देवराज चौहान के खामोश होते ही परेशान सा प्रवेश गोदरा कह उठा।

“ये तो तुमने जो भी करने को कहा है, वो बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं। ये सब करके तो हम सरासर फंस जायेंगे। सबकी नजरों में रह कर, माल समेटना और निकलने की सोचना, पागलपन के अलावा और कुछ भी नहीं है। पुलिस वाले वहां होंगे। प्लेटो सुरक्षा कम्पनी केलोग वहां होंगे। वीडियो कैमरे चल रहे होंगे। हमारी हरकतों और हमारी आवाज रिकार्ड हो रही होगी। हजार-पांच सौ लोग वहां होंगे और तुम कहते हो कि हम पांच लोग अरबों की डकैती डालने में कामयाब हो जायेंगे। वहां से सुरक्षित निकल भी जायेंगे। कोई हमारे पीछे नहीं आयेगा। मुझे नहीं मालूम था कि इतने घटिया ढंग से डकैती डाली जाती है। मालूम होता तो मैं तुमसे बड़ा ही डकैती मास्टर होता।”

देवराज चौहान के चेहरे पर शांत मुस्कान आ ठहरी।

“इसके अलावा एक रास्ता और भी है।” जगमोहन तीखे स्वर में कह उठा- “वहां चलकर सबसे कह देते हैं कि फला-फलां दिन हम डकैती डालने आ रहे हैं कुछ देर के लिए जेवरातों के पास कोई न रहे। जब हम अरबों के जेवरात लूटकर चले जायें तो पुलिस वहां आकर गोलियां चलानी शुरू कर दे कि डकैती हो गयी है।”

“तुम मेरी बात को मजाक में क्यों ले रहे हो?” प्रवेश गोदरा ने दांत भींचकर कहा।

“क्योंकि तुम वाहियात बात कर रहे हो। जगमोहन ने उसे घूरा- “डकैतियां ऐसे ही होती हैं। या तो खामोशी से, या फिर शोर-खराबा डालकर, हथियारों के दम पर। जैसे कि हम करने जा रहे हैं। अरबों की दौलत के सुरक्षा प्रबन्ध ऐसे हैं कि अगर हम सबके जाने के बाद डकैती करेंगे तो रात को वहां रहने वाले पांच गनमैनों के साथ हमारा टकराव होगा ही होगा। वो मरेंगे या हम। खून-खराबा होगा। जबकि हम नहीं चाहते कि खून-खराबा हो”

“इस बात की क्या गारण्टी है कि देवराज चौहान ने जिस ढंग से काम करने को कहा है, उस ढंग से खून-खराबा नहीं होगा।” कमल शर्मा जगमोहन को देखते हुए सोच भरे स्वर में कह उठा।

“कोई गारण्टी नहीं। गारण्टी इस बात की भी नहीं कि हम अरबों की डकैती में सफल हो जायेंगे। देवराज चौहान कोई जादूगर नहीं कि यही बैठे-बिठाये वो सारे जेवरात हमारे पास पहुंच जायेंगे। कुछ भी पाना हो उसके लिए कर्म करना पड़ता है। फल मिलना या न मिलना बाद की बात है।” जगमोहन ने उखड़े स्वर में कहा- “जिस ढंग से देवराज चौहान ने काम करने को कहा है, अगर उस ढंग में खून-खराबा होता है तो वो सामने वाले की गलती से होगा। तब हम सबको वार्निंग दे चुके होंगे कि किसी ने भी कोई हरकत की तो खून-खराबे के हम जिम्मेदार नहीं होंगे। ऐसे में जो भी हमारे बीच रास्ते में आयेगा, सोच-समझ कर आयेगा। अगर रात को खामोशी से काम किया गया तो, तब वार्निंग देना बेमानी होगा। इसके अलावा तब सिक्योरिटी और भी टाईट हो जाती है। जबकि पब्लिक हॉल के भीतर होगी तो सिक्योरिटी वाले बहुत हद तक लापरवाह होंगे कि ऐसे मौके पर कोई गड़बड़ नहीं हो सकती और उनकी इसी सोच का फायदा उठा ले जाना है पैंतालिस मिनट में।”

प्रवेश गोदरा सूखे होठों पर जीभ फेर कर, कमल शर्मा को देखा।

“गोदरा साहब। मेरे ख्याल में ये ठीक कह रहे हैं। हम हिम्मत से काम लें तो सफल हो जायेंगे।”

“मैं ये सब नहीं कर सकता। इतने लोगों के सामने, रिवॉल्वर निकालकर, सब के सामने अरबों के जेवरातों को ले जाने के लिए बहुत बड़ा हौसला चाहिए।” प्रवेश गोदरा ने देवराज चौहान को देखा- “तब तो मैं घबराहट में अपनी टांगों पर भी शायद न खड़ा रह पाउँ। मुझमें ये सब कर गुजरने की हिम्मत नहीं है।”

“ठीक है।” जगमोहन बोला- “तुम यहीं रहना। डकैती के बाद हम तेरे से मिलेंगे और तब तू हमसे लिया, वो एक करोड़ रुपया वापस दे देना। उसके बाद तू अपने रास्ते और मैं”

“तुम बार-बार एक करोड़ को क्यों बीच में लाते हो।” प्रवेश गोदरा गुस्से से भड़क उठा।

“वो हराम का है जो उसे भूल जाऊं?” जगमोहन ने भी उसी के ढंग में कहा।

कुछ पलों के लिए वहां चुप्पी आ ठहरी।

“गोदरा।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “तुम घबरा रहे हो। अगर इतना ही घबराते रहे तो, डकैती नहीं कर सकोगे। हम तो वहां से निकल जायेंगे, परन्तु ये घबराहट तुम्हें फंसा देगी।”

“क्या करूं मैं?” प्रवेश गोदरा की बैचेनी बढ़ती ही जा रही थी।

“अपने विचारों को काबू में रखो, जो तुम्हारे भीतर घबराहट भर रहे हैं। जिस ढंग से डकैती करनी है। कहां-कहां पर क्या करना है। बता दिया है सब कुछ-उन सब बातों पर गौर करो। इस तरह सोचो कि जैसे तुम कर रहे हो। तब किस तरह वहां से हालातों को सम्भालना है। पैंतालीस मिनट का खेल है। उसके बाद सामने अरबों की दौलत होगी। दस अरब तुम्हारे हैं। ये सब बातें तुम्हें हौसला देगी। तुममें जोश भर देगी।”

“बेटे- “जगमोहन होठों ही होठों में बड़बड़ा उठा- “दस अरब तो क्या तेरे को दस रुपये नहीं मिलने। हमें ब्लैकमेल करके तू, हमारे साथ आ मिला है। काम हो जाने दो। डण्डे मार कर दौड़ा दूंगा तेरे को।”

प्रवेश गोदरा ने पहलू बदला। वो अपने पर काबू पाने की चेष्टा कर रहा था।

“शर्मा को देखो।” देवराज चौहान बोला- “वो नहीं घबरा रहा है। इस बात को स्वीकार कर चुका है कि दौलत पाने के लिए, खतरों के बीच जाकर तो खड़े होना ही पड़ेगा।” देवराज चौहान ने पुन: कहा।

“शर्मा की बात और है। ये ऐसे उल्टे काम एक-दो बार कर चुका है।” प्रवेश गोदरा खुद को संभालता जा रहा था- “मैं अपने को ठीक कर लूंगा। सच में इस वक्त मैं यहीं सोच रहा हूं कि तुम्हारे बताये ढंग से मैं डकैती कर रहा।”

तभी सोहनलाल ने टोका।

“अपनी मैडम ईरानी को मत बताना कि डकैती कैसे होगी। बात बाहर जाने का मतलब है, डकैती का फेल होना।”

“कसम से। कसम खाकर कहता हूँ कि यहां होने वाली बातें मैं उससे या किसी से भी नहीं कहूंगा।”

सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगाई।

तभी कमल शर्मा बोला।

“एक बात बार-बार मेरी सोचों में आ रही है।”

“जो मन में आये। वो बात बाहर अवश्य निकालो।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

“जब हम डकैती करके निकलेंगे तब जरूरी तो नहीं कि हम सब एक साथ ही हों।” कमल शर्मा ने उसे देखा।

देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभर आयी।

“सच बात तो ये है कि हमें डकैती के बाद वहां से अलग-अलग निकलना होगा। ताकि कोई हमारे पीछे आये तो वो हम पर हाथ डालने में कामयाब न हो सके। अपनी सुरक्षा के लिए हममें से किसी ने किसी वरिष्ठ नागरिक को रिवाल्वर अपने साथ रखा होगा और किसी ने किसी को। जब लगेगा कि खतरा नहीं है तो उन्हें रास्ते में उतार दिया जायेगा।”

“यानि कि डकैती होते ही हम अलग-अलग हो जायेंगे। अरबों की कीमत के जेवरात किसी एक के पास होंगे।”

“जुदा होने के बाद हमारी मुलाकात कैसे होगी? जेवरात वहां से लेकर कौन निकलेगा?”

देवराज चौहान के चेहरे पर अभी भी मुस्कान मौजूद थी।

“मैं जानता था कि तुम इसी बात पर आओगे।” देवराज चौहान ने कमल शर्मा को देखा- “तुम्हारा सवाल सही भी है। डकैती के बाद बिखर गये तो हमें कहां मिलना है। अरबों के जेवरात लेकर कहां पहुंचना है। जहां पहुंचना है, वो जगह मैंने चुन रखी है। परन्तु उसके बारे में किसी को बताया नहीं है और अभी बताऊंगा भी नहीं। जब डकैती का माल लेकर निकलना होगा, तभी उस जगह के बारे में बताऊंगा। डकैती की दौलत जेवरात लेकर जगमोहन सबसे पहले निकलेगा। उसके साथ तुम दोनों में से कोई एक होगा।” देवराज चौहान शर्मा और गोदरा को देखा।

“हम दोनों में से एक-?” गोदरा के होठों से निकला।

“हां और जो बचेगा, वो मिनट भर बाद सोहनलाल के साथ बाहर निकलेगा। सुरक्षा के मद्देनजर किसी व्यक्ति को गन के निशाने पर रखा होगा। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं।”

“तुम सबके बाद में निकलोगे?” जगमोहन बोला।

“लेकिन जहां पहुंचना है, वहां का पता पहले बता देने में क्या हर्ज है?” गोदरा बोला।

“हर्ज ये है कि कोई पुलिस के हाथों में पड़ गया तो, उस पते के के बारे में मुंह खोल सकता है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर कहा- “इस पर भी डकैती के बाद मेरी बताई जगह पर हमारी वहां मुलाकत न हुई तो, मुलाकात करने के लिए हर रोज सात दिन तक दोपहर के बारह बजे मैरिन ड्राईव के ठीक ऊपर पुल पर आधे घंटे के लिए आयेगा। यानि कि वो जगह हमारी मुलाकात का सैंटर प्वाईंट होगा, अगर किसी वजह से हम अलग हो गये तो।”

“ये बात मुझे जंची” गोदरा ने सिर हिलाया।

“क्या मैं विश्वास करूं कि डकैती के बाद, बेशकीमती जेवरातों को लेकर, किसी के मन में बेईमानी नहीं आयेगी?” शर्मा बोला।

“चिन्ता मत कर।” जगमोहन बोला- “तुम्हारा हिस्सा तो मैं मदन डेयरी दूध में धोकर दूंगा। मेरा वादा है ये। मैं जिससे वादा कर लेता हूं वो मेरे वादे को हमेशा याद रखता है।”

कमल शर्मा ने सहमति से सिर हिलाया।

“ये सब बातें तो हुई।” देवराज चौहान ने कहा- “डकैती कैसे करनी है, जान लिया है तुमने। साथ-साथ अब ये भी सोचते रहो कि किसी वजह से, डकैती, उस हॉल में ही फेल हो गयी तो, पुलिस ने वहीं हमें गिरफ्तार कर लेना है। जितने चांसिस डकैती सफल होने के हैं, उतने ही इस बात के हैं।”

“लेकिन गड़बड़ होगी कैसे?” गोदरा के होठों से निकला।

“वहां पर ज्यादा संख्या में लोग मौजूद होंगे। उनमें से कई ऐसे भी बहादुर

हो सकते हैं, जो रिवॉल्वरों की परवाह न करके हमसे मुकाबला करने पर आमादा हो जाये। ऐसे कामों में, ऐसे वक्त में, अक्सर ऐसी मुसीबतें भी खड़ी हो जाती हैं। इसलिए हर तरफ के हालातों पर सोच-समझ कर चलना है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है।”

देवराज चौहान सब पर नजर मारता हुआ बोला- “योजना को बेहतर करने की कोई राय देना चाहे तो बेशक दे सकता है।”

“जो दो व्यक्ति पीठ पर नकली बारूद के थैले लिए मौजूद होंगे, वो जानते होंगे कि भीतर क्या हो रहा है।” जगमोहन ने पूछा।

“मैंने तो उन्हें नहीं बताया, लेकिन वो इतने बेवकूफ नहीं होंगे “ये जान कर कि भीतर इतनी बड़ी डकैती हो रही है वो गड़बड़ नहीं करेंगे क्यूंकि उन्हें काम की कम कीमत मिल रही है। जबकि वो डकैती करने वालों का साथ दे रहे हैं। बाहरी हालातों को संभाल रहे हैं।”

“क्या गड़बड़ कर सकेंगे वे। तब वो इस स्थिति में नहीं होंगे कि पुलिस को कुछ बता सके। वो जानते होंगे कि पुलिस के पास जाने से वो बच नहीं सकेंगे। पुलिस उन्हें ही पकड़ लेगी। वो चुप ही रहेंगे। इस पर भी उन्होंने कोई गड़बड़ करने की चेष्टा की तो हमारा कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्योंकि मामले का असली सिरा तो हमारे ही हाथों में होगा।”

दो पलों के लिए उनके बीच चुप्पी रही।

तभी जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा।

“तुमने कहा था कि सिर्फ एक बात सारी योजना को फेल कर सकती है।”

“हां।” देवराज चौहान के चेहरे पर गम्भीरता आ ठहरी।

“क्या बात?”

