शुक्रवार : पच्चीस दिसम्बर
मुम्बई राजनगर
दस बजे के करीब इरफान पवन डांगले को साथ ले कर राजा साहब के आफिस में पहुँचा।
होटल में राजा साहब के वजूद को स्थापित रखने के लिए विमल को सुबह के दो ढाई घण्टे राजा साहब का बहुरूप धारण कर के आफिस में जरूर बैठना पड़ता था। उसके बाद, जैसी जरूरत होती थी, वो राजा साहब का सैक्रेट्री कौल बन जाता था या कौल का सैक्रेट्री विमल बन जाता था।
“मैरी क्रिसमस, सर।”—पवन डांगले अदब से बोला।
“क्रिसमस तो मैरी हमें कबूल है”—विमल विनोदपूर्ण स्वर में बोला—“और वो तुम्हें भी हो लेकिन हम अंग्रेज थोड़े ही हैं! हमें तो गुरपुरब की बधाई देना। और इरफान को ईद मुबारक बोलना। नो?”
“यस, सर।”
“विश करने ही आये या...”
“खास बात है।”—जवाब इरफान ने दिया।
“क्या?”
“इसके पास एक इस्टोरी है। बाप, सुनोगे तो तबीयत फड़क जायेगी।”
“फड़काओ, भई।”
डांगले ने पिछली रात का किस्सा बयान किया और दस लाख रुपये के नोट पेश किये।
“कमाल है!”—वो खामोश हुआ तो विमल मन्त्रमुग्ध स्वर में बोला—“उस की ऐसी मजाल हुई?”
“नवां आदमी है।”—इरफान बोला—“कोई उसे पहचानता नहीं।”
“नाम क्या बोला?”
“नहीं बोला।”—डांगले बोला।
“पूछना था।”
“वो बार बार यूँ अपने को दफेदार का आदमी बता रहा था जैसे कि वो ही उसका नाम हो। साफ जाहिर हो रहा था कि पूछने पर नाम बताने वाला नहीं था; बताता तो गलत बताता।”
“जाने क्यों दिया?”
“क्योंकि रोक के रखने का कोई फायदा नहीं था।”
“क्यों फायदा नहीं था? उससे हम दफेदार का पता निकलवा सकते थे।”
“वो तो अभी भी निकलता सकते हैं। दोपहर को वो मेरे को डोमेस्टिक एयरपोर्ट के अराइवल लाउन्ज में मिलने वाला है जहाँ कि वो मुझे फिफ्टी पर्सेंट एडवांस—ढाई करोड़ माइनस ये दस लाख—देने आने वाला है।”
“हूँ।”
“और कल सुबह फिश वगैरह की डिलीवरी के लिए भी वो ही आयेगा।”
“वो क्यों भला?”
“बाकी की रकम देना होगा न!”
“वो तब देगा?”
“सैटल ये हुआ है कि वो बाकी का पैसा काम हो जाने के बाद देगा और काम ये है कि फिश के क्रेट भीतर पहुँच जायें और कोई उन्हें खोलने की कोशिश न करे। ये काम उसके सामने हो जायेगा।”
“अगर उसने जिद की कि क्रेटों ने जो गुल खिलाना है, वो गुल खिल चुकने के बाद वो बाकी की पेमेंट देगा?”
“तो मैं क्रेट भीतर नहीं पहुँचने दूँगा। तो मैं उस सिक्योरिटी लैप्स को ही अंजाम नहीं दूँगा जिस का मैंने उस से वादा किया है। मैं खुद कुछ करने की जगह सिक्योरिटी वालों को हुक्म दूँगा कि वो सप्लाई को वैसे ही हैंडल करें जैसे कि वो करते आ रहे हैं।”
“वो ऐसा होने देगा? जिस के ढाई करोड़ रुपये इनवैस्ट हुए होंगे, वो ऐसा होने देगा?”
“नहीं होने देगा तो क्या करेगा?”
“उस घड़ी उसकी हैसियत शर्तें लगाने वाली नहीं होगी।”—इरफान बोला—“उस घड़ी वो डांगले का मोहताज होगा। मेरे को पक्की, हुज्जत की कोई नौबत आने से पहले ही वो बाकी की रकम डांगले को सौंप देगा।”
“कैसे? जेब से निकाल के?”
“अरे, नहीं, बाप। सप्लाई के जो इतने किरेट वो लायेगा, उन्हीं में से एक में रोकड़ा होगा।”
“हम क्या करेंगे? उसे थाम लेंगे?”
“बोलेंगा न, बाप।”
“ये बहुत बड़ी फीस है। बहुत बड़ी फीस बहुत बड़े काम की होती है।”
“अभी तेरे को नहीं मालूम बहुत बड़ा काम कौन-सा होगा!”
“मालूम तो है!”
“क्या?”
“ये होटल उड़ाना।”
“बरोबर।”
“बिना यहाँ ठहरे मेहमानों की परवाह किये जिन के साथ औरतें और बच्चे भी हैं!”
“तभी तो राजा साहब पर थू थू होगी। बाप, इधर तू सेफ है, यूँ तू अलग थलग पड़ गया तो उन का काम आसान हो जायेगा।”
“हम ऐसा नहीं होने देंगे।”
“अब नहीं होने देंगे न! हमारा ये जवान गुमराह हो जाता, रोकड़े की चमक इसे अँधा बना देती तो होने में कसर भी क्या रह गयी थी?”
“पाँच करोड़ रुपया बहुत बड़ी रकम होती है, उसको नजरअन्दाज करके, उसके लालच के हवाले न हो कर अपना जो ऊँचा अखलाक और आला किरदार, डांगले, तुमने पेश किया है उसकी तारीफ अल्फाज से नहीं हो सकती। हम ताजिन्दगी तुम्हारे मशकूर रहेंगे। वो बच्चे तुम्हारे मशकूर होंगे जो यतीम होने से बच गये, वो औरतें तुम्हारी मशकूर होंगी जो विधवा होने से बच गयीं, वो मर्द तुम्हारे मशकूर होंगे जो अपने सगेवालों का मरा मुँह देखने से बच गये, वो किशोरियाँ तुम्हारी मशकूर होंगी जिन्होंने अभी सुहाग का जोड़ा पहनना है, वो किशोर तुम्हारे मशकूर होंगे जिन्होंने कोई कालजयी किताब लिखनी है, कोई अमर गीत गाना है, किसी ताजमहल जैसे अजूबे को तामीर देना है। डांगले, पिछली रात तुम अपने ईमान से डिग गये होते तो यकीनन कल इस शहर को तिरानवे से भी बड़ी तबाही का नजारा करना पड़ता।”
“सर, मेरे मन ने मुझे जो करने के लिए प्रेरित किया, वो मैंने किया।”
“ऐसा निर्मल मन साधुजनों का होता है, मन के ऐसे फैसले विद्वजन करते हैं। धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर, तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहीं ठौर।”
डांगले खामोश रहा।
“तुम्हारी बातों से अब एक बात तो साबित हो गयी कि हमारा सिक्योरिटी चीफ मारवाड़े इसलिये हमें ढूँढ़े नहीं मिल रहा क्योंकि वो दुश्मनों के कब्जे में है। जो पट्टी उन्होंने तुम्हें पढ़ाई, जरूर वो पहले मारवाड़े को पढ़ाने की कोशिश कर चुके हैं और कोशिश में नाकाम रहने की वजह से ही उन की तवज्जो तुम्हारी तरफ गयी। उस शख्स का ये कहना कि मारवाड़े आजाद है, हवा की माफिक आजाद है, उसे कोई थाम नहीं सकता, इस बात की तरफ साफ इशारा है कि हमें अब जब देखने को मिलेगा, मारवाड़े का मरा मुँह ही देखने को मिलेगा।”
“सर, उसने साफ बोला था मारवाड़े साहब लौट के नहीं आने वाले थे, उन की वापिसी नामुमकिन थी।”
“ऐग्जैक्टली।”
“और इसी वजह से वो मेरी कल्पना यहाँ के नये सिक्योरिटी चीफ के तौर पर कर रहा था!”
“लिहाजा जो पुड़िया मारवाड़े पर कारगर न हुई, वो तुम्हारे पर आजमा रहा था!”
