शाम के छः बज रहे थे ।

आश्रम में आरती समाप्त हो चुकी थी । जाने वाले लोग जा रहे थे । जो लोग स्वामी ताराचंद के प्रवचन से प्रभावित हो गए थे । वो सेवकों से पूछ-पूछकर एक झोपड़े के बाहर कतार लगाकर खड़े हो गए थे । उनमें औरतें भी थी और मर्द भी । ये सब तन से, सेवा करके पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त करना चाहते थे । इस संबंध में झोपड़े में मौजूद साधुओं से बात करना चाहते थे ।

कुल मिलाकर वे चालीस के करीब थे ।

तभी झोपड़े से एक साधु निकला ।

लोग उसे प्रणाम करने को लेटे ।

साधू ने दोनों हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठाए । हिलाए । चेहरे पर मधुर मुस्कान थी ।

"प्यारे श्रद्धालुओं ।" साधु ने प्यार से कहा--- "मुझे खुशी है कि आप सब अपने कर्मों को सुधारते हुए, शरीर का इस्तेमाल करके, आने वाले जन्म में मनुष्य योनि प्राप्त करना चाहते हैं । मनुष्य का जीवन पाने के लिए, भगवान के दिए शरीर को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए । कुछ भी बुरा नहीं होता । हर काम आवश्यकता के अनुसार किया जाता है । कर्म ही जीवन है । जीवन का अंत कहीं भी नहीं है । शरीर का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करके पुनः मनुष्य की प्राप्ति की जा सकती है । जो ऐसा नहीं करते, वो मनुष्य योनि में प्रवेश नहीं कर पाते और जीव का शरीर पा लेते हैं । ये सब शिक्षा स्वामी जी की है जो, मैं आपसे कह रहा हूं ।"

"स्वामी जी की ।"

"जय ।"

"स्वामी ताराचंद ।"

"अमर रहें ।"

"ऐसा मत कहिए । स्वामी जी भी मनुष्य हैं ।" साधु ने टोका--- "आप सब शरीर को कर्मों की राह पर डालना चाहते हैं । परन्तु आवश्यक काम की वजह से, आज मैं आपको समय नहीं दे पाऊंगा । इस बारे में कल बात होगी । जिनके पास समय कम है वो अपना पता छोड़कर जा सकते हैं । जो आश्रम में रुकना चाहे, रुक सकता है ।"

"तभी एक सेहतमंद-स्वस्थ व्यक्ति लोगों की भीड़ में से निकला और साधू के चरणों में जा गिरा ।

"मुझे आशीर्वाद दीजिए स्वामी जी ।" वो कह उठा ।

"भगवान का आशीर्वाद सबके पास रहता है ।" साधू मुस्कुराकर कह उठा--- "हम कौन होते हैं किसी को आशीर्वाद देने वाले ?"

उस व्यक्ति ने साधू के चरणों में उठने की कोशिश नहीं की ।

"तुझे क्या परेशानी है श्रद्धालु ?" साधु ने पहले वाले स्वर में पूछा।

"महाराज ।" उसी प्रकार चरणों में झुके-झुके कह उठा--- "मैं स्वामी ताराचंद के चरणों की धूल माथे पर लगाना चाहता हूं । एक बार मुझे स्वामी जी का सामीप्य मात्र क्षण भर के लिए हासिल हो जाए तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा ।"

"ये तो मामूली बात है । स्वामी जी अपने श्रद्धालुओं के लिए हमेशा हाजिर रहते हैं । कल दिन में तुम स्वामी जी से मिल लोगे । सुबह हमें अवश्य एक बार याद दिला देना।  हम तुम्हें बाद में स्वामी जी के पास ले जाएंगे ।"

वो व्यक्ति उठा । उसने अभी भी हाथ जोड़ रखे थे ।

"धन्य हो । धन्य हो । यहां आकर मुझे तो मुक्ति का रास्ता मिल गया । इसके साथ ही वो व्यक्ति पीछे हटा ।

वो साधू पुनः उन लोगों से अपनी बातें कहने लगा ।

वो व्यक्ति भीड़ से पीछे की तरफ निकला । उसने कमीज पायजामा पहन रखा था । पांवों में कुछ नहीं पहना हुआ था । सिर के बाल गर्दन तक जा रहे थे । चेहरे पर दाढ़ी-मूछें थी । तभी उसे पेड़ के नीचे खड़ा साधू नजर आया तो उसके पास जा पहुंचा और हाथ जोड़कर बोला ।

"भगवान ! रात ठहरने के लिए कोई अच्छी जगह बता दो कि कहां पर विश्राम कर सकूं ।"

"अवश्य श्रद्धालु ।" उसने रास्ते की तरफ इशारा किया--- "इस रास्ते के अंत में कुछ झोपड़े बने हैं । वहां और भी श्रद्धालु हैं । खाने को भी मिलेगा । नहाने को भी ।"

"मैं रास्ता नहीं जानता । आप....।"

तभी पास आता साधू कह उठा ।

"इस श्रद्धालु को भी छोड़ आता हूं ।"

"अवश्य दीनापाल।"

"आओ श्रद्धालु ।" दीनापाल जो कि कैप्टन कालिया था--- "आपको विश्रामगृह तक पहुंचा दूं ।"

वो व्यक्ति कैप्टन कालिया के साथ चल पड़ा । दो-चार कदम आगे जाने पर कैप्टन कालिया ने दबे स्वर में कहा ।

"बाईं तरफ से दाढ़ी ठीक करो । उतर रही है अजबसिंह।"

वो व्यक्ति अजब सिंह ही था । उसने जल्दी से चेहरे पर लगा रखी दाढ़ी को बाईं तरफ से दबाकर ठीक किया । इस तरह कि कोई समझ न सके कि वो दाढ़ी ठीक कर रहा है ।

"ताराचंद से मिलने की बात तुमने क्यों की ?" कैप्टन कालिया ने चलते-चलते पूछा ।

"मैं किस्सा ही खत्म कर देना चाहता हूं ताराचंद का ।" अजब सिंह की आवाज कठोर हो गई ।

