सिटिंग रूम में कुर्सियों पर बैठे थे देवराज चौहान और सोहनलाल।
सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगा ली थी।
“तू प्रवेश गोदरा के बारे में मालूम करने गया था।”
“हाँ। इसी के बारे में मालूम करके आया हूं। गोदरा निहायत ही शरीफ आदमी है।” सोहनलाल बोला।
“शरीफ आदमी कम-से-कम मेरे रास्ते में नहीं आयेगा।” देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा।
“दौलत का लालच इन्सान से बहुत कुछ करा देता है। दौलत के मामले में कमीना है। पैसे की खुशबू आते ही इसका दिल-दिमाग हिल गया है। इस समय भी दौलत के हाथों मजबूर होकर यहां तक पहुंचा हुआ है। सुनने में आया है कि वैसे तो हिम्मत वाला इन्सान है। लेकिन किसी की जान नहीं ले सकता। इतना बड़ा हौसला नहीं है इसमें कि किसी को मार सके।”
“यानि कि इन्सानियत बाकी है इसमें।”
“कुछ भी कह लो। परन्तु मौका-परस्त है। सालों से रनवीर भंडारी के साथ था, परन्तु दौलत को देखते ही, उससे दगा कर गया।”
“और इसके साथी?”
“कोई साथी नहीं है।” सोहनलाल ने इन्कार में सिर हिलाते हुए कहा- “कमल शर्मा नाम का एक व्यक्ति है, जो कि असिस्टैंट के तौर पर इससे चिपका रहता है और उसका खर्चा-पानी चल जाता है। अपने साथियों का जिक्र करके इसने खामखाह का ड्रामा कर रखा है कि तुम पर दबाव बना रहे और इसके साथ ठीक तरह पेश आओ।”
देवराज चौहान ने समझने वाले ढंग में सिर हिलाया।
“मतलब कि ये सिर्फ दो हैं। गोदरा खुद और दूसरा कमल शर्मा, जो कि यहां आ रहा है।”
“हां। गोदरा की एक बहन है, नाम देवी है। यूं तो वो भी शरीफ है। परन्तु विनोद खुराना नाम के युवक के बच्चे की मां बनने वाली है, जो कि भटकी औरतों-युवतियों से पेशा कर, अपनी कमीशन लेता है। देवी और विनोद खुराना शादी करना चाहते हैं लेकिन गोदरा तैयार नहीं है इस शादी के लिये। इत्तफाक से विनोद खुराना का एक साथी मिल गया। उसे ये बात पता चली। कुछ और मालूम हो, ये सोचकर मैं प्रवेश गोदरा के घर जा पहुंचा। सोचा उसकी बहन से कहूंगा कि, प्रवेश मेरा दोस्त हूं। परन्तु घर के दरवाजे खुले मिले। वहां कोई नहीं था। बैडरूम की हालत बता रही थी कि आनन-फानन कोई सामान समेट कर गया है। वहां एक बैग को पड़े देखा, जिसमें पांच सौ के नोटों की पचास लाख की गड्डियां थी। ये वो ही गड्डियां थी, जो मैंने जगमोहन को दिलवाई थी।”
देवराज चौहान के होंठ सिकुड़ गये।
“और बैग में मौजूद जेवरात?”
“नोटों की गड्डियों के अलावा बैग में कुछ नहीं था। मैंने उस बैग को उठाकर बाहर खड़ी अपनी कार में रखा और आसपास के लोगों से पूछताछ की। उस मकान के सामने सड़क पार मौजूद धोबी ने बताया कि गोदरा की बहन सूटकेस थामे एक युवक के साथ कार में बैठकर गई है। वो युवक एक-दो बार ही उस घर में पहले आया था। मैंने उसका हुलिया पूछा, फिर खुराना का हुलिया मालूम किया तो समझ गया कि देवी, विनोद खुराना के साथ भाग गई है। जेवरात सारे ले गई है परन्तु नोटों को क्यों छोड़ गई, समझ में नहीं आया।”
“नोटों को वहां छोड़कर जाने का एक ही मतलब है कि विनोद खुराना किसी तरह पहचान गया होगा कि नोट नकली हैं। ऐसे में नकली नोटों को साथ रखकर वे कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते होंगे।”
देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “इसका मतलब, देवी, प्रवेश गोदरा की हर हरकत पर नजर रख रही थी। सब कुछ जानती थी। तभी तो गोदरा के घर से निकलने पर, उसने विनोद खुराना को बुलाया और लाखों के जेवरातों के साथ वहां से निकल गई।”
देवराज चौहान और सोहनलाल की नजरें मिली।
“ये बात प्रवेश गोदा के कानों तक न पहुंचे।” देवराज चौहान ने कहा- “वरना दौलत और बहन के हाथ से जाने के बारे में सुनकर वो परेशान हो जायेगा और जो थोड़ा-बहुत काम करना होगा, वो भी नहीं कर सकेगा। वैसे मुझे नहीं लगता कि प्रवेश गोदरा या उसका साथी इस डकैती में हमारे किसी खास काम आ सकेंगे।”
“मालूम नहीं, डकैती की क्या योजना है तुम्हारे मस्तिष्क में।” सोहनलाल ने कश लेते हुए कहा- “वरना जरूरत पड़ने पर गोदरा इस मामले में, हमारे लिये तगड़ा काम का साबित हो सकता है।”
“कैसे?” देवराज चौहन की निगाह, सोहनलाल के चेहरे पर जा टिकीं।
सोहनलाल ने कश लिया फिर देवराज चौहान से कह उठा।
“प्रवेश गोदरा की गर्लफ्रेंड है रूपा ईरानी-। वो देश की चुनिन्दा मॉडलों में से एक है। बेहद खूबसूरत है। किसी को घास तक नहीं डालती, लेकिन गोदरा को पनीर खिलाती है। रूपा ईरानी भी उन सोलह मॉडलों में से एक है, जो जेवरातों को अपने जिस्म पर डालकर, होटल के हॉल में उनका प्रदर्शन करेगी।”
देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी-।
“कहां है रूपा ईरानी?” देवराज चौहान ने पूछा।
“मुम्बई में। कल वो प्रदर्शनी के लिये तैयारी शुरू कर रही है।”
होंठ सिकोड़े देवराज चौहान, सोहनलाल को देखता रहा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं...”
“रूपा ईरानी हमारे किसी काम आ सकती है?”
“हां। लेकिन वो हमारे काम क्यों आयेगी?” देवराज चौहान ने सिर हिलाया।
“गोदरा के कहने पर वो हमारा मनचाहा काम कर सकती है।”
सोहनलाल अपने शब्दों पर जोर देकर बोला।
“ये कोई ऐसा काम नहीं है कि दोस्ती की खातिर कर दिया जाये।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “डकैती है ये। अरबों की दौलत का मामला है। रूपा ईरानी नाम की मॉडल्स के लिये मर्द ऐसी चीज नहीं होगी कि वो गोदरा की बात मानने पर मजबूर हो जाये। नामी मॉडल्स ऐसे काम के लिये आसानी से तैयार नहीं होगी।”
सोहनलाल देवराज चौहान को देखता रहा फिर बोला।
“हो सकता है उसका, गोदरा के साथ खास सम्बन्ध हो।”
“कितना भी खास सम्बन्ध क्यों न हो। दोस्ती की खातिर वो डकैती का कोई काम करने से रही।”
सोहनलाल ने सोच भरे ढंग में पहलू बदला।
“रूपा ईरानी के बारे में कुछ और बताओ।”
“और तो ऐसी कोई खास बात नहीं है। वो-वो ड्रग्स लेती है।” सोहनलाल एकाएक बोला।
“ड्रग्स?”
“स्मैक...”
“फिर तो जल्दी मरेगी।” देवराज चौहान के होठों से निकला- “स्मैक जान लेकर ही छोड़ती है।”
दोनों के बीच कुछ पलों तक खामोशी रही।
“सोचना ये है कि रूपा ईरानी किस तरह हमारे लिये काम कर सकती है?” देवराज चौहान ने कहा।
“गोदरा से बात करें?”
“नहीं। इस सिलसिले में पहले रूपा ईरानी से मिलना होगा।”
“उससे-? वो ये बात प्रदर्शनी आयोजकों के सामने खोल भी सकती है कि हम जेवरातों की डकैती...”
“नहीं खोलेगी।” देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ- “तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकते हो। जगमोहन गोदरा के पास ही रहेगा। रूपा ईरानी का घर जानते हो?”
“हां- “ सोहनलाल की गर्दन भी हिली।
☐☐☐
ब्रा और पैंटी पहनकर रूपा ईरानी, डबल बैड पर फैली नींद में डूबी हुई थी। शाम के चार बज रहे थे। कल शो की तैयारियां शुरू करनी थी। परसों प्रदर्शनी शुरू हो रही थी। वो नींद पूरी करके, फ्रेश होकर इस काम पर लग जाना चाहती थी। जानती थी कि प्रदर्शनी का वक्त लम्बा हैं आराम के लिये समय कम मिलेगा।
ग्यारह बजे नाश्ता किया था। उसके बाद वो नींद में जा डूबी थी। नींद के मामले में वो किस्मत वाली थी कि जब भी चाहती, उसे नींद आ जाती थी।
कॉलबेल बजने पर वो हिली। आंखें खोली। वॉल क्लाक में वक्त देखा। मन-ही-मन सोचा कि शाम हो रही है, वैसे भी उठना ही था। लेकिन कौन आ गया? खुद को फ्रेश भी महसूस करती हुई।
वो उठी और दरवाजे की तरफ बढ़ी। तभी दूसरी बार कालबेल बजी। दरवाजे पर लगी आई मैजिक में आंख लगाई तो उसे सोहनलाल का चेहरा दिखा। जो कि उसके लिये अंजान चेहरा था। चेहरे पर उलझन भरी।
“कौन है?”
“मैडम ईरानी।” सोहनलाल की मध्यम-सी आवाज कानों में पड़ी।
“यस।”
“आपसे बात करनी है।”
“लेकिन मैं आपको नहीं...।”
“गोदरा साहब ने भेजा है- “ सोहनलाल की आवाज आई- “उनका मैसेज है।”
रूपा ईरानी के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।
“प्रवेश, फोन पर भी मुझसे बात कर सकता था।”
“मैडम इस बारे में हम नहीं जानते। आप कहें तो हम जायें। कहें तो रुके…”
“आपको साथ भी कोई है?”
“हां। एक और है। जायें हम…”
क्षणिक सोच के बाद रूपा ईरानी बोली।
“रुको- “
उसके बाद उसने शरीर पर गाउन डाला। शीशे में चेहरा ठीक किया और आगे बढ़कर दरवाजा खोला।
सोहनलाल और देवराज चौहान को देखा।
“कहो-?” उसकी निगाह पुनः दोनों पर गई।
“यूं खड़े रहकर बात नहीं हो पायेगी।” सोहनलाल बोला- “भीतर आने दीजिये।”
रूपा ईरानी ने उन्हें भीतर आने का रास्ता दिया और फिर दरवाजा
बंद किया। सामने मौजूद सोफा चेयर पर दोनों जा बैठे। रूपा ईरानी खड़ी रही।
“बैठ जाइये- “सोहनलाल बोला- “ताकि बात की जा सके।” न चाहते हुए भी रूपा ईरानी बैठी।
“कहो”
“मेरा नाम सोहनलाल है।” सोहनलाल बोला- “मेरे साथ देवराज चौहान है। ये…”
रूपा ईरानी चौंकी।
“क-कौन?”
“देवराज चौहान…”
“ड-डकैती वाला-दे-देवराज चौहान-?” रूपा ईरानी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।
देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ चुकी थी।
“तुम जानती हो?” सोहनलाल बोला।
“हां-हां-प्र-प्रवेश ने बताया था, देवराज चौहान के बारे में।”
उसके चेहरे का रंग कुछ फीका-सा नजर आने लगा था।
देवराज चौहान और सोहनलाल की नजरें मिलीं।
“म-मैंने, प्रवेश को समझाया था।” रूपा ईरानी सूखे होठों पर जीभ फेरकर कह उठी- “ये-ये काम उसके बस का नहीं है। इस काम में ह-हाथ मत डाले। दे-देवराज चौहान को ब्लैकमेल ना करे। ले-लेकिन वो नहीं माना। पैसे का भूत उस पर सवार था। म-मेरी बात उसे समझ ही नहीं आई।...क्या-? क्या कर डाला उसने?”
दोनों ने रूपा ईरानी की घबराहट को पहचाना।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और शांत स्वर में कह उठा।
“दौलत का भूत बुरा नहीं होता अगर उसे पाने की तमन्ना और हौंसला मन में हो तो।”
रूपा ईरानी, देवराज चौहान को देखने लगी।
“तुम पर दौलत का भूत सवार नहीं है क्या?” देवराज चौहान ने शांत स्वर में पूछा।
रूपा ईरानी ने दोनों को देखा फिर संभले स्वर में बोली।
“दौलत की सबको जरूरत होती है। परन्तु जरूरी तो नहीं कि इसके लिये डकैती की जाये। ये पागलपन है।”
“तुम पागलपन में शामिल नहीं होना चाहती?” देवराज चौहान की निगाह उसके चेहरे पर थी।
“मैं?” उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
“प्रवेश गोदा बता रहा था कि तुम्हें पैसे की सख्त जरूरत है।”
“सख्त जरूरत?”
“हम अरबों हासिल करने जा रहे हैं सोच लो। हो सकता है उसने हमें गलत बताया हो।”
रूपा ईरानी ने सूखे होठों पर जीभ फेरी। डर-हिचकिचाहट के भाव चेहरे पर थे। उसने बारी-बारी दोनों को देखा। उसके बाद लम्बी चुप्पी के पश्चात् कह उठी।
“तुम लोग अरबों हासिल करने जा रहे हो। लेकिन वो पैसा मुझे क्यों दोंगे?”
“क्योंकि तुम जेवरातों की नुमाईश के दौरान हमारा काम करोगी।”
रूपा ईरानी चौंकी।
“तुम-तुम लोगों का काम?”
“हां…”
“वो काम डकैती से वास्ता रखता है?”
“हां- “
“मैं नहीं करूंगी।” वो बेचैनी से सिर हिलाकर कह उठी।
“तुम्हें पैसे की जरूरत नहीं?”
