दामले हूँ और...”

“चुप कर।” मीणा गुर्रा उठा।

“नहीं चुप करता। तू क्या कर लेगा...।” सुधीर दामले गुस्से से बोला।

“पुलिस वालों से मुझे बात करने दे, तुम चुप रहो।”

“मैं चुप नहीं रहूँगा, पुलिस को बताऊँगा कि तुमने मेरे शरीर पर कब्जा करके क्या-क्या किया। मैंने अपने को बेगुनाह भी साबित करना है। नहीं तो पुलिस मुझे फांसी पर लटका...।”

“पुलिस आत्मा वाली बात पर यकीन नहीं करेगी।”

“मुझे बात करने दे। मैं उसे यकीन दिला दूंगा कि मैंने कुछ नहीं किया।”

मीणा हंस पड़ा, फिर बोला- “ठीक है, कर लो बात...।”

“कमिश्नर...।” सुधीर दामले फोन पर बोला।

“तुम कौन हो?” कमिश्नर पाटिल की उलझन भरी आवाज कानों में पड़ी।

“मैं सुधीर दामले हूँ, वो दामले...।”

“तारा का पति?

“हाँ, वो ही है...”

“तो तुम भी इसके साथ इस काम में शामिल हो...।”

“गलत बात मत कहो। मेरी बात सुन लो, मैं तुम्हें सब समझाता...”

“तुम, उसके पास मौजूद हो? क्यों कर रहे हो उसके साथ?”

“बात तो सुनो...।”

“तुम हो कहाँ इस वक्त...।”

“अपनी ही कहे जायेगा?” सुधीर दामले कलप कर बोला- “मेरी बात नहीं सुनेगा क्या?”

मीणा हंस पड़ा।

देवराज चौहान अजीब हाल में खड़ा सुधीर दामले को देखे जा रहा था।

“क्या कहना चाहते हो तुम?” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं सुधीर दामले हूँ। तुमने जिसे देखा, वो मेरा शरीर था, परन्तु तब उस पर पूरी तरह सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा का अधिकार था... और मैं तब अपनी जगह पाने की चेष्टा...”

“क्या बकवास कर रहे हो? सब-इंस्पेक्टर मीणा मर चुका है।” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं उसकी आत्मा की बात कर रहा हूँ...।”

“आत्मा?”

“मरने के बाद सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा ने मेरे शरीर पर कब्जा कर लिया था और मैं...।”

“तुम पागल तो नहीं हो?” कमिश्नर का तीखा स्वर कानों में पड़ा।

“क्या?” सुधीर दामले के होंठों से निकला।

मीणा हंस पड़ा।

“तुम हंस क्यों रहे हो?” पाटिल की आवाज पुनः कानों में पड़ी।

“मैं नहीं, सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा हंस रही है, जो कि मेरे शरीर में इस वक्त बसी हुयी है।”

“तुमने शराब पी रखी है?”

“शराब? नहीं तो इसमें शराब की बात कहाँ से आ गई?”

दामले के होंठों से निकला।

“तुम बहकी-बहकी बातें क्यों कर रहे हो? आत्मा की बातें और...”

“पागल इन्सान!” दामले गुस्से से बोला- “मैं बहकी बातें नहीं कर रहा, सच बात तुझे बता रहा हूँ, और तेरी समझ में कुछ नहीं पड़ रहा, या तू समझना नहीं चाहता? मुझे ही पागल कह रहा है।

“फिर से बता, क्या कहना चाहता है?” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।

“हम इन्सानों के शरीर में आत्मा होती है ना?” सुधीर दामले ने झल्लाये स्वर में कहा।

“हाँ, ऐसा ही कुछ सुना है...।”

“सुना नहीं है, होती है। जो कि हमारे शरीरों को जिन्दा रखती है और दिमाग चलता है, दिल धड़कता है। ये सब आत्मा की मौजूदगी की ही वजह से होता है। समझे मेरी बात कि नहीं?”

“समझा। आगे कहो क्या कहना चाहते हो?” कमिश्नर की आवाज कानों में पड़ी।

“सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा की हादसे में मौत हो गई। मरने के बाद उसके साथ क्या हुआ, मैं नहीं जानता, परन्तु उसकी आत्मा मेरे शरीर में प्रवेश कर गई।” दामले ने अपनी बात पर जोर देकर कहा।

“ये तुम अजीब बात कह रहे हो।”

“मैं सच कह रहा हूँ। क्या मेरी बात तुम आगे सुनोगे?”

“कहो...।”

“तब मेरा बहुत बुरा एक्सीडेंट हुआ था। एक कार ने मुझे जबर्दस्त टक्कर मारी थी। इन्हीं चंद पलों में जाने कैसे सब-इंस्पेक्टर मीणा की आत्मा ने मेरे शरीर पर अधिकार कर लिया और मीणा मेरे शरीर का मालिक बन बैठा।”

“हैरानी हो रही है तुम्हारी बात सुन कर। क्या ऐसा होता है?”

“मेरे साथ हुआ-सुना तुमने?”

“चिल्लाओ मत, फिर क्या हुआ?”

“मेरे शरीर में घुस कर मीणा की आत्मा, मीणा बन कर रहने लगी और वो मेरे शरीर का सहारा लेकर अपने को मीणा साबित करने की चेष्टा में लग गया। तब मैं भी शरीर के भीतर था, सब देख-सुन-समझ रहा था, परन्तु कुछ कर नहीं सकता था तब। मीणा ने मेरे शरीर का सहारा लेकर सब-इंस्पेक्टर रंजीत की हत्या की।”

“ओह, तो उसकी हत्या भी तुमने की थी?” कमिश्नर की आवाज कानों में पड़ी।

“मैंने नहीं, मीणा ने...।”

“तुम्हारी बात के हिसाब से, तब मीणा तुम्हारे शरीर का इस्तेमाल कर रहा था?”

“हाँ, तब...”

“फिर तो हत्यारे तुम ही हुए...।”

मीणा हंस पड़ा।

“तुम फिर हंस रहे...”

“मैं नहीं बेवकूफ, मीणा हंस रहा है। वो अभी भी मेरे शरीर के भीतर ही है। तुम मुझे हत्यारा मान रहे हो, सब-इंस्पेक्टर रंजीत का, जबकि मेरे शरीर में घुसकर, ये सब कुछ मीणा कर रहा था। बैंक डकैती भी इसी तरह हुई। शरीर मेरा था, परन्तु तब शरीर के भीतर मीणा की आत्मा का कंट्रोल था, वो ही सब कुछ कर रही थी।”

“तुम्हारी बातों पर कौन यकीन करेगा?”

“मैं चाहता हूँ तुम यकीन करो और मुझे बेगुनाह मानो। मैंने कुछ नहीं किया।”

“असम्भव! ये कभी भी नहीं हो सकता।”

“क्यों नहीं हो सकता?”

“फैसला अदालत करती है। पुलिस नहीं करती है। अदालत हर बात का सबूत मांगती है।”

“सबूत?”

“हाँ, क्या तुम अपनी बात सच साबित करने के लिए मीणा की आत्मा को अदालत में पेश कर सकते हो?”

“तुम उल्लू के पट्टे हो...।” सुधीर दामले चीख कर कह उठा।

मीणा हंसा।

“ये मीणा की आत्मा हंस रही है?” उधर से कमिश्नर दामले ने पूछा।

“हाँ...ये...”

“तुम्हारी बकवास पर कौन यकीन करेगा? तुम खुद को कानून से बचाने के लिए मनगढ़ंत कहानी सुना रहे...।”

“मेरा यकीन करो, मैं सच कह रहा...।”

“बकवास मत करो। तुम किसी भी कीमत पर कानून से नहीं बच सकते। सब-इंस्पेक्टर मीणा की मौत हो चुकी है। तुम सुधीर दामले हो और तुमने ही सब किया है। बैंक डकैती के दौरान तुम पुलिस का दिमाग खराब करने के लिए, सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा होने का ड्रामा करते रहे। तुम्हारे जैसे अपराधी बहुत देखे हैं जब पकड़े जाते हैं तो आसानी से सब कबूल लेते हैं। अपनी खैर चाहते हो तो खुद को कानून के हवाले कर दो। ऐसा करने पर कानून तुम्हारे साथ कुछ नर्मी...।”

“कमीने!” सुधीर दामले पाँव पटक कर कह उठा- “मैं तेरे को सच्चाई बता रहा हूँ और तू जख्मों पर नमक डालने लगा।”

“तू बच नहीं सकता दामले।” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी- “अपने को कानून के...।”

तभी मीणा कह उठा- “क्यों दामले, अब तो तेरी तसल्ली हो गई? मेरी बातें सच निकलीं कि कोई तेरी बात का भरोसा नहीं करेगा।”

“चुप रह, मुझे बात करने दे।” सुधीर दामले गुस्से से बोला।

“अब बचा है क्या है बात करने को...।”

“कमिश्नर को समझाने दे, मैं उसे यकीन दिला दूंगा कि...”

“कानून को मैं तुमसे ज्यादा अच्छी तरह जानता हूँ। अगर तू मेरी आत्मा को अदालत में पेश भी कर दे, तो भी कानून तेरी बात को सच नहीं मानेगा। क्योंकि कानून आत्मा नाम की किसी चीज को नहीं जानता। कानून ठोस सबूत और ठोस गवाही ही मानता है। तेरा अब कुछ नहीं हो सकता, तू फंसा ही फंसा। तूने बहुत बात कर ली। अब मुझे बात करने दे।”

“नहीं, मैं बात करूँगा...।” दामले तड़प कर बोला।

“मैं तेरी हालत समझ रहा हूँ। तेरे भीतर ही हूँ मैं, तेरा हाल नहीं जानूंगा तो किसका जानूंगा! तेरे विचार मैं महसूस कर सकता हूँ, मेरे विचार तू महसूस कर सकता है। मत भूल कि मैं पुलिस वाला हूँ और कानून की बारीकियाँ भला मुझसे बेहतर कौन जानेगा! सच ये ही है कि कानून तेरे को उम्रकैद से कम सजा नहीं देगा। कोई वकील तेरे को नहीं बचा सकता, क्योंकि आत्मा को कोई मानेगा नहीं। वो किसी को दिखती भी नहीं है।”

“तूने मेरे को फंसा दिया।” दामले ने गुस्से से कहा।

“सच मान, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। जो हुआ, होता चला गया।”

सुधीर दामले की आवाज नहीं आई।

“बोल कमिश्नर...” मीणा कह उठा फोन पर।

“ये क्या हो रहा है, मैंने तुम दोनों की बातें सुनीं।” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।

“तो क्या समझा?” मीणा मुस्कराया।

“मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा। तुम दोनों मुझे पागल बना रहे हो।”

“तेरे को दामले ने जो कुछ भी कहा, वो सच था।” मीणा ने गम्भीर स्वर में कहा।

“आत्मा वाली बात?”.

“हाँ, आत्मा वाली बात...”

“तुम्हारा मतलब कि तुम्हारी आत्मा, दामले के शरीर में रहकर सब कुछ कर रही है?”

“हाँ...” .

“और सुधीर दामले बे-कसूर है?”

“ये ही बात सच है।”

“बकवास! तुम दोनों मुझे बेवकूफ बना रहे हो। कभी फोन लेकर तुम बात करने लगते हो और कभी दामले। साथ ही कहते हो कि मैं तुम लोगों की बातें मान लूं? इस तरह तुम कानून को बेवकूफ नहीं बना सकते।”

“सुना दामले...।” मीणा बोला।

“कमिश्नर, हम दोनों एक ही शरीर में हैं। तुम यकीन करो।”

“ऐसी बात है तो मेरे सामने आओ। तब मैं देखूगा कि मामला क्या है।”

“ये तेरे को फँसा रहा है दामले...” मीणा कह उठा।

“वो ठीक ही तो कह रहा है कि जब तक मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा, वो हकीकत को कैसे...”

