हाकिम के लिए, विशाल शयनकक्ष को खासतौर से सजाया गया था । उसी शयनकक्ष में दो कुर्सियों पर आमने-सामने बैठे हाकिम और दालू बातचीत कर रहे थे । दोनों नहा-धोकर फ्रेश हो चुके थे ।

"तुमने अभी तक बताया नहीं दालू कि मुझे क्यों याद किया ?"

दालू मुस्कुराया और मीठे स्वर में कह उठा ।

"हाकिम तेरे को तो मालूम है कि जिस किताब में तेरी मौत का तरकीब दर्ज है, वो किताब नगरी की देवी मिन्नो के पास थी । जिसे तू हर हाल में पाना चाहता है ।"

हकीम की निगाह में प्रश्न उभरा ।

"और अपनी मौत से पूर्व मिन्नो उस किताब को गुप्त जगह पर रख गई थी । जिसे कि मैं लाख ढूंढने पर भी ढूंढ नहीं पाया । यानी कि वो किताब तेरी मौत की चाबी है हाकिम। जब तक वो किताब तेरे कब्जे में नही आती, तब तक तेरे को हासिल अमरत्व बेकार है ।" दालू का स्वर मीठा ही था ।

"दालू, तुम बातों में उलझा रहे हो ।" हाकिम के माथे पर बल उभरे ।

"ऐसा तो मैंने कुछ भी नहीं कहा हाकिम । मैं तो सारे हालात सामने रख रहा हूं।"

"मिन्नो मर चुकी है । अब तक किताब नहीं मिली तो समझो उसकी मौत के साथ ही वो किताब भी समाप्त हो गई है । डेढ़ सौ बरस बीत चुके हैं इस बात को और तुम जाने क्यों उस किताब और मिन्नो का जिक्र ले बैठे हो । लगता है तुमने मेरा वक्त खराब करने के लिए मुझे बुला लिया ।" हाकिम ने कहा।

"यह बात नहीं हाकिम । दरअसल तुम नगरी के हालातों से अनजान हो । तभी तो तुम्हें बुलाना पड़ा ।"

"क्या मतलब ?"

"दरअसल हाकिम ऐसा है कि मिन्नो दोबारा जन्म लेकर वापस नगरी में आ गई है ।" दालू मुस्कुराकर बोला ।

हाकिम चौंका, फिर तुरंत ही सामान्य हो गया ।

"ये कैसे संभव है दालू  ?"

"ये संभव हो चुका है । मिन्नो ही नहीं, उस वक्त देवा के साथ लड़ाई में उसके दो खास साथी मारे गये थे । नीलसिंह और परसू । वो भी पुनः जन्म लेकर वापस आये हैं मिन्नो के साथ। उनके इरादे मुझे ठीक नहीं लग रहे। और तो और देवा जो मर गया था वो भी दोबारा जन्म लेकर नगरी में लौट आया है । लड़ाई में उसके खास साथी उसके साथ मरे थे, वो भी उसके साथ ही आये हैं, जैसे कि जग्गू, गुलचंद, भंवर सिंह, त्रिवेणी । हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि उन सबके चेहरे हू-ब-हू वैसे ही हैं जैसे पहले जन्म में थे । जरा भर भी अंतर नहीं और तुम्हें जिसका लहू स्वादिष्ट लगा था वो गुलचंद का लहू था ।"

हाकिम आंखें सिकोड़े दालू को देखने लगा ।

उसे खामोश पाकर आखिर दालू ही बोला ।

"ऐसे क्या देख रहे हो हाकिम ?"

"मुझे तुम्हारी बात पर यकीन नहीं आ रहा ।" हाकिम के होंठ खुले ।

दालू के होठों पर मुस्कान उभरी।

"हाकिम, क्या मैं तुमसे झूठ बोलने का साहस कर सकता हूं । अगर कर सकता हूं तो समझो मैं तुमसे झूठ बोल रहा हूं ।" दालू के चेहरे पर दोस्ताना भाव थे ।

"मैं जानता हूं तुम मुझसे झूठ बोलने का साहस नहीं कर सकते । लेकिन तुम्हारी बातों पर यकीन करने के लिए मुझे कुछ बातों का सहारा चाहिये ।" हाकिम ने दालू को देखा ।

"कैसी बातें ?"

"मैं यह मान भी लूं कि मिन्नो और अन्यों ने अपने उसी चेहरे के साथ जन्म लिया है, लेकिन तुमने तो नगरी का समय चक्र रोक रखा है । कोई उम्र पूरी करके मर नहीं सकता और कोई पैदा नहीं हो सकता । ऐसे में वे लोग कैसे पैदा हो गये ?" हाकिम ने कहा ।

"वो हमारी पाताल नगरी में नहीं, पृथ्वी पर जन्म लेकर यहां आ पहुंचे हैं।"

"हूं तो पृथ्वी पर जन्म लिया मिन्नो और अन्यों ने ।" हाकिम ने अजीब से स्वर में कहा--- "पृथ्वी से यहां नगरी में कोई मनुष्य नहीं आ सकता, फिर वो लोग कैसे आ गये ?"

"बहुत आसान है । कोई भी बात कठिन नहीं । असंभव से भी असंभव काम हो जाते हैं ।" दालू पहले वाले ही मीठे स्वर में बोला--- "अगर पास में गद्दार बैठा हो तो...।"

"गद्दार ?"

"हां, वो पेशीराम, जो...।"

"जो लोगों की दाढ़ी बनाया करता था और बाल काटा करता था ।" हाकिम बोला ।

"वही-वही, पेशीराम वही । उस गद्दार ने ही मिन्नो और दूसरे मनुष्यों को नगरी का रास्ता बताया । वही पेशीराम उन सबको यहां लाया और मेरे खिलाफ काम करता रहा और तो और जब मैं तुम्हें बुलाने के लिए अनुष्ठान में व्यस्त था तो छाती ठोक कर पेशीराम यहां आ पहुंचा । मैंने सात मनुष्यों का लहू कटोरों में भर रखा था और उन सातों को तुम्हारी सेवा के लिए बांध रखा था कि तुम आओगे तो तुम्हारी खून की प्यास तबीयत से मिटा दूंगा । अनुष्ठान के दौरान पेशीराम उन सबको आजाद कराकर ले गया । अनुष्ठान पर बैठा होने की वजह से मैं, मेरा उठकर उसे रोकना ठीक नहीं था । अनुष्ठान भंग हो जाता । इसी बात का फायदा उठाया पेशीराम ने । अब तुम यह बताओ, जिस लहू को तुम ने पसंद किया वो गुलचंद का लहू था, जिसे पेशीराम ले गया । अब कहां से बुझाऊंगा तुम्हारी प्यास । दोबारा इंतजाम करने के लिए अपने आदमियों को पृथ्वी पर भेजना होगा ताकि कुछ मनुष्यों को लाकर तुम्हारी खून की प्यास को बुझाया जा सके । इसके अलावा अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं ।"

"वो सब मनुष्य नगरी में है तो किसी को नगरी पर भेजने की जरूरत नहीं । वो बच नहीं सकते । उनके लहू से मैं अपनी प्यास बुझा लूंगा ।" हाकिम ने शांत स्वर में कहा ।

दालू की आंखों में तीव्र चमक लहरा उठी ।

"हाकिम अभी समस्या खत्म नहीं हुई । यूं कहो कि शुरू हो गई है ।" दालू पुनः मीठे स्वर में कह उठा।

"वो कैसे ?"

"मिन्नो के रूप में समस्या हम दोनों के सामने खड़ी है हाकिम ।" दालू ने कहा--- "मेरे लिए तो यह मुसीबत खड़ी हो गई कि मिन्नो मेरे से नगरी और तिलस्म वापस मांग सकती है । सारी नगरी के लोगों को मेरे खिलाफ कर सकती है । यह ठीक है कि तिलस्मी ताज की शक्ति से मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा परंतु तब नगरी का बड़ा बनने में वो मजा नहीं रह जायेगा ।"

"समझा ।" हाकिम ने सिर हिलाया--- "तो इस बात की खातिर तूने मुझे बुलाया ।"

"पहले अपनी मुसीबत भी सुन लो हाकिम । तब पता चलेगा कि गरज हम दोनों की ही है ।"

"क्या ?"

"मैं नहीं जानता मिन्नो को उस जन्म की याद आई है या नहीं । पहले तक तो यही खबर थी कि उसे बीते जन्म के बारे में कुछ भी याद नहीं है ।" दालू ने मुस्कुराकर मीठे-मीठे स्वर में कहा--- "जरा सोचो, अगर उसे बीते जन्म के बारे में याद आ गया तो यह भी याद आ जायेगा कि उसने वो किताब कहां रखी है, जिसमें तुम्हारी मौत का विवरण दर्ज है और बीते जन्म की याद आने पर ही वो मेरे से नगरी और सब अधिकार वापस मांगेगी । यानी कि हम दोनों की मुसीबत मिन्नो ही है । अगर मिन्नो ही न रहे तो मैं भी सुरक्षित और तुम भी । बल्कि तुम तो मिन्नो पर काबू करके जान सकते हो कि उसने वो किताब कहां रखी है ।"

हाकिम ने दालू को देखा ।

"मुझे ज्यादा समझाने की कोशिश मत करो । मैं तुम्हारी बातों का सारा मतलब समझ गया हूं ।"

दालू के होंठो पर मुस्कान छाई रही ।

"यह भी तो हो सकता है कि मिन्नो को पहले जन्म की कोई बात याद ही न आये।" हाकिम बोला ।

"ऐसा कभी नहीं हो सकता ।"

"क्यों ?"

