राजनगर, वर्तमान।

“जय हिन्द सर।” फाह्याज़ को देखते ही सुबोध ने एड़ियाँ खड़कायीं।

सैल्यूट का जवाब देने के बाद फाह्याज़ सीधे अपने केबिन में चला गया। सुबोध ने भी अपने डेस्क की दराज से विनायक के केस से सम्बंधित रिपोर्ट्स और पारदर्शी थैलियों में बंद कुछ दवाएं निकालीं, फिर उसके पीछे लपक पड़ा।

“अब तबियत कैसी है सर?” केबिन में दाखिल होने के बाद उसने पूछा।

“तबियत बिगड़ी ही कब थी।” फाह्याज़ ने उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा- “बस थोड़ा सा काम करने का मन नहीं था।”

“इसे ही तो तबियत का नासाज होना कहते हैं सर जी।”

“अब तक क्या प्रोग्रेस की आपने?” फाह्याज़ ने सुबोध की टिप्पणी को नजरअंदाज करके फाइल को अपनी ओर खींच लिया।

“पोस्टमार्टम और फिंगरप्रिंट रिपोर्ट्स तो आपको कल ही मेल कर दी थी, जो कि हमारे लिए कोरा कागज़ साबित हुए हैं। चाकू पर से और कमरे से उठाये गए सारे के सारे बायोमेट्रिक ट्रेसेस सिर्फ और सिर्फ मकतूल के ही हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कॉज ऑफ डेथ ग्रिवियस इंजरी है। मौत का वक्फ़ा रात साढ़े नौ से साढ़े बारह के बीच दर्ज है।”

“नयी बात बताइए आचार्य जी।”

“नयी सूचना के तौर पर आज हमारे पास मकतूल की कॉल डिटेल्स, उसकी बैकग्राउंड से जुड़ी इनफार्मेशन्स और सीसीटीवी फुटेज हैं, जिनमें से केवल कॉल डिटेल्स ही काम की लग रही है क्योंकि बिल्डिंग के एंट्रेंस और कंपाउंड की सीसीटीवी फुटेज में कोई भी सस्पिसियस मूवमेंट रिकॉर्ड नहीं हुई है, स्पेशियली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज टाइम इंटरवल के बीच। अव्वल सुबह छ: बजे तक तो सिक्योरिटी पर्सन्स के अलावा कोई स्पॉट ही नहीं हुआ है। अपार्टमेंट के पाँच सौ मीटर के दायरे में आने वाले एटीएम और दुकानों पर लगे कैमरे भी हमने खंगाले।”

“अच्छी-खासी मेहनत कर डाली आपने।”

“लेकिन ये मेहनत तो जाया साबित हुई सर।”

“कोई बात नहीं, होता है। मकतूल की बैकग्राउंड रिपोर्ट क्या है?”

“मूलरूप से यूपी के सीतापुर का रहने वाला था लेकिन गाँव से पूरी तरह रिश्ता टूट चुका था।”

“वजह?” फाह्याज़ ने भवें ऊंचकाई।

“पिता बहुत पहले गुजर चुके थे, माँ मानसिक रूप से कमजोर थी। गाँव वालों के बताये अनुसार, जब विनायक पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में बाहर था तभी किसी रोज चाचा ने जायदाद के पेपर्स पर इसकी माँ का अंगूठा ले लिया था फिर उसके चल बसते ही उसने इलाके के दबंग शख्सियतों और स्थानीय थाने की मदद से संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया। पेपर्स तो उसके पास थे ही, ऊपर से विनायक उस वक्त ठहरा अकेला बाईस-तेईस साल का लड़का, कोर्ट के चक्कर लगाने का हौसला न कर सका था लिहाजा हार मानकर उसने रिश्तेदारों की मदद से शहर में ही ठिकाना बना लिया था।”

“इतना नैतिक पतन हो चुका है हमारे समाज का? गाँव वालों ने उस बेगैरत चाचा को जलील नहीं किया?”

“चाचा को जलील होने की इतनी ही लाज होती तो ऐसी हरकत ही क्यों करता?”

“फिर तो बॉडी क्लेम करने के लिए भी अब तक कोई नहीं आया होगा।”

“हमने चाचा को बुलवाया है।”

“हम्म।” फाह्याज़ ने गहरी साँस ली और कुछ देर की खामोशी के बाद पूछा- “हत्या की रात क्या वाकई सोसायटी की लाइट गयी थी?”

“बिल्कुल भी नहीं।”

“तो फिर पोर्टेबल लैंप ऑन क्यों था?”