“जी हाँ।”
“कल जब उन्हें मालूम होगा कि उन का मिशन—नापाक मिशन—फेल हो गया था तो उन का कहर तुम पर टूटेगा।”
“मेरे को भी ऐसा ही अन्देशा है।”
“शादीशुदा हो?”
“था। दुधमुँहा बच्चा छोड़कर बीवी मर गयी। अभी ढाई साल का है, मेरी माँ के पास नागपुर में है।”
“मुम्बई में अकेले रहते हो?”
“जी हाँ।”
“कहाँ?”
“सायन में।”
“तुम कुछ दिन होटल में रहोगे और कुछ दिन होटल से बाहर जहाँ जाओगे, सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ जाओगे।”
“यस, सर।”
“और कुछ?”
“जी नहीं।”—वो उठ खड़ा हुआ, उसने इरफान की तरफ देखा।
“तुम चलो”—इरफान बोला—“मैं आता हूँ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया, राजा साहब का अभिवादन किया और वहाँ से रुखसत होने लगा तो एकाएक विमल ने उसे टोका।
“एक सैकण्ड रुको।”—वो बोला।
“यस, सर।”
“ये नोट उठाओ।”
“जी!”
“हम तुम्हें कोई ईनाम दे कर तुम्हारे सद्कर्म की महिमा कम नहीं करना चाहते, ये नहीं जाहिर करना चाहते कि हिसाब बराबर हो गया, खासतौर से उस रकम से जिस पर हमारा कोई दावा नहीं। फिर भी हमें इस वक्त इसका कोई अधिकारी जान पड़ रहा है तो वो तुम्हीं हो।”
“सर!”
“उठाओ।”
“लेकिन, सर...”
“दैट्स ऐन आर्डर।”
झिझकते हुए उसने नोट उठाये, विमल का फिर अभिवादन किया और वहाँ से चला गया।
“दो बातें बोलने का है, बाप।”—पीछे इरफान बोला।
“कौन-सी?”
“एक तो ये, जल्दी ही ये फाइव स्टार डीलक्स होटल मुसाफिरखाना बन जायेगा।”
“वो तो ये है ही।”
“खैराती मुसाफिरखाना बन जायेगा। या बड़ी हद ये कह ले कि यहाँ के स्टाफ और उस के कुनबों का, तेरे मुरीदों का, होस्टल बन जायेगा।”
“क्या बकता है?”
“अभी कल मारवाड़े के कुनबे को इधर आने को बोला, आज इस को वैसीच बोला...”
“वजह तेरे को नहीं मालूम?”
“पहले उस ठग विमल गुप्ता को और उस की बाई को होटल में रहने को बोला।”
“वो शख्स पहली बार मुम्बई आया, खास हमें ढूँढ़ता आया, हमें छ: करोड़ रुपये देने आया, हम उसे इतनी भी कर्टसी नहीं दिखा सकते थे?”
“तू मालिक है, जो मर्जी कर लेकिन मैं पहले भी बोला फिर बोलता है, जब से तू मलाड वाले आश्रम में हो कर आया है जज्बाती बातें करता है, लैक्चर देता है, नसीहत देता है, शेर पढ़ता है, दोहे बोलता है, गुरुवाणी सुनाता है, भूल जाता है कि किस रास्ते पर चल रहा है और कहाँ तू पहुँचना चाहता है।”
“दूसरी बात बोल।”
“तुका तेरा मुरीद था, तू तुका का मुरीद था, कहते हैं एक किस्म के लोगों में एक दूसरे की खसलत, खसूसियात आकर रहती हैं।”
“मैं तुझे”—विमल उपहासपूर्ण स्वर में बोला—“तुका लगने लगा हूँ?”
“मुकम्मल तौर से तो नहीं लेकिन कुछ हरकतें तू तुका की जिन्दगी के आखिरी दिनों की हरकतों जैसी बराबर करता है। लेकिन तुका तो उम्रदराज शख्स था, सठिया गया था। अपनी टूटी टाँग की पेचीदगियों की वजह से उसे अपना अगला कदम अपने बनाने वाले की देहरी पर दिखाई देता था इसलिये उस पर फैयाजी का जुनून सवार था, दोनों हाथों से पैसा लुटाता था, बाप, तेरी क्या पिराब्लम है? तेरा तो टाँग नहीं टूटेला, तू बूढ़ा भी नहीं, तू सठियाया भी नहीं हुआ, तेरी क्या पिराब्लम है?”
“ये सब तू इसलिये कह रहा है क्योंकि मैंने डांगले को दस लाख रुपये दे दिये?”
“और किसलिये कह रहा हूँ?”
“वो रकम हमारी थी?”
“उसकी थी?”
“वो अपनी कहानी से रकम का जिक्र गोल कर जाता तो क्या होता?”
“उसका रकम गोल करने का इरादा होता तो कहानी भी गोल करता। फिर तू उसके मन के फैसले के कसीदे न पढ़ रहा होता।”
“कहानी भी गोल करता तो जो कहर यहाँ बरपता...”
“कुछ न होता। मैं क्या साला नाबीना है? शोहाब क्या आँख और अक्ल दोनों से नाबीना है?”
“क्या कहना चाहता है?”
“मारवाड़े के गायब होते ही हम सब इस्टोरी समझ गये थे। और ये भी समझ गये वे कि दुश्मनों का अगला निशाना मारवाड़े के अन्डर में चलने वाला पवन डांगले था। साला कर के तो दिखाता ऐसी कोई हरकत जो अल्लामारा दफेदार उस से करवाना चाहता था! दस आँखें हैं मेरी। शोहाब की तो बीस होंगी। बाप, जैसी खूनी जंग हम ‘भाई’ की मौत के बाद भी अभी लड़ रहे हैं, उस में बेगानों से ज्यादा अपनों पर शक करना पड़ता है। तू बैठा भजता रह सकता है, न कोई बैरी न ही बेगाना, जिसे रोज अपने ही खून से नहाना पड़ता हो उसके लिए सब हैं, सब बेगाने हैं। तू पिलपिलाता जायेगा तो हमारे बीच सबसे कमजोर कड़ी तू ही बन जायेगा। और ये क्या कोई तेरे को बाहर से बताने आयेगा कि मजबूत वार कमजोर कड़ी पर पड़ता है!”
विमल अवाक् उसका मुँह देखता रहा।
“इसलिये सूफियाना कलाम को लगाम दे, अपने पाँव हकीकी जमीन पर टिका के रख और अपने इस हकीर अनपढ़ कमअक्ल कमजर्फ मुरीद की दरखास्त कबूल कर और पहले जैसा वो गरजता बरसता सोहल बन के दिखा जिस के खयाल से ‘कम्पनी’ के आकाओं की रू काँपती थी। इस बात का अहतराम कर कि अगर इस होटल को कुछ हो गया, होटल के साथ यहाँ ठहरे मेहमानों को कुछ हो गया तो सब का खून तेरे सर होगा। अगर तू उन की हिफाजत नहीं कर सकता तो तेरे को ये होटल चलाने का कोई अख्तियार नहीं; इसकी लीज कैंसल कर, रणदीवे को बुलाकर होटल उस को सौंप और किसी पीर फकीर की मजार पर जा कर बैठ जहाँ तेरा सूफिया कलाम हो, मेरी ढोलक हो और शोहाब की पेटी हो।”
“क्या बकता है?”
“बकता ही हूँ। हमेशा ही बकता हूँ लेकिन आज कुछ ज्यादा ही बक गया। साॅरी बोलता है, बाप।”
“तू जज्बाती हो रहा है।”
“सोहबत का असर है। तेरे पर तुका की सोहबत का असर हुआ तो क्या मेरे पर तेरी सोहबत का असर नहीं होगा?”
“तू इस बात का जवाब देने वाला था कि दफेदार का आदमी अपनी बोगस सप्लाई के साथ जब कल सुबह यहाँ पहुँचेगा तो हम क्या करेंगे? उसे थाम लेंगे?”
“कोई फायदा नहीं होगा। मुझे हैदर की बात का यकीन कि दफेदार किसी को अपना ठिकाना पता नहीं लगने दे रहा। उस भीड़ू को हम थामेंगे तो जो बात उसे मालूम ही नहीं होगी वो वो कैसे बतायेगा?”