“नहीं।” हिम्मत करके उसने इन्कार किया- “म-मेरे पास इतना पैसा है कि सारी उम्र इज्जत की रोटी खा सकू। शानदार बंगला बनाने की तमन्ना में, ऊंटी में जमीन ले रखी है। लेकिन उसके लिये डकैती में साथ देने की मेरी जरूरत नहीं।”
देवराज चौहान और सोहनलाल की नजरें मिलीं। ,
देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी।
“अगर हम कहें कि तुम्हें फला-फलां काम करना है तो क्या तुम इन्कार करोगी?”
रूपा ईरानी का चेहरा पक्क पड़ गया। आंखों में डर नजर आने लगा। उसकी नजरें देवराज चौहान पर टिकी रही। उसकी रुकी सांसें इत्तफाक से जोरों से चली और सीना उठने-बैठने लगा। एकाएक वो उठ खड़ी हुई।
“कहाँ?” सोहनलाल भी खड़ा हुआ।
“मैं अभी और बात नहीं कर सकती। दवा लेनी है, उधर कमरे में। दस मिनट में आई…”
“स्मैक लेनी है।” सोहनलाल शांत स्वर में बोला।
सूखे होठों पर जीभ फेरकर, वो सोहनलाल को देखने लगी।
“हम तुम्हें अकेले नहीं छोड़ सकते।” सोहनलाल बोला- “मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।”
रूपा ईरानी ने इन्कार नहीं किया और सोहनलाल को लिए दूसरे कमरे में चली गई।
रूपा ईरानी जब सोहनलाल के साथ पुनः वापस कमरे में आई तो उसकी आंखों में नशे के लाल डोरे तैर रहे थे। आंखों में मस्ती भी थी। चाल में मध्यम-सी लड़खड़ाहट उसकी खूबसूरती को चांद चांद लगा रही थी। स्मैक की डोज लेने के बाद वो और भी खूबसूरत लगने लगी थी।
“तगड़ी डोज़ ली है इसने।” वापस बैठते हुए सोहनलाल ने देवराज चौहान से कहा।
“मेरा माल है। जो मन में आयेगा करूंगी।” नशे में उसकी हिम्मत बढ़ गई थी- “तुम्हें क्या।” उसकी आवाज में नशे से भरा कम्पन स्पष्ट महसूस हो रहा था।
“मैंने तुमसे पूछा था कि अगर मैं तुम्हें कोई काम करने को कहूं तो क्या तुम इन्कार करोगी?” उसे देखते हुए देवराज चौहान ने एक-एक शब्द पर जोकर देकर पूछा।
रूपा ईरानी की नशे से भरी आंखें देवराज चौहान के चेहरे पर जा टिकीं।
“देख भाई देवराज चौहान।” रूपा ईरानी नशे से भरे स्वर में कह उठी- “धमकी देकर मुझे डरा मत। इन उंगलियों पर नचाती हूं मैं मर्दो को।” उसने अपनी उंगलियां दिखाई- “मैं...।”
“मैं नाचने वाले मर्दो में से नहीं हूं।” देवराज चौहान मुस्कुराया।
“मतलब कि नहीं नाचेगा।” कहते हुए रूपा ईरानी ने इन्कार में, जोरों से सिर हिलाया।
“नहीं- “ डकैती में साथ देती हो हमारा?”
“नहीं। बिल्कुल नहीं। जरा भी गड़बड़ हुई तो मेरा कैरियर चौपट हो जायेगा। पुलिस मुझे पकड़ लेगी।”
“गड़बड़ न हुई तो, तुम्हें हमसे एक अरब रुपया मिल सकता है।” देवराज चौहान बोला।
“मुझे नहीं चाहिए ऐसा पैसा, जो गले की मुसीबत बन जाये।”
“ये तो नशे में टुन्न हो रही है।” सोहनलाल ने मुंह बनाया।
कुर्सी पर बैठी-बैठी वो झूम-सी रही थी। नशे ने अब और असर दिखाना शुरू कर दिया था।
“गोदरा को कब से जानती हो?” देवराज चौहान ने पूछा।
“बहुत साल हो गये।”
“उसे अब तक अपने साथ क्यों रखा है। तुम्हें मर्दो की क्या कमी। चाहने वाले बहुत मिलते होंगे।”
“मैं ऐसी-वैसी नहीं हूँ। ढंग से बात करो…” रूपा ईरानी हाथ हिलाकर कह उठी।
“मैं तुम्हें समझने की कोशिश कर रहा हूं।” देवराज चौहान के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था- “प्रवेश गोदरा के साथ तुम्हारा रिश्ता इतना लम्बा क्यों चल रहा है।”
“प्रवेश अच्छा इन्सान है। मतलबी नहीं। मेरे साथ ढंग से पेश आता है।” रूपा ईरानी कह उठी- “वो मेरे शरीर के साथ दोस्ताना कम रखता है और मुझसे ज्यादा। जो उसके दिल में है वो ही मुंह में। लेकिन दूसरे लोग। वो मेरे शरीर की कीमत लगाते हैं। उंगली लगाने के पांच हजार। कलाई पकड़ने के दस हजार। यूंही धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। सब बेईमान हैं। अगर कोई ईमानदारी से मुझसे शादी करना चाहता है तो, वो मुझे पसन्द नहीं आता।”
“गोदरा से शादी क्यों नहीं कर लेती?”
रूपा ईरानी ने कुछ नहीं कहा।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाकर कश लिये।
“गोदरा शादी के लायक नहीं है क्या?”
“वो तो बहुत बढ़िया है।” रूपा ईरानी नशे में एकाएक गम्भीर नजर आने लगी- “मैं तो उससे शादी कर लेना चाहती हूं। लेकिन वो मेरे को शादी के लिये मना कर देता है।”
“क्यों?”
“मेरी नशे की आदत को पसन्द नहीं करता। नशा छोडूं तो वो मेरे से शादी करेगा और ये नशा छूटता कहां है।” कहते हुए रूपा ईरानी के स्वर में उदासी के भाव आ गये थे।
देवराज चौहान उठा। सोहनलाल को भी उठने का इशारा किया।
“कहां चले?” रूपा ईरानी ने सुर्खी भरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा।
“इतना ही बैठना था आओ सोहनलाल।”
दोनों दरवाजे की तरफ बढ़े।
“कमाल है। चल पड़े” पीछे से रूपा ईरानी की बड़बड़ाहट सुनाई दी।
दोनों बाहर निकले तो सोहनलाल ने पूछा।
“अचानक क्यों चल पड़े?”
“जरूरत नहीं थी बैठने की।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “जर्बदस्ती करके, किसी से काम लेना पसन्द नहीं मुझे। लेकिन गोदरा, इस मॉडल से प्यार-मोहब्बत से काम निकाल लेगा।”
“प्रवेश गोदरा?”
“हां। उसकी बात मानेगी ये। दिल-ही-दिल में गोदरा से प्यार करती है। इस काम के लिये गोदरा को तैयार करना होगा कि वो रूपा ईरानी को तैयार करे कि डकैती में हमारा साथ दे।”
“वो तो डकैती के नाम से बिदक रही है। नहीं मानेगी...”
“गोदरा जब उससे शादी करने को तैयार होगा तो, वो सब कुछ बिना कहे कर देगी।” देवराज चौहान बोला।
☐☐☐
जेवरातों की प्रदर्शनी का पहला दिन।
सात सितारा होटल के हॉल में सफलतापूर्वक फैशन शो को अंजाम दिया जा रहा था।
शाम के चार बज रहे थे।
वहां से सात किलोमीटर दूर पांच सितारा होटल में एक साथ तीन कमरे बुक थे। एक कमरे में प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा ठहरे थे। दूसरे में जगमोहन और देवराज चौहान। तीसरे में सोहनलाल था।
आज सुबह ही वो आकर होटल में ठहरे थे अब बंगले में रहना उन्होंने ठीक नहीं समझा था। जरूरत के मुताबिक वो आपस में मिल लेते थे। बात कर लेते थे।
देवराज चौहान जेवरातों की प्रदर्शनी के बारे में जानकारी टटोलने दो घंटे पहले निकला था। सोहनलाल और जगमोहन कमरे में बैठे चाय पी रहे थे कि प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा ने भीतर प्रवेश किया।
प्रवेश गोदरा बेचैन लग रहा था दोनों वहां मौजूद सोफा चेयर पर जा बैठे।
“तेरे को क्या हुआ?” जगमोहन ने शांत,भाव में पूछा।
“आज फैशन शो शुरू हो गया है, जेवरातों का-।”
“तो?”
“अभी तक कोई योजना नहीं बनी तो आगे कैसे काम होगा। अब तक योजना बन जानी चाहिए थी कि कैसे डकैती...।”
“दिक्कत आ गई है।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।
“कैसी दिक्कत?”
जगमोहन खामोश रहा।
सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगा ली।
“क्या मंगवाऊं?” जगमोहन ने पूछा।
“मैं दिक्कत के बारे में पूछ रहा हूं-।”
“सच बात बताये बिना काम नहीं चलेगा। वरना मैं बताता ही नहीं शायद हम ये डकैती न कर पायें।”
“क्यों?” प्रवेश गोदरा हड़बड़ा पड़ा।
कमल शर्मा ने जगमोहन को देखते हुए सूखे होठों पर जीभ फेरी।
“तेरे को क्या फर्क पड़ता है।” जगमोहन ने जानबूझकर लम्बी-लम्बी सांस ली- “बिना कुछ किए तेरे को तो करोड़ मिल गये।”
“करोड़ गये कुएं में तुम…।”
“वो तो जा ही चुके हैं। तेरे भी, मेरे भी। लेने वाले ले गये।”
“क्या-क्या कहां?”
“ये कहा कि मेरे करोड़ गये और तू ले चुका है।”
“मैं डकैती के बारे में पूछ रहा हूं।” गोदारा दांत भींचकर
बोला- “क्यों नहीं हो सकती डकैती?”
“सिक्योरिटी बहुत टाईट है।”
“ये पहले नहीं मालूम था?” प्रवेश गोदरा के चेहरे पर गुस्सा नजर आने लगा।
“इतना गुस्सा क्यों करता है। हमारे साथ दो कदम चलने में, तेरी फैक्ट्री पर कौन-सा ताला लग गया जो चीखे जा रहा है। तेरे को जो करोड़ मिला है, वो गरीबों में बांट दे। अगले जन्म में तू पक्की डकैती कर पायेगा।”
“इस बार किसकी मां मर गई?” गोदरा ने पहले वाले स्वर में कहा।
“मेरे भाई किसी की मां नहीं मरी।” जगमोहन सामान्य ढंग से, सादे स्वर में कह उठा- “सब की माएं खेल-कूद रही हैं और सलामत हैं। तेरी मां की मुझे खबर नहीं। बात दरअसल ये है कि प्लेटो सुरक्षा कम्पनी का मालिक विवेक बंसल बहुत घिसा हुआ बंदा है। उसने वास्तव में तगड़े सिक्योरिटी का इन्तजाम कर दिया है वहां कि, डकैती न हो सके। ऊपर से मुम्बई पुलिस। विवेक बंसल और मुम्बई पुलिस ने मिलकर कोई कसर नहीं छोड़ी, सिक्योरिटी टाईट करने में। हमें तो समझ ही नहीं आ रहा कि जेवरातों के हॉल में कैसे-किस तरह पहुंचा जाये?”
“तो ये सब पहले नहीं मालूम था।” प्रवेश गोदरा ने दांत भींचकर कहा।
“मालूम होता तो तेरे को करोड़ क्यों देता। सुन-अब काम नहीं हो पाया तो आधा करोड़ वापस कर…”
“आज ये बातें क्यों कह रहे हो। ये बात पहले भी कह सकते
“सोचा शायद पर कोई रास्ता मिले?”
“देवराज चौहान कहां है?” प्रवेश गोदरा क्रोध से भरा पड़ा था।
“होटल का फेरा लगाने लगा है, शायद कोई रास्ता मिल जाये…”
प्रवेश गोदरा खा जाने वाली निगाहों से जगमोहन को देखने लगा।
“मुझे खायेगा क्या?”
“मैं तो देवराज चौहान को बहुत बड़ा डकैती मास्टर समझता था।”
“तेरे समझने से क्या होता है।”
“लोगों से सुना और अखबारों में पढ़ा था कि…”
“सब झूठ है। दुश्मनों की उड़ाई अफवाहें हैं। ऐसे सोचने-समझने से पहले मेरे से बात कर ली होती।”जगमोहन ने मुंह बनाकर कहा- “ये अपना सोहनलाल है ना, ये रहा, इसी का दिमाग चलता है हर डकैती में। लेकिन डरता है कि ये बात किसी को मालूम न हो जाये। इसलिये देवराज चौहान का नाम आगे कर देता है।”
“सोहनलाल को जानता हूँ मैं कि वो क्या है…”
सोहनलाल चुप बैठा, सिग्रेटे के कश ले रहा था।
“शर्मा- “ प्रवेश गोदरा ने उसे देखा।
“कराची बात करें, भाई से-?” कमल शर्मा जल्दी से बोला।
“भाई-वाई गया भाड़ में।” प्रवेश गोदरा तेज स्वर में बोला- “मुझे तो इनकी बातें समझ में नहीं आ रही। अगर ये सब ही कहना था इसने तो पहले कहा जा सकता था। अब मौके पर ये सब कहने की…”
“कहना क्या चाहता है- “ कमल शर्मा ने टोका।
“मैं क्या कहूं। अभी तो ठीक से कुछ सोच भी नहीं पा रहा।” कहते हुए गोदरा ने जगमोहन को घूरा।
“मैंने तो सुना था कि डकैती की योजना बनाना और माल तक पहुंच पाना, देवराज चौहान के लिये मामूली खेल है।”
“सुना क्या, ये सच भी है।” गोदरा विश्वास भरे स्वर में कह उठा- “लेकिन इनकी बातें मेरी समझ से बाहर हैं।”
खामोश बैठा सोहनलाल एकाएक कह उठा।
“जल्दबाजी मत करो। कोई-न-कोई रास्ता निकल आयेगा। देवराज चौहान के आने का इन्तजार करो।”
“वो तो ठीक है। लेकिन हमें पता तो चले कि परेशानी क्या है।” गोदरा झल्लाकर बोला।
सोहनलाल ने जगमोहन को देखा फिर गोदरा और शर्मा।
“परेशानी कोई खास नहीं है। ऐसी छोटी-छोटी दिक्कतें काम-धंधे में आ ही जाती हैं। सब्र से काम लेना चाहिए।”
“उल्लू के पढ़े-।” प्रवेश गोदरा का सब्र जवाब देने लगा- “बताओ तो सही, क्या दिक्कत है।”
“उल्लू का पट्ठा होगा तू-।” सोहनलाल सामान्य स्वर में बोला- “मैं तो ये कह रहा था कि देवराज चौहान ने डकैती की योजना बना ली है। सब ठीक है। थोड़ी-सी अड़चन आ रही है। वो दूर न हुई तो, डकैती नहीं हो पायेगी।”
“अब क्या ये टेबल तेरे सिर पर मारकर पूछे कि दिक्कत क्या है।” गोदरा गुर्रा उठा।
तभी जगमोहन कह उठा।
“ढंग से बात कर, नहीं तो ये टेबल मैं तेरे सिर पर मार दूंगा। जरूरी तो नहीं कि तेरे को हम अपनी भागदौड़ के बारे में बताते रहे। साथ लगा है तो चुपचाप साथ लगा रह। जो हमारे साथ होगा, वो ही तेरे साथ होगा। हमारा तो एक करोड़ रुपया गया। जो तेरे पास है। इस काम में हमें क्या मिला, अगर कुछ न हुआ तो-? अब सुन ही ले कि जो योजना बनाई है, उसके लिये हमें प्रदर्शनी का भीतरी कोई बंदा चाहिए, जो हमारे काम आ सके। उसके बिना इस योजना को अंजाम नहीं दे सकते। और ऐसा कोई, हमें मिल नहीं रहा।”
“ये तो मामूली-सी बात है।” प्रवेश गोदरा कह उठा- “दिक्कत कहां से आ गई?”
