रागिनी ने जब कार के इंजन की आवाज सुनी। कार के जाने का एहसास हुआ तो वो अपने कमरे से निकली और बगल के ओबराय, के कमरे में जा पहुंची।

ओबराय बैड पर अधलेटा सा था। चेहरे पर शांत भाव थे। रागिनी को देखकर मुस्कराया।

वो अभी भी सरदार परमजीत सिंह के वेष में थी।

"तुम वास्तव में बहुत खूबसूरत हो।" ओबराय बोला।

"तुम्हारी पत्नी से तुम्हारा पीछा छुड़ा दिया, इसलिए क्या ?" रागिनी थोड़ा सा मुस्कराई।

"वो मैं नहीं जानता। लेकिन तुम वास्तव में खूबसूरत हो।"

"लाश ठिकाने लगी क्या ?"

"विजय ले गया है लाश को। शुक्रा उसके साथ है। अभी वो बताने आया था कि लाश को ले जा रहा है।"

"कार जाने की आवाज अभी सुनी है मैंने।"

"उसी में लाश चली गई होगी।" ओबराय ने पास रखा सिगार थाम लिया।

"तुम्हारा काम हो गया।" रागिनी की निगाह ओबराय पर जा टिकी।

"हां।" ओबराय ने उसे देखा।

"मुझे नब्बे करोड़ तलाश करके दो।"

"रात के इस वक्त ?"

"अब क्या हर्ज है ?"

"दिन निकलने पर प्रिया को कमरे-बंगले में नहीं पाया जाएगा। ऐसे में रात को किसी ने हमें देख लिया कि हम बंगले में कुछ तलाश कर रहे हैं, घूम रहे हैं तो... ।" ओबराय ने कहना चाहा।

"तुम नब्बे करोड़ की बात को टालने की कोशिश कर रहे हो।" रागिनी ने उसकी बात काटी।

"अब तुम ऐसी बात नहीं कर रही कि खूबसूरत लगो।"

"जब मेरे मतलब की बात आई तो मैं बदसूरत लगने लगी।" रागिनी का स्वर सपाट और सख्त सा हो गया।

"गलत मत समझो।" ओबराय ने सिगार सुलगा लिया--- "आज रात का वक्त नाजुक है। मेरे ख्याल में हमें ये रात सामान्य ढंग से नींद लेकर बिता लेनी चाहिए। कल दिन में रुपया तलाश कर लिया जाएगा।"

रागिनी ने ओबराय की आंखों में झांका।

"शक मत करो।" ओबराय मुस्करा पड़ा--- "मैं तुम्हारे साथ धोखा नहीं कर सकता। मेरे कहने पर तुमने मेरी पत्नी की हत्या की है। जितनी तुम गुनेहगार हो, उतना ही मैं। तुमसे धोखा करूंगा तो मैं भी फंसूंगा।"

"ठीक है। कल दिन निकलने पर, अपनी बात भूल मत जाना।"

"मैं कोई बात भूलता नहीं।"

रागिनी बाहर निकल गई।

ओबराय ने सिगार का कश लिया।

प्रिया से पीछा छूट गया। वो उसकी मौत का सामान इकट्ठा कर रही थी, और वही सामान उसकी अपनी मौत की वजह बन गया। अब ?

नब्बे करोड़ बंगले में रखने में दयाल और सुमित्रा ने प्रिया की मदद की थी और उसे नहीं बताया गया। यानी कि दयाल और सुमित्रा पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जो एक बार धोखा दे सकता है। वो दोबारा भी कभी धोखा दे सकता है। कुछ वक्त बीतने के पश्चात इन दोनों को नौकरी से निकालना होगा।

नन्दराम ?

जो कि प्रिया के बदन की खुश्बू में नहा कर उसकी हत्या करने को तैयार हो गया। पहले उसने उसे छत से नीचे फेंक कर जान लेनी चाही। प्रिया ने ये बात बेदी से कही थी और उसने ईयरपिन के जरिए स्पष्ट सुनी थी। प्रिया अब नहीं रहीं। परन्तु नन्दराम जैसे विश्वासघाती इन्सान को पास रखना ठीक नहीं था। वो उसके किसी दुश्मन के लालच देने पर भी, उसकी हत्या की कोशिश कभी कर सकता है। नन्दराम ने जो किया। वो उसका कसूर नहीं था। प्रिया ने अपनी जवानी में लपेटकर उसे राह से भटका दिया था।

किसी मुनासिब मौके पर नन्दराम को भी नौकरी से निकाल देगा। और कुछ दिन बाद अपना आदमी भेजकर उसे खत्म करवा देगा। क्योंकि नन्दराम ने उसे खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

ओबराय सोचता रहा कि भविष्य में उसने क्या-क्या करना है।

■■■

बाईस दिन

सुबह आठ बजे सुमित्रा, ओबराय के पास पहुंची।

ओबराय बैड टी लेकर ही हटा था।

"मालिक।" सुमित्रा ने कहा--- "मालकिन अपने कमरे में नहीं हैं।"

ओबराय ने शांत भाव से सुमित्रा को देखा।

"ये बात मेरे को बताने की क्या जरूरत है ?" ओबराय ने सामान्य स्वर में कहा।

"ज... जी, मालकिन बंगले में कहीं भी नहीं हैं।" सुमित्रा कह उठी।

"मन्दिर चली गई होगी।" ओबराय ने लापरवाही से कहा और बैड से नीचे उतर आया--- "चाय और ले आओ।"

"जी। लेकिन मालिक ड्राइवर अपने क्वार्टर में है। सब कारें भी बंगले में हैं।"

ओबराय ने सुमित्रा को देखा।

"पैदल बाहर चली गई होगी।"

"मैंने बहादुर से पूछा है। मालकिन रात में बाहर नहीं गई। सुबह से नन्दराम ड्यूटी पर है। वो भी कहता है, मालकिन बाहर नहीं गईं।" सुमित्रा ने धीमे से स्वर में कहा।

"छत पर देख लो।"

"वहां भी नहीं हैं।"

"किसी और कमरे में होगी।"

"मैंने सब कमरें देख लिए हैं। मालकिन कहीं भी नहीं हैं।"

ओबराय ने लापरवाही से सिर हिलाया।

"तो फिर इन्तजार करो। वो जहां भी होगी, तुम्हें नजर आ जाएगी। चाय लाओ।" ओबराय का स्वर लापरवाही से भरा शांत था।

सुमित्रा बाहर निकल गई।

करीब साढ़े आठ बजे सुमित्रा ने दरवाजा थपथपाकर बेदी को नींद से जगाया। तीन घंटे पहले ही सोए बेदी की आंखें खुलीं। उसने उठकर दरवाजा खोला।

"मालकिन को कहीं बाहर तो नहीं छोड़ आए ?" सुमित्र ने पूछा।

"क्या ?" बेदी ने उसे घूरा।

"मेरा मतलब है, रात तुम्हारे रिश्तेदार की तबीयत खराब हो गई थी। तुम उसे लेकर बाहर गए थे। कहीं मालकिन बाहर गई हो और तुम्हें वापस भेज दिया हो।" सुमित्रा बोली।

"अजीब बात कर रही हो। मालकिन बंगले में नहीं हैं क्या ?"

"नहीं। कहीं भी नहीं हैं।"

"ये कैसे हो सकता है। रात को मालकिन से पूछ कर ही शुक्रा को डॉक्टर के पास ले गया था।"

"तो फिर मालकिन कहां गई ?"

"बंगले में ही होंगी।" बेदी ने सामान्य स्वर में कहा।

"नहीं है मैंने हर जगह देख लिया है।" सुमित्रा के चेहरे पर उलझन थी।

बेदी अब क्या कहता।

सुमित्रा चली गई।

बेदी बाहर निकल कर शुक्रा के क्वार्टर में पहुंचा। उसे नींद से उठाया।

"नींद फिर पूरी कर लेना।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "अब यहां हमारी कोई जरूरत नहीं। चार लाख नकद ओबराय से लो और नब्बे करोड़ की रकम देखो बंगले में कहां है।"

शुक्रा ने सहमति में सिर हिलाया।

"जल्दी से तैयार हो जा।" बेदी की आवाज में व्याकुलता भर आई--- "अब सिर्फ बाईस दिन बचे हैं मेरे जिन्दगी के। अपने यार को बचाना है तो फुर्ती दिखा।"

■■■

तैयार होकर ब्रेकफास्ट लेने के पश्चात साढ़े नौ बजे रागिनी ने ओबराय से मुलाकात की।

"गुडमार्निंग।" रागिनी कह उठी।

"मार्निंग।" ओबराय नहा-धो चुका था।

"अब मुहूर्त ठीक हो तो, नब्बे करोड़ को तलाश कर लिया जाए।" रागिनी का स्वर सामान्य था।

"हां। तुम ढूंढ सकती हो।" ओबराय मुस्कराया।

"और तुम...।"

"तुम तलाश कर लो। नहीं मिले तो फिर मैं खुद को तकलीफ दूंगा कि रुपये कहाँ पड़े हैं।" ओबराय ने कहा--- "इतनी बड़ी दौलत किसी कोने में तो छिपाई नहीं जा सकती। आसानी से मिल जाएगी।"

"मैं बंगले की जगहों के बारे में ठीक से नहीं जानती।"

"पहले बंगले के कमरों में नजर मार लो।"

"हूं। प्रिया के बंगले पर न होने से, नौकरों में क्या हो रहा है ?"

"खास नहीं। वे उसे बंगले में ढूंढ रहे हैं। एक- दूसरे से पूछ रहे होंगे। इस बारे में, इसके अलावा वो कर भी क्या सकते हैं।" कहते हुए ओबराय मुस्करा पड़ा।

"तुम्हें कैसा लग रहा है।" रागिनी भी मुस्कराई।

"हल्का महसूस कर रहा हूं खुद को। वो मेरी जान लेना चाहती थी। उसने अपनी औकात से कहीं ज्यादा पांव फैला लिए थे। समझदार नहीं थी वो।" ओबराय ने कहा।

"उसके गायब होने के बारे में पुलिस को खबर नहीं करोगे ?"

"करूंगा। सप्ताह बाद करूंगा। तब तक लाश की जगह हड्डियों का ढांचा रह जाएगा। यानी कि कोई नहीं कह सकेगा कि वो हड्डियों का ढांचा प्रिया का है। जब वो मिलेगा। मैं नहीं चाहता कि पुलिस को पता चले कि प्रिया की हत्या की गई है और पुलिस इस मामले की छानबीन शुरू कर दे। उसकी लाश की हालत ज्यादा से ज्यादा बिगड़ जाए फिर पुलिस को उसके लापता होने की खबर करूंगा।"

"दौलत के दम पर तुम पुलिस को अपने हक में ले सकते हो। फिर हिचक कैसी ?"