“वो दफेदार का आदमी है, पता नहीं बता सकता तो पते तक पहुँचने का कोई जरिया तो बन सकता है!”
“जरिया तो हम उसे बराबर बनायेंगे।”
“कैसे?”
“हम उसके पीछे आदमी लगायेंगे। और उम्मीद करेंगे कि यूँ हमें दफेदार का कोई अता पता हासिल होगा। हो गया तो हम उसके पाँच करोड़ के नुकसान के मातम में भी शरीक होकर दिखायेंगे।”
“एक काम हम और भी तो कर सकते हैं।”
“क्या?”
“दफेदार के लिए भिंडी बाजार की ट्रैवल एजेंसी में फोन लगाया जाये तो जवाब मिलता है नम्बर छोड़ दो, काल बैक किया जायेगा। इससे ये बात तो जाहिर है, कि जो काल रिसीव करता होगा, वो आगे कहीं दफेदार को फोन लगाता होगा और उसे काल की बाबत बताता होगा वर्ना कैसे दफेदार काल बैक करता है?”
“बाप, वो लाइन शोहाब पहले ही टटोल चुका है।”
“अच्छा! क्या नतीजा निकला?”
“ट्रैवल एजेंसी से जो काल आगे लगायी जाती है, उसे कोई रिसीव नहीं करता, एक मशीन जिसे अपने आप जवाब देने वाली मशीन बोलते हैं...”
“आटो आनसरिंग मशीन।”
“वही! वो मशीन खाली ये ऐलान करती है कि फलां नम्बर पर फोन लगाया जाये और वो नम्बर हर बार जुदा होता है। मशीन मोबाइल के नम्बर पर चलती है और उसकी पोजीशन बदलती रहती है।”
“ओह! इसका मतलब तो ये हुआ कि दफेदार ‘भाई’ से भी पहुँचा हुआ आदमी है!”
“भाई से नहीं तो छोटा अंजुम से तो है ही जिसकी कि उसने जगह ली है।”
“हूँ। इरफान, मुझे तेरे जज्बात की कद्र है, लेकिन मैं भी क्या करूँ! आदत से मजबूर हूँ।”
“मजबूर आदमी किस काम का!”
“मैं मगरूर भी तो नहीं बन सकता!”
“कौन बोला तेरे को ऐसा बनने को? तूने मगरूर बनने की कोशिश की तो हम समझेंगे कि तू बखिया बनना माँगता है। फिर क्या हम तेरे साथ होंगे?”
“अरे, क्या कह रहा है? तेरे बिना मैं अपनी कल्पना नहीं कर सकता।”
“मैं क्या कर सकता हूँ? मैंने अल्लाह को मुँह दिखाना है। तुका को मुँह दिखाना है।”
“सब ठीक हो जायेगा। जो होगा, अच्छा होगा। जो तिसु भावे सोई करसी, हुक्म न करना जाई।”
“फिर शुरू हो गया!”
विमल हँसा।
धीरज परमार के फ्लैट पर उसके फोन की घण्टी बजी।
उसने काल रिसीव की।
“मनकोटिया बोल रहा हूँ।”—आवाज आयी।
“कहाँ हो?”
“कैसाना में।”
“अभी वहीं हो?”
“और कहाँ जाऊँ?”
“और कहाँ जाऊँ? काम हुआ या नहीं हुआ?”
“नहीं हुआ। इसीलिये तो फोन कर रहा हूँ।”
“क्या हुआ?”
“अरे, बोला न, कुछ नहीं हुआ।”
“वो तो मैंने सुना। लेकिन कुछ क्यों नहीं हुआ? काबू में नहीं आये वो लोग?”
“काबू में न आने का तो कोई मतलब ही नहीं था लेकिन इधर तो कोई पहुँचा ही नहीं!”
“क्या!”
“छ: घण्टे हो गये इन्तजार करते। भोर से ले कर अब तक कोई स्टीमर इधर किनारे पर नहीं लगा।”
“स्टीमर भटक गया होगा लेकिन देर सबेर जरूर पहुँचेगा।”
“कब पहुँचेगा? कल? परसों? एक हफ्ते बाद? मैं और मेरे आदमी क्या इधर सूखते रहेंगे?”
“मनकोटिया, करोड़ों का माल यूँ ही हाथ नहीं आ जाता।”
“मुझे तुम्हारी बात से इत्तफाक है, लेकिन माल का कोई अता पता तो मिले! और नहीं तो इसी बात का कोई हिंट मिले कि इन्तजार करना वाजिब है या नहीं!”
“लगता है स्टीमर कहीं भटक गया या हाई सीज पर उसके साथ कोई हादसा हो गया।”
“या माल उन लोगों के हाथ लगा ही नहीं।”
“ऐसा?”
“हाँ। माल साथ होता तभी तो स्टीमर का कोई रोल था। माल हाथ न लगा होने की सूरत में समुद्री सफर तो बेमानी था। वो लोग आराम से खुश्की के रास्ते ट्रेन, बस या टैक्सी से राजनगर लौट सकते थे।”
“खाली मोहन बाबू। नाकामी हाथ लगने की सूरत में उन चाचा भतीजी के इधर लौटने का तो कोई मतलब ही नहीं था, वो तो उधर के ही हैं।”
“उन लोगों की कामयाबी पर मुझे पहले ही शक था।”
“ऐसी तो कोई बात नहीं थी।”
“तो फिर क्यों स्टीमर किनारे आकर नहीं लगा? कितना आसान लग रहा था तुम्हें उन लोगों की दुक्की पीट देना! वो मुँह अँधेरे यहाँ किनारे आ कर लगते, मेरे आदमी सब को शूट कर देते और सोना हमारे कब्जे में होता। अब मैं मूर्खों की तरह सिर उठा उठा कर देख रहा हूँ समुद्र की तरफ कि कब...”
“वो क्या है कि...”
“छोड़ो क्या है! साफ बोलो मैं क्या करूँ?”
“मुझे दो घण्टे का टाइम दो, मैं कुछ पता लगाने की कोशिश करता हूँ।”
“क्या पता लगाओगे? कैसे पता लगाओगे?”
“बोलूँगा। दो घण्टे बाद फोन करना।”
“ठीक है।”
दोपहरबाद जगमोहन सोकर उठा।
वो उस घड़ी सिमरन के फ्लैट पर था जो हर्नबी रोड पर स्थित एक हाउसिंग कम्पलैक्स की दूसरी मंजिल पर था।
वो उठकर अटैच्ड बाथ में दाखिल हुआ जहाँ से वो बाहर निकला तो उसने सिमरन को चाय के साथ बैड के करीब एक कुर्सी पर बैठे पाया।
जगमोहन को देख कर वो मुस्कराई और फिर चाय पेश की।
उसने चाय का मग थामा और पलँग पर पालथी मार कर बैठ गया।
फिर आँख भर कर सिमरन की तरफ देखा।
वो छबीसेक साल की कदरन साँवली रंगत वाली, साढ़े पाँच फुट तक पहुँचते कद वाली खूबसूरत लड़की थी जो कि एक निगाह में बीस की भी नहीं लगती थी। उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि कभी वो एक प्रोफेशनल गनमैन की मौल होती थी। जगमोहन ने अपने जिस चौथे कारनामे को विशालगढ में अंजाम दिया था, उसमें वो—जस्सी नाम का—गनमैन भी शामिल था। वो चार जने थे और कारनामे को उन्होंने पूरी कामयाबी से अंजाम दिया था। गैटअवे व्हीकल को हजरती चला रहा था जब कि कहीं से एक गोली आयी और पैसेंजर सीट पर बैठे जस्सी की साइड का शीशा तोड़ती उसकी कनपटी में घुस गयी। वो एक ऐसा हादसा था जिसका न कोई सिर था न पैर था। पीछे गोलियाँ तो चल रही थीं लेकिन वो उनके रेंज से पूरी तरह से बाहर थे जब कि पता नहीं कैसे वो असम्भव काम सम्भव हो गया था।
बाद में उस नामुराद खबर को सिमरन तक पहुँचाने की जिम्मेदारी जगमोहन को खुद अपने सिर लेनी पड़ी थी। उसी फ्लैट में जिस में कि वो उस घड़ी मौजूद था उसने जब सिमरन को वो खबर सुनायी थी तो एकबारगी तो उसे लगा था कि वो वहीं उसके सामने गिरकर मर जाने वाली थी।
जगमोहन के लिए वो नया तजुर्बा था।
मरने वाला उस लड़की का कुछ नहीं लगता था फिर भी उसकी मौत की खबर सुनकर उसका वो हाल हुआ था, कोई सगेवाला होता तो पता नहीं क्या होता।
उसी क्षण उसने सिमरन पर अपना दावा लगाने का निश्चय कर लिया था, वो सिमरन की गम की घड़ियों में उसका हमदर्द बना था और उसके अपने मातम के दौर से उबरने के बाद उसका साथी बना था।
और अब आइन्दा दिनों में जीवन साथी बनने का तमन्नाई था।
“तीसरी बार चाय बनायी।”—वो बोली।
“अरे! मुझे जगाया होता?”
