इंस्पैक्टर जगतवीर सिंह बड़ा ही दबंग और सख्तमिजाज लेकिन ईमानदार पुलिस ऑफिसर था । चोटों के निशान से भरे चेहरे की तरह उसकी सर्द आँखें भी भावहीन थी । इसके बावजूद आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि कानून से खिलवाड़ करने वालों से उसे सख्त नफरत थी ।

गोविंदपुरी स्लम एरिया के थाने का इंचार्ज था वह । पूरे इलाके में उसका दबदबा था । जरायम पेशा लोग उससे दूर ही रहने में भलाई समझते थे । उसकी उम्र करीब पैंतालीस वर्ष थी मगर भारी कसरती जिस्म में ताकत और फुर्ती की कमी नहीं थी । उसकी पोस्टिग शहर के खतरनाक इलाकों के थानों में ही की जाती रही थी । इसीलिए उसे खतरनाक पुलिस अफसर समझा और कहा जाता था ।

अपने दल–बल सहित वहाँ पहुँचते ही वह आवश्यक कार्यवाही में जुट गया था ।

अब जलीस को गौर से देख रहा था ।

उसने धैर्यपूर्वक जलीस का बयान सुना फिर सोनिया की कहानी सुनी ।

उन दोनों से सरसरी पूछताछ पहले भी की जा चुकी थी ।

सोनिया का कथन खत्म होते ही बलराम सिंह, अमोलक और पीटर को साथ लिए आ पहुंचा ।

उन दोनों के आगमन से जलीस विचलित सा हो गया ।

"ये ही वे दोनों है, जनाब ।" बलराम बोला ।

इंस्पैक्टर के संकेत पर पीटर बिस्तर के पास पहुँचा ।

माला की लाश पर निगाह डालते ही वह सिसकारी लेकर रह गया ।

"इस लड़की को जानते हो ?" इंस्पैक्टर ने पूछा ।

"जी हाँ । इसका नाम माला सक्सेना है । अच्छी लड़की थी । में बरसों से इसे जानता था ।"

अमोलक ने भी यही जानकारी दे दी ।

इंस्पैक्टर के बुलावे पर पुलिस का एक डॉक्टर भी वहाँ आ पहुँचा था और लाश का मुआयना कर रहा था ।

उसने अपना काम खत्म करके लाश को चादर से ढक दिया ।

"किस नतीजे पर पहुँचे, डॉक्टर ।" इंस्पैक्टर ने पूछा ।

"फिलहाल मोटे तौर पर यही कहा जा सकता है कि इसकी मौत करीब घंटा भर पहले हुई थी । मौत की वजह बेरहमी से इसकी खोपड़ी को कूटा जाना था और इसके लिए सोडे की बोतल को बतौर हथियार इस्तेमाल किया गया लगता है ।" डॉक्टर ने कहा फिर जलीस की ओर सर हिलाया–"अगर इस पर भी बोतल से ही वार किया गया था तो बालों की तुलनात्मक जाँच से पता चल जाएगा । उस हालत में इसे आसानी से इसके लिए जिम्मेदार तुम नहीं ठहरा पाओगे ।"

"आपको यकीन है कि यह वाकई बेहोश रहा था ?"

डॉक्टर ने जलीस के सर के पृष्ठ भाग पर लगी चोट को मुआयना करने के बाद जवाब दिया–"इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि इस चोट की वजह से यह बेहोश हो गया था । लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह के केस में अक्सर लोग खुद भी ऐसी चोट लगा लिया करते हैं ।"

"शुक्रिया, डॉक्टर ।"

तभी सादा लिबास वाला एक आदमी, जिसे सोडे की बोतल फिंगर प्रिंट्स चैक करने के लिए दी गई थी, बोतल को एक छड़ में फंसाए आ पहुँचा ।

"इस पर किसी की उंगलियों के निशान नहीं मिले ।" वह बोला–"हो सकता है, खून के दागों के नीचे कोई निशान हो लेकिन उसके लिए पहले हमें बोतल को लेबोरेटरी भेजना होगा ।"

"ठीक है ।" इंस्पैक्टर ने कहा–"इसे पैक करा दो ।" फिर बलराम सिंह से पूछा–"इन दोनों के बारे में बताओ ।"

"ये गोल्डन एरो बार में थे । बार टेंडर का कहना है कि करीब तीन घंटे से ये वहीं थे और उसकी इस बात की पुष्टि एक वेटर ने भी की थी ।"

"हम जा सकते हैं इंस्पैक्टर ?" अमोलक ने पूछा ।

"तुम सब ।" इंस्पैक्टर ने बारी–बारी से सोनिया समेत उन चारों को घूरा–"मेरे साथ चलोगे ।"

"किसलिए ?" जलीस ने पूछा ।

इंस्पैक्टर कटुतापूर्वक मुस्कराया ।

"दिल बहलाने के लिए । मुझे एक दिलचस्प खबर मिली है । विक्टर की बार के पिछले कमरे में फर्श पर खून के धब्बे मिले और दीवार में घुसी दो गोलियाँ लेकिन यह पता नहीं लगा कि जख्मी कौन हुआ था । एक और खबर यह है कि इस वारदात से कुछ ही देर पहले तुम तीनों को वहाँ जाते देखा गया था ।"

"तो ?"

"मैं इस बारे में तुमसे खुलकर बातें करना चाहता हूँ और ऐसी बातें करने के लिए मेरे पास एक ही मुनासिब जगह है–पुलिस स्टेशन ।" इंस्पैक्टर दरवाजे की ओर बढ़ा–"कम ऑन, यू फोर ।"

 

* * * * * *

 

लगभग साढ़े आठ बजे ।

बरसों बाद एक बार फिर जलीस उस पुलिस स्टेशन में पहुँचा जहाँ पहले भी कई दफा वह आ चुका था । किसी प्रकार की कोई तब्दीली वहाँ उसे नजर नहीं आई ।

सोनिया, अमोलक और पीटर को बाहर ही बैंच पर बैठकर इंतजार करने के लिए कहा गया तो उन पर अलग–अलग प्रतिक्रिया हुई ।

पहले से ही सहमे पीटर को पसीने छूटने लगे और वह जल्दी–जल्दी सिगरेट के कश लेने लगा ।

अमोलक फिक्रमंद होते हुए भी स्वयं को बेफिक्र और सामान्य जाहिर करने की कोशिश कर रहा था ।

जबकि कुपित सोनिया ने बाक़ायदा शोर मचाना शुरु कर दिया कि उसे वहाँ क्यों लाया गया था ? क्यों इस तरह रोका जा रहा था ?

लेकिन जगतवीर सिंह पर इसका कोई असर नहीं हुआ ।

वह अपने तीन मातहतों सहित जलीस को अपने ऑफिस में ले गया ।

उन चारों के बीच घिरा खड़ा जलीस जगतवीर सिंह के इरादे को भाँप चुका था और तय कर चुका था कि खुद उसे क्या करना था ।

"मुझ पर चार्ज लगाना चाहते हो ?" उसने पूछा ।

"अभी नहीं ।"

"तुम बेवकूफ़ हो, इंस्पैक्टर ।"

जगतवीर सिंह तनिक मुस्कराया ।

"कोई चार्ज लगाए बगैर इस तरह मुझे यहाँ तुम नहीं रोक सकते ।"

"अच्छा ? तुम जाना चाहते हो ?"

