लाला तेज-तेज कदम उठाता वहाँ टहल रहा था, जैसे उसे अपनी टांग के अलावा किसी और चीज से मतलब ही ना हो।
बार-बार रुककर वो अपनी टांग झटकने लगता था।
दूबे कैंची गेट के पास पहुँच कर बाहर देखने लगा।
उसने देखा कि दो पुलिस वाले बाहर की सीढ़ियों पर दो भरे लिफाफे रखकर जा रहे हैं।
दूबे ने जेब से चाबी निकाली और ताला खोला, फिर कैंची गेट थोड़ा सा खोला
“ऐ, तुम!” दूबे ने कुत्ते वाली औरत से कहा- “इधर आओ।”
“क्या है?” वो वहीं बैठे कह उठी।
“बाहर सामान रखा है, वो उठा के भीतर ले लो...।”
“ये जरा सा काम तुम नहीं कर सकते...।”
“ये काम तुम ही करो।’
वो उठी और कुत्ते की जंजीर थामे पास आई।
“दो मिनट के लिए कुत्ते को छोड़ दो।”
“ये मेरे बिना नहीं रहता...।”
“डेट पर भी तुम्हारे साथ जाता है?” दूबे ने कड़वे स्वर में कहा।
“हाँ...।”
“सब कुछ देखता है?” दूबे के स्वर में व्यंग्यं भर आया।
“तो क्या हो गया। जानवर भी प्यार करते हैं। देख लिया तो इसके लिए नया क्या है...।”
“भाड़ में जा...।” दूबे बड़बड़ा उठा।
वो कुत्ते की जंजीर थामे कैंची गेट के पास जाकर ठिठकी, बाहर देखा। लिफाफे नजर आये।
“जल्दी कर, उठा उसे।” दूबे ने गुस्से से कहा।
“तुम तमीज से बात करो।” वो भी गुस्से से बोली- “सब मर्द मुझसे तमीज से बात करते हैं।”
“मैं तुम्हें गोली मार दूंगा।”
“यही कहकर मुझे डराते रहना।” वो चिढ़े स्वर में कह उठी, फिर उसने कुत्ते से कहा- “टॉमी, तुम यहीं रहो। उन लिफाफों में तुम्हारे लिए बिस्कुट हो सकते हैं। मैं उन्हें लेकर आई।” कह कर उसने जंजीर छोड़ दी।
कुत्ता वहीं खड़ा रहा।
“जल्दी करो...।” दूबे बोला।
“पुलिस वाले मुझे गोली तो नहीं मार देंगे?”
“नहीं मारेंगे। अब जल्दी कर।”
वो खुले कैंची गेट से बाहर निकली।
“भाग मत जाना। वरना मैं गोली मार दूंगा।” पीछे से दूबे ने कहा।
“मैं अपने टॉमी को छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाली।” वो बोली और दो सीढ़ियां उतरी। फिर वहाँ रखे दोनों लिफाफों को उठाया और पलट कर जल्दी से भीतर आ गई।
दूबे ने जल्दी से कैंची गेट बंद किया और ताला लगाकर चाबी जेब में रखी।
वो औरत दोनों लिफाफों को चैक कर रही थी, फिर एक लिफाफे में से कुत्ते के बिस्कुट वाला पैकिट निकाला और अपनी कुर्सी की तरफ बढ़ते कह उठी- “आ टॉमी। तेरे को बिस्कुट खिलाती हूँ...।”
टॉमी उसकी तरफ दौड़ गया।
दूबे टोपी से ढका गाल खुजलाता बड़बड़ा उठा-
“साली, पागल कहीं की...।”
तभी मीणा ऊपर आता दिखा।
“पाँच थैले हैं नोटों से भरे...।” उसने ऊँचे स्वर में देवराज चौहान से कहा- “वो एक-एक करके ला रहे हैं।”
“मैं भी हाथ लगा दूँ थैलों को?” जगमोहन जल्दी से कह उठा।
“तुम तो बिल्कुल नहीं। तुम्हारी नजरें ठीक नहीं हैं।” मीणा बोला।
“तुमसे पूछे बिना थैलों से नोट थोड़े ना निकालूंगा।”
“तुम चुपचाप बैठे रहो। ये ही बहुत है।” फिर मीणा की निगाह लिफाफों पर पड़ी- “तो समान आ गया...।”
दूबे ने हाँ में सिर हिलाया।
कुत्ते वाली कुत्ते को बिस्कुट खिलाने में व्यस्त थी।
लाला वापस कुर्सी पर आ बैग था।
“फोन आया था?” मीणा ने दूबे से पूछा।
“देवराज चौहान ने बात की...।”
मीणा देवराज चौहान के पास आया।
“किससे बात की? कमिश्नर था?” मीणा ने पुछा।
“मैं जानता नहीं उसे। उसने कहा कि बाहर खाने का सामान रखा जा रहा है।” देवराज चौहान बोला।
“सावी के बारे में कोई बात नहीं की?”
“नहीं।”
“अभी वो आई नहीं होगी।” मीणा ने जैसे ये शब्द अपने आपसे कहे।
तभी बेसमेंट की सीढियों की तरफ से आहटें उभरीं। मीणा उस तरफ बढ़ गया।
बैंक के सारे कर्मचारी वो भारी थैला उठाये किसी तरह ऊपर आ गये थे। सब हांफ रहे थे।
“शाबाश!” मीणा कह उठा- “तुम लोगों ने कमाल कर दिया। दूबे, रखवा ले, जहाँ रखवाना है।”
“इधर ले आओ।” दूबे रिवाल्वर वाला हाथ हिलाकर कह उठा- “कैंची गेट के पास, दांई तरफ इस तरह रखो कि बाहर से ना दिखे कि हम भीतर कुछ कर रहे हैं।”
जहाँ दूबे ने कहा था, वहाँ वो थैला रख दिया गया।
“इसी तरह सब थैले ले आओ...।” मीणा ने कहा।
गुप्ता वापस उसी टेबल के पास, कुर्सी पर बैठ गया था।
“तुम क्यों बैठ गये मैनेजर...?” मीणा ने पूछा।
“मुझ बूढ़े से बोझा क्यों उठवाते हो... । एक ही बार में थक गया हूँ। ये ले आयेंगे।
बैंक के स्टॉफ के लोग बेसमेंट में जाने के लिए सीढ़ियां उतर गये थे।
मीणा, देवराज चौहान के पास पहुँच कर बोला- “तुमने मुझे ठीक कहा है कि नोटों के साथ मुझे निकल जाना चाहिये। मैंने इस बात पर शान्ति से विचार किया। मुझे नहीं लगता कि लोग अब मुझे इन्दर प्रकाश मीणा मानेंगे। कामराज और सावी ने तगड़ी साजिश रची है, जिसे मैं तोड़ नहीं सकता। सच बात तो ये है कि मुझे समझ ही नहीं आया कि उन्होंने मेरे खिलाफ क्या चक्कर चलाया है। मैं इन नोटों के साथ कहीं पर शानदार जिन्दगी बिताऊँगा और... ।”
“आधे मेरे हैं।” पन्द्रह कदम दूर खड़ा दूबे कह उठा।
मीणा ने उसे देखा और सिर हिलाकर कह उठा-
“चिन्ता मत कर। मैं तेरा हक नहीं मारूँगा। आधे तेरे ही हैं।”
“तुम्हारी पत्नी तुमसे बात करेगी।” देवराज चौहान बोला- “शायद वो तुमसे कुछ खास कहना चाहती हो।”
“वो जो भी कहे, अब मैं उस पर विश्वास नहीं करने वाला। जो एक बार दगा दे सकती है, वो दूसरी बार भी ऐसा कर सकती है। वो घटिया और बुरी औरत है। मैंने उसे मन से निकाल दिया है।” मीणा के चेहरे पर गुस्से के भाव दिख रहे थे- “बस एक ही अफसोस रहेगा उम्र भर कि मैं सावी और कामराज की साजिश बेनकाब करके, खुद को इन्दर प्रकाश मीणा साबित नहीं कर सकता।”
“तुम लोग यहाँ से ठीक-ठाक निकल जाओ। मेरे लिए ये ही बड़ी बात होगी।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “बाहर मौजूद पुलिस तुम्हें आसानी से जाने नहीं देगी...।”
“पुलिस से तो मैं निपट...।”
तभी फोन की बेल बजने लगी।
सब की निगाह उस तरफ गई।
“सावी का फोन होगा।” मीणा के होंठों से निकला। गुप्ता ने रिसीवर उठाकर कान से लगाया।
“हैलो...।” वो बोला।
“उससे बात कराओ...।” कमिश्नर पाटिल की आवाज गुप्ता के कानों में पड़ी।
गुप्ता ने कान से रिसीवर हटाया और मीणा को इशारे से पास आने को कहा।
मीणा पास पहुँचा तो गुप्ता ने रिसीवर उसकी तरफ बढ़ा दिया।
“हैलो...” मीणा ने कान से रिसीवर लगाया।
“तुम्हारी पत्नी आ गई है। वो तुमसे बात करना चाहती है।” पाटिल की आवाज मीणा के कानों में पड़ी।
“अब तो तुमने मान लिया कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।” मीणा बोला।
“अगर मैं मान लूंगा तो क्या तुम अपने को पुलिस के हवाले कर दोगे?”
“कभी नहीं...”
“सच बात तो ये है कि तुम मीणा नहीं हो...।”
“तुम अपनी ये ही बकवास करते रहना, तुम....।” मीणा गुस्से में आ गया था।
“तुम्हारी पत्नी तुमसे बात करने को बेताब है।”
“उसे फोन दो...।”
दो पल लाईन पर खामोशी रही।
मीणा रिसीवर कान से लगाए रहा। फिर उसके कानों में औरत की आवाज पड़ी- “हैलो...।”
“सावी...।” मीणा के होंठों से निकला- “अब तुम्हें कैसे मेरी याद आ गई...।”
“फिर सावी, ये सावी आखिर है कौन जो तुम सावी करते फिर रहे...?”
“ता... रा...?” मीणा के होंठों से निकला- “तुम तारा हो, मैंने तुम्हें पहचान लिया है।”
देवराज चौहान पास आ गया।
“तुम भला मुझे क्यों नहीं पहचानोगे, मैं तुम्हारी पत्नी...।”
“बकवास मत करो। तुम मेरी पत्नी नहीं हो। मैं तो सावी से बात होने की सोच रहा...।”
“ऐसा मत कहो, मैं ही तुम्हारी पत्नी हूँ। कुछ देर पहले टी.वी. पर समाचार चैनल वालों ने तुम्हारी तस्वीरें दिखाईं, जब तुम बैंक से बाहर निकले थे। मैं तो तुम्हें टी.वी. पर देखकर ही घबरा गई। मुझे यकीन नहीं आया कि तुम ऐसी कोई हरकत कर सकते हो। टी.वी. में ना देखा होता तो मैं यकीन ही नहीं करती। उस दिन से मैं सुरेन्द्र भाई साहब और मेहता भाई साहब के साथ तुम्हें ढूंढे जा रही...”
“तुम अपनी बकवास बंद करोगी?” “
“ये तुम क्या कह रहे हो? शायद उस एक्सीडेंट की वजह से तुम्हारे दिमाग में कोई चोट...।”
“जुबान बंद रख साली। मैं तेरे को जरा भी नहीं जानता, उस दिन मिलने के सिवाय...।” मीणा गुर्रा उठा।
“आप मुझे कितनी भी गालियाँ दे लीजिये, कोई बात नहीं...मैं...।”
“पागल औरत! क्यों मेरे पीछे पड़ी है?” मीणा दाँत पीस कर कह उठा।
देवराज चौहान गम्भीर निगाहों से मीणा को देख रहा था।
“मैं आपकी पत्नी तारा हूँ। आप यकीन क्यों नहीं करते! सुरेन्द्र और मेहता भाई साहब भी आये हैं। हम सब आपके लिए परेशान हो रहे हैं। आप बैंक से बाहर आ जाईये। हम आपको घर ले जायेंगे।”
“तू कमिश्नर को फोन दे। उस हरामी पुलिस वाले से अब बात करनी पड़ेगी कि...।”
तभी फोन पर मेहता की आवाज आई।
“ओए दामले, ये तेरे को क्या हो गया? तूने बैंक पर कब्जा कर लिया। तू तो बहुत हिम्मत वाला है।”
मीणा दाँत पीस उठा।
“पहचाना नहीं दामले। मैं... मेहता...देख ले तूने मेरेको थप्पड़ मारे। पर मैं नाराज नहीं हुआ। उस दिन तू घर से चला आया तो मैं छुट्टियां लेकर तुम्हें ढूंढता फिर रहा हूँ। साथ में सुरेन्द्र भी है। हम सब तेरे लिए परेशान हो रहे...।”
“तुम सब उल्लू के पट्टे हो...।”
“खूब, तो यार को गालियां देता है। कोई बात नहीं, ये भी माफ किया। आखिर तू यार है अपना। चल अब फटाफट बैंक से बाहर आ जा। भाभी बहुत परेशान हो रही है। तूने तो...।”
“सालो...कुत्तो! मैं तुम सब को कच्चा चबा जाऊँगा।” मीणा गला फाड़ कर चीखा और रिसीवर फोन पर पटक दिया । गुस्से में चेहरा लाल सुर्ख हो रहा था। रह-रह कर वो दाँत भींच रहा था- “कमीने-कुत्ते, हरामजादे हैं सब जो...।”
उसी पल फोन पुनः बज उठा।
मीणा के होंठों से गुर्राहट निकली। उसने पागल सा हुए रिसीवर उठाया और गुर्राया- “कमिश्नर?”