“दिल न माना। तुम तो घोड़े बेचकर सोये हुए थे!”
“सारी रात बहुत मुसीबत और मशक्कत में गुजरी थी न!”
“काम हुआ?”
“हुआ। बराबर हुआ।”
“बधाई।”
“लेकिन नहीं हुआ।”
“क्या मतलब?”
“मक्खी पड़ गयी।”
“अरे! कैसे?”
मोटे तौर पर उसने पिछली रात का वाकया बयान किया।
“ओह!”—वो खामोश हुआ तो सिमरन बाली—“अब क्या करोगे?”
“क्या करूँगा!”
“कर पाओगे कुछ?”
तभी फोन की घण्टी बजी।
सिमरन ने हाथ बढ़ा कर फोन उठाया।
“हल्लो।”—वो बोली।
“परमार बोल रहा हूँ।”—दूसरी तरफ से आवाज आयी।
“राग नम्बर।”
“वो वहाँ है?”
“हाँ। बोला न, राग नम्बर।”
उसने रिसीवर वापस क्रेडल पर रख दिया।
जगमोहन ने भवें उठा कर उसकी तरफ देखा।
“बहुत गलत काल आती हैं।”—सिमरन बोली—“मैं क्या कह रही थी? हाँ, पूछ रही थी। कर पाओगे कुछ?”
“करने लायक है तो सही कुछ, इसलिये हो सकता है कि कर पाऊँ।”
“क्या?”
“जैसा कि मैंने अभी बताया, दिलीप चौधरी के पास मास्टर नेवीगेटर नाम का एक आला है जिसकी बाबत मैंने उसकी भतीजी को कहते सुना था कि उसके जरिये समुद्र में ऐन उस जगह पर पहुँचा जा सकता था जहाँ कि स्टीमर डूबा था।”
“आठ सौ किलो सोने से भरे ट्रक के साथ?”
“हाँ। सोना समुद्र की तह में भले ही कब तक पड़ा रहे, उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला और वो जहाँ पड़ा है उसका वहीं पड़ा रहना इसलिये निश्चित है कि उसके साथ बख्तरबन्द गाड़ी का और तीन सौ फुट लम्बे स्टीमर का भार शामिल है। सोने को निकालने की कभी भी कोशिश की जाये, वो वहीं होगा जहाँ कि स्टीमर डूबा था। और स्टीमर कहाँ डूबा था, इस बात को मास्टर नेवीगेटर पिनप्वायंट कर सकता है।”
“तुम्हारा इरादा मास्टर नेवीगेटर हथियाने का है?”
“इस बाबत अभी कोई पक्का फैसला मैं नहीं कर सका हूँ क्योंकि एक तो मुझे इस दावे पर ही शक है कि वो आला ऐसा करतब करके दिखा करता है—न होता तो मैं तभी उसे चौधरी से छीन लेने की कोशिश करता जब कि किनारे लगने पर मैंने उसकी बाबत सुना था—दूसरे, मुझे ये ज्यादा मुफीद लगता है कि मैं उस आले के सदके चौधरी के समुद्र से सोना निकाल लेने का इन्तजार करूँ और फिर सोना उससे छीन लूँ।”
“ओह!”
“दोनों ही सिलसिलों में चौधरी की मुतवातर निगाहबीनी जरूरी है जिसका कोई फौरी इन्तजाम मेरे पास नहीं है।”
“तुम खुद भी तो ये काम कर सकते हो!”
“कर सकता हूँ। लेकिन निगाहबीनी के किसी काम को कोई चौबीस घण्टे अकेला नहीं कर सकता।”
“शायद ये चौबीस घण्टों निगाहबीनी का काम न हो!”
“वक्ती तौर पर भी नहीं कर सकता।”
“वजह?”
“एक मुसीबत और भी मेरी जान को आयी हुई है जिसकी वजह से मेरा खैरगढ़ लौटना जरूरी है।”
सिमरन की भवें उठी।
“अरे, खैरगढ़ चौकी का वही दरोगा जिसकी बाबत मैंने तुम्हें बताया था कि खामखाह मेरे पीछे पड़ा है। वो मेरी गुजश्ता जिन्दगी की बाबत कुछ भाँप गया जान पड़ता है। मैं न लौटा तो वो मेरी गिरफ्तारी का वारण्ट निकलवा देगा।”
“ओह!”
“मैं दरअसल समझ नहीं पा रहा हूँ कि वो शख्स—भगवती सिंह डोभाल—असल में क्या चाहता है! वो सच में मेरी असलियत को जान गया है या एक शक के तहत अँधेरे में तीर चला रहा है! ये उलझन दूर हो तो उससे निपटने का तरीका मेरे पास है।”
“क्या?”
“जान से मार डालूँगा। लाश का पता नहीं लगने दूँगा।”
सिमरन ने निर्विकार भाव से उस बात को सुना। खून खराबा उसके लिए क्या बड़ी बात थी? आखिर गनमैन की मौल रह चुकी थी।
“फिलहाल”—जगमोहन बोला—“मेरा उस दारोगा को खैरगढ़ में दिखाई देते रहना जरूरी है। मैं बुधवार से उसकी निगाहों से दूर हूँ, अब और दूर रहना उसके सब्र का इम्तहान लेना होगा इसलिये आज मेरा खैरगढ़ लौटना जरूरी है।”
“कल।”
“क्या कल?”
“कल जाना।”
“क्यों?”
“क्यों कि मैं ऐसा कह रही हूँ।”
“कोई खास बात है?”
“समझो तो खास ही है, न समझो तो कुछ नहीं।”
जगमोहन ने अपलक उसे देखा।
वो बड़े चित्ताकर्षक भाव से मुस्कराई।
“मैं आठ बजे की गाड़ी से चला जाऊँगा।”—जगमोहन बोला।
“जा के क्या करोगे? सो जाओगे?”
“हाँ।”
“यानी कि सोने के लिए जाओगे?”
“तो?”
“कल सुबह चले जाना। दस बजे तक खैरगढ़ पहुँच भी जाओगे।”
“लेकिन...”
“अगर आज रात तुम मुझे अकेली छोड़ के गये तो मैं समझूँगी तुम्हें मेरे से कोई मुहब्बत नहीं।”
“ठीक है। मैं कल सुबह जाऊँगा। अब खुश?”
“हाँ। बहुत।”
“शनिवार का, कल का, दिन खैरगढ़ में गुजार कर इतवार को दोपहर तक, या उससे पहले ही, मैं फिर यहाँ आ जाऊँगा।”
“बढ़िया।”
“लेकिन सवाल ये है कि इतने में ही चौधरी और उसकी भतीजी कूपर रोड से कहीं खिसक गये तो क्या होगा?”
“अभी वो कूपर रोड पर हैं?”
“हाँ। मैंने चौधरी को साफ ऐसा बोलते सुना था कि वहाँ की अलकतारा नाम की इमारत में उसने एक फर्निश्ड फ्लैट ठीक किया हुआ है।”
“तुम्हारे लौटने तक वहाँ की निगरानी मैं कर सकती हूँ।”
“नहीं, नहीं। ये तुम्हारे करने लायक काम नहीं। वहाँ एकाएक कोई पेचीदगी पैदा हो गयी तो तुम खुद उसे हैंडल कर नहीं सकोगी और मैं खैरगढ़ से पलक झपकते पहुँच नहीं सकूँगा।”
“धीरज परमार के बारे में क्या कहते हो?”