सबकी निगाह देवराज पर आ ठहरी।

“तुमने कहा था कि पलक झपकते ही डकैती को असफल किया जा सकता है।”

“यही कहा था।”

“ऐसा कैसे हो सकता है?” सोहनलाल के माथे पर बल नजर आने लगे।

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और शांत स्वर में बोला।

“उस दौरान अगर इंस्पेक्टर वानखेड़े वहां आ गया, जो कि आ भी सकता है, तो वो हमारी सारी मेहनत पर पानी फेर देगा।”

“वानखेड़े?” जगमोहन के होठों से अजीब सा स्वर निकला।

सोहनलाल ने बेचैनी से पहलू बदला।

गोदरा और शर्मा की नजरें मिली।

“ये कैसे सम्भव है कि इंस्पेक्टर वानखेड़े उस वक्त वहां आया तो, हमारी डकैती असफल हो जायेगी।” जगमोहन बोला- “ये मेरी समझ में जरा भी नहीं आयी?”

“मैंने पहले ही कहा था कि इस बात को कोई सोच भी नहीं सकता।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में कह उठा- “वानखेड़े मेरे काम करने के ढंग को जानता है। वो जानता है कि डकैती के दौरान, दौलत के लिए मैं किसी की जान नहीं लूंगा। जितनी अच्छी तरह मैं इस बात को विश्वास के साथ जानता हूं उतनी ही अच्छी तरह वानखेड़े इस बात से वाकिफ है। ऐसे में वो ठीक वक्त पर वहां आ गया तो हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे।”

चुप्पी सी छा गयी वहां

मिनट भरे की खामोशी के बाद जगमोहन बोला।

“वानखेड़े इस हीरे-जेवरातों की प्रदर्शनी में दिलचस्पी ले रहा है। वो उस हॉल का वो फेरा भी लगा चुका है। उसने शायद प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के मालिक विवेक बंसल को फोन करके, तुम्हारे बारे में सतर्क रहने को भी कहा होगा। ऐसे में वो कभी भी वहां आ सकता है। न ही आये तो भी बड़ी बात नहीं...”

तभी कमल शर्मा कह उठा।

“तुम डकैती के दौरान दौलत पाने के वास्ते किसी की जान नहीं लेते। ये जुदा बात है। लेकिन तुम्हारे साथ हम भी तो हैं हम शूट कर सकते हैं जरूरत पड़ने पर। ये बात तो...”

“काम के दौरान मैं या मेरे साथियों में कोई फर्क नहीं होता।”

देवराज चौहान ने कहा- “अपनी जान पर आ बने तो जुदा बात है। वरना थोड़ी सी बात पर कोई किसी की जान नहीं लेगा। इस बात को अच्छी तरह अपने दिमाग में बिठा लो। कोई भी खामखाह किसी की जान नहीं लेगा। किसी पर काबू पाना हो तो उसकी टांग पर गोली चलाई जा सकती है।”

“ये क्या बात हुई?” गोदरा के होठों से निकला।

“डकैतियां करता हूं मैं, दौलत हासिल करने के लिए। मासूमों की जान नहीं लेता।” देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबा कर कहा- “कोई अड़चन बने तो उसे घायल किया जा सकता है। मेरे साथ काम करना है तो मेरे ढंग से चलना होगा।”

गोदरा या शर्मा फिर कुछ नहीं बोले।

“अगर वानखेड़े उस वक्त वहां पहुंच गया तो फौरन समझ जायेगा कि जो दो आदमी, मुंह बांधे, पीठों पर थैलों को बांधे मौजूद हैं, वो बोगस हैं। थैलों में बारूद नहीं है। ये खोखली धमकी है।”

“कोई जरूरी तो नहीं कि डकैती के दौरान वानखेड़े वहां आये।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“बिल्कुल जरूरी नहीं।” देवराज चौहान ने इंकार में सिर हिलाया- “लेकिन आ गया तो सब कुछ खत्म हो जायेगा। ऐसे में हम पुलिस के फंदे में फंस सकते हैं। काम इस ढंग से करना है कि किसी के आने का डर मन में न रहे।”

जगमोहन ने पहलू बदला।

सोहनलाल उठा और कश लेते हुआ टहलने लगा।

“मन में कोई शंका हो तो उसे ठीक करके आगे बढ़ना चाहिए। आंखों बंद करके डकैती जैसा काम नहीं किया जाता।”

सोहनलाल ने ठिठक कर देवराज चौहान को देखा।

“क्या कहना चाहते हो?”

“कुछ देर के लिए वानखेड़े का आजाद रहना ठीक नहीं।”

देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।

“उसे कैद करोगे?” जगमोहन चौंका।

“हां कुछ देर के लिए उसे बंधक बना कर रखना होगा।”

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली।

“शर्मा, ये तो नई मुसीबत शुरू हो गयी-।” गोदरा के होंठों से निकला।

“इस मामलों में देवराज चौहान इससे बेहतर जानता है कि क्या करना है और क्या नहीं” कमल शर्मा ने सोच भरे स्वर में कहा।

“वानखेड़े पर हाथ डालना आसान काम नहीं है।” जगमोहन बोला।

“मैं जानता हूं। लेकिन ये काम भी अब, हमारी डकैती का हिस्सा बन गया है।” देवराज चौहान एक-एक शब्द चबाकर सख्त से स्वर में कह उठा- “जैसे भी हो, ये काम तो करना ही है।”

“वानखेड़ेको कैसे फंसायेंगे।” जगमोहन व्याकुल हो उठा- “कहां रखेंगे उसे कैद में। हमारे पास कोई ठिकाना नहीं, जहां उसे कैद में रखा जा सके। हमारे पास वक्त नहीं कि, वानखेड़े पर पूरी तरह ध्यान दिया जाये। हमें डकैती पर ध्यान देना है। वानखेड़े पर हाथ डालना मामूली काम नहीं जो...”

“इसके लिए किसी से बात करनी पड़ेगी। वानखेड़े पर हम हाथ डालेंगे और रखेगा कोई दूसरा।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “इस काम में नोट काम करेंगे।”

“वो कैसे?”

“मैं बताता हूं तुम सब को वानखेड़े के मामले में कैसे काम करना है। ये काम आज या कल तक पूरा हो जाना चाहिए।” इसके साथ ही देवराज चौहान बताने लगा।

☐☐☐

प्लेटो सुरक्षा कम्पनी के मालिक विवेक ने मेजर खन्ना और प्रशांत यादव पर निगाह मारी। खार के नौवें रास्ते स्थित अपने ऑफिस में मौजद थे।

“मेरे ख्याल से हीरे-जेवरात की सुरक्षा के प्रबन्ध इससे ज्यादा बेहतर नहीं किया जा सकते।” विवेक बंसल ने राय लेने वाली निगाहों से दोनों को देखा- “आखिर तीन दिन जेवरातों को बेचने के लिए हॉल में रखा जायेगा, तब खुद-ब-खुद ही सुरक्षा व्यवस्था और भी बढ़ जायेगी। क्योंकि वहां खरीददारों के तौर पर और भी लोग होंगे।”

“मैं कब से कह रहा हूं कि ऐसी सुरक्षा व्यवस्था के बीच, कोई भी जेवरातों पर हाथ मारने में सफल नहीं हो सकता।” मेजर खन्ना विश्वास भरे स्वर में कह उठा- “सब ठीक रहेगा।”

प्रशांत यादव कह उठा।

“सर। रात बारह बजे जब प्रदर्शनी बंद होगी। तब इस बात के ज्यादा चांसिस हैं कि कोई जेवरातों पर हाथ साफ करने के लिये हॉल में घुसने की कोशिश करे। लेकिन बाहर मौजूद सिक्योरिटी बहुत टाईट है। भीतर पांच गनमैन मौजूद होंगे। कंट्रोल रूम में मौजूद सिक्योरिटी वाले, वीडियो कैमरों के जरिये हॉल में नजर रख रहे होंगे। मेरा मतलब है कि कोई भी जेवरातों तक पहुंचने में सफल नहीं हो सकता।”

“वही तो मैं कह रहा।” मेजर खन्ना ने कहना चाहा।

फोन की बेल हुई।

विवेक बंसल ने रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“विवेक बंसल?” वानखेड़े था दूसरी तरफ।

“जी हां-आप...”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े।”

“ओह, वानखेड़े साहब। माफ कीजियेगा, मैं आपकी आवाज नहीं पहचान सका।” विवेक बंसल के होठों पर मुस्कान उभरी- “एक ही बार आपसे बात हुई थी, लेकिन आज के बाद आपकी आवाज पहचान लूंगा।”

“कोई बात नहीं। हीरे-जेवरातों की सिक्योरिटी के बारे में तसल्ली है तुम्हारी?”

“जी हां। सब कुछ ठीक है। देवराज चौहान ने वहां कुछ काने की कोशिश की तो सफल नहीं हो सकेगा।”

“जरूरी नहीं कि ऐसा हो। मैंने तो तुम्हें देवराज चौहान के प्रति सतर्क किया था।”

“सर। मैंने आपकी बात को पूरी तरह ध्यान में रखा है।”

“गुड! फोन रखता हूं।”

“क्या आपके पास कोई खबर है कि देवराज चौहान कुछ करेगा?”

“नहीं। मैंने पहले और अब, सिर्फ व्यक्तिगत तौर पर ही बात की है।” इसके साथ ही लाईन कट गयी।

☐☐☐

वानखेड़े ने रिसीवर रखा। चेहरे पर सामान्य भाव थे। कुर्सी पर बैठे इंस्पेक्टर शाहिद खान ने मुस्कुराकर, उसे देखा और हाथ में पकड़ा पैन, खुली फाईल पर रखता हुआ कह उठा।

“सर! क्या आपको नहीं लगता है कि इस बार आप देवराज चौहान में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। उसके बारे में कोई खबर नहीं कोई हवा नहीं। फिर भी…”

“शाहिद।” वानखेड़े मुस्कुराया- “सुनने में आ रहा है कि उस हॉल में तीस अरब के हीरे-जेवरात एक साथ मौजूद होंगे। देवराज चौहान ऐसा मौका कभी नहीं छोड़ेगा। अगर वो देश से बाहर हुआ तो जुदा बात है।”

“सिक्योरिटी बहुत सख्त है वहां।” शाहिद खान बोला।

“तुम ठीक से नहीं जानते देवराज चौहान को।” वानखेड़े सिग्रेट सुलगाते हुए कर उठा- “मैंने उसकी आदतों में ये बात नोट की है कि वो दौलत के लिये कम और मजे के लिये डकैती ज्यादा करता है। ऐसी जगह डकैती करने में वो ज्यादा दिलचस्पी लेता है, जहां सिक्योरिटी टाईट हो। सामान तक पहुंचने का रास्ता न हो।”

शाहिद खान की निगाह देवराज चौहान पर थी।

“जरूरी नहीं कि वो जेवरातों पर हाथ डाले। फिर भी सोचना और सावधानी से काम लेना हमारी ड्यूटी में आता है चूंकि देवराज चौहान की फाईल मेरे पास है तो, मुझे हर तरफ नजर रखनी पड़ती है। इतनी बड़ी रकम देवराज चौहान की दिलचस्पी का कारण बन सकती है। इसलिए मैंने विवेक बंसल को सतर्क कर दिया”

“सर। एक बार देवराज चौहान हाथ में आ जाये तो।”

“हाथ में वो आ चुका है। दो बार मैं उसे गिरफ्तार भी कर चुका है, लेकिन वो निकल भागा। उसका कहना है कि मैं उसे जेल में नहीं रख सकता और मैं उसे जेल में कैद रखकर दिखाऊंगा।” वानखेड़े द्रुण स्वर में कह उठा- “कानून तोड़ता है, मुजरिम है वो। उसकी सजा उसे मिलनी चाहिये।”

“आप तो कई बार उसकी तारीफ करते हैं।”

“हां शाहिद। देवराज चौहान कई बातों में तारीफ के काबिल है।” वानखेड़े ने सिर हिलाकर गम्भीर स्वर में कहा- “कुछ दिन पहले ही उसने मेरे लिये कानून और देश के भले के लिए छोटा भाई को, शूट करके, उससे नोट छापने वाली सरकारी प्लेटें हासिल करके मुझे लौटाई। लेकिन वो कानून तोड़ता है, उससे आम जनता को तकलीफ नहीं होती। खाम-खां किसी की जान नहीं लेता। दौलत पाने के लिये खून नहीं करता। उसके हाथों अधिकतर वो ही मरते हैं, जो कानून के लिये सिरदर्द होते हैं। या वो जो उसके साथ हेरा-फेरी-धोखाधड़ी, गलत काम करते हैं। उसे दौलत की ही तरह किसी इन्सान के बारे में मालूम हो जाये कि उसकी हरकत देश को गम्भीर नुकसान दे रही है, या वो देश का गद्दार है तो वो उसे नहीं छोड़ता।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान ने गहरी निगाहों से उसे देखा।

“आप तो उसके हक की बात कर रहे हैं।”

“मैं सच कह रहा हूं।” वानखेड़े गम्भीर था।

“अगर कभी वो गिरफ्तार होकर अदालत पहुंचता है तो क्या इन बातों का जिक्र करेंगे. आप?”

“जरूरत पड़ी तो जरूर करूंगा। अदालत में हर बात सच कहूंगा।

देवराज चौहान की एक-एक डकैती के बारे में बताऊंगा। उसकी बुराईयों और अच्छाईयों के बारे में बताऊंगा। अदालत को देवराज चौहान के बारे में बताना मेरा काम है। ये देखना अदालत का काम है कि उसे क्या सजा मिलनी चाहिये।”

“अजीब बात है सर। पुलिस का काम है अपराधी को कानून से सजा दिलवाना।अदालत से सजा दिलवाना। ऐसे में पुलिस अपराधी को बुरा-से-बुरा बनाकर पेश करती है। और आप अदालत में देवराज चौहान की तारीफ के बारे में।”

“गलत कह रहे हो। मैं किसी की तारीफ नहीं करता। अदालत में शपथ लेकर सच बोलना हमारा काम है। किसी की बुराईयों का हम गुणगान करते हैं तो उसकी अच्छाईयों का जिक्र करते हुए हमें पीछे नहीं हटना चाहिये।” वानखेड़े शांत स्वर में कह रहा था- “कुछ बार ऐसा हो चुका है कि मैं कानून के लिये देवराज चौहान को पकड़ना चाहता था। उसके पीछे था। ये सब जानते हुए भी देवराज चौहान ने अपनी जान खतरे में डालकर, मेरी जान बचाई। इस बारे में क्या कहोगे कि वो पागल है।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान उसे देखता रहा। बोला कुछ नहीं।

“देवराज चौहान दौलत के लिये कानून तोड़ता है। और भी कई वजहों के लिये कानून तोड़ता है लेकिन इन्सानियत है उसमें। किसी की जान की कीमत जानता है वो। पुलिस की वर्दी की भी इज्जत करना आता है उसे। वो।”

तभी फोन की बेल बजी।

“हैलो।” शाहिद खान ने रिसीवर उठाया- “इंस्पेक्टर शाहिद खान दिस साईड।”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े से बात करनी है।” प्रवेश गोदरा की धीमी आवाज उसके कानों में पड़ी- “कई जगह फोन लगाया, लेकिन उनसे बात नहीं हो पायी। आपका नम्बर दिया कि वानखेड़े साहब आपके पास हो सकते हैं।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान की निगाह वानखेड़े की तरफ उठी।

“आप कौन हैं?”

