पारसनाथ कार ड्राइव कर रहा था। मोना चौधरी बगल की सीट पर बैठी थी। महाजन पीछे वाली सीट पर मौजूद था। बंद बोतल पास रखी थी। जब जरूरत पड़ती, घूंट मार लेता था।
मोना चौधरी दोनों को बता रही थी कि वहां पर क्या-क्या हो सकता है और किस-किस हालात में क्या-क्या कदम उठाना है। जब वो मोती बाग रेड लाइट पर पहुंचे तो नौ बज रहे थे और फुटपाथ पर रतनचंद खड़ा था। उससे सौ कदम दूर एक कार खड़ी थी। सुबह के वक्त तीव्रता से गुजरने वाले रोजमर्रा के वाहनों का दौर जारी था।
मोना चौधरी के कहने पर पारसनाथ ने रतनचंद के पास कार रोकी।
"भीतर आ जाओ।"
मोना चौधरी के कहते ही रतनचंद भीतर आ बैठा। एक निगाह पारसनाथ पर मारी।
"ये पारसनाथ है।"
मोना चौधरी के कहने पर रतनचंद ने फौरन गर्दन हिलाई और बोला।
"वो सामने कार खड़ी है। उसमें वे सब लोग हैं।"
तीनों ने कार पर निगाह मारी।
"रतनचंद।" मोना चौधरी गंभीर स्वर में कह उठी--- "यह तो तुम भी समझते हो कि दोनों के सामने होने पर कैसे भी हालात पैदा हो सकते हैं। कुछ भी हो सकता है। ऐसा करके, सच्चाई जानने के लिए हम जुआ खेल रहे हैं। कोई जरूरी नहीं कि पत्ते हमारे हाथ में ही पड़ें।"
"मालूम है।" रतनचंद ने बेचैनी से कहा--- "कुछ बातें मन में रखी जाती हैं। बताई नहीं जाती।"
"उन दोनों में से कोई भी मर सकता है।"
"हां।" रतनचंद ने बेचैनी से पहलू बदला।
"असली हो या नकली। सामने वाले पर कैसा भी वार कर सकता है। अपनी योजना तैयार करने के लिए जयपुर वाले के पास, तब बहुत वक्त था, जब मैं वहां से चली आई और तुम भी आ गए। वो हवेली में कई घंटे अकेला रहा था। दिल्ली में आकर उसने कहीं फोन किया?" मोना चौधरी ने पूछा।
"मैं अपने कामों में व्यस्त था। नींद भी ली। वो अकेले कमरे में ही रहा। ऐसे में वो फोन पर किसी से बात भी करे तो क्या मालूम पड़ेगा। मोबाइल फोन तो हर वक्त वो जेबों में ठूंसे रहता है।"
"खैर...।" मोना चौधरी ही पुनः बोली--- "इधर दिल्ली वाले के पास भी अपनी योजना तैयार करने के लिए बहुत वक्त था। मैंने उससे सुबह चार बजे बात की और बारह बजे मिलने का वक्त तय किया। इतने घंटों में वो भी पुख्ता योजना तैयार कर सकता है। जिसने जो किया है, वो सामने आ जाएगा और हमें यही कोशिश करनी है कि दोनों में से किसी की भी जान न जाये। मरे तो वही मरे, जो क्लोन है। नकली वासवानी है।"
रतनचंद सिर हिलाकर रह गया।
"जयपुर में यहां तक तुम लोगों का किसी ने पीछा किया?"
"मैंने इस बारे में ध्यान नहीं दिया।" रतनचंद को जैसे अपनी भूल का अहसास हुआ।
"और दिल्ली में?"
"दिमागी तौर पर इस मामले में मैं बहुत व्यस्त रहा हूं।" रतनचंद गहरी सांस लेकर कह उठा--- "पीछा किए जाने के बारे में ध्यान न देकर भूल कर बैठा हूं।"
"और अब कोई तुम लोगों का पीछा करेगा तो, किसी भी कीमत पर जान नहीं सकोगे। पीछा करने वाले इस बारे में सतर्क होंगे कि इस खास मौके पर तुम लोग उनके पीछा किए जाने के बारे में जान न सको।"
होंठ भींचे रतनचंद मोना चौधरी को देखने लगा।
"तुम्हें याद होगा कि मैंने जयपुर में कहा था कि दोनों के सामने आने पर बेशक कुछ भी हो, मेरी इजाजत के बिना कोई हरकत में नहीं आएगा।" मोना चौधरी ने कहा।
"हां। याद है।"
"ये बात अपने दोनों असिस्टेंट और बलराम को समझा दी।"
"बता चुका हूं।"
"तुम्हें वहां का रास्ता मालूम है, जहां मुलाकात की जगह तय की है।"
"मालूम है। दिल्ली के सब रास्तों से अच्छी तरह वाकिफ हूं। किसी-न-किसी केस के सिलसिले में अक्सर दिल्ली आना पड़ता है। मुझे कहीं भी पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं।" रतनचंद बोला।
"ठीक है। अपने असिस्टेंट और बलराम को मेरी कार में भेज दो और तुम कार ड्राइव करके, उसे साथ लिए वहां तक पहुंचोगे, जहां हमें जाना है। हम तुम्हारे पीछे रहेंगे। तीन-चार किलोमीटर पहले ही कार रोककर तुम हमारी कार में आ जाना और वो अकेला आगे बढ़ेगा। उसे अच्छी तरह समझा देना।"
"वो अकेला जाने से इंकार कर दे तो?" रतनचंद बोला।
"आनाकानी अवश्य कर सकता है, लेकिन पक्का इंकार करने की पोजीशन में, अब वो नहीं है। इस बात से वो भी बाकी होगा। उसकी 'डोर' अब हमारे हाथों में आ चुकी है।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा--- "उसे समझा देना कि हम उसे घेरे रहेंगे। वो खुद को अकेला न समझे। उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा और खामख्वाह सिर-खोपड़ी घुमाकर हमें तलाश करने की थी चेष्टा न करे। उसके सामने यही दर्शाए कि अकेला ही वो यहां आया है। उससे बातें करे। बाकी जो देखना-समझना है। वो हम समझ लेंगे।"
रतनचंद बिना कुछ कहे, दरवाजा खोलकर बाहर निकला।
"उसके पास रिवाल्वर है इस वक्त?" मोना चौधरी ने पूछा।
"हां।" रतनचंद ने सिर हिलाया--- "लेने की कोशिश करूं क्या?"
"नहीं। कोई जरूरत नहीं।"
रतनचंद आगे खड़ी कार की तरफ बढ़ गया।
कृष्ण सूरी, वीरेंद्र और बलराम उनकी कार में आ पहुंचे थे। जब आगे वाली कार, वहां से रवाना हुई तो पारसनाथ ने काफी फासला रखकर, कार उनके पीछे लगा दी।
इस सफर को जारी हुए आधा घंटा बीत चुका था।
तब एक घंटा पूरा होने को था, जब आगे वाली कार गुड़गांव रोड पर दौड़ रही थी। जो कि काफी हद तक सुनसान थी और उनकी मंजिल पास ही थी।
"रतनचंद को कार यहीं रोककर, उसे अकेला छोड़ देना चाहिए।" मोना चौधरी बोली--- "वो जगह अब ज्यादा दूर नहीं।"
उनकी कार काफी पीछे थी।
"उन्हें रोकूं।" पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा।
उसी पल मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।
"वो शायद रुक रहे हैं।"
पारसनाथ ने भी कार की गति धीमी कर दी।
आगे वाली कार सड़क के किनारे रुक गई। पारसनाथ ने भी एक तरफ कार करके रोक दी। एक मिनट तक उनकी निगाहें, आगे वाली कार पर टिकी रही। फिर रतनचंद बाहर निकलता नजर आया। बाहर खड़ा होकर जब उसने दरवाजा बंद किया तो, वो भी बाहर निकला और कार के गिर्द घूमता हुआ ड्राइविंग सीट पर बैठा। चलने के अंदाज पर वो कुछ उखड़ा-सा लग रहा था। फिर वो कार आगे बढ़ गई। रतनचंद वहीं खड़ा जाती कार को देखता रहा फिर उसने इस तरफ देखा।
पारसनाथ ने कार आगे बढ़ा दी।
कुछ ही पलों बाद रतनचंद उनकी कार में मौजूद था। कार फुल होने की वजह से मोना चौधरी ने रतनचंद को अपने साथ ही सटाकर बिठा लिया था।
"उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि कहां पहुंचना है।" मोना चौधरी बोली।
"हां।" रतनचंद ने बेचैनी से कहा--- "इस बात से वो बहुत गुस्से में आ गया था। पहले तो नहीं माना। लेकिन तुम ठीक कहती थी। उसे मानना ही पड़ा। अकेला रहने पर वो और भी खतरा महसूस करने लगा था।"
"मेरे ख्याल में तुम लोगों ने वासवानी साहब को भारी खतरे में डाल दिया है।" बलराम बोला--- "वो...।"
"हम उसके साथ हैं।" रतनचंद कह उठा--- "देख नहीं रहे।"
बलराम होंठ भींचकर रह गया। ये सब बातें शायद उसे पसंद नहीं आ रही थीं।
"वो, दूसरा वाला वासवानी।" पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा--- "भी पूरी तैयारी कर चुका होगा।"
"हां।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "कहने को तो उसने कहा था कि उसके साथ मारवाह ही होगा। लेकिन मैं जानती हूं अपनी तरफ से पूरा इंतजाम करके आएगा कि, उसकी जान को कोई खतरा न रहे।"
कई पलों तक कार में खामोशी रही।
"बेबी।" महाजन घूंट भरकर बोला--- "हो सकता है, दिल्ली वाला ढेर आदमी साथ लाए और उसे भून दे।"
"इतने ज्यादा। आदमी भी वो साथ नहीं लाएगा। क्योंकि अभी तक तो यही जानता होगा कि, यहां पर मुझसे मिलने आ रहा है।" मोना चौधरी होंठ सिकोड़कर बोली--- "लेकिन कोई पक्का इंतजाम तो करके आएगा ही।"
■■■
दिन के साढ़े ग्यारह बज रहे थे।
सूर्य सिर पर चढ़ता हुआ आग का गोला बनता जा रहा था। परंतु वो खुली जगह होने के कारण, गर्मी कम ही महसूस हो रही थी। वक्त से पहले पहुंच गया था वो। बारह बजने में अभी आधा घंटा बाकी था। आसपास पेड़ों की संख्या बहुत थी। ये ग्रीन बैल्ट एरिया था। उसने पेड़ की छांव में कार रोकी और बाहर निकलकर, चंद कदमों के फासले पर, दूसरे पेड़ की छांव में खड़ा हो गया था। जमीन सूखी थी। कहीं-कहीं पर ही घास नजर आ रही थी।
उसकी पैनी निगाह हर तरफ घूम रही थी। जाहिर था कि उसे उसकी तलाश थी जो उसके चेहरे जैसा है। वो यहां पहुंचने वाला है। सिर से पैर तक वो बेचैनी के तालाब में डूबा हुआ था। रह-रहकर उसके दांत भिंच रहे थे और हाथ जेब में पड़ी रिवाल्वर को छूने लगता।
बीतते वक्त के साथ-साथ उसकी व्याकुलता, हद पार करने लगी थी।
बारह बज गए।
वो छिपी निगाहों से मोना चौधरी-रतनचंद वगैरह को भी देखने की चेष्टा कर रहा था कि वो कहां पर है परंतु वह नजर नहीं आए।
तब बारह के ऊपर पंद्रह मिनट हुए होंगे कि कार के इंजन की आवाज उसके कानों में पड़ी। फिर विदेशी कार नजर आई। जो कि पेड़ों के बीच पहुंचते ही रुक गई थी। कार पर निगाह पड़ते ही उसके होंठ भिंच गए थे। हाथ जेब में पड़ी रिवाल्वर तक जा पहुंचा।
उसके देखते-ही-देखते कार का दरवाजा खुला और मारवाह नजर आया। उसने तुरंत पीछे का दरवाजा खोला तो वो निकला। उस जैसे चेहरे वाला। जिसका उसे इंतजार था। उसे देखते ही उसके चेहरे पर दरिंदगी बरसने लगी थी। आंखों में वहशी चमक आ ठहरी थी। वो तुरंत पेड़ के तने की ओट में हो गया और छिपी निगाहों से उन्हें देखने लगा।
अजीत वासवानी और मारवाह ने हर तरफ नजर मारी। सुनसानी-शांति और वीरानी के अलावा उन्हें कुछ भी नजर नहीं आया। फिर पेड़ के नीचे खड़ी कार को देखा।
"सर।" मारवाह बोला--- "वो कार...।"
"इसका मतलब मोना चौधरी यहां पहुंच चुकी है।" अजीत वासवानी ने कहा और शांत भाव से आगे बढ़ा। मारवाह भी।
मारवाह आसपास देखते हुए बोला।
"मोना चौधरी कहीं नजर नहीं आ रही।"
"यहीं होगी। देखते रहो।" अजीत वासवानी की निगाह भी इधर-उधर जा रही थी--- "सावधान रहना। यहां मेरे लिए कोई खतरा भी हो सकता है। ऐसे वक्त में हमें किसी पर भी भरोसा नहीं करना चाहिए।"
"मेरे ख्याल में तो आपको मोना चौधरी के कहने पर यहां भी नहीं आना चाहिए था।" मारवाह बोला।
"इस वक्त मोना चौधरी की बात मानना मजबूरी है।" अजीत वासवानी आसपास देखता हुआ बोला--- "मेरे क्लोन को तो वो खत्म कर चुकी है। इतना बड़ा खतरा उसने मेरे सिर से उतार दिया। ऐसे में उससे एक बार मिल लेने में, उसकी बात मान लेने में हर्ज नहीं होना चाहिए। वैसे भी वो मेरे को ऐसे पेपर्स देना चाहती है, जो उसे मेरे क्लोन के पास से मिले हैं।"
"वो कैसे पेपर्स हो सकते हैं। उसके पास कैसे पहुंचे?"
