माँ का देहांत
14 जनवरी, 1907 को एडोल्फ हिटलर की माँ अपनी छाती में दर्द की शिकायत लेकर पारिवारिक डॉक्टर से मिलने गई, क्योंकि दर्द इतना अधिक था कि वह रात भर सो नहीं पाई थी। डॉक्टर ने उसकी जाँच की और पाया कि उसे स्तन कैंसर है, जो काफी बिगड़ चुका है।
एडोल्फ हिटलर सिसकियाँ भरने लगा, जब डॉक्टर ने बताया कि उसकी माँ गंभीर रूप से बीमार है तथा तत्काल शल्य-चिकित्सा करनी होगी। दो-चार दिन बाद ही 46 वर्षीय क्लारा हिटलर का ऑपरेशन किया गया और उसका एक स्तन निकाल दिया गया। लेकिन ऑपरेशन करने तक बहुत देर हो चुकी थी। उसकी बीमारी असाध्य कैंसर ने धीरे-धीरे उसके शरीर को खोखला कर दिया था। उसमें इतनी ताकत नहीं बची थी कि सीढ़ियाँ चढ़कर अपने फ्लैट तक पहुँच सके। अत: वे लिंज, ऑस्ट्रिया के निकट एक उपनगर में पहली मंजिल के एक फ्लैट में रहने चले गए।
समस्याएँ तब और बढ़ गईं, जब हिटलर अकादमी की प्रवेश-परीक्षा में फेल हो गया और उसकी माँ की हालत पहले से भी ज्यादा बिगड़ गई। इलाज दर्दनाक और महँगा था तथा दवा कैंसर से उत्पन्न फोड़ों पर सीधे ही लगानी होती थी। मरीज को फ्लैट की रसोई में शिफ्ट कर दिया गया, क्योंकि वह जगह अपेक्षाकृत गरम रहती थी। एडोल्फ बराबर अपनी माँ की हालत पर निगरानी रखता और घरेलू कामकाज—अर्थात् खाना पकाने एवं फर्श की सफाई आदि में भी मदद कर देता था। पर घर में हमेशा दवाइयों की बू भरी रहती।
वह तो अपना दर्द सह लेती थी, लेकिन एडोल्फ को माँ के कष्ट से बहुत तकलीफ होती। माँ की हालत धीरे-धीरे बिगड़ती चली गई और दिसंबर 1907 में क्रिसमस के त्योहार का मौसम आने तक वह मृत्यु के निकट पहुँच चुकी थी। 21 दिसंबर की सुबह, परिवार के क्रिसमस वृक्ष की चमकती रोशनी के बीच, वह सदा के लिए खामोश हो गई। एडोल्फ का सर्वनाश हो गया। उस डॉक्टर ने बाद में आकर मृत्यु प्रमाण-पत्र पर दस्तखत कर दिए। डॉक्टर ने बाद में बताया कि उसने कभी भी किसी व्यक्ति को इतना दु:खी होते नहीं देखा था जितना हिटलर अपनी माँ की मृत्यु से दु:खी था।
क्लारा हिटलर को दिसंबर में धुंध भरे एक दिन लिओडिंग के कब्रिस्तान में उसके पति की बगल में दफना दिया गया। उस कब्रिस्तान में उनका पुत्र एडवर्ड भी दफन था, जो एडोल्फ का छोटा भाई था और जिसकी छह वर्ष की आयु में खसरे से मृत्यु हो गई थी।
अगले दिन, क्रिसमस संध्या पर, हिटलर और उसकी बहनें डॉक्टर से मिलने गईं और उन्होंने चिकित्सा बिल का भुगतान कर दिया। डॉक्टर ने उस परिवार को बिल में कुछ रियायत भी दे दी, हालाँकि वह मरीज को देखने के लिए बहुत बार उनके घर भी गया था। एडोल्फ हिटलर ने डॉक्टर के प्रति बहुत आभार व्यक्त किया। हिटलर ने कहा, ‘‘मैं सदा आपके प्रति कृतज्ञ रहूँगा।’’
माता-पिता दोनों के चले जाने के बाद हिटलर ने अब फिर वियना की तरफ रुख किया और कला अकादमी में जाने का विचार किया। वह फरवरी 1908 में वहाँ से चला गया। लेकिन उस सुंदर प्राचीन शहर में हिटलर को हालात रास नहीं आए। स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि उसे पार्क की बेंचों पर सोना पड़ा और खैराती सूप रसोइयों में जाकर पेट भरना पड़ा। वियना में उसने जो कष्ट भरे दिन गुजारे, यही वह समय भी था, जब उसने राजनीति और नस्ल के बारे में अपनी अनेक धारणाएँ बनाईं, जिनके अपरिमित परिणाम बाद में सामने आए।
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