इन बातों के पन्द्रह मिनट बाद महाजन ने भीतर प्रवेश किया। पूरा हुलिया बदल रखा था महाजन ने। जींस की पैंट। काली कमीज। होंठों पर बड़ी-बड़ी मूंछे। गाल पर काला मस्सा स्पष्ट नजर आ रहा था। आंखों पर काला चश्मा और ठोड़ी पर छोटी बकरे जैसी दाढ़ी थी।
भीतर प्रवेश करते ही पल भर के लिए वो ठिठका फिर उसकी निगाह एक टेबल पर बैठे पारसनाथ पर गई तो वो उसकी तरफ सिर हिलाते हुए बढ़ गया।
पास पहुंचा।
दोनों की नजरें मिली।
“हैलो।”
दोनों ने हाथ मिलाया। इस दौरान पारसनाथ खड़ा हो गया था। फिर बैठा।
“माल लाए हो?” महाजन बोला।
“हां।” पारसनाथ ने सिर हिला दिया।
दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में झांका।
“दिखाओ।”
पारसनाथ ने जेब से काले रंग की शहनील की थैली निकाली और टेबल पर रख दी।
महाजन ने थैली उठाई और इधर-उधर निगाह मारते हुए छाती के करीब लाकर थैली को खोला और थोड़ा सा हथेली पर पलटा। हथेली पर हीरे जगमगा उठे।
“वालिया साहब।” स्क्रीन पर निगाह टिकाये भास्कर बोला –“उनके पास हीरे हैं।”
“हां। मैं भी देख रहा हूं।” जसबीर वालिया की आवाज आई –“वो अब सौदेबाजी कर रहे हैं।”
“यस सर।”
“नजर रखो। उनकी हर हरकत देखो।”
“हीरो की संख्या कुछ ज्यादा लग रही है। शायद वे कीमती भी हो।” भास्कर की नजरें स्क्रीन पर थी।
“भास्कर रेस्टोरेंट में कोई लफड़ा होगा तो बात हम पर आएगी। उन पर नजर रखो। अब उनमें कोई सौदेबाजी हो रही है। कुछ नहीं करना है। उन्हें देखते रहो। हमें सिर्फ ऐसे लोगों को इस वक्त देखना है, जो मेरी तलाश में रेस्टोरेंट में आने वाले हैं। एक मिनट भास्कर स्क्रीन देखो उनमें गर्मा-गर्मी हो रही है। शायद बहस।
दोनों के चेहरों पर गुस्सा है।”
“जी। मैं भी यही कहने वाला था।”
एकाएक महाजन ने रिवॉल्वर निकाल कर पारसनाथ की तरफ कर दी। हीरों की थैली भी महाजन के हाथ में थी। पारसनाथ गुस्से में होंठ भींच कर रह गया।
“ये हीरे अब मेरे हैं।” महाजन दांत भींच कर बोला –“दो साल पहले तुमने मेरे पांच लाख रुपये नहीं दिए थे। हिसाब बराबर। यहां से उठे तो गोली मार दूंगा।”
“मैंने तुम पर विश्वास करके, तुमसे सौदा करने का प्रोग्राम बनाया था।” पारसनाथ कठोर स्वर में बोला –“तुम...।”
“दो साल पहले मैंने भी तुम पर विश्वास करके, तुम्हें पांच लाख दिए थे, वो तुम खा गए।” महाजन दूसरे हाथ में हीरों की थैली जकड़े उठा –“मेरे पीछे आए तो गोली मार दूंगा।”
पारसनाथ सख्त निगाहों से उसे देखने लगा।
महाजन दो कदम पीछे हटा फिर रिवॉल्वर जेब में डाले पलटते हुए बाहर की तरफ भागा।
कुछ लोगों ने ये सब देखा।
उसी पल पारसनाथ उठा और फुर्ती के साथ उसने महाजन पर छलांग लगा दी। महाजन भागा तो महाजन की टांग पारसनाथ के हाथ में आ गई। दोनों नीचे गिरे। फौरन संभले। एक-दूसरे को टक्कर देने के लिए आमने सामने थे कि उसी पल भास्कर, एक आदमी के साथ वहां आ गया।
“ये क्या हो रहा है।” भास्कर शांत स्वर में बोला –“मैं इस रेस्टोरेंट का मैनेजर हूं। मेरे और मेरे आदमी के पास रिवॉल्वर है। मैंने तुम लोगों के पास हीरे भी देखे हैं उधर चलो, वो पीछे दरवाजा नजर आ रहा है। वहां बात करते हैं। वहां पर इस बात का फैसला होगा कि पुलिस को बुलाया जाए या नहीं।”
महाजन और पारसनाथ ने एक-दूसरे को खा जाने वाली निगाहों से देखा।
“तुम मेरे हीरे नहीं ले जा...।” पारसनाथ ने कठोर स्वर में कहना चाहा।
“दो साल पहले तूने मेरे पांच लाख दबा लिए थे। वो क्या तेरा मरा हुआ बाप देगा।” महाजन गुर्राया।
“ये सब बातें उधर मेरे केबिन में करना।” भास्कर शांत स्वर में बोला –“मैं रेस्टोरेंट में कोई गड़बड़ नहीं देखना चाहता।”
भास्कर और उसका आदमी, उन्हें धकेलने वाले ढंग में केबिन में ले गए।
सब कुछ शांत रहा।
“बैठो।” भास्कर टेबल पीछे कुर्सी पर बैठता हुआ बोला –“सब ठीक हो जाएगा। क्या बात है। बैठ जाओ।”
महाजन और पारसनाथ बैठ गए।
उनके पीछे भास्कर का आदमी जेब में हाथ डाले खड़ा रहा।
“अब बोलो-क्या बात है-जल्दी करो मुझे और भी काम करने हैं।”
“ये मेरे से हीरे खरीदने आया था। और पेमेंट दिए बिना हीरे लेकर जा रहा था। रिवॉल्वर भी इसके पास...।”
“देखा है सब कुछ। रिवॉल्वर भी, हीरे भी।” फिर उसने महाजन को देखा –“क्यों, तुमने ऐसा क्यों किया?”
“दो साल पहले ये मेरे पांच लाख दबा गया था।” महाजन गुर्राया।
“क्यों...तुमने ये किया था?”
“मैं कब मना कर रहा हूं।” पारसनाथ बोला –“वो पांच लाख काटकर बाकी के मुझे दे दे। हीरे कीमती हैं।”
“हीरे दिखाओ।” भास्कर ने हाथ बढ़ाया।
महाजन ने थैली उसकी तरफ नहीं बढ़ाई।
“ठीक है। सारे मत दो। एक हीरा दिखाओ।”
महाजन ने थैली में से एक हीरा निकालकर उसे दे दिया।
भास्कर ने मटर के दाने से भी छोटे से हीरे को देखा फिर मुस्कराया।
“मुझे हीरों को पहचान नहीं है। लेकिन यहां कोई है जो हीरों को परख लेता है। उसे दिखा कर आता हूं।”
“तुम चाहते क्या हो?”
“पहले हीरा परख लेने दो।” भास्कर उठते हुए बोला –“फिर तुम्हारी बात का जवाब दूंगा। मैं पांच मिनट में वापस आ रहा हूं। मेरा जो आदमी यहां खड़ा है। ऐसे बीस आदमी हैं इस वक्त रेस्टोरेंट में। सबके पास रिवॉल्वरें हैं। यहां से जाने या आपस में झगड़ने की चेष्टा की तो कुछ बुरा भी हो जाएगा।”
“तुम मुझे यहां क्यों रोकना चाहते हो?” महाजन ने उसे घूरा।
“फिक्र मत करो। मेरा इरादा बुरा नहीं है। मैं तुम दोनों की परेशानियां ही दूर करने की चेष्टा कर रहा हूं।” भास्कर ने मुस्करा कर कहा और हीरा मुट्ठी में जकड़े केबिन से बाहर निकलता चला गया।
महाजन और पारसनाथ ने एक-दूसरे को खा जाने वाली नजरों से घूरा।
“मैं तेरे को छोडूंगा नहीं।” पारसनाथ गुर्राया।
“मेरे पांच लाख वापस दे दे। तो मैं...।”
“चुप।” वहां खड़े आदमी ने रिवॉल्वर निकाल ली –“बात नहीं। खामोश रहो। ऐसे झगड़ा बढ़ जाता है।”
सेकेंडों में ही जसबीर वालिया ने उस हीरे को परखा और सामने खड़े भास्कर को देखा।
“हीरा कीमती है और इस तरह के हीरे उनके पास बहुत हैं।”
“जी हां।” भास्कर ने सिर हिलाया –“छोटी सी थैली भरी पड़ी है।”
दोनों की नजरें मिली।
“ये चोरी और हेराफेरी का माल है।” वालिया बोला –“सौदा सस्ते में हो सकता है। तुम उनसे बात...।”
“ड्रग्स का सौदा मैं कर सकता हूं।” भास्कर मुस्कराया –“हीरों के सौदे में अनजान हूं। अनाड़ी हूं। ये काम आप ही करें तो बेहतर होगा।”
दो पलों की सोच के बाद जसवीर वालिया बोला।
“चलो। मैं बात करता हूं उनसे। तुम बाहर ध्यान रखना। मोना चौधरी आज अवश्य रेस्टोरेंट में...।”
“मेरी हर तरफ नजर है। आप फिक्र न करें।”
☐☐☐
उन दोनों के भीतर प्रवेश करते ही महाजन कह उठा।
“अब आप किसे ले आए। आप वो हीरा...।”
“ये जसबीर वालिया साहब हैं। इस रेस्टोरेंट के मालिक। और भी बहुत से रसूख है इनके। रेस्टोरेंट तो बस यूं ही।” कह कर भास्कर मुस्कराया फिर वालिया से बोला –“इनका परिचय क्या करवाऊं। मैं तो खुद ही इनसे अनजान हूं वालिया साहब। आप इनसे बातचीत करें और मैं बाहर देख लूं।”
जसबीर वालिया ने मुस्कराकर दोनों को देखते हुए सहमति से सिर हिलाया।
“इसे यहीं छोड़ जाता हूं।” भास्कर ने अपने आदमी की तरफ इशारा किया –“कभी कोई काम पड़ ही जाता है।”
“जाओ भास्कर। बाहर की तरफ ध्यान दो।” जसबीर वालिया आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठता हुआ बोला –“मोना चौधरी कभी भी रंग-रूप बदल कर आ सकती है। महाजन या उसका साथी पारसनाथ भी आ सकता है।”
भास्कर बाहर निकल गया।
जसबीर वालिया ने दोनों पर निगाह मारी।
भास्कर का छोड़ा व्यक्ति पीछे दरवाजे के पास खड़ा था। रिवॉल्वर उसका जेब में था।
“हीरे जैसी आइटम को लेकर यूं सरेआम झगड़ा नहीं करते। बंद कमरे में बात कर लेते हैं। मैंने हीरा देखा है जो भास्कर मेरे पास लाया था।” कहकर वालिया ने हीरा टेबल पर रखा –“क्वालिटी ठीक है। ऐसे कितने हैं?”
“दो सौ।” पारसनाथ बोला।
“कहां से लिए ये हीरे?”
“कहीं से भी।” पारसनाथ बोला –“हीरों को इधर से उधर करना मेरा धंधा है।”
“खूब। तुम दोनों के नाम क्या हैं।”
“मैं तो अपना नाम बताऊंगा नहीं।” पारसनाथ बोला –“अपने बारे में मैं यूं ही किसी को बताता नहीं।”
“ठीक है। जब मुझ पर विश्वास आ जाए। तब बताना। झगड़ा क्या है, तुम दोनों में।” जसबीर वालिया ने मुस्करा कर दोनों को देखा –“मैं चाहता हूं तुम दोनों के बीच झगड़ा खत्म हो जाए और इन हीरों को मैं खरीद लूं। अगर मुझे नहीं बेचना चाहते तो कोई बात नहीं। हममें सौदेबाजी को शुरुआत अगली बार हो जाएगी। इस बार मुलाकात ही सही।”
वो चुप रहे।
“बताओ। क्या झगड़ा है तुम दोनों में?” जसबीर वालिया भोले स्वर में बोला।
“इससे पूछो।” पारसनाथ ने महाजन की तरफ इशारा किया।
जसबीर वालिया ने अपना ध्यान महाजन पर लगाया।
“क्या बात हो गई?”