"जो लोग इतनी बड़ी योजना को अंजाम दे सकते हैं, उनके लिए, मेरे महत्वपूर्ण पेपर हासिल करना क्या कठिन रहा होगा। देखने पर ही मालूम होगा कि वो कैसे पेपर्स हैं।" अजीत वासवानी का स्वर शांत था।
वे दोनों कार के पास पहुंचकर ठिठके।
"मोना चौधरी नजर नहीं आ रही।" मारवाह की आंखें सिकुड़ी--- "उसे यहीं, पास ही होना चाहिए और हमें देखते ही सामने आ जाना चाहिए।" कहते हुए मारवाह ने कार के बोनट पर हाथ रखा--- "गर्म है। इसका मतलब खास ज्यादा देर नहीं हुई, कार को यहां पहुंचे।"
दोनों की निगाहें मोना चौधरी की तलाश में इधर-उधर फिरने लगीं।
"कुत्ते।" इतनी तेज आवाज वहां गूंजी कि उन्हें कुछ समझ नहीं आया। दूसरे ही पल उनकी नजरें जयपुर वाले पर पड़ी जो गुस्से में कांपता हुआ पेड़ के तने के पास खड़ा, दिल्ली वाले को खतरनाक निगाहों से घूर रहा था। उसकी आंखों की सुर्खी, कई कदमों के फासले से ही स्पष्ट नजर आ रही थी।
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उस पर निगाह पड़ते ही दिल्ली वाले का ये हाल हुआ जैसे सैकड़ों बिच्छुओं ने एक साथ उसे डंक मार दिया हो। फटी-फटी, फैली आंखें। हैरानी से खुला मुंह। सांसें लेनी ही जैसे भूल गया हो वो। बुत की तरह ऐसे खड़ा था, जैसे होशो-हवास छिन गए हों। मस्तिष्क में जाने कैसा तूफान उठ खड़ा हुआ था कि कोई भी सोच-विचार वहां टिक नहीं पा रहा था।
मारवाह का हाल भी उससे कुछ जुदा नहीं था।
"वासवानी साहब।" मारवाह के होंठों से फटा-फटा-सा स्वर निकला।
अजीत वासवानी के मस्तिष्क को तीव्र झटका लगा। वो बुरे हाल से वापस लौटने लगा।
"ये--- ये जिंदा है।" उसके होंठों से निकला।
"ह--- हां।" अगले ही पल मारवाह के हाथ में रिवाल्वर नजर आने लगी--- "क्लोन जिंदा है और मोना चौधरी ने कहा था कि इसे खत्म कर आई है, जयपुर में।"
अजीत वासवानी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा।
"मोना चौधरी ने धोखे में रखकर हमें फंसा दिया है। मोना चौधरी ने इसे नहीं मारा और यहां बुलाकर इसे, हमारे सामने खड़ा कर दिया है। इन लोगों ने, मोना चौधरी को बड़ी रकम देकर खरीद लिया है मारवाह।"
"इसे जिंदा देखकर तो यही साबित होता है।" मारवाह के दांत भिंच गए--- "इसे शूट कर...।"
"नहीं। अभी कुछ मत करना।" अजीत वासवानी दांत भींचकर कह उठा--- "मोना चौधरी ने हमें यहां बुलाया है तो वह भी कहीं पास ही होगी। और...।"
"हम फंस गए हैं वासवानी साहब। हमें पूरा इंतजाम करके निकलना चाहिए था। मैंने आपसे कहा भी था लेकिन आप नहीं माने।" मारवाह गुस्से में था--- "मेरे ख्याल में हमारी मौत करीब है। मैं पक्का कह सकता हूं कि हमें खत्म करने के लिए यहां तगड़ा घेरा डाला जा चुका है।"
अजीत वासवानी के दांत भिंचे हुए थे। वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे।
"सर।" मारवाह खतरनाक स्वर में कह उठा--- "इसके खत्म हो जाने से सारी मुसीबत टल जाएगी। मैं इसे अभी गोली...।"
"तुम ठीक कहते हो।" अजीत वासवानी ने एक-एक शब्द चबाकर कहा--- "लेकिन उससे पहले मैं मोना चौधरी का झूठा चेहरा देखना चाहता हूं कि सामने आकर वो क्या कहती है। जब इंसान बिक जाए तो उसके चेहरे के भाव देखने वाले होते हैं।"
"आप वक्त खराब कर रहे हैं।"
"मैं जो कह रहा हूं, वही ठीक है। इसे अभी शूट मत...।"
तभी जयपुर वाला वासवानी दहाड़ उठा।
"मारवाह। तू भी इस झूठे के साथ मिल गया। तेरे को पता नहीं चला कि ये मैं नहीं, क्लोन है। या इसने तेरे को इतनी दौलत दे दी कि तू इसे ही, अपना मालिक कहने पर मजबूर हो गया।"
"जुबान बंद कर।" मारवाह गुर्रा उठा--- "मैं वासवानी साहब को अच्छी तरह जानता हूं। ये बातें कहकर तू मेरा दिमाग खराब करना चाहता है। मैं तेरी बातों के झांसे में नहीं आने वाला।"
"होश से काम ले मारवाह।"
"मैं होश से ही काम ले रहा हूं। अगर वासवानी साहब को वक्त पर खबर न मिल गई होती तो तेरी चाल अवश्य सफल हो गई होती। आज तू मेरा मालिक बना होता।"
"मैं तेरा मालिक ही हूं। तुम...।"
"तो फिर ये कौन है।" मारवाह ने पास खड़े अजीत वासवानी की तरफ इशारा किया।
"ये मेरा क्लोन है जो...।"
"बकवास मत कर। मैं सब समझता...।"
"मारवाह।" जयपुर वाला दांत भींचकर बोला--- "अगर इसकी जगह मैं खड़ा हो जाऊं तुम्हारे साथ और ये मेरी जगह पर खड़ा हो जाए तो, उस स्थिति में तुम कैसे कह सकोगे कि मैं अजीत वासवानी नहीं।"
"यही तो तुम चाहते थे और कामयाब नहीं हो सके।" मारवाह कड़वे स्वर में कह उठा--- "मुझे खुशी है कि तुम अपनी कमीनी चाल में सफल नहीं हो सके। वरना मैं अपने मालिक के क्लोन की सेवा में लगा होता।"
जयपुर वाला दांत भींचकर रह गया।
अजीत वासवानी दांत भींचे उसे घूर रहा था।
उनके बीच तनाव भरा माहौल गहरा होता जा रहा था।
"मोना चौधरी कहां है?" अजीत वासवानी ने शब्दों को चबाकर कहा।
"कमीने, तूने उसे भेजा मेरी जान लेने के लिए। तूने सोचा मेरे खत्म होते ही, अरबों की दौलत संभालकर, जिंदगी भर मौज-मस्ती करेगा और तेरे वो दोनों साथी डॉक्टर और दूसरा। तुम सब हरामजादे हो।" वो पागल-सा हुआ लग रहा था।
"मोना चौधरी कहां है?" अजीत वासवानी ने पूछा।
"तुम्हें पता होना चाहिए कि वो कहां है। तीस करोड़ उसे तुमने दिए थे, मैंने नहीं।" वो दांत भींचकर बोला।
"और वो कितने में बिकी।" अजीत वासवानी का लहजा खतरनाक हो उठा।
"क्या मतलब?"
"उसने तुम्हारी जान नहीं ली। तीस करोड़ मैंने तुम्हारी जान लेने के लिए ही दिए थे और तुमने अपनी जान बचाने के लिए उसे कितनी बड़ी रकम दी कि वो तुम्हारा साथ देने पर उतर आई।"
"ये बात मोना चौधरी से पूछ लेना। वो अच्छा जवाब दे देगी।" उसने कड़वे स्वर में कहा।
तभी मारवाह सख्त स्वर में बोला।
"वासवानी साहब, इसने मोना चौधरी को तगड़ी रकम देकर खरीदा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं।"
"मुझे भी यही लगता है।"
"मुझे तो लगता है आने वाले पलों में बुरा होने वाला है। इसे गोली...।"
तभी जयपुर वाला चीखकर कह उठा।
"तुम लोगों ने सोचा मेरा अपहरण करके ये किस्सा खत्म कर दोगे। मेरी मौत के साथ ही तुम लोगों की सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी। लेकिन मैं किस्मत वाला निकला जो तुम्हारे साथियों के चंगुल से भाग निकला और दोबारा हाथ नहीं...।"
"मेरे साथियों के चंगुल से।" उसने कड़वे और व्यंग्य भरे स्वर में कहा।
"हां तुम और...।"
"अगर मेरा कोई साथी होता या होते...।" अजीत वासवानी खा जाने वाले स्वर में कह उठा--- "तो तुम्हें खत्म करने के लिए मैं मोना चौधरी को तीस करोड़ जैसी रकम क्यों देता। मेरे साथी ही तुम्हें ढूंढ लेते और खत्म कर देते।"
"तुम्हारे लिए, मोना चौधरी जैसी खतरनाक शख्सियत को बीच में लाना इसलिए जरूरी हो गया था कि तुम्हारे साथी मुझे ढूंढ नहीं पा रहे थे और मेरा ज्यादा देर आजाद रहना, तुम्हारे लिए खतरे से खाली नहीं था। इसलिए तुमने मोना चौधरी को मुझे अपना क्लोन बताकर कहा कि वो मुझे, जल्दी से खत्म कर दे।"
अजीत वासवानी व्यंग्य से मुस्कुराया।
"गलत।" उसने इंकार में सिर हिलाया--- "अगर मैं क्लोन हूं। तो ऐसी योजना को जन्म देने वाले कितने खतरनाक होंगे, ये तुम सोचो और तुम्हें खत्म करना योजना का अहम हिस्सा होता। ऐसे में वो जमीन-आसमान एक करके तुम्हें ढूंढ लेते और खत्म कर देते। मोना चौधरी को बीच में लाकर, दूसरों की नजरों में मामला और न खोलते। यूँ कि मैं क्लोन नहीं, हकीकत में अजीत वासवानी हूं और जब जब मुझे तुम्हारे बारे में, यानी कि अपने क्लोन के बारे में एक करोड़ की कीमत चुकता करने पर मालूम हुआ तो, मेरे सामने और कोई रास्ता नहीं था कि, किसी से कहता कि तुम्हें खत्म करें। क्योंकि मेरा वजूद खत्म करके, तुम मेरा अस्तित्व ओढ़ लेना चाहते थे। जबसे मुझे तुम्हारे बारे में खबर मिली तब से मैं बंगले में बंद होकर रह गया। बिल्कुल भी बाहर नहीं निकला। बंगले पर रहकर ही देश और विदेशों में मौजूद सारे बिजनेस को जैसे-तैसे संभाल रहा हूं। अपने किसी भी मैनेजर से मैंने रू-ब-रू मुलाकात नहीं की। क्या मालूम, किसे तुम खरीद लो और सामने आते ही वो मुझे गोली...।"
तभी मारवाह दांत भींचकर कह उठा।
"वासवानी साहब, आप इसे सफाई क्यों दे रहे हैं?"
"जरूरी है।"
"क्या मतलब?" मारवाह के होंठ भिंच गए।
"तुम नहीं समझ रहे लेकिन मैं समझ रहा हूं कि क्या चक्कर रहा है।" अजीत वासवानी ने कड़वे स्वर में कहा--- "मोना चौधरी इसे क्यों लाई और उसने यहां मुझे क्यों बुलाया।"
"मैं अभी भी नहीं समझा।"
"बेवकूफ।" अजीत वासवानी पहले वाले स्वर में कह उठा--- "इसने मोना चौधरी को शक में डाल दिया होगा। उसके दिमाग में ठूंस-ठूंसकर भर दिया होगा कि, ये अजीत वासवानी है और मैं क्लोन। मोना चौधरी को धोखे में रखकर, इसकी हत्या करने भेजा है। एक ऐसी स्थिति भी आई होगी कि मोना चौधरी को लगने लगा होगा कि ये सच कह रहा है। ऐसे में पूरी तरह सच्चाई जानने के लिए मोना चौधरी ने इसे मेरे सामने खड़ा कर दिया कि ये मेरे से बातें करे और मालूम हो सके कि क्लोन मैं हूं या फिर ये। मोना चौधरी पास ही कहीं मौजूद हमारी बात सुन रही है।"
"ओह।" मारवाह के होंठों से निकला।
"हमारा ख्याल गलत था कि मोना चौधरी बिक गई है। उसने इससे मोटी रकम ली है।" अजीत वासवानी का स्वर बेहद शांत था--- "बल्कि मोना चौधरी तो ये जानने की कोशिश कर रही है कि असल में कौन है क्लोन। वो नहीं चाहती कि उसके हाथों असली अजीत वासवानी मरे। मैं मोना चौधरी की इस कोशिश को गलत नहीं कहता। वो अपनी जगह ठीक है।"
"लेकिन अब ये कैसे स्पष्ट होगा कि ये ही क्लोन है।" मारवाह कह उठा।
"हो जाएगा। झूठ कभी भी नहीं छिपता। किसी-न-किसी रूप में सामने आ ही जाता है।"
"इसके मुंह से ऐसा कुछ निकलवाना चाहिये कि मोना चौधरी समझ जाए कि यही क्लोन है।"
"मेरे ख्याल में ये कोशिश सफल नहीं होगी।" अजीत वासवानी दांत भींचकर बोला।
"क्यों?"
"ये बेवकूफ नहीं है। इनकी योजना का एक-एक पहलू बहुत पक्का है। और अब तो मोना चौधरी ने इसे कह रखा होगा कि अगर वो असली है तो, मेरे मुंह से ऐसी कोई बात निकलवाए कि लगे मैं क्लोन हूं। ऐसे में तो ये और भी सतर्क होगा इसके मुंह से कोई गलत बात न निकल जाए।" अजीत वासवानी का स्वर कड़वा हो चुका था।
मारवाह होंठ भींचकर रह गया।
जयपुर वाला खा जाने वाली निगाहों से अजीत वासवानी को देखे जा रहा था।
"ये तड़प रहा है कि मेरे मुंह से कुछ ऐसा नहीं निकल रहा कि, मोना चौधरी के सामने खुद को अजीत वासवानी साबित कर सके। ये, भी समझता है कि मेरे मुंह से कोई भी अपने हक में बात निकलवाना, असंभव-सी बात है, क्योंकि क्लोन तो ये है।" अजीत वासवानी ने चुभते स्वर में कहा--- "अब मैं इसके मुंह से कोई ऐसी बात निकलवाने की चेष्टा करता हूं कि मामला साफ हो सके।"
"ये ठीक रहेगा वासवानी साहब।" मारवाह ने होंठ भींचकर कहा।
अजीत वासवानी ने ऊंचे स्वर में कहा।
"तो तुम क्लोन नहीं, असली अजीत वासवानी हो।"
"ये बात तुम बहुत अच्छी तरह जानते हो कि...।"
"तो फिर तुम क्यों भागे फिर रहे हो। डरकर क्यों छिप रहे हो। दुनिया को क्यों नहीं बताते कि तुम ही असली अजीत वासवानी हो और तुम्हारी जगह पर तुम्हारा क्लोन है। इस बात को उठाया क्यों नहीं तुमने। पुलिस के पास जाते। ये कोई छोटा मामला तो नहीं, जो दब जाए। पुलिस तब तक चैन से नहीं बैठती, जब तक असल-नकल का पता नहीं चल जाता। तुम असली हो तो तुम्हें डर कैसा। अजीत वासवानी जैसी हस्ती को तो किसी की परवाह ही नहीं करनी चाहिए कि...।"
"यही बात तो मैं तुमसे कहना चाहता हूं।" जयपुर वाला गुर्रा उठा।
"क्या?"
