रनवीर भंडारी दोपहर से ही, बंगले के हॉल-विशाल ड्राइंगरूम में बैठा शराब पी रहा था। शरीर पर रात का पहना ही नाईट सूट था और अब दूसरी रात आ गयी थी। नहाया भी नहीं था। पुराने नौकर ने जर्बदस्ती वाले ढंग में खाने को थोड़ा-बहुत दिया था। बंगले में कोई नहीं था।
नयना, बच्चों को लेकर अपनी मां के घर पहुंच चुकी थी।
वकील का ही फोन आया था कि कोर्ट में आज तलाक के पेपर्स उसने जमा करा दिए हैं। एक दिन बाद की तारीख पड़ी है। साईन तो वो कर चुका था तलाक के कागजों पर। कोर्ट में पेश होकर, उसने तलाक के लिये, जज के सामने हामी भरनी थी। दोनों पार्टियां समझदार थी। ये देखकर जज ने तलाक कराने में देर नहीं लगानी थी।
नौकरों को भी रनवीर भंडारी ने छुट्टी दे दी थी।
एक-एक करके सब जाते जा रहे थे। जो दो-चार बचे थे।
उन्होंने भी एक दो दिन में चले जाना था। पुराना नौकर बबलू, जो कि बूढ़ा होने को आ रहा था। उसका इरादा अभी जाने का नहीं लग रहा था। अपने मालिक की हालत देखकर वो बहुत दुखी नजर आ रहा था।
रनवीर भंडारी नशे में था। आंखें सूजकर भारी हो रही थी।
आधी से ज्यादा खुली-खाली बोतल सामने पड़ी थी। अंधेरा होने पर बबलू ने वहां की रोशनियां जला दी थी।
“बस कीजिये मालिक। बहुत पी ली।” बबलू पास आकर दबे स्वर में बोला।
“पी लेने दे। महंगी व्हिस्की है।” रनवीर भंडारी धीमे स्वर में बोला और घूंट भरा –“फिर मालूम नहीं पीने को मिले या ना मिले। कहां मिलेगी। पैसा ही नहीं होगा। दौलत ही नहीं होगी। पीने को कहां मिलेगी। नयना छोड़ गयी। बच्चों को भी ले गयी। सबकी ‘यारी दौलत से’ थी। बहुत कीमती चीज़ होती है दौलत। पास हो तो सब पास रहते हैं। न हो तो सब साथ छोड़ जाते हैं। अकेला रह जाता है इंसान। जैसे मैं रह गया। मेरा सारा आडम्बर खत्म हो गया। बंगला-बिजनेस, नौकर, कार, बैंक सब कुछ चला गया। कुछ भी तो नहीं बची।”
बबलू की आंखों में आंसू आ गये। वो खामोशी से, पास से हट गया।
भंडारी ने गिलास खाली किया और पास पड़ा फोन उठाकर नम्बर मिलाने लगा। दो-तीन बार नम्बर मिलाने पर नम्बर मिला।
बेल की आवाज कानों में पड़ी फिर गोदरा का स्वर।
“हैलो।”
“गोदरा।”
“ओह भंडारी साहब।”
“देवराज चौहान नहीं मिला?”
“मिला-आया था मेरे पास।”
“ओह-तुमने कहा कि भंडारी को पचास करोड़ की जरूरत...।”
“कहा। लेकिन वो कहता है कि डकैती मैंने नहीं की। कोई दूसरा कर गया। उसके पास पैसे नहीं हैं।”
रनवीर भंडारी ने गहरी सांस ली फिर हौले से हंसा।
“बेईमान हो गया देवराज चौहान।”
“मेरे ख्याल में तो वो सच कह रहा...।”
“सब सच्चे है। सब ठीक है। भंडारी गलत है।” भंडारी के होंठों से नशे भरी हंसी निकली –“देवराज चौहान कहता है कि उसने डकैती नहीं की। इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है मेरे लिये। लालच मार देता है सबको। उसने सोचा क्यों दे भंडारी को पैसा। दिए बिना ही काम चल जायेगा। आखिर भंडारी क्या बिगाड़ लेगा। देवराज चौहान ठीक ही तो सोचता है। मैं उसका क्या बिगाड़ सकता हूं। कुछ भी नहीं। बुरा किया देवराज चौहान ने।” मेरे को कम से कम पचास करोड़ तो देना ही चाहिये था।”
उधर से गोदरा ने रिसीवर रख दिया।
“बंद कर दिया फोन। गोदरा ने फोन बंद कर दिया। मेरी बात भी पूरी नहीं सुनी। ये वही गोदरा है जो हाथ बांधे मेरे सामने खड़ा रहता था। इसे अब जरूरत ही कहां है मेरी। भंडारी तो खाली हो गया। नंगा हो गया। दौलत नहीं। माल नहीं। सलाम मारने वाले भाग गये। कोई मेरी परवाह क्यों करेगा।” फोन पकड़कर बैठा रहा भंडारी। नशे में उसका चेहरा लाल-सा होकर भभक रहा था।
उसने फोन रखकर नया पैग तैयार किया। घूंट भरा गिलास रखा।
बबलू दूर खड़ा देख रहा था। उसकी आंखें भर आई थी। वो पलटकर बाहर निकल गया।
रनवीर भंडारी देर तक बैठा शून्य में देखता रहा फिर एक और घूंट भरा और फोन उठाकर नम्बर मिलाने लगा। पहली बार में ही लाईन मिली। बेल बजी।
“हैलो।” उधर से आवाज कानों में पड़ी।
“नमस्कार ससुर जी।” रनवीर भंडारी के नशे से भरे चेहरे पर फीकी सी मुस्कान उभरी।
“रनवीर। कैसे हो बेटा?”
“बेटा?...हूं ठीक है।” हौले से हंसा वो –“नयना से बात कराईये।”
चौथे पल ही फोन पर नयना की तीखी आवाज़ पड़ी।
“कहो-फोन क्यों किया?” नयना के बारे में जानने के लिये पढ़ें अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’।
“नाराज मत होवो नयना। तुम मेरी पत्नी हो। मेरे बच्चों की।”
“शटअप।” नयना का तेज स्वर कानों में पड़ा।
दो पलों के लिये भंडारी चुप सा रह गया।
“गुस्सा उतरा नहीं तुम्हारा?” रनवीर भंडारी का स्वर नशे में भरभरा रहा था।
“पी रखी है। पिओ।” नयना का कड़वा स्वर कानों में पड़ा –“इसके अलावा तुम्हारे पास काम की...।”
“तलाक के कागजों पर भी हस्ताक्षर कर दिए। सिर्फ एक बार कहने पर। मैं तुम्हारा कितना ध्यान रखता...।”
“साईन करने का धन्यवाद। थैंक्स।” नयना का कड़वा स्वर कानों में पड़ा –“रही बात मेरा ध्यान रखते हो तो किसी दूसरे से कहो। वो सच मानेगा। मेरे से दूर ही रखो इन शब्दों को।”
“नाराज हो।”
“बकवास मत करो।”
रनवीर भंडारी ने आंखें बंद कर ली।
“नयना, मुझे इस तरह छोड़कर मत जाओ। बच्चों को मुझसे जुदा न करो। सोचो मेरा क्या होगा। मैं कहां जाऊंगा। पैसा भी नहीं रहा। रहने की जगह नहीं। खाने को, पहनने को भी...।”
“रनवीर।” नयना के होंठों से चबाए शब्द निकले –“रास्ता मैं बता देती हूं।”
“क्या?” कहते हुए रनवीर भंडारी ने गिलास उठाया। घूंट भरा।
“तुम्हें इस वक्त उस हीरोईन के पास जाना चाहिये, जिसके शरीर से खेलने की खातिर, तुमने करोड़ों रुपये फिल्म के रूप में फूंक दिए। अब तक तुम्हें ये तो समझ में आ गया होगा कि उसमें ऐसा कुछ भी नहीं था जो मेरे से ज्यादा हो। तुमने तब मेरे बारे में नहीं सोचा। बच्चों के बारे में नहीं सोचा कि उनका क्या होगा। तुम्हारा पैसा, सिर्फ तुम्हारा नहीं था। उस पर मेरा और बच्चों का भी हक था। अपनी अय्याशी में तुमने हमारा हक भी बरबाद कर दिया। वो वक्त याद करो। जब तुम पन्द्रह-पन्द्रह दिन घर नहीं आते थे। महीना बीत जाता था तुम्हारे इन्तजार में। तुम उस हीरोईन के बेडरूम में घुसे रहते थे। मैं जानती थी कि तुम क्या कर रहे हो। लेकिन मैंने तुम्हें सहा। तुम दूसरी औरत के साथ रहते रहे। मैं तुम्हें समझाती रही। जबकि तुमने मेरी तरफ ध्यान नहीं दिया। मैं उस हीरोईन से कहीं ज्यादा खूबसूरत हूं। बढ़िया हूं। लेकिन कुत्ते की तरह तुम्हें दूसरा घर सूंघने की आदत पड़ गई थी। अपने घर की महक कैसे पहचान पाते।”
“नयना...। मैं...।”
“इस वक्त तुम्हें उसी हीरोईन के पास जाना चाहिये। वो तुम्हें अपनी गोद में बिठायेगी। बोतल भी खोलेगी। तुम्हारे साथ पिएगी। तुम्हारी हर जरूरत को पूरा।”
“कुत्ते हो तुम। औरत होने के नाते मैंने अपनी सौत की सह लिया लेकिन ये नहीं सह सकती कि मेरे बच्चे पैसे-पैसे को तरसें।”
“प्लीज नयना तुम।”
“इसलिये तुमसे तलाक लेना जरूरी है। खुशखबरी दूं तुम्हें?”
नयना की आवाज में कड़वापन था।
“खुशखबरी?” नशे से भरा था रनवीर भंडारी का स्वर –“द-दो।”
“जज से बात कर ली है मैंने। वो एक सप्ताह में ही हमारा तलाक करवा देगा।”
“य-ये खुश-खबरी है?”
