अनवर और आरिफ़ दोनों को इसका बड़ा अफ़सोस था कि कर्नल ने उन्हें स्टेशन जाने से रोक दिया। वे इससे पहले कर्नल डिक्सन या उसकी लड़की से नहीं मिले थे। सोफ़िया भी स्टेशन जाना चाहती थी। उसे भी बड़ी कोफ़्त हुई।
‘आप नहीं गये कर्नल साहब के साथ?’ आरिफ़ ने इमरान से पूछा।
‘नहीं।’ इमरान ने लापरवाही से कहा और च्यूइंगम चूसने लगा।
‘मैंने सुना है कि कर्नल साहब आपसे बहुत ख़ुश हैं।’
‘हाँ...आँ, मैं उन्हें रात भर लतीफ़े सुनाता रहा।’
‘लेकिन हम लोग क्यों हटा दिये गये थे?’
‘लतीफ़े बच्चों के सुनने लायक़ नहीं थे।’
‘क्या कहा? बच्चे!’ आरिफ़ झल्ला गया।
‘हाँ, बच्चे!’ इमरान मुस्कुरा कर बोला, ‘कर्नल साहब मुझे जवानी के इश्क़ के क़िस्से सुना रहे थे।’
‘क्या बकवास है?’
‘हाँ बकवास तो थी ही!’ इमरान ने संजीदगी से कहा, ‘उनकी जवानी के ज़माने में फ़ौजियों पर आशिक़ होने का रिवाज नहीं था! उस वक़्त की लड़कियाँ सिर्फ़ आशिक़ों से इश्क़ करती थीं!’
‘समझ में नहीं आता कि आप किस क़िस्म के आदमी हैं?’
‘हाँय। अब आप ये समझते हैं कि क़सूर मेरा है।’ इमरान ने हैरत से कहा, ‘कर्नल साहब ख़ुद ही सुना रहे थे।’
आरिफ़ हँसने लगा। फिर उसने थोड़ी देर बाद पूछा-
‘वो बन्दर कैसा था?’
‘अच्छा था!’
‘ख़ुदा समझे!’ आरिफ़ ने भन्ना कर कहा और वहाँ से चला गया।
फिर इमरान टहलता हुआ उस कमरे में आया जहाँ अनवर और सोफ़िया शतरंज खेल रहे थे। वह चुपचाप खड़ा हो कर देखने लगा। अचानक अनवर ने सोफ़िया को शह दी। उसने बादशाह को उठा कर दूसरे ख़ाने में रखा। दूसरी तरफ़ से अनवर ने हाथी उठा कर फिर शह दी। सोफ़िया बचने ही जा रही थी कि इमरान बोल पड़ा-
‘ऊँ...हूँह! यहाँ रखिए!’
‘क्या...’ सोफ़िया झल्ला कर बोली, ‘आपको शतरंज आती है या यूँही...बादशाह एक घर से ज़्यादा चल सकता है?’
‘तब वो बादशाह हुआ या केचुआ। बादशाह तो मर्ज़ी का मालिक होता है। यह खेल ही ग़लत है। घोड़े की छलाँग ढाई घर थी ऊँट तिरछा सपाटा भरता है, चाहे जितनी दूर चला जाये। रुख़ एक सिरे से दूसरे सिरे तक सीधा दौड़ता है और फ़रज़ी जिधर चाहे चले कोई रोक-टोक नहीं। गोया बादशाह घोड़े से भी बदतर है...क्यों न उसे गधा कहा जाये जो इस तरह एक ख़ाने में रेंगता फिरता है।’
‘यार, तुम वाक़ई बुक़रात हो।’ अनवर हँस का बोला।
‘चलो...चाल चलो!’ सोफ़िया ने झल्ला कर अनवर से कहा।
सोफ़िया सोच-समझ कर नहीं खेलती थी, इसलिए उसे जल्दी ही मात हो गयी।
अनवर उसे चिढ़ाने के लिए हँसने लगा था। सोफ़िया उसकी इस हरकत की तरफ़ ध्यान दिए बग़ैर इमरान से बोली—
‘आपने डैडी को तन्हा क्यों जाने दिया।’
‘मैं निहत्था हो कर नहीं जाना चाहता।’ इमरान ने कहा।
‘क्या मतलब?’