"हाँ ।"

"तो जाओ ।"

स्पष्ट था, जगतवीर सिंह को बहाने की तलाश थी । वह जाहिर करना चाहता था कि पूछताछ के दौरान उसने भागने की कोशिश की थी और पुलिसवालों के इस पुराने तरीके से वह बखूबी वाक़िफ़ था ।

"जाने से पहले मैं यहाँ लाए जाने की असली वजह जानना चाहता हैं ।" वह बोला–"मेरे खिलाफ न तो यहाँ किसी ने शिकायत दर्ज करायी है और न ही कोई जुर्म मैंने किया है ।"

"यहाँ भले ही न किया हो लेकिन कहीं तो जुर्म जरुर किए हैं । और इतने ज्यादा किए हैं कि एक लंबी फ़ेहरिस्त उनकी बनायी जा सकती है । मैं जानना चाहता हूँ, तुम कहाँ से आए हो, जलीस ?"

"यह मैं नहीं बताऊंगा ।"

जगतवीर सिंह ने उसकी गरदन पर तगड़ा हाथ जमा दिया ।

इस अनपेक्षित वार ने जलीस का संतुलन बिगाड़ दिया और वह नीचे जा गिरा । वह धीरे से उठा और एक कुर्सी पर बैठ गया ।

"इसके बारे में क्या खयाल है तुम्हारा ?"

गुस्से के बावजूद जलीस मुस्कराया ।

"अगर तुमने दोबारा ऐसी हरकत की तो मैं तुम सबकी वो गत बना दूँगा कि हमेशा याद रखोगे ।" वह सर्द लहजे में बोला–"अगर यहाँ ऐसा नहीं कर पाया तो कहीं और मौका मैं ढूंढ लूँगा । इसलिए मुझे हाथ मत लगाना ।"

"धमकी दे रहे हो ?"

"नहीं । सिर्फ बता रहा हूँ, दोस्त ।"

"तो फिर कुछ और भी बता दो । मसलन, विक्टर की बार में क्या हुआ था ।"

"इस बारे में विक्टर से ही पूछो । बार का मालिक वह है ।"

"वह इतना ज्यादा डरा हुआ है कि कुछ नहीं बता पा रहा ।"

"वे सभी डरे हुए है ।"

"फिर भी ऐसा कोई आदमी हम ढूंढ़ निकालेंगे जिसने देखा था कि बार के पिछले कमरे में कौन–कौन थे और वहाँ क्या हुआ था ।"

"तो फिर जाओ और उनसे मेरे खिलाफ नामजद रिपोर्ट करा दो ।"

"तुम यहाँ के हालात और लोगों से पूरी तरह वाक़िफ़ लगते हो ।"

"बरसों पहले बरसों तक मैं खुद यहाँ रह चुका हूँ ।"

"ठीक कहते हो । उस वक्त का तुम्हारा रिकॉर्ड भी हमारे पास है, देखना चाहोगे ?"

"नहीं, मैं कई बार गिरफ्तार जरुर हुआ था । लेकिन या तो मेरे केस अदालत तक नहीं पहुँचे और अगर पहुँचे भी तो हर बार मुझे साफ बरी कर दिया गया ।"

"तुम मुझे सख्ती करने पर मजबूर कर रहे हो, जलीस ।"

"मैं सिर्फ असलियत बता रहा हूँ ।"

"मैंने सुना है, तुम रिवॉल्वर रखते हो ?"

"सुनने की बात छोड़ो । तुमने मेरी तलाशी ली थी । क्या मेरे पास रिवॉल्वर मिली ?"

"नहीं, लेकिन तुम्हारी बैल्ट की हालत ऐसी है जैसे कि तुम वहाँ होल्सटर में रिवॉल्वर रखते हो । तुम जैसा बदमाश इस तरह खुले आम रिवॉल्वर कब से रखने लगा ?"

"सुना है कि यह पहले भी खुलेआम रखता था ।" एक मातहत बोला–"और वो रिवॉल्वर इसने एक पुलिसमैन से छीनी थी जिसे इसने और इसके साथियों ने बेदर्दी से पीटा था ।"

"हाँ, याद आया । मैं तो भूल ही गया था कि पुलिसवालों के साथ मार–पीट करना इसकी आदत है । इसीलिए इसने मुझे भी धमकी दी थी । ठीक है न, जलीस ?"

जलीस ने जवाब नहीं दिया ।

"खैर, इस बारे में बाद में बातें करेंगे । पहले मैं जानना चाहता हूँ, तुम इस शहर में वापस क्यों आए हो ? अपने दोस्त के हत्यारे की तलाश में ?"

"हाँ ?" जलीस ने कहा ।

"लेकिन यह हम पुलिसवालों का काम है ।"

"तुम पुलिसवाले यह काम नहीं करना चाहते ?"

"क्यों ?"

"क्योंकि तुम लोग रनधीर की हत्या को 'अच्छा हुआ, बला टली' वाले ढ़ंग से ले रहे हो ।"

"तुम जानते हो, उसका हत्यारा कौन था ?"

"अभी नहीं ।"

"लेकिन तुम्हें यकीन है कि पता लगा लोगे ?"

"हाँ ।"

"फिर क्या करोगे ?"

"एक अच्छे शहरी की तरह उसे पुलिस के हवाले कर दूँगा ।"

"यह सब करने का मौका तुम्हें नहीं मिलेगा । क्योंकि हमने सुना है, यहाँ तुम्हारे दर्जनों दुश्मन है । और उनमें से कोई भी कभी भी तुम्हारी जान ले सकता है ।"

"ऐसी अफवाहें मैंने भी सुनी है और मैं पुलिस प्रॉटेक्शन लेने के बारे में सोच रहा हूँ ।"

जगतवीर सिंह मुस्कराता हुआ उसके पास आ गया ।

"तुम वाकई होशियार आदमी हो, जलीस ।" उसने कहा–"लेकिन तुम्हारी जुबान बहुत ज्यादा चलती है,और एक तगड़ा ।" हाथ उसकी गरदन पर जमा दिया ।

बचने की कोशिश करने के बावजूद जलीस कुर्सी समेत नीचे जा गिरा ।

वह धीरे–धीरे फर्श से उठा और सीधा खड़ा होते ही दायें हाथ का वजनी घूँसा इंस्पैक्टर की नाक पर जमा दिया ।

इंस्पैक्टर की नाक से खून बहने लगा । लेकिन इसकी परवाह न करते हुए उसने जलीस के पेट में दो घूँसे जड़ दिए । जवाब में जलीस ने भी दो घूँसे उसके चेहरे पर धर दिए । फिर अचानक जलीस के सर पर पीछे से डंडे का वार हुआ और वह औधे मुँह नीचे जा गिरा ।

इंस्पैक्टर के चेहरे पर कई स्थानों से खून बह रहा था । लेकिन वह गालियाँ बकता हुआ जलीस के बेहोश शरीर पर ठोकरें जमाता रहा ।

