बबूसा ने होम्बी की चमक भरी बूढ़ी आंखों में झांका।
होम्बी के होंठों के बीच मध्यम-सी मुस्कान उभरी और लुप्त हो गई।
“जादूगरनी, मैं परेशान हूं।”
“परेशानी तो अभी तेरी शुरू होनी है बबूसा।” होम्बी धीमे स्वर में कह उठी।
“धरा के बारे में मुझे कुछ बता जादूगरनी।”
“जरूर बताती, अगर वो अपनी ताकतों का इस्तेमाल डोबू जाति पर करना चाहती। परंतु हमारी जाति उससे सुरक्षित है।”
मशालों के प्रकाश में दोनों के चेहरे सिंदूरी से हुए चमक रहे थे।
“पर धरा सदूर पर तो मुसीबतें खड़ी करेगी।”
“सदूर से मेरा कोई वास्ता नहीं।” जादूगरनी ने स्पष्ट कहा।
“पर मेरा तो वास्ता है।”
“उससे मुझे कोई मतलब नहीं।”
“ऐसा मत कहो जादूगरनी। इस जन्म में मैंने डोबू जाति की सेवा की है। मैंने हमेशा यहां के लोगों का भला चाहा है।”
“तो बदले में डोबू जाति ने तुझे पनाह भी दी बबूसा। जबकि तू सदूर से आया था।”
“मुझे रास्ता दिखा जादूगरनी। मुझे परेशानी से निकाल दे।”
“तू परेशानी से नहीं निकल सकेगा। आने वाला वक्त तेरा बुरा हाल कर देगा।” होम्बी कह उठी।
“तो मैं क्या करूं?”
“तू अब डोबू जाति से चला जाएगा बबूसा। तेरे सवालों का जवाब अब तुझे सदूर ग्रह पर ही मिलेगा।”
“पर मैं फिर वापस आऊंगा और...”
“तू फिर कभी वापस नहीं आ सकेगा। तू सदूर पर ही रहेगा। तेरी किस्मत की लकीरें ये ही कह रही हैं।”
बबूसा, होम्बी को एकटक देखने लगा।
“सच होम्बी, मैं कभी भी वापस नहीं आऊंगा?” बबूसा बेचैन-सा कह उठा।
होम्बी ने इंकार में सिर हिला दिया।
“यहां की याद मुझे सताती रहेगी जादूगरनी।”
“वहां के हालात तुझे सांस ही नहीं लेने देंगे कि तू डोबू जाति को याद कर सके।”
“सदूर की रवानगी कब होगी?”
“कल।”
“ओह। मेरी एक समस्या हल कर जादूगरनी। धरा की वजह से सदूर पर परेशानियां आ सकती हैं। मैं धरा को यहीं छोड़ जाना चाहता हूं।”
“वो ऐसा नहीं होने देगी।” होम्बी ने शांत स्वर में कहा।
“नहीं होने देगी? वो कैसे मुझे रोक सकती है। मैं उसके हाथ-पांव बांधकर डोबू जाति के योद्धाओं के हवाले कर दूँगा कि पोपा के जाने के बाद उसे आजाद कर दें। ये तो बहुत आसान काम है।” बबूसा ने कहा।
“तू अभी तक उसे समझ नहीं पाया।”
“बता जादूगरनी, ताकि मैं उसे समझ सकूं।”
“वक्त आने पर तू समझेगा उसे कि वो क्या है। तू उसके खिलाफ कुछ करने की कोशिश करेगा तो हार जाएगा। उसकी ताकतें उसके साथ हैं। वो उसके रास्ते में आने वाली हर परेशानी को दूर कर देंगी। तूने कुछ करने की चेष्टा की तो भुगतेगा।”
“वो इतनी ताकतवर है?”
होम्बी ने सिर हिला दिया।
बबूसा खामोशी से होम्बी को देखता रहा।
“क्या तूने भविष्य की झलक पाई कि धरा सदूर पर जा रही है?” बबूसा ने पूछा।
“हां। वो सदूर पर बिना किसी परेशानी के पहुंच जाएगी।”
“ओह, फिर तो मेरा कुछ भी करना, सोचना बेकार होगा। क्या मैं धरा पर किसी तरह काबू नहीं पा सकता?”
“मुझे इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं, क्योंकि अब डोबू जाति सुरक्षित है। अब जा, मैं और नहीं बोलूंगी।”
बबूसा होम्बी से मिलकर वहां पहुंचा, जहां जगमोहन, नगीना, मोना चौधरी, सोमारा और धरा थीं। धरा सबसे अलग बैठी थी और चमक भरी नजरों से बबूसा को ही देख रही थी।
“बबूसा।” सोमारा ने कहा-“अगोमा तेरे को दो बार पूछने आ चुका है। वो कहता है सोलाम आ गया है।”
बबूसा ने सिर हिलाया और धरा की तरफ बढ़ गया।
उसे अपनी तरफ आते पाकर धरा मुस्कराई तो निचला होंठ टेढ़ा-सा हो गया।
“तू मेरी परेशानी का कारण बनी हुई है धरा।”
“होम्बी तो तेरे को बचा रही है, कुछ न बताकर। क्यों, तू मुझे यहीं छोड़ जाने की सोच रहा है।” धरा हंसी।
बबूसा के चेहरे पर हैरानी उभरी।
“त--तेरे को कैसे पता चला?”
“मेरी ताकतों ने मुझे बताया।” धरा के चेहरे पर शैतानी चमक नाच उठी।
बबूसा धरा को देखता रह गया।
“मुझसे पंगा मत ले। वरना मुंह की खाएगा। मैं तब तक ही चुप हूं जब तक सदूर पर नहीं पहुंच जाती। अगर तू मुझे छेड़ेगा तो मैं तुझे छोड़ने वाली नहीं। होम्बी की बात मान और चुपचाप बैठ जा।”
बबूसा ने होंठ भींच लिए। धरा को देखता रहा।
“तूने सच में मुझे परेशान कर दिया है, जाने तू कौन है।” बबूसा ने कहा और पलटकर बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ गया। पीछे से धरा की छोटी-सी हंसी कानों में पड़ी।
तभी जगमोहन ने बबूसा को पुकारा ।
बबूसा ने ठिठककर जगमोहन को देखा।
“धरा के साथ तुम्हारी क्या बातचीत चल रही है?”
“तुम्हारे जानने लायक बात नहीं है। सोलाम आ गया है मैं अगोमा के पास जा रहा हू हम सब मिलकर कुछ सोचेंगे। बातें अब वो नहीं रहीं, जो पहले थी, पर मैं सोमाथ को सबक सिखाना चाहता हूं।” कहते हुए बबूसा बाहर निकल गया। जबसे बबूसा को ये बात पता चली थी कि धरा की ताकतों ने ढाई सौ साल पहले सदूर ग्रह पर रानी ताशा द्वारा, राजा देव को सदूर से बाहर फिंकवाया था कि, आज जैसे हालात आएं और धरा को वापस सदूर जाने का मौका मिल सके, तो बबूसा के मन में रानी ताशा के प्रति बुरे विचार छंटने लगे थे। ऐसी स्थिति में रानी ताशा को वो दोषी नहीं मान सकता था। रानी ताशा के पश्चाताप को वो हमेशा दिखावा मानता रहा, परंतु अब उसे एहसास हो रहा था कि ताकतों ने जब उसे आजाद किया और रानी ताशा को जब होश आया तो उसे कितना दुख पहुंचा होगा कि राजा देव के साथ उसने क्या किया। हालातों के करवट लेते ही बबूसा की परेशानी बढ़ने लगी थी, परंतु सोमाथ के बारे में बबूसा के विचार नर्म नहीं थे। महापंडित ने सोमाथ का निर्माण, उसके मुकाबले पर खड़ा करने को किया था। सोमाथ ने उसे मारने का प्रयत्न भी किया था। ऐसे में बबूसा सोमाथ को सबक सिखाकर दिखा देना चाहता था कि महापंडित का निर्माण अधूरा है।”
अगोमा बिजली वाले कमरे में नहीं मिला।
बबूसा अगोमा की तलाश करने लगा।
हर तरफ मशालों की रोशनी फैली थी। बबूसा को एक आदमी से पता चला कि सोलाम तीस योद्धाओं के साथ लौटा है और इस वक्त सब खाना खा रहे हैं तो बबूसा वहां पहुंचा, जहां खाना खाया जाता था। वहां सोलाम, अगोमा और सब योद्धा खाना खा रहे थे। बबूसा उन सबसे मिला। खाने के बाद अगोमा, सोलाम, जगमोहन, नगीना, मोना चौधरी और सोमारा के साथ बबूसा की संयुक्त बातचीत हुई। मुद्दा था सोमाथ को खत्म करने का।
लम्बे वक्त तक बात होती रही।
अंत में बात यहां खत्म हुई कि योद्धाओं के पास जो घातक हथियार हैं, मौका पाते ही उन घातक हथियारों से सोमाथ की गर्दन काटकर, उसे मार दिया जाएगा।
उसके बाद सब कमरे में पहुंचे। धरा को खाना खाते पाया।
बबूसा धरा के पास पहुंचा और वहीं बैठता बोला।
“तुम्हारे पास ताकतें हैं?”
“थोड़ी-सी।” धरा ने खाना खाते कहा-“पर सदूर पर पहुंचते ही, मुझे मेरी ताकतें ढूंढ़ लेगी।”
“तो तुम ताकतवर हो।”
“बहुत।”
“तब तो तुम मेरा काम कर सकती हो। मेरी कुछ परेशानी दूर कर दोगी।” बबूसा ने कहा।
“बड़े प्यार से बोल रहे हो। कोई काम फंस गया लगता है।”
“तुम मेरे लिए सोमाथ को खत्म कर दो।”
धरा कुछ पल चुप रही फिर खाना खाते कह उठी।
“ये नहीं हो सकेगा।”
“मेरी ताकतें इंसानों पर काम करती हैं। सोमाथ इंसान नहीं है। वो तारों, मशीनों का बना हुआ है। मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। पर मैं इंसानों को नहीं छोड़ती।” कहते-कहते धरा अजीब-से अंदाज में मुस्कराई तो निचला होंठ टेढ़ा हो गया।
“तुम तो बड़ी कमजोर हो।” बबूसा ने आंखें सिकोड़ी।
धरा हंस पड़ी।
“गलतफहमी में मत रहना । सदूर पर पहुंच तो तमाशा दिखाऊंगी तुझे?”
“क्या करेगी? तू सदूर पर?”
“अभी क्यों पूछता है। तब देखना तू मेरी ताकत। सदूर पर इंसान बसते हैं बिजली के बने सोमाथ जैसे लोग नहीं कि जिन पर मेरी ताकतों का असर नहीं होगा। वहां तो सब कुछ मेरे लिए तैयार पड़ा है। मेरे वहां पहुंचने और वक्त पूरा होने की देर है कि हर तरफ मेरे नाम का डंका बजेगा। जानता है मेरा नाम क्या है?”
“धरा।” बबूसा के होंठों से निकल ।
“ये ते मेरा पृथ्वी का नाम है। सदूर पर मेरा नाम दूसरा है। सब जानते हैं मेरे नाम को।” धरा का निचला होंठ टेढ़ा हो गया।
“क्या नाम है?”
“अभी नहीं बताऊंगी। वक्त पूरा होने से पहले मैंने अपना नाम बताया तो सदूर पर पहुंचते-पहुंचते मैं मुसीबत में पड़ जाऊंगी। मेरी ताकतों ने इस बारे में मुझे पहले ही सचेत कर दिया था कि अपना नाम न बताऊं।” धरा ने सिर हिलाकर कहा।
“अपनी ताकतें दिखा मुझे?”
धरा ने बबूसा की आंखों में झांका फिर आंखें नचाकर धीमे स्वर में, टेढ़े होंठ से कह उठी ।
“सदूर पर तू मेरे साथ चल ही रहा है। वहां तू मेरी ताकतों का नाच देखना।”
“तेरे बारे में मुझे राजा देव से बात करनी होगी।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“नहीं कर पाएगा तू?” धरा अपने खास अंदाज में मुस्कराई-“मेरी ताकतें तेरे दिमाग से ये बात निकाल देंगी। तू भूल जाएगा कि तूने राजा देव को कुछ बताना है।”
“मैं राजा देव को तेरे बारे में बता के रहूंगा।”
धरा मुस्कराई। निचला होंठ लटकने लगा। वो शैतान की तरह दिखी।
तभी मोना चौधरी पास आती कह उठी।
“क्या बातें हो रही हैं तुम दोनों में?”
उसी पल बबूसा उठते हुए बोला।
“ये मुझसे सदूर ग्रह के बारे में बातें पूछ रही थी। चलो खाना खा लें। मुझे तो भूख लग रही है।”
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रात चैन से बीती। नीचे बिछाने को गर्म कपड़े और ओढ़ने को कम्बल उन्हें दे दिया गया था। उन्हें जरा भी सर्दी नहीं लगी और वो गहरी नींद में रहे। बबूसा और सोमारा एक तरफ पास-पास ही सोए थे जबकि धरा उन सबसे अलग होकर सोई थी। मोना चौधरी, नगीना, जगमोहन बातें करते-करते जाने कब सो गए थे। उन लोगों ने ये तो तय कर ही लिया था कि डोबू जाति के दो योद्धा मौका पाते ही सोमाथ पर हथियारों से हमला करेंगे और उसकी गर्दन काट देंगे। आसान तरीका था ये सोमाथ को खत्म करने का। बबूसा सोमाथ से छुटकारा पा लेना चाहता था ताकि आने वाले वक्त में वो बिना किसी परेशानी के काम कर सके। अब उसे नई चिंता यानी कि धरा की चिंता होने लगी थी कि वो कौन है और सदूर पर जाकर वो क्या करना चाहती है। उसके पास कैसी ताकतें हैं? धरा के बारे में होम्बी ने भी सतर्क किया और महापंडित ने भी। ये बबूसा के लिए चिंता का विषय था कि धरा जब सदूर पर पहुंचेगी तो तब क्या होगा। उसने मन-ही-मन में विचार पक्का कर लिया था कि राजा देव को धरा के बारे में खबर देगा। ताकि राजा देव इस बारे में जो ठीक समझें वो कर सकें। वो अन्यों को भी धरा के बारे में बताना चाहता था। परंतु उसे लग रहा था कि अभी उन्हें कुछ बताना ठीक नहीं। धरा के बदले रूप के बारे में सुनकर वो व्यर्थ में परेशान हो जाएंगे। रात सोमारा जब पास ही लेटी थी तो सोने से पहले उसने धरा के बारे में बात छेड़ी थी।
“बबूसा, मुझे सोमाथ की इतनी चिंता नहीं है, जितनी कि धरा की है। वो जाने क्या इरादा रखती है।”
“उसको बातों से लगता है कि वो कुछ खास है।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“जब वो हमसे बातें करती है तो शैतान जैसी लगने लगती है। उसका निचला होंठ जब टेढ़ा होता है तब वो पूरी शैतान लगती है। तुम ऐसा कुछ करो कि हमारे साथ सदूर पर न जा सके।”
“मैंने सोचा था ऐसा, परंतु जादूगरनी ने मना कर दिया कि ऐसा सोचूं भी नहीं। धरा को पता चल जाएगा और वो अपनी ताकतों का मेरे पर इस्तेमाल कर देगी। जब मैं ये बात करके धरा के पास आया तो वह मेरे मन के विचार जानती थी।”
“समझ में नहीं आता कि सदूर पर क्या होगा?”