“हाँ...मैं...तुमने फोन काट...।”
“साले, कमीने-कुत्ते...।” मीणा गला फाड़ कर दहाड़ा- “ये तुमने किससे मेरी बात करा दी? तुम तो मेरी पत्नी से बात...।”
“ये तुम्हारी पत्नी तारा...।”
“मेरी पत्नी तारा नहीं, सावी है।” मीणा वैसे ही दहाड़ा।
“तुम सुधीर दामले हो, हमें पता चला...।”
“बकवास मत करो।” मीणा दाँत पीस कर कह उठा- “मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ, पुलिस वाला हूँ। सुधीर दामले को मैं जानता तक नहीं। कभी नाम नहीं सुना। तुम मुझे जबर्दस्ती सुधीर दामले कैसे बना सकते हो।”
“मैडम तारा तुम्हें अपना पति कह रही हैं और मिस्टर मेहता, मिस्टर सुरेन्द्र तुम्हारे पड़ौसी...।”
“बकवास। झूठ...।” मीणा गुस्से से कह उठा- “सब कुछ झूठ है। कोई मेरा पड़ौसी नहीं। तारा मेरी पत्नी नहीं। मेरी पत्नी सावी है और ये बात मैं कह-कह कर थक गया हूँ। और तुम मुझे मरा मान रहे हो। मैं सब समझता हूँ कि तुम सब कामराज के बहकावे में आ चुके हो। उसके इशारे पर मेरे साथ ऐसा सलूक कर रहे...।”
“सुधीर दामले।” कमिश्नर पाटिल का गम्भीर स्वर, मीणा के कानों में पड़ा- “तुम्हारी पत्नी ने बताया कि...।”
“वो मेरी पत्नी नहीं है। झूठ कहती है वो...।” मीणा चीखा।
“तुम्हारी पत्नी ने बताया कि तुम्हारा एक दिन सुबह एक्सीडेंट हो गया था। उसके बाद ही ये सारी गड़बड़ हुई। तुम्हारे पड़ोसियों का भी मानना है कि उस एक्सीडेंट की वजह से तुम्हारे सिर में कोई ऐसी चोट लगी कि जिससे तुम्हारी याददाश्त को नुकसान पहुँचा। तुम किसी बात की फिक्र मत करो दामले। ऐसी स्थिति में तुम्हें कोई कानून सजा नहीं दे सकता। कुछ दिन डाक्टरों की देख-रेख में रहना होगा। बेहतर होगा कि हथियार फेंककर बाहर
आ जाओ। सब ठीक हो...।”
मीणा रिसीवर कान से लगाए गुस्से से काँप रहा था।
गुप्ता कुर्सी पर बैठा सिर उठाये उसे देखे जा रहा था।
देवराज चौहान पास आ पहँचा था।
दूबे रिवाल्वर थामे सतर्कता से सब लोगों पर निगाह रखे था।
“तुम मुझे पागल नहीं बना सकते।” मीणा एकाएक गुर्रा उठा- “मेरा कोई एक्सीडेंट नहीं हुआ। मैं एकदम ठीक हूँ। जो औरत खुद को मेरी पत्नी कह रही है, वो झूठी है। वो दो भी झूठे हैं, जो खुद को मेरा पड़ौसी कह रहे हैं। मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ और सावी का पति हूँ। तुम कामराज के इशारे पर मेरा दिमाग बदलने की कोशिश कर रहे हो और मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। तुम लोग मेरा वजूद खत्म कर देना चाहते हो। मैं सबको समझाते-समझाते अब थकने लगा हूँ... कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश
मीणा हूँ। बहुत हो गया। ये बात अब मुझे समझ आती जा रही है कि मेरी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। मैं पागल हूँ, जो खुद को मीणा साबित करने में लगा...।”
“सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा की सत्रह दिन पहले हादसे में मौत हो चुकी है।” पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“तो फिर मैं कौन हैं कमीने? मैं जीता-जागता इन्दर प्रकाश मीणा, बैंक पर कब्जा जमाये....।”
“तुम सुधीर दामले हो।”
“तुम कुत्ते हो! कामराज के इशारे पर तुम कुत्ते बन गये...।”
“कामराज का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो ठीक से पता भी नहीं होगा कि यहाँ क्या हो रहा है। ना ही उसने फोन करके हालातों के बारे में जानने की चेष्टा की है। वो इस मामले से अलग है। ए.सी.पी. कामराज की इतनी हिम्मत नहीं कि कमिश्नर पाटिल को अपने इशारे पर चला सके। तुम बहुत बड़ी गलत फहमी में जी रहे हो कि ये सब कामराज के इशारे पर हो रहा है। कामराज का इस मामले से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है... तुम तो...”
“तुमने मुझे बताया था कि कामराज दो महीने बाद सावी से शादी करने वाला है।”
“बताया था। मैंने उससे पूछा था...तुम्हारी बोत सुनकर कि...।”
“मेरे जीते जी वो कैसे मेरी पत्नी से शादी...।”
“मीणा मर चुका है।”
“मर चुका है?” मीणा ने दाँत किटकिटा कर कहा-- “तो फिर मैं कौन हूँ जो...।”
“तुम सुधीर दामले हो। तारा के...।”
“तू कुत्ता है और कुत्ता ही रहेगा।” मीणा ने गुर्राकर कहा और रिसीवर वापस पटक दिया।
सामने बैठे गुप्ता ने थूक निगला।
मीणा का चेहरा धधक रहा था।
बैंक कर्मचारी बेसमेंट से किसी तरह दूसरा नोटों का थैला ऊपर ले आये थे।
देवराज चौहान पास खड़ा माथे पर बल डाले मीणा को सोच भरी निगाहों से देख रहा था।
दूबे नोटों का बैग रखवाने में व्यस्त था।
लाला अपनी टांग को झटके देता रहता था।
“सुना तुमने...।” मीणा गुस्से से गुर्रा कर देवराज चौहान से कह उठा- “बाहर मौजूद पुलिस वाले मुझे सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा मानने को तैयार नहीं हैं, बल्कि वो तो कहते हैं कि मैं सुधीर दामले हूँ। और तो और, तारा नाम की औरत को मेरी पत्नी बनाकर मुझसे बात करा दी। उसके साथ मौजूद दो लोगों को मेरा पड़ौसी बता रहे हैं। हद हो गई इन सब बातों की। मैं पागल...।” मीणा ने वो सब बताया जो तारा और कमिश्नर ने कहा था।
“तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हो, ये बात मैं दावे से कहता हूँ...।” देवराज चौहान बोला।
“तो फिर पुलिस वाले क्यों नहीं...।” मीणा ने कहना चाहा।
“ये मामला अब और उलझ गया है कि टी.वी. पर तुम्हें देखकर, कोई औरत तुम्हें अपना पति कहने लगी।”
“पड़ौसी भी आ गये। साले...। तुम्हें बताया था कि कैसे मैं तारा के घर पहुंच गया था...वो...।”
“याद है मुझे। जो भी हो, मामले में अब एक और उलझन आ गई कि तारा तुम्हें अपना पति क्यों कह रही है?”
“पागल है साली...”
“पुलिस के पास, इन हालातों में आकर कहना कि वो तुम्हारी पत्नी है, छोटी बात नहीं...।” देवराज चौहान बोला।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“ये सुधीर दामले कौन है?” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में पूछा।
“मुझे क्या पता...।” मीणा ने दाँत भींच कर कहा- “चाल है ये पुलिस वालों की जो...।”
“पुलिस वाले ये चाल नहीं चल सकते...”
“तो अब तुम ये कहना चाहते हो कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं...।” मीणा ने देवराज चौहान को घूरा।
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हो। मैं सोच रहा हूँ कि वो औरत तुम्हें अपना पति और तुम सुधीर दामले हो, ये बात यूं ही नहीं कह रही होगी।”
“आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?” मीणा झल्लाया।
“मामले में उलझन वाला पेंच आ गया है।”
“तुम भी सीधी तरह क्यों नहीं कह देते कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हूँ।” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा।
“मैं ये नहीं कह सकता। क्योंकि तुम मीणा ही हो। मेरा अनुभव कहता है कि तुम मीणा ही हो और सच कह रहे हो...”
“तो पुलिस मुझे मरा क्यों मान रही है?”
“ये तो पुलिस जाने...”
“पुलिस पागल है जो...”
“पुलिस पागल नहीं हो सकती। क्योंकि पुलिस एक इन्सान नहीं होता। ये एक संस्था होती है। बहुत से लोग होते हैं। ये लोग इस तरह नहीं कह सकते कि तुम मर गये हो। इसकी भी कोई वजह होगी। वरना पुलिस के लिए ये कहना कि तुम ही सब-इंस्पेक्टर मीणा हो, आसान बात थी, परन्तु इस स्थिति में भी पुलिस ये मानने को तैयार नहीं है। जबकि तुम बैंक पर कब्जा किए बैठे हो। कोई बात तो बीच में होगी ही जो...।”
“कैसी बात?”
“मैं नहीं जानता कि असल में बीच की बात क्या है!” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा।
“मेरे लिए ये ही बहुत है कि तुम मुझे सब-इंस्पेक्टर मीणा मानते हो।”
देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिला दिया।
“देख लिया मैनेजर...कि मेरे साथ क्या हो रहा है?” कड़वे स्वर में मीणा ने गुप्ता से कहा।
“म...मैं क्या कर सकता हूँ....”
“कोई कुछ नहीं कर सकता। कोई भी मेरी सहायता नहीं कर सकता। जो करना है, मुझे ही करना होगा।” मीणा ने कैंची गेट के एक तरफ रखे थैलों को देखा। दो थैले वहाँ पहँच चुके थे।
“देवराज चौहान।” मीणा बोला- “मैंने पक्का फैसला कर लिया है कि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत लेकर चलता बनूं...।”
“ये फैसला तुम्हें बहुत पहले ले लेना चाहिये था।” देवराज चौहान ने कहा।
“शरीक इन्सान इसी तरह पिस जाता है। कोई मुझे इन्दर प्रकाश मीणा माने या ना माने! लोग मुझे जिन्दा माने या मरा मानें। क्या फर्क पड़ता है? दौलत मेरे पास है। मेरी है। मैं ऐश से जिन्दगी बिताऊँगा। तुम देखना मेरे दिल को दुखा कर कामराज और सावी कभी भी खुश नहीं रह, पायेंगे। एक दिन ऐसा जरूर आयेगा कि सावी मुझे याद करके रोएगी...।” मीणा की आँखों में आंसू चमक उठे।
देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।
“मैं दौलत लेकर चला जाऊँगा। फिर कहीं पर नये नाम से दोबारा जिन्दगी शुरू करूँगा, लेकिन शादी नहीं करूँगा।”
देवराज चौहान ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा- “अब तुम ठीक सोच रहे हो। जिन्दगी बहुत लम्बी है। किसी एक के लिए अपने को बरबाद कर लेना ठीक नहीं। तुम नये नाम से जिन्दगी शुरू करना। पैसा तुम्हारे पास होगा। हर आराम भी तुम्हारे कदमों में होगा...।”
मीणा ने आँखों में आये आंसू पौंछे।
देवराज चौहान ने उसका कंधा थपथपाया और पलट कर जगमोहन की तरफ बढ़ गया।
मीणा ने गहरी सांस ली।
तभी गुप्ता कह उठा- “ये, इसका नाम देवराज चौहान है?”
मीणा ने गुप्ता को देखा।
“तुम इसे देवराज चौहान कह कर बुला रहे थे ना, इसलिए पूछा...।” गुप्ता जल्दी से कह उठा।
“हाँ, इसका नाम देवराज चौहान है, ये अच्छा इन्सान है।” मीणा ने सिर हिलाकर कहा।
“तुम्हारा दोस्त है?”
“नहीं...”
“रिश्तेदार है?”
“नहीं...”
“पुरानी पहचान का है?”
मीणा ने इन्कार में सिर हिलाया।
“तो तुम्हारा इसके साथ कोई रिश्ता नहीं है?”
“नहीं...”
“ये तो अभी, यहीं बैंक में मिला?”
“हाँ। इससे इतनी ही पहचान है।”
“अजीब बात है। तुम दोनों इस तरह बातें करते हो जैसे पुराना जानते हो एक-दूसरे को।”
“दिल मिलने की बात होती है। वैसे भी मैं पुलिस वाला हूँ, पेशेवर डकैत नहीं। ये बात देवराज चौहान ने महसूस कर...।”
“मुझे लगता है तुम उस पर काफी भरोसा कर रहे हो। वो तुम्हें सलाह देता है।”
“हाँ, वो ठीक बातें कहता है। अच्छी सलाह दे रहा है।”
मीणा वहीं कुर्सी पर बैठ गया।
“तुम उसे भी पैसा दोगे?” गुप्ता ने दूर जगमोहन के पास पहुँच चुके देवराज चौहान को देख कर कहा।
“नहीं।”
“तारा नाम की औरत सच में तुम्हारी पत्नी है?”
मीणा ने गुप्ता को घूरा।
“यूँ ही, यूँ ही पूछ रहा हूँ...।”
“तुम शुरू से ही सब देख-सुन रहे हो और तुम्हें अब तक भरोसा हो जाना चाहिये कि मेरी पत्नी सविता है।”
“वो तो मैं जानता हूँ।” गुप्ता ने सिर हिलाया- “फिर ये औरत तुम्हें अपना पति क्यों कह रही है?”
“ये पुलिस की ही चाल है कोई...।”
“ऐसा ही होगा।” गुप्ता गर्दन हिला उठा।
देवराज चौहान जगमोहन के पास कुर्सी पर बैठा तो जगमोहन कह उठा- “अब क्या हुआ?”
देवराज चौहान ने सारी बात बताई।
“मुझे समझ नहीं आता कि तुम इसे इन्दर प्रकाश मीणा क्यों मान रहे हो?” जगमोहन ने मुँह बनाकर कहा।
“क्योंकि ये मीणा ही है।”
“पता नहीं तुम किस आधार पर कह रहे हो। मेरी समझ से तो बाहर है...कि पुलिस कहती है मीणा सत्रह दिन पहले मर गया है।”
देवराज चौहान मुस्करा कर रह गया।
“तारा नाम की औरत के बारे में क्या कहोगे जो इसे सधीर दामले कह रही है और खुद को इसकी पत्नी करती है?”
“ये बात नहीं समझा मैं कि वो इसे अपना पति क्यों कह रही है?”
“पुलिस जानबूझ कर उसे...”
“तारा नाम की औरत भी गलत नहीं है। ये वो ही औरत है, जिसकी कार की साईड लगने से मीणा फुटपाथ पर जा गिरा था और जब वो कार के नम्बर के दम पर कार के मालिक के घर पहुंचा तो पता चला कि कार सुधीर दामले के नाम दर्ज है और ये औरत उसे ही सुधीर दामले कहने लगी। पड़ौसी भी आकर उसे सुधीर दामले ही कहने लगे, तब तारा ने उसे बहुत कहा कि वो उसकी पत्नी है। परन्तु मीणा उस औरत से खुद को बचा कर, वहाँ से चला आया था।”
“तुमने अभी कहा कि तारा नाम की औरत भी गलत नहीं है।”
“तो?”
“तो फिर गलत कौन है? तारा को भी तुम सही कह रहे हो और ये भी मानते हो कि ये सब-इंस्पेक्टर मीणा है।”
देवराज चौहान के चेहरे पर सोच के भाव आ रुके थे।
“दोनों ठीक हैं तो गलत कौन है? जबकि दोनों में से एक ही ठीक हो सकता है।”
“मुझे तो दोनों ही ठीक लगते हैं।”
“ये सम्भव नहीं कि दोनों अपनी जगह पर ठीक हों।” जगमोहन ने कहा- “मेरा ख्याल है कि ये सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है। सुधीर दामले ही है। क्योंकि पुलिस भी उसे मर गया कह रही है। कोई भी उसे मीणा मानने को तैयार नहीं है और...।”
“है तो ये मीणा ही...।” देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
“और तारा भी ठीक है, जो उसे अपना पति कह रही है?”
जगमोहन ने आँखें सिकोड़ कर कहा।
“शायद ऐसा ही कुछ है।”
“दोनों बातें एक साथ कैसे ठीक हो सकती हैं?”