 

* * * * * *

 

होश में आने पर जलीस ने स्वयं को उसी तरह फर्श पर पड़ा पाया । उसने दाएं–बाएँ गरदन घुमाई ।

इंस्पैक्टर जगतवीर सिंह कुर्सी पर बैठा था और एक डॉक्टर उसके गाल पर टाँके लगा रहा था ।

दरवाजे में खड़ा विनोद महाजन हाथ में पकड़े एक कागज को हिलाता हुआ जोर–जोर से बोल रहा था । एक अन्य इंस्पैक्टर उसे खामोश कराने की कोशिश कर रहा था ।

जलीस के जिस्म का पोर–पोर दर्द कर रहा था । लेकिन वह उठकर बैठ गया । वह समझ गया कि उसकी पेशगी जमानत करायी जा चुकी थी ।

"तुमने यहाँ पहुँचने में बहुत देर लगाई, बीनू ।" वह बोला–

"बेवक्त ऐसे काम में देर लग ही जाती है ।" महाजन ने कहा ।

जलीस खड़ा हो गया और आग्नेय नेत्रों से घूरते इंस्पैक्टर से बोला–"तुम्हें फोन करने से पहले मैंने महाजन को फोन कर दिया था । मैं जानता था तुम मेरे साथ इसी ढंग से पेश आने की कोशिश की जाएगी ।"

"बको मत ।" इंस्पैक्टर गुर्राया–"दफा हो जाओ ।"

"मेरे तीनों दोस्त भी मेरे साथ जाएंगे ।"

"तुम आओ, जलीस ।" महाजन ने कहा–"इंस्पैक्टर उन्हें नहीं रोकेगा । अगर रोकता है तो मैं उनकी भी जमानत करा लूँगा और इसमें दस मिनट से ज्यादा नहीं लगेंगे ।"

डॉक्टर ने ड्रेसिंग खत्म करके एक प्रेसक्रिप्शन लिखकर जगतवीर को दिया तो उसने मुट्ठी में भींचकर उसे फर्श पर फेंक दिया ।

जलीस हँसा ।

"मैंने तुम्हें पहले ही आगाह कर दिया था कि मुझ पर दोबारा हाथ मत उठाना लेकिन तुम नहीं माने नतीजा तुम्हारे सामने है ।"

"दफा हो जा, गुंडे । अगली बार मैं तुझे नहीं छोडूंगा ।"

जलीस अपने कपड़े झाड़कर दरवाजे की ओर बढ़ गया । उसके पीछे महाजन था और सबसे पीछे जगतवीर सिंह था–क्रोधित एवं विवश ।

इंस्पैक्टर के चेहरे पर निगाह पड़ते ही पीटर की आँखें हैरानी से फैल गई । अमोलक पर हमेशा की तरह कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । लेकिन सोनिया पहली ही निगाह में सब भाँप गई कि क्या हुआ था और उसके जज्चात उसके वादे पर हावी होकर रह गए । उसकी खूबसूरत आँखों और हल्की लेकिन आकर्षक मुस्कराहट में 'आयम प्राउड ऑफ यू' वाले भाव थे ।

पुलिस स्टेशन की इमारत से बाहर आते ही महाजन ने कहा–"तुम पूरे पागल हो, जलीस ।"

"नहीं, बीनू ।"

"बेकार की बातें मत करो । जगतवीर अपनी इस तौहीन को कभी भूलेगा ।"

"तब तो उसे यह भी याद रखना पड़ेगा कि उसका सख्ती करने का रवैया मेरे साथ नहीं चलेगा ।"

"वह सिर्फ सख्त ही नहीं होशियार भी है । अगर वह चाहता तो तुम पर कोई भी चार्ज वह लगा सकता था । लेकिन ऐसा करने की बजाय उसने तुम्हें चले जाने देने की समझदारी दिखाई ताकि तुम पर दबाव बनाकर वह ज्यादा लुत्फ उठा सके । तुम जैसे लोगों के लिए उसके दिल में खास किस्म की नफरत है । अब तुम बाक़ायदा उसकी लिस्ट में आ गए हो । और इसका सीधा मतलब है–मौत की शक्ल में कानून का शिकंजा भी कसना शुरु हो गया है ।"

"तुम्हारी किस्मत अच्छी थी, जलीस ।" पीटर ने कहा ।

अमोलक पहली बार मुस्कराया ।

"इसकी ही नहीं हम सबकी भी । अगला नंबर हमारा ही होना था ।"

"देख रही हो, सोनिया ।" जलीस बोला–"मैंने कितनी बड़ी मुसीबत से तुम्हें बचा लिया ।"

उसके साथ चल रही सोनिया ने उसकी बाँह थाम ली ।

"धन्यवाद !" वह बोली–"उसने भी तुम्हें चोट पहुँचाई थी ?"

"नहीं, बेबी ।"

"जब यह बात फैलेगी कि जलीस ने जगतवीर सिंह की यह हालत की है ।" पीटर ने कहा–"तो पूरे इलाके में कोई भी बदमाश हमारे पास भी नहीं फटकेगा । सब समझ जाएंगे कि जगतवीर सिंह के हाथों इसकी मौत यकीनी है ।"

जलीस की बाँह पर सोनिया की उंगलियों का कसाब बढ़ गया ।

"क्या...वाकई ऐसा ही होगा, जलीस ?"

"हाँ, तुम्हारा अपना क्या खयाल है ?"

"यही ।" वह हिचकिचाती सी बोली–"तुम ठीक कहते हो ।"

"मुझे मरते देखने का इससे ज्यादा आसान तरीका भी और नहीं हो सकता । तुम्हें खुद से किया गया अपना वादा याद है ना ?"

"म...मैं उसे भूल जाना चाहती हूँ ।"

महाजन तनिक आगे खड़ा हाथ हिलाता हुआ एक टैक्सी को रोकने की कोशिश कर रहा था ।

"तब तो बेहतर होगा कि अभी से भूलना शुरु कर दो ।" जलीस ने कहा फिर उसे कुछ याद आया तो अपनी जेबें थपथपाने लगा और फिर बोला–"मेरा पर्स वहीं रह गया ।"

"ठहरो ।" महाजन पलटकर बोला–"मैं जाकर ले आता हूँ ।"

"नहीं ।" जलीस ने कहा–"मैं खुद ही जाऊँगा । पुलिस वालों से कोई डर मुझे नहीं लगता ।" और पलटकर वापस इमारत में चला गया ।

रिपोर्ट दर्ज कराने वाले कमरे में मौजूद हैड कांस्टेबल ने उसे कड़ी निगाहों से घूरा तो जलीस ने बताया कि उसका पर्स कहाँ रह गया था ।

हैड कांस्टेबल ने एक कांस्टेबल को पर्स लाने भेजा तो जलीस भी उसके पीछे चल दिया ।

कांस्टेबल कॉरीडोर में सीधा चला गया । लेकिन जलीस ने जगतवीर सिंह के दरवाजे को हौले से दस्तक देकर खोला और अंदर चला गया ।