“मैं कल राजा देव से धरा के बारे में बात करूंगा।”
“सदूर कब जाने वाले हैं हम?”
“होम्बी ने तो कहा है कि कल हम सदूर की तरफ रवाना हो जाएंगे।” बबूसा बोला।
“और तो क्या धरा भी हमारे साथ जाएगी?”
“होम्बी का कहना है कि धरा सदूर पर पहुंच जाएगी।”
“तुम्हें जादूगरनी की बातों का पूरा भरोसा है?”
“पूरा भरोसा है। वो जो कहती है वो सच होता है।” बबूसा ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
“तो हम कल सदूर रवाना हो जाएंगे।”
“हां सोमारा।”
“धरा हमारे साथ होगी। जादूगरनी ने ये नहीं बताया कि सदूर पर धरा का क्या रूप सामने आएगा?”
“वो नहीं बता रही। कहती है मुझे ये बात पता चलेगी तो धरा को एहसास हो जाएगा और वो मुझे मार देगी।”
“क्यों मारेगी?”
“इसलिए कि मैं उसकी ‘पोल’ वक्त से पहले न खोल दूं।”
“मुझे विश्वास नहीं होता। धरा तुझे कैसे मार सकती है बबूसा। वो तेरा मुकाबला नहीं कर सकेगी।”
“अपनी ताकतों के सहारे वो मुझे मारेगी।”
“जादूगरनी ने ऐसा कहा?”
“उसने इशारों-इशारों में ऐसा ही कहा। मैं जादूगरनी की बात को हवा में नहीं उड़ा सकता।”
“मैंने तो सोचा था कि राजा देव मिल गए, तुम मिल गए, बाकी बातें जैसे तैसे हल हो जाएंगी। लेकिन धरा ने तो मेरी नींद ही उड़ा दी है। तुम सुबह राजा देव और रानी ताशा को धरा के बारे में बताना कि क्या हो रहा है।” सोमारा ने कहा।
“जरूर बताऊंगा। बहुत कुछ है मेरे पास बताने को। धरा की ताकतों ने ही ढाई सौ साल पहले सदूर पर, रानी ताशा पर अपना कब्जा किया था और राजा देव को ग्रह से बाहर फिंकवा दिया था। तब जो कुछ भी हुआ रानी ताशा ने नहीं किया था, धरा की ताकतों ने, रानी ताशा को माध्यम बनाकर किया था ताकि आगे ऐसी-ऐसी घटनाएं हों और धरा जब सदूर पर आना चाहे तो उसे रास्ता तैयार मिले। स्पष्ट है कि धरा की सहायक ताकतें ढाई सौ बरस से खामोशी से काम कर ही है। धरा के हक में काम कर रही थीं। ये एक बेचैन कर देने वाली बात है।”
“फिर तो रानी ताशा निर्दोष है।” सोमारा बोली।
“हां। रानी ताशा निर्दोष है । मैं रानी ताशा के वियोग को ड्रामा समझता रहा जबकि रानी ताशा स्वयं परेशान थी कि उसके हाथों से ये क्या हो गया। राजा देव को कैसा धोखा दे दिया। वो अभी तक नहीं जानती कि वो सब धरा की ताकतों का खेल था।”
“तुम ये बात रानी ताशा और राजा देव को जरूर बताना।”
“समस्या खड़ी हो सकती है सोमारा।”
“कैसी समस्या?”
“राजा देव को सदूर के उस जन्म की याद आने पर, वो आसानी से धरा की ताकतों वालीं बात पर विश्वास नहीं करेंगे। राजा देव ये ही सोचेंगे कि रानी ताशा ने उन्हें धोखा दिया और वो उसे सजा देना चाहेंगे। ऐसे मौके पर राजा देव को समझाना बेहद कठिन होगा। उन पर जब क्रोध सवार होता है तो वो किसी की नहीं सुनते।”
“तुम्हारी बात तो मानेंगे।”
“शायद इतनी नहीं, जितनी कि वो सामान्य हालत में मानते हैं।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“फिर क्या होगा बबूसा। धरा की शक्तियों के किए कसूर की सजा रानी ताशा भुगतेगी?”
बबूसा चुप रहा।
“ये तो गलत होगा। रानी ताशा, पहले ही राजा देव के दूर हो जाने की वजह से सजा पा चुकी है। जब वो वियोग में परेशान होती थी तो मैं भी यही सोचती थी कि गलती, रानी ताशा की तो है। परंतु अब जो हालात सामने आ रहे हैं, वो तो कुछ और ही कहते हैं। रानी ताशा तो, राजा देव को धोखा देने के मामले में मासूम है। निर्दोष है।”
“मैं ठीक करने की चेष्टा करूंगा सब कुछ।” बबूसा व्याकुल था।
“तुम रानी ताशा को, राजा देव के क्रोध से बचा लोगे?”
“बचाना ही होगा। मुझे कोई रास्ता सोचना होगा सोमारा।”
“एक बात अभी मन में आई है।”
“क्या?”
“भैया (महापंडित) से कहकर राजा देव के मस्तिष्क का वो हिस्सा ही साफ करवा दें, जहां उस जन्म की यादें मौजूद हैं । इस तरह राजा देव को वो धोखे वाली बात याद नहीं आएगी और सब ठीक तरह से चलता रहेगा।”
“मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगा।”
“क्यों?”
“मैं राजा देव का सेवक हूं और इस तरह का धोखा मैं राजा देव के साथ नहीं कर सकता। ये बात मेरी सीमा से बाहर है और ऐसा कोई करने की चेष्टा भी करेगा तो मैं होने नहीं दूंगा।” बबूसा ने दृढ़ स्वर में कहा-“मैं दूसरी तरह से राजा देव को समझाने की चेष्टा करूंगा। परंतु अभी तो मुझे धरा की चिंता है।”
“तुम सुबह होते ही राजा देव और रानी ताशा को धरा के बदले रूप के बारे में बता देना।”
“ऐसा ही करूंगा मैं ।”
उसी पल कुछ दूर कम्बल ओढ़े सोई धरा ने चेहरे से कम्बल हटाया और मुस्कराकर बबूसा और धरा की तरफ देखने लगी। मशाल की रोशनी में उसका निचला होंठ कुछ टेढ़ा हो गया और वो शैतान की तरह दिखने लगी।
“अभी तो मैं तुझे कुछ भी नहीं बताने दूंगी बबूसा। मैं नहीं चाहती कि सदूर पर पहुंचने में मुझे कोई अड़चन आए।”
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सुबह धुंध भरा मौसम था। मध्यम ठंडी हवा के झोंके चल रहे थे। सर्दी इतनी जबर्दस्त थी कि दो कदम चलना भी मुहाल हो रहा था। गर्म कपड़े भी ज्यादा साथ न दे रहे थे। पहाड़ के बाहर शायद हीं कोई ऐसा नजर आ रहा था जिसे आवश्यक काम के लिए बाहर आना पड़ा था। हर तरफ मौजूद बर्फ की वजह से, तीखी ठंडक जैसे शरीर को चीरती भीतर तक घुसी जा रही थी। दिन का उजाला फैले कुछ वक्त बीत चुका था। तभी पोपा का दरवाजा खुला और फिर सीढ़ियां खुलती जमीन से आ लगीं। दरवाजे पर किलोरा दिखा जो कि एक तरफ हट गया फिर सोमाथ नीचे उतरता दिखा। जो कि हमेशा की तरह चुस्त नजर आ रहा था। सीढ़ियां उतरकर सामने पहाड़ के मुहाने की तरफ बढ़ गया। सीढ़ियां वापस सिमटती चली गईं और दरवाजा बंद हो गया। इस बुरी सर्दी का असर सोमाथ पर जरा भी नहीं था। सोमाथ पहाड़ के भीतर प्रवेश कर गया लोग काम करते दिख रहे थे। रानी ताशा के दो आदमी भी दिखे, जो पहरे के तौर पर वहां टहल रहे थे। सोमाथ आराम ते कदम उठाता आगे बढ़ता चला गया। पहाड़ के भीतर की जगह गर्म थी।
बहुत कम सर्दी थी भीतर। सोमाथ अभी मूर्ति वाले हॉल में पहुंचा ही था कि उसके कानों को शूं की आवाज सुनाई दी। उस आवाज की वजह जानने के लिए सोमाथ ने गर्दन घुमानी चाही कि तभी लोहे की कुछ भारी चकोर पत्ती, उसकी गर्दन काटती चली गईं। सोमाथ के कदम वहीं रुक गए। परंतु पत्ती
पूरी गर्दन न काट सकी और ‘टक’ की आवाज के साथ वो थम गई। उसी पल सोमाथ की आंखें जैसे उलट गई हों। अब आंखों की जगह वहां सिर्फ सफेद परत दिखने लगी और वो भयानक दिखने लगा।
“ये क्या हो गया?”
“किसने किया?”
डोबू बस्ती वालों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
सब कुछ फासला रखकर वहां इकट्ठे होने लगे।
रानी ताशा के वे आदमी भी आ गए, जो डोबू बस्ती के लोगों पर नजर रखे हुए थे।
“ओह, ये किसने कर दिया?”
“हमने तो इनसे हथियार ले लिए थे।” दूसरा बोला।
“सोमाथ।” पहले वाले ने पुकारा-“तुम ठीक हो कि नहीं?”
परंतु सोमाथ तो जैसे अपने में व्यस्त था। उसका शरीर इधर-उधर डोल रहा था हौले-हौले। लेकिन गिरने वाली कोई बात नहीं दिख रही थी। लोगों की आवाजें अभी भी उठ रही थीं। उस भीड़ में अगोमा और सोलाम भी आ खड़े हुए थे। दोनों की नजरें मिलीं। जहां एक ही सवाल था कि गर्दन पूरी क्यों नहीं कटी? तभी सोमाथ का हाथ उठा और गर्दन में फंसी लोहे की पत्ती को खींचने लगा। देखते-हीं-देखते वो गर्दन से आजाद होकर सोमाथ के हाथों में दिखी। उसने उसे नीचे फेंक दिया। फिर दोनों हाथों से सिर को थामा और गर्दन को पहले की तरह सेट बिठाने लगा। दो मिनट की मेहनत के बाद उसने गर्दन को वापस, ठीक से सेट किया और सिर पर हाथ से दबाव बढ़ाकर उसे रोके रखा। धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा।
वहां खड़े सब लोग हैरत से सोमाथ को देख रहे थे। वो नहीं जानते थे कि ये तारों और धातु का बना इंसान है। वो हैरान थे कि गर्दन से खून नहीं निकला। वो हैरान थे कि आधी से ज्यादा गर्दन कट जाने के बाद भी वो शांत खड़ा अपने हाथों से काम ले रहा है। उनके चेहरे उनकी हैरत को दर्शा रहे थे।
“ये क्या कर रहा है?” अगोमा ने दबे स्वर में सोलाम से पूछा।
“मैं नहीं जानता।” सोलाम ने शब्दों को चबाते हुए कहा-“इसकी गर्दन कटकर अलग क्यों नहीं हुई?”
“शायद हथियर फेंकने की रफ्तार कम होगी।”
“तो दूसरा हथियार क्यों नहीं फेंका गया।”
कई मिनट बीत गए।
सोमाथ एक हाथ गर्दन पर रखे, दूसरे से सिर दबाए स्थिर खड़ा रहा।
धीरे-धीरे सोमाथ की उल्टी आंखें जैसे वापस होने लगीं।
इस पूरी प्रक्रिया को दस मिनट लगे और सोमाथ की आंखें पहले की तरह स्वस्थ दिखने लगीं। उसने सिर और गर्दन से हाथ हटा लिया और मुस्कराकर हर तरफ देखने लगा।
गर्दन पहले की तरह सामान्य हो चुकी थी।
“क्या हुआ सोमाथ?” रानी ताशा का एक आदमी पास आकर बोला-“तुम पर जानलेवा वार किया गया।”
“हां।”
“किसने?”
“इन्हीं में से किसी ने। ये पता लगाना कठिन है कि किसने ऐसा किया।”
सोमाथ की निगाह अगोमा पर जा टिकी। वो आगे बढ़ा और अगोमा के पास पहुंचकर बोला-“तुम्हें पता होगा कि किसने मुझे मारने की चेष्टा की।”
“मुझे नहीं पता। मैं तो बिजली वाले कमरे में व्यस्त था कि शोर सुनकर इधर आ गया।” अगोमा कह उठा ।
“कोई बात नहीं। जिसने भी ऐसा किया है, उसे कहना कि दोबारा कोशिश करे।”
“तु-तुम्हारी तो गर्दन कट गई थी।” सोलाम अजीब-से स्वर में कह उठा।
“तो?”
“फिर ठीक कैसे हो गई?”
सोमाथ ने अगोमा से पूछा।
“बबूसा कहां है?”
“उधर कमरे में।” अगोमा ने आगे की तरफ इशारा किया।
“मुझे वहां ले चलो।”
अगोमा, सोमाथ को उस कमरे के बाहर छोड़ गया, जहां बबूसा था।
सोमाथ ने भीतर प्रवेश किया और ठिठककर सबको देखा। चेहरे पर मुस्कान थी। बबूसा की निगाह सोमाथ के चेहरे पर टिक गई। धरा कम्बल ओढ़े लेटी थी कि सोमाथ के भीतर प्रवेश करते ही उसने कम्बल में से थोड़ा-सा मुंह बाहर निकाला और चमक भरी निगाहों से सोमाथ को देखने लगी थी। जगमोहन, नगीना और मोना चौधरी की नजरें मिलीं।
सोमाथ, बबूसा के पास पहुंचकर बोला।
“मैं जानता था कि तुम मुझे खत्म करने की कोशिश जरूर करोगे।”
“मैंने तो ऐसा कुछ नहीं किया।” बबूसा कह उठा।
“अभी मेरी गर्दन काटने की कोशिश की गईं।”
“पर तुम्हारी गर्दन तो ठीक है।”
“तुम जानते हो कि मेरे शरीर के भीतर, महापंडित ने ऐसा सिस्टम रखा है कि टूट-फूट की फौरन रिपेयर हो जाती है।” सोमाथ ने शांत स्वर में कहा-“तुम जरूर सफल हो गए होते अगर मेरा गला कटने को लेकर, महापंडित ने गले में ‘रोक’ न रखी होती।”
“तुम तो मुझसे ऐसे कह रहे हो जैसे पूरा भरोसा हो कि ये काम मेरे इशारे पर हुआ है।”
“तुम्हारे ही इशारे पर हुआ है हमला।”
“यकीन कैसे है तुम्हें?” बबूसा उठ खड़ा हुआ।
“क्योंकि अभी तक रानी ताशा के किसी आदमी पर हमला नहीं किया गया। सिर्फ मेरे पर ही हमला हुआ। मुझे यकीन दिलाने के लिए ये ही बात बहुत है कि ये काम तुम्हारा है।” सोमाथ का स्वर सामान्य था।
“जो भी हो तुम मुझे कुछ नहीं कह सकते।” बबूसा बोला।
“क्यों?”