“इसकी तो कोई भी साधारण वजह हो सकती है सर। रात को लोग लाइट ऑफ करके सोते हैं।”

“लेकिन यहाँ पर इसकी वजह साधारण नहीं दिखाई दे रही है। किचन के हालात बयां कर रहे थे कि वह कुकिंग में जुटा हुआ था। इट मीन्स, उसे लैंप जलाने की जरूरत तब तक नहीं थी, जब तक कि किसी टेक्निकल इशू के तहत उसकी बत्ती गुल न हुई रही हो, जो कि नहीं हुई थी।”

“यानी कि इस अँधेरे की क़त्ल में अहम् भूमिका है?”

“पता नहीं, लेकिन जब विनायक क़त्ल हो रहा था तो उसकी बत्ती गुल थी, ये तय है।”

“ये संभावना गलत भी हो सकती है सर। वारदात से सबसे पहले वाकिफ़ होने वाले दूधवाले को जब हमने यहाँ बुलाकर उसका डिटेल स्टेटमेंट लिया तो लाइट के बाबत उसका कहना था कि वे ऑन थीं। क़त्ल करने के बाद हत्यारे को उन्हें

ऑन करने की क्या जरूरत थी?”

“मे बी कि दूधवाले से पहले भी किसी ने उस फ्लैट में दखल बनाई हो। किसी चीज की तलाश में या फिर सबूत मिटाने की कोशिश में हो सकता है कि हत्यारा ही वहाँ आया हो और उसे रोशनी की जरूरत पड़ी हो।”

“लेकिन ये इतना स्ट्रांग पॉइंट नहीं है सर कि इस पर इतनी मगजमारी की जाए। अँधेरे में कातिल के लिए क़त्ल करना तो मुश्किल ही होता। कोई सार्वजनिक स्थल होता, जहाँ उसे अपनी पहचान छुपाने की जरूरत होती तो वहाँ ये थ्योरी चल जाती। बिजली गुल होने की कोई भी वजह हो सकती है इसलिए हमें इसे अंडर कंसिडरेशन रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। किसी क्लू का लिंक इससे जुड़ता दिखाई दिया तो हम आगे डिस्कस कर लेंगे।”

फाह्याज़, सुबोध की बातों से मुतमईन तो हुआ लेकिन अपने उस अंतर्मन को न समझा सका, जो बार-बार इस बात की ताकीद कर रहा था कि वह अँधेरा साधारण नहीं था, जिसमें विनायक की जिंदगी खो गयी थी।

“बिल्डिंग की इलेक्ट्रिसिटी का सेंट्रलाइज्ड कण्ट्रोल कहाँ होता है?” उसने पूछा।

“बेसमेंट में, लेकिन अगर कातिल की योजना में अँधेरा शामिल था तो उसे इतनी जहमत उठाने की क्या जरूरत थी। ये काम क्या स्विचबोर्ड से नहीं हो सकता था?”

“बेसमेंट से भी तो किसी फ्लैट की इलेक्ट्रिसिटी पर असर डाला जा सकता है?” फाह्याज़ ने मानो सुबोध का तर्क सुना ही नहीं।

“अगर ऐसा होता तो केवल विनायक के फ्लैट की नहीं, उस मंजिल की सारे फ्लैट्स की इलेक्ट्रिसिटी प्रभावित होती। स्विचबोर्ड से इतर देखा जाए तो उस बिल्डिंग के पर्टिकुलर एक फ्लैट की लाइट बस सर्किट ब्रेकर के जरिये ही ऑफ की जा सकती है, जो कि हर फ्लैट में एंट्रेंस के पास दीवार में एक चैम्बर के भीतर इंस्टाल्ड होता है। विनायक के केस में तो उस चैम्बर पर ताला लटक रहा था यानी कि फ्लैट की बत्ती गुल करने के लिए ये एकलौता तरीका भी अमल में नहीं लाया गया था।”

“ऐसी जगहों से कोई भी ट्रेस नहीं मिला है, जहाँ बिजली गुल करने के प्रयास में हत्यारे ने पहुँच बनाई रही हो सकती है?”