"साफ-साफ कहो ।" चलते हुए कैप्टन कालिया ने सामान्य निगाहों से उसे देखा।

"ताराचंद को खत्म कर देना ही अब हमारे लिए बेहतर है । उन लोगों का ड्रग्स का धंधा ताराचंद ने संभाल रखा है । ताराचंद को कुछ हो गया तो उन लोगों का ड्रग्स का धंधा बिगड़ सकता है । ड्रग्स से उन लोगों को तगड़ी आमदनी है । उस पैसे से वे लोग हथियार और आदमी खरीदते हैं ।" अजब सिंह ने शब्दों को चबाकर कहा ।

"ठीक कहते हो । कुछ दिन पहले मुझे खबर मिली कि कश्मीर में एक आतंकवादी संगठन मैडम का ही है। सी.आई.ए. मैडम तक मोटी रकम पहुंचाती है और सामूहिक हत्याकांड या बड़ी वारदात करने को कहती है तो ये काम इन लोगों का खड़ा किया आतंकवादी संगठन करता है । मैडम का एक अलग से डिपार्टमेंट है । जो कि ऐसी वारदातों के बाद ये हवा फैलाता है कि, ये  काम पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने किया है । इन लोगों की पहुंच गई अखबारों तक है । उन अखबारों में भी, पाकिस्तान का नाम लेकर खबरें छप जाती हैं । तब अमेरिका बीच में आता है । और जख्मों पर मरहम लगाता है । कोई सोच भी नहीं सकता कि इनमें से अधिकतर वारदातें अमेरिका करा रहा है।"

"ओह ! लेकिन अमेरिका ये सब क्यों कर रहा है ?"

"दुनिया में दादाई  वाला अपना अस्तित्व कायम रखना चाहता है ।"

"क्या मतलब ?"

"दुनिया के मामलों में दखल देना और फैसले कराना, अमेरिका की आदत है । तभी तो दुनिया के देश उसे पूछते हैं । अमेरिका का दूसरे देशों में दखल देना कम हो जाएगा तो, अमेरिका को कोई बड़ा नहीं मानेगा । इसलिए अमेरिका दुनिया के कई देशों में गड़बड़ियां फैलाता है और फिर ये पूछने पहुंच जाता है कि क्या हुआ ? इसके बाद अपने फैसले उन पर थोप देगा।"

"ऐसा है तो सी.आई.ए.  के कदमों को रोकना होगा ।"

"आसान नहीं है, सी.आई.ए. के कदमों को रोकना ।" कैप्टन कालिया ने सख्त स्वर में कहा--- "सबसे पहले तो ये साबित करना होगा कि अमेरिका की जासूसी संस्था सी.आई.ए. ये सब कर रही है । ये बात ही साबित नहीं की जा सकती ।"

"ठीक कहते हो कालिया । अमेरिका पर सीधे तौर पर उंगली उठाना संभव नहीं हो पाएगा ।"

दोनों रास्ते पर धीमे कदमों पर आगे बढ़ रहे थे । आस-पास से आश्रम के लोग और श्रद्धालु बराबर गुजर रहे थे । कुछ श्रद्धालु जाते-जाते कैप्टन कालिया के चरणों को छू लेते । वो साधुओं के कपड़े पहने हुए था।

"अमेरिका इस समय पूरे तौर पर एशिया की शांति भंग करने में लगा है ।" कैप्टन कालिया ने धीमे स्वर में कहा--- "क्योंकि हमारा देश एशिया में शक्ति बनता जा रहा है । ये बात अमेरिका महसूस कर चुका है । हिन्दुस्तान के पास ताकत हो, वो पसन्द नहीं करता । ऐसे में वो हिन्दुस्तान को घरेलू झगड़ों में उलझाकर कमजोर करना चाहता है। देश का विकास रोकना चाहता है । इस काम में अमेरिका की सी.आई.ए. खुफिया एजेंसी बहुत हद तक सफल भी रही है । लेकिन...।"

"कालिया साहब ।" चेहरा सामान्य था । अजब सिंह का, परन्तु आवाज में खतरनाक भाव थे ।

"कहो ।"

"ये मैडम कौन है ?"

"मैं नहीं जानता । तुम्हारी तरह नाम ही सुना है ।" कालिया ने अजबसिंह के चेहरे पर निगाह मारी।

"मेरे ख्याल से हमें सब काम छोड़कर, मैडम के बारे में पता लगाना चाहिए । मैडम ही है, जो इन सब कामों को अंजाम दे रही हैं।  मैं उसके प्यादों पर हाथ डालता आ रहा हूं । प्यादों के कामों को पूरा नहीं होने देता । लेकिन मेरी चोटों को वो आसानी से सह लेते हैं । बेहतर होगा कि हम उनके संगठन की चीफ मैडम को ढूंढकर खत्म कर दे । ऐसा होते ही संगठन की अधिकतर कार्यवाही ठप्प हो जाएगी । तब बिखरे संगठन को हम और भी बिखेर देंगे ।

कैप्टन कालिया ठिठका । गम्भीर निगाहों से अजब सिंह को देखने लगा ।

"मेरी बात ठीक नहीं लगी ?"

"तुम्हारी बात ठीक है ।" कालिया ने कहा--- "लेकिन ये बात बहुत देर बाद तुम्हारी समझ में आई है ।"

"मैं समझा नहीं ।"

"इस बात पर मैं बहुत देर से काम कर रहा हूं ।"

"ओह ! आप मैडम को तलाश कर रहे हैं ?" अजब सिंह के होंठों से निकला ।

"मैं ही नहीं । मेरे कई साथी भी खामोशी से इस काम पर लगे हुए हैं। मैडम के बारे में हमें कोई भी खबर मिलती है तो उस खबर को अच्छी तरह चैक किया जाता है ।" कैप्टन कालिया धीमे स्वर में कह रहा था--- "लेकिन ये मैडम बहुत ही सतर्क रहने वाली औरत है । अपने निशानों को पीछे नहीं छोड़ती ।"

"मतलब कि मैडम के बारे में मालूम नहीं हो सका ।"

"नहीं । मैडम के संगठन के बहुत लोग हमने पकड़े हैं । छोटे ओहदे वाले भी । बड़े ओहदे वाले भी । सख्त पूछताछ के बाद हम इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि मैडम तक सीधी पहुंच किसी की भी नहीं है । मैडम से बात की जा सकती है । मैडम सबसे बात कर सकती है । परन्तु वो कौन है ? किधर रहती है, कोई नहीं जानता ।"

"ये कैसे हो सकता है ?"