"कि तुमने मोना चौधरी को मेरी हत्या के लिए क्यों भेजा। तुम पुलिस के पास क्यों नहीं गए, तुम्हारा क्लोन तुम्हारी जगह लेने की चेष्टा कर रहा है। किसी ने तुम्हारा क्लोन बना लिया है। तुम्हारे मन में चोर है, तभी तो तुमने मोना चौधरी से बात की।"
अजीत वासवानी दांत भींचकर कह उठा।
"मोना चौधरी को बीच में लाने का मेरा मतलब सिर्फ ये था कि मैं सिर पर आए खतरे को जल्द से जल्द निपटाना चाहता था। कानून का काम लंबा खिंच जाता है और उस दौरान तुम लोग मेरी हत्या की कोशिश करने में सफल हो सकते थे। मेरी लाश गायब करके तुम मेरी जगह पर आ सकते थे और किसी को पता भी नहीं चलता कि क्या हो गया है। तब पुलिस भी तुम्हें ही असली समझती रहती और तुम लोग बहुत खतरनाक हो, ये मैं जानता हूं। पुलिस को मोटी-मोटी रकम देकर आसानी से मुझे क्लोन साबित कर सकते हो या पुलिस के द्वारा ही मेरे को खत्म करवा...।"
"यही बात। ठीक यही बात, मेरा भी जवाब है, तुम्हारे सवाल का कि मैं पुलिस के पास क्यों नहीं गया और क्यों छिपता फिर रहा हूं।" उसने गुस्से से मुट्ठियां भींचते हुए कहा।
अजीत वासवानी होंठ भींचकर रह गया।
"वासवानी साहब। ये बहुत पक्का होकर आया है। इसके मुंह से कुछ निकलवाना आसान नहीं।"
"जो पक्के होकर आते हैं, वही मौके पर कच्चे पड़ जाते हैं।" अजीत वासवानी ने कठोर स्वर में कहा--- "कोई-न-कोई बात तो इसके मुंह से निकलेगी ही।"
"मेरी मानिए तो उसे शूट करके...।"
"नहीं। इसे मोना चौधरी ही गोली मारेगी। मोना चौधरी पूरी तरह इस मामले के बीच है। ऐसे में उसकी तसल्ली होनी ही चाहिए कि कौन क्लोन है। अगर इसे शूट कर दिया तो मोना चौधरी गुस्से में हमारे साथ बुरा कर सकती है। बात, बातों में है तो बातों में ही रहने दो। ये कुछ गलत करने की कोशिश करे तो बेशक इसे गोली मार देना।"
मारवाह जयपुर वाले को खा जाने वाली निगाहों से देखने लगा।
"मैं क्लोन हूं तो तुम्हारी जगह पर कैसे आ गया। जबकि तुम्हारे पास तो तगड़ी सिक्योरिटी है। हर समय सुरक्षा में रहते हो। कोई मक्खी भी तुम तक नहीं पहुंच सकती।" अजीत वासवानी ने कहा।
जयपुर वाले ने दांत किटकिटाए।
"पूछ तो ऐसे रहे हो, जैसे तुम नहीं जानते।" वो पुनः मुट्ठियां भींचते हुए कह उठा।
"नहीं जानता, तभी तो पूछ रहा हूं।"
जयपुर वाला उसी मुद्रा में उसे देखता रहा फिर मारवाह से बोला।
"मारवाह, तुम्हें अच्छी तरह याद होगा, जब मैं रात को अकेले ही कार लेकर, बाहर निकल गया था घूमने के लिए। तब तुम नींद में थे। उसी रात ही इन लोगों ने मुझे घेरकर मेरा अपहरण कर लिया था और वापस जो आया वो मैं नहीं, ये मेरा क्लोन था और...।"
"वासवानी साहब रातों को अकेले निकलकर घूमने की गलती बहुत बार कर चुके हैं।" मारवाह ने कड़वे स्वर में कहा--- "तुम कब की बात कर रहे हो।"
"जब मैं आखिरी बार रात को कार लेकर निकला था।" जयपुर वाले ने दांत पीसे।
"आखिरी दो बार तो परसों और करीब बारह दिन पहले वासवानी साहब रात को बाहर निकले थे। दोनों ही बार मैं पास नहीं था। लेकिन मैंने अपने असिस्टेंट को आदेश दे रखा है कि वासवानी साहब जब भी इस तरह बाहर निकलें तो मुनासिब फासला रखकर इनका पीछा किया जाए। ये बेशक लाख मना करें, लेकिन इनकी ये बात किसी भी कीमत पर नहीं मानी जाए। इसलिए आखिरी दोनों बार, इनका पीछा किया गया। एक बार आधा घंटा रात को कार ड्राइव करके वापस आ गए और दूसरी बार चालीस मिनट लग गए थे। दोनों ही बार ये मेरे आदमियों की निगाह में रहे कहीं भी इन्होंने कार नहीं रोकी।
"मारवाह।" जयपुर वाला पागलों की तरह दहाड़ उठा।
"चिल्लाता क्यों है। तेरे बाप का खाता हूं क्या?" मारवाह उसी के लहजे में कह उठा।
जयपुर वाला गुस्से में दांत पीसकर रह गया।
अजीत वासवानी का चेहरा क्रोध से जल रहा था।
"बहुत ढिढ है ये। अपने मुंह से कोई बात नहीं निकलने देगा।" अजीत वासवानी गुर्रा उठा।
"मारवाह।" जयपुर वाला गुस्से से सुलगता कह उठा--- "तुम्हारी बहन की शादी पर, मैंने क्या तोहफा दिया था।"
मारवाह से पहले ही अजीत वासवानी कड़वे स्वर में कह उठा।
"मैंने कीमती हीरों का सैट दिया था और ये बात जगजाहिर है। कोई अंदर की बात करो।"
"मारवाह, मैंने तुम्हें कब अपनी सेवा में लिया था और...।"
"छः साल पहले।" अजीत वासवानी ने पहले वाले स्वर में ही कहा--- "तब इक्कीस तारीख थी और लंच मारवाह ने मेरे साथ ही किया था। लेकिन उस दिन मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। इसलिए मैंने नाम का ही लंच लिया था। मारवाह को ये बात अवश्य याद होगी। और अंदर की बात करो। मैं भी तो जानूं कि मेरे क्लोन ने मेरी जगह लेने के लिए कितनी गहराई तक, मेरी जिंदगी के बखिए उधेड़े हैं।"
"क्लोन, मैं नहीं तुम हो। मैं अजीत वासवानी हूं।" जयपुर वाला चीख उठा।
"ये बात मैं तुमसे ज्यादा ऊंची आवाज में कह सकता हूं।" अजीत वासवानी ने दांत भींचकर कहा--- "मैं मरता मर जाऊंगा कमीने, लेकिन अपने बाप-दादा की कमाई दौलत की दुनिया को तुम जैसे लोगों के हाथों में नहीं जाने दूंगा। मेरे सच को कोई भी झूठ नहीं दबा सकता। तुम और तुम्हारे साथियों ने गलत सोचा कि मेरा क्लोन बनाकर तुम लोग मेरा सब कुछ हथिया लोगे। शायद कामयाब भी हो जाते। परंतु वक्त रहते तुम्हारे ही किसी आदमी ने, सिर्फ एक करोड़ के लालच में, मुझे सब बताकर, तुम लोगों की सारी योजना पर पानी फेर दिया। उसी से मुझे पता चला कि तुम जयपुर में हो। मेरा क्लोन जयपुर में बनाया गया। ये सब मुझे न मालूम होता तो फिर कुछ भी हो सकता था। जब मैंने पहली बार मारवाह को तुम्हारी खोजबीन के लिए जयपुर में भेजा तो तुम्हारे आदमियों ने इसे डराकर वापस भेज दिया। दूसरी बार मारवाह जयपुर गया तो तुम्हारे आदमियों ने इसे खत्म करने की चेष्टा की। इसके पास तुम्हारी तस्वीर थी। यानी कि मेरे क्लोन की और इसकी पूछताछ से तुम लोग समझ गए कि तुम लोगों की योजना किसी तरह मुझ तक पहुंच गई है। लेकिन मारवाह बच गया। मोना चौधरी ने उसे बचाकर दिल्ली भेज दिया और तुम्हारी तलाश में लग...।"
"बकवास कर रहे हो तुम। मैं तो खुद अपनी जान बचाने के लिए तुम लोगों से छिप रहा था और फिर मारवाह की जान मैं क्यों लूंगा, ये जानते हुए कि ये धोखे में, मेरे क्लोन का साथ दे रहा है।" जयपुर वाले ने धधकते स्वर में कहा--- "तुम कब तक अपने पर पर पर्दा...।"
"तो मारवाह के पीछे पड़ने वाले तुम्हारे आदमी नहीं थे?" अजीत वासवानी ने दांत भींचकर कहा।
"जहां मैं जयपुर में छिपा था, वहां से बाहर की तो मुझे होश ही नहीं थी कि, कहां क्या हो रहा है। ऐसे में मेरे आदमी कहां से आ गए।" जयपुर वाला फाड़ खाने वाले स्वर में बोला--- "तुम...।"
"तो फिर वो कौन थे, जिन्होंने मारवाह की जान लेने की...।"
"मैं कुछ नहीं जानता। जानता हूं तो सिर्फ इतना ही मैं क्लोन नहीं, अजीत वासवानी हूं और...।"
"बहुत बड़े मक्कार और झूठे हो तुम।" अजीत वासवानी दांत भींचकर कह उठा--- "अपने पर पानी तक नहीं पड़ने दे रहे। तुम्हारे दिमाग को ऐसा प्रशिक्षण दिया गया है कि तुम किसी भी हालत में, किसी भी मौके पर मौत न खा सको।" अजीत वासवानी खतरनाक स्वर में कह उठा।
जयपुर वाला दांत पीसकर गुर्राया।
"तुम हो मक्कार। तुम कमीने हो। झूठे हो। तुम...।"
■■■
मोना चौधरी, महाजन, पारसनाथ, रतनचंद, वीरेंद्र, कृष्ण सूरी और बलराम पेड़ों-झाड़ियों की ओट में उनकी बातें स्पष्ट सुन रहे थे।
आखिरकार महाजन कह उठा।
"बेबी। ये दोनों तो कुत्ते-बिल्लियों की तरह एक-दूसरे के सामने अड़े हुए हैं। मुझे तो कोई फायदा होता नजर नहीं आता।" कहने के पश्चात महाजन ने मुंह बनाया।
मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े हुए थे।
"दोनों ही एक-दूसरे से तेज हैं।" पारसनाथ खुरदरे स्वर में बोला--- "इस तरह असली-नकली के बारे बारे में मालूम नहीं होगा। ये गलत तरीका इस्तेमाल किया गया है।"
"तरीका तो ठीक है।" मोना चौधरी कह उठी--- "लेकिन दोनों का पलड़ा बराबर का नहीं रहा।"
"वो कैसे?" रतनचंद ने पूछा।
"जयपुर से जिस अजीत वासवानी को हम लाए हैं, वो जानता है कि हम उसकी बातें सुन रहे हैं। ऐसे में उसके मुंह से कोई गलत बात निकलने वाली नहीं और दिल्ली वाला अजीत वासवानी शायद जान चुका है कि दूसरे को उसके सामने क्यों किया गया है। जाहिर है, उनकी बातें सुनकर हम इस नतीजे पर पहुंचने की चेष्टा कर रहे हैं कि कौन क्लोन है और कौन असली। उसे मालूम है कि मैं पास ही हूं। इस बात का उसे पूरा अहसास है। यही वजह है कि दोनों में से कोई भी पहाड़ के नीचे नहीं आ रहा। दोनों ही बातों के जवाब संभलकर दे रहे हैं।"
"अब क्या करें बेबी?" महाजन ने बोतल से घूंट भरा।
"इस वक्त तो ये मामला यहीं रोक देना ठीक है। बाद में किसी दूसरे रास्ते के बारे में सोचा जाएगा।" कहने के साथ ही मोना चौधरी ओट से निकलकर सामने आती चली गई।
"चल भाई।" महाजन ने गहरी सांस लेकर कहा--- "हम भी अपने दर्शन दे दें।"
"सर।" वीरेंद्र बोला--- "इतनी भागदौड़ करने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ।"
"हां।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा--- "लेकिन जिसे हम जयपुर से लाए हैं। वो असली है।"
"अगर वही असली है तो फिर इस असली-नकली की दौड़ में क्यों लगे हुए हो।" महाजन ने तीखे स्वर में कहा--- "जयपुर में तुम ही इस मामले को लेकर हमारे पास आए थे कि असली-नकली को लेकर उलझ गए हो।"
रतनचंद कुछ न कह सका। चेहरे पर गंभीरता ही रही।
वे सब भी अपनी जगह से बाहर निकल आए।
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मोना चौधरी पर निगाह पड़ते ही दोनों वासवानी खामोश हो गए। दोनों की निगाह मोना चौधरी पर जा टिकी। उनके करीब पहुंचकर, मोना चौधरी ठिठकी। पीछे-पीछे बाकी सब भी आ गए तो उनकी निगाह उन सब पर भी फिरी। चंद पलों के लिए उनके बीच चुप्पी-सी रही।
आखिरकार अजीत वासवानी उखड़े स्वर में मोना चौधरी से बोला।
"मुझे तुमसे ऐसी आशा नहीं थी मोना चौधरी...।"
मोना चौधरी ने शांत निगाहों से उसे देखा।