“कमिश्नर को इसी बात का तो इन्तजार है कि तू सामने जाये और तुझे गिरफ्तार कर ले।” मीणा ने कहा।

‘मुझे बात करने दो।

“कर ले...।

सुधीर दामले ने कमिश्नर से बात की

“कमिश्नर! अगर मैं सामने आऊँ, तुझे इस बात का यकीन हो जाये कि मेरे शरीर में मीणा की आत्मा है तो तुम मुझे बे-गुनाह मान लोगे?”

कमिश्नर की आवाज नहीं आई।

“बोलती बंद हो गई कमिश्नर की।” मीणा हंस कर कह उठा।

“तू चुप कर।” दामले ने तीखे स्वर में कहा।

फोन की लाईन पर खामोशी रही।

“कमिश्नर...।” दामले पुनः बोला- “तुम सुन रहे हो मेरी बात?”

“हाँ...”

“मेरी बात का जवाब दो कि जब तुम्हें यकीन हो जायेगा कि मेरे शरीर में मीणा की आत्मा घुसी पड़ी है और मेरे शरीर का सहारा लेकर जो किया, मीणा ने किया, मैंने नहीं किया तो क्या तुम मुझे बे-गुनाह मान कर छोड़ दोगे?”

“तुमने तो मेरा दिमाग खराब कर दिया है।”

“मेरी बात का सच जवाब दो कमिश्नर।”

“कानून आत्मा को नहीं मानता।” उधर से कमिश्नर ने कहा।

“इसका मतलब हर हाल में मैं ही दोषी माना जाऊँगा?”

सुधीर दामले तड़प कर बोला।

“तुम ही गुनाहगार हो। सब कुछ तुमने किया है। तुम्हें सैकड़ों लोगों ने डकैती करते देखा है। इस तरह की बातें करके तुम खुद को बचा नहीं सकते। दूबे मर गया है, अगर तुमने खुद को कानून के हवाले नहीं किया तो तुम भी दूबे की तरह मारे जाओगे।”

सुधीर दामले ने गहरी सांस ली।

“हो गई तसल्ली दामले?” मीणा ने व्यंग भरे स्वर में पूण।

“हाँ...हो गई।” दामले ने मरे स्वर में कहा।

“मैंने तेरे से झूठ तो नहीं कहा था कि अगर तू पुलिस के हाथ लगा तो सारी जिन्दगी जेल में ही बीतेगी...।”

सुधीर दामले ने कुछ नहीं कहा।

“अब तू क्या चाहता है कमिश्नर?” मीणा बोला।

“मेरी राय है कि तुम दोनों खुद को पुलिस के हवाले कर...”

“दोनों?”

“हाँ, तुम और दामले...”

“मैं कौन हूँ?” मीणा मुस्कराया।

“जो भी हो तुम। इस वक्त तुम सुधीर दामले जैसे अपराधी के साथ मौजूद हो। उसने हत्या और बैंक डकैती की है। अगर तुमने उसका साथ दिया तो तुम भी उसके गुनाह के हिस्सेदार माने जाओगे।”

मीणा ठठाकर हंस पड़ा।

“तुम्हें मेरी बात पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये। अपना नाम बताओगे तुम?”

“सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा।”

“बकवास, तुम...।”

“कसम से, मैं मीणा ही हूँ... और इस वक्त दामले के शरीर में घुसा बैठा हूँ।”

“तुम दोनों मुझे बेवकूफ नहीं बना सकते। कैसी वाहियात बात कर रहे हो! आत्मा भी भला कोई चीज होती है। कानून की किसी किताब में आत्मा नाम का जिक्र नहीं है। खुद को कानून के हवाले...”

“कमिश्नर। कानून ने तो सुधीर दामले को जीते जी ठिकाने लगा दिया।”

“क्या मतलब?”

“सुधीर दामले बिलकुल निर्दोष है और कानून उसे गुनाहगार ठहरा रहा...”

“गुनाहगार ठहराना या ना ठहराना, अदालत का काम है। तुम दोनों खुद को कानून के हवाले...।”

“क्यों दामले...।” मीणा मुस्करा कर बोला- “खुद को कानून के हवाले करना है?”

“कानून पागल है।” दामले गुर्रा उठा।

मीणा पुनः जोरों से हंस पड़ा।

“तुम दोनों खुद को कानून के हवाले कर...।”

“चुप हो जा कमिश्नर। तेरे पास अब इन बातों के अलावा कहने को कुछ नहीं है।” मीणा ने कहा- “दूबे की मौत का मुझे दुःख है, पर इतना भी दुःख नहीं कि मैं अपने सारे काम छोड़ कर बैठ जाऊँ। अभी मुझे बहुत काम करने हैं। दामले को संभालना है। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत को संभालना है। बढ़िया ठिकाना ढूंढना है। इस शहर से दूर जाना है। मैं थक जाऊँगा सारे काम करते-करते...।”

“तुम दोनों पुलिस से नहीं बच सकते...।” कमिश्नर का कठोर स्वर कानों में पड़ा।

“बच जायेंगे। कानून मेरे लिए खेल है।” मीणा हंस कर बोला।

“तुम...”

“अब और वक्त खराब मत कर कमिश्नर। काम करने दे।”

मीणा ने कहा और मोबाईल कान से हटाकर, उसे बंद कर दिया सन्नाटा सा छा गया वहाँ।

देवराज चौहान अपनी जगह पर खड़ा सुधीर दामले को देखे जा रहा था।

सुधीर दामले, देवराज चौहान को देखने लगा था।

गहरा अंधेरा वहाँ मौजूद था।

कुछ कदमों पर पजेरो मौजूद थी, जिसमें डेढ़ सौ करोड़ की दौलत भरी पड़ी थी। पास ही अंधेरे में कॉटेज बड़ी चट्टान की तरह लग रही थी। आसमान में चन्द्रमाँ नहीं था। इस वजह से अंधेरा और गहरा गया था। देवराज चौहान और दामले सायों की तरह लग रहे थे इस वक्त। कुछ दूर हाइवे पर से वाहनों के तेजी से निकलने की आवाजें, कभी-कभार सुनाई दे जाती थीं।

“तुमने मुझे बरबाद कर दिया इन्दर प्रकाश मीणाऽ...ऽ...ऽ...” सुधीर दामले एकाएक चीख उठा।

देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।

“गैर कानूनी काम तुमने किए और पुलिस मुझे पकड़ लेना चाहती है।” दामले की आँखों में आंसू चमक उठे।

“रो मत...” मीणा की आवाज उसके होंठों से निकली।

“तूने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा...।” दामले की आँखों से आंसू बहकर गालों पर आ लुढ़के थे।

“मुझे दुःख है इस बात का। तब मैंने सोचा नहीं था कि ये सब हो जायेगा।”

दामले फफक पड़ा।

“रो मत। तू रोता है तो मेरा दिल भी दुखता है।”

“तेरा दिल?” दामले गुस्से से बोला- “तू तो सिर्फ आत्मा है। तेरा दिल है ही कहाँ?”

“इस वक्त तेरा दिल ही मेरा दिल है।”

“बरबाद कर दिया तूने मुझे। तू क्यों चुप है देवराज चौहान? देखा तूने कि मेरा क्या हाल हो गया है...।”

देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़े।

“कुछ बोलेगा नहीं?” दामले गालों पर आ चुके आंसुओं को साफ करता कह उन।

“क्या कहूँ मैं! ये तुम दोनों का आपसी मामला है।” देवराज चौहान बोला।

“ये कह कर तू बच नहीं सकता।”

“मैंने तो तेरे साथ कोई ना-इन्साफी नहीं की।” देवराज चौहान ने कहा।

“तूने इस पुलिस वाले का साथ दिया है।”

“मैंने इसे बचाया था। डकैती के हालातों को संभालना इसे नहीं आता, वो मैंने संभाला। ये ही किया मैंने।”

“तू बीच में ना आता तो ये पकड़ा जाता...।”

“दामले!” देवराज चौहान ने गभीर स्वर में कहा- “ये मारा भी जा सकता था।”

“क्या....मारा...।”

“हाँ। पुलिस दूबे की तरह इसे भी भून देती। इसका क्या है, शरीर तो तेरा है, गोलियाँ लगते ही ये तो तेरा शरीर छोड़कर चला जाता। परन्तु तू मर जाता। मैंने मीणा की सहायता करके, तेरा ही भला किया है।”

“अब और भला कर...”

“क्या?”

“इसे जाने को कह दे...।”

“मैंने कहा है, परन्तु ये नहीं मान रहा।” देवराज चौहान दबे स्वर में बोला।

“मुझे इससे नफरत हो गई है। इसे मेरे शरीर से निकल जाने को कह दे।” दामले थके स्वर में बोला

देवराज चौहान चुप रहा।

कुछ पल वहाँ खामोशी रही।

फिर सुधीर दामले के होठों से मीणा की आवाज निकली-

“दामले! अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। तेरे लिए मैंने ही परेशानी पैदा की है, मैं ही तेरी परेशानी दूर करूँगा।”

“वो कैसे?” पूछा दामले ने। ।

“अब तेरे को ये तो पता चल गया होगा कि तू पुलिस के हाथ लगा तो उम्र भर जेल में ही रहना पड़ेगा तुझे...।”

“ये सब तेरी वजह से होगा।” दामले ने गुस्से से कहा।

“मैं चाह कर भी पुलिस की निगाहों में तुझे बेगुनाह साबित नहीं कर सकता। परन्तु बिगड़े काम को बना सकता हूँ...।”

“बता तो...कैसे?”

“मेरे को अपना दोस्त मान ले। हम दोनों इस शरीर में...।”

“ये सिर्फ मेरा शरीर है।” दामले तेज स्वर में बोला।

“तो तझे भी अपने शरीर में रहने दे। अभी बाईस साल निकालने हैं मैंने। मैं तेरे को सारी मुसीबतों से दूर कर दूंगा। पुलिस तेरे को छू भी नहीं पायेगी। तेरा बहुत ध्यान रखूगा। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत से हम दोनों और तेरा परिवार मजे लेंगे। बहुत अच्छी जिन्दगी बितायेंगे हम। यहाँ से दिल्ली चले जायेंगे। वहाँ तू बहुत बड़ा बंगला खरीदेगा। नया नाम होगा तेरा। कारें, नौकर और परिवार के साथ दुनियाँ की सैर पर भी जायेगा तू। तेरे को बहुत सुख...।”

“और तू-तू कहाँ होगा तब?”

“तेरे भीतर। मैं तेरे भीतर इसी तरह रह कर दुनिया के मजे लूंगा और हम...”

“मुझे पसन्द नहीं कि तू मेरे शरीर में रहे।” दामले कह उठा।

“इतनी सी तो बात है, तू मान क्यों नहीं लेता?”

“ये तेरे लिए इतनी सी बात होगी, मेरे लिए नहीं। मैं तेरे को अपने साथ हर जगह नहीं ले जा सकता।”

“तू ऐसा क्यों सोचता है दामले। मुझ में और अपने में फर्क क्यों रखता है? तू ये सोच कर चल कि अब से हम दोनों एक ही हैं। धीरे-धीरे मैं तुझे अच्छा लगने लगूंगा...।”

“तू तुझे अपनी बातों में नहीं फंसा सकता।” दामले ने दृढ़ स्वर में कहा- “मेरे शरीर से निकल जा।”

“मेरी बात मानने में ही तेरा भला है।”

“मेरा भला तब होगा, तब तू मुझे छोड़ कर चला जायेगा।”

“फिर तू पुलिस से कैसे बच सकेगा?”

“वो मैं देखूगा कि मुझे क्या करना है। क्या तू मुझे छोड़कर जाने को तैयार है?”