‘मैं उनसे कह रहा था कि मैं अपनी हवाई बन्दूक़ साथ ले चलूँगा, लेकिन वो इस पर तैयार नहीं हुए।’
‘क्या आप वाक़ई बन्दूक़ से मक्खियाँ मारते हैं?’ अनवर ने चंचल मुस्कुराहट के साथ पूछा।
‘जनाब!’ इमरान सीने पर हाथ रख कर थोड़ा-सा झुका फिर सीधा खड़ा हो कर बोला, ‘पिछली जंग में मुझे विक्टोरिया क्रॉस मिलते-मिलते रह गया। मैं हस्पतालों में मक्खियाँ मारने का काम करता रहा। इत्तफ़ाक़ से एक दिन एक डॉक्टर की नाक पर बैठी हुई मक्खी का निशाना लेते वक़्त ज़रा-सी चूक हो गयी। क़सूर मेरा नहीं, मक्खी का था कि वह नाक से उड़ कर आँख पर जा बैठी। बहरहाल, इस हादसे ने मेरी सारी पिछली ख़िदमात पर सोडा वॉटर फेर दिया।’
‘सोडा वॉटर!’ अनवर ने क़हक़हा लगाया। सोफ़िया भी हँसने लगी।
‘जी हाँ! उस ज़माने में ख़ालिस पानी नहीं मिलता था, वरना मैं यह कहता कि मेरे पिछले कारनामों पर पानी फेर दिया गया।’
‘ख़ूब! आप बहुत दिलचस्प आदमी हैं!’ सोफ़िया बोली।
‘मेरा दावा है कि मेरा निशाना बहुत साफ़ है।’
‘तो फिर दिखाइए न।’ अनवर ने कहा।
‘अभी लीजिए!’
इमरान अपने कमरे से एयरगन निकाल लाया। फिर उसमें छर्रा लगा कर बोला, ‘जिस मक्खी को कहिए!’
सामने वाली दीवार पर मक्खियाँ नज़र आ रही थीं। अनवर ने एक की तरफ़ इशारा कर दिया।
‘जितने फ़ासले से कहिए!’ इमरान बोला।
‘आख़िरी सिरे पर चले जाइए।’
‘बहुत ख़ूब।’ इमरान आगे बढ़ गया। फ़ासला अठारह फ़ुट ज़रूर रहा होगा।
इमरान ने निशाना ले कर ट्रिगर दबा दिया। मक्खी दीवार से चिपक कर रह गयी। सोफ़िया देखने के लिए दौड़ी। फिर उसने अनवर की तरफ़ मुड़ कर आश्चर्य से कहा—
‘सचमुच कमाल है! डैडी का निशाना भी बहुत अच्छा है...लेकिन शायद वे भी...’
‘ओह, कौन-सी बड़ी बात है!’ अनवर शेख़ी में आ गया। ‘मैं ख़ुद लगा सकता हूँ।’
उसने इमरान के हाथ से बन्दूक़ ली। थोड़ी देर बाद सोफ़िया भी इस काम में शामिल हो गयी। दीवारों का पलस्टर बर्बाद हो रहा था। उन पर मानो मक्खियाँ मारने का भूत सवार हो गया था। फिर आरिफ़ भी आ कर शामिल हो गया। काफ़ी देर तक यह खेल जारी रहा। लेकिन कामयाबी किसी को भी न हुई। अचानक सोफ़िया बड़बड़ायी, ‘लाहौल विला क़ूवत...क्या हिमाक़त है...दीवारें बर्बाद हो गयीं।’
फिर वे झेंपी हुई हँसी हँसने लगे। लेकिन इमरान की बेवक़ूफ़ी-भरी संजीदगी में तनिक भी फ़र्क़ न आया।
‘वाक़ई दीवारें बरबाद हो गयीं!’ आरिफ़ बोला, ‘कर्नल साहब हमें ज़िन्दा दफ़्न कर देंगे।’
‘सब आपकी बदौलत!’ अनवर ने इमरान की तरफ़ इशारा करके कहा।
‘मेरी बदौलत क्यों। मैंने तो सिर्फ़ एक ही मक्खी पर निशाना लगाया था।’
अनवर हँसने लगा। फिर उसने इमरान के कन्धे पर हाथ रख कर कहा।
‘यार, सच बताना, क्या तुम वाक़ई बेवक़ूफ़ हो?’
इमरान ने गम्भीरता से सिर हिला दिया।
‘लेकिन कल रात तुमने ड्रग्स की तस्करी के बारे में क्या बात कही थी?’
‘मुझे याद नहीं!’ इमरान ने हैरत से कहा।
‘फिर कर्नल साहब ने हमें हटा क्यों दिया था?’
‘इनसे पूछ लीजिएगा!’ इमरान ने आरिफ़ की तरफ़ इशारा किया और आरिफ़ हँसने लगा।
‘क्या बात थी?’ अनवर ने आरिफ़ से पूछा।
‘अरे, कुछ नहीं...बकवास!’ आरिफ़ हँसता हुआ बोला।
‘आख़िर बात क्या थी?’