"ये ही सच है । मैडम अपने संगठन के आदमियों को काम बता देती है। उन तक पैसे पहुंचा देती है । जो लोग उन्हें पैसा देने आते हैं, वो किराए के होते हैं । उन्हें भी नहीं मालूम होता कि जो पैकिट, जो बैग वो कहीं पहुंचाने जा रहे हैं । उसमें क्या है । कोई उनसे संबंध बनाता है । काम करने को कहता है । सामान पहुंचाने की एवज में जो पैसे तय होते हैं, वो उन्हें पहले ही मिल जाते हैं ।" कालिया ने कहा ।

कुछ चुप्पी के बाद अजबसिंह ने गम्भीर स्वर में कहा ।

"लेकिन उस मैडम की हकीकत तक पहुंचने का कोई तो रास्ता होगा ।"

"अवश्य होगा । लेकिन अभी तक हम उस रास्ते तक पहुंच नहीं पाए । एक दिन हम मैडम तक पहुंचेंगे अवश्य ।"

अजबसिंह कुछ नहीं बोला ।

"मैडम की खबरें हम तक कम ही पहुंचती हैं, परन्तु हम लोगों की ज्यादातर खबरें मैडम के संगठन के पास पहुंच जाती हैं । इससे कई बार शक होता है कि हमारा कोई आदमी मैडम तक या उसके आदमियों तक खबरें पहुंचाता है।"

"ओह ! ऐसा हो सकता है । पैसे के लालच में किसी की नियत खराब भी हो सकती है ।"

दोनों फिर चलने लगे ।

"कालिया साहब । ताराचंद की मौत से शायद कोई नई बात सामने आए । मैं उसे कल खत्म कर दूंगा ।"

"खतरा है अजबसिंह । ये उसकी जगह है । उसे मारकर बच निकलना आसान नहीं ।"

"खतरों का डर मुझे मत दिखाइए ।" अजबसिंह का स्वर सख्त हो गया--- "मैं सब संभाल लूंगा ।"

कालिया ने गम्भीर निगाह उस पर मारी ।

"जो तुम ठीक समझो । करो । परन्तु ये काम बहुत खतरनाक है ।"

"मेरी सोचों के मुताबिक ताराचंद को खत्म करना जरूरी है । ताराचंद की मौत से मैडम के कई काम रुकेंगे । वो परेशान होगी ।" अजब सिंह ने धीमे स्वर में कहा--- "लेकिन आप यहां पर कैसे पहुंच गए ?"

"प्यारेलाल को जानते ही हो ।"

"जो ड्रग्स का काम ।"

"हां । वो ही । वो ताराचंद से बहुत बड़ा सौदा कर रहा है ड्रग्स का । प्यारेलाल के आदमी से ही खबर मिली थी । तो मैं अन्य आश्रम का साधू बना, यहां पहुंच गया । मेरे और भी आदमी यहां हैं । प्यारेलाल पर हाथ डालना है हमने । शायद उससे मैडम के बारे में कुछ पता चल सके ।"

"तो आप आश्रम में ही हैं ।"

"हां । अब कल सुबह मुलाकात होगी ।"

"कल मैं ताराचंद के करीब पहुंचने की कोशिश करूंगा । उसे खत्म करने के लिए ।" अजबसिंह के होंठों से गुर्राहट निकली ।

कैप्टन कालिया ने गम्भीर निगाहों से उसे देखा । कहा कुछ नहीं।

दोनों आश्रम के विश्राम गृह के झोपड़े के पास पहुंच गए थे ।

■■■

भून्तर के होटल में, कमलेश ।

शाम के चार बज रहे थे ।

राकेश जोगिया को कमलेश ने अभी किसी काम के लिए बाहर भेजा था । खुद खिड़की पर आ खड़ी हुई थी । कुछ देर बाद उसने राकेश जोगिया को कार पर, होटल से बाहर निकलते देखा तो कमलेश खिड़की से हटी और टेबल के पास पहुंचकर ड्रॉअर में से दांतों वाला खतरनाक-सा दिखाई देने वाला चाकू निकाला और साड़ी में, कमर के पास छिपाकर कमरे से बाहर निकलकर शांत भाव से आगे बढ़ने लगी ।

रास्ते में मिलने वाले होटल के कर्मचारी ठिठककर उसे सलाम करते।

कमलेश सिर हिलाकर आगे बढ़ती रही ।

कुछ देर बाद होटल के बेसमेंट के ऐसे हिस्से में पहुंची, जहां खास कैदियों को रखा जाता था । वहां कोई पहरेदार नहीं था । सामने लोहे का मजबूत दरवाजा बंद था । कमलेश ने साड़ी में फंसा रखी, वो चाबी निकाली जो उसने चोरी-छिपे कभी छाप लेकर बनाई थी । उससे वो दरवाजा खोला और भीतर प्रवेश करके दरवाजा बंद कर लिया । चाबी वापस फंसा ली । फिर आगे बढ़ी । चेहरे पर कठोरता आ ठहरी थी ।

ये छोटा सा हॉल था और वहां आठ दरवाजे लगे नजर आ रहे थे । जो कि बंद थे । कमलेश एक-एक करके सब दरवाजों को खोलकर चैक करने लगी । चौथा दरवाजा खोलते ही ठिठक गई ।

सामने कुर्सी पर बज्जू बैठा था।

इसके अलावा वहां सिंगल बैड और टी.वी. फ्रिज था ।

कमलेश कुछ पल दरवाजे पर खड़ी उसे देखती रही । बज्जू उसे देखते ही उठ खड़ा हुआ ।

कमलेश आगे बढ़ी और छोटे से तंग कमरे में पहुंच कर खड़ी हो गई ।

"आपको यहां देखकर हैरानी हो रही है ।" बज्जू कह उठा ।

"पहचानते हो मुझे ?" कमलेश का स्वर शांत था ।

"जी हां । आप, अजब सिंह की पत्नी हैं ।

कमलेश के होंठों पर कड़वी मुस्कान उभरी ।

"मैं कुछ और भी हूं बज्जू ।"

बज्जू की आंखें सिकुड़ी ।

"और ? और क्या हैं ?"