और जसबीर वालिया को सामने देखकर महाजन का खून खौल रहा था। वो तो अब तक जाने कैसे वालिया के सामने बैठे उसे सह रहा था।
महाजन ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। घूरता रहा वो जसबीर वालिया को। दोनों की नजरें मिली। चंद ही पलों में, वालिया जैसे शातिर की नजरों में, महाजन की तस्वीर आंखों ही आंखों में दिमाग में उतर गई।
जसबीर वालिया की आंखें सिकुड़ी। फिर होंठ सिकुड़ गए। उसके बाद माथे पर बल दिखे। फिर सिकुड़ी आंखें हैरानी से फैलने लगी। माथे पर उभरे बल धीरे-धीरे गायब होने लगे।
वो पहचान गया था महाजन को।
“त...तुम?” उसके होंठों से अजीब सा स्वर निकला –“महाजन...।”
महाजन के चेहरे पर जहरीली मुस्कान फैल गई।
“मैं जानता था कि तुम जैसा हरामी देर-सवेर में मुझे पहचान ही जाएगा।” कहने के साथ ही महाजन ने आंखों पर चढ़ा रखा काला चश्मा उतार कर टेबल पर रखा। फिर मूंछे-दाढ़ी और मस्सा उतार कर टेबल पर रख दिया। मौत से भरी निगाह जसबीर वालिया के चेहरे पर ही टिकी थी –“क्यों –मुझे सामने देखकर कैसा लग रहा है। तुमने तो सोचा ही नहीं होगा कि मैं कभी तुम्हारे सामने आ जाऊंगा, वो भी इतनी जल्दी।”
जसबीर वालिया सच में हक्का-बक्का बैठा था।
महाजन ने रिवॉल्वर निकाली और नाल का रुख उसकी तरफ कर दिया।
जसवीर वालिया का चेहरा फक्क पड़ गया था। महाजन की आंखों में उसे अपनी मौत नजर आ रही थी। और अपनी मौत का उसे जरा भी यकीन नहीं हो रहा था।
“तू बहुत बुरा इंसान है, जसबीर वालिया। दरिन्दे से भी बुरा। विमान में विस्फोट करते वक्त तूने ये भी न सोचा कि सौ से ज्यादा मासूम कैसे तड़प-तड़प कर मरेंगे। उनके आगे-पीछे कितने लोग होंगे, जो उनकी मौत के साथ जीते जी मर जाएंगे। कुछ नहीं सोचा तूने। तूने तो अपने काम में सफल होना था। यही सोचा तूने।”
जसवीर वालिया बेजान सा कुर्सी पर बैठा महाजन को देखे जा रहा था।
“अब तू मरने जा रहा है। विश्वास तो नहीं आ रहा होगा। लेकिन आ जाएगा। मरने के बाद तो विश्वास आ ही जाएगा। बहुत आसान मौत मर रहा है तू, जबकि तेरे कर्म बुरे हैं। तेरे को बेबी ऐसी मौत मारना चाहती थी कि तू जान सके कि असली आतंक क्या होता है। कैसा होता है। लेकिन बेबी की ये हसरत पूरी नहीं हो सकेगी। फिर भी तेरे मरने की बात सुनकर उसे...।”
“गोली मत चलाना।” पीछे खड़े आदमी का स्वर दरिन्दगी से भरा था –“वरना तुम्हारा साथी मरेगा।”
महाजन ने तुरंत गर्दन फेरी।
बगल की कुर्सी पर पारसनाथ बैठा था। उसके ठीक पीछे वो व्यक्ति खड़ा था जिसे भास्कर छोड़ गया था। उसके हाथ में दबी रिवॉल्वर की नाल पारसनाथ के सिर से लगी थी।
पारसनाथ या महाजन इस स्थिति में नहीं थे कि कुछ कर सकें।
मौत से भरा सन्नाटा छा गया वहां।
जसबीर वालिया की हालत में अभी भी कोई फर्क नहीं आया था। जैसे कि वो जानता हो कि महाजन पर इस धमकी का कोई असर नहीं होगा। वो उसे गोली मार देगा।
“रिवॉल्वर फेंको।” वो पहले वाले स्वर में ही गुर्राया।
महाजन के दांत भिंच गए। हाथ में दबी रिवॉल्वर का रुख जसबीर वालिया की तरफ ही रहा।
“मैं ज्यादा इन्तजार नहीं करूंगा।” वो व्यक्ति दांत किटकिटा उठा –“यहां हर तरफ हमारे आदमी मौजूद हैं । जो भी हो, कम से कम तुम लोग जिन्दा नहीं बचोगे। अगर मैंने गोली चला दी। सेकेंडों में सब यहां होंगे। तुम सिर्फ एक को गोली मार सकोगे। वालिया साहब को या मुझे। दूसरा तब तक तुम पर झपट पड़ेगा। समझदारी इसी में है कि रिवॉल्वर टेबल पर रखकर कुर्सी पर बैठे ही बैठे हाथों को ऊपर कर लो।”
महाजन समझ गया कि उसकी बात मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं। बात नहीं मानी तो पारसनाथ की जान जाएगी। वो शायद बाद में खुद को बचा ले। लेकिन पारसनाथ तो गया। पारसनाथ की मौत की कीमत पर वो जसबीर वालिया की मौत नहीं चाहता था।
महाजन ने दांत भींचे रिवॉल्वर को टेबल की साइड में नीचे गिराया और धीरे-धीरे दोनों हाथ ऊपर कर लिए। साथ ही उस की गर्दन जसबीर वालिया की तरफ घूमी। जिसके चेहरे पर खौफ नाच रहा था। आंखों की पुतलियां तेजी से फिर रही थी। महाजन की रिवॉल्वर गिरने के साथ ही उसके शरीर में कम्पन के साथ ही तेजी से हरकत हुई।
वो व्यक्ति सावधानी से पारसनाथ के सिर से रिवॉल्वर सटाए खड़ा था।
एकाएक जसबीर वालिया उठा और उसके होंठों से भरा भरा खरखराता स्वर निकला।
“सावधान रहना। इन्हें हिलने का मौका मत देना।”
“फिक्र मत कीजिए वालिया साहब।” वो खतरनाक स्वर में बोला –“आप निकल जाइये यहां से।”
जसबीर वालिया रुका नहीं। तेजी से, लड़खड़ाते कदमों से बाहर निकलता चला गया।
कई पलों तक कमरे में मौत भरा सन्नाटा छाया रहा।
“सालों।” तभी वो व्यक्ति गुर्राया –“रिवॉल्वर फेंक कर तुमने बहुत बड़ी गलती की है। मरना तो तुम दोनों ने वैसे भी था ही। तुम्हारी जगह मैं होता तो वालिया साहब को शूट कर देता।”
महाजन उसे देख कर मुस्कराया।
“पीछे देख, तेरा बाप आ गया है।”
उसने फौरन पीछे गर्दन घुमाई।
उसी क्षण महाजन, कुर्सी पर बैठे-बैठे ही उस पर झपट पड़ा। उसकी रिवॉल्वर वाली कलाई थामी और कुर्सी सहित नीचे गिरता चला गया। रिवॉल्वर वाला भी तीव्र झटका लगने की वजह से नीचे जा गिरा। रिवॉल्वर उसके हाथ से निकल गई। दोनों गुत्थम गुत्था हो गए।
पारसनाथ फुर्ती से उठा और दांत भींचकर जोरदार ठोकर उस व्यक्ति के सिर पर मारी। वो हल्की सी चीख के साथ बेहोश हो गया।
“उस हरामजादे को पकड़ो पारसनाथ।”
दरवाजा खोलकर पारसनाथ उसी पल बाहर निकल गया।
महाजन घायल चीते की तरह उठा और अपनी रिवॉल्वर उठाता हुआ बाहर भागा। बाहर निकलते ही ठिठका। पारसनाथ ने भास्कर को रिवॉल्वर के निशाने पर ले रखा था।
“कहां है वालिया।” पारसनाथ की गुर्राहट महाजन ने सुनी।
“वो...वो भागते हुए बाहर की तरफ गए हैं।” भास्कर डरे स्वर में कहा उठा।
दोनों रिवॉल्वरें थामे बाहर की तरफ दौड़े।
पता चला कि जसबीर वालिया बाहर खड़ी अपनी कार पर अभी-अभी गया है।
हाथ आकर निकल गया था वो।
☐☐☐
मोना चौधरी दिन के ग्यारह बजे इन्दौर पहुंच गई थी। तब सूर्य सिर पर चढ़ रहा था। गर्मी के मारे बुरा हाल हो रहा था। आधी रात के बाद उसने सफर शुरू किया था। बीच में कार कहीं भी नहीं रोकी थी। पहले से ही तय हो गया था कि पारसनाथ और महाजन किस होटल में रुकेंगे।
मोना चौधरी भी सीधा उसी होटल में पहुंची। अपने लिए कमरा लिया। महाजन-पारसनाथ के बारे में पूछा तो पता चला कि वो होटल में सुबह आकर ठहरे तो हैं, परंतु इस वक्त होटल में मौजूद नहीं हैं।
मोना चौधरी अपने कमरे में पहुंची। नहा-धोकर नाश्ता लिया और होटल से निकल आई। अब उसके सामने एक ही लक्ष्य था जसबीर वालिया। ग्लौरी रेस्टोरेंट का मालिक। ग्लौरी रेस्टोरेंट के बारे में पता करना कोई कठिन काम नहीं था। लेकिन मोना चौधरी अपने शिकार पर हाथ डालने से पहले, शिकार के बारे में पूरी तरह जान लेना चाहती थी। ऐसे में उसने पहले जसबीर वालिया के बारे में छानबीन करने की सोची।
शाम के सात बजे तक उसकी भाग दौड़ जारी रही।
जब अंधेरा होने लगा तो उसकी भागदौड़ थमी।
जसबीर वालिया के बारे में कई बातें जान चुकी थी वो।
जसबीर वालिया खतरनाक इंसान है। रेस्टोरेंट की आड़ में गैरकानूनी काम करता है। पुलिस के साथ बनाकर रखता है। नेताओं तक उसकी पहुंच है। ड्रग्स और डायमंड के धंधे में दिलचस्पी रखता है। दौलत के लिए हर काम कर देता है। मोना चौधरी के सुनने में आया कि उसकी पत्नी और बच्चा भी है। लेकिन उसके परिवार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई। जसबीर वालिया के नजदीकी व्यक्तियों में रेस्टोरेंट का मैनेजर भास्कर, डांसर रोजी के अलावा राजू और कुछ नाम भी सामने आए। मोना चौधरी को भास्कर, रोजी के घर का पता भी मिल गया। अब मोना चौधरी के सामने ये बात थी कि जसबीर वालिया तक कैसे पहुंचे? वो सावधान होगा। बख्तावर सिंह उसे सावधान कर चुका होगा कि वो आ रही है। ऐसे में रेस्टोरेंट में उसपर हाथ नहीं डाला जा सकेगा। बचने के अलावा उसने अटैक करने का इन्तजाम भी कर रखा होगा। अगर रेस्टोरेंट में उस पर हाथ डाला जा सका तो महाजन और पारसनाथ के हाथ से वो नहीं बचा सकेगा। उन दोनों ने शाम को अपनी योजना के साथ जसबीर वालिया के ग्लौरी
रेस्टोरेंट में जाना था।
मोना चौधरी कार में बैठी सोचती रही।
कलाई में बंधी घड़ी में वक्त देखा। शाम को आठ बज रहे थे। सोचने के बाद मोना चौधरी इस नतीजे पर पहुंची कि सबसे पहले उसे जसबीर वालिया के घर के बारे में जानना चाहिए कि वो कहां रहता है। उसकी पत्नी-बच्चा कहां है। उस खतरनाक इंसान की कमजोर कड़ी क्या है, जो उसे बेबस करके रख दे।
सोच-विचार के बाद मोना चौधरी ने डांसर रोजी के पास जाने की सोची। रोजी के बारे में मालूम हो चुका था कि वो रेस्टोरेंट में डांस करती है और जसबीर वालिया की पुरानी पहचान वाली है।
☐☐☐
वो बे-इन्तहा खूबसूरत थी।
अट्ठाईस-तीस की होगी। कम की लगती है। अगर लोग सिर्फ उसका चेहरा देखने की खातिर डांस के लिए आ जाते थे तो हैरानी की कोई बात नहीं थी। ऐसे में नाच के दौरान वो कभी-कभार जिस्म का आखिरी कपड़ा भी उतार दे, तो सामने वालों की चांदी तो होनी ही थी।
मोना चौधरी को सामने देखकर वो मुस्कराई।
“हाय।” दोनों हाथों से दरवाजा थामे वो बोली –“तुम गलत दरवाजे पर आ गई हो।”
“कैसे कहाँ?”
“इस दरवाजे पर सिर्फ मर्द ही आते हैं और मायूस होकर लौट जाते हैं।” वो हौले से हंसी।
“तुम रोजी हो?”
“क्यों नहीं।” रोजी ने फौरन कहा –“मेरे से तुम्हें काम है?”
“हां।”
“हैरानी है कि आज किसी लड़की को मेरे से काम पड़ गया।” वो पीछे हटती हुई बोली –“आओ, यूं तो मैं किसी को घर के भीतर नहीं आने देती। लेकिन तुम लड़की हो, इसलिए इंकार नहीं किया।”
“घर के भीतर क्यों नहीं आने देती?” मोना चौधरी ने भीतर प्रवेश करते हुए कहा।
“मर्द मेरे पास, मेरा करीबीपन हासिल करने के लिए आते हैं। मुझे बिकाऊ समझते हैं और मैं बिकाऊ नहीं।” कहते हुए उसने दरवाजा बंद किया।
मोना चौधरी ने पलटकर उसे देखा।
“रेस्टोरेंट में नाचती हो। चर्चे हैं कि मूड में आकर कपड़े भी उतार देती हो।”
“क्यों नहीं।” वो हंसी।
“ये बिकाऊपन नहीं तो क्या?”
“नहीं। ये मेरा काम-मेरा बिजनेस है। इसी के पैसे मिलते हैं।” रोजी कड़वे स्वर में कहते हुए आगे बढ़ी और सोफे पर बैठती हुई बोली –“जिस दिन मैं बिकाऊ बन गई। उस दिन मेरा डांस देखने कोई नहीं आएगा। आज तो लोग इस आशा के साथ मेरा डांस देखने आते हैं कि शायद कभी सौदा पट जाए और मैं बंद कमरे में कपड़े उतार दूं उनके सामने।”
मोना चौधरी आगे बढ़ी और उसके सामने बैठ गई।
“मर्दो को तुम नहीं जानती। औरत जब तक कपड़े पहने रखे, ये कुत्तों की तरह सूंघते हुए उसके आगे-पीछे घूमते रहते हैं कि कुछ हुक्म तो मिले। और जब औरत हासिल हो जाए, उसे बिना कपड़ों के अपनी बांहों में देख ले तो उस के बाद वो मर्द, उस औरत को पहचानना भी पसंद नहीं करता। कपड़े पहने हो तो मर्द से लाखों रुपया झाड़ लो। वो दे देगा। औरत उसके सामने नंगी हो चुकी हो तो मर्द हर समय उसे काम-धंधे के नुकसान सुनाता रहेगा कि कहीं ये पैसा न मांग ले। यानी की बाहरी मर्द के सामने कपड़े मत उतार, लेकिन उसे ये भी लगता रहे कि तुम कभी भी कपड़े उतार सकती हो। ऐसे में एक दिन उसके कपड़े उतर जाएंगे। वो बिक जाएगा और एक दिन वो नजर आना भी बंद हो जाएगा।”
मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
“मर्दो की नस्ल को बहुत अच्छी तरह जानती हो।”
“पन्द्रह साल की उम्र से मर्दो से वास्ता पड़ता आ रहा है। मर्दों ने ही सिखाया है ये सब।” कहकर उसने पास पड़ी सिगरेट उठाकर सुलगाई –“तुम सिगरेट लेना चाहो तो पैकेट वहां पड़ा है।”
“थैंक्स।”
“क्या नाम है तुम्हारा?” रोजी ने उसे देखा।
“मोना चौधरी।”
“मेरे पास क्यों आई?”
“परेशानी में औरत ऐसी औरत का सहारा ढूंढती है जो उसकी मदद कर सके।” मोना चौधरी बोली।
“तो परेशान हो तुम। में इस बारे में तुम्हारी कोई खास मदद नहीं कर सकती। हजार-पांच सौ चाहिए तो...।”
“एक आदमी ये कहकर, विश्वास दिलाकर मेरे शरीर से खेलता रहा कि वो मेरे से शादी करेगा।” मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा –“मुझे बच्चा ठहर गया। अब वो मुझसे न तो शादी कर रहा है, न ही खर्चे-पानी की बात करता है। मुझसे मिलना भी छोड़ दिया।”
“पुरानी बात है।” रोजी ने लापरवाही से कहा –“उसके बच्चे को गिरा कर नई जिन्दगी शुरू करो।”
“नहीं। ऐसा नहीं हो सकता। मैं उससे प्यार करती हूं।”
“बेवकूफ हो।” रोजी हंसी –“प्यार-व्यार कुछ नहीं होता...तुम...।” एकाएक वो ठिठकी –“लेकिन तुम मेरे पास क्यों आई –मैं किसी महिला सेवा संस्था में तो काम नहीं करती।”
“मैं तुम्हारे पास इसलिए आई हूं कि तुम उस आदमी को समझाओ कि मुझे धोखा न दे।”
“मैं समझाऊं?”
