राजनगर, वर्तमान।

फाह्याज़, हसन और लियाकत डायनिंग टेबल पर थे। रात की घटना के बाद फाह्याज़ खुद को सामान्य दर्शाने की कोशिश तो कर रहा था लेकिन वास्तविकता ये थी उसका सिर भारी था और बदन बुखार से तप रहा था लिहाजा उसने सुबोध को विनायक के केस की फॉरेंसिक और पोस्टमार्टम रिपोर्ट मेल करने को बोलकर आज घर से ही उस मसले पर दिमाग खपाने का फैसला किया था, बशर्ते कि फील्ड में जाने का कोई अपरिहार्य कारण न टपक पड़ता। हसन स्कूल के लिए तैयार था जबकि लियाकत परस्पर दो कुर्सी के फासले पर बैठे अपने बेटे और पोते को घूर रहे थे, जिनके बीच वैसी ही खामोशी थी, जैसी खामोशी अक्सर मध्यमवर्गीय परिवारों में पास-पास बैठे टीनएजर बेटे और पिता के बीच देखने को मिल जाती है, जबकि हसन टीनएजर कहलाने से अभी सालों दूर था फिर भी न तो उसने पिता से बात करने की कोशिश की थी और न ही पिता ने उससे। लियाकत को आज सुबह-सुबह हैरान होने की एक वजह ये मिली थी कि हसन ने स्कूल जाने से बचने के लिए पेट दर्द का क्लासिक बहाना नहीं बनाया था बल्कि इसके विपरीत उसके चेहरे पर स्कूल जाने की खुशी नजर आ रही थी।

सभी ब्रेकफ़ास्ट सर्व होने का इंतजार कर रहे थे। किचन से ख़ट-पट की आवाज़ आ रही थी, जो मेड द्वारा पैदा की जा रही थी। थोड़ी देर बाद वह ब्रेकफ़ास्ट के मीनू में शामिल चीजों के साथ बाहर आयी और उन्हें टेबल पर रखने के बाद लियाकत से मुखातिब होकर बोली- “फ्रीज में पेस्ट्री नहीं है साब जी।”

“नहीं है?” लियाकत का माथा संकुचित हुआ, उन्होंने हसन पर दृष्टिपात किया- “कौन खा गया? अभी कल शाम मैंने पांच पीस देखे थे फ्रीज़ में।”

हसन ने कंधे उचकाकर अनभिज्ञता जताते हुए तिरछी निगाहों से फाह्याज़ की ओर देखा।

“मुझे तो मालूम भी नहीं था कि फ्रीज़ में पेस्ट्रीज रखे हुए हैं।” फाह्याज़ ने हड़बड़ाकर सफाई पेश की।

लियाकत, मेज से उठकर मेड के साथ किचन में चले गए। उन दोनों के जाने के बाद फाह्याज़ ने अपना रुमाल हसन की ओर बढ़ाते हुए कहा- “हाथ में लगा है और होठों के किनारों पर भी; जल्दी से पोंछ लो। मेरे बाप की निगाहें इस उम्र में भी काफी तेज़ हैं, आगे से काम थोड़ा और सफ़ाई से करना।”

हसन ने इस बात से प्रभावित हुए बिना कि उसकी चोरी पकड़ ली गयी है, रुमाल थाम लिया और हाथ व मुँह में लगे पेस्ट्री को पोंछकर उसे फाह्याज़ को लौटा दिया।

“जहाँ तक मुझे याद आता है, तुम किचन में चोरी तो नहीं किया करते थे।”

“मैंने चोरी नहीं की है। पेस्ट्रीज मेरे स्कूलबैग में हैं।” हसन ने नाराज भाव से कहा।

“हाँ-हाँ, लेकिन स्कूलबैग में खुद से तो पहुँचे नहीं होंगे? या उन्हें दादाजान ने तो रखा नहीं होगा?”