"पहचानो। मेरी आवाज ध्यान से सुनो । तुमने लता के साथ, मेरे से दो बार बात की थी ।"

"मैंने बात की ?" बज्जू ने अजीब से स्वर में कहा--  "मैं तो आपको पहली बार अपने सामने देख...।" कहते-कहते बज्जू के शब्द होंठों में ही रह गये । चेहरे पर हैरानी उभरने लगी । आंखें फैलती-सी दिखाई देने लगी ।

कमलेश की तीखी निगाह उस पर ही थी ।

"पहचान लिया ?" बज्जू के चेहरे के बदलते भावों को देखकर, कमलेश शांत स्वर में बोली ।

"आप...आपकी आवाज मैडम-मैडम की आवाज से मिलती है ।" बज्जू के होंठों से निकला।

बज्जू हक्का-बक्का सा नजर आने लगा ।

"इतने हैरान होने की जरूरत नहीं ।"

"आप-आप तो अजब सिंह की पत्नी हैं ।" बज्जू अभी तक हैरान था ।

"पत्नी अपनी जगह हूं । मैडम अपनी जगह हूं ।" कमलेश ने शब्दों को चबाकर कहा ।

"बज्जू की हैरानी अभी तक कम नहीं हुई थी ।

"बज्जू ।" कमलेश के स्वर में वो ही भाव आ गए, जो मैडम के तौर पर बात करते हुए आते थे ।

"जी-जी। यस मैडम ।" बज्जू ने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा ।

"यहां क्या कर रहे हो ?"

"गड़बड़ हो गई थी मैडम । मामला ठीक करने की कोशिश कर रहा हूं ।"

"पूरी बात कहो ।"

"मैडम थाईलैंड से बीचपॉम नाम का जो जहाज दिल्ली आ रहा था । उसमें से सामान ।"

"सब मालूम है मुझे । आगे कहो ।" कमलेश ने टोका ।

"उस काम के लिए मोना चौधरी जैसे इश्तहारी मुजरिम को एक करोड़ में तैयार किया था । परन्तु जब वो काम के लिए निकली तो रास्ते में उसका एक्सीडेंट हो गया था । तब यही समझा गया कि मोना चौधरी एक्सीडेंट में मारी गई । तब मैंने फैसला किया कि अजब सिंह को ही खत्म कर दिया जाए तो ।"

"तुम्हें लता ने जहाज तबाह करने को कहा था ।" कमलेश कह उठी ।

"हां ।" बज्जू ने गम्भीरता से सिर हिलाया--- "लेकिन जहाज में दो-ढाई हजार लोग थे । ऐसे में जहाज को रास्ते में तबाह करना ठीक नहीं था तो मैंने अजब सिंह को खत्म करने का फैसला किया ।"

"तो तुम यहां आ गए ।"

"हां ।" बज्जू ने सिर हिलाया--- "मैं यहां आ गया । अजब सिंह को झूठ-सच सुनाकर, यहां पर रहने का रास्ता बना लिया । मन में यही था कि मौका मिलते ही अजब सिंह को खत्म कर दूंगा । परन्तु अजब सिंह किसी काम के लिए भून्तर से बाहर चला गया ।"

"अब इस इंतजार में होगे जब वो वापस आएगा, तो उसे खत्म करोगे।"

"सोचा तो यही था, लेकिन अजब सिंह के इंतजार की अब जरूरत नहीं रही ।"

"अब क्या हुआ ?" कमलेश की आंखें सिकुड़ी ।

"मोना चौधरी, जिसे मैं मरा समझ रहा था, वो मुझे इसी होटल में मिली ।

"इसी होटल में ?"

"जी हां ।" बज्जू की निगाह मैडम के चेहरे पर ही थी--- "आपके बेटे संजीव सिंह के साथ थी मोना चौधरी ।"

"सुधा ?" कमलेश के होंठों से निकला ।

"कौन सुधा ?"

"जिससे संजीव सिंह शादी करने का फैसला कर चुका...।"

"मैडम ! मोना चौधरी है । संजीव सिंह को अपने जाल में फंसाना उसके लिए मामूली काम है और मामूली काम को अंजाम देकर यहां पहुंच गई ।" बज्जू बोला--- "मुझे नहीं मालूम था कि अजब सिंह आपके पति...।"

"मालूम होता तो तब क्या करते बज्जू ?"

"तब में अजबसिंह की मौत का इंतजाम न करता ।"

"जिस तरह मैं अजब सिंह की पत्नी हूं उसी तरह अपने संगठन की बड़ी भी हूं । मेरे लिए दोनों चीजें जरूरी है । लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मैं संगठन को बर्बाद होने दूंगी । भविष्य में अगर अजबसिंह संगठन को तबाह करता तो क्या मैं उसे रोकती ? नहीं रोकती । वो अपना काम कर रहा है, मैं उसे क्यों रोकूं । इसी तरह संगठन का कोई आदमी संगठन के हक में काम कर रहा है तो उसे भी रोकूंगी नहीं।"

"मतलब कि अजबसिंह की मौत पर आपको कोई एतराज नहीं होगा ।"

"नहीं । बशर्ते कि उसे संगठन के हक में खत्म किया जाए ।"

"ओह ।"

"होटल में मोना चौधरी से क्या बात हुई ?" कमलेश बोली । 

"हमारा एक करोड़ उसकी तरफ था । उसी करोड़ के बदले मैंने उसे कहा कि वो अजब सिंह को खत्म करे। साथ ही उसे बता दिया कि वो कहीं बाहर गया है । तब मोना चौधरी ने मालूम कर लिया कि अजबसिंह कहां गया है । वो आपके बेटे के साथ उसके पीछे-पीछे चली गई वो यकीनन उसे खत्म करके ही आएगी।"

कमलेश का चेहरा कठोर हो गया ।

"तुम यहां ठहरे क्या कर रहे हो ?"