“राजा देव नहीं चाहते कि बबूसा का बुरा हो।”
“इसका ये मतलब तो नहीं कि तुम मुझ पर हमला कराने लगो।” सोमाथ का स्वर सख्त हुआ।
“तुम्हें वहम है। मैंने ऐसा कुछ नहीं कराया।”
“मैं जानता हूं तुम इतने में ही बस नहीं करोगे। तुम अपनी कोशिश जारी रखोगे।”
बबूसा और सोमाथ की नजरें मिलीं।
“मैं तुम्हें पसंद नहीं करता सोमाथ।” बबूसा ने कठोर स्वर में कहा।
“मैं भी तुम्हें पसंद नहीं करता।” सोमाथ ने शांत स्वर में कहा-“ये मत सोचते रहना कि राजा देव तुम्हारी मौत नहीं देखना चाहते तो मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। मैं राजा देव का हुक्म नहीं मानता।”
“तुम भी अपनी कोशिश कर लेना।”
“मारे जाओगे। तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते। मेरे रास्ते में आना तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा। मैं ये बात भी जानता हूं कि रानी ताशा और राजा देव का मिल जाना तुम्हें रास नहीं आ रहा। परंतु मैं तुम्हें आखिरी बार सतर्क कर रहा हूं कि मेरे से मुकाबला करने की मत सोचो, वरना तुम्हारे मर जाने का राजा देव को दुख होगा।”
“मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं।”
सोमाथ ने सिर हिलाया और बबूसा को देखते पलटकर बाहर निकल गया।
“तो ये बच गया।” नगीना कह उठी।
“हां।” बबूसा बोला-“परंतु ये...”
तभी सोलाम ने भीतर प्रवेश करते हुए कहा।
“हमारे योद्धा ने हथियार फेंककर सोमाथ की गर्दन काटने की भरपूर चेष्टा की, आधी से ज्यादा कट गई, परंतु...”
“उसके गले में कोई ‘रोक’ लगी है। जिस वजह से उसकी गर्दन नहीं कट सकती।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“ये बात तुमने पहले क्यों नहीं बताई बबूसा?”
“मैं भी नहीं जानता था।”
“अब हमें कुछ नया सोचना होगा कि सोमाथ को खत्म किया जा सके।” मोना चौधरी ने कहा।
“मुझे तो ये काम आसान नहीं लगता।” जगमोहन के चेहरे पर गम्भीरता दिख रही थी।
“तुम इस बारे में कुछ सोचकर मुझे बताओ सोलाम।” बबूसा ने सख्त स्वर में कहा।
सोलाम बाहर निकल गया।
बबूसा की निगाह धरा की तरफ उठी।
कम्बल से झांकते धरा के चेहरे को देखा। दोनों की आंखें मिलीं। धरा मुस्कराई तो निचला होंठ टेढ़ा दिखने लगा। बबूसा के होंठ भिंच गए। वो बाहर निकलता चला गया। बबूसा ने दृढ़ इरादा कर लिया था कि रानी ताशा और राजा देव को, धरा के बारे में सब कुछ बता देना है कि उसका असली रूप कुछ और है।
बबूसा के जाते ही धरा ने हाथ के इशारे से सोमारा को पास बुलाया।
“क्या है?” पास पहुंचकर सोमारा बोली।
“बैठ तो...” धरा ने फर्श पर हाथ मारकर कहा।
सोमारा बैठ गई।
“कहां गया है बबूसा?”
“यहीं है, जाना कहां है।” सोमारा तीखे स्वर में कह उठी।
“वो पोपा में गया है। राजा देव और रानी ताशा को मेरे बारे में बताने।” धरा मुस्कराई। होंठ टेढ़ा हो गया।
“तो? मुझे क्यों बता...”
“बबूसा किसी को कुछ नहीं बता सकेगा।” धरा के चेहरे पर शैतानी भाव नजर आने लगे।
“वो बताएगा तुम्हारे बारे में।”
“मेरी ताकतें उसे रोक देंगी।”
“बबूसा को रोकना आसान नहीं...”
“नादान। मेरी ताकतों को तू नहीं जानती। वो बबूसा को चकराकर रख देंगी।”
“क्या मतलब है तेरा?” सोमारा की आंखें सिकुड़ी।
“समझकर भी नासमझ बन रही है। सब कुछ तो बता दिया तुझे।”
“तेरी ताकतें हैं कहां?”
“मेरे आसपास। तुम सब के करीब। सब सुनती हैं वो और मेरी बेहतरी के लिए काम करती हैं। वो मुझे हर हाल में सदूर पहुंचा देना चाहती हैं। वो पूरे रास्ते में कोई रुकावट नहीं आने देंगी।”
“मैं तेरी ताकतों को देखना चाहती हूं।”
“वक्त पूरा होने ही वाला है। उसके बाद तू मेरी ताकतों की मौजूदगी का एहसास पा सकेगी।”
“किस वक्त की बात कर रही है तू।”
“सदूर पहुंचकर तुझे सब बता दूंगी। तब तो मेरे बारे में सब जान
जाएंगे।” धरा मुस्कराई तो निचला होंठ टेढ़ा हो गया।
“तेरी ताकतें तेरे पास हैं तो सब कुछ बताने में डरती क्यों है तू?”
“मेरी ताकतों ने बताया है कि सदूर पहुंचने तक मुझे चुप रहना है। मैंने तो तेरे को ये कहने के लिए बुलाया था कि बबूसा किसी को भी मेरे बारे में बता नहीं पाएगा। ये तो उस जादूगरनी ने बबूसा के सामने मेरी ताकतों वाली बात खोल दी, नहीं तो मैं पहले की तरह सामान्य ढंग से, सदूर तक भी पहुंच जाती।”
“महापंडित को भी पता है कि तेरा सदूर पर आना ठीक नहीं।” सोमारा कह उठी।
धरा हंसी। निचला होंठ टेढ़ा हो गया। वो शैतान की तरह दिखने लगी।
“महापंडित की बात मत कर।”
“क्यों?”
“वो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल मेरे पर नहीं कर सकेगा। वो मेरा मुकाबला नहीं कर सकता।”
“महापंडित का मुकाबला तू नहीं कर सकेगी।”
“महापंडित मेरे सामने फुस्स है।” धरा ने हवा में हाथ लहराया-“वो बेबस हो जाएगा।”
“तू जानती है महापंडित को?”
“मैं उसे बहुत ज्यादा जानती हूं। पर वो मुझे ठीक से नहीं जानता। अब जान लेगा।”
“तू आधी-अधूरी बातें करती है। साफ बात क्यों नहीं करती?”
“वो भी करूंगी। सदूर तो पहुंच लेने दे।” धरा हंसी।
सोमारा धरा को देखती रहीं, फिर कह उठी।
“तू अपने को बहुत समझ रही है। पता नहीं कौन है तू, पर सदूर पर तेरी एक न चलेगी।” कहते हुए सोमारा उठ गई-“वहां अब राजा देव भी है। तूने कुछ किया तो तेरे को ग्रह से बाहर फेंक देंगे।”
धरा हंस पड़ी। सोमारा वापस अपनी जगह पर जा बैठी। उखड़ी निगाहों से धरा को देखा। उसी पल नगीना और मोना चौधरी उठीं और सोमारा के पास पहुंचकर, उसके पास बैठ गईं।
सोमारा ने दोनों को देखा।
“क्या बात है सोमारा? नगीना बोली-“धरा के साथ तुम्हारी और बबूसा की कुछ खास बातें हो रही हैं कल से।”
“हां।” सोमारा गम्भीर हो उठी-“बात ही कुछ ऐसी है।”
“मुझे बता क्या बात है?”
सोमारा ने धरा की तरफ देखा।
धरा इधर ही देख रहीं थी। नजरें मिलते ही वो मुस्कराई तो निचला होंठ टेढ़ा हो गया।
“धरा वैसी नहीं है, जैसी तुम लोग उसे जानते हो-वो...” एकाएक सोमारा की बात बदलती चली गई-“वो बहुत अच्छी है, वो कहती है देवराज चौहान, नगीना का पति है, रानी ताशा का उस पर कोई हक नहीं है। नगीना के साथ नाइंसाफी हो रही...”
और उधर कम्बल ओढ़े, चेहरा बाहर रखे धरा के चेहरे की मुस्कान शैतानी हो उठी थी। निचला होंठ टेढ़ा होकर मुस्कान का साथ दे रहा था।
उसकी नजरें सोमारा के कहते होंठों पर टिक चुकी थीं।
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बबूसा ने रानी ताशा के आदमी से कहा।
“किलोरा से कहो, बबूसा पोपा में आना चाहता है।”
उस व्यक्ति के हाथ में दबे यंत्र से सम्पर्क बनाकर ये बात किलोरा से कही।
“किलोरा, दरवाजा खोल रहा है तुम्हारे लिए।” उस व्यक्ति ने यंत्र बंद करते हुए कहा-“सोमाथ पर जानलेवा हमला किसने किया था?”
“मैंने नहीं देखा।” बबूसा मुस्करा पड़ा ।
“उसका आधे से ज्यादा गला कट गया था। वो दिल दहला देने वाला नजारा था।”
बबूसा ने कुछ नहीं कहा और बाहर को तरफ बढ़ गया।
बाहर निकलते ही सर्दी का तीव्र एहसास हुआ। शरीर पर गर्म कपड़े भी नहीं पहन रखे थे। वो जब से डोबू जाति में वापस आया था, तभी से धरा के नए हालातों में उलझ गया था। एक मिनट भी चैन का नहीं मिला था। उसने सामने खड़े पोपा पर निगाह मारी। पोपा पर बर्फ पड़ी हुई थी। ओस की बूंदें लकीरें बनाती, पोपा से नीचे की तरफ आई पड़ी थीं। बबूसा हर तरफ नजरें घुमा रहा था परंतु उसका पूरा ध्यान धरा के ख्यालों पर था। धरा के बारे में होम्बी ज्यादा बताने से कतरा रही थी, शायद उसे चुप रहने में ही भला दिख रहा था। वो जानता था कि होम्बी जो करेगी, उसके फायदे के लिए करेगी। इधर धरा कह रही थी कि सदूर पर पहुंचने के बाद ही वो अपने बारे में कुछ कहेगी। परंतु बबूसा का पूरा विश्वास था कि आने वाले वक्त में धरा उनके लिए कोई मुसीबत खड़ी करेगी। महापंडित भी धरा के बारे में बता चुका है कि वो लड़की सदूर पर पहुंचकर कुछ अच्छा नहीं करने वाली। वो सदूर की ही है और अब वापस आ रही है। महापंडित से उसकी कल बात हुई थी। शायद अब तक महापंडित को धरा के बारे में कुछ नया मालूम हो गया हों। उससे फिर बात करनी चाहिए।
तभी पोपा का दरवाजा खुला और किलोरा वहां खड़ा दिखा। किलोरा ने बबूसा को देखा। आस-पास देखा कि उसी पल सीढ़ियां खुलती नजर आईं और जमीन से आकर लग गईं।
बबूसा सीढ़ियां चढ़कर, पोपा के भीतर जा पहुंचा।
“कैसे हो किलोरा?”
“ठीक हूं।” किलोरा पास ही लगे बटनों को दबाता कह उठा।
“अब तो मेरे आने पर तुम्हें दरवाजा खोलने के लिए किसी से इजाजत नहीं लेनी पड़ती।” बबूसा मुस्कराया।
उसी पल सीढ़ियां सिमट आईं और दरवाजा बंद होता चला गया।
किलोरा पलटा और गहरी निगाहों से बबूसा को देखता कह उठा।
“सोमाथ पर तुमने हमला कराया?”
“ओह, तो खबर यहां तक आ गई । तुमसे किसने कहा कि मैंने हमला कराया?”
“सोमाथ ने, वो यहीं है।”
“तुम्हें पूरा भरोसा है कि सोमाथ का दिमाग सही है? मुझे तो वो ठीक नहीं लगता।”
“वो पूरी तरह ठीक है।” किलोरा बोला-“उससे मत उलझो। तुम उसका मुकाबला नहीं कर सकते। वो तुम्हें मार देगा।”
“वो मुझे मारने की कोशिश कर चुका है। रानी ताशा वहां न पहुंच जाती तो, वो मुझे मार ही देता।”
“तब भी सोमाथ से उलझने का इरादा रखते हो।”
“हां।”
“वो तुम पर भारी पड़ेगा और तुम्हारी जान ले लेगा।” किलोरा के चेहरे पर गम्भीरता थी।”
“सोमाथ ने बचकाना हरकत की जो तुमसे मेरी शिकायत लगाई।” बबूसा मुस्करा पड़ा।
उसने मुझसे नहीं रानी ताशा से कहा था और रानी ताशा ने ये बात राजा देव से कही, जब वो चालक कक्ष में मौजूद थे और मैं भी पास में ही था। किलोरा ने बात स्पष्ट करते हुए कहा।
“हूं।” बबूसा ने सिर हिलाया-“तुम सोमाथ की तरफ हो या मेरी?”
“किसी की भी तरफ नहीं। किसी से उलझने या किसी की साइड लेना मेरा काम नहीं है।”
“राजा देव कहां हैं?”
“चालक कक्ष में।”
“मैं अभी राजा देव के पास जाऊंगा परंतु मुझे महापंडित से बात करनी है।” कहने के साथ ही बबूसा आगे बढ़ गया-’मैं सोमाथ को छोड़ने वाला नहीं। वरना वो अक्सर मेरे रास्ते में आता रहेगा। उसे सबक सिखाना जरूरी है।’ बबूसा बड़बड़ा उठा।
बबूसा स्क्रीन वाले गोल कमरे में पहुंचा। वहां कोई भी मौजूद नहीं था।
बबूसा ने हैडफोन जैसा यंत्र कानों पर लगाया और बटनों-लीवरों से छेड़-छाड़ करने लगा। स्क्रीन रोशन हो उठी। वो महापंडित से सम्पर्क बनाने की चेष्टा में था और लगातार कोशिश करते रहने के बाद, पंद्रह मिनट लगे सम्पर्क बनने में। स्क्रीन पर महापंडित का चेहरा दिखने लगा।
“मैं कबसे तुम्हारे साथ सम्पर्क बनाने की चेष्टा में था।” बबूसा बोला।
“मैं दूर था। मेरी मशीन ने मुझे पुकार-पुकार कर बुलाया। आने में वक्त लग गया। लड़की के बारे में नया कुछ?”