"ऐसा करना तो अपना अपराध कबूलना होगा। खुद को खामखाह शक में लाने वाली बात हो गई। बेहतर है कि खामोशी से बैठ जाया जाए।" ओबराय लापरवाही से कह उठा--- "सब ठीक रहेगा।"

"समझदार हो।" रागिनी हौले से हंसी।

"जब तुमने उसे मारा तो वो तड़पी थी ?" ओबराय ने उसे देखा।

"नहीं। खास नहीं। मेरे वार ने उसे सोचने-समझने या तड़पने का मौका ही नहीं दिया।" रागिनी कह उठी--- "उस वक्त बहुत खतरनाक हालात हो गए थे। वो मुकाबले पर उतर आई थी।"

"किस्मत अच्छी थी तुम्हारी जो तुम्हारा वार चल गया।" ओबराय मुस्करा पड़ा।

"हां।"

"जाओ। अपनी दौलत तलाश कर लो।"

रागिनी ने कुछ नहीं कहा और दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

बाहर निकलते ही वो ठिठकी।

सामने से ही बेदी और शुक्रा आ रहे थे।

पल भर के लिए वो हड़बड़ा सी गई। फिर सामान्य हो गई। वो सरदार परमजीत सिंह के वेष में थी। ऐसे में उसे पहचान पाना आसान नहीं था। वो उन दोनों के बगल से होती हुई आगे बढ़ती चली गई।

बेदी ठिठका तो शुक्रा भी रुक गया।

बेदी की निगाह जाती रागिनी पर थी।

"इन सरदार जी को देखने पर क्यों लगता है कि इसे देखा हुआ है। खासतौर से इसकी चाल पहचानी लगती है।" बेदी कह उठा--- "तेरे को ऐसा नहीं लगता क्या ?"

"मेरे को तो नहीं लगता।" शुक्रा बोला।

बेदी ने लापरवाही से सिर हिलाया।

दोनों पुनः दरवाजे की तरफ बढ़े कि बेदी फौरन ठिठक गया।

दूसरे ही पल उसकी आंखें फैलती-सी गईं। चेहरे पर हक्के-बक्के भाव आ ठहरे। तेजी से पलटा और पुकारा।

"सरदार जी।" कुछ दूर पहुंच चुकी रागिनी ठिठकी और गर्दन घुमाकर इधर देखा

"एक मिनट जरा, यहां आना।"

रागिनी दो पल तो खड़ी रही फिर पास आने लगी।

बेदी होंठ, सिकोड़े उसे ही देखे जा रहा था। आंखों में अजीब-सी चमक थी।

"क्या कर रहा है।" शुक्रा ने दबे स्वर में कहा।

बेदी ने कुछ नहीं कहा।

रागिनी पास आ गई। ठिठकी।

दोनों की आंखें मिलीं। बेदी हौले से हंसा।

"सरदार साहब का वेष तो बना लिया तूने। लेकिन अपनी चाल नहीं बदल सकी।" बेदी की आवाज में व्यंग्य के साथ खुशी भी थी।

रागिनी ठगी सी खड़ी रह गई।

"क्यों दोस्त।" बेदी पुनः बोला--- "हैरान हो गई।"

"ये कौन है विजय ?" पास खड़ा शुक्रा उलझन से कह उठा।

"रागिनी।"

"क्या ?" शुक्रा का मुंह खुला का खुला रह गया।

रागिनी ने एकाएक गहरी सांस ली परन्तु कहा कुछ नहीं ।

"बहुत मेहरबानी की तुमने प्रिया को खत्म कर दिया। उसका खून हमारे सिर नहीं आया।" बेदी बोला।

"लाश ठिकाने लगाना, खून करने से कम नहीं होता।" रागिनी इस बार अपनी आवाज में बोली।

"ठीक कहती हो। फिर भी हत्या करना तो, हत्या करना ही होता है।" बेदी ने कहा--- "तुम्हें यहां देखकर हैरानी हुई।"

"दोस्त जब हेराफेरी पर आ जाए तो खुद ही कुछ करना पड़ता है। तुम यहां नब्बे करोड़ की तलाश में आए थे और प्रिया की खूबसूरती में फंस गए। नब्बे करोड़ को छोड़कर सिर्फ बारह लाख का इन्तजाम करने लग गए।"

"और तुम उदय से छः लाख ले भागी। यहां सरदार के वेष में आ पहुंची। मैं नहीं जानता कि ओबराय को तुमने कैसे बेवकूफ बनाया। लेकिन तुमने भी कम नहीं किया ये सब करके।" बेदी ने उसे घूरा।

"शुरुआत तुमने की थी, गड़बड़ करने की। अगर मुझे मालूम न पड़ता तो मैं नब्बे करोड़ से दूर हो जाती।" रागिनी ने कड़वे स्वर में कहा।

"अब मिल गए करोड़ों।"

"मिल जाएंगे।"

"छः लाख कहां है जो तुम उदय से ले भागी थीं ?"

"मेरे पास हैं।"

"यहीं ?"

"हां।"

"अब क्या इरादा है।" बेदी की आवाज तीखी हो गई--- "नब्बे करोड़ को लेकर आधे-आधे वाले हिसाब में चलना है। या कुछ और ही सोच रखा है। सोच समझ कर जवाब देना।"

"सोचा तो कुछ और ही था।" रागिनी मुस्कराई--- "अब तुमने पहचान लिया तो अपनी मर्जी भी नहीं कर सकती। नहीं तो तुम सारा मामला खराब कर दोगे। वैसे मन नहीं है तुम्हें फूटी कौड़ी भी देने का।"

"लेकिन देनी पड़ेगी।" बेदी हौले से हंसा।

"हां।"

बेदी ने शुक्रा को देखा। जिसके चेहरे पर अभी भी अजीब से भाव सिमटे पड़े थे।

"अगर मैं इसे न पहचानता तो करोड़ों को लेकर आने वाले वक्त में जाने क्या होता।"

शुक्रा गहरी सांस लेकर रह गया।

"ओबराय जानता है कि तुम रागिनी हो ?" बेदी ने पूछा।

"हां।"

"तो फिर उसे बता देते हैं कि हम पहले की तरह ही एक हैं। उसके बाद रुपया ढूंढते हैं।"

■■■

वो नब्बे करोड़ प्रिया के बेडरूम से ही मिले।

डबल बैड के भीतर खाली जगह में गड्डियों को ढंग से लगा रखा था। वार्डरोब लॉक था। जिसे कि चाबी ढूंढकर खोला गया तो भीतर कपड़ों की अपेक्षा नोटों की गड्डियां लगी नजर आईं । ठूंस-ठूंस कर भर रखी थी। कमरे में ही बाथरूम के साथ लगती स्टोर जैसी छोटी-सी जगह थी। वहां भी नोटों की गड्डियां ठूंसी हुई थीं।

इतनी दौलत सामने देखकर रागिनी के होश उड़े जा रहे थे।

पहले तो ये दौलत थैलों में बंद, आंखों से छिपी हुई थी। लेकिन अब सामने खुली पड़ी थी।

"नब्बे करोड़ मिल गए विजय।" रागिनी का स्वर थरथरा रहा था।

बेदी और शुक्रा की नजरें मिलीं।

"बातें बाद में करना। इसे यहां से ले जाना कैसे है। वो सोचो।" शुक्रा ने कहा--- "मेरे ख्याल में अब हमारा यहां पर ज्यादा देर टिके रहना ठीक नहीं। निकल चलो यहां से।"

रागिनी के पांव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

बेदी के चेहरे पर गम्भीरता थी।

"इतनी बड़ी दौलत को यहां से ले जाना भी समस्या है।" बेदी ने कहा।

"दौलत को संभालना कोई समस्या नहीं है।" रागिनी ने फौरन कहा--- "इसे हम वैन में डालकर ले जा सकते हैं। पहले भी ये सारी दौलत वैन में ही थी। अब भी आ जाएगी।"

"पहले रुपया थैलों में बंद सिमटा हुआ था। अब बिखरा हुआ है।" बेदी ने कहा--- "तुम...।"

"कोई फर्क नहीं पड़ता। सारा रुपया आ जाएगा वैन में।"

"वैन कहाँ है ?" शुक्रा ने पूछा।

"कुछ दूर एक शॉपिंग सेंटर के पार्किंग में खड़ी है। मैं अभी वैन लेकर आती हूं।" रागिनी बेसब्र हो रही थी।

"जल्दी आना। तब तक हम नोटों की गड्डियों को किसी में बांधते हैं।"

रागिनी बाहर निकल गई।

बेदी ने गहरी सांस लेकर शुक्रा को देखा, जो सिगरेट सुलगा रहा था।

"इतनी ज्यादा दौलत देखकर मुझे जाने क्यों घबराहट हो रही है।" बेदी कह उठा।

"ऐसा हो जाता है।" शुक्रा मुस्कराया--- "अब तुम्हारा ऑपरेशन हो जाएगा। कोई रुकावट नहीं।"

"हां। वैसे भी बारह लाख इकट्ठे हो चुके हैं और ये नब्बे करोड़ भी हाथ लग गए हैं।" बेदी बोला।

शुक्रा ने कश लेकर बेदी से गम्भीर स्वर में कहा।

"ये नब्बे करोड़ की दौलत शुभ नहीं है मेरे ख्याल से।"

"मैं समझा नहीं।" बेदी ने उसे देखा।

"ये नब्बे करोड़ की दौलत बहुत लोगों के पास में गई। लेकिन कोई भी इसे अपना नहीं बना सका। जिसने भी इस दौलत को अपना बनाना चाहा, वो अपनी जान गंवा बैठा।" ये जानने के लिए पढ़ें पूर्व प्रकाशित उपन्यास "छत्तीस दिन" ।

बेदी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।

"ये कैसे हो सकता है।"

"ये हुआ है। अब प्रिया को ही देख लो। आखिरी बार नब्बे करोड़ प्रिया के पास रहे और जान गंवा बैठी। इस दौलत ने पहले भी बहुतों की जान ली है। इस दौलत के बारे में मेरा विचार अच्छा नहीं है।"

"तुम बेवकूफी से भरी बात कह रहे हो। मत भूलो ये दौलत हम सबका जीवन संवार सकती हैं। अच्छे से अच्छा काम खोलकर, सारी जिन्दगी आराम से बिता सकते हैं। दौलत तो दौलत ही होती है, अच्छी हो या बुरी।" बेदी के स्वर में पूर्ण विश्वास के भाव थे ।

"लगता है मेरी बात को तुम मजाक समझ रहे हो।"

"तुम बात ही ऐसी कर रहे हो।"

शुक्रा ने कुछ नहीं कहा।

"मैं ओबराय से अपने चार लाख लेकर आता हूँ।"

ओबराय ने बेदी को देखा तो मुस्करा पड़ा।

"नब्बे करोड़ मिल गए ?"