“हां-क्योंकि तुम उसे जानती हो। जसबीर वालिया है वो?”
रोजी देखती रही मोना चौधरी को।
कई पल खामोशी से बीत गए।
“क्या देख रही हो?” मोना चौधरी ही बोली।
“कहां रहती हो तुम?”
“दिल्ली?”
“तो क्या जसबीर दस-दस दिन गायब होकर तुम्हारे पास रहता था। अक्सर वो इन्दौर से बाहर चला जाता था।”
“हां।” मोना चौधरी मुंह लटका कर फौरन बोली –“मेरे पास ही तो रहता था। मेरे साथ जीने-मरने की कसमें खाता था और अब मुझे पहचानता भी नहीं।”
रोजी ने कश लिया। चेहरे पर गंभीरता आ गई थी।
“तुम उसे जानती हो। मुझे किसी ने बताया कि तुम चाहो तो जसबीर को समझा सकती हो। वो मेरे से शादी कर ले। मैं शरीफ घर की अच्छी लड़की हूं। उससे प्यार करती हूं। उसके बच्चे को जन्म दूंगी। उसे खुश रखूंगी।”
“गलत दरवाजे पर आ गई हो तुम।” रोजी ने सपाट स्वर में कहा –“जो बात मैं अपने लिए उसे न समझा पाई, वो ही बात मैं तुम्हारे लिए कैसे समझा सकती हूं, मैं कुछ नहीं कर सकती।”
“अपने लिए...।” मोना चौधरी ने उसे देखा –“क्या मतलब?”
“मैं भी तुम्हारी तरह शरीफ घर की थी कभी। मैं भी जसबीर से प्यार करती थी। मेरे से शादी का वादा करके जसबीर तीन साल मेरे जिस्म से खेलता रहा। बच्चा ठहरता तो साफ हो जाता। जब मेरे से दिल भर गया तो मेरी जगह पर दूसरी आ गई। मैं समझ न पाई कि क्या करूं। जब जसबीर के सामने जाकर बार-बार इस बात को लेकर रोई कि अब मैं क्या करूंगी तो उसने मुझे डांस सीखने को कहा कि वो डांसर का काम अपने रेस्टोरेंट में देगा। यानी कि जिसे कभी उसने अपने दिल में बसा रखा था। जिसके साथ जीने-मरने की कसमें खाई थी। उसे वो दूसरों के सामने नचा रहा था। तब तक मुझे घर वालों ने भी बाहर निकाल दिया था। मजबूरी थी कि हालातों से समझौता कर लूं और मैंने कर लिया। इसी तरह जिन्दगी बिता रही हूं।”
मोना चौधरी उसे देखती रही फिर धीमे स्वर में बोली।
“तो अब तुम जब जसबीर को देखती हो तो तुम्हें गुस्सा नहीं आता। खून नहीं खौलता उसे देखकर?”
“नहीं।” कश लेते हुए रोजी हंसी –“ऐसा कुछ नहीं होता मुझे। मैं ऐसी बातों से बहुत आगे आ चुकी हूं। किस बात की दुश्मनी जसबीर से। मैं तो उजड़ ही गई। अब कुछ करूंगी तो मुझे डांस के काम से निकाल देगा। शहर की बाकी जगह भी कह देगा कि मुझे काम न दिया जाए। काम-धंधे से बेकार हो जाऊंगी। तब कहीं धंधा न करने लग जाऊं। इसलिए चुपचाप, जिन्दगी को बिता रही हूं। जैसे बीते जा रही है। सच पूछो तो मैं खोखली हूं भीतर से।”
“तुम तो खूबसूरत हो। शादी करके घर बसा सकती हो।”
“मैं नहीं जानती, मैं क्या करूंगी।” रोजी ने अनमने मन से कहा –“तुम जाओ।”
“मुझे कुछ तो बताओ। मैं क्या करूं। जसबीर वालिया को किसी से तो शादी करनी ही है। मैं क्या बुरी हूं जो...।”
“जसबीर ने तीन साल पहले शादी कर ली है।” रोजी ने गंभीर स्वर में कहा।
“क्या कह रही हो।” मोना चौधरी ने हैरानी जाहिर की।
“सही कह रही हूं। मोनिका नाम की लड़की से शादी कर चुका है वो। उसका बंटी नाम का बेटा भी है। ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि वो शादी कर चुका है। अपनी पत्नी और बच्चे को, लोगों से दूर रखता है। आमतौर पर कोई नहीं जानता कि उसका परिवार कहां रहता है।” रोजी हौले से सिर हिलाकर कह उठी।
“ऐसा क्यों?”
“जसबीर के बुरे कर्म, जो उसे डराते हैं। उसे डर है कि कोई उसकी पत्नी-बच्चे को नुकसान न पहुंचा दे। क्योंकि उसने किसी के साथ शायद ही भलाई की हो। तुम-मेरी जैसी कितनी लड़कियों को खराब किया। गैरकानूनी काम भी...।”
“तुम्हारे कहने का ढंग ऐसा है कि जैसे तुम जानती हो कि जसबीर अपनी पत्नी और बच्चे को कहां रखता है?”
“हां। इत्तेफाक से जान गई थी। लेकिन जसवीर नहीं जानता कि मुझे मालूम है।” रोजी ने शांत स्वर में कहा –“एक दिन वो एक औरत और बच्चे के साथ यहां से बहुत दूर मार्केट में दिखा। जेवरात खरीद रहा था। बच्चे को भी गोद में उठा लेता था। ये सब देखकर मुझे अजीब सा लगा कि जसबीर को उस बच्चे से इतना लगाव क्यों? मैंने पीछा किया। वो लोग रात होने पर एक बंगले में पहुंचे। जब मैंने छानबीन की तो पता चला कि वो औरत जसबीर की पत्नी है। मोनिका नाम है उसका और उस बच्चे का बाप है वो।”
मोना चौधरी की निगाह, उस पर जा टिकी।
“कहां है वो बंगला?”
रोजी कुछ कहने लगी कि होंठ बंद कर लिए। फिर बोली।
“तुम ये क्यों पूछ रही हो। उसके घर जाकर हल्ला करोगी। बाद में ये बात भी खुलेगी कि मेरे से तुम्हें बंगले का पता चला। सॉरी, मैं तुम्हें जसबीर के परिवार के बारे में नहीं बता सकती कि वो कहां रहता है।”
“नहीं बताओगी?” मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़ कर उसे देखा।
“नहीं।”
मोना चौधरी ने बेहद शांत भाव में रिवॉल्वर निकाली और रोजी की तरफ कर दी।
रोजी हक्की-बक्की रह गई।
“य...ये...क्या?”
“मैं मोना चौधरी हूं। ये तो तुमने सुन ही लिया है। लेकिन तुम्हें ये बता दूं कि मेरा जसबीर वालिया से ऐसा कोई रिश्ता नहीं है, जैसा कि तुम्हें बताया है।” मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर बोली।
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि वो खतरनाक मुजरिम है। आतंकवादी है। पाकिस्तान के लिए काम करता है। शायद अभी तुमने अखबार में पढ़ा हो कि आसमान में जाते विमान में विस्फोट...।”
“हां। टी.वी. न्यूज चैनल में सुना था।”
“वो विमान जसबीर वालिया ने बम विस्फोट से उड़ा दिया था।”
“ये क्या कह रही...।”
“मैं भी विमान में ही थी तब। मौके पर पैराशूट से कूद गई। मिनट पहले जसबीर विमान से पैराशूट बांध कर कूद गया था। मैं तुम्हें खुलासा तौर पर बताने की जरूरत नहीं समझती। इसी से तुम जसबीर वालिया की असलियत समझ सकती हो। किसी के कहने पर वो मुझे खत्म करना चाहता है। लेकिन मैं उसे मारने इन्दौर आ गई।”
रोजी अपलक उसे देखती रही।
“तुममें इतनी हिम्मत है कि जसबीर को खत्म कर सको। रिवॉल्वर हाथ में लेकर तुम शेरनी बन गई लगती...।”
“लगती नहीं। मैं शेरनी हूं।” मोना चौधरी के चेहरे पर जहरीली मुस्कान आ ठहरी –“इश्तिहारी मुजरिम हूं मैं। कानून मेरे पीछे रहता है और वालिया जैसे लोग मुझसे डरते हैं।”
“मुझे विश्वास नहीं।” रोजी उसे घूर रही थी।
“जल्दी विश्वास आ जाएगा। तुम बताओ, जसबीर वालिया की पत्नी और बच्चा कहां है?”
“अगर तुम जसबीर को मार सकी तो मुझे खुशी होगी।” रोजी ने धीमे स्वर में कहा –“लेकिन अपनी दुश्मनी तुम उसकी पत्नी और बच्चे पर उतारो ये ठीक नहीं। जो भी करना है जसबीर के साथ करो।”
मोना चौधरी उठी और आगे बढ़कर रिवॉल्वर की नाल रोजी की गर्दन पर रख दी।
“मैडम रोजी। वालिया जैसे हरामी लोग आसानी से हाथ नहीं आते। वो जान चुका है कि मैं उसे मारने के लिए इन्दौर आ रही हूं। ऐसे में वो और भी सतर्क हो गया होगा।” मोना चौधरी का स्वर दरिन्दगी से भर उठा –“उसकी जान लेने से पहले मैं उसे आतंक का अहसास करना चाहती हूं कि आतंक क्या होता है। आतंक का चेहरा किसे कहते हैं। वो दूसरों की जानें लेता रहा। मैं उसके सामने उसकी बीवी बच्चे को मारूंगी। फिर उसकी जान लूंगी और आतंक से परिचय करवाऊंगी उसका कि ये होता है आतंक।”
रोजी मोना चौधरी के वहशत भरे चेहरे को देखती रही।
“उठ।” मोना चौधरी गुर्राई।
“मुझे डराओ मत।” रोजी सपाट स्वर में कहते हुए उठ खड़ी हुई –“मैंने अपनी छोटी सी जिन्दगी में बहुत कुछ देखा है। ऐसा कि अब मुझे डर नहीं लगता। किसी बात की हैरानी भी नहीं होती।”
“बता-चल मेरे साथ।” मोना चौधरी ने रिवॉल्वर की नाल का दबाव उसके गले पर बढ़ाया –“बता, जसबीर वालिया की बीवी मोनिका और उसका बच्चा कहां पर रहता है।”
“रिवॉल्वर जेब में रख लो मोना चौधरी।” रोजी ने गंभीर स्वर में कहा –“इस बात को जानने के लिए तुम्हें रिवॉल्वर निकालने की जरूरत नहीं। तुम जसबीर को खत्म करना चाहती हो। वो कमीना इंसान है। इस काम में मैं तुम्हारी हर संभव सहायता करूंगी। चलो मैं बताती हूं तुम्हें कि जसबीर ने अपनी पत्नी और बच्चे को कहां रखा है।”
☐☐☐
रात के बारह के ऊपर का वक्त हो रहा था।
जसबीर वालिया दांत भींचे तेजी से कार चला रहा था। उसका चेहरा कठोर हुआ पड़ा था। सामने से आने वाले वाहनों की तीव्र रोशनी कभी-कभार उसके चेहरे पर पड़ जाती थी। रफ्तार बहुत तेज थी उसकी कार की। इस वक्त उसकी कार इन्दौर की सीमा पर बसी नई कॉलोनी में आ पहुंची थी। यहां से रेस्टोरेंट का रास्ता सवा-डेढ़ घंटे का था।
इस इलाके में नए-नए बंगले बने हुए थे। शानदार इलाका था। इन्हीं में से एक बंगले के बंद गेट के सामने जसबीर वालिया ने कार रोकी। हेडलाइट की रोशनी में वो काला, खूबसूरत गेट, तेज रोशनी में चमक उठा। दो पल वो होंठ भींचे गेट को देखता रहा। फिर दरवाजा खोलकर नीचे उतरा। गेट खोला और कार को भीतर ले जाकर, गेट बंद किया और फिर कार को पोर्च में ले जा रोका।
इंजन बंद किया। हेडलाइट की रोशनी बंद की। बाहर निकला।
बंगले में अंधेरा सा छाया हुआ था। भीतर कहीं नाइट बल्ब सा जलता महसूस हो रहा था। वह हाथ बढ़ाकर कॉलबेल बजाने लगा कि उसे लगा कि दरवाजा खुला है। उसने दरवाजे पर हाथ रखा तो दरवाजे के दोनों पल्ले खुल गए। जसबीर वालिया वहीं खड़ा, आंखें सिकोड़े खुले दरवाजे को देखता रहा।
उसने भीतर की आहट लेने की चेष्टा की। कोई आवाज महसूस नहीं हुई।
“मोनिका।” जसबीर वालिया ने वहीं खड़े-खड़े पुकारा। स्वर मध्यम था।
कोई आवाज नहीं आई।
“मोनिका।” इस बार जसबीर वालिया की आवाज कुछ ऊंची थी।
लेकिन वही सन्नाटा व्याप्त रहा।
जसबीर वालिया के होंठ भिंच गए। अनजानी आशंका से दिल धड़क उठा। सतर्कता से अंधेरे में नजरें दौड़ाते हुए उसने रिवॉल्वर निकाल कर हाथ में ले ली। पलट कर पीछे देखा। अंधेरे में उसकी कार खड़ी थी। उसके पार अंधेरे में डूबा लॉन और दीवार के पार बाहर सड़क पर मध्यम सी रोशन स्ट्रीट लाइट नजर आ रही थी।
जसबीर वालिया ने गर्दन घुमाई और खुले दरवाजे से भीतर देखा। वो ड्राइंग हॉल था। जीरो वॉट का बल्ब रोशन था। परंतु प्रकाश अपर्याप्त था। उसने कॉलबेल पर उंगली रखी।
बेल की तीव्र आवाज बंगले में कहीं गूंजी। चिड़िया के तेज चहचहाने का स्वर। उसके बाद पुन: वो ही सन्नाटा छा गया। बेल के जवाब में भीतर से कोई आवाज नहीं आई।
जसबीर वालिया और भी सतर्क हो गया। रिवॉल्वर पर उसकी पकड़ मजबूत हो गई। उसकी गर्दन पुनः पीछे घूमी और वो हर तरफ देखने के बाद भीतर की तरफ आहिस्ता से बढ़ा। इतना तो उसे स्पष्ट अहसास हो गया था कि पक्के तौर पर गड़बड़ है कोई। पुकारने या बेल बजाने पर भी मोनिका की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। जबकि आमतौर पर कार के इंजन की आवाज सुनकर मोनिका दरवाजे तक दौड़ी आ जाती थी।
वो भीतर प्रवेश कर गया।
रिवॉल्वर हाथ में। आंखें हर तरफ। भिंचे होंठ। उत्तेजना से दिल कुछ तीव्र सा होकर धड़कने लगा था। मन में ये आशंका बार-बार उठ रही थी कि कहीं महाजन तो यहां तक नहीं आ गया। लेकिन दिल इस बात की गवाही नहीं दे रहा था महाजन इतनी जल्दी यहां नहीं पहुंच सकता और गिने-चुने चंद खास लोग ही मोनिका और उसके बच्चे के बारे में जानते थे। इस घर के बारे में जानते थे। ऐसे में उन्हें यहां के बारे में तो किसी हाल में नहीं पता लग सकता। इतनी जल्दी तो बिल्कुल नहीं।
तो मोनिका कहां है?