“उलझा मामला है ये। बीच की बात हमारी समझ से बाहर है। कुछ ऐसा है जो हमें समझ नहीं आ रहा।” देवराज चौहान ने मीणा को देखकर कहा- “ऐसा मामला पहले कभी मेरी नजरों से नहीं निकला।”
“वो तुम पर भरोसा करता है।” जगमोहन बोला।
“हाँ। क्योंकि मैं उसे ठीक सलाह दे रहा हूँ। ये बात तो वो भी समझता है।” देवराज चौहान ने कहा।
“तुम उससे सहानुभूति है?”
“शायद।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो पहले से ही हालातों का मारा है और मैं चाहता हूं कि वो पैसा ले जाने में कामयाब रहे, ताकि अपना भविष्य सुधार सके। इस तरह अतीत की बातों को वो भूलने की कोशिश कर सकेगा।” देवराज चौहान ने कहा।
“तुम इसकी पत्नी किसे मानते हो?”
“सविता नाम की औरत को, जो कि दो महीने बाद कामराज से शादी करने जा रही है।”
“इस बात का यकीन तुमने मीणा की बातें सुनकर ही किया?”
“इन हालातों में मैंने ठीक बात महसूस की। जो मेरी समझ में आया, उसी हिसाब से मैंने ये बात कही है।”
“ऐसा है तो सविता एक बार भी मीणा से बात करने नहीं आई...”
“क्योंकि पुलिस के मुताबिक मीणा मर चुका है। यही बात सविता जानती होगी। वो लोग कहते हैं कि मीणा का अन्तिम संस्कार किया जा चुका है। मीणा जिन्दा नहीं हो सकता।”
“इस बात के बारे में तुम्हारा अपना क्या ख्याल है?” जगमोहन ने पूछा।
देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा, फिर बोला- “ये मीणा ही है।”
“तुम्हारा मतलब कि जिसका अन्तिम संस्कार किया गया, वो इन्दर प्रकाश मीणा नहीं था?”
“मुझे तो यही लगता है।”
“मैं नहीं मानता।”
“क्यों?”
“क्योंकि अन्तिम संस्कार के वक्त, जाने कितने लोगों ने मीणा के दर्शन किए होंगे। सब धोखा नहीं खा सकते कि सामने मरा पड़ा इन्सान मीणा ही है। मैं मानता हूं कि जिसका अन्तिम संस्कार किया गया, वो मीणा ही था।”
देवराज चौहान ने गुप्ता के पास बैठे मीणा को देखा और
विश्वास भरे स्वर में कह उठा- “वो सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही है। इस बात का मुझे पूरा भरोसा है।”
जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।
दूबे चेहरा ढापें टोपी के पीछ खुश था।
स्ट्रांग रूम से नोटों से भरे थैलों को लाया जा रहा था। जो कि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत से भरे पड़े थे। इनमें से आधी दौलत उसकी थी। वो बार-बार थैलों पर हाथ फेर रहा था और मन ही देवराज चौहान का शुक्रिया अदा कर रहा था कि उसने समझाया और उस पागल इन्सान को बात समझ आ गई, कि उसे नोटों की तरफ ध्यान देना चाहिये। यूँ दूबे कभी-कभी ये सोच कर गम्भीर हो उठता था कि क्या आगे ही सब कुछ ठीक रहेगा?
तभी दूबे ने मीणा को पुकारा।
“गुरु, इधर आ।”
मीणा गुप्ता के पास से उठा और दूबे के पास आ पहुँचा
“तेरे को ये सोच कर खुशी नहीं हो रही कि हम डेढ़ सौ करोड़ की दौलत को ले जा रहे हैं।” दूबे मुस्करा कर बोला।
“बहुत खुशी हो रही है।” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा।
“ऐसे पांच थैले हैं?”
“हाँ...”
“ये पाँचों तो किसी तरह वैन में आ ही जायेंगे। तू क्या कहता है?”
“वैन में आ जायेंगे।” मीणा ने कहा।
“कुछ सोचा है तूने कि इतनी बड़ी दौलत को कहाँ रखेगा?”
दूबे ने व्याकुल स्वर में पूछा- “तेरे को पहले से ही कोई जगह तय कर लेनी चाहिये थी कि दौलत को वहाँ रखेगा।”
“अब कोई जगह देख लूंगा।”
“मतलब कि इस बारे में तूने कुछ भी नहीं सोचा?”
“नहीं...!”
“संभल कर जाना। अगर पीछे पुलिस पड़ गई तो क्या करेगा?”
मीणा के चेहरे पर सोच के भाव उभरे। फिर बोला- “मैं अपने साथ एक बंधक ले के जाऊँगा।”
“एक?”
“वैन में दो की जगह नहीं होगी। पीछे तो थैलों से जगह भर जायेगी। आगे एक ही सीट खाली...।”
“मेरी मान तो मैनेजर को बंधक बना के ले...।”
“देवराज चौहान को ले जाऊँगा।”
“देवराज चौहान को?” दूबे चौंका- “वो तेरी सारी दौलत छीन लेगा।”
“मैं सतर्क रहूंगा। मेरे पास रिवाल्वर है। वैसे लगता नहीं कि देवराज चौहान ऐसा कुछ करेगा।”
“वो डकैती मास्टर देवराज चौहान है, तेरे जैसों को तो वो चुटकी से ठिकाने लगा देता होगा।”
मीणा के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।
“गुरु, देवराज चौहान को अपने साथ मत ले। वो जीता-जागता खतरा है दौलत के लिए।”
“देवराज चौहान मुझे ठीक सलाह देगा कि आगे मैं क्या करूं?”
“वो तेरे को मार कर, दौलत ले उड़ेगा।” दूबे ने समझाने की कोशिश की।”
“ये खतरा तो हो सकता है।” मीणा सोच भरे स्वर में कह उठा।
“मेरी मान तो बैंक मैनेजर को बंधक बनाकर अपने साथ ले जाना। देवराज चौहान तो तेरा बिस्तरा गोल कर देगा।” मीणा सिर हिलाकर बोला “सोचता हूँ।”
“अब तो तेरे को कोई काम नहीं। यहाँ से निकल जाने को तैयार है?”
“हाँ। अब कोई काम नहीं बचा।” मीणा के चेहरे पर गुस्से और कड़वे भाव उभर आए।
“वैसे हुआ क्या फोन पर?”
“कमिश्नर पाटिल हरामजदगी पर उतर आया।” गुर्ग उठा मीणा- “उल्लू का पट्टा...।”
“किया क्या उसने, तू तारा-तारा कुछ कह रहा था...।” मीणा ने दूबे को बताई सब बात।
“गुरु, एक बात तो बता।” दूबे धीमें स्वर में कह उठा-तू आखिर है कौन?”
मीणा ने दूबे को घूरा।
“गुस्सा मत किया कर। मेरी बात का जवाब दे कि...”
“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ कमीने...।” मीणा ने खा जाने वाले स्वर में कहा।
“तू तो मुझे भी बेवकूफ बनाने में लगा है।” दूबे ने गहरी सांस ली।
“साले-कमीने, मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ तो हूँ। तू क्यों... ।”
“चल छोड़ इस बात को...।” दूबे ने जैसे बात खत्म करनी चाही।
“उल्लू का पट्ठा है तू।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “पहले तू मेरे तलवे चाटा करता...।”
“वो तू नहीं था। सब इंस्पेक्टर मीणा था। मैंने तेरे तलवे कभी नहीं चाटे।” दूबे ने अपनी बात पर जोर देकर कहा।
“मैं ही सब-इंस्पेक्टर...”
“खत्म कर इस बात को।” दूबे हाथ हिलाकर बोला- “याद रखना कि बंधक के तौर पर अपने साथ देवराज चौहान को नहीं, मैनेजर को ले जाना। देवराज चौहान तो तेरा काम कर देगा और नोट ले भागेगा। वो बहुत बड़ा डकैती मास्टर है और यहाँ डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है। हरामी है वो। तेरे से प्यार से पेश आकर मौका ढूंढ रहा है, हमारा गला काटने का। अब सब बातें छोड़ और नीचे बेसमेंट में जाकर देख कि अभी तक वो स्ट्रांग रूम से तीसरा थैला क्यों नहीं लाये...”
मीणा ने कुछ नहीं कहा और पलट कर बेसमेंट की सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
इसी पल फोन की बेल बज उठी। मीणा ठिठका और गर्दन घुमा कर गुप्ता को देखा, जो कि रिसीवर उठाने जा रहा था।
गुप्ता ने रिसीवर उठाया। बात की, फिर कान से रिसीवर हटाकर, मीणा को इशारा किया।
मीणा फौरन पास जा पहुँचा। गुस्से भरे अंदाज में रिसीवर कान से लगाकर कहा-
“अब कौन सा नया बम छोड़ने जा रहे हो कमिश्नर...?”
“मैं हूँ, तारा, आपकी पत्नी...।” तारा का भर्राया स्वर कानों में पड़ा- “आपको क्या हो गया है जो...।”
‘चुप कर साली!” मीणा दाँत पीस कर गुर्रा उठा- “मैं तेरा सिर फोड़ दूंगा। जबर्दस्ती की मेरी पत्नी बन रही है। तेरी चाल में सफल नहीं होने दूंगा। पुलिस के कहने पर तू मुझे फांस कर बाहर बुलाना चाहती...”
“ये कैसी बातें कर रहे हैं आप? मैं आपकी तारा हूं तारा, आप पहचानते क्यों नहीं मुझे...।”
“क्योंकि मैं तेरे को नहीं जानता.......।”
“आपके सिर में चोट लगी है, इस वजह से याददाश्त...।”
“याददाश्त भूल जाने से कोई अपने को सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं कहने लगता। किसी दूसरी औरत को अपनी पत्नी नहीं कहता। किसी दूसरे घर को अपना घर नहीं कहने लगता।” मीणा क्रोध भरे स्वर में कह रहा था- “मुझे सिर में तो क्या कहीं भी चोट नहीं लगी। तेरी ये चाल नहीं चलने वाली। पुलिस को भी समझा देना कि...।”
“ये आप क्या कह रहे.....”
“भाड़ में जा साली...।” मीणा ने गुर्राकर कहा और रिसीवर वापस रख दिया।
गुप्ता गर्दन उठाये उसे देख रहा था।
लाला फिर कुर्सी से उठा और टांग को दो-तीन बार झटका देकर टहलने लगा।
तभी मीणा ने बैंक कर्मचारियों को देखा, जो कि तीसरा नोटों से भरा थैला सीढ़ियों से ऊपर ला रहे थे। मीणा फौरन आगे बढ़ा और रिवाल्वर जेब में रखकर, थैला लाने में सहायता करने लगा।
“ऐ सुन!” मीणा ने टहलते लाला को आवाज लगाई- “जरा हाथ लगा...”
लाला ने उस तरफ देखा, फिर इन्कार की मुद्रा में हाथ हिला दिया।
“उल्लू का पट्ठा...।” मीणा बड़बड़ा उठा।
“मैं आऊँ?’ कुर्सी पर बैठा जगमोहन ऊँचे स्वर में कह उठा।
“तू, नहीं...बिलकुल नहीं...।” थैला संभाले मीणा बोला परन्तु जगमोहन उस तरफ बढ़ गया।
“वापस जा। मैं तेरे से कुछ नहीं चाहता।” मीणा ने कहा।
“कलप क्यों रहा है...।’’ पास पहुँच कर जगमोहन थैले को सहारा देता कह उठा- “मुफ्त में ये काम कर रहा हूँ...।”
“मुफ्त में? मुझे तो तू कमीना लगता है।’
“जुबान संभाल।” जगमोहन ने उखड़े स्वर में कहा- “सिर फोड़ दूंगा।”
“पुलिस वाले को धमकी देता है?” मीणा ने कठोर स्वर में कहा।
बातें करते हुए वे थैले उठाये, वहाँ रखे दो थैलों की तरफ वे सरकते जा रहे थे। बैंक कर्मचारी भी मेहनत के साथ भारी थैले को संभाले हुए थे। मीणा की बात पर, जगमोहन कह उठा- “बाहर मौजूद पुलिस वाले तुझे पुलिस वाला मानने से इन्कार कर रहे हैं।”
“देवराज चौहान मानता है कि मैं मीणा ही हूँ...।”
“इस बारे में देवराज चौहान के साथ मेरे विचार नहीं मिलते...”
“मतलब कि तू मुझे सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा नहीं मानता?”
“नहीं...”
“भाड़ में जा...।”
उन सबने मिलकर तीसरे थैले को, पहले रखे बाकी दोनों थैलों के पास रख दिया।
“अब जल्दी से बाकी के दोनों थैले लाओ...।” मीणा तेजी से सांसें लेता कह उठा।
बैंक कर्मचारी पलट कर बसेमेंट की सीढ़ियों की तरफ बढ़ गये।
“मैं भी जाऊँ उनके साथ?” जगमोहन ने मीणा से कहा।
“नहीं... तू...”
“मुफ्त में...”
मीणा ने गहरी सांस ली, फिर सिर हिलाकर कह उठा- “तू बोत चालू चीज लगता है। खैर जा, तेरे को नोटों से भरे थैले को हाथ लगाकर खुशी मिलती है तो खुश हो ले।”
जगमोहन तेजी से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
मीणा वहीं खड़े हर तरफ देखने लगता। चेहरे पर गम्भीरता दिखाई दे रही थी। फिर देवराज चौहान की तरफ बढ़ गया। रास्ते में टहलता लाला टकराया तो ठिठक कर बोला- “थैले को हाथ लगाने के लिए मैंने तुझे बुलाया तो तू आया क्यों नहीं?”
“मेरी टांगें काम नहीं करतीं। अपना ही बोझ उठा लूं, ये ही बहुत है। नोटों का बोझ कैसे उठाऊँगा...।” लाला बोला।
“जाने से पहले मैं तेरे को एक डाक्टर का पता बताऊँगा। वो ठीक कर देगा। सावी को भी एक बार ऐसी ही तकलीफ हुई थी। उस डाक्टर ने दस दिन में ठीक कर दिया था।” मीणा ने कहा।
“बता तो, कौन सा डाक्टर है?”
“डाक्टर मनोचा, वो...।”
“बांद्रा ईस्ट में जो है?” लाला कह उठा।
“वो ही, वो ही...”
“वो कमीना तो चोर है। मैं गया था उसके पास, दो महीने इलाज कराया। मोटी-मोटी रकमें वसूलीं। अपने पास से ही दवा की पुड़िया बनाकर देता था। जरा भी फर्क नहीं पड़ा...।” लाला ने मुँह बना कर कहा।
“अच्छा, पर सावी को तो उसने ठीक कर दिया था।”
लाला ने कुछ नहीं कहा और पुनः टहलने लगा।
मीणा देवराज चौहान के पास खाली पड़ी कुर्सी पर जा बैठा।
“मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ...।” मीणा बोला।
“क्या?” देवराज दौहान ने उसे देखा।
“मैं जब दौलत लेकर जाऊँगा तो तुम्हें साथ ले जाऊँगा।”
“मुझे?”