वह कमरे में अकेला था । दो दर्द निवारक गोलियाँ पानी से निगलकर उसने यूं कुर्सी की पुश्त से पीठ सटा ली मानों पहले कभी उसे देखा ही नहीं था और उसके बोलने का इंतजार करने लगा ।

जलीस ने डेस्क के पास जाकर एक बालपैन उठाया और पैड पर एक टेलीफोन नंबर लिख दिया ।

"देखो दोस्त, मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे सर पर सवार होने की कोशिश करें । इस शहर में सही स्थानों में मेरे अपने भी सम्पर्क हैं । इसलिए हम दोनों की भलाई की ख़ातिर इस नंबर पर फोन कर लेना । लेकिन अगर तुम कुछ देर पहले यहाँ हुए वाकए को जाती दुश्मनी का दर्जा दे रहे हो तो जब चाहो मेरे साथ हिसाब बराबर कर सकते हो ।"

इंस्पैक्टर ने पैड पर निगाह डाली फिर बड़ी हिकारत से उसे घूरा ।

"तुम वाकई खुद को बड़ी चीज साबित करने की कोशिश कर रहे हो ?"

"ऐसी बात नहीं है ।" कहकर जलीस ने पूछा–"सोनिया ब्रिगेजा के बारे में तुम्हारी क्या राय है ?"

इंस्पैक्टर तनिक आगे झुक गया ।

"तुम उसे पसंद करते हो ?"

"जहाँ तक मैं समझता हूँ, वह अच्छी लड़की है और किसी भी मामले में इनवाल्व नहीं है ।"

इंस्पैक्टर कटुतापूर्वक मुस्कुराया ।

"करीम भाई दारुवाला या रनधीर के साथ चिपकी रहने वाली लड़की हर मामले में इनवाल्व होनी चाहिए ।"

"वे लोग बचपन के साथी थे ।"

"वे इससे भी ज्यादा कुछ थे । उनके ताल्लुकात बहुत गहरे थे । रनधीर ने उसके लिए दो बार स्पेशल स्टेज शो अरेंज कराए थे ।"

"मैने सुना है, रनधीर ने वो बिज़नेस के नज़रिए से किया था और उसमें मोटा मुनाफ़ा हुआ था ।"

"लेकिन सोनिया को जो शोहरत और स्टेज शो बिज़नेस में जो तगड़ा ब्रेक मिला उसकी कीमत रनधीर को कैसे चुकाई थी उसने...पैसे से ? तुम्हारी इस बात ने मुझे कुछ और सोचने पर भी मजबूर कर दिया है । हो सकता है, इस पूरे अर्से में तुम चाहकर भी सोनिया को नहीं भुला पाए और जब तुम यहाँ वापस आए तो अपने पुराने दोस्त को–तुमने ही ठिकाने लगा दिया था ताकि उसके माल और सोनिया को एक साथ हासिल कर सको ।"

"यह बिल्कुल बेबुनियाद है । इस तरह के तुम्हारे आइडिए से मुझ पर कोई असर होने वाला नहीं है ।"

"फिर भी यह अपने आप में एक आईडिया तो है ही । दोबारा आना तब हम इस बारे में और ज्यादा बातें करेंगे । मैं किसी भी वक्त तुम्हारे लिए बुलावा भेज सकता हूँ । क्योंकि अब से मेरी खास तवज्जो तुम्हारी ओर ही रहेगी ।"

"तुम चाहे जो भी करो लेकिन फोन करना मत भूलना ।" जलीस ने पैड की ओर इशारा करते हुए कहा ।"

"नहीं भूलूंगा ।"

कांसटेबल पर्स ले आया था । जलीस ने पर्स लेकर जेब में रखा और धन्यवाद देकर बाहर निकल गया । तब तक महाजन टैक्सी रोक चुका था । सब उसमें सवार हो गए ।

सबसे पहले महाजन को ड्राप किया गया । फिर पीटर और अमोलक को अपनी नई रिहाइश पर छोड़कर जलीस ने ड्राइवर को माला सक्सेना का पता बता दिया ।

टैक्सी पुनः आगे बढ़ गई ।

सोनिया ने जलीस की ओर गरदन घुमाकर चिंतित स्वर में पूछा–"वहाँ किसलिए चल रहे हो ?"

"अपनी रिवॉल्वर लानी है । उसे मैं कूड़े के ड्रम में छोड़ आया था ।"

संक्षिप्त मौन के पश्चात सोनिया बोली–"जलीस...।"

"हाँ ।"

"उसे वहीं क्यों नहीं छोड़ देते ?"

"किसे ?"

"रिवॉल्वर को ।" सोनिया पूर्णतया गंभीर थी–"उसके लिए कूड़े का ढेर ही सबसे सही जगह है ।"

"तुम चाहती हो, मैं सचमुच जल्दी मारा जाऊँ ?"

सोनिया की आँखों में गीलापन था । उसने होंठ काटते हुए गरदन दूसरी ओर घुमा ली ।

"तुम पागल हो ।"

उसका यह व्यवहार जलीस को अजीब लगा ।

"सोनिया...।"

"तुम्हारा जो जी चाहे करो ।" वह उसी तरह गरदन घुमाए बोली–"गोलियाँ बरसाओ । लोगों की जाने लो और साबित करते फिरो कि सबसे बड़े दादा हो । लेकिन एक बात अच्छी तरह समझ लो अगर तुमने किसी की जान ली तो पुलिस तुम्हारी जान ले लेगी और अगर पुलिस ने ऐसा नहीं किया तो कानून तुम्हें जरुर फाँसी चढ़ा देगा ।"

जलीस मुस्कुराया ।

"तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ?"

"क्या मतलब ?"

"अचानक मेरे लिए फिक्रमंद क्यों होने लगी ?"

सोनिया ने सर झटका और पलटकर उससे सट गई ।

"यह अचानक नहीं हुआ है, जलीस ।" वह मुस्कुराकर बोली–"बस यूँ समझ लो कि मुद्दत बाद तुम्हें दोबारा समझने में मुझे देर लगी है ।"

जलीस ने उसे बाँहों में कसकर उसके अधखुले नम होंठों पर चुंबन जड़ दिया ।

 

* * * * * *

 

कूड़े के ड्रम से रिवॉल्वर निकालने में जलीस को कोई दिक्कत पेश नहीं आई । उसे अच्छी तरह साफ करके होल्सटर को उसने वापस बैल्ट में कस लिया और पास ही मौजूद उस रेस्टोरेंट की ओर बढ़ गया जहाँ सोनिया उसका इंतजार कर रही थी ।

रेस्टोरेंट में प्रवेश करके वह सीधा पब्लिक टेलीफोन बूथ में जा घुसा और अपने नए निवास स्थान का नंबर डॉयल किया ।

दूसरी ओर से पीटर की आवाज़ सुनाई दी तो पूछा–"बता सकते हो दीना कहाँ मिलेगा ?"

"शायद होटल मोती महल में । पक्का पता लगाऊं ?"

"हाँ, तुमने उसके पीछे लग जाना है और जब तक मैं कांटेक्ट न करूँ अमोलक को रिपोर्ट देते रहना । समझ गए ?"