उसके पुकारने, कॉलबेल बजाने पर भी उसने कोई जवाब नहीं दिया।
स्पष्ट था कि कहीं भारी गड़बड़ है।
रिवॉल्वर थामे उसने बंगले का नीचे का हिस्सा छान मारा। परंतु कोई नहीं मिला। बंगले के पीछे का दरवाजा जो कि अक्सर बंद रहता था वो इस वक्त खुला हुआ था। उस दरवाजे का खुला होना, किसी नई मुसीबत की तरफ इशारा कर रहा था। नीचे वाले हिस्से के बाद वो रिवाल्वर थामे दबे पांव, ऊपर जाने वाली सीढ़ियां दबे पांव चढ़ने लगा। उसकी निगाह जीरो वॉट की ना-काफी रोशनी में हर तरफ देखने का प्रयास कर रही थी। उसने अभी तक लाइट जलाने की चेष्टा नहीं की थी। बंगले में प्रवेश किए उसे दस मिनट बीत चुके थे। परंतु कोई आहट उसने नहीं सुनी। ऐसा लग रहा था जैसे सारा बंगला खाली हो।
जसबीर वालिया ऊपर की मंजिल पर पहुंचा।
सामने गैलरी थी। उधर दो कमरे बने हुए थे। बाकी के दो कमरे दूसरी तरफ थे। बेडरूम दूसरी तरफ था। वो धड़कते दिल के साथ, रिवॉल्वर थामे, धीरे-धीरे बेडरूम की तरफ बढ़ने लगा।
दरवाजे के करीब पहुंचते ही जसबीर वालिया ठिठका।
दरवाजा खुला हुआ था।
भीतर अंधेरा था।
जसबीर वालिया का दिल अनहोनी आशंका से जोरों से धड़का। यकीनन गड़बड़ है। बाहर का खुला हुआ दरवाजा। पुकारने पर कोई भी नहीं आया। बेल पर बंगले के भीतर कोई हलचल नहीं हुई। अब बेडरूम का दरवाजा खुला हुआ था। मोनिका अगर बंटी के साथ नींद में होती तो दरवाजा अवश्य भीतर से बंद होना था।
अब दो ही बातें हो सकती थी।
या तो भीतर कोई उसके इन्तजार में छिपा है।
या फिर किसी ने मोनिका को मार दिया है। शायद बंटी को भी?
नहीं। कस गए उसके जबड़े। वो अंधेरे में खड़ा कई पलों तक खुले दरवाजे को देखता रहा। फिर रिवॉल्वर थामे धीरे-धीरे नीचे बैठा। उसके बाद पेट के बल लेट कर दरवाजे की तरफ बढ़ने लगा। आंखें पूरी तरह अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हो चुकी थी। रिवॉल्वर हाथ में तैयार दबी थी।
वो धीरे-धीरे पेट के बल सरकता हुआ कमरे में प्रवेश करता चला गया। पास ही स्विच बोर्ड था। वो पलक झपकते ही उछला और स्विच दबा कर कमरे में रोशनी कर दी। रिवॉल्वर वाला हाथ हर तरफ घूमा।
कोई भी तो नहीं था वहां।
मोनिका नहीं। बंटी नहीं। कोई अजनबी नहीं। खाली था कमरा। बेड भी खाली।
इसके अलावा जो देखने को मिला जसबीर वालिया को, वो उसे हिला देने के लिए बहुत था।
बेड की चादर पर खून ही खून नजर आ रहा था। चादर अस्त व्यस्त थी। एक तकिये पर खून इस तरह लगा था, जैसे किसी ने खून गिरा दिया हो। दूसरा तकिया नीचे गिरा हुआ था। उधर पड़ा टी.वी. फर्श पर गिरा चूर हुआ पड़ा था। फ्रिज पर खून भरे हाथ के निशान थे। तकिये के पास ही मंगलसूत्र टूटा पड़ा था जो कि मोनिका के गले में पड़ा होता था। टेडी बीयर दूर फर्श पर पड़ा था। जसबीर वालिया जानता था कि बंटी इस टेडी बीयर को हमेशा अपने पास ही रखता था। ड्रेसिंग टेबल इस तरह टेढ़ा हुआ पड़ा था कि जैसे किसी ने अपने को बचाने के लिए ड्रेसिंग टेबल को थामा हो, परंतु खींचने वाले ने ड्रेसिंग टेबल थामने वाले को खींच लिया हो।
ड्रेसिंग टेबल पर भी खून नजर आ रहा था।
इसमें कोई शक नहीं था कि कमरे में खून की होली खेले ज्यादा देर नहीं हुई थी। जसबीर वालिया ने बेड के नीचे हर तरफ देखा। ये सोच कर कि लाशें कहीं नीचे हो। इधर-उधर हो।
परंतु कहीं भी लाश नहीं थी।
जसबीर वालिया का खून खौलने लगा। मोनिका और बंटी को मार कर हत्यारे ने लाशों को गायब कर दिया। किसने किया ये सब। कौन है उसका दुश्मन? क्या महाजन-मोना चौधरी? नहीं वो इतनी जल्दी यहां तक नहीं पहुंच सकते। ये सब हमारे किसी और ही दुश्मन ने किया है।
मोनिका और बंटी की मौत पर स्तब्ध था जसबीर वालिया। रिवॉल्वर हाथ में थामे अनिश्चिंत सा खड़ा खून से भरी चादर को बार-बार देखे जा रहा था। आंखों के सामने मोनिका का खूबसूरत चेहरा बार-बार आ रहा था तो कभी उसे लगता था कि बंटी अपने शरारती अंदाज में उसकी तरफ भागता आ रहा हो।
तभी जसबीर वालिया चिहुंक कर उछला।
सामने पड़े फोन की बेल एकाएक बजने लगी थी। वो कई पलों तक फोन को देखता रहा। फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा और बेजान जैसे हाथ से रिसीवर उठाकर कान से लगाया। होंठ हिले। परंतु शब्द नहीं निकला।
“अब तेरी बारी है।” खरखराती-भारी, अजीब सी आवाज उसके कानों में पड़ी और फोन कट गया।
जसबीर वालिया होंठ भींचे हाथ में पकड़े रिसीवर को देखने लगा। आंखों में कभी-कभार खौफ की परछाईयां उछालें मारने लगती थी।
अब तेरी बारी है।
ये शब्द बार-बार उसके मस्तिष्क से टकरा रहे थे।
इसका मतलब किसी ने मोनिका और बंटी को मार दिया है। तभी तो उसे कहा कि तेरी बारी है। उसने सोचने की कोशिश की कि आवाज किसकी थी। परंतु वो ये भी अंदाजा नहीं लगा पाया कि आवाज मर्द की थी या औरत की। रिसीवर उसके हाथ से छूट गया और फर्श से टकरा कर, टूट गया।
उसकी सोचों में बार-बार मौत शब्द टकराने लगा।
वो समझ गया कि उसके किसी दुश्मन ने सिर उठा लिया है। वो जो कोई भी है, लंबे वक्त से उसकी ताक में होगा और उसकी पत्नी और बच्चे के बारे में पता चलते ही अपना काम कर गया। अब उसके पीछे है। यानी कि उसके परिवार की हत्या करने वाला, अब उस पर नजर रख रहा है, उसकी जान लेने की चेष्टा करेगा। और वो उसे देख नहीं पा रहा। जाने वो किधर छिपा उसे देख रहा था।
मोनिका और बंटी की मौत से वो टूट तो गया था, साथ ही उसका खून खौल उठा था। उसे विश्वास था अपने पर कि जिसने भी ये किया है, उसे खत्म करके ही रहेगा।
फिलहाल तो यहां से निकलना जरूरी था। यहां पर वो घिर चुका था। अनजाने दुश्मन से। जो शायद पास ही कहीं हो सकता है। नहीं, पास नहीं हो सकता। अभी-अभी तो फोन पर उसने धमकी दी है। वो दूर होगा। नहीं, वो पास ही है। तभी तो उसे पता है कि वो यहां है। फोन तो पास मौजूद मोबाइल फोन से भी कर सकता।
पास ही में है वो हत्यारा कहीं?
सुलग उठा जसबीर वालिया सिर से पांव तक।
एकाएक वो रिवॉल्वर थामे उठा और चीखता हुआ कमरे से बाहर भागा।
“कहां है तू हरामजादे। सामने आ। मोनिका और बंटी की जान लेकर तू जिन्दा नहीं रह सकता। सामने आ। डरपोक की तरह क्यों छिपा हुआ है।”
जसबीर वालिया की आवाज अंधेरे में डूबे उस छोटे से बंगले में गूंजती चली गई।
लेकिन शब्दों की वापसी का किसी भी रूप में जवाब नहीं मिला।
“अब सामने क्यों नहीं आता। तूने कहा –मेरी बारी है। तो आ मार मुझे।” जसबीर वालिया गुस्से और पागलपन से चीख रहा था।
कोई जवाब नहीं।
जसबीर वालिया वहीं खड़ा हांफता रहा। चेहरा लाल सा होकर भभक रहा था। रिवॉल्वर वाला हाथ नीचे लटक रहा था। उसकी गुस्से से भरी खतरनाक निगाह हर तरफ घूम रही थी।
मिनट भर ऐसे ही बीत गया।
जसबीर वालिया को लगा वो यूं ही चीख रहा है। होश खो बैठा है वो। जो हत्यारा इतनी बेरहमी से उसकी पत्नी और बच्चे को मार सकता है। वो आसानी से उसे गोली मार सकता है। वो खुले में खड़ा है। जबकि बंगला अंधेरे में डूबा पड़ा है। एकाएक उसने महसूस किया कि गुस्से में वो होश खो रहा है। इस वक्त उसे सब्र से काम लेना चाहिए। अपने दुश्मन पर विजय पानी है। अपने को बचाना है तो सबसे पहले अपने पर काबू पाना होगा।
जसबीर वालिया संभला।
वो नहीं जानता था कि मोनिका और बंटी की लाशें कहां हैं?
बंगले के पिछवाड़े में उनकी लाशें पड़ी हो सकती हैं। छत पर भी हो सकती है। हत्यारा भी, कहीं भी, पास हो सकता है। हो सकता है। उसे इस वक्त भी अंधेरे में छिपा कहीं देख रहा हो। सबसे पहले उसे खुद को बचाना है। खुद सलामत रहेगा तो ही बदला ले पाएगा।
रिवॉल्वर हाथ में थामे जसबीर वालिया एकाएक नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ दौड़ा। उसके जूतों की आवाजें वहां गूंज उठी। फिर सीढ़ियों से तेजी से उतरने की आवाजें। नीचे ड्राइंग रूम में कालीन बिछा था। वहां तो भागने की आवाजें नहीं आई। परंतु दरवाजे तक पहुंचते ही पुनः उसके जूतों की आवाजें आने लगी।
वो सीधा पोर्च में पहुंच कर ही ठिठका।
घुप्प अंधेरा था वहां। क्षण भर के लिए ठिठक कर उसने आस-पास देखा फिर रिवॉल्वर थामे फुर्ती से स्टेयरिंग सीट पर बैठा। कार स्टार्ट की। बैक की, फिर गेट की तरफ भगाता चला गया। गेट बंद था। उसने परवाह नहीं की। कार की तेज टक्कर गेट पर मारी। तेज आवाज के साथ गेट खुल गया। वो कार को बाहर लेता चला गया। दो पलों में कार तेजी से सड़क पर दौड़ रही थी।
उसका चेहरा पसीने से भरा हुआ था। दांत भिंचे हुए थे। घबराहट भी थी आंखों में।
☐☐☐
आधे घंटे की ड्राइविंग के बाद जसबीर वालिया फार्म हाउस जैसी जगह पर पहुंचा। वहां दूर-दूर कॉटेज बनी नजर आ रही थी। स्ट्रीट लाइट नहीं थी। आधी रात होने की वजह से इधर गहरा अंधेरा छाया हुआ था। उसकी कार की हेडलाइट की रोशनी अंधेरे को चीरती हुई दूर तक जा रही थी।
अधिकतर कॉटेज अंधेरे में डूबी हुई थी।
एक आध कॉटेज में ही रोशनी हो रही थी।
जसबीर वालिया ने एक कॉटेज के सामने कार रोकी। उसका मस्तिष्क इस कदर उलझा हुआ था कि ठीक से कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा था। वो जल्दी से नीचे उतरा और कॉटेज का बाहरी गेट खोला। उसके बाद कार को मुख्य दरवाजे के सामने ले जा रोका। चांद की रोशनी में, छोटा सा लॉन और कॉटेज चमक रही थी। यहां वो फुर्सत के वक्त में मोनिका और बंटी के साथ आ जाता था। एक-दो दिन बिता कर वापस चला जाता था। इस कॉटेज के बारे में कोई भी नहीं जानता था।
उसने कॉटेज का दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश करके दरवाजा बंद कर लिया। रास्ते में उसने इस बात का ध्यान रखा था कि कोई पीछा न करे। लेकिन कोई पीछे नहीं आया था। वो निश्चिंत था।
जसबीर वालिया ने भीतर की लाइटें ऑन की और थका टूटा सा सोफे पर जा बैठा। हाथ में दबी रिवॉल्वर जेब में रख ली थी। ये सजी-सजाई कॉटेज थी। हर जगह-हर कमरा उसकी पत्नी मोनिका ने अपने हाथों से खुशी से सजाया था। घर का काम करके वो बहुत खुश होती थी। बच्चों की तरह पूछती थी कि ये चीज यहां रखी कैसी लग रही है। परंतु अब वो नहीं रही। बंटी भी नहीं रहा।
किसी ने उन दोनों को खत्म कर दिया था।
उसके परिवार को, घर को, सुख को उजाड़ दिया था।
ऐसा कौन सा दुश्मन है जिसने एकदम अपना फन उठा दिया। वो ही जानता था कि मोनिका और बंटी की मौत से उसे कितनी तकलीफ हो रही है। परंतु उनकी मौत का ठीक से अफसोस भी नहीं कर पा रहा था। क्योंकि वो खुद खतरे में था। हत्यारा उसके पीछे था। उसकी भी जान लेना चाहता था।
जसबीर वालिया ने सिगरेट निकाल कर सुलगाई।
आंखों के सामने खून में डूबा वो बेडरूम और चादर, कपड़े घूम रहे थे। उनकी लाशें कहां फेंकी होंगी हत्यारे ने? पीछे लॉन में या छत पर। अगर वो कोई पागल हत्यारा हुआ तो बड़ी बात नहीं लाशों को अपने साथ ले गया हो। लाशों को साथ ले जाकर वो क्या करेगा? मालूम नहीं-ये सब क्या हो रहा है।
जसबीर वालिया का माथा फटने लगा। दांत भिंच गए। मन ही मन पक्के तौर पर तय कर लिया कि वो किसी भी सूरत में इस हत्यारे को नहीं छोड़ेगा। तड़पा-तड़पा कर मारेगा। माथा फटने की वजह से उसे चाय की इच्छा महसूस हुई तो उठा और किचन की तरफ बढ़ गया। किचन की रोशनी जलाई और चाय बनाने लगा।
एकाएक उसे हाल में उड़ाए विमान का ध्यान आया कि बम लगाकर उसने सौ से ज्यादा ऐसे लोगों को मारा जिनका कोई कसूर नहीं था। जैसे कि मोनिका और बंटी का कोई कसूर नहीं था। परंतु उन्हें मार दिया गया। आतंक फैलाने के नाम पर और भी ऐसे जाने कितने निर्दोष लोगों की जान ली और...।
सिर झटक कर जसबीर वालिया ने इन विचारों को अपनी सोचों से निकाला।
उसने क्या किया-वो ये नहीं सोचना चाहता था।
उसके साथ क्या हुआ, वो सिर्फ यही सोच रहा था और जिसने किया, उसे मार देना चाहता था।
यहां वो खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था। मन ही मन उसने तय किया कि कल सुबह वो ये जानने का प्रयास करेगा कि किसने मोनिका और बंटी की हत्या की। चाय बनाने के बाद, उसने आराम से बैठकर चाय पी। गुस्से से सिर से पांव तक सुलगा हुआ था।
चाय समाप्त करके घड़ी देखी। रात के ढाई बज रहे थे।
उसने रिसीवर उठाया और ग्लौरी फोन किया।
“हैलो।” उधर से आवाज आई।
“भास्कर कहां है?” उसके होंठों से सख्त स्वर ही निकला।
“ओह, सर आप। एक मिनट अभी बुलाता हूं।”
कुछ देर बाद भास्कर की आवाज कानों में पड़ी।
“कहिए वालिया साहब?”