“हाँ। मैं तुम्हें साथ ले जाना चाहता हूँ। क्योंकि मेरे पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत होगी और मुझे नहीं पता कि मैं दौलत को कैसे संभालूंगा। तुम मेरे साथ रहोगे तो मुझे हौसला रहेगा।”
“ठीक है। तुम चाहते हो तो मैं ऐसा ही करूँगा।”
“पुलिस को ये ही बताया जायेगा कि मैं तुम्हें बंधक बनाकर अपने साथ ले जा रहा हूँ...।”
देवराज चौहान ने सिर हिला दिया। फिर बोला-
“डेढ़ सौ करोड़ को किसमें लाद कर ले जाओगे?”
“बाहर मारुति ओमनी वैन खड़ी है, जो कि पीछे से खाली है। सब सीटें उखाड़ रखी हैं। सिर्फ आगे ही दो सीटें हैं। उस वैन में ये पाँचों थैले आ जायेंगे। हम आगे बैठेंगे।” मीणा ने बताया।
“मेरी मानो तो एक बंधक और साथ ले लो।”
“वैन में जगह नहीं होगी तीसरे के लिए...।”
देवराज चौहान के चेहरे पर सोचें नाच रही थीं। बोला- “तुम क्या समझते हो...कि पुलिस तुम्हारे पीछे नहीं आयेगी...?”
“दूबे यहीं पर रहेगा और इसके निशाने पर यहाँ के सारे लोग होंगे। पुलिस से कह दिया जायेगा कि अगर उन्होंने मेरा पीछा करने या मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की तो बैंक में सब को मार दिया जायेगा।”
“फिर भी पुलिस कोशिश करेगी कि तुम्हारा पीछा किया जा सके...।”
“मैं पुलिस को तुमसे बेहतर जानता हूँ। वो कोशिश करेगी तो एक-दो बार धमकी और देने से वो पीछे हट जायेगी।”
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा कर कश लिया, फिर कहा- “डेढ़ सौ करोड़ को तुम कहाँ ले जाना चाहते हो?”
“पता नहीं। मैंने कोई जगह नहीं सोच रखी...।”
देवराज चौहान ने मीणा को घूरा, फिर कहा-
“तुमने कोई जगह तय नहीं कर रखी कि दौलत को कहाँ ले जाना है?”
“नहीं...”
“बहुत बड़े बेवकूफ हो। ये सब बात तय करके ही तुम्हें काम शुरू करना चाहिये था।”
“मैं तुम जैसा घिसा हुआ डकैती मास्टर नहीं हूँ। साधारण इंसान हूँ, पहले ये सब बातें नहीं सोच सका। मैंने तो यूँ ही गुस्से में यहाँ आकर बैंक पर कब्जा जमा लिया था कि कोई मुझे सब इंस्पेक्टर मीणा नहीं मान रहा। तब मन ही मन कामराज और सावी को गालियाँ दे रहा था। ध्यान नहीं रहा कि इस बारे में भी सोचूं...।”
देवराज चौहान ने कश लिया।
“तुम मेरी सहायता करोगे ना?” मीणा ने देवराज चौहान को देखकर कहा।
“जहाँ तक सम्भव हो सका, करूँगा। परन्तु कोई ठिकाना ना होने की वजह से तुम और दौलत मुसीबत में पड़ सकते हो। ऐसे में तुम्हारे साथ रहना भी खतरनाक हो सकता है मेरे लिए...।”
देवराज चौहान ने कहा।
“क्या तुम्हारे पास कोई ठिकाना नहीं है कि जहाँ दौलत रखी जा सके?”
“किसी और के लिए मेरे पास ठिकाना नहीं है। ऐसे कामों के लिए मैं बाद की प्लानिंग पहले ही तैयार करके रखता हूँ।”
“मेरे से ये गलती हो गई।”
“ये बहुत बड़ी गलती है।”
“मुझे यकीन है कि तुम मेरे साथ रहोगे तो मुझे मुसीबत में नहीं फंसने दोगे।”
कुछ पलों तक दोनों में खामोशी रही। फिर मीणा कह उठा- “दूबे नहीं चाहता कि मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँ?”
देवराज चौहान ने मीणा को देखा।
“वो...।” मीणा हिचक कर बोला- “कहता है कि तुम्हारी नीयत बदल सकती है। ये डेढ़ सौ करोड़ की दौलत का मामला है। वो कहता है कि मैं मैनेजर को बंधक बनाकर साथ ले जाऊँ लेकिन इस मौके पर मैं तुम्हें अपने साथ रखना चाहता हूँ।”
देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
“तुम्हारी नीयत तो नहीं बदलेगी ना देवराज चौहान?” मीणा गम्भीर स्वर में कह उठा।
“ये पैसा तुम्हारी मेहनत का है और मेरी नीयत मरते दम तक नहीं बदलेगी। भरोसा रखो। मैं दिल से तुम्हारी सहायता करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम जिन्दगी से पहले से ही परेशान हो। मैं चाहता हूँ कि दौलत के साथ तुम खुश रहो।”
“तुम...तुम कितने अच्छे इन्सान हो।” मीणा की आँखों में पानी चमक उठा।
दूबे ने वहाँ पड़े तीनों थैलों को थपथपाया। वो खुश था और बार-बार अपनी टोपी से ढका गाल खुजला रहा था। उसने एक तरफ बैठे बैंक के चौकीदार को देखा, फिर उसके पास जा पहुंचा।
“डेढ़ सौ करोड़ की दौलत बैंक के बाहर जाने वाली है।” दूबे ने कहा।
चौकीदार ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं।
“तुम्हें तकलीफ तो हो रही होगी?”
‘नहीं। मुझे कोई तकलीफ नहीं...।”
“तुम पहले से ही हार्ट के मरीज हो। कुछ करने की मत सोच लेना। वरना तीसरा अटैक भी हो जायेगा।”
“मैनेजर साहब की देख-रेख में बैंक लूटा जा रहा है, तो मुझे बीच में आने की क्या जरूरत है।” चौकीदार बोला।
“ये बात तो तूने ठीक कही।”
“बाहर पुलिस है... तुम लोग कैसे निकलोगे?”
“तू फिक्र में पतला मत हो। वो हम देख लेंगे।” दूबे ने रिवाल्वर वाला हाथ हिलाकर कहा।
मीणा कुर्सी से उठा और टहलने लगा।
लाला अभी-अभी वापस अपनी कुर्सी पर आ बैठा था।
तभी कुत्ते वाली औरत मीणा से कह उठी- “तुम लोग बैंक का पैसा लेकर जा रहे हो?”
“हाँ...” मीणा ने उसे देखा
“ये ठीक कर रहे हो।” वो बोली- “कितनी देर में तुम लोग चले जाओगे?”
“क्यों?”
“मैं सोच रही हूँ कि अगर तुम अभी दस-पन्द्रह मिनट में निकल जाओगे तो मैं घर जाकर, जल्दी से तैयार होकर डेट पर जा सकती हूँ। पार्लर का वक्त तो मिलेगा नहीं। क्या तुम मुझे अभी जाने दे सकते हो?”
“चुपचाप बैठी रहो...।” मीणा ने मुँह बनाकर कहा।
“कैसे मर्द हो तुम! खूबसूरत औरत से बात करना भी नहीं आता।” वो झल्ला कर कह उठी।
“खूबसूरत औरतें ही मुसीबतें खड़ी करती हैं, जैसे सावी ने मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर रखी है।” मीणा गुस्से से कह उठा।
“तुम्हारी पत्नी तो अपने आशिक से शादी करने जा रही है, मैं शादी थोड़े ना कर रही हूँ। एक रात की तो बात है फिर...।”
“चुप हो जाओ।” मीणा गुस्से से ऊँचे स्वर में कह उठा। कुत्ते वाली फिर नहीं बोली।
मीणा, गुप्ता के पास पहुँचा और खाली पड़ी कुर्सी पर जा बैठा।
“जा रहे हो?” गुप्ता कह उठा।
“हाँ...”
तभी बैंक के कर्मचारी और जगमोहन चौथा थैला संभाले, ऊपर आ पहुँचे।
“शाबाश!” दूर खड़ा दूबे कह उठा- “ले आओ यहाँ...मैं जानता हूँ भारी है, पर हिम्मत मत हारो, ले आओ।”
“ये बात तो स्पष्ट हुई नहीं कि तुम मीणा हो या सुधीर दामले?” गुप्ता ने कहा।
“उल्लू के पट्टे, मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...”
“मुझे तो यही लगता है, परन्तु पुलिस नहीं मानती।”
“अब मैं पुलिस की परवाह नहीं करता।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “भाड़ में जाये पुलिस! कामराज के इशारे पर पुलिस काम कर रही है। तभी वों मुझे मीणा मानने को तैयार नहीं। नहीं तो ना सही। मुझे दौलत की तरफ ध्यान देना चाहिये। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत से सारी जिन्दगी ऐश से बिताई जा सकती है।”
“इसमें तुम्हारे साथी का भी हिस्सा होगा...।”
“आधा। तब भी बहुत है।”
“तुम्हें उस औरत से इस तरह बात नहीं करनी चाहिये थी।” गुप्ता बोला।
“किस औरत की बात कर रहे हो?” तीखी नजरों से मीणा ने गुप्ता को देखा
“वो, जो फोन पर तुम्हें अपना पति कह रही है, तारा नाम...।”
“वो झूठी है। फरेबी है। पुलिस की चाल है, जो उसे बात करने को आगे कर रखा है।”
“फिर भी तुम्हें उससे प्यार से बात करनी...।”
तभी मैनेजर गुप्ता का मोबाईल फोन बज उठा।
“हैलो!” गुप्ता ने मोबाईल फोन पर बात की।
“आप ठीक तो हैं?” उधर गुप्ता की पत्नी थी।
“मेरी पत्नी है।” गुप्ता ने मीणा से कहा, फिर फोन पर बोला- “मैं ठीक हूँ।”
“एक-आध बार बैंक के बाहर का चक्कर भी लगा लीजिये।”
“क्यों?”
“बैंक के बाहर टी. वी. वाले भी खड़े हैं। आप बाहर आयेंगे तो वो आप की तस्वीर लेकर टी. वी. पर दिखायेंगे। मैं आपको टी.वी. पर देख लूंगी। पूरे मोहल्ले में मेरा रौब हो जायेगा।”
“भाग्यवान...।” गुप्ता गहरी सांस लेकर बोला- “इधर बैंक में खेल नहीं हो रहा, जो तुम मुझे टी. वी. पर आने को कह रही हो। बैंक पर कब्जा करने वाले लोगों ने सब पर हथियार तान रखे हैं और...”
“आप तो बहुत बहादुर हैं। एक बार आपने एक बदमाश को पकड़ लिया था जो मेरे गले से सोने की चेन खींच कर आ रहा था। अब भी आप थोड़ी बहादुरी दिखाईये और बैंक डकैतों को पकड़ लीजिये। फिर आप की बहादुरी के किस्से टी. वी. पर हमारे सब रिश्तेदार देखेंगे। हमारा इन्टरव्यू...।”
“भाग्यवान...।” गुप्ता ने गहरी सांस ली।
“हाँ...”
“यहाँ पर कोई खेल नहीं हो रहा। सबकी जानें फंसी हुई हैं। बाहर भारी संख्या में पुलिस...”
“आप तो बहादुर हैं। फिर...।”
“वो बदमाश को पकड़ने की बहादुरी जब मैंने दिखाई थी, तब मैं चालीस का था। अब रिटायरर्ड होने वाला हूँ। चलता हूँ तो हड्डियों में आवाज आती है। तू मुझे हवा मत दे। कोई फायदा नहीं। तुम तो...”
“मैं वहाँ होती तो डकैतों पर काबू पा लेती। मैं तो अभी भी आप को जवान समझती थी।”
“तू मुझे बूढ़ा समझना शुरू कर दे। फोन बंद कर। बहुत हो गया। रात के लिए कोफ्ते बना के रखना।”
“डाक्टर ने कोफ्ते खाने को मना कर रखा...।”
“तू ही बता, डाक्टर ने कोफ्ते खाने को मना कर खा है और तू कहती है कि मैं डकैतों को पकड़ लूं।”
उधर से गुप्ता की पत्नी ने फोन बंद कर दिया।
गुप्ता ने गहरी सांस लेकर मीणा को देखा, फिर फोन जेब में रख लिया।
मीणा उसे ही देख रहा था, फिर कह उठा- “तो तुम मुझे पकड़ लेने की सोच रहे हो...।”
“मेरी बीवी चाहती है कि ऐसा करके मैं टी.वी. पर आ जाऊँ! गुप्ता ने गहरी सांस ली- “बेवकूफ है वो।”
मीणा ने जेब से रिवाल्वर निकाल कर हाथ में ले ली।
“मैं कुछ नहीं करूँगा। मेरी बीवी तो ऐसे ही कह रही थी। मैं उसकी बातों में नहीं आने वाला।”
“मेरा साथी कह रहा है कि दौलत के साथ, तुम्हें बंधक बनाकर साथ ले जाऊँ....।” मीणा बोला।
“क्या कहते हो?’ गुप्ता बेचैन हुआ- “मैं तो बूढ़ा हो रहा हूँ। किसी और को साथ ले जाओ...।”
“किसे?”
“किसी को भी...।” गुप्ता व्याकुल सा मीणा को देखने लगा।
मीणा ने देवराज चौहान को देखकर कहा-
“उसे ले जाऊँ, देवराज चौहान को?”
“वो...वो ठीक रहेगा।” गुप्ता ने फौरन कह दिया।
मीणा मुस्करा कर रह गया, फिर बोला- “मेरा साथी यहीं रहेगा।”
“क...क्यों?”
“ताकि अगर पुलिस बाहर मेरा पीछा करे, मुझे पकड़ना चाहे तो मेरा साथी तुम सब को मार सके।”
“ओह...। लेकिन तुम्हारे साथी को कैसे पता चलेगा कि पुलिस तुम्हारे पीछे है या कब उसने सबको मारना है...।”
“मेरे साथी और मेरे पास मोबाईल फोन हैं। हम फोन पर बातें करते रहेंगे।”
“अच्छा...।” गुप्ता ने समझने वाले ढंग में सिर हिलाया।
“जानते हो मैंने ये बातें तुम्हें क्यों बताई?”
“क...क्यों?”