“तुमने कहा था कि धरा को साथ न लाऊं, ऐसी कुछ कोशिश करूं। परंतु जादूगरनी कहती है कि मैं ऐसा कुछ भी न करूं, वरना वो मुझे नुकसान पहुँचा देगी।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“ऐसा ही कुछ मेरी मशीनों ने मुझे संकेत दिया है कि वो लड़की सदूर पर पहुंच जाएगी।”
“मतलब कि उसे रोका नहीं जा सकता।”
“व्यर्थ होगा उसे रोकना।”
“तुम्हें धरा के बारे में मशीनों ने कोई नई जानकारी दी?” बबूसा ने कहा।
“मशीनें कोशिश में लगी हैं। वो खुद तकलीफ में हैं। क्योंकि इस बारे में कोई जानकारी नहीं पा रहीं कि वो लड़की कौन है, परंतु एक मशीन का कहना है कि जब वो लड़की सदूर पर पहुंचेगी तो तभी उसके बारे में जानकारी मिलनी शुरू होगी।”
“तुम्हारी मशीनें इस तरह असफल क्यों हो रही हैं महापंडित?”
“मशीनों का कहना है कि वो अपने प्रश्न के जवाब के करीब पहुंचने को होती हैं तो जाने कौन उन्हें आगे बढ़ने से रोक देता है। उनका कहना है कि कुछ ताकतें उनका रास्ता रोक रही हैं।”
“धरा कहती है कि उसके पास ताकतें हैं। सदूर पर भी उसकी ताकतें मौजूद है।”
“वो मुझे सच कहती लग रही है बबूसा।”
“तो तुम धरा से हार मानने वाले हो। उसकी ताकतें अपना काम पूरा कर रही हैं परंतु तुम्हारी मशीनें सफल नहीं हो रहीं।”
“वो लड़की जरूर कोई खास है।”
“खास से मतलब?”
“ताकतवर।”
“वो सदूर पहुंच सके, इसके बारे में सदूर पर मौजूद उसकी ताकतों ने अपना काम शुरू कर दिया था। रानी ताशा के हाथों राजा देव को ग्रह से बाहर फिंकवा दिया था। ताकि जब राजा देव की वापसी हो तो वो भी सदूर पर पहुंच सके। और तुम्हारी मशीनें एक छोटी-सी बात का जवाब नहीं पा सकी कि धरा की हकीकत क्या है।” बबूसा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“मैं खुद नहीं समझ पा रहा कि ये सब क्यों हो रहा है। मेरे साथ मेरी मशीनें इस बात को जानने की कोशिश में बराबर लगी हुई हैं कि उस लड़की की असलियत क्या है। इस बारे में मालूम होते ही मैं तुम्हें बताऊंगा बबूसा।”
महापंडित से बात करके बबूसा उस कमरे से निकला और पोपा के रास्तों पर आगे बढ़ गया। चेहरे पर गम्भीरता व्याकुलता की छाप थी। रह-रहकर उसके होंठ सख्ती से भिंच जाते थे। रास्ते में दो-तीन लोग मिले। वो खुश होकर बबूसा से मिले, परंतु बबूसा सिर हिलाकर आगे बढ़ता, चालक कक्ष की तरफ बढ़ता रहा। पोपा का जर्रा-जर्रा उसका पहचाना हुआ था। पोपा बनाते समय पूरे वक्त वो राजा देव (देवराज चौहान) और जम्बरा के साथ था। पोपा को तैयार करने में उसने भी बराबर का हाथ लगाया था। यहां के रास्ते, यहां की ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिसे उसका पता न हो। पोपा उसके घर की तरह था, जिसका कि रहने वालों को सब पता होता है। बबूसा के दिमाग में इस वक्त खलबली मची हुई थी। उसकी नजरों में इस वक्त सबसे जरूरी काम, राजा देव को धरा के बारे में बताना था। उसे पूरा भरोसा था कि राजा देव अवश्य धरा का कोई इंतजाम करेंगे। धरा से छुटकारा मिल जाएगा। ऐसी बातों का हल निकालने में राजा देव का दिमाग बहुत काम करता था। एकाएक बबूसा मुस्करा पड़ा, ये सोचकर कि सदूर पर वो फिर
राजा देव के साथ जीवन व्यतीत करेगा राजा देव की सेवा में लग जाएगा। सब कुछ अच्छे से चलने लगेगा। तभी उसके ख्याल धरा की तरफ मुड़ गए कि इस वक्त तो इस समस्या का हल निकालना है। बार-बार उसे धरा के टेढ़े होंठ वाली मुस्कान याद आ रही थी।
कभी-कभी तो वो बहुत खतरनाक लगती है। बबूसा बड़बड़ा उठा-’पहले वो कितनी मासूम लगा करती थी। तब मुझे क्या पता था कि मेरे साथ रहकर, वो अपना ही कोई खेल, खेल रही है।’
बबूसा अपनी ही सोचों में उलझा गैलरी के रास्ते को तय करके बाईं तरफ मुड़ता गया। वो परेशान भी लग रहा था और तनाव में भी था। सोमाथ से ज्यादा उसे, धरा की समस्या दिख रही थी। राजा देव को इस बारे में बताना जरूरी हो गया था। राजा देव ही धरा के बारे में कोई रास्ता निकालेंगे। ये रास्ता खत्म होते ही आगे चार सीढ़ियां आई जिन्हें चढ़कर वो सीधे वाले रास्ते में आगे बढ़ गया है। दाएं-बाएं और तिरछी तरफ भी
एक रास्ता पा रहा था। रास्तें में यदा-कदा कोई दिख जाता है, परंतु इधर का रास्ता सुनसान जैसा ही लगता था। क्योंकि इस तरफ पोपा का पिछला हिस्सा था और सामान्य लोगों का इस तरफ आना कम ही होता था। चुप्पी का वातावरण हर तरफ व्याप्त था।
आगे के मोड़ से मुड़ते ही बबूसा रुकता चला गया।
सामने से सोमाथ आ रहा था। सोमाथ भी करीब आकर ठिठक गया।
बबूसा शांत भाव में मुस्कराया और कह उठा।
“तो तुम मेरी शिकायत लगा रहे हो रानी ताशा से। बच्चे जैसी बात है?”
“मैं अपने लिए रास्ता तैयार कर रहा हूं।” सोमाथ सामान्य स्वर में बोला।
“कैसा रास्ता?”
“तुम्हें खत्म करने का। सबसे कहना जरूरी है कि तुमने मुझे मारने की चेष्टा की, ताकि जब मैं तुम्हें मारूं तो मैं सच्चा लगूं। मैंने कह दिया है कि अगर तुमने दोबारा ऐसा किया तो मैं तुम्हें मार दूंगा।”
“रानी ताशा से कहा?”
“राजा देव से भी कहा है।”
“राजा देव नें तुम्हारी बात पसंद नहीं की होगी।”
“उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राजा देव मुझे संयम बरतने और तुम्हें समझाने को कह रहे थे।” सोमाथ बोला।
“तो तुम अपने को मुझसे ज्यादा ताकतवर समझते हो।”
“मैं हूँ।”
“ये भूल है तुम्हारी।” बबूसा मुस्करा रहा था-“मैं तुम्हें खत्म करने वाला हूँ।”
“नहीं कर सकते।”
“बहुत जल्द तुम्हारी बात का जवाब मिल जाएगा। मैं तुम्हारे लिए एक चक्रव्यूह की तैयारी कर रहा हूं मन ही मन मुझे पूरा यकीन है कि तुम उस चक्रव्यूह से नहीं बच सकते। अपने को बचा सको तो बचा लेना।”
“मुझे मारने में तुम कभी भी सफल नहीं हो सकते।” सोमाथ का स्वर शांत था।
“ये तो आने वाला वक्त बताएगा।”
“तुम मुझे इसलिए मारना चहते हो कि उस दिन मैं तुम्हें मारने जा रहा था।” सोमाथ मुस्करा पड़ा।
बबूसा कुछ पल सोमाथ को देखता रहा फिर कह उठा।
“गलती महापंडित की है कि उसने तुम्हें अथाह ताकत दें दी और मेरा जन्म कराते समय, मुझमें राजा देव के सारे गुण दिए। राजा देव की ताकत राजा देव का दिमाग, सब कुछ उन जैसा ही है। राजा देव में ये खासियत रही है कि वो कभी भी हार नहीं मानते। तो मैं कैसे तुमसे हार मान सकता हूं। मुझसे झगड़ा लेकर तुमने गलत कर दिया।”
“तुम्हें इस बात का जरा भी डर नहीं कि तुम मारे जाओगे मेरे हाथों।”
“तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकोगे। क्योंकि मेरे चक्रव्यूह को तुम भेद नहीं सकोगे। फंसकर रह जाओगे।” बबूसा ने सिर हिलाकर कहा-“अगर तुम बच गए तो मैं हार मान लूंगा।”
सोमाथ शांत निगाहों से, बबूसा को देखने के बाद बोला।
“बहुत भरोसा है अपने चक्रव्यूह पर, जो मुझे पहले ही बता दिया कि तुम क्या करने जा रहे हो।” सोमाथ ने कहा।
“आने वाले वक्त में देखना कि क्या होता है। मैं तुम्हारे लिए ही हर वक्त सोचता रहता हूं।” बबूसा ने कहा और सोमाथ की बगल से होते हुए आगे बढ़ गया। चेहरे पर शांत भाव थे। पलटकर एक बार भी सोमाथ को नहीं देखा।
वो रास्ता पार होते ही आगे संकरी गली जैसा रास्ता आ गया कि जहां से एक बार में एक ही इंसान आगे जा सकता था, यानी कि कतार के रूप में आगे बढ़ा जा सकता था वहां से। वो करीब बारह कदम का रास्ता था जिसे पार करते ही बबूसा पोपा के पीछे वाली जगह पर पहुंच गया, जो कि खुली जगह थी। करीब पंद्रह लोग वहां बैठ सकते थे। बबूसा ठिठका और उसकी गम्भीर निगाह हर तरफ घूमने लगी। सब कुछ उसका जाना-पहचाना था। छत धातु की बनी हुई थी। धातु में ही डिजाइन जैसा डाल रखा था। दीवारें कहीं प्लेन थीं तो कहीं जरूरत के हिसाब से सामान लगाया हुआ था, जैसे कि खाने बने हुए थे। उन पर ढक्कन लगा था एक तरफ वाशबेशिन जैसा कुछ लगा था और उस पर टूंटी के आकार का कुछ था और वहां से पानी भी आता था। बबूसा जानता था कि पोपा के ऊपरी, बाहरी खोल में पानी भरा हुआ है। ऊपर खोल के नीचे धातु को एक और परत थी, दो परतों के बीच पानी भरने की जगह थी, इससे पोपा सफर के दौरान सूर्य की गर्मी से भी बचा रहता था और पानी की जरूरत भी पूरी हो जाती थी।
बबूसा उन खानों को खोलकर देखने लगा।
एक आधा को छोड़कर वो खाली थे। स्पष्ट था कि पोपा का ये हिस्सा कम इस्तेमाल होता था। बबूसा की निगाह साइड में खुलने वाले पोपा के दरवाजे पर जा टिकी। वो बंद था और पास में पीले बटनों वाली प्लेट लगी थी। आगे बढ़कर बबूसा उन पीले बटनों को खास क्रमवार के हिसाब से दबाने लगा।
दबाने के चंद सेकेंडों के बाद दरवाजा हिला और फिर बाहरी तरफ खुलता चला गया। ठंडी हवा का तीव्र झोंका भीतर आया। बाहर बर्फ की बिछी सफेद चादर दिखने लगी। बबूसा सोच भरी निगाहों से बाहर देखने लगा, तभी खुले दरवाजे के भीतर सीढ़ियां निकलीं और खुलती हुई जमीन से आ लगीं।
बबूसा ने पलटकर पोपा के भीतर निगाह मारी।
खानों को जोड़ती रॉडों पर उसकी निगाह जा टिकी। आगे बढ़कर उसने रॉडों को हाथ से पकड़कर चेक किया, वो बेहद मजबूती से लगी हुई थीं।
‘इस बार कड़ा मुकाबला होगा सोमाथ।’ बबूसा बड़बड़ा उठा।
फिर बबूसा वापस खुले दरवाजे पर ठिठका कि ठिठक कर रह गया।
खुली सीढ़ियों के पास सोमाथ खड़ा ऊपर ही देख रहा था।
दोनों की नजरें मिलीं, बबूसा बरबस ही मुस्करा पड़ा।
“ये क्या कर रहे हो?” सोमाथ ने पूछा।
“तुम मुझसे नहीं पूछ सकते कि मैं क्या कर रहा हूं।” बबूसा हौले-से हँस पड़ा।
सोमाथ उसे देखता रहा फिर बोला।
“इस रास्ते को मैंने पहली बार देखा है।”
“तुम पोपा को जानते ही कितना हो। महापंडित ने पोपा के बारे में जो जानकारी तुम में भर दी, वो ही तुम जानते हो और महापंडित भी पोपा को ज्यादा नहीं जानता। मैं तो राजा देव और जम्बरा के साथ, पोपा के निर्माण में लगा रहा था। हम तीनों से ज्यादा पोपा को और कोई नहीं जान सकता।” बबूसा ने कहा।
“तुम मुझे क्या बताना चाहते हो, ये कहकर।”
“कुछ नहीं बताना चाहता ।” बबूसा ने कहा और नम्बरों वाली प्लेट के बटनों को दबाने लगा।
“तुम्हारी ये हरकतें अजीब-सी हैं।” बाहर खड़ा सोमाथ बोला-“तुम...”