“सब ठीक है उधर?”
“जी हां। सब ठीक है। रोजी अब तंग करने लगी है। सारा प्रोग्राम खराब हो जाता है।”
“साफ कहो।”
“कुछ दिन पहले दो बार बिना बताए नहीं आई। आज भी नहीं आई। शो देखने वाले तो...।”
“इन बातों को छोड़ो। महाजन और पारसनाथ के बारे में बात करो।”
“उनके बारे में तो कोई बात नहीं। वो तो आपके पीछे गए थे। उसके बाद तो नहीं लौटे। लौटते तो तैयार इन्तजाम था उनकी लाशें ठिकाने लगाने का भी।” भास्कर की आवाज में सख्ती आ गई थी।
“अगर अब आएं तो खत्म कर देना हरामजादों को।”
“इस काम के लिए मैं तैयार बैठा हूं वालिया साहब। आप निश्चिंत रहिए।”
“मोना चौधरी भी आ सकती है।”
“उसका हुलिया रेस्टोरेंट के हर कर्मचारी के पास है। आई तो वापस नहीं जाएगी।”
“आज नहीं आई तो कल अवश्य आएगी।”
“आप तो ठीक हैं। वो दोनों आपको तो नहीं पकड़ सके।”
“नहीं। लेकिन गड़बड़ हो गई है।” जसबीर वालिया का स्वर एकाएक थकान से भर गया –“किसी ने मोनिका और बंटी को मार दिया है। जब मैं घर पहुंचा तो...।”
“ये आप क्या कह रहे हैं।” भास्कर का हैरानी भरा स्वर उसके कानों में पड़ा।
“ठीक कह रहा हूं। लेकिन ये काम महाजन-मोना चौधरी का नहीं है।” वालिया के होंठों से गुर्राहट निकली।
“ये बात पक्के तौर पर आप कैसे कह सकते हैं।”
“मोनिका और बंटी कहां रहते हैं। मेरा घर कहां है। ये बात सिर्फ दो-चार लोग ही जानते हैं और वो ये बात किसी को भी नहीं बताएंगे। महाजन-मोना चौधरी तो दिल्ली से अभी इंदौर पहुंचे ही हैं। ऐसे में उन्हें मेरे घर के बारे में पता नहीं चल सकता। जबकि पर्याप्त वक्त में भी पूछताछ करें, तो भी कहीं से उन्हें नहीं मालूम होगा।”
भास्कर की तरफ से आवाज नहीं आई।
“क्या सोच रहे हो?”
“मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं आ रहा कि भाभी और बंटी?”
“मैं कह रहा हूं तो तुम्हें विश्वास कर लेना चाहिए।” दांत भींचकर जसबीर वालिया कह उठा –“तुम खामोशी से मालूम करने की कोशिश करो कि ये काम किसने किया है।”
“मालूम करूंगा। मालूम ही नहीं करूंगा उस कुत्ते को ऐसी मौत मारूंगा कि...।”
“तुम कुछ नहीं करोगे भास्कर।” जसबीर वालिया के होंठों से वहशी स्वर निकला –“उसे मैं सजा दूंगा। तुम उसके बारे में पता करो और...।”
“ठीक है। आप कहां हैं इस वक्त?”
“ऐसी जगह पर जहां मेरी तलाश में कोई नहीं आ सकता।”
“फोन नम्बर दे दीजिए ताकि...।”
“कल मैं ही तुम्हें फोन कर लूंगा। तुम मालूम करो कि मोनिका और बंटी को किसने...।”
“पक्का मालूम कर लूंगा वालिया साहब।”
जसबीर वालिया ने रिसीवर रख दिया। उसकी आंखों में दरिन्दगी नाच रही थी।
☐☐☐
भोर का उजाला फैल गया था।
कॉटेज के बेडरूम में जसबीर वालिया सोया पड़ा था। रात देरी से सोने की वजह से दिन निकलने पर भी वो गहरी नींद में था। नाइट सूट पहना हुआ था। उसके कुछ कपड़े इस कॉटेज पर हमेशा रहते थे।
तब आठ बज रहे थे कि चाय का प्याला थामे किचन से मोनिका निकली और उसके पास पहुंची। एक हाथ में प्याला थामे, दूसरे हाथ से उसे उठाया।
“अब तो उठ जाओ। आठ बज रहे हैं।”
“सोने दो।” जसबीर वालिया करवट लेते कह उठा –“नींद मत खराब किया करो।”
“और मैंने कितनी बार कहा है कि मेरी बनाई चाय मत खराब किया करो। चाय पियो। उसके बाद सोना हो तो सो जाना। आधा शहर काम पर जा चुका है और तुम्हारा नींद से भी उठने का इरादा नहीं लग रहा।”
“मोनिका तुम हमेशा मेरी नींद खराब करती हो।” जसबीर वालिया नींद से उठ कर बैठने की कोशिश करता हुआ बोला।
“चाय पकड़ो। अभी नाश्ता भी तैयार करना है।”
जसबीर वालिया ने चाय का प्याला थामा और घूंट भरा। तब तक मोनिका किचन की तरफ बढ़ गई थी। उसके कदमों की मध्यम सी आवाज उठती रही और किचन में आकर समाप्त हो गई। जसबीर वालिया की आंखें भी अभी ठीक से नहीं खुली थी। दो-तीन घूंट भरने के बाद उसने आंखें खोली। दो-तीन घूंट और भरे।
रात के हालात एकाएक उसके जेहन में कौंधे।
वो चिहुंक पड़ा। हाथ में पकड़ा चाय का प्याला, कुछ अपने ऊपर, कुछ बेड पर गिरा। मोनिका तो मर गई है। फिर ये चाय-चाय कौन दे गया।
चाय-मोनिका ने ही तो दी है। हमेशा वो ऐसे ही उसे सुबह चाय थमा जाती है।
वो मोनिका ही तो थी।
जसबीर वालिया की आंखें फैल गई। उसकी निगाह किचन के दरवाजे की तरफ घूमी। वहां कोई नजर नहीं आया। कोई आहट भी नहीं आ रही थी किचन से।
“मो...मोनिका।” उसके होंठों से फटा-फटा सा स्वर निकला।
सन्नाटा छाया रहा।
कोई जवाब नहीं।
जसबीर वालिया जल्दी से बेड से उतरा और किचन की तरफ दौड़ा। शांत वातावरण में उसके दौड़ने की आवाज गूंजी और दरवाजे पर पहुंच कर तुरंत ही थम गई।
किचन में कोई भी नहीं था।
चूल्हा बंद था। चाय का बर्तन एक तरफ पड़ा था। जहां उसने रात को चाय बनाकर रखा था। वो फटी-फटी आंखों से किचन में नजरें दौड़ाता रहा। मोनिका नहीं है। लेकिन उसे मोनिका ने चाय दी है। पक्का दी है। ओह-कहीं उसे धोखा तो नहीं हुआ है। वो पागल तो नहीं हो गया। मोनिका-मोनिका चाय कैसे दे सकती है। वो तो...।
अविश्वास के समन्दर में जा फंसा वो।
एकाएक वो आगे बढ़ा। चाय के बर्तन के पास पहुंचा। उसे छू कर देखा। वो गर्म जैसा था। इसका मतलब चाय बनाई गई है। जाने क्या सोच कर उसने गैस के दोनों बर्नरों को छूकर देखा।
एक बर्नर गर्म था।
मतलब कि गैस जलाई गई।
चाय बनाई गई।
मोनिका ने ही उसे चाय दी है। तो कहां गई मोनिका। किचन की खिड़की बंद थी। उसने दोनों हाथों से खिड़की के पल्लों को खोला तो ठंडी हवा का झोंका उसके पसीने से भरे शरीर से टकराया। बाहर धूप थी। दूर अन्य कॉटेज नजर आ रही थी और कुछ भी नजर नहीं आया।
वो जल्दी से वापस बेडरूम में पहुंचा।
बेड पर बिखरे प्याले और चाय को देखा।
ये हकीकत थी कि उसे चाय दी गई। मोनिका ने चाय दी। उसने उससे बातें भी की थी। मोनिका की आवाज को वो नहीं भूल सकता। वो नींद में था, चाय थमा कर चली गई। इसलिए उसे देखा नहीं था। लेकिन वो मोनिका ही थी। अगले ही पल वो पागलों की तरह दौड़ा और पूरी कॉटेज का फेरा लगा लिया।
मोनिका कहीं भी नजर नहीं आई।
वो पागलों की तरह कॉटेज से बाहर निकला सामने ही कार खड़ी थी। दौड़ते हुए उसने कॉटेज का फेरा लगाया। मोनिका उसे कहीं भी नहीं दिखी।
जब कॉटेज के भीतर पहुंचा जसबीर वालिया तो, गहरी-गहरी सांसें ले रहा था। चेहरे पर पसीना बह रहा था। थकान और अजीब से भाव उसके चेहरे पर थे। गिरने वाले ढंग में वो सोफे पर बैठ गया।
मोनिका?
ओफ्फ, पागल हो जाएगा वो। मोनिका भला उसे कैसे चाय दे सकती है। वो-वो तो रात ही मर गई थी। किसी ने उसकी और बंटी की हत्या कर दी थी। उसे भ्रम हुआ है कि मोनिका ने उसे चाय दी है। ओह-दी तो है-चाय का प्याला बेड पर गिरा है। चाय का बर्तन गर्म था। बर्नर भी गर्म ही था।
जसबीर वालिया एकाएक सतर्क हो उठा।
मोनिका है यहां-उसने चाय दी है। उससे बातें की हैं। एकाएक वो कह उठा और बेडरूम में जा पहुंचा। परंतु दो कदम भीतर की तरफ उठाते ही ठिठक गया।
आंखें फैल सी गई। चेहरा हैरानी और अविश्वास से भर गया।
देखता ही रह गया सामने-बेड की तरफ। बेड को।
बेड पर नई चादर बिछी थी। ठीक से तकिये लगे थे। एक भी सिलवट नहीं थी चादर पर। चाय या प्याली के गिरे होने की बात तो दूर। ऐसा लगता था जैसे वहां कोई सोया ही न हो। लेकिन वो जानता था कि वो वहां सोया था। लेकिन दूसरी चादर बिछी थी। उस पर चाय और प्याली...।
जसबीर वालिया की सोचें ठिठकी।
नई चादर कौन बिछा गया।
वो चादर और प्याली कहां गई।
“मोनिका?” जसबीर वालिया ने पलटते हुए पुकारा और किचन की तरफ दौड़ा।
किचन में पहुंचकर ठिठका।
उसकी निगाह सामने शेल्फ पर मौजूद प्यालों और प्लेटों पर जा टिकी। एक-एक कर उसकी निगाह सब पर गई। वो छ: थे और छ: मौजूद थे। जसबीर वालिया ने पास पहुंच कर हर प्याले, हर प्लेट को देखा। सब सूखे थे और पुराने रखे लग रहे थे। ऐसा कुछ नहीं था कि उसे लगता अभी धोकर रखा गया है कप और प्लेट।
ये कैसे हो सकता है। अभी तो उसने इस प्याले में चाय पी थी। और अब इस तरह पड़े हैं ये कि जैसे इन्हें कई दिनों से इस्तेमाल नहीं किया गया हो।
असंभव।
ये नहीं हो सकता।
क्या हो रहा है ये सब?
जसबीर वालिया ने कॉटेज का एक-एक कोना छान मारा। परंतु वो चादर न मिली जो रात भर बेड पर बिछी हुई थी। जिस पर रात को सोया और सुबह चाय गिरी थी। कहीं भी नहीं थी वो चादर। एक बारगी उसे भ्रम होने लगा कि उसे किसी ने चाय दी भी थी। बेड पर सच में दूसरी ही चादर थी या ये ही थी। नहीं-नहीं उसे अच्छी तरह याद है कि बेड पर दूसरी चादर थी। फिर वो चादर कहां गई?
चाय का प्याला-उस प्याले में तो उसने चाय पी थी। परंतु वो तो किचन में इस तरह सूखा पड़ा है कि जैसे कई दिनों से उसका इस्तेमाल न किया गया हो।
जसबीर वालिया ने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया।
वापस ड्राइंग रूम में आ बैठा।
क्या हो रहा है सब?