"पेशीराम, मिन्नो और अन्य मनुष्यों को पृथ्वी से यहां लाया है तो यूं ही नहीं लाया । सोच-समझ कर लाया होगा । तुम्हारे पिताश्री यानी कि गुरुवर की कृपा से वो साधारण इंसान न रहकर, कई शक्तियों का मालिक बन चुका है । नगरी के सारे हालातों से तुम वाकिफ हो । उधर मुद्रानाथ और बेला कब से मेरे हाथों से दूर कहीं छिपकर रह रहे हैं । मुद्रानाथ के पास ऐसी शक्तियां है कि अपनी बेटी मिन्नो के पिछले जन्म की यादें आसानी से वापस ला सकता है। तुम क्या समझते हो कि मुद्रानाथ को खबर नहीं होगी कि मिन्नो नगरी में आ गई है । वो उससे क्या अब तक मिला नहीं होगा । नही मिला तो मिलने की कोशिश कर रहा होगा यानी कि जब तक मिन्नो जिंदा है, तब तक हम पर मुसीबत सवार रहेगी । तुम मिन्नो को खत्म कर दो । अगर उसे पहले जन्म की बातें याद आ गई हों तो उससे वो किताब भी हासिल कर सकते हो।"

हाकिम कुर्सी से उठा और पीठ पर हाथ बांधे टहलने लगा ।

"इसमें सोचने की क्या बात है हाकिम ?"

हाकिम ने ठिठककर दालू को देखा ।

"नगरी में कुछ करूंगा तो पिताश्री अवश्य नाराज होंगे ।" हाकिम बोला ।

"तुम्हें किसी की क्या परवाह । गुरुवर ने तो इतना भी ध्यान न रखा कि तुम उनकी औलाद हो । इस पर भी तुम्हारी मौत का विवरण किताब में दर्ज करके, वो किताब कुलदेवी को सौंप दी, ताकि जरूरत पड़ने पर तुम्हारी जान ली जा सके । ऐसे में तुम्हें अपने पिताश्री के बारे में सोचना भी नहीं चाहिये । बल्कि तुम्हें दिखा देना चाहिये कि उस किताब के बावजूद भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ सकता ।"

हाकिम मुस्कुरा पड़ा ।

"चालाकियां तो तुममें कूट-कूट कर भरी पड़ी है दालू । कम से कम मुझ पर उन चालाकियों का इस्तेमाल मत करो ।" भड़काओ मत मुझे ।" हाकिम कह उठा ।

"मैं तो बता रहा था कि...।"

"ज्यादा मत बताओ । क्योंकि तुम्हारा चेहरा ही मुझे सब कुछ बता रहा है।"

दालू खामोश रहा ।

"मैं देख लूंगा मिन्नो को । तुम फिक्र छोड़ दो ।"

दालू का चेहरा खिल उठा ।

"कुछ देर मैं आराम करना चाहता हूं । मेरे आराम का इंतजाम किया तूने ?" हाकिम बोला ।

"पूरा इंतजाम है हाकिम, दालू को मालूम है कि हाकिम का सेवा-सत्कार कैसे करना है । यह भूलकर मैंने क्या तुम्हारे क्रोध का शिकार होना है ।" कहने के साथ ही दालू उठा और एक तरफ नजर आ रही हूं जंजीर खींची । कहीं मध्यम सा घंटा बजने का स्वर कानों में पड़ा ।

हाकिम ने पूछा ।

"मिन्नो इस वक्त कहां है ?"

"मिन्नो आखिरी खबर के मुताबिक तिलस्म में कहीं है । देवा भी तिलस्म में कहीं है। मेरे आदमियों में चालाकी से उन्हें तिलस्म में फंसा दिया है ।" दालू ने तुरंत कहा ।

तभी केसर सिंह ने भीतर प्रवेश किया और हाथ बांधकर खड़ा हो गया ।

"जी ।"

"हाकिम के आराम का सामान लेकर आओ केसर सिंह ।" दालू ने आराम से कहा ।

"जी । अभी हाजिर हुआ ।" कहने के साथ ही केसर सिंह पलट कर बाहर निकल गया ।

उल्टे पांव केसर सिंह लौटा ।

उसके साथ बेहद खूबसूरत युवती थी। इन्तहाई खूबसूरत, ऊपर से बनाव-श्रृंगार, जो भी देखे देखता ही रह जाये । उम्र अठारह बरस से ज्यादा नहीं थी हालांकि युवती के चेहरे पर खौफ के साये मर्डर आ रहे थे, परंतु खौफ के सायों की वजह से उसकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई थी ।

उसे देखते ही हाकिम के चेहरे पर मुस्कान उभर आई।

"दालू साठ बरस पहले जब तुमने मुझे बुलाया था, तब इस नगीने को मेरे सामने पेश क्यों नहीं किया ?"

"क्योंकि हाकिम के लिए ये नगीना आज के लिए रखा था ।" दालू ने मीठे स्वर में कहा ।

"हाजिर जवाब तो तुम शुरू से ही हो ।" हाकिम की निगाह युवती के सिर से पांव तक फिर रही थी। वो साड़ी पहने ला-जवाब लग रही थी। जिस्म पर लगे खूबसूरत गहनों ने तो कमाल ही कर दिया था--- "जाओ तुम लोग अब मुझे आराम करने दो ।"

दालू और केसरसिंह बाहर निकल गये ।

दरवाजा बंद हो गया ।

हाकिम की आंखों में तीव्र चमक लहरा रही थी ।

जबकि युवती डर में डूबी बेहाल हो रही थी ।

■■■

दालू और केसर सिंह बंद दरवाजे के बाहर ही मौजूद थे ।

"केसरे ।" दालू के स्वर में प्रसन्नता थी--- "अब मामला ठीक हो जाएगा । सारे हालात मेरे पक्ष में हो जाएंगे । हाकिम ने कह दिया है कि वो मिन्नो को खत्म कर देगा ।"

"यह तो बहुत अच्छी खबर सुनाई ।" केसर सिंह मुस्कुराया ।

"अब मुझे खुद मैदान में नहीं उतरना पड़ेगा । सब काम बैठे-बैठे ही ठीक हो जाएगा।" दालू बोला ।

"लेकिन हाकिम को कैसे पता चलेगा कि मिन्नो तिलस्म में कहां है ?" केसर सिंह ने पूछा ।

"अपनी शक्ति के दम पर हाकिम जान लेगा कि मिन्नो तिलस्म में कहां है। हाकिम की तिलस्मी शक्तियां बहुत तेज है । वहां की कोई बात उससे नहीं छिप सकती है । मिन्नो अभी भी तिलस्म में मौजूद है ।"

"अगर मिन्नो तिलस्म से बाहर आ गई हो तो ?"

"ऐसा नहीं हो सकता केसरसिंह, वो सब कुछ भूली,तिलस्म में ही भटक रही है ।"

"मैंने संभावना व्यक्त की है ।"

दो पल की चुप्पी के बाद दालू कह उठा ।

"अगर मिन्नो तिलस्म से बाहर आ गई है तो फिर उसे तलाश करना होगा । हाकिम के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं कि तिलस्म से बाहर मौजूद किसी की स्थिति के बारे में जान सके।"

दालू और केसर सिंह इसी तरह की बातें करते रहे ।

एक घंटे बाद दरवाजा खुला ।

हाकिम का सपाट चेहरा दोनों ने देखा।

दालू के चेहरे पर फौरन मुस्कान उभरी ।

"बहुत जल्दी आराम हो गया हाकिम ।" स्वर में भरपूर मिठास थी ।

"आराम अपूर्ण रहा दालू ।" कहकर हाकिम भीतर की तरफ पलट गया ।

दालू और केसर सिंह ने भीतर प्रवेश किया ।

भीतर का दृश्य देखते फौरन ही संभल गये । चेहरों पर से कई तरह के भाव आकर गुजर गये । केसरसिंह ने छिपी निगाहों से दालू को देखा, जबकि दालू की निगाह बेड पर थी ।

वो युवती वस्त्रहीन बेड पर मृत अवस्था में पड़ी थी । उसका शरीर जगह-जगह से उधड़ा पड़ा था । उसके गहने नीचे फर्श पर बिखरे पड़े थे । बालों की हालत ऐसी थी कि जैसे उन्हें मुठियों में कसकर झिझोड़कर कर सिर से जुदा करने की चेष्टा की गई हो । एक बांह की हड्डी टूटी हुई थी, जो कि मुड़कर इस तरह पड़ी थी कि जैसे वो बांह शरीर से अलग हो गई हो।