"मैंने तुम्हें तीस करोड़ जैसी मोटी रकम दी कि इस फ्रॉड को, मेरे क्लोन को, जो मुझे खत्म करके मेरी जगह लेना चाहता है, उसे खत्म कर दो। तुमने हामी भर दी। काम की कीमत भी ले ली। तुमने इसे ढूंढ भी लिया। लेकिन इसे खत्म नहीं किया। मेरे खतरे को, मेरे सामने ला खड़ा किया।"
"ऐसा करना जरूरी था।" मोना चौधरी का शांत स्वर गंभीर था।
अजीत वासवानी गुस्से भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखता रहा।
"इसका कहना है कि ये असल में अजीत वासवानी है और तुम कौन हो और मैं साबित नहीं कर सकती कि ये गलत कह रहा है। ऐसे में मेरे लिए मालूम करना जरूरी हो गया कि कौन असली...।"
"तुम्हें मालूम करने की क्या जरूरत थी। जिस काम के लिए तुम्हें तीस करोड़ दिए गए हैं। उसे पूरा...।"
"नहीं।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में गर्दन हिलाई--- "मुझे ये बात मालूम करने की बहुत जरूरत थी कि कौन असली अजीत वासवानी है। मान लो, अगर तुम क्लोन हुए और तुमसे पैसे लेकर मैं असली अजीत वासवानी की हत्या कर देती हूं तो तुम लोगों की खतरनाक योजना से मेरा नाम भी जुड़ जाता है। जबकि क्लोन जैसी योजना से मैं वास्ता रखना, कभी पसंद नहीं करूंगी। इसने...।" मोना चौधरी ने जयपुर वाले की तरफ इशारा किया--- "मुझे पचास करोड़ की ऑफर दी, तुम्हें खत्म करने की। मैंने ये कहकर स्पष्ट इंकार किया कि पहले ये साबित करे कि तुम क्लोन हो। यानी कि पैसे लेकर भी, मैं ऐसा गलत काम नहीं करूंगी कि जिसका बाद में मुझे अफसोस हो। मैं जो भी गलत काम करती हूं, वो एक हद तक होता है और क्लोन जैसे मामले को मैं बहुत ही घातक मामला समझती हूं। मानव क्लोन का सिलसिला चालू हो गया तो दुनिया तबाही के कगार पर आ खड़ी होगी। ये वैज्ञानिक आज तो वाह-वाही लूटने के लिए पूरी ताकत से ये काम कर रहे हैं, लेकिन जब इसके नतीजे भविष्य में सामने आएंगे तो ये खुद ही कांप उठेंगे, उन्हें देखकर। अगर मानव क्लोन की जरूरत होती तो सृष्टि की संरचना करने वाले ने इसका भी इंतजाम कर दिया होता, जैसे मानव की बुनियादी जरूरतों का इंतजाम हर जगह पर मौजूद है। ये वैज्ञानिक सृष्टि की संरचना को बिगाड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में मैं क्लोन को जिंदा रहने देकर, मानवता के खिलाफ गलत काम नहीं कर सकती। तभी मैं ये जानने की कोशिश कर रही हूं कि असली अजीत वासवानी कौन है। ताकि मेरे हाथों क्लोन ही खत्म हो।"
अजीत वासवानी गहरी सांस लेकर कह उठा।
"मैं ये नहीं कहता कि तुम गलत हो। अपनी जगह पर तुम पूरी तरह ठीक हो। लेकिन मैं ही अजीत वासवानी हूं। क्लोन नहीं हूं। क्लोन ये है, जिसने तुम्हें शक में डाल दिया है और इसे जिंदा रखकर तुम मुझे भारी खतरे में डाल रही हो। ये सामने है। मैं यहां हूं अब तुम ही कहो कि मैं कैसे साबित करूं कि मैं ही अजीत वासवानी हूं और ये क्लोन है मेरा।"
"बकवास मत करो। मैं अजीत वासवानी हूं।" जयपुर वाला दांत भींचकर कह उठा।
"चुप करो।" एकाएक महाजन उखड़े स्वर में दोनों को घूरकर कह उठा--- "बहुत दिमाग खराब कर दिया है तुम दोनों ने।"
अजीत वासवानी ने खा जाने वाली निगाहों से महाजन को देखा।
कुछ ऐसे ही भाव जयपुर वाले अजीत वासवानी के चेहरे पर उभरे।
मोना चौधरी, अजीत वासवानी से बोली।
"तुमने कहा था कि डेढ़ साल पहले तुम्हारा अपहरण किया गया और चार दिन बाद छोड़ा गया तो जिस्म पर गहरे जख्म थे।"
"हां।" अजीत वासवानी ने सिर हिलाया।
मोना चौधरी ने जयपुर वाले वासवानी को देखा।
"तुमने भी यही कहा था।"
"कहा था।"
"तब तो उन जख्मों के निशान तुम दोनों के जिस्मों पर होंगे।"
"हां। निशान बाकी हैं।" अजीत वासवानी ने कहा।
जयपुर वाला होंठ भींचकर रह गया।
"तुमने हां नहीं कही?" मोना चौधरी ने उसे देखा।
जवाब में जयपुर वाले ने अपने जिस्म पर पड़े कपड़े उतारने शुरू कर दिए। सिर्फ अंडरवियर ही रह गया जिस्म पर। उसकी टांगों पर, कूल्हों के नीचे और कमर पर पुराने जख्मों के निशान नजर आए।
सबने उन निशानों को ध्यानपूर्वक देखा।
मोना चौधरी ने अजीत वासवानी से कहा।
"तुम कपड़े उतारो।"
अजीत वासवानी के चेहरे पर जहरीले भाव थे। जयपुर वाले को देखते हुए, कपड़े उतारते हुए बोला।
"सब तैयारी कर रखी है। कहीं भी चूक नहीं की कमीने ने।"
जयपुर वाला वासवानी उसे खा जाने वाली निगाहों से देखता रहा।
अजीत वासवानी ने कपड़े उतारे।
सबने देखा। उसके भी वहां-वहां पुराने जख्मों के निशान थे, जहां जयपुर वाले के थे। जख्मों के आकार-प्रकार में थोड़ा-बहुत फर्क था और ये बात कोई मायने नहीं रखती थी।
"पहन लो कपड़े।" मोना चौधरी के चेहरे पर गंभीरता नजर आ रही थी।
रतनचंद उलझे अंदाज में कह उठा।
"जो भी हो, क्लोन बनाने वालों ने, बहुत सोच-समझकर अपनी योजना को अंजाम दिया है। जरा-जरा सी बात का भी ध्यान रखा गया है कि कहीं भी उसका क्लोन मात न खा सके।"
वो दोनों कपड़े पहनने लगे तो मारवाह, जयपुर वाले से बोला।
"तुम्हें मालूम है, एक बार कुछ लोगों ने तुम्हारी जान लेने की कोशिश की थी और चाकू ने तुम्हारी बगल के पास गहरा, लंबा निशान बना दिया था। जो कि अभी भी है।"
"हां। ये रहा।" जयपुर वाले ने फौरन बांह ऊंची की तो बगल में चाकू का पुराना निशान नजर आया।
पारसनाथ ने देखा, वैसा ही निशान अजीत वासवानी की बगल में भी था।
"मारवाह।" मोना चौधरी बोली--- "तुम दोनों निशानों को करीब से देखो। शायद तुम पहचान सको निशान के दम पर कि कौन-सा असली है और कौन-सा इन दोनों में क्लोन है।"
"असली वासवानी साहब के साथ ही मैं यहां आया हूं।" मारवाह ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा--- "फिर भी तुम्हारे कहने पर बगल के निशानों को जरूर देखूंगा।" कहने के साथ ही उसने सबसे पहले पास खड़े अजीत वासवानी के निशान को ध्यानपूर्वक देखा फिर आगे बढ़कर जयपुर वाले वासवानी की बगल के निशान को देखा। उसके बाद सिर हिलाते हुए मोना चौधरी से कह उठा--- "दोनों निशान ही एक ऐसे हैं। ऐसा लगता है जैसे ये निशान एक ही की बगल की हों। मान लो मेरी बात। साहब ही असली वासवानी हैं।" उसने अजीत वासवानी की तरफ इशारा किया।
"मैंने तुमसे सलाह नहीं पूछी।" मोना चौधरी ने शांत भाव से कहा।
दोनों कपड़े पहन चुके थे।
"अब क्या किया जाए?" रतनचंद ने मोना चौधरी से पूछा।
"तुम कहो।" मोना चौधरी बरबस ही मुस्कुरा पड़ी।
"मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।" रतनचंद के स्वर में परेशानी आ गई थी।
तभी अजीत वासवानी कह उठा।
"मोना चौधरी, मैंने ये काम तुम्हें इसलिए दिया था कि मैं इसे पूरा होता हुआ देखना चाहता था। लेकिन अब तुम्हारी ही वजह से, ये मामला लंबा होता जा रहा है। ये मेरे लिए खतरे वाली बात है।"
"फ़िक्र मत करो। इस पर मेरी नजर है। ये तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" मोना चौधरी बोली।
"तुम इसके साथियों को भूल रही हो। जो...।"
"मैं कुछ नहीं भूली।" मोना चौधरी गंभीर स्वर में कह उठी--- "अगर तुम बहुत ज्यादा खतरा महसूस कर रहे हो तो दो दिन और खुद को सुरक्षित रख लो।"
"दो दिन में क्या होगा?"
"मैं असल-नकल की पहचान कर लूंगी। न कर सकी तो इसे खत्म कर दूंगी।" मोना चौधरी का स्वर शांत था।
"असली-नकली को पहचाने बिना तुम मेरे क्लाइंट को उंगली भी नहीं लगाओगी।" रतनचंद सख्त स्वर में कह उठा--- "ये बात हममें तय हो चुकी है, मोना चौधरी।"
"ये बात तुम बाद में भी कर सकते हो।" मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"मैं जा रहा हूं।" अजीत वासवानी ने, जयपुर वाले को घूरते हुए मोना चौधरी से कहा--- "और मुझे पूरा विश्वास है कि तुम जल्दी ही असली-नकली को पहचानकर, इस मामले को खत्म करोगी।"
मोना चौधरी का सोचों में घिरा चेहरा, हौले से हिला।
अजीत वासवानी, मारवाह के साथ वहां से चला गया।
मोना चौधरी ने जयपुर वाले वासवानी को देखा।
"तुमने तो कहा था कि तुम आसानी से उसके मुंह से ऐसी कोई बात निकलवा लोगे कि...।"
"मैं क्या करूं।" जयपुर वाला वासवानी दांत भींचकर कह उठा--- "मैंने तो पूरी कोशिश की, लेकिन वो इतना ज्यादा चालाक निकलेगा, मैंने नहीं सोचा था। हर बात की काट उसके पास है।"
"या फिर हर बात की काट तुम्हारे पास है।" मोना चौधरी ने चुभते स्वर में कहा।
"मेरे पास काट कहां से आ गई। मैं अजीत वासवानी हूं। वो नकली है।"
"हां-हां। तू तो गंगा स्नान करके आया है और उसने कभी गंगा के दर्शन ही नहीं किए।" महाजन व्यंग्य से कह उठा।
■■■
मोना चौधरी, महाजन और पारसनाथ, रतनचंद के साथ ही उस जगह पर आ गए थे जहां वे लोग ठहरे थे। जयपुर वाला वासवानी चुप-चुप-सा था। रास्ते भर में उसने कोई बातचीत नहीं की थी। जबकि आपस में, वे सब यदा-कदा बात करते रहे थे कि ये मामला कैसे हल होगा। कोई रास्ता उन्हें नजर नहीं आ रहा था। कुछ सूझ नहीं रहा था, इस समस्या से निकलने के लिए।
साढ़े तीन बजे वापस पहुंचकर सबने लंच किया। फिर मोना चौधरी उससे बोली।
"मैं, तुम्हें साथ लिए इतने दिन नहीं गंवा सकती।" आवाज में गंभीरता थी--- "अब तुम ही कुछ कहो कि इस स्थिति से कैसे निपटा जा सकता है।"
"मैं अपने हालात पहले ही तुम्हारे सामने रख चुका हूं।" जयपुर वाले वासवानी ने बेचैन स्वर में कहा।
"कोई तो रास्ता होगा।"
"होता तो तुम्हें पहले ही बता चुका होता।" उसने पहले वाले स्वर में कहा।
"ठीक है। अगर वो बंगला तुम्हारा है तो तुम अवश्य जानते होगे कि चोरी-छिपे कैसे भीतर प्रवेश किया जा सकता है।"
"ऐसा कोई रास्ता नहीं है।" उसने तुरंत इंकार में सिर हिलाया।
"खतरे के वक्त कोई भी रास्ता इस्तेमाल नहीं होता कि...।"
"बोला तो ऐसा कोई रास्ता नहीं है। वो बंगला जंगल में नहीं है। जो कि निकलने के लिए एयर जैसी रास्ता बनाया जाता।"
मोना चौधरी सिर हिलाकर सोच भरे स्वर में बोली।
"आज तुम और वो आमने-सामने हुए परंतु कोई नतीजा नहीं निकला। मैं ये काम एक बार फिर करना चाहती हूं। तुम दोनों को फिर आमने-सामने करना चाहती हूं, वो भी वहीं, बंगले में। बंगले में ऐसा होने पर ये बात सामने आ सकती है कि तुम नकली हो या वो।"
"मेरे ख्याल में, तुम्हारी ये कोशिश भी बेकार रहेगी।" उसने व्याकुलता से दोनों हाथ मले।
"वो कैसे?"