“जनता का सेवक समझ लीजिये।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान के होंठ सिकुड़े।

“जनता के सेवक का कोई नाम तो होगा?”

वानखेड़े की निगाह, शाहिद खान पर जा टिकी।

“सेवक की सेवा देखिये। नाम का क्या करना है। इंस्पेक्टर वानखेड़े साहब से कहां बात हो सकेगी। बहुत जरूरी बात है। उनके काम की है। मेरे से बात करके उन्हें मजा आ जायेगा।”

“यहीं हैं, लो बात करो।” कहने के साथ ही शाहिद खान ने वानखेड़े की तरफ रिसीवर किया- “कोई आपसे बात करने के लिये जगह-जगह फोन कर रहा है। मेरे ख्याल में उसके पास कोई खास खबर है।”

वानखेड़े ने रिसीवर लिया।

“कौन हो तुम?”

“कौन साहब हैं?” गोदरा का संभला हुआ शांत स्वर कानों में पड़ा।

“इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े। तुम मुझसे बात करना चाहते हो?”

“हां, जनाब-कई जगह फोन किया। आखिर कार जवाब मिला कि है तो आप पुलिस हैडक्वाटर में ही। लेकिन कहां, ये मालूम नहीं। फिर ये नम्बर दिया कि शायद आप यहां...।”

“तुम कौन हो?”

“इंस्पेक्टर साहब। मेरे नाम-पते से आपको क्या लेना-देना। फिर भी काम हो जाने के बाद नाम-पता भी बता दूंगा और आप चाहेंगे तो हमारी छोटी-सी मुलाकात भी हो सकती है।”

“कहना क्या चाहते हो?”

“पहले तो पूछना चाहता हूं कि किसी बड़ी घटना को रोकने या नामी अपराधी को पकड़वाने में पुलिस इनाम देती है क्या?”

“क्यों नहीं-ऐसा कुछ हो तो जरूर इनाम देती है। तुम कहना क्या चाहते हो?”

“इनाम एडवांस में मिल सकता है क्या?”

वानखेड़े समझ गया कि दूसरी तरफ जो भी है, संभलकर इससे बात करनी होगी।

“तुम इनाम की फिक्र मत करो मैं।”

“जनाब। मुझे तो इनाम की फिक्र है, तभी आपसे बात कर रहा हूं। नहीं तो मुझे क्या पड़ी है दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की। आप ये बताईये कि कितना इनाम मिलेगा? पूरी नहीं तो आधा ही, एडवांस में अवश्य चाहिये।”

“जब तक तुम बताओगे नहीं कि मामला क्या है। इनाम की बात कैसे तय हो पायेगी।” वानखेड़े के चेहरे पर तीखे भाव उभरे।

“हां। ये बात तो आपकी भी ठीक है।” प्रवेश गोदरा का स्वर कानों में पड़ रहा था- “लेकिन इंस्पेक्टर साहब, बात मुंह से निकली और पराई हो गयी। इनाम की रकम आप हजम कर गये तो, मेरा क्या होगा।”

“मुझ पर विश्वास रखो। ऐसा नहीं होगा। तुम एक जिम्मेवार पुलिस अधिकारी से बात कर रहे हो।”

“हां साब। किसी ने ये तो बताया था कि आप ईमानदार हैं।”

लाईन पर चुप्पी छा गयी।

“बता रहे हो?”

“ठीक है इंस्पेक्टर साहब। आप पर भरोसा करके बता देता हूं इनाम की रकम डूबी तो सबको बता दूंगा कि वो आप खा गये।”

वानखेड़े ने अपने गुस्से को दबाकर सब्र से काम लिया।

“मुझ पर भरोसा रखो। तुम कुछ बताने जा रहे थे।”

“हां इंस्पेक्टर साहब। आप जरा ये बताईये कि किसी होटल में हीरे-जेवरात रखे जा रहे हैं।”

वानखेड़े चौंका।

“हीरे-जेवरात?” उसके होठों से निकला।

“हां। किसी होटल में रखे जा रहे हैं क्या?”

“ठीक कहा तुमने।” वानखेड़े ने खुद को संभाला।

“बहुत कीमती हैं वो?”

“हां”

“उन पर डकैती पड़ने वाली है।”

“डकैती?” हक्का-बक्का रह गयो वानखेड़े।

“जी हाँ। तभी तो मैंने आपको फोन किया। किसी ने बताया कि आप देवराज चौहान को पकड़ना चाहते...।”

“देवराज चौहान?” सकते में रह गया वानखेड़े।

“जी हां। तभी तो मैंने आपको फोन किया। किसी ने बताया कि आप देवराज चौहान को पकड़ना चाहते।”

“देवराज चौहान?” वानखेड़े फौरन खड़ा हो गया।

“वो ही तो डकैती करेगा। तभी तो आपको फोन किया कि...”

“तुम्हें कैसे पता चला ये सब?”

“अन्दर की बात है इंस्पेक्टर साहब। सब कुछ फोन पर ही सुनेंगे क्या। बीच में कोई सुन लेगा। तब मेरे इनाम की रकम।”

“मुझसे मिलो। कहां मिलोगे?”

“पुलिस वालों से मिलने में मुझे डर लगता है। मैं शरीफ बंदा।”

“शरीफों के साथ पुलिस शराफत से पेश आती है। तुम्हें इनाम लेना है ना?”

“ह-हां-क्यों नहीं, तभी तो।”

“बोलो, कहां मिल रहे हो मुझसे। मेरा तुमसे बात करना जरूरी है।”

प्रवेश गोदरा की आवाज नहीं आई।

“हम दोनों का मिलना जरूरी है।” वानखेड़े अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा।”

“वो तो मैं समझ रहा हूं। ठीक है, आप मांटुगा के दूसरे चौराहे के पास की पार्किंग में मिलें, तीन घंटे बाद।”

“पहुंच जाऊंगा वहां, लेकिन तीन घंटे बाद क्यों-अभी क्यों नहीं?”

“आपकी शादी हो गयी?”

“क्या मतलब?”

“आपकी शादी हो गयी क्या?”

“नहीं।”

“तभी तो-आप समझ नहीं सकेंगे मेरी हालत ! वो दरअसल क्या है कि मेरी बीवी ने एक बार मुझे पड़ोस की औरत के साथ कहीं देख लिया था। बस, तब से तो उसने मेरे आने-जाने का ब्यौरा बना रखा है कि मैं किधर जाता हूं। क्यों गया? किससे मिला। फालतू में मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देती। कोई काम न हो तो कहती है, सामने बैठ जाओ और खुद सब्जी काटती रहेगी। क्या कहूं अपनी हालत के बारे में। आपसे मिलने आना है तो अभी से बहाना मारकर कोशिश शुरू करूंगा तो तीन घंटे बाद मांटुगा पहुंच सकूँगा।”

वानखेड़े ने वॉल क्लॉक पर निगाह मारी।

“दोपहर के तीन बज रहे हैं। पांच बजे मिलोगे वहां?”

“अगर न आ सके तो?”

“इंस्पेक्टर साहब, इनाम का मामला है पहुंचूंगा क्यों नहीं। जरूरत पड़ी तो बीवी को भी साथ लेता आऊंगा। एक बात...”

“क्या?”

“इंस्पेक्टर साहब। आजकल हाथ जरा तंग चल रहा है। ज्यादा नहीं, सिर्फ हजार रुपया लेते आईयेगा। इनाम की रकम मिलते ही वापस कर दूंगा। इतना तो विश्वास होगा ही आपको मुझ पर।” गोदरा की दांत फाड़ती आवाज कानों में पड़ी।

“हजार रुपया लेता आऊंगा।”

“नमस्कार इंस्पेक्टर साहब। तीन घंटे बाद मिलेंगे, मांटुगा की पार्किंग में।” इसके साथ ही रिसीवर रख दिया गया था।

वानखेड़े ने रिसीवर रखा। चेहरे पर सोच के भाव थे।

इंस्पेक्टर शाहिद खान की निगाह वानखेड़े पर थी।

“क्या मामला है सर।आप डकैती और देवराज चौहान की बात कर रहे थे।” शाहिद खान ने पूछा।

वानखेड़े ने शाहिद खान को देखा फिर होंठ सिकोड़े कह उठा।

“कुछ घंटे बाद बात करना। सब बताऊंगा। मेरा ख्याल ठीक निकला। शायद देवराज चौहान हीरे-जेवरातों की डकैती करने के फेर में है।”

“ओह।’

☐☐☐

देवराज चौहान ने एक-एक करके सौ-सौ की दस गड्डियां टेबल पर रख दी।

“तीन दिन के लिये एक आदमी को कमरे में बंद रखने की ये कीमत कम नहीं है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा। ये आठ बाई दस का छोटा-सा कमरा था। जिसमें दम घुटने का एहसास बराबर हो रहा था। कमरे का दरवाजा लकड़ी का पुराने की का था। बंद करने के लिये सांकल (जंजीर) लटक रही थी। छत लाल पत्थर की सिल्लियों की थी। ये जगह जाने कितनी पहले बनी थी।

धारावी का इलाका था ये। तंग छोटी गलियों में से गुजरकर इस नम्बर के मकान को ढूंढते यहां पहुंचा था। वरली के एक दारुखाने से यहां का पता मालूम हुआ था देवराज चौहान को कि, इस पते पर मदनलाल नाम का आदमी मिलेगा। वो दादागिरी वाले काम करता है। देवराज चौहान यहां पहुंचा। मदनलाल मिला। बात हुई, देवराज चौहान ने कहा कि एक आदमी को तीन दिन के लिये कैद रखना है। उसने फौरन हां कही। पचास हजार रुपये मांगे तो उसके सामने लाख रुपये रख दिया गये।

पचास बरस का मदन लाल हैरान-सा हुआ।

“मैंने पचास हजार कहा था और तुमने एक लाख…”

“तुम्हारा हौसला बढ़ाने के लिये बाकी के पचास हजार हैं।” देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई।

“क्या मतलब?”

“जिसे कैद में रखना है, वो पुलिस वाला है। ये सुनकर तुम भाव बढ़ाओ, मैंने पहले ही रकम डवल कर दी।”

“पुलिस वाला?” वो चौंका।

“हां”

“चक्कर क्या है?”

“अगर तुम मुफ्त में काम कर दोगे तो’चक्कर बता देता हूं।” देवराज चौहान को गहरी निगाहों से, मदनलाल देखने लगा।

“तुमने अपने बारे में नहीं बताया?” मदनलाल ने एकाएक कहा।

“तेरे को लाख रुपये अच्छे नहीं लग रहे। किसी दूसरे के पास जाऊं क्या?”

“तुम्हारा काम हो जायेगा।” एकाएक मदनलाल मुस्करा पड़ा।

देवराज चौहान ने रिवॉल्वर निकाली और रुख उसकी तरफ कर दिया।

मदनलाल का चेहरा फक्क हुआ।

“ये ये...”

“अब मैं तुम्हें अपना परिचय देने जा रहा हूं। ऐसा करना मुझे जरूरी लगा। क्योंकि तुम्हारी नियत लाख रुपये की तरफ ज्यादा है और जो काम मैंने कहा है, उस पर ध्यान कम है।”

“ऐ-ऐसी बात नहीं...।” मदनलाल ने कहना चाहा।

“ऐसी बात नहीं है तो फिर भी जान ले, मैं देवराज चौहान हूं। पुलिस से लेकर तुम जैसे लोग और अखबार पढ़ने वाले मेरे बारे में अच्छी तरह जानते हैं कि...

“तुम-देवराज चौहान?” वो चौंका।

“हां।”

“ड-ड-डकैती मास्टर?”

“हां”

मदनलाल ने सूखे होठों पर जीभ फेरी और सीधा होकर बैठ गया।

“स-सच कह रहे हो कि तुम...”

‘कहीं से पुरानी-नई अखबार ढूंढ-ढांढ के मेरी छपी तस्वीर देख लेना। आगे सुन-एक पुलिस वाले को तूने तीन दिन अपने पास रखना है। सख्त पहरा। बाहर की हवा भी उसे न मिले। उसके बाद उसे छोड़ देना। मारपीट नहीं होनी चाहिये। खाना-पीना वक्त पर उसे मिले। इस बारे में उनकी कोई शिकायत मेरे पास न आये।”

“समझ गया।” उसने दायें-बायें सिर हिलाया।

“इस काम के लिये लाख रुपया कम है तो बोल, और दे देता हूं।”

“ब-बहुत है देवराज चौहान।”

देवराज चौहान हाथ में दबी रिवॉल्वर हिलाता हुआ बोला।

“हममें जो बात तय हुई है, सब कुछ वैसा ही हो। वरना।”

“सब कुछ वैसे ही होगा। तुम तो अपने भाई निकले। ये बताओ शिकार कहां है?”

“शिकार तुम्हें आज मिल जायेगा। इस काम में विश्वास के बंदे साथ लेना। वरना।”

“चिन्ता मत करो। तुम्हारा काम कहीं भी गड़बड़ नहीं होगा।”

देवराज चौहान ने रिवॉल्वर वापस जेब में रखी।

“उठो। मेरे साथ चलो। अपने साथियों को कहां से...”

“बगल की गली में ही हैं।” मदन लाल ने उठते हुए टेबल पर, पड़ी गड्डियां संभाल ली- “अभी उन्हें लाया।”

“मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”

“जैसा तुम ठीक समझो।” गड्डियों को उठाकर वो पुरानी-सी अलमारी में रखता हुआ बोला- “मामूली-सा काम है ये। पहले बता देते कि तुम देवराज चौहान हो तो कसम से, एक पैसा भी न लेता और।”

“अब क्यों ले रहे हो। वापस लौटा दो गड्डियां।” देवराज चौहान के चेहरे पर शांत मुस्कान उभरी।

“माया न आये तो, कोई बात नहीं आती माया को लौटाना मेरी मां कहती थी अच्छा शगुन नहीं होता।”

☐☐☐

वानखेड़े ठीक वक्त पर मांटुगा की पार्किंग में जा पहुंचा। शाम हो चुकी थी। लोग पार्किंग में पहुंचकर, वापस जाने की तैयारी में थे। यूं कि आज छुट्टी का दिन था। इसलिये ज्यादा भीड़ नहीं थी। इस वक्त वानखेड़े को सबसे ज्यादा परेशानी इसलिए हो रही थी, जिससे उसने यहां मिलना है। जिसने फोन किया है, उसे पहचानेगा कैसे?