दालू ने फौरन खुद को संभाला । हाकिम को देखा ।

"युवती ने एतराज उठाया था हाकिम ?" दालू मिठास भरे स्वर में बोला ।

"नहीं, ये तो मेरा वजन सहन नहीं कर सकी । मेरे प्यार को बर्दाश्त नहीं कर सकी और मर गई । ऐसे में इसका लहू पीने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था ।" हाकिम ने मुंह बनाकर कहा ।

दोनों ने देखा एक तरफ से युवती की गर्दन उधड़ी पड़ी है ।

"मुझे अफसोस है कि तुम्हारा आराम अपूर्ण रहा हाकिम ।" दालू ने पूर्ववतः स्वर में कहा--- "मैं नगरी से छांट कर इससे भी बढ़िया युवती को तुम्हारे सामने पेश करूंगा । ताकि तुम्हारा आराम पूर्ण हो सके ।"

"कोई जरूरत नहीं । तुम्हारी पसंद मैंने देख ली है, बेकार है ।" हाकिम ने कहा--- "मैं खुद नगरी में जाकर अपनी पसंद का आराम तलाश कर लूंगा ।"

"जैसी तुम्हारी मर्जी ।" दालू ने फौरन सहमति में सिर हिलाया--- "नगरी वाले भी तुम्हारे दर्शन कर लेंगे।"

"शयनकक्ष दूसरा तैयार करो ।"

"दूसरा तैयार है हाकिम, आओ ।" दालू ने कहा फिर केसर सिंह से कहा--- "ये कमरा साफ करवा दो ।"

केसरसिंह ने खामोशी से सिर हिलाया।

दालू और हाकिम दरवाजे से बाहर निकले और सामने के रास्ते पर बढ़ गये । रास्ते में जो भी सेवक मिलता, फौरन अदब से झुक जाता । आँखों में डर आता हाकिम को देखकर ।

दालू, हाकिम के साथ अन्य शयनकक्ष में पहुंचा । जो कि पहले शयनकक्ष की तरह ही सजावट से भरा पड़ा था । एक नजर हर तरफ मारने के पश्चात हाकिम ने कहा ।

"मेरे लिए सोमरस का प्रबंध करो ।"

"अभी लो ।" दालू ने कहा और एक तरफ मौजूद जंजीर को खींच लिया ।

कहीं मध्यम सा घंटा बजने की आवाज आई ।

"मिन्नो का क्या किया जाये हाकिम ?" दालू ने कहा ।

"तुमने बताया कि वो तिलस्म में है ।" हाकिम ने उसे देखा।

"हां ।"

"मैं अभी अपनी शक्ति का प्रयोग करके जान लेता हूं कि वो तिलस्म के किस हिस्से में है ।" हकीम ने शांत स्वर में कहा--- "मैं फौरन ही उसकी जान ले लूंगा ।"

"मैं चाहता हूं मिन्नो के साथ देवा और नील सिंह को भी खत्म कर दो । मेरे लिए अच्छा होगा ।"

हकीम ने मुस्कुराकर दालू से कहा ।

"तुम जो कहोगे, मैं वही कर दूंगा दालू ।"

दालू भी आभार भरे ढंग से मुस्कुरा पड़ा ।

"तुमने तो मेरी सारी परेशानियां ही दूर कर दी हैं ।"

तभी एक सेवक ने भीतर प्रवेश किया और हाथ बांधकर खड़ा हो गया ।

"फौरन सोमरस का इंतजाम करो ?" दालू ने कहा ।

"जी ।" कहने के साथ ही सेवक पलट कर बाहर निकल गया ।

"पेशीराम का मेरे खिलाफ खड़ा होना, बहुत गलत होगा । बात खुलते ही नगरी को गलत संदेश जायेगा।"

"पेशीराम भी खत्म हो जायेगा ।" हाकिम ने कहा--- "एक-एक करके नहीं, एक ही बार में अपने दुश्मनों के बारे में बता दो, जिन्हें खत्म करना है ।"

"पेशीराम के साथ वह सारे मनुष्य जो पृथ्वी से यहां आ पहुंचे हैं ।" दालू ने स्पष्ट कहा ।

"सब खत्म हो जायेंगे ।"

पांच मिनट के बाद ही पीतल के बहुत बड़े कटोरे को थामे एक सेवक ने भीतर प्रवेश किया । वह कटोरा बाल्टी के बराबर था । दूसरे सेवक ने ट्रे जैसी प्लेट में दो गिलास रखे थे ।

उन्हें देखते ही दालू बोला ।

"सारा सामान टेबल पर रख दो ।"

सेवक टेबल की तरफ बढ़ने लगे कि हाकिम ने टोका ।

"ठहरो ।"

दोनों सेवक ठिठके ।

हाकिम आगे बढ़ा और सेवक के हाथों से कटोरा लेकर होठों से लगा लिया । कटोरे में गाढ़े पीले रंग का तरल पदार्थ था । एक ही सांस में हाकिम ने सारा कटोरा खाली किया और सेवक के हाथ में थमा दिया । उसके बाद हाकिम ने लंबी सांस ली।

"सोमरस और हाजिर करुं हाकिम ।"

"अभी नहीं ।"

दालू के इशारों पर सेवक वापस चले गये ।

अगले ही पल सोमरस की वजह से हाकिम का चेहरा भभकने लगा । आंखें भारी सी होकर सुर्ख सी होने लगी । हाकिम पर नशा सवार होने लगा ।

"सोमरस स्वादिष्ट था दालू ।" हाकिम के स्वर में भरभराहट आ गई थी ।

"ये सोमरस खासतौर से पहले मैं ही तुम्हारे लिए तैयार करवा लिया था हाकिम ।" दालू मुस्कुराया।

हाकिम ने कुछ नहीं कहा और फर्श पर ही आलथी-पालथी मारकर बैठ गया । दोनों बांहें सीधी करके घुटनों पर रखी और आंखें बंद करके होठों-ही-होठों में कुछ बुदबुदाने लगा ।

दालू तीन-चार कदम पीछे हट गया। नजरें हाकिम पर ही टिकी रही ।

करीब एक मिनट तक खामोशी और बुदबुदाहट से भरा यही आलम रहा ।

फिर एकाएक उसी मुद्रा में हाकिम का शरीर धीरे-धीरे हवा में उड़ने लगा । अब होठों के बुदबुदाना थम गया था । हाकिम का शांत चेहरा सोमरस की वजह से भभक रहा था ।

दालू की निगाह एकटक हाकिम पर थी ।

कुछ मिनट बीते होंगे कि हाकिम के चेहरे पर कई तरह के भाव आने लगे । कभी चेहरे पर परेशानी और उलझन की रेखाएं उभरती तो कभी वहां कोई भी भाव नहीं होता । करीब दो मिनट तक उसके चेहरे के भाव इसी तरह बदलते रहे, उसके बाद उसका चेहरा पुनः शांत अवस्था में आया और होठों में बुदबुदाहट जारी हो गई । मिनट भर बाद जब बुदबुदाहट थमी तो हवा में थमा आसनमुद्रा में हाकिम का शरीर फर्श की तरफ धीरे-धीरे आने लगा और देखते ही देखते फर्श पर जा लगा ।

दालू की निगाह एक पल के लिए भी हाकिम से न हटी थी।

हाकिम ने गहरी सांस ली और आंखे खोली । जो कि सोमरस की वजह से लाल सुर्ख हो रही थी । आंखें खोलते ही चेहरे पर हल्का सा क्रोध भी नजर आने लगा था ।

उसके क्रोध को पहचान कर दालू मन ही मन सतर्क हुआ था ।

"दालू ।" हाकिम का स्वर सोमरस के सेवन की वजह से थरथरा रहा था--- "तुमने मुझे गलत खबर दी ।"

"मैं समझा नहीं हाकिम कि मुझसे गलती कहां हुई ?" दालू बोला ।

"तुमने कहा, मिन्नो और देवा तिलस्म में है ।"

"हां हाकिम, मैंने कहा था ।"

"दोनों में से कोई भी तिलस्म में मौजूद नहीं है ।" हाकिम ने तीखे स्वर में कहा।

"ये कैसे संभव है ?"

"तो क्या मैं गलत कह रहा हूं ।" हाकिम उठ खड़ा हुआ।

"मेरा यह मतलब नहीं था । बल्कि मेरे लिए यह खबर नई है कि मिन्नो और देवा तिलस्म में नहीं है । जब कि आखिरी खबर के मुताबिक वो दोनों तिलस्म में ही थे । दालू के होठों से निकला ।

हाकिम ने दालू को घूरा ।

"अगर इसी तरह मुझे गलत खबरें देते रहे तो तेरा काम कैसे होगा दालू ।"

"ऐसा मत कहो । यह खबर मिले मुझे कई दिन हो गये हैं । उसके बाद मैं अनुष्ठान में व्यस्त हो गया । अनुष्ठान के दौरान ही तिलस्म में कोई गड़बड़ हुई होगी ।" दालू बोला ।

हाकिम आगे बढ़कर कुर्सी पर जा बैठा ।

"वैसे उन दोनों का तिलस्म से बाहर आ जाना खतरे वाली बात हो गई है ।" दालू का स्वर एकाएक चिन्ता से भर उठा--- "इसका मतलब बुरा वक्त आ गया है ।"

"क्या मतलब ?"