उसे सच में मोनिका ने चाय दी थी या कोई वहम या सपना था? वहम-सपना कैसे हो सकता है? चाय गिरी भी तो थी। लेकिन अब, गिरी चाय कहीं भी नजर नहीं आ रही थी। खराब हुई चादर, और प्याला कुछ भी नहीं था वहां पर। वहां साफ चादर बिछी पड़ी थी। जसबीर वालिया दोनों हाथों से सिर दबाता चला गया।
अगले ही पल वो सीधा होकर बैठा और सिगरेट सुलगा ली। अजीब भाव थे चेहरे पर। दो-चार कश एक साथ लिए और संयत सा अपने को समझाने का प्रयत्न करने लगा।
सबसे पहले तो उसने खुद को ये समझाने की चेष्टा की थी कि वो वहम में घिर गया है। ऐसा कुछ नहीं है। मोनिका मर चुकी है। रात उसकी हत्या कर दी गई थी। ऐसे में वो उसे चाय नहीं दे सकती। उससे बात नहीं कर सकती। वो मोनिका से बहुत प्यार करता है, इसलिए उसकी हत्या के बाद उसे ये अहसास हुआ कि मोनिका ने उसे वैसे ही चाय दी है, जैसे वो चाय देती...चाय...हां, चाय तो दी थी।
उसने चाय पी थी।
चाय का प्याला गिरा भी था।
इस बात को कैसे झुठला सकता है?
तो फिर चाय किसने दी? मोनिका ने दी तो वो चाय देकर कहां चली गई। चादर किसने बदली और वो प्याला इस तरह पड़ा नजर आ रहा है कि जैसे उसे इस्तेमाल ही नहीं किया हो।
जसबीर वालिया पुनः इन्हीं सोचों में आ फंसा।
उसे याद आया कि रात उसने चाय बनाकर पी थी। निगाह फौरन सेंटर टेबल पर गई। वहां रात का उसके द्वारा रखा गया चाय का खाली गिलास पड़ा था। वो देखता रहा, खाली गिलास को। बेड से अगर प्याला उठाया गया है तो ये गिलास भी उठाना चाहिए था। ये नहीं उठाया गया।
कौन है कॉटेज में?
क्या-क्या मोनिका की आत्मा?
जसबीर वालिया का चेहरा अजीब से भावों से भर उठा। मोनिका की आत्मा ने उसे चाय दी या वहम था उसका। जसबीर वालिया को लगा, कुछ नहीं हुआ। वहम था उसका। पागलपन है उसका। वो खामख्वाह की सोचों को अपने में बसाए जा रहा है। मोनिका नहीं थी वो, मात्र उसकी सोचें थी। चाय भी उसका धोखा था। चादर वो ही बिछी होगी वहां । प्याला उसने इस्तेमाल ही नहीं किया तो।
हां, अब वो ठीक सोच रहा है।
उसकी दिमागी हालत स्थिर होने लगी। यूं ही वो पागल हो गया था। सिगरेट समाप्त करके वो उठा और बाथरूम में प्रवेश कर गया। नहा-धोकर उसे सुकून मिला। तौलिया बांधे बेडरूम में आया और वार्डरोब खोल कर पैंट-कमीज निकाल कर पहन ली। मन ही मन सोच रहा था कि यहां से जाकर, उसे तलाश करने की कोशिश करेगा, जिसने मोनिका और बंटी की हत्या की है।
इन्हीं सोचों में उलझा वो किचन में पहुंचा। निकलने से पहले चाय पीने का मन था। उसकी सोचें इस तरफ दौड़ रही थी कि कौन हो सकता है मोनिका और बंटी की जान लेने वाला?
आज मोना चौधरी भी उसके रेस्टोरेंट में पहुंच सकती है?
चाय समाप्त की। पन्द्रह मिनट लग गए। कुछ देर बैठा रहा। फिर वो उठा। कार की चाबियां बेडरूम में थी। और चाबियां लेने के लिए वो बेडरूम में पहुंचा कि ठिठक गया। आंखें फटकर फैलती चली गई। चेहरा निचुड़ कर सूख गया। पागलों जैसी छाया उसके चेहरे पर आ ठहरी।
सामने बेड पर नन्हे से बंटी की खून से लथपथ लाश पड़ी थी।
“बंटी...ऽ...ऽ...।” जसबीर वालिया चीखा और पागलों की तरह बेड की तरफ दौड़ा और पास पहुंचते ही बंटी की लाश को दोनों बांहों में उठा लिया।
वो सच में बंटी था।
उसका प्यारा बेटा।
उसके जिगर का टुकड़ा।
इन्हीं बांहों में खेलता था वो। छलांगे मारता था और अब बेजान सा पड़ा था। खून में डूबा हुआ। किस बेरहम ने उसकी जान ली। क्यों मार दिया उसे। क्या कसूर था उसका।
बंटी को छाती से लगाए। फफकता हुआ जसबीर वालिया फर्श पर बैठता चला गया। रोता रहा। रोता रहा। बंटी के खून भरे चेहरे को चूमता। प्यार करता। उसे गले से लगाता। उसे पुकारने लगा। परंतु उस मासूम ने कहां होश में आना था। जाने कब तक यही आलम रहा। रोते-रोते उसके आंसू सूखने लगे। थक गया वो बंटी को पुकार-पुकार कर। टूटन तो उसके चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रही थी। ढेरों लाशें देखी थी उसने। जाने कितनों को मारा था। परंतु अपनों की लाश को पहली बार सामने देखा था। जिगर का टुकड़ा, सिर्फ मांस का लोथड़ा बन कर उसके सामने पड़ा था।
क्या हो गया ये सब। बरबाद हो गया वो। उसकी छोटी सी, खूबसूरत सी दुनिया उजड़ गई थी।
रोते-सिसकते उसने बंटी के शरीर को बहुत प्यार से बेड पर रखा। बार-बार उसके सिर पर हाथ फेरने लगा। उसके चेहरे पर नजर पड़ती तो रोने को मन करता। लेकिन आंसू सूख गए थे। अब उसे स्वीकार करना पड़ रहा था कि उसका जिगर का टुकड़ा, बेजान टुकड़ा होकर रह गया था।
आखिरकार वो उठा। खून से सने हाथों को देखा। खून में डूब चुकी कमीज को देखा। उसके बेटे का खून था। ये उसका खून था। किसी ने बहा दिया। मार दिया उसके मासूम बेटे को। थके टूटे कदमों से वो कमरे से बाहर निकल कर बाथरूम की तरफ बढ़ा कि ठिठक गया।
सामने ही फर्श पर मोनिका का खून में डूबा मृत शरीर पड़ा था।
वो स्तब्ध सा खड़ा रह गया। मोनिका की लाश को देख कर।
“मोनिका...ऽ...ऽ...।”
☐☐☐
घंटा भर वो मोनिका के खून में डूबे शरीर से लिपट-लिपट कर रोता रहा। उसे इस तरह उठाने की चेष्टा कर रहा था जैसे वो नींद में हो। पागल सा हो गया था वो। जाने कितना वक्त बीत गया।
रोने से हुई लाल सुर्ख आंखों से उसने वक्त देखा। दोपहर का डेढ़ बज गया था। पता ही नहीं चला था, वक्त कब और कैसे बीता? अपनों से आखिरी मिलन था उसका। जिन्दा तो न मिले। मरे ही मिल गए, वरना उसने तो मरों के चेहरे देखने की भी आशा छोड़ दी थी।
जैसे-तैसे वो उठा। बाथरूम में जाकर हाथ-मुंह धोया। लगा खून उतारा। उसके बाद पैंट-कमीज उतारी, जिस पर खून लग गया था। बेडरूम में पहुंच कर नई पैंट कमीज पहनी। अब वो दोनों लाशें जैसे उसके लिए पुरानी चीज हो गई थी। बेडरूम में बंटी की लाश और ड्राइंग रूम के फर्श पर पड़ी मोनिका की लाश।
इन लाशों को यहां से ले जाना होगा।
इनका क्रियाकर्म करना होगा।
लेकिन ये सब कैसे कर पाएगा। ये तो पुलिस केस है। पुलिस को बुलाना होगा। पुलिस आई तो उसे सबके सामने रहना पड़ेगा। जबकि कोई उसकी भी जान लेना चाहता है। क्या करे ?
खुद को अजीब सी स्थिति में पाया उसने। अपनों की लाशें सामने पड़ी थी और उनका अन्तिम संस्कार भी ठीक से न कर पा रहा था। बंटी की लाश को भीगी निगाहों से देखते हुए वो बाहर निकला। ड्राइंग रूम में पहुंचते ही ठिठक गया। भूचाल के चेहरे पर आ ठहरे।
मोनिका की लाश वहां नहीं थी।
अभी तो पड़ी थी लाश। पांच मिनट पहले देखा था। उसके बाद बाथरूम गया और बेडरूम में आकर कपड़े बदले। इतने में लाश कहां गई? जबकि वहां खून की एक बूंद भी नहीं थी। उसने अजीब सी हालत के साथ ध्यान से फर्श को देखा। उसे लगा जैसे उसे साफ कर दिया हो। हल्का सा पीलापन चमकता महसूस किया, जो कि उसके सामने ही सूखता चला गया। लाश कहां गई? अजीब सी हालत हो रही थी जसबीर वालिया की।
लाश कहीं नहीं जा सकती।
एकाएक वो पागलों की तरह दौड़ा। पूरी कॉटेज छान मारी। सब कमरे, यहां तक कि बाहर की जगह भी देख ली। परंतु मोनिका की लाश कहीं भी नहीं थी। कहां गई लाश? परेशान सा वो वापस, बेडरूम में पहुंचा तो एक बार फिर उसे पांवों के नीचे से फर्श खिसकता सा लगा। कमरे को घूमता-हिलता सा महसूस किया जैसे।
बेड पर बंटी की लाश नहीं थी।
एक बार फिर नई चादर बेड पर बिछी थी।
कहीं भी खून की बूंद नहीं थी। न बेड पर, न फर्श पर। कोई देखकर सोच भी नहीं सकता था कि वहां पर किसी बच्चे की लाश कुछ देर पहले मौजूद थी।
“बंटी।” उसके होंठों से कंपकंपाता स्वर निकला।
वो आवाज इतनी धीमी थी कि कठिनता से सिर्फ उसे ही सुनाई दी।
वहीं खड़ा रहा जसबीर वालिया।
वो जानता था कि बंटी की लाश कहीं नहीं मिलेगी। जैसे मोनिका की लाश कहीं नहीं मिली।
वो ड्राइंग रूम में आ बैठा था।
सकते की हालत में था। ठगा सा। दबा-दबा। घबराया हुआ भी और गुस्से में भी। दोपहर के ढाई बज रहे थे। आधा दिन बीत गया था परंतु उसे वक्त गुजरने का होश ही नहीं था।
मोनिका की लाश।
बंटी की लाश।
ओफ्फ। क्या हो रहा है ये सब?
जसबीर वालिया ने हरकत करती उंगलियों से किसी प्रकार सिगरेट सुलगाई। कश लिया। दिमाग बंद हो रहा था उसका। मोनिका और बंटी की हत्या उसके बंगले पर हुई कल रात और आज लाश यहां मिली। बंटी की लाश बेडरूम में और मोनिका की इसी ड्राइंग रूम के फर्श पर। वहां...।
लेकिन बाद में लाशें गायब हो गई।
खून भी साफ कर दिया गया।
किसने रखी लाशें और फिर क्यों गायब कर दी गई?
जसबीर वालिया को अपना दिमाग घूमता सा लगा। एकबारगी तो उसे लगा कि जैसे लाशों को उसने देखा ही नहीं था यहां। सब कुछ सपना था। लेकिन नहीं हकीकत था सब कुछ। उसने अपने खून से सने हाथ साफ किए थे। उसके कपड़े खून से रंग गए थे तो कपड़े चेंज किए।
सब कुछ सपना कैसे हो सकता है?