तभी बाहर फैली सीढ़ियां दरवाजे में आ सिमटी और दरवाजा बंद होने लगा।
बबूसा और सोमाथ एक-दूसरे को देखते रहे कि दरवाजा बंद हो गया। बाहर से आती ठंडी हवा थम गई। बबूसा कई पलों तक बंद दरवाजे को देखता रहा। फिर रहस्य से भरी मुस्कान चेहरे पर नाच उठी।
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बबूसा चालक कक्ष में पहुंचा जो कि पोपा के आगे की तरफ था। चालक कक्ष का नजारा ऐसा था जैसे कि उस जगह पर किसी ने ढेर सारा बिजली का सामान डालकर उसे जोरों से हिला दिया हो। हर तरफ तारें, स्विच, नॉंब, पचासों लीवर, सुर्ख रंग का डैशबोर्ड और उस पर बहुत संख्या में स्विच।
कुछ ऐसे लीवर भी थे जो कि स्टेयरिंग की तरह गोल-गोल घुमाए जा सकते थे। सामने ऐसे कांच जैसे प्लास्टिक की विण्ड स्क्रीन थीं कि कुछ टकरा जाने की स्थिति में वो टूटें न। इस तरफ दो कुर्सियां थीं, जो कि फर्श के साथ फिट थीं। ऐसी और भी ढेरों चीजें थीं जिन्हें बता पाना कठिन है। बाईं तरफ की दीवार में ढक्कन वाले छोटे-छोटे खाने बने हुए थे, जिन पर नम्बर प्लेट लगी थी। छत पर विण्ड स्क्रीन जैसा शीशा लगा था, जो कि मध्यम साइज की खिड़की जैसा था और वहां से भी बाहर देखा जा सकता था। ये दस फुट चौड़ा और दस फुट लम्बा कमरा था। डैशबोर्ड के एक तरफ छोटी-छोटी कई स्क्रीनें लगी थीं जो कि पोपा की यात्रा के वक्त पोपा के बाहर, हर दिशा का नजारा दिखाती थीं। इस वक्त चालक कक्ष में देवराज चौहान मौजूद था, जो कि नीचे झुका डैशबोर्ड के नीचे की तारों में उलझा हुआ था कि आहट पाकर सिर घुमाया तो बबूसा को देखा।
“आं-हां राजा देव, आपको पोपा के चालक कक्ष में देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है।” बबूसा खुशी से कह उठा।
देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ और मुस्कराया।
“हम सबकी मेहनत सफल हुईं बबूसा। पोपा बना लिया हमने।” देवराज चौहान ने कहा।
“आपने और जम्बरा ने बहुत मेहनत की थी।”
“तुमने और सौ से ज्यादा लोगों ने पोपा बनाने में बहुत ज्यादा सहयोग दिया था।”
“पोपा बनाना आपका सपना था राजा देव। मैं बहुत खुश था जब आपने कहा था कि पोपा तैयार हो गया। उस रात आपने इसी चालक कक्ष में बैठकर कारू (शराब) पी थी। बहुत ज्यादा कारू पी ली थी। आप और भी पीना चाहते थे, परंतु मैंने कारू का बर्तन आपसे लेकर उस खाने में बंद कर दिया था।” बबूसा ने एक बंद खाने की तरफ इशारा किया।
“मुझे याद नहीं।” देवराज चौहान मुस्कराया।
बबूसा के मुस्कान भरे चेहरे पर सोच के भाव उभरे।
“ये सारे खाने के लॉक्स आपने सेट किए थे मेरी मौजूदगी में। इन्हें खोलनें का क्रम जम्बरा को बता दिया था?”
“जम्बरा तब दूसरे कामों में व्यस्त था। तो मैंने सोचा कि उसे अगली मुलाकात में बता दूंगा। तुम तो ये खबर देने किले की तरफ रवाना हो चुके थे कि कल मैं किले पर पहुंच रहा हूं। अगले दिन में भी रवाना हो गया था।”
बबूसा का चेहरे पर दुख के भाव उभरे। उसे वो वक्त याद आ गया था।
“बबूसा-क्या हुआ?”
“कुछ नहीं राजा देव।” बबूसा ने तुरंत सिर हिलाया-“तो आपने इन बक्सों को खोलने के बारे में किसी को नहीं बताया फिर तो आज भी वो वाला कारू का बर्तन इसी बक्से में होगा।” कहने के साथ ही बबूसा आगे बढ़ा और एक बंद बक्से के पास टिठककर वहां लगी बटनों की प्लेट के बटनों को क्रमवार दबाने लगा।
दबाकर हटा तो, हाथ से बक्से का पल्ला खोल दिया।
वो मात्र दो फुट गहरा था। और उसमें पड़ा कुछ दिखा। बबूसा ने हाथ से उसे पकड़ा और बाहर निकाला। चमक रही थी बबूसा की आंखें। वो बर्तन जग की तरह खुले मुंह वाला था और अब खराब हो चुका था। बदरंग हो चुका था। उसका बुरा हाल, देखते ही बनता था।
देवराज चौहान एकाएक ठहाका मारकर हंस पड़ा।
“ये-ये वो ही बर्तन हैं राजा देव।” बबूसा की आवाज कांप रही थी-“वो ही बर्तन है, जब पोपा बन जाने की खुशी में आप इस बर्तन में भरकर कारू पी रहे थे। तब का रखा अब बर्तन को बाहर निकाला है।”
“मुझे कुछ-कुछ उस वक्त की याद आ रही है बबूसा।” देवराज चौहान हंसते हुए कह उठा।
“वो ही बर्तन है ये।”
देवराज चौहान हंसता हुआ कुर्सी पर जा बैठा।
बबूसा ने मुस्कराकर बर्तन को एक तरफ रखते हुए कहा।
“बीते वक्त की कुछ यादें कितनी अच्छी होती हैं राजा देव।” “हां। बहुत अच्छा लगता है पुरानी बातों को याद करके।”
बबूसा देवराज चौहान को गम्भीर निगाहों से देखने लगा।
“मुझे लगता है पोपा का निर्माण करना जैसे कल को बात है। चालक कक्ष की एक-एक चीज याद है मुझे। मैंने ही इस कक्ष को तैयार किया था। यहां तब की याद है कि कौन-सी तार को कहां जोड़ा था मैंने।”
“आपने ही सब कुछ बनाया है तो क्यों याद नहीं होगा।”
“आज मैं बहुत खुश हूं बबूसा। मैंने सोचा है कि मैं ही पोपा को चलाकर, सदूर तक ले जाऊंगा।”
“इससे अच्छी और क्या बात होगी।”
“मैं जल्द से जल्द सदूर पर पहुंचकर देखना चाहता हूं कि अब मेरा सदूर कैसा है।”
कुछ चुप रहकर बबूसा बोला।
“मुझे आपसे शिकायत है राजा देव।”
देवराज चौहान बबूसा को देखने लगा।
“मैंने आपको कितना रोका कि अभी आप रानी ताशा से न मिलें, परंतु आपने मेरी एक न मानी।”
“क्यों न मिलता ताशा से।” देवराज चौहान बोला-“मैं ताशा से दूर नहीं रह सकता।”
“मैं चाहता था कि आपको सब याद आ जाए कि रानी ताशा ने आपको कैसा धोखा दिया, कैसे आपको सदूर ग्रह से बाहर फेंका...”
“ताशा मुझे क्यों ग्रह से बाहर फेंकने लगी। वो तो मुझ पर जान देती है।”
बबूसा कुछ चुप रहकर कह उठा।
“मेरे ख्याल में तब रानी ताशा स्वयं धोखे में थीं। वो खुद नहीं जानती थीं कि उनके द्वारा क्या हो रहा है।”
“क्या मतलब?”
“मुझे पता लगा हैं कि आपको सदूर से बाहर फेंकने का काम, रानी ताशा ने अपने होशोहवास में नहीं किया था। मैं आपको कुछ नई बातें बताना चाहता हूं, वो ही बताने में आपके पास आया हूं।” बबूसा गम्भीर हो गया-“धरा को तो आप जानते ही हैं, पर वो...वो...” बबूसा थम-सा गया-फिर मुस्कराकर कह उठा-“वो बता रही थीं कि राजा देव सदूर पर पहुंचकर बहुत खुश होंगे। रानी ताशा के साथ बहुत अच्छा जीवन बिताएंगे।”
देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
जबकि बबूसा के चेहरे पर बेचैनी नाच उठी।
“धरा बहुत खराब...” बबूसा ने पुनः कहा, परंतु उसके होंठों से जैसे जबरन निकला-“धरा को सदूर पर साथ ले जाना बहुत अच्छी बात रहेगी। वो भी सदूर को देखकर खुश होगी राजा देव।”
“वो हमारे साथ ही तो चल रही है।” देवराज चौहान मुस्कराकर बोला।
“ये मुझे क्या हो रहा है ।” बबूसा के होंठों से निकला-“मैं आपको कुछ और बताना चाह रहा हूं ये कैसी बातें मेरे मुंह से निकल रही हैं, मैं धरा की असलियत...धरा का व्यवहार सबके साथ बहुत अच्छा है...मैं-मैं अभी बात नहीं कर सकता राजा देव। पता नहीं मुझे क्या हो रहा है। ये भी धरा की ही चाल...धरा के साथ मैं और सोमारा रात देर तक बातें करते रहे और और...ओह।” बबूसा ने अपना माथा पकड़ लिया।
“तुम्हें कुछ आराम कर लेना चाहिए बबूसा।” देवराज चौहान ने कहा-“थक गए लगते हो।”
“ये सब उसकी ताकतें...मैं धरा को पूरा सदूर घुमाऊंगा राजा देव।”
“हां, बग्गी पर उसे...”
“अब तो सदूर पर वाहन चलते हैं राजा देव।” बबूसा परेशान स्वर में बोला-“सच में मैं थका हुआ हूं मुझे कुछ देर आराम करना होगा। मैं-मैं जा रहा हूं राजा देव।”
“तुम्हें मालूम है कि आज हम सदूर की तरफ पोपा में रवाना हो जाएंगे।” देवराज चौहान ने कहा।
“ओह मुझे नहीं पता था।”
“चलने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, कुछ ही घंटों में हम पृथ्वी ग्रह छोड़ देंगे।”
“फिर तो मुझे भी चलने की तैयारी कर लेनी होगी।”
“सोमारा से मिलकर कैसा लगा?” देवराज चौहान मुस्कराया।
“बहुत अच्छा राजा देव। हम सदूर पर पहुंचकर शादी कर लेंगे।”
“तुम सोमाथ के लिए अपन मन में क्रोध रखे हुए हो।” देवराज चौहान बोला।
“ये मेरा और सोमाथ का मामला है राजा देव।” बबूसा का स्वर सख्त हो गया।
“वो तुमसे ज्यादा ताकतवर है बबूसा। उस पर हमला न ही करो तो अच्छा है।”
“आप इस मामले में न पड़ें राजा देव। मैं उसे संभाल लूंगा।”
देवराज चौहान ने गहरी नजरों से बबूसा को देखा।
“तुम मेरी बात नहीं मान रहे।”
“मैं सोमाथ को जीतकर दिखाऊंगा राजा देव।” बबूसा ने दृढ़ स्वर में कहा।
“अगर तुमने अब सोमाथ पर हमला किया तो वो तुम्हें मार देगा। उसने स्पष्ट कहा है।” देवराज चौहान बोला-“और मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। तुम्हारे बिना सदूर पर मेरा काम कैसे चलेगा?”
“सोमाथ मुझे नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा। उसे खत्म करने के लिए मैंने जो चक्रव्यूह तैयार किया है, उसका मुकाबला वो नहीं कर सकेगा और धोखे में मारा जाएगा। क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं राजा देव?”
“भरोसा है। पर मैं नहीं चाहता कि तुम खतरे में पड़ो।” देवराज चौहान गम्भीर था।
“मैं वो सीधा-साधा बबूसा नहीं राजा देव। इस बार महापंडित ने मेरा जन्म कराते समय मुझ में आप जैसी ताकत और आप जैसे दिमाग के गुण डाल दिए थे। ऐसे में आपको मेरी चिंता नहीं करनी चाहिए। मैं ही कुछ संभाल सकता हूं। डोबू जाति का सबसे तेज योद्धा हूं मैं। ऐसे में मैं बहुत सोच-समझकर सोमाथ के खिलाफ अपने चक्रव्यूह को तैयार कर रहा हूं।”
देवराज चौहान के चेहरे पर गम्भीरता ठहरी रही।
उसी पल दरवाजे पर आहट उभरी और किलोरा ने भीतर प्रवेश किया।
दोनों की नजरें किलोरा पर गईं। उसी पल देवराज चौहान, बबूसा से कह उठा।
“तुम कितने भी बेहतर सही, पर मुझे तुम्हारी चिंता रहेगी।”
“मैं चलने की तैयारी कर लूं राजा देव।” बबूसा मुस्कराया-“पोपा के चलते ही मैं आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊंगा।” बबूसा इजाजत लेकर बाहर निकला और आगे बढ़ता बड़बड़ा उठा-’ये मुझे क्या हों गया था। मैं जब भी धरा की असलियत राजा देव को बताने लगता तो मेरे मुंह से मेरे मनचाहे शब्द क्यों नहीं निकल रहे थे। जरूर ये सब धरा की ताकतें ही मेरे मुंह से निकलवा रही थीं और उन बातों से मुझे रोक रही थीं, जो मैं कहना चाहता था। धरा ने कहा भी तो था कि मेरी ताकतें मुझे कुछ भी बताने नहीं देंगी। ये सब शैतानी धरा की ही है।”
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बबूसा पहाड़ के भीतर उस कमरे में पहुंचा, जहां वो सब मौजूद थे। सबसे पहले उसकी निगाह धरा की तरफ गई, जो कि सबसे अलग-थलग कम्बल ओढ़े बैठी थी। नजरें मिलते ही धरा मुस्कराई तो उसका नीचे का होंठ टेढ़ा हो गया। बबूसा का चेहरा सख्त हो उठा। वो सीधा धरा के पास पहुंचकर नीचे बैठा कि धरा ने हंसकर कहा।
“राजा देव को बता आया मेरे बारे में?”
“तूने मुझे बताने क्यों नहीं दिया। जब भी कहना चाहा तो मुंह से दूसरे ही शब्द निकले।” बबूसा का स्वर तीखा था।
धरा हंस पड़ी।
“हंसती क्यों है?”
“मैंने तेरे को कहा तो था कि तू राजा देव को बता नहीं सकेगा कुछ। मैं नहीं बताने दूंगी।”
“तो तेरी ताकतों ने मुझे कहने से रोका?”
“हां। मैं न चाहूं तो तू मेरी अनचाही बात कैसे किसी को बता पाएगा।” धरा ने आंखें नचाईं।
“अपनी ताकतें दिखा मुझे?”
“सदूर पर दिखाऊंगी। वैसे भी यहां मेरे पास दो-तीन ही ताकतें हैं।” धरा ने गहरी सांस ली-“पर सदूर पर मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी। वहां तो वही होगा जो मैं चाहूंगी। मुझे वहां पहुंचने तो दे। तू देवराज चौहान को सब कुछ बता देता तो मेरे को सदूर पर पहुंचने में समस्या आ सकती थी। मैंने ऐसा होने ही नहीं दिया।”
“तू है कौन?”
“मैंने तेरे को बताया था कि धरा हूं मैं।”
“तेरा असली नाम?”
“दोबारा पूछ रहा है ये ही बात।” खुंबरी मुस्कराई, निचला होंठ टेढ़ा हो गया-“मेरा असली नाम तो तू तभी जान पाएगा। जब सदूर पर पहुंचेगा। उससे पहले मैं अपने बारे में कुछ नहीं बताने वाली।”
“बताने से क्या होगा?”