“ताकि तुम पुलिस को ये सब समझा सको। समझ गये...।”
गुप्ता ने सहमति से सिर हिलाया।
“मैं दौलत लेकर यहाँ से चला भी जाऊँ तो तुमने पुलिस को ये सब बातें याद रखवानी हैं। कहीं ऐसा ना हो कि पुलिस मुझे पकने या गोली मरने की गलती कर दे...और इधर मेरा साथी तुम सब को मार दे।”
“म...मैं पुलिस को तुमसे दूर रखने की पूरी कोशिश करूँगा।” गुप्ता ने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर कहा।
“इसी में हम संबका भला है।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा और उठ खड़ा हुआ।
गुप्ता ने बेचैनी से पहलू बदला।
मीणा बेसमेंट में जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया। हाथ में रिवाल्वर थी।
“जल्दी ला आखिरी थैला भी...।” पीछे से दूबे ने ऊँचे स्वर में कहा।
मीणा बेसमेंट की सीढ़ियां उतरता चला गया।
देवराज चौहान से चार कदम दूर कुर्सी पर बैठा लाला कह उठा- “ये सब कब तक चलेगा देवराज चौहान?”
“अभी वक्त लगेगा।”
“ये तो नोट लेकर जाने वाले हैं।”
“हाँ। परन्तु एक यहीं रहेगा।”
“रात को मेरी बेटी कनाडा से आ रही है। मैंने उससे वादा किया था कि उसे लेने एयरपोर्ट आऊँगा।”
“शायद तुम एयरपोर्ट ना जा सको।” देवराज चौहान कह उठा।
“मैं तो सुबह बहुत जल्दी में था कि तुम्हारे ढाई करोड़ देकर, मैं अपने बाकी के काम कर सकूँ। आज बहुत काम थे। परन्तु अब तो सारे काम भूल चुका हूँ। बस, यहाँ से निकल जाना चाहता हूँ। तुम्हें वो मीणा जानता है?”
“यहीं पर पहचान हुई।”
“उसे पता है कि तुम डकैती मास्टर हो?”
“हाँ, अब पता है।” देवराज चौहान ने लाला को देखा।
“वो शायद तुम्हारी बात मान लेगा। मुझे यहाँ से बाहर निकलवा दो।” लाला बोला।
“वो अभी तक मेरी बातें इसलिये मान रहा है कि मैं उसे सही सलाह दे रहा हूँ। जब उसे महसूस होगा कि मैं उसे गलत सलाह देने लगा हूँ तो वो मेरी बातों को सुनना बंद कर देगा।”
देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “और मेरे कहने से भी वो तुम्हें बाहर नहीं जाने देगा। वो बेवकूफ नहीं है।”
तभी लाला उठा। टांग को थोड़ा सा ऊपर उठाकर दोबारा झटका दिया। फिर पुनः चहलकदमी शुरू कर दी।
तभी फोन बजने लगा।
देवराज चौहान ने गुप्ता को रिसीवर उठाते देखा, फिर वो फोन पर बातें करने लगा था।
देवराज चौहान ने दूबे पर नजर मारी। वो अभी तक टोपी से चेहरा ढांपे था और बार-बार खुजला रहा था गालों को। उसकी सिर्फ आंखें ही नजर आ रही थीं। दूबे खुशी से भरी नजरों से नोटों से भरे बैगों के पास चला जाता तो कभी उन्हें छूकर देखता। चौकीदार एक तरफ बैठा था।
कुत्ते वाली औरत कुत्ते को गोद में लिए कुर्सी पर बैठी थी। शान्ति थी बैंक में।
गुप्ता अभी तक बातें कर रहा था फोन पर।
तभी दूबे देवराज चौहान के पास आया और खुशी भरे स्वर में कह उठा- “मैं गुरू से कहूँगा कि काम हो जाने के बाद तुम्हें एक करोड़ तो जरूर दे दे।”
देवराज चौहान जवाब में मुस्कराया।
“पचास लाख तुम्हें मैं अपने हिस्से में से दूंगा।”
“ये कहने का शुक्रिया। पर मुझे पैसा नहीं चाहिये।” देवराज चौहान बोला।
“नहीं चाहिये?”
देवराज चौहान ने इन्कार में सिर हिलाया।
“तुम्हें मुफ्त का डेढ़ करोड़ मिल रहा ...।”
“मेरे पास पैसा बहुत है। और इस तरह मैं किसी से पैसा लेता भी नहीं। ये तुम दोनों की मेहनत का पैसा है। इस पर मेरा हक नहीं बनता। इस दौलत में से मैं एक पैसा भी नहीं लूंगा।”
“ये तुम्हारा आखिरी फैसला है?”
“हाँ...”
“तुम्हारी मर्जी। फिर भी तुम्हारा मन करे तो कह देना। डेढ़ करोड़ तुम्हें मिल जायेगा।”
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।
दूबे थैलों की तरफ बढ़ गया था। तभी वो सब पाँचवां नोटों से भरा थैला लेकर सीढ़ियों से ऊपर आ पहुंचे।
“शाबाश! शाबाश! शाबाश!” दूबे प्रसन्नता से ऊँचे स्वर में कह उठा- “ले आओ, ये आखिरी है। मैं जानता हूँ कि इतने भारी थैले उठाकर तुम बहुत थक गये हो। अब आराम करना। कोई काम नहीं है और...”
बैंक के कर्मचारी, मीणा, जगमोहन, सबने थैले को सहारा देकर ऊपर उठा रखा था। और उस थैले को भी, उन चारों थैलों के पास ला पटका और गहरी-गहरी सांसें लेने लगे।
मीणा रिवाल्वर थामे जगमोहन से बोला- “तुम जाओ और कुर्सी पर बैठ जाओ।”
“कम से कम थैक्यू तो कह दो। मुक्त में काम किया है तुम्हारा।” जगमोहन ने कहा।
“मैंने बुलाया नहीं था। तुम खुद ही काम करने आगे आये थे...।”
“ये तो तुम थप्पड़ मार रहे हो...।” जगमोहन ने नाखुश स्वर में कहा।
“जाओ...।”
जगमोहन शराफत के साथ देवराज चौहान की तरफ बढ़ गया।
“मीणा साहब...।” गुप्ता की आवाज सुनाई दी।
मीणा ने गुप्ता को देखा तो गुप्ता ने रिसीवर ऊपर करके दिखा दिखा दिया।
मीणा ने सिर हिलाया, फिर बैंक के कर्मचारियों से बोला-
“कुछ आराम कर लो। अगले कुछ मिनटों में इन थैलों क बाहर खड़ी वैन में रखना है। चिन्ता मत करो। अब ज्यादा मेहनत का काम नहीं है। वैन को मैं कैंची गेट के बाहर सीढ़ियों के पास लगा दूंगा। जाओ, पानी वगैरह पी लो...।”
बैंक के सारे कर्मचारी काउंटर के पीछे मौजूद अपनी कुर्सियों की तरफ बढ़ गये।
मीणा, गुप्ता के पास जा पहुंचा।
“किसका फोन है?” मीणा ने पूछा।
“कमिश्नर साहब का। मैंने वो सब बातें बता दी, जो तुमने कही थीं।” गुप्ता ने कहा।
“अच्छी तरह समझा दीं?’’ मीणा ने गुप्ता से रिसीवर लेते हुए कहा।
“हाँ...।” साथ ही गुप्ता ने सिर हिलाया।
मीणा ने रिसीवर अपने कान से लगाया और कुर्सी पर बैठ गया।
“बोल कमिश्नर।”
“तुम बैंक की दौलत लेकर जा रहे हो?” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“हाँ...मैं...।”
“मैनेजर ने मुझे बता दिया है सब कुछ।” पाटिल का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा- “उसने मुझे बताया कि तुम्हारा साथी बैंक में ही रहेगा और सब को बंधक बनाए रखेगा।”
“ताकि मैं दौलत के साथ सुरक्षित निकल सकूँ। तुम लोग मुझे पकड़ने या गोली मारने की कोशिश...”
“ऐसा कुछ नहीं होगा। मैं तो खुद चाहता हूँ कि...।”
“कमिश्नर, जो कह रहा हूँ, तू सिर्फ वो ही सुन...।”
“हाँ...”
“मैं अपने साथ एक को बंधक बनाकर ले जाऊंगा। ताकि अगर मेरा पीछा किया जाये, या मुझे पकड़ने की चेष्टा की जाये तो मैं उस बंधक के सिर में गोली मार सकूँ।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा।
“ऐसा कुछ नहीं होगा...तुम...।”
“नहीं होगा तो अच्छी बात है। आगे सुनो। मेरे पास और मेरे साथी के पास मोबाईल फोन हैं। हम फोन पर एक दूसरे से बातें करते रहेंगे। जहाँ भी मुझे खतरा दिखा, तो मैं अपने साथी से कह दूंगा कि वो बैंक में मौजूद सबको मार दे, और वो मार देगा। तब सबका खून पुलिस के सिर पर होगा।”
“ऐसा कुछ नहीं होने वाला। पुलिस तुम्हारे पीछे नहीं आयेगी।”
“आई तो जो होगा, तुम्हें बता चुका हूँ-और पुलिस मुझे ढूंढने की भी कोशिश नहीं करेगी।”
“ठीक है, आगे कहो।” कमिश्नर पाटिल का स्वर शांत था- “तुम्हारा साथी बैंक से कब निकलेगा सबको छोड़ कर?”
“जब वो ठीक समझेगा, निकल जायेगा। अब हम यहाँ से चले जाना चाहते हैं।” मीणा ने कहा।
“तुम लोगों को जाने का रास्ता साफ मिलेगा।”
“रास्ता साफ नहीं मिला तो पुलिस को लाशें उठानी पड़ेंगी। फैसला तुम पर है।”
“तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। कोई पीछे नहीं आयेगा तुम्हारी पत्नी मेरे पास ही खड़ी है।”
“तुम तारा की बात कर रहे हो।” मीणा का स्वर कड़वा हो गया।
“हां, वो तुम्हारी पत्नी...”
“बकवास मत करो। तुम भी अच्छी तरह जानते हो कि वो मेरी पत्नी नहीं है।
मीणा गुर्राया
“वो तुम्हें अपना पति कह रही ...।”
“सुना नहीं, चुप हो जाओ।” मीणा गुस्से से कह उठा पाटिल की आवाज नहीं आई।
“तुम मुझे सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा मानने को तैयार हो या नहीं?”
“सब-इंस्पेक्टर मीणा मर चुका है। मैंने बहुत अच्छी तरह पता की है ये बात और तुम मीणा हो ही नहीं सकते...।”
“भाड़ में जाओ! मैं बाहर आ रहा हूँ। पुलिस वालों को समझा के रखना कि...”
“सब ठीक रहेगा। मुझ पर भरोसा रखो...।”
मीणा ने रिसीवर रख दिया।
“क्या तुम सच में बाहर जा रहे हो?” गुप्ता बोल पड़ा।
“हाँ।”
“नोटों से भरे सब थैले भी, ले जा रहे हो?”
“तुम्हें तकलीफ है क्या?”
“न...नहीं। ले जाओ तुम...।” गुप्ता ने तुरन्त कहा।
मीणा पलट कर देवराज चौहान के पास जा पहुंचा।
“चलें?” मीणा ने देवराज चौहान से पूछा।
“मैं तैयार हूँ...।”
“मैं भी साथ चलूँ?” जगमोहन फौरन कह उठा।
“तुम तो बिलकुल भी नहीं। मुझे तुम पर जरा भी भरोसा नहीं है।” मीणा तीखे स्वर में कह उठा।
“मैं मुफ्त में तुम्हारे काम आ सकता...।”
“तुम्हें मुफ्त में क्या, दस लाख साथ दो, तो तब भी ना ले जाऊँ।” कहकर मीणा पलट कर दूबे की तरफ बढ़ता कह उठा- “गेट खोल, मैं यहाँ से दौलत के साथ निकल जाना चाहता हूँ।”
दुबे की चमकती आँखें बता रही थीं कि वो खुश हो चुका है। उसने जल्दी से जेब से चाबी निकाली और कैंची गेट की तरफ बढ़ गया। मीणा थैलों के पास पहुँच कर ऊँचे स्वर में बोला- “बैंक का स्टॉफ आ जाये इधर, थैलों को वैन में रखना है।
जल्दी आओ।” मीणा कैंची गेट की तरफ बढ़ने लगा था- “मैं मिनट में वैन बाहर गेट पर खड़ी कर रहा हूँ...।”
दूबे कैंची गेट खोल चुका था।
मीणा उसके पास जा पहुंचा।
दोनों की नजरें मिलीं और दूबे खुशी भरे स्वर में कह उठा- “आगे की यात्रा शुभ हो...।”
“शुभ ही होगी।” मीणा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“आधे नोट मेरे हैं। कहीं तुम मुझे धोखा देकर, सारी दौलत लेकर भाग मत जाना।” दूबे बोला।
“मैं धोखा नहीं देता। इस दौलत में से आधे, 75 सौ करोड़ ही मेरे से जिन्दगी भर खत्म नहीं होने वाले...।”
“तूने सच में कोई जगह फिक्स नहीं कर रखी कि दौलत को कहाँ ले जाना है?” दूबे ने पूछा।
“नहीं, यहाँ से निकलने के बाद ही सोचूंगा कि...।”
“साथ में मैनेजर को ही ले जा रहा है ना?”
“देवराज चौहान मेरे साथ जाये...।”
मीणा की निगाह पुलिस वालों जा रही थी। वो जानता था कि पुलिस उसके साथ कुछ करने की स्थिति में नहीं है। फिर भी सतर्क रहना जरूरी था। दूर खड़े पुलिस वालों की निगाह उस पर थी। वो वैन के पास जा पहुँचा। दरवाजा खोल कर भीतर बैठा और स्टार्ट किया उसे।
मीणा ने तीखी निगाहों से पुलिस वालों को देखा और वैन को बैक करके बैंक के गेट के पास ले जाने लगा। जल्दी ही बैक होती वैन बैंक के गेट पर जा लगी। मीणा इंजन बंद करके बाहर निकला और तीन सीढ़ियां
चढ़कर कैंची गेट के पास पहुंचा। दूबे पास ही खड़ा दिखा तो मीणा कह उठा- “थैलों को वैन में रखवा। बैंक के स्टॉफ से बोल।”
दूबे उसी पल थैलों के पास खड़े बैंक के स्टॉफ से कह उठा- “चलो, जल्दी करो। थैलों को वैन में रखो। कुछ ही कदमों का फासला है।”
मीणा ने वैन का पिछला दरवाजा उठा दिया।
अगले आठ मिनटों में वो पाँचों थैले, यानि कि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत को वैन में ठूसा जा चुका था।
मीणा ने वैन का पीछे का दरवाजा नीचे करके बंद किया और बैंक में आ पहुँचा। हाथ हिला कर बोला- “अच्छा दोस्तो, मैं अब चलता हूँ। तुम लोगों ने मेरा बहुत साथ...।”
“अब तो मैं जा सकती हूँ?” कुत्ते वाली औरत कह उठी।
“चुप रहो।” मीणा ने मुँह बनाकर कहा और कुछ दूर खड़े गुप्ता को देखकर कहा- “तुम मुझे याद आओगे...।”
गुप्ता ने गहरी सांस ली और हाथ हिला दिया।
मीणा ने देवराज चौहान को देखा तो वो पास आ गया।
“चलो।” मीणा बोला- “तुम वैन लाओगे।” कह कर मीणा ने रिवाल्वर निकाल ली।
“गुरू, यहाँ से जाते ही, मुझे भूल मत जाना...।”
“आधी दौलत तेरी है। यहाँ सब को ठीक से संभालना और दो घंटे बाद तू भी यहां से निकल जाना।”
दूबे ने सहमति से सिर हिला दिया।
देवराज चौहान वैन की ड्राईविंग सीट पर जा बैठा।
मीणा बगल वाली सीट पर। तभी कमिश्नर पाटिल उसे इसी तरफ आता दिखा।
देवराज चौहान ने वैन स्टार्ट की और आगे बढ़ाया। मीणा ने रिवाल्वर देवराज चौहान की कमर से लगा दी। देवराज चौहान ने मीणा को देखा तो मीणा उसी पल कह उठा- “कमिश्नर आ रहा है...। उसे दिखाना है कि मैं तुम्हें जबर्दस्ती ले जा रहा हूँ। रोको जरा, वो कुछ कहना चाहता है।”
देवराज चौहान ने वैन रोकी। हर तरफ नजर मारी। पुलिस ही पुलिस नजर आ रही थी, परन्तु इस वक्त वो शांत खड़ी थी। कुछ करने का इरादा नहीं लग रहा था उसका।
कमिश्नर वैन के पास पहुँचा। वो खाली हाथ था। देवराज चौहान की कमर से रिवाल्वर लगाए, मीणा कमिश्नर से बोला- “मैं जा रहा हूँ...”