हसन कुछ कहने के बजाय टुकुर-टुकुर पिता को देखता रहा।

“अब बताओ भी कि....।”

“किचन में टोटल फाइव पेस्ट्रीज थीं।” फाह्याज़ की बात काटकर हसन ने यकायक मुँह खोला- “एक मेरे पेट में है एंड अदर फोर आर इन माय स्कूलबैग।”

“यानी कि चोरी का माल दोस्तों के साथ भी बाँटने का ख्याल है?”

“सारे फ्रेंड्स के साथ नहीं, केवल एक फ्रेंड के साथ। वह मेरी बेस्ट फ्रेंड है।”

“मेरी?” फाह्याज़ ने ‘मेरी’ शब्द पर खासा जोर देते हुए, बनावटी हैरानी जाहिर करते हुए कहा- “यानी कि लड़की है?”

हसन ने ‘हाँ’ में सिर हिलाया।

“तो कब से चल रहा है ये?” फाह्याज़ मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

“क्या?” हसन के चेहरे पर बड़ा सा प्रश्नचिह्न उभरा।

“यही; किचन से पेस्ट्रीज चुराकर बेस्टफ्रेंड को खिलाने का सिलसिला।”

हसन एक बार फिर तुरंत जवाब देने के बजाय मासूमियत से फाह्याज़ की ओर देखने लगा।

“कुछ दिनों से या कुछ महीनों से?” फाह्याज़ ने पूछा।

“ये फर्स्ट टाइम है।”

“ये क्रांतिकारी सलाह किसने दी तुम्हें कि पेस्ट्री खिलाने से दोस्ती मजबूत होती है?”

“इसमें मेरा एक मिशन है।” हसन ने धीमे स्वर में कहा- “आई वांट टू गेट क्लोजर विद तबस्सुम।”

“सीक्रेट मिशन है?” फाह्याज़ ने फुसफुसाहट भरे स्वर में पूछा।

“ज्यादा सीक्रेट नहीं है। आपके लिए तो बिल्कुल भी सीक्रेट नहीं है।”

हसन का उक्त कथन सुनकर फाह्याज़ की भंगिमायें गंभीर हो गयीं।

“मिशन क्या है?” उसने पूछा।

“कल रात आपके सपने में अम्मी आयी थी न?” जवाब देने के बजाय हसन ने पूछा।

फाह्याज़ उसे हैरत से देखता रह गया।

“इट्स नॉट अ रॉकेट साइंस अब्बू।” हसन ने उसका आशय भाँपकर झुंझलाते हुए कहा- “शोर सुनकर मेरी नींद खुल गयी थी तो मैंने आपको और दादाजान को बातें करते हुए सुन लिया था।”

“हाँ आयी थी।” फाह्याज़ की निगाहें बेटे के चेहरे पर ठहर कर रह गयी थीं, मानो उसके मन को पढ़ने की कोशिश कर रहा था।

“आई ट्राइड अ लॉट कि अम्मी मेरे सपनों में आये लेकिन कभी नहीं आयी बट जब मैंने सुना कि वो आपके सपनों में आयी थीं तो मुझे लगा कि आई शुड

ट्राई वन मोर टाइम विद अ न्यू स्ट्रेटेजी।”

“तुम क्या कह रहे हो?” फाह्याज़ ने हँसने की कोशिश की, ये जुदा बात थी कि उलझन के बोझ तले दबकर उसकी हँसी खुलकर बाहर न आ सकी- “तुम....तुम ड्रीम्स को कण्ट्रोल कैसे करोगे? तुम ये कैसे डिसाइड करोगे कि कौन तुम्हारे सपनों में आयेगा?”

“एक बार हमारी टीचर ने बताया था कि ड्रीम्स आर नथिंग बट अल्टरनेट मेनिफेस्टेशन ऑफ़ ऑउर डे बाय डे एक्टिविटीज। सो मैंने कई बार पूरे दिन अम्मी के बारे में सोचा; खाते वक्त, नहाते वक्त, सोते वक्त लेकिन वो मेरे ड्रीम्स में नहीं आयीं। एंड देन सडनली आई गॉट अ प्लान।”

“और इस प्लान में तुम्हारी वो बेस्ट फ्रेंड..क्या नाम बताया तुमने..हाँ तबस्सुम...वो तबस्सुम भी तुम्हारे इस प्लान में शामिल होगी।”

“उसी की हेल्प से तो प्लान सक्सेजफुल होगा।”

“वो क्या हेल्प करेगी तुम्हारी?”