"हां।" बेदी पास आकर रुका।

"गुड। इतनी बड़ी दौलत देखकर मजा आ रहा होगा।" ओबराय हौले से हंसा ।

"मैं चार लाख लेने आया हूँ।"

"चार लाख ?" ओबराय मुस्करा रहा था--- "नब्बे करोड़ की दौलत मिल गई। अभी भी चार लाख पर नजर है।"

"वो मेरी मेहनत की कमाई है।"

"दौलत तो दौलत ही होती है। बेशक वो मेहनत की कमाई की हो या हराम की।"

"फर्क होता है।" बेदी मुस्कराया--- "चार लाख को मैं हक की नजर से देखूंगा और उस करोड़ों की दौलत को चोर नजरों से देखूंगा। उसे खर्च करते डर लगेगा। लेकिन चार लाख को खर्च करने में डर नहीं लगेगा।"

"पक्के सेल्समैन हो। टेबल पर से लिफाफा उठा लो। पांच सौ वाली आठ गड्डियां पड़ी है उसमें।"

बेदी ने टेबल पर से लिफाफा उठाया। भीतर देखा। पूरे चार लाख थे।

"अब क्या कर रहे हो ?"

"जाने की तैयारी।"

"सब जा रहे हो ?"

"हां। रागिनी वैन लेने गई है। उसमें नब्बे करोड़ रखकर निकल जाएंगे।" बेदी ने कहा--- "जाने में अभी तीन-चार घंटे लग ही जाएंगे।"

"लंच करके जाना। मैं तुम लोगों को खुशी से, सुख-शान्ति से भेजना चाहता हूं।" ओबराय हौले से हंसा।

"बहुत खुश हो रहे हो प्रिया से पीछा छुड़ाकर ?"

"क्यों नहीं। आज मुझे लग रहा है जैसे मैं बहुत देर बाद चैन की खुली हवा में सांस ले रहा हूं।"

बेदी उसे देखता रहा। बोला कुछ नहीं।

"ये काम खत्म होने पर क्या तुम खुद को हल्का महसूस नहीं कर रहे।" ओबराय ने पूछा।

"हां। आज उतने तनाव में नहीं हूं, जैसे कि रोज होता था। लेकिन प्रिया के मरने का अफसोस है मुझे ?"

"क्यों ?" ओबराय अपने नाक की चोंच मसलने लगा।

"वो उतनी बुरी नहीं थी। जितनी कि तुमने उसे बना रखा था।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।

"एक बात तुम भूल रहे हो विजय।" ओबराय पुनः मुस्करा पड़ा--- "अगर प्रिया की जान न ली जाती तो तुम अपनी जान गंवा बैठते। सिर में फंसी गोली निकलवाने के लिए बारह लाख इकट्ठे न कर पाते। और कुछ दिन बाद मर जाते। तुम्हें खुश होना चाहिए कि तुमने अपने बचने का इन्तजाम कर लिया।"

"शायद।" बेदी ने गहरी सांस ली।

"अपनी जिन्दगी से ज्यादा कीमती और कुछ नहीं होता।"

बेदी ने हौले से सिर हिला दिया, ओबराय को देखते हुए फिर बोला ।

"रात के बाद प्रिया किसी को नजर नहीं आई। नौकर आपस में प्रिया के बारे में ही बात कर रहे हैं। ऐसे में आज ही मैं, शुक्रा के साथ चला जाऊं, तो वे लोग शक नहीं करेंगे कि....।"

"शक करने से क्या होता है।" ओबराय ने लापरवाही से कहा--- "उन्होंने कुछ भी देखा-सुना नहीं। और मेरे यहां नौकर वही करते हैं, जो मैं कहूंगा। अपना शक भी एक-दूसरे पर जाहिर करने की हिम्मत नहीं कर सकते।"

"लेकिन आपकी हत्या करने की कोशिश कर सकते हैं, छत से धक्का देकर।" बेदी तीखे स्वर में कह उठा।

ओबराय के दांत भिंच गए।

"तब नन्दराम की आंखों पर, प्रिया ने अपना जिस्म बिछाकर अंधेरा कर दिया था।"

"नन्दराम के साथ क्या करोगे ?"

"ये तुम्हारा मामला नहीं है और यहां से जाने के बाद कभी मुझसे रिश्ता जोड़ने की कोशिश मत करना विजय । "

"दोबारा तुम्हें देखने के लिए मेरे पास फुर्सत ही कहां होगी।" बेदी ने कहा और पलटकर बाहर निकल गया।

■■■

रागिनी कोरियाई वैन लेकर आई। वेष अभी भी परमजीत सिंह का था।

चादरों में नोटों को बांध-बांध कर वे वैन तक ले जाते और गड्डियां वैन के पीछे वाले हिस्से में डाल देते। सारा काम गुप-चुप तरीके से हो रहा था। अगर किसी नौकर को ये सब होने की खबर हो भी गई थी तो उसने वैन की तरफ या प्रिया वाले बेडरूम में आने की कोशिश नहीं की थी।

नब्बे करोड़ की दौलत से वैन का पीछे वाला हिस्सा पूरा भर गया था। इस सारे काम को पूरा करने में चार घंटे लगे। लंच भी नहीं लिया था उन्होंने और सुमित्रा पूछने भी नहीं आई थी। वैसे तो वैन के शीशे काले थे। फिर भी सावधानी के नाते, वैन में पड़ी नोटों की गड्डियों के ढेर पर चादर बिछा दी थी कि गड्डियों की झलक कोई भी किसी स्थिति में न देख सके।

ये काम पूरा होने पर उन्होंने ओबराय को 'बाय' कहने की जरूरत नहीं समझी। अपना-अपना सामान समेटकर वैन में रखा और वैन को बाहर लेते चले गए।

वैन को रागिनी ही ड्राइव कर रही थी।

"मैंने तो सोचा भी नहीं था कि हम फिर एक साथ हो जाएंगे।" रागिनी कह उठी।

"तुमने कैसे सोच लिया कि हमारी मुलाकात दोबारा नहीं होगी।" बेदी बोला ।

"तुम्हारे मिलने से मुझे पैंतालीस करोड़ का नुकसान हो गया।" रागिनी ने मुंह बनाया।

"गलत कह रही हो।" बेदी की आवाज में तीखेपन के भाव आ गए--- "समझो कि पैंतालीस करोड़ का फायदा हो गया। वरना मैं नब्बे करोड़ का मालिक बन जाता, अगर तुम न मिलती तो।"

शुक्रा खामोश बैठा बाहर देख रहा था।

"मेरा छः लाख कहां है ?" बेदी ने पूछा।

"सूटकेस में। अब तो करोड़ों के मालिक बन गए हो। अभी भी छः लाख जैसी रकम के लिए रो रहे हो।"

"आदत है।"

"रोने की।"

"हां।"

"अच्छी आदत है।" रागिनी की आवाज में कड़वापन आ गया--- "कुछ लोग बिना वजह सारी उम्र रोते रहते हैं।"

"मैं उन्हीं लोगों में हूं।" बेदी का स्वर सपाट था।

"जाना कहां है? कहाँ पर पैसा आधा-आधा करना है।" रागिनी ने पूछा।

"नब्बे करोड़ की रकम हमारे पास है। ये कोई मजाक नहीं है कि कहीं भी वैन खड़ी करके, रुपया आधा-आधा करना शुरू कर दें। इसके लिए कोई ठिकाना चाहिए, जो कि हमारे पास नहीं है।" बेदी ने कहा।

"तो...?" रागिनी ने एक निगाह उस पर मारी।

"रुपये को बांटने के लिए जब तक किसी ठिकाने का इन्तजाम नहीं होगा, तब तक के लिए वैन को होटल में ले चलो। पार्किंग में खड़ी रहेगी वैन। और तुम होटल में रहोगी।"

"क्या मतलब, मैं...।"

"इस बात का कोई मतलब नहीं हैं। जो मैंने कहा है, वो तुम समझ गई होगी।" बेदी की आवाज में सख्ती उभरी।

"मैं पैसे के साथ इस शहर से निकल...।"

“मैंने तुम्हें रोका नहीं है। निकल जाओ। मुझे कोई ऐसी जगह बता दो, जहाँ नब्बे करोड़ की रकम को आधा-आधा किया जा सके। अब ये दौलत थैलों में बंद नहीं है कि थैलों का बंटवारा कर लिया। एक-एक गड्डी खुली पड़ी है और नब्बे करोड़ की नकद रकम का ढेर लगा हुआ है।"

रागिनी ने कुछ नहीं कहा।

वैन में आधा मिनट चुप्पी रही।

"मैं अपना मेकअप उतारना चाहती हूं।"

"रास्ते में जो जगह ठीक लगे उतार लेना।"

"पैसे के बंटवारे के लिए कब तक किसी जगह का इन्तजाम कर लोगे ?" रागिनी ने पूछा।

"देखता हूं। शायद कल तक कोई इन्तजाम कर लूं। मुझे तुमसे ज्यादा जल्दी है।"

"इससे तो अच्छा होता कि पांच-सात घंटे हम ओबराय के यहां रुककर पैसा बांट लेते।" रागिनी कह उठी।

"वहां से तो तुम्हें भागने की जल्दी लगी हुई थी।" बेदी ने तीखे स्वर में कहा।

"अब चलते हैं। वहीं पैसे का बंटवारा---।"

"भूल जाओ।" बेदी ने गहरी सांस ली--- "अब तो ओबराय हम लोगों को पहचानने से भी इन्कार कर देगा।"

शुक्रा गम्भीर सा बिलकुल चुप था।

■■■

रागिनी सरदार परमजीत सिंह के वेष को त्याग चुकी थी। न चाहते हुए भी नब्बे करोड़ से भरी वैन को होटल के पार्किग में ले जाकर खड़ी करनी पड़ी। सब नीचे उतरे। रागिनी ने सूटकेस में कुछ कपड़े रख कर सूटकेस बाहर निकाला और बाकी सारा भीतर ही रहने दिया। वैन जब लॉक की तो बेदी ने वैन की चाबियां उसके हाथ से ले ली।