“खुशी की बात है।” कमिश्नर पाटिल ने गम्भीर स्वर में कहा-फिर वैन में झांका। देवराज चौहान की कमर में लगी रिवाल्वर देखी और कह उठा- “तुम्हारा साथी बैंक के भीतर है?”
“हाँ...।”
“उसे भी साथ ले जाते तो बहुत अच्छा होता।”
“वो मेरे साथ वैन में होता तो अब तक पुलिस ने वैन को घेर लेना था।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।
“तब भी तुम्हें जाने देते।” कमिश्नर ने देवराज चौहान से पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है?”
“उससे कुछ मत पूछो । वो मेरा बंधक है।”
कमिश्नर ने मीणा को देखा तो मीणा कड़वे स्वर में कह उठा- “कामराज कैसा है कमिश्नर?”
“उससे मेरा कोई मतलब नहीं...।”
“बकवास मत करो। तुम उसके इशारे पर नाच रहे हो। तभी तो मुझे सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा नहीं मान रहे।” मीणा ने मुँह बनाकर कहा- “अब मैंने भी इस बात की परवाह छोड़ दी है कि कोई मुझे मीणा मानता है या नहीं...।”
कमिश्नर गम्भीर निगाहों से उसे देखता कह उठा- “वो देखो। तुम्हारी पत्नी तारा तुम्हें हसरत भरी नजरों से देख रही है। वो रो रही है। तुमसे बात करना चाहती है। भेजूं उसे?”
“वो मेरी नहीं, तुम्हारी पत्नी होगी।” मीणा गुर्राया- “अपनी पत्नी को मेरे हवाले करने की कोशिश क्यों कर रहे हो?”
“मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानूंगा।” कमिश्नर ने गम्भीर स्वर में कहा- “लेकिन तारा तुम्हारी पत्नी ही है।”
“मैं तुम्हारी बात की परवाह नहीं करता...। ये बताओ कि मेरा पीछा करने का क्या इन्तजाम किया है?”
“कोई भी इन्तजाम नहीं किया।”
“मैं नहीं मानता... । तुमने कोई तो इन्तजाम किया होगा। ये बात मुझे पता चलते ही मैं अपने साथी को फोन करूँगा और बैंक में सबको मार देगा।”
“यकीन मानो, तुम्हारे पीछे कोई नहीं आयेगा।”
“पता चल जायेगा।”
“तुम्हें बहुतों ने देख लिया है।” कमिश्नर ने कहा- “और तुम्हारे पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है। ऐसे में तुम कहीं भी बच कर नहीं रह सकते, पुलिस तुम्हें देर-सबेर मैं पकड़ ही लेगी।”
कमिश्नर पाटिल शांत स्वर में कह उठा।
“मैं किसी के हाथ नहीं आने वाला। पुलिस वाला हूँ, पुलिस के सब तौर-तरीके जानता हूँ। कुछ और कहना है तुमने?”
“नहीं। लेकिन तुम्हारा साथी कब जायेगा यहां से?”
“जब तुम उसे जाने दोगे।”
“मैं तो चाहता हूँ कि वो अभी तुम्हारे साथ...।”
“चुप रहो।” मीणा ने सख्त स्वर में कहा, फिर देवराज चौहान की कमर से लगी रिवाल्वर का दबाव बढ़ा कर बोला- “चलो अब...”
देवराज चौहान ने वैन आगे बढ़ा दी।
कमिश्नर पीछे रह गया।
वहाँ फैले पुलिस वाले वैन को ही देख रहे थे।
देवराज चौहान और मीणा की सतर्क निगाह पुलिस वालों पर ही फिर रही थी। वैन सड़क पर आई और एक तरफ आगे बढ़ गई। पुलिस, वैन को जाने का रास्ता देती रही। मीणा ने देवराज चौहान की कमर से रिवाल्वर हटा ली थी।
“इनका बस चले तो ये मेरे टुकड़े-टुकड़े कर दें...।” मीणा कह उठा।
देवराज चौहान कुछ नहीं बोला। ।
पुलिस घेरे के बाद पब्लिक की भीड़ थी, जो कि दर्शक बने यहाँ के हालातों को समझने की चेष्टा कर रहे थे। लोग नहीं जानते थे कि ये वैन जाने का क्या चक्कर है। वैन सड़क पर आगे बढ़ती चली गई। भीड़ से बाहर सड़क पर आ गई। देवराज चौहान इस बात का पूरा ध्यान रख रहा था कि अगर पीछा किया जा रहा हो तो, उसे पता चल जाये।
“हम निकल आये।” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा।
“खुश मत हो...।” देवराज चौहान बोला
“क्यों, क्या कोई हमारे पीछे है?”
“पीछे ना भी हो, तब भी हम बचने वाले नहीं। पुलिस ने अब तक इस वैन के बारे में मैसेज फ्लैश कर दिया होगा। सड़कों पर जगह-जगह पुलिस तैनात होगी। जहाँ-जहाँ से भी वैन निकलेगी, पुलिस को खबर लगती रहेगी। उन्हें पता होगा कि हम किस तरफ जा रहे हैं। जरूरी नहीं कि पुलिस वर्दी में, पुलिस की गाड़ी में पीछा करे हमारा। वो सादे कपड़ों में, साधारण कारों में भी पीछा कर सकती है, उनके पास बहुत वक्त था अपनी तैयारी के लिए। अब तक पुलिस ने सशक्त योजना बना ली होगी, हम पर नजर रखने की।”
“ओह...।” मीणा के दाँत भिंच गये। वो व्याकुल दिखने लगा- “तो हम क्या करें?”
“हमें ये वैन बदलनी होगी। जब तक ये वैन हमारे पास है, तब तक पुलिस से दूर नहीं रहेंगे।” देवराज चौहान बोला।
“वैन कैसे बदलेंगे?”
“किसी दूसरी वैन को उठाना होगा और मुनासिब जगह पर थैलों को उस वैन में रखना होगा।”
“ये तो झंझट वाला काम है...।”
“बचना है तो ये हमें करना ही पड़ेगा।”
“करना है तो करना ही है।” मीणा उखड़े स्वर में कह उठा। वैन सड़क पर दौड़े जा रही थी।
“कहाँ से वैन उठायें?”
“देखते हैं...हमें...।”
“यहाँ से थोड़ा आगे एक पार्किंग है। वहाँ कई गाड़ियां खड़ी होती हैं।” मीणा कह उठा।
“देख लेते हैं वहाँ। हमें ऐसी गाड़ी चाहिये जिसमें सब थैले आ जाये।” देवराज चौहान शीशों में से बाहर पीछे का ध्यान रख रहा था- “बेहतर होगा कि हम दोबारा मारुति ओमनी वैन का इस्तेमान न करें।”
“फिर तो बड़ी गाड़ी देखनी पड़ेगी। कोई पीछे तो नहीं आ रहा?”
“अभी तक तो नहीं। मैं पीछे नजर रख रहा हूँ...।” देवराज चौहान गम्भीर था।
“तुम इस प्रकार पहले भी कई बार दौलत भरकर भागे होगे। तुमने तो बहुत डकैतियां की होंगी।”
“तुम्हारी तरह बेवकूफी से भरी डकैती कभी नहीं की कि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत पुलिस की नजरों के सामने से ले भागे और ऐसा कोई ठिकाना तैयार ना हो कि, जहाँ पहुँच कर छिपना हो।” देवराज चौहान ने कहा।
“ये गलती तो मुझसे हो गई, मैं...।”
तभी मीणा का मोबाईल बज उठा।
“हैलो...।” मीणा ने फोन निकाल कर बात की।
“सब ठीक है?” दूबे का व्याकुलता स्वर कानों में पड़ा।
“अभी तक तो सब ठीक ही है।” मीणा ने गहरी सांस ली।
“तुम सतर्क रहना, कहीं...।”
“फिक्र मत कर दूबे, मेरे साथ देवराज चौहान है। वो सब संभाल रहा...।”
“बेवकूफ, देवराज चौहान से ही तो सतर्क रहने को कह रहा हूँ।” दूबे का तीखा स्वर कानों में पड़ा- “वो एक गोली तेरे सिर में मारेगा और डेढ़ सौ करोड़ ले उड़ेगा। जो माना हुआ खतरनाक इन्सान है।”
“मैं समझ गया।” मीणा शांत स्वर में बोला- “तू कब तक वहाँ से निकलेगा?”
“एक-दो घंटे में निकल जाऊँगा। मैं उन आदमियों को फोन करने वाला हूँ अभी, जो बाहर पहुँच कर, पुलिस पर हमला करके उनका ध्यान बंटा देंगे और मैं उसी भगदड़ में निकल जाऊँगा।”
“जो भी करना, सावधानी से करना। पुलिस वालों को मौका मिला तो वो छोड़ेंगे नहीं...।”
“मानता हूँ।” कहकर उधर से दूबे ने फोन बंद कर दिया था।
मीणा ने मोबाईल जेब में रखा और कह उठा- “वो मुझे सतर्क कर रहा है तुमसे।”
वैन ड्राईव करते देवराज चौहान ने सिर हिलाकर कहा- “दूबे अपनी जगह ठीक है। क्योंकि डेढ़ सौ करोड़ की दौलत किसी का भी ईमान खराब कर सकती है।”
“तुम्हारा ईमान क्या कहता है?”
“निश्चित रहो। मैं सच्चे मन से तुम्हारे साथ हूँ। मेरा ईमान कहता है कि जहाँ तक हो सके, तुम्हारी सहायता करूँ। वैसे भी मैं इस तरह किसी से दौलत नहीं छीनता। मैं खुद के किए कामों पर विश्वास रखता हूँ...।”
“तुम्हारा साथी जगमोहन तो ऐसा नहीं है।” मीणा बोला।
“वो भी मुझ जैसा ही है। मैंने ही उसे पटा रखा है। उसके पास रिवाल्वर थी। वो तुम्हें और दूबे को आसानी से शूट कर सकता था। बैंक में। परन्तु उसने ऐसा कुछ भी नहीं किया।”
“वो मेरे से दौलत झाड़ लेने का रास्ता तलाश कर...।”
“तुम्हारी मर्जी होने पर ही वो तुमसे दौलत लेता। तुम्हें तैयार करता कि तुम खुद ही उसे दौलत दो...”
“जो भी हो देवराज चौहान, जाने क्यों मुझे तुम पर विश्वास है।”
देवराज चौहान खामोशी से वैन को आगे बढ़ाये जा रहा था।
ये भीड़ भरी सड़क थी। सड़क के दोनों तरफ ऊँची-ऊँची इमारतें थीं। तभी मीणा सामने की तरफ इशारा करके कह उठा- “वहाँ से बाँये लेना। उस इमारत के पीछे पार्किंग है।”
देवराज चौहान ने सिर हिला दिया।
“क्या इस वक्त पुलिस हम पर नजर रख रही होगी?” मीणा ने पूछा।
“तुम पुलिस वाले हो, इस बात का जवाब मुझसे बेहतर तुम्हारे पास है।”
“पुलिस नजर रख रही होगी या आगे किसी चौराहे से वैन को पहचान कर नजर रखना शुरू कर देगी। ऐसी भीड़ परी सड़क पर, क्या पता चलता है, अगर कोई पीछा करे भी...”
आगे जाकर देवराज चौहान ने मीणा के कहे मुताबिक बाई तरफ वैन मोड़ दी। छोटी सी सड़क सामने की इमारत के पीछे की तरफ जा रही थी।
“इस इमारत के पीछे पार्किंग है।”
“तुम्हे जगहों का बहुत पता है।” देवराज चौहान ने कहा।
“पुलिस वाला हूँ। ऐसी बातें नहीं जानूंगा तो बात कैसे बनेगी।” मीणा मुस्करा पड़ा।
जल्दी ही वे इमारत के पीछे की तरफ पहुँच गये।
वहां कतारों में कारें ही कारें खड़ी दिख रही थीं।
पाँच सौ के ऊपर थीं कारें।
देवराज चौहान ने वैन की रफ्तार धीमी कर दी और काम की गाड़ी को तलाशने लगा।
मीणा भी ऐसा ही कुछ तलाश कर रहा था। तभी मीणा कह उठा- “ये पंजीरी ठीक रहेगी। महेन्द्राकी पंजीरो....।”
देवराज चौहान ने पंजीरो को देखा, वो नई गाड़ी थी और पांच थैले आसानी से उसमें आ सकते थे।
“हाँ, ये ठीक रहेगी।” देवराज चौहान ने कहा और वैन को पंजीरो के पास ले जा रोका।
मीणा बाहर निकला और हर तरफ नजर मारी।
देवराज चौहान भी इंजन बंद करके बाहर आ भाया।
‘मेरे ख्याल में सब ठीक है, पुलिस पीछे नहीं है।” मीणा बोला।
देवराज चौहान ने सिग्रेट निकाल कर सुलगा ली। नजरें पार्किंग में दूर-दूर तक जा रही थीं।
“सब ठीक है ना?” मीणा ने देवराज चौहान से पूछा।
“अगर सब ठीक है तो हमें गाडी बदलने का काम जल्दी से करना चाहिये। पुलिस को जब अपने पॉइंटों पर वैन निकलती नहीं दिखेगी तो यो बीच के रास्तों पर वैन को तलाश करेगी।
“हम दस मिनट में यहाँ से चल देंगे।” मीणा आसपास नजरें दौड़ाता कह उठा।
“दस मिनट में?”