"क्योंकि मैं सब जानता हूं कि तुम मुझे ये सब क्यों करने को कह रही हो। अगर मैं क्लोन हूं तो, ऐसी गलती क्यों करूंगा, जिससे कि ये साबित हो कि मैं क्लोन हूं।" उसने मोना चौधरी की आंखों में झांका--- "तुम जो कहती रहोगी मैं करता रहूंगा और वो मेरे सामने जाने पर क्यों मानेगा कि वो क्लोन है।"
"मैं तुम्हारे साथ बंगले में जाऊंगी।" मोना चौधरी का लहजा कठोर हो गया--- "मैं वहां मौजूद रहूंगी। लेकिन उसे नहीं पता होगा कि मैं वहां पर हूं। ऐसे में अगर वो क्लोन है तो तुम्हारे सामने वो मानेगा। ऐसा कुछ तो अवश्य करेगा कि मालूम हो जाए वो क्लोन है। अगर आज रात, तुम्हें सामने पाकर, ये जानकर कि तुम अकेले ही हो, उसने तुम्हें ही नकली कहा तो, मैं तुम्हें ही क्लोन मानूंगी।"
उसने दांत भींच लिये।
"जब वो तुम लोगों के सामने आएगा तो तुम यही कहोगे कि हमारी निगाहों से बचकर भाग निकले हो और यहां आ गए हो। ताकि खुद को अजीत वासवानी साबित कर सको।"
उसने, व्याकुल नजरों से रतनचंद को देखा।
अनमने मन से रतनचंद कह उठा।
"वासवानी साहब, ऐसी ही किसी कोशिश से असलियत सामने आएगी कि...।"
"और अगर असलियत सामने नहीं आई।" उसने दांत भींचकर, गुस्से से कहा--- "मुझे ही खामख्वाह क्लोन मान लिया गया तो ये मुझे ही गोली मार देगी।"
"गलतफहमी में हो तुम। इतने खामख्वाह में भी तुम्हें, क्लोन नहीं माना जाएगा। तुम्हें क्लोन मानने की कोई खास वजह होगी, तभी तुम्हें क्लोन माना जाएगा। जल्दी में मैं तुम्हारी जान लेने वाला कदम नहीं उठाऊंगी अगर तुम ही अजीत वासवानी हो तो, मेरी बात मान लेने में तुम्हें हर्ज नहीं होना चाहिए।"
होंठ भींचे वो खामोश हो गया।
"आज रात।" मोना चौधरी बोली--- "तुम और मैं बंगले में प्रवेश करेंगे और...।"
"भूल में हो। वहां सख्त पहरा लगा रखा।"
"तुम भूल कर रहे हो।" मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा--- "मत भूलो तुम अजीत वासवानी हो। अगर बंगले के भीतर प्रवेश कर गए तो, कोई भी नहीं कह सकता कि तुम अजीत वासवानी नहीं हो। तुम्हारे साथ होने पर, मुझे भी कोई कुछ नहीं कह सकता। मैं वहां जा चुकी हूं और कईयों ने मुझे देखा होगा। अब सवाल ये पैदा होता है कि जब बंगले वाले तुम्हें देखेंगे तो तुम कौन से कपड़े पहने होगे। जब रात का वक्त होगा। ऐसे में तुम्हें नाईट ड्रेस में होना चाहिए। तुम जो भी हो, लेकिन तुम्हें ये अवश्य मालूम होना चाहिए कि अजीत वासवानी की पसंदीदा नाइट ड्रेस कौन-कौन सी हैं।"
उसने फौरन बता दिया नाइट ड्रेसों के बारे में।
"पारसनाथ नाईट ड्रेसों के बारे में सुना?"
"हां।"
"इसकी बताई नाइट ड्रेसों में से कोई एक ले आओ। रंग और क्वालिटी में कोई फर्क न हो।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "मैं सोचती हूं बंगले में कैसे प्रवेश करना है।"
"इस तरह क्या हम किसी फैसले पर पहुंच सकते हैं।" कृष्ण सूरी उलझन भरे स्वर में बोला।
"कोशिश करना हमारा काम है।" रतनचंद ने सोच भरे स्वर में कहा--- "और तुम जानते हो कि हमारा काम ऐसा है कि जब रास्ता न मिले तो अंधेरे में हाथ-पांव मानना शुरू कर दो। न से हां ही सही। कुछ तो होगी ही।"
कृष्ण सूरी गहरी सांस लेकर रह गया।
"मुझे लगता है तुम लोगों की बातें मानकर खुद को, मैंने और भी मुसीबत में फंसा लिया है।" वो कह उठा।
"आप क्लोन हैं?" रतनचंद ने उसे देखा।
"नहीं। मैं ही अजीत वासवानी हूं।" उसने दांत भींचकर कहा।
"अगर ये सच है तो फिर आपको किसी तरह की फिक्र नहीं करनी चाहिए।" रतनचंद उसका चेहरा देखते हुए कह उठा--- "ये सब, हम ये जानने के लिए कर रहे हैं, हमें सबूतों के साथ पता चले कि क्लोन कौन है। इस मामले में सिर्फ जुबान पर विश्वास नहीं किया जा सकता।"
■■■
रात के दस बज रहे थे। हर तरफ चहल-पहल थी।
मोना चौधरी ने भीतर प्रवेश करने के लिए बंगले के पिछवाड़े की दीवार चुनी। वो बारह फीट ऊंची दीवार थी। उसे पार करना मोना चौधरी के लिए वो दिक्कत का सौदा नहीं था। लेकिन जयपुर वाले लिए तो उस पर चढ़ना, पहाड़ से भी कठिन था।
साथ में महाजन और रतनचंद थे। और शाम को ही बंगले की बाहरी स्थिति देख गए थे और अब साथ में एलुमिनियम की फोंल्डिंग की डेढ़ फीट चौड़ी सीढ़ी कार की डिग्गी में डालकर ले आए थे जिसके तीन फोल्ड खोलने पर वो दस फीट की हो जाती थी।
पिछवाड़े की दीवार के पास करीब-करीब अंधेरा था।
महाजन ने जल्दी से सीढ़ी के फोल्ड खोले और दीवार से लगा दी। मोना चौधरी फुर्ती से सीढ़ी पर चढ़ी और भीतर झांकने लगी। यहां ज्यादा देर खड़ा नहीं हुआ जा सकता था, आते-जाते किसी की निगाह भी उनकी हरकतों पर पड़ सकती थी और सारी कोशिशें फेल हो सकती थीं। दीवार के भीतरी तरफ पेड़ों की कतार लगी हुई थी, ऐसे में अगर कोई छत पर है तो, वहां से उन पर निगाह पड़नी संभव नहीं थी। पिछवाड़े दो गनमैन गश्त लगाते नजर आए, जो कि चलते हुए एक-दूसरे को पार करते हुए, दूर बंगले के कोनों की तरफ बढ़ते चले गए। मोना चौधरी उन्हें देखती रही।
और कोई नजर नहीं आया।
जब वे दूर पहुंचे तो मोना चौधरी गर्दन घुमाकर दबे स्वर में बोली।
"मैं भीतर कूद रही हूं। तुम जल्दी आओ। हरीअप।" कहने के साथ ही मोना चौधरी दीवार पर चढ़ी और अगले ही पल बे-आवाज नीचे कूदकर तने की ओट में हो गई।
चंद पल बीतने पर दीवार की मुंडेर पर जयपुर वाले वासवानी का चेहरा नजर आया।
तभी फेरा लगाते गनमैन पुनः नजर आए।
मोना चौधरी तुरंत पेड़ की ओट में हो गई। मुंडेर पर मौजूद वो नीचे होता हुआ पीछे को हो गया। मोना चौधरी ने हिसाब लगाया कि चार गनमैन हैं, जो लगातार बंगले के गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं। जो पहले नजर आए थे, वो इतनी जल्दी विशाल बंगले का फेरा लगाकर, वापस नहीं आ सकते।
वो दोनों गनमैन भी पहले वाली की तरह एक-दूसरे को पार करते हुए, कोनों पर जाकर मुड़ते चले गए तो मोना चौधरी दीवार की मुंडेर की तरफ निगाह मारकर दबे स्वर में बोली।
"जल्दी करो।"
वो जल्दी से मुंडेर पर आ बैठा। परंतु बारह फीट की निचाई देखकर अचकचा उठा।
"मैं इतनी नीचे नहीं कूद सकता।" उसके होंठों से निकला।
"बेवकूफ। क्यों वक्त बर्बाद...।" मोना चौधरी ने कहना चाहा।
"मैं नहीं कूद सकता। मैं...।"
"आओ।" मोना चौधरी आगे बढ़ी--- "कूदो मैं तुम्हें संभाल लूंगी।"
"लेकिन...।"
"आओ।" मोना चौधरी धीमे स्वर में गुर्रा उठी।
दिल पर उसने पहाड़ से भी बड़ा पत्थर रखा होगा, कूदने के लिए। उसने ऊपर से नीचे छलांग मारी। मोना चौधरी ने थोड़ा-बहुत उसे संभाला। फिर भी उसका घुटना नीचे लगा। होंठों से कराह निकली। मोना चौधरी ने उसकी बांह पकड़कर उठाया और पास के तने की ओट में खींच लिया।
उसी वक्त पहले वाले दोनों गनमैन पुनः वहां नजर आने लगे। वे निश्चिंत लग रहे थे कि कोई भीतर आने के बारे में सोच भी नहीं सकता। हर तरफ सख्त पहरा है।
जयपुर वाला गहरी-गहरी सांसें ले रहा था। उसके शरीर पर कीमती नाइट सूट के ऊपर सिल्क का गाउन पड़ा था। गले, हाथ की उंगलियों और कलाई पर वही सोने का कड़ा था, जिन्हें वह हर वक्त पहने ही नजर आया था। पांवों में कीमती चप्पले थीं। यानी कि उसे देखकर कोई भी नहीं कह सकता था कि वह अजीत वासवानी नहीं है। खासतौर से अब, जबकि वो अजीत वासवानी के बंगले में था।
दोनों गनमैनों को आगे बढ़ती हुई, मोना चौधरी दबे स्वर में कह उठी।
"एक बात कान खोलकर सुन लो कि मैंने तीस करोड़ अजीत वासवानी से लिए हैं तुम्हें खत्म करने के लिए और तुम्हारी जान की अपेक्षा में तुम्हें साथ में ढोती फिर रही हूं, ऐसा करना मेरे लिए भी खतरे से खाली नहीं। अगर तुम अजीत वासवानी हो तो, अब तुम अपने बंगले में हो और यहां पर तुम जैसे-तैसे, कुछ करके, अगर वो नकली है, तो मेरी निगाहों में ये साबित कर सकते हो। मैं तुम्हें ये समझाना चाहती हूं कि ऐसे मौके तुम्हें बार-बार नहीं मिलेंगे। खुद को बचा सकते हो तो बचाओ।"
"वो...।" उसके होंठों से बेचैन स्वर निकला--- "मुझे देखते ही गोली मार सकता है।"
"ऐसा मौका आए तो तुम्हें खुद को बचाने का पूरा हक है।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।
वो कुछ नहीं बोला।
"भीतर जाकर तुम्हें क्या करना है। ये मैं तुम्हें बता चुकी हूं। बाकी तुम्हारी समझ पर है।"
वो दोनों गनमैन मुड़ चुके थे।
"आओ।"
मोना चौधरी और वो, दोनों छिपी जगह से निकलकर खुले में आ गए और टहलने के अंदाज में आगे बढ़ने लगे।
"ये खिड़कियां खुली हो सकती हैं।" मोना चौधरी ने पिछवाड़े की बंद खिड़कियों पर निगाह मारी।
"मालूम नहीं। अक्सर इन्हें बंद ही रख जाता है।"
दोनों टहलते हुए खिड़कियों के पास पहुंचे और आगे बढ़ते हुए मोना चौधरी सावधानी से खिड़कियों को चेक करती जा रही थी। तभी दरवाजा नजर आया। मोना चौधरी ने उस पर हाथ रखा तो वो खुल गया। दोनों के कदम वहीं रुककर रह गए।
"किसी की लापरवाही से दरवाजा खुला रह गया होगा।" उसके होंठों से निकला--- "वरना, ये बंद ही रहता है।"
मोना चौधरी ने बिना कुछ कहे उसकी बांह पकड़ी और दरवाजे से भीतर प्रवेश करके, फौरन दरवाजा बंद कर लिया। ये बंगले का विशाल-खूबसूरत ड्राइंग हॉल था। मोना चौधरी यहां पहले भी आ चुकी थी।
उसकी निगाह इधर-उधर फिर रही थी।
"तुम कौन हो मैं नहीं जानती।" मोना चौधरी ने उसके चेहरे पर निगाह मारी, वहां अजीब से भाव थे--- "लेकिन खुद को अजीत वासवानी बनाकर रखो।"
उसने फौरन खुद को संभाला।
"मैं--- मैंने कभी भी नहीं सोचा था कि अपने ही बंगले पर मुझे, चोरों की तरह छुपकर आना पड़ेगा और...।"
"फालतू की बातें छोड़ो।" मोना चौधरी ने चुभते स्वर में कहा--- "और इस पर ध्यान दो कि मैं तुम्हें अपने साथ बचाने के लिए रखे हुए हूं या जान लेने के लिए। तुम वो बकरे भी हो सकते हो मेरे लिए जिसे हलाल करने के वास्ते खिला-पिलाकर तगड़ा किया जाता है। मैं तुम्हारे साथ कभी भी, कुछ भी कर सकती हूं।"
उसने मोना चौधरी को देखा।
"आगे बढ़ो।"
वो आगे बढ़ा। मोना चौधरी उसके साथ चल दी। दोनों ड्राइंग हॉल पार करके सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए, जो कि पहली मंजिल पर जा रही थी। अभी आधी सीढ़ियां ही तय की होंगी कि नीचे उतरता नौकर नजर आया जो उन्हें ऊपर आता देखकर, दोनों हाथ बांधे सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
मोना चौधरी और वो, आराम से उसके करीब से सीढ़ियां तय करते चले गए।
"ये कौन था?" मोना चौधरी ने पूछा।
"नौकर।"
"नाम मालूम है?"
"दीनू। बीते बारह सालों से ये बंगले पर काम कर रहा है।" उसने शांत स्वर में कहा।
"ये बातें मालूम करना, कोई कठिन काम नहीं है।" मोना चौधरी गहरी सांस लेकर कह उठी।
उसने जवाब में कुछ नहीं कहा।
■■■
"वासवानी साहब।" मारवाह सतर्क भाव से बोला--- "मेरे ख्याल में मोना चौधरी ने ठीक नहीं किया।"
अजीत वासवानी ने सोच भरे भाव से हाथ में थाम रखे व्हिस्की के गिलास में से घूंट भरा और निगाहें उठाकर, मारवाह को देखा। फिर सिर हिलाकर कह उठा।
"मोना चौधरी की जगह पर खुद को रखकर सोचो तो, तुम्हें लगेगा, वो ठीक कर रही है।" गंभीर भाव में कहते हुए उसने घूंट भरा--- "उन लोगों ने इतनी बड़ी योजना को अंजाम दिया है। अगर मुझे वक्त रहते न मालूम होता तो वे कामयाब हो गए होते। अपनी योजना को खराब होते देखकर, उन्होंने क्लोन को अकेला छोड़ दिया कि, जैसे भी हो, वो मेरी जगह लेने की कोशिश करे। साथ में उसके साथ यकीनन उसकी सहायता कर रहे होंगे। इन हालातों में अगर मोना चौधरी, मेरे क्लोन के पास पहुंचती है और क्लोन कहता है कि वही असली अजीत वासवानी है, तो बताओ मोना चौधरी क्या करेगी?"