"ये क्या ?" रागिनी अचकचाकर कह उठी।

"ये इसलिए कि कहीं तुम वैन लेकर खिसक मत जाओ।" बेदी चाबी जेब में डालता हुआ कह उठा।

"मतलब कि तुम वैन लेकर खिसकना चाहते हो।" रागिनी ने उसे घूरा।

"फिक्र मत करो। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। तुम जो भी कमरा लोगी, उसमें मैं तुम्हारा पति बनकर रहूंगा और चाबी मेरे पास रहेगी। तुम मुझ पर पूरी तरह नजर रखना। एक-आध दिन की बात है। चाहो तो बेशक वैन के पहिए से हवा निकाल दो। लेकिन ऐसा करने पर बाद में बहुत परेशानी होगी, क्योंकि नब्बे करोड़ के नोटों की गड्डियां वैन में ठूंसी हुई हैं। हवा निकालने के बाद उसमें नया पहिया लगाना भी आसान नहीं होगा।"

"ये हरकत सरासर गलत है।" रागिनी उखड़ी।

"हम दोस्त हैं और दोस्तों में कुछ भी गलत-ठीक नहीं होता। सब चलता है।" बेदी मुस्कराया।

रागिनी उसे घूरने लगी।

"कमरा बुक कराकर आ जाना। मैं उदय और शुक्रा के पास उसी कमरे में हूं, जो कमरा इनके पास पहले था।" कहने के साथ ही बेदी, शुक्रा के साथ होटल के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गया। चार लाख वाला लिफाफा बगल में दबा रखा था।

रागिनी ने हसरत भरी निगाहों से वैन को देखा। उसका बस चलता तो वो अभी वैन लेकर खिसक जाती। लेकिन वैन की दूसरी चाबी उसके पास नहीं थी।

■■■

बेदी की बात सुनते ही उदयवीर व्याकुल सा हो उठा। नब्बे करोड़ बाहर खड़ी वैन में है और उसमें से पैंतालीस करोड़ बेदी के हैं। ये बात उदयवीर को परेशान करने वाली थी।

"ये ले चार लाख।" बेदी ने उदयवीर की तरफ लिफाफा बढ़ाया--- "इस बार संभालकर रखना।"

उदयवीर ने पांच सौ की आठ गड्डियों वाला लिफाफा लेकर पास ही रख लिया। शुक्रा एक कुर्सी पर आराम से बैठ गया। तीनों होटल के कमरे में थे।

उदयवीर ने शुक्रा को देखा।

"ये नब्बे करोड़ वही वाला है, जिसे पहले हम तलाश करने की कोशिश कर रहे थे ?" उदयवीर ने पूछा।

"तेरे को तो पता ही है।" शुक्रा कह उठा।

"पक्के तौर पर पता कर रहा हूं।"

"हां। वही नब्बे करोड़ हैं।"

उदयवीर के चेहरे पर गम्भीरता के भाव आ गए।

"तूने इसे बताया नहीं कि इस नब्बे करोड़ को कोई भी अपना नहीं बना सका।" उदयवीर ने कहा--- "जिसने भी इस दौलत को पाने की कोशिश की, वो किसी न किसी हालात में मारा गया।"

"बोला था।" शुक्रा ने गहरी सांस ली।

"तो...।" उदयवीर ने बेदी को देखा--- "क्या कहता है ?"

"मेरी बात इसकी समझ में नहीं आ रही।" शुक्रा ने बेदी को देखा।

बेदी की निगाह बारी-बारी दोनों पर जा रही थीं।

"विजय।" उदयवीर गम्भीर स्वर में कह उठा--- "हम जो कह रहे हैं, वो सही है जिसने भी इस दौलत को पाने की इच्छा दिल में रखी, वो जिन्दा नहीं बचा। हमने ये बात खासतौर से नोट की थी। और अब तुम इस दौलत पर नजर रख रहे हो। वैसे भी तुम्हारा वक्त ठीक नहीं चल रहा।"

बेदी ने होंठ भींच लिए।

कुछ पलों तक उनके बीच चुप्पी रही।

"उदय।" बेदी ने होंठ खोले--- "पैंतालीस करोड़ बहुत बड़ी रकम होती है।"

"कोई भी दौलत जान से कीमती नहीं होती।"

"मेरे ख्याल से तुम दोनों बेकार का वहम मन में रखे हो कि... ।"

"हम वो बात कह रहे हैं विजय...।" शुक्रा ने कहा--- "जिसे हमने खासतौर से नोट किया है। इस दौलत को कोई भी अपना नहीं बना सका। जिसने भी ऐसी कोशिश की, उसे जान से हाथ धोना पड़ा।" ये सब जानने के लिए पढ़ें, अनिल मोहन का उपन्यास "छत्तीस दिन।"

"दौलत का लालच इस पर हावी हो गया है।" उदयवीर ने शुक्रा को देखकर उखड़े स्वर में कहा।

शुक्रा कुछ न कहकर बेदी को देखता रहा।

"विजय।" उदयवीर कह उठा--- "मेरी बात मानो, ये वहम नहीं है। जाने क्या बात है, जो भी इस दौलत को पाने की इच्छा करता है। या जो ये दौलत रख लेता है। किसी न किसी रूप में उसे जान से हाथ धोना पड़ता है। मैं जानता हूं तुम लालच में फंस चुके हो। पैंतालीस करोड़ हैं तुम्हारे, नब्बे करोड़ में से और ये रकम बहुत बड़ी होती है। लेकिन सबसे कीमती चीज अपनी जान होती है। वो न रही तो दुनिया भर की दौलत बेकार है।"

बेदी की निगाह उदय पर पड़ी।

"तुम्हें ऑपरेशन के लिए, जान बचाने के लिए बारह लाख की जरूरत थी। बारह लाख अब तुम्हारे पास हैं। चार लाख ये रहे। छः लाख रागिनी से लो। डेढ़-दो लाख के जेवरात मेरे पास हैं, जो प्रिया से लिए। डॉक्टर वधावन को देने के लिए बारह लाख पूरे हो जाते हैं। मैं तो यही कहूंगा कि इस दौलत का लालच छोड़कर अपना ऑपरेशन कराओ और ठीक होने के बाद, अच्छी जिन्दगी की शुरुआत करो।" उदयवीर ने कहा।

"बिना दौलत के।" बेदी के होंठों से निकला।

"पहले तुम्हारे पास कहां दौलत थी। दिमाग में गोली फंसने से पहले तुम मामूली से सेल्समैन थे और तनख्वाह से खर्चा-पानी ही चला पाते थे। ठीक होने के बाद फिर कहीं नौकरी कर लेना। लेकिन इस नब्बे करोड़ से दूर हो जाओ। ये दौलत किसी की सगी नहीं है।" उदयवीर ने समझाने वाले ढंग में कहा।

बेदी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभर आई।

"ये नहीं समझेगा।" उदयवीर ने शुक्रा को देखते हुए गम्भीर स्वर में कहा।

"इसे सिर्फ दौलत ही नजर आ रही है इस वक्त। हमारी बात समझने के लिए इसके पास वक्त ही नहीं है।"

"तुम दोनों की बेवकूफी से भरी बातों को..."

तभी रागिनी ने भीतर प्रवेश किया।

उसे देखते ही उदयवीर के चेहरे पर तीखेपन के भाव आ गए।

"तुम...।" उदयवीर उठा--- "मुझे बेवकूफ बनाकर छः लाख ले गई थी।"

"तुम लोग भी तो मुझे धोखा दे रहे थे। इस तरह मिलकर काम नहीं होता।" रागिनी ने लापरवाही से कहा।

उदयवीर होंठ भींचकर रह गया।

"पतिदेव जी।" रागिनी ने बेदी से कहा--- "चलो मेरे साथ। सामान कमरे में पहुंच चुका है। वैन की चाबी तुम्हारे पास है। ऐसे में मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकती।"

"कौन सा कमरा मिला ?" बेदी ने उसे देखा।

"ऊपर के फ्लोर पर है।"

"इन दोनों को नम्बर बता दो।"

रागिनी ने उदयवीर और शुक्रा को कमरे का नम्बर बता दिया।

"हम रात को 'डिनर' के वक्त मिलेंगे।" बेदी ने दोनों से कहा--- "डिनर डायनिंग हॉल में ही लेंगे।"

दोनों खामोश रहे। कुछ कहा नहीं।

"तुम्हारे दोस्त मुझे आज कुछ ज्यादा ही चुप से लग रहे हैं। लगता है दोबारा मेरा सामने आना इन्हें अच्छा नहीं लगा। लेकिन मैं इतनी बुरी नहीं हूं। बता क्यों नहीं देते तुम इन्हें।"

"इन्हें तुमसे नहीं, मुझसे शिकायत है और शिकायत की वजह तुम नहीं हो।" बेदी मुस्कराया।

"फिर ठीक है।" रागिनी ने लापरवाही से कहा।

"चलो।"

परन्तु रागिनी वहीं खड़ी कह उठी।

"वैन की चाबी कहां है ?"

"मेरी जेब में।" बेदी ने उसे देखा।

"दिखाओ।"

"क्यों ?" बेदी के माथे पर बल उभरे।

"तुम्हारा क्या भरोसा। मेरे साथ कमरे में बैठे रहो और चाबी अपने दोस्तों के हवाले कर दो कि, ये चुपचाप वैन को लेकर खिसक जाएं और बाद में तुम भी बाथरूम जाने के बहाने चलते बनो।"

"बात तो अक्लमंदी वाली कर रही हो।" बेदी व्यंग से कह उठा--- "मैं भूल गया था कि तुम में जरूरत से ज्यादा समझ है।"

"वैन की चाबी दिखाओ।"

बेदी ने जेब से चाबी निकाल कर उसे दिखाई।

"शुक्र है ये तुम्हारे पास ही है।"

"फिक्र मत करो। ये मेरे पास ही रहेगी। पैसे के मामलों में मैं तुम्हारी तरह कमीना नहीं हूं।" बेदी बोला।

"करोड़ों का सवाल हो तो कमीना बनना पड़ता है। नहीं तो कोई दूसरा कमीना बनकर दौलत को ले जाएगा।" कहने के साथ ही वो आगे बढ़ी और बेदी की बांह में बांह डाल ली--- "चलें डियर । अब हम पति-पत्नी हैं। बेशक नकली ही सही। जो थोड़े से वक्त का साथ है, वो तो प्यार-मोहब्बत से गुजार सकते हैं।"

दोनों बाहर निकल गए।

शुक्रा ने सोचों में फंसे सिगरेट सुलगाकर कश लिया।

उदयवीर चेहरे पर गम्भीरता समेटे, वापस बैठ गया।

"विजय हमारी बात को गम्भीरता से नहीं ले रहा।" उदयवीर ने उसे देखा।

"गलती उसकी भी नहीं है।" शुक्रा ने गहरी सांस ली--- "करोड़ों की दौलत का लालच कम नहीं होता, खासतौर से वो अपने ही कब्जे में हो। उसे दौलत के खिलाफ सुनना अच्छा नहीं लग रहा।"

"अगर इन करोड़ों रुपयों का इतिहास देखा जाए तो, विजय के साथ कुछ भी बुरा हो सकता है।"

शुक्रा ने कश लेकर, गम्भीरता से सिर हिलाया।

"एक बार फिर कोशिश करेंगे विजय को समझाने की।"

■■■

"विजय। हम एक बार फिर से अच्छी दोस्ती शुरू कर सकते हैं।"

बेदी ने रागिनी को देखा। वो नहाकर आई थी और नाइटी डाल रखी थी।

"हमारी दोस्ती खत्म ही कब हुई थी जो नई दोस्ती की शुरुआत करने की जरूरत पड़  गई।"

"दोस्ती में थोड़ी, खट्टास आ गई है। इसलिए नई दोस्ती कर लेते हैं। पीछे वाली छोड़ देते हैं।"

बेदी मुस्करा पड़ा।

"नई दोस्ती में कुछ खास है ?"