“यहाँ का एक पार्किंग अटेंडेंट कारें चोरी करने का काम भी करता है। मैं उससे बात करता हूँ। वो पंजीरो खोल देगा और चाबी का इन्तजाम भी कर देगा। मैं अभी आया।” कहकर मीणा एक तरफ तेजी से बढ़ गया।
सावधानी के तौर पर देवराज चौहान वैन के पास से कदम दूर हट गया। उसकी नजरें पुलिस को तलाश रही थीं कि कहीं उनके पीछे यहाँ तक तो नहीं आ पहुँची?
पन्द्रह मिनट में मीणा लौटा। उसके साथ पच्चीस बरस का दुबला-पतला लड़का था। शरीर पर मैले से हो रहे कपड़े थे। बाल बिखरे हुए थे। उसने कोई नशा कर रखा था, जिसकी वजह से आंखें लाल थीं उसकी।
देवराज चौहान उसके पास आ पहुंचा।
मीणा ने देवराज चौहान से कहा- “ये काम तो कर देगा, पर दस हजार मांगता है।”
“पजेरो की चाबी?” देवराज चौहान ने अटेंडेंट को देखा।
“पाँच मिनट में बना दूंगा।”
“ठीक है, जल्दी हमारे काम करो।” देवराज चौहान बोला।
“दस हजार।”
“काम करो और ले लो।”
“पहले दिखाओ कि तुम्हारे पास हैं?”
देवराज चौहान ने पाँच सौ की गड्डी निकाल कर उसे दिखाई।
“ठीक है।” उसके चेहरे पर मुस्कान उभरी- “मैं अभी आया...”
“ये साला पक्का कार चोर है। दो बार जेल जा चुका है, परन्तु मानता नहीं चोरी से...” मीणा कह उठा।
“तुमने इसे क्या कहा?”
“यही कि एक कार खिसकानी है, सुनते ही फौरन तैयार हो गया। जब पता चला कि पंजीरो की बात हो रही है, दस हजार का अपना भाव सामने रख दिया। साधारण कार तो हजार रुपये में ही हवाले कर देता।”
देवराज चौहान सिर हिलाकर रह गया।
दस मिनट में वो वापस आ गया। एक कपड़े का थैला हाथ में पकड़ा हुआ था। जिसमें चाबियां और उसके औजार थे। वो पंजीरो के पास पहुँचा और औजार निकाल कर लॉक खोलने लगा। मीणा उसके पास जा पहुंचा।
देवराज चौहान हर तरफ नजर रखने लगा।
“कल भी एक आया था इसी पजेरो को लेने। पर सौदा रह गया।” लॉक खोलते वो बोला।
“क्यों रह गया सौदा?”
“वो पाँच दे रहा था और मैं दस मांग रहा था। उसने कहा कि पांच बाद में दे जाऊँगा। मैं नहीं माना।”
मीणा चुप रहा।
अगले ही पल उसने दरवाजे का लॉक खोल दिया।
“अब इसकी चाबी भी तैयार कर।” मीणा ने कहा।
“चाबियां तैयार हैं मेरे पास। फुर्सत में चाबियां बनाने का ही काम करता हूँ। कोई न कोई लग जायेगी।”
इसके बाद वो पंजीरो में तरह-तरह की चाबियां लगा कर चैक करने लगा।
“तुम चोर तो नहीं लगते...।” वो कह उठा।
“नहीं...”
“तो पंजीरो की क्या जरूरत पड़ गई?”
“मेरा दोस्त कहता है कि पजेरो की सैर करनी है। उसकी बात माननी पड़ी मुझे...”
“तुम मुझे पहले से जानते हो कि मैं ये धंधा करता हूँ...?”
“हाँ...”
“कैसे जानते हो?”
“किसी ने बताया था। ज्यादा सवाल-जवाब मत करो। जल्दी से...”
“लो, लग गई।” उसके होंठों से निकला और इसके साथ ही पजेरो स्टार्ट हो गई।
मीणा ने राहत की सांस ली।
उसने अपना थैला और औजार समेटते हुए कहा- “दस हजार मुझे दो और चुपचाप इसे लेकर खिसक जाओ।”
“अभी हमारा काम पूरा नहीं हुआ है। तुम्हें साथ लगाना होगा। पंजीरो की डिग्गी खोलो...।”
“डिग्गी?”
“मेरा मतलब पीछे का दरवाजा। वैन में कुछ सामान रखा है, उसे पंजीरो में रखना है।”
“अब तुम ये काम भी मुझसे करवाओगे?”
“जरा सा हाथ लगाने में तेरा क्या घिसता है।” फिर मीणा ने वैन के पास खड़े देवराज चौहान से कहा- “वैन को जरा सा घुमा कर इस तरफ ले आ। थैलों को इसमें रखना है।”
देवराज चौहान ने ऐसा ही किया। उस कार चोर ने इग्नीशन में लगी चाबी निकाली और उससे पंजी का पीछे का दरवाजा खोल दिया।
भीतर काफी जगह थी।
मारुति ओमनी की डिग्गी खोली गई। भीतर पड़े थैले नजर आये।
उन्हें देखकर कार चोर की आँखें सिकुड़ी
“ये तो सरकारी सामान लगता है। ऊपर मुहर भी है, ये तो बैंक का नाम लिखा है इस कागज पर...।” कार चोर हड़बड़ाया।
“ये सरकारी सामान ही है।”
“सरकारी?”
“हम सरकारी लोग ही हैं। मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ।
“सब-इंस्पेक्टर मीणा, उसे तो मैं जानता हूँ। तुम वो नहीं हो...।” कार चोर ने उसे घूर कर देखा।
“मैं वो नहीं हूँ...”
“नहीं...।”
“कोई फर्क नहीं पड़ता अब।” मीणा ने गहरी सांस ली- “तू थैलों को हाथ लगवा, तू भी आ।” मीणा ने देवराज चौहान से कहा।
तीनों थैलों को उठाकर पजेरो में रखने लगे। थैले भारी थे।
परन्तु पजेरो में रखे गये
तीन थैले पीछे आ गये। बाकी के दो को पजेरो के बीच वाली सीट पर रख दिया। वहाँ काफी जगह थी।
वो कार चोर इतना काम करके बुरी तरह हांफने लगा था।
“नशा टूट गया लगता है तेरा...।” मीणा ने मुस्करा कर पजेरो का पीछे का दरवाजा नीचे गिराया और चाबी घुमा कर निकाली।
“ये....थैलों में क्या है?” वो सांसें संयत करता कह उठा।
“मैं बताता हूँ।” देवराज चौहान ने जेब से पाँच सौ की गड्डी निकाली और उसमें से बीस नोट निकाल कर उसे दिए– “ये तेरे दस हजार...और अब सुन...थैलों में करोड़ों की दौलत है।”
“करोड़ों की?” वो हक्का-बक्का रह गया।
“हम बैंक लूट कर भाग रहे हैं।” देवराज चौहान ने कहा
“बैंक?” उसका चेहरा देखने लायक था।
“हाँ। पुलिस ने हमारी वैन पहचान ली थी, इसलिए हमें गाड़ी बदलनी थी। वो बदल ली। तू सोच रहा होगा कि ये बात मैंने तेरे को क्यों बताई? सोच रहा है ना?”
उसने अपना गुड़मुड़ हुआ चेहरा हिला दिया।
“तेरे भले के लिए बताई कि तू कहीं पुलिस के चक्कर में ना पड़ जाये और पुलिस तेरे को हमारा साथी न समझ ले। पुलिस जल्दी ही इस वैन को ढूंढते यहाँ आयेगी। अगर तूने बताया उन्हें कि हम पजेरो को ले गये हैं तो पकड़े जाने पर हम भी पुलिस से कह देंगे कि पजेरो तूने ही हमें दी थी और तू जानता था कि हम डकैती करके भाग रहे हैं। हमारे पास करोड़ों रुपया है। इस काम का तुम्हें दस लाख दिया।”
“दस लाख या दस हजार?” उसके होंठों से निकला।
“हम दस लाख ही कहेंगे।”
उसने थूक निगली, फिर कह उठा- “लेकिन जब मैंने पजेरो देने का सौदा तुमसे किया, तब मुझे कहाँ पता था कि तुम लोग डकैती करके आ रहे हो...।”
“क्या पुलिस तेरी ये बात सुनेगी?”
“न...नहीं..,”
“हमारे पकड़े जाने पर वो हमारी बातें सुनकर ही केस तैयार करेगी और तेरे को हमारा साथी माना जायेगा।”
“ये तो तुम मुझे फंसा रहे हो।”
“नहीं। हम तुम्हें बता रहे हैं कि तुम कैसे फंस सकते हो। अगर अपना मुँह बंद रखोगे तो इस मामले से बचे रहोगे। तुमने किसी को नहीं बताना है कि हम यहाँ से गाड़ी बदल कर गये हैं। बताया तो तू भी गया।”
“नहीं बताऊँगा।” वो मरे स्वर में बोला- “कुछ पैसा मुझे भी दो। तुम लोगों के पास करोड़ों रुपया...।”
“ये लो...।” देवराज चौहान ने हाथ में पकड़े बाकी के चालीस हजार भी उसे दे दिए।
“लेकिन...।” मीणा बोला- “पजेरो का मालिक पुलिस में रिपोर्ट देगा कि यहाँ से उसकी गाड़ी गायब हो गई है तो तब...?”
“पजेरो वाला तीन-चार दिन बाद आयेगा।” नोटों को जेब में ठूसता कार चोर कह उठा- “परसों वो पूना गया है। इसी इमारत में उसका आफिस है। वो मुझसे कह कर गया था कि उसकी गाड़ी का ध्यान रखू...”
“ये तो बढ़िया हो गया..:।” मीणा मुस्करा कर उसका कंधा थपथपा उठा- “चल तू खिसक ले। हमारे बारे में मुँह खोला तो तू भी गया। ये बात तेरी समझ में आ गई होगी कि...।”
“मैंने तुम दोनों को देखा भी नहीं कभी।” कहकर उसने अपना थैला उठाया और वहाँ से चला गया।
देवराज चौहान, मीणा से पजेरो की चाबी लेता कह उठा-
“तुम वैन को पीछे करो। मैं पजेरो बाहर निकालता हूँ कतार से, तुम वैन को आगे कहीं लगा दो।”
मीणा तुरन्त वैन में जा बैठा और वैन स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।
देवराज चौहान ने पजेरो बाहर निकाली और वैन के पीछे चल पड़ा।
मीणा ने जल्दी ही वैन को पार्किंग में खड़ी अन्य गाड़ियों के साथ लगाया और पजेरो में आगे देवराज चौहान के बगल वाली सीट पर आ बैठा। पजेरो के शीशों पर काली फिल्म चढ़ी थी यानि कि बाहर से नहीं देखा जा सकता था कि पीछे वाली सीट पर दो थैले पड़े हैं। देवराज चौहान ने पजेरो को आगे बढ़ा दिया। पार्किंग से बाहर निकलते वक्त, वहाँ दो लोग तो खड़े थे पार्किंग वाले । परन्तु किसी ने स्लिप मांगने की चेष्टा नहीं की। बल्कि एक ने तो गाड़ी को देखकर सलाम भी मारा। शायद वो ये ही सोच
रहा था कि पजेरो का मालिक ही पजेरो को ले जा रहा है। वो आराम से बाहर सड़क पर आ गये।
मीणा गहरी सांस लेकर कह उठा- “काम बन गया। ये तो बढ़िया हो गया। जानते हो, जब मैं वैन को पार्किंग में लगा रहा था तो मैंने सोचा तुम दौलत लेकर भाग जाओगे। उस दौरान कई बार ये ख्याल मेरे मन में आया।
मैं मन ही मन घबरा भी उठा था।”
“ये डर तो तुम्हें तब भी लगता अगर इस काम में हम साथी होते।” देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
“तब शायद कम डर लगता। परन्तु अब तो मुझे लगा कि तुम भाग ही जाओगे।”
“क्योंकि मैं खामखाह तुम्हारी सहायता कर रहा हूँ और यही बात शायद तुम्हें परेशान कर रही है।”
“शा...यद...”
“मैं चाहता हूँ कि तुम बाकी की जिन्दगी मौज से बिताओ। बीती जिन्दगी की परेशानी, सब कुछ भूल जाओ।”
मीणा चुप रहा।
“तुम्हें किसी ने नहीं माना कि तुम मीणा हो...।”
“हाँ...”
“अब जो कारचोर मिला, वो भी ये ही कह रहा था कि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा को जानता है, और तुम वो नहीं हो।”
“यही कहा उसने...”
“परन्तु मुझे पूरा भरोसा है कि तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हो।” देवराज चौहान ने कहा।
“हाँ, मैं इन्दर प्रकाश मीणा ही हूँ...।” मीणा गम्भीर स्वर में कह उठा।
“पागल हैं सब...”
“नहीं।” देवराज चौहान ने पजेरो चलाते हुए कहा- “सब पागल नहीं हो सकते...”
“मतलब क्या है तुम्हारा...?”
“कुछ तो बीच में बात है...जो समझ में नहीं आ रही। परन्तु तुम बता सकते हो मुझे कि क्या बात है?”
“मैं ? मैं कैसे बता सकता हूँ? मुझे क्या पता कि लोग क्या सोच कर मुझे मीणा नहीं मानना चाहते...।”
देवराज चौहान ने मीणा को देखा, फिर सामने देखते कह उठा- “इसकी वजह जानने के लिए मैं उत्सुक हूँ। कभी तो तुम वजह बताओगे...”
“फिर तो तुम्हें निराश होना पड़ेगा, क्योंकि वजह मैं भी नहीं जानता।” मीणा ने इन्कार में सिर हिलाया।
देवराज चौहान चुप रहा। कुछ देर बाद बोला- “अब जाना कहाँ है?”
“मैं नहीं जानता।”
“तुम्हें बताना पड़ेगा कि जाना कहाँ है। क्योंकि दौलत तुम्हारी है, ये काम तुम्हारा है। मैं तो ड्राईवर के नाम पर तुम्हारे साथ हूँ।”
“तुम ही बताओ...।”
“मैं क्या...।”
“दौलत कहाँ छिपाऊँ?”
“दौलत तुम्हारी है। इसका फैसला तुम्हें ही करना होगा।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “ऐसी कोई जगह सोचो, जहाँ तुम इस दौलत को ले जाकर छिपा सको। दिमाग दौड़ाओ तो शायद कोई जगह याद...”