“उसके अब्बू उसके सपनों में रेगुलर आते रहते हैं इसलिए मैं उसे फेवर में लेकर उससे ये ट्रिक मालूम करूँगा कि वो कैसे अपने अब्बू को सपनों में बुला लेती है। फिर मैं भी उसी ट्रिक से अम्मी को बुलाया करूँगा।”

“तो उसके अब्बू नहीं हैं?”

“साल भर पहले उसकी अम्मी-अब्बू का रोड एक्सीडेंट हुआ था, जिसमें उसके अब्बू की तो डेथ हो गयी लेकिन अम्मी कुछ दिन हॉस्पिटल में रहने के बाद ठीक हो गयीं।” हसन ने ‘नहीं’ में सिर हिलाते हुए कहा।

फाह्याज़ को समझ में नहीं आया कि क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करे। वह बस हसन को देखता रह गया। पेस्ट्री गायब होने की साधारण सी घटना के पीछे इतना बड़ा ‘राज़’ छिपा होने की तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। यकीनन बच्चों का मनोविज्ञान जितना दिलचस्प होता है, उतना ही भावुक भी करता है और उलझाता भी है। इस मनोविज्ञान को समझने और हैंडल करने की कुव्वत हर किसी में नहीं होती, फाह्याज़ में भी नहीं थी लेकिन फिर भी उसने कोशिश की।

“ठीक है। जब ट्रिक तुम्हें पता चल जाये तो मुझे भी बता देना।”

“डन।” हसन ने थम्ब्ज अप किया।

लियाकत को किचन से बाहर आता देख दोनों खामोश हो गए।

“आज तो हमें बिना पेस्ट्री के काम चलाना होगा।” लियाकत ने अपनी कुर्सी ग्रहण करते हुए, हसन पर दृष्टिपात करते हुए कहा- “सॉरी हसन, मैं दोपहर को बेकरी शॉप से दोबारा लेता आऊँगा।”

“इट्स ओके दादाजान।” हसन ने अपने लहजे में दोनों जहान की समझदारी

घोलते हुए कहा।

“और इसका भी पता लगाने की कोशिश कीजिएगा कि फ्रीज से पेस्ट्रीज कहाँ गयीं।” फाह्याज़ ने कनखियों से हसन की ओर देखते हुए कहा।

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हसीनाबाद, सन 1975।

“रात अपने पूरे शबाब पर है। संसार को ढकने वाले कुदरती शमियाने पर चमक रहा चाँदी की थाल सरीखा महताब अपनी दुधिया रोशनी बिखेर रहा है। सब कुछ यूँ शांत है कि मालूम होता है इंसानों की बस्तियां वीरान हो गयी हैं। पर कहीं कुछ है, जो शांत नहीं है, इसलिये शांत नहीं है क्योंकि आज पूरे चाँद की रात है। एक ऐसी रात है, जो मेरे लिए अभिशाप है।”

जमुना के पांवों की थरथराहट बढ़ गयी। उसका कलेजा जोर-जोर से उछलकर पसलियों से टकराने लगा। रात के ग्यारह बजने वाले थे और सर्दी के असर ने कस्बे को ठीक उसी तरह वीरान कर दिया था, जैसा अभी-अभी बरामदे में बैठे पशुपति ने कहा था। उसकी पीठ जमुना की ओर थी और सिर का पृष्ठभाग रॉकिंग चेयर की पुश्त से टिका हुआ था। कुर्सी पर हौले-हौले झूलते हुए वह पीपल के पेड़ के ऊपर चमक रहे पूरे आकार के चाँद को देख रहा था। पूनम की रात होने के कारण दूर जंगल से कबाइलियों के ढोल-नगाड़े और नाचने-गाने की आवाजें आ रही थीं। ठण्ड बढ़ चुकी थीं, सर्द हवाएं भी चल रही थीं लेकिन पशुपति बिना किसी असहजता के बैठा हुआ था। नीचे डाकबंगले के कंपाउंड में अँधेरा फैला हुआ था।