“कभी नहीं...।”

“कमीना, कुत्ता है तू...।” दामले तड़प उठा

“मैंने डेढ़ सौ करोड़ की दौलत इसलिये नहीं लूटी कि तू उस पर ऐश करे।”

“तेरे से वादा करता हूँ कि मैं इस दौलत से ऐश नहीं करूँगा।” दामले बोला।

“तो क्या करेगा इसका?”

“मैं सारा पैसा पुलिस के हवाले कर दूंगा और खुद को भी। उसके बाद कानून को विश्वास दिलाने की कोशिश करूँगा कि मेरे शरीर ने जो कुछ भी किया, सब-इंस्पेक्टर मीणा ने किया। मैंने नहीं...।”

“खूब...।” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा- “तेरा ख्याल है कि कानून तेरी बात सुनेगा?”

“सुनाने की कोशिश करूँगा।” दामले ने दृढ़ स्वर में कहा।

“तू बेवकूफ है।”

“मैं स्वतंत्रता सेनानी का बेटा हूँ। मैंने गलत काम करना नहीं सीखा।

“भाड़ में गया तेरा स्वतंत्रता सेनानी बाप!” मीणा दाँत पीस कर कह उठा- “तू भी पागल है और तेरा बाप भी पागल था-जो अपनी औलाद को ऐसी शिक्षा दे गया। उसने तेरे को पैसे की कीमत नहीं समझाई?”

“मेहनत का पैसा ही...”

“चुप कर...चुप कर! नहीं तो मैं अपना सिर फोड़ लूंगा। तू सच में बेवकूफ है।” मीणा ने कहा, फिर देवराज चौहान से कह उठा- “तुम सुन रहे हो ना देवराज चौहान...।”

“हाँ...” देवराज चौहान ने कहा।

“इसे बताओ कि इसके विचार कितने गलत हैं।” मीणा झल्लाया।

“मैं इसके विचारों को गलत नहीं कह सकता।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।

“ये पैसे की कीमत नहीं समझ रहा...।”

“ये इसकी मर्जी कि बैंक डकैती के पैसे को किस नजर से देखता है ये। तुम अपनी जगह पर ठीक हो और ये अपनी जगह पर।”

“ये तो मानते हो ना कि पुलिस इसे नहीं छोड़ने वाली...।”

“मानता हूं...।” देवराज चौहान ने कहा।

“फिर इसका फायदा कहाँ है? मेरे साथ रहने में या सारी उम्र जेल में बिताने में...?”

“मैं स्वतंत्रता सेनानी का बेटा हूँ। इस तरह कानून से डर से कर नहीं भागूंगा।” सुधीर दामले कह उठा।

“पागल है। पूरा पागल है।” मीणा ने झल्ला कर माथे पर हाथ मारा- “स्वतंत्रता सेनानी को रोये जा रहा है। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत की अहमियत नहीं समझ रहा। तेरे को किसी ने बताया नहीं कि देश स्वतंत्र हो चुका है?”

“मालूम है। जानता हूँ कि...।”

“तो अब स्वतंत्रता सेनानी का जिक्र क्यों करता है? नेताओं की बात कर। दौलत की बात कर। फिल्मों की बात कर। योरोप और रूस की बात कर। चाँद और मंगल की बात कर। पर स्वतंत्रता सेनानी की बात मत कर। वो गुजरा जमाना है। मार्डन बन जा। दौलत के साथ जीना सीख। दुनिया के नये रंग देख और...।”

“मैं इस दौलत को इस्तेमाल करने की सोच सकता हूँ।”

दामले गम्भीर स्वर में कह उठा।

“ये हुई बात...” मीणा खुश हो उठा।

“पर तेरे को मेरे शरीर से बाहर जाना होगा।”

“ये क्या बात हुई? इस पैसे को हासिल करने में मेरा दिमाग और मेरी मेहनत है। मैं मजे ना लूं क्या?”

तभी देवराज चौहान कह उठा- “तुम अपना मोबाईल दो...”

“क्यों?”

“पुलिस कमिश्नर को, दूबे के फोन से तुम्हारा नम्बर मिल गया है। पुलिस मोबाईल फोन कम्पनी की सहायता से फोन की लोकेशन का पता लगा लेगी और कभी भी यहाँ पहुँच जायेगी।”

देवराज चौहान बोला।

“सत्यानाश...।” मीणा के होंठों से निकला- “ये बात मेरे दिमाग में क्यों न आई...”

“फोन दो...”

मीणा ने फोन निकाल कर, देवराज चौहान को दिया।

देवराज चौहान ने उसी पल फोन को नीचे गिराया और जूते से मसल कर अच्छी तरह तोड़ दिया। उसके बाद उसे चैक करके देखा कि वो चालू तो नहीं है। परन्तु वो टूट चुका था।

“मैंने देख लिया है कि तुम कैसे घटिया पुलिस वाले हो।” दामले बोला- “तुम मुझे क्या बचाओगे पुलिस से...।”

“मैं बचा लूंगा। तुम मेरा भरोसा तो...।”

“मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूँ कि तुम मेरे शरीर से बाहर निकल...”

“मैं जा रहा हूँ...।” तभी देवराज चौहान कह उठा।

“जा रहे हो-कहाँ?” मीणा कह उठा।

“मैंने इतनी देर ही तुम्हारे साथ रहना था। दूबे को पुलिस ने मार दिया है। वो आने वाला नहीं। मेरा यहाँ कोई काम नहीं है। दौलत तुम्हारे और दामले के पास है। अब जो भी करो, मुझे कोई मतलब नहीं...।”

“ये नहीं हो सकता।” मीणा बोला- “मैं अभी सुरक्षित नहीं हुआ। दौलत कहाँ छिपाऊँ, ये तो तुमने ही मुझे बताना है। वैसे भी अभी मेरे हालात ऐसे नहीं हैं कि तुम मेरे पास से जाओ। मैं अकेला रह जाऊँगा।”

“दामले तुम्हारे साथ है। इससे सलाह ले सकते ...।”

“ये स्वतंत्रता सेनानी की औलाद तो मुझे और दौलत को डुबो देगी...”

“जो भी हो, अब इस मामले से मेरा कोई मतलब नहीं। मैं जाऊँगा।”

“मैं तुम्हें इस तरह नहीं जाने दूंगा।” सुधीर दामले कह उठा- “इसने मेरे शरीर पर कब्जा कर रखा है।”

“तो मैं क्या करूँ?” बोला देवराज चौहान।

“इसे कहो कि मेरा शरीर छोड़कर चला...।”

“जब इसने तुम्हारे शरीर पर कब्जा किया था, तब मैंने हाँ नहीं भरी थी, जो तुम मुझे जिम्मेवार ठहराओ कि...।”

“मैं तुम्हें जिम्मेवार नहीं ठहरा रहा।” दामले ने बेचैनी से कहा- “परन्तु तुम्हारी जरूरत महसूस करता हूँ।”

“क्यों?”

“किसी को हम दोनों के पास रहना चाहिये। तुम देख ही रहे हो कि मैं कितना परेशान हूँ। ऐसी स्थिति में तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम मेरी सहायता करो...और मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिलाओ।” दामले ने कहा।

“परन्तु मीणा मेरी बात नहीं मान रहा। तुम्हारा शरीर छोड़ कर जाने को तैयार नहीं है।” देवराज चौहान ने कहा।

“अभी तुम यहीं रहो। मुझे छोड़कर मत जाओ। मुझे तुम्हारा बहुत सहारा है। क्योंकि तुम सारे हालात समझ रहे हो।” दामले ने कहा- “तुम चले गये तो मुझे लगेगा जैसे मैं अकेला रह गया हूँ। अभी मत जाओ। मुझे इस मुसीबत से छुटकरा पा लेने दो।”

देवराज चौहान दामले को देखने लगा।

“मैं भी चाहता हूँ कि तुम अभी यहीं रहो। दूबे मर चुका है।” मीणा ने गम्भीर स्वर में कहा- “गाड़ी में डेढ़ सौ करोड़ की दौलत पड़ी है। उसे संभालने के लिए मुझे तुम्हारी सहायता की जरूरत है। इधर, दामले ने मेरा दिमाग खराब कर रखा हैं...।”

“तेरा दिमाग है ही कहाँ जो खराब होगा?” दामले भड़क उठा- “सब कुछ तो मेरा है।”

“तेरी हर चीज आधी मेरी है।”

“मैं तेरे को अपने शरीर से बाहर निकाल के रहूँगा।” दामले दाँत किटकिटा उठा।

“मैं नहीं जाने वाला। अभी बाईस साल मुझे इस दुनियां में और बताने हैं।”

“तू कोई दूसरा शरीर ढूंढ ले...।”

“मुश्किल है। भटकती आत्मा को मन-पसन्द शरीर आसानी से नहीं मिलता, वैसे भी हर शरीर में प्रवेश नहीं किया जा सकता। इस बात के लिए बहुत कुछ देखना पड़ता है। मैंने तेरा शरीर छोड़ दिया तो दूसरा शरीर मिलना कठिन हो जायेगा। मैं वायुमंडल में भटकता रहूँगा।”

“मैं ऐसे हालात पैदा कर दूंगा कि तुझे मेरा शरीर छोड़कर जाना ही होगा।” दामले गुर्राया।

“अब तू कुछ नहीं कर सकता।”

देवराज चौहान आँखें सिकोड़े सुधीर दामले को देखे जा रहा था।

“देवराज चौहान।” दामले बोला।

“हाँ...।”

“मैं पुलिस के पास जाऊँगा। मैंने फैसला कर लिया है।” दामले ने दृढ़ स्वर में कहा।

“पुलिस के पास गया तो फंस जायेगा। मीणा ठीक कहता है कि तब बाकी जिन्दगी जेल में बीतेगी।” देवराज चौहान ने कहा। “जो भी हो, मैं पुलिस के पास जाऊँगा। कानून भी देख लेगा कि एक शरीर में दो की आत्मा बसी हुई है। मैं बोलूंगा तो मीणा भी बोलेगा। हमारी आवाजों में फर्क है। कानून समझ जायेगा कि...।”

मीणा हंस पड़ा, बोला- “मैं बोलूंगा ही नहीं पुलिस के सामने और तेरा काम भी खराब कर दूंगा।”

“कैसे?”

“मैं पुलिस वालों को चांटा मार दूंगा। चीजें उठाकर उन पर फैकुंगा। गालियाँ दूंगा। तब वो ये ही समझेंगे कि ये सब तू ही कर रहा है और अपने जुर्मों से बचने के लिए, ऊट-पटांग बात कर रहा है।”

“तू ऐसा नहीं करेगा।” दामले कलप कर बोला।

“ऐसा ही करूँगा मैं और तब पुलिस वाले तुझे खतरनाक अपराधी मान कर पिंजरे में जकड़ देंगे। जेल में तेरे को आठ बाई आठ की कोठरी में रख दिया जायेगा। तू इतना तंग हो जायेगा कि मौत की कामना करने लगेगा।”

“मैं तेरे से छुटकारा चाहता हूँ।” दामले तड़प उठा।

“ये ही नहीं हो सकता ।” मीणा ने शांत स्वर में कहा- “इसके अलावा तू जो कहेगा, तेरी बात मानूंगा।”

“कभी ना कभी तो मैं तेरे से पीछा छुड़ा ही लूंगा। मैं आत्महत्या कर लूंगा।”

“आत्महत्या में मैं तेरे को सफल नहीं होने दूंगा। मेरी सहमति के बिना तू कोई काम नहीं कर सकता।”

“तू भी तो मेरी सहमति के बिना अपनी मर्जी नहीं कर सकता।”

“हाँ। हम दोनों का अधिकार, इस वक्त शरीर पर आधा-आधा है।” मीणा बोला।

“तू मुझे बहुत परेशान कर रहा है मीणा...।” रो देने वाले स्वर में दामले कह उठा।

“तेरी जिद्द तेरे को परेशान कर रही है। तू मेरे साथ रहना स्वीकार कर ले सब ठीक हो जायेगा।”

दामले ने गहरी सांस ली।

मीणा कुछ ना बोला।

वहाँ शान्ति छाई तो देवराज चौहान पजेरो की तरफ बढ़ गया।

“तुम कहाँ जा रहे हो?” दामले ने उसे पुकारा।

“आराम करूँगा, गाड़ी में...।”

“जा तो नहीं रहे?”