अचानक ही वो उठा और ड्राइंग रूम के फर्श के उस हिस्से को घूरते, बेडरूम की तरफ बढ़ा जहां मोनिका की लाश पड़ी थी। बेडरूम में प्रवेश करके ठिठका और साफ-सुथरे बेड को देखने लगा। चेहरे पर दर्द-परेशानी और गुस्से के भावों के साथ-साथ ढेर सारी उलझन भरी थी।
जसबीर वालिया वहां से हटा और बाथरूम की तरफ बढ़ गया। जाने क्यों होंठ भिंच गए थे। उसे लगने लगा कि कोई उसके साथ खेल खेल रहा है। ऐसा खेल जिसमें खून-कत्ल और उसकी बरबादी शामिल थी।
बाथरूम में प्रवेश करते ही ठिठका।
उसकी आंखें सिकुड़ी।
उसे अच्छी तरह याद था कि उसने कपड़े यहीं लटकाए। हुक पर। खून से सने कपड़े और हाथ साफ करने के बाद, मुंह साफ करने के बाद वाश बेसिन पर, खून लगा छोड़ आया था। लेकिन वाश बेसिन बिल्कुल साफ था। खून का कोई दाग-धब्बा नहीं था। हुक पर खून से सने कपड़े भी नहीं थे। दो पलों के लिए उसे लगा,
उसे वहम हो गया है। पागल होता जा रहा है।
दूसरे ही पल उसकी मुट्ठियां भिंच गई।
“नहीं। मैं पागल नहीं हूं। वहम नहीं है मुझे।” होंठों ही होंठों में वो बुदबुदा उठा –“मैंने जो देखा, जो महसूस किया। वो ठीक किया है। सुबह मुझे मोनिका ने चाय दी। बात की। नाश्ता बनाने को कह कर किचन में चली गई। जबकि एक रात पहले उसकी हत्या हो चुकी थी। उसके बाद, चादर पर चाय गिरी। जाने किसने चादर बदल दी। चाय का कप साफ होकर वापस, किचन में अपनी जगह पर पहुंच गया। फिर बेडरूम में बेड पर बंटी की लाश, खून में पड़ी मिली। उसके बाद मोनिका की लाश ड्राइंग रूम के फर्श पर मोनिका की खून में डूबी लाश मिली। लेकिन किसी ने जैसी सफाई के साथ लाशें रखी, वैसे ही उन लाशों को गायब कर दिया। खून तक साफ कर दिया गया। यहां तक कि उसके कपड़ों को भी गायब कर दिया गया। जिन पर खून लग गया था। ये सब किया गया। यानी कि कॉटेज में कोई है। वो ही ये सब कर रहा है। लेकिन मैं तो कॉटेज के भीतर ही था। अगर ये सब कोई कर रहा है तो वो मुझे क्यों नहीं दिखा। ये कोई मजाक है कि कॉटेज में उसकी मौजूदगी में सब कुछ हो और उसे पता न चले।”
बड़बड़ाते हुए जसबीर वालिया बाहर निकला।
बहुत परेशान लग रहा था वो।
कमर पर हाथ बांधे वो टहलने लगा। चेहरे पर तरह-तरह के भाव आ-जा रहे थे। धीरे-धीरे वो इस फैसले पर पहुंचने लगा कि उसके गिर्द जाल बुना गया है। वो किसी चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। वो जो भी है उसने मोनिका और बंटी को मार दिया और अब उसे मारना चाहता...।
जो ये सब कर रहा है। अगर वो आसपास ही है तो अब तक उसे आसानी से मार सकता था।
फिर मारा क्यों नहीं।
जसबीर वालिया के सामने ये सवाल खड़े होने लगे, जिसका जवाब उसके पास नहीं था कि अभी तक उसे जिन्दा क्यों छोड़ा हुआ है, अगर उसे मारना चाहता है कोई। कोई मोनिका और बंटी की लाशें लिए क्यों घूम रहा है। कभी लाशें रखता है कभी गायब कर देता है। उसे अहसास होने लगा कि किसी जबरदस्त साजिश का शिकार हो चुका है वो। उसका दुश्मन कमजोर नहीं है। जैसे कोई अदृश्य होकर उसके आसपास घूम रहा हो।
उसे यहां से निकल जाना चाहिए।
यहां कुछ है। खतरा है। किसी के शिकंजे में जकड़ा जा रहा है। जब तक खुद को आजाद महसूस नहीं करेगा, तब तक वो उसे नहीं ढूंढ पाएगा, जिसने मोनिका और बंटी की जान ली है। जसबीर वालिया एकाएक ठिठका। सामने ही बाहर निकलने का दरवाजा था। वो तेजी से दरवाजे की तरफ बढ़ गया। उसे यहां से निकल जाना होगा। भास्कर से मिलेगा। उसे साथ रखेगा। दो और को साथ लेकर मोनिका और बंटी के हत्यारे को तलाश करेगा। वो किसी गहरी चाल में फंस चुका है।
दरवाजे से बाहर निकल कर वो सामने खड़ी कार तक पहुंचा। कार की चाबियां हाथ में थी। वो दरवाजा खोलते-खोलते एकाएक ठिठक गया। नजरें कार के टायर पर गई।
वो पंचर था। हवा जरा भी नहीं थी। तभी दूसरे पहिए पर नजर गई। वो भी नीचे बैठा हुआ था। उसने बाकी के दोनों पहिए देखे। उनका भी वैसा ही हाल था। जसबीर वालिया की आंखें सिकुड़ गई। चारों पहियों का एक साथ पंचर होना इत्तेफाक नहीं हो सकता। ये सब किया गया है है।
जसबीर वालिया नीचे झुका और कार के पहियों को चेक करने लगा।
फौरन ही सारी स्थिति स्पष्ट हो गई।
पहियों पर किसी ने चाकू मारे हुए थे। कार के पहियों को बेकार कर दिया था कि वो यहां से जा न सके। लेकिन वो जा सकता था। कार के बिना भी जा सकता था। जसबीर वालिया के दांत भिंच गए। नजरें दूर-दूर फैली कॉटेजों पर जाने लगी। तीन कॉटेजों में कार खड़ी नजर आ रही थी। वो किसी की कार ले सकता था। लिफ्ट ले सकता था। उसने जेब में पड़ी रिवॉल्वर को थपथपाया और कॉटेज के बाहरी द्वार की तरफ बढ़ने लगा कि तभी कॉटेज में मौजूद फोन की बेल बजने लगी।
ठिठक गया जसबीर वालिया।
होंठ भिंच गए।
किसका फोन हो सकता है। इस फोन का नम्बर उसने किसी को नहीं दे रखा। कुछ पल वो अनिश्चित सा खड़ा रहा फिर पलटा और कॉटेज के भीतर प्रवेश कर गया।
फोन की बेल बजे जा रही थी।
“हैलो।” जसबीर वालिया ने रिसीवर उठाया।
“अगर तुमने कॉटेज से बाहर जाने की कोशिश की। पांव बाहर निकाला तो उसी वक्त तुम्हें गोलियों से भून दिया जाएगा।” वो ही, अजीब सी भारी आवाज कानों में पड़ी और फोन बंद कर दिया गया।
जसबीर वालिया रिसीवर थामे सामने की दीवार को घूरे जा रहा था। वो शब्द जैसे बार-बार कानों में पड़ रहे थे। ये बात स्पष्ट हो गई थी कि वो फंस चुका है। उसके गिर्द चक्रव्यूह डाल दिया गया था। बाहर जाने को स्पष्ट तौर पर मनाही कर दी गई थी।
क्या वो बाहर जाए?
गोलियों से भूनने की बात मात्र कोरी धमकी नहीं हो सकती। कुछ भी हो। इस बात को चेक करने के लिए कॉटेज से बाहर जाने की कोशिश करना बेवकूफी थी।
जो भी ये सब कर रहा था, बहुत सोच समझ कर कर रहा था।
मोनिका और बंटी को उसने खामख्वाह नहीं मारा। वो उसे भी मारेगा तो फिर इन्तजार किस बात का कर रहा है ? उसे मारता क्यों नहीं? वो उस पर नजर रख रहा है तो उसे मारने के कितने मौके होंगे उसके पास।
जसबीर वालिया ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए रिसीवर रखा। उसने फैसला किया कि वो कॉटेज से बाहर नहीं निकलेगा। कोरी धमकी नहीं दी गई उसे। उसके आस-पास न नजर आने वाला जो भी है, खतरनाक है वो। जाने क्या सोच कर दिल धड़क उठा। वो इस बात पर विश्वास नहीं कर पा रहा था कि वो बेबस हो चुका है। अदृश्य हाथों ने उसे इस तरह जकड़ लिया है कि वो अपनी इच्छा के साथ नहीं चल सकता।
एकाएक उसे लगा वो कमजोर भी हो गया है।
शायद मोनिका और बंटी की मौत ने उसे कमजोर बना दिया है तोड़ दिया है।
लेकिन, अब क्या होगा? वो जो भी है, अब क्या करेगा? नहीं, वो अपने आपको मरने नहीं देगा। वो जो भी है, उसका मुकाबला करेगा। खुद को जिन्दा बचा लेगा और मोनिका-बंटी की मौत का बदला भी लेगा। सब ठीक हो जाएगा। लेकिन...लेकिन वो है कौन? जो...।
☐☐☐
जाने कब तक जसबीर वालिया बैठा रहा।
वो खुद नहीं जानता था कि क्या सोच रहा है। उसकी सोचें इस कदर गुड़-मुड़ हो रही थी कि वो अपनी ही सोचों को समझ नहीं पा रहा था। आंखें बोझिल सी हो रही थी। चेहरे पर अजीब से भाव ठहरे हुए थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था और शाम के साढ़े चार से ऊपर का वक्त हो गया था।
एकाएक वो थके से अन्दाज में उठा और कॉटेज के भीतर घूमने लगा। जाने क्या तलाश करना चाहता था वो। उसे खुद नहीं पता कि वो क्या ढूंढ रहा था। पूरी कॉटेज में घूमा। एक-एक चीज देखी। फिर एक खिड़की खोली और बाहर देखने लगा। दूर एक कॉटेज में लोग नजर आ रहे थे। उनके बच्चे बाहर खेल रहे थे। एक कॉटेज के बाहर कार खड़ी थी। अन्य कॉटेज में पहले कार नजर आ रही थी। लेकिन अब वहां कार नहीं थी।
शाम की तेज धूप में कॉटेज चमक रही थी।
वो किसी ऐसे इंसान को तलाश कर रहा था, जो उसकी कॉटेज पर नजर रख रहा हो।
परंतु देर तक ऐसा कोई भी नजर नहीं आया।
उस खिड़की को बंद करके वो कॉटेज के दूसरे हिस्से की खिड़की पर पहुंचा और उसे खोल कर बाहर देखने लगा। देर तक देखता रहा। परंतु इधर भी कोई नहीं दिखा। जबकि उसे फोन पर कहा गया था कि अगर उसने कॉटेज से बाहर निकलने की चेष्टा की तो उसे भून दिया जाएगा।
परंतु कहीं भी कोई नजर नहीं आ रहा था।
तो क्या उसे मात्र कोरी धमकी दी गई।
परेशान सा सोचों में डूबा वो वापस साफे पर आ बैठा। क्या करे? यहां से निकले? अगर बाहर कोई हुआ तो उससे आसानी से निपट सकता है। रिवॉल्वर है उसके पास। डरने की क्या बात है। इन सोचों ने उसका हौसला बढ़ाया। जेब में पड़ी रिवॉल्वर पर हाथ मारा तो उसकी हिम्मत ने उछाल मारी।
तभी उसे मोना चौधरी का ध्यान आया। अब तक तो वो आ ही गई होगी रेस्टोरेंट में।
शाम के पांच बज रहे थे।
उसने भास्कर को फोन किया रेस्टोरेंट में। बात हुई।
“मोना चौधरी आई?” जसबीर वालिया ने छूटते ही पूछा।
“अभी तो नहीं वालिया साहब।”
“वो आएगी।”
“मैंने पूरा इन्तजाम कर रखा है, वो आई तो जिन्दा वापस नहीं जा सकेगी।”
“हां। वो महाजन और पारसनाथ...।”
“वो भी नजर नहीं आए। हो सकता है आज आ जाएं।”
“ध्यान रखना।”
“जी। आप कब तक आएंगे?” उधर से भास्कर ने पूछा।
एकबारगी वालिया के मन में आया कि वो भास्कर को इधर के हालात बता दे और उसे यहां आ जाने को कहे। लेकिन इन विचारों को दबा गया जसबीर वालिया कि यहां जो भी है, वो खुद संभाल लेगा। भास्कर को बुलाने की क्या जरूरत है। रेस्टोरेंट का मामला ही संभाल ले। यही बहुत है।
“मेरा पता नहीं कब आता हूं। तुम अपने काम की तरफ ध्यान दो।” कहकर जसबीर वालिया ने रिसीवर रखा।
शान्ति छाई हुई थी यहां।
जसबीर वालिया के चेहरे पर दृढ़ता और कठोरता दिखाई देने लगी। जेब में पड़ी रिवॉल्वर निकाल कर हाथ में ले ली। तय कर लिया था उसने कि वो यहां से जाएगा। अगर किसी ने रोकने की चेष्टा की तो उसे शूट कर देगा। सुबह से लेकर अब तक कोई आहट नहीं उभरी थी। हर तरफ सन्नाटा ही था। ऐसे में वो कैसे
मान ले कि यहां कोई है। पूरी कॉटेज खाली पड़ी हुई थी। बाहर भी कोई नहीं था।
लेकिन ये भी जानता था कि आस-पास कुछ तो है। वो चाय, वो दोनों लाशें, फिर लाशों का गायब हो जाना। उसके खून से सने कपड़े गायब और खून के धब्बे भी साफ। कार के टायरों को चाकू से काट कर बेकार कर देना। फोन पर उसे धमकी देना।
यकीनन वो किन्हीं लोगों में घिरा हुआ था।
इस घेरे को तोड़ेगा वो।
रिवॉल्वर हाथ में थामे वो पलटा और खुले दरवाजे से बाहर निकलता हुआ आंगन में आ पहुंचा। तेज धूप में वो सिर से पांव तक नहा उठा। गर्मी बहुत थी। उसने कार पर निगाह मारी। जिसके चारों पहिये बैठे हुए थे। होंठ भींचे रिवॉल्वर थामे, वहीं खड़े जसबीर वालिया ने हर तरफ देखा।
कोई नजर न आया।
धूप की वजह से कॉटेज वाले भी, अपनी कॉटेजों में थे। वो मन ही मन तय कर चुका था कि उधर की कॉटेज वालों से वो किसी तरह कार ले लेगा, यहां से जाने के लिए और कुछ ही घंटों में कार को किसी के हाथों वापस भी भिजवा देगा। वो कॉटेज वाले थोड़ा-बहुत जानते हैं उसे। एक बार वो परिवार के साथ उसके यहां चाय पीने आए थे, जब वो मोनिका और बंटी के साथ यहां आया था।
दांत भींचे सावधानी से जसबीर वालिया, रिवॉल्वर दबाए सतर्कता से बाहरी गेट की तरफ बढ़ने लगा। उसकी पैनी-गुस्से से भरी निगाह हर तरफ जा रही थी। मन के एक कोने में डर की छाया भी थी कि जिन्होंने उसे यहां फंसा दिया है, वो कहीं से उसकी हरकतों को देख रहे हो सकते हैं।
आठ-दस कदम दूर ही रह गया था गेट।
तभी पांवों के पास कुछ हुआ सा महसूस हुआ।
वो ठिठका। नीचे देखा। दूसरे ही पल उसकी आंखें सिकुड़ गई। करीब एक फीट दूर पांवों के पास की मिट्टी उधड़ी हुई थी और सुराख सा नजर आ रहा था। वो फौरन झुका और सुराख में उंगली डालकर घुमाने लगा। दो पलों के बाद ही उंगली किसी कठोर चीज से छुई। उसने अच्छी तरह उस चीज को दूसरी उंगली लगाकर पकड़ा और बाहर निकाल लिया। वो रिवॉल्वर की गोली थी और अभी भी गर्म थी।
हाथ में पकड़ी गोली को देखता रह गया वो।
मतलब कि नजर थी उस पर?
जसबीर वालिया ने दांत भींच कर, रिवॉल्वर थामे हर तरफ नजर घुमाई। चुप्पी-सुनसानी और तेज धूप के अलावा और कुछ भी नजर नहीं आया। कठोर निगाहों से उसने हाथ में पकड़ी गोली पर नजर मारी। वो समझ गया कि पांवों के पास इस तरह गोली आने का मतलब था कि उसे रुकने की चेतावनी दी गई है। अगर इस चेतावनी को न मानकर वो आगे बढ़ा तो इस बार गोली उसके शरीर के किसी हिस्से में धंस सकती है।
वो देर तक अनिश्चित सा खड़ा रहा।
क्या आगे बढ़े? खतरा मोल ले? खतरा मोल ले भी लेता अगर भागने के लिए पास ही कोई कार या वाहन होता। पैदल कहां तक भागेगा। खुला इलाका है। वो जो भी है, उसका निशाना ले लेगा। जबकि वो उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। क्योंकि वो नजर नहीं आ रहा। जब तक उसे तलाश करेगा, तब तक उसे कई गोलियां लग चुकी होंगी। आखिर वो कौन है। मोनिका और बंटी को मारने के बाद उससे क्या चाहते हैं। वो सामने है। उसका निशाना आसानी से ले सकते हैं। इस पर भी उसका निशाना नहीं लिया जा रहा।
क्यों?