फोन पर उसे पहचानने की निशानी के बारे में नहीं पूछा था। पार्किंग भी इतनी बड़ी थी कि ऐसे में किसी को देखकर ये सोचना कि, इसी से उसने मिलना है, सम्भव नहीं था। अपनी कार को पार्क किए, पास ही टहलता इधर-उधर नजरें दौड़ा रहा था। लोगों पर उसकी निगाहें जा रही थी।

पन्द्रह-बीस मिनट ही इस तरह बीते होंगे कि उसके करीब एक व्यक्ति आ पहुंचा। उसके चहरे पर घनी मूछे थी, बाए गाल पर काले रंग का मास्सा था और सर पर विग थी। वानखेड़े समझ गया कि सामने वाले व्यक्ति ने अपना हुलिया बदला हुआ है, ताकि जब वो दुबारा सामने आये तो वानखेड़े उसे पहचान न पाए। वानखेड़े ने उसे गहरी निगाहो से देखा और सोचा की जब ये मेरे सामने आएगा तब ही मैं फैसला कर पाउँगा कि मैं इसे पहचान पाया या नहीं।

वो प्रवेश गोदरा ही था।

“वक्त क्या हुआ?” उसने पूछा।

वानखेड़े ने कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह मारी, फिर उसे वक्त बताया।

“वक्त पूछना तो बहाना था इंस्पेक्टर साहब। मैं तो आपकी आवाज पहचानकर जान लेना चाहता था आप ही इंस्पेक्टर साहब हैं।

वानखेड़े ने गहरी सांस ली। उसने भी आवाज पहचान ली कि इसी से फोन पर बात की थी।

“मैं तब तुमसे पूछना भूल गया था कि तुम्हें पहचानूंगा कैसे?” वानखेडे बोला।

“इस बारे में मुझे भी बात करना याद नहीं रहा। अपनी बीवी से जान छुड़ाने की सोच रहा था। तब कि घर से बाहर कैसे निकलूंगा।”

प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया- “ये औरतें भी खूब होती हैं। हजार रुपया लाये या भूल गये।”

“दे दूंगा। पहले...”

“बाद में मैं भूल जाऊंगा। नोटों का काम पहले ही हो जाना चाहिये।”

वानखेड़े ने जेब से हजार रुपया निकालकर उसे थमाया।

नोटों को जेब में डालता गोदरा मुस्कराकर कह उठा।

“किसी को कहूंगा कि मैंने पुलिस वाले से नोट झाड़े हैं तो कोई मानेगा ही नहीं। खैर, चिन्ता मत करो। मेरे इनाम के पैसों से ये हजार रुपया काट लेना। इस वक्त हजार रुपये की सख्त जरूरत थी।”

“तुम डकैती और देवराज चौहान के बारे में।”

“हां-हां-करते हैं बात। उधर आ जाईये। मेरी कार खड़ी है। उसमें बैठकर बातें।”

“ये मेरी कार है इसमें बैठकर।”

“समझा कीजिये इंस्पेक्टर साहब। मेरी कार में कुछ कागज। कुछ नक्शे पड़े हैं। वो भी तो दिखाने हैं।”

“चलो।” वानखेड़े ने सिर हिलाया।

दोनों पार्किंग में एक तरफ चल पड़े।

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“पत्नी प्यार से मुझे नम्बरी कहती।”

“मैं तुम्हारा नाम पूछ रहा हूं। उपनाम नहीं।”

“रामलाल-श्यामलाल-दीनदयाल, जो अच्छा लगे, वही लीजिये इंस्पेक्टर साहब।” गोदरा मुस्कुराया।

चलते-चलते वानखेड़े ने उसे घूरा।

“तुम ठीक तरह बात नहीं कर रहे।”

“अब तो हजार रुपया दे दिया। अगर लेना होता तो मैं चिकने-चुपड़े ढंग से बात करता, माल निकालने के वास्ते। वो रही मेरी कार। उधर आपको हर बात का जवाब मिल जायेगा।” प्रवेश गोदरा ने एक कार की तरफ इशारा किया।

दोनों कार के पास पहुंचे। प्रवेश गोदरा ठिठका। बोला।

“इंस्पेक्टर साहब।”

“हां”

“कहने वाले तो कहते हैं कि आप पर हाथ डालना बहुत कठिन है  परन्तु मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगा।” गोदरा ने कहा।

वानखेड़े ने आंखें सिकोड़कर उसे देखा।

मुस्करा पड़ा प्रवेश गोदरा।

“समझकर भी मेरी बात नहीं समझ रहे। मैं आपको बता दूं कि इस समय आप देवराज चौहान के कब्जे में हैं।”

“कहां है देवराज चौहान?” वानखेड़े के चेहरे पर सख्ती आ गयी थी।

“आपके करीब। आपके पीछे।”

वानखेड़े फौरन पलटा।

सिर्फ तीन कदमों के फासले पर देवराज चौहान को देखा।

“तुम...।” वानखेड़े वास्तव में चौंका- “मुझे यहां बुलाने के लिये, सारा ड्रामा तुमने किया?”

“बुलाने नहीं, कब्जे में करने के लिये वानखेड़े?” देवराज चौहान के चेहरे पर मुस्कान उभरी।

“क्या मतलब?”

“मैं हीरे-जेवरातों की डकैती डालने जा रहा हूं। तुम मेरे बारे में सबको सतर्क कर रहे हो। प्लेटो सुरक्षा कम्पनी में विवेक बंसल को भी मेरे बारे में सतर्क किया। वहां लगी पुलिस को भी सतर्क कर दिया होगा और ऐसे में तुम भी चैन से नहीं बैठने वाले। कभी भी मेरे लिये मुसीबत बन सकते थे।”

“थे?”

“हां, अब नहीं बनोगे। जब तक मैं डकैती में व्यस्त रहूंगा। तुम कैद में रहोगे।” देवराज चौहान ने कहा- “अगर तुमने मेरे मामले में दखल न दिया होता तो, तुम्हारी तरफ मेरा ध्यान भी नहीं जाता।”

वानखेड़े का चेहरा कठोर हो गया।

“तुमने कैसे सोच लिया कि मुझे कैद कर लोगे?” वानखेड़े

एक-एक शब्द चबाकर कह उठा।

“तुम कैद हो चुके हो। अब तुम्हारी मर्जी नहीं चल सकती। समझदारी तो इसी में है कि यहां से निकलने की कोशिश करना भी मत। वरना तुम्हें नुकसान हो सकता है।” देवराज चौहान ने कहा।

“देवराज चौहान।” वानखेड़े कठोर स्वर में बोला- “इस तरह कब तक कानून से खेलते रहोगे?”

“जब तक कानून के हाथ मेरी गर्दन तक नहीं पहुंच जाते।”

“मतलब कि ये बात मान चुके हो कि एक दिन तुम्हारी गर्दन पर कानून का हाथ होगा।”

“हाँ। सच बात को स्वीकार करने में मुझे कोई एतराज नहीं।”

“फिर भी तुम्हें कानून का डर नहीं।”

“पुराना पापी कभी नहीं डरता। कानून आज मेरी गर्दन पकड़ ले या दस साल बाद । सजा में फर्क नहीं आयेगा । जो सजा आज मिलेगी, वो ही दस साल बाद मिलनी है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “फिर मैं कानून से डरूं क्यों। मैं कानन को अपना दुश्मन नहीं मानता। कानून मेरे भले की सोचता है कि मैं गलत काम न करूं।”

वानखेड़े कुछ कहने लगा कि सोहनलाल पर नजर पड़ी। जोकि इधर ही आ रहा था। गोदरा जो कुछ समय पहले पास ही था, अब जाने किधर खिसक गया था। सोहनलाल पास आकर ठिठका।

“नमस्कार वानखेड़े साहब।”

“कुछ महीने पहले तुम्हें गिरफ्तार न करके मैंने गलती कर दी सोहनलाल।” वानखेड़े ने कड़वे स्वर में कहा।

ये जानने के लिये पढ़िये पूर्व प्रकाशित उपन्यास- ‘मिशन डकैती मास्टर।’

“कर दी तो कर दी। बीती बातों को दोहराने से क्या फायदा।”

सोहनलाल मुस्कुराया।

“उससे पहले भी कश्मीर में तुम्हें गिरफ्तार नहीं किया कि...”

ये जानने के लिये पढ़े पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘सरकारी शैतान’।

“मैंने आपको कभी नहीं रोका। जो आप कह रहे हैं, ये आपके काम थे।”

“अब मैं ऐसी गलती नहीं करूंगा।” होंठ भींचकर वानखेड़े बोला।

“मैं तो चाहता हूं कि आप गलती करें और मैं बचता रहूं।”

सोहनलाल बोला- “वैसे कश्मीर में मैं आपकी रिक्वैस्ट पर गया था। तब नहीं मालूम था कि सारा गोरख धंधा आप का ही...।”

“इन बातों को छोड़ो।”देवराज चौहान ने टोका- “यहां से...।”

उसी वक्त जगमोहन पास आ पहुंचा।

“क्या हुआ?” जगमोहन तीखे व्यंग से बोला- “वानखेड़े साहब कोई जरूरी काम छोड़कर आये हैं, जो हमारे साथ चलने से इन्कार कर रहे हैं। या बैंक में चैक भुनाने जाना है।”

वानखेड़े ने उसे घूरा।

“खुले घूम रहे हो, तभी आवाज निकल रही है।”

“आवाज तो मेरी बंद में भी निकलती है।” कहते हुए जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा- “ले जाऊं इसे।”

देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिलाया।

“तो तुम होटल की नुमाईश में लगने वाले हीरे-जेवरातों की डकैती करने जा रहे हो?” वानखेड़े बोला।

“हां।” देवराज चौहान का स्वर सामान्य था- “लेकिन मेरी योजना ऐसी है कि अगर इत्तफाक से तुम डकैती के वक्त वहां पहुंच गये तो सारी मेहनत फेल हो जायेगी। डकैती को बेकार कर दोगे।”

वानखेडे ने देवराज चौहान को देखा।

“ऐसा कैसे हो सकता है?” वानखेड़े की आंखें सिकुड़ी।

“ऐसा हो सकता है तभी मैं नहीं चाहता कि तुम आजाद रहो। दो-तीन दिन तुम्हें कैद में रहना होगा।”

“डर रहे हो मुझसे?” मुस्कुराया वानखेड़े।

“डरना भी बुरा नहीं होता लेकिन इस वक्त मैं सावधानी बरत रहा हूं। मदनलाल कहां है जगमोहन?”

“उधर-बुलाऊं।”

देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिलाया।

जगमोहन ने बांह उठाकर खास ढंग से इशारा किया एक तरफ खड़ी वैन की ओट में मदनलाल अपने दो साथियों के साथ निकला

और वहां आ पहुंचा।

“इसे कैद में रखना है।” जगमोहन ने कहा।

मदनलाल ने वानखेड़े को सिर से पांव तक देखा।

“पुलिस वाला है ये?”

“हां।”

“लगता तो नहीं।”

“खतरनाक है।” सोहनलाल ने कहा- “संभालकर रखना।”

“आराम से रहे तो सख्ती नहीं करनी है।” देवराज चौहान बोला- “इससे हमारी दुश्मनी नहीं है।”

“समझ गया।” मदनलाल की नजरें वानखेड़े पर जा टिकी- “चल भाई। पहली बार किसी पुलिस वाले को कैद में रख रहा हूं।”

“सौदा महंगा न पड़ जाये।” वानखेड़े ने पुलसिया स्वर में कहा।

मदनलाल ने देवराज चौहान पर निगाह मारी फिर कह उठा।

“अगर तुम्हें ठीक से कैद में न रख पाया तो सौदा तब महंगा पड़ेगा। देवराज चौहान ने मुझे जिन्दा नहीं छोड़ना।”

वानखेड़े ने आसपास निगाह मारी। ऐसा कुछ नजर न आया कि अपना बचाव कर सके। मामूली सी चाल में फंस गया था वो। जरा भी शक होता तो साथ में दो-चार सादी वर्दी वालों को अवश्य लाता।

“मदनलाल।” देवराज चौहान बोला- “इंस्पेक्टर साहब की तलाशी लो।”

मदनलाल ने तलाशी ली। रिवॉल्वर मिला।

दो-चार लोगों की निगाह उन पर पड़ी, परन्तु गड़बड़ का एहसास पाकर तेजी से आगे बढ़ गये।

“रिवॉल्वर को अपने पास रख लो। जब इसे कैद से आजाद करो तो वापस कर देना।”

मदनलाल ने सिर हिलाकर रिवॉल्वर जेब में डाली और अपने साथियों से बोला।

“इसे ले चलो। आराम से चले तो ठीक नहीं तो उठाकर ले चलना है।” स्वर में सख्ती आ गयी थी।

वानखेड़े जानता था कि घिर चुका है। बचकर नहीं निकल सकता। उसने देवराज चौहान को देखा।

“देवराज चौहान।” वानखेड़े ने दांत भींचकर कहा- “जल्दी मिलेंगे। इस बार कोई रियायत नहीं करूंगा।”

“जरूर मिलना।” देवराज चौहान ने सामान्य स्वर में कहा- “लेकिन डकैती के बाद।”

मदनलाल और उसके तीनों साथी, वानखेड़े को वैन में बिठाकर ले गये।

जगमोहन ने गम्भीर स्वर में देवराज चौहान से पूछा।

“ये कैद में रख लेगा वानखेड़े को। कहीं वानखेड़े कैद से निकल न भागे?”