“मैं पहचानी जाऊंगी। मेरा नाम तो तूफान खड़ा कर देगा, बहुत वक्त बीत गया मुझे सदूर से निकले, परंतु जानने वाले तो अभी भी मेरा नाम जानते हैं। मेरी असलियत जानते हैं। जबकि मैं नहीं चाहती कि सदूर पर पहुंचने से पहले मुझे कोई परेशानी हो।”
“तूने मेरा दिमाग खराब कर रखा है धरा।” बबूसा झल्ला उठा।
“सदूर पर पहुंचकर तू मुझे नए नाम से जानेगा। वो ही, मेरा पुराना नाम।” धरा ने आंखें नचाकर कहा।
“तू शैतान जैसी है।”
“सच कहा, मैं ऐसी ही हूं।”
“मैं तुझे साथ नहीं ले जाना चाहता।” बबूसा ने दांत भींचकर कहा।
“तू कुछ नहीं कर सकेगा। मेरी ताकतें मेरे बारे में, तेरे को किसी से कहने नहीं देंगी। मैं सदूर पर जरूर पहुंचूंगी।”
“मैं तेरी हरकतों से हैरान-परेशान हो गया हूं।”
“अभी से-अभी तो मैंने कुछ किया भी नहीं। मेरा रंग तूने देखा ही कहां है। सदूर पहुंच और मेरा रंग देख ले।”
“हम आज ही सदूर के लिए चल रहे हैं।”
“जानती हूं। मेरी ताकतों ने मुझे इस बात का एहसास करा दिया है।”
बबूसा उसी पल वहां से उठा और पलटकर सबसे कह उठा।
“हम आज पोपा में बैठकर सदूर के लिए चल देंगे।”
“सच बबूसा।” सोमारा खुशी से कहते उठी और पास आ पहुंची।
जगमोहन, नगीना और मोना चौधरी की नजरें मिलीं।
“तैयारी करो सोमारा। मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें कुछ काम बताता हूं।” बबूसा बोला।
तभी जगमोहन कह उठा।
“सोमाथ का कुछ हुआ?”
“उसका भी जरूर कुछ होगा।” बबूसा कड़वे स्वर में कह उठा-“जब तक उसकी जान नहीं लूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा।”
“जान?” मोना चौधरी बोली-“पर वो तो रोबोट है, हमारी तरह इंसान नहीं, उसमें जान कैसे आ गई?”
“उसे खत्म कर देने में ही सब कुछ आ जाता है।” कहने के साथ ही बबूसा, सोमारा के साथ बाहर निकल गया।
जगमोहन ने वहीं बैठे धरा से कहा।
“आज हम सदूर की तरफ चल देंगे धरा।”
“मुझे अच्छा लगेगा।” धरा ने शांत स्वर में कहा।
“तुम्हें डर तो नहीं लग रहा।”
“डर कैसा? अपने घर जाते किसी को डर लगता है क्या?” धरा ने मासूम स्वर में कहा।
“घर? सदूर ग्रह तुम्हारा घर कैसे हो गया?”
“अगर सदूर मुझे पसंद आ गया तो मैं अपनी दुनिया वहीं बसा लूंगी।”
“तुमने सोमारा से कहा कि नगीना के साथ नाइंसाफी हो रही है। देवराज चौहान उसका पति है, जिसे कि रानी ताशा...”
“सही तो कहा है।” धरा बोली-“देवराज चौहान पर मैं रानी ताशा का हक नहीं मानती। पर मैं कर भी क्या सकती हूं। कह ही सकती हूं। रानी ताशा और सोमाथ का मुकाबला तो मैं कर नहीं सकती।”
तभी मोना चौधरी कठोर स्वर में कह उठी।
“बेला, हमें कुछ करना होगा। हम इस तरह चुपचाप क्यों बैठे हैं।”
“हम कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं हैं।” जगमोहन बोला।
“क्यों नहीं हैं, हम तो...”
“मोना चौधरी।” जगमोहन ने शब्दों को चबाकर कहा-“तुम बेहतर जानती हो कि हम रानी ताशा का मुकाबला नहीं कर सकते। करें तो सोमाथ आगे आ जाएगा। रानी ताशा के और लोग भी हैं जो...”
“पर हम कब तक चुप बैठे रहेंगे। देवराज चौहान को तो न बेला की परवाह है, न तुम्हारी, वो रानी ताशा में इस कदर डूबा हुआ है कि शायद उसे हमारा ख्याल ही नहीं आ रहा होगा। मुझे नहीं पता था कि वो इतना कमीना है कि एक औरत की खातिर वो बेला को और तुम्हें भूल जाएगा।” मोना चौधरी गुर्रा उठी।
“तुम देवराज चौहान की स्थिति को गलत समझ रही हो।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा-“इस वक्त सदूर ग्रह के जन्म में वो रंग चुका है। तब रानी ताशा के साथ उसे बेहद प्यार था और अब वो उसे मिल गई और ताशा को याद भी आ गईं उसे। तब वो उस ग्रह का राजा हुआ करता था। इस वक्त उसके मस्तिष्क में सदूर ग्रह की चीजें हैं। ये जन्म धुंधला पड़ गया लगता है शायद। वरना वो नगीना भाभी और मुझे नहीं भूल सकता था। उसे तो सिर्फ रानी ताशा ही नजर आ रही है।”
“ऐसा है तो हम क्यों सदूर ग्रह जाने को तैयार हो रहे हैं।” मोना चौधरी ने तीखे स्वर में कहा।
“दो बातें हैं जिनकी वजह से हम सदूर ग्रह पर जाने को तैयार हैं। एक तो बबूसा का सहारा है हमें। बबूसा सोमाथ को खत्म कर देना चाहता है और वो रानी ताशा के भी खिलाफ है। ऐसे में हम बबूसा के साथ रहकर आने वाले वक्त का इंतजार कर सकते हैं कि शायद भविष्य में देवराज चौहान ठीक हो जाए। सदूर और रानी ताशा का असर उस पर से कम हो जाए। हम देवराज चौहान को आसानी से नहीं अलग कर सकते।” जगमोहन की आंखें भर आई-“मैंने अपना सारा जीवन ही देवराज चौहान के साथ बिताया है। एक तरह से मेरी जिंदगी ही उसके साथ शुरू हुईं थी तो अब उसे अलग होते कैसे देख सकता हूं। उसने तो कह दिया है कि सारा पैसा मैं और भाभी बांट लें परंतु पैसे के हमने क्या करना है। बहुत देख लिया। मैं देवराज चौहान को इस तरह नहीं छोड़ सकता। अगर आगे जाकर भी सब कुछ ऐसा ही रहा और देवराज चौहान रानी ताशा के साथ खुश रहा तो में तब वापस पलटूंगा। मन में ये चैन तो रहेगा कि देवराज चौहान जहां है खुश है।”
“तब हम सदूर ग्रह से वापस कैसे आएंगे?” मोना चौधरी ने कहा।
“कोई रास्ता निकल आएगा।” जगमोहन मुस्कराया-“नहीं तो सदूर पर ही रह लेंगे।”
मोना चौधरी ने नगीना से कहा।
“तुम क्या चाहती हो बेला?”
“मैं देवराज चौहान को हंसी-खुशी बसते देखना चाहती है पेश वो जहां भी, जिसके साथ भी रहे।” नगीना ने शांत स्वर में कहा-“मैं जगमोहन को बातों से पूरी तरह सहमत हूं कि जब हमें तसल्ली हो जाएगी तो हम सदूर से चल देंगे। इतनी आसानी से उन्हें छोड़ भी नहीं सकती मैं। जरूरत पड़ी तो सदूर ग्रह पर ही मैं बाकी का जीवन बिता देने को तैयार हूं।”
मोना चौधरी, एकटक-सी नगीना को देखती रही।
“मिन्नो।” नगीना ने कहा-“मेरी मान तो तू वापस चली जा...”
“तुझे इस तरह छोड़कर।”
“जगमोहन है न मेरे साथ। ये मेरा ध्यान रखेगा।” नगीना मुस्करा पड़ी।
मोना चौधरी ने जगमोहन को देखा फिर दृढ़ स्वर में कह उठी।
“नहीं बेला, इन हालातों में मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ सकती। अभी मुझे तेरे साथ ही रहना होगा।”
नगीना ने कुछ नहीं कहा।
कुछ कदमों की दूरी पर बैठी धरा चमकती निगाहों से इन्हें देख रही थी।
“हमें बबूसा पर भरोसा रखना होगा।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा-“हम सब उसके साथ हैं, एक वो ही है जो सोमाथ से टकरा सकता है। सोमाथ नहीं रहेगा तो हमारे लिए हालात बेहतर हो जाएंगे।”
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बबूसा, सोमारा के साथ उस कमरे से निकलकर, आगे बढ़ने लगा। डोबू जाति के लोग आ-जा रहे थे सामान्य-सा रोज की तरह का शोर उठ रहा था। कहीं-कहीं रानी ताशा के आदमी भी खड़े दिख जाते थे।
“तुम मुझे कहां ले जा रहे हो बबूसा।” सोमारा कह उठा।
“आज हम वापस सदूर चल रहे हैं सोमारा।” बबूसा ने गम्भीर स्वर कहा।
“ये तो खुशी की बात है, पर तुम परेशान क्यों हो रहे हो?” सोमारा बोली।
“मैं धरा की वजह से परेशान हूं, मैं सोमाथ की वजह से परेशान हूं। मेरी परेशानियां खत्म होने की अपेक्षा बढ़ती ही जा रही हैं। अभी मेरे से ज्यादा बात मत करो। जो मेरे दिमाग में काम बाकी है, वो मुझे कर लेने दो। सोमाथ को खत्म करने के लिए मुझे कुछ सामान की जरूरत है। वो सामान में अगोमा को बताऊंगा और तुम अपनी देख-रेख में उसे पोपा के भीतर, तुमने पोपा का पीछे वाला हिस्सा देखा है। जहां एक बंद दरवाजा लगा है?” बबूसा ने पूछा।
“देखा है।”
“सारे सामान को वहां पर पहुंचा देना। यहां जो रानी ताशा के आदमी हैं, उनसे कहकर भीतर रखवा देना।”
“हां, ठीक है।”
बबूसा, सोमारा के साथ बिजली वाले कमरे में पहुंचा तो अगोमा नहीं मिला। कुछ ढूंढ़ने पर अगोमा मिला तो बबूसा उसे एक तरफ ले जाकर बोला।
“आज पोपा सदूर पर जा रहा है अगोमा।”
“ओह, तुम भी जा रहे हो?”
“हां।”
“तुम्हारे चले जाने का मुझे दुख होगा।” अगोमा गम्भीर स्वर में कह उठा।
“मैं फिर आऊंगा अगोमा।” बबूसा ने मुस्कराने की चेष्टा की।
अगोमा चुप रहा।
“मुझे कुछ सामान चाहिए। वो इकट्ठा करके, उसे सोमारा को दे देना।”
“कैसा सामान?”
“एक मोटा रस्सा। मोटा और मजबूत। कम-से-कम वो पच्चीस फुट लम्बा हो।”
“ऐसे कोई रस्से पड़े हैं।”
“तुम खुद चुनना मजबूत रस्से को। अगर वो मजबूत न हुआ तो मेरी जान चली जाएगी।” बबूसा ने कहा।
“वो मजबूत होगा।” अगोमा ने दृढ़ स्वर में कहा-“जो, मैं तुम्हें दूंगा।”
“साथ में मुझे हथियार चाहिए। कुल्हाड़ा-हथौड़ा और हमारे खास सारे हथियार। बहुत ज्यादा नहीं चाहिए, परंतु कम भी न हों। कुल्हाड़ा और हथौड़ा आठ-आठ-दस-दस की संख्या में हों।”
“पर हमारे हथियारों पर तो पहरा है।” अगोमा बोला।
“मुझे बहुत जरूरत पड़ेगी पोपा के भीतर, आने वाले वक्त में। इसके बिना मेरा काम नहीं चलेगा।”
“सोलाम से पता करता हूं। वो और उसके योद्धाओं के पास हथियार होंगे। उन्होंने हथियार बनाए थे बाहर।”
“तलवारें हैं?” बबूसा ने पूछा।
“मेरे पास ज्यादा हथियार नहीं हैं। योद्धाओं ने जो छिपा रखे होंगे, वो ही उनसे निकलवा सकता हूं।”
“मैं जो कहना चाहता हूं वो तुम समझ गए हो। सोमारा तुम्हारे पास है। सब इंतजाम करके इसे दो। ये उन्हें पोपा में ले जाएगी। ये काम जल्दी से जल्दी करो। राजा देव कभी भी चलने के लिए कह सकते हैं।”
“रानी ताशा के आदमी हथियारों को देखकर, उन्हें जब्त कर लेंगे।” अगोमा बोला।
“वो ऐसा नहीं कर सकेंगे। वक्त आने पर इस बारे में मैं राजा देव से बात कर लूंगा।
अगोमा ने सिर हिलाया और सोमारा को देखकर कहा।
“तुम मेरे साथ आओ।”
अगोमा और सोमारा चले गए।
परंतु बबूसा की नजर सोमाथ पर टिक गई थी जो कि कुछ पहले ही वहां पहुँचा था और अब अगोमा और सोमारा को एक साथ जाते देख रहा था फिर उसने बबूसा की तरफ नजर घुमाई।
नजरें मिलीं।
बबूसा कहर भरे अंदाज में मुस्कराया और पलटकर वहां से आगे बढ़ गया। वो मूर्ति वाले हॉल में जा पहुंचा और मूर्ति के पीछे वाले उस रास्ते पर बढ़ गया, जो होम्बी के कमरे तक जाता था। बबूसा होम्बी के कमरे में पहुंचा तो होम्बी को आंखें बंद किए, तख्त जैसे पत्थर पर लेटे पाया। उसकी आंखें बंद थीं। बालों को उसने हाथ में पकड़ रखा था।
“जादूगरनी।” बबूसा ने धीमे स्वर में पुकारा।
“आ गया मुझे दुख देने।”
“मैं तुम्हें दुख दे सकता हूं जादूगरनी? मैं तो तुम्हारा बच्चा हूं।” बबूसा की आंखें भर आईं।
“हमेशा के लिए आज तू यहां से जा रहा है और कहता है दुख नहीं दे रहा।” होम्बी ने आंखें खोलीं। उसी मुद्रा में उसे देखा-“हजार साल से ऊपर हो गए मुझे। तब से जिंदा हूं और लोगों को बिछड़ते ही देखा है मैंने। सब मेरे से दूर चले जाते हैं। लम्बी उम्र सजा की तरह है। मैंने हमेशा ही जाति के लोगों को अपने बच्चों की तरह चाहा है, पर कोई मेरा साथ ज्यादा देर तक नहीं दे सकता और बिछड़ जाता है, आज तेरी बारी भी आ गई, मुझसे दूर चले जाने की।”
बबूसा की आंखों में आंसू चमक उठे।
“मेरा जाना जरूरी है जादूगरनी। बहुत काम पूरे करने हैं मुझे। नहीं तो मैं...”