इस क्यों का जवाब उसके पास नहीं था। यही क्यों, उसके लिए परेशानी पैदा कर रहा था। उसकी निगाह पुनः हर तरफ गई। परंतु कुछ नहीं नजर नहीं आया।
वहीं खड़ा था। जरा भी आगे नहीं बढ़ा था।
आखिरकार इस नतीजे पर पहुंचा कि वो आगे नहीं जाएगा।
वापस कॉटेज में ही उसे जाना होगा। उसे ढूंढेगा जिसने उस पर पहरे बिठा रखे हैं। जिसने अनजाने चक्रव्यूह में कैद कर लिया था उसे। अपनी इच्छा से वो कुछ भी नहीं कर पा रहा था। वो पास ही है कहीं। उसे ढूंढ कर ही रहेगा। जान से मार देगा उसे।
जसबीर वालिया पलटा और भारी कदमों से चलता हुआ वापस कॉटेज में आ गया। इस दौरान भी वो पूरी कोशिश कर रहा था कि कोई नजर आए। परंतु कोई नजर नहीं आया। वो समझ नहीं पाया कि अदृश्य तौर पर उसे यहां बंदी बनाने वाला कहां पर छिपा हुआ हो सकता है। वो ढूंढने पर भी दिखाई क्यों नहीं दे रहा?
एकाएक उसने फैसला किया कि वो भास्कर से बात करेगा। कुछ आदमियों के साथ यहां आने को बोलेगा। वो आदमियों के लेकर आ गया तो फिर सब ठीक हो जाएगा। आसानी से यहां से निकल जाएगा। इसके साथ ही उसने आगे बढ़कर रिसीवर उठाया और नम्बर मिलने लगा।
दूसो पल ही ठिठका।
रिसावर में डायल टोन नहीं थी। उसने प्लंजर दबाया। फोन पर हाथ मारा कि डायल टोन आ जाए। परंतु करंट नहीं आया। फोन डेड हो गया था। अभी तो बात की थी, भास्कर से? ओह-तो फोन पर खराब कर दिया गया। ताकि वो किसी को सहायता के लिए बुला न सके। जसबीर वालिया ने आहिस्ता से फोन वापस रख दिया। दिल धड़क सा उठा कि आखिर वो जो भी है, चाहता क्या है। माथे पर पसीने का एहसास हुआ तो बांह से उसने साफ कर लिया।
फोन खराब कैसे किया गया?
जसबीर वालिया तारें चेक करने लगा।
तारें चेक करते-करते वो कॉटेज के बाहर पहुंचा तो ठिठक गया। वो सामने, जो बाहर से फोन की तार आ रही थी। वो कटी हुई लटक रही थी। तार काट दी थी किसी ने? ये काम अभी-कुछ देर पहले ही हुआ है। ज्यादा देर नहीं हुई। अब उसे इस बात का अहसास होने लगा था कि वो बुरी तरह घिरा हुआ है। वो जो भी है, मात्र कोरी धमकी नहीं दे रहा। हकीकत में सब कुछ कर सकता है, कर रहा है और कर भी देगा।
जसबीर वालिया पहली बार मन ही मन घबराया।
वापस कॉटेज में आ गया।
अब वो हद से ज्यादा गंभीर होकर हालातों पर गौर करने लगा कि क्या हो रहा है ये सब। उसकी पत्नी और बच्चे को मार दिया। उसे इस तरह फंसा कर रखा है। न तो उसे मारा जा रहा है। न ही उसे कहीं जाने दिया जा रहा है। बंदी बना रखा है और वो जो कोई भी है, सामने नहीं आ रहा।
क्यों? वो...।
“आपके परांठे तैयार हैं।” तभी किचन की तरफ से मोनिका की पहचानी आवाज आई –“तैयार हो जाइए ला रही हूं।”
जसबीर वालिया को करंट सा लगा।
ये तो मोनिका की आवाज है। वो इसी तरह किचन से ही आवाज दे देती...।
तभी उसके देखते ही देखते किचन से मोनिका बाहर निकली। घर में पहनने वाला गाऊन पहन रखा था उसने। इस गाऊन को वो कई बार देख चुका था। उसके होंठों पर चिरपरिचित वो ही मुस्कान थी, जो वो हमेशा देखा करता था। चलने का वो ही खुशनुमा अंदाज।
आंखे फाड़े जसबीर वालिया देखता रहा, मोनिका को।
मोनिका ने उसके सामने टेबल पर परांठों वाली प्लेट रखी।
“खा लीजिए। सुबह से आपने कुछ खाया नहीं। कितनी बार कहा है कि खाना वक्त पर खाया करो। काम बाद में।”
उसी हालत में बैठा वो, मोनिका को देखे जा रहा था।
“क्या हो गया है आपको। क्या देख रहे हैं?”
जसबीर वालिया ने प्लेट में नजर मारी। प्लेट में दो परांठे और दही की कटोरी पड़ी थी।
तभी मोनिका बोली।
“कुछ कम है क्या-और क्या चाहिए-बताओ।”
जसबीर वालिया के होंठ हिले। कई पलों तक हिलते रहे फिर खरखराता सा स्वर निकला।
“क...कौन हो तुम?”
“क्या?” मोनिका ने हैरानी से कहा –“मैं कौन हूं। अरे मैं तो आपकी पत्नी हूं।”
जसबीर वालिया जैसे खुद को संभालता जा रहा था।
“नहीं। तुम मोनिका नहीं हो सकती। कोई और हो तुम। मोनिका तो कल रात मर गई थी। उसकी हत्या कर दी...।”
एकाएक मोनिका का चेहरा उदास हो गया। वो वहां से हटी और दूर जाकर खड़ी हो गई।
“जवाब क्यों नहीं देती तुम?” जसबीर वालिया एकाएक खड़ा हो गया।
“हां।” मोनिका ने दुखी स्वर में कहा –“कल मुझे किसी ने मार दिया था। बहुत तकलीफ हुई जसबीर। मरने में दर्द बहुत हुआ था। मरने से पहले मैं तुम्हें ही याद कर रही थी। लेकिन तुम नहीं आए।”
जसबीर वालिया स्तब्ध सा अपनी जगह पर खड़ा उसे देखे जा रहा था।
“किसने मारा तुम्हें?” जसबीर वालिया के होंठों से कम्पन भरा स्वर निकला।
“मैं नहीं जानती। तब वो मुझे नजर नहीं आए जिन्होंने मुझे और बंटी को मारा। वो इंसान नहीं थे। तब तो मैं उन्हें जरा भी समझ नहीं पाई। अपने को बचाने की खातिर चीखती रही। कमरे से बाहर निकल जाने की कोशिश करती तो जाने कौन मुझे उठा कर वापस पटक देता। इसी तरह मेरी जान चली गई। बहुत दर्द हुआ था।”
“झ...झूठ बोलती हो तुम।” जसबीर वालिया के होंठों से थरथराता सा स्वर निकला –“तुम तो जिन्दा हो। मेरे सामने खड़ी हो। फिर कैसे मर सकती...।”
“ये मैं नहीं हूं। मेरी आत्मा है। मेरा सूक्ष्म शरीर है। जो मुक्ति न मिल पाने के कारण भटक रहा है। मर कर भी मैं जीवन चक्र से नहीं निकल सकी है। कैसे निकलती। मेरी गति तो हुई नहीं। तुमने तो अभी तक मेरा संस्कार भी नहीं किया। क्या तुम्हें मुझसे प्यार नहीं था?”
जसबीर वालिया की आंखें भर आई।
“क्या कह रही हो मोनिका। तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुमसे और बंटी से कितना प्यार करता था। ये कह कर मेरे दिल को मत दुखाओ। मैं...मैं तुम्हारा संस्कार करूंगा मोनिका। मैं...।”
“बंटी का भी। उसकी आत्मा भी भटक रही है।”
“हां...हां बंटी का भी। तुम दोनों का संस्कार करूंगा। लेकिन तुम्हें मारा किसने, यहां तुम किसके साथ हो?” एकाएक जसबीर वालिया ने कहा –“यहां कोई आदमी भी है। तुम...तुम...।”
“हां। यहां कुछ लोग हैं। उनके बारे में मैं तुम्हें कुछ नहीं बता सकती। क्योंकि इस संसार की बातों से अब मेरा कोई वास्ता नहीं रहा। मेरी दुनिया दूसरी है।” मोनिका की आवाज में दर्द था –“लेकिन मरने के बाद मुझे पता चला कि तुम क्या काम करते हो। तब मुझे बहुत दुख हुआ। तुम कितने मासूमों की जान ले चुके हो। उस विमान में यात्रा करने वाले यात्रियों ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था। कितने यात्री थे विमान में?”
“सौ।” जसबीर वालिया की आवाज में कम्पन उभरा –“सौ से ज्यादा थे?”
“और तुमने क्या किया?”
“म...मैंने...।” जसबीर वालिया ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
मोनिका वैसे ही खड़ी उसे देखती रही।
“मैंने, विमान में बम लगाकर विमान उड़ा दिया।”
“इतने लोगों की जान तुमने ले ली। सैकड़ों परिवार अपने के मर जाने के गम में बैठे रो रहे होंगे। जैसे मेरे और बंटी के मरने पर तुम्हें दुःख-तकलीफ हुई। जैसे ही उनको हुई होगी।” मोनिका दुखी स्वर में कह रही थी –“मरने के बाद मुझे पता चला कि तुम ऐसे काम अक्सर करते हो। राजू भी मिला मुझे। जो विमान बम विस्फोट में मारा गया था। उसकी आत्मा भी भटक रही है। उसने सब कुछ बताया मुझे कि तुम्हारे साथ मिलकर उसने क्या-क्या किया।”
जसबीर वालिया का चेहरा निचुड़-सा गया। टांगों में एकाएक कमजोरी महसूस होने लगी। वो वहीं सोफे पर बैठ गया। बेजान सा हो रहा था वो।
“मैं तो तुम्हें अच्छा इंसान समझती थी। लेकिन मरने के बाद जब मुझे पता चला तो तुमसे घृणा हो गई। कैसे बुरे इंसान हो तुम। अच्छा हुआ मैं मर गई। वरना तुम्हारे साथ रहकर मेरा बाकी का जीवन खराब हो जाता है। मैं...।”
“नहीं मोनिका। ऐसा न कहो।”
“क्यों न कहूं। मेरी और बंटी की मौत को वजह तुम हो।” मोनिका भर्राये स्वर में कह उठी –“जानते हो मेरी जान किसने ली। उसी विमान में सफर करने वाली लोगों की आत्माओं ने। वो पांच-छ: थी। जिन्हें अपनी मौत का और अपने लोगों से बिछड़ने का बहुत दुःख था। वो ही आत्माएं आई और मुझे बंटी को मार दिया। ताकि तुम्हें भी अपनों के मरने का दुख हो। वो आत्माएं तुम्हें तब तक तड़पाएगी जब तक तुम जिन्दा हो। वो तुम्हें छोड़ेंगी नहीं।”
“नहीं मोनिका नहीं। ऐसा न कहो।” जसबीर वालिया के होंठों से कंपकंपाता स्वर निकला –“तुम उन्हें समझाओ कि वो ऐसा न करें। मैं अब कोई भी बुरा काम नहीं करूंगा। किसी को तंग नहीं करूंगा। मैं...मैं किसी की जान नहीं...।”
“आत्मा अपना बदला लेकर रहती है जसबीर। मैं उन्हें नहीं रोक सकती।” मोनिका ने गंभीर स्वर में कहा –“ये तुम्हें पहले सोचना चाहिए था कि तुम बुरे काम कर रहे हो। किसी की जान लेना सबसे बुरा कर्म होता है। लेकिन तुम...।”
“मुझे माफ कर दो मोनिका मैं...।”
“मैं...मैं कौन होती हूं माफ करने वाली। मुझे तो तुमसे हमदर्दी है।” मोनिका ने दुःख भरे स्वर में कहा –“लेकिन तुम किस-किस से माफी मांगोगे? एक-दो हो तो बात भी है। तुम तो सैकड़ों हजारों लोगों के मुजरिम हो। जिन्हें, मारा उनके मुजरिम। जिनके मारे, उनके मुजरिम। तुम्हारे पास तो माफी मांगने के लिए भी शब्द नहीं है।”
जसबीर वालिया की आंखों से आंसू निकल गए। दोनों हाथों से उसने चेहरा ढांप लिया। कुछ पलों तक वो सिसकता रहा फिर अपने पर काबू पाया। चेहरे पर से दोनों हाथ हटाकर मोनिका को देखा।
लेकिन वहां मोनिका नहीं थी।
“मोनिका।” वो तड़प कर उठा और भागा।
उसके दौड़ने की आवाज गूंज उठी।
वो किचन में पहुंचा।
कोई भी नहीं था किचन में।
बाहर निकल कर सारी कॉटेज का जर्रा-जर्रा छान मारा। मोनिका-मोनिका पुकारता रहा। परंतु मोनिका ने भला उसे कहां मिलना था। अजीब सी हालत हो रही थी उसकी। कुछ समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है। क्या होगा आगे। वो किस भंवर में फंसा है। थका-टूटा जब वापस कमरे में आया तो ठिठक गया। चेहरे पर थकान और टूट के भाव था। नजरें टेबल पर।
जहां प्लेट में परांठे और दही की कटोरी थी।
वहां अब कुछ भी नहीं था।
ये कैसे हो सकता है? जसबीर वालिया ने खुद को संभाला। मोनिका की आत्मा ने उसके सामने ही तो परांठे रखे थे। कहां चले गए? वो किचन में आया। देखा। परंतु कहीं भी परांठों का वजूद नहीं था। मोनिका का कोई अहसास नहीं था। एकाएक वो खुद को बेजान महसूस करने लगा था। सब कुछ भ्रम जैसा लग रहा था उसे। मोनिका की आत्मा से बात करना। परांठे रखना फिर गायब हो जाना। कई बार उसे अहसास होता कि सब कुछ महज धोखा है। उसने मोनिका से बात नहीं की। परांठे देखे भी नहीं। लेकिन ये सब तो हुआ था।
जसबीर वालिया खुद को पागल सा महसूस करने लगा।
एकाएक उसके होंठों से गुर्राहट निकली। दांत भिंच गए। वो पागल सा दिखने लगा। खतरनाक फैसला कर लिया था उसने। वो यहां से जाएगा। कोई गोली मारे तो मार दे। लेकिन वो यहां नहीं रुकेगा। वो पलटा और बाहर निकलता चला गया। उसके कदम बाहरी गेट की तरफ बढ़ते रहे। देखते ही देखते वो गेट से बाहर निकलकर दृढ़ कदमों से आगे बढ़ता चला गया। उसे इन्तजार था उन गोलियों का जो किसी भी पल उसके शरीर में आकर धंस सकती थी। परंतु कोई गोली नहीं आई। वो कॉटेज से दूर होता चला गया।
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