“वो ये काम कर सकता है। करा भी सकता है। कोई दूसरा जरिया न सूझा तो उसी का आसरा होगा।”
“कब तक न सूझा?”
“सोमवार तक इन्तजार करने का इरादा है।”
“उतने में चौधरी और उसकी भतीजी खिसक गये तो?”
“मुझे उम्मीद नहीं। उनका इतनी जल्दी खिसक जाने का इरादा होता तो उन्होंने राजनगर में रहने के लिए फ्लैट का जुगाड़ न किया होता।”
“यानी कि इस मामले में इमरजेन्सी कोई नहीं है?”
“दिखाई तो नहीं देती!”
“ठीक।”
“अभी एक आस-उम्मीद और भी है।”
“वो क्या?”
“कोई एक महीना पहले मैंने एक शख्स को चिट्ठी लिखी थी जिससे मुझे बहुत उम्मीदें थी, बहुत किस्म की उम्मीदें थीं, उसकी तरफ से कोई जवाब न मिलने से मुझे बहुत मायूसी हुई है लेकिन पता नहीं क्या बात है, उम्मीद अभी भी पूरी तरह से नहीं टूटी है।”
“शायद चिट्ठी उसे मिली न हो। फिर लिख दो।”
“न मिली होने की सूरत में फिर लिखने में कोई हर्ज नहीं लेकिन चिट्ठी मिली होने की सूरत में हर्ज है। क्या पता उसने मेरी अपील जैसी चिट्ठी को जानबूझ के नजरअन्दाज कर दिया हो...”
“अपील जैसी?”
“जब से खैरगढ़ चौकी का दारोगा डोभाल मेरे पीछे पड़ा है, पता नहीं क्यों मुझे परलोक दिखाई देने लग गया है।”
“क्या कह रहे हो?”
“हर घड़ी एक ही वहशी खयाल सताता है कि मेरी चल चल होने वाली है।”
“उस दारोगा की वजह से? जिसको, कहते हो कि, जान से मार डालोगे, लाश का पता नहीं लगने दोगे?”
“ठीक कहता हूँ। फिर भी लगता है कि मेरे साथ कोई अनहोनी होने वाली है।”
“खामखाह?”
“इसी वजह से जज्बाती हो कर मैंने चिट्ठी उसको नहीं, उसके ज़मीर को लिखी जिसका कि मैंने उसे कैदी बताया। अगर उसने चिट्ठी को जानबूझ कर नजरअन्दाज किया है तो दोबारा चिट्ठी लिखने में मेरी हेठी है। जिसने एक बार मेरी बात न सुनी, क्या गारण्टी है कि दूसरी बार सुनेगा?”
“बात क्या?”
“मैं अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उसे सौंपना चाहता हूँ। ये सोना मेरे हाथ आ गया तो ये भी।”
“क्या!”
“ताकि मेरी बद्कारियों का हासिल किसी सद्कार्य में लगे।”
“सद्कार्य में लगे! वो कोई साधु महात्मा है?”
“नहीं, लेकिन गरीब गुरबा के लिए जो कुछ वो कर रहा है, वो कोई नहीं करता, यहाँ तक कि हमारी सरकार भी नहीं करती। एक अकेले आदमी की वजह से गरीबों की बस्तियों में, झौंपड़पट्टों में कितने ही स्कूल, दवाखाने, अनाथाश्रम, लंगर चल रहे हैं।”
“इतना खर्चा करने के लिए पैसा कहाँ से आता है?”
“काफी सारा तो उसने स्मगलरों, मवालियों, ब्लैक मार्केटियरों से छीना है, काफी सारा उसे, उसके अभियान से प्रभावित मेरे जैसे लोग देते हैं।”
“है कौन वो?”
“मेरे ही जैसा हालात का सताया एक शख्स है जो जिन्दगी में बेशुमार धक्के खाने के बाद अब किसी मुकाम पर पहुँचा जान पड़ता है।”
“कौन?”
“सोहल!”
“वो इश्तिहारी मुजरिम?”
“हाँ।”
“वो सुपर गैंगस्टर जिसकी गिरफ्तारी पर लाखों का ईनाम है?”
“हाँ।”
“वो दानी धर्मात्मा बन गया है?”
“हाँ।”
“यकीन नहीं आता।”
“क्योंकि, उसके सद्कायों का कोई प्रचार नहीं होता। क्योंकि वो ‘नेकी कर दरिया में डाल’ वाली सीख पर चलता है।”
“मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ जो मुझे यकीन है तुम्हें नहीं मालूम होगी।”
“क्या?”
“यहाँ राजनगर में कुछ नौजवान लोग चैम्बूर के दाता के नाम से पब्लिक से चन्दा बटोरते हैं।”
“अच्छा!”
“हाँ। बोलते हैं चैम्बूर के दाता के हाथ मजबूत करने का है जो कि दीनबन्धु दीनानाथ है, गरीबनवाज है, सखी हातिम है, राबिन हुड है।”
“चैम्बूर का दाता!”
“हाँ। क्या वो वो शख्स हो सकता है जिस का नाम तुमने सोहल बताया?”
“हो तो सकता है। होगा ही। हैरानी है कि उस के अभियान का इतना प्रचार हो गया है।”
“प्रचार बराबर हुआ है लेकिन मेरे को तो लोग बाग उस बहाने अपनी जेबें भरते जान पड़ते हैं।”
“क्या मतलब?”
“चैम्बूर के दाता के नाम पर चन्दा माँगते नहीं, वसूलते हैं और फिर जो हासिल होता है, खुद हड़प जाते हैं।”
“ये तो बहुत बुरी बात है! सोहल को इसकी खबर लगनी चाहिये।”
“चाहिये तो सही! क्योंकि यूँ चन्दा बटोरना तो सरासर लूट है, ठगी है, जो कि बन्द होनी चाहिये या यूँ जमा हुआ पैसा अपने मुकाम पर पहुँचना चाहिये।”
“ठीक कहा तुमने।”
“तुम उस शख्स को कैसे जानते हो?”
जगमोहन ने बताया।
“हे भगवान!”—सुनकर सिमरन ने नेत्र फैलाये—“इसी शहर में तुम उसके साथ मिल कर इतना बड़ा काण्ड कर चुके हो?”
“बड़ा लेकिन गुनाह बेलज्जत जैसा।”
“फिर भी राजनगर में शरेआम विचरने की तुम्हारी मजाल होती है?”
“वो कहते नहीं हैं कि चिराग तले अँधेरा।”
“कमाल के आदमी हो!”
“सोहल से कोई कम्यूनीकेशन हो जाती तो ठीक हो जाता।”—जगमोहन यूँ बोला जैसे स्वतः भाषण कर रहा हो।
“जो काम एक महीने से नहीं हुआ, वो अब तो क्या होगा!”
“मैंने बोला न, उम्मीद अभी तक पूरी तरह नहीं टूटी।”
“पूरी तरह तो टूटनी भी नहीं चाहिये क्यों कि उम्मीद पर तो दुनिया कायम है।”
“फिर भी मैंने एक और चिट्ठी लिखी है।”
“और चिट्ठी लिखी है! किस को?”
“हजरती को।”
“हीरालाल हजरती को?”
“हाँ।”
“ओह, नो।”
“क्या हुआ?”
“वो आदमी बुरी खबह है।”
“मेरी मजबूरी है। वो पाँच बार मेरे साथ काम कर चुका है। सोहल के बाद मुझे कोई भरोसे का आदमी दिखाई देता है तो वो वही है।”
“मैं उसको तुम्हारे से पहले से जानती हूँ। वो किसी के काम आने वाला शख्स नहीं। वो सिर्फ अपने काम आने वाला शख्स है। हर वक्त अपनी रोटियाँ सेंकने की फिराक में रहता है। जस्सी की जिन्दगी में यहाँ आता था तो उससे बात कम करता था, मुझे ज्यादा ताड़ता था।”
“बोला न, मेरी मजबूरी है। वो आये तो सही, मैं उसे हैंडल कर लूँगा।”
“कब तक आने की उम्मीद है?”
“सोमवार तक। या मंगलवार तक।”
“न आया तो?”