“नहीं वो तो मैं तुम्हें अब सुना रही हूं कि आज से आठवें दिन मैं किशोरी लाल से शादी कर रही हूं। पैंतालीस बरस का वो अविवाहित है। मेरे बच्चों को अपना नाम देने को तैयार है। कानूनी रूप से। मेरे से शादी करने की सोचकर ही वो खुश है, क्योंकि वो जानता है कि, मेरे से खूबसूरत औरत मिलना आसान नहीं। वैसे भी वो शुरू से ही मुझे पसन्द करता था। परन्तु कहा कभी नहीं। वो मेरे लिये, मुझे सिर्फ देखने के लिये घर पर आता लेकिन तुम हमेशा यही सोचते थे कि, वो तुमसे मिलने आता है।”
रनवीर भंडारी ने आंखें खोली। आंसू थे आंखों में।
“उसके पास दौलत है। वो मेरी जरूरतें भी पूरी करेगा और मेंरे बच्चों की भी।”
“मुझे इस तरह मत छोड़ो नयना। मैं तुम्हारे बिना –।”
“तुम्हारे साथ रहने की सोचकर भी मेरा दम घुटने लगता है। समझ में नहीं आता कि अब तक मैं तुम्हारे साथ कैसे रहती रही। हे भगवान, शुक्र है कि वक्त रहते मैं बच गयी।” इसके साथ ही लाइन कट गयी।
“नयना, सुनो तो –।” रनवीर भंडारी ने कहना चाहा कि गहरी सांस लेकर रह गया फिर बड़बड़ाया –“इसने भी फोन बंद कर दिया। सब मेरे से दूर हो गये। पैसा नहीं तो कोई भी नहीं।”
थके-टूटे स्वर में भंडारी ने फोन एक तरफ रखा और गिलास उठाकर खाली किया फिर दूसरे हाथ से आंसू साफ करने लगा। एकाएक रनवीर भंडारी ठिठका।
उसकी निगाह बबलू के साथ खड़े वानखेड़े पर जा टिकी।
वो सिर्फ दस कदम की दूरी पर थे। वानखेड़े की तीखी-सख्त निगाह उसके चेहरे पर टिकी थी। आ ठहरी।
“ये हैं रनवीर भंडारी साहब?” वानखेड़े बोला बबलू से।
बबलू ने भारी मन से सिर हिला दिया।
रनवीर भंडारी के चेहरे पर हर तरह के भावों से भरी मुस्कान आ ठहरी।
“कैसा जमाना आ गया है। मेरे घर पर, मेरे सामने खड़े होकर ये पूछा जा रहा है कि क्या मैं भंडारी हूं। कभी ये भी वक्त था कि यहां कोई आ ही नहीं सकता था। दौलत से यारी क्या टूटी, सब कुछ ही...।”
“मालिक। ये पुलिस वाले हैं।” बबलू ने धीमे स्वर में कहा।
रनवीर भंडारी की नशे भरी आंखें वानखेड़े पर जा टिकी।
“पुलिस वाला। मेरे यहां, वो भी बिना वर्दी के। आने दो। बैठ जाओ, पूछने की भी जरूरत नहीं।” रनवीर भंडारी ने सिर हिलाकर धीमे स्वर में कहा और बोतल उठाकर गिलास भरा।
करीब आकर वानखेड़े ने अपना कार्ड निकाल कर उसके सामने किया।
“मेरा कार्ड देख लो, विश्वास आ जायेगा कि मैं –।”
“कोई फर्क नहीं पड़ता अगर तुम चोरी करने भी आये हो तो।” हाथ हिलाकर रनवीर भंडारी कह उठा –“चोर-पुलिस सब एक जैसे हैं मेरे लिये। है ही नहीं कुछ। खाली हो गया भंडारी। ये बंगला-मेरा नहीं है। नीलाम होने वाला है सब कुछ। मेरे से तुम क्या ले जाओगे।”
वानखेड़े ने कार्ड जेब में डाला और उसके सामने सोफे पर बैठ गया।
“बबलू। गिलास ला दे, इसके लिये...।”
“नहीं। मैं नहीं पीता।” वानखेड़े बोला।
“नहीं पीते। पुलिस वाले होकर नहीं पीते तो खाते कैसे होंगे, इस काम में?” रनवीर भंडारी गिलास उठाकर हंस पड़ा।
उसकी बात पर ध्यान न देकर वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में पूछा।
“अभी तुम शायद अपनी पत्नी से बात कर रहे थे।”
“शायद नहीं पक्का। पत्नी...हां पत्नी से बात कर रहा था। पांच-छ: दिन वो मेरी पत्नी रहेगी। बस। खेल खत्म। फिर वो पैसे वाले से शादी कर लेगी। मेरा पैसा तो खत्म हो गया। मैं किस काम का रहा।”
“कहां गया तुम्हारा पैसा?” वानखेड़े का स्वर पहले जैसा ही था।
“फिल्म बना दी।” रनवीर भंडारी नशे में हाथ हिलाकर हंसा फिर पास ही रखा गिलास उठाकर घूंट भरा –“वो साली थी ही बहुत खूबसूरत। मेरे शोरूम पर आया करती थी। नये-नये डिजाईनों के गहने देखने-बनवाने। फिल्मों में उसे देखा करता था। आ गया दिल। बातों में नहीं फंसी। कोशिश की। कोई फायदा नहीं हुआ। मैंने भी सोच लिया कि छोडूंगा नहीं। पैसे की क्या कमी थी। उसे फंसाने के चक्कर में, उसे हीरोईन लेकर, फिल्म बिना दी। फंस गयी। दिन-रात मेरे साथ। पत्नी की तरह रही वो। खूब लूटा उसने मुझे। दो करोड़ तो फिल्म में काम करने का मांग लिया और एक-दो-एक-दो उधार लेते-लेते पन्द्रह करोड़ उसके पास पहुंच गया। मैं तो उसे पाकर जैसे दुनिया भूल चुका था। ऐसे में बीबी, बच्चे कहां याद आते हैं। खूब ऐश की। उसे भी करवाई। बन गयी फिल्म। रिलीज हुई। फ्लॉप हो गयी। बहुत बुरी तरह पिटी फिल्म। लागत भी वापस नहीं आई। करोड़ों डूब गया। पन्द्रह करोड़ वो हीरोईन उधार ले चुकी थी। फिल्म फ्लॉप होते ही उसने नज़र आना, मिलना बंद कर दिया। उधार कहां से वापस आता। शहर का जाना-माना ज्वैलर्स रनवीर भंडारी फुटपाथ पर आ गया। सुना है उस हीरोईन ने नया बंगला खरीदा है। नई उम्र के लड़के को साथ रखा है। लड़के को भी एक-आध फिल्म में चांस दिलवा दिया। उसके तो खूब मजे हो रहे हैं।”
रनवीर भंडारी। परन्तु उसके हाव-भाव में गुस्सा भर आया था।
वानखेड़े देर तक उसे देखता रहा। फिर उठा और उसके पास रखा व्हिस्की का गिलास उठाकर टेबल पर रखा और वापस आ बैठा।
“ये क्या-अभी ऐसी नौबत तो नहीं आई कि मेरी व्हिस्की की बोतल भी नीलाम –।” कहते हुए हंस पड़ा।
“मिस्टर भंडारी।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा –“इस-वक्त मैं ऑन ड्यूटी, आपसे बात करना चाहता हूं।”
“हां करो-कहो...।”
वानखेड़े ने बबलू को देखा।
“तुम जाओ-इतनी दूर रहो कि हमारी बात न सुन सको।”
बबलू वहां से हट गया।
“मेरा गिलास –।”
“पी लेना। पहले मेरे से बात कर लो।”
रनवीर भंडारी नशे में धुत सा, हाथों को हिलाकर रह गया।
“तुम्हारा सब कुछ नीलाम होने वाला है। नीलामी से बचने के लिये तुमने इन्तजाम नहीं किया पैसे का?”
रनवीर भंडारी ने नशे में बंद हो रही आंखों से वानखेड़े को देखा।
“तुम्हारे पास है? वापस दे दूंगा। कसम से-वापस दे दूंगा पचास करोड़ की जरूरत है। दे रहे हो।”
वानखेड़े मुस्कराया।
रनवीर भंडारी की नशे से भरी आंखें सिकुड़ी क्या, बंद सी महसूस होने लगी।
“हंस रहे हो। हंस लो। कौन नहीं हंस रहा। सब ही तो हंस रहे है मुझ पर। तुम भी हंसो। खत्म हो गया भंडारी। दौलत के यार हैं सब। दौलत नहीं तो कुछ भी नहीं हंसो...।”
“ये सब ड्रामेबाजी छोड़ो। सीधी तरह बात करो।”
वानखेड़े का स्वर सामान्य था- “मैं देवराज चौहान के बारे में बात करने आया हूं। डकैती मास्टर देवराज चौहान –।”
पलभर के लिये ऐसे लगा जैसे रनवीर भंडारी को झटका सा लगा हो। उसका शरीर हिला हो फिर थम गया। नशे से भरी आंखें पूरी खुल गयी। वो वैसे ही पस्त पड़ा वानखेड़े को देखने लगा।
“डकैती मास्टर देवराज चौहान।” रनवीर भंडारी होंठों हिले।
“जानते हो या सिर्फ नाम ही सुना है देवराज चौहान का?”
वानखेड़े की आवाज बेहद शांत थी।
रनवीर भंडारी कुछ खामोश रहकर बोला।
“क्या कहना चाहते हो?”
वानखेड़े अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा।
“इंस्पेक्टर।” भंडारी गहरे नशे में था –“मैंने सुन ली है तुम्हारी बात। जवाब भी दूंगा। अब मेरी वो स्थिति नहीं है कि अपनी इज्जत बचाने की खातिर झूठ बोलूं। मैं तो पहले ही बिका-बिकाया हूं। तुम जो कहना चाहते हो कह दो। उसके बाद मैं कह दूंगा। कोई भी पर्दा नहीं रखूंगा। पर्दे में है ही क्या-कुछ बचा ही नहीं।” नशे से भरी हंसी हंसा भंडारी।
“मैंने पूछा है कि तुम देवराज चौहान को जानते हो?”
वानखेड़े, रनवीर भंडारी को घूरता रहा।
“तुमने तीस अरब के जेवरातों की डकैती करने के लिये देवराज चौहान से बात की।” वानखेड़े का स्वर कठोर था।
रनवीर भंडारी की आंखें सिकुड़ गयी। उसने अपने नशे से भरे चेहरे पर हाथ फेरा।
“कहो-कहो।”
“पचास करोड़ तुम्हें बाजार का देना है। जानते थे कि इतनी बड़ी रकम का इन्तजाम नहीं हो सकता और लेनदार छोड़ेंगे भी नहीं। ये जानकर तो जरा भी नहीं छोड़ेंगे कि तुम कंगाल हो चुके हो। अपनी बरबादी तुम्हें सामने नजर आने लगी। अपने, पराये होते तुम देख ही रहे थे। तुम्हारी पत्नी तुम्हें छोड़ने को तैयार थी क्योंकि उस फिल्मी हीरोईन के चक्कर में सब गंवा बैठे थे। पत्नी के लिये तुम्हारे पास कुछ नहीं बचा था। खानदानी रईस हो तुम। फुटपाथ पर रहने की तो सोच भी नहीं सकते। पैसे की सख्त जरूरत की वजह से तुम किसी तरह देवराज चौहान तक पहुंचे। उसे तीस अरब के जेवरातों की प्रदर्शनी के बारे में बताकर डकैती करने को कहा। सुरक्षा इन्तजामों की व्यवस्था तुम ही देख रहे थे। ऐसे में तुम्हारे लिये सारा काम आसान हो गया। तुमने इस काम के लिये देवराज चौहान को तैयार किया।”
वानखेड़े के खामोश होते ही रनवीर भंडारी सिर हिलाकर बोला।
“मेरा गिलास दो, जो तुमने टेबल पर रख दिया है।”
“पहले मेरी बातों का –।”
“इंस्पेक्टर पीते हुए आराम से बात होती है। गिलास दो बाकी की बात फिर करता हूं।”
वानखेड़े उठा और टेबल पर रखा भरा गिलास उठाकर उसे थमाया और वापस बैठ गया।
“तुम्हारी हालत ऐसी नहीं है कि तुम और पीना सह सको।” वानखेड़े बोला।
रनवीर भंडारी ने दो घूंट भरे और गिलास पास ही रख लिया।
“सिगरेट दोगे?”
वानखेड़े ने फौरन सिगरेट सुलगाकर उसे थमा दी।
“बहुत मतलब के होते हैं पुलिस वाले।” रनवीर भंडारी नशे में उल्टे-सीधे ढंग से कश लेते कह उठा- “तुम तो मेरी नौकरगिरी करने से भी परहेज नहीं कर रहे। व्हिस्की का गिलास पकड़ा रहे हो। अपनी सिग्रेट मुझे दे रहे हो कि...”
“किसी का काम करने से कोई छोटा नहीं हो जाता
“जो मन में आये कहो।” रनवीर भंडारी ने कश लिया - सब तुम्हें किसने बताया। देवराज चौहान वाली बात।”
“देवराज चौहान का एक साथी मेरे हाथ लग गया। उसने बताया।”
“कौन जगमोहन या सोहनलाल?”
“कोई और।”
“और?”
“इस काम में पांच लोग थे। शायद छः।” वानखेड़े को रूपा ईरानी का भी ध्यान आया –“उनमें से किसी ने बताया।”
“हिस्से बांट लिए उन्होंने तीस अरब के जेवरातों के?”
“नहीं।” वानखेड़े ने उसकी नशे से भरी आंखों में झांका।
“क्यों नहीं बांटे। देवराज चौहान ने मेरी तरह किसी दूर का भी हिस्सा दबा लिया क्या। बहुत कमीना है। मैंने तो सुना था, ऐसा नहीं है वो, लेकिन गिरा हुआ निकला।” रनवीर भंडारी की आवाज नशे में गुड़मुड़ हो रही थी- “साले को वहां के सारे सुरक्षा प्रबन्ध बताये। जी भी सहायता कर सकता था की। बदले में उसने मुझे तीस अरब के जेवरातों में से दो अरब का हिस्सा देना पसन्द किया। मैंने सोचा कोई बात नहीं। सौदा घाटे का नहीं। मेरे को उधार वापस करने के लिये पचास करोड़ चाहिये। दो अरब तो मेरा बहुत कुछ संवार देगा। बाकी के अट्ठाईस अरब को देवराज चौहान जो भी करे। लेकिन साले-हरामी देवराज चौहान के मन में बेईमानी आ गयी। डकैती की और भंडारी को भूल गया। खबर मिली कि वो कहता है मैंने डकैती नहीं की। दूसरा ही कोई डकैती कर गया। भरोसा ही नहीं रहा। जिसके लिये फिल्म बनाई। जिसके लिये अपने को बरबाद किया। मेरा पन्द्रह करोड़ रुपया उधार लिया उसने। वापस क्या देना है। शक्ल भी नहीं दिखाती साली। दिमाग खराब हो गया था जो उसे पैसा दिया। बहुत बड़ी हरामजादी निकली वो। जब भी पैसा मांगा। रात को बैड पर ऐसे वक्त पर मांगा जब बोतल पेट में होती और वो मेरा बोझ संभाल रही होती। मुंह से इन्कार कैसे निकलता। उसने तो मुझे बरबाद कर दिया। गुण वाली है। अपने औरत होने की कीमत जानती है। वरना औरतें तो जिन्दगी भर...।”
“भंडारी।” वानखेड़े ने टोका।
भंडारी चुप हुआ।
उसे देखा।
“तुम बहक रहे हो। नशा तुम्हें बातों से भटका रहा है।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा।
“ऐसा कुछ नहीं है। मैं पूरे होश में हूं। जो कह रहा हूं उसमें तुम्हारी बातों का ही जवाब है। मैं-मैं अपनी बातों से मान रहा हूं कि मैंने देवराज चौहान को डकैती की राह पर डाला। वहां के सारे सुरक्षा प्रबन्धों के बारे में उसे बताया। इसके पीछे मेरा मकसद था कि बाजार का पचास करोड़ चुका सकूँ। मेरा घर-परिवार, बिजनेस बच जाये। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। देवराज चौहान ने मुझे दो अरब ही नहीं दिया। बेईमान हो गया। पचास करोड़ ही दे देता। लेकिन।”
“तुम देवराज चौहान तक कैसे पहुंचे?”