"मैडम ! सच बात तो ये है कि मैं अजबसिंह की मौत की खबर का इंतजार कर रहा हूं । उसके मरते ही राकेश जोगिया मुझे जाने को कह देगा । यानी कि मैं अपना काम निपटाकर आजाद हो जाऊंगा । अजब सिंह की मौत से हमें आराम मिलेगा । उसकी वजह से हमें अक्सर नुकसान होता रहता है । वो हमारे लिए परेशानियां खड़ी करता रहता है ।"

कमलेश बज्जू को देखती रही ।

"मैडम ! अजबसिंह किस संगठन के लिए, किन लोगों के लिए काम करता है, ये तो आपको मालूम होगा ।"

"नहीं ।" कमलेश की आंखों में सर्द भाव आ ठहरे थे--- "ये नहीं मालूम हो सका । अजब सिंह का संगठन सतर्कता कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल करता है । अजबसिंह भी उन लोगों के बारे में ज्यादा नहीं बताता । कुरेद कर पूछना गलत होगा । अजब सिंह को शक हो सकता है कि...।"

"समझ गया मैडम।"

आंखों में सर्द भाव समेटे कमलेश ने साड़ी में फंसा चाकू निकाला और उसे खोला ।

बज्जू की आंखें सिकुड़ी ।

कमलेश के चेहरे पर मौत के भाव नजर आने लगे थे ।

"ये...ये क्या-मैडम ?" बज्जू कभी चाकू को देखता तो कभी उसके चेहरे को । आंखों में शक आ ठहरा था ।

"गड़बड़ ये है बज्जू कि मेरी असलियत कोई नहीं जानता और तुम जान गए हो ।" कमलेश ने सर्द स्वर में कहा ।

"तो...तो क्या हो गया मैडम । मेरे से कोई बात बाहर नहीं जाएगी ।" बज्जू ने जल्दी से कहा--- "मैं तो आपका बरसों पुराना वफादार-राजदार हूं । मैं क्यों किसी को बताऊंगा कि मैडम कौन है ?"

"मुझे मालूम है कि तुम सच कह रहे हो । लेकिन जब रिवॉल्वर गर्दन से लगी हो तो मैंने बड़ी-बड़ी वफादारियां को मिट्टी में मिलते देखा है । तब पत्थर भी सच्चाई उगल देते हैं ।"

"न...नहीं मैडम । मुझ पर विश्वास रखिए । मैं उनमें से नहीं हूं । मैं तो आपके लिए जान भी दे सकता हूं ।"

"सच ?" कमलेश की आंखों में खतरनाक चमक उभर आई।

"हां मैडम । आप जब चाहें, आजमाकर देख लीजिए ।"

"गुड । तुम जैसे लोग कम ही होते हैं बज्जू । अपनी आंखें बंद करो ।" कमलेश कहर से मुस्कुराई ।

"ज...जी...?"

"अपनी आंखें बंद करो । जब कहूं, तब खोलना।"

बज्जू ने एक निगाह कमलेश के हाथ में पकड़े चाकू पर मारी फिर होंठों पर जीभ फेरकर आंखें बंद कर लीं । कमलेश कहर भरी निगाहों से उसे देखती रही । फिर एकाएक ही झपट्टा मारा और दांतेदार चाकू उसकी आधी गर्दन को काटता हुआ बाहर निकल गया।

बज्जू के शरीर को झटका लगा । आंखें खुली । पुतलियों में हैरानी थी । तभी उसका शरीर शिथिल होता हुआ मुड़ा और तेज आवाज के साथ नीचे जा गिरा । गर्दन कट जाने की वजह से एक तरफ घूमी हुई थी । आंखें फटकर, खाली दीवार की तरफ सट थी । गर्दन से खून निकल कर फर्श पर बह रहा था।

कमलेश दांत भींचे आगे बढ़ी और एक दरवाजा धकेलकर भीतर प्रवेश कर गई । वो बाथरूम था । पानी से उसने खून में डूबा चाकू और हाथ धोए । फिर चाकू को बंद करके वापस साड़ी में फंसाया । खून के छींटे साड़ी पर कहीं भी नहीं गिरे थे । वो बाथरुम से बाहर निकली और बज्जू की लाश को देखे बिना वहां से बाहर आ गई।

कमलेश बेसमेंट से बाहर निकली । लोहे के उस दरवाजे को पहले की तरह हर लॉक करके, होटल के रास्तों को पार करती हुई, उस कमरे में पहुंची, जो उसका प्राइवेट कमरा था । दीवारों में किताबों के रैक के पीछे छिपाकर रखे वायरलैस सैट का हैडफोन उठाकर सिर पर रखा और संबंध बनाने लगी।

चार-पांच मिनट लगे, लाइन मिलने में ।

बात हुई । दूसरी तरफ स्वामी ताराचंद था ।

"ताराचंद ।"

"यस मैडम ।" ताराचंद का सतर्क स्वर कानों में पड़ा।

"वहां पर कैसा चल रहा है ?"

"ठीक है मैडम ।"

"अजबसिंह तुम्हारे आश्रम के आस-पास ही कहीं है ।"

"अभी तक ऐसी कोई खबर नहीं मिली ।"

"सतर्क रहो ।"

"जी मैडम ।"

"अजब सिंह का लड़का, संजीव सिंह, मोना चौधरी के साथ तुम्हारे आश्रम तक पहुंच चुका है ।"

"मोना चौधरी...?"

"इश्तहारी मुजरिम मोना चौधरी । वो वहां अजब सिंह को खत्म करने आई है।"

"ओह ।" ताराचंद का सोच भरा स्वर कानों में पड़ा--- "मोना चौधरी का हुलिया क्या है मैडम ?"

कमलेश ने बताया । फिर कहा ।

"कोई बात है क्या ?"

"यस मैडम ! आश्रम के एक साधू की जंगल में एक लड़के-लड़की ने पिटाई की है । वो मेरे और आश्रम के बारे में पूछताछ कर रहे थे । मेरा साथी किसी तरह जान बचाकर भाग आया ।"

"वो संजीव और मोना चौधरी हो सकते हैं ।"

"यस मैडम !"