"हाँ ।"

"गुड ! अमोलक से बातें कराओ ।"

क्षणिक खामोशी के पश्चात् लाइन पर अमोलक का स्वर उभरा ।

"बोलो, जलीस ।"

"महाजन ने तुम्हें रनधीर के तमाम रिकॉर्ड दे दिए थे ?" जलीस ने पूछा ।

"क्या मतलब ?"

"मेरा मतलब है, तुम्हें पूरा यकीन है कि महाजन ने हर एक चीज तुम्हारे हवाले कर दी थी ?"

"महाजन के बारे में यकीनी तौर पर कभी कुछ नहीं कहा जा सकता ।" अमोलक ने बेहिचक जवाब दिया–"लेकिन मैं नहीं समझता कि तुम्हारे साथ वह चालाकी करेगा । मैने जो रिकॉर्ड तुम्हें दिए थे वे पूरे ही थे । रनधीर अपने सभी जायज धंधे कानून की सीमा में रहकर ही करता था । क्योंकि वह इनकम टैक्स या दूसरे टैक्सों के लफड़े में पड़ने में बहुत डरता था । इसलिए उसके कागज़ात में जो भी रिकॉर्ड थे सभी सही और कंमप्लीट थे ।"

"मेरा मतलब यह बिल्कुल नहीं है ।"

"तो फिर साफ–साफ बताओ ।"

"ओ.के.। विक्टर की बार में मिले कीमती और सलीके के लिबास वाले उन तीन आदमियों को मेरे साथ–साथ तुमने भी देखा था । मेरी तरह तुम भी जानते हो कि रनधीर के स्तर से उनका स्तर कहीं ज्यादा ऊंचा है । फिर भी वे उसकी आर्गेनाइजेशन में थे । सुलेमान पाशा और ऐसे ही दूसरे लोगों की तरह । मैं जानना चाहता हूँ, क्यों ? रनधीर ने उन्हें अपने साथ कैसे मिलाया ? और उन लोगों ने क्यों रनधीर को अपना बॉस मान लिया ?"

"यह एक ऐसी बात है, जलीस ।" कई सैकेंड की चुप्पी के बाद कहा गया–"जिसके बारे में कोई बात नहीं करता ।"

"तुम तो बात कर सकते हो ।"

"रनधीर बेहद चालाक था । इस मामले की असलियत उसने सिर्फ अपने तक ही महफूज रखी थी । फिर भी जहाँ तक मैं समझता हूँ ऐसे सब लोगों के कुछ खास राज, जो उनकी सबसे कमजोर नसें थी, उसके हाथ में थे । संभवतया किसी प्राईवेट फाइल की शक्ल में । जिसके दम पर वह उन पर जैसा चाहे दबाव डाल सकता था ।"

"तुम्हारे अनुमान में दम है । विक्टर की बार में सौदे की बात करते वक्त उनका इशारा ऐसी ही किसी चीज की ओर ही रहा होगा ।"

"मैंने अक्सर इस बारे में सोचा है । हालांकि रनधीर ने कभी बात तो नहीं की मगर वह जब और जैसे चाहता था किसी को भी नचा देता था ।"

"क्या उन नाचने वालों में महाजन भी शामिल था ?"

"नहीं, जलीस । महाजन इस नज़रिए से छोटी मछली था । जबकि रनधीर ने सिर्फ मगरमच्छ ही फँसाए हुए थे । उसके पास जो भी चीज थी वो अपने आप में 'पॉवर पैकेज' था ।"

"और वो पैकेज फाइल की शक्ल में था ?"

"ज्यादा उम्मीद तो इसी बात की है ।"

"तुमने किचिन में रखा फ्रिज देखा है न ?"

"हाँ, क्यों ?"

"उसके नीचे लकड़ी की चौकी नहीं है । वो अपने छोटे–छोटे पायों पर ही फर्श पर खड़ा है । तुम्हारे विचार से क्या वो पैकेज उसके नीचे छुपाया जा सकता था ।"

"अगर वो फाइल की ही शक्ल में है तो जरुर छुपाया जा सकता था ।"

"ठीक है, तुम पूरे अपार्टमेंट की तलाशी लो–चप्पा–चप्पा छान मारो । शायद वो तुम्हारे हाथ आ जाए । पुलिस वहाँ बारीकी से तलाशी ले चुकी है और संभवतया हत्यारा भी । लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ, वो चीज किसी को नहीं मिली । अगर मिल गई होती तो अब तक क्या बिग बॉस हुक्म चला रहा होता । मैं और पीटर तुमसे फोन पर कांटेक्ट करते रहेंगे इसलिए फोन के पास ही रहना ।

"ठीक है । तुम्हें मदद की जरुरत है ?"

"नहीं ।"

"तुम किसी से भिड़ने जा रहे हो ?"

"ऐसा ही समझ लो । लेकिन मैं उसे संभाल सकता हूँ ।"

"अरमान अली और फरमान अली से भी चौकस रहना । पीटर ने हालांकि कहा तो नहीं है लेकिन तुम्हारे अकेले घूमने की वजह से वह बेहद परेशान है...।" अचानक अमोलक का स्वर तेज हो गया–"एक खास बात और सुनने में आई है । आर्गेनाइजेशन को मज़हब के नाम पर बाँटने की साजिश चल रही है ।"

"मतलब ?"

"वही हिन्दू–मुसलमान का चक्कर है ।"

"किसलिए ?"

"दोनों को एक–दूसरे के खिलाफ भड़काकर हिन्दू और मुस्लिम इलाकों में फसादात कराने के लिए ।"

"यह नामुमकिन है । ऐसे काम 'शरीफ' सियासती लीडर ही कराया करते हैं–यही काम करने वाले किराए के गुंडों से । जरायम पेशा लोगों की आर्गेनाइजेशन को न तो इस बिना पर बाँटा जा सकता है और न ही उनसे यह कराया जा सकता है ।"

"लेकिन यह अफ़वाह जोरों पर है । मंदिर–मस्जिद के झगड़े को स्थानीय मुद्दा बनाकर यहाँ भी बड़े पैमाने पर आगजनी, लूटपाट और खून–ख़राबा कराए जाने की तैयारियाँ की जा रही हैं ।"

"यह किस पागल के दिमाग की उपज है ?"

"यह तो पता नहीं लेकिन सुलेमान पाशा और दारुवाला के नाम सुनने में आए हैं । ठीक सातवें रोज बड़ी भारी गड़बड़ होगी ।

जलीस हँसा ।

"फ़िक्र मत करो । ऐसा कुछ नहीं होगा । क्योंकि उससे पहले ही हालात बिल्कुल बदल चुके होंगे । वैसे तुम्हारा क्या खयाल है, मज़हब के बारे में ?"

"यह हर एक का अपना जाती मामला है । अपना विश्वास और आस्था है । मैं हिन्दू हूँ लेकिन इस नाते दूसरे मजहबों को बुरा या घटिया मैं नहीं मानता । तुमने मुझसे यह क्यों पूछा ?"