दालू की निगाह हाकिम पर जा टिकी ।

"हाकिम।" दालू की आंखों में बेचैनी की आवाज में व्याकुलता थी--- "एक बार जो तिलस्म में फंस गया वो बाहर नहीं आ सकता । बाहर तभी आ सकता है जब उसे तिलस्म से बाहर निकलने वाले रास्तों का ज्ञान हो और तिलस्म के रास्तों का ज्ञान नगरी के ओहदेदारों को ही है, जो तिलस्म के कामों से संबंध रखते हैं । ऐसे में मिन्नो-देवा तिलस्म से कैसे बाहर आ गये, इसका तो एक ही स्पष्ट मतलब निकलता है कि मिन्नो को पहले जन्म की याद आ गई है ।"

"क्या ?" हाकिम के माथे पर बल पड़े ।

"मैं ठीक कह रहा हूं । तिलस्म को मिन्नो ने ही बनाया था कि कौन सा रास्ता कहां जायेगा और किस रास्ते पर क्या-क्या मुसीबतें खड़ी होंगी । इसलिए तिलस्म से मिन्नो से ज्यादा आसानी से भला कौन निकल सकता है । इससे एक बात और स्पष्ट हो गई कि देवा और मिन्नो एक साथ ही है ।" कहते हुए चिंता में फंसा दालू दोनों हाथ मलने लगा ।

हाकिम के माथे पर बल उभरे ।

"तुम्हारा मतलब कि मिन्नो को पूर्वजन्म की याद आ गई है ।" हाकिम का स्वर सोच से भरा था ।

"हां।" दालू की आवाज सख्त होने लगी--- "यह बात मेरे लिए बुरी अवश्य है । परंतु तुम्हारे लिए अच्छी ही बात है । तुम अब उससे वो किताब हासिल कर सकते हो । उसके बाद उसे खत्म कर देना ।"

हाकिम के चेहरे पर सोच के भाव उभरे थे ।

"कोई जरूरी तो नहीं कि मिन्नो को पूर्वजन्म की याद आ गई हो । तभी वो तिलस्म से निकल सकी हो ।"

दालू ने हाकिम को देखा ।

"क्या कहना चाहते हो ?" दालू ने पूछा ।

"तुमने बताया था कि पेशीराम ही उन सबको नगरी में लाया है ।" हाकिम ने कहा--- "ऐसा भी होता है कि पेशीराम ने उन्हें तिलस्म से निकाल दिया हो।"

दालू एकाएक कुछ नहीं कह सका ।

"मालूम करो असल बात क्या है ।" हकीम ने कहा--- "मैं नगरी में जा रहा हूं अपने आराम का सामान तलाश करने । अपने सारे आदमी इस काम में लगा दो कि तिलस्म से बाहर मिन्नो, देवा और उनके साथी कहां है । ये सब मुझे मालूम होगा तो मैं उनके खिलाफ अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकूंगा । दुश्मन कहां है, मुझे ये नहीं मालूम होगा तो मैं कुछ भी नहीं कर सकूंगा ।"

"मैं सब कुछ मालूम करता हूं हाकिम ।" दालू के चेहरे पर सख्ती और चिंता आ गई थी ।

हाकिम उठ खड़ा हुआ ।

"नगरी में जा रहे हो ?" दालू ने पूछा ।

"हां, वहां से मैं अपने पसंद की लड़की लाऊंगा ।" हाकिम ने कहा।

"तुम क्यों तकलीफ करते हो । मैं किसी बढ़िया...।"

"कोई  जरूरत नहीं । मैं खुद ही नगरी से ले आऊंगा।" हाकिम मुस्कुरा पड़ा । सोमरस की वजह से अभी भी उसका चेहरा तमतमा रहा था ।

"किसी को साथ कर देता हूं ।"

"नगरी के रास्ते मेरे लिए अनजान नहीं है ।" कहने के साथ ही हाकिम बाहर निकलता चला गया।

सोचों में डूबा दालू कई पलों तक वहीं खड़ा रहा ।

तभी केसर सिंह ने भीतर प्रवेश किया तो दालू की सोचें टूटी ।

"हाकिम कहां है ?" केसर सिंह का स्वर शांत था ।

"वो नगरी गया है । अपनी पसंद की युवती लाने ।" दालू ने सामान्य स्वर में कहा ।

"हाकिम की ये हरकत कोई पसंद नहीं करता नगरी में ।" केसर सिंह ने कहा--- "वो जब भी आता है तो नगरी की युवतियों में भय समा जाता है । सैकड़ों उसकी वहशी हरकतों की शिकार होती है । जाने कितने लोगों का लहू पीकर वो अपनी भूख और प्यास मिटाता है ।"

"हाकिम की इन हरकतों को तो बर्दाश्त करना ही होगा । दालू कह उठा--- "वह बुरी आदतों का मालिक है, सब जानते हैं। लेकिन हमारे काम का है हाकिम और हमें अपने काम को देखना है, हम हर तरफ से सुरक्षित रहेंगे तो तभी नगरी वालों की तरफ ध्यान दे पायेंगे ।"

केसर सिंह ने कुछ नहीं कहा।

"एक बुरी खबर है केसरे । बुरी न ही हो तो अच्छा है।" दालू बोला।

"क्यों ?"

"हाकिम ने अपनी शक्ति से मालूम किया है कि मिन्नो और देवा तिलस्म में नहीं है । वे दोनों तिलस्म से बाहर आ चुके हैं । दो ही तरीके से मिन्नो, देवा के लिए तिलस्म से बाहर आ सकती है । एक तो यह कि उसे पहले जन्म की याद आ गई हो या फिर पेशीराम ने उन्हें तिलस्म से बाहर का रास्ता दिखाया हो ।" कहते हुए दालू के चेहरे पर फैली कठोरता और गहरी हो गई।

"ये सब बातें तो वास्तव में चिंता में डालने वाली है ।" केसर सिंह ने कहा--- "मैं आपसे यह कहने आया था कि गुलाबलाल जी आये हैं। वे भी कुछ व्याकुल लग रहे हैं । शायद उनके पास कोई खबर है।"

"ओह कहां है गुलाबलाल। मैं गुलाबलाल से ही मिलने की सोच रहा था ।" दालू के होठों से निकला ।

"उन्हें मैं बैठक में बिठाकर आपको खबर देने आया हूं ।"

"हूं, आओ मेरे साथ ।" दालू पलट कर दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

■■■

दालू और केसर सिंह बैठक में पहुंचे तो गुलाबलाल को व्याकुलता से टहलते पाया ।

"आओ, गुलाबलाल बैठो। बिना खबर के अचानक कैसे आना हुआ ?" दालू ने कहा ।

गुलाबलाल ने ठिठक कर दालू को देखा और फिर गंभीर स्वर में कह उठा ।

"दालू, बुरी खबर देने के लिए मुझे स्वयं ही आना पड़ा ।"

दालू के चेहरे पर पुनः सख्ती लौटने लगी ।

"जब से मिन्नो नगरी में आई है। तुम मुझे कोई भी अच्छी खबर नहीं सुना सके ।"

गुलाबलाल खामोश रहा ।

"कहो, क्या कहना चाहते हो ?" दालू का स्वर पहले जैसा ही था ।

"मिन्नो की पहले जन्म की सारी यादें उसके मस्तिष्क में आ गईं और...।"

"यह बात तुम इस कारण कह रहे हो कि मिन्नो तिलस्म से बाहर आ गई है ।" दालू ने कहा ।

"तुम्हें कैसे मालूम कि मिन्नो तिलस्म से बाहर आ गई है ।" गुलाबलाल के होठों से निकला ।

"बताऊंगा, पहले तुम अपनी कह लो ।"

"मिन्नो, देवा और त्रिवेणी को एक साथ अमरु ने तिलस्म में देखा है। अमरु ने अपनी आंखों से मिन्नो को तिलस्म तोड़कर आगे बढ़ते देखा है । अमरु की खबर है कि मिन्नो, देवा के साथ गहरे तिलस्म से निकलकर तिलस्म की ऊपरी तह में आ गई और बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ रही है। अमरू ने बताया कि तिलस्म के अधिकतर मजबूत हिस्से टूटे पड़े हैं । यानी कि मिन्नो जिस रास्ते से गुजर रही है वो रास्ता समाप्त करती आ रही है। इससे स्पष्ट है कि मिन्नो को अपने पहले जन्म की याद अच्छी तरह आ गई है । तभी तो वो तिलस्म तोड़ते हुए बाहर निकलने वाले रास्ते की तरफ जा रही है ।"