“देवराज चौहान तक-तक-वो प्रवेश गोदरा है ना-वो हीरे-जेवरातों का अच्छा पारखी है। मेरे शो-रूम पर ग्राहकों को भी पटा के लाता था कि मेरे जेवरात बिके और उसका कमीशन मिले। बढ़िया बंदा है। काम का है। उससे एक बार यूं ही मजाक में डकैती वाली बात की तो कुछ दिनों बाद, मेरे पास जगमोहन आ गया। इस-इस तरह बात शुरू हुई।” ये सब जानने के लिये पढ़ें अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित, देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’।
वानखेड़े, भंडारी के नशे से भरे सुर्ख चेहरे को देखता रहा।
वो, उसे बताना चाहता था कि गोदरा उससे गद्दारी करके, देवराज चौहान के साथ डकैती में शामिल हो गया था। लेकिन नहीं बताया। वो पहले से ही टूटा पड़ा था। गोदरा की धोखेबाजी के बारे में बताकर, उसे और दुखी नहीं करना चाहता था।
“कहां रहता है देवराज चौहान?”
“मुझे क्या मालूम। मेरे को तो, मेरे ऑफिस में आकर ही मिलता था। इंस्पेक्टर वो-क्या नाम बताया तुमने, अपना कि बताया ही नहीं।” एकाएक कहते-कहते ठिठका वो। नशे से बंद हो रही आंखों से उसे देखा।
“वानखेड़े। इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े।”
“हूँ। इंस्पेक्टर वानखेड़े। तो मैं कह रहा था कि देवराज चौहान ही तीस अरब के जेवरातों के साथ मजे ले रहा होगा।”
वानखेड़े देखता रहा उसे।
भंडारी ने कश लिया। फिर गिलास उठाकर घूंट भरा।
“जो तुम पूछना चाहते थे पूछ लिया इंस्पेक्टर वानखेड़े?”
“हां। बहुत हद तक पूछ लिया।”
“पांच मिनट इन्तजार करो। बोतल में थोड़ी सी शराब पड़ी है। वो खाली कर लूं। फिर चलता हूं।”
“कहां?” वानखेड़े के होंठों से निकला।
“तुम्हारे साथ-तुमने मुझे गिरफ्तार कर ही लिया। कोई बात नहीं। सब कुछ तो नीलाम होने वाला है मेरा। तुम तो मेरे लिये भगवान बनकर आये हो। जेल में रोटी तो मिल जायेगी। वरना बाहर वालों ने मुझे पानी भी नहीं।”
“मैं तुम्हें गिरफ्तार करने नहीं आया भंडारी।”
रनवीर भंडारी ठिठका। नशे से उसका शरीर हिला किसी तरह वानखेड़े को देखा।
“गिरफ्तार करने नहीं आये। मजाक कर रहे ।”
“मैं तुम्हें गिरफ्तार करने नहीं आया और मजाक भी नहीं कर रहा।”
“फिर क्या करने आये हो। रिश्वत में देने को मेरे पास पैसा भी नहीं।”
“मैं रिश्वत लेने वाले काम नहीं करता।” वानखेड़े ने कठोर नज़रों से उसे घूरा।
“रिश्वत नहीं लेते तुम।”
“नहीं।”
“फिर तो तुम नकली पुलिस वाले हो। असली पुलिस वाले रिश्वत न ले, ये तो हो ही नहीं सकता। वो जब नये-नये पुलिस में भर्ती होते हैं तो कुछ कर दिखाने का जज्वा होता है उनमें। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें पता चलता है कि ये आसान नहीं है नौकरी। खुद को सुरक्षित रखना है तो खाना भी पड़ेगा और खिलाना भी पड़ेगा। पसन्द न होते हुए भी रिश्वत के पैसे लेने पड़ेंगे। अगर मालूम पड़ गया दूसरों को कि ये रिश्वत नहीं लेता तो, उसका ट्रांसफर ऐसी जगह कर दिया जाता है जहां पैसा होते हुए भी खाने की दुकान नहीं मिलती। तुम लोगों की नौकरी भी बहुत मुसीबत वाली है।”
वानखेड़े उसे देखता रहा।
रनवीर भंडारी ने गिलास उठाकर खाली कर दिया था।
“भंडारी। मुझे तुम्हारे फिंगर प्रिंट चाहिये।”
“फिंगर प्रिंट क्या-फिंगर ही ले लो। मुझे जरा भी तकलीफ नहीं होगी। बचा ही क्या है जो तकलीफ-।”
उसके सुने बिना ही वानखेड़े ने बबलू को बुलाया। उसे कांच का साफ गिलास कपड़े से पकड़कर लाने को कहा तो बबलू फौरन गिलास ले आया।
रनवीर भंडारी पर नशा बहुत ज्यादा सवार हो रहा था। वो शायद सब कुछ भूल जाने के लिये पी रहा था परन्तु उसकी ये भी कोशिश बेकार की थी। पीकर कभी भी, कुछ भी भूला नहीं जा सकता। वानखेड़े गम्भीर निगाहों से उसे देखता हुआ, सोच रहा होगा कि इस बंगले में रहने वाले ने कभी कितनी शानदार जिन्दगी बिताई होगी और अब किस हाल में आ पहुंचा था।
वानखेड़े, भंडारी की उंगलियों के निशान लेकर चला गया।
रनवीर भंडारी नशे में बे-सुध सा होने लगा था। बबलू उसे संभालने की चेष्टा करने लगा। साथ ही उसकी आंखों से आंसू बह उठे थे कि मालिक की जिन्दगी बरबाद हो गयी। बबलू ने नयना को रोकने के लिये हाथ-पांव बहुत जोड़े थे, लेकिन नयना ने कहां रुकना था। वो बच्चों को लेकर चली गयी थी। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा था उसने।
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अगले दिन देवराज चौहान, जगमोहन और सोहनलाल ने दिन भर अलग-अलग भागदौड़ करने का प्रोग्राम बनाया। स्केच रूपी चेहरा उनके पास था। कहीं से उस चेहरे के बारे में जाना जा सकता था।
अगले दिन सुबह की अखबार देखते ही तीनों ठगे से रह गये।
अखबार में त्रिखा की तस्वीर फिर छपी थी। एक तरफ चार अन्य चेहरों की तस्वीरें थी। विवरण इस प्रकार था कि, त्रिखा के बारे में छपा था कि ये पांचवां डकैत तो डकैती करने वाले दिन ही कार में मृत पाया गया। किसी ने छुरा मारकर उसकी हत्या की थी। परन्तु अन्य चारों डकैतों की लाशें, कल पुलिस को अन्य मकान में मिली। पुलिस का कहना था कि ये चारों आपस में लड़-मरे हैं। परन्तु वहां कोई और भी था, वो आखिर बचे डकैत को गोली मारकर सारे जेवरात ले गया। पुलिस उस व्यक्ति को जोरों-शोरों से तलाश कर रही है।
तीनों ने पढ़ी ये खबर।
राजेश गुलाटी के मृत चेहरे की तस्वीर के नीचे उसका नाम लिखा था। साथ में भोपाल सिंह की तस्वीर के नीचे, नाम लिखा था और उनके पास भोपाल सिंह के चेहरे का स्केच था। पुलिस ने जनता से अपील की थी कि बाकी के दो डकैतों को पहचानने में, पुलिस का सहयोग दे।
“ये क्या हो गया?” जगमोहन के होंठों से निकला।
“पांचों मारे गये, जिन्होंने डकैती की थी।” सोहनलाल के दांत भिंच गये।
“हमारे पास भोपाल सिंह नाम के व्यक्ति का स्केच है। यानि कि हम ठीक रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे। भोपाल सिंह ने देवराज चौहान को तैयार किए दोनों बारूद मैन को काम करने से रोका। एक को गोली मारी। दूसरा बच गया, लेकिन हाथ-पांव तुड़वाकर अस्पताल में भरती हो गया।” जगमोहन बोला –“अगर ये न मरते तो हम देर-सवेर में भोपाल सिंह के पास पहुंच जाते। उसका मुंह खुलवा लेते कि मामला क्या है। लेकिन वो अब नहीं रहा।”
तभी सोहनलाल बोला।
“ये देखो। नीचे क्या लिखा है। पुलिस को शक है कि “आखिरी डकैत को गोली मारकर तीस अरब के जेवरात ले जाने वाला देवराज चौहान नाम का डकैती मास्टर हो सकता है।”
“क्योंकि पुलिस को मिले सबूतों के मुताबिक पहले ये डकैती देवराज चौहान करने वाला था, परन्तु उसका ही कोई साथी, उसे धोखा देकर, दूसरे लोगों के साथ डकैती कर गया। शायद इसी बात का बदला देवराज चौहान ने लिया हो। पुलिस इस दृष्टिकोण से भी सोच रही है।”
“यानि कि दौलत भी गयी और डकैती में हमारा नाम भी चढ़ गया।” जगमोहन का चेहरा सख्त हो गया।
“पुलिस ये भी सोच रही है कि किसी को पता चल गया हो कि तीस अरब के जेवरातों के साथ डकैत कहां छिपे हैं तो उसने मौका देखकर सबको खत्म किया और जेवरात ले गया हो।” सोहनलाल बोला –“अखबार में लिखा है।”
“हमें ये नहीं देखना कि पुलिस क्या सोच रही है।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा –“पुलिस अपना काम कर रही है। उसे सोचने दो। लेकिन हम तो जानते हैं कि हमने ये काम नहीं किया।”
जगमोहन और सोहनलाल की नज़रें, देवराज चौहान पर जा टिकी।
“तो किसने किया ये काम?”
“मेरे ख्याल में उन पांचों के अलावा उनके साथ कोई छठा भी था। उसने ही ये सब किया...।”
“छठा कौन?” जगमोहन के होंठों से निकला।
“ये छठा वो ही हो सकता है, जिसे हमारी योजना मालूम थी। जिसने हमसे धोखेबाजी की। हमारी बातों को जानते हुए, उसने दूसरे लोगों को डकैती के लिये तैयार किया और हमसे पहले ही डकैती कर गया। डकैती के लिये रखी हमारी रिवॉल्वरों और नकाबों का यूं ही इस्तेमाल नहीं हुआ। दूसरे ग्रुप में जो डकैती का बड़ा बना हुआ था, वो इधर हमारा साथी बना रहा।”
“कौन हो सकता है वो?”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
“मेरे ख्याल में हमें एक बार फिर शुरू से इस मामले पर सोचना होगा।” देवराज चौहान बोला।
“शुरू से?”