“रोक नहीं रही तुझे। मैंने कब कहा तेरे को, रुकने को। तेरा चले जाना ही ठीक है। सदूर का है तू, डोबू जाति का तो नहीं।”
“ऐसा कहकर मेरा दिल मत तोड़। मैं डोबू जाति का ही हूं। तुम्हारा ही हूं।” बबूसा की आंखों में आंसू निकलकर गालों पर आ गए।
होम्बी, बबूसा को देखती रही कुछ पल फिर उठ बैठी। चेहरे का झुर्रियों वाला मांस हिलने लगा।
“आने वाले वक्त की मैंने छाया देखी। तेरे को खतरे में देखा। पोपा जा रहा है और तू पोपा के बाहर, रस्सा थामे लटक रहा है और सोमाथ पोपा के दरवाजे पर खड़ा दिख रहा है।” होम्बी गम्भीर स्वर में कह उठी।
बबूसा चौंका फिर संभलते हुए कह उठा।
“ऐसा नहीं हो सकता जादूगरनी।”
“ऐसा होगा। मैंने देख लिया है। क्या कर रहा है तू?”
बबूसा ने होंठ भींच लिए।
होम्बी उसे देखती रही।
“मैं-मैं सोमाथ को खत्म करने वाला हूं।” बबूसा ने कहा-“मैं-मैं पोपा के बाहर कैसे हो सकता हूं और सोमाथ तब पोपा में कैसे हो सकता है। फिर देखो, जादूगरनी शायद कुछ नया दिखे जो कि...”
“भविष्य मुझे जो दिखा मैंने बता दिया। अब सोमाथ तुम्हें खत्म करता है या तुम सोमाथ को, ये मैं नहीं जानती।”
“क्या मैं सफल नहीं हो सकूंगा।”
“तेरा जो भविष्य दिखा मुझे, बता दिया। तेरी सदूर तक की यात्रा आसान नहीं रहने वाली।”
“कुछ और बता जादूगरनी।”
“नहीं जानती। जो आभास हुआ मुझे, वो बता दिया। जैसा करेगा, वैसा ही पाएगा।”
बबूसा के होंठ भिंच गए।
“मैं अपने इरादे से पीछे हटने वाला नहीं।” बबूसा ने दृढ़ स्वर में कहा-“सोमाथ को मजा चखाकर रहूंगा।”
होम्बी के बूढ़े चेहरे पर मुस्कान फैल गई। वो बोली।
“तो अब तू जा रहा है बबूसा। हमेशा-हमेशा के लिए।”
बबूसा ने गम्भीरता से सिर हिलाया।
होम्बी ने कंघी उठाई और बबूसा की तरफ बढ़ाकर बोली।
“ले।” वो अपने काले बाल पीछे की तरफ करती कह उठी-“बालों में फेर दे।”
बबूसा ने फौरन कंघा उठाया और होम्बी के पीछे पहुंचकर बालों में फेरने लगा।
“उस लड़की से बचकर रहना।” होम्बी बोली।
“धरा की बात कर रही हो जादूगरनी?”
“वो ही।”
“वो खतरनाक है, कभी-कभी तो वो शैतान लगती है।” बबूसा बोला।
“वो सच में शैतान है। उसका मुकाबला करने की सोचना भी मत।”
“क्या मेरे सामने धरा से मुकाबले करने का वक्त आएगा?”
“आएगा और तू उसका मुकाबला करेगा भी, पर ऐसा मत करना। तू उससे जीत नहीं पाएगा और वो तेरी जान ले लेगी। तेरे को नाच दिखा देगी। उससे बचकर रहना।” होम्बी ने मध्यम स्वर में कहा।
“पर वो है कौन?”
“ये बात मैं तेरे को नहीं बताऊंगी।”
“तू इस बात का जवाब जानती है जादूगरनी?”
“हां।”
“वो सदूर पर पहुंचकर क्या करने वाली है?” बबूसा ने पूछा।
“कोई अपने घर जाकर क्या करता है। तू सदूर पर पहुंचकर क्या करेगा?”
“पहले की तरह अपने काम देखूंगा।”
“तो वो लड़की भी पहले की तरह सदूर पर पहुंचकर अपने काम देखेगी।”
“अपने काम? कौन-से काम?”
“ये तेरे को सदूर पर ही पता चलेगा। वहां तू उसकी ही शक्ल वाली, एक और लड़की को भी देखेगा।”
“उसकी शक्ल वाली?” बबूसा की आंखें सिकुड़ी।
“हां, उसकी शक्ल वाली, एक और लड़की। वो इस लड़की का असली रूप होगी। वो ही तो है असली, जो कि सैकड़ों बरसों से गहरी नींद में है। वो उठेगी और इस लड़की के साथ मिलकर, तहलका मचा देगी। वो अपने अधूरे इरादों को पूरा करने में लग जाएगी। परंतु उसकी राह भी आसान नहीं होगी। वो भी आ जाएगा।”
“वो कौन-जादूगरनी?”
होम्बी चुप हो गई।
“बता जादूगरनी, तू किसके आने की बात कर रही हो?”
“नहीं बता सकती उसके बारे में।”
“क्यों?”
“लड़की को अच्छा नहीं लगेगा मेरा कुछ बताना।”
“तुम्हें धरा से डर हैं जादूगरनी?”
“मुझे क्या डर होगा।” जादूगरनी मुस्कराई-“मुझे किसी भी चीज से डर नहीं लगता, क्योंकि मैंने बहुत लम्बी जिंदगी बिताई है। बहुत कुछ देखा है मैंने। पहले कभी डरा करती थी, अब किसी भी बात से डर नहीं लगता।”
“तो फिर मुझे बता दे।”
“तू सदूर पर पहुंचने से पहले सब कुछ जान गया तो, वो तेरे को नुकसान पहुंचा देगी। वो नहीं चाहती कि तू ये बातें किसी और को बता दे। उसे परेशानियों का सामना करना पड़े।”
“जादूगरनी मैंने राजा देव को धरा के बारे में बताना चाहा तो मेरी जुबान से कुछ और शब्द ही निकलने लगे।”
“उस लड़की की ताकतों ने तेरे को कहने से रोका।”
“ये तो मेरे लिए चिंता वाली बात हो गई।”
“तू उस लड़की पर से ध्यान हटा ले, वो बहुत ताकतवर है। सदूर पर पहुंचकर वो फिर अपने रंग में रंग जाएगी। उसकी ताकतें ऊर्जा हासिल कर लेंगी। टुकड़े-टुकड़े हुआ सदूर फिर वापस आ मिलेगा और...क्या है।” एकाएक होम्बी ने अपने दोनों हाथ हवा में लहराए-“तू मेरी बातों के बीच क्यों आ रही है?”
कंघा करता बबूसा थम गया।
“कौन बीच में आ रहा है होम्बी?” बबूसा बोला।
“चली जा यहां से।” होम्बी फिर से हाथ हिलाकर बोली।
तभी एक लरजती, मध्यम-सी आवाज वहां गूंजी।
“तू मेरी बातें क्यों करती है?”
“तेरे को क्या, मैं जो भी करूं।” होम्बी ने हवा में पुनः हाथ लहराया।
“मेरे से झगड़ा करेगी।”
“तू मेरा क्या बिगाड़ेगी। इस जमीन पर तेरे पास ताकतें नहीं हैं। जिस जमीन पर जा रही है, वहां रौब दिखाना।”
“तेरे को मेरा जरा भी डर नहीं।”
होम्बी हंस पड़ी। बोली।
“तेरे पास ऐसा है ही क्या जिससे मैं डरूं। मैं नहीं परवाह करती तेरी।”
“मेरे बारे में बबूसा को कुछ मत बता।”
“बताना होता तो पहले ही बता देती, परंतु बबूसा के भले के लिए ही उसे नहीं बता रही। तू मेरी बातों में दखल मत दे, नहीं तो मैं बता दूंगी कि तू कौन है और बबूसा, महापंडित को बता देगा और तू वक्त से पहले पहचानी जाएगी।”
“तू बुरी है।”
“अपने को देख।” होम्बी ने शांत स्वर में कहा-“बुरी तो तू है। मैं तेरे को अच्छी तरह जान चुकी हूं।”
फिर वो आवाज नहीं आई।
“कंघा फेर बालों में, रुक क्यों गया बबूसा?” होम्बी बोली।
“ये-ये किसकी आवाज थी जादूगरनी?”
“उसी लड़की की। वो अपनी ताकतों के माध्यम से, मेरे से बात कर रही थी।” होम्बी ने गम्भीर स्वर में कहा-“वो चाहती है कि मैं तेरे से, उसकी कोई भी बात न करूं और ये ही ठीक होगा बबूसा। उसे क्रोध आ गया तो तेरा नुकसान कर देगी।”
“मैं तो उसके बारे में तेरे से जानना चाहता था।”
“मैं बताने वाली नहीं।”
“क्या महापंडित जानता है कि धरा कौन है?”
“लड़की का नाम सुनेगा तो फौरन सब कुछ समझ जाएगा वो। नाम ही तो लड़की की पहचान है।”
“तो नाम मुझे बता...”
“जब वक्त आएगा, तेरे को पता चल जाएगा। ये मत सोच कि मैं बता दूंगी। मुझे तो तू यात्रा के दौरान ही मुसीबत में पड़ा दिख रहा है। तेरे को सोमाथ से झगड़ा नहीं लेना चाहिए।”
“वो देखना मेरा काम है जादूगरनी।”
“तू हमेशा ही जिद्दी रहा है। जो मन में आ जाए, वो करके ही रहता है, पर इस बार तेरे लिए बहुत खतरे हैं।”
बबूसा का चेहरा सख्त हो गया।
“ला कंघा दे।”
बबूसा ने होम्बी को कंघा दिया और सामने आ गया।
होम्बी ने सामान्य नजरों से बबूसा को देखकर कहा।
“जा अब तू। खुश रह।”
“तेरे से दूर जाकर मुझे बहुत दुख होगा।”
“कुछ नहीं होगा। तेरे को मेरी याद ही नहीं आएगी, क्योंकि तू उलझने जा रहा है हालातों से। तेरे को जादूगरनी की याद ही नहीं आएगी। अपना ख्याल रखना मेरे बच्चे। आगे की राह आसान नहीं है।”
“मैं सोमाथ को नहीं खत्म कर पाऊंगा?”
“नहीं जानती। पता होता तो जरूर बता देती।” होम्बी ने शांत मुस्कान से कहा।
“मैं सदूर पर पहुंचूंगा?”
“अब बात को घुमाकर पूछ रहा है। जिंदा रहा तो तभी सदूर पर पहुंचेगा। सोमाथ को लेकर यात्रा के दौरान, तू क्या करने की सोच रहा है मेरे को पता चल गया है। बच गया तो सदूर पर पहुंच जाएगा। नहीं तो नहीं पहुंचेगा। पर एक बात मैं तेरे को बता दूं कि आने वाले वक्त में सोमाथ को मैंने सदूर पर देखा है।”
“ओह, तो इसका मतलब सोमाथ को मैं खत्म नहीं कर सकूंगा। वो मुझे मार देने में कामयाब रहेगा।” बबूसा गम्भीर और व्याकुल दिखने लगा-“लेकिन जादूगरनी, मैं अपने इरादे से हटने वाला नहीं। मैं सोमाथ को...”
“जा बबूसा।” होम्बी कह उठी-“तेरा जाने का वक्त करीब आता जा रहा है।”
बबूसा ने होम्बी को देखा।
होम्बी, गम्भीर नजरों से बबूसा को देखे जा रही थी।
बबूसा बाहर निकल गया।
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शाम के चार बज रहे थे। सूर्य का सुबह से ही पता नहीं था। कड़कती सर्दी हर तरफ फैली थी और कोहरे का झुंड तैरता आता और आगे सरक जाता। हर तरफ बर्फ की सफेदी की चांदी बिछी नजर आ रही थी। पहाड़ों की लम्बी श्रृंखला बर्फ की चादर से ढकी हुई थी। रुक-रुककर चल रही हवा की सर्द लहरें, शरीर को कंपा रही थीं। हर तरफ, मौसम की सर्द और वीरान खामोशी ठहरी दिखाई दे रही थी, परंतु डोबू जाति में इस बुरे सर्द मौसम से दूर गहमा-गहमी थी। डोबू जाति के लोग पहाड़ से बाहर निकले खड़े थे। शायद सब ही बाहर थे क्योंकि पोपा वहां से जा रहा था। वे रानी ताशा के हाथों आजाद हो चुके थे। पोपा को जाते देखने के लिए सब पहाड़ से बाहर निकल आए थे। उनके चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी तो पोपा के चले जाने की उत्सुकता भी। वे सब पहाड़ के साथ-साथ सटे होने के अंदाज में मौजूद थे तो कुछ काफी दूरी पर खुले में मौजूद थे। देर से वहां पर ये ही आलम था। सब पोपा के भीतर जा चुके थे। कब के दरवाजे बंद हो चुके थे और पोपा के चालू इंजन की मध्यम-सी आवाज कानों में पड़ रही थी। एकाएक पोपा कांपता-सा दिखा। कई पलों तक कांपता-सा तेज आवाज करता रहा फिर तेजी से ऊपर उठा और दाएं-बाएं को झुका, फिर ऊपर उठने लगा।
सबकी हैरत भरी निगाहें पोपा पर टिकी थीं। उनके देखते ही देखते, पोपा जिन धातु की टांगों पर खड़ा था, वो पोपा के भीतर ही कहीं लुप्त होती चली गई। इसके साथ ही पोपा आसमान की तरफ उठता चला गया। डोबू जाति के लोगों की सांसें थम गईं जैसे पोपा को देखते हुए। तभी पोपा आसमान में छाए बादलों में गुम होता चला गया। ये सब मात्र एक-डेढ़ मिनट में ही हो गया था।
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देवराज चौहान के चेहरे पर मुस्कान थी। उसकी निगाह सामने लगे मीटर को थरथराती सुई पर लगी थी। कभी-कभी नजरें उन छोटी-छोटी स्क्रीनों की तरफ उठ जाती, जहां पोपा के बाहर का, हर तरफ का दृश्य देखा जा सकता था। एक स्क्रीन पर पूरे पोपा की तस्वीर नजर आ रही थी, परंतु धुंध-कोहरे को वजह से वो तस्वीर स्पष्ट नहीं थी। पास में किलोरा मौजूद था। दोनों चालक कक्ष की कुर्सियों पर बैठे थे और कुर्सी पर खुद को एक ऐसी बेल्ट जैसी चीज से बांध रखा था, जो कि पेट पर से चौड़ी होकर गुजर रही थी।
“आप कुछ भी नहीं भूले राजा देव।” किलोरा मुस्कराकर बोला-“सब याद है आपको।”
देवराज चौहान ने मुस्कराकर सामने के शीशे के पार देखा। जहां बादलों का जाल ही नजर आ रहा था। फिर ऊंचाई मापने वाले मीटर को देखा और कहा।
“हम पृथ्वी की सीमा से बाहर निकलकर, आकाशगंगा में पहुंचने वाले हैं।” देवराज चौहान बोला।
“तो रफ्तार तेज कर दीजिए। ताकि झटकों का असर पोपा पर कम हो।” किलोरा ने कहा।
देवराज चौहान ने रफ्तार तेज कर दी।
मिनट भर बीता कि पोपा सूखे पत्ते की भांति कांप उठा। कई तीव्र झटके लगे। अगर वो कुर्सी पर बेल्ट में फंसे न होते तो जरूर नीचे लुढ़क गए होते। बीस सेकेंड ये ही आलम रहा और फिर तूफान गुजर जाने वाली स्थिति आ गई। सब कुछ शांत होता चला गया। सामने की स्क्रीन के बाहर धूप भरा मौसम दिखने लगा। वे आकाशगंगा में प्रवेश कर गए थे पृथ्वी के घेरे से निकलकर। छोटी स्क्रीनों पर पोपा के हर तरफ का स्पष्ट नजारा दिख रहा था। पोपा तेज रफ्तार के साथ एक दिशा में बढ़ा जा रहा था।
“हमारी उड़ान सफल रही राजा देव।” किलोरा ने मुस्कुराकर कहा।
“पोपा को संभालकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। मेरा सपना था पोपा की सैर करते, आकाश गंगा में घूमना।” देवराज चौहान की आवाज में उत्साह भरा था-“चालक कक्ष में दो चेयर क्यों हैं, जिन पर हम बैठे हैं।”
“बताइए राजा देव।”
“एक मैने अपने लिए रखी और दूसरी ताशा के लिए। मैं ताशा के संग आकाश गंगा में घूमना चाहता था।”
“कितना अच्छा सोचा था आपने।”
देवराज चौहान ने मीटर को देखते पोपा की दिशा निर्धारित करके कहा।
“दिशा का मुझे ज्यादा ज्ञान नहीं है। एक बार देख लो कि मैंने सही दिशा चुनी है कि नहीं?”