“मदनलाल को सब समझा दिया है।” देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई- “वो लापरवाह नहीं रहेगा।”

सावधानी के नाते दूर एक कार के पीछे छिपा कमल शर्मा बाहर निकला और पास आ पहुंचा।

वे सब वापस होटल पहुंचे और फिर से डकैती की योजना पर बात करने लगे। देवराज चाहता था कि हर किसी के दिमाग में अच्छी तरह बैठ जाये कि किसे कब क्या करना है। कहीं मौके पर कोई गलती न कर बैठे।

आज सातवां और आखिरी दिन था मॉडल्स का जेवरात पहनकर, नुमाईश करने का। आखिरी दिन होने की वजह से आज अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा ही भीड़ थी। सिक्योरिटी वाले भी भीड़ देखकर, अन्य दिनों की अपेक्षा आज ज्यादा ही सावधान थे।

अन्य पुलिस वाले की तरह विवेक बंसल भी वहां मौजूद था। उसे तसल्ली थी कि सात दिन ठीक से निकल गये और विश्वास था कि अगले तीन दिन भी ठीक तरह निकल जायेंगे।

☐☐☐

परेशान था इंस्पेक्टर शाहिद खान।

परसों शाम इंस्पेक्टर वानखेड़े उससे मिलने गया था, जिसका फोन आया था और वानखेड़े ने कहा था कि वो आकर बतायेगा कि डकैती और देवराज चौहान का क्या मामला है। वानखेड़े के इन्तजार में वो रात भर रहा। रात की उसकी ड्यूटी भी थी। सुबह हो गयी।

परन्तु वानखेड़े नहीं लौटा।

परेशानी की यही वजह थी कि वानखेड़े नहीं लौटा। ड्यूटी खत्म होने पर भी शाहिद खान घर नहीं गया। दिन भर पुलिस हैडक्वार्टर में ही रहा कि शायद वानखेड़े या उसका फोन आ जाये। परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

शाहिद खान समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। क्योंकि उसे नहीं मालूम था कि वानखेड़े कहां गया और किससे मिलने गया। इस बारे में किसी से बात नहीं की कि, कहीं बात खुलने से वानखेड़े का काम खराब न हो जाये। कहीं वानखेड़े का वापस न लौटना, उसकी व्यस्तता न हो।

इंस्पेक्टर शाहिद खान इन्तजार करता रहा।

दिन भी बीत गया।

वानखेड़े नहीं लौटा।

इंस्पेक्टर शाहिद खान की परेशानी बढ़ती गयी। परन्तु वो किसी को कुछ बता नहीं रहा था। इंस्पेक्टर वानखेड़े का काम करने का ढंग ऐसा था कि वो, खुद नहीं जानता था कि वानखेड़े के बारे में उसे क्या कदम उठाना चाहिये। आखिरकार उसने चुप रहकर ही भागदौड़ करनी ठीक समझी। दिन में चार घंटे कुर्सी पर बैठे-बैठे ही नींद ले ली थी। इतना तो जान चुका था। उस दिन फोन की बातें सुनकर कि वानखेड़े डकैती और देवराज चौहान के चक्कर में है।

जाहिर है डकैती वहां ही हो सकती है जहां नुमाईश हो रही है। अरबों के हीरे-जेवरात हैं और वहां डकैती तभी होगी, जब हीरे-जेवरात एक ही जगह, उस हॉल में इकट्ठे रखें जायेंगे।

एक रात, एक दिन और बीत गया।

आठवां दिन आ गया, जब हीरे-जेवरातों को बेचने के लिये हॉल में रखना था। शाहिद खान सबसे पहले होटल के उस हॉल में जाने की सोची, जहां हीरे-जेवरातों को रखा जाना था।

☐☐☐

सुबह के ठीक साढ़े दस बजे फोन की घंटी बजी।

रूपा ईरानी ने रिसीवर उठाया।

दूसरी तरफ देवराज चौहान था।

“हैलो।”

“रूपा ईरानी।”

रूपा ईरानी देवराज चौहान की आवाज पहचान गयी थी।

“देवराज चौहान?”

“हां। आज तुमने हॉल के अटैच बाथरूम के फ्लश टैंक में रिवॉल्वरों के पैकिट रखने हैं।”

“बारह बजे के बाद, यानि कि एक बजे से पहले ये काम हो जायेगा।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा।

“एक से ज्यादा का वक्त न हो जाये।” देवराज चौहान का स्वर आया।

“नहीं बजेगा। एक बजे तक मैं अपना काम निपटा दूंगी।

सोहनलाल ‘प्रवेश पास’ कल ले गया था।”

“मिल गये हैं वो?”

“आज पहले दिन ही डकैती के लिये तैयार हो गये।”

“अभी मालूम नहीं क्या होता है। तुम अपना काम एक बजे तक पूरा कर देना।”

“ओ.के. मेरा प्रवेश कैसा है?” रूपा ईरानी ने पूछा।

दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया था देवराज चौहान ने।

रूपा ईरानी ने रिसीवर रखा। चेहरे पर गम्भीरता दिखाई देने लगी थी।

☐☐☐

रिसीवर रखकर देवराज चौहान ने सब पर नजर मारी फिर शांत स्वर कह उठा।

“आज पहला दिन है हीरे-जेवरातों को खुले हॉल में रखकर बेचने का। ग्राहकों का बारह बजे आना शुरू हो जायेगा। ये सब तीन-दिन चलना है। दिन के बारह से, रात के बारह बजे तक और हम आज ही पहले ही दिन, शुरूआत के दो घंटों में डकैती करेंगे।”

“पहले दिन-आज ही।” कमल शर्मा के होठों से निकला।

गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

“आईडिया बुरा नहीं। पहले दिन के पहले दो घंटों में वहां के लोग इस बारे में पूरी तरह लापरवाह होंगे कि किसी भी तरह की कोई गड़बड़ नहीं हो सकती। और हम काम कर जायेंगे।” जगमोहन कह उठा।

“ठीक यही बात मैंने सोची और आज का दिन-पहला दिन रखा डकैती के लिये। वे लोग सावधान होंगे परन्तु इस हद तक नहीं, किसी भारी गड़बड़ को फौरन संभाल सके। ऐसे में हमें अपना काम करने में आसानी होगी।” देवराज चौहान बोला।

“अ-आज हम डकैती करेंगे।” गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

“घबर रहे हो।” सोहनलाल बोला।

“न-नहीं लो।” गोदरा घबराया पड़ा था।

“हिम्मत से काम लीजिये गोदरा साहब। दस अरब के हम हिस्सेदार हैं।” कपल शर्मा कह उठा।

“हां-हां, क्यों नहीं, गिनकर दस अरब दूंगा।” जगमोहन मुस्कराकर प्यार से कह उठा।

“वो एक करोड़ कम कर लेना। जो तुमने मुझे एडवांस दिया है।” गोदरा बोला।

“कोई बात नहीं,” जगमोहन का स्वर प्यार भरा ही था- “पैसा तेरे पास रहा या मेरे पास रहा, एक ही बात है।”

देवराज चौहान ने सब पर निगाह मारते हुए कहा।

“मैं एक बार फिर सब बातें कहूंगा कि डकैती के वक्त हमने कैसे हरकत में आना है उसके बाद वहां जाने के लिये मेकअप करके अपने चेहरे बदलेंगे।”

“रूपा को फोन कर दूं कि वो रिवॉल्वरों को, वहां...।”

“रूपा को फोन कर चुका हूँ, तुम लोग एक बार फिर सुनो, वहां क्या करना है। ध्यान रखना, ये खुली डकैती है। पलों में सब कुछ बदल सकता है अगर कोई लापरवाही कर गया तो हम लोगों का बच पाना कठिन होगा सबको अपने-अपने हिस्से के काम की तरफ ध्यान देना है और काम करके, वहां से फौरन निकल चलना है।”

“जेवरातों को डालने के लिये थैला भी तो...।” जगमोहन ने बोलना चाहा।

“थैलों की जरूरत नहीं। वहां टेबल पर बिछे कपड़े पर जेवरातों को रखकर गठरी बनाई जा सकती है।” देवराज चौहान ने फौरन टोका- “हॉल के भीतर हम कुछ लेकर नहीं जा सकते।”

☐☐☐

दिन के ठीक बारह बजे थे।

हॉल में प्रवेश आरम्भ हुआ ही था। भीतर प्रवेश करने वालों में तीसरा नम्बर देवराज चौहान का था। चेहरे पर फ्रेंचकट दाढ़ी और मूछों के अलावा आंखों पर नजर का प्लेन ग्लास का चश्मा था। हाथों की उंगलियों में सोने और नगों वाली अंगूठियां चमक रही थी। गले में सोने की भारी चेन थी। देखने में वो रईसजादा लग रहा था।

हॉल के भीतर टेबलों की लम्बी-लम्बी कतारें इस ढंग से लगी थीं कि आने वाला घूमता हुआ, हर तरफ का फेरा लगा ले। ऐसी तीन कतारें थी। जिन पर शीशे के जारों में पड़े हीरे-जेवरात चमक रहे थे। कुल मिलाकर ऐसे बक्सों की संख्या तीन सौ से ऊपर थी।

तीस अरब की कीमत के जेवरात वहां मौजूद थे।

आने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। वो सोलह की सोलह मॉडल्स परियां बनकर हॉल में इधर-उधर घूमती और आने वाले लोगों का मुस्कुराकर स्वागत कर रही थी। रूपा ईरानी भी देवराज चौहान को दिखी। परन्तु देवराज चौहान ने फौरन उस पर से मुंह घुमा लिया।

वो जानता था कि वीडियो कैमरों से हॉल में निगरानी रखी जा रही है, ऐसे में कंट्रोल रूम में बैठे उसकी किसी भी हरकत का गलत मतलब निकाल सकते थे।

देवराज चौहान अन्य लोगों की भांति शीशे के बक्सों में रखे जेवरातों को ध्यानपूर्वक देखने लगा। इस तरह देखता कि जैसे फैसला कर रहा हो कि कौन-सा खरीदना चाहिये। हर बक्से पर जेवरात की कीमत का ‘टंग’ लटक रहा था। लोगों के धीमें में बातें करने की आवाजें वहां गूंजनी आरम्भ हो चुकी थी।

देवराज चौहान ने कलाई पर बंधी घड़ी में वक्त देखा। बारह, बीस हो रहे थे। योजना के मुताबिक साढ़े बारह बजे तक उसके सब साथियों ने भीतर आ जाना था। अब तक कुछ आ भी चुके होंगे। देवराज चौहान बहुत शांत और संयत था। कहने को तो वो जेवरातों को देख रहा था, परन्तु उसकी निगाह हर तरफ थी। जगमोहन और कमल शर्मा को उसने हॉल के भीतर आया देख लिया था।

पहले सात दिनों में तो जेवरातों का फैशन शो देखने आने वालों की जांच पर सख्ती थी। क्योंकि आयोजक नहीं चाहते थे कि मात्र फैशन शो देखने के लिये लोगों की बे-वजह की भीड़ लग जाये।

चूंकि अब जेवरातों को बेचने के लिये रखा गया था, इसलिए आने वालों के भीतर आने पर ज्यादा पाबन्दी नहीं थी। भीतर आने के लिये पास या निमंत्रण कार्ड ही दिखाना था। इसके अलावा भीतर आन वाले की तलाशी बहुत अच्छी तरह से ली जा रही थी और इस बात का ध्यान रखा जा रहा था कि उसके पास हथियार तो नहीं।

साढ़े बारह बजे तक पांच सौ से ज्यादा लोग हॉल में पहुंच चुके थे और लोगों का भीतर आना बराबर जारी था। भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। जाहिर था कि आने वालों में खरीदने वाले कम और देखने वाला ज्यादा थे। इन कीमती जेवरातों को देखने की इच्छा उन्हें यहां तक ले आयी थी।

देवराज चौहान को कमल शर्मा और सोहनलाल भी नजर आये।

जो कि एक साथ ही थे। जैसे कि वे लोग इकट्ठे आये हों। सोहनलाल ने घंटा भर पहले ही खरीदे नये कपड़े पहने हुये थे।

साढ़े बारह बज चुके थे।

अब देवराज चौहान से इशारा मिलने पर उन लोगों ने बारी-बारी

बाथरूम में जा पहुंचना था और फ्लश टैंक में रखी गयी रिवॉल्वरें और नकाबों को चेहरे पर हाथ कर, फौरन योजना के मुताबिक हॉल में फैल जाना था और डकैती की घोषणा कर देनी थी।

परन्तु देवराज चौहान इस बात की तसल्ली कर लेना चाहता था कि रिवॉल्वरें फ्लश टैंक में पहुंच चुकी हैं या नहीं? अगर पहुंच चुकी हैं तो हरकत में आने का वक्त आ चुका था। उसके दो नकली ‘बारूद मैनों’ ने बारह बजकर चालीस मिनट पर हॉल के प्रवेशद्वार के बाहर पहुंच जाना था।

देवराज चौहान शीशे के जार में मौजूद एक जेवरात को ध्यान से देखते हुए, सोच रहा था कि रूपा ईरानी की तलाश में अभी नजरें घुमाता है कि रूपा ईरानी पास आ पहुंची।

“सर।” वो मुस्कुराकर बोली- “मेरी लायक कोई सेवा?”

देवराज चौहान उसे देखकर शांत भाव से मुस्कुराया।

“जेवरात पसन्द कर रहा हूं। पसन्द आने पर सेवा अवश्य बताऊंगा। आप बहुत खूबसूरत हैं।

“थैक्स।” रूपा ईरानी हौले से खिलखिलाई- “आपकी दाढ़ी बहुत अच्छी है। कोई जेवरात पसन्द आये तो मुझे अवश्य याद कर लीजियेगा। यहां बाथरूम भी है। जरूरत पड़ने पर आप उसे इस्तेमाल कर सकते हैं।” कहने के साथ ही रूपा ईरानी आगे बढ़ गयी।

देवराज चौहान ने पुन: अपना ध्यान शीशे के जार में मौजूद जेवरात पर लगा दिया था। रूपा ईरानी की बात से स्पष्ट था कि उसने उसे पहचान लिया है। उसकी नजरें वास्तव में तेज थी। दूसरे वो बाथरूम इस्तेमाल होने का इशारा देकर बता गयी थी कि रिवॉल्वरों को वहां पहुंचा चुकी है।

अब हरकत में आया जा सकता है।

देवराज चौहान ने बड़ी देखी, बारह-पैंतालिस हो रहे थे।

यानि कि बाहर दोनों ‘बारूद मैन’ पहुंच चुके हैं या पहुंचने वाले हैं। परन्तु देवराज चौहान जानता था कि बारूद मैनों के बाहर पहुंचने पर भीतर भी फौरन खबर आ जानी थी कि बाहर कुछ हो रहा है।

ठीक उसी वक्त इंस्पेक्टर शाहिद खान भीतर हॉल में पहुंचा और एक तरफ काऊंटर के पार मौजूद आयोजकों के पास पहुंचा।

वहां ज्वैलर्स संघ के अध्यक्ष लक्ष्मी चन्द्र मित्तल के अलावा दो अन्य व्यक्ति भी मौजूद थे। शाहिद खान उन्हें अपना कार्ड दिखाते हुए बोला।

“मैं इंस्पेक्टर शाहिद खान हूं। आप बतायेंगे कि विवेक बंसल कहां मिलेंगे।”

“उधर-वो रहे।” इंस्पेक्टर ने इशारा किया।

शाहिद खान ने उधर देखा। वहां कई लोग थे।

“मैं जानना चाहता हूं कि उनमें से विवेक बंसल कौन है।” शाहिद खान बोला।

“सफेद कमीज वाले। जिन्होंने माथे पर काला चश्मा फंसा रखा

“थैंक्स।” शाहिद खान उस तरफ बढ़ गया।

☐☐☐

विवेक बंसल छ: व्यक्तियों में मौजूद, बातों में व्यस्त था कि शाहिद खान ने बिना वक्त गंवाये उसकी कलाई पकड़ी और कुछ कदम दूर ले आया।

विवेक बंसल उलझा-सा दिखाई दिया। शाहिद खान से वो पहले कभी नहीं मिला था।

“कौन हैं आप, और।”

“आप विवेक बंसल हैं प्लेटो सुरक्षा कम्पनी वाले।”

“हां।” विवेक बंसल की आंखें सिकुड़ी।

“दो दिन पहले इंस्पेक्टर वानखेड़े ने आपसे फोन पर बात की थी। तब मैं भी पास बैठा था। उनका असिस्टैंट हूं मैं। इंस्पेक्टर शाहिद खान।”

“कहिये। मैं आपकी क्या सेवा करूं।”

“उस फोन के बाद वानखेड़े साहब आपसे मिले थे?”