“हां। हमारे साथ प्रवेश गोदरा-कमल शर्मा और रूपा ईरानी थी। चौथा रनवीर भंडारी था। जो कि ये जानता था कि हम डकैती करने जा रहे थे। परन्तु वो हमारी योजना को किसी भी हिस्से से वाकिफ नहीं था।” देवराज चौहान सोच भरे गम्भीर स्वर में कहता जा रहा था –“फिर भी हम इन चारों को लेते हैं कि चारों में से किसी एक ने-या दो ने मिलकर हमारे साथ धोखेबाजी की और हमारी योजना को इस्तेमाल करते हुए, ठीक मौके पर हमसे पहले ही डकैती कर ली। ताकि तीस अरब की पूरी दौलत का मालिक बन सके। ये बात पहले से ही उसकी योजना में रही होगी कि डकैती की पूरी दौलत का उसने अकेला ही मालिक बनना है। डकैती करने वालों को खत्म करने की उसने पहले ही सोच रखी होगी। तभी तो मौके पर आसानी से डकैतों को खत्म करके, तीस अरब की दौलत खामोशी से ले गया।”
“तुम ये भूल रहे हो देवराज चौहान कि पुलिस क्या कह रही है।” जगमोहन ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा –“पुलिस का कहना है कि डकैती करने वाले तीस अरब की दौलत के साथ वहां छिपे थे। किसी को उनकी भनक पड़ गयी तो उसने बहुत चालाकी से सबको खत्म किया और डकैती की तीस अरब की दौलत लेकर चलता बना।”
“ये भी हो सकता है।” सोहनलाल के होंठों से निकला।
“हां।” देवराज चौहान बोला –“ऐसा भी हुआ हो सकता है।”
सोहनलाल ने परेशानी भरे ढंग में गोली वाली सिगरेट सुलगाई।
“अगर ऐसा हुआ है तो उस अज्ञात इंसान को जल्दी-जल्दी तलाश नहीं कर सकते।” देवराज चौहान के चेहरे पर सोचों के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे –“और हाथ पर हाथ रखकर भी नहीं बैठ सकते। इन हालातों में हमारे सामने शक की जो दीवार है। उसी पांव रखकर आगे बढ़ना है।”
“तुम्हारा मतलब कि गोदरा, शर्मा, रूपा और भंडारी।” जगमोहन ने उसे देखा।
“हां। हमें इन पर नजर रखनी होगी। फिर से नये सिरे से ये काम करना होगा। अब हमें ये नहीं सोचना कि काम के दौरान गोदरा या शर्मा हर वक्त हमारे साथ रहे। वो गड़बड़ नहीं कर सकते। कर सकते हैं। वो फोन पर तो किसी बाहरी आदमी को हमारी योजना के बारे में बताते रह सकते हैं।”
“हां। हो सकता है।”
“चारों को पूरी तरह शक के घेरे में रखो। नजर रखो।”
“लेकिन हम तीन लोग-चार पर कैसे नजर रख सकते –।” सोहनलाल ने कहना चाहा।
“तीन नहीं दो।” देवराज चौहान ने टोका –“इस काम में मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगा। मैं भोपाल सिंह के बारे में जानकारी इकट्ठी करूंगा। कि वो क्या था। कैसे लोगों में उसका बैठना था। शायद वहां से पता चले कि उससे कौन-कौन मिलता था। उन मिलने वालों में ही कोई हमारे काम का है जिसे हम ढूंढ रहे हैं।”
“ठीक है।” सोहनलाल बोला – “तुम ये काम करो। मैं अपने खास दो आदमियों को बुला लूंगा। जिन पर मुझे विश्वास है। इस तरह हम हर वक्त उन चारों पर नजर रख सकेंगे।”
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई। कश लिया।
“मुझे इस बात में ज्यादा दम नहीं लगता कि किसी बाहरी व्यक्ति को डकैती के कहीं छिपे रहने के बारे में पता चला और वो वहां पहुंचकर सबको मारकर दौलत ले गया।” देवराज चौहान ने कहा –“डकैती करने वाले बेवकूफ नहीं होंगे कि तीस अरब की दौलत पास होने पर किसी अंजान व्यक्ति को पास भी फटकने दें। जिसने भी उन सबको मारकर दौलत हासिल की। वो उनकी पहचान वाला था।”
“ये बात तो हम फिर सोच सकते हैं कि डकैती करने वाले पांच नहीं छ: थे। पांच ने सामने रहकर काम किया। छठा पीछे रहा। जब सारा काम निपट गया तो छठा उन सबको मारकर दौलत ले गया होगा।” जगमोहन बोला।
“मैं यही सोच रहा हूं।” देवराज चौहान ने सिर हिलाया –“और डकैती के वक्त वो छठा हमारा साथी बना हुआ था। सिर्फ ये ही तर्क समझ में आता है। गले से नीचे उतरता है।”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
“जिन लोगों ने डाका डाला, उन सबकी हत्या हो जाने, दौलत गायब हो जाने की वजह से हम लोगों के लिये परेशानी बढ़ गयी है कि हमें धोखा देकर जो डकैती का जिम्मेवार है, वो हमारे हाथों से दूर हो गया है।”
“हम उसे ढूंढ लेंगे।” जगमोहन दांत भींचकर कह उठा।
“मुझे भी विश्वास है कि वो ज्यादा देर हमारे हाथों से दूर नहीं रहेगा।” सोहनलाल ने कहा।
“मैं भोपाल सिंह के बारे में छानबीन करने जा रहा हूं। तुम उन चारों पर नज़र रखो। दो और लोगों का इन्तजाम करो।” देवराज चौहान ने कहा और आगे बढ़कर दरवाजा खोलते बाहर निकल गया।
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“प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा, रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी में से किसी की भी उंगलियों के निशान डकैतों की लाशें पाये जाने वाले मकान में से उठाये गये निशानों से नहीं मिलते।”
वानखेड़े ने फाईल को एक तरफ रखते हुए गम्भीर स्वर में सामने बैठे शाहिद खान से कहा –“इन चारों को शक के दायरे से हमें बाहर करना पड़ेगा।”
“अभी पूरी तरह से इन्हें शक के दायरे से बाहर करना ठीक नहीं।” शाहिद खान बोला।
“पूरी तरह इन्हें बाहर नहीं कर रहा।” वानखेड़े गम्भीर था –“मैं तो ये कह रहा हूं कि हमें दूसरी तरफ भी सोचना है कि ये काम देवराज चौहान का किया भी हो सकता है।”
“क्यों नहीं हो सकता।” शाहिद खान बोला –“या फिर किसी बाहरी व्यक्ति का भी।”
“हां। यही मैं कहना चाहता हूं। हमें देवराज चौहान और किसी अंजान व्यक्ति के बारे में भी सोचना पड़ेगा। जिस मकान में लाशें मिली हैं, उसके आस-पास के लोगों से पूछताछ करना फिर जरूरी हो गया है। जो भी डकैती का जिम्मेवार है, जिसने उन चारों को मारकर तीस अरब के जेवरात हासिल किए हैं, उसे हर हाल में कानून की गिरफ्त में लाना जरूरी है।”
“मदनलाल से मिलें-जो भोपाल सिंह का भाई है।” शाहिद खान ने पूछा।
“नहीं। कल वो यहां से गया है। भोपाल सिंह के बारे में मालूम कर रहा होगा। शाम तक मिलूंगा।” वानखेड़े ने सिर हिलाते हुए कहा –“उससे पहले वहां पूछताछ करनी है, जहां चारों डकैतों की लाशें मिली। मुझे इस बात की संभावना पूरी दिख रही है कि उनका कोई छठा साथी था, जो उन्हें डकैती के लिये रास्ता दिखा रहा था। उसी ने ही सबको मारकर ।”
“कमल शर्मा कह रहा था कि उसका गांव जाने का प्रोग्राम बन रहा है।” शाहिद खान ने टोका।
“गांव जाने का प्रोग्राम?” वानखेड़े के माथे पर बल पड़े।
“कहता था कि गांव में उसके बूढ़े मां-बाप हैं। उन्हें सेवा की जरूरत है। शहर में रहकर उनका मन खराब हो गया है। डकैती जैसे काम में हाथ डालकर उसने बहुत बड़ी गलती की। अब उसे डर लगने लगा है कि कहीं फिर से कोई गलत काम न कर दे।”
“फिर से गलत काम तो गांव में भी हो सकता है। खैर तुमने क्या कहा?”
“मैंने कहा अभी गांव जाने की कोशिश न करे। पुलिस को उसकी कभी भी जरूरत पड़ सकती है।”
वानखेड़े होंठ सिकोड़कर उठा और पीठ पर हाथ बांधे चहलकदमी करने लगा।
कई मिनट ऐसे ही बीत गये।
“क्या हुआ?”
वानखेड़े ने ठिठक कर उसे देखा।
कमल शर्मा के गांव जाने की बात सुनकर कुछ अजीब सा लगा।
“क्यों?”
“कल रूपा ईरानी से मिला था। उसकी उंगलियों के निशान लेने के लिये। वो कोरिया जाने को कह रही थी कि कोरिया में उसे फैशन शो का बड़ा चांस मिल रहा है। अगर उसका काम ठीक रहा तो शायद यूरोप में बड़ा काम मिल जाये मॉडलिंग का।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा – “ये सब लोग एकाएक शहर से-देश से बाहर जाने की तैयारी क्यों करने लगे?”
शाहिद खान की आंखें सिकुड़ी।
“रूपा ईरानी कब जाने को कह रही थी।”
“ज्यादा बात नहीं हुई। लेकिन मैंने कहा कि मेरे को खबर किए बिना वो कहीं न जाये।”
“मान गयी।”
“हां।”
“कहीं इस सारे मामले में रूपा ईरानी और कमल शर्मा का तो हाथ नहीं। शाहिद खान कह उठा।
वानखेड़े सिगरेट सुलगाकर कुर्सी पर आ बैठा।
“कुछ भी हो सकता है। ये मामला इतना उलझा हुआ है मुझे यकीन है कि इन्हीं में से कोई इन सब बातों का जिम्मेवार कि कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा। सब लोग हमारे सामने हैं।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा –“देवराज चौहान हमारे सामने नहीं है और उसकी तलाश करना बेवकूफी भी है। बल्कि वो तो खुद ही, उसे ढूंढने की फिराक में है। जिसने ये सब किया अगर उसने उन चारों डकैतों की हत्या न करके, तीस अरब के जेवरात नहीं पाये तो। इसके अलावा जो हमारे सामने है। उन्हें ही देखना है हमने। अखबार में उन चारों की तस्वीरें छपी है। गुलाटी और भोपाल सिंह के बारे में तो मालूम हो चुका है। पुलिस पार्टियां इनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी इकट्ठी कर रहे हैं। बाकी दो के बारे में भी जल्दी ही खबर मिल जायेगी।”
“मेरे ख्याल में रूपा ईरानी और कमल शर्मा का शहर से निकल जाने का प्रोग्राम बनना, शक पैदा करता है।” शाहिद खान गम्भीर स्वर में कह उठा – “डकैती के बाद कमल शर्मा को अपने मां-बाप की सेवा का ध्यान आ गया। उधर रूपा ईरानी को कोरियन कम्पनी की तरफ से ऑफर आ गया। कहीं ये ही सारे मामले में पीछे तो नहीं। तीस अरब के जेवरात इन दोनों के पास या किसी एक के पास तो नहीं कि, जिनके साथ खिसकने की तैयारी हो रही है।”
वानखेड़े ने गहरी सांस ली।
“मैं इन दोनों पर सख्त निगरानी रखवाता हूं।” शाहिद खान ने दांत भींचकर कहा –“अगर तीस अरब के जेवरात इनके पास हैं तो ये बच नहीं सकेंगे। पुलिस की तफ्तीश पूरी हुई और ये शहर से निकल जाने की तैयारी करने लगे हैं। इन सालों को गिरफ्तार कर लेना चाहिये था। ताकि...।”
“कोई फायदा नहीं।” वानखेड़े ने इन्कार में सिर हिलाते हुए कहा –“हमारे पास इनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं हैं जो हैं उसकी अदालत परवाह नहीं करेगी। ये सब आसानी से बच निकलेंगे। तब ये लोग और भी चौड़े हो जायेंगे। अब हमारी बातों का जवाब तो दे रहे हैं, बाद में, तब ये हमसे बात भी नहीं करेंगे। बेहतर यही है कि इन पर नज़र रखें। खामोशी से हम अपना काम करते रहे। कहीं तो कामयाबी मिलेगी ही।”
शाहिद खान होंठ भींचकर रह गया।
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मध्यम वर्ग के लोग रहते थे इस कॉलोनी में। छोटे-बड़े मकान मिक्स थे। देवराज चौहान जेबों में हाथ डाले मकानों पर लिखे नम्बरों को पढ़ते हुए आगे बढ़ा जा रहा था। दोपहर हो रही थी।
भोपाल सिंह के घर का पता ढूंढने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी। एक इलाके के जेबकतरे से यूं ही मुलाकात हो गयी। वो देवराज चौहान का पर्स निकालने के फेर में था। उसकी कलाई पकड़ ली थी देवराज चौहान ने। तब उसे स्केच और अखबार में छपी तस्वीर दिखाई तो कह उठा वो।
“ये तो भोपाल सिंह है। नम्बरी हरामी। मर गया तो बढ़िया हो गया।” जेबकतरा मुंह बनाकर बोला।
“कहां रहता है।” देवराज चौहान ने पूछा।
“इसके घर का तो नहीं पता। लेकिन ये मालूम है किस इलाके में रहता है।”
“किधर?”
उसने बताया तो देवराज चौहान उस इलाके में पहुंचा और वहां भोपाल सिंह के घर के बारे में पूछा। मालूम हुआ वो किस नम्बर के मकान में रहता है। तो पैदल ही गलियों में आगे बढ़ गया था। दोपहर होने की वजह से बहुत कम लोग ही तपती धूप में आते-जाते दिखाई दे रहे थे।
एक मकान का नम्बर देखते ही देवराज चौहान ठिठक गया।
यही नम्बर था। यही मकान था। देवराज चौहान ने आगे बढ़कर बेल बजाई।
जवाब न मिलने पर दूसरी बार बजाई। तब भी कोई जवाब न मिला।
उसी पल पीछे आहट मिली। देवराज चौहान पलटा कि ठिठक कर रह गया। पीछे तीन कदमों के फांसले पर मदनलाल खड़ा था। दो पल तो दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
“तुम?” देवराज चौहान के होंठों से निकला।
“तुम यहां कैसे?” मदनलाल हैरान हुआ उसे देखकर।
“किसी को ढूंढने आया...।”
“भोपाल सिंह को?”
“तुम भोपाल सिंह को कैसे जानते हो?” देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी।
“वो मेरा भाई था। उसने डकैती डाली थी शायद वो ही डकैती जो तुम डालने जा रहे थे।”
देवराज चौहान, मदनलाल को देखता रहा।
“भीतर आओ।” आगे बढ़ते मदनलाल ने कहा –“किसी ने देखकर तुम्हें पहचान लिया तो मुसीबत खड़ी हो जायेगी इंस्पेक्टर वानखेड़े इस बार मुझे छोड़ेगा नहीं। इसके साथ ही मदनलाल ने दरवाजे को धक्का दिया तो वो खुल गया। भीतर प्रवेश करता कह रहा था वो –“पास ही में अभी गया था। पांच ही मिनट में वापस आया तो तुम मिले।”
देवराज चौहान भीतर आया तो मदनलाल ने दरवाजा बंद कर लिया।
साधारण से कमरे में सोफा पड़ा नजर आ रहा था।
“बैठो।” वो पंखा चलाता कह उठा –“तुम्हें यहां देखकर मुझे खुद हैरानी हो रही है।”
देवराज चौहान बैठा और सिगरेट सुलगाकर बोला।
“तुम भोपाल सिंह के भाई हो?”