“जरूर आयेगा। मैंने उसको उसकी किस्म की चिट्ठी लिखी है।”
“दोनों आ गये तो?”
“तो मैं हजरती को चलता कर दूँगा।”
“वो हो जायेगा?”
“उसे होना पड़ेगा।”
“लसूड़ा है।”
“मैं निपट लूँगा। वो मेरा अदब करता है, मेरे से बाहर नहीं जा सकता।”
“हूँ। तुमने मेरे बारे में क्या सोचा?”
“क्या मतलब?”
“सब कुछ सोहल को सौंप दोगे तो मेरा क्या होगा?”
“मुझे पता था मैं तुम्हारे से इस बाबत बात करूँगा तो ये सवाल उठेगा। इसीलिये पहले मैंने कुछ नहीं बताया था। सुनामपुर वाले काम में आखिरी घड़ी में पंगा न पड़ गया होता, सोना डूब न गया होता तो मैं अभी भी नहीं बताता।”
“अभी भी नहीं बताते? यानी कि मेरे लिये तुम अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझते?”
“पूरी पूरी जिम्मेदारी समझता हूँ। इसीलिये ये फ्लैट, जो जस्सी की जिन्दगी में तुम लोगों के पास किराये पर था, अब तुम्हारी मिल्कियत है। ‘सी-गार्डन’ में धीरज परमार के साथ तुम पचास फीसदी की पार्टनर हो जो कि ताजिन्दगी तुम्हारी स्टेडी इन्कम का जरिया बना रहेगा। लिंक रोड पर मेरा जो फ्लैट है, मैं न रहा तो वो भी तुम्हारे हवाले होगा। खैरगढ़ की कोठी भी तुम्हारे हवाले होगी। खैरगढ़ में मेरा जो बैंक अकाउंट है, उसकी नामिनी पहले से तुम हो। पचास लाख रुपया हार्ड कैश में तुम्हारे हवाले है। अभी भी तुम्हारा पूछना बनता है कि तुम्हारा क्या होगा?”
उसका सिर स्वयमेव इंकार में हिला।
“और तुम्हें क्या चाहिये?”
“मग परे रखो, बोलती हूँ।”
जगमोहन ने खाली मग साइड टेबल पर रखा।
सिमरन कुर्सी पर से उठी, उसने उसकी छाती पर हाथ रख कर उसे पीछे को धक्का दिया और फिर उस पर ढेर हो गई।
“जो मुझे चाहिये”—उसके कान की लौ चुभलाती वो फुसफुसाई—“वो मैं खुद वसूल लूँगी।”
“मुझे कोई एतराज नहीं।”
“जवान, जो कुछ है, निकाल दो।”
“जवान दस्यू सुन्दरी के कब्जे में है, सुन्दरी को जो चाहिये, खुद निकाल ले।”
“हुक्म नहीं मानोगे तो ऐसा ही होगा।”
“बेशक हो।”
कुछ क्षण खामोशी रही।
“तुम्हें परलोक दिखाई देता था?”—वो फुसफुसाई।
“हाँ।”
“गलत दिखाई देता था।”
“ऐसा?”
“अब त्रिलोक दिखाई देगा। तैयार हो जाओ।”
“जो हुक्म।”
इरफान अन्धेरी पहुँचा।
अवधूत अपने गैरेज की वर्कशाप में अपनी आफिस टेबल के पीछे मौजूद था।
“सलाम बोलता है, बाप।”—इरफान बोला।
अवधूत ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखा।
“मैं इरफान।”
“मालूम। बैठ।”
“शुक्रिया।”
“तुका जिन्दा था तो मेरी उससे अक्सर मुलाकात होती थी। तेरे से भी। अब तो बहुत दिनों बाद तेरी सूरत देखी।”
“इत्तफाक की बात है।”
“अभी कैसे आया?”
“इधर से गुजर रहा था, सोचा सलाम बोलता चलूँ।”
“वो तो बोल दिया, और क्या बोलना माँगता है?”
“इधर बोलना ठीक होगा?”
“ठीक होगा। मिस्त्री लोग फासले पर हैं और अपने अपने काम में बिजी हैं।”
“हूँ। सुना है दफेदार तेरा जुए का अड्डा फोड़ दिया?”
“किस से सुना है?”
“किसी से पूछो, बाप, सब यहीच बोलता है। अपनी बिरादरी में कोई बात छुपती है!”
“हूँ।”
“मैं ये भी सुना कि अड्डा फिर खड़ा कर लिया। मंगल को फोड़ा, जुम्मेराती को चालू था।”
“तेरे को इन बातों से क्या लेना देना है?”
“है न! जालिम नाहक जुल्म करे तो मजलूम से हमदर्दी तो होती है न!”
“अभी हमदर्दी जताने आया है या मेरी दुश्वारी का मजा लेने आया है, मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने आया है?”
“तौबा, बाप। कैसी बातें करता है? तू तुका का दोस्त। मेरा तो ऐसा सोचना भी कुफ्र।”
अवधूत खामोश रहा।
“दफेदार की फीस भरी? उसका हिस्सा मुकरर्र किया?”
“ ‘भाई’ का। इसलिये किया क्यों कि मैं दरिया में रह के मगर से बैर नहीं कर सकता।”
“एक ही तो मगर नहीं है दरिया में!”
“मेरे पीछे एक ही मगर है।”
“ ‘भाई’ अब इस दुनिया में नहीं है।”
“दफेदार कहता है दुबई में बैठा गर्दन में लगी गोली के जख्म से शफा पाता है।”
“उस को गोली मारने वाला कहता है कि वो जहन्नुम में बैठा शैतान से हाथ मिलाता है।”
“वो जहन्नुम से मुझे फोन नहीं लगा सकता।”
“क्या बोला?”
“बुध को ‘भाई’ ने दुबई से खुद मुझे फोन किया और दफेदार से इत्तफाक दिखाने के लिए मुझे शाबाशी दी।”
“खुद ‘भाई’ ने?”
“हाँ। कालर आइडेण्टिटी पर नम्बर आया था जिसकी मैंने तसदीक की थी कि वो दुबई का था।”
“ये कैसे मालूम कि दूसरी तरफ से ‘भाई’ बोल रहा था? तू ‘भाई’ की आवाज पहचानता है?”
“खूब पहचानता हूँ।”
“कैसे भला?”
“कभी ऐसा इत्तफाक हुआ था कि मैं एक बार नहीं, दो बार नहीं, कई बार रूबरू ‘भाई’ से मिला था। क्यों मिला था, ये मैं तेरे को नहीं बताने वाला लेकिन मेरा यकीन कर, बुधवार मैंने ‘भाई’ की आवाज को साफ पहचाना था, लाइन पर ‘भाई’ ही था।”
“ये नहीं हो सकता। ये नामुमकिन है। ‘भाई’ को जिधर गोली लगी थी, उधर ही ठौर मारा गया था।”
“देख, मेरे भाई, मैंने जो दिखाई देता है, उस पर यकीन करना है; जो दिखाई नहीं देता, उस पर नहीं। और दिखाई मुझे ये देता है कि ‘भाई’ का खास आया और मुझे बर्बाद कर गया।”
“बर्बाद ही नहीं कर गया, भड़वा बना गया।”
“क्या बोला?”
“अन्डरवर्ल्ड में साला किसी से पूछो कैसे मालूम ‘भाई’ जिन्दा है, बोलता है अवधूत बोला। जो दफेदार के हुक्म से ‘भाई’ के जिन्दा होने की ऐसी पब्लिकसिटी करता हो, वो भड़वा न हुआ तो क्या हुआ?”
“मैं मजबूर हूँ।”
“कोई मजबूरी नहीं है। तू झूठ पर यकीन करता है, सच पर यकीन कर।”
“कैसे?”
“मैं तेरे को उस शख्स से मिलवाता हूँ जिसने ‘भाई’ को ढेर किया।”
“नहीं ढेर किया। दफेदार कहता है गोली भेजे में नहीं लगी, गर्दन में लगी इसलिये बच गया।”
“और तूने यकीन किया। बल्कि ये कहना भी गलत है कि यकीन किया, डण्डे के जोर से यकीन कराया गया।”
“मेरी मजबूरी...”
“अब एक ही बात न भज। तेरी मजबूरी का भी हल है।”
“क्या?”