“मेरे पास कोई जगह नहीं है। क्योंकि लोग मुझे इन्दर प्रकाश मीणा मानने से इन्कार कर रहे हैं। अगर सब पहले की ही तरह लोग मुझे मीणा मानते तो, मैं दौलत को कहीं भी रख सकता था। बतौर मीणा मेरे पास कई जगहें हैं। ढेरों लोग मुझे जानने वाले हैं और मेरी सेवा करने को, अपना सौभाग्य समझेंगे। ये तभी होगा, जब वे मुझे मीणा ही समझें।”
“सब-इंस्पेक्टर मीणा वाला किस्सा तो अब खत्म हो गया।” देवराज चौहान बोला।
“हाँ। कामराज और सावी जीत गये। उनकी चाल कामयाब रही। मैं हार गया।” मीणा ने दुःख भरे स्वर में कहा- “लेकिन मैं कामराज को छोडूंगा नहीं। उसे जान से मार दूंगा।”
“तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिये।”
“क्यों...उसने मेरी जिन्दगी...।”
“अब तुम्हारे पास डेढ़ सौ करोड़ की दौलत है। पिछली जिन्दगी भूल जाओ और नई जिन्दगी शुरू कसे।”
“नई जिन्दगी?” बड़बड़ा उठा मीणा- “बहुत मुश्किल है नई जिन्दगी शुरू करना...।”
तभी मीणा का मोबाईल फोन बजने लगा।
“हैलो...।” मीणा ने बात की।
“गुरू, सब ठीक है?” दूबे की आवाज कानों में पड़ी।
“एकदम बढ़िया....।”
“देवराज चौहान ने कोई गड़बड़ तो नहीं की?”
“नहीं। देवराज चौहान मेरे लिए ईमानदार है। वो मेरी सहायता कर रहा है।”
“बच कर रहना उससे। भरोसा मत कर बैठना। वरना मौका मिलते ही वो तुम्हारा गला...।”
“तू कब वहाँ से निकल रहा है?” मीणा ने पूछा।
“बस कुछ ही देर में। मैंने अपने आदमियों को फोन पर बता दिया है, उन्हें कहाँ हमला करना है। वो आ रहे हैं।”
“ठीक है, वहाँ से निकल कर मुझे फोन कर, तब मैं तेरे को बताऊँगा कि मैं किधर हूँ...”
“कुछ ही देर में मैं बैंक से बाहर होऊँगा?”
“मैनेजर कैसा है?”
“बढ़िया है। जैसा तुम छोड़कर गये थे।”
“और वो कुत्ते वाली?”
“साली को मैंने एक थप्पड़ मारा, तब आराम से बैठी। डेट पर जाने की जिद्द कर रही थी।” दूबे का उखड़ा स्वर कानों में पड़ा।
“पुलिस वालों के फोन आ रहे हैं मैनेजर के पास?”
“हाँ। परन्तु मैनेजर ने उन्हें संभाला रखा है। तुम्हारे पीछे पुलिस तो नहीं?”
“नहीं।”
“कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारे पीछे पुलिस हो और मेरे यहाँ से निकल जाने के बाद पुलिस तुम्हें घेर ले।”
“खामखाह की उड़ान मता भर ।। तू अपने बारे में सोचा और वहाँ से निकल।” मीणा ने कहा और फोना बंद करके जेब में रखा लिया।
देवराज चौहान सामान्य गति से पजेरो आगे बढ़ाए जा रहा था।
“तुम इस दौलत में से आधा दूबे को दोगे?” देवराज चौहान ने पूछा।
“हाँ। वो मेरा पार्टनर है इस काम में...।”
“मुझे खुशी है कि तुम्हारे मन में पैसे को लेकर कोई बे-ईमानी नहीं है अपने साथी से...।”
“बे-ईमानी का कोई फायदा भी नहीं। इतना पैसा मैं क्या करूँगा? संभालना कठिन हो जायेगा।” मीणा ने परेशान स्वर में कहा- “सावी ने मेरे साथ गद्दारी नहीं की होती तो सब ठीक होता। औरत ने मुझे बरबाद कर दिया।” मीणा की आँखों में आंसू चमक उठे।
देवराज चौहान खामोशी से पजेरो चलाता रहा।
मीणा ने आंसू पोंछे और बोला- “बता देवराज चौहान, दौलत कहाँ छिपाऊँ?”
“अगर तेरे पास कोई ठिकाना नहीं...तो दौलत को गाड़ी में भरकर सड़कों पर घूमते रहना ठीक नहीं।”
“तो?”
“हमें किसी जगह पर टिक जाना चाहिये। किसी वीरान जगह पर। उसके बाद सोचना कि दौलत कहाँ छिपाऊँ।”
“क्या तुम मुझे ठीक सलाह दे रहे हो?” मीणा ने सोच भरे स्वर में, देवराज चौहान को देखकर कहा।
“हाँ। अगर तुम्हारे मन में कुछ और है तो बेशक तुम वो ही करो।”
“मेरे मन में कुछ और नहीं है।” मीणा ने सिर हिलाया- “अभी-अभी मुझे एक जगह याद आई है। मुम्बई से पूना की तरफ निकलो तो वहाँ पास ही हाईवे से चार-पांच सौ मीटर भीतर एक लकड़ी की काटेज बनी हुई है। जो कि पुरानी है और टूट-फूट सी रही है। वहाँ कोई नहीं रहता। हम वहाँ जा सकते हैं।”
“जैसा तुम कहो। मैं गाड़ी को पूना की तरफ जाने वाले बार्डर की तरफ ले लेता हूँ।”
“ये ठीक रहेगा।”
“वैसे तुम्हें मुम्बई से दूर निकल जाना चाहिये। यहाँ पास में कहीं रहे तो बच नहीं सकोगे।”
“मुझे दूबे का इन्तजार है। आधी दौलत उसे देकर यहाँ से दूर...”
मीणा के शब्द मुँह में ही रह गये।
एकाएक उसके शरीर को बेहद तीव्र झटका लगा और एक हाथ से दिल थाम लिया।
मीणा का चेहरा दो पलों में ही लाल सुर्ख हो उठा था। “साले-कुत्ते, तू फिर आ गया? निकल जा यहाँ से।” मीणा चीखा।
देवराज चौहान ने चौंक कर उसे देखा। पजेरो सावधानी से ड्राईव करने लगा। वो जानता था कि ऐसा बैंक में भी किया था मीणा ने। वो नहीं समझ पाया कि ये क्या है?
मीणा छाती को दबाये मुँह खोले गहरी-गहरी सांसें ले रहा था।
“भाग जा! मैं तेरे को नहीं आने दूंगा। अब सब कुछ मेरा है।” मीणा पुनः चीखा।
“क्या हुआ है तुम्हें?” पूछा देवराज चौहान ने एकाएक मीणा तड़पा।
दाँत किटकिटाने की आवाज कसकर सुनी देवराज चौहान ने।
“मैं तुझे मार दूंगा।” मीणा गुर्रा उठा- “चला जा यहाँ से...”
तभी मीणा का शरीर ऐसे कांपा जैसे किसी ने पकड़ कर उसे झिंझोड़ दिया हो।
उसके बाद मीणा शांत पड़ गया।
गहरी-गहरी सांसें लेते हुए सिर को आगे डैश बोर्ड पर रख दिया।
देवराज चौहान हैरान और उलझन में था कि मीणा को एकाएक ये क्या हो जाता है
“मीणा, तुम ठीक तो हो?” देवराज चौहान ने पूछा।
“हूँ...।” मीणा की मध्यम सी आवाज आई।
“ये तुम्हें क्या हो गया था? बैंक में भी तुम्हें ऐसा कुछ हुआ था। ये सब क्या है?” देवराज चौहान के स्वर में उलझन थी।
मीणा चुप रहा।
‘जवाब दो मीणा-ये तुम्हें क्या...।”
“चुप रहो। मुझे आराम करने दो।” बेहद मद्धम स्वर में कहा मीणा ने। सिर अभी तक डैशबोर्ड पर रखा हुआ था।
देवराज चौहान ने फिर कुछ नहीं कहा और पजेरो चलाने में व्यस्त हो गया। परन्तु मस्तिष्क में अब नई उलझन पैदा हो गई थी कि आखिर मीणा को ये अचानक ही क्या हो जाता है? दिल क्यों थाम लेता है? तड़प क्यों उठता है? ये शब्द कि सब कुछ मेरा ..तुम चले जाओ-क्यों कहता है? आखिर बात क्या है? परन्तु देवराज चौहान के पास किसी बात का जवाब नहीं था।
लेकिन मन में ये था कि अभी बतायेगा मीणा।
पजेरो ड्राईव करते वक्त देवराज चौहान कभी-कभार मीणा पर निगाह मार लेता था।
पाँच-सात मिनट बाद मीणा ने गहरी सांस ली और डैशबोर्ड से सिर उठाकर सीधा बैठ गया। चेहरे पर शांत मुस्कान थी और वो सामान्य दिख रहा था। देवराज चौहान ने उसके चेहरे पर निगाह मारी, फिर सामने देखकर बोला- “क्या हुआ था?”
“सब ठीक है।” मीणा बोला।
“मैंने पूछा है कि तुम्हें क्या हुआ था? ऐसा ही कुछ बैंक में हुआ था।” देवराज चौहान ने पूछा।
मीणा खामोश रहा।
“दौरा पड़ता है क्या?”
“हाँ...”
“झूठ मत बोलो। ये दौरा नहीं हो सकता।” देवराज चौहान ने कहा।
“कैसे कह सकते हो?”
“दौरे में कोई किसी को गालियाँ नहीं देता। तुम्हारी तरह बातें नहीं करता।”
मीणा ने मुस्करा कर देवराज चौहान को देखा।
“क्या होता है तुम्हें, मुझे बताओ...।”
“वहम में मत पड़ो, मुझे दौरा पड़ता है कभी-कभी...।”
“तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो। जबकि मुझसे झूठ नहीं बोलना चाहिये तुम्हें...।” देवराज चौहान कह उठा।
“वहम मत पालो, मैं तुमसे सच ही कह रहा हूँ।” मीणा ने धीमे स्वर में कहा।
“तुम मुझसे कुछ छिपा रहे हो।”
मीणा ने कुछ नहीं कहा। बाहर अंधेरा हो चुका था। गाड़ियों की हैडलाईटें सब तरफ आन हो चुकी थी।
देवराज चौहान बार-बार मीणा को देख रहा था।
“इस तरह मुझे क्या देख रहे हो?” मीणा बोला।
“सोच रहा हूँ कि तुम मुझसे सच क्यों नहीं बोल रहे?” देवराज चौहान ने कहा।
“मेरे सच को तुम ही झूठ मान रहे हो।”
“अगर तुम इसी तरह झूठ बोलते रहे तो मैं तुम्हें छोड़ कर चला जाऊँगा।” देवराज चौहान गम्भीर था।
मीणा ने उसे देखा। परन्तु कहा कुछ नहीं। देवराज चौहान पजेरो चलाने के दौरान हर तरफ निगाह रख रहा था।
परन्तु पुलिस का खतरा कहीं नहीं था।
बैंक में फंसे लोगों की जान बचाने के लिए, पुलिस ने गम्भीरता से काम लिया था और उन्हें दौलत के साथ निकल जाने दिया था। कोई भी पीछे नहीं आया था।
“हम मुम्बई से बाहर निकलने वाले हैं।” मीणा ने कहा- “हमें कहीं से डिनर पैक करा लेना चाहिये।”
“अब मैं कहीं भी गाड़ी नहीं रोदूंगा।”
“आगे, मुम्बई से बाहर निकलने पर ढाबा आयेगा। वहाँ से खाना पैक करा लेंगे।”
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।
पजेरो भागी जा रही थी।
“अब बताओ कि तुम्हें अचानक क्या हो जाता है?” पूछा देवराज चौहान ने।
“विश्वास करो, वो सिर्फ एक दौरा है जो कि बचपन से मुझे पड़ता है।” मीणा मुस्करा कर बोला।
“जिन्हें बचपन से दौरा पड़ता हो, उन्हें पुलिस में भर्ती नहीं किया जाता।”
“मैं रिश्वत देकर भर्ती हो गया था।”
“तुम मुझे मजबूर कर रहे हो कि तुम्हारे बारे में मैं ये सोचूं...कि तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा नहीं हो।”
“ये क्या कहते हो?” मीणा तड़प कर बोला- “एक तुम ही हो, जो मुझे मीणा मान रहे हो।”
“तो फिर मुझे उस दौरे का सच बताओ।”
“अभी मेरे से इस बारे में बात मत करो।” मीणा गम्भीर स्वर में बोला- “इस बारे में फिर बात करेंगे।”
“तुम ये बात मानते हो कि दौरे का सच कुछ और है?” देवराज चौहान ने पूछा।
“हाँ... । परन्तु अभी कोई बात मत करो।”
देवराज चौहान सामने देखता गाड़ी चलाता रहा, फिर बोला -
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हो ना?”
“पूरी तरह, मैं इन्दर प्रकाश मीणा ही हूँ।” मीणा दृढ़ स्वर में कह उठा- “किस्मत का मारा मीणा ही हूँ मैं...।”
देवराज चौहान ने फिर कुछ न पूछा।
कुछ देर बाद मीणा बोला-
“जहाँ बाईं तरफ रोशनियाँ हो रही हैं, वो ढाबा है। वहाँ गाड़ी रोको, खाना पैक करा लूं। तुम्हें भूख लग रही है?”
“अभी तो नहीं, लेकिन लग जायेगी। दिन भर से कुछ नहीं खाया।”
देवराज चौहान ने ढाबे के पास पजेरो रोक दी। इंजन स्टार्ट ही रखा।
मीणा ने दरवाजा खोला पजेरो का, फिर एकाएक हिचक कर ठिठका। देवराज चौहान को देखा
तब तक देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली थी।
“क्या हुआ?” उसे अपनी तरफ देखते पाकर देवराज चौहान ने पूछा।
“तु...तुम खाना पैक करा के लाओ। मैं गाड़ी में बैठता हूँ।”
मीणा ने कहा।
देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
“मैं खाने के बिना ही रह लूंगा।” देवराज चौहान बोला- “ऐसे ही चलते हैं।”
“देखो, मुझे गलत मत समझो। मुझे तुम पर भरोसा है। लेकिन तब भी मन में आता है कि तुम दौलत लेकर भाग गये तो...?”
“ऐसा भरोसा किस काम का जो शक के कवच में छिपा हो!”
“तुम ले आओ खाना...”
“तुम इसी तरह की बातें करते रहे तो मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा। वैसे भी अब तुम खतरे से बाहर हो और सब कुछ संभाल सकते हो। मेरा चले जाना ही ठीक है।”
“नहीं देवराज चौहान।” मीणा के होंठों से निकला- “तुम पास हो तो मेरी हिम्मत सलामत है। जब तक दूबे नहीं आ जाता, प्लीज, तुम मत जाना। मैं खाना पैक करा के लाता हूँ...।” दरवाजा खोल कर मीणा बाहर निकला।
“मैं दौलत लेकर भाग गया तो...?” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।
मीणा ने देवराज चौहान को देखा, फिर बेचैनी भरे स्वर में कह उठा
“नहीं, तुम ऐसा नहीं करोगे।” कहकर उसने दरवाजा बंद किया और ढाबे की तरफ बढ़ गया।
दस मिनट में मीणा खाना पैक कराकर, वापस आ गया।
वो पजेरो में बैठा। दरवाजा बंद किया।
देवराज चौहान ने पजेरो आगे बढ़ा दी।
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