मदनलाल ने भाई होने की बात बताकर कहा।
“भोपाल के मरने के बाद घर आकर देखा तो पता चला, मां भी नहीं रही। छ: साल से तो मैंने इधर की खबर नहीं ली थी। पता कैसे चलता। भोपाल शान से यहां रह रहा था। वो मर गया तो सब कुछ मेरा ही हो गया।” मदनलाल के चेहरे पर शांत मुस्कान उभरी –“एक बात बहुत बढ़िया रही।”
“क्या?”
“घर में नौ लाख नकद रोकड़ा पड़ा है। कहीं हाथ मारा होगा भोपाल ने। मजा ही आ गया। साले के मरने में किसी का तो भला हुआ। वरना जब तक जिन्दा रहा, दूसरों को तंग करता रहता...।”
“तूने वानखेड़े को कैद रखा था। जब वानखेड़े आजाद हुआ तो उसने तेरे को कैसे छोड़...।”
“कहां छोड़ा। हेडक्वार्टर के लॉकअप में बंद करके भूल गया था। सुबह शाम इतना खाने को मिल जाता था कि भूखे पेट जान न निकले। मैं तो उसे पनीर खिलाता रहा। खैर।” मदनलाल कहते-कहते ठिठका-फिर बताने लगा कि कैसे वो कल वानखेड़े से बात हुई और उसने क्यों छोड़ा।
देवराज चौहान के चेहरे पर गम्भीरता आ ठहरी।
“तुमने क्या पता किया?”
“पता तो बहुत किया, लेकिन पता लगा नहीं। उसकी खास पहचान वालों से भी बात की। लेकिन किसी को कुछ नहीं पता कि भोपाल किस फेर में था। क्या कर रहा था। आस-पास से पूछा तो उन्होंने कहा कि वो भोपाल की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। बात-बात पर झगड़ा करता था। कम बोलते थे उससे।”
देवराज चौहान मदनलाल को देखता रहा।
“अभी पता कर रहा हूं। शायद काम की बात पता चल जाये। उधर एक लड़की रहती है।”
“लड़की?”
“हां। मैंने तो देखा नहीं। अभी पता लगा है कि भोपाल उसके यहां पर ही खाली वक्त में पड़ा रहता था। हो सकता है भोपाल ने डकैती के बारे में उससे कोई बात की हो। सोचा दोपहर है। शाम को जाऊंगा उसके पास।”
“और क्या मालूम हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“चल।” देवराज चौहान खड़ा हो गया।
“किधर?”
“उस लड़की के पास।”
“अभी? ठीक है। चलो।” मदनलाल भी खड़ा हो गया- “लेकिन वो जो इंस्पेक्टर है। उसकी एक बात समझ में नहीं आई।”
“क्या?”
“कल उसके ऑफिस में, तुम्हारे साथ डकैती करने वाला बैठा था। वो ही, जिसने इंस्पेक्टर वानखेड़े को फांसा...।”
“प्रवेश गोदरा।”
“वो ही होगा। मुझे पता लगा है कि इंस्पेक्टर वानखेड़े तुम्हारे सब साथियों के बारे में जान गया है। लेकिन किसी को गिरफ्तार नहीं कर रहा। मेरे को भी छोड़ दिया। ऐसा पुलिस वाला पहले कभी नहीं देखा।”
“पुलिस वाला वो वैसा ही है, जैसे दूसरे हैं।” देवराज चौहान के होंठों पर मुस्कान उभरी।
“फिर वो किसी को गिरफ्तार क्यों नहीं कर –।”
“मजबूरी है उसकी।”
“क्यों?” मदनलाल के माथे पर बल पड़े।
“मुझे या मेरे साथियों को गिरफ्तार करके पहले उसे ये साबित करना होगा कि हम लोग डकैती की योजना बना चुके थे और डकैती करने जा रहे थे। लेकिन ठीक मौके पर दूसरे लोग डकैती कर गये। वानखेड़े की मजबूरी है कि वो ये साबित नहीं कर पायेगा कि मेरे साथ जो लोग थे, वो वास्तव में डकैती की योजना बना चुके थे। डकैती करने जा रहे थे। क्योंकि कोई भी उसकी बात पर गवाही नहीं देगा। देगा तो अदालत में पीछे हट जायेगा। सबूत के नाम पर उसके पास जो है। उस पर अदालत खास ध्यान नहीं देगी। उसके बाद उसे ये भी साबित करना होगा कि डकैती में हम जिन रिवॉल्वरों का इस्तेमाल करने जा रहे थे। उन्हें कोई दूसरा कर गया। इस बात को साबित करने के लिये उन लोगों की गवाही चाहिये, जिन्होंने डकैती डाली। सीधे-सीधे उनका हाथ आना कठिन था। अब तो ये सामने है कि डकैती करने वालों की हत्या हो चुकी है।”
मदनलाल ने समझने वाले ढंग में सिर हिलाया।
“वो तीस अरब के जेवरात कौन ले गया?”
“उसी को मैं ढूंढ रहा हूं। उसी को इंस्पेक्टर वानखेड़े तलाश कर रहा है। जिसने डाका डालने वालों की हत्या की। वो ही ले गया। आओ उस लड़की से बात करते हैं, जिससे भोपाल सिंह अक्सर मिलता था। कहां रहती है वो?” देवराज चौहान ने पूछा।
“ज्यादा दूर नहीं है उसका घर।”
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दरवाजा खोलने वाली तीस-बत्तीस बरस की औरत थी।
कमीज–सलवार पहन रखा था। चेहरा साधारण था। शरीर भारी। उसने दोनों को सवालियां नजरों से देखा।
“भोपाल का भाई हूँ मैं।” मदनलाल बोला –“अन्दर आऊं क्या?”
वो फौरन पीछे हट गयी।
दोनों भीतर गये तो उसने दरवाजा बंद किया।
सामने साठ बरस की औरत बैठी टी.वी. देख रही थी।
उन्हें देखते ही टी.वी. बंद करके बोली।
“ये कौन है ममता?”
“भोपाल का भाई है।”
“ओह! बिठाओ इन्हें।”
देवराज चौहान और मदन लाल बैठ गये। टेबल पर वो अखबार पड़ी थी। जिसमें मरने वालों की तस्वीरें नजर आ रही थी। यानि कि इन्हें भोपाल के मरने का पता चल गया था।
“भोपाल के मरने का बहुत दुःख हुआ।” वो साठ बरस की औरत दोनों को देखते हुए कह उठी –“तुम दोनों में से कौन है उसका भाई?”
“मैं।” मदनलाल बोला।
“जुग-जुग जियो बेटा। तेरे से क्या छिपाना, भोपाल और ममता बिन ब्याह के एक ही थे। हर महीने बीस हजार रुपया देता था भोपाल, ममता को। सुबह से बेचारी दुखी हुई पड़ी है कि खर्चा कहां से –।”
“कुछ पूछने आया हूँ।” मदनलाल कह उठा।
“पूछो-पूछो घर की बात है।”
मदनलाल ने देवराज चौहान को देखा कि वो पूछे।
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई फिर कह उठा।
“टेबल पर पड़ा अखबार बता रहा है कि तुम्हें मालूम हो चुका है कि भोपाल सिंह ने डकैती की। वो तुम्हारे पास अक्सर आया करता था। डकैती के बारे में तुमसे बातें करता होगा कि वो क्या-क्या कर रहा है।”
“नहीं।” ममता बोली –“कोई खास बात तो कभी नहीं की। भोपाल ने ये बताया था कि वो इतनी बड़ी डकैती करने जा रहा है कि अगर कामयाब हो गया तो राजा-महाराजा बनकर रहेगा।”
“और कुछ?”
“नहीं। इसके अलावा कोई बात नहीं की। मैंने पूछा भी, लेकिन डकैती के बारे में उसने कुछ नहीं बताया।”
“तो तुम्हें मालूम था कि वो बड़ी डकैती करने जा रहा है।”
देवराज चौहान बोला –“ये बात तुमने किस-किस से की। किसी के सामने तो मुंह से निकाली होगी। कोई और भी जान गया होगा कि भोपाल सिंह बहुत बड़ी डकैती करने जा रहा है। सोचकर सही जवाब देना। गलत बात मत बोलना।”
ममता ने अपनी मां को देखा।
“हां-हां बता दे अगर किसी को बताया था तो। जैसा भोपाल था वैसा ये मदनलाल।” उसकी मां कह उठी।
“पेशावर सिंह से बात की थी।”
“पेशावर सिंह?” मदनलाल कह उठा –“ये कौन है?”
“दिखाने को तो टैक्सी चलाता है, लेकिन चोरी-चकारी जैसे उल्टे काम करता है।”
देवराज चौहान और मदनलाल की नज़रें मिली।
“कब बतायी थी पेशावर सिंह को ये बात?”
“तभी-शायद उसी दिन-रात को, जब भोपाल सिंह ने मुझे बताया। उस दिन पेशावर सिंह भी मुझे मिलने आया था।” ममता ने सोच भरे स्वर में कहा –“यूं ही बातों-बातों में मेरे मुंह से निकल गया था।”
“कितने दिन पहले पेशावर सिंह को बताया था?” देवराज चौहान ने पूछा।
“सात-आठ दिन हो गये।”
“कहां रहता है पेशावर सिंह?”
“इसका घर तो पता नहीं।” ममता ने कहा –“पुराने चौक के स्टैण्ड पर टैक्सी खड़ी करता है।”
देवराज चौहान ने इशारा किया मदनलाल को और खड़ा हो गया।
मदनलाल भी उठा।
ममता की मां फौरन खड़े हुए-हुए बोली।
“बेटी। ममता जैसे भोपाल की थी। वैसे ही तुम्हारी। वो बीस हजार रुपया देता था महीने के। कभी ऊपर भी दे देता था। तुम जो ठीक समझो दे देना। लेकिन रिश्ता मत तोड़ना। मैं...।”
“मुझे बहन बनाने का शौक है लड़कियों को।” मदनलाल तीखे स्वर में बोला –“मां बनाने का नहीं। भोपाल बहुत मिलते हैं सड़क पे। आवाज देना। एक के चार आ जायेंगे।”
“पराये जैसे बात क्यों...।”
मदनलाल और देवराज चौहान बाहर आ गये।
“अच्छी बात पता लगी।” देवराज चौहान बोला –“पेशावर सिंह टैक्सी चलाता है। उल्टे-सीधे काम भी करता है। ऐसे में भोपाल सिंह द्वारा मोटी डकैती करने की सुनकर चुप नहीं बैठा होगा।”
“क्या कहना चाहते हो?”
“सात-आठ दिन पहले ममता से, पेशावर सिंह को पता चला। डकैती हुए आज चौथा दिन है। पेशावर सिंह के पास इस बात का पूरा समय था कि वो भोपाल सिंह पर नज़र रख सके। उसके साथ जो डकैती करने वाले थे। उनके बारे में जान सके। डकैती के बाद भी उन पर नज़र रख सकता था और मौका मिलने पर उनकी हत्या करके, डकैती के जेवरात ले जा सकता था।”
मदनलाल ठिठका।
“तुमने तो सीधे उंगली उठा दी पेशावर सिंह पर। जबकि उसे देखा भी नहीं। हो सकता है उसे भूल जाने की बीमारी हो। वो डकैती वाली बात सुनकर भूल भी गया हो?”
“मैंने अंदेशा जाहिर किया है।” देवराज चौहान ने धूप नज़रें दौड़ाते हुए कहा –“टैक्सी देखो।”
“पेशावर सिंह वाले स्टैण्ड पर चलना है क्या?”
“हां।”
दस मिनट के इन्तजार के बाद कठिनता से टैक्सी मिली।
वो भीतर बैठे। ड्राईवर ने टैक्सी आगे बढ़ाई और बोला।
“कहां जाना है साहब जी?”
“पुराने चौक के टैक्सी स्टैण्ड पर।”
बीस मिनट में वहां पहुंचे।
“टैक्सी स्टैण्ड उधर है, जाना कहां है?”
“टैक्सी स्टैण्ड पर ही जाना है।” देवराज चौहान बोला –“वही चलो।”
ड्राईवर ने टैक्सी स्टैण्ड के पास ले जाकर टैक्सी रोक दी देवराज चौहान ने किराया चुकता किया और मदनलाल के साथ टैक्सी स्टैण्ड पर पहुंचा। एक तरफ ड्राईवर फट्टे जैसे तख्ते पर, पेड़ की छाया के नीचे बैठे ताश खेल रहे थे। खेल के अलावा किसी तरफ भी उनका ध्यान नहीं था। उनके पास पहुंचते ही, ताश खेलना छोड़कर वे उन्हें देखने लगे। एक कह उठा।
“कहां चलना है साहब जी?”
“पेशावर सिंह से मिलना है।” देवराज चौहान की निगाह - पूछने वाले पर जा अटकी।
उसकी आंखें सिकुड़ी।
“क्या काम है?”
“उसने कहा था कि वो यहां मिलेगा। जब भी मिलना हो।” देवराज चौहान ने सामान्य स्वर में कहा।
ड्राईवर ने आपस में एक-दूसरे को देखा।
“बाऊ जी।” एक ने कहा –“उसका कुछ पता नहीं कब आता है। कब जाता है। टैक्सी तो उसकी यूं ही एक तरफ खड़ी रहती है या फिर जरूरत होती है तो टैक्सी कोई दूसरा इस्तेमाल कर लेता है, उसे चलाने का भाड़ा दे देता है।”
“आखिरी बार कब आया था वो यहां।”
“चार दिन हो गये।”
“चार दिन?”