दालू के दांत भिंच गये।

"इसके साथ ये खबर भी देता हूं नगरी के गद्दार के बारे में कि वो पेशीराम है।"

दालू के होंठ सिकुड़ गये।

"ये कैसे जाना।"

"त्रिवेणी को मिन्नो और देवा के साथ तिलस्म में देखा गया है।  जबकि मैंने त्रिवेणी को, पेशीराम के हवाले किया था कि वो उससे अपने बेटे कालूराम की मौत का बदला ले सके । इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि पेशीराम का ही संबंध मिन्नो और देवा के साथ है ।" गुलाबलाल ने कहा।

होंठ भींचे दालू ने सिर हिलाया ।

"तुम ठीक कहते हो कि हमारे खिलाफ चलने वाला नगरी का वो गद्दार पेशीराम ही है ।" दालू खतरनाक स्वर में कह उठा--- "अनुष्ठान में जब मैं व्यस्त था तो स्वयं आकर पेशीराम सब मनुष्य कैदियों को मेरी आंखों के सामने से आजाद करवा कर ले गया और अनुष्ठान पर बैठे होने की वजह से मैं उसका कुछ न बिगाड़ सका ।"

"ओह, मैं तो पूछना ही भूल गया कि हाकिम नगरी में आ गया क्या ?" गुलाबलाल ने एकाएक पूछा ।

"हां और इस वक्त वो नगरी में गया है ।"

"नगरी में ?" गुलाबलाल के चेहरे पर बेचैनी उभरी ।

"तो अब ये स्पष्ट हो गया कि मिन्नो को पूर्वजन्म की याद आ चुकी है । ऐसे में उसका रुख मेरी तरफ ही होगा लेकिन वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी । हाकिम मेरे साथ है। तिलस्म ताज की शक्तियां मेरे साथ है । मैं सब संभाल लूंगा । गुलाबलाल तुम फौरन ये जानकर मुझे बताओ कि मिन्नो नगरी के बाहर कहां है ताकि मैं हाकिम को बता सकूं।"

"मैं अपने सारे आदमी को काम पर लगा देता हूं ।"

"फौरन जाओ ।"

गुलाबलाल तेजी से पलटकर बाहर निकलता चला गया ।

दालू के चेहरे पर गुस्से और चिंता के भाव उभरे पड़े थे ।

"ये तो बहुत बुरा हुआ केसरे जो मिन्नो को सब याद आ गया ।" दालू शब्दों को चबाकर कह उठा ।

"आपको चिंता करने की क्या जरूरत है । हाकिम सब संभाल लेगा ।" केसर सिंह ने कहा।

"हां, यह बात तो है। तुम भी सारे आदमी इस काम पर लगा दो वो तिलस्म से बाहर मिन्नो के ठिकाने का पता लगा सकें कि वो कहां है । ताकि हाकिम जल्द से जल्द मिन्नो को खत्म कर सके।"

■■■

हाकिम नगरी से दो घंटे बाद वापस लौटा और नीले पहाड़ के भीतर स्थित दालू के महल में प्रकट हुआ । उसके कंधे पर एक बेहोश युवती थी । महल के रास्तों को पार करता हुआ शयनकक्ष में पहुंचा और बेहोश युवती को बेड पर डालकर घंटा बजाने की जंजीर खींची ।

फौरन ही सेवक हाजिर हुआ ।

"आज्ञा मेरे आका ?" सेवक सिर झुकाकर बोला ।

"किसी सेविका को भेजो ।"

"जी ।" सेवक वापस चला गया।

हाकिम कुर्सी पर बैठ गया । चेहरे पर शांत भाव थे ।

कुछ ही पलों के पश्चात पच्चीस वर्षीय सेविका ने भीतर प्रवेश किया ।

"हुक्म ।" सेविका के चेहरे पर भय मौजूद था ।

"इसे ।" हाकिम ने बेड पर बेहोश पड़ी युवती की तरफ इशारा किया--- "इसका श्रृंगार करके हमारे लिए तैयार करो । संवारने में कोई कमी बाकी न रहे ।"

"ऐसा ही होगा आका ।" सेविका ने सिर झुका कर कहा।

हाकिम कुर्सी से उठा और बाहर निकल गया ।

बैठक में हाकिम और दालू की मुलाकात हुई ।

हाकिम को देखते ही दालू के चेहरे पर मुस्कान आ गई ।

"नगरी में हो आये हाकिम ।"

"हां ।" हाकिम कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।

"कोई पसंद आई, मन बहलाने के लिए ?" दालू बराबर मुस्कुरा रहा था ।

"दो के साथ तो प्यार कर आया हूं । लेकिन तृप्ति नहीं हुई ।" हाकिम मुस्कुराया--- "और आते-आते बहुत ही खूबसूरत युवती को साथ ले आया हूं ताकि रात को मन बहल सके ।"

दालू खुलकर मुस्कुराया ।

"हाकिम जब तक तुम यहां हो, नगरी के मालिक तुम ही हो । जो मन में आये, करो । किसमें इतनी हिम्मत कि तुम्हारे सामने सिर उठा सके । किसी ने ऐसा किया तो बुरा अंजाम होगा उसका ।"

हाकिम मुस्कुराया ।

"वो युवती कहां है, जिसे तुम साथ ले आये हो ?" दालू ने पूछा ।

"शयनकक्ष में । सेविका उसका श्रृंगार कर रही है ।"

दालू ने सिर हिलाया फिर बोला ।

"रात्रि के तुम्हारे भोजन की क्या व्यवस्था की जाये ।"

"एक आदमी का लहू तैयार कर लो और बाकी बचे उसके शरीर को आग पर भून कर मसालेदार बनाकर मेरे सामने पेश करना । भुना हुआ शरीर स्वादिष्ट होना चाहिए ।" हाकिम ने सरल लहजे में कहा।

"खाने में ये सब तैयार हो जायेगा। मैं अभी आदेश दे देता हूं ।" दालू ने कहा फिर पल भर ठिठककर बोला--- "एक हादसा हुआ है हाकिम । उसे तुम गम्भीरता से ही लोगे ।"

हाकिम की निगाह दालू के चेहरे पर जा टिकी ।

"मिन्नो अपने पहले जन्म की बातों को जान चुकी है । तिलस्म से वह देवा के साथ अपने पहले जन्म की यादों के सहारे तिलस्म तोड़ते हुए बाहर आ गई है । इस मामले में पेशीराम ने उसकी सहायता नहीं की ।" दालू के स्वर में गंभीरता थी--- "इधर तुम नगरी का चक्कर लगा आये हो । यह बात आम हो चुकी है कि तुम नगरी में आ गये हो । मिन्नो जहां भी होगी, ये खबर उस तक पहुंच चुकी होगी । या फिर पेशीराम ने तुम्हारे आने की खबर मिन्नो तक पहुंचा दी हो ।" इतना कहकर दालू खामोश हो गया ।

हाकिम के माथे पर बल पड़े ।

"स्पष्ट कहो, बात को बीच में क्यों छोड़ा ?"

"मिन्नो अब तक यकीनन जान चुकी होगी की तुम नगरी में आ गये हो और तुम्हें अमरत्व हासिल है । वो तुम्हारा मुकाबला नहीं कर सकती। तुम्हें नहीं मार सकती । मुझ तक पहुंचने से पहले उसे तुम से टक्कर लेनी होगी । ऐसे में मिन्नो सबसे पहले उस किताब को पाना चाहेगी, जिसमें ये दर्ज है कि तुम्हारी जान कैसे ली जा सकती है । स्पष्ट मतलब है कि मिन्नो अब हम दोनों के सिर पर लटकती तलवार बन चुकी है, जो कभी भी हमें खत्म कर सकती है । अगर उसका फौरन इंतजाम न किया गया तो ।"

"तुम ठीक कह रहे हो ।" हाकिम का चेहरा गुस्से से सुर्ख हुआ--- "यह तो बुरी खबर है । सोमरस लाओ।"

दालू ने तुरंत उठकर जंजीर खींची तो घंटा बजने की आवाज आई ।

सेवक हाजिर हुआ ।

"सोमरस लाओ ।"

दालू का आदेश पाकर सेवक लौट गया ।

"तुम्हारा क्या ख्याल है । दालू मिन्नो ने वो किताब कहां रखी होगी ?" हाकिम ने पूछा ।

"मालूम होता तो कब की तुम्हें मिल चुकी होती ।" दालू ने कहा--- "सवा सौ बरस से उस किताब की तलाश हो रही है, परंतु वो नहीं मिल पाई ।"

"मेरा ख्याल है मिन्नो ने वो किताब अपने महल में कहीं छुपा रखी होगी ।" हाकिम बोला।

"असंभव ।" दालू ने कहा--- "महल में होती तो वो कब कि मुझे मिल चुकी होती । पूरे दस बरस तक मेरे आदमी उस महल में ही किताब तलाश करते रहे । कई गुप्त जगहें ढूंढ निकाली, परंतु किताब नहीं मिली । मेरे ख्याल में वो किताब मिन्नो ने महल से बाहर ही कहीं सुरक्षित रख दी होगी ।"