“नहीं। उनसे सिर्फ दो बार फोन पर बात हुई थी। मुलाकात कभी नहीं हुई।” विवेक बंसल बोला- “लेकिन आप ये सब क्यों...?”

“मिस्टर विवेक।”शाहिद खान कह उठा- “परसों आपसे फोन पर बात करने के बाद उन्हें किसी का फोन आया। मैं पास ही था। तब फोन पर मैंने इतना ही जाना कि हीरे-जेवरात की डकैती और देवराज चौहान के सबन्ध में कोई बात हो रही है। कोई इंस्पेक्टर वानखेड़े को इस बारे में ‘टिप’ देना चाहता था। मुलाकात का वक्त तय हुआ। इंस्पेक्टर वानखेड़े ने सारी बात शाम को बताने को कहा और उससे मिलने चले गये जो उन्हें देवराज चौहान और डकैती के बारे में बताना चाहता था।”

विवेक बंसल सतर्क-सा नजर आने लगा।

“फिर?”

“उसके बाद वानखेड़े साहब अभी तक नहीं लौटे।” इंस्पेक्टर शाहिद खान का स्वर व्याकुल-सा हो उठा था।

“ओह।” विवेक बंसल की आंखें सिकुड़ी।

“मैंने सोचा, उनके बाद किसी रूप में उनकी आपसे बात हुई हो।”

“उसके बाद मेरे से बात नहीं हुई।” विवेक बंसल जल्दी से बोला- “आपके पूरा यकीन है कि फोन पर हीरे-जेवरातों की डकैती और देवराज चौहान का जिक्र हो रहा है। सुनने में गलती भी…”

“जो मैंने कहा है वो पक्की बात है।”

“फिर तो हमें और भी सतर्क हो जाना चाहिये।” विवेक बंसल की नजरें हॉल में दौड़ने लगी- “आज पहला दिन है। कुल मिलाकर तीन दिन की बात है। अगर कुछ होगा तो, इन्हीं तीन दिनों में ही होगा।”

“बेशक। लेकिन आप जो भी कीजिये, अपने तौर पर कीजिये। जो मैंने कहा है वो किसी को पता न चले।”

“क्यों?” विवेक बंसल के होठों से निकला।

“इंस्पेक्टर वानखेड़े साहब का काम करने का ढंग अपना ही है। हो सकता है उनके साथ कोई भी गड़बड़ न हुई हो और वो अपने ढंग से इस काम में व्यस्त हो। बात खुलने पर कहीं उनकी भाग-दौड़ खराब न हो जाये।

“समझ गया। आपकी बताई बात मैं अपने तक ही रखूँगा।”

विवेक बंसल गम्भीर दिखाई देने लगा था- “सिक्योरिटी पर नजर मार लेता हूं। उन्हें सतर्क करके इतना कह देता हूं कि खबर मिली है कि कोई गड़बड़ हो सकती है।”

“जैसा आप ठीक समझें।”

“सिक्योरिटी में पुलिस वाले भी हैं। वो अवश्य जानना चाहेंगे कि क्या खबर मिली। कैसे मिली?”

“मिस्टर विवेक। ये आपका मामला है। आपने संभालना है। इतना ध्यान रखना है कि मेरी कही बात सिर्फ आप तक ही रहे।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान ने गम्भीर स्वर में कहा- “इस दौरान मैं इंस्पेक्टर वानखेड़े की तलाश में व्यस्त...”

इंस्पेक्टर शाहिद खान अपने शब्द पूरे न कर सका।

तभी प्रशांत यादव हड़बड़ाया-सा वहां पहुंचा। उसके माथे पर पसीने की बूंदें स्पष्ट तौर पर चमक रही थी। उसका चेहरा देखते विवेक बंसल की आंखें सिकुड़ी।

“क्या...?” उसने पूछना चाहा।

“सर। हॉल के प्रवेश द्वार के बाहर अभी-अभी दो व्यक्ति पहुंचे हैं। उन्होंने होठों पर टेप लगा रखी है। उनकी पीठों पर बस्ते जैसे दो भारी से थैले हैं। वो खतरनाक हैं। उन्होंने वहां मौजूद पुलिस वालों को

एक कागज थमाया है। जिस पर लिखा है कि भीतर डकैती हो रही है और उनकी पीठों पर थैलों में विस्फोटक सामग्री है। दोनों के हाथों में रिमोट कंट्रोल है। आगे लिखा है कि अगर उन पर या भीतर डकैती करने वालों पर हाथ डाला गया तो वे रिमोट के बटन दबाकर खुद को बारूद से उड़ा देंगे। बारूद इतनी ज्यादा मात्रा में है कि होटल का एक हिस्सा पूरी तरह तबाह हो जायेगा। ये हॉल भरभरा कर गिर पड़ेगा। भीतर मौजूद लोगों में से कोई भी जिन्दा नहीं बचेगा।”

विवेक बंसल हक्का-बक्का सा प्रशांत यादव को देखने लगा।

“सर।” प्रशांत यादव माथे पर से पसीने को साफ करता कह उठा।

“उन्होंने तुमसे कोई बात नहीं की?” विवेक बंसल के होठों से निकला।

“नो सर। वो होठों पर टेप चिपकाये हुए हैं।”

“अब मैं कह सकता हूं कि इंस्पेक्टर वानखेड़े किसी मुसीबत में फंस चुके हैं।” शाहिद दांत भींचकर कह उठा- “अगर वे इसी काम पर लगे होते तो, इस वक्त ये सब न हो रहा होता।”

“अब क्या होगा?” विवेक बंसल के होठों से निकला।

“डकैती।” होंठ भींचकर शाहिद खान ने कहा।

“हम उन दोनों पर काबू पा सकते....”

“पागलों वाली बात मत करो।” शाहिद खान ने शब्दों को चबाकर कहा- “उन पर काबू पाने की सोचना भी नहीं। कोई पुलिस वाला भी ऐसा करने की सोचेगा भी नहीं। अगर उनकी धमकी सच्ची है तो, उनके थैलों में पड़े बारूद के फटते ही हर तरफ लाशें और तबाही...”

“हो सकता है वे खोखली धमकी दे रहे हों।” विवेक बंसल की आवाज में सख्ती आने लगी।

“धमकी सच्ची है या खोखली...इस बात को चैक करने की हिम्मत कौन करेगा। कम से कम पुलिस तो ऐसा खतरा किसी भी हालत में नहीं उठायेगी। अगर उन्होंने बारूदी विस्फोट कर दिया तो, यहां बिछने वाली ढेर सारी लाशों का जिम्मेवार कौन होगा?”

“यहां मेरी सिक्योरिटी है शाहिद खान साहब।”

“अवश्य होगी, लेकिन तुम ऐसी कोई हरकत नहीं कर सकते कि, जिससे दूसरों की जान जाये। इस वक्त तुम किसी भी तरह का फैसला नहीं ले सकते। तुम आम सिक्योरिटी सर्विस के इंचार्ज हो। अगर तुम तोप भी होते तब भी इन हालातों में कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं होते। यहां तुम्हारी सिक्योरिटी है तो ज्वैलर्स संघ ने पुलिस की सहायता भी ले रखी है। हर तरफ पुलिस ही पुलिस है। तुम्हारा काम सिक्योरिटी देना था लेकिन गड़बड़ होने की स्थिति में हालातों को संभालना पुलिस का काम है। तुम्हारा नहीं। खामोशी से हाथों को बांधकर एक तरफ हो जाओ। तुम्हें कोई भी बेवकूफी करने की जरूरत नहीं। कुछ करना है या नहीं करना है, ये बात अब पुलिस देखेगी। तुम्हारा काम खत्म।” शाहिद खान का स्वर कठोर था।

“लेकिन...”

“चुप रहोगे, या अभी तुम्हारे दांत तोड़ दूं।” शाहिद खान का स्वर गुस्से से भर उठा।

विवेक बंसल दांत भींचकर रह गया।

“इसके बात करने का ढंग तो ऐसा है, जैसे पुरानी दुश्मनी उतार रहा हो।” प्रशांत यादव कह उठा।

“इन हालातों में तुम्हारे जिस्म पर भी पुलिस की वर्दी होती तो तब तुम्हें समझ में आता कि जनता की जान कितनी कीमती होती है और, ऊपर वालों को जवाब देने के लिये जुबान तक नहीं हिलती है। मरने वालों को रोते-बिलखते परिवार वाले सामने आते हैं तो, खुद को गोली मार लने का दिल करता है।”

विवेक बंसल बेबस सा नजर आने लगा।

तभी प्रशांत यादव सूखे होठों पर जीभ फेर उससे बोला।

“अब क्या किया जाये सर?”

तभी डकैती होने की घोषणा हो गयी।

☐☐☐

देवराज चौहान ने घड़ी पर निगाह मारी। वक्त हो चुका था। उन्हें हरकत में आने में अब देर नहीं लगानी चाहिये। उसके साथी उसकी नजरों के सामने ही थे। वे देवराज चौहान के इशारे के इन्तजार में थे और उन्हें जिस वक्त का इन्तजार था वो आ गया।

खुसर-फुसर होते-होते हॉल में ये बात हवा की तरह फैल गयी कि बाहर दो बारूद में लिपटे व्यक्ति खड़े हैं जो कि कभी भी खुद को बारूद से उड़ा सकते हैं और उनके साथी डकैती के लिये भीतर हैं।

यही वक्त था, हरकत में आने का।

करीब ही, अलग-अलग फैले सोहनलाल, जगमोहन, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा को उसने आंखों ही आंखों में इशारा किया कि बाथरूम में जाकर फल्श टैंक में रखी रिवॉल्वरें उठाये। उनके ऊपर लपेटे नकाब चेहरों पर पहनकर डकैती के लिये हरकत में आ जाये।

वो सब अलग-अलग लापरवाही भरे अंदाज में उस तरफ बढ़े, जिधर बाथरूम था।

देवराज चौहान भी बाथरूम की दिशा की तरफ बढ़ा।

दूसरे ही पल उनके कदम ठिठकते चले गये,वो आवाज सुनकर। हॉल में लगे छोटे-छोटे स्पीकरों से मध्यम लेकिन कर्कश-सा स्वर उभरकर हॉल में गूंज उठा।

कोई भी शरारत करने की कोशिश न करें। पुलिस वाले हो या सामान्य नागरिक। इस वक्त अपनी जगह पर खड़े रहना ही समझदारी है। हम यहां मौजूद जेवरातों की डकैती कर रहे हैं। कुछ देर की तकलीफ है ये। उसके बाद हम चले जायेंगे। इस चेतावनी के बाद भी किसी ने कोई गलत हरकत की तो हम गोलियां चलाने पर मजबूर हो जायेंगे। और यहां हुए खून-खराबे की जिम्मेवारी हम पर नहीं होगी। ऐसा कुछ न हो, इसी कारण हम कह रहे हैं कि हम डकैती करके शराफत से यहां से चले जायेंगे। खून-खराबा हुआ, लाशें बिछी तो जिम्मेवारी हमारी नहीं होगी। बाहर हमारे दो आदमी जिन्हें इस वक्त बारूद मैन कहना ही ठीक होगा। खड़े हैं अगर उन्हें छेड़ने, तंग करने या पकड़ने की चेष्टा की गयी तो वो हाथ में पकड़े रिमोट का बटन दबाकर, पीठ पर थैले में मौजूद बारूद को उड़ा देंगे वो दोनों खुद तो मरेंगे ही, साथ में हॉल में मौजूद सैकड़ों लोग भी मारे जायेंगे। क्योंकि उस शक्तिशाली बारूद के फटते ही होटल को ये हिस्सा भरभराकर गिर जायेगा। मैं फिर कह रहा हूं कि हम किसी की जान लेने के पक्ष में नहीं हैं। डकैती करने आये हैं और डकैती करके चले जायेंगे। सब धीरे-धीरे दीवारों के साथ सटते चले जायें। अगर कोई खुद को बहादुर समझता है तो वो बेशक बेवकूफी वाली हरकत कर सकता है। हमें कोई एतराज नहीं। उस हरकत का हम बेहद क्रूरता पूर्वक जवाब देंगे और जिम्मेवारी हम पर नहीं होगी?”

इन शब्दों के साथ ही पैना सन्नाटा छा गया था वहां। लोग बुत से बने एक-दूसरे को देखने लगा।

तभी दो-तीन औरतों की चीख गूंजी। दो व्यक्ति घबराकर चीखे। हॉल में नकाब डाले व्यक्ति दिखाई देने लगे थे। उनके हाथों में रिवॉल्वरें दबी थी।

☐☐☐

देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा के पांव जहां के तहां ठिठक गये। कुछ पलों के लिये तो वो हैरानी के सागर में गहराई तक जा पहुंचे।

डकैती हो रही है?

डकैती तो वो करने जा रहे थे।

फिर ये सब...?