“क्या बात है साहब जी। बहुत पूछताछ कर रहे हो।”
“मेरे को तो पेशावर सिंह ने कहा था कि आज वो यहां अवश्य मिलेगा।”
“अभी तक तो आया नहीं। उधर कुर्सियां पड़ी हैं। बैठ जाओ। कर लो इन्तजार।
देवराज चौहान ने कुर्सियों की तरफ नजर मारी। वो टूटी-फूटी थी। दोनों खामोशी से वहां पहुंचे और कुर्सियों पर बैठ गये। देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई।
पेशावर सिंह वो हो सकता जिसकी मुझे तलाश है।” देवराज चौहान बोला।
“कैसे?”
“वो बोलता है चार दिन से आया नहीं, डकैती हुए आज चौथा दिन ही है।” देवराज चौहान से एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा- “ शायद पेशावर सिंह, भोपाल पर नजर रख रहा हो और डकैती के बाद मौका देखकर सबको मारकर तीस अरब के जेवरात ले भागा हो।”
मदनलाल ने देवराज चौहान को देखा कहा कुछ नहीं।
“मुझे नहीं लगता कि पेशावर सिह यहां आयेगा।” देवराज चौहान के चेहरे पर सोचों के भाव दौड़ रहे थे –“वो डकैती की दौलत के साथ कहीं दूर चला गया भी हो सकता है।”
“अगर वो यहां आया तो?”
“तो।” देवराज चौहान ने मदनलाल के चेहरे पर नजर मारी –“इस काम में पेशावर सिंह का हाथ नहीं...।”
तभी उनके कानों में ऊंची आवाज पड़ी।
“ओए पेशावर। वो देख उधर, तेरे को मिलने वाले बैठे हैं।”
देवराज चौहान और मदनलाल की निगाह घूमी। ये शब्द तख्ते पर बैठे ड्राईवरों में से एक ने कहे थे। दूसरी तरफ से चालीस बरस का साधारण-सा व्यक्ति वहां आ पहुंचा था।
“मेहमान?” उसने एक ड्राईवर से पूछा।
“वो उधर-कुर्सियों पर बैठे हैं। चार दिन से कहां थे तुम?” ड्राईवर ने पूछा।
बिना कुछ कहे पेशावर सिंह देवसज चौहान और मदनलाल के पास आ गया।
“मुझे पूछ रहे हो तुम दोनों?” वो बोला।
“तुम्हारा नाम पेशावर सिंह है?” देवराज चौहान ने खड़े होते हुए पूछा।
“हां”
“ममता के यहां जाते हो?”
“ममता?” पेशावर सिंह की आंखें सिकुड़ी –“क्या मतलब?”
“घबराने की बात नहीं। ममता ने हमें बताया कि तुम यहां मिलोगे। तुमसे कुछ पूछना है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा –“चार दिन से तुम कहां थे? मालूम हुआ तुम यहां आये ही नहीं।”
“लेकिन तुम लोग हो कौन?” पेशावर सिंह एकाएक भारी उलझन में नज़र आने लगा।
“पहले हमारी बात का जवाब दो। फिर हम, तुम्हारे हर सवाल का जवाब...।”
“चार दिन से मैं कहां था या कहां नहीं। तुम लोगों को क्या।” पेशावर सिंह उखड़ा –“अपना काम करो।”
“भोपाल सिंह को जानते हो?” देवराज चौहान की निगाह उसके चेहरे पर थी।
“भोपाल सिंह?” उसकी आंखें सिकुड़ी।
“वो ही जो बड़ी डकैती करने जा रहा था। ममता ने तुम्हें बताया था। याद तो होगा।” देवराज चौहान का स्वर शांत था।
पेशावर सिंह देवराज चौहान को घूरने लगा।
“क्या हुआ?”
“साफ बात करो।”
“ममता से ये जानने के बाद तुमने क्या किया कि भोपाल सिंह डकैती करने जा रहा...।”
“मैंने कुछ नहीं किया पागल नहीं हूं जो दूसरों की बातें सुनकर अपने काम धंधे छोड़कर बैठ जाऊं।” पेशावर सिंह उखड़े स्वर में कह उठा –“बेवकूफों वाले सवाल मेरे से पूछने की जरूरत नहीं है।”
“अखबार देखी आज?” देवराज चौहान उसके चेहरे को देखे जा रहा था।
“देख ली, अगर तुम भोपाल सिंह के बारे में कुछ कहना चाहते हो तो उसकी तस्वीर देख ली। मरा हुआ चेहरा था तस्वीर में। डकैती जैसे काम करेगा तो यही होगा। अपनी औकात से बाहर आ गया था वो। मर गया।” पेशावर सिंह ने उसी लहजे में कहा।
देवराज चौहान ने अब तक महसूस कर लिया था कि डकैती से उसका कोई वास्ता नहीं है।
“तो तुमने ममता की बात पर ध्यान नहीं दिया कि –।”
“मेरे पास काम बहुत है। इतना वक्त किधर है कि हर तरफ स्टेयरिंग मोड़ता फिरूं। मेरे को नहीं परवाह कि कौन क्या कर रहा है।” पेशावर सिंह ने देवराज चौहान को घूरा –“लेकिन कुछ दिन पहले भोपाल सिंह को देखा था।”
“कहां?”
“सेन्ट्रल मार्केट के फुटपाथ पर खड़ा था भोपाल सिंह। उधर मैं टैक्सी लेकर जा रहा था। किसी से बातें कर रहा था वो। दोपहर का वक्त था।” पेशावर सिंह कह उठा-चेहरे पर सोच के भाव थे –“मैंने तब कुछ देर के लिये खासतौर से ये सोचा कि धूप में खड़ा रहने की क्या जरूरत है। छाया में खड़ा होकर नहीं बात कर सकता क्या। तब मुझे ममता का भी ध्यान आया कि, उसने कहा था कि भोपाल सिंह बहुत बड़ी डकैती करने वाला है। मेरी ये सोचें आई गयी हो गयी।”
देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ चुकी थी।
“वो किससे बातें कर रहा था?” देवराज चौहान ने पूछा।
“मुझे क्या पता?”
“तुमने उसे देखा होगा। वो देखने में कैसा...।”
“उसकी पीठ रही मेरी तरफ। भोपाल सिंह ही नजर आया। उनसे आगे निकल गया तो पलटकर भी नहीं देखा।”
देवराज चौहान होंठ भींचे, पेशावर सिंह को देखता रहा।
“ओके।” देवराज चौहान के होंठ खुले –“तुमने जितना देखा उस आदमी को-उतना ही वो कैसा लगा?”
“बोला तो। मैंने उसे देखा ही नहीं ठीक से।” पेशावर सिंह ने झल्लाकर कहा –“कमीज-पैंट पहने था वो। कपड़ों के रंग भी ठीक से याद नहीं। इतना अवश्य मालूम है कि भोपाल कुछ परेशान-गुस्से जैसा परेशान लगा था मुझे। चंद सेकेंडों के लिये ही तो देखा था। उसके बाद मेरी टैक्सी आगे निकल गयी थी।”
देवराज चौहान समझ गया कि पेशावर सिंह से कुछ मालूम नहीं हो सकेगा। लेकिन वो महत्वपूर्ण व्यक्ति था, जिससे डकैती से एक दिन पहले परेशानी-गुस्से में बातें कर रहा था। उसी दिन ही भोपाल सिंह ने मानक सिंह की हत्या की थी और राम भाई की हत्या करने में असफल रहा था!
देवराज चौहान चला गया था।
मदनलाल सोचों में डूबा घर पहुंचा तो दरवाजा खुला पाया।
वो फौरन आगे बढ़ा और खुले दरवाजे के अन्दर देखा तो ठिठक गया। फिर गहरी सांस लेकर भीतर प्रवेश कर गया।
सामने ही कुर्सी पर वानखेड़े बैठा था।
“आप कब आये इंस्पेक्टर साहब?”
“कुछ देर हुई।” वानखेड़े बोला –“दरवाजा खोल लिया। तुम्हें एतराज तो नहीं हुआ?”
“क्या लेंगे पानी या –।” मदनलाल फ्रिज की तरफ बढ़ते हुए बोला।
“कुछ नहीं।”
मदनलाल ने फ्रिज से ठण्डे पानी की बोतल निकाली और वानखेड़े के सामने सोफा चेयर पर आ बैठा। बोतल खोली। घूंट भरा। हथेली से माथे और चेहरे से पसीना पोंछने की चेष्टा की।
“इतनी धूप में कहां से आ रहे हो?” वानखेड़े की निगाह उन पर थी।
“आप ही के काम से गया हुआ था। भोपाल के बारे में पता करने।” मदनलाल ने वानखेड़े को देखा।
“पता लगा? कोई काम की –।”
“कुछ देर पहले मैं देवराज चौहान के साथ था।”
वानखेड़े की आंखें सिकुड़ी।
“देवराज चौहान के साथ?” शब्दों को चबाकर पूछा वानखेड़े ने।
“हां।”
“कहां मिला वो तुम्हें?”
“यहीं आया था।”
“तुमसे मिलने?”
“नहीं। भोपाल सिंह को तलाशता हुआ इधर पहुंचा था कि मैं मिल गया।” मदन लाल धीमे स्वर में बोला।
“उसे भोपाल सिंह के बारे में कैसे पता।”
“मैंने इस बारे में नहीं पूछा।” बात टाल दी मदनलाल ने।
“क्या चाहता था वो भोपाल सिंह से?”
“उसे मालूम हो गया था कि भोपाल ने डकैती डाली है। वो मर भी गया है।” मदनलाल बोला –“देवराज चौहान भोपाल की पहचान वालों के बारे में पता करना चाहता था उनसे बात करना चाहता था। मैं उसके साथ ही इस काम में लगा हुआ था।”
वानखेड़े के होंठ भिंच गये।
“क्या पता किया...कहां गये थे देवराज चौहान के साथ?”
मदनलाल ने सब कुछ सच-सच बता दिया वानखेड़े को।
कुछ छिपाने की जरूरत भी नहीं थी।
वानखेड़े समझ गया कि कोई फायदा नहीं। मदनलाल के दम पर वो खास कुछ नहीं जान पायेगा। साथ ही ये बात स्पष्ट हो गयी कि तीस अरब के जेवरात, देवराज चौहान के पास नहीं हैं। देवराज चौहान ने डकैतों को नहीं मारा, लेकिन वानखेड़े ने हिम्मत नहीं हारी और भागदौड़ में लगा रहा।
☐☐☐
महीने भर बाद, रनवीर भंडारी का बंगला-शोरूम, ऑफिस, कार उसका जर्रा-जर्रा नीलाम हो गया। नीलामी के दौरान रनवीर भंडारी कुर्सी पर बैठा, बोतल थामे अपनी बरबादी का तमाशा देखता रहा।
सब कुछ बिक गया। खत्म हो गया था उसका वजूद। देखने वाले उसे सहानूभुति भरी नजरों से देख रहे थे। भंडारी किसी से निगाह नहीं मिला रहा था। कोई आकर कोई बात करता तो उसके होंठ हिलते, परन्तु बोलने का मन नहीं था। इसलिये कहने से पहले ही खामोश हो जाता। गोदरा पास ही रहा उसके। कहा कुछ नहीं। कहता भी क्या। कुछ भी तो नहीं था बोलने को।
नीलामी के दौरान वानखेड़े भी वहां पहुंचा था। करीब आधा घंटा वहां रहा। किसी से कोई बात नहीं की। खामोशी से चला गया। नीलामी समाप्त होते-होते भंडारी जाने कहां चला गया। पी रखी थी उसने बहुत। गोदरा ने तो सोचा था कि भंडारी को अपने साथ ले जायेगा घर पर। परन्तु जाने कहां चला गया वो। परेशान से गोदरा ने बहुत ढूंढा उसे। परन्तु वो नहीं मिला। घर पहुंचा तो फोन की बेल को बजते पाया।
“हैलो।” गोदरा ने रिसीवर उठाया।
“सब ठीक है?” कमल शर्मा की आवाज कानों में पड़ी।
“हां। रनवीर भंडारी के यहां से आ रहा हूं। वो तो गया। बरबाद हो गया।”
“ओह, आज तो उसके बंगले शो-रूम की नीलामी थी। जो नीलामी में पैसा मिलना था। उसे कर्जदारों ने आपस में बांट लेना था।” कमल शर्मा की आवाज सुनाई दे रही थी उसे –“नीलाम हो गया सब कुछ?”
“हां।”
“बहुत बुरा हुआ। उस हीरोईन के चक्कर में पड़कर फिल्म बनाना महंगा पड़ा उसे।”
“देवराज चौहान कामयाब हो जाता तो, शायद बच जाता।”
“मैंने तुम्हें ये बताने के लिये फोन किया है कि मैं शहर छोड़कर हमेशा के लिये गांव जा रहा हूं। रात की ही ट्रेन है। मां-बाप बहुत बूढ़े हो गये हैं। उनका अकेले रहना कठिन है।”
सुनकर गोदरा ने गहरी सांस ली।
“जैसा तुम ठीक समझो। फिर आओगे?”