मारवाह कुछ नहीं कह सका।
"मेरा क्लोन नहीं साबित कर पा रहा कि वो अजीत वासवानी है, यही दिक्कत मेरे सामने भी है। अगर मोना चौधरी या कोई भी, मुझे कहे कि मैं साबित करूं कि मैं क्लोन नहीं हूं तो बताओ, मैं कैसे साबित करूंगा, क्योंकि जिन लोगों ने मेरे खिलाफ साजिश रची है, उन्होंने हर छोटी-से-छोटी बात लेकर, बड़ी बात तक उसके दिमाग में भर दी है। उसे अच्छी तरह पट्टी पढ़ा दी है कि वो कहीं भी मात न खाए। सवालों के जवाब में जो मैं कहूंगा, वही वो कहेगा। जरा भी फर्क नहीं होगा और मोना चौधरी नहीं चाहती कि उसके हाथों असली अजीत वासवानी की हत्या हो और ये उसकी ईमानदारी से भरी, अच्छी सोच है। मैं उसकी सोच से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूं। लेकिन ये भी नहीं चाहता कि असलियत तक पहुंचने में वो, इतनी देर लगा दे कि, मैं उन लोगों के हाथों मारा जाऊं, मेरी जगह मेरा क्लोन ले ले।"
"लेकिन मोना चौधरी भला इस बात को कैसे जान पाएंगी कि आप वासवानी साहब ही हैं और जो उसके साथ है, वो उसका क्लोन है। आपकी बातों से स्पष्ट है कि इस बात का फैसला कर पाना बेहद कठिन काम है।"
अजीत वासवानी ने कंधे उचकाकर, गिलास में से घूंट भरा।
"मोना चौधरी बेवकूफ नहीं है। बहुत सोच-समझकर ही मैंने उसे काम सौंपा है। वो पूरी कोशिश कर रही होगी कि मामले की तह तक पहुंच सके। अपने ढंग से उसे कुरेद भी रही होगी। मुझे विश्वास है मोना चौधरी पर कि वो जल्द ही दूध-का-दूध और पानी-का-पानी करेगी।" अजीत वासवानी ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा और बची हुई पसंदीदा व्हिस्की एक ही सांस में खाली कर दी--- "एक पैग और तैयार कर दो।"
मारवाह ने फौरन गिलास उठाया और कमरे के कोने में मौजूद बार की तरह बढ़ गया।
"ये पहली मंजिल पर स्थित छोटा-सा प्राइवेट ड्राइंगरूम था। जहां अजीत वासवानी फुर्सत में बैठता था। पास ही में दो बेडरूम थे और किसी भी बेडरूम को वो रात में अपने इस्तेमाल में ले लेता था।
मारवाह ने गिलास तैयार करके अजीत वासवानी को थमाया। वासवानी ने छोटा-सा घूंट लेकर गिलास टेबल पर रखा। अभी तक वो दिन वाले कपड़ों में ही था।
"लगता है आज आप 'डिनर' लेट लेंगे।" मारवाह मुस्कुराकर बोला।
"हां।" वासवानी ने सिर हिलाकर गिलास पुनः उठा लिया--- "इस पैग के बाद तीसरा पैग बेडरूम में लूंगा और डिनर मुझे वहीं पहुंचा देना। तुम्हारे केबिन में बेल दे दूंगा। अभी कपड़े भी चेंज करने हैं। उसने गहरी सांस ली--- "जबसे क्लोन को देखा है, तबसे ही बेचैन हुआ पड़ा हूं।"
"मेरा भी यही हाल है।"
"जाओ तुम। मुझे अकेला छोड़ दो।"
मारवाह बाहर निकल गया।
अजीत वासवानी छोटे-छोटे घूंट लेता, सोचता रहा। मस्तिष्क में बेचैनी भरी पड़ी थी।
■■■
वो, मोना चौधरी को लिए अपने रूम में प्रवेश कर गया था।
शानदार बेडरूम था। देखते ही बनता था।
मोना चौधरी हर तरफ नजर मारकर बोली।
"अजीत वासवानी कभी भी बेडरुम में आ सकता है।"
"पक्का नहीं कि वो इसी बेडरूम में आए।" उसने गंभीर स्वर में कहा।
"क्या मतलब?"
"दो बैडरूम हैं। साथ-साथ लगे हुए। दोनों ही तैयार रहते हैं। मैं किसी में भी सो जाता हूं। दोनों बेडरूमों में जरूरत का हर सामान मौजूद है।" उसका लहजा बेहद सामान्य था।
मोना चौधरी ने उसे घूरा।
"जब तक साबित न हो जाए। खुद को अजीत वासवानी साबित करने की चेष्टा मत करो।"
उसने मोना चौधरी को देखकर शांत स्वर में कहा।
"मैं ही अजीत वासवानी हूं।"
"यही जानने के लिए तो तुम्हें यहां लाई हूं।" मोना चौधरी ने तीखे स्वर में कहा।
उसने, मोना चौधरी के शब्दों की परवाह नहीं की और वार्डरोब की तरफ बढ़ गया। वार्डरोब खोला। भीतर कीमती असंख्य कपड़े नजर आ रहे थे। वो अपने शरीर पर पड़े कपड़े उतारने लगा।
"ये क्या कर रहे हो?" मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े।
"नाइट ड्रेस चेंज कर रहा हूं। इस ड्रेस में मुझे कई नौकरों ने यहां तक आते देखा है। साथ में तुम्हें भी देखा है। वो साबित कर सकते हैं कि मैं ही बाहर से आया हूं और तुम मेरे साथ थी। कपड़े बदल लेने से कोई नहीं कह सकेगा कि मैं ही बाहर से आया हूं।" कहकर वो मुस्कुराया।
उसने दूसरी नाइट ड्रेस पहन ली। वार्डरोब के नीचे मौजूद स्लीपरों में से एक जोड़ी स्लीपर निकालकर पहने। पहले वाले स्लीपर और कपड़े वार्डरोब में रखकर उसे बंद करके पलटा।
मौना चौधरी की निगाह उस पर ही टिकी थी।
"तुम कहीं छुप जाओ।" कहने के साथ ही वो चंद कदमों के फासले पर वार्डरोब की तरफ बढ़ा।
"कहां।" मोना चौधरी ने इधर-उधर निगाह मारी।
"छिपने के लिए वार्डरोब है या फिर अटैच्ड बाथरूम। जहां भी तुम ठीक समझो।" वो बार के पास पहुंचकर ठिठका। पसंदीदा व्हिस्की की बोतल उठाकर, पास ही मौजूद गिलास में डाली और एक ही सांस में गिलास खाली कर गया हाथों-हाथ दूसरा गिलास भर लिया।
"मैं तुम्हें पहली बार व्हिस्की पीते देख रही हूं। पीने वाले हो तो पहले क्यों नहीं पी?" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।
"मैं यही ब्रांड लेता हूं और ये आसानी से कहीं नहीं मिलता। यूं समझो कि विदेश से मेरे लिए ये व्हिस्की आती है। यही वजह रही कि तुमने पहले मुझे व्हिस्की पीते नहीं देखा और इस वक्त पीना जरूरी था। क्योंकि रात को डिनर से पहले मैं दो-तीन पैग अवश्य ले लेता हूं। अभी मारवाह को बुलाऊंगा। पैग, मेरे हाथ में न देखकर उसे कुछ अजीब-सा लगेगा। खासतौर से तब तो और भी शक में पड़ेगा, अगर मेरे क्लोन को पीते देख चुका होगा।"
मोना चौधरी उसे गहरी निगाहों से देखने लगी।
"तुम कहीं छुप जाओ।"
मोना चौधरी ने कुछ सोचकर बाथरूम की अपेक्षा वार्डरोब में छिपना ठीक समझा। वार्डरोब का दरवाजा मात्र एक इंच खुला रहने दिया कि बेडरूम में देख सके और होने वाली बातें सुन सके।
■■■
मारवाह अपने केबिन जैसे, कमरे में मौजूद था। जहां हर सुविधा मौजूद थी। दो फोन थे। एक इंटरकॉम था। टी.वी., फ्रिज, सोफा यहां तक कि आराम करने के लिए छोटा-सा बेड भी मौजूद था। अतीत वासवानी जब बंगले पर होता तो, उसका वक्त अधिकतर इसी कमरे में बीतता था। उसके असिस्टेंट बगल के केबिन में मौजूद रहते। जरूरत पड़ने पर वो उन्हें फौरन बुला लेता।
वो जानता था कि अभी वासवानी के खाने में वक्त था। इसलिए इंटरकॉम पर किचन में अपने डिनर के लिए कह दिया, जो कि पांच-सात मिनट बाद ही नौकर दे गया। मारवाह जल्दी-जल्दी डिनर करने लगा। वासवानी डिनर के लिए उसे कभी भी कह सकता था। वासवानी का खाना-पीना उसके ही हाथों से होता था। नौकर उसकी मौजूदगी में खाना सर्व करता था और वो उसकी जरूरत की हर चीज फौरन हाजिर करा देता था। ये वासवानी साहब का बहुत पुराना नियम था। वासवानी को जाने क्यों शुरू से ही पसंद नहीं था कि बंगले के नौकर खाने के दौरान, उसके पास फेरा लगाते रहें।
मारवाह डिनर करके हटा ही था कि, बेल बजी। बेल की आवाज से ही उसने पहचान लिया कि ये पहले वाले बेडरूम की बेल है। वो हाथ साफ करके फौरन उठा और बाहर निकलकर गैलरी में तेज-तेज कदमों से आगे बढ़ गया। लंबी गैलरी पार करने के बाद, वो एक बंद दरवाजे के सामने ठिठका और फिर डोर नॉब घुमाते हुए, दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया।
कुर्सी पर जयपुर वाला वासवानी बैठा, हाथ में गिलास थामें घूंट भर रहा था।
"डिनर ले आऊं?"
उसने हाथ में पकड़े खाली हो रहे गिलास को देखा फिर मारवाह को।
"हां। डिनर के लिए ही तुम्हें बुलाया है।"
"दस मिनट में 'डिनर' आया सर।" कहने के साथ ही मारवाह निकल गया।
हमेशा की तरह मारवाह ने, उसे डिनर करवाया, जैसे अजीत वासवानी को कराता था। आधा घंटा, मारवाह डिनर के दौरान, सेवा के लिए मौजूद रहा जिस चीज की जरूरत पड़ती तो इंटरकॉम पर किचन से कहकर मंगवाता और, दरवाजे पर से ही सामान नौकर से ले लेता।
फिर नौकर को बुलाकर बर्तन उठवा दिए गए।
"तुम भी डिनर ले लो।" जयपुर वाले ने शांत स्वर में कहा।
"जी। मैंने कुछ देर पहले ही लिया है।" मारवाह बोला।
वासवानी ने सिर हिलाया।
"कल का कोई प्रोग्राम हो तो बता दीजिए।" मारवाह ने कहा।
जयपुर वाले ने मारवाह को देखा फिर गहरी सांस लेकर कह उठा।
"जब तक क्लोन का काम नहीं निपटेगा। किसी काम में मन नहीं लगेगा। खास काम हो तो, बिल्कुल भी ढंग से नहीं हो पाएगा। तुम्हारा क्या ख्याल है। मोना चौधरी ने कहा है कि दो दिन में सब कुछ सामने ला देगी। ऐसा कर पाएगी वो।"
"मुझे तो नहीं लगता।" मारवाह सोच भरे स्वर में बोला--- "मुझे तो वो खुद बाहरी तौर पर उलझी लग रही थी।"
"मेरा भी यही ख्याल है। खैर जाओ। मैं सोने जा रहा हूं। पहरे पर एक नजर मार लेना। पहरा थोड़ा सख्त कर देना। जाने क्यों मन में अजीब से वहम उठ रहे हैं।"
"मेरे होते हुए आप किसी बात की फिक्र न करें।" मारवाह ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
जवाब में जयपुर वाला हौले से मुस्कुराकर रह गया।
मारवाह इजाजत लेकर बाहर निकल गया।
■■■
मारवाह ने अपने केबिन कमरे में कदम रखा ही था कि ठीक उसी वक्त बेल बजी। मारवाह के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। ये दूसरे बेडरूम की बेल थी।
वहां कौन है?