“पूरे कमरे में, यहाँ तक कि वेपन पर कोई फॉरेन ट्रेस नहीं मिला है।”

“उसने ग्लव्ज पहना रहा होगा।”

“ट्रेस से मेरा मतलब फूटवियर के सोलप्रिंट्स से भी था सर।”

“हो सकता है उसने रबर सोल के जूते पहने रहे हों।”

सुबोध बगले झाँकने लगा, तुरंत कोई जवाब न दे सका।

“हम इस मामले को सिर्फ इसलिए आत्महत्या के खाते में डालने की नहीं सोच सकते हैं आचार्य जी कि कमरे में किसी बाहरी का दखल फिलहाल साबित नहीं हो पा रहा है। कोई भी अपने आप को ख़त्म करने के लिए इतनी बेरहमी भरा रास्ता नहीं चुनेगा कि खुद से खुद के ही जिस्म पर गहरा जख्म बनाने लगेगा। आप इन फोटोग्राफ्स को देखिए।” फाह्याज़ ने दराज से तस्वीरों का लिफ़ाफ़ा बाहर निकालकर तस्वीरों को मेज पर फैला दिया- “सीने पर जख्म की शक्ल में जो अजीब सा सिगिल जैसा ठप्पा है, वह ठप्पा अगर मकतूल ने खुद से लगाया है तो क्या लाश के पास या फ्लैट की तलाशी में ऐसी कोई मुहर मिली है हमें?”

“हो सकता है कि टैटू की शक्ल में उसके सीने पर ये निशान पहले से ही रहा हो। सुसाइड के दौरान उसने उस टैटू पर बस चाकू की नोक फेरा हो।”

“लेकिन वो ऐसा क्यों करेगा?”

“मैं पहले भी कह चुका हूँ सर कि वह किसी कल्ट का मेम्बर रहा हो सकता है।”

“जो कि महज़ संभावना है, दूर की कौड़ी है; और कुछ नहीं।”

“केवल संभावना नहीं सर, प्रबल संभावना है, वरना बॉडी पर ऐसे निशान का क्या मतलब हो सकता है, वो भी जख्म की शक्ल में। ये कल्ट में शामिल लोग किसी गोपनीय समुदाय का अंग होते हैं। इनके अपने तौर-तरीके और विधान होते हैं। हो सकता है कि इसने कल्ट का कोई उसूल तोड़ा हो और कल्ट के विधान के मुताबिक़ रिचुअलिस्टिक तरीके से सुसाइड करके खुद को उस कृत्य की सजा दी हो।”

“वाह।” फाह्याज़ हँसा- “क्या थ्योरी गढ़ी आपने। हाल ही में कौन सी सीरीज देखी थी; असुर?”

“वेबसीरीज की कहनियाँ भी हमारे समाज से ही उठाई गयी होती हैं सर।” फाह्याज़ का व्यंग्य महसूस कर सुबोध तुनकते हुए बोला।

“चलिए आपकी बात मान लेते हैं। इसे सुसाइड लेकर चलते हैं तो भी ये सुसाइड, सुसाइड नहीं रिचुअलिस्टिक तरीके की हत्या कही जायेगी। मैं खुद नहीं कह रहा बल्कि आपके ही थ्योरी की रोशनाई मुझे इस नतीजे पर पहुँचा रही है। उस कथित कल्ट का पता लगाना तो बनता ही है न दरोगा जी।”

“जरूर सर लेकिन उससे पहले एक काबिल-ए-गौर बात और सुन लीजिए फिर कॉल डिटेल्स पर आते हैं, जिसमें हमारे लिए एक अहम् सुराग है।” सुबोध ने पारदर्शी थैलियों में भरी दवाओं को फाह्याज़ की ओर सरकाते हुए कहा फिर फाइल में से किसी डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन पेपर निकालकर मेज पर रख दिया और आगे बोला- “हमें मकतूल के फ्लैट से ये दवाएं मिलीं, जो सिजोफ्रेनिया के लिए पेस्क्राइब की जाती हैं।”

“मरने वाले को अजीब चीजें दिखाई देती थीं?” फाह्याज़ की पेशानी पर बल पड़े- “यानी कि वह मानसिक रोगी था।”

“जी। मेडिकेशन और थेरेपी दोनों के जरिये उसका इलाज चल रहा था। और इलाज करने वाले डॉक्साब ये जनाब थे।” सुबोध ने प्रिस्क्रिप्शन पेपर भी फाह्याज़ की ओर सरका दिया।

“डॉ. अंशुमान गुप्ता; नित्या मेंटल केयर।” फाह्याज़ ने प्रिस्क्रिप्शन पेपर पढ़ा।

“कुछ डॉक्टर्स सिजोफ्रेनिया को अनुवांशिकता से भी जोड़कर देखते हैं। विनायक के केस में ये अनुवांशिकता के और नजदीक है क्योंकि हमें हासिल सूचना के मुताबिक़ उसकी माँ भी एक मानसिक रोगी थी।”

“आपकी थ्योरी तो और मजबूत हो गयी आचार्य जी।” फाह्याज़ हँसा- “हम रिपोर्ट में लिख देते हैं कि विनायक को सिजोफ्रेनिक अटैक हुआ था। इस दौरान उसे कुछ ऐसा नजर आया, जिससे बचने के चक्कर में उसने खुद को ही मार डाला। बस एक बार इस पर डॉक्साब की मुहर लगने की जरूरत है, जो कि लग ही जायेगी।”