“बोला न! मैं तेरे को उस शख्स के पास ले के चलता हूँ जिसने ‘भाई’ को ढेर किया।”
“कौन शख्स? सोहल?”
“हाँ।”
“मेरे सोहल के पास जाने का, जानता है, क्या मतलब होगा?”
“क्या मतलब होगा?”
“मैं शेर की गोद से उठा और भालू की गोद में जा बैठा।”
इरफान ने अवाक् उसकी तरफ देखा।
“बिरादर”—फिर वो असहाय भाव से गर्दन हिलाता बोला—“तेरे पर दफेदार का बहुत गहरा रंग चढ़ेला है, जो अभी छूटना तो दूर, हलका पड़ना भी मुश्किल जान पड़ता है।”
“मैं मजबूर हूँ।”
“बोला तू ऐसा। कई बार बोला। ठीक है, अपना अड्डा चलाये रखने के लिए जो तुझे ठीक लगता है, तू कर। वान्दा नहीं। पण भड़वागिरी छोड़।”
“क्या करूँ?”
“ये पब्लिकसिटी करना बन्द कर कि ‘भाई’ जिन्दा है। लोग तेरी बात पर एतबार करते हैं और जिस बात पर एतबार करते हैं, उसे आगे दोहराते हैं। ऐसे सोहल की बात कच्ची पड़ती है। तेरे जरिये दफेदार इस कहावत पर अमल कर रहा है कि सौ बार बोला झूठ भी सच हो जाता है। तू झूठ बोलना बन्द कर। मैं तुझे यकीन दिलाता हूँ कि ये बात सरासर झूठ है कि ‘भाई’ जिन्दा है। मैं तेरे को तुका की दोस्ती का सदका देता हूँ, तू ये झूठ फैलाना बन्द कर वर्ना...”
“वर्ना क्या?”
“वर्ना तेरे को मालूम।”—इरफान का लहजा एकाएक हिंसक हो उठा—“जान है तो जहान है। जान है तो अड्डा है, गैरेज है, मुम्बई है; जान नहीं तो कुछ भी नहीं। क्या?”
अवधूत के मुँह से बोल न फूटा।
“अभी जाता है।”—इरफान कुर्सी से उठता बोला—“फिर आयेगा।”
“फिर क्यों आयेगा?”
“मैं एकीच तो कोशिश नहीं करता न, बाप! जो बात अभी तेरे भेजे में नहीं घुसी, उसको फिर घुसाने की कोशिश करने आयेंगा न!”
“कोई फायदा नहीं होगा।”
“देखेंगा।”
कूपर रोड पर स्थित ‘अलकतारा’ एक नौमंजिला इमारत थी जिसकी पाँचवीं मंजिल पर वो फ्लैट था जो दिलीप चौधरी ने राजनगर प्रवास के लिए ठीक किया था।
चाचा भतीजी वहाँ पहुँचे।
“छोटा है”—चौधरी बोला—“लेकिन हमारे लिये ठीक है।”
मुग्धा ने सहमति में सिर हिलाया।
“यहाँ हम बिना किसी की तवज्जो में आये जब तक चाहें, रह सकते हैं।”
“दो बैडरूम हैं।”—मुग्धा, जो एक एक दरवाजा खोल कर भीतर झाँक रही थी—“इससे बड़ा हमने क्या करना था!”
“यही मैंने सोचा था, वर्ना यहाँ तीन और चार बैडरूम के फ्लैट भी उपलब्ध हैं।”
“ऐन फिट है ये हमारे लिये।”
“किचन में सब कुछ है—सिवाय ताजा दूध के—लेकिन रेफ्रीजरेटर में कंडेंस्ड मिल्क का डिब्बा है। जा, चाय बना के ला।”
“अभी।”
मुग्धा किचन में चली गयी तो चौधरी ड्राईंगरूम में सोफे पर ढेर हुआ।
तभी कालबैल बजी।
उसने जाकर दरवाजा खोला तो पाया कि लैंडलार्ड आया था।
लैंडलार्ड का नाम मेहरोत्रा था, वो उस इमारत का ही मालिक नहीं था, बिल्डर भी था और वैसे फ्लैट बना कर उन्हें फर्निश्ड बेचना उसका स्थायी कारोबार था।
“आइये।”—जबरन मुस्कराता चौधरी बोला—“आइये, मेहरोत्रा साहब। वैलकम।”
मेहरोत्रा की त्योरी चढ़ी हुई थी जो कि उस स्वागतपूर्ण उद््गार से भी ढीली न हुई। भुनभुनाते हुए वो भीतर दाखिल हुआ।
“बिराजिये।”—चौधरी बोला।
“नहीं, ऐसे ही ठीक है।”—वो बोला और फिर धम्म से एक सोफाचेयर पर ढेर हुआ।
चौधरी उसके सामने बैठ गया।
“चाय पियेंगे?”—वो बोला।
“नहीं।”
“बन रही है।”
“बन रही है?”—मेहरोत्रा की भवें उठीं—“कौन बना रहा है?”
“मेरी भतीजी। मुग्धा।”
“ओह! नहीं, नहीं। मैं चाय नहीं पिऊँगा। मैं चाय पीने नहीं आया।”
“मर्जी आपकी।”
“आप कहाँ गायब हो गये थे?'
“गायब हो गया था?”
“और क्या? यहाँ तो आप नहीं थे! पिछले हफ्ते के बाद आज मुझे आप की सूरत दिखाई दी है।”
“मैं बिजी था।”
“जरूर होंगे। शौक से बिजी रहिये आप लेकिन अपनी बिजीनेस में अपनी फाइनेंशल लायबलिटी पूरी करने के लिए तो आप को वक्त निकालना चाहिये था या नहीं?”
“वो क्या है...”
“मुझे नहीं पता क्या है? आप को पहले ही बोला था कि मेरी कैश की टर्म है, जब तक फुल पेमेंट न हो जाये, मैं फ्लैट का पोजेशन नहीं देता। मैंने आपका लिहाज किया जो पाँच लाख रुपये की बैलेंस पेमेंट वीकएण्ड तक लेना कबूल कर लिया और आप को फ्लैट की चाबी सौंप दी। अब तो अगला वीकएण्ड आया पड़ा है। ये क्या इंसाफ है?”
“मैं शहर में नहीं था। आपको मालूम है कि हमारी पिछली मुलाकात के बाद मैं आज ही, बल्कि अभी यहाँ लौटा हूँ...”
“मालूम है मुझे। मेरी नीचे आफिस में सब को खास हिदायत थी कि आप के यहाँ पहुँचते ही वो लोग मुझे फोन करें। अभी आफिस में क्लायंट्स को छोड़ कर मैं यहाँ आया हूँ।”
उसका आफिस उसी इमारत में ग्राउण्ड फ्लोर पर था।
“मेहरोत्रा साहब, मैं दो दिन में आपका...”
“नो।”
“सोमवार को मैं...”
“नो, सर। नैवर। आप मुझे पाँच लाख रुपये अभी अदा कीजिये...”
“लेकिन...”
“वर्ना मैं आप के दस लाख लौटाता हूँ।”
“अरे, क्या गजब करते हैं आप? मुझे घर से बेघर करना चाहते हैं?”
“मैं नहीं करना चाहता। आप होना चाहते हैं।”
“अरे, मेरी भतीजी मेरे साथ है...”
“वो आप की प्राब्लम है। मैं बैलेंस पेमेंेट लेने आया हूँ जिसकी वसूली मेरी प्राब्लम है...”
“अरे, कोई प्राब्लम नहीं, मैं सोमवार को...”
“नाओ। दिस मिनट।”
“लेकिन...”
“नो।”
“मुझे आप से ऐसी सख्ती की उम्मीद नहीं थी।”
“धँधा मुलाहजों से नहीं चलता, चौधरी साहब।”
“वो तो ठीक है लेकिन...”
“बहस का कोई फायदा नहीं।”
“चलिये, ऐसा कीजिये, अभी आप दो लाख रुपये कबूल कीजिये, बाकी मैं हर हाल में सोमवार को...”
“नो। फुल पेमेंट अभी कीजिये वर्ना...”