“आऊंगा तो मिलूंगा। देवराज चौहान वाले मामले की कोई खबर हो तो मुझे गांव में खबर करना।”
“करूंगा।”
बात खत्म हो गयी।
रात को ट्रेन से कमल शर्मा गांव चला गया था अपने परिवार के साथ।
गोदरा का मन उदास हो रहा था। बहन देवी, उसका पैंतीस लाख लेकर विनोद खुराना के साथ भाग गयी थी। डकैती वाला मामला गड़बड़ा गया। रनवीर भंडारी का सब कुछ बिक गया। वो बरबाद हो गया। कमल शर्मा शहर छोड़कर गांव चला गया। उधर रूपा ईरानी ने महीने भर से कोई बात नहीं की थी उससे।
अगले ही दिन रूपा ईरानी का फोन आया।
“हाय-कैसे हो?” रूपा ईरानी की खनकती आवाज उसके कानों में पड़ी।
गोदरा ने गहरी सांस ली।
“बढ़िया।”
“क्या कर रहे हो?”
“मजे ले रहा हूँ?” गोदरा ने शांत स्वर में कहा –“तुम क्या कर रही हो?”
“मैं कोरिया जा रही हूं। कोरिया की एक कम्पनी के साथ मेरा अनुबंध हो गया है। कह नहीं सकती कि वापसी में कितना वक्त लगेगा। हमारी शादी वाला प्रोग्राम तो रह गया गोदरा।” रूपा का मुस्कराता स्वर उसके कानों में पड़ा।
“कोई बात नहीं। अभी शादी करने का मेरा कोई इरादा नहीं।” गोदरा ने लापरवाही से कहा।
“देवराज चौहान की तरफ से कोई खबर आई क्या?”
“नहीं।”
“मुझे पहले ही पता था कि डकैती जैसे कामों से कभी भी दौलत हासिल नहीं होती। तुम मेहनत करो। मेहनत से कमाया पैसा ही अपना लगता है।” रूपा ईरानी ने कहा।
“सलाह के लिये धन्यवाद।”
“वापस आकर फोन करूंगी। मिलेंगे।”
“जरूर। जरूर मिलेंगे।” गोदरा ने कहा और रिसीवर रख दिया। डकैती में गड़बड़ हो जाने की वजह से वो परेशान था और किसी भी बात में उसका मन नहीं लग रहा था।
उधर रनवीर भंडारी कभी-कभार लोगों को नजर आता रहा। वो ही कपड़े मैले होकर फटने जैसे हो रहे थे। बाल और दाढ़ी बढ़ गयी थी। पागल-सा हो गया था वो। जो उसे जानते-पहचानते थे। वो दया करके उसे खाने को दे देते थे और वो खा लेता था। लेकिन पैसा किसी से नहीं लेता था। एक बार भंडारी को ढूंढता-ढूंढता गोदरा, उस तक जा पहुंचा था। वो फटे कपड़ों में मैला बदबूदार सा बंद दुकान के बाहर फर्श पर सो रहा था। उसकी दाढ़ी में खाने-पीने का सामान लगा हुआ था। गोदरा ने उससे बात करनी चाही। परन्तु उसने गोदरा को पहचाना ही नहीं। उसकी बातों से गोदरा को महसूस हुआ कि उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं। गोदरा ने पास ही के होटल से उसे खाना लाकर दिया तो फौरन खाना खाने लगा।
उसकी हालत पर गोदरा की आंखों में आंसू आ गये। उसके बाद फिर कभी उसने रनवीर भंडारी को तलाश करने या मिलने की चेष्टा नहीं की।
रूपा ईरानी का फोन वानखेड़े को गया।
“नमस्कार इंस्पेक्टर साहब। मैं रूपा ईरानी। पहचाना आपने।”
“हां।” वानखेड़े ने कहते हुए हौले से सिर हिलाया।
“मॉडलिंग के लिये कोरिया की कम्पनी से सारा अनुबंध हो गया है। ज्यादा से ज्यादा दो सप्ताह तक मुझे काम के लिये कोरिया पहुंचना है। आपने कहा था कि मेरे से पूछे बिना कहीं नहीं जाना।”
“चली जाओ।”
“इजाजत है।”
“हां। पुलिस की तरफ से कोई रुकावट नहीं।” वानखेड़े ने कहा और सोचो में डूबे रिसीवर रख दिया। डकैती के पीछे किसका हाथ था। पता नहीं चल रहा था। तीस अरब के जेवरातों की अभी तक कोई खबर नहीं मिली थी। भागदौड़ करते-करते वानखेड़े अब थकने लगा था। ऐसे में रूपा ईरानी को रोककर, क्या करना था।
☐☐☐
गोदरा का मन ऐसे खराब हुआ पड़ा था कि किसी काम में मन नहीं लग रहा था। चार महीनों से घर बैठे ही खा रहा था। नौकरी या काम करने का मन ही नहीं करता था उसका। पांचवें महीने अकेला पन महसूस करते हुए वो कमल शर्मा से मिलने, उसके गांव पहुंच गया कि कुछ दिन वहां रहेगा।
परन्तु कमल शर्मा गांव में नहीं मिला।
गांव वालों ने बताया कि वो जमीन और गांव का मकान बेचकर बूढ़े मां-बाप और अपने परिवार को लेकर गांव से चला गया है। कहां? ये किसी को भी नहीं पता था। कोई भी बता नहीं पाया। शर्मा का इस तरह सब कुछ बेच का चले जाना, गोदरा को समझ नहीं आया। वो वापस चला आया।
छ: महीने बीत गये। जो जमा पूंजी इकट्ठी कर रखी थी।
घर बैठकर खाते-खाते अब वो भी खत्म होने पर आती जा रही थी। उसे लगा कि अब उसे नौकरी कर लेनी चाहिये।
जेवरातों के बाजार में उसकी साख थी। नौकरी मिलने में उसे कोई दिक्कत नहीं आई। रामचंद-सूरजमल के शानदार शो-रूम ‘गहना’ में उसे फौरन नौकरी मिल गयी। शहर के पुराने और जाने-माने ज्वैलर्स थे रामचंद-सूरजमल। उसे अच्छी तरह पहले से ही जानते थे।
प्रवेश गोदरा ने शराफत से भरी जिन्दगी की शुरूआत फिर से कर दी थी।
☐☐☐
तीन साल बाद
गहना
रामचंद-सूरजमल ज्वैलर्स
शाम के वक्त बहुत बड़े बोर्ड पर, नियोन लाइट में ये शब्द जग-बुझ रहे थे।
जेवरात का बहुत बड़ा शोरूम था। करीब बीस सेल्सगर्ल वहाँ काम करती थी। सबने पिंक साड़ी पहन रखी थी। खूबसूरत परियों की तरह, वे सब उस शो-रूम की रोशनी में चमक रही थी। पुरुष कर्मचारी भी थे वहां। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था। अलग-अलग काउंटरों पर तीस-पैंतीस कस्टमर बैठे शो सेल्सगर्ल उन्हें जेवरात दिखा रही थी। चमक-दमक से भरी जेवरातों की दुनिया में आम इंसान खुद को जैसे दूसरे ही लोक में पाता है।
भीड़ भरे बाजार के बीचों-बीच ‘गहना’ नाम का जेवरातों का ये शो-रूम था।
उस मार्केट की पार्किंग में प्रवेश गोदरा ने अपनी पुरानी मारुति कार पार्क की और इसी शोरूम की तरफ बढ़ गया। बीते ढाई बरस से पन्द्रह हजार रुपया महीना के तौर पर गोदरा ‘गहना’ में नौकरी कर रहा था। चूंकि वो जेवरातों का पारखी था और मार्केट में उसकी पकड़ थी। इसलिये नौकरी पाने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई थी। उसके हवाले जिम्मेवारी के काम थे। जेवरातों को-हीरों को कहीं से लाना। कहीं लेकर जाना। ग्राहकों को पटाकर लाना। मोटी-मोटी नकद की पेमेंट लाना और पहुंचाना, ऐसे और भी काम उसके हवाले थे। हर काम को वो पूरी जिम्मेवारी के साथ पूरा करता था। मालिकों को शिकायत का कभी भी मौका नहीं दिया था।
रामचंद-सूरजमल को अगर मालूम हो जाता कि वो कभी, देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर के साथ डकैती में लिप्त रहा है तो उनके होश उड़ जाते। उन पर पहाड़ टूट जाता। गोदरा को कभी अपने पास भी ना फटकने देते। शो-रूम के भीतर न आने देते। लेकिन ये सब उन्हें नहीं मालूम थी और गोदरा दोनों का चहेता बना हुआ था। वैसे भी गोदरा पुरानी जिन्दगी भूल कर, नई जिन्दगी की शुरूआत कर चुका था। बीती जिन्दगी कभी याद आती तो, वो सब बातें बुरे सपने की तरह, अपनी सोचों से निकाल देता।
रामचंद और सूरजमल की टक्कर का दूसरा ज्वैलर्स, उसे बीस हजार पर कब का अपने यहां नौकरी पर बुला रहा था। इधर रामचंद्र और सूरजमल से वो साल भर से तनख्वाह बढ़ाने की बात कर रहा था। हर बार उसे यही जवाब मिलता कि बढ़ायेंगे-बढ़ायेंगे। परन्तु बढ़ाई नहीं गई। इस वक्त प्रवेश गोदरा पक्का होकर आया था कि या तो अभी तनख्वाह बढ़ायेगा या नौकरी छोड़कर कल से दूसरे ज्वैलर्स के यहां काम शुरू कर देगा जो उसे बीस हजार देने को राजी था।
उसे आते पाकर, बाहर खड़े गनमैन ने फौरन शीशे का दरवाजा खोल दिया।
गोदरा ने मुस्करा कर उसे देखा और भीतर प्रवेश कर गया। भीतर कदम रखते ही वो शो-रूम की रोशनियों में नहा गया। चमक उठा था वो। पल भर के लिये ठिठक कर इधर-उधर नजर घुमाई तो उसकी नजरें परी जैसी युवती पर जा टिकी। जो कि वहां सेल्सगर्ल थी। साल भर से दोनों में थोड़ी-थोड़ी दोस्ती थी।
संजना नाम था उसका।
गोदरा उसके पास पहुंचा।
दोनों एक-दूसरे को देखकर मीठे ढंग से मुस्कराये।
“कैसी हो संजना?”
“अच्छी हूं। आप सुनाईये।” संजना की मुस्कराहट और खिली। मोतियों की तरह दांत चमक उठे।
“मैं ठीक हूं।” गोदरा खुलकर मुस्कराया –“कल से, शायद हम न मिल सकें।”
“मेरे से कोई गलती हो गयी?” वो मुस्कराई भी। गम्भीर भी नजर आई।
“तुमसे कोई गलती होगी तो उसकी परवाह भी नहीं करूंगा। बात इन मालिकों की है।” प्रवेश गोदरा ने मुस्करा कर कहा –“साल भर से लटका रहे हैं। तनख्वाह नहीं बढ़ा रहे। आज अगर तनख्वाह न बढ़ाई तो कल से दूसरी जगह नौकरी शुरू।”
“ओह!” वो मुस्करा रही थी, लेकिन बुझी-बुझी सी लगने लगी एकाएक।”
“और कुछ कहना है तुम्हें या ओह ही कहना है।” गोदरा के होंठों पर मुस्कान थी।
संजना ने कुछ नहीं कहा।
“बेवकूफ हो तुम। चुप ही रहोगी। अगर आज मेरी तनख्वाह न बढ़ी तो कल से मैं नहीं आ पाऊंगा। दूसरी जगह नौकरी पर तो और भी व्यस्त हो जाऊंगा। क्योंकि नई नौकरी होगी। हमारे बीच मुस्कराहटें बहुत हो गयी। शादी का प्रोग्राम हो तो कह दो। तुम मुझे अच्छी लगती हो। बहुत हो गया, अब से शादी कर लेनी चाहिये। बाहर का खाना अच्छा नहीं लगता। तुम्हें खाना बनाना आता है कि नहीं?”
“आता है।” संजना के होंठ हिले।
“चाय?”
“वो भी आती है।” संजना के होंठों से निकला।
“सब कुछ आता है?”
“बच्चा पैदा करना आता है?”
“नहीं।”
“नहीं। फिर तो हमारी शादी नहीं हो सकती।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में सिर हिलाया।
“बच्चा पैदा हो जायेगा। कर दूंगी।”
“कर दोगी-कैसे?”
“वो-वो...।” संजना हड़बड़ाई। संभली। गोदरा को घूरा –“जब शादी हो जायेगी तो कैसे का जवाब भी दे दूंगी।”
“जवाब को छोड़ो। बच्चा पैदा होना चाहिये। करोगी?”
“हां।” संजना की मुस्कान में शर्म आ गयी।
“फिर तो तुम मेरी बीवी बनने लायक हो। अब बोलो-शादी करोगी मुझसे?”
“ये सवाल बाकी कहां बचा?”
“मुझे जवाब चाहिये।” गोदरा ने मुस्करा कर उसे देखा।
“अभी चलें।”
“कहां?”
“शादी करने।”
“तुम्हारे बाप-भाई ने बीच में टांग मारी तो?”