“अब कॉल डिटेल्स देख लेते हैं सर, क्योंकि खटकने वाली असली बात इसी

में है।” सुबोध ने फाइल में से एक और शीट निकाल ली, जिस पर दर्ज मोबाइल नम्बर्स में से कई पर रेड सर्किल बने हुए थे।

“ये पिछले पंद्रह दिन की कॉल डिटेल्स हैं।” जब फाह्याज़ ने उस शीट पर भरपूर नजर डाल ली तो सुबोध ने कहा- “रेड सर्किल वाला नम्बर संदिग्ध है। हालाँकि विनायक के सेलफोन में ये कामरान हुसैन नाम से सेव है लेकिन हत्या वाले दिन से पहले न तो विनायक को कभी इस नंबर पर कॉल आयी थी और न ही उसकी तरफ से की गयी थी। गौर करने वाली बात ये है कि हत्या वाले दिन दोपहर दो बजे से शाम छ: बजे के बीच इस नंबर से उसे लगातार बारह बार कॉल की गयी थी। विनायक ने अपने जीवन की आख़िरी कॉल भी इसी नम्बर से अटेंड की थी और कुल दो मिनट सत्रह सेकंड तक बात की थी। फिर रात दस बजे के बाद तीन बार इस नंबर से कॉल आयी थी, जो कि मिस कॉल बन कर रह गयी।”

“यानी कि जिस समय ये कॉल्स आयीं, उस समय तक विनायक क़त्ल हो चुका था?”

“या हो रहा था।” सुबोध ने जोड़ा।

“किस अफलातून का नंबर है ये?” इस बार फाह्याज़ के लहजे में उत्सुकता थी।

“कामरान हुसैन ही इसका वास्तविक नाम है, जो कि विनायक के मोबाइल में भी सेव है। डिटेल निकलवाने पर पता चला है कि साकेत नगर का रहने वाला है।”

“और कुछ इस कलाकार के बारे में?”

“जब हम विनायक के सेलफोन के जरिये उसकी सोशल मीडिया एक्टिविटीज को खंगाल रहे थे तो ये भी पाया कि इसने उसी दिन उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी, जो अभी भी पेंडिंग है। इसकी प्रोफाइल से मालूम हुआ कि ये फ्रीलांस आर्टिस्ट है। शौक़ीन लोग इससे अपनी शक्लें बनवाते हैं। इसने वाट्सएप पर भी विनायक को मेसेज भेजा था- ‘प्लीज टेक मी सीरियसली सर, पिक अप माय फोन। इट्स टू अर्जेंट।’ ”

“यानी कि विनायक से इसकी वाकफियत महज़ कुछ ही घंटे पुरानी थी। ये उसे बड़ी शिद्दत से ढूंढ रहा था और बात करने को मरा जा रहा था?”

“और इस काम में फेसबुक उसका मददगार साबित हुआ था। नम्बर उसे सहज इसलिए हासिल हो गया होगा क्योंकि विनायक की प्रोफाइल पर ये विजिबल टू एवरीवन है।”

“पर क्यों?” फाह्याज़ के नेत्र संकुचित हुए- “ये कलाकार उससे क्या बात करना चाहता था या फिर मौक़ा मिलने पर क्या कहा होगा इसने उससे? कुछ तो कहा ही होगा। कुछ ऐसा, जो जरूरी रहा होगा तभी विनायक ने इसका नंबर सेव कर लिया था।”

“साकेतनगर हमारे बगल में ही है सर।”

“बिल्कुल, साथ ही अंशुमान गुप्ता का क्लिनिक भी।”

“मैं जल्द ही हमारे काम की मालूमात हासिल करके आपसे मिलता हूँ।”

“आप डॉक्टर के यहाँ से होकर आइए फिर कलाकार से मिलने एक साथ चलेंगे।”

“श्योर सर।” सुबोध ने खड़े होते हुए कहा।

“एक मिनट।” वह प्रस्थान को उद्यत हुआ ही था कि फाह्याज़ ने उसे टोका- “किसी टैटू एक्सपर्ट की सेवाएं लीजिए और विनायक की बॉडी पर मिले निशान की शिनाख्त करने की कोशिश कीजिए। गूगल लेंस की मदद से इसे इंटरनेट पर भी तलाशिए। अगर ये किसी कल्ट या पुरातन कला से जुड़ा कोई प्रतीक हुआ तो आई थिंक कोई न कोई तथ्य जरूर हासिल होगा।”

“राइट सर।”