"ताराचंद ! अजबसिंह के लड़के को कुछ मत करना । उससे हमें कई काम लेने हैं ।" कमलेश ने कहा ।

"यस मैडम ।"

"मोना चौधरी पर नजर रखो । वो तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी । अजबसिंह को खत्म करेगी । उसे एक करोड़ रुपया देकर बज्जू ने अजबसिंह को खत्म करने भेजा है ।" कमलेश का स्वर बेहद शांत था ।

"फिर तो मोना चौधरी अपने साथ ही हुई ।"

"कुछ वक्त के लिए । सतर्क रहना । जो भी नई खबर हो, मुझे बताना ।"

"जी ।"

कमलेश ने वायरलैस सैट ऑफ किया । और चेहरे पर गम्भीरता नजर आ रही थी।

■■■

संबंध-विच्छेद होते ही स्वामी ताराचंद ने वायरलैस सैट की पेटी बंद की और इसी प्रकार श्रद्धानंद को बुलावा भेजा । श्रद्धानंद फौरन दौड़ा-दौड़ा आया । मन में डर था कि कहीं ताराचंद को ये तो पता नहीं चल गया कि उसने, उस युवक-युवती को उसके काम-धंधों और आश्रम के बारे में बताया है ?

साथ में मुनीराम भी था।

"कहिए स्वामी जी ।" हाथ जोड़कर श्रद्धानंद ने धड़कते दिल से पूछा ।

"श्रद्धानंद । तुमने उस युवक-युवती को अच्छी तरह देखा था, जिन्होंने तुम्हारी पिटाई की ?"

"बहुत अच्छी तरह स्वामी जी । उन बेवकूफों को तो मैं कभी भी नहीं भूल सकता ।"

"युवती का हुलिया बताओ । देखने में वो कैसी लगती है ?"

श्रद्धानंद ने शब्दों में मोना चौधरी की तस्वीर जाहिर कर दी ।

स्वामी ताराचंद के चेहरे पर सख्ती आ गई ।

"क्या हुआ स्वामी जी ?" अब तक खामोश खड़ा मुनीराम कह उठा ।

उसकी बात पर ध्यान न देकर स्वामी ताराचंद ने श्रद्धानंद से कहा ।

"श्रद्धानंद ! तुम उन दोनों को पहचानते हो । वे कभी भी आश्रम में आ सकते हैं । देखते ही मुझे खबर करना ।"

"जी ।"

"अजबसिंह को कहीं भी देखो तो फौरन मुझे खबर करो । इस बारे में सबको सतर्क कर दो ।"

"ये काम मैं अभी करता हूं ।"

"जाओ ।"

श्रद्धानंद बाहर निकल गया ।

स्वामी ताराचंद ने मुनीराम को देखा ।

"क्या हुआ स्वामी जी ?"

"मुनीराम ! श्रद्धानंद की पिटाई करने वाले युवक-युवती मोना चौधरी और संजीव सिंह हैं । मोना चौधरी खतरनाक इश्तहारी मुजरिम हैं और संजीव सिंह, अजय सिंह का बेटा है । मैडम से अभी बात हुई है । ये सब बातें मैडम ने ही बताई है। मोना चौधरी अजब सिंह की हत्या करने आई है । अजब सिंह हमारे आश्रम में या आसपास ही कहीं है । मोना चौधरी को एक करोड़ रुपया देकर बज्जू ने इस काम के लिए तैयार किया है ।" स्वामी ताराचंद ने सोच भरे स्वर में कहा ।

"ओह ।" मुनीराम बोला--- "ऐसी बात है तो मोना चौधरी ने अजबसिंह के बेटे को साथ क्यों रखा हुआ है ?"

"खास ही वजह होगी । वरना मोना चौधरी उसे साथ क्यों रखेगी ?"

"ये बात तो ठीक कही, स्वामी जी ।"

"हमें सावधान रहना होगा । यहां के हालात खतरनाक भी हो सकते हैं । इस बात का भी हमें पूरा ध्यान रखना है कि अजबसिंह को खत्म करते हुए शोर-शराबा पैदा ना हो ।" स्वामी ताराचंद ने धीमे स्वर में कहा ।

"मोना चौधरी बेवकूफ तो है नहीं, जो शोर होने देगी । बज्जू ने उसे भेजा है तो वो हमारी दुश्मन नहीं है ।"

स्वामी ताराचंद उठा और टहलने लगा ।

"मेरे लायक आज्ञा स्वामी जी ?"

"आश्रम में नजर रखो । यकीनन अजबसिंह पास ही कहीं हैं ।" स्वामी ताराचंद ने दृढ़ स्वर में कहा।

"जी ! प्यारेलाल आने वाला है । आज वो ड्रग्स की सौदेबाजी करेगा ।"

"वो जब आए उसे, मेरे पास ले आना । तुम अजबसिंह को तलाश करो ।"

मुनीराम बाहर निकल गया।

■■■

मोना चौधरी ने मेकअप से खुद को पूरा ही बदल लिया था । सिर के बीचों-बीच जूड़ा उठा हुआ था । स्कर्ट और स्लीवलैस टॉप पहन रखा था । टॉप बहुत छोटा था और देखने वाले की आंखें अटक जाती । नग्न बांहों पर दोनों तरफ उसने सांप और राक्षस के चेहरों जैसा टैटू लगा लिए थे । छोटे-छोटे तीन टैटू चेहरे पर भी लगा लिए थे । एक माथे पर, दो गालों पर । आंखों में काजल और होंठों पर बैगनी रंग की लिपस्टिक चमक रही थी । स्कर्ट में से, टांगों के मसल्स का उभार आकर्षित कर रहा था । कानों में लंबे झुमके और नाक में छोटा-सा छल्ला लगा लिया था । साथ ही किया था, चेहरे का मेकअप ।

कुल मिलाकर, उसका चेहरा बहुत बदल गया था।

पांवों में कुछ नहीं पहना था ।

वो आवारागर्दी-हिप्पी जैसी युवती लग रही थी जो कि यहां-वहां घूमती रहती हो । कंधे पर पुराना-सा थैला लटका रखा था, उसमें सामान पड़ा महसूस हो रहा था ।

शाम के सात बज रहे थे, जब वो पैदल ही आश्रम के मुख्य द्वार पर पहुंची । कुछ दूर एक बस खड़ी नजर आ रही थी । दूसरी तरफ पांच-छः कारें खड़ी थी । मुख्य द्वार के बाहर दो साधू बैठे थे, जो कि आने-जाने वालों की तरफ देखते और हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठा देते ।

मोना चौधरी उनके पास पहुंची ।

एक साधू ने उसे देखकर आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया । मोना चौधरी एकाएक मुस्कुराई और पास आकर थैला रखते हुए उनके पास बैठते हुए कह उठी ।

"सुनाओ यार, क्या हाल है ?"