"क्योंकि मैं मुसलमान हूँ । हालांकि न तो मैंने कभी नमाज पढ़ी है और न ही रोजा रखा । फिर भी उन सभी लोगों से खुद को बेहतर समझता हूँ जिनका ईमान पैसा है और अपनी खुदगर्जी के लिए जो धोखा और फरेब, से लेकर हर बुरे से बुरा काम करने के लिए तैयार रहते हैं । चाहे वे रोजा और नमाज के पाबंद मुसलमान हों या फिर रामनामी लपेटकर सुबह शाम मंदिर में घंटिया बजाने वाले हिन्दू । क्योंकि वे सिर्फ ढ़ोंगी और कपटी होते हैं । जबकि हम लोग ऐसे नहीं हैं । हमें अच्छा और शरीफ नहीं समझा जाता न ही ऐसा समझा जाने के लिए कोई ढोंग हम करते हैं । हम जो हैं खुलेआम और सबके सामने हैं । लेकिन न तो किसी भले आदमी को कभी हमने सताया है और न किसी की मजबूरी से फायदा उठाने की कोशिश की हैं न किसी के साथ दगाबाजी या वादा खिलाफी की और न ही अपने फायदे के लिए कभी झूठ, धोखा या फरेब का सहारा लिया है । यही हमारा ईमान है । यही मज़हब है और यही वजह है कि तुम हिन्दू और पीटर ईसाई होकर भी मेरा साथ देते हो । शराफ़त और इंसानियत के लबादे में लिपटे हैवानों और अपने फायदे की ख़ातिर मज़हब को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने या मज़हब की तिजारत करने वाले सफेद पोश ऊँचे लोगों से हम गुंडे बदमाश लाख दर्जे बेहतर है ।"

"मुझे खुशी है कि आज भी तुम्हारे विचार बदले नहीं हैं, जलीस । तुम तकरीर भी अच्छी कर सकते हो । सियासत में चले जाओ तो यकीनी तौर पर कामयाब हो जाओगे ।"

"तारीफ के लिए शुक्रिया, दोस्त । लेकिन आजकल की सियासत एक व्यापार है । भाई लोगों ने इसे निहायत घटिया और गंदा एक ऐसा धंधा बना दिया है जिसे दौलत या शोहरत के भूखे बेईमान लोग ही आमतौर पर अपना पेशा बना रहे हैं । ऐसे धंधे में अपनी गुजर नहीं हो सकती, दोस्त ।" जलीस ने कहा–"अब तुम मज़हब के और सियासत के किस्से को भुलाकर तलाशी का काम शुरु कर दो और फोन की घंटी पर कान लगाए रखना ।"

"ठीक है ।"

जलीस संबंध विच्छेद करके पलटा तो बाहर खड़ी सोनिया को बूथ के शीशे के दरवाजे से अपनी ओर ही देखती पाया ।

वह दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला ।

"तुम यहाँ क्यों खड़ी हो ?"

"अकेली बैठी बोर हो रही थी । अब कहाँ चलना है ?"

"सुलेमान पाशा के पास ।"

"मैं भी साथ चलूँगी ।"

"ओ के मैडम ।" जलीस ने कहा और उसकी पीठ में हाथ डाले दरवाजे की ओर बढ़ गया ।

 

* * * * * *

 

सुलेमान पाशा को ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं हुई ।

स्थानीय राजनीति में उसका अपना खास मुकाम था । उसे इस मुकाम तक पहुँचाने में इस बात का भी बड़ा हाथ था कि वह हर वक्त सबसे मिलने के लिए तैयार रहता था और दोस्त या दुश्मन का फर्क किए बगैर सबसे मिलता था ।

उस वक्त वह मशहूर होटल जहाँगीर के अनारकली रेस्टोरेंट में जैकी के साथ डिनर ले रहा था । उनकी मेज लगभग कमरे के बीच में थी । दर्जनों दूसरी मेजों से घिरी हुई ।

आस–पास किसी मसलमैन को न पाकर जलीस समझ गया या तो वे वहाँ थे ही नहीं या फिर उसे देखकर खिसक गए थे ।

उन दोनों में किसी से भी पूछे बगैर जलीस ने अपने और सोनिया के बैठने के लिए दो खाली कुर्सियाँ खींच ली । लेकिन उन दोनों में से किसी ने भी ऐसी प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की कि अन्य किसी ग्राहक का ध्यान उनकी ओर आकर्षित होता । फिर लगभग दोस्ताना अंदाज में पाशा ने वेटर को बुलाकर उनके लिए दो कॉफी का आर्डर दे दिया ।

"क्या तुम मेरा ऑफर कबूल करने के लिए तैयार हो ?" पाशा ने पूछा ।

जैकी ने धीरे से सर ऊपर उठाया । उसके चेहरे से साफ जाहिर था कि पाशा के उस ऑफर से कोई ताल्लुक उसका नहीं था ।

"अगर मैने कबूल किया ।" जलीस बोला–"तो मेरी कीमत दोगुनी होगी ।"

"मंजूर है ।" पाशा ने बेहिचक कहा–"बोलो ?"

"अभी नहीं । पहले मुझे कुछ और करना है ।"

"जलीस ।" जैकी उसका हाथ थपथपाकर बोला–"अब तुम सिर्फ एक ही काम करोगे–जान गँवाओगे । इतनी ताकत तुम्हारे पास नहीं है कि यहाँ हुक्म चला सको ।"

"तुम्हारी याददाश्त काफी कमजोर है, जैकी । मेरी ताकत का नमूना विक्टर की बार में देखने के बाद भी तुम ऐसा कह रहे हो ।"

जैकी का मुँह लटक गया ।

"वैसा ही नमूना मैं यहाँ भी दिखा सकता हूँ ।" जलीस का कथन जारी था–"अगर यकीन नहीं है तो इसी तरह बकवास करते रहो ।"

जैकी ने अपने खुश्क हो गए होंठों पर जुबान फिराई ।

"तुम पागल हो ।"

वेटर आया और कॉफी सर्व करके चला गया ।

"आजकल तुम्हारा सियासत का धंधा कैसा चल रहा है, पाशा ।" जलीस ने पूछा ।

"तुम्हें कैसा नजर आया ?"

"एकदम मंदा । तभी तो तुमने मज़हबी फसाद कराने की तैयारियाँ करा रखी है ।"

पाशा ने फौरन यूं आस–पास देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा था फिर जलीस को घूरा ।

"क्या बक रहे हो ?" उसके धीमे स्वर में पैनापन था ।

"वही, जो सुना है । क्या इस काम में तुम्हारे साथ जैकी भी शामिल है ?"

"तुम पागल हो गए हो । तुम्हारी इस बकवास पर कोई भी यकीन नहीं करेगा ।"

"यकीन दिलाना मुझे आता है और पागल मैं नहीं, तुम हो गए हो । इसीलिए मज़हबी फसाद की आग पर अपनी सियासत की रोटियाँ सेंकने जैसा हैवानी काम करने वाले हो । लेकिन तुम्हारा यह मंसूबा कभी पूरा नहीं होगा । क्योंकि जिस सातवें रोज के लिए तुमने तैयारियाँ करा रखा है । वो दिन तुम्हें देखना नसीब नहीं होगा । तुम उससे पहले ही अल्लाह मियाँ के पास पहुँच जाओगे ।"

"यही कहने यहाँ आए हो ?"