हाकिम के चेहरे पर सोच के भाव छाये रहे ।

तभी सेवक सोमरस से भरा बड़ा सा पीतल का कटोरा थामे भीतर आया । साथ में दूसरे सेवक ने थाल जैसी चीज में दो लंबे गिलास रखे हुए थे ।

हाकिम फौरन उठा और सेवक के हाथ से कटोरा थामकर होठों से लगा लिया । कटोरा होठों से तभी हटा जब खाली हो गया तो उसे वापस सेवक को थमा कर हाकिम चहल-कदमी करने लगा।

दालू ने सेवकों को देखा ।

"आका हकीम के लिए रात्रि के भोजन को तैयार करना है ।"

"हुकुम कीजिये ।"

"नगरी में जाकर किसी स्वस्थ व्यक्ति को पकड़ लाओ। उसका खून कटोरे में निकाल कर रखना और शरीर को अलाव की आग में भूनकर मांस को स्वादिष्ट मसालेदार बनाकर पेश करना है ।" दालू ने कहा ।

"जी, इसी तरह का भोजन तैयार किया जायेगा ।" सेवक ने कहा ।

"ध्यान रहे । भोजन स्वादिष्टता से भरपूर होना चाहिए ।" दालू ने चेतावनी भरे स्वर में कहा--- "अगर आका हाकिम को स्वादिष्ट न लगा तो सजा दी जायेगी ।"

"आका को भोजन अवश्य पसंद आयेगा ।" सेवक ने भावहीन स्वर में कहा ।

दालू का इशारा पाकर दोनों सेवक बाहर निकल गये।

सोमरस की वजह से हाकिम का चेहरा धधकने लगा था । आंखों की सुर्खी बढ़ गई थी ।

दालू ने वहां टहलते हाकिम को देखा ।

"दालू ।" हाकिम दांत भींचकर कह उठा--- "यह वक्त किताब को न ढूंढकर मिन्नो को ढूंढने का वक्त है । उसे वक्त रहते ढूंढ लिया जाये तो सब कुछ ठीक हो जायेगा ।"

"तुम ठीक कहते हो । मिन्नो को जल्दी से जल्दी तलाश करने के आदेश मैंने गुलाबलाल को दे दिए हैं और अपने आदमी भी मिन्नो की तलाश में लगा दिए हैं । इस वक्त मिन्नो की तलाश शुरू हो चुकी होगी । वो देवा या दूसरे मनुष्य जहां भी छिपे हैं, जल्दी ही पकड़ लिए जायेंगे।"

हाकिम होंठ भींचे टहलता रहा ।

तभी केसर सिंह ने भीतर प्रवेश किया ।

"मैंने सब आदमी मिन्नो की तलाश में भेज दिए हैं ।" वो भीतर प्रवेश करते ही बोला ।

"बहुत अच्छा किया केसरे।" दालू शब्दों को चबाकर कह उठा--- "अब मिन्नो की खैर नहीं, क्यों हकीम ।"

हकीम का चेहरा सोमरस की वजह से तमतमा रहा था ।

"तुम मिन्नो का पता लगाओ । फिर देखो मैं मिन्नो-देवा और दूसरे मनुष्यों को कैसे समाप्त करता हूं ।" हाकिम के स्वर में दरिंदगी कूट-कूट कर भरी पड़ी थी । वह बेहद भयंकर लगने लगा था।

हाकिम का यह रूप देखकर दालू को मन ही मन राहत मिली ।

दालू ने केसर सिंह को देखा जो शांत सा खड़ा था ।

"कब तक मिन्नो की खबर लग जाने की आशा है केसरे ।"

"कभी भी मिन्नो के बारे में खबर मिल सकती है ।" गुलाबलाल और हमारे आदमी सब इसी काम पर लग गये हैं ।"

दालू के चेहरे पर मौत से भरी मुस्कान नाच उठी ।

"हाकिम ।" दालू ने कहा--- "हो सकता है, रात को तुम्हें आराम न मिल पाये ।"

"क्यों ?" हाकिम ने सोमरस से सुर्ख आँखों से दालू को देखा ।

"मिन्नो की खबर कभी भी मिल सकती है । उसे खत्म करने के लिए तुम्हें जाना पड़ सकता है ।"

"तब तो और मजा आयेगा ।" हाकिम खतरनाक ढंग से हंसा--- "मनुष्यों का स्वादिष्ट लहू पीने को मिलेगा।"

■■■

हाकिम ने रात्रि के भोजन के दौरान लोगों का कटोरा खाली किया और साथ ही साथ पांच प्लेटों में मौजूद भुना हुआ मसाले वाला मांस खा रहा था । पास में तीन सेवक हाथ बांधे खड़े थे । ताकि हाकिम की हर आवश्यकता को फौरन पूरा किया जा सके ।

कुछ देर पहले ही दालू वहां से उठकर गया था ।

केसर सिंह बीच-बीच में चक्कर लगा जाता था ।

तभी केसर सिंह को खबर मिली कि उसकी पत्नी उससे मिलने आई है तो केसर सिंह हैरान हुआ उसके आने पर । आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि नगरी से उसकी पत्नी यहां मिलने आई हो । वह तो हर दूसरे दिन नगरी का फेरा लगाकर अपने परिवार वालों से मिल लेता था । कल ही तो नगरी में जाकर अपने परिवार से मिलकर आया था । उलझन में फंसा केसर सिंह बैठक में मौजूद अपनी पत्नी के पास पहुंचा तो देखा उसकी पत्नी रूपदेवी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे । सारा चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था । केसरे सिंह को देखते ही उसकी रुलाई और फूट पड़ी । केसर सिंह के चेहरे पर हैरानी का समंदर उमड़ पड़ा ।

"क्या बात है रूप, क्या हुआ, किसने तेरे को इतना दुख दिया कि तू इस तरह तड़प रही है ।"

"मैं बर्बाद हो गई, मेरे साथ आप भी बर्बाद हो गये ।" रूपदेवी का चेहरा आंसुओं से गीला होने लगा ।

"किसमें इतनी हिम्मत आ गई कि केसर सिंह की तरफ आंख उठा सके ।" केसरसिंह का चेहरा कठोर हो गया ।

रूपदेवी फफकती रही । बोली कुछ नहीं ।

"तू चुप क्यों है रूप, बता उसका नाम और बता उसने क्या किया है ?" केसर सिंह का चेहरा कठोर हो गया।

रूपदेवी रोती रही । बोली नहीं ।

केसर सिंह के माथे पर बल उभर आये।

"क्या बात है, तू कुछ कहती क्यों नहीं रूप ?"

रूपदेवी के होंठ कांपे फिर थके से शब्द निकले ।

"हाकिम, मीरा को उठा लाया है । वो बेचारी जाने किस हाल में होगी ।"

केसर सिंह के चेहरे पर जलजले के भाव उभरे और गुजर गये ।

"क्या कहा ?" केसर सिंह की आंखे फैल गई--- "मीरा, मीरा को हाकिम उठा लाया है ।"

"हां, आज वो नगरी में आया था । दो अन्य युवतियों की जिंदगी बर्बाद कर दी । एक तो पीड़ा से ही मर गई । उसके बाद वो मीरा को उठा लाया ।" रूपदेवी फफक पड़ी--- "उसे बचा लीजिये । वो हमारी फूल सी बच्ची है । आप तो दालू के खास आदमी हैं और...।"

"बस रूप, बस।" केसरे सिंह के दांत भिंच गये--- "अब तू जा।"

"मैं अपनी बच्ची को लेकर ही वापस जाऊंगी । मीरा को ला दीजिये ।" रूपदेवी रोये जा रही थी ।

"फिक्र मत कर ।" केसर सिंह का स्वर बेकाबू सा हो रहा था--- "मैं...मैं सब ठीक कर दूंगा । जा रूप, तू जा, मीरा को बचाने के लिए ये वक्त बहुत कीमती है ।"

रूप देवी ने आंसू भरा चेहरा उठाकर केसर सिंह को देखा ।

"अच्छी बात है । लेकिन एक बात अवश्य सुन लीजिये। अगर मेरी बेटी को आप सही सलामत वापस नहीं लाये तो मेरा मरा हुआ मुंह ही आपको देखने को मिलेगा ।" कहने के साथ ही रूपदेवी पलटी और तेज-तेज कदम उठाते हुए बैठक से निकलती चली गई ।

"रूप-रूप...।"  केसर सिंह ने तड़प कर पुकारा ।

परंतु रूपदेवी ने अपना चेहरा, केसर सिंह को नहीं दिखाया और चली गई।

केसर सिंह की हालत अजीब सी हो रही थी, यह सोचकर कि हकीम उसकी प्यारी बेटी मीरा को उठा लाया है । उसके लिए तो गजब होने से भी ये बुरी बात थी ।