"यार ?" एक साधू के होंठों से निकला ।

"तुम लोग किस्मत वाले हो, जो इतनी बढ़िया जगह रहते हो ।" मोना चौधरी दोस्ताना भाव में बोली--- "मुफ्त रहने-खाने के साथ तनख्वाह भी मिलती होगी । यहां का खुला मौसम-ठंडी हवा...।"

"कैसी बातें कर रही हो बालिका ?"

"बालिका ?" मोना चौधरी हंसी--- "छोड़ो यार इन बातों को । गांजे वाली सिगरेट पिला ।"

"गांजे वाली ?" दूसरे साधू के माथे पर बल पड़े ।

"अगर तुम गांजे वाली सिगरेट या चिलम नहीं पीते तो फिर असली साधू ही नहीं । हरिद्वार में मैं ढाई साल साधुओं के बीच रही । वहां कितने अच्छे साधू थे । सुल्फा-गांजा-चरस-अफीम खुद भी पीते और मुझे भी पिलाते थे । मजे ही मजे थे वहां । मेरा तो वहां से आने का मन ही नहीं था ।" मोना चौधरी ने कहते हुए दोस्ताना भाव में घुटने पर हाथ मारा।

दोनों साधुओं की नजरें मिली । फिर मोना चौधरी को देखा ।

"ऐसी बात है तो हरिद्वार से आई हो क्यों ?"

"आना पड़ा यार । गड़बड़ हो गई । सच बात तो ये है कि हरिद्वार से ही भागना पड़ा ।" कहते हुए मोना चौधरी का स्वर धीमा हो गया--- "पुलिस ने उन सब साधुओं की जगह को घेर लिया था । मैं भी वहीं थी । तब पता चला कि उन साधुओं में से कुछ साधु बहुत बड़े गुंडे-बदमाश थे । उस चक्कर में दूसरे साधू भी पकड़े गए । मैं बचकर भाग आई।"

दोनों की निगाहें मिली ।

"वो साधू पाखंडी होंगे ।" एक ने कहा ।

"जो भी कहो, वो सब साधू थे मजेदार । खाओ-पियो मस्त रहो । कोई फिक्र नहीं । चिंता नहीं ।" कहते हुए मोना चौधरी ने मुस्कुराकर मस्ती में दोनों हाथ उठाए--- "उन्हें मैं कभी भी नहीं भूल पाऊंगी ।"

"यहां का पता तुम्हें किसने दिया ?"

"किसने क्या, उन्हीं साधुओं से पता चला था । वो आपस में बात करते थे कि इस आश्रम के स्वामी के यजमान बहुत हैं। भेंट भी बहुत आती होगी । अगर यहां काम मिल जाए तो बहुत अच्छा होगा। कुछ साधुओं ने तो यहां आने का प्रोग्राम भी बनाया था । लेकिन पुलिस का छापा ऐसा पड़ा कि पूछो मत । उसके बाद मैं घूमती-फिरती यहां आ गई । सच में बहुत अच्छी जगह है । ये बातें बाद में । एक सिगरेट तो पिला सुल्फे वाली ।"

"सुल्फे वाली ?"

"सुल्फे वाली नहीं तो अफीम-गांजा-चरस वाली ।" मोना चौधरी ने धीमे स्वर में कहते हुए उसके घुटने पर हाथ मारा--- "कोई भी पिला । पिला दे यार...।"

"दोनों साधुओं की नजर मिली । आंखों ही आंखों में इशारे हुए । फिर एक ने सिर पर बांध रखे साफे में से सिगरेट निकालकर मोना चौधरी को दी । साथ में माचिस भी ।

"एक ही । तुम नहीं पियोगे ?"

"सबके सामने पीने से स्वामी जी ने मना किया है । हमें जब पीनी होती है तो हम उधर पेड़ों के पीछे चले जाते हैं ।"

"समझ गई।  समझ गई।" मोना चौधरी ने सिगरेट होंठों से लगाई--- "मैं तो सूटा खींच लूं ।" इसके बाद सिगरेट सुलगाकर उसने तगड़ा कश लिया--- "वाह मजा आ गया । कौन-सा माल है इसमें ?"

"चरस ।" एक साधू ने धीमे से कहा।

"चरस की सिगरेट तो पहले भी पी । लेकिन ये उम्दा किस्म की चरस है । असली माल लिया है, कहीं से ।" कहते हुए पुनः कश लिया मोना चौधरी ने--- "ऐसा बढ़िया स्वाद पहले नहीं आया ।"

"चरस खरीदने हमें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता ।" दूसरा साधू कह उठा--- "स्वामी जी से हमें माल मिल जाता है ।"

"स्वामी जी से ?"

"हां । स्वामी जी अपने सेवकों पर बहुत मेहरबान रहते हैं । सेवकों की हर जरूरत पूरी करते हैं । स्वामी जी के श्रद्धालु ये सब चीजें स्वामी जी को भेंट दे जाते हैं और स्वामी जी खुले दिल से हम लोगों को दे देते हैं ।"

"फिर तो स्वामी जी बहुत अच्छे हैं ।" मोना चौधरी कश लेकर कह उठी--- "सुनो, मुझे भी आश्रम में जगह दिलवा दो ।"

"तुम्हें ?" मैं बाकी की जिंदगी आश्रम में बिता दूंगी । लो, कश लगाओ ।" मोना चौधरी ने सिगरेट उनकी तरफ बढ़ाई ।

"सबके सामने हम सिगरेट नहीं...।"

"लगा लो । कौन परवाह करता है । सब पीते हैं ।"

एक साधू ने सिगरेट पकड़ी और कश लेने लगा ।

अंधेरा घिरने लगा था ।

"मुझे भी आश्रम में लगवा दो । यहीं रहकर छोटा-मोटा काम कर दिया करूंगी । कितनी अच्छी जगह है ये। जब यहां भी छापा पड़ेगा तो भागकर, कहीं और चली जाऊंगी ।"

"स्वामी जी के श्रद्धालु बहुत ऊंची पहुंच वाले हैं । यहां छापा नहीं पड़ सकता ।"

"फिर तो और भी बढ़िया बात है ।" मोना चौधरी मुस्कुराकर बोली ।

"तुम साधुओं की टांगे दबाने का काम यहां कर लेना ।"

"टांगे दबाने का ?"