‘फिर बताऊँगा।’
सोफ़िया इमरान को घूरने लगी।
‘वो बन्दर कैसा था?’ अनवर ने इमरान से पूछा।
‘अच्छा-ख़ासा था...आर्ट का एक बेहतरीन नमूना।’
‘घास खा गये हो शायद!’अनवर झल्ला गया।
‘मुमकिन है लंच में घास ही मिले।’ इमरान ने रोनी सूरत बना कर कहा, ‘नाश्ते में तो चने के छिलके खाये थे।’
तीनों बेतहाशा हँसने लगे। लेकिन सोफ़िया गम्भीर हो गयी। उसने ग़ुस्सायी आवाज़ में कहा।
‘आप डैडी का मज़ाक़ उड़ाने की कोशिश कर रहे थे। पता नहीं वे क्यों ख़ामोश रह गये।’
‘मुमकिन है उन्हें ख़याल आ गया हो कि मेरे पास भी हवाई बन्दूक़ मौजूद है।’ इमरान ने संजीदगी से कहा, ‘और हक़ीक़त ये है कि मैं उनका मज़ाक़ उड़ाने की कोशिश हरगिज़ नहीं कर रहा था...मैं भी विटामिन पर जान छिड़कता हूँ! विटामिनों को ख़तरे में देख कर मुझे पूरी क़ौम ख़तरे में नज़र आने लगती है।’
‘क्या बात थी?’ अनवर ने सोफ़िया से पूछा।
‘कुछ नहीं।’ सोफ़िया ने बात टालनी चाही, लेकिन अनवर पीछे पड़ गया। जब सोफ़िया ने महसूस किया कि जान छुड़ानी मुश्किल है तो उसने सारी बात दुहरा दी। इस पर क़हक़हा पड़ा।
‘यार, कमाल के आदमी हो।’ अनवर हँसता हुआ बोला।
‘पहली बार आपके मुँह से सुन रहा हूँ, वरना मेरे डैडी
तो मुझे बिलकुल बुद्धू समझते हैं।’
‘तो फिर आपके डैडी ही...’
‘अररर!’ इमरान हाथ उठा कर बोला, ‘ऐसा न कहिए! वे बहुत बड़े आदमी हैं...डायरेक्टर जनरल ऑफ़ इंटलिजेंस ब्यूरो!’
‘क्या?’ अनवर हैरत से आँखें फोड़ कर बोला, ‘यानी रहमान साहब!’
‘जी हाँ!’ इमरान ने लापरवाही से कहा।
‘अरे, तो आप वही इमरान हैं...जिन्होंने लन्दन में अमरीकी गुण्डे मैक्लॉरेंस का गिरोह तोड़ा था!’
‘पता नहीं आप क्या कह रहे हैं?’ इमरान ने आश्चर्य व्यक्त किया।
‘नहीं, नहीं! आप वही हैं।’ अनवर के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी थीं। वह सोफ़िया की तरफ़ मुड़ कर बोला, ‘हम अभी तक एक बड़े ख़तरनाक आदमी का मज़ाक उड़ा रहे हैं।’
सोफ़िया फटी-फटी आँखों से इमरान की तरफ़ देखने लगी और इमरान ने एक बेवक़ूफ़ी-भरा क़हकहा लगा कर कहा, ‘आप लोग न जाने क्या हाँक रहे हैं!’
‘नहीं सूफ़ी!’ अनवर बोला, ‘मैं ठीक कह रहा हूँ। मेरा एक दोस्त राशिद ऑक्सफ़ोर्ड में इनके साथ था। उसने मुझे मैक्लॉरेंस का क़िस्सा सुनाया था। वो मैक्लॉरेंस जिसका वहाँ की पुलिस कुछ नहीं बिगाड़ सकी थी, इमरान साहब से टकराने के बाद अपने गिरोह समेत ख़त्म हो गया था!’
‘ख़ूब हवाई छोड़ी है किसी ने!’ इमरान ने मुस्कुरा कर कहा।
‘मैक्लॉरेंस के सर के दो टुकड़े हो गये थे।’ अनवर बोला।
‘अरे तौबा-तौबा!’ इमरान अपना मुँह पीटने लगा, ‘अगर मैंने उसे मारा तो मेरी क़ब्र में कट्टर घुसे...नहीं बिघ्घू...भिगू... हाँय नहीं, ग़लत...क्या कहते हैं उस छोटे जानवर को जो क़ब्रों में घुसता है!’
‘बिज्जू!’ आरिफ़ बोला।
‘ख़ुदा जीता रखे...बिज्जू, बिज्जू!’
‘इमरान साहब, मैं माफ़ी चाहता हूँ!’अनवर ने कहा।
‘अरे, आपको किसी ने बहकाया है।’
‘नहीं जनाब, मुझे यक़ीन है।’
सोफ़िया इस दौरान कुछ नहीं बोली। वह बराबर इमरान को घूरे जा रही थी। आख़िर उसने थूक निगल कर कहा—
‘मुझे कुछ-कुछ याद पड़ता है कि एक बार कैप्टन फ़ैयाज़ ने आपका ज़िक्र किया था।
‘किया होगा...मुझे वह आदमी सख़्त नापसन्द है। उसने पिछले साल मुझसे साढ़े पाँच रुपये उधार लिये थे। आज तक वापस नहीं किये।’
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