“ये हिन्दुस्तान का नम्बर वन डकैती मास्टर है। लेकिन कायदे से शरीफ है।” मीणा ने कहा

“तू इसके भीतर चला जा...।”

“इस तरह मैं किसी के भी भीतर जा सकता तो फिर बात ही क्या थी...।” मीणा ने गहरी सांस ली।

“तो फिर मेरे भीतर तू कैसे आ गया?” दामले ने पूछा।

“रास्ता साफ मिला था मुझे...तो मैं तुरन्त तेरे शरीर में आया और शरीर पर कब्जा कर लिया।”

“रास्ता कैसे साफ मिलता है?”

“तू अपने बारे में सोच, फालतू के सवाल मत पूछ।” तभी देवराज चौहान पलट कर वापस आता कह उठा- “मीणा!” देवराज चौहान कुछ पहले ही ठिठक गया- “गाड़ी में खाना बिखरा पड़ा है। साफ कर...।”

“ओह हाँ!” मीणा ने सिर हिलाया- “तब दामले ने मेरी जगह छीननी चाही थी तो खाना गिर गया। मैं अभी साफ कर देता हूँ।” कहने के साथ ही दामले का शरीर पजेरो की तरफ बढ़ गया। देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई कि तभी उसका मोबाईल बज उठा।

“हैलो।” देवराज चौहान ने बात की।

“तुम ठीक हो?” जगमोहन की आवाज कानों में पड़ी।

“हाँ। तुम कहाँ हो?”

“पुलिस ने दूबे को शूट कर दिया। मैं वहाँ से बच निकला हूँ। मुझे किसी पुलिस वाले ने नहीं पहचाना। वहाँ पर ऐसा मौका नहीं था कि, मेरे को पहचान पाते। वहाँ हड़बड़ी मची हुई थी।”

“ये अच्छा हुआ।”

“तुम कहाँ हो? मीणा कहाँ है?”

“मैं मीणा के साथ ही हूँ...।”

“कहाँ हो, मैं आ जाता हूँ...।”

“तुम्हारे आने की जरूरत नहीं। बंगले पर जाओ। मैं फुर्सत पाकर बंगले पर आ जाऊँगा।” देवराज चौहान ने कहा।

“डेढ़ सौ करोड़ कहाँ है?” जगमोहन की आवाज कानों में पड़ी।

देवराज चौहान ने फोन बंद किया और जेब में रख लिया।

पजेरो की डोम लाईट जलाए मीणा, या ये कहा जाये कि मीणा दामले के शरीर का इस्तेमाल करते हुए सीटों पर बिखरा खाना साफ कर रहा था।

देवराज चौहान, सुधीर दामले को देखे जा रहा था।

दामले वास्तव में अजीब से हालातों में फंसा पड़ा था। मीणा की आत्मा उसके शरीर में थी और बाहर निकलने को तैयार नहीं थी। वो इस वक्त एक शरीर और दो इन्सान थे।

देवराज चौहान को दामले से सहानुभूति थी

परन्तु वो चाहकर भी दामले की सहायता नहीं कर सकता था।

क्योंकि मीणा की आत्मा उसके शरीर से निकलने को तैयार नहीं थी

कुछ देर बाद मीणा की आवाज आई- “साफ कर दिया देवराज चौहान...।”

देवराज चौहान पजेरो की तरफ बढ़ गया।

पास पहुँच कर ड्राईविंग डोर खोला और सीट पर जा बैठा। थोड़ी सी सीट पीछे की, ताकि टांगें फैला सके और सीट की पुश्त को भी पीछे किया, परन्तु वो ज्यादा पीछे ना हुई, क्योंकि पीछे नोटों से भरे थैले पड़े थे।

देवराज चौहान सीट पर पसर गया। बाहर खड़े सुधीर दामले को देखा। अंधेरे में उसके होंठ हिलते तो देख नहीं पाया, लेकिन इतना समझ गया कि दामले और मीणा बातें कर रहे होंगे देवराज चौहान ने गहरी सांस ली और आंखें बंद कर लीं। इस वक्त तो दामले और मीणा की भी अजीब दास्तान हुई पड़ी थी। कोई सुने तो भरोसा ना करे। तभी पजेरो का दरवाजा खुला और दामले भीतर आ बैठा।

दरवाजा बंद हो गया।

“तेरे को भूख लग रही होगी देवराज चौहान?” मीणा ने पूछा।

“नहीं...।” देवराज चौहान ने आंखें बंद ही रखीं।

“मुझे अफसोस है कि खाना गिर गया...।”

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा। कुछ खामोशी रही, फिर दामले की आवाज आई- “देवराज चौहान?”

“हाँ...।” इसी मुद्रा में बोला देवराज चौहान।

“मुझे बता, मैं क्या करूँ”

“तेरे हालात तू ही जाने...।”

“तेरे को भी तो सब पता है देवराज चौहान। ऐसे में तू मुझे राय तो दे सकता है।” दामले ने बेचैनी से कहा।

“कुछ समझ नहीं आता कि क्या कहूँ... । देवराज चौहान ने आँखें खोल के उसे देखा।

“इस सारे मामले में मीणा गलत है ना?”

“हाँ...। मीणा की गलती ये है कि मेरे शरीर में घुस कर इसने जो किया, वो तेरे को भुगतना पड़ेगा।” देवराज चौहान का स्वर गभ्भीर था।

“मुझे कुछ रास्ता दिखा कि मैं क्या करूँ...।”

“मीणा को अपने शरीर से बाहर निकाल दे।”

मीणा हंस पड़ा।

“ये मेरे बस में नहीं है। इसने अच्छी तरह अपनी पकड़ बना रखी है।” दामले बोला।

“मौके की तलाश में रह कि जब तू इसे अपने शरीर से निकाल सके।”

“शायद ये सम्भव नहीं।” दामले ने दुखी स्वर में कहा- “ये अपनी मर्जी से ही मेरा शरीर छोड़ कर जा सकता है, वैसे नहीं।”

“फिर तो ये तेरे लिए परेशानी वाली बात है।” देवराज चौहान ने कहा।

“हाँ, तभी तो पूछ रहा हूँ कि...।”

“अगर तू इसे बाहर नहीं निकाल सकता तो तेरी मजबूरी है कि तू इसके साथ दोस्ती करे।”

“दोस्ती?”

“तू इसकी बात माने और ये तेरी। दोनों एक ही शरीर में प्यार से रहो, तभी वक्त कटेगा।”

“मैं इसे अपने भीतर नहीं सह सकता...।”

“सहना पड़ेगा। धीरे-धीरे तेरे को इसकी आदत पड़ जायेगी। ये तो पक्का है कि तू पुलिस के हाथ लगा कि सारी उम्र के लिये जेल में पहुँच गया, जबकि तूने कोई जुर्म नहीं किया। जेल से बचना है तो मीणा की बात मान, ये ठीक कह रहा है कि किसी दूसरे शहर में दौलत के साथ चले जाओ और वहाँ खामोशी से, पुलिस से दूर रहा जा सकता है।”

“तुम्हारा मतलब कि मीणा को मुझे सहना होगा?”

“इसे अपने शरीर से नहीं निकाल सकता तो फिर सहना ही होगा।”

दामले गहरी सांस लेकर रह गया।

“मेरे बस में होता तो मैं मीणा को तेरे शरीर से जरूर निकाल देता।” देवराज चौहान ने कहा।

मीणा हंस पड़ा।

“हंस मत कमीने...।” दामले ने खींझ कर कहा।

“तुम दोनों मेरे खिलाफ साजिश रच रहे हो और मैं हँस भी नहीं सकता।” मीणा ने कहा।

“तू बुरा है।”

“मैं मजबूर हूँ, किस्मत का मारा हूँ... । मैं भी सोचता हूँ कि मेरा शरीर होता तो कितना अच्छा होता! पर तू मेरे दिल की बात क्या समझेगा। तू तो सिर्फ यही रट लगाए हुए है कि मैं तेरे शरीर से चला जाऊँ...”

“हाँ, मैं आजाद रहना चाहता हूँ। तेरे से बंध कर नहीं रहना चाहता।”

“दामले।” देवराज चौहान बोला- “इस स्थिति में तुम दोनों को मिल कर चलना चाहिये।”

“मेरा परिवार है। अपने परिवार के साथ मैं इसे क्यों रखू?” दामले ने कहा।

“मैंने डेढ़ सौ करोड़ की दौलत भी तो इकट्ठी की है। उसके मजे क्या तेरा परिवार नहीं लेगा?”

“मेरी पत्नी है।’

“तो?”

“मैं उसके पास जाऊँगा तो मुझे पसन्द नहीं कि तब तू भी सब मजे ले। सब देखे।” दामले बोला।

“इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? तेरे शरीर में हूँ तो ये सब होगा ही।”

“ऐसा नहीं हो सकता कि उस वक्त के लिए तू मेरे शरीर से निकल जाये?”

“मुझे बेवकूफ समझता है?” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा- “मैं तेरे शरीर से निकला नहीं कि तूने सारी जगह पर अपना ही अधिकार कर लेना है। मैं तेरी बातों में फंसने वाला नहीं दामले।”

दामले ने कुछ नहीं कहा।

“मैं तेरे को तंग नहीं करना चाहता।” मीणा बोला- “परन्तु मेरी भी मजबूरी है...मैं...।”

“कानून की नजरों में तूने मेरे को फंसा कर बुरा किया।”

“जानबूझ कर नहीं किया मैंने...। बस हो गया।” मीणा ने शांत स्वर में कहा- “मुझे कोई शरीर चाहिये था तब। तू क्या समझता है कि उस दिन चौराहे पर तेरे को जो कार ने टक्कर मारी, वो इत्तफाक था?”

“क्या मतलब?” दामले चौंक कर कह उठा।

देवराज चौहान ने भी सुधीर दामले को देखा।

“वो एक्सीडेंट अपने आप नहीं हुआ था, मैंने करवाया था।”

मीणा गम्भीर स्वर में बोला- “क्योंकि कोई शरीर पाने को मैं बेचैन हो रहा था...”

“तूने कैसे करवाया?”

“तब तू सड़क पार कर रहा था दामले। ट्रेफिक लाल बत्ती पर रुका हुआ था। आत्मा के रूप में तब मैं चौराहे पर ही था और शरीर की तलाश में था। जब तुझे सड़क पार करते देखा तो मैंने लालबत्ती पर सबसे आगे खड़ी कार के चालक को, उसके शरीर के भीतर घुसने की चेष्टा करके, मैंने उसे परेशान कर दिया। हालांकि इस प्रकार मैं किसी के शरीर के भीतर नहीं घुस सकता, परन्तु परेशान किसी को भी कर सकता हूं, वो मैंने तब किया। उसने परेशानी में बिना-सोचे समझे कार आगे बढ़ा दी और तेरे से जा टकराई वो कार...”