"है तो नहीं, लेकिन हो सकता है।" रागिनी भी मुस्कराई।

"क्या ?"

"हमारे पास बहुत बड़ी दौलत है। सारी जिन्दगी हम मजे से बिताएंगे। और...।"

"हम ? तुम्हारा मतलब कि एक साथ ?"

"यही बात कहने जा रही हूं कि अब तुम्हारा ऑपरेशन हो जाना है। तुम ठीक हो जाओगे। अच्छे साथी की, पति की मुझे जरूरत होगी ही। तुम बुरे नहीं हो।" पास आकर रागिनी ने उसके कंधे पर हाथ रखा--- "और देर-सबेर में तुम भी तो साथी के लिए किसी को ढूंढोगे। ऐसे में मैं क्या बुरी हूं। जबकि मेरे पास पूरा पैंतालीस करोड़ रुपया है। औरत के पास दौलत हो तो वो और भी अच्छी लगती है।"

बेदी ने सिगरेट सुलगा ली।

"याद है मैं सिगरेट पीती थी। लेकिन जब लगा कि, मेरा सिगरेट पीना तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो उस दिन से मैंने सिगरेट नहीं पी। मैं किसी भी तरफ से बुरी नहीं हूं, विजय।"

"मैंने कभी भी नहीं कहा कि तुम बुरी हो।"

"तो फिर जिन्दगी भर शादी करके इकट्ठे रहते हैं। मजा आएगा। बुढ़ापे में इन दिनों को याद किया करेंगे।"

"जरूरी तो नहीं कि जो अच्छा लगे उससे शादी कर ली जाए।" बेदी के स्वर में किसी तरह का भाव नहीं था।

"क्या मतलब?"

"मतलब तुम बाखूबी समझ रही हो।"

"तो तुम मुझसे शादी करने को मना कर रहे हो।"

"कुछ भी समझ लो। मैं अभी शादी नहीं करना चाहता। शायद कभी भी न करूं।" बेदी ने जानबूझकर कहा।

"मर्जी तुम्हारी।" रागिनी ने लापरवाही से गहरी सांस ली--- "इस बारे में मैं तुम पर दबाव नहीं डाल सकती।"

बेदी ने कश लिया।

"आओ। कुछ प्यार कर लें।"

"ये वक्त नहीं है इस काम का। हम...।"

"इस काम के लिए कोई भी वक्त का पाबन्द नहीं होता। डिनर में अभी बहुत वक्त है। कम ऑन।"

■■■

इसी होटल का मैनेजर कमलराय, इस वक्त अपने शानदार ऑफिस में बैठा हुआ था। कुछ पहले ही फाइल एक तरफ सरका कर, आराम भरी मुद्रा में बैठा था। परन्तु उसका मस्तिष्क दूसरी तरफ उलझने लगा था। तीन दिन से कोई फोन पर लगातार धमकियां दे रहा था कि अगर उसे एक करोड़ रुपया न दिया गया तो वो होटल को ऐसा नुकसान पहुंचाएगा कि उनका धंधा बंद हो जाएगा। कमल राय ने इस बारे में फौरन होटल के मालिक धर्म शुक्ला से बात की तो धर्म शुक्ला ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि एक पैसा भी नहीं दिया जाएगा। वो जो करना चाहता है कर ले।

कमल राय ने फोन आने पर ये बात उसे कह दी, जिसने फोन पर धमकी दी थी।

इस पर भी अगले दिन पुनः धमकी भरा फोन आया।

कमल राय ने वही बात दोहरा दी।

और आज कमल राय ने चैन की सांस ली। शाम के आठ बज रहे थे, और अभी तक धमकी वाला फोन नहीं आया था। उसने यही सोचा कि धमकी देने वाला समझ चुका है कि यहां उसकी बात नहीं बनेगी। होटल से पैसा नहीं मिलने वाला। तभी फोन करना बंद कर दिया है।

उसी समय ही फोन की बैल बजने लगी।

"हैलो।" मैनेजर कमल राय ने रिसीवर उठाया।

"पहचाना मुझे।" नशे में भरभराती आवाज, कमल राय के कानों में पड़ी।

कमलराय का दिल जोरों से धड़का। उसने खुद पर काबू पाने की कोशिश की।

"तुम...।" कमल राय के होंठों से निकला।

"हां, मैं। तुमने क्या सोचा कि मैं मर गया हूं।" स्वर बहुत ज्यादा नशे में था।

"मैंने ऐसा कुछ नहीं सोचा।" कमल राय ने कहा--- "तुम हो कौन ?"

"मेरे बारे में मत पूछा कर। तेरे को पहले भी बोला है।" आवाज में गुस्सा आ गया--- "काम की बात कर।"

कमल राय समझ नहीं पाया कि क्या कहे।

"तो आज भी तेरा इन्कार ही है।"

"मैं कौन होता हूं हां या ना करने वाला। होटल के मालिक की मर्जी।"

"एक बार फिर पूछ ले उससे।" आवाज में खतरनाक भाव आ गए।

"पूछ चुका हूं। मालिक तेरी बात मानने को तैयार नहीं।" कमल राय ने कहा।

"मेरे को उसका फोन नम्बर दे। मैं बात करता हूं।"

"मालिक का नम्बर किसी को नहीं दिया जा सकता।"

"तो तुम लोग कुछ करवा कर ही रहोगे।" उसके दांत किटकिटाने का स्वर कमल राय के कानों में पड़ा।

कमलराय व्याकुल सा रिसीवर थामे बैठा रहा।

"मैनेजर। मेरी बात सुन अगर होटल में एक-दो तेज आवाज वाले बम धमाके हो गए तो क्या होगा।"

कमलराम ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

"चुप क्यों कर गया! बोल।" नशे में डाँवाडोल हो रहा स्वर कमल राय के कानों में पड़ा--- "मैं बताता हूँ। अगर दो बम विस्फोट हो गए तो सुबह तक आधे लोग होटल छोड़कर चले जाएंगे। उसके बाद मैं हर पांच दिन बाद दो-तीन बम विस्फोट कर दिया करूंगा। तुम लोगों का होटल नहीं चलने दूंगा। लोग आना बंद कर देंगे। जब तक मुझे करोड़ रुपया नहीं मिलेगा। मैं इस होटल को नुकसान पहुंचाता रहूंगा।"

कमल राय समझ नहीं पाया कि क्या कहे।

"सुन रहा है या मर गया ?" नशे और गुस्से से भरा स्वर कानों में पड़ा--- "अभी तो बम भी नहीं फोड़ा।"

"तुम पकड़े जाओगे।" कमल राय होंठों से निकला।

जवाब में पहले वो हंसा। फिर बोला।

"मेरी चिन्ता मत करो। मुझ तक पहुंचना इतना आसान नहीं। हर बार विस्फोट करने के बाद तुमसे बात करके पूछूंगा कि तुम्हारे मालिक को अक्ल आ गई है। वो एक करोड़ देने को तैयार... ।"

"सुनो।" कमल राय जल्दी से बोला--- "इस वक्त तुम बहुत नशे में हो। तुम्हें खुद नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो। क्या करने को कह रहे हो। जब होश में आ जाओ, तब...।"

"दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा। मुझे नशे में कहते हो। पागल हो। मैं कभी भी नशे में नहीं रहता। मेरी आवाज पर मत जाना। मेरा दिमाग बिलकुल ठीक है।"

"नहीं तुम नशे में हो। ठीक से सोच नहीं पा...।"

"चुप रहो।" आने वाली आवाज में नशे से भरी चिल्लाहट आ गई--- "तुम्हारी बात सुनकर तो पी हुई भी उतर गई। अब दोबारा पीनी पड़ेगी। खैर, छोड़। अपने काम की बात सुन। आज रात मैं मोटल में बम विस्फोट करने जा रहा हूं। अपने मालिक को कहना, नमूना देख ले। एक करोड़ दे दे। वरना होटल का वो हाल कर दूंगा कि यहां कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे।"

"तुम....।" कमल राय ने कहना चाहा।

परन्तु दूसरी तरफ से रिसीवर रख दिया गया।

हड़बड़ाए से कमल राय ने धर्म शुक्ला को फोन लगाया। बात हुई।

"शुक्ला साहब। बहुत बड़ी गड़बड़ी होने जा रही है।" कमल राय के होंठों से निकला।

"क्या हुआ, तुम इतना घबराए हुए क्यों हो ?"

"उसका फोन आया था, अभी-अभी। जो एक करोड़ मांग रहा है।"

"तुमने उसे मना नहीं किया कि...।"

"बहुत मना किया। हर बार मना किया। जब-जब फोन आया तभी मना किया। लेकिन लगता है वो कुछ करके रहेगा। पूरा पागल लगा वो।" कमल राय ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

"क्या कहता है।"

"कहता है, आज रात होटल में एक-दो विस्फोट करेगा। पांच-सात दिन में कोई-न-कोई विस्फोट करता रहेगा। यहां कोई आएगा नहीं। कोई डर की वजह से ठहरेगा नहीं। वो आपको पूरी तरह बरबाद करने की तैयारी में तुला हुआ है। देखना साहब, वो होटल में विस्फोट जरूर करेगा।"

"इतना आसान समझते हो ये सब करना।" कानों में पड़ने वाला धर्म शुक्ला का स्वर कठोर हो गया।

"वो बहुत नशे में था और...।"

"फिक्र मत करो। वो कुछ नहीं कर सकेगा।"

"शुक्ला साहब वो...।" कमल राय ने कहना चाहा।

"मैं अभी कमिश्नर से बात करता हूं। होटल के बाहर-भीतर पुलिस...।"

"ये आप क्या कर रहे हैं सर ?"