केसर सिंह बैठक से निकलकर जल्दी से उस कमरे में पहुंचा, जहां हाकिम रात्रि का भोजन लेने में व्यस्त था । अपने चेहरे के भावों पर बहुत हद तक वो काबू पा चुका था ।

उस वक्त हाकिम भुने हुए मांस वाली आखिरी प्लेट खाली करने में व्यस्त था । मांस चबाते हाकिम ने सेवक से कहा ।

"सोमरस लेकर आओ ।"

"जी।" सेवक फौरन बाहर निकल गया ।

केसर सिंह वहां से जाने ही वाला था कि हाकिम ने टोका।

"नगरी से मैं एक युवती लेकर आया हूं । सेविका को उसके श्रृंगार करने उसे सजाने का काम सौंपा था । मालूम करो श्रृंगार पूरा हो गया ?" हाकिम की आंखों में मादकता का नशा नाच रहा था ।

केसरे सिंह ने सिर्फ सिर हिलाया और पलट कर बाहर निकल गया ।

केसर सिंह वहां से उस शयनकक्ष में पहुंचा ,जहां युवती का श्रृंगार किया जा रहा था जो कि पूर्ण हो चुकी थी । युवती की आंखें रो-रोकर लाल हो चुकी थी । केसर सिंह को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके दिल के टुकड़े कर दिए हो । वो उसकी बीस वर्षीय बेटी मीरा ही थी ।

तीन सेविकाए उसका श्रृंगार करने में व्यस्त थी ।

"मीरा ।" केसर सिंह के होठों से कंपकपाता स्वर निकला ।

"बापू ।"

केसर सिंह को देखकर मीरा चीख उठी और भागकर केसर सिंह से लिपट गई ।

"मुझे बचा लो बापू, मुझे...।"

"फिक्र मत कर बेटी ।" केसर सिंह ने किसी तरह अपने पर काबू पाया--- "सब ठीक हो जायेगा ।"

"मुझे यहां से ले चलो ।" मीरा की आंखों में आंसू थे ।

"हां...हां क्यों नहीं । मैं अभी आता हूं ।" कहने के साथ ही केसर सिंह ने अपनी बेटी को अपने से जुदा किया।

वहां मौजूद तीनों सेविकाओं के चेहरे गंभीर हो उठे ।

केसर सिंह पलट कर तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ा । उन तीनों में एक मुख्य सेविका की जो तेज-तेज कदम उठाकर केसर सिंह के करीब पहुंची ।

केसर सिंह ने ठिठककर तड़पती निगाहों से उस सेविका को देखा ।

"ये हमें बता चुकी है कि ये तुम्हारी बेटी है । परंतु हममें इतनी हिम्मत नहीं कि तुम्हें खबर कर सकें ।"

केसर सिंह अपनी हालत पर काबू पाते हुए उसे देखता रहा ।

"अब तुम क्या करोगे ?" सेविका का स्वर व्याकुल था ।

"मैं...मैं।" केसर सिंह ने अपनी आवाज में कंपन महसूस किया ।

"केसर सिंह ।" सेविका का स्वर गंभीर था--- "मत भूलो ये हाकिम का मामला है ।"

"मैं...मैं दालू को मजबूर कर दूंगा कि...कि वो मेरी बेटी को बचा ले ।" केसर सिंह की आवाज में विश्वास, आविश्वास के भाव थे। जिन्हें वह खुद ही महसूस कर रहा था ।

"केसर सिंह ।" सेविका ने अफसोस भरे स्वर में कहा--- "जब दूसरे पिसते हैं तो दर्द महसूस नही होता । खुद को पिसना पड़े तो दर्द का अहसास होता है। जो कि अब तुझे हो रहा है। हम तो मजबूर है। दालू का आदेश ही हमारा धर्म-कर्म है । लेकिन तेरे लिए कहती हूं कि अभी भी वक्त है । बुरे काम छोड़ दे । दालू का साथ देकर तू कभी भी अच्छे रास्ते पर नहीं बढ़ सकता ।"

केसरसिंह बिना कुछ कहे वहां से आगे बढ़ गया ।

केसरसिंह बिना खबर दिए दालू के शयनकक्ष में प्रवेश करता चला गया । दालू उस वक्त तीन युवतियों के मौजूदगी में सोमरस का आनंद ले रहा था । केसरसिंह को इस तरह भीतर प्रवेश करते देख, दालू के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे । दूसरे ही पल मुस्कुरा पड़ा ।

"तो मिन्नो का पता मालूम हो कि गया कि वो कहां मौजूद है ।" दालू कह उठा ।

केसरसिंह के चेहरे पर तड़प और व्याकुलता के भाव थे ।

"मैं तुमसे अकेले में बात करना चाहता हूं ।"

दालू की आंखें सिकुड़ी । उसने केसरसिंह के चेहरे के भावों को देखा जो कुछ और ही कह रहे थे । दालू ने तुरंत हाथ से इशारा किया । तीनों युवतियां बाहर निकलती चली गई ।

दालू ने केसर सिंह को देखा ।

"कहो केसरसिंह, ऐसी क्या खास बात है जो...।"

"दालू।" केसरसिंह की भरपूर कोशिश कर रहा था कि उसका स्वर बेकाबू न हो--- "मैंने तुम्हारी बहुत सेवा की । क्या मेरी सेवा में कहीं कोई कमी रह गई ।"

"ये तू कैसी बात कर रहा है केसरे।" दालू की आंखें सिकुड़ी ।

"मैंने जो पूछा है उसका जवाब दो दालू ।"

"तुमने तो सेवा में अपना रात-दिन एक कर दिया है केसरे । बात क्या है ?" दालू बोला ।

"अगर मेरे परिवार पर कोई मुसीबत आती है तो तुम मेरे लिए क्या करोगे दालू ?"

"तू कैसी बातें कर रहा है केसरे ।" दालू का स्वर सख्त हो गया--- "जो तेरे या तेरे परिवार की तरफ आंख भी उठायेगा तो मैं उधर से उसका कुनबा खत्म कर दूंगा ।"

केसरसिंह ने दालू की आंखों में देखा ।

"बता कौन है वो ?" दालू के चेहरे पर क्रोध नाच उठा ।

"हाकिम ।" केसरसिंह की आवाज कठोर हो गई ।

दालू जल्दी से खड़ा हो गया ।

"क्या कहा, हाकिम ?"

"हां ।"

दालू के चेहरे पर क्रोध गायब हो गया और बेचैनी वहां दिखाई देने लगी ।

"क्या किया है हाकिम ने ?" दालू के होठों से निकला ।

"वो नगरी से मेरी बेटी मीरा को उठा लाया है, जो इस वक्त श्रृंगार-बनाव के साथ शयनकक्ष में मौजूद है और हाकिम उसके पास जाने वाला है ।" केसरसिंह की आवाज में तड़प भर आई--- "मेरी बेटी मुझे लौटा दो दालू । हाकिम को रोक लो । मैं अपनी सेवाओं की कीमत के बदले अपनी बेटी मांग रहा हूं । उसे लौटा दो दालू ।"

दालू के चेहरे पर गंभीरता नजर आने लगी ।

"क्या बात है दालू । तुम खामोश क्यों हो गये ?" केसरसिंह व्याकुल हो उठा ।

"तुम अच्छी तरह जानते हो कि हाकिम अपने काम में किसी का दखल पसंद नहीं करता ।"

"दालू, ये किसी की नहीं, मेरी बेटी की जान और इज्जत का सवाल ।"

"केसरे ।" दालू ने सोच भरे स्वर में कहा--- "हाकिम को मैंने बेहद खास काम के लिए बुलाया है । वो काम पूरा होना जरूरी है, वरना मिन्नो...।"

"दालू, मैं अपनी बेटी की बात कर रहा हूं ।" केसर सिंह की आंखों में पानी चमका ।

"हाकिम, इस वक्त मेरी सबसे बड़ी जरूरत है, मैं उसे किसी भी कीमत पर नाराज नहीं कर सकता।" दालू ने स्पष्ट कहा--  "मुझे तुम्हारे साथ हमदर्दी है । हाकिम की जगह कोई और होता तो मैं कभी भी पीछे नहीं हटता । लेकिन मैं हाकिम को नाराज नहीं कर सकता ।"

"मैं तो केसरा हूं, केसरा । केसरे की बेटी बे-मौत मरने जा रही है दालू, वो..."