“क्यों, तेरा कोई सगा है, प्रदर्शनी के भीतर...”
“रनवीर भंडारी हैन। वो हमारे काम।”
“वो हमारे काम नहीं आ सकता। उसने जितना काम आना था आ गया। वो ज्वैलर्स संघ की तरफ से वहां पर काम कर रहा है। उस पर सबकी नजर रहेगी। उसकी कोई हरकत पकड़ी गई तो हमारा सारा मामला बेकार हो जायेगा। हमें प्रदर्शनी से वास्ता रखता, कोई ऐसा बंदा चाहिए, जो स्वतन्त्रता पूर्वक हमारा काम कर सके। जैसे कि वहां का कोई सिक्योरिटी गार्ड। कोई पुलिस वाला। या विवेक बंसल की कम्पनी का कोई आदमी। या फिर कोई मॉडल, जो जेवरातों
को पहनकर उनकी नुमाईश कर रही है।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा- “इनमें से कोई एक भी हमारे हाथ लग गया तो सारी समस्या हल हो जायेगी। देवराज चौहान इसी काम के वास्ते गया है। साथ में दो आदमियों की और जरूरत है इस काम में। उनका भी इन्तजाम करना है। वो तो हो ही जायेगा। लेकिन पहले ये काम तो हो...”
प्रवेश गोदरा जगमोहन को देखने लगा।
कमल शर्मा ने बेचैनी से कई बार गोदरा को देखा।
“भीतर वाले से तुम लोग क्या काम लेना चाहते हो?” प्रवेश गोदरा के होठों से निकला।”
“खास काम नहीं है। मामूली है।” जगमोहन ने लापरवाही से कहा- “जब हीरे-जेवरातों को बेचने के लिये आठवें-नवें और दसवें दिन रखा जायेगा। तब हमें भीतर जाने के लिये वो पास दिलवा देगा और दो-चार रिवॉल्वरें उस हॉल के बाथरूम में रखनी है कि भीतर जाकर, उन्हें हम हासिल कर लें। सख्त चैकिंग है। हथियार भीतर नहीं ले जाया जा सकता। और भीतर हथियारों के बिना काम नहीं हो सकता।”
“लोगों को मारोगे?”
“डराना है बेवकूफ। हम वहां माल समेटने जा रहे हैं। लाशें बिछाने नहीं।”
प्रवेश गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरकर पहले बदला।
कमल शर्मा की नजरें गोदरा पर थी।
कुछ पलों तक शान्ति रही।
“अपने कमरे में जाओ।” जगमोहन ने बोरियत भरे स्वर में कहा- “हमें भागदौड़ कर लेने दो। बीच में दखल मत दो। तुम्हारी इस तरह की पूछताछ से हमारे काम में रुकावट आती है।”
“गोदरा साहब-।” शर्मा ने फौरन टोका।
“हां”
“अपने कमरे में चलते हैं। जो करना है इन्होंने करना है। हमें ज्यादा पूछताछ नहीं करनी चाहिए।”
सोचों में डूबा गोदरा सिर हिला कर उठा।
“आओ”
दोनों बाहर निकल गये।
जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली- “गोदरा इस वक्त यही सोच रहा था कि रूपा ईरानी ये काम कर सकती है।” सोहनलाल बोला।
“हां। लेकिन अभी मुंह नहीं खोलेगा। पहले यही सोचेगा कि बाहर-बाहर से काम हो जाये।” जगमोहन ने कहा- “ये अपने हिस्से को दौलत के लिए मरा जा रहा है। अपने सहेली को ये हर हाल में तैयार करेगा, इस काम के लिये...”
“सीधे-सीधे बात करते तो...।”
“नखरें दिखाता। नहीं मानता। रूपा ईरानी को इस मामले में नहीं लेता। अब धीरे-धीरे सोचेगा कि डकैती न हुई तो दस अरब की दौलत हाथ से जायेगी। शर्मा, जो इसके साथ चिपका हुआ है, वो ही हवा देगा कि रूपा ईरानी से ये काम करा लेते हैं। दौलत का चस्का बहुत बुरा होता है और ये चस्का इन दोनों को लग चुका है।” जगमोहन
मुस्कुराकर कह उठा।
अपने कमरे में पहुंचते ही कमल शर्मा कह उठा।
“गोदरा साहब। ये काम तो आप रूपा ईरानी से करा सकते हैं।”
“मैं उसे इस मामले में नहीं लेना चाहता।” प्रवेश गोदरा बेचैनी से बोला।
“क्यों?”
“उसे डकैती जैसा काम पसन्द नहीं। मुझे भी रोक रही थी, ये सब करने से।” प्रवेश गोदरा ने कुर्सी पर बैठते हुए गहरी सांस ली- “ये सब करने के लिये वो किसी कीमत पर नहीं मानेगी।”
“आपका कहना मान लेगी।”
“नहीं मानेगी। मैं उसकी आदत अच्छी तरह से जानता हूं। वैसे तो एंट्री पास भी दिलवा सकती है। हमारे लिये रिवॉल्वरें भी हाल के बाथरूम में पहुंचा देगी। बहुत तेज है वो। लेकिन मानेगी नहीं।”
गोदरा ने इन्कार में सिर हिलाया।
“आपकी दोस्ती सालों पुरानी...”
“दोस्ती का मतलब ये तो नहीं कि अंधे कुएं में छलांग लगा दी जाये। उसके पास पैसा है। शोहरत है। दौलत का पागलपन उस पर इतना ज्यादा नहीं कि डकैती जैसे काम में हिस्सा ले ले। समझदारी से चलती है।”
प्रवेश गोदरा कमल शर्मा से कह उठा।
“अगर देवराज चौहान कोई इन्तजाम न कर पाया तो क्या होगा?”
प्रवेश गोदरा ने होंठ भींच लिए।
“दौलत पाने का सपना अधूरा रह जायेगा। फिर कभी ऐसा मौका नहीं मिलेगा।”
“लेकिन शर्मा, मैं रूपा को अच्छी तरह जानता हूं कि वो इस काम के लिये तैयार नहीं होगी।”
“तो ये भी जानते होंगे कि उसे कैसे तैयार करना है।” गोदरा, शर्मा को देखने लगा।
कमल शर्मा गर्दन हिलाकर कह उठा।
“रास्ता तो हर चीज का होता है। उसे भी रास्ते पर लाने के लिये कोई रास्ता होगा।”
गोदरा ने कुछ न कहा।
“देवराज चौहान को नहीं मालूम रूपा ईरानी के बारे में, वरना वो आपसे बात कर चुका होता।”
“सच बात तो ये है कि मैं डकैती जैसे काम में उसे नहीं लेना चाहता। वो साफ दिल की अच्छी लड़की है।”
“ये आपकी सोच-विचार है। मैं क्या कहूं। सब ही साफ दिल की अच्छी होती है। किसी को हालात बुरा बना देते हैं तो कोई बुरे हालातों से निकलकर संभल जाती है।” कमल शर्मा अपने शब्दों पर जोर देता समझाने वाले स्वर में कह उठा- “मैं तो इतना ही कहूंगा कि अरबों के मालिक बनने के बाद आप एक-से-एक बढ़िया लड़की को हासिल कर सकते हैं। उसे पा सकते हैं। दिल को बड़ा करके सोचिये। मेरी बात सही लगेगी।”
“मैं उसे मन-ही-मन चाहता हूं शर्मा-।” गोदरा ने दांत भींचकर कह उठा।
“ये तो और भी अच्छी बात है।। भगवान ने चाहा तो सारा मामला ठीक तरह निपट जायेगा। बाद में आप उससे शादी कर सकते हैं। मुझे तो कोई दिक्कत नजर नहीं आ रही। वैसे आपकी मर्जी।” कमल शर्मा धीमे स्वर में बोला।
प्रवेश गोदरा होंठ भींचे बैठा रहा।
कमल शर्मा उसके सामने बैठ गया। खामोश रहा। वो चाहता था, गोदरा को सोचने का वक्त मिले।
जब कुछ वक्त मिला तो कमल शर्मा पुनः कह उठा।
“क्या सोचा गोदरा साहब?”
प्रवेश गोदरा ने सिर दांयें-बायें इन्कार में सिर हिलाया।
“सोच लीजिये। अभी तो वक्त है। मेरे ख्याल में आपको मैडम ईरानी से बात करनी ही पड़ेगी।” कमल शर्मा शांत स्वर में बोला- “वैसे देख लेते हैं, शायद देवराज चौहान ही कोई रास्ता निकाल ले। कोई इंतजाम हो जाये।”
चौथे दिन की प्रदर्शनी चल रही थी आज।
वे लोग अधिकतर होटल में ही रहते। देवराज चौहान अवश्य यदा-कदा बाहर निकल जाता था और तीन-चार घंटों बाद लौटता।
जगमोहन ने कई बार उसके साथ जाना चाहा। परन्तु देवराज चौहान जरूरत नहीं है कहकर, उसे रोक देता। देवराज चौहान ने जरूरत के मुताबिक दो अन्य व्यक्तियों का इन्तजाम कर लिया था। जो कि सड़क छाप बदमाश थे। उन्हें उनका काम समझा दिया था। उस काम के बदले उन्होंने पच्चीस-पच्चीस हजार मांगे, सोचकर कि दस-बारह हजार कम कर देंगे। परन्तु देवराज चौहान ने पैसा कम नहीं कराया।
दोनों को पच्चीस-पच्चीस हजार देते हुए इस बात पर जोर दिया कि
वो काम बढ़िया ढंग से करें, वरना वो उन्हें शूट कर देगा। आखिरी शायद इसलिये कहे कि काम में वो लापरवाही इस्तेमाल न करें।
इधर दिनों के बीतने के साथ-साथ प्रवेश गोदरा की परेशानी बढ़ती जा रही थी। वो परेशान था तो कमल शर्मा भी परेशान था।
शर्मा चाहता था कि गोदरा, किसी तरह रूपा ईरानी को काम के लिये तैयार करे। परन्तु स्पष्ट तौर पर इस बात का दवाब उस पर नहीं डाल सकता था। गोदरा ठीक तरह से उठ-बैठ नहीं पा रहा था। बेचैनी, उससे चिपकी रहती थी हर वक्त। शर्मा से खास कुछ बात भी नहीं करता था।
इस वक्त भी वो डबल बैड पर आंखें बंद किए लेटा था कि शर्मा ने भीतर प्रवेश किया।
आहट पाकर प्रवेश गोदरा ने आंखें खोली।
“देवराज चौहान अभी-अभी होटल से बाहर गया है।” कमल शर्मा बोला।
“आया कब था?” प्रवेश गोदरा उठ बैठा।
“घंटा भर पहले। जब मैं उनके कमरे में गया तो तभी देवराज चौहान आया था।”
“कह क्या रहा है वो?”
“डकैती की तैयारी में है। तुम्हारा हाल पूछा रहा था।” कमल
शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा।
गोदरा के दांत भिंचने लगे।
“पूछा कि भीतरी आदमी का कोई इन्तजाम हुआ या नहीं?”
“पूछा था । इन्तजाम नहीं हुआ। जगमोहन की बातों से लगता। कि डकैती से पीछे भी हटा जा सकता है।”
“ये तो गलत हो जायेगा शर्मा-।”
कमल शर्मा खामोश रहा।
“मैं तो दस अरब की दौलत की आस लगाये बैठा हूं।”
“देवराज चौहान की सारी योजना, इस बात पर टिकी है कि भीतरी आदमी मिले और अपना काम सफलतापूर्वक करे। चार दिन से वो ऐसा कोई नहीं ढूंढ पाये। सोहनलाल तो कह रहा था कि कोशिश हो रही है। तीन से बात की थी। परन्तु वो नहीं माने और पीछे हट गये। एक पुलिस वाला पूरी सहायता करने को तैयार है, लेकिन वो आधा हिस्सा मांगता है।”
“आधा-?”