"क्यों ?"

"शुक्ला साहब। होटल में ठहरने वाले और आने-जाने वाले लोग कभी भी ये पसन्द नहीं करेंगे कि उन्हें पुलिस के बीच में गुजरकर होटल में जाना पड़े। ये बात अवश्य खुल जाएगी कि किसी ने होटल में बम विस्फोट करने की धमकी दी है। ये बात आम होने में देर है कि होटल खाली हो जाना शुरू हो जाएगा। कोई भी होटल में ठहरना पसन्द नहीं करेगा। हमारा धंधा ठप्पा जाएगा।" कमल राय ने जल्दी से कहा।

"इसका भी इन्तजाम हो जाएगा।"

"क... कैसे ?"

"पुलिस सादे कपड़ों में होगी और किसी को पता नहीं चलेगा कि क्या हो रहा है। वो आने-जाने वालों पर नजर रखेंगे। जिस पर शक होगा। उसे चैक कर लेंगे। सब ठीक रहेगा।"

"लेकिन आप कब तक इस तरह पुलिस की सहायता लेंगे। कब तक पुलिस यहां रह सकेगी। अगर वो दो-चार दिन बम विस्फोट नहीं करे और बाद में कर दे तो...।"

"फिलहाल तो अभी का इन्तजाम करना है। वो जो भी है पकड़ा जाएगा। बच नहीं सकता।" कहने के साथ ही दूसरी तरफ से धर्म शुक्ला ने फोन रख दिया था।

कमलराय ने रिसीवर रखा और माथे पर उभरे पसीने को पोंछने लगा। जाने क्यों उसका मन कह रहा था कि वो पागल शराबी कुछ करके ही रहेगा।

रात के ग्यारह बजे तक, सादे कपड़ों में बीस पुलिस वाले होटल की पार्किंग से लेकर भीतर तक की लगभग हर जरूरी जगह पर खड़े हो चुके थे। आने-जाने वालों पर वो पैनी निगाह रख रहे थे। किसी को नहीं मालूम था कि होटल में ये सब हो रहा है।

सब कुछ सामान्य नजर आ रहा था।

रात के करीब बारह बजे, कमलराय के टेबल पर पड़े फोन की घंटी बजी। उस वक्त कमल राय घर जाने की सोच रहा था। उसने रिसीवर उठाया।

"हैलो।"

"पहचाना ?" नशे में भरभराती खतरनाक आवाज उसके कानों में पड़ी।

"तुम ?" कमलराय चौंका।

"हां । मैं तुम लोगों का सत्यानाश करने जा रहा हूं। अब पछताना । मेरी बात को कोरी धमकी समझते हो।"

"क्या... क्या कर रहे हो तुम ?"

"आज तो सिर्फ दो विस्फोट करूंगा।" नशे से भरी आवाज में जहर के भाव थे--- "आज के दो विस्फोटों से अक्ल न आई। मुझे एक करोड़ नहीं दिए तो चार दिन बाद पांच विस्फोट करूंगा। सारा धंधा खराब कर दूंगा। इतने बड़े होटल में कुत्ते भी आकर नहीं भौंकेंगे। फिर पछताते रहना।"

"कहां बम लगाए हैं तुमने।" कमल राय का चेहरा घबराहट से भरा पड़ा था।

"मालूम करके क्या करोगे। बमों को पकड़कर होटल के बाहर फेंक दोगे।" उस आवाज में हंसी शामिल हो गई--- "कोई बात नहीं। ऐसा कर सकते हो तो करो। मैं बता देता हूं कि कहाँ बम लगाए हैं मैंने ?"

"कहां ?" कमल राय के होंठों से निकला।

"पार्किंग में कम से कम सत्तर-अस्सी गाड़ियां खड़ी है। उनमें से सिर्फ दो गाड़ियों में बम लगाए हैं। मतलब कि सत्तर-अस्सी गाड़ियों में से बम लगी दो गाड़ियां ढूंढ सकते हो तो ढूंढ लो। लेकिन सोच-समझ कर गाड़ियों के पास जाना, क्योंकि सिर्फ पांच मिनट पड़े हैं उनके फटने में।"

"पागल हो गए हो तुम। नशे में हो तुम। बम विस्फोट करने का मतलब जानते...।"

"जानता हूं। एक करोड़ रुपया ।" हंसी से भरी आवाज आई।

"भूल में हो। तुम्हें एक पैसा भी नहीं मिलेगा। तुम...।"

"मिलेगा। देखना। बहुत जल्दी मिलेगा। होटल चलाना है तो पैसा देना ही पड़ेगा मुझे।" इसके साथ ही लाइन कट गई।

कमल राय रिसीवर थामे रह गया। चेहरे पर हवाईंया उड़ रही थी। फोन पर ठीक कहा गया था कि सत्तर-अस्सी गाड़ियों में दो गाड़ियां ढूंढना कि बम किसमें लगे हैं जबकि वक्त पांच मिनट का था, असम्भव बात थी ।

इतने कम वक्त में कुछ नहीं किया जा सकता।

कमल राय ने होटल के मालिक धर्म शुक्ला को ये खबर देने का इरादा बनाया लेकिन ये सोचकर रिसीवर रखा कि इस पांच मिनट में पार्किंग में मौजूद लोगों की जान अवश्य बचाई जा सकती है। गाड़ियों के अधिकतर ड्राइवर और पार्किंग अटेंडेंट को शोर डालकर वहां से हटाया जा सकता है। इस विचार के साथ ही वो उठा और भागता हुआ बाहर निकल गया।

■■■

होटल के पार्किंग में, कतारों से लगी गाड़ियों में से एक कार में विस्फोट हुआ। कार के परखच्चे उड़ गए। उसके छोटे-छोटे पीस होकर, हवा में दूर तक उड़ गए। आसपास खड़ी गाड़ियों को भी तगड़ा नुकसान पहुंचा। यह तो अच्छा हुआ कि वक्त रहते कमल राय ने पार्किंग में से सब लोगों को चिल्ला-चिल्लाकर बाहर निकल आने को कहा था और जब विस्फोट हुआ तो वहाँ कोई नहीं था।

विस्फोट की आवाज बहुत जबरदस्त थी, जिसकी वजह से पूरे होटल में जाग हो गई। तब रात का "पौन" बज रहा था। होटल में सिर से पांव तक हलचल पैदा हो गई। अधिकतर लोग अपने कमरों से बाहर आ गए थे।

अभी वे ठीक से संभल भी नहीं पाए थे कि दूसरा विस्फोट हो। गया। वो भी पहले की तरह कानों को फाड़ देने वाला विस्फोट था। और इस बार विस्फोट के साथ पार्किंग में खड़ी कोरियाई वैन के परखच्चे उड़ गए। और इस विस्फोट के साथ जो नजारा पैदा हुआ, वो देखने लायक था।

बम लगाने वाले ने, कोरियाई वैन के नीचे बम लगाया था। विस्फोट में वैन के परखच्चे उड़े तो भीतर मौजूद नब्बे करोड़ के नोटों की, पांच-पांच सौ की गड्डियां हवा में हर तरफ ऐसे बिखरने लगी, जैसे बरसात में पानी की बूंदें बिखर कर गिरती हैं।

दूर खड़े जिन लोगों के पास गड्डियां गिरीं, जिनसे गड्डियां आ टकराई। पहले तो वे हक्के-बक्के रह गए। फिर जब नोटों को देखकर होश आया तो गड्डियों पर झपट पड़े और गुपचुप सी ये खबर आग की तरह फैलने लगी कि पार्किंग में पांच सौ की गड्डियां ही गड्डियां बिखरी पड़ी हैं।

कोरियाई वैन और उस कार में आग लगी हुई थी। परन्तु पांच सौ के नोटों की गड्डियों के लालच में लोग पार्किंग की तरफ दौड़ पड़े। जो लोग होटल के कमरों से विस्फोट की आवाज सुनकर आए थे, वो भी पार्किंग में बिखरी नोटों की गड्डियों की तरफ दौड़ पड़े थे।

■■■

इस वक्त किसी को इस बात की परवाह नहीं थी कि, बम विस्फोट क्यों हुए। किसने किए। जो भी आता, पूछता क्या बात है, फिर पार्किंग में से चीखती-चिल्लाती आवाजें सुनता। ढेर सारी भीड़ को बदहवासी में एक-दूसरे को धक्के देते देखता। जब मालूम होता कि नोटों की गड्डियों की बरसात हुई है तो वो भी दो- चार नोटों की गड्डियां पाने के लिए उस भीड़ में शामिल हो जाता।

बेदी, शुक्रा और उदयवीर हक्के-बक्के से एक तरफ खड़े ये सब देख रहे थे।

"किसी ने कोरियाई वैन बम से उड़ा दी है।" बेदी ने सूखे स्वर में कहा।

"ये काम ओबराय ने किया होगा। सिर्फ वही जानता है कि वैन में नब्बे करोड़ की दौलत ... ।"

"ओबराय ये काम नहीं कर सकता।" बेदी ने थके स्वर में कहा--- "ऐसा करके वो मुसीबत मोल नहीं लेना चाहेगा। प्रिया को रागिनी ने मारा है। नोटों को हाथ से जाते देखकर, गुस्से में रागिनी पुलिस को ये बयान दे सकती है कि उसने ओबराय के कहने पर प्रिया की जान ली है। ओबराय ऐसी हरकत करने की कोशिश नही करेगा।"

"तो फिर वैन में बम किसने लगाया।" उदयवीर गम्भीर था।

"यही तो समझ में नहीं आ रहा।" बेदी की हालत अजीब हो रही थी।

तीनों की निगाहें पार्किंग में ढेर सारी भीड़ पर थी। जो नोटों की गड्डियों की तलाश में, एक-दूसरे पर झपट रहे थे। अजीब-सा शोर-शराबा वहां हो रहा था।

"बहुत बुरा हुआ ये।" बेदी ने दुखी स्वर में कहा।

"मेरे ख्याल में अच्छा ही हुआ।" उदयवीर धीमे स्वर में बोला।

"क्या मतलब ?"