“फिर?” दामले कह उठा।

“बस, फिर मैं तेरे शरीर में आ गया।” मीणा गम्भीर था।

“कैसे आ गया? कार टकराने का, तेरे भीतर आने का क्या सम्बन्ध?” दामले ने पूछा।

मीणा चुप रहा।

“मेरी बात का जवाब दे।” दामले पुनः बोला।

मीणा ने कुछ नहीं कहा।

“मीणा।” देवराज चौहान बोला।

“हाँ...।” मीणा की आवाज दामले के होंठों से निकली

“तू अपने बारे में बता कि तेरी जान कैसे गई, फिर क्या हुआ?” देवराज चौहान ने कहा।

“ये इन्सानों के समझ में आने वाली बात नहीं है।” मीणा ने कहा।

“तू बता तो...।” दामले ने व्याकुल स्वर में कहा।

“मैं जानना चाहता हूँ तेरे बारे में सब कुछ। तू बाईस साल की क्या बात कह रहा था...।”

मीणा ने गहरी सांस ली।

“बता दे अब, इतने नखरे क्यों करता है?” दामले तीखे स्वर में बोला।

“बताता हूँ।” मीणा की आवाज में गम्भीरता थी- “उस दिन मेरा मूड बड़ा अच्छा था। घर से मैं पुलिस स्टेशन पहुंचा था। सुबह नाश्ते में सावी ने अपने हाथों से मुझे पूड़ी-आलू खिलाये थे। वो वक्त अकसर मुझे याद आता है। खैर, उस दिन दो घंटे मैं पुलिस स्टेशन में रहा, फिर मोटर साईकिल उठाकर भायखला चल दिया। नौकरी से वास्ता रखता ही काम था उधर। अकेला ही पुलिस स्टेशन से मोटर साइकिल पर निकला था। दिन के बारह बज रहे थे। तब मैं नहीं जानता था कि मेरे साथ क्या होने वाला है। मेरी किस्मत क्या रंग दिखाने वाली है। पता होता तो मैं पुलिस स्टेशन से ही

ना निकलता।”

“और तु मर गया ?”

“हाँ। मैं मर गया। तब मुझे ये समझने का भी मौका नहीं मिला कि मैं मरने जा रहा हूँ। मैं नीचे गिरा कि तभी एक बस मेरे ऊपर चढ़ गई। मेरा शरीर कुचला गया। तभी मैंने खुद को बहुत हलका महसूस किया। मैंने अपने आपको हवा में लटके पाया। तब मुझे महसूस हुआ कि अब मैं हवा में भी उड़ सकता हूँ। कुछ देर के लिए मुझे ये सब बहुत अच्छा लगा। मैं तब नीचे देख रहा था। सड़क पर मेरी मोटरसाईकिल पड़ी थी। बस के नीचे मेरा कुचला शरीर पड़ा था और लोग इकट्ठे होकर ड्राईवर को बाहर निकाल

कर उसे मार रहे थे।” मीणा ने तड़प भरे स्वर में कहा।

“मतलब कि तुम अपनी मौत का नजारा देख रहे थे।” दामले बोला।

“हाँ।” मीणा ने उदास स्वर में कहा- “जब मुझे एहसास हुआ कि मैं मर गया हूँ तो पागल हो गया मैं। मैं अपने कुचले पड़े शरीर में वापस जाने का प्रयास करने लगा। लोग ड्राईवर को मार रहे थे और मैं चिल्ला-चिल्ला कर उन्हें कह रहा था कि मुझे हस्पताल ले चलो। जल्दी करो, शायद में बच जाऊँ। परन्तु मेरी आवाज कोई नहीं सुन रहा था।”

“क्योंकि तुम मर चुके थे...”

“हाँ दामले। तब मैं इन्सान नहीं रहा था। मेरे शरीर से आत्मा बाहर आ गई थी। शरीर कुचल कर खराब हो गया था। मैं इन्सान होता तो मेरी आवाज सबने सुन ली होती। परन्तु आत्मा की आवाज इन्सान नहीं सुन सकता। उसे कोई देख भी नहीं सकता। मैं तड़प रहा था, रो रहा था, अपने शरीर को देखकर। परन्तु मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं था। सड़क पर भीड़ बढ़ती जा रही थी। वो ड्राईवर जो बस चला रहा था, वो अधमरा सा होकर सड़क पर पड़ा था। उसके शरीर के कई हिस्सों से खून निकल रहा था। लेकिन तकलीफ तो मुझे थी। क्योंकि मैं मर गया था। मैं परेशान होकर अपने कुचले शरीर के गिर्द ही चक्कर काटे जा रहा था। तभी मेरे पास कुछ

आत्माएं और आ गई। पहले तो उन्होंने सारा माजरा समझा, फिर मुझे ढांढस देने लगी और कहने लगी कि तुम मर गये हो। अब परेशान क्यों होते हो! इंसानी जीवन से बाहर निकलकर तुमने मुक्ति पा ली। लेकिन मुझे तो सावी याद आ रही थी। मैं सावी के बिना नहीं रह सकता था। वो शाम को घर पर मेरे वापस आने का इन्तजार करेगी। जब उसे पता चलेगा कि मैं मर गया हूँ तो उसका बुरा हाल हो जायेगा। मैं जिन्दा हो जाना चाहता था, परन्तु मेरा शरीर तो कुचला जा चुका था। कुछ ही देर में वहाँ पुलिस आ गई। पुलिस कुछ देर बाद मेरे शरीर को गाड़ी में डाल कर ले गई। उस ड्राईवर को भी ले गई। मेरी मोटर साईकिल और बस भी ले गई। फिर फौरन ही सड़क पर ट्रेफिक दौड़ने लगा कि जैसे वहाँ कुछ हुआ ही ना हो। लेकिन मैं मर गया था।”

मीणा की आँखों में आंसू आ गये थे।

“फिर?” दामले कह उठा।

“मैं अपने शरीर के पीछे जाना चाहता था, परन्तु वहाँ मौजूद आत्माओं ने मुझे समझाने की कोशिश की कि मरने के बाद इस तरह परेशान होने की जरूरत नहीं। वे मुझे अपने-अपने किस्से सुनाने लगीं। लेकिन मेरा ध्यान तो अपने शरीर पर था। सावी की तरफ था। मैंने उनकी बात पूरी सुनी भी नहीं और अपने शरीर की तरफ चल दिया। जल्दी ही मैंने एक हस्पताल में अपने शरीर को ढूंढ लिया। निचले दर्जे का एक कर्मचारी मेरे शरीर पर कफन

चढ़ा रहा था। कुछ पुलिस वाले पास ही खड़े बातें कर रहे थे कि रात नौ बजे डाक्टर आकर पोस्टमार्टम करेगा। मैं पागल हो रहा था कि ये मेरे शरीर के साथ क्या कर रहे हैं और...।”

“पर तुम तो तब मर चुके थे?” दामले कह उठा।

देवराज चौहान ध्यान से मीणा की बात सुन रहा था।

“हाँ, मर चुका था, परन्तु अपना मरना मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा था।”

“ओह...”

“मैं वहाँ से सीधा पुलिस स्टेशन पहुँचा। वहाँ सारे काम पहले जैसे ही चल रहे थे। परन्तु वहाँ पुलिस वाले एक-दूसरे को मेरी मौत के बारे में बता रहे थे। एक्सीडेंट के बारे में बातें कर रहे थे। मैं तड़प रहा था। मैंने उन लोगों को बताने की चेष्टा की कि मैं जिन्दा हूँ, परन्तु मेरी बात कोई नहीं सुन रहा था, जैसे मेरी आवाज उन तक पहुँच ही ना रही हो। मैं पागल होता जा रहा था। तभी मैंने एक पुलिस वाले को कहते सुना कि साहब अभी-अभी मेरे मरने की खबर देने, मेरे घर गये हैं।”

“साहब कौन...? ए.सी.पी. कामराज तो नहीं?”

“नहीं। वो इंस्पेक्टर रामदीन था। जिसने सावी को, घर जाकर मेरे मरने की खबर दी थी। परन्तु मैं उसके पहले ही अपने घर जा पहुँचा। तब सावी नहा कर साड़ी बांध रही थी। वो बहुत खूबसूरत लग रही थी और गुनगुना रही थी, साड़ी बांधते हुए। कुछ देर तो मैं सब भूल कर उसके खूबसूरत चेहरे को देखता रह गया। उसका चेहरा मुझे हमेशा ही अच्छा लगता था। मैं कई बार उसका चेहरा देखने में खो जाता था और वो शरारत से कहा करती थी, आँखें फाड़ कर क्या देख रहे हो। तब मुझे ध्यान आया कि आज सावी ने बाजार जाने को कहा था, वो बाजार जाने को तैयार हो रही होगी। मैंने उसे पुकारा, उससे बात करनी चाही। परन्तु उसे नहीं पता चला कि मैं वहाँ हूँ। मेरा शरीर तो था नहीं कि जिसे वो देख पाती, और आत्मा को इन्सान देख नहीं सकते। सुन नहीं सकते। मैं तड़पता रहा कि सावी मुझे देख-सुन नहीं रही। घर के नौकर अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। परन्तु किसी ने भी मुझे देखा-सुना नहीं, जबकि मैंने सब से बात की। सावी तैयार हुई ही थी कि नौकर ने आकर कहा, इंस्पेक्टर साहब आये हैं। मैं समझ गया कि इंस्पेक्टर रामदीन मेरी मौत की खबर देने आ पहुँचा है।”

“तुमने अपनी मौत के बाद, सब कुछ अपनी आँखों से देखा...?” दामले बोला।

“हाँ। मैं सब को अपने जिन्दा होने का एहसास दिलाना चाहता था और...”

“जिन्दा होने का एहसास? पर तुम तो मर चुके थे।”

“लेकिन मैं खुद को जिन्दा ही मान रहा था। अपनी मौत को स्वीकार करना आसान नहीं होता, मरने के बाद।”

“ओह...फिर क्या हुआ?”

“इंस्पेक्टर रामदीन ने सावी को बताया कि एक्सीडेंट में मेरी मौत हो गई है। सुनते ही सावी पछाड़ खाकर गिर गई। मैं सावी का ये हाल न देख सका और घर से बाहर आ गया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किधर जाऊँ... कि तभी दो सेहतमंद आकृतियां मेरे पास आ पहुंची, हाथ में मोटा सा रजिस्टर जैसा थाम रखा था। उन्होंने मुझे बताया कि वे जीवन-मृत्यु का हिसाब रखने वाले हैं, उन्होंने मेरा नाम पूछा। ये जान कर कि मैं पुलिस

वाला हूँ, उन्होंने कहा कि हम उन इन्सानों को नहीं देखते, जो जीवन में पुलिस वाले होते हैं। तुम्हारे लिए दूसरा आयेगा। वे दोनों चले गये। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा कि मेरे साथ क्या हो रहा है! अब मेरा कोई घर ठिकाना नहीं था। कुछ ही देर बीती कि पतली-सूखी आकृतियां मेरे पास पहुंच गईं। उन्होंने भी हाथ में रजिस्टर जैसी चीज थाम रखी थी। मेरा नाम पता पूछा, फिर उन्होंने रजिस्टर देखकर बताया कि अभी तो तुम्हारी मौत नहीं लिखी। तुम्हें बाइस बरस और जीना है। सुनकर मैं बहुत खुश हुआ। परन्तु जब उन्हें पता लगा कि मेरा शरीर कुचला गया है और मैं दोबारा उसमें नहीं जा सकता तो उसने कहा कि तुम बाईस बरस से पहले स्वर्ग

या नर्क में जगह नहीं पा सकते। क्योंकि 72 वर्ष तुम्हारा जीवन चलना है। उनकी किताब में येही लिखा है। मैंने उन्हें बहुत कहा कि अब तो मेरा शरीर खराब हो गया है, मुझे रख लो। नर्क मे ही जगह दे दो। परन्तु उन्होंने कहा कि वो नियम के विरुद्ध नहीं चल सकते। ऐसी बहुत सी आत्माएं यहाँ घूमती रहती हैं, जिन्हें अभी बरसों का इन्तजार करना है, स्वर्ग या नर्क में जगह पाने के लिए। उसने मुझे उन आत्माओं की टोली में शामिल हो जाने की सलाह दी। मैं नहीं माना और जिद्द करता रहा, स्वर्ग या नर्क में जगह मिल जाये। इस पर उसने मुझे बताया कि किस प्रकार मैं किसी इन्सानी शरीर में प्रवेश कर के, बाकी के 22 बरस बिता सकता हूँ।”

“तो ये बात तुम पहले नहीं जानते थे?” दामले ने पूछा।

“नहीं। दूसरी दुनिया की बातें मुझे क्या पता! किसी के शरीर में प्रवेश करने का रहस्य बता कर वो दोनों आकृतियाँ चली गई और मैं इस जमीन पर कोई ऐसा आदमी ढूंढने लगा, जिसमें मैं प्रवेश कर सकूँ।”

“किसी के शरीर में प्रवेश करने का क्या रहस्य बताया उन आकृतियों ने?” दामले ने उत्सुकता से पूछा।

“ये बाद में बताऊँगा।” मीणा ने सीट पर बैठे ही बैठे करवट ली।

“तुम्हारी बातें सुनकर मुझे बहुत मजा आ रहा है, आगे बताओ।” दामले बोला।

“एक हस्पताल में मुझे एक औरत मिली, उसके शरीर की भीतर हालत ऐसी थी कि मैं भीतर प्रवेश कर सकता था। परन्तु सारी जिन्दगी मैं मर्द बनकर जिया तो मैं बाकी के बाईस बरस औरत बन कर कैसे रह सकता था? मैंने उसके शरीर में प्रवेश नहीं किया और ढूंढता रहा किसी मर्द को, जिसके शरीर में मैं प्रवेश कर सकूँ।”

“और तेरे को मैं मिला, फिर?”