"सब समझता हूं मैं ।" दालू सिर हिलाकर सामान्य स्वर में कह उठा--- "बार-बार एक ही बात को दोहराओ मत, मेरी मजबूरी समझो, मैं अपना राज कायम रखना चाहता हूं । इसके लिए जरूरी है कि हाकिम मिन्नो को खत्म कर दे और वो करेगा । केसरे...अपने आप पर काबू रख। भूल जा अपनी बेटी को । शुरू में मन खराब तो होगा । लेकिन बाद में सब ठीक हो जायेगा।"

दालू के जवाब से केसर सिंह को ऐसा लगा जैसे उस पर पहाड़ टूट पड़ा हो । लेकिन उसने खुद को बेकाबू नहीं होने दिया । चेहरे पर जहां भर का दर्द अवश्य नजर आने लगा ।

"जा केसरे अपना मन कहीं और लगा । हौसला रख, दुख के इन पलों को इसी तरह निकाल ले ।"

केसरसिंह ने देखा कि दालू के चेहरे पर कहीं भी दुख अफसोस का भाव नहीं था ।

"जा थोड़ा सा सोमरस ले लो।"

केसर सिंह ने कुछ नहीं कहा और सिर झुकाये टूटा-सा, थका-सा, पलट कर बाहर निकलता चला गया । दालू से उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी । उसे पूरा विश्वास था कि दालू अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेगा कि उसकी बेटी हाकिम के हाथों सलामत रहे । परंतु दालू के दो टूक जवाब ने उसके सारे भ्रम चूर-चूर करके रख दिए थे ।

केसर सिंह के जाते ही दालू ने उन तीनों युवतियों को बुलाया और सोमरस के साथ मौज-मस्ती में डूबता चला गया।

केसर सिंह की हालत ऐसी हो रही थी जैसे उसमें जान ही न बची हो, टांगों में कंपन होने लगा था । सिर को फटता महसूस कर रहा था । वह सीधा उस कमरे में पहुंचा, जहां हाकिम भोजन कर रहा था । परंतु अब वहां हाकिम नहीं था । सेवक नहीं थे । बर्तन नहीं थे।

हाकिम वहां से जा चुका था ।

शायद शयनकक्ष में ।

वहां साजो-श्रृंगार के साथ उसकी बेटी मौजूद थी ।

केसरसिंह की आंखों के सामने रूपदेवी का आंसुओं भरा चेहरा नाच उठा।

केसरसिंह में इतना दम नहीं था कि हाकीम का किसी प्रकार से विरोध कर पाता । यह काम या कोशिश दालू ही कर सकता था, परंतु उसको उसकी बेटी की परवाह कहां। नगरी का मालिक बना रहने के लिए उसकी निगाहों में मिन्नो को खत्म करना जरूरी था । उसकी बेटी को बचाना जरूरी नहीं था । केसरसिंह के मन में दालू के प्रति नफरत का सैलाब उमड़ पड़ा ।

आज केसरसिंह ने पहली बार खुद को असहाय सा महसूस किया । जिससे हर कोई डरता था । आज जाने क्यों खुद उसे अपने से ही डर लग रहा है । मस्तिष्क में आंधियां चल रही थी और वो कुछ भी ठीक से सोच-समझ न पा रहा था । आंखों के सामने रूपदेवी, मासूम मीरा के चेहरे ही घूम रहे थे । कैसा बाप है वह कि अपनी मासूम बेटी को दरिंदे से बचाने का साहस नहीं कर पा रहा ।

केसर सिंह कांपती टांगों से कमरे से बाहर निकला । चेहरे पर ऐसा पीलापन उभर आया था । जैसे बरसों से बीमार हो, परंतु आंखों में गुस्से से भरी खूनी चमक थी ।

तभी सामने से एक सेवक आया और ठिठक कर बोला ।

"आपका आदमी आपसे मिलने आया है ।"

केसरसिंह की आंखे सेवक पर जा टिकी ।

"कौन ?"

"मौजसिंह ।"

केसरसिंह का चेहरा पीलापन लिए कठोरता से भर उठा । मौजसिंह उन आदमियों में शामिल था जो मिन्नो के बारे में मालूम करने गये थे कि वो किस जगह पर हो सकती है ।

"मौजसिंह कहां है ?" केसरसिंह का स्वर सशक्त ही था ।

"बैठक में ।"

"तुम जाओ ।"

सेवक चला गया तो केसरसिंह बैठक की तरफ बढ़ गया । चेहरे पर अब दरिंदगी के भाव आ ठहरे थे और सुर्ख आंखों में वहशियाना चमक ।

कुछ ही पलों उपरांत केसरसिंह ने बैठक में प्रवेश किया ।

मौजसिंह कुर्सी पर बैठा था । उसे देखते ही फौरन उठकर कह उठा ।

"केसरे, मिन्नो के बारे में मालूम कर आया हूं कि वो कहां है । वहां और लोग भी हैं । सबके चेहरे तो नहीं देख पाया। लेकिन वहीं पर है ।"

केसरसिंह के चेहरे पर क्रूरता से भरी मुस्कान नाच उठी।

"कहां है मिन्नो ?"

"अपने महल में ही, जिसका हाल खंडहर जैसा हुआ पड़ा है। वहां मैंने शुभसिंह और नीलसिंह को भी देखा । उस महल में जाने का कोई इरादा नहीं था । मैं तो यूं ही उधर से गुजर रहा था कि शुभसिंह की झलक मिल गई । मेरी उत्सुकता बढ़ी कि वहां शुभसिंह क्या कर रहा है तो उसके बाद अन्य लोगों को भी वहां देखा । वे बातें कर रहे थे । जिससे यह बात स्पष्ट हो गई कि मिन्नो महल के भीतर ही है।"

केसरसिंह जहरीले अंदाज में मुस्कुराया ।

"खूब मौजसिंह, तू बहुत ही बढ़िया खबर लाया । ये खबर सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई ।" शुभसिंह ने शाबाशी भरे ढंग से उसको थपथपाकर बोला--- "और किसे दी ये खबर ?"

"किसी को भी नहीं, खबर आम हो गई तो वे सब सतर्क हो सकते हैं ।" मौजसिंह मुस्कुराकर बोला ।

"यह तो और भी अच्छा किया। बहुत समझदारी से काम लिया। तेरे को तो इनाम मिलना चाहिए ।" केसरसिंह की आंखों में मौत के भाव चमक उठे । अगले ही पल कमर में फंसी कटार निकाली और इतने खतरनाक ढंग से वार किया कि मौजसिंह का पेट पलक झपकते ही कई जगह से गहराई तक उधड़ गया।

मौजसिंह चीख भी न सका और नीचे गिरकर तड़पने लगा ।

खूंखार ढंग से केसरसिंह ने एक कदम आगे बढ़ाया और कटार का वार उसकी गर्दन पर किया । मौजसिंह जोरों से तड़पा और फिर हमेशा-हमेशा के लिए शांत पड़ गया । केसरसिंह खूनी निगाहों से मौजसिंह के मृत शरीर को देखता रहा । शरीर से लहू बहकर फर्श पर फैल रहा था । केसरसिंह की निगाहें मौजसिंह की लाश पर अवश्य थी परंतु आंखों के सामने मासूम बेटी मीरा का चेहरा नाच रहा था । जो हाकिम के साथ शयनकक्ष में बंद थी ।

सिर से पांव तक वहशी भावों में डूबे केसरसिंह पलटा कि ठिठककर रह गया।

दरवाजे पर मुख्य सेविका खड़ी एकटक उसे देख रही थी ।

केसरसिंह की आंखों से गुस्सा और नफरत की चिंगारियां फूट रही थी ।

"मुझे खुशी है केसरसिंह ।" मुख्य सेविका ने शांत स्वर में कहा--- "कि तुमने बुरे काम छोड़कर अच्छा रास्ता पकड़ लिया है । लेकिन अच्छे रास्ते पर आने में बहुत देर कर दी । पहले रास्ता बदल लिया होता तो तुम्हारी बेटी सलामत रहती ।"

केसरसिंह के होठों से गुर्राहट निकली।

"मेरी मासूम बेटी सलामत रहती तो मैं रास्ता कैसे बदलता ।" केसरसिंह गुर्राया--- "दालू के मेरा प्रति कमीनापन बाहर कैसे आता । अपने लालच में दालू ने मेरी बेटी को दरिंदे के सामने डाल दिया । अब मैं साबित कर दूंगा कि हाकिम उसे बचाने का दम रखता है तो मैं उसे तबाह करने का हौसला रखता हूं ।"

मुख्य सेविका के चेहरे पर गंभीरता थी।

"तो मैं आशा करूं कि तुम देवी के खिलाफ कोई काम नहीं करोगे । उसे मुसीबत में नहीं डालोगे, ये बताकर कि इस वक्त वो अपने महल में ही मौजूद हैं ।" सेविका ने कहा ।

"अब मुझे दालू का नहीं, मिन्नो का आदमी समझो ।"

मुख्य सेविका के चेहरे पर मुस्कान उभरी ।

"तुम्हारी बेटी का बहुत दुख है लेकिन उतनी ही खुशी है कि तुम्हें अच्छे-बुरे की पहचान हो गई ।

"सेवकों से कहकर ये कमरा साफ करवा दो । दालू, मौजसिंह के बारे में पूछे कि इसे क्यों मारा गया तो इसका जवाब मैं भी उसे दूंगा । केसरसिंह ने दांत भींचे कहा और खून से सनी कटार थामे बाहर निकलता चला गया ।