“मैं बरामदे में बैठा चाँद को देख रहा हूँ, जिसकी रोशनी न जाने कितनी बार मेरे अंदर छिपी दरिंदगी के उभरने का बायस बनी है, मुझे हैवान बनाने का जरिया बनी है। पहले मुझे इस चाँद से डर लगता है, फिर धीरे-धीरे मुझ पर एक उन्माद छाने लगता है, बदन थरथराता है और आँखों में खून उतरने लगता है। आज भी यही हो रहा है; मेरा डर जा चुका है, उन्माद भी गुजर चुका है, अब शरीर काँप रहा है और आँखें लाल हो रही हैं, जो संकेत है कि मैं किसी भी पल वो बनने वाला हूँ, जो मैं कभी नहीं बनना चाहता था। शायद आज रात मेरी हैवानियत का शिकार मेरा नौकर होगा, जो दरवाजे के पास खड़ा मुझे देख रहा है।”

पशुपति का आख़िरी कथन सुनते ही जमुना के हलक से घुटी-घुटी सी चीख निकल गयी। दहशत से उसके अंगों ने पसीना उगल दिया और उसकी निगाहें अनायास ही कुर्सी के हत्थे पर मौजूद पशुपति के हाथों पर चली गयीं, जहाँ भेड़िये की खाल जैसे काले-काले बाल उग आये थे। उसके नाखून भी बड़े-बड़े और

नुकीले हो गए थे।

जमुना के साँसों की लय बिगड़ने लगी। उसने मुँह पर हथेली रखी और जल्दी से दरवाजे की ओट में हो गया। अगर पशुपति का रुख उसकी ओर होता तो वह ये भी देख पाता कि चाँद पर ठहरी पशुपति की आँखें डूबते सूरज की तरह लाल हो रही थीं और भाव-भंगिमाएं ऐसी थीं, जैसे वह अपने भीतर बसी किसी दूसरी शख्सियत से जूझ रहा हो, किसी ऐसे को खुद पर हावी होने से रोक रहा हो, जिसके हावी होने के बाद वह, वह नहीं रह जाने वाला हो। उसकी हालत ठीक नहीं थी, उसके होंठ थरथरा रहे थे बावजूद इसके उसने वो तमाम बातें बड़े ही सहज भाव से और स्पष्ट बोली थीं, जो जमुना ने कुछ क्षण पहले सुनी थी।

“जमुना....क्या ये आप हैं?” सहसा पशुपति ने उसे लक्ष्य करके कहा।

दरवाजे की ओट में खड़े जमुना की हिम्मत न हुई कि कोई जवाब दे।

“जमुना?” इस बार पशुपति ने सख्त लहजे में पुकारा।

प्रत्युत्तर में जमुना काँपते हुए दरवाजे की ओट से बाहर आया और पाया कि पशुपति कुर्सी समेत दरवाजे की ओर घूम चुका था। वह सामान्य था। न तो उसके नाखून बड़े थे और न ही उसके हाथों पर भेड़िये की खाल जैसे बाल थे, जैसा कि थोड़ी देर पहले उसने देखा था।

‘तो क्या मैंने जो देखा, वह मेरा वहम था?’ जमुना ने खुद से पूछा। फिर जवाब भी खुद ही दिया- ‘नहीं...नहीं..वहम नहीं था।’ 

भीतर ही भीतर सहमते हुए और आँखों में असमंजस लिए हुए वह मूकदर्शक बना पशुपति को देखता रहा।

“डर रहे हो?” पशुपति ने हँसते हुए पूछा।

जमुना एक बार फिर मौन रहा।

“आप बड़े भीरू प्रवृत्ति के हैं जमुना प्रसाद।” पशुपति अबकी दफा खुलकर हँसा- “अरे भाई, मैं किताब पढ़ रहा था। वेयरवुल्फ वाली अपनी फेवरेट किताब- रूपांतरण।”