“जब मैं बहुत परेशान हो गया, तो मैंने फिर उन दोनों आकृतियों को तलाश करके नर्क-स्वर्ग में कहीं पर जगह मांगी,परन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। वो नियम से बंधे हुए थे। इसी तरह मुझे पन्द्रह दिन बीत गये। परन्तु ऐसा कोई भी नहीं मिला, जिसके शरीर में मैं प्रवेश कर पाता और पन्द्रहवें दिन की सुबह मैंने फैसला किया कि किसी के शरीर में प्रवेश करने का रास्ता मुझे चक्कर चला कर बनाना पड़ेगा। मैं तब उसी चौराहे पर मंडरा रहा था, जिसके पास ही तुम्हारा घर है। तभी मैंने तुम्हें सड़क पार करते देखा। ट्रेफिक लालबत्ती पर रुका हुआ था। मैंने तुम्हें पहले बताया ही है कि कैसे मैंने एक कार से तुम्हारा एक्सीडेंट कराया और तब मैं तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गया।”

“एक्सीडेंट का मेरे शरीर में प्रवेश करने से क्या मतलब?”

दामले के होंठों से निकला।

“गहरा नाता है। दरअसल इन्सानों के शरीर में, दिल के पास बहुत

छोटा सा छेद होता है, जो कि मांस से ढका रहता है। वो ही छेद हमारे शरीर में रहने वाली आत्मा का घर होता है। वो ही आत्मा हमारे शरीर का संचालन करती है। आत्मा एक बिन्दु की तरह होती। सफेद, नर्म छोटा सा बिन्दु उस छेद में मौजूद रहता है। छेद, माँस से ढका रहता है। परन्तु जब-जब हमारे शरीर को जानलेवा तकलीफ होती है तो वो छेद खुल जाता है और उसमें मौजूद आत्मा बार-बार उस छेद से अन्दर बाहर होती है और फैसला लेती है कि अभी उसे इस शरीर में रहना है कि नहीं...।”

“हाँ।” दामले ने गहरी सांस ली- “अब तो ये बात मैं भी जान गया हूँ...।”

“तो पूछा क्यों?”

“यूं ही तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता था।”

“जब तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ, तुम उछल कर गिरे तो उसी वक्त तुम्हारे शरीर में मौजूद, तुम्हारी आत्मा वाला छेद खुल गया और आत्मा भीतर-बाहर होने लगी। बस मुझे इतना ही वक्त चाहिये था। मैं फौरन खुले मुँह से भीतर प्रवेश कर गया और तुम्हारी आत्मा के उस छेद पर मैंने कब्जा जमा लिया। यानि कि शरीर तुम्हारा था और तुम्हारे शरीर को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा चलाने लगा। और तुम छेद के बाहर ही रहे और भीतर आने का प्रयास करने लगे। परन्तु मैंने तुम्हारी आत्मा को भीतर नहीं आने दिया।

लेकिन तुम अपनी भरपूर कोशिश करते रहे। आखिरकार तुम सफल हुए, आधे सफल हुए। तुमने आत्मा के रहने के आधे स्थान को हासिल कर लिया।”

दामले ने गहरी सांस ली।

मीणा पुनः कह उठा- “तुम्हारे शरीर को हासिल करने के बाद मैंने खुद को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही माना। मैं भूल गया कि मैं मर चुका हूँ और दूसरे के शरीर में हूँ, मैं खुद को इन्दर प्रकाश मीणा साबित करने लगा। गुस्से में आकर मैंने सब-इंस्पेक्टर रंजीत को मारा। बैंक पर कब्जा किया। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत ले भागा और...”

“और मेरी जिन्दगी बरबाद कर दी।” दामले थके स्वर में बोला।

“ये सब मैंने जानबूझ कर नहीं किया।” मीणा ने कहा।

देवराज चौहान ने आँखें बंद कर लीं।

“मेरे शरीर में आने का तुम्हें क्या फायदा मिला? कुछ भी नहीं। पुलिस के लिए, दुनिया के लिए, तुम मर चुके हो। सावी कामराज के साथ शादी करने जा रही है...। मुझे भी खामखाह परेशान कर रहे हो...”

“मेरी बात सुनकर तुम समझ गये होगे कि किसी के शरीर में रहना मेरी मजबूरी है। मैंने अभी 22 साल इस दुनिया में बिताने हैं। दूसरी आत्माओं की तरह मैं भटकते नहीं रहना चाहता। शायद वे आत्माएं ये नहीं जानतीं कि किसी के शरीर में कैसे प्रवेश किया...।”

“मैं तो इतना जानता हूँ कि तुमने मेरा जीना मुहाल कर दिया है।” दामले ने कहा।

“देवराज चौहान...।” मीणा बोला- “तुमने सब सुना, जो मैंने कहा?” मीणा कह उठा।

“हाँ...।” देवराज चौहान ने आँखें खोलीं।

“तो तुम ही बताओ कि मैं क्या करूँ अब? क्या मैंने गलत किया दामले के शरीर में आकर?”

“दामले के शरीर में आकर तो तुमने गलत ही किया।”

देवराज चौहान ने कहा- “लेकिन तुम्हारी आपबीती सुन कर मुझे अफसोस हुआ...। मेरी मजबूरी ये है कि मैं तुम दोनों के लिए ही कुछ नहीं कर सकता।”

“मेरे साथ पहली बुरी बात ये हुई कि बस वाले ने मुझे मार दिया। दूसरी बुरी बात हुई कि मेरे से सावी दूर हो गई। तीसरी ये गलत बात हुई कि मेरे को स्वर्ग-नर्क में जगह नहीं मिली, क्योंकि मैं वक्त से पहले मर गया था। फिर बुरा ये हुआ कि अब दामले मुझे परेशान कर रहा है कि मैं इस शरीर से निकल जाऊँ। आखिर जाऊँ तो कहाँ जाऊँ देवराज चौहान?”

देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।

“पर तू मुझे क्यों तकलीफ दे रहा है?” दामले बोला।

“अब भी तेरे को लगता है कि मैं तुझे तकलीफ दे रहा हूँ? तेरे को मेरे बारे में सुनकर दुःख नहीं हुआ?”

“हुआ...” दामले ने गहरी सांस ली।

“फिर ये क्यों कहता है कि मैं तुझे तकलीफ दे रहा हूँ। मैं तो खुद तकलीफ का मारा हूँ...।”

“तो मैं क्या कहूँ, तू मेरे शरीर पर कब्जा जमाए हुए क्यों है? चला जा यहाँ से।”

“ये कहकर तू मुझे और दुःख देता है...।”

“पहले मैं अपने बारे में सोचूंगा कि तेरे बारे में सोचूंगा?” दामले बोला।

“तू ये सोच कि अब हम दोनों एक ही हैं।” मीणा ने कहा- “हम दोस्त हैं, हम भाई हैं, हम...।”

“तूने मेरा सत्यानाश कर दिया है। तू मेरा दुश्मन है। कानून की नजरों में तूने मुझे मुजरिम बना दिया है।”

“जानबूझ कर नहीं किया मैंने...।”

“मैं अपनी पत्नी तारा से बात करना चाहता हूँ।” दामले बोला।

“कर ले, मैं भला तुझे क्यों रोकूंगा!” मीणा ने कहा।

“तू बीच में नहीं बोलेगा।”

“नहीं बोलूंगा। पर तू तारा से कैसे बात...।”

“तू मेरी पत्नी का नाम मत ले। मुझे अच्छा नहीं लगता।” दामले उखड़े स्वर में बोला।

“मानी तेरी बात। तू कैसे अपनी पत्नी से बात करेगा? फोन तो देवराज चौहान ने तोड़...।”

“देवराज चौहान के पास भी तो मोबाईल होगा? क्यों देवराज चौहान, तुम्हारे पास फोन है?”

“हाँ। अगर फोन आने के बारे में तुम्हारी पत्नी ने पुलिस को बता दिया तो पुलिस मेरे फोन नम्बर का पता लगाकर हम तक पहुँच सकती है। ये खतरे वाली बात हो जायेगी।” देवराज चौहान ने कहा।

“मैं तारा को समझा दूंगा, वो मेरी बात समझ जायेगी।”

“इन हालातों में तुम्हारे घर के बाहर पुलिस जरूर होगी। शायद तुम्हारे घर का नम्बर भी टैपिंग पर ले रखा हो...।”

“मैं तारा के मोबाईल पर फोन करूँगा।”

“तुम्हारी मर्जी, वैसे ऐसा करना खतरे से भरा है।”

“सब ठीक है। तुम मेरा विश्वास करो। अपना फोन दो।”

देवराज चौहान ने सुधीर दामले को फोन दिया।

दामले मोबाईल पर तारा के नम्बर मिलाने लगा।

“नई मुसीबत मत खड़ी कर देना।” मीणा बोला।

“तुम चुप ही रहो तो अच्छा है।” दामले ने मुँह बनाकर कहा। नम्बर लग गया। दूसरी तरफ बेल जाने लगी।

दामले फोन कान से लगाए, उधर से तारा की आवाज सुनने का इन्तजार करने लगा।

“हैलो...।” तभी तारा का भर्राया स्वर कानों में पड़ा।

“तारा...।” दामले का स्वर खुशी से काँप उठा।

दो पल तो तारा की आवाज नहीं आई।

दामले समझ गया कि उसकी आवाज सुनकर तारा को यकीन नहीं आ रहा होगा कि वो है।

“तारा मैं हूँ...मैं...सुधीर...दामले...। तुम्हारा पति...”

“अ...आप...?” तभी तारा का कांपता स्वर कानों में पड़ा।

“हाँ तारा...मैं...।” दामले की आँखों में आंसू भर आये- “तू...तू कैसी है तारा?”

“मैं तो ठीक हूँ, परन्तु...परन्तु आपने ये क्या कर रखा...।”

“तेरे पास तो कोई नहीं ?” पूछा दामले ने।

“नहीं। पुलिस के पास से अभी घर लौटी हूँ। परन्तु आप कहाँ हैं?” तारा की आवाज में तड़प थी।

“मैं?” दामले की आवाज सोच भरी हो गई- “मैं...अब तुझे क्या बताऊँ...?”