“हां।” कमल शर्मा ने सिर हिलाया- “जगमोहन ने कहा कि कोई रास्ता न मिला तो उसकी आधी वाली बात माननी पड़ेगी।”
प्रवेश गोदरा भड़क कर खड़ा हुआऔर चहलकदमी करने लगा।
“कैसे दे देंगे उसे आधा । दस अरब तो हमें देना है। अगर आधा उस पुलिस वाले को दे दिया तो हमारे हाथ क्या आयेगा। तब तो हो सकता है देवराज चौहान हमें कुछ भी देने से इन्कार कर दे। आखिर देवराज चौहान को भी तो कुछ चाहिये।”
“ये बात तो है।” कमल शर्मा ने सिर हिलाया- “अगर पुलिस वाले की आधी वाली बात मान ली गई तो सारा-का-सारा नुकसान तो हमें ही होगा। मेरी मानो तो मैडम ईरानी से बात कर लो।”
प्रवेश गोदरा ठिठककर भिंचे होठों से उसे देखने लगा।
“ये मौका हाथ से निकल गया तो शायद फिर कभी दौलत हासिल करने का मौका न मिले।” कमल शर्मा बोला।
चेहरे पर सख्ती समेटे गोदरा दरवाजे की तरफ बढ़ा।
“कहां चले?”
“जगमोहन के पास। बात करने...”
“मैं भी चलता हूं।” कमल शर्मा फौरन उसके साथ हो गया काम करने के लिये तैयार करे। परन्तु गोदरा जाने क्यों अड़ा पड़ा था।
“गोदरा। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। पहले से ही परेशान है। ऐसी बातें करके हमें और परेशान न करो। ये खतरनाक मामला है।
इसमें आने से हर कोई डर रहा है।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।
“ऐसे भी कोई डकैती होती है। बारात सिर पर खड़ी है और दुल्हन का पता नहीं।” प्रवेश गोदरा तीखे स्वर में बोला।
“ऐसा हो जाता है कभी-कभी। कभी तो खाली घोड़ी ही दुल्हन के घर पहुंचती है, लड़का कार्ड छपवाने गया होता है।”
“मैं मजाक नहीं कर रहा।” प्रवेश गोदरा कठोर स्वर में बोला।
“मैंने भी ये बात मजाक में नहीं कही।”
तभी कमल शर्मा बोला।
“आज चौथा दिन है। सिर्फ तीन बाकी है नुमाईश खत्म होने में। उसके बाद सारे जेवरातों को हॉल में, शो-केसों में लगा दिया जायेगा। हमारे पास इतना वक्त नहीं कि, इस तरह आराम से बातें करते रहे।”
“देवराज चौहान लगा है किसी मॉडल को फंसाने में।” जगमोहन बोला।
“मॉडल-?” गोदरा के होठों से निकला- “मॉडल ही क्यों?”
“देवराज चौहान ने मालूम किया है कि सोलह की सोलह मॉडल्स, पीछे वाले दरवाजे से भीतर आती है और उनकी तलाशी नहीं ली जाती। उन्हें चैक नहीं किया जा रहा। ये सबसे बड़ी भूल है सिक्योरिटी वालों की।” जगमोहन ने लापरवाही से कहा- “उन्हें कहीं भी आने-जाने में मनाही नहीं है। सिर्फ कंट्रोल रूम में नहीं जा सकती। और हम जो काम करना चाहते हैं, वो काम कोई मॉडल ही आसानी से कर सकती है।”
प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा की नजरें मिली।
“देवराज चौहान ने बात की किसी मॉडल्स से?” गोदरा ने पूछा।
“हां। रूपा ईरानी नाम की...।” सोहनलाल ने कहना चाहा।
“रूपा ईरानी” चौंका प्रवेश गोदरा।
“क्या हुआ?”
गोदरा संभला। खुद को सामान्य करने की चेष्टा की।
“कुछ-नहीं- “ गोदरा ने फौरन सिर हिलाया- “क्या बात हुई रूपा से”
सोहनलाल के होठों पर शांत-सी मुस्कान उभरी।
“वो कहने लगी कि डकैती से वास्ता रखती कोई बात नहीं मानेगी।” सोहनलाल बोला।
“फिर-?”
“उसने बताया कि उसका खास दोस्त प्रवेश गोदरा भी इस काम में हमारे साथ है।”
प्रवेश गोदरा मुंह खोले, सोहनलाल को देखने लगा।
“तुमने बताया था रूपा ईरानी को कि तुम क्या करने जा रहे हो।” सोहनलाल ने पूछा।
वो सोहनलाल को देखता रहा।
“तुमसे सोहनलाल ने कुछ पूछा है।” जगमोहन ने टोका।
“क्या?” प्रवेश गोदरा अपने ही किसी ख्यालों में से बाहर निकला।
“रूपा ईरानी को तुमने बताया था कि देवराज चौहान के साथ ये सब करने जा रहे हो।” सोहनलाल पुनः बोला।
गोदरा ने सहमति से सिर हिलाया।
“गलती की। ऐसी बातें किसी को बताते नहीं।”
“वो किसी में नहीं आती” गोदरा के होठों से निकला।
“तो?”
“मेरी-मेरी खास है वो। मैं चाहता हूं उसे।”
“और वो?”
गोदरा खामोश रहा।
“बोलो। वो भी तुम्हें चाहती है क्या?”
“म-मालूम नहीं। कहती तो वो है कि मुझे चाहती है।” गोदरा धीमे स्वर में कह उठा।
“उसने, तुमसे कहा कि तुम, उनसे शादी कर लो।”
“मालूम नहीं।” प्रवेश गोदरा ने बेचैनी से पहलू बदला- “लेकिन वो मेरे से शादी करना चाहती है। उसे इन्कार नहीं।”
पुनः बोला
“और तुम?”
“इन बातों का, जेवरातों की डकैती से क्या मतलब। तुम...”
“मतलब है।” सोहनलाल अपने शब्दों पर जोर देकर बोला- “मेरी बात का जवाब दो।”
प्रवेश गोदरा ने खा जाने वाली निगाहों से सोहनलाल को पूरा ।
“पीछे हो जा।” जगमोहन ने व्यंग से, सोहनलाज से कहा- “वरना, ये कच्चा खा जायेगा।”
“मैं, तुम्हारी बात किसी भी कीमत पर नहीं मानूंगा।” प्रवेश गोदरा कह उठा।
“कौन-सी बात?”
“तुम चाहते हो कि इस काम के लिये मैं रूपा ईरानी को तैयार करूं”
“ये सब करने को तो मैंने कहा नहीं।”
प्रवेश गोदरा ने होंठ भींच लिए।
कमल शर्मा व्याकुल दिखा।
“गोदरा साहब।” कमल शर्मा ने धीमे स्वर में कहा- “आप कुछ ज्यादा ही परेशान हो रहे हैं।”
कई पलों तक वहां खामोशी रही ।
प्रवेश गोदरा कुछ संभला दिखा।
“किसने बात की रूपा से?” गोदरा ने धीमे स्वर में पूछा।
“देवराज चौहान ने। मैं साथ ही था।”
“वो नहीं मानी, तुम लोगों की बात- “ प्रवेश गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।
“मान जाती।” सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट का कश लिया- “देवराज चौहान को सामने पाकर, आधी तो वो वैसे ही मानी लग रही थी, लेकिन वो डरकर मान रही थी। जबकि देवराज चौहान का उसूल है कि किसी को डराकर अपने काम के लिये तैयार मत करो। ऐसे लोगों से मौके पर गड़बड़ हो जाती है। साथी वो, जो मर्जी से काम करे।”
गोदरा, सोहनलाल को देखता रहा।
“पहले उसने स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा, परन्तु जब स्मैक की तगड़ी डोज ली तो उसमें हिम्मत आ गई। तब उसने साफ-साफ कहा कि वो डकैती से वास्ता रखता कोई काम नहीं करेगी।”
“हां। वो इन कामों को पसन्द नहीं करती।”
“लेकिन तुम्हें पसन्द करती है।”
“क्या मतलब?”
“वो तुमसे शादी करने को तैयार है। तुम्हें प्यार करती है। खुद मानी वो।” सोहनलाल ने सरल स्वर में कहा- “उसके पास खूबसूरती है। शोहरत है। पैसा है। रूपा ईरानी तुम्हें हर तरह से खुश रखेगी।”
“वो नशेड़ी है।”
“ये आदत हटा सकते हो प्यार से”
“न हटी तो? नशा करने वाले पर मुझे कभी भरोसा नहीं रहा।”
प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“जब वो तुम्हारी अपनी बन जायेगी तो, उस पर भरोसा भी करने लगोगे।” सोहनलाल कह रहा था- “पहले हमने तुमसे इसलिये बात नहीं की कि अपने काम के लिये किसी को तैयार कर ही लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ होता हमें नजर नहीं आ रहा। ये भी सोचा कि तुम खुद ही रूपा ईरानी की बात करोगे कि वो तुम्हारी पहचान की है, ये काम वो कर देगी। लेकिन तुम इस बारे में खामोश रहे तो मजबूरन मुझे ही ये बात करनी पड़ी”
प्रवेश गोदरा के चेहरे पर फंसे के भाव नजर आने लगे।
“रूपा ईरानी से बात करो। इस नुमाईश में वो जेवरातों को पहने चांद की तरह चमक रही है। तुमने शायद उसे देखा नहीं, वो सच में खूबसूरत लग रही थी। मूर्ख ही होगा जो उसका हाथ नहीं थायेगा।”
मुस्कुरा पड़ा सोहनलाल- “तुम जो कहोगे, वो मानेगी। हम कहते हैं वो खुशी से हमारा काम करे। जर्बदस्ती उससे काम लिया तो, उससे हमें नुकसान हो सकता है।”
कमल शर्मा ने फौरन प्रवेश गोदरा को देखा।
“बात कर लीजिए मैडम ईरानी से। वो...।”
“वो नहीं मानेगी।”
“तुम उससे कहो कि तुम उससे शादी करोगे।” जगमोहन कह उठा।
“मैं उससे झूठ नहीं बोल सकता।”
“तो सच कहो कि तुम, उससे शादी करोगे। उसकी नशे की आदत छुड़ा देना बाद में-।” जगमोहन का स्वर गम्भीर था- “रूपा ईरानी को तैयार करो कि वो हमारा ये थोड़ा सा काम कर दे। अगर उसे नहीं तैयार कर सकते तो अपने बिस्तर गोल करके खिसक लो। मेरा दिया एक करोड़ बोरे में बांध कर रखो। बाद में मुझे वापस कर देना।”
“वापस क्यों?” गोदरा के होठों से निकला।
“क्योंकि तुम इस काम में पार्टनर बनने के लायक नहीं हो।
तुम्हारी वजह से डकैती से हमें पीछे होना पड़ रहा है। कि तुम छोटे से काम के लिए रूपा ईरानी को तैयार नहीं कर रहे। जबकि ये काम आसानी से कर सकते हो। ऐसे में तुम उस करोड़ के हकदार नहीं बनते। अगर तुमने मेरा माल मुझे वापस कर देने में आना-कानी की तो, तुम्हें गोली मारने में मुझे वक्त नहीं लगेगा। क्योंकि तब तो वैसे भी गुस्सा चढ़ा होगा कि तुम्हारे वजह से डकैती नहीं की जा सकी।”
प्रवेश गोदरा का चेहरा फीका सा पड़ा नजर आने लगा।
“ये तो सरासर जर्बदस्ती वाली बात हुई-।”
“एक करोड़ रुपया दिया है तेरे को। फालतू की जर्बदस्ती नहीं कर रहा। माल वापस कर और कहीं भी जा। मैंने बांध नहीं रखा तेरे को।” जगमोहन का लहजा तीखा हो गया- “करोड़ रुपया दबाकर बैठ गया। काम कुछ करता नहीं। दस अरब की दौलत पाने के सपने देख रहा है और नींद आती नहीं। ऐसे में तेरे को सपने देखने का हक नहीं। यहां से सीधा अपने कमरे में जा और आधे घंटे में फैसला कर ले कि अब तेरे को कौन से रास्ते पर चलना है।”
गोदरा के चेहरे पर उभरा फीकापन न छंटा।
“शर्मा साहब- “ जगमोहन ने कमल शर्मा को देखा।
“हां-हां” शर्मा ने हड़बड़ाकर जगमोहन की तरफ नजर घुमाई।
“देखने में तो आप समझदार लगते हैं, लेकिन समझदारी वाला काम नहीं कर रहे।” जगमोहन के स्वर में कठोरता थी- “अगर आप समझदार होते तो, अब तक ये आपसे सब कुछ समझ चुका होता।”
“म-मैंने तो समझाया था।”
“फिर तो आपके समझाने में कमी रह गयी । इसे ले जाओ और गोद में बिठाकर तसल्ली से समझा देना।”
प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली और उठ खड़ा हुआ।
“चल शर्मा”
शर्मा फौरन ही गोदरा के साथ हो गया। दोनों दरवाजे की ओर बढ़े।
“जवाब देता जा, क्या करेगा?” पीछे से जगमोहन ने टोका- “दोबारा कब मिलेगा, करोड़ वापस देने के वास्ते?”
प्रवेश गोदरा ने पलट कर शांत निगाहों से जगमोहन को देखा।
“आज रात बात करूंगा रूपा से”
“प्यार से करना। खुशी से उसे तैयार करमा इस काम के लिए कि काम करते वक्त उसमें जोश हो। हिम्मत हो।”
“इस काम का उसे भी कुछ मिलना चाहिए।”
“तू क्या चाहता है कि उसे क्या मिले?”