"हां । हम दिन भर के थके होते हैं । रात को हमें आराम दे देना, टांगे दबाकर।"

मोना चौधरी ने दोनों पर निगाह मारी, फिर सिर हिलाकर कह उठी ।

"मैं समझ गई ।"

"क्या ?"

"पूछो मत । टांगे दबा दूंगी । बोलो-आज से ही शुरु करूं ये काम ।"

दोनों साधुओं की नजरें मिली ।

"क्या कहता है, टांगे दबवा लें ?" एक ने दूसरे से पूछा ।

"बेवकूफी मत कर । स्वामी जी गुस्सा हो जाएंगे । आज्ञा के बिना हमें कोई काम नहीं करना है ।"

"तो ?"

"सुबह स्वामी जी को खबर कर देंगे, इसकी इच्छा के बारे में । वो इससे बात कर लेंगे ।

"ठीक है ।"

मोना चौधरी उन दोनों को देख-सुन रही थी ।

"तुम रात आराम से बिताओ ।" साधू ने मोना चौधरी से कहा--- "सुबह बात करेंगे ।"

"रात कहां रहूं ?"

"भीतर चली जाओ । अतिथिशाला को पूछ लेना । वहीं आराम से रहना । खाना-पीना मिलेगा।"

"ठीक है । सुबह बातें करेंगे ।" मोना चौधरी उठी और थैला उठाकर आश्रम के गेट से भीतर प्रवेश कर गई ।

अंधेरा होने के बाद चहल-पहल कुछ कम हो गई थी । झोपड़ियों या झोपड़ी में प्रकाश होने लगा था । मोना चौधरी पूछते-पूछते अतिथिशाला में जा पहुंची । वो सतर्क थी । उसकी पैनी निगाह हर चीज को देख-परख रही थी। वहां मौजूद लोगों में जल्दी ही मित्रता हो गई और बातों-बातों में जान लिया कि इस तरफ बना पक्का मकान स्वामी जी का है । नीचे वे प्रवचन देते हैं और ऊपर आराम करते हैं । कुछ ही देर में उसने, संजीव सिंह को देखा । दोनों की नजरें मिली । संजीव सिंह के चेहरे पर लंबी-लंबी मूंछे नजर आ रही थी । सिर पर विग डालने की वजह से बाल, गर्दन तक लटक रहे थे। एक निगाह में, उसे पहचानना आसान नहीं था ।

कुछ देर बाद मोना चौधरी और संजीव सिंह अकेले में मिले ।

■■■

"कोई खतरा तो नहीं आया, यहां पहुंचने में ?" संजीव सिंह ने पूछा ।

"सब ठीक रहा।"

"मैं भी आसानी से भीतर आ गया ।"संजीव सिंह ने इधर-उधर देखते हुए गम्भीरता से कहा--- "एक साधू मुझे यहां तक छोड़ गया। उधर, पीछे वाले हिस्से में खाना तैयार है । उधर जाकर खाना खाया जा सकता है । रोशनी के लिए यहां जनरेटर और गैस का इस्तेमाल किया गया है।"

मोना चौधरी ने हर तरफ नजर मारी । झोपड़ी से फूटती रोशनियां शहर जैसा या किसी मेले जैसा माहौल बना रही थी, यहां का । वातावरण मन को सुकून देने वाला था ।

"अब क्या करना है ?" संजीव सिंह ने पूछा ।

"कल स्वामी ताराचंद तक पहुंचने की चेष्टा करूंगी ।

"उससे बात क्या करोगी ?"

मोना चौधरी ने संजीव सिंह को देखा ।

"हम यहां पापा को बचाने और उन्हें ले जाने आए हैं ।" संजीव सिंह बोला।

"हां । तुम्हारे पापा को भी तलाश कर लेंगे और स्वामी ताराचंद को मैं इस तरह की गलत हरकतें नहीं करने दूंगी । उसे भी सबक सिखाना जरूरी है । ड्रग्स का धंधा करके वो...।"

"सुधा ! क्या तुम बेकार के कामों में पड़ रही ?"

"नहीं संजीव ! तुम्हें बता चुकी हूं कि ये सब करना भी जरूरी है और तुमने कहा था कि तुम मेरा साथ दोगे ।"

"मैं पीछे नहीं हट रहा । तुम्हारे साथ कदम से कदम मिलाकर ही चलूंगा ।"

"तो तुम अपने पापा को ढूंढो और तब तक मैं स्वामी। स्वामी ताराचंद को देखती...।"

"सुधा ! एक आदमी मुझे पापा जैसा लगा है ।"

"कहां ?"

"विश्राम गृह में ही।" संजीव सिंह गम्भीर स्वर में बोला--- "उसने दाढ़ी-मूंछ लगाकर हुलिया बदला हुआ है । मैंने उसे चलते देखा तो लगा जैसे वो पापा ही हैं । चेहरे पर से भी ऐसा ही लगता है । आंखों से भी । उसने भी मुझे देखा । तब मुझे लगा कि वो मुझसे बात करने के लिए मेरे पास आने वाला है । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । वो दूसरे विश्राम गृह में चला गया।"

"ये कब की बात है ।" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी ।

"आधा घंटा हो गया । शायद वो आदमी पापा न हो ।" संजीव सिंह का स्वर धीमा गम्भीर  था ।

"तुम जानते हो कि तुम्हारे पापा यहीं आए हैं तो वो तुम्हारे पापा हो सकते हैं । असली चेहरे में यहां आने का खतरा वो कभी भी नहीं उठाएंगे ।" मोना चौधरी ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा--- "उस आदमी को चैक करना जरूरी है ।"

दो पलों के लिए उनके बीच खामोशी रही।

"मुझे उस झोपड़े में ले चलो । जहां तुम्हारे पापा जैसा आदमी गया है ।"

"आओ ।"

"तुम आगे चलो । हमारा साथ-साथ जाना ठीक नहीं । कोई शक कर सकता है ।"

संजीव सिंह आगे चल पड़ा ।

मोना चौधरी लापरवाही से, कुछ फासला रखकर उसके पीछे चल पड़ी ।