“पुलिस कहती है कि आपने एक खून किया है। बैंक डकैती तो आपने मेरे सामने ही की है...। ये आपको क्या हो गया? क्या कर...”

“तारा!” तड़प उठा दामले- “क्या तेरे को लगता है कि मैं ये सब करूँगा?”

“नहीं, परन्तु बैंक डकैती तो आपने मेरे सामने की है। मैं...मैं भी वहाँ थी। आप मुझे फोन पर गालियाँ दे रहे...।”

“व...वो मैं नहीं था तारा।” दामले ने होंठ भींच कर कहा।

“क्या मतलब?”

“अब मैं तेरे को क्या समझाऊं कि...।”

“आप...आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही। आप घर क्यों नहीं आ जाते...”

“घर? नहीं, मैं घर नहीं आ सकता। पुलिस मुझे पकड़ लेगी। मैं...”

“सब ठीक हो जायेगा, आप घर आ जाईये...”

“बात को समझो तारा, मुझ पर हत्या का इल्जाम है, डकैती का इल्जाम है। पुलिस मुझे जेल में डाल देगी।”

“आपने ये सब क्यों किया? आप तो ऐसे ना थे...।”

“वो...वो उस दिन सुबह चौराहे पर मेरा एक्सीडेंट हुआ था...। कार ने मुझे टक्कर...।”

“ये बात मैंने पहले आपसे कितनी बार कही थी, परन्तु आप नहीं माने और...”

“मेरे सिर में चोट लगी थी तब...और मैं अपने को भूल गया। मुझे कुछ भी याद नहीं रहा। घर-परिवार, राहुल जो पूना में पढ़ रहा है, कुछ भी याद नहीं रहा...और मैं अपने को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा समझने लगा...।”

“हाँ, मुझे याद है, आप अपने को सब-इंस्पेक्टर मीणा कहते रहे हैं...”

“बस, उसी सब-इंस्पेक्टर मीणा ने ये सब कुछ किया। मैंने कुछ नहीं किया।” दामले मन मार कर कह उठा- “पर अब मुझे होश आ गया है। अब मैं ठीक हूँ। मुझे पता है कि मैं तुम्हारा पति सुधीर दामले हूँ। परन्तु मैं घर नहीं आ सकता। आया तो पुलिस उन इल्जामों में मुझे पकड़कर जेल में डाल देगी, जो मैंने अपने होशो-हवास में नहीं किए।”

“आप पुलिस को ये ही बात बता दीजियेगा कि आप होश में नहीं थे और...”

“उससे कोई फायदा नहीं होगा। मैं बच नहीं सकूँगा।”

“ओह! पुलिस ने घर के बाहर भी दो पुलिस वालों को बिठा रखा है।”

“वो इसलिये कि मैं आऊँ और पुलिस मुझे पकड़ ले।”

“ओह...अब मैं क्या करूँ?”

“मुझे भी इसी बात की चिन्ता है कि अब क्या होगा।” दामले ने गहरी सांस ली- “मैं अब पुलिस से बच नहीं सकता... वो मुझे पकड़ कर जेल में डाल देगी। मेरी सारी उम्र जेल में ही बीतेगी।”

“नहीं-नहीं।” उधर से तारा घबरा कर बोली- “ये नहीं हो सकता।”

“ये ही होगा। मैं बहुत परेशान हूँ कि अब मैं क्या करूँ? तुम ही बताओ तारा...”

“मैं-मैं क्या कहूँ?” उधर से तारा रो पड़ी।

“रो मत। हौसला रख...”

“मैं...मैं सुरेन्द्र भाई साहब से इस बारे में बात करूँ? वो कोई रास्ता...”

“भूल के भी किसी से बात मत करना।”

“अच्छा...।”

“किसी को बताना भी मत कि मेरा फोन आया था।” दामले ने पक्का किया।

“नहीं बताऊँगी।” तारा का भर्राया स्वर दामले के कानों में पड़ा- “लेकिन अब होगा क्या?”

“पता नहीं, क्या होगा...।” दामले ने दुःख भरे स्वर में कहा।

“आप हैं कहाँ पर?”

“अभी मैं तेरे को नहीं बता सकता कि मैं कहाँ पर हूँ। मुझे सोचने का वक्त दे तारा...।”

“पुलिस कहती है कि आपके पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है?”

“हाँ, वो है मेरे पास।”

“वो पैसा आप पुलिस को वापस दे दीजिये।”

“क्या पैसा वापस दे देने से पुलिस मुझे छोड़ देगी?” दामले ने पूछा।

“पता नहीं...”

“पुलिस मुझे किसी भी हाल में नहीं छोड़ेगी। वो मुझे हत्यारा और डकैत बनाकर अदालत में पेश कर देगी।”

“त...तो अब क्या होगा?” तारा का घबराया स्वर कानों में पड़ा।

“मैं बुरी तरह फंस गया हूँ तारा...।” दामले ने मरे स्वर में कहा।

“मुझे बताईये कि मैं आपको बचाने के लिए क्या कर सकती हूँ...। मैं जानती हूँ कि आप स्वतंत्रता सेनानी के बेटे हैं और कोई गलत काम नहीं कर सकते। ये सब आपके सिर में चोट लगने की वजह से हुआ।”

दामले ने गहरी सांस ली।

देवराज चौहान आंखें बंद किए बातें सुन रहा था।

“क्या हुआ?” तारा का बेचैनी से भरा स्वर कानों में पड़ा।

“मैं ठीक हूँ, सोच रहा हूँ कि कैसे इस मुसीबत से बाहर निकलूं?” दामले बोला।

“हम कहीं छिपकर रह लेंगे।”

“छिपकर?”

“जहाँ पुलिस को पता नहीं चले। पूना चले जाते हैं, हमारा बेटा भी वहाँ...”

“ये आसान नहीं है।” दामले ने कहा- “सब जानते हैं कि पूना में हमारा बेटा पढ़ता है। तू वहाँ से गायब हुई तो पुलिस सबसे पहले तेरी तलाश में पूना ही पहुँचेगी।”

“तो फिर क्या करें-हम तो बुरी तरह फंस गये हैं।”

“मुझे सोचने का वक्त दो। मैं तुम्हें फिर फोन करूँगा।” दामले ने कहा।

“फिर फोन करोगे ना?”

“क्यों नहीं करूँगा? तुम मेरे पास नहीं हो तारा...इस बात की मुझे बहुत तकलीफ है।

“आ जाती हूँ, मुझे बताईये कि आप कहाँ पर हैं?”

“घर के बाहर पुलिस मौजूद है। तुम कहीं गईं तो वो तुम्हारे साथ या पीछे आयेंगे।”

“ओह...”

“जल्दबाजी मत करो। मैं तुम्हें फिर फोन करूँगा...अब बंद करता हूँ।”

“फोन जरूर करना।”

“जरूर करूँगा। पहले मुझे कोई रास्ता सोच लेने दो।” दामले ने कहा और फोन बंद कर दिया।

तभी मीणा कह उठा- “तेरी स्थिति का मुझे अफसोस है दामले...।”

“तूने तो मुझे पूरी तरह बरबाद करके रख दिया है।” दामले ने मरे स्वर में कहा।

“हाँ, मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ। पर क्या करूँ, मैं भी फंसा पड़ा हूँ।”

“मेरा फोन दो।” देवराज चौहान ने कहा।

दामले ने उसे फोन दिया।

देवराज चौहान ने फोन जेब में रखकर आँखें बंद कर ली।

“तुम्हारी पत्नी तुम्हारे लिये बहुत परेशान है।” मीणा बोला।

“क्यों ना होगी? हम एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं।” दामले ने गहरी सांस ली।

“देख दामले, तेरे पास वो ही रास्ता है, जो मैंने तुझे बताया है। भाईयों और दोस्तों की तरह हम साथ रहते हैं। इतनी बड़ी दौलत हमारे पास है। जिन्दगी का भरपूर मजा लेंगे।”

“इस तरह तो तू मेरे परिवार में प्रवेश कर जायेगा...।”

“क्या फर्क पड़ता है? परिवार तेरा, शरीर तेरा, मैंने तो तेरे शरीर में थोड़ी सी जगह ले रखी है।”

“तारा ये बात कभी भी स्वीकार नहीं करेगी।”

“उसे मत बता...।”

“ये कैसे हो सकता है?”

“क्यों नहीं हो सकता? जब वो सामने होगी, मैं चुप रहा करूँगा।” मीणा ने कहा।

“कभी तो उसे पता चलेगा...।”

“कभी नहीं पता चलेगा। सब ठीक रहेगा। तेरा काम भी चल जायेगा और मुझे भी जगह मिली रहेगी।”

“नहीं, ये बात मुझे भी पसन्द नहीं।” दामले बोला- “तू मेरे शरीर से चला क्यों नहीं जाता?”

“मैं तेरे लिए सब कुछ कर सकता हूँ, पर ये ही काम नहीं कर सकता।” मीणा बोला।

“जहर घोल दिया है तूने मेरे जीवन में...।”

मीणा की आवाज नहीं आई।

“क्या करूँ देवराज चौहान मैं?” दामले थके स्वर में बोला।

“मुझे अपने मामले में मत डाल... । मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।” देवराज चौहान ने आँखें बंद ही रखीं।

“तुम मुझे कुछ तो सलाह दे सकते हो कि मैं अब क्या करूँ?”

“सलाह तुम्हें दे चुका हूँ, बार-बार मत पूछो...।”

“एक बार और बता दे...।”

“जब तक तुम मीणा को अपने शरीर से बाहर नहीं निकालते, तब तक मिल कर रहो।” देवराज चौहान बोला।

“लेकिन मैं इसे अपने शरीर से बाहर नहीं निकाल सकता?” दामले ने कहा।

“मुझे ये ही शरीर पसन्द है।” मीणा बोला।

“ऐसे हाल में तुम दोनों को मिलकर रहना चाहिये।” देवराज चौहान ने कहा।

“इस कमीने के साथ तो मिलकर रहने का दिल भी नहीं करता...”

“दामले।” मीणा गम्भीर स्वर में बोला- “नाराजगी का कोई फायदा नहीं। तू मुझे स्वीकार कर ले। ये तो तेरे को करना ही पड़ेगा। तभी हम भविष्य के बारे में कुछ सोच सकेंगे।”

दामले ने कुछ नहीं कहा।

“अब तक तेरे को कुछ-कुछ तो मेरी आदत पड़ गई होगी। अगले दो-चार दिनों में पूरी आदत हो जायेगी। एक वक्त तो ऐसा आयेगा कि तू मेरे बिना उदास हो जायेगा, अगर मैं चला गया तो...।”

“नहीं उदास होऊंगा, तू जा के तो दिखा।”

“जोश मत दिला, मैं जाने वाला नहीं...” मीणा हंस पड़ा।

दोनों में कुछ देर चुप्पी रही।

देवराज चौहान की आँखें बंद थीं, वो कह उठा- “बातों में ही मस्त मत रहो। आस-पास भी नजर रखो, कहीं पुलिस सिर पर ना आ जाये।”

“सब ठीक है।” मीणा बोला- “यहाँ पुलिस नहीं आने वाली।”

फिर चुप्पी छा गई।

मीणा ने ही बात छेड़ी- “आखिर तेरे मन में क्या है दामले, मुझे बता। पर ये जान ले कि आखिरी रास्ता ये ही होगा कि हम दोनों मिलकर इस शरीर में रहें।”

“इस बारे में बाद में फैसला लूंगा। पहले मैं कुछ चैक करना चाहता हूँ...।” दामले बोला।

“क्या?”

“मैं कमिश्नर पाटिल से मिलकर उसे विश्वास दिलाना चाहता हूँ, कि मेरे शरीर ने जो भी किया, उसमें मेरी सहमति नहीं थी।”

“वो तेरी बात सुनेगा भी नहीं...।”

“तू इस मामले में मेरा साथ देगा कि नहीं?” दामले उखड़ा।

“दूंगा। तेरी पूरी तसल्ली कराऊँगा।”

“कल दिन में हम कमिश्नर पाटिल के पास चलेंगे और तू भी उससे बात करेगा।”

“कर लूंगा। पर तेरे को मेरी भी एक माननी होगी।”

“क्या?”