“ऐसा कुछ नहीं है। मैं अभी यहां सब को लाईन लगाकर खड़ा कर देती हूं।”
“यहां?”
“बिल्कुल यहां-घर फोन करूं क्या?”
“नहीं। मुझ यकीन हो गया। तो हम कल शादी करेंगे। मन्दिर में करेंगे। ठीक।”
“ओके माई डियर एक्स हसबैंड।” संजना मुस्कराकर हंसकर खुशी से बोली।
“साले बूढों से निपट लूं।” गोदरा ने दूर नजर आ रहे केबिन पर नजर मारी। उधर बढ़ना चाहा।
“एक ही है। वहां। तो अपने घर फोन कर दू शादी के लिये कि- “
“फोन क्या करना है। तुम खुद घर जाओ कल शादी है तो काम भी करना होगा। होगा कि नहीं? तुम्हारी छुट्टी के लिये मैं कह दूंगा।” कहने के साथ ही गोदरा आगे बढ़ गया। कोने में केबिन नजर आ रहा था।
उधर पहुंचकर प्रवेश गोदरा ने केबिन का दरवाजा धकेला और भीतर प्रवेश कर गया। शानदार केबिन में बड़ी-सी टेबल के एक तरफ रखी कुर्सी पर सूरजमल बैठा था। रामचंद्र की कुर्सी खाली थी। वो वहां नहीं था। सूरजमल वहां मौजूद छोटी-सी स्क्रीनों को बारी-बारी देख लेता था। स्क्रीनों पर शो-रूम के दृश्य बदल-बदलकर आ रहे थे। गोदरा के भीतर आने पर, सूरजमल ने गर्दन घुमाकर उसे देखा।
“आओ गोदरा।” सूरजमल ने मुस्कराकर उसे देखा –“मैंने तुम्हें स्क्रीन पर आते देख लिया था। संजना के साथ बहुत घुल मिलकर बात कर रहे थे। ये बढ़िया बात तो नहीं। शो-रूम में तुम्हें शराफत से आना-जाना चाहिये।”
“मैं उससे शादी की बात कर रहा था।” गोदरा ने तीखे स्वर में कहा –“कल हम शादी करने जा रहे हैं। मैं और संजना।”
“क्या?”
सूरजमल ने हैरानी से उसे देखा।
“हैरान होने की क्या जरूरत है। क्या आपने शादी नहीं की। बच्चे पैदा नहीं किए।”
“आराम से बात करो। भड़के क्यों हुए हो।” सूरजमल मुस्करा पड़ा।
“कल मैं दो काम नये कर रहा हूं। संजना से शादी के साथ-साथ कल मैं नई जगह नौकरी भी शुरू कर रहा हूं। आज मैं आपको नमस्ते करने आया हूं।” प्रवेश गोदरा ने सूरजमल को घूरकर कहा।
“नमस्ते–कल दूसरी जगह नौकरी कर रहे हो।” सूरजमल हड़बड़ा कर बोला– “बहुत अच्छी बात है। लेकिन तुम बैठो तो सही। खड़े क्यों हो। जल्दी तो नहीं है जाने की।”
टेबल पर रखा पानी का गिलास सूरजमल ने गोदरा की तरफ बढ़ाया।
“पानी पिओ। बाहर गर्मी बहुत है। हवा चल रही है या नहीं?”
गोदरा उखड़े ढंग से बैठा कुर्सी पर।
गोदरा ने पानी पिया। सूरजमल को देखा।
“शादी की बात तो समझ में आती है, लेकिन नई जगह नौकरी करने की बात समझ में नहीं आई।”
“आप एक साल से मेरी तनख्वाह बढ़ाने को कह रहे हैं लेकिन बढ़ा नहीं रहे। दूसरी जगह मुझे पच्चीस हजार...।”
“पच्चीस हजार? तुमने तो सप्ताह भर पहले कहा था कि बाहर बीस हजार मिल...।”
“अब पच्चीस को ऑफर आ गयी है। कल मैं वहां नौकरी...।”
“जल्दी मत करो। हम लोगों का सिलसिला ठीक चल रहा है।” सूरजमल ने हाथ हिलाकर कहा –“ठीक है अब बीस हजार महीना देंगे। हम तो सोच ही रहे थे तुम्हारी तनख्वाह बढ़ाने ।”
“मैं पच्चीस हजार की कह रहा हूं और आप।”
“बीस ठीक है। वक्त आने पर पच्चीस भी।”
“आप मेरा हिसाब कर दीजिये। बीस में नौकरी करके मैं अपना पांच हजार का नुकसान नहीं करूंगा। क्यों करूं, वहां मुझे पच्चीस मिल रहा है। शादी के बाद तो वैसे भी खर्चा बढ़ जाता है।”
सूरजमल ने गोदरा को घूरा।
“तो तुम पच्चीस हजार से कम नहीं मानोगे?”
“क्यों मानूं। मेरी वजह से आपको तगड़ा फायदा होता है। आपके सारे जिम्मेवारी वाले काम मैं करता हूं। मेरे ख्याल में तो पच्चीस भी कम हैं। मुझे कम से कम...।”
“ठीक है-ठीक है। माना। पच्चीस हजार महीना मिलेगा अब तुम्हें।”
“इस बार की तनख्वाह पच्चीस हजार देंगे। दो-तीन दिन में तनख्वाह मिलनी है मुझे।”
“बढ़िया भाई।” सूरजमल मुस्कराया- “पच्चीस देंगे।”
“शादी के बाद कुछ दिन संजना काम पर नहीं आयेगी। उसकी तनख्वाह नहीं काटी जायेगी।”
“ये कह रहे हो या हुक्म दे रहे हो।”
“मैं आपके पांवों में पड़कर रिक्वेस्ट कर रहा हूं।”
“ये भी बढ़िया। कुछ और तो नहीं है बाकी।” सूरजमल ने दोनों हाथ आगे करके कहा।
“बाकी क्या-मैंने कुछ मांगा है आपसे।” गोदरा ने मीठे स्वर में कहा –“कल मेरी और संजना की शादी है। हम दोनों आपके यहां काम करते हैं। ऐसे में आपको प्रेजेन्ट तो देना चाहिये।”
“क्या चाहते हो?”
“संजना से कहिये कि अपनी पसन्द का बढ़िया सा हार प्रेजेन्ट के लिये पसन्द कर ले।”
सूरजमल ने इन्टरकॉम के जरिये संजना को केबिन में बुलाया। शादी के लिये बधाई दी और लाख रुपये तक की कीमत का कोई भी जेवरात शादी के लिये प्रेजेन्ट के तौर पर पसन्द कर लेने को कहा।
संजना को भेजकर सूरजमल ने प्रवेश गोदरा को देखा।
“कर ली अपनी।”
“मैंने तो कुछ किया ही नहीं।” गोदरा मीठे ढंग से मुस्कराया –“पुराना सेवक हूं आपका।”
सूरजमल ने टेबल का ड्राज खोला और नीचे झुकते हुए एक मैग्जीन निकाली। फिर सीधे होकर उसे फुरेरी दी और प्रवेश गोदरा की तरफ सरका दी।
“अमेरिका में प्रकाशित होने वाली, यूरोप में सबसे ज्यादा बिकने वाली मैग्जीन है ये।” सूरजमल ने शांत स्वर में कहा –“इसके टाईटल कवर पर देखो। टाईटल कवर पर जिस मॉडल की तस्वीर है, वो हिन्दुस्तानी है। रूपा ईरानी नाम इसका। आज से कुछ साल पहले ये हिन्दुस्तान में मॉडलिंग किया करती थी। फैशन शो करती थी। लेकिन किस्मत की धनी निकली। कोरिया में एक शो के लिये इसे बुलाया गया। उसके बाद तो इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोरिया के बाद यूरोप फिर अमेरिका में इसे मॉडलिंग के चांस मिले। लगभग पूरी दुनिया की जानी-मानी मॉडल बन गयी ये। यहां तक कि दो हॉलीवुड फिल्मों में भी काम कर चुकी है। कहा जाता है कि इसने इतना पैसा कमाया मॉडलिंग में कि इसके पास आज की तारीख में बे-हिसाब दौलत है।”
प्रवेश गोदरा बुत सा बना मैग्जीन के टाईटल कवर पर छपी उसकी तस्वीर को देखे जा रहा था। पहले से कहीं ज्यादा हो गयी थी वो। उसकी आंखों में जिन्दगी की चमक खूबसूरत थी। चेहरे पर शोखी थी। इन तीनों सालों में उसकी उम्र जरा सी बढ़ी हुई नहीं लग रही थी। बल्कि पहले से कम उम्र की लग रही थी वो।
“गोदरा साहब कहां खो गये?” सूरजमल ने टोका।
गोदरा ने गहरी सांस ली। मन ही मन सोचा कि अगर सूरजमल से कहे कि दुनिया भर की ये मशहूर मॉडल कभी उसकी प्रेमिका थी। वे शादी करने वाले थे। रात-रात भर इकट्ठे रहते-सोते थे तो उसे पागल समझेगा।
“बे-इन्तहा दौलत की मालकिन रूपा ईरानी चार दिन बाद हिन्दुस्तान आ रही है। अब इनका इरादा हिन्दुस्तान में बस जाने का है। ऊटी में महल जैसा शानदार बंगला है इसका। वहीं रहेगी।” सूरजमल ने कहा।
ऊटी में बंगला? जमीन तो ले रखी थी रूपा ने। उसे बताया करती थी और मजाक में ये भी कहा करती थी कि जो उस जमीन पर महल जैसा बंगला बनाकर उसे देगा उससे शादी करेगी। खैर-बना लिया होगा बंगला। गोदरा ने सोचा।
“ज्वैलर्स एसोसिएशन द्वारा हर बड़े ज्वैलर्स को खबर दी गयी है कि, मशहूर मॉडल रूपा ईरानी नये डिजाईनों के आकर्षक और बढ़िया जेवरात खरीदने का इरादा रखती है। ऐसे में हम जेवरात तैयार रख लें।” सूरजमल बोला –“मैं ये तुम्हें कहना चाहता हूं कि ऊटी में रूपा ईरानी के पास जेवरात तुम लेकर जाओगे। क्योंकि तुम बातें करने में माहिर हो और ग्राहक को जेवरात के बारे में तसल्ली भी करा सकते हो। रूपा ईरानी को जेवरात बेचने हैं तुमने।”
सूरजमल को देखते हुए, प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया।
गोदरा का चेहरा बता रहा था कि वो पुरानी यादों में जा फंसा। सूरजमल की आवाज ने यादों को पीछे धकेला।
“क्या सोचने लगे गोदरा।”
“सोच रहा है कि कौन-सा जेवरात रूपा ईरानी को पसन्द आ सकता है।” गोदरा गम्भीर स्वर में मुस्कराया।
“कुछ दिन हैं हमारे पास। मुझे पूरी आशा है कि तुम रूपा कुछ जेवरात बेच लोगे। ये अच्छी बात है कि इसके पति को जेवरातों में दिलचस्पी नहीं है। यानि कि तुमने सिर्फ इस औरत को ही संभालना...।”
“पति?” उसके होंठों से निकला ।
“क्या हुआ?”
“ये शादी शुदा है?”
“हाँ। बच्चा भी है। साल भर की बेटी है। पति के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है मुझे। सुना है कि जब ये अमेरिका में मॉडलिंग के लिये फोटो सेशन करने गयी तो, उस दौरान ही इसने शादी की थी। हमें उसके पति से कोई मतलब नहीं। तुमने इसे जेवरात बेचकर, अपनी काबलियत साबित करनी है। अब तुम्हारी तनख्वाह पच्चीस हजार हो...।”
उसकी बात पर ध्यान न देकर गोदरा कुर्सी से उठा। वो विदेशी पत्रिका भी उठा ली। जिसके कवर पर रूपा ईरानी की मुस्कराती हुई दिलकश तस्वीर छपी थी।
“ये मैग्जीन मैं ले जा रहा हूं।”
“ले जाओ। तो कल तुम संजना से शादी कर रहे हो।” सूरजमल मुस्कराया।
“हां।” गोदरा के होंठों पर भी मुस्कान उभरी।
“तो मैं आशा करूं कि जल्दी ही तुम बाप बनकर दिखाओगे।” सूरजमल हंसा।
“हां। अगर आप भी वादा करें कि बच्चे के गले में जो सोने की चेन आप डालेंगे, उसमें कम से कम एक लाख का हीरा जड़ा होगा।” गोदरा ने हंसकर कहा –“तब संजना भी पूरी कोशिश करेगी कि जल्दी मां बने।”
“फायदा देने वाले घोड़े को खिलाने में हमें एतराज नहीं।”
सूरजमल मुस्कराया –“तुम बाप बनो। उसके गले में सोने की चेन के साथ लाख से ऊपर की कीमत का हीरा होगा। साथ में।”
“क्या साथ में?”
“तुम्हारी तनख्वाह भी पच्चीस से तीस कर देंगे।”
“तीस तो तब तक हो ही चुके होंगे। तब आप पैंतीस हजार करेंगे। यही मतलब था ना आपका।”
सूरजमल ने उसे घूरा।
मैग्जीन थामे प्रवेश गोदरा मुस्कराकर पलटा और केबिन से बाहर निकल गया।
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