जमुना की नजर पशुपति के पहलू में गयी, जहाँ वाकई ‘रूपांतरण’ रखा हुआ था लेकिन उसे अच्छी तरह याद आ रहा था कि जब पशुपति वो बातें बोल रहा था तो चाँद की ओर देख रहा था, न कि किताब के पन्नों में झाँक रहा था। बहरहाल हकीकत जो भी रही हो लेकिन वह, पशुपति की एक और संदिग्ध हरकत से रूबरू तो हो ही चुका था।

“य..यहाँ..अँधेरे में..कैसे पढ़ पा रहे थे आप?” उसने लगभग मिमियाते हुए जुबान खोली।

“मैं अँधेरे में भी देख सकता हूँ।” पशुपति यकायक गंभीर हो गया- “और फिर

आज तो पूर्णिमा की रात है, मौसम साफ़ है, रोशनी की कमी कहाँ है। है क्या?”

“नहीं है।” जमुना ने इस बार लहजा सामान्य रखने की कोशिश करते हुए कहा।

“आप अभी भी डरे हुए हैं?” पशुपति ने मानो उसके अंतर्मन को टटोल लिया- “यकीन कीजिए भाई, मैं किताब ही पढ़ रहा था। मुझ पर विश्वास न हो तो लीजिए, खुद देख लीजिए।” पशुपति ने गोद में पड़ी हुई किताब उठाई और उसे जमुना की ओर बढ़ाते हुए आगे कहा- “पेज नंबर फिफ्टी फाइव से शुरू हो रहे नये सीन के पहले पैराग्राफ की लाइनें पढ़कर देखिए।” जमुना ने जब किताब नहीं थामा तो पशुपति ने उसे वापस अपनी गोद में रख लिया- “भयकथाओं को पढ़ने का वास्तविक आनंद तभी आता है, जब आप उन्हें पूरे फील के साथ पढ़ते हैं। आज पूर्णमासी है, कथानक में सीन भी वैसा ही था तो सोचा माहौल तैयार किया जाए।”

“आपने मुझे बुलाया क्यों था साब जी?” जमुना मुद्दे पर आ गया क्योंकि यहाँ रहना अब उसके लिए असह्य हो रहा था। जान बच जाने के बाद वह यहाँ से जल्द से जल्द लौट जाना चाहता था।

उसके सवाल पर पशुपति हद से ज्यादा गंभीर हो गया। वह उठा, उसके करीब आया।

“एक बहुत ही नायाब सीख देनी है आपको।” उसने सर्द लहजे में कहा।

जमुना की साँसें थमने लगीं।

“लालच बहुत बुरी बला होती है।” पशुपति ने उसके दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए कहा- “इस सबक को जीवन में उतार लीजिए।”

“य...ये सबक...ये सबक तो बचपन में ही सिखा दिया जाता है हर किसी को साहब जी।” जमुना ने हकलाते हुए कहा। पशुपति के फौलादी हाथ उसे अपने कंधे पर भारी महसूस हो रहे थे।

“लेकिन आपने तो जीवन में नहीं उतारा?” पशुपति ने तल्ख़ लहजे में कहा- “आप ही क्यों, लाखों में महज़ कुछ ही ऐसे होते हैं, जो इस मानवीय कमजोरी से पूरे जीवन महफूज रह पाते हैं। मुझे उम्मीद है कि आज से आप भी उन कुछ लोगों में शामिल होने की कोशिश करेंगे, अब जाइए।” जमुना छूटते ही जाने के लिए मुड़ा कि पशुपति ने उसे रोका- “सुनिए।” वह ठिठक गया- “मामूली से लगने वाले इस छोटे से सबक के लिए आपको देर रात यहाँ बुला लिया मैंने, जानना चाहते हैं क्यों?” जमुना मौन रहा तो जवाब उसने स्वयं दिया-“क्योंकि मौत हर बार सपनों में नहीं आती। हो सकता है इस बार हकीकत में आ जाए।”

सुनते ही जमुना के बदन में सनसनी भर गयी।