“मैंने फैसला कर लिया है कि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत को इसी कॉटेज के पास जमीन में दबा दूंगा। जमीन खोदने के लिए तेरे को मेरा साथ देना होगा।” मीणा ने कहा।

“इतनी बड़ी दौलत को जमीन में दबाएगा?” दामले बोला।

“कोई और रास्ता भी तो नहीं। दौलत को इस तरह खुले में रखना खतरे से खाली नहीं।” मीणा ने कहा।

“इसके लिए तो काफी बड़ा गड्ढा खोदना पड़ेगा। हम थक जायेंगे।”

“काम तो करना ही है...।”

“दौलत को जमीन के भीतर छिपाने की बात मुझे जंची नहीं।”

“तेरे को कमिश्नर से मिलना है?”

“हाँ...”

“फिर तू अपनी पत्नी से भी मिलना चाहेगा।”

“तेरे को कैसे पता?”

“मैं तेरे मन के विचार अब कुछ-कुछ समझने लगा हूँ...।”

दामले ने गहरी सांस ली। बोला- “तो क्या हो गया-देवराज चौहान यहाँ रहकर दौलत की रखवाली करेगा। वो ईमानदार है।

“फिर भी दौलत को ठिकाने लगा देना जरूरी है, जब तक अगला प्रोग्राम नहीं बनता। हमें पुलिस को बेवकूफ नहीं समझना चाहिये। अगर वो किसी तरह यहाँ तक पहुँच गई तो दौलत भी हाथ से निकल जायेगी।” मीणा ने कहा।

“तुम सुन रहे हो देवराज चौहान?” दामले ने कहा।

“हाँ...”

“मुझे नहीं लगता कि दौलत को इस तरह छिपा देना चाहिये...” दामले बोला।

“वक्ती तौर पर ऐसा करना ठीक है। क्योंकि तुम दोनों फंसे पड़े हो और तय नहीं कर पा रहे कि आगे क्या करना है। दौलत जमीन में दबी रहेगी तो तुम इधर-उधर जा सकोगे। मुझे भी छुट्टी मिलेगी।”

“तुम्हें तो अभी छुट्टी नहीं देंगे।” मीणा ने कहा- “जब तक हम कोई फैसला नहीं लेते भविष्य का, तब तक तुम हमारे साथ ही रहो तो तुम्हारी बहुत मेहरबानी होगी।”

“मैं इसकी बात से सहमत हूँ।” दामले कह उठा।

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।

“ठीक है।” दामले बोला- “जमीन खोद कर हम दौलत वहाँ छिपा देंगे कल।”

“पहला काम ये होगा। फिर हम कमिश्नर के पास चलेंगे।”

“ठीक है। जमीन खोदने के लिए कुदाल-फावड़ा भी तो चाहिये।”

“कल वो भी ले आयेंगे। परन्तु हमें सतर्क रहना होगा।”

मीणा ने कहा- “तुम्हारे चेहरे को बहुत से लोग जानते हैं। पुलिस तुम्हारी तलाश कर रही होगी। खतरे से बचे रहना है हमें...।”

“देवराज चौहान को भेज देंगे कि फावड़ा-कुदाल ले आये।”

दामले ने कहा।

देवराज चौहान आँखें बंद करके पड़ा रहा।

“देखेंगे।” देवराज चौहान को खामोश पाकर, मीणा कह उठा।

“कमिश्नर पाटिल का आफिस कहाँ है?” दामले ने पूछा।

“तो तू क्या उसके आफिस मिलने जायेगा?” मीणा बोला

“हाँ, क्यों?”

“पागल है! वो तेरे को रस्सा बांध कर वहीं बिठा लेगा। हमें ये देखना होगा कि वो कहाँ-कहाँ जाता-आता है और वहीं मौका पाकर उसे घेर लेंगे। तब तू बात करना उससे।”

“जैसे भी हो, मैं उससे बात करना चाहता हूँ...।”

“लेकिन ये बात तेरे को पहले बता दूं कि कमिश्नर से बात करने का कोई फायदा नहीं होगा। मैं तो सिर्फ तेरा दिल रखने के लिए तेरी बात मान रहा हूँ कि तेरी गलतफहमी दूर हो जाये...।”

“तो क्या इस बात के लिए तेरा शुक्रिया अदा करूँ?” दामले कड़वे स्वर में बोला- “तू मेरे शरीर में रहकर, इस तरह मेरे से बात नहीं कर सकता। तेरे को मेरी हर बात माननी चाहिये।”

“मान तो रहा हूँ...।” मीणा मुस्कराया।

“जब से तू मेरे शरीर में आया है, तब से मेरी जिन्दगी का सत्यानाश कर दिया तूने।”

“ऐसा मत कह। मेरा दिल दुखता है।”

“सच बात ही तो कह रहा हूँ... । मैं अगर इस तरह तेरे शरीर में आ जाता तो तू क्या मुझे स्वीकार करता?”

मीणा ने गहरी सांस ली और कह उठा- “बात मत कर मेरे शरीर की। मुझे ऐसा लगता है जैसे वो गुजरे जमाने की बात हो।”

“तू कभी भी नहीं मानता कि मैं तेरे शरीर में रहूँ, खासतौर से उस वक्त रहूँ, तब तू अकेले में अपनी पत्नी के पास जाये। तू ये सोचकर ही परेशान रहता है कि मैं हर समय तेरे साथ रहना...।”

“मेरी बात मत कर। क्योंकि मेरे पास शरीर है ही नहीं...

वो वक्त याद दिलाकर मुझे दुखी ना कर। मेरे को अब नई जिन्दगी शुरू कर लेने दे, बाईस साल के लिए।” मीणा ने थके स्वर में कहा।

“एक बात तो बता...।”

“क्या?” मीणा बोला।

“तेरे को मरे अभी पन्द्रह-बीस दिन ही हुए हैं और तेरी पत्नी सावी का कामराज से टांका भिड़ गया। और वो दो महीने बाद आनन-फानन शादी भी करने वाले हैं। सावी को तेरे से इतना प्यार था तो साल भर तो ठहर जाती...।”

“उसे मुझसे प्यार था।” मीणा ने दुःख भरे स्वर में कहा।

“तभी तेरे मरने के दो-ढाई महीने बाद वो कामराज से शादी कर रही है?” दामले व्यंग से बोला।

“ये बातें मत कर।” मीणा ने कहा- “क्योंकि मेरा वो शरीर खत्म हो चुका है। सावी की मर्जी...अब वो जो भी करे। वैसे मेरा ख्याल है कि मेरी मौत के बाद खुद को अकेला पाकर वो घबरा गई हो और...”

“कामराज का हाथ थाम लिया।” दामले तीखे स्वर में कह उठा।

“हाँ, ऐसा ही हुआ होगा। कामराज ने अभी तक शादी नहीं की है। सावी खूबसूरत तो है ही। दोनों की नजरें मिल गई होंगी। अब सावी से मेरा नाता टूट चुका है। क्योंकि मेरा शरीर जल चुका है। तेरे शरीर में अब मेरा नया जीवन शुरू हो चुका है। मुझे अब इस शरीर से, तेरे से ही मतलब है।”

“देवराज चौहान को नींद आ गई लगती है।” दामले बोला

“जब तक तुम चुप नहीं करोगे...।” देवराज चौहान ने कहा- “मैं कैसे सो सकता हूँ।”

“हमें भी सो जाना चाहिये।” दामले बोला- “मैं थक गया हूँ।”

“मैं भी थकान महसूस कर रहा हूँ।” मीणा ने कहा।

फिर दामले सीट पर पसर गया

“मैं इधर करवट नहीं लेटता।” कहकर दामले ने दूसरी तरफ करवट ली- “ऐसे सोता हूँ।”

“ठीक है... ऐसे ही सही।” मीणा मुस्करा कर कह उठा- “मानी तेरी बात।”

☐☐☐

अगले दिन देवराज चौहान की आँख खुली तो दिन का उजाला फैल चुका था। रात सोचों में डूबे जाने कब उसकी आँख लग गई थी। सोचों में दामले और मीणा ही थे, दोनों ही इस वक्त अजीब हालातों में फंसे थे।

आँखें खोलते ही देवराज चौहान ने बगल वाली सीट पर नजर मारी।

वहाँ सुधीर दामले नहीं था। सीट खाली थी।

देवराज चौहान ने आसपास नजर मारी। वो कहीं ना दिखे। देवराज चौहान पजेरो से बाहर निकला और सामने नजर आ रही कॉटेज की तरफ बढ़ गया, सन्नाटा था हर तरफ। जहाँ भी नजर जाती, खाली जमीन ही दिखती। जिस पर झाड़ियां, पेड़ खड़े दिख रहे थे। आबादी से कटा इलाका था

देवराज चौहान काटेज के गिर्द चक्कर काट कर सामने की तरफ पहुँचा तो ठिठक गया।

वहाँ सुधीर दामले नजर आया था। वो कुदाल से जमीन की खुदाई कर रहा था। पास में फावड़ा भी रखा था। करीब आठ फीट घेरे में खुदाई चल रही थी और एक फीट गहरा गड्ढा खोदा जा चुका था।

देवराज चौहान पास पहुँच कर ठिठकते कह उठा- “कब से काम कर रहे हो?”

“सुबह के पहले से।” दामले कुदाल छोड़ कर गहरी सांसें लेता कह उठा। पसीने से उसका शरीर पूरा भीगा हुआ था- “इस कॉटेज में से हमें फावड़ा-कुदाल मिल गया तो दिन निकलेने से पहले ही हम काम पर लग गये।”

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली।

“हम दौलत यहाँ, इसी गड्ढे में वक्ती तौर पर छिपायेंगे।” मीणा कह उठा।

“अच्छी बात है।” देवराज चौहान बोला- “दोस्ती हो गई तुम दोनों में?”

“हो रही है।” मीणा मुस्करा कर बोला- “धीरे-धीरे ये लाईन पर आ रहा है।”

“मुझे तो पसन्द नहीं कि ये मेरे शरीर में रहे। परन्तु ये जाने को तैयार नहीं...। मैं कर ही क्या सकता हूँ!”

“मौका ढूंढो दामले।” देवराज चौहान कह उठा- “मीणा को अपने शरीर से बाहर निकालने का मौका ढूंढते रहो और तब तक दोस्तों की तरह रहो। इसके अलावा तुम कुछ नहीं कर सकते।”

“मैं फावड़े से मिट्टी निकालता हूँ बाहर।” मीणा ने कहा और दामले के हाथों ने फावड़ा थाम लिया।

“मैं थक गया हूँ...।” दामले बोला।

“तू आराम कर, मैं मिट्टी बाहर...।”

“बेवकूफ, शरीर तो हमारा एक ही है।” दामले झल्ला उठा।

“ओह...।”

“मैं उधर छाया में बैठना चाहता हूँ।” कह कर दामले गड्ढे से बाहर निकला- “मुझे भूख भी लग रही है।”

“देवराज चौहान से कह।” मीणा बोला- “ये ही खाने को लाकर देगा। साथ में पानी भी ले आयेगा।”

“ला दोगे देवराज चौहान?”

“क्यों नहीं...।” देवराज चौहान मुस्कराया।

“मेरे कपड़े भी खराब हो गये हैं।” दामले ने कहा।

“वो तो दुकानें खुलने पर ही मिल पायेंगे। दस बजे का इन्तजार करना होगा।”

“कोई बात नहीं। तब तक हम गड्ढा गहरा करते रहेंगे।”

दामले ने गड्ढे को देखा।