तभी चाय की ट्रे के साथ मुग्धा वहाँ पहुँची।
“मेरी भतीजी।”—चौधरी बोला—“आप चाय तो पीजिये।”
“पेमेंट कीजिये। पी लूँगा।”
“अरे, जनाब, जहाँ इतना लिहाज किया, वहाँ सिर्फ तीन लाख का सोमवार तक और...”
“वो ही तो गलती की! बिजनेस में मैंने कभी अपने किसी सगेवाले का लिहाज नहीं किया। पता नहीं आपका क्यों किया? अब सबक लिया मैंने। कोई लिहाज नहीं। मिस्टर चौधरी, पेमेंट के बिना आप यहाँ नहीं रह सकते। एण्ड दैट्स फाइनल।”
“ये भी फाइनल कि आप चाय नहीं पियेंगे?”
“हाँ।”
“चाय बैडरूम में ले के जा”—चौधरी मुग्धा से बोला—“मैं आता हूँ।”
सहमति में सिर हिलाती मुग्धा वहाँ से चली गयी, अपने पीछे उसने दरवाजा बन्द कर लिया।
“मैं”—पीछे चौधरी बोला—“पेमेंट आप को यूरो में दूँ तो कोई एतराज?”
“यूरो में!”—मेहरोत्रा बोला।
“हाँ “
“आप के पास यूरो कहाँ से आये?”
“जहन्नुम से आये।”—तब चौधरी भड़का—“जो पूछा है, उसका जवाब दीजिये।”
“आप रुपये में पेमेंट कीजिये।”
“करता हूँ। टाइम दो ताकि मैं यूरो को रुपयों में तब्दील करवा सकूँ। कल आना।”
“नहीं, नहीं। पेमेंट तो मैं ले के जाऊँगा। अभी।”
“अभी पेमेंट यूरो में ही हो सकती है।”
“ठीक है।”
“यूरो का भाव तिरेपन-चौवन के बीच में है, इस लिहाज से...”
“पचास से नीचे है। मैं क्या जानता नहीं!”
“गलत जानते हैं।”
“तो पचास से जरा ऊपर होगा।”
“आपकी खामखयामी है...”
“होगी। दस हजार यूरो देते हैं तो मैं आपकी खातिर आपकी बात कबूल कर सकता हूँ।”
“लेकिन...”
“अब छोड़िये लेकिन वेकिन। ऐसे पेमेंट लेने में मेरे लिये तो जहमत ही है! मजबूरी में ही तो कबूल कर रहा हूँ आप की बात! अब जो फैसला करना है जल्दी कीजिये।”
“ठीक है। आप की जिद है तो...”
“मेरी जिद है?”
चौधरी ने उसे पाँच-पाँच सौ यूरो के बीस नोट सौंपे।
मेहरोत्रा ने नये नकोर नोटों को बड़े सन्दिग्ध भाव से देखा।
“ये असली तो हैं?”—फिर बोला।
“मैं उस धन्धे में नहीं हूँ।”—चौधरी गुस्से से बोला—“मेरे पास नकली कहाँ से आयेंगे?”
“ठीक! बहरहाल शुक्रिया! रसीद आफिस से ले लीजियेगा।”
“दे के जाइयेगा। वैसी ही मुस्तैदी से, जैसी से वसूली के लिए आये।”
“ठीक है जनाब, दे के जाऊँगा।”
मन ही मन खुश होता मेहरोत्रा वहाँ से रुखसत हुआ।
उसे मालूम था यूरो का भाव बावन-चालीस चल रहा था। लिहाजा उसने चौबीस हजार रुपये फालतू झटक लिये थे। पाँच लाख पर दस दिन का ब्याज चौबीस हजार रुपये।
बढ़िया।
सिमरन ने एक पीसीओ से धीरज परमार को फोन लगाया।
“बहाने से फ्लैट से बाहर निकली हूँ।”—वो जल्दी से बोली—“क्या बात थी? क्यों फोन लगाया?”
“वो वहाँ क्या कर रहा है?”—परमार ने पूछा।
“फालतू बातों में वक्त जाया मत करो। तुम्हें मालूम है क्या कर रहा है! आज रात वो यहीं रहेगा, कल खैरगढ़ जायेगा, परसों फिर लौट आयेगा।”
“खाली हाथ आया?”
“हाँ।”
“क्या हुआ?”
“स्टीमर डूब गया।”
“माल हाथ लगा?”
“लगा लेकिन स्टीमर के साथ डूब गया।”
“कहाँ?”
“समुद्र में।”
“समुद्र में कहाँ?”
“फोन पर कथा करने का टाइम नहीं है।”
“बाकी दो जने कहाँ गये?”
“कूपर रोड पर अलकतारा करके एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग है। चाचा, भतीजी उसके एक फ्लैट में हैं। चाचा के कब्जे में मास्टर नेवीगेटर करके एक आला है जो ऐन कील ठोक के बता सकता है कि स्टीमर समुद्र में कहाँ डूबा! आयी बात समझ में?”
“हाँ। ये तो पचास करोड़ की बात है, गोली की तरह समझ में आयी।”
“रख रही हूँ।”
“जीती रह, पट्ठी।”
चौधरी बैडरूम में पहुँचा।
“चाय तो ठण्डी हो गयी!”—मुग्धा बोली।
चौधरी ने दोनों भरे हुए कपों पर निगाह डाली।
“अरे!”—वो बोला—“तू तो पी लेती!”
“सोचा, आप अभी आ जायेंगे”—वो बोली—“अभी आ जायेंगे, इसलिये न पी।”
“जा, गर्म कर ला।”
“नयी बनाऊँगी। वो लैंडलार्ड था?”
“हाँ।”
“पैसे का झगड़ा कर रहा था?”
“हाँ। पद्रह का फ्लैट है, दस दिये थे, पाँच पिछले इतवार तक देने का वादा किया था जो कि झूठा वादा था क्योंकि मुझे मालूम था नहीं दे सकता था।”
“तो वादा क्यों किया?”
“क्योंकि आज हमारे पास पैसा ही पैसा होना था। तब मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि हाथ आकर सोना हाथ से निकल जायेगा। सुनामपुर में हम नाकाम रहे होते, सोना हमारे हाथ ही न आया होता तो हमें इस फ्लैट की जरूरत ही न होती। तो मैं खुशी से लैंडलार्ड की दस लाख रुपये लौटाने की पेशकश कबूल कर लेता।”
“ओह!”
“दो लाख रुपये भी हमारे पास इसलिये हैं क्योंकि इब्राहीम शेख की नीयत बद् हो गयी वर्ना ये रकम उसके पास होती।”
“वो तो है।”
“लैंडलार्ड का पैसा न देना होता, तो सोमवार रात ट्रेन में गुजारने की जगह हमने यहाँ गुजारी होती।”
“वो जैसे अभी आ धमका, वैसे सोमवार रात आ धमकता?”
“हाँ।”
“इतनी रात को भी?”
“हाँ। यहीं के एक फ्लैट में तो रहता है!”
“ओह!”—वो एक क्षण ठिठकी और फिर बोली—“वो सच में हमें यहाँ से बाहर कर देता?”
“मिजाज तो ऐसा ही दिखा रहा था।”
“तो हम कहाँ जाते?”
“फिलहाल तो किसी होटल में ही जाते। आगे की आगे सोचते।”
“अंकल, आपने मोहन बाबू से न बिगाड़ी होती तो हमारे लिये आगे की जो सोचता, वो सोचता। याद नहीं सोमवार को कैसे उसने हमारी रातगुजारी का इन्तजाम ‘सी-गार्डन’ में ही करने की पेशकश की थी; खैरगढ़ अपने घर भी हमें साथ ले कर चलने को तैयार था!”
“तब था। आज तो साफ न बोल दिया था!”
“क्योंकि उसकी कुछ अपनी प्राब्लम थी। उसने हमें खैरगढ़ साथ ले जाने से न बोला था, वो हमारा राजनगर में भी कोई इन्तजाम कर सकता था जैसा कि सोमवार को ‘सी-गार्डन’ में करने को बोला था।”
“छोड़ वो किस्सा।”
“अभी यूरो ने लाज रखी, जो खामखाह आपके हाथ लग गये।”
“हाँ। अब जा चाय का कुछ कर।”
मुग्धा ने ट्रे उठाई और वहाँ से चली गयी।
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