वो अभी तो अजीत वासवानी के पास से आ रहा है। कहीं मारवाह साहब दूसरे बेडरूम में तो नहीं पहुंच गए। वहां उनको कोई काम पड़ गया हो। इस सोच के साथ ही वो उल्टे पांव बाहर निकला और तेजी से आगे बढ़ गया। जिस बेडरूम में वो पहले गया था, उसके बगल वाले दरवाजे पर ठिठका और डोर नॉब घुमाकर दरवाजा खोलते हुए भीतर प्रवेश कर गया।
अजीत वासवानी को उसने छोटे से बाथरूम के पास ही, कुर्सी रखे बैठे पाया। हाथ में व्हिस्की का खत्म होता गिलास था और बदन पर कपड़े देखकर, मारवाह के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे। क्योंकि कुछ देर पहले तो वासवानी के शरीर पर, दूसरी नाइट ड्रेस थी।
अजीत वासवानी ने उस पर निगाह मारी।
"डिनर ले आओ।"
मारवाह की आंखें सिकुड़ी। चेहरे पर एक के बाद एक, अजीब से भाव आकर गुजर गए।
"डिनर?" उसके होंठों से निकला।
अजीत वासवानी प्रश्न भरी निगाह, मारवाह के चेहरे पर जा टिकी।
"वासवानी साहब, अभी तो आपने 'डिनर' लिया है। मैंने पास खड़े होकर आपको...।"
"क्या बकवास कर रहे हो।" अजीत वासवानी के माथे पर बल पड़े। चेहरे पर तीखापन उभरा।
मारवाह हक्का-बक्का। कुछ कहते न बना, दो पल के लिए।
"खड़े-खड़े मुझे क्या देख रहे हो। डिनर ले...।"
"ये कैसे हो सकता है।" एकाएक मारवाह की आंखें, हैरत से फैलने लगीं।
"तुम पागल तो नहीं हो गए।" अजीत वासवानी के दांत भिंचते चले गए।
"क--- कौन हो तुम?" मारवाह तुरंत ही अपने रंग में लौटा और हाथ में रिवाल्वर नजर आने लगी। चेहरे पर कठोरता उभर आई थी। वो सतर्क नजर आने लगा था।
अजीत वासवानी के चेहरे पर हैरानी उभरी। दो पलों के लिए वो कुछ नहीं कह सका।
"ये क्या पागलपन कर रहे हो, मुझ पर रिवॉल्वर...।" अजीत वासवानी ने कहना चाहा।
"जुबान बंद रखो।" मारवाह गुर्रा उठा--- "तो तुम यहां भी आ पहुंचे। हैरानी है मुझे कि कैसे आ गए। लेकिन मेरे होते हुए तुम वासवानी साहब का बाल भी बांका नहीं कर सकते।"
अजीत वासवानी ने गहरी निगाहों से मारवाह को देखा फिर गिलास थामें कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। मारवाह।" अजीत वासवानी का स्वर गंभीर था--- "अपनी इस हरकत का मतलब मुझे समझाओ।"
मारवाह दांत भींचे, रिवाल्वर थामें उसके प्रति सतर्क था।
"अभी समझाता हूं मतलब।" मारवाह पूर्ववतः लहजे में कह उठा--- "कोई चालाकी दिखाने की चेष्टा मत करना। मेरी तो बहुत इच्छा है कि तुम्हें अभी गोली मार दूं। ऐसा करने का मुझे मौका मत देना। वरना वासवानी साहब से यही कहना पड़ेगा कि खुद को बचाने के लिए तुम्हें शूट करना पड़ा।"
"वासवानी साहब को कहना पड़ेगा।" उसकी आंखें सिकुड़ी।
"ड्रामा मत कर कमीने।" मारवाह ने रिवाल्वर वाला हाथ हिलाया--- "मेरे साथ चल। बगल वाले बेडरूम में।"
अजीत वासवानी के चेहरे पर अजीब से भाव आ ठहरे थे। उसने हाथ में रखा व्हिस्की का गिलास खाली करके रखा और मारवाह को घूरते हुए बोला।
"चलो।"
दोनों बाहर निकले। रिवाल्वर थामें मारवाह सावधान था।
मारवाह उसे लिए दूसरे बेडरूम में पहुंचा। जयपुर वाला बेड पर अधलेटा-सा पत्रिका के पन्ने पलटने में व्यस्त था और आने वाले वक्त का इंतजार कर रहा था कि मारवाह को, रिवॉल्वर के दम पर, अजीत वासवानी को भीतर लाते देखा। मारवाह को दिखाने के लिए जयपुर वाला हैरानी से उछलकर बेड पर खड़ा हो गया।
"ओह! ये कमीना यहां भी आ गया।" जयपुर वाला दांत भींचकर कह उठा--- "मारवाह छोड़ना मत इसे। मोना चौधरी भी यहीं आसपास ही होगी। हद कर दी अब तो मोना चौधरी ने। मैं...।"
"वासवानी साहब।" मारवाह कठोर स्वर में बोला--- "ये दूसरे बेडरूम में, आपका रूप लिए मौजूद था और...।"
"बकवास मत करो।" अजीत वासवानी गुर्रा उठा--- "मैं तुम्हारे साथ कुछ देर पहले ड्राइंगरूम में था। वहां दो पैग लिए। पैग भी तुमने बनाए थे। मैं हूं अजीत वासवानी। तुम धोखा खा...।"
"ओह।" जयपुर वाला चेहरे पर जहरीले भाव समेटे बेड से नीचे आ गया--- "सुना मारवाह। ये तुम्हारे साथ था। इसका मतलब ये काफी देर से यहां है और मेरी हरकतों पर नजर रख रहा है।"
"आप ठीक कहते हैं वासवानी साहब।" मारवाह दांत भींचे कह उठा।
अजीत वासवानी की बुरी हालत थी। वो तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि दूसरा यहां आ सकता है और हालातों को इस तरह पलटाकर रख सकता है।
"बहुत खूबसूरत चाल चली तुमने।" अजीत वासवानी कड़वे स्वर में बोला--- "मोना चौधरी कहां है।"
"मारवाह।" जयपुर वाला दांत भींचकर कह उठा--- "मोना चौधरी यकीनन इसके साथ आई होगी। बंगले में ही कहीं छिपी होगी। इसे मैं संभाल लूंगा। तुम मोना चौधरी को ढूंढो। अगर वो मुकाबला करने की कोशिश करे तो बेशक गोली मार देना। अब इस मामले को निपटा ही देना चाहिए।"
"आप ठीक कह रहे हैं। मामला अब निपट ही जाना चाहिए।" मारवाह सख्त स्वर में बोला--- "लेकिन इसके पास आपको अकेला छोड़कर जाना ठीक नहीं...।"
"मैं संभाल लूंगा इसे।" कहने के साथ ही जयपुर वाला आगे बढ़ा और तकिए के नीचे से रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली--- "तुम मोना चौधरी को तलाश करो, बंगले में।"
मारवाह जल्दी से बाहर निकल गया।
मारवाह के जाने के बाद दोनों की निगाहें मिलीं।
जयपुर वाले चेहरे पर जहरीले भाव उभरे। रिवाल्वर उसने गाउन की जेब में डाल ली।
"क्यों, कैसी रही।" जयपुर वाला कड़वे अंदाज में हंसा--- "पहुंच गया न यहां। तुमने तो कभी सोचा भी नहीं होगा कि इस तरह भी बाजी पलट सकती है।"
"ठीक कहते हो। मैंने वास्तव में, ऐसा होने की कभी नहीं सोची थी। मोना चौधरी कहां है।" वो दांत भींचकर बोला।
"कुएं में।" वो उसी अंदाज में हंसा।
"क्या मतलब?"
"ढूंढ रही होगी मुझे।" कहकर जयपुर वाला खुशी भरे लहजे में जोरों से हंस पड़ा--- "मौका पाकर मैं भाग निकला उसकी गिरफ्त से। अब कहां जाता। यहीं तो आना था मुझे। यही मेरी मंजिल थी। छिपकर बंगले में प्रवेश कर आया। भीतर आने पर हर किसी ने मुझे अजीत वासवानी ही समझा और टिक गया। मारवाह का रंग तुमने देख ही लिया है। अब वो तुम्हें नकली समझ रहा है। मोना चौधरी भी तुम्हें नकली समझेगी क्योंकि मारवाह मेरे साथ है। यूं समझो कि तुम मेरी जगह पर खड़े हो और मैं तुम्हारी जगह पर आ गया। मजा तो आ रहा होगा।"
अजीत वासवानी सख्त निगाहों से उसे देख रहा था।
"मैं तुम्हें कभी भी कामयाब नहीं होने दूंगा।"
"मैं कामयाब हो चुका हूं।" वो जोरों से हंसा।
अजीत वासवानी की निगाह बाथरूम के बंद दरवाजे की तरफ उठी।
"तो मोना चौधरी को बाथरूम में छिपा रखा है।" अजीत वासवानी ने दांत भींचकर कहा।
जयपुर वाला जोरों से हंसा।
"हां। हां। जाओ मिल लो उससे। वो तो मुझे ढूंढ रही होगी। हो सकता है अभी उसका फोन भी आ जाए कि मैं उसकी कैद से निकल भागा हूं और तब मैं ही उससे बात करूंगा।"
अजीत वासवानी आगे बढ़ा और बाथरूम का दरवाजा खोलकर भीतर झांका वो खाली ही मिला। उसने पलटकर कहर भरी निगाहों से जयपुर वाले को देखा।
"बहुत बड़ी गलती कर दी तुमने यहां आकर। अगर मोना चौधरी की कैद से निकल भागे थे तो जान बचाने के लिए तुम्हें दिल्ली से भाग जाना...।"
"क्यों भागता।" उसने दांत किटकिटाकर कहा--- "मैं अजीत वासवानी हूं। मैं असली हूं और तुम क्लोन हो। मैं तुमसे डरकर क्यों भागूं। अपनी हस्ती को पाने के लिए, मैं पूरी कोशिश करूंगा। छिपता क्यों फिरूं। मारवाह के आते ही, तुम्हें गोली मारने को कह दूंगा। अब वो मेरी बात मानेगा। मैं वापस अपनी जगह पर आ चुका हूं। मेरा हौसला अब दोगुना हो गया है। अब मुझे तुम्हारा, तुम्हारे साथियों का या मोना चौधरी का कोई डर नहीं रहा। पहले की ही तरह बादशाह हूं अब मैं--- बादशाह...।"
अजीत वासवानी तेजी से आगे बढ़ा और किसी चीते की तरह जयपुर वाले पर छलांग लगा दी। जयपुर वाले ने बचने की चेष्टा नहीं की और दोनों नीचे जा गिरे। अजीत वासवानी ने जयपुर वाले को अपने नीचे दबाकर जकड़ लिया और वहशी स्वर में गुर्रा उठा।
"हरामजादे। कब तक तू हमारे हाथों से बचता रहेगा। एक बार तो तू बच गया था, लेकिन अब नहीं बच सकेगा। तेरी मौत मेरे हाथों ही होनी थी जो तू यहां आ गया।"
"तू मुझे नहीं मार सकता। मारवाह मेरे पहने कपड़े देखकर समझ जाएगा मैं असली हूं और जो जिंदा सामने खड़ा है वो नकली अजीत वासवानी है।" जयपुर वाला जल्दी से कह उठा।
"मारवाह को कुछ पता नहीं चलेगा। तेरे कपड़े मैं पहन लूंगा और अपने तुझे पहना दूंगा।" अजीत वासवानी दरिंदा बन चुका था--- "वो यही समझेगा कि मैंने क्लोन को खत्म कर दिया। वही तेरी लाश गायब करेगा। अपने असली मालिक की लाश ठिकाने लगाकर, वो चैन की सांस लेगा और तमाम उम्र तेरे क्लोन को, यानी कि मुझे अजीत वासवानी समझता हुआ, मेरी सेवा करता रहेगा। मैं तुझे...।"
"अपने साथियों से पूछ ले। उस डॉक्टर से और उस आदमी से...। जयपुर वाले की आंखों में तीव्र चमक लहरा रही थी--- "शायद अभी वो मुझे जिंदा रखना चाहते...।"
"अजीत वासवानी को खत्म करने के लिए तो वो कब के पागल हुए पड़े हैं। तू मरेगा तो तभी मैं तेरी जगह तसल्ली से ले सकूंगा।" कहने के साथ ही उसने, जयपुर वाले के गले पर पंजा रखकर, हाथ का दबाव बढ़ा दिया--- "तेरी मौत मेरे ही हाथों होनी थी अजीत वासवानी।"
तभी वार्डरोब का दरवाजा खुला और चेहरे पर खतरनाक भाव समेटे मोना चौधरी नजर आई। हाथ में रिवाल्वर दबी थी। उसके शरीर का जर्रा-जर्रा गुस्से से कांप रहा था।
जयपुर वाले का, गला दबने से दम घुटने लगा था।
"बस। मिस्टर क्लोन।" मोना चौधरी का वहशी स्वर उसके कानों में पड़ा--- "तुम्हारा खेल खत्म हो चुका है और ये जुदा बात रही कि तुम्हें पहचानने के लिए, मैं खुद उलझन में आ फंसी थी।"
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मोना चौधरी का स्वर कानों में पड़ते ही वो जोरों से चौंका। पंजे की पकड़ ढीली हुई तो नीचे पड़े जयपुर वाले असली वासवानी ने उसे अपने ऊपर से जोरों से धक्का दिया तो वो पास ही नीचे जा गिरा। जयपुर वाला असली अजीत वासवानी जल्दी से उठा और गहरी-गहरी सांसें लेने लगा।
मोना चौधरी पर निगाह पड़ते ही क्लोन की आंखें हैरानी से फैलती गई थीं।
"मोना चौधरी।" उसके होंठों से फटा-फटा-सा स्वर निकला।
"हां मिस्टर क्लोन मैं हूं मोना चौधरी।" स्वर में नागिन-सी फुंफकार थी--- "और तुम्हारी मौत भी हूं।"
"म--- मैंने तुम्हें तीस करोड़ दिए हैं।" उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। जल्दी से कहा।
"हां। लेकिन तीस करोड़ देते हुए तुमने खुद को अजीत वासवानी कहा था। क्लोन नहीं।" मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर, खतरनाक स्वर में कह रही थी--- "और तीस करोड़ तुमने क्लोन को खत्म करने के लिए दिए थे। अजीत वासवानी को खत्म करने के लिए नहीं और क्लोन तुम खुद हो।"
उसका जिस्म भय से कांपा। सूखे होंठों पर जीभ फेरी। कुछ कह नहीं सका।
असली अजीत वासवानी के चेहरे पर राहत के भाव नजर आ रहे थे।
"कुर्सी पर बैठ जाओ।" मोना चौधरी ने भिंचे स्वर में कहा।
वो कांपती टांगों से आगे बढ़ा और कुर्सी पर जा बैठा।