किलोरा ने देखा मीटर को।
फिर कुछ लीवरों को आगे-पीछे करके सेट करने लगा। निगाह मीटर पर थी। इसके साथ ही पोपा की दिशा बदलती चली गईं। कुछ पल के लिए वो पोपा के मुड़ने पर टेढ़े हो गए थे। फिर पोपा सीधा होता चला गया।
“दिशा मैंने सेट कर दी।” किलोरा बोला-“अब हमें इसी दिशा की तरफ जाना है। कुछ दिन के बाद हमें दिशा बदलनी होगी। कुल दस दिन का सफर है और अभी पोपा की रफ्तार भी बढ़ानी है।”
देवराज चौहान विंड शील्ड के बाहर देखता कह उठा।
“दस दिन का सफर है। हम रात या अंधेरा नहीं देख पाएंगे। क्योंकि आकाश गंगा में सूर्य हमेशा चमकता रहता है। रात होना तो, ग्रह का हिस्सा होता है कि जिस हिस्से पर सूर्य की रोशनी पड़ती रहे, वो हिस्सा दिन और जिधर सूर्य की रोशनी न पड़े उसे रात हो जाना कहते हैं। ये सब बातें कितनी अच्छी लगती हैं, जब हम आकाश गंगा में पोपा में बैठे घूम रहे हों। ये एक नई दुनिया की बातें बन जाती हैं।”
“आकाश गंगा में घूमने के खतरे भी बहुत हैं राजा देव।” किलोरा मुस्कराया।
“वो कैसे?”
“कुछ दिन बाद ऐसा रास्ता आएगा जहां बड़े-बड़े पत्थर आकाश गंगा में तैर रहे हैं। वो हमारे रास्ते में आते हैं अगर वो पोपा से टकरा गए तो पोपा को नुकसान हो सकता है। वो पत्थर वहीं तैरते रहते हैं। ऐसे में मैं सेंसर ऑन करके अलार्म लगा दूंगा कि जब उन पत्थरों वाला रास्ता आने वाला होगा तो अलार्म बज उठेगा। तब मैं रास्ता बदल दूंगा पोपा का और कई घंटों बाद पोपा को घुमाकर, वापस रास्ते पर ले आऊंगा जब पत्थर निकल चुके होंगे।”
“ये अलार्म और सेंसर वाला सिस्टम तो मैंने नहीं बनाया था।” देवराज चौहान सोच भरे स्वर में बोला।
“ये जम्बरा ने बाद में तैयार किया था।” किलोरा ने कहा-“जम्बरा कई बार पोपा की सैर कर चुका है और रास्ते में उसे इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ा तो उसने ये सिस्टम बनाया।”
“हूं। ये अच्छा किया जम्बरा ने। पोपा की उड़ान पर ही, ऐसी बातें समझ में आती हैं।” देवराज चौहान ने कहा-“और क्या-क्या नया किया जम्बरा ने पोपा में?”
“मैं कैसे बता सकता हूं राजा देव। क्योंकि मुझे क्या पता आपने क्या-क्या लगाया था पोपा में।” किलोरा मुस्कराया।
देवराज चौहान ने सिर हिला दिया।
“आकाश गंगा में आठ दिन का सफर करने के बाद एक जगह धुएं की बनी गहरी, काली सुरंग नजर आती है। वो सुरंग भी इधर-उधर डोलती रहती है। वो काफी लम्बी है और उसके दोनों तरफ उसका मुंह है, मतलब कि धुएं की उस सुरंग के भीतर प्रवेश किया जा सकता है जबकि भीतर कुछ भी नजर नहीं आता।”
“पता किया वो सुरंग किस चीज की है?”
“जम्बरा ने उस सुरंग से बचकर रहने को कहा है, पर उसने पता नहीं किया कि वो क्या चीज है।” किलोरा बोला।
“वो सदूर की तरफ तो नहीं बढ़ती?”
“नहीं राजा देव, वो आकाश गंगा में ही तैरती रहती है।”
“वो सुरंग कितनी मोटी है?” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा।
“काफी मोटी है। सुरंग के मुंह में एक साथ पांच-सात पोपा प्रवेश कर सकते हैं।”
“आकाश गंगा रहस्यों से भरी पड़ी है।” देवराज चौहान कह उठा।
“ऐसा ही है। एक जगह गैस के सतरंगी छल्ले घूमते नजर आते हैं जो कि काफी बड़े-बड़े हैं। जम्बरा का कहना है कि उन छल्लों से बचकर रहा जाए। जम्बरा ये भी कहता है कि उन छल्लों में ऐसी गैस है, जो कि पत्थर को भी पिघला दे। वो काफी ढेर सारे छल्ले हैं, मोटे और बड़े-बड़े। जम्बरा ने पोपा की उड़ान के दौरान कुछ पत्थरों को छल्लों में फंसते देखा और उन्हें पानी की तरह पिघलते और बूंदों के रूप में नीचे गिरते देखा था।”
देवराज चौहान ने गम्भीरता से सिर हिलाकर कहा।
“ऐसे गैसों से भरे छल्ले सदूर से आ टकराए तो सदूर को भारी नुकसान हो सकता है।”
“परंतु वो कभी भी सदूर की दिशा में भटकते हुए नहीं आए। वो आकाश गंगा में ही मंडराते रहते हैं। जम्बरा अक्सर पोपा पर सवार होकर कई बार उन छल्लों की स्थिति देखने के लिए जाता रहता है।” किलोरा ने बताया।
“सदूर से कितनी दूर हैं वो छल्ले?”
“काफी दूर हैं। उन तक पहुंचने के लिए तेज रफ्तार पोपा का दो दिन का सफर करना पड़ता है।”
“फिर तो हमारा सदूर उनसे काफी दूर है। वो सदूर तक आसानी से नहीं पहुंचने वाले।” देवराज चौहान बोला ।
“इसी तरह एक बहुत बड़ा सफेद सितारों जैसा झुंड आकाश गंगा में तैरता नजर आ जाता है। जैसे लाखों सितारे एक ही जगह इकट्ठे हो गए हों। वो अपने आप में गोल-गोल घूमता रहता है। देखने में अद्भुत है। जम्बरा कई बार उनके पास तक जा चुका है परंतु सितारों के झुंड का रहस्य नहीं समझ सका कि वो क्या हो सकता है।”
“सदूर से सितारों का झुंड कितनी दूर है?” देवराज चौहान ने पूछा।
“पोपा से एक दिन का सफर है।”
“सदूर पर पहुंचकर, मैं इन चीजों के बारे में बात करूंगा।” देवराज चौहान ने पेट और कुर्सी पर बंधी बेल्ट खोलते हुए कहा।
“आकाश गंगा में और भी बहुत अजीब-सी चीजें हैं जो हमारी समझ में नहीं आ रहीं।”
देवराज चौहान कुर्सी से उठते हुए बोला।
“जम्बरा के साथ उन चीजों को देखने जाऊंगा, उसके बाद ही उनके बारे में कोई विचार कायम हो सकेगा। अब तुम पोपा को संभालो। मैं अपने कमरे में जा रहा हूं।”
“जरूरी नहीं कि पोपा के चालक कक्ष में कोई मौजूद हो। दिशा निर्धारित करके हम चालक कक्ष को अकेला छोड़ सकते हैं।”
“मैंने ऐसा सिस्टम तो नहीं बनाया था।” देवराज चौहान के होंठ सिकुड़े।
“ये सिस्टम जम्बरा के बाद मैंने तैयार किया, जब उसने पोपा की उड़ान के दौरान, जरूरत महसूस की।”
देवराज चौहान मुस्कराया और चालक कक्ष से बाहर निकलकर आगे बढ़ गया। कुछ रास्तों को पार करने के बाद वो एक कमरे में पहुंचा जहां रानी ताशा के सारे आदमी, कमरे की दीवारों में फिक्स कर रखी, बेल्टों में जकड़े खड़े थे। कुल बीस-बाईस संख्या थी उनकी।
“बेल्टों को बांधने की जरूरत नहीं रही।” देवराज चौहान बोला-“और जाकर सबसे ये बात कह दो कि वो अब पोपा में घूम-फिर सकते हैं। अपने कार्य कर सकते हैं।”
धरा एक छोटे-से केबिन में, फर्श के साथ फिक्स कुर्सी पर बैठी थी। बेल्ट बांध रखी थी। सामने एक सिंगल बेड बिछा हुआ था। उसके पास ही अटैच बाथरूम का दरवाजा था। रह-रहकर धरा मुस्कराने लगती थी। उसका निचला होंठ टेढ़ा हो जाता और आंखों में चमक भर आती थी। कभी-कभी वो सिर को दाएं-बाएं हिलाने लगती थी। जब पोपा हिलना शुरू हुआ, उसमें कम्पन्न उभरा तो वो हंस पड़ी थी। बच्चों की तरह खुश होकर कह उठी।
‘लगता है पोपा चल पड़ा है खुंबरी। तेरा काम बन गया।’
कई बार पोपा हिला तो कई बार स्थिर हुआ।
“पता नहीं, चला भी है या वहीं का वहीं खड़ा है।’ धरा ने बेचैनी से कहा-’यहां खिड़की भी तो नहीं कि बाहर देख सकूं।’
फिर जब पोपा जोरों से थरथराया और बाद में टेढ़ा होकर सीधा हुआ तो धरा कह उठी।
‘ये पोपा की सैर भी अजीब है। कुछ पता ही नहीं चल रहा। कभी हिलता है तो कभी खड़ा हो जाता है। पर तू क्यों चिंता करती है खुंबरी। तेरी ताकतों ने कहा तो है कि तू सदूर पर जा पहुंचेगी।’
कुछ देर और बीत गई।
“मैं कब तक इस तरह बंधी बैठी रहूंगी। ये तो खुंबरी के लिए सजा ही हो गई।”
फिर वो वक्त भी आया जब रानी ताशा का आदमी दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश हुआ।
धरा सामान्य दिखने लगी।
“सब ठीक है।” वो बोला-“पोपा आसमान में पहुंच गया है।”
“मैं-मैं कुर्सी से उठ सकती हूं?” धरा बोली।
“हाँ।”
धरा उसी पल बेल्ट खोलते कह उठी।
“पोपा आसमान में पहुंच गया है?”
“उससे भी ऊपर, पृथ्वी ग्रह से बाहर निकल चुका है।” वो जाने को हुआ।
“लेकिन पोपा की मंजिल कहां है?”
“तुम नहीं जानती। हम वापस अपने सदूर ग्रह जा रहे हैं।” वो बोला।
“अपने सदूर ग्रह?” धरा मुस्कराई, निचला होंठ टेढ़ा हो गया-“कब तक पहुंच जाएंगे सदूर ग्रह?”
“दस दिन लगेंगे।”
“दस दिन, बस। मैंने तो सैकड़ों बरसों का इंतजार किया है। दस दिन तो चुटकी में बीत जाएंगे।” धरा खुशी से कह उठी।
वो आदमी बाहर निकल गया।
धरा के चेहरे पर तेज चमक फैल गई। निचला होंठ टेढ़ा हुआ। वो हल्का-सा ठहाका लगा उठी।
‘चल खुंबरी सदूर पर। बहुत मजा आएगा वहां। श्राप का वक्त भी खत्म होता जा रहा है। तेरी ताकतें फिर से जीवित हो जाएंगी। पांच सौ साल बाद सदूर पर जाना कैसा लगेगा। बहुत अच्छा लगेगा। मेरा वक्त वापस लौट आएगा। लेकिन उससे पहले मुझे बहुत काम करने होंगे। मेरी ताकतों को ऊर्जा मिलती रहे, इसके लिए बर्तन में पानी भरकर मंत्र पढ़ना है। फिर बर्तन को सुरक्षित रखना है और इस बात का भी ध्यान रखना है कि बर्तन का पानी सूखे नहीं। उसमें मंत्र वाला पानी डालते रहना होगा। अभी तो तूने भी वहां पर जीवित होना है। पांच सौ साल बाद भी तू वैसी ही सुंदर दिखेगी या नहीं? कहीं तेरा हाल खराब तो नहीं हो गया होगा। दोलाम ने तो कहा था कि बढ़िया रसायनों का इस्तेमाल करेगा। शरीर में जरा भी अंतर नहीं पड़ेगा पांच सौ सालों में। मुझे तो अपनी वो ही सुंदरता चाहिए। अगर मेरी सुन्दरता में जरा भी फर्क पड़ा तो दोलाम को बहुत भयानक सजा दूंगी। वो खुंबरी ही क्या, जो सुंदर न हो। मेरी फौज के आधे लोग तो मेरी सुंदरता से प्रभावित होकर ही, मेरा साथ दे रहे थे। ये तो मेरा घातक हथियार है, सुंदर होना। वाह खुंबरी वाह, तेरा भी जवाब नहीं। पर डुमरा जरूर कुछ करेगा।
वो चुप बैठने वाला नहीं। क्या पता उसे भनक लग गईं हो कि खुंबरी वापस आ रही है। वो कहीं छिपा बैठा होगा, पर उसकी शक्तियां उसे सब खबरें दे रही होंगी। अब मैं पहले वाली गलती नहीं करूंगी, वैसे भी मेरी ताकतें जब ऊर्जा पाएंगी तो वो बहुत ही ज्यादा ताकतवर हो जाएंगी। डुमरा को तो खुंबरी मसल कर रख देगी इस बार।” धरा की आंखों और चेहरे पर बहुत ही खतरनाक चमक लहरा रही थी। निचला होंठ टेढ़ा हो चुका था।
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