"नहीं । यह तो मैने सिर्फ तुम्हें आगाह करने के लिए कहा है ।"

"और क्या कहना चाहते हो ?"

"कहना नहीं, पूछना है–वो कौन सी तलवार थी जिसे रनधीर ने तुम्हारे सर पर लटकाया हुआ था ?"

पानी का गिलास उठाने के लिए बढ़ा पाशा का हाथ बीच में ही रुक गया ।

"क्या मतलब ?"

"मतलब तुम अच्छी तरह समझ रहे हो ।"

"नहीं ।"

"मैं समझाता हूँ । रनधीर दूर की सोचता था और उसकी निगाह तेज थी । इस बात की भी पूरी जानकारी उसे थी कि आने वाले कल में कौन कितना ताकतवर हो सकता था । जिन लोगों के बहुत ज्यादा ताकतवर होने की संभावना थी । वह उनके पीछे लग गया और उन सबकी कमजोर नसें अपने हाथ में ले ली । वह जब भी जिसे इस्तेमाल करना चाहता था उसकी वो नस दबा देता था ।"

पाशा कुछ नहीं बोला ।

जैकी ने पुनः सर झुका लिया ।

"तुम्हारी कौन सी कमजोर नस उसके हाथ में थी, पाशा ?" जलीस ने पुनः पूछा ।

"पता नहीं, तुम क्या बक रहे हो ?"

"मुझसे उड़ने की कोशिश मत करो । रनधीर को मुझसे ज्यादा कोई नहीं जानता था वह मेरे लिए खुली किताब की तरह था । इसी तरह मैं उसके लिए था । सत्रह साल पहले हमने आर्गेनाइजेशन के ऑपरेशन का एक प्लॉन बनाया था और वो यही था । वो लॉग रेंज प्लॉन थी और हमारे दिमागों की उपज नहीं थी क्योंकि तब हमारी उम्र कम ही थी और उसी हिसाब से सोच का दायरा भी बड़ा नहीं था । उस प्लॉन को बनाने, अमल में लाने और सौ फीसदी कामयाब बनाने का पूरा आईडिया हमने एक उपन्यास से लिया था । फिर अपने हिसाब से पूरी तरह ठोंक बजाकर देखने के बाद ही उसे अंतिम रूप दिया था । और फिर उसी रोज से रनधीर ने उसे अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया था । हम जानते थे टॉप पर पहुँचने की हमारी मंज़िल के लिए वो शार्टकट था और यही वजह थी कि रनधीर जल्दी टॉप पर पहुँच गया और देर तक उसी पोजीशन पर बना रहा ।

पाशा पुस्कुराया ।

"अगर तुम्हें इतनी जानकारी है तो इस बाजी के तीनों इक्के तुम्हारे पास है ।" उसका स्वर उपहासपूर्ण था–"लेकिन तीन इक्के तो क्या तीन पत्ते भी तुम्हारे पास नहीं है वरना तुम दिखा देते ।"

"पत्ते तुम लोगों ने खुद बाँटे है । फिर भी अगर तुम्हें नजर नहीं आ रहे हैं तो तुम सब अंधे हों ।" जलीस मुस्कुराकर उसी के स्वर में बोला–"रहा सवाल दिखाने का तो उसके लिए अभी देर है । अभी तो बाजी शुरु हुई है । मोटी चालें चली जानी और फिर शो करायी जानी बाकी है ।"

पाशा कई पल गौर से उसे देखता रहा ।

"नहीं, जलीस ।" अंत में बोला–"तुम ब्लफ कर रहे हो और तुम्हारे इस झाँसे में मैं नहीं आने वाला । तुम्हारे पास कुछ नहीं है । तुमसे कोई खतरा भी मुझे नहीं है ।"

"किसी को तो खतरा जरुर है और इतना ज्यादा है कि मुझे खत्म कराने के लिए उसे बाहर से गनमैन बलाने पड़े हैं ।"

"अच्छा ? और तुम समझते हो यह मेरा काम है ?"

"नहीं । मैं नहीं समझता कि अपने गनमैन होते हुए बाहर से किसी को बुलाने के पचड़े में तुम पड़ोगे ।" जलीस ने जैकी पर निगाह डाली–"अलबत्ता तुम्हारा यह दोस्त जैकी ऐसी बात जरुर सोच सकता है ।"

जैकी ने झटका सा खाकर सर ऊपर उठाया और सहमी निगाहों से आस–पास देखा ।

"लेकिन यह सिर्फ सोच ही सकता है । इसने ऐसा किया नहीं । यह जानता है इसका क्या अंजाम होगा । इतना बेवकूफ़ मैं नहीं हूँ कि पीछे का इंतजाम करके न रखू । अगर उन्होंने मुझे मार दिया तो फिर सबसे पहले जैकी को मरना पड़ेगा । असलियत यह है कि जैकी की भलाई मेरे जिंदा रहने में ही है ।"

पाशा ने खोजपूर्ण निगाहों से उसे देखा फिर तनिक आगे झुक गया ।

"एक बात बताओ, जलीस । तुम कहाँ से आए हो ? सत्रह साल का लंबा अर्सा तुमने कहाँ गुजारा ?"

"इस शहर से बहुत दूर ।"

"तुम वहाँ क्या थे ?"

जैकी के साथ–साथ सोनिया की निगाहें भी उस पर और जलीस पर जम गई थीं ।

जलीस मुस्कुराया ।

"मैं ऐसी चीज था कि तुम सोच भी नहीं सकते ।"

इतनी बड़ी चीज कि अगर तुम मारे गए तो तुम्हारे आदमी यहाँ आकर मौत बरसाना शुरु कर देंगे ?"

जलीस की बाँह पर रखा सोनिया का हाथ कस गया ।

"तुम बिल्कुल ठीक समझ रहे हो, पाशा । यह मेरा अपना प्राइवेट मिशन है । लेकिन वे लोग भी पूरी तरह तैयार है ताकि जरुरत पड़ने पर उन्हें बुलाया जा सके । मेरी मौत के बाद तो वे खुद ही आ पहुँचेगे ।"

अचानक जलीस कहकहा लगाकर हँस दिया ।

पाशा के चेहरे से स्पष्ट था कि इस पर जरा भी शक उसे नहीं था । उसे यकीन हो गया था कि जलीस का एक–एक शब्द सही था । कुछेक पल सोचने के बाद बोला–"अब गैंग बार का जमाना नहीं रहा, जलीस ।"

"अच्छा ?"