"मुझे मत मारो मोना चौधरी।" उसकी आवाज में डर की भरपूर थरथराहट थी--- "तुम जितना पैसा कहोगी। मैं तुम्हें दूंगा। मुझे अजीत वासवानी बना रहने दो। मैं--- मैं तुम्हें वासवानी ग्रुप के सारे बिजनेस का आधा साझेदार बना दूंगा। जिंदगी भर तुम दौलत से खेलोगी। हमें कोई कमी नहीं रहेगी। दौलत में बहुत बड़ी ताकत होती है। इसे खत्म कर दो। मुझे अजीत वासवानी बना रहने दो।" उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।
एकाएक मोना चौधरी के होंठों पर शांत मुस्कान उभरी।
"तुम्हारी बात पर मैं बाद में गौर करूंगी। पहले मेरे उन सवालों का जवाब दो, जो मैं जानना चाहती हूं।" मोना चौधरी का स्वर बेहद शांत था।
"पूछो तुम जो भी पूछोगी, मैं सच-सच बताऊंगा।" उसने जल्दी से कहा।
"खुद ही बता दो सबकुछ कि, जयपुर में मारवाह के साथ क्या हुआ, क्यों हुआ? तुम्हारे आदमी रतनचंद को भी रोक रहे थे और मुझे भी। जबकि तुमने ही मुझे इस काम पर लगाया था। यानी ऐसे सारे सवालों का जवाब। तुम बखूबी मेरी बात का मतलब समझ रहे होगे।"
"हां। हां। समझ रहा हूं। सब बताता हूं।" क्लोन ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए जल्दी से कहा--- "दरअसल मैं मेरा साथी और मुझे जन्म देने वाला डॉक्टर, चाहते थे कि मारवाह को अंत तक यकीन आ जाए कि मैं क्लोन नहीं, असली अजीत वासवानी हूं। इसलिए मारवाह को जानबूझकर, तस्वीर देकर जयपुर भेजा और वहां मेरे साथियों ने पहले ही मारवाह को डरा-धमकाकर वापसी का इंतजाम करा रखा था। ताकि मारवाह यही समझे कि क्लोन के साथी नहीं चाहते कि उसकी तलाश की जाए और मारवाह ने ऐसा ही समझा और योजना के मुताबिक मारवाह को मैंने वापस दिल्ली बुला लिया।"
तभी दरवाजा खुला और मारवाह ने भीतर प्रवेश किया। वो कुछ कहने लगा कि भीतर का माहौल देखकर ठिठक गया। उसके हाथ में रिवाल्वर दबी थी। मोना चौधरी को देखकर वो और भी चौंका।
"खामोशी से खड़े रहो मारवाह।" जयपुर वाले असली अजीत वासवानी ने शांत स्वर में कहा।
मारवाह समझने की चेष्टा करने लगा।
मोना चौधरी ने क्लोन को देखा।
"आगे बोलो।"
क्लोन खौफ भरे स्वर में बोला।
"वासवानी के जयपुर से हमारी कैद से भाग निकलने की वजह से हमारे सामने बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई थी। हमारी सशक्त योजना को वासवानी कभी भी मिट्टी में मिला सकता था। इसका खत्म होना जरूरी था। परंतु ये कहीं भी मिल नहीं रहा था। जाने जयपुर में कहां छुप गया था। आखिरकार डॉक्टर और मेरे साथी ने यही फैसला किया कि किसी खतरनाक हस्ती को वासवानी को क्लोन बताते हुए, तगड़ी रकम देकर इसकी हत्या करवाई जाए। ये काम उन्होंने मुझे करने को कहा। मैंने मारवाह से उन लोगों की लिस्ट तैयार करवाई जो पैसों के लिए हर तरह के खतरनाक काम करते हैं और इस लिस्ट में से मैंने मोना चौधरी को चुना। इस तरह वासवानी को खत्म करने का काम तुम्हें दे दिया। तुम जयपुर चली गई। तभी मेरे साथियों को मालूम हुआ कि जयपुर में छिपे वासवानी ने अपने बचाव के लिए प्राइवेट जासूस रतनचंद को लिया है जो कि मुझे खत्म करने की भी कोशिश में है। ऐसे में मेरे साथियों ने रतनचंद को रोकने और उसे खत्म करने की कोशिश की। इधर हम चाहते थे कि तुम जल्दी से वासवानी को ढूंढकर खत्म कर दो कि कहीं देर होने से मामला न बिगड़ जाए। जो आदमी रतनचंद के पीछे थे उन्हें तुम्हारे पीछे भी लगा दिया, ताकि तुम समझो कि उनके आदमी तुम्हें आगे बढ़ने के लिए रोक रहे हैं। तुम्हें जानबूझकर इस मामले में गुस्सा दिलाया गया, ताकि तुम गुस्से में जल्द-से-जल्द वासवानी को तलाश करके खत्म करो। मैं तुम्हारे बारे में मालूम कर चुका था कि तुम डरकर या धमकी से पीछे नहीं हटती बल्कि अपने काम के प्रति और भी पक्की हो जाती हो। इसी वजह से तुम्हारी एक-आध बार ठुकाई भी करवाई गई। तुम्हें वासवानी की मौजूदगी का, जयपुर में होने का पक्का विश्वास हो, इसके लिए गोपाल शिराजी की सहायता लेकर तुम्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया कि तुम्हें लगे वासवानी कहीं आस-पास ही है।"
क्लोन रुका और मोना चौधरी को देखने लगा।
अजीत वासवानी और मारवाह की निगाह उन पर ही थी।
"कहते रहो।" मोना चौधरी का स्वर बेहद शांत था।
"उधर कालिया ने जब रतनचंद पर फायरिंग की तो वो बच गया और उसके बाद वो कहीं नजर नहीं आया। वो सतर्क हो चुका था। हमारे किराए के आदमी उन्हें ढूंढते रहे। उधर तुम भी हमारे आदमियों की निगाहों से एकाएक जाने कहां गायब हो गई। मैं, डॉक्टर और उसका साथी तुम्हारे और रतनचंद की और वासवानी की खबर न मिलने की वजह से भारी तौर पर परेशानी के दौर से गुजर रहे थे कि, तभी आज सुबह तुम्हारा फोन आया फिर जो-जो भी हुआ। तुम्हारे सामने ही है।" क्लोन का चेहरा फक्क पड़ा हुआ था।
"तुम्हारा फोन आने के बाद मैंने डॉक्टर और उसके साथी से बात की तो उन्होंने, कहा कि तुमसे मिल लेने में कोई हर्ज नहीं है। जैसे भी हालात सामने आएं, उनसे सावधानी से निपटूं। वासवानी के खत्म होने की बात सुनकर वो दोनों भी खुश हो गए थे। उन्हें भी विश्वास था कि तुम वासवानी को खत्म करके ही दम लोगी। क्योंकि वो जान चुके थे कि तुम बहुत खतरनाक हो। लेकिन दो दोपहर की मुलाकात के बाद मैंने उन्हें बताया कि वासवानी अभी जिंदा है। तुम और रतनचंद ये जानने की कोशिश कर रहे हो कि वास्तव में असली वासवानी कहां है तो वो चिंतित अवश्य हुए, परंतु जैसे उन्हें विश्वास हो कि अंत में तुम लोग मुझे ही असली मानोगे। उन्होंने मुझे सामान्य बना रहने को कहा। लेकिन अब अचानक वासवानी के यहां जाने और खासतौर से तुम्हारे साथ होने की वजह से, असल बात सामने आ गई।"
मोना चौधरी मुस्कुराई।
"वास्तव में तुम लोगों ने वासवानी की जगह लेने के लिए, इसकी खरबों की दौलत पाने के लिए, बहुत ही जबरदस्त योजना को जन्म दिया कि मैं भी उलझकर रह गई। योजना में कहीं भी कोई कमी नहीं थी। बस एक, सिर्फ एक ही गलती कर दी तुम लोगों ने।"
"क्या?" क्लोन के होंठों से निकला।
"मुझे इस मामले में खींच लिया।" मोना चौधरी का स्वर कड़वा हो गया--- "मुझसे वासवानी की हत्या के लिए न कहते। उसे दूर ही रखते और खुद ही वासवानी की तलाश करते रहते तो देर-सवेर में तुम लोग इसे खत्म करने में सफल हो जाते और तुम लोगों के मनसूबे पक्के तौर पर सफल रहते।"
क्लोन की आंखों में तीव्रता खौफ ने उछाल मारी।
"मुझे मत मारो मोना चौधरी। इसे खत्म कर दो। मैं तुम्हें इसकी दौलत और कामों का आधा हिस्सेदार बना लूंगा। डॉक्टर और उसका साथी भी खुश होगा। दौलत के लिए खतरे कब तक उठाती रहोगी। मेरी बात मानकर, तुम जाने कितनी दौलतमंद हो जाओगी।"
"ठीक कहते हो।" मोना चौधरी मुस्कुराई--- "डॉ. और उसका साथी कहां हैं?"
"दिल्ली में ही हैं।" कहने के साथ ही क्लोन ने महारानी बाग का एक पता बताया--- "दोनों यहां रह रहे हैं। बेशक इनसे भी बात कर लो।"
मोना चौधरी ने अजीत वासवानी को देखा।
"क्लोन तुम्हारे सामने है। वासवानी तुम इसका इंतजाम करोगे या मैं।" मोना चौधरी का स्वर वहशी हो उठा था।
"नहीं।" क्लोन जल्दी से कह उठा--- "मुझे मत मारो। मैं मरना नहीं चाहता। ये दुनिया कितनी अच्छी है। मैंने तो अभी कुछ भी नहीं देखा। मेरी जान मत लो।" तड़पकर कहते हुए उसने दोनों हाथ जोड़े।
दांत भींचे अजीत वासवानी ने मारवाह को इशारा किया।
मारवाह तो जैसे पहले से ही तैयार था। उसके हाथ में दबी रिवाल्वर से, तीव्र आवाज के साथ गोली निकली और क्लोन के सिर में प्रवेश करती हुई दूसरी तरफ से निकल गई। क्लोन के जिस्म को तीव्र झटका लगा। शरीर जोरों से लहराया और कटे पेड़ की तरह, गिरते हुए कुर्सी से टकराया और नीचे लुढ़क गया। वो मर चुका था। नकली जीवन, असली मौत पा चुका था।
कई क्षणों तक सबकी निगाहें क्लोन की लाश पर टिकी रहीं।
मारवाह ने अजीत वासवानी को देखा और धीमे स्वर में कह उठा।
"माफ कीजिए वासवानी साहब। मैं आपको पहचान नहीं सका और...।"
"तुम्हारी कोई गलती नहीं।" अजीत वासवानी मुस्कुराकर कह उठा--- "बल्कि कई बार तो मुझे ही ऐसा लगने लगा था कि कहीं मैं नकली तो नहीं।" कहकर उसने मोना चौधरी को आभार भरी निगाहों से देखा--- "अगर तुम्हारा दखल इस मामले में न होता तो शायद, मैं अपना सब कुछ गंवा बैठता।"
मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।
"मारवाह।" अजीत वासवानी गंभीर हो उठा--- "क्लोन की लाश का चेहरा बिगाड़ देना और इसे कहीं दूर इस तरह फेंक दो कि, जब लाश पुलिस की निगाहों में आए तो इसका संबंध मेरे से न जुड़ पाए।"
"मैं अभी सारा इंतजाम करता हूं वासवानी साहब।" मारवाह ने सतर्क स्वर में कहा।
तभी मोना चौधरी आगे बढ़ी और रिसीवर उठाकर, नंबर मिलाने लगी।
नंबर मिला। पारसनाथ से बात हुई।
"पारसनाथ।" मोना चौधरी ने सख्त स्वर में कहा--- "महारानी बाग का पता नोट करो। वहां, मेरे बताए पते पर दो व्यक्ति मिलेंगे। उनमें से एक डॉक्टर होगा और दूसरा उसका साथी। उन दोनों को खत्म कर दो। उन्हें किसी भी हाल में नहीं बचना चाहिए। खासतौर से डॉक्टर को। ताकि फिर कभी वो किसी मानव क्लोन को तैयार न कर सके।"
"ठीक है।" पारसनाथ का सपाट स्वर कानों में पड़ा--- "असली कौन निकला?"
"जयपुर वाला।"
"मतलब कि सबसे पहले तुम जिस अजीत वासवानी से मिली, वो ही क्लोन था।"
"हां। पारसनाथ, वक्त बर्बाद मत करो। हो सकता है, बंगले पर क्लोन का कोई आदमी हो और वो फोन पर डॉक्टर और उसके साथी को यहां के बदले हालातों के बारे में खबर कर दे और वो खतरा महसूस करके, वहां से खिसक जाएं। दोनों को खत्म करो। कब तक पूरा हो जाएगा ये काम?"
"ज्यादा-से-ज्यादा दो घंटे।" पारसनाथ के सपाट स्वर में, खुरदरापन भर आया था।
मोना चौधरी ने रिसीवर रखकर अजीत वासवानी से कहा।
"इस कमरे में जो कुछ भी हुआ है, दो घंटे तक किसी को पता न चले। यानी कि लाश के बारे में भी, बंगले के नौकर और पहरेदारों को भनक न मिल सके।" मोना चौधरी के दांत भिंचे हुए थे।
"मैं समझ गया।" अजीत वासवानी ने सिर हिलाया।
"लाश के बारे में तो वैसे भी कोई नहीं जान पाएगा।" मारवाह ने कहा--- "क्योंकि इसे ठिकाने लगाने में सिर्फ मेरे साथी ही साथ होंगे। यहीं पर इसका चेहरा बिगाड़कर, इसे पैक करके यहां से बाहर निकाला जाएगा।"
"ये काम दो घंटे से पहले मत करना। तब तक वो डॉक्टर और उसका साथी खत्म हो चुके होंगे।"
मारवाह की सख्त नजरें लाश पर गईं।
"मुझे कोई जल्दी नहीं। रात पूरी बाकी पड़ी है।" उसकी आवाज में खतरनाक भाव आ गए थे--- "दो घंटे लगाकर मैं आराम-आराम से इसका चेहरा ऐसा बिगाड़ता हूं कि गर्दन से ऊपर सिर्फ हड्डियां ही नजर आएंगी। मांस नहीं।"
मोना चौधरी ने हौले से सिर हिलाया और अजीत वासवानी को देखा।
"तुम्हें तुम्हारा हक मिल चुका है। और...।"
"तुम्हारी वजह से।" अजीत वासवानी मुस्कुरा पड़ा--- "मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूंगा मोना चौधरी। याद है मैंने तुम्हें कहा था कि दिल्ली वाले को खत्म कर दो मैं तुम्हें पचास करोड़ दूंगा।"
"तो?" मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।
"मैं अब सच में तुम्हें पचास करोड़ दूंगा। तुम...।"
"वासवानी, जो तीस करोड़ मुझे मिला था, वो भी तो तुम्हारा था। एक काम की कीमत मैं एक बार ही लेती हूं। बार-बार नहीं।" कहने के साथ ही मोना चौधरी पलटी और दरवाजा खोलते हुए बाहर निकल गई।
समाप्त
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