जवाब किसी के भी पास नहीं था।

उन्हें हॉल की दीवारों के साथ सटकर खड़े होने को ही कहा गया था। हर कोई जल्दी दीवार के पास पहुंच जाना चाहता था। ये सोचकर कि कहीं गोलियां न चल जायें। हर कोई जैसे अपनी जान बचा लेना चाहता था। भगदड़-सी पैदा हो गयी थी वहां। होंठ भींचे देवराज चौहान की कठोर निगाह हर तरफ घूमने लगी थी।

उसे चार ऐसे व्यक्ति नजर आये, जिनके चेहरों पर काली रंग की सिल्क की चमकती नकाबें पड़ी थीं। देखने के लिये नकाब में आंखों की जगह छेद थे और सांस लेने के लिये नाक की जगह, नकाब में छोटा-सा छेद था। उन नकाबों के पीछे उन चेहरों को देख-पहचान पाना असम्भव-सी बात थी। उन चारों के हाथों में रिवॉल्वरें दबी थी।

वो सब सतर्क नजर आ रहे थे और लग रहा था कि कभी भी फायरिंग शुरू कर देंगे अगर जरा भी गड़बड़ हुई तो।

“जल्दी।” रिवॉल्वर थामें एक नकाब वाला चीखा- “दीवारों के साथ सट जाओ। हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं है।”

वहां मौजूद हर कोई दीवारों के साथ सटता जा रहा था। ऐसे लोगों में जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा भी थे।

देवराज चौहान भी था, जो धीरे-धीरे नजरें हर तरफ मारता हुआ दीवार की तरफ बढ़ रहा था, लेकिन अब उसके चेहरे पर अजीब से भाव थे। होंठ सिकुड़ चुके थे। सोचो में छोटा-सा तूफान भर गया था। देवराज चौहान आसानी से पहचान रहा था कि उनके चेहरों पर पड़ी नकाबें वो ही हैं, जो उसने रिवॉल्वरों के साथ लपेटकर फ्लश टैंक में, रूपा ईरानी के द्वारा पहुंचाई थी और रिवॉल्वरें भी वो ही थी, जो नकाबों में लिपटी हुई थी। यानि कि ये साजो-सामान वो ही था, जिसके दम पर उसने डकैती करनी थी, परन्तु उसके साजो सामान पर दूसरे लोग डकैती कर रहे थे। जिस ढंग से उसने डकैती करनी थी। ठीक उसी ढंग से डकैती की जा रही थी। जो योजना उसने बनाई वैसे ही काम हो रहा था। जरा भी फर्क नहीं था।

पांचवा व्यक्ति भी नकाब और रिवॉल्वर में नजर आ गया था, जो कि उस काऊंटर के पास खड़ा था, जहां ज्वैलर्स संघ के चेयरमैन लक्ष्मी चन्द्र मित्तल, दो व्यक्तियों के साथ मौजूद थे। लक्ष्मी चन्द्र मित्तल का सिर काऊंटर पर पड़ा था। जाने वो बेहोश था या मर चुका था। अन्य दो नजर नहीं आ रहे थे। यकीनन वो काऊंटर के पीछे नीचे लुढ़के होंगे। एक की टांगें नजर आ रही थी। उस काऊंटर के पास खड़े नकाब डाले रिवॉल्वर थामे व्यक्ति के हाथ में छोटा-सा माईक था। उसी ने ही माईक द्वारा हाथ में लगे स्पीकरों के दम पर इस बात की घोषणा की थी कि डकैती हो रही है और साथ ही चेतावनी दी।

उसके पास हथियार थे। बाहर मौजूद दो बारूदी आदमी भी उसके थे।  

उसकी योजना पर हू-ब-हू काम हो रहा था।

जब डकैती के लिये वो हरकत में आ रहा था। जो कुछ उसने  करना था। सब कुछ वैसे ही हो रहा था। फर्क सिर्फ ये था कि ये सब कुछ वो या उसके साथी नहीं कर रहे थे। कोई और लोग कर रहे थे। देवराज चौहान सब कुछ सोचता-समझता अपने पर काबू पाने की चेष्टा करता, दीवार की तरफ बढ़ रहा था। चेहरे पर गम्भीरता, कठोरता थी।

ये सब कैसे हो जाना सम्भव है?

इत्तफाक नहीं हो सकता।

स्पष्ट था कि उसकी डकैती की योजना इन लोगों तक पहुंच गयी थी, जो डकैती कर रहे हैं और ठीक मौके पर इन डकैती करने वालों ने मिली जानकारी का पूरा फायदा उठाया। उसकी योजना पर इन लोगों ने अपनी योजना बना ली।

वो भी दीवार के पास जाकर खड़ा हो गया।

लगभग सारे ही दीवारों के साथ सटे खड़े हो चुके थे। उन लोगों में प्लेटो सुरक्षा कम्पनी वाले भी थे और वहां मौजूद पुलिस वाले भी।

उनकी निगाहें हॉल में मौजूद चारों व्यक्तियों पर और पांचवे पर जा रही थी जो काऊंटर के पास अभी तक माईक थामें खड़ा था। वो पांचों ही बेहद सतर्क थे।

“जल्दी करो।” माईक थामे व्यक्ति ने कठोर स्वर में कहा- “जो बीच में आने की कोशिश करे, शूट कर दो।”

इन शब्दों के साथ ही वो चारों व्यक्ति हरकत में आये और फुर्ती से आगे बढ़कर एक टेबल पर पड़े शीशे के जारों को तोड़कर उसमें से जेवरात निकाले। टेबल पर बिछी चादर, को झटका देकर, टूटे जारों को नीचे गिराया और टेबल से चादर खींचकर, जेवरातों को उसमें डाला।

ये भी उसकी योजना का हिस्सा था कि जेवरातों को टेबल पर बिछी चादर में समेटना। शीशे के जारों को तोड़ने पर सायरन की आवाज नहीं उभरी। यानि कि इन लोगों ने वहां से बिजली सप्लाई काट दी होगी,  जहां से सायरन के लिये, जारों की नीचे लगे सायरन कंट्रोल प्लग को करंट मिल रहा होगा।

वे चारों तेजी से काम करते जा रहे थे।

रिवॉल्वर की नालों से शीशे के बक्सों को तोड़ते और जेवरात निकालकर चादर पर फैंक देते। चादर को दो ने खोलकर पकड़ा हुआ था और साथ-साथ चल रहे थे। सारा काम बिजली की सी तेजी से हो रहा था। उन चारों में से कोई भी इधर-उधर नहीं देख रहा था।

फुर्ती से अपना काम निपटाने में व्यस्त थे। तभी प्रवेश द्वार से कमीश्नर रैंक का पुलिस वाला भीतर आया।

“कोई भीतर नहीं आयेगा।” माईक थामें व्यक्ति कठोर स्वर में बोला- “कोई बाहर नहीं आयेगा। जो जहां है, वही खड़ा रहे। अपनी जगह भी कोई नहीं बदलेगा। जो पुलिस वाला भीतर आया है वो एक तरफ खड़ा हो जाये।”

भीतर प्रवेश करने वाला पुलिस वाला तुरन्त एक तरफ खड़ा हो गया।

शीशे के केस टूटते जा रहे थे। बेशकीमती जेवरातों से चादर भारी होती जा रही थी।

सांसों की आवाजें वहां गूंज रही थी। हर कोई पूरी कोशिश कर रहा था कि वो हिले भी नहीं और ये बुरा वक्त निकल जाये। जेवरातों की तरफ तो किसी का भी ध्यान नहीं था। सबका ध्यान डकैतों की तरफ था।

“गुड।” माईक थामने वाले व्यक्ति ने शब्दों को चबाकर सख्त स्वर में कहा- “सब ऐसे ही खड़े रहें। हमें ज्यादा देर नहीं लगेगी। हम जाने ही वाले हैं। हम खुद यहां ज्यादा देर नहीं रुकना चाहते।”

“इनमें देवराज चौहान कौन है?” विवेक बंसल ने बगल में खड़े

इंस्पेक्टर शाहिद खान ने धीमें स्वर में पूछा।

“मैं नहीं जानता।” शाहिद खान ने हौले से शब्दों को चबाकर कहा।

“नकाब की वजह से पहचान नहीं पा रहे, जो।”

“नकाब न भी पहने होते तो भी पहचान न पाता।” शाहिद खान बोला- “देवराज चौहान को मैंने कभी भी नहीं देखा। तस्वीर ही देखी है और उस तस्वीर के दम पर इस मौके पर नहीं पहचान सकता।”

“ओह। मैंने भी देवराज चौहान को नहीं देखा। तस्वीर भी नहीं देखी।”

शाहिद खान की निगाह, काउंटर के पास खड़े व्यक्ति पर जा टिकी।

“वो शायद देवराज चौहान है।”

“जिसने माईक पकड़ रखा है?” विवेक बंसल के होठों से निकला।

“हां। वो सबको निर्देश दे रहा है। वो देवराज चौहान ही होगा।”

शाहिद खान का सख्त स्वर, गम्भीर था।

“हां, शायद।” विवेक बंसल की निगाह, जेवरातों को इकट्ठा करते दूसरे पर गयी- “हम कुछ कर नहीं सकते इस वक्त। सबके सामने वो डकैती कर रहे।”

“हम देख रहे हैं। इतना ही बहुत है।” शाहिद खान शब्दों को चबाकर कहा- “इस नाजुक मौके पर कोई कुछ नहीं करने चाहेगा। बाहर बारूद बांधे दोनों व्यक्तियों ने पुलिस को खामोश रहने पर मजबूर कर रखा है।”

विवेक बंसल का चेहरा बता रहा था कि वो ऐसे मौके पर कुछ कर गुजरना चाहता है। परन्तु समझ नहीं पा रहे या कि क्या करे।

इस तरह डकैती का मंजर उसने पहले कभी नहीं देखा था।

तभी शाहिद खान एक कदम आगे बढ़कर ठिठका और माईक थामें व्यक्ति को देखकर ऊंचे स्वर में बोला।

“इस नकाब के पीछे तुम खुद को छिपा नहीं सकते देवराज चौहान।”

सबकी निगाह शाहिद खान की तरफ गयी।

माईक वाले ने उसे देखा।

वो चारों नकाबपोश भी पल भर के लिये ठिठके।

“तुम जल्दी से अपना काम करो।” अपने चारों साथियों से कहा फिर शाहिद खान को देखा- “तुम कैसे कह सकते हो कि मैं देवराज चौहान हूं।”

“मुझे खबर थी कि देवराज चौहान यहां डकैती करने वाला है।” शाहिद खान ने शांत स्वर में कहा।

“मैं देवराज चौहान नहीं हूं।” उस व्यक्ति ने कहा- “देवराज चौहान उन चारों में है।”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े कहां है?”

“वानखेड़े?”

“हाँ।” शाहिद खान का स्वर सामान्य लेकिन सख्त था- “परसों से वानखेड़े साहब...।”

“खामोश हो जाओ। मुझे बातों में लगाने की कोशिश मत...।”

“मैं सिर्फ वानखेड़े साहब की बात कर रहा...।”

“इस वक्त तुम्हें किसी बात का जवाब नहीं मिल सकता।”

उसने कठोर स्वर में कहा- “खामोश हो जाओ।”

शाहिद खान होंठ भींचकर उसे देखने लगा।

दो पल चुप्पी में बीत गये।

“तुम इस डकैती में कामयाब नहीं हो सकते।” एकाएक विवेक बंसल कह उठा।

“तुम रोकोगे हमें?” माईक थामे वो खतरनाक स्वर में गुर्रा उठा। विवेक बंसल समझ नहीं पाया कि क्या कहें। हड़बड़ा-सा उठा।

“बेवकूफी वाली बातें मत करो।” शाहिद खान ने कहा- “हम तुम लोगों को रोक ही नहीं सकते। बल्कि तुम सबकी गर्दनें भी तोड़ सकते हैं। हमारी खामोशी का शुक्रिया अदा करो कि...”

“कुछ नहीं कर सकते तुम लोग।” वो कड़वे स्वर में कह उठा- “मैं तो चाहता हूं कि तुम लोग कुछ करो। ताकि कल के अखबार में ढेरों लाशें का जिक्र हो। इस होटल के मलबे में बदले जाने की तस्वीर हो। साथ में ये भी खबर हो कि मलबे में से अभी और भी लाशें निकल सकती हैं।”

इंस्पेक्टर शाहिद खान होंठ भींचकर रह गया।

“जब तक हमारे दो आदमी बारूद के साथ बाहर हैं, तब तक तुम लोग कुछ भी नहीं कर सकते।”

“उसके बाद क्या बच जाओगे?”

“बकवास बंद करो।” माईक वाला गुर्रा उठा- “बहुत हो गया।”

देवराज चौहान की पैनी निगाह डकैती कर रहे, उन पांचों पर बारी-बारी फिर रही थी। वो उनमें से किसी को पहचान लेना चाहता था कि किसी को कहीं देखा हो। किसी की चाल-ढाल से उसे पहचान ले। परन्तु उसकी नजरें ऐसी कोई भी बात नहीं पहचान रही थी।

वे अब अपने पर बहुत हद तक काबू पा चुका था। जो कुछ भी उसकी आंखों के सामने हो रहा था, वो उसकी ही डकैती की योजना थी। रिवॉल्वरें, नकाब, काम करने का ढंग, एक-एक चीज जो भी, जो उसके मुंह से निकली थी।

कौन है ये लोग?

इन्हें कैसे पता चला कि वो ये सब करने जा रहा है और वक़्त से ठीक पहले ये हरकत में आ गये। इस वक्त वो उन लोगों की डकैती को थोड़ी-सी कोशिश करके, बेकार कर सकता था, क्योंकी वो तो जानता था कि बाहर मौजूद दोनों व्यक्ति बारूद मैन नहीं हैं। पुलिस को ज्यादा डर बाहर वालों का था कि उनकी हरकत पर पर बाहर वाले बारूद के साथ अपनों को न उड़ा दें। उससे तबाही ज्यादा हो सकती है। बेगुनाह मर सकते थे। अगर पुलिस को जरा-सा भी इशारा मिल जाता कि बाहर दोनों व्यक्ति खाली हैं तो पुलिस ने अवश्य कुछ कर दिखाना था।

वो लोग फुर्ती से जेवरातों को समेट रहे थे। हर कोई सांस रोके अरबों की डकैती को होते देख रहा था।

लेकिन देवराज चौहान का इरादा उनकी डकैती खराब करने का जरा भी नहीं था। इस समय उसके मन में सिर्फ यही बात थी कि उसकी योजना कैसे इन तक पहुंची। कौन हैं ये लोग? इनके डकैती कर लेने के बाद ही इन बातों का जवाब तलाश कर सकता था। अगर ये पुलिस के पास पहुंच गये, तो इन्हें पुलिस ने कभी सांस लेने का मौका नहीं देना और उसकी बातों का जवाब इन लोगों से बात किए बिना कभी नहीं मिल पायेगा।

“शर्मा।” प्रवेश गोदरा फुसफुसाया।

“हां”

“ये क्या हो रहा है?”