"इस नब्बे करोड़ की दौलत का ये ही हाल होना था।" उदयवीर पहले वाले स्वर में बोला--- "इस दौलत ने जिसके पास भी जाना था। उसी की जान ले लेनी थी। मनहूस दौलत थी ये। हमारे देखते ही देखते ये नब्बे करोड़, कई लोगों की मौत की वजह बनी। तुम भी इसके लालच में पड़ चुके थे। अगर ये नब्बे करोड़ खुद तबाह न होते तो, इसने तुम्हें भी नहीं छोड़ना था। अच्छा हुआ जो खुद ही तबाह हो गया रुपया।"

"हां उदय।" शुक्रा ने गहरी सांस ली--- "अच्छा हुआ जो विजय इस नब्बे करोड़ के पास नहीं रहा।"

बेदी ने कुछ नहीं कहा। जेब से वैन की चाबी निकाल कर एक तरफ फेंक दी। चेहरे पर ऐसे भाव थे, जैसे अपने हिस्से के पैंतालीस करोड़ जाने का बहुत दुःख हुआ हो।

तीनों की निगाहें पार्किंग की तरफ ही थीं।

एकाएक बेदी ने उदयवीर और शुक्रा पर निगाह मारी।

"अब हम इस होटल में नहीं रह सकते।" बेदी के होंठों से निकला।

"क्यों ?"

"वैन प्रिया की थी। होटल के रजिस्टर में भी उसका नम्बर दर्ज होगा और उसमें विस्फोट के साथ ही नोटों की गड्डियों की बरसात हुई है। करोड़ों रूपया, लोग लूट रहे हैं। कुछ करोड़ की गड्डियां जल भी गई होंगी। पुलिस के आते ही सबसे पहले वैन के मालिक को तलाशा जाएगा। वैन रागिनी की है। फौरन मालूम हो जाएगा। और इस वक्त तो मेरा नाम दर्ज है, होटल के रजिस्टर में, उसके पति के तौर पर। मुझे भी पुलिस धर लेगी और होटल के स्टाफ के कई लोग जानते हैं कि हम लोगों का, तुम दोनों के साथ उठना-बैठना है। ऐसे में हमारे साथ तुम भी बचने वाले नहीं। होटल से तुरन्त चलना ही, हमारे हक में रहेगा।"

"लेकिन वो छः लाख जो रागिनी के पास...।" उदयवीर ने कहना चाहा।

"ओ अभी रागिनी से ले लेंगे।" शुक्रा ने कहा ।

"अपने को बरबाद हुई पाकर रागिनी वो छः लाख नहीं देगी।" बेदी ने दोनों को देखा1

"कैसे नहीं देगी।" शुक्रा के चेहरे पर गुस्सा उभरा--- "मैं उसकी गर्दन उखाड़ दूंगा।"

"रागिनी नजर नहीं आई।" उदयवीर ने कहा--- "वो अपने कमरे में होगी। जल्दी से उसके पास चलो।"

तीनों वहां से हटे ही थे कि बेदी के होंठों से निकला।

"वो रही।"

उदय और शुक्रा की नजरें उस तरफ उठीं।

रागिनी होटल के मुख्य द्वार पर खड़ी पार्किंग की तरफ देख रही थी। रोशनी में उसका चेहरा पूरा चमक रहा था। उसकी उम्र अड़तीस बरस वाली, पूरी झलक रही थी। इस वक्त वो कुछ ज्यादा उम्र की और बदसूरत सी लग रही थी। चेहरा इस तरह निचुड़ा हुआ था कि जैसे जिस्म का सारा खून किसी ने निकाल लिया हो। बांहें बेजान सी होकर, जैसे झूल सी रही थीं।

"कहीं ये मर न जाए।" उदयवीर के होंठों से निकला।

"करोड़ों की दौलत जाते देखकर तो पड़ोसी भी मर जाए।" शुक्रा ने कहा--- "इसके तो दिल पर सीधी चोट लगी है।"

बेदी आगे बढ़ा और रागिनी के पास जा पहुंचा।

रागिनी ने खाली-खाली निगाहों से उसे देखा।

उदयवीर और शुक्रा भी पास आ गए थे।

"रागिनी।"

"विजय।" रागिनी का सूखा सा स्वर कांप रहा था। वो ठीक से बोल नहीं पा रही थी--- "मैं बरबाद हो गई। मेरा सब कुछ लुट गया। जिस दौलत के लिए मैंने सबको छोड़ा, वो मुझे छोड़ गई। मैं....।"

"हौसला रखो रागिनी।" बेदी ने धीमे-थके स्वर में कहा--- "शायद हमारी किस्मत में करोड़ों रुपया नहीं है। तभी ये...।"

"मैं बरबाद हो गई विजय। मैं...।"

"इस वक्त तुम्हें अपने पर काबू रखना चाहिए।" बेदी ने उसके कंधे पर हाथ रखा--- "वक़्त के साथ बराबरी नहीं की सकती। जो होना है, वो तो होना ही है। कुछ चीजें इन्सान के काबू में नहीं होती।"

रागिनी के फक्क चेहरे के होंठ हिले। कुछ कह नहीं सकी।

"मैं खुद बहुत परेशान हूं कि ये सब क्या हो गया।" बेदी ने उसे तसल्ली देने वाले ढंग में कहा।

"खाली हाथ हो गई। एक ही झटके में जैसे महल से निकलकर फुटपाथ पर आ खड़ी हुई हूं। ये भी समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं, कहां जाऊं। कोई भी तो नहीं है मेरा। फूटी कौड़ी भी पास में नहीं है।"

"ये अफसोस भरी बातें फिर कर लेना। बहुत बड़ी जिन्दगी पड़ी है। ये वक्त बरबाद करने के लिए नहीं है।"

रागिनी ने बेदी को देखा।

"वैन में किसी ने बम लगाया था ?" रागिनी ने पूछा।

"शायद। बिना बम लगाए, वैन को इस तरह उड़ाया नहीं जा सकता।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "लेकिन बम लगाने वाला नहीं जानता था कि वैन के भीतर करोड़ों की दौलत है। वरना वो बम न लगाता। करोड़ों की दौलत कोई यूं आग के हवाले नहीं करता। बल्कि उसे खुद पाने की कोशिश करता है।"

"तो...तो फिर वैन में बम किसने लगाया ?"

"मैं नहीं जानता।" बेदी ने उसका कंधा दबाया।

"यहां मत खड़े रहो।" शुक्रा बोला--- "कमरे में चलते हैं।"

"आओ।" बेदी ने उसकी बांह पकड़ी।

रागिनी से शायद चलने की भी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। बेदी ने एक हाथ उसके कंधे पर रखा और सहारा देने वाले ढंग में उसे लेकर होटल के भीतर की तरफ बढ़ा। उदयवीर और शुक्रा साथ ही थे।

चलते-चलते बेदी हौसला देने वाले ढंग में कह रहा था।

"जो भी हुआ। बहुत गलत हुआ। तुम नहीं जानती कि मैं खुद करोड़ों के नुकसान को सहन नहीं कर पा रहा हूं। लेकिन कभी-कभी न चाहते हुए, अनचाही बातें भी बर्दाश्त करनी पड़ती हैं।"

"ये सब बुरी बात हमारे साथ ही होनी थी।"

"किसी के साथ तो होना ही था। सबके साथ ही कभी-न-कभी बुरा होता है। बर्दाश्त करना पड़ता है। दिल पर पत्थर रखकर हमें हालातों का सामना करना ही है।" बेदी धीमे स्वर में कह रहा था और मन में था कि वो छः लाख रुपया, रागिनी से हासिल कर ले। ताकि ऑपरेशन कराकर, दिमाग में फंसी गोली निकलवा सके। यही वजह थी कि वो रागिनी को अपने साथ चिपकाए, उसे सहारा देने पर उतारू था।

रागिनी को लेकर, वो रागिनी के ही कमरे में पहुंचे। बेदी ने उसे कुर्सी पर बिठाया। शुक्रा ने उसे पानी पिलाया। बेदी ने दो-चार लाइनें और बोली कि उसे हौसला मिले। फिर बोला ।

"वो छः लाख दो। कम से कम मैं अपना ऑपरेशन तो करा लूं।"

रागिनी ने नजरें उठाकर बेदी को देखा। उसका चेहरा करोड़ों की बरबादी देखकर इस कदर निचुड़ गया था कि वो ठीक से पहचानने में नहीं आ रही थी।

"कौन सा छः लाख ?" उसके शब्द बता रहे थे कि उसे वास्तव में याद नहीं है छः लाख के बारे में।

"वही छः लाख, जो उदय से लिया था।" बेदी पुनः बोला।

शुक्रा और उदय की निगाहें रागिनी पर थी।

"मेरे पास तो नहीं है वो छः लाख।" रागिनी के सूखे से होंठ हिले ।

"तुम्हारे पास ही तो है। कुछ घंटे पहले कह रही थी कि ले लेना।" बेदी के होंठों से निकला।

रागिनी ने खाली-खाली निगाहों से बेदी को देखा।

"वो वैन में थे। आगे की सीटों के पास।"

"क्या ?" बेदी का मुंह खुला का खुला रह गया।

"झूठ बोलती है ये।" शुक्रा का स्वर सख्त हो गया।

"मेरे पास बचा ही क्या है जो झूठ बोलूं।" रागिनी का स्वर थका-टूटा था--- "मेरे अपने रुपये कुछ गहने भी वैन में थे। और वो सब कुछ अब नहीं रहा। कुछ भी नहीं बचा। होटल का 'बिल' देने तक को अब पैसे नहीं हैं।"

बेदी ने हड़बड़ा कर उदयवीर और शुक्रा की तरफ देखा ।

"ये.... ये तो कह रही है कि वो...वो छः लाख भी वैन में थे।" बेदी का चेहरा फक्क पड़ने लगा।

"मैं पहले ही कह चुका हूं कि झूठ बोल रही है। पैसा दबा लिया है।" शुक्रा शब्दों को चबाकर कठोर स्वर में कह उठा ।

तभी उदयवीर आगे बढ़ा और रागिनी के सूटकेस की तलाशी लेने लगा।

वहां गहरी खामोशी छा गई थी। रागिनी अपनी उम्र से ज्यादा नजर आ रही थी। आंखों के नीचे काली झाइयां गहरी होकर स्पष्ट चमक रही थी। चेहरे पर रौनक की जगह उजड़ापन नजर आ रहा था।

बेदी का चेहरा भी ये सोचकर लटक चुका था कि छः लाख न मिला तो क्या होगा ?

रागिनी के सामान की छानबीन करके उदयवीर गहरी सांस लेकर कह उठा।

"यहां तो कुछ भी नहीं है।"

"रुपये कहीं छिपा दिए होंगे।" शुक्रा की आवाज में तीखापन था--- "मैं देखता हूं।"

उसके बाद शुक्रा ने रागिनी के सामान के अलावा, कमरे और बाथरूम की अच्छी तरह छानबीन की। परन्तु छः लाख तो क्या, छः पैसे भी नजर नहीं आए।

"कहां हैं छः लाख ?" शुक्रा ने सख्त निगाहों से रागिनी को देखा।

"बता चुकी हूं। छः लाख और मेरे अपने पैसे भी सब वैन में थे।" रागिनी की जान निकली हुई थी--- "सब कुछ खत्म हो गया। मेरे पास कुछ भी नहीं है।"

"ये तो बहुत बुरा हुआ।” उदयवीर व्याकुल हो उठा।

शुक्रा के चेहरे पर झल्लाहट के भाव नजर आ रहे थे।

बेदी का चेहरा पीला-सा नजर आने लगा था। कुछ दिन बचे थे। कठिनता से बारह लाख का इन्तजाम किया था लेकिन छः लाख फिर कम हो गया। कैसे होगा ऑपरेशन ?