पाशा के चेहरे पर खिंचाव सा पैदा हो गया ।

"तुम्हें एक पुरानी लेकिन बड़ी सही बात याद दिलाता हूँ ।" वह गुर्राता सा बोला–"तुम जानते हो शमशेर राना बहुत ही बड़ी तोप हुआ करता था ? मगर उसे उसी के आदमियों ने मार डाला था । क्योंकि वह उन सबके लिए खतरा बन गया था । अगर वे ऐसा नहीं करते तो पुलिस ने पूरे गिरोह का सफाया कर देना था । इस वक्त यहाँ भी बिल्कुल वैसी ही स्थिति है । अगर तुम इसी तरह यहाँ के मामलात में दखल देते रहे तो आर्गेनाइजेशन में बगावत फैल जाएगी । पूरा संगठन कई टुकड़ों में बँटकर तुम्हारे साथ और आपस में मारा–मारी शुरु कर देगा । उस हालत में पुलिस भी बड़े पैमाने पर हरकत में आ जाएगी और तुम इतनी बड़ी तोप नहीं हो कि हर तरफ से हुए इस हमले का मुकाबला कर सको । अगर तुम इतनी बड़ी तोप होते तो मैं तुम्हारे बारे में जरुर बहुत पहले ही सुन चुका होता । मैंने ही नहीं, हर किसी ने तुम्हारा नाम सुन लेना था । जुर्म की दुनिया से ताल्लुक रखने वाली कोई भी बड़ी हस्ती खुद को सत्रह साल तक छुपाकर नहीं रख सकती, जलीस ।"

"तुम भूल रहे हो, पाशा । जलीस खान अपवाद रहा है और आज भी है ।"

जलीस का लहजा इतना सर्द था कि पाशा उससे निगाहें मिलाए नहीं रख सका और जैकी अपनी कुर्सी में सिकुड़ सा गया ।

"तुम यह भी भूल रहे हो कि अगर मैं मारा गया तो तुम्हारा भी मुकम्मल तौर पर पुलंदा बंध जाएगा । मेरा मतलब समझ रहे हो न ?"

पाशा के चेहरे पर विवशतापूर्ण भाव उत्पन्न हो गए ।

"तुम रनधीर से भी ज्यादा बुरे आदमी हो ।"

"उसके हाथ में तुम्हारी कौन सी कमजोर नस थी ?" जलीस ने वही सवाल दोहराया ।

"कोई नहीं...कोई भी नहीं ।"

जलीस हँसा ।

"तुम झूठ बोल रहे हो ।" वह बोला–"रनधीर बेवजह नहीं मारा गया । वह खतरा था...बहुत बड़ा खतरा । बहुत से लोगों की कमजोर नसें उसके हाथ में थीं और वे सभी लोग गलत किस्म के थे । लेकिन अपनी नसें दबी होने की वजह से वे बड़े होकर भी बेबस बनकर रह गए थे । रनधीर के सामने दुम हिलाने के अलावा कोई चारा उनके पास नहीं था । लेकिन एक रोज रनधीर उनके लिए इतना ज्यादा बड़ा खतरा बन गया कि उसे और ज्यादा बर्दाश्त कर पाना उनके लिए नामुमकिन था । किसी ने मौके का फायदा उठाया और उसे खत्म कर दिया । इस तरह खतरा तो वक्ती तौर पर टल गया मगर असली समस्या वैसी ही बनी रही । क्योंकि हत्यारे को वो चीज नहीं मिल सकी जिसे नंगी तलवार की तरह रनधीर ने उसके सर पर लटकाया हुआ था । मुसीबतों की वो पिटारी सबकी पहुँच से दूर अभी भी वहीं है जहाँ रनधीर ने उसे रखा हुआ था ।"

"यह तुम्हारा अनुमान है या यकीन ?"

"यकीन ।"

"गलत । अगर ऐसा होता तो उसे हासिल करके तुम उसका सौदा कर रहे होते ।"

"अभी वो 'पिटारी' मुझे नहीं मिली है लेकिन जल्दी ही मिल जाएगी ।"

"अच्छा ?"

"हाँ । क्योंकि रनधीर को कोई भी इतनी अच्छी तरह नहीं जानता था जितना मैं उसे जानता था । मुझे पूरा विश्वास है, उसने सिर्फ मेरे लिए कोई क्लू जरुर छोड़ा होगा...किसी ऐसी जगह जहाँ के बारे में उसे पूरा यकीन था कि मैं जरूर उसे समझ जाऊँगा–ठीक वैसे ही जैसे कि हम सत्रह साल पहले एक–दूसरे के लिए क्लू छोड़ा करते थे । जल्दी ही वो क्लू मेरी पकड़ में आ जाएगा । उसके जरिए उस 'पिटारी' तक भी मैं जा पहुँचूंगा और तुम सब लोगों के एक बार फिर छक्के छूटने शुरु हो जाएंगे । इस दौरान तुममें से हर एक को मेरे साथ सीधा चलना होगा । जो भी टेढ़ा चलेगा चोट खा बैठेगा । विक्टर की बार में जो हुआ था, तुमने भी जरुर सुन लिया होगा । इसलिए अगर तुम या कोई और यह समझता है कि मैं किसी को शूट नहीं करूँगा तो यह सिर्फ तुम लोगों का पागलपन होगा...निरा पागलपन ।"

"तुम मुझसे क्या चाहते हो ?" पाशा ने फँसी सी आवाज़ में पूछा ।

जलीस खड़ा हो गया ।

"रनधीर का हत्यारा ।" वह बोला–"उसे ढूंढने में तुम मेरी मदद कर सकते हो । तुम सियासत बाज हो । हर एक जगह तुम्हारी पहुंच है उसे इस काम के लिए इस्तेमाल करो ।" सोनिया भी खड़ी हो चुकी थी । जलीस ने उसका हाथ थाम लिया–"और मज़हबी फसाद फैलाने का अपना इरादा इसी वक्त बदल दो वरना...।" शेष वाक्य जानबूझकर अधूरा छोड़कर बोला–"कॉफी के लिए शुक्रिया ।" और सोनिया सहित पलटकर प्रवेश द्वार की ओर बढ़ गया ।

दरवाजे के पास खड़े पाशा के दोनों गनमैन को अपनी ओर घूरता पाकर जलीस मुस्कुराया तो वे दोनों भी तनिक मुस्करा दिए । पेशेवर होने की वजह से वक्त और मौके की नज़ाकत को वे समझते थे । उनकी खास सेवाओं के लिए मुनासिब जगह वो नहीं थी ।

जलीस और सोनिया दरवाजे से गुजरकर लॉबी में आ गए ।

वहाँ मौजूद पब्लिक टेलीफोन से जलीस ने अमोलक को फोन किया ।

"क्या रिपोर्ट है ?"

"पीटर ने कुछेक मिनट पहले ही सूचना दी थी कि दीना 'मोती महल' में अपने कमरे में ही है ।" अमोलक ने जवाब दिया–"पीटर भी उसी के पास है और तुम्हारे पहुंचने तक वहीं रहेगा ।"

"तुम्हें कुछ मिला ?"

"अभी नहीं ।"

"कोशिश करते रहो जब तक तुम्हें पूरा यकीन न हो जाए कि वहाँ कुछ नहीं है और मेरे पहुँचने तक वहीं ठहरना ।"

संबंध विच्छेद करके वह बूथ से बाहर आ गया ।

सोनिया खामोश थी–अपने ही विचारों में बुरी तरह उलझी हुई सी ।

होटल से निकलकर जलीस ने टैक्सी रोकी । ड्राइवर को मोती महल चलने के लिए कहकर दोनों उसमें सवार हो गए ।