“डकैती हो रही है। वो ही डकैती जो हमने करनी थी। अब कोई और लोग कर रहे हैं।” कमल शर्मा के होठों से निकला।

“मुझे तो गड़बड़ लग रही है शर्मा।”

“क्या?”

“ये सारा काम देवराज चौहान करा रहा है।”

“देवराज चौहान?” कमल शर्मा के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।

“हां उसके मन में लालच आ गया है।” प्रवेश गोदरा एक-एक शब्द चबाकर कह उठा- “योजना बनाकर, दिखावे के तौर पर वो हमें यहां ले आया। उधर, इन आदमियों को तैयार कर रखा था, जो अब डकैती कर रहे हैं। देवराज चौहान अब ये दर्शा रहा है कि उनके काम करने से पहले ही, कोई दूसरा डकैती के लिये आ गया।”

कमल शर्मा ने सूखे होठों पर जीभ फेरकर, गोदरा को देखा।

“देवराज चौहान, ऐसा क्यों करेगा?” शर्मा बोला।

“इसलिए कि हमें दस अरब का हिस्सा न देना पड़े।”

कमल शर्मा कुछ पलों के लिए चुप कर गया। फिर कह उठा।

“तेरी बात मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही।”

“क्यों-वजह?”

“वजह मैं नहीं जानता, लेकिन मुझे नहीं विश्वास कि देवराज चौहान ऐसा करेगा।”

“ठीक मौके पर, जब हम सब कुछ करने जा रहे थे कि ये सब हो गया। ऐसी गड़बड़ सिर्फ देवराज चौहान ही कर सकता है। कहीं और से ऐसी गड़बड़ नहीं हो सकती।” प्रवेश गोदरा दृढ़ स्वर में कह उठा- “देवराज चौहान के मन में बेईमानी आ गयी है कि वो हमें दस अरब का हिस्सा नहीं देना चाहता। मुझे तो और भी शक हो रहा है।”

“क्या?”

“इन लोगों ने, जो नकाब चेहरों पर डाल रखे हैं। जो रिवॉल्वरें हाथों में हैं शायद ये वो ही सब सामान हो सकता है, जो रूपा ने फ्लश टैंक में रखा है।”

कमल शर्मा चौंका।

“ये कैसे हो सकता है?”

“मैंने अपना शक जाहिर किया है कि अगर देवराज चौहान के इशारे पर ही ये सब हो रहा है तो ये नकाब और रिवॉल्वरें वो ही हो सकती हैं, जो रूपा ने फ्लश टैंक में रखी थी। वरना, इन लोगों को कैसे पता चला कि फ्लश टैंक में रिवॉल्वरें और नकाब हैं। इनकी गिनती करो। ये भी पांच हैं और हम भी पांच हैं। समझे क्या?”

कमल शर्मा सोच भरी निगाहों से, प्रवेश गोदरा को देखने लगा।

गोदरा के होठ भिंचे हुये थे।

“क्या मालूम तुम्हारा ख्याल गलत हो। मैडम ईरानी का रखा सामान फ्लश टैंक में ही पड़ा हो।” कुछ पल बाद शर्मा बोला।

“ये डकैती निपट जाये। सच-झूठ सामने आ जायेगा।” प्रवेश गोदरा का चेहरा बता रहा था कि वो सिर से पांव तक गुस्से में भर चुका है- “सच मानो शर्मा, इतनी बड़ी गड़बड़ सिर्फ देवराज चौहान के इशारे पर ही हो सकती है।”

शर्मा ने गोदरा को देखा फिर उसकी घूमती निगाह कुछ दूर दीवार के साथ सटे देवराज चौहान पर गयी।

“गोदरा साहब।” शर्मा बोला- “देवराज चौहान कितने आराम खड़ा है।

गोदरा ने भी उधर देखा। 

“हां।” गोदरा शब्दों को चबाकर कह उठा- “इस तरह खड़ा देख रहा है कि उसकी योजना पर ठीक से काम हो रहा है या नहीं। मेरी बात सच हो रही है कि देवराज चौहान ने ही ये गड़बड़ की है कि हमें दस अरब न देना पड़े।

लेकिन मैं इतनी आसानी से देवराज चौहान की इस चाल में फंसने वाला नहीं।”

“देवराज चौहान का इस तरह आराम से खड़ा होना, तुम्हारी बात पर सच की मुहर लगाता है।” शर्मा ने कहा।

“वो कैसे?”

“यहां सिर्फ पांच हैं, जिन्होंने रिवॉल्वरें थाम रखी हैं। इन पर काबू पाना कठिन काम नहीं। एक-दो इधर के मरें या उधर के, उन पर काबू पाया जा सकता है।” शर्मा एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठा- “पुलिस तो इसलिये कुछ नहीं कर रही कि बाहर खड़े दोनों आदमी गड़बड़ होने पर ढेर सारे बारूद के साथ खुद को न उड़ा दें। होटल तबाह न हो जाये। लोग न मर जायें, लेकिन देवराज चौहान खामोश क्यों है। उसकी डकैती पर कोई और हाथ मार रहा है। ऐसे में उसे पूरी कोशिश करनी चाहिये कि डकैती फेल हो जाये। वो पुलिस को तो नहीं बता सकता है कि बाहर खड़े दोनों बारूद मैन नकली हैं। ऐसा किया तो खुद फंस जायेगा। लेकिन हौसला दिखाकर ऐसा तो कर सकता है कि उसके साथ पुलिस भी इन पांचों पर झपट पड़े। या कोई दूसरा तरीका अपना सकता है, इस डकैती को फेल करने के लिये। मामूली काम है इस वक्त ये करना देवराज चौहान के लिये। परन्तु वो कुछ नहीं कर रहा। कुछ करेगा भी नहीं। क्योंकि ये सब उसी के इशारे पर हो रहा है। मुझे अब विश्वास होता जा रहा है कि तुम ठीक कह रहे हो। देवराज चौहान की चाल है ये।”

दोनों के चेहरे गुस्से से सुलग रहे थे।

धीमें स्वर में उनकी बातें हो रही थी।

“गोदरा साहब।”

“अभी देवराज चौहान को कुछ नहीं कहेंगे। देखेंगे कि बाद में वो क्या कहता है। देर-सवेर में हमसे छुटकारा पाकर ये डकैती की दौलत के पास जाना चाहेगा। तब सोचेंगे कि हमें क्या करना है।”

शर्मा ने सोच भरे गम्भीर स्वर में कहा- “सीधे-सीधे मुंह खोलना ठीक नहीं। जो भी हो, हम देवराज चौहान का मुकाबला नहीं कर सकेंगे। जो करना होगा, खामोशी से करेंगे। देवराज चौहान ने हमारे साथ चाल चली है तो उसकी चाल का जवाब हम चाल से देंगे।”

दांत भींचे प्रवेश गोदरा सिर हिलाकर रह गया।

जगमोहन की आंखों में खतरनाक भाव ठहरे हुए थे। उसकी खा जाने वाली निगाहें उन सब पर फिर रही थी, जो डकैती कर रहे थे और अरबों के जेवरातों को बड़ी-सी चादर में समेट रहे थे। उसकी सोचों के मुताबिक ये सारे जेवरात उनके थे। इस पर उनका हक बनता था। पांच मिनट पहले व हरकत में आ गये होते तो ये सारे अरबों के जेवरात वे समेट रहे होते। यानि कि वो सोच रहा था कि ये दौलत उनकी है जिसे दूसरे ले जाने की तैयारी में है। वो तो इन लोगों पर झपट पड़ना चाहता था, परन्तु ऐसा करना खतरनाक था।वो फंस सकता था। हाथ बांधे मजबूरी में खड़ा वो अरबों के जेवरातों को चादर में सिमटते देख रहा था।

ठीक बगल में सोहनलाल खड़ा था। ये सब हुआ देखकर, वो भी स्तब्ध हुआ पड़ा था।

“जगमोहन।” सोहनलाल के होठों से धीमा स्वर निकला।

“हूं।” सोहनलाल की निगाहें सिमटते जेवरातों पर थी। आधे से ज्यादा माल चादर में पहुंच चुका था।

“ये-ये सब क्या हो रहा है। मेरी समझ से तो बाहर...”

“लेकिन मेरी समझ में सब कुछ आ रहा है।” जगमोहन की आवाज में दरिन्दगी भर आयी।

“क्या-क्या समझ में आ रहा है?”

“ये लोग हमारा माल लूट रहे हैं। इस वक्त ये सारा माल हम समेट रहे होते सोहनलाल।”

सोहनलाल ने शांत निगाह जगमोहन पर मारी फिर कह उठा।

“सब कुछ तो वैसा ही हो रहा है, जैसी योजना देवराज चौहान ने बताई-समझाई थी।”

“इसका मतलब हमारी योजना बाहर गई।” सोहनलाल बोला- “यानि कि हममें से कोई इन लोगों से मिला हुआ है जिसने हमारी योजना का जर्रा-जर्रा इन लोगों को बताया और ये लोग हमसे पहले ही हरकत में आ गये।”

“कौन मिला हुआ हो सकता है।” जगमोहन ने भिंचे स्वर में कहा।

“गोदरा या कमल शर्मा के अलावा और कौन होगा। ये डबल गेम उन्होंने ही खेली है।”

“ये बात बाद में सोचेंगे। तुमने देखा ये पांच हैं और हम भी पांच ने ही ये सब करना था।”

“हां।”

“इससे ये तो स्पष्ट था कि गड़गड़ हो चुकी है। पांच और पांच का इत्तफाक नहीं हो सकता।” जगमोहन एक-एक शब्द चबाकर कह उठा था- “और तो और, देवराज चौहान ने जो दो आदमी नकली बारूद के साथ बाहर खड़े किए थे, धमकी देने के लिये, ये लोग अपनी धमकी में उन्हीं दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं।”

“ओह। ये तो मैंने सोचा नहीं...।”

“सोहनलाल। इन लोगों को हमारी योजना की भी पूरी तरह से जानकारी थी। सारा काम तैयार मिला है इन्हें। मेहनत हमारी और खा गये ये।”

“अपने किसी ढंग से रिवॉल्वरें और नकाबें ले आये भीतर...”

सोहनलाल के चेहरे पर सख्ती थी।

“ये गद्दारी गोदरा या कमल शर्मा ने की है, या फिर दोनों ने मिलकर की है।” सोहनलाल कड़े स्वर में कह उठा।

“ये बात मेरे गले से नीचे नहीं उतर रही।”

“क्या मतलब?”

“पच्चीस-तीस अरब की डकैती में, उनकी जानकारी के मुताबिक दस अरब का हिस्सा उन्हें मिलना था, जो कि पर्याप्त से कुछ ज्यादा ही था। दस अरब बहुत होता है। ऐसे में वो गद्दारी की क्यों सोचेंगे?”

“तो फिर हमारी योजना बाहर कैसे गयी? कैसे किसी को पता चला कि।”

“इसके लिये सोचना पड़ेगा कि किस गली को खुला छोड़ दिया। कहां ताला लगाना भूल गये।” जगमोहन एक-एक शब्द चबाकर कह उठा- “सबसे पहले तो ये देखना है कि इस बारे में जानकारी किस-किस को थी कि हम डकैती करने जा रहे हैं। इसमें कौन-कौन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमसे जुड़ा हुआ था।”

“क्या मतलब?”

“जैसे कि रनवीर भंडारी जानता था कि हम डकैती करने वाले हैं। गोदरा की गर्लफ्रेंड रूपा ईरानी जानती थी कि हम डकैती करने वाले हैं, जैसे कि बाहर नकली बारूदी मैन ने जान लिया होगा कि हम डकैती करने वाले हैं।  जिस मदनलाल ने वानखेडे को कैद कर रखा है, उसने किसी तरह जान लिया होगा कि हम अरबों के हीरे-जेवरातों की डकैती करने के फेर में हैं। इनके साथ गोदरा और कमल शर्मा के नाम भी जोड़ सकते हो सोहनलाल।”

“गोदरा और कमल शर्मा को अभी बीच में न लो, दूसरों के लिये सवाल उठता है कि हमारी योजना के जर्रे-जर्रे की जानकारी इनको कैसे हो गयी। ये बात तो हममें से ही किसी ने निकाली होगी।”

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली।

कई पलों तक वे एक-दूसरे को देखते रहे।

“ये वक्त इन बातों को निचोड़ने का नहीं है। हमारे सामने जो डकैती हो रही है, इसके बाद हम फुर्सत-ही-फुर्सत में हैं। आराम से यही बातें करनी है। वैसे मदनलाल को, पुलिस की-कानून की दुहाई देकर, वानखेड़े सब कुछ बता सकता है कि देवराज चौहान डकैती करने वाला है। वो उसे कैद से आजाद कर दे।”

यानि कि इस तरह मदनलाल को हमारी योजना का पता चल सकता है?

“मैं तो अपने ख्याल जाहिर कर रहा हूं। रूपा ईरानी डकैती के बारे में जानती थी। वो, गोदरा को गोदी में बिठाकर आसानी से हमारी योजना के बारे में जान सकती थी। यानि कि इन बातों के नतीजे पर पहुंचना आसान नहीं है। ये बातें तो अब फुर्सत की। सामने देखते रहो कि हमारे माल को, दूसरे कैसे लूट रहे हैं।”

“हमारे माल को?”

“गलत क्या कहा-अगर पांच मिनट पहले हम हरकत में आ जाते तो ये सब यहां खड़े होते और हम अरबों की कीमत के जेवरातों को समेट रहे होते। यहां मौजूद सारी दौलत को मैं अपनी ही समझ रहा हूं।”

तभी स्पीकरों से आती मध्यम-सी आवाज सबके कानों में पड़ी।

“जो जैसा है, वैसा ही रहे, सब ठीक चल रहा है। पांच मिनट की बात है।” काऊंटर के पास खड़ा व्यक्ति हाथ में पकड़े माईक

पर बोल रहा था- “मुझे खुशी है कि सारा काम आराम से हो रहा है। जरा भी खून-खराबा नहीं हुआ।”

☐☐☐