"विजय।" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में खामोशी तोड़ी।

बेदी ने उसे देखा।

"हमारा यहां ठहरना ठीक नहीं। होटल से निकल चलो।"

"अब मेरा ऑपरेशन नहीं हो सकेगा।" बेदी के स्वर में रो देने वाले भाव थे।

उदयवीर और शुक्रा की नजरें मिलीं।

रागिनी तो अपनी ही दुनिया में उजड़ी सी, गुम थी।

"यहां से निकलो।" शुक्रा विवशता से होंठ भींचे बोला--- "ये बात बाद में करेंगे।"

बेदी चाहकर भी कुछ नहीं कह सका। होंठ नहीं खुल सके।

"उदय। कमरे में जाकर सारा सामान समेटो।" शुक्रा ने उसे देखा।

उदयवीर तुरन्त बाहर निकल गया।

"आ विजय।"

"कहां जा रहे हो तुम लोग ?" रागिनी ने खाली-खाली निगाहों से बेदी को देखा।

"मालूम नहीं।" बेदी धीमे से कह उठा--- "लेकिन तुम्हें भी इसी वक्त होटल छोड़ देना चाहिए।"

"क्यों?"

"वो वैन तुम्हारी थी। पुलिस की जांच शुरू होते ही, ये बात फौरन मालूम हो जाएगी। और तुम भूल रही हो कि विस्फोट के बाद वैन से करोड़ों रुपयों की गड्डियां इधर-उधर बिखरी हैं। पुलिस के हत्थे चढ़ गई तो सारी उम्र जेल में ही बीत जाएगी। बम विस्फोट की जिम्मेवारी भी तुम पर डाल दी जाएगी। देर मत करो। भाग लो यहां से। दुःख-अफसोस बाद में कर लेना। वरना दुःख मनाने का भी वक्त नहीं मिलेगा।"

रागिनी ने सूनी-सूनी निगाहों से बेदी को देखा।

"कहां जाऊं। मेरे पास तो जगह भी नहीं है जाने की। कोई रिश्ता नहीं बचा।" वो खुद को पूरी तरह तबाही के कुएं में धंसी महसूस कर रही थी।

"कहीं भी जाओ। लेकिन होटल छोड़ दो अगर मुसीबतों से बचना चाहती हो।" बेदी ने होंठ भींच कर कहा।

"तुम्हारे साथ चलूं।"

"मेरे साथ।" बेदी ने बुझी निगाहों से उसे देखा--- "मेरा अपना कोई भरोसा नहीं और तुम मेरे साथ की इच्छा कर रही हो। उसका साथ पकड़ो, जिसे अपनी तो होश हो।"

तभी दरवाजे पर उदयवीर नजर आया। कंधे पर छोटा-सा एयरबैग था।

"चलो।"

बेदी और शुक्रा दरवाजे की तरफ बढ़े।

"दोस्त।" रागिनी का टूटा स्वर कानों में पड़ा ।

बेदी ने ठिठक कर, रागिनी की तरफ देखा ।

रागिनी ने अपने फीके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की और हाथ उठाकर हिलाया।

बेदी कुछ पलों तक रागिनी के निचुड़े चेहरे को देखता हुआ सोचने लगा कि जब ये मिली थी तो कितनी खूबसूरत थी। फिर ये सोच कर गहरी सांस ली कि उसकी अपनी जिन्दगी का भरोसा नहीं तो दूसरों की फिक्र क्या करनी। जवाब में बेदी ने भी हाथ हिलाया और बाहर निकल गया।

■■■

इक्कीस दिन

अगले दिन सूर्य की पहली किरण के साथ ही तीनों वापस शहर में जा पहुंचे। उदयवीर ने रात को होटल के बाहर से ही एक कार उठा ली थी। शहर के भीतर पहुंचकर उन्होंने कार छोड़ी और टैक्सी लेकर वे गैराज पर पहुंचे। रात से लेकर अब तक वे तीनों ही चुप-चुप से थे। उनके बीच कोई खास बातचीत नहीं हुई थी। वे कुछ कहते-बोलते भी तो क्या ?

उदयवीर ने गैराज खोला।

बेदी किसी से बात किए बिना केबिन में गया और रात का थका-टूटा फर्श पर ही जा लेटा। सोचों में दिमाग में फंसी गोली थी कि वो बाहर कैसे निकलेगी। बारह लाख में से छः लाख निकल गए। लगभग छः लाख ही बचे थे। कुछ ही देर में उसकी आंख लग गई।

उदयवीर और शुक्रा केबिन से बाहर आ गए। दोनों गम्भीर थे।

"अब क्या किया जाए शुक्रा।" उदयवीर ने धीमे स्वर में कहा।

"मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।" शुक्रा से कुछ कहते न बन पा रहा था।

"विजय की हालत समझ।" उदयवीर व्याकुल था--- "चंद दिनों की जिन्दगी बची है उसकी। ऐसे में वो न तो ठीक से खा सकेगा। न बात कर पाएगा। कुछ भी काम ठीक से नहीं...।"

"मैं सब समझता हूं। अब तू ही बता मैं क्या करूं।"

"विजय की जिन्दगी बचाने के लिए छः लाख चाहिए।"

शुक्रा के होंठों पर अजीब सी मुस्कान आ गई।

"छः लाख। खुद को भी बेच तो, तब भी इकट्ठा नहीं होगा।"

"कुछ कर शुक्रा।"

"मैं कुछ नहीं कर सकता। तू कुछ कर सकता है तो कर ले।"

"मैं... मैं छः लाख का इन्तजाम कहां से कर सकता हूं। अपना सब कुछ बेचकर भी नहीं कर पाऊंगा।"

"वही तो मैं कह रहा हूं कि इतनी रकम का इन्तजाम करना मेरे बस का भी नहीं है।" शुक्रा ने लम्बी सांस ली।

उदयवीर गम्भीर और बेचैन था।

"मैं घर जा रहा हूं। मां-बहन से मिल आऊं। वापसी पर खाना-पाना लेता आऊंगा।" उदयवीर बोला।

शुक्रा ने सिर हिलाया ।

"विजय का ख्याल रखना।"

शुक्रा ने कुछ नहीं कहा। उदयवीर भारी मन से बाहर निकल गया।

■■■

बीस दिन

बेदी गुमसुम सा था। बात करने को मन नहीं कर रहा था। वो जानता था कि छः लाख का इन्तजाम नहीं हो सकेगा। बारह लाख पूरे नहीं हो सकते और वो ऑपरेशन नहीं करा पाएगा। गोली मस्तिष्क में ही फंसी रहेगी। कुछ दिनों बाद वो मर जाएगा।

बेदी ने शुक्रा को देखा जो कैबिन की टेबल के पास खड़ा था। टेबल पर पांच-पांच सौ के नोटों की आठ गड्डियां बिखरा रखी थी और प्रिया वाले जेवरात पड़े थे जो उदयवीर ने लूटे थे। शुक्रा की निगाह कभी गड्डियों पर जाती तो कभी जेवरातों पर। बाहर गैराज के लड़के दो कारों के साथ चिपके हुए थे। उदयवीर उनके पास चक्कर लगाने के लिए, अभी केबिन से बाहर गया था।

"क्या देख रहा है।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा।

शुक्रा ने बेदी को देखा और गहरी सांस ली।

"मैं सोच रहा हूं, जितना सामने पड़ा है, इतना और मिल जाए तो तुम पर से सारी मुसीबतें दूर हो जाएंगी।"

"बहुत आसान है ये सोचना कि इतना और मिल जाए।" बेदी के चेहरे पर फीकी मुस्कान उभरी ।

"ठीक बोलता है तू। छः लाख कम नहीं होते।" शुक्रा ने होंठ भींचकर कहा--- "लेकिन तेरे को मरने के लिए इस तरह नहीं छोड़ा जा सकता। हाथ पर हाथ रख कर तो बैठा ही नहीं जाएगा।"

"तो क्या करेगा ?"

“मालूम नहीं।" शुक्रा ने कहा और नोटों की गड्डियों, जेवरात, पैसे लिफाफे में डाल दिए।

"सोचने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता।" बेदी ने फीकी आवाज में कहा।

शुक्रा ने कुछ नहीं कहा। बेदी पर निगाह मारकर खामोशी से बाहर निकल गया।

उदयवीर ठीक हो रही कारों के पास खड़ा था कि शुक्रा उसे एक तरफ ले गया।

"उदय। मैं डॉक्टर वधावन से मिलकर आता हूं।" शुक्रा ने कहा।

"वधावन से ?" उदयवीर की आंखें सिकुड़ी--- "क्यों ?"

"उससे बात करता हूं। शायद वो विजय के ऑपरेशन के लिए तैयार हो जाए।"

"छः लाख में ?"

"छः नकद । छ: उधार। कोशिश करने में क्या हर्ज है। हो सकता है बात बन जाए।"

"वो बूढ़ा सनकी डॉक्टर तुमसे बात करने को भी राजी नहीं होगा। वो खार खाया हुआ है कि हमने उसकी बेटी का अपहरण किया था कि वो बेदी का ऑपरेशन कर दे। ऐसे में अगर वो बारह लाख लेकर भी ऑपरेशन करता है तो बड़ी बात होगी।" उदयवीर ने उखड़े स्वर में कहा--- “ये बात तो आजमा ही चुके हैं कि उसे किसी दबाव में लाकर, उससे ऑपरेशन नहीं कराया जा सकता।"

"फिर भी बात करने में क्या हर्ज है। शायद...।"

"वो पागल इन्सान शायद वाले लोगों में नहीं आता।" उदयवीर ने बे-मन से कहा--- "फिर भी तुम बात करना चाहते हो तो इसमें मुझे क्या एतराज होगा। साथ चल पड़ता हूं मैं...।"

"तुम विजय के पास रहो। उसे अकेला छोड़ना ठीक नहीं।"

"ठीक है।"

"कुछ खिला देना उसे। नहीं तो इसी तरह बैठा रहेगा।" शुक्रा ने दुःख भरे स्वर में कहा।

उदयवीर ने हौले से सिर हिला दिया।

शुक्रा गैराज से बाहर निकल गया।

■■■