“एक अरब तो मिलना ही चाहिए। गिनती अरबों में चल रही हो तो”
“सुना सोहनलाल। धेले का काम नहीं और एक अरब से कम की बात करता है उस लड़की के लिए। ठीक है, दिया। उसे अच्छी तरह संभाल कर बात करना। वो इंकार करे तो इसका ये मतलब नहीं कि तू उसका सिर फोड़ दे। वो तेरे से शादी करना चाहती है। प्यार से बात करेगा तो मानेगी क्यों नहीं।” जगमोहन ने लापरवाही से कहा।
“वो सब्र वाली है।” प्रवेश गोदरा ने ढीले स्वर में कहा- “पैसे का उसे खास लालच नहीं है।”
“तेरा लालच तो उसे है। उसी लालच से उसे दबा”
“बच्चों की तरह बात मत करो। वो बहुत समझदार है।”
“समझदार है तो उसे समझदारी से समझा-।”
“तू नहीं समझेगा। आ शर्मा-।”
गोदरा और कमल शर्मा बाहर निकल गये।
जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली।
“क्या ख्याल है?” सोहनलाल बोला।
“उस मॉडल को तैयार कर लेगा ये। जाते वक्त आंखों में दृढ़ता थी।” जगमोहन बोला।
“मेरे ख्याल से ये खुद नहीं चाहता कि रूपा ईरानी इस मामले में आये।” सोहनलाल मुस्कुराया।
“अरबों की रकम हजम कर लेना चाहता है। हाथ-पांव हिलाना नहीं चाहता। लड़की हमारे काम आ सकती है, लेकिन ये सोचकर उसे इस तरफ से दूर रख रहा है कि किसी तकलीफ में न आ जाये।”
जगमोहन ने शांत स्वर में कहा- “अब नक्शा दिखा दिया है। दस अरब तो दूर, मिला हुआ करोड़ रुपया भी हाथ से जाता दिखा तो, डण्डे की तरह सीधा हो गया। अपनी जरूरत को उससे बात करेगा। इसके बिना गोदरा के पास कोई रास्ता भी तो नहीं रहा। आते नोट कौन गंवाना चाहता है। दस अरब तो दूर, अब तो उसे, उस करोड़ की चिन्ता पड़ गयी होगी, जो मैंने दिया था।”
☐☐☐
रात को दो बजे रूपा ईरानी होटल पहुंची।
इस सात सितारा होटल में सिर्फ पांच किलोमीटर दूर वो होटल था, जहां प्रोग्राम के आयोजकों ने उसके ठहरने का इंतजाम कर रखा था। वहां छ: अन्य मॉडल्स और भी ठहरी थी। वैन उन्हें वहां छोड़ गयी थी। सब थकी-सी अपने-अपने कमरों की तरफ बढ़ गयी थी।
दिन के बारह बजे से रात के बारह बजे तक की लगातार कसरत से
रूपा ईरानी पर थकान, पूरी तरह हावी हो जाती थी। शाम को उसे परेशानी तो तब होती, जब डोज लेने का समय हो जाता। परन्तु प्रोग्राम के चालू रहते, किसी तरह वो खुद पर काबू पाये रहती। इस शो की उसे मोटी रकम मिल रही थी। लिखित एग्रीमैंट में था कि अगर वो प्रोग्राम के दसों दिन में से कोई भी दिन एक दिन व्यक्तिगत परेशानी से प्रोग्राम न कर पाई तो उसे मेहनताने से डबल हर्जाना देना होगा।
रूपा ईरानी को पूरा अहसास था कि डोज लेने जैसी गड़बड़ की तो, उसे तगड़ा नुकसान होगा। अलबत्ता भविष्य में होने वाले बड़े प्रोग्रामों से हाथ धोना पड़ेगा।
अब वो बैचेन थी कि जल्द से जल्द होटल के कमरे में पहुंचकर
स्मैक की डोज ले। इस वक्त उसने घुटनों तक लम्बी स्कर्ट और पारदर्शी
कपड़े की शर्ट पहने हुई थी। शरीर का आधा हिस्सा तो स्पष्ट नुमाया हो ही रहा था। तीसरी मंजिल पर स्थित अपने कमरे में पहुंची। दरवाजा बंद किया। जीरो वॉट का बल्ब पहले से ही रोशन था। उसने तीव्र रोशनी आन की और सैंडिल उतार कर एक तरफ फेंके। आनन-फानन स्कर्ट और कमीज उतार कर एक तरफ फेंक दी। ब्रा और पैंटी में वो और भी हसीन दिखाई देने लगी थी। उसकी लम्बी टांगें, जैसे शीशे की भांति चमक रही थी। कोई दूसरा देखता तो अवश्य उसके दिल की धड़कनें थम जाती। परन्तु प्रवेश गोदरा के लिए नजारा नया नहीं था। इस पर भी उसकी धड़कनों में कुछ तेजी आ गयी थी।
रूपा ईरानी तेजी से आगे बढ़ी और बैडरूम में प्रवेश कर गई। वार्ड रोब खोला तो भीतर सूटकेस और एयर बैग नजर आया। उसने हड़बड़ाये अंदाज में सूटकेस खोला और कपड़ों में छिपा रखा पैकिट निकालने लगी। बिना डोज के अब उसे और सहन नहीं हो रहा था। अपनी हालत को वो खराब होती महसूस कर ही थी।
दो पलों में ही एक-एक करके सूटकेस के सारे कपड़े उसने नीचे गिरा दिये।
परन्तु पैकिट वहां नहीं था।
कहां गया?
यहीं तो रखा था। उसने नीचे गिरे कपड़ों को चैक किया कि कहीं पैकिट उसमें फंसा हो। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था वे बदहवास सी नजर आने लगी। चेहरा सुर्ख सा होने लगा। पास पड़े बैग को पकड़ा। जल्दी से उसे खोला और उलटा करके सारा सामान वापस गिरा दिया। शायद उसमें पैकिट रख दिया हो।
उसमें भी नहीं था।
कहां गया?
यहीं तो रखा था सूटकेस में।
रूपा ईरानी की आंखों में अजीब सी चमक कौंधने लगी। रह-रहकर अजीब सा कम्पन उभर रहा था मस्तिष्क में। स्मैक की न मिली तो पागल हो जायेगी। यहां किसको कहे स्मैक के लिए। उसे सख्त जरूरत थी। बेहद सख्त जरूरत थी। जानती थी कि स्मैक
“ओह-। कहां गया उसके स्मैक का पैकिट। यहीं तो रखा था। भला कहां जा सकता है? वो पुनः बिखरे कपड़े और बिखरे सामान में हाथ मारने लगी। यहीं तो होना चाहिए। उत्तेजना और घबराहट के कारण उसकी सांसें तेज-तेज चलने लगी थी। स्मैक की डोज न मिली तो कहीं की नहीं रहेगी। नींद नहीं ले पायेगी। कल का शो भी नहीं कर पायेगी। उसके लिए चलना, काम करना असम्भव हो जायेगा।
इन सोचों के साथ ही उसका शरीर शीथिल होने लगा। एकाएक वो खुद को बेहद कमजोर महसूस करने लगी थी। लोग उसके सामने पलकें बिछाये रहते थे और नशे ने क्या हालत कर दी थी उसकी इस हकीकत के बारे में लोग जान गये तो उसे पसन्द करना छोड़ देंगे।
लेकिन स्मैक कहां गयी? वो पैकिट? बिखरे सामान के पास नीचे बैठ गयी और पागलों की तरह सामान को इधर-उधर फैंकने लगी। उसे मालूम हो चुका था कि स्मैक का पैकिट यहां नहीं है।
फिर भी वो, खुद को धोखा देते हुए, उस पैकिट की तलाश कर रही थी और सोच रही थी कि इंतजाम करने के बारे में किसी से कहेगी तो, खामखाह बदनाम होगी। परन्तु स्मैक के बिना तो रह नहीं सकती।
आखिर करे तो क्या करे?
“स्मैक ढूंढ रही हो”
इस आवाज पर रूपा ईरानी चौंक कर उछली। नजरें बैडरूम, के दरवाजे की तरफ गयी।
प्रवेश गोदरा वहां खड़ा गम्भीर निगाहों से उसे देख रहा था।
उसके हाथ में वो पैकिट था, जिसमें इस वक्त रूपा ईरानी की जान बसी हुई थी। यानि कि स्मैक का पैकिट। उस पैकिट पर निगाह पड़ते ही, उसके होंठ कांपे, आंखों में चमक आ गयी।
“प्लीज प्रवेश। प-पैकिट मुझे-दे दो। मुझे-।”
प्रवेश गोदरा ने होंठ भींचे पैकिट रूपा ईरानी की तरफ फेंका और वहां से हटकर वापस छोटे से ड्राइंग रूम में आ गया। जब वो भीतर आई, तब खिड़की के लम्बे पर्दे के पीछे छिपा था गोदरा। वो
जानता था कि वापस आते ही रूपा ईरानी, स्मैक की डोज लेगी। तभी तो उसने तलाश करके वो पैकिट अपने पास रख लिया था।
पन्द्रह मिनट बाद रूपा ईरानी ने वहां कदम रखा। वो ब्रा और पेंटी में थी। उसकी चाल में नशे से भरी लड़खड़ाहट थी। दो छोटे-छोटे कपड़ों में उसका शरीर लाजवाब लग रहा था। उसकी आंखों में नशे के लाल डोरे तैर रहे थे। चेहरे पर सुर्खी से भरी मस्ती थी। वो तगड़ी डोज लेकर आई थी, सिर से पांव तक वो इस बात की गवाह थी।
उसके बहकते कदम बहुत भले लग रहे थे। खूबसूरती और बहकने में सदियों पुराना सम्बन्ध था।
प्रवेश गोदरा की तीखी निगाह उसके चेहरे पर थी। एक बार भी उसके शरीर पर नजर नहीं मारी थी। वो मस्ती भरी चाल में आगे आयी और सोफा चेयर पर धंस गई।
“कब आये?” रूपा ईरानी के होंठों से मस्ती भरा स्वर निकला।
“दो घंटे हो गये।”
“भीतर कैसे आये?”
“वेटर से पांच सौ का नोट देकर दरवाजा खुलवा लिया था और भीतर आने पर उसने दरवाजा पहले की तरह बाहर से बंद कर किया और चाबी वापस ‘की’ बोर्ड पर लटका दी।” प्रवेश गोदर। ने तीखे स्वर में कहा- “तुम जब स्मैक का पैकिट ढूंढ रही थी, तब जानती हो, कैसी लग रही थी।”
“कैसी?”
“कुतिया लग रही थी।” प्रवेश गोदरा की आवाज में नफरत के भाव आ गये- “ऐसी कुतिया, जो उस वक्त स्मैक पाने के लिए दुनिया का हर काम करने को तैयार हो। स्मैक के बदले उस वक्त तुम हर काम करने को तैयार हो जाती। एक तो क्या बीस-बीस आदमियों को भी तब बर्दाश्त कर लेती।”
रूपा ईरानी की नशे भरी निगाह, प्रवेश गोदरा के चेहरे पर जा टिकी।
“तुम कहती हो कि तुमसे हर कोई शादी करना चाहता है। जरूर करना चाहता होगा। यूं समझो कि जो तुमसे शादी करने के सपनेदेखता है वो तुम्हारी इस हकीकत से वाकिफ नहीं है। जब दुनिया को तुम्हारी हकीकत की जानकारी हो जायेगी कि तुम नम्बरी नशेड़ी हो तो तब तुम्हारी तरफ शादी के लिए नहीं, तुम्हारे जिस्स से खेलने के लिए हाथ बढ़ेंगे। कुछ देर पहले तुम्हारी जो हालत थी उसे देखकर तो मुझे अपने पर शर्म आ रही है कि किसे मैने अपना दोस्त बना रखा है।
रूपा ईरानी देखती रही, प्रवेश गोदरा को।
“तुम मुझसे शादी करना चाहती हो। कभी ये सोचा है कि में, तुमसे शादी करने को क्यों तैयार नहीं हूं।”
रूपा ईरानी चुप।
“क्योंकि नशेबाजों को मैं अच्छी तरह जानता हूं कि इनकी औकात क्या होती है। नशा करने वाला बेशक कितने ही पैसे वाला क्यों न हो। एक दिन ऐसा भी आता है, कि जब इन्हें नशा नहीं मिल पाता तो ये नशा पाने के लिए हर बुरा काम करने को तैयार हो जाते हैं। कुछ देर पहले तुमने अपनी हालत तो देखी ही होगी। तव चुटकी भर स्मैक पाने के लिए, अगर तुम्हें कपड़े उतार कर होटल का चक्कर भी लगाना पड़ता तो तुम ऐसा कर देती। समझी-ये होती है नशोड़ियों की असली जिन्दगी। नशा करने वालों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जैसे कि मैं तुम्हारा भरोसा नहीं करता। अपने नशे की आदत की वजह से, शादी के बाद तुम मेरी जिन्दगी बरबाद करके रख दो। ये मुझे पसन्द नहीं। इससे तो बेहतर है कि मैं शादी न करूं या किसी दूसरी से कर लूं। लेकिन तुमसे नहीं कर सकता।” प्रवेश गोदरा की आवाज में कूट-कूट कर गुस्सा भरा पड़ा था।
रूपा ईरानी की आंखों में पानी चमक उठा।
“तुम कहती हो। बहुत पैसा है तुम्हारे पास। ऊंटी में जो शानदार बंगला बनाकर देगा, उसके साथ शादी करोगी। लेकिन हकीकत में तुम्हारी औकात झोपड़े में रहने के लायक भी नहीं है। तुम किसी काबिल नहीं हो। लोग तुम्हारे पीछे भागते होंगे। लेकिन तुम नशे के पीछे। एक बार का नशा न मिले तो तुम कुतिया बनकर उसे हासिल करने के लिए तैयार हो जाओगी।”
आंखों से पानी निकल कर गालों तक लुढ़क आया था रूपा ईरानी के। वो स्थिर सी बैठी, प्रवेश गोदरा के गुस्से से भरे चेहरे को देखे जा रही थी। फिर उसने अपने गालों पर लुढ़क आये आंसुओं को हथेली से साफ किया। वो पूरी तरह नशे में थी, लेकिन होशो-हवास में भी थी।
“मुझसे शादी करोगे प्रवेश?” रूपा ईरानी के स्वर में कम्पन
“शादी?” प्रवेश गोदरा ने नफरत भरे स्वर में कहा- “मैं तो अब तुमसे मिलना भी बंद कर दूंगा। मशहूर मॉडल हो तुम। बहुत खूबसूरत हो। हजारों-लाखों तुम्हारे चाहने वाले हैं उनसे शादी करो। उन्हें अपने पास बिठाओ। वो तुम्हें स्मैक भी लाकर देंगे और तुम्हारे साथ खुद भी स्मैक लेंगे।”
“मैं नशा करती हूं, इसलिए तुम मुझसे शादी नहीं करोगे।”
“हां।”
“नशा करना छोड़ दूं तो, शादी करोगे मुझसे?” रूपा ईरानी की आवाज में सच भरा हुआ था।
प्रवेश गोदरा ने उसकी आंखों में झांका।
“तुम कभी भी नशा नहीं छोड़ सकती।”
“छोड़ दूंगी। मुझसे शादी कर लो।”
“मुझसे बढ़िया मिल जायेंगे तुम्हें तो।”
“मुझे बढ़िया नहीं, तुम से शादी करनी है। तुम्हारे साथ मेरी जिन्दगी अच्छी बीतेगी। तुम्हारे-मेरे विचार मिलते हैं। इस बारे में सोचा है मैंने कि हमारी शादी सफल रहेगी।” रूपा ईरानी ने नशे से भरे गम्भीर स्वर में कहा।
“तुम मेरी बीवी बनने के काबिल नहीं हो।”
“बोला तो, नशा छोड़ दूंगी। मैं झूठ नहीं बोलती। शादी कर लो मुझसे।अकेलेपन का एहसास मुझे नशे की तरफ भगाता है। सोलह साल की उम्र में मैं बिना मां-बाप की हो गयी थी। तब से लेकर अब तक की भागदौड़ से मैं थक गयी हूं। जो भी मिला, झूठा इंसान ही मिला। सच्चा नहीं मिला। नशा मिला, तो वो ही अपना लगा। फिर तुम मिले। कई बार आजमाया। तुम खरे उतरे। मुझे हर बार पसन्दआये। वरना मैं शादी के लिए कभी न कहती।”
“तुम सिर्फ अपने बारे में सोच रही हो। मेरे बारे में सोचो कि क्या मुझे तुम जैसी स्मैकी से शादी करनी चाहिए?” प्रवेश गोदरा ने एक-एक शब्द चबाकर उखड़े स्वर में कहा।
“हम दोनों एक-दूसरे को पसन्द करते हैं। तुम सहारा दोगे तो मैं नशा छोड़ दूंगी।”
“पहले नशा छोड़ो। फिर मेरा सहारा लेना। नशा करने वालों पर मैं भरोसा नहीं करता।”
रूपा ईरानी प्रवेश मोदरा को देखती रही फिर धीमें स्वर में बोली।
“मैं-मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि नशा छोड़ सकूँ। कमजोर पड़ जाती हूं। मुझे तुम्हारे सहारे की सख्त जरूरत है। खुद को मैं तुम्हारे हवाले कर देती हूँ। जैसे मेरी नशे की आदत छूट सकती है। छुड़वा दो। जो कहोगे मैं वो ही करूंगी। जहां मेरा ईलाज करवाओगे, मैं कराऊंगी। सब कुछ तुम पर छोड़ती हूं।”
प्रवेश गोदरा रूपा ईरानी के नशे में भरे सुर्ख गम्भीर चेहरे को देखता रहा।
“जब तक तुम्हारी दिल से इच्छा न हो, नशा छोड़ने की, तक नशा नहीं छूटेगा।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“मेरी इच्छा है। लेकिन कोशिश तुम्हें करनी है। तुम्हें मेरी सहायता करनी है।”
“इस काम में मैं तुम्हारे साथ हूं। लेकिन जब तक तुम्हारा नशा पूरी तरह नहीं छूट जाता, तब तक तुमसे शादी नहीं करूंगा।”
“मत करो। लेकिन आज की बात से ये बात तो स्पष्ट हो गयी कि देर-सवेरे में हमने ही शादी करनी है। मेरे नशा छूटने की देर है। तुम तब तक मुझे अपनी पत्नी बेशक न मानो, लेकिन मैं तुम्हें आज से अभी से अपना पति मान रही हूं। फेरों की रस्म जब भी तुम चाहोगे। पूरी कर लेना। मैं खुद को अब तुम्हारी ब्याहता समझूगी।”
प्रवेश गोदरा, रूपा ईरानी को देखता रहा।
“अपने मां-बाप की ब्याहता जिन्दगी के झगड़े और उनकी शादी का अंत देखकर सोचा था कि कभी भी शादी नहीं करूंगी। लेकिन तुम जैसे इंसान के साथ शादी करने में मुझे कोई एतराज नहीं।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा- “मैं जानती हूं कि तुम्हारा साथ मिलेगा तो, नशा छोड़ देना मेरे लिए मामूली बात होगी।”
प्रवेश गोदरा गहरी सांस लेकर रह गया।
“आज तुम मुझे बहुत ज्यादा अच्छे लग रहे हो। ऐसा लग रहा है, जैसे दुनिया के सब से खूबसूरत मर्द तुम ही हो। शायद इसलिए कि मैंने तुम्हें पति माना है। और पत्नी को अपना पति सबसे अच्छा लगता है।” कहते हुए छोटी सी मुस्कान उभरी रूपा ईरानी के चेहरे पर- “जब फेरे हो जायेंगे तो तुम भी मेरे बारे में ऐसा ही महसूस करोगे।”
प्रवेश गोदरा ने पहलू बदला। खामोश रहा।
“आज का दिन मेरे लिए बहुत अच्छा है। इसे मैं कभी नहीं भूलूंगी।” रूपा ईरानी जैसे इस फैसले के बाद खुद को हल्की महसूस कर रही थी- “शायद आज ये सब होना था। इसी कारण तुम मेरे पास आ पहुंचे।”
गोदरा ने रूपा ईरानी की आंखों में झांका।
“मैं तुम्हारे पास और किसी बात के लिए आया था।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“तुम्हारी डकैती का क्या हाल।”
“उसी सिलसिले में तुम्हारे पास आया हूं।’
रूपा ईरानी की आंखें प्रवेश गोदरा के चेहरे पर जा टिकी।
“डकैती के सिलसिले में मेरे पास आने की कोई जरूरत नहीं। शायद तुम्हें मालूम नहीं कि देवराज चौहान मुझसे मिला था। उसे तुम्हारी मेरी पहचान के बारे में मालूम है। वो डकैती के काम में मेरी सहायता चाहता था। मैंने मना कर दिया।”
“मैं इसी वास्ते तुम्हारे पास आया हूं।” प्रवेश गोदरा के चेहरे पर बैचेनी झलकी।
रूपा ईरानी ने अपने नशे से भरे चेहरे पर हाथ फेरा और सिर हिलाकर कह उठी।
“अब तो मैं तुम्हारी हकदार हूं। तुम्हें पति मान चुकी हूं। ऐसे में तुम्हें अच्छा-बुरा हक से समझा सकती हूं। तुम्हें ये कह सकती हूं कि गलत काम कर रहे हो। अपने साथ-साथ मुझे भी ले डूबोगे। जिस तरह तुम्हें ये पसन्द नहीं कि मैं ड्रग्स लूं उसी तरह मुझे भी ये पसन्द नहीं कि तुम डकैती जैसा खतरनाक काम करो।”
“अब मैं पीछे नहीं हट सकता।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“हट सकते हो। उनका करोड़ रुपया वापस दो और”
“पागलों वाली बात मत करो।” प्रवेश गोदरा के होठों से निकला- “मैं उनके कामों से वाकिफ हो चुका हूं। ऐसे में वो मुझे तब तक नहीं छोड़ेंगे, जब तक कि उनका काम पूरा नहीं हो पाता।
वो मुझे हर पलं नजरों के सामने रखेंगे कि कहीं डकैती की बात मेरे मुंह से निकल कर, दूसरे के कानों तक न पहुंच जाये। मत भूलो वो डकैती किंग देवराज चौहान है। उसके सामने चालाकी दिखाना गलत होगा। मैं तो शुरू से ही समझता रहा उन लोगों ने मेरे दबाव के कारण, मुझे साथ लिया और करोड़ रुपया मुझे दे दिया। लेकिन अब ये बात महसूस कर चुका हूं कि उन्होंने शुरू से ही जो किया, अपनी योजना के हिसाब से किया। वो नहीं, मैं उनके पास फंस चुका हूं।”
“तुम्हारे पास निकल चलने का खूबसूरत मौका है इस वक्त।”
“इस वक्त?”
“हां। यहां से तुम खामोशी से निकल सकते हो।”
“मेरा साथी शर्मा उनके होटल में है। और मेरे साथ उनका साथी सोहनलाल आया है जो होटल की लॉबी में है। हो सकता है इस वक्त वो तुम्हारे कमरे के बाहर ही खड़ा हो।”
“सोहनलाल? हां, आया था मेरे पास, देवराज चौहान के साथ।”
“क्या बात की तब तुमसे-।”
रूपा ईरानी ने सारी बात बतायी।
“तब-।” सब कुछ बता कर रूपा ईरानी ने लम्बी सांस ली- “देवराज चौहान ने स्पष्ट महसूस कर लिया था कि उसके बारे में जानकर डर गयी हूं। वो मुझे काम के लिए कहता तो मैंने इंकार नहीं करना था। ये बात देवराज चौहान ने भी महसूस कर ली थी। परन्तु देवराज चौहान ने मुझसे नहीं कहा और सोहनलाल के साथ बाहर निकल गया।”
उसे देखते सोच भरे स्वर में प्रवेश गोदरा ने कहा।
“तुमने उन्हें कहा था कि तुम ये काम नहीं करोगी। डकैती में उनका साथ नहीं दोगी।”
“हां कहा था। लेकिन ड्रग की डोज लेने के बाद मुझमें जाने कैसे हिम्मत आ गयी और मैंने उन्हें मना कर दिया।”
“तुम्हारे इंकार की वजह से वो नहीं गये”
“वो ही तो मैं कह रही हूँ कि देवराज चौहान समझ गया था के उनके एक बार कहने पर मैं उसकी बात मान जाऊंगी। लेकिन उसने नहीं कहा और चला गया।” रूपा ईरानी ने लम्बी-गहरी सांस ली।
“इससे तो ये ही बात समझ में आती है कि तुम्हारे मुंह से निकले इंकार के बाद देवराज चौहान जर्बदस्ती तुमसे काम नहीं लेना चाहता होगा और तब उसके पास मैं भी था। मेरे द्वारा वो, तुमसे काम ले सकता है। इसलिए उसने अपना जाल मुझ पर कसा। तभी तो इस वक्त मैं, तुम्हारे पास मौजूद हूं।”
“मेहरबानी हो देवराज चौहान की। भगवान उसे सफलता दे।” रूपा ईरानी मुस्करा कर कह उठी- “आज का वक्त तो बहुत शुभ है, अगर आज हमारी ऐसी मुलाकात न होती तो हममें नया रिश्ता कभी भी कायम न हो पाता। मैं तुम्हें अपना पति नहीं मान पाती और तुम भी मन से मुझे अपनी पत्नी मान चुके हो। जल्दी ही मैं नशा छोड़कर तुम्हारे मुंह से ये बात सुनूंगी कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं।”
“रूपा। इस वक्त तुम्हें हालात की गम्भीरता समझनी चाहिए।”
प्रवेश गोदरा गम्भीर स्वर में बोला।
रूपा ईरानी उसे देखने लगी।
“क्या हुआ?”
“डकैती जैसा काम मुझे पसन्द नहीं। तुम इस काम में पहले से ही हाथ डाल चुके हो, इसलिए पीछे हटने के लिए ज्यादा दबा नहीं डाल सकती। ये तो स्पष्ट है कि भविष्य में तुम्हें कोई भी गलत काम नहीं करने...”
“मत करने देना। लेकिन इस वक्त तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी।”
“तुम्हारी सहायता करनी होती तो मुझे एतराज नहीं था। तुम्हारे द्वारा मुझे देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर की सहायता करनी पड़ेगी और डकैती जैसी बातें मुझे अच्छी नहीं लगती।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा।
“मुझे तुम्हारी नशे की आदत पसंद हैं, फिर भी मैंने तुम पर विश्वास कर लिया कि तुम नशा छोड़ दोगी और मैंने तुम्हें पति कहने का अधिकार दे दिया। इसी तरह तुम भी मेरा साथ दे दो, मेरी इस बात पर विश्वास करके मैं फिर कभी ऐसे गलत काम में हाथ नहीं डालूंगा। तुम जो करोगी, मेरे लिए करोगी।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहते हुए सिग्रेट सुलगाई- “अब एक मुसीबत भरे काम में हाथ डाल दिया है तो मुझे उस मुसीबत में से सफलता पूर्वक निकल भी लेने दो। तभी हम अच्छी और नई जिन्दगी की शुरूआत कर सकेंगे।”
रूपा ईरानी ने दोनों हाथ अपने नशे से भरे चेहरे पर रगड़े।.
“तुम मुझे कुएं में छलांग मारने को कह रहे हो।”
“मेरे कहने पर छलांग मारने में अब तुम्हें एतराज नहीं होना चाहिए।” वो मुस्कुराया।
“अब क्या हो गया?”
‘तुमने मुझे अपना पति माना है।”
‘ओ. के. अब तुम भी कह दो कि तुमने मुझे पत्नी मान लिया है। उसके बाद तुम जो कहोगे मैं करूगी।”
“इस बारे में मुझसे झूठ मत बुलवाओ। जब तक तुम नशा नहीं छोड़ोगी। तब तक मैं तुम्हें अपनी पत्नी नहीं मानूंगा।”
अजीब सी मुस्कान उभरी, रूपा ईरानी के चेहरे पर।
“अब क्या हुआ?”
“तुम्हारी जगह, दूसरा कोई होता तो अपना काम निकलवाने के लिए मुझे पत्नी कह देता। खैर, मुझे खुशी है कि मैंने तुम्हें अपना पति मानकर गलत काम नहीं किया। बोलो, डकैती में मुझसे क्या सहायता चाहते हो?”
प्रवेश गोदरा के चेहरे पर गम्भीरता उभरी। वो कुछ व्याकुल दिखा।
“क्या बात है प्रवेश?”
“कुछ नहीं।” प्रवेश गोदरा कश लेते हुए बोला- “मैं तुम्हें, बताऊंगा तो वो आधा-अधूरा रहेगा। यकीनन कोई न कोई बात बतानी रह जायेगी। बेहतर होगा कि कल दिन में तुम देवराज चौहान से बात कर लेना। वो तुम्हें बता देगा कि क्या करना है। लेकिन बात करते हुए उससे सावधान रहना। वो खतरनाक है।”
“प्रवेश- “रूपा ईरानी कह उठी- “देवराज चौहान बेशक कैसा भी है। लेकिन औरतों की इज्जत करना आता है उसे। एक बार में उससे मिल चुकी हूं। वो भरी नियत वाला इंसान लगा मुझे...”
“एक ही बार में पहचान लिया उसे?”
“औरत एक ही नजर में मर्द की नियत को भांप लेती है। ये बात हमेशा ध्यान में रखना। मैं शो-बिजनेस में हूं। कदम-कदम पर रोज नये-नये मर्दो से वास्ता पड़ता है। इसलिए इन बातों को मैं अच्छी तरह जान सकती हूं।”
“होटल से कितने बजे उस होटल में पहुंच जाती हो?”
“ग्यारह बजे मुझे और यहां ठहरी अन्य मॉडल्स को लेने वैन आ जाती है।”
“बढ़िया। सुबह दस बजे तक देवराज चौहान, यहां, तुम्हारे पास पहुंच जायेगा। वो तुम्हारा एक घंटा लेगा।”
“ठीक है।”
प्रवेश गोदरा उठ खड़ा हुआ।
“तुम कहां चले?” उसे उठते पाकर रूपा ईरानी के होठों से निकला।
“जाना है लॉबी में सोहनलाल मेरी वापसी का इंतजार कर रहा है।” गोदरा मुस्कुराया।
“उसे बैठा रहने दो। आज मैं तुम्हें अपने पति के रूप में बैड पर देखना चाहती...”
“बहुत वक़्त लग जायेगा। सोहनलाल इतनी देर इंतजार नहीं करेगा और ऊपर आ जायेगा। मैं नहीं चाहता कि तुम इन हालातों में, हममें से किसी के साथ नजर आयें। इस वक्त हमें सावधानी से चलने की जरूरत है।”
“अजीब बात है।” रूपा ईरानी ने मुंह बनाया- “अपने पति के साथ भी वक्त नहीं बिता सकती-।”
“शादी के बाद ऐसा ही होता है, इसलिए इस काम से फुर्सत पाते ही ज्यादा से ज्यादा वक्त मेरे पास बिताना। बाद में तुम्हारी ड्रग्स की आदत छूट गयी। हमने शादी कर ली तो घर के कामों में उलझ जाओगी।”
“वो वक्त तुम्हें अच्छा लगेगा।”
“चलता हूं-?” कहने के साथ ही प्रवेश गोदरा दरवाजे की तरफ बढ़ा।
“प्रवेश”
वो ठिठका। पलट कर रूपा ईरानी को देखा।
“इस काम के बाद तुम कोई गलत काम नहीं करोगे। शराफत से जिन्दगी बिताओगे।”
“वादा।”
प्रवेश गोदरा दरवाजा खोलकर बाहर निकला तो ठिठक गया। पास ही दीवार के साथ सोहनलाल खड़ा था। दोनों की नजरें मिली।
सोहनलाल मुस्कुराया।
“तुम-?” गोदरा के होठों से निकला।
“मैंने सोचा कि कहीं तुम भीतर ही नींद में न डूब जाओ। इसलिए जगाने आ गया।”
तभी पीछे से रूपा ईरानी की आवाज आयी।
“कौन है प्रवेश।”
प्रवेश गोदरा बाहर निकला और पीछे से रूपा ईरानी का चेहरा
झलका।
“नमस्कार भाभी जी- “ सोहनलाल ने शराफत से दोनों हाथ जोड़ कर कहा।
“तो तुमने हमारी बातें सुनी हैं।” गोदरा तीखे स्वर में बोला।
“कैसे कही ये बात?”
“रूपा को तुम भाभी कह रहे हो।”
“भाभी जी कहने तक ही सुना है। इसके बाद तो कुछ नहीं हुआ। आओ” सोहनलाल आगे बढ़ गया।
प्रवेश गोदरा और रूपा ईरानी की नजरें मिली।
“प्रवेश- “ रूपा ईरानी ने हाथ बढ़ाकर उसका हाथ पकड़ा और प्यार से बोली- “अपना ध्यान रखना।”
गोदरा ने उसका हाथ थपथपाया और सोहनलाल के पीछे बढ़ गया।
रूपा ईरानी कुछ पलों तक उन्हें जाता देखती रही, फिर दरवाजा बंद कर लिया।
☐☐☐
सोहनलाल और प्रवेश गोदरा जब वापस होटल पहुंचे तो आधी रात के साढ़े तीन बज रहे थे। कमल शर्मा दूसरे कमरे में सोया पड़ा। था। देवराज चौहान और जगमोहन उनके इंतजार में थे। जगमोहन ने गोदरा के चेहरे पर सामान्य भाव देखे तो समझ गया कि काम ठीक तरह से हो गया।
“रूपा से बात हो गयी है। उसके होटल दस बजे पहुंच जाना कल। ग्यारह बजे वो वहां से निकल जाती है।” प्रवेश गोदरा ने बैठते हुए कहा- “उसे जो समझाना हो। समझा देना। एतराज न हो तो कल मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।”
“चलना।” देवराज चौहान का स्वर शांत था।
“वो कहती है कि जब तुम उससे मिले तो, तुम उसे तैयार कर सकते थे अपने काम के लिए। लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया।”
“ठीक समझी वो।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “मैंने जर्बदस्ती नहीं की। डकैती जैसे काम में किसी को जबर्दस्ती साथी बनाना गलत है। मौके पर वो घबराहट से गलती भी कर सकता है। तुमने उसे जर्बदस्ती तैयार तो नहीं किया?”
“नहीं- “ सोहनलाल बोला- “भाभी जी बहुत प्यार-मोहब्बत से तैयार हो गई।”
प्रवेश गोदरा ने उसे घूरा।
सोहन लाल ने मुंह फेर लिया।
“वो मेरी खातिर, इस काम के लिए तैयार हुई है।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में देवराज चौहान से कहा।
“मैं जानता था कि तुम्हारा कहना वो मान लेगी।” देवराज चौहान ने सिर हिलाया।
“सुबह होने वाली है। मैं कुछ घंटों की नींद लेना चाहता हूं।” कहते हुए प्रवेश गोदरा उठ खड़ा हुआ।
प्रवेश गोदरा के जाने के बाद देवराज चौहान ने कहा।
“वो मॉडल रूपा ईरानी उस दिन इस बात को भांप गयी थी कि ये जानते हुए भी कि वो तैयार हो जायेगी। मैंने उस पर साथ काम करने का दवाब नहीं डाला। यानि कि इस बात से स्पष्ट है कि वो समझदार और चालाक है। गोदरा के साथ उसकी अच्छी पटती है। ऐसे लोगों के साथ सावधानी से पेश आना चाहिए और सिर्फ काम की बात करनी चाहिए।”
“वो ड्रग्स लेने की आदी है।” सोहनलाल बोला।
“हमारे काम में ऐसे लोग और भी खतरनाक माने जाते हैं, सोहनलाल।” देवराज चौहान बोला- “उसे उतना ही डकैती के बारे में बताना है, जितनी जरूरत है। ड्रग्स लेने वाले पर, डकैती के मामले में, ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है। दौलत सबका दिमाग खराब कर देती है और जब दौलत अरबों में हो तो दिमाग के साथ-साथ दिल भी बेईमान हो जाता है। वो अकेली नहीं है, उसके साथ गोदरा भी है और गोदरा के साथ कमल शर्मा भी है।”
जगमोहन और सोहनलाल होंठ सिकोड़े देवराज चौहान को देखने लगे।
“मैंने उनकी बातें सुनी।” सोहनलाल बोला- “उन्होंने गड़बड़ वाली बात नहीं की।”
“ये तो अच्छी बात है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा- “आने वाले वक्त में सब ठीक रहेगा।”
☐☐☐
कयामत ढा रही थी रूपा ईरानी।
बहुत ही अच्छे ढंग से मेकअप कर रखा था। कंधों तक जाते उसके सिर के बाल लहरा रहे थे। शरीर पर सादी कमीज-सलवार पहन रखी थी। जिसमें वो बहुत जंच रही थी। होठों के बीच छिपे सफेद दांत जब चमक मारते तो, देखने वाला देखता ही रह जाता।
सवा दस बज रहे थे, जब देवराज चौहान और प्रवेशगोदरा होटल में उसके पास पहुंचे। देवराज चौहान पर नजर पड़ते ही, पल भर के लिए वो हड़बड़ाई फिर संभल गयी।
“मैंने तो सोचा भी नहीं था कि फिर कभी हमारी मुलाकात होगी।” रूपा ईरानी ने शांत स्वर में कहा।
देवराज चौहान कुछ नहीं बोला।
“बैठो।” बोला प्रवेश गोदरा-फिर रूपा ईरानी को देखा- “तुम भी बैठो।”
“मेरे पास पैंतालिस मिनट है।” रूपा ईरानी बैठते हुए बोली- “ग्यारह बजे वैन ने लेने आ जाना है।”
“हमारी बात पन्द्रह मिनट से ज्यादा की नहीं है?”देवराज चौहान बोला।
रूपा ईरानी ने देवराज चौहान को देखा।
“क्या करना होगा मुझे?” उसने पूछा।
“आज नुमाईश को पांचवां दिन है। कल और परसों। दो दिन और मॉडल्स ने हीरे-जेवरातों की नुमाईश करनी है। उसके बाद आठवें-नवें और दसवें दिन उन सब जेवरातों को उसी हाल में शीशे के शो-केसों में बेचने के लिए रखा जाना है।”
देवराज चौहान के खामोश होने पर, रूपा ईरानी ने सहमति में सिर हिलाया।
“तुमने, हमारे लिए ऐसे ‘पास’ का इंतजाम करना है कि हम आखिरी तीनों दिन भीतर जा सकें।”
“इंतजाम हो जायेगा। कितने आदमियों के लिए पास चाहिए।” रूपा ईरानी ने विश्वास भरे स्वर में पूछा।
“अभी कुछ तय नहीं है। छ: सात आदमियों का प्रवेश पास तो कम से कम होना चाहिए।”
“आज ये इंतजाम हो जायेगा। कभी भी आकर पास ले सकते हो।”
“मैं ले जाऊंगा।” प्रवेश गोदरा जल्दी से कह उठा।
देवराज चौहान ने कमीज में छिपा रखा एक लिफाफा निकाला और टेबल पर रख दिया।
रूपा ईरानी ने लिफाफे को देखा फिर देवराज चौहान को।
“इसमें क्या है?”
“पांच रिवॉल्वरें...”
रूपा ईरानी के चेहरे पर घबराहट के भाव उभरे। फिर खुद को सामान्य करने की कोशिश की।
“क्या करना है?”
“हाल में जाते वक्त, मॉडल्स के प्रवेश करने का रास्ता स्टेज के पीछे से है। मॉडल की तलाशी नहीं ली जाती हॉल में जाते समय। वहां से सुरक्षा प्रबन्धों की ये सबसे कमजोर कड़ी है। तुम ये रिवॉल्वर उस हॉल के भीतर ले जाओगी और वहां के बाथरूम में छिपा दोगी।”
गहरी सांस लेकर रूपा ईरानी ने आंखें बन्द की और फिर खोल दी।
“बाथरूम में ऐसी कोई जगह नहीं कि पांच रिवॉल्वरों को छिपाया जा सके।” उसने कहा।
“लिफाफे के भीतर पड़ी रिवॉल्वरें पालीथिन में पैक हैं गीली नहीं हो सकतीं। उस बाथरूम में पांच फ्लश टैंक हैं। किसी में भी इन रिवॉल्वरों क डालकर वापस ढक्कन लगा सकती हो।” देवराज चौहान की नजरें उसके चेहरे पर थीं- “ये काम करना, तुम्हारे लिए कठिन नहीं।”
“सच में कोई कठिन नहीं। कब करना होगा ये सब? किस दिन डकैती करोगे?”
“तीनों में से किसी एक दिन डकैती का होगा। तय नहीं कि वो कौन सा दिन होगा।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “ये रिवॉल्वरें तुमने आज नहीं डालनी है फलश टैंक में। जिस दिन हम कहेंगे। उस दिन डालनी है।”
“मुझे कैसे पता चलेगा कि कब डालनी है?” रूपा ईरानी ने पूछा।
“तुम यहां से, होटल से ग्यारह बजे निकलती हो।”
“हां”
“जिस दिन भी रिवॉल्वरें फलश टैंक में रखनी होगी। उस दिन ग्यारह से पहले तुम्हें फोन कर देंगे।”
‘समझ गयी।” रूपा ईरानी ने गम्भीर निगाहों से देवराज चौहान को देखा- “कितनों की जान जायेगी, इस डकैती में?”
“एक की भी नहीं”
बरबस ही रूपा ईरानी जहरीले अंदाज में हंसी।
देवराज चौहान के चेहरे पर कोई नया भाव न उभरा।
प्रवेश गोदरा बैचेन सा नजर आया।
“रिवॉल्वरें खाली हैं क्या?” रूपा ईरानी के होठों पर मुस्कान थी।
“नहीं।” देवराज चौहान के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।
“रिवॉल्वरें भरी हुई और कहते हो, किसी की जान नहीं जायेगी।
अगर डकैती में किसी की जान लेने का इरादा नहीं है तो रिवॉल्वरें खाली होनी चाहिए।” उसने देवराज चौहान की आंखों में झांका।
“ये हमारे सोचने की बात है कि रिवॉल्वरें खाली हों या भरी। कितनों की जान हमने लेनी है या किसी को भी नहीं मारना। इस बारे में सोचने की तुम्हें जरूरत नहीं।” देवराज चौहान की आवाज में सख्ती आ गयी- “तुम जरूरत से ज्यादा इस मामले में अपना दिमाग इस्तेमाल कर रही हो। जो काम कहा है, वो करो। उतना ही सोचो।”
“मैंने कोई खास सवाल तुमसे नहीं पूछा। वो ही पूछा जो सोचों में आया। लेकिन तुम्हारी बात सही है कि मुझे अपने काम तक ही सोचना चाहिए। काम हो जायेगा देवराज चौहान।”
“किसी कारण तुम ये काम नहीं कर सकी तो डकैती नहीं हो सकेगी- “ देवराज चौहान बोला।
“तुम्हें पास भी मिल जायेंगे और पांचों रिवॉल्वरें भी फ्लश टैंक तक पहुंच जायेगी। रिवॉल्वरें जिस दिन रखनी हो। फोन कर देना मेरे लिए मामूली काम है।” रूपा ईरानी ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
तभी प्रवेश गोदरा बोला।
“इसे बता दो, कि इस काम के बदले इसे क्या मिलेगा?”
देवराज चौहान ने गोदरा को देखा।
“तुमने नहीं बताया?”
“माल तुमने देना है मैंने नहीं। तुम बताओ।”
“इस काम के बदले तुम्हें एक अरब की दौलत मिलेगी।” देवराज चौहान ने रूपा ईरानी को देखा- “एक अरब बहुत बड़ी दौलत होती है।
रूपा ईरानी सांस लेकर रह गयी।
“कम है क्या?” प्रवेश गोदरा ने पूछा।
“नहीं। बहुत ज्यादा है। विश्वास नहीं आता कि कभी इतनी बड़ी दौलत मुझे मिल पायेगी।”
“मिलेगी। मिलेगी। विश्वास पर ही दुनिया कायम है।” प्रवेश गोदरा ने कहते हुए देवराज चौहान को देखा।
देवराज चौहान की निगाह रूपा ईरानी पर थी।
“हर रिवॉल्वर काले कपड़े में लिपटी हुई है। जो कि नकाब है। चेहरा ढांपने के लिए।” देवराज चौहान ने कहा- “इन पैकिटों को खोलने की चेष्टा मत करना। क्योंकि वापस पैकिंग ठीक नहीं हो पायेगी और फ्लश टैंक में ये गीली होकर, बेकार हो जायेंगी।”
“तुम्हारे दिए सामान में मैं बिल्कुल छेड़छाड़ नहीं करूंगी।” रूपा ईरानी ने शांत स्वर में कहा।
“चलो गोदरा।” देवराज चौहान खड़ा हो गया।
प्रवेश गोदरा भी उठा।
“अगर तुम लोगों ने सफल डकैती कर ली तो मुझे अरब रुपया कैसे मिलेगा?” रूपा ईरानी ने पूछा।
“तुम तक पहुंच जायेगा।” देवराज चौहान बोला।
“इस बात की फिक्र मत करो रूपा।” गोदरा कह.उठा- “मैं इसके साथ ही हूं। ध्यान रखूँगा।”
रूपा ईरानी ने गम्भीर निगाहों से, प्रवेश गोदरा को देखा।
“प्रवेश अपना ध्यान रखना।” गम्भीर स्वर में बोली वो।
प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया।
“ये मत सोचो कि देवराज चौहान तुम्हारे साथ है तो तुम सफल होकर ही रहोगे।” रूपा ईरानी एक-एक शब्द चबाकर कह उठी- “ये भी सोच कर रखो कि तुम फंस सकते हो, पुलिस तुम्हें पकड़ सकती है। तुमहारी सारी उम्र जेल में बीत सकती है।”
प्रवेश गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी और देवराज चौहान को देखा।
“मुझे मत देखो।” देवराज चौहान के होठों पर मुस्कान उभरी- “इसकी बात पर गौर करो। ये ठीक कह रही है।”
गोदरा की निगाह रूपा ईरानी की तरफ उठी।
“अब कुछ नहीं हो सकता प्रवेश। डकैती के मामले में तुम काफी आगे बढ़ चुके हो। पलट पाना सम्भव नहीं। हो सके तो, फंसने वाले मौके के लिए, अपने बचने का रास्ता तलाश करके रखो।” रूपा ईरानी गम्भीर थी।
प्रवेश गोदरा बैचेन सा नजर आया।
“कैसा रास्ता-तैयार रखूं?” उसके होठों से निकला।
“मैं नहीं जानती। मुझसे कहीं ज्यादा तुम इस मामले के हालातों से वाकिफ हो?”
गोदरा पूर्ववत् अन्दाज में उसे देखता रहा।
देवराज चौहान ने गोदरा को इशारा किया और दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
गोदरा भी चलने को हुआ।
“अपना ख्याल रखना मेरे प्यारे पति” रूपा ईरानी का स्वर गम्भीर था।
गोदरा ने सिर हिलाया और देवराज चौहान के साथ बाहर निकल गया।
आज छट्रा दिन था। हीरे-जेवरातों की नुमाईश को चलते हुए।
दोपहर का एक बज रहा था।
होटल के कमरे में देवराज चौहान, जगमोहन, सोहनलाल, प्रवेश गोदरा, और कमल शर्मा मौजूद थे। कुछ मिनट पहले ही सब, देवराज चौहान के कहने पर इकट्ठे हुए थे। कमल शर्मा खुश था कि रूपा ईरानी से बात हो गयी। सब ठीक हो गया।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई और बारी-बारी सब को देखा।
“हम सब इस वक्त डकैती के बारे में बात करने को इकट्ठा हुए हैं।” देवराज चौहान बोला- “ये डकैती ऐसी नहीं है कि हम सब खामोशी के साथ काम करके निकल जायें और दूसरों को बाद में पता चले कि डकैती हो गई है।”
सबकी निगाहें देवराज चौहान के चेहरे पर आ ठहरी थी।
“मैंने हर तरफ नजर मार ली है। सुरक्षा प्रबन्ध हमें इस बात की छूट नहीं देते कि हीरे-जेवरातों की डकैती हम चुपके से कर सकें।
ऐसे में ये डकैती उस वक्त होगी, जब हॉल में लोग मौजूद होंगे। खरीदने के लिए जेवरातों को पसन्द कर रहे होंगे। उस वक्त हम डकैती करेंगे। अरबों के हीरे-जेवरातों पर कब्जा जमायेंगे।”
दो पलों के लिए पैना सन्नाटा वहां छा गया।
“ये भारी खतरे वाला काम है।” कमल शर्मा के होठों से निकला।
“काम ऐसे करें या वैसे करें, खतरा तो है ही। दौलत पाने के लिए खतरे की लागत तो लगानी ही पड़ेगी।” देवराज चौहान ने कहा- “वरना, ऐसी कौन सी डकैती है, जो घर बैठे-बैठे हो सके।”
“तुमने इस तरह से पहले कभी डकैती की है?” प्रवेश गोदरा ने पूछा।
गोदरा के इस सवाल पर जगमोहन मुस्कुराया।
“चिन्ता मत कर।” सोहनलाल ने व्यंग से कहा- “जिस तरह से ये तुम्हारी पहली डकैती है, उसी तरह से डकैती करने का ये ढंग भी, हम लोग पहली तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। जो होगा देखा जायेगा।”
“मैं मजाक नहीं कर रहा...”
“तो ऐसे बेवकूफी वाले सवाल भी मत करना।”
“लेकिन डकैती करनी कैसे है।” गोदरा परेशानी में कह उठा- “कुछ पता तो चले।”
“वही बताने जा रहा हूं।” देवराज चौहान गम्भीर था- “लेकिन तुम यहां होने वाली बातें किसी भी कीमत पर रूपा ईरानी से नहीं कहोगे। हमारी बातें हमारे बीच ही रहनी चाहिए।”
“हां।” प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया- “मैं ऐसा ही करूंगा।”
देवराज चौहान ने कश लेकर सिग्रेट ऐश ट्रे में डाली।
“तुम मैडम ईरानी को फोन भी नहीं करोगे। बात मुंह से निकल जाती है।” सोहनलाल ने कहा।
गोदरा ने तुरन्त सहमति से सिर हिलाया।
“इस वक्त तो ये लाल किले को ताजमहल कहने को भी तैयार हो जायेगा।” जगमोहन बड़बड़ाया।
“रूपा ईरानी से हॉल में प्रवेश करने वाले पास लाने हैं।”देवराज चौहान ने सोहनलाल से कहा- “कल वो पास तुम लेकर आना । गोदरा लेने नहीं जायेगा।”
गोदरा बैचेन हुआ। परन्तु खामोश रहा।
“मैं कल ले आऊंगा।” सोहनलाल बोला।
देवराज चौहान ने पुन: सब को देखा।
“डकैती की योजना तो मैं बताने जा रहा हूं। परन्तु इस योजना बहुत भारी अड़चन है। पलक झपकते ही डकैती को असफल किया जा सकता है। ये बात तुम में से शायद कोई न सोच सके।”
“कैसी अड़चन?” जगमोहन के होठों से निकला।
“पहले सुन लो कि डकैती पर कैसे काम करना है। अड़चन के बारे में बाद में बात करेंगे।”
सब देवराज चौहान को देख रहे थे।
“हमने काम इस तरह करना है कि उस पर गहरी योजना की जरूरत नहीं। मोटे तौर पर हमने उस हॉल के भीतर जाना है, जहाँ जेवरात रखे हैं और उन्हें लेकर बाहर आ जाना है। वहां की सिक्योरिटी पुलिस और लोगों से कैसे बचाव करना है। ये जानना जरूरी है।”
गम्भीर स्वर में कहते हुए देवराज चौहान बारी-बारी सबको देख रहा था- “प्रवेश पास के दम पर हम भीतर प्रवेश कर जायेंगे। और।”
“किस दिन हम ये काम करेंगे?” कमल शर्मा बोला।
“हमारे पास तीन दिन हैं। आठवां-नवां-दसवां दिन। किसी एक दिन हम...”
“दिन तय नहीं किया?”
“किया है।” देवराज चौहान ने कमल शर्मा को देखा- “लेकिन पहले बताना मैं जरूरी नहीं समझता।”
“हमसे कैसा छिपाना?”
“शर्मा- “ गोदरा बोला- “ये जानने की हमें जरूरत भी क्या है। सब साथ ही तो है। जब कहेगा चल देंगे।”
“मैंने यूं ही पूछा था।”
“बीच में मत टोक” - व्याकुल सा बोला गोदरा- “पहले बात सुन लेने दे कि ये सब काम कैसे होना है।”
सब चुप हो गये।
बोला देवराज चौहान।
“प्रवेश ‘पास’ से हम भीतर प्रवेश कर जायेंगे। रूपा ईरानी हथियारों को हॉल के बाथरूम में पांच में से किसी फ्लश टैंक में डाल चुकी होगी। यानि कि भीतर हमें हथियारों की कमी नहीं होगी। जरूरत पड़ने पर हथियारों को वहां से निकालकर हम हाथों में ले सकते हैं। जब हम हॉल के भीतर प्रवेश करेंगे। उसके महसूस ठीक दस मिनट बाद हॉल के बाहर सौ-सौ फीट के फासले पर दो आदमी नजर आयेंगे। उनकी पीठों पर थैले होंगे। जिसमें बारूद होगा और मुंह पर उन्होंने टेप चिपका रखे होंगे।”
“बारूद?” प्रवेश गोदरा हड़बड़ाया।
“मुंह पर टेप चिपके होंगे?” जगमोहन की आंखें सिकुड़ी- “ऐसा क्यों?”
“कहने को उन थैलों में बारूद होगा। परन्तु हकीकत में थैले बेकार के समान से भरे होंगे। वे दोनों व्यक्ति पैंतालीस मिनट तक वहाँ रहेंगे। पैंतालिस मिनट के भीतर के सारे जेवरात हमने समेटने हैं और वहां से निकल जाना है। जब हम भीतर होंगे तो तब पुलिस के लिए उन दोनों को धमकी के तौर पर इस्तेमाल करेंगे कि अगर किसी ने हमें घेरने पकड़ने की चालाकी की तो, बाहर मौजूद हमारे आदमी, थैलों में मौजूद बारूद से विस्फोट कर देंगे। जिसमें कि सारा होटल तबाह हो जायेगा। जाने कितने लोगों की जानें जायेंगी। ये सुनकर कम से कम पुलिस वाले तब हमारे खिलाफ कुछ खास नहीं करेंगे।
जब तक वे सोच-विचार करेंगे, तब तक हमे अपना काम करके निकल चुके होंगे!
पल भर के लिए देवराज चौहान ठिठका।
“भीतर तीन रिवॉल्वरों के दम पर किन्हीं खास तीन लोगों से रिवॉल्वर लगा देंगे कि अगर हमारे साथ किसी ने चालाकी करने की चेष्टा की तो, हम गोलियां चलानी शुरू कर देंगे। ये सब देखकर पुलिस किसी भी कीमत पर गलत हरकत करने की चेष्टा नहीं करेगी और जब हम जेवरातों के साथ वहां से निकलेंगे तो अपने साथ दो खास लोगों को ले चलेंगे ये कहकर कि कोई हमारे पीछे न आये। वरना हम इन्हें शूट कर देंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि तब कोई हमारे पीछे नहीं आयेगा। अलबत्ता दूसरे ढंग से पुलिस हमें घेरने की चेष्टा करेगी।”
“हमारे चेहरे खुले होंगे।” कमल शर्मा बोला- “वहां वीडियो कैमरे चल रहे होंगे। हमारे चेहरे कैमरों में कैद हो।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा। रिवॉल्वरों के साथ नकाब भी है नायलोन की। हरकत में आने से पहले ही नकाब चेहरों पर डाल लिए जायेंगे।”
देवराज चौहान ने कहा- “मैं तुम सब को सिलसिले वार बताता हूं कि डकैती कैसे करेंगे।”
“बाहर मौजूद दोनों व्यक्तियों के चेहरों पर ‘टेप’ क्यों चिपके होंगे?”जगमोहन ने पूछा।
“ताकि कोई उनसे बात न कर सके। वो किसी से बात न कर सकें। बातचीत में पुलिस उन दोनों को लापरवाह करके उन पर काबू पा सकती है। तब देख सकती है कि उनकी पीठ पर मौजूद थैले खाली हैं, हम मात्र खोखली धमकी दे रहे हैं। टेप उनके मुंह पर लगी होने की वजह ही, उन्हें देखने वालों के मस्तिष्क पर खौफ का दबाव भी पड़ेगा।”
“वो जानते हैं कि भीतर तब क्या हो रहा होगा?”
“नहीं उन्होंने वहां, उस स्थिति में पैंतालिस मिनट रहना है। फिर निकल जाना है। निकलते वक्त वो पुलिस के हाथों में पड़ जाते हैं तो उनकी गलती होगी। मैंने उन्हें हर बात अच्छी तरह समझा दी है, अब ये उन पर निर्भर होगा कि वे पुलिस से बचकर निकल सकते हैं या नहीं। उन्हें अपने काम के पैसे मिल चुके हैं।”
“तुम सिलसिलेदार बताओ कि ये सब कैसे होगा?” प्रवेश गोदरा ने बैचेनी से पहलू बदला।
देवराज चौहान खुलासा तौर पर बताने लगा कि डकैती के वक्त कैसे-कैसे क्या करना है।
सब उसकी बात, एक-एक शब्द ध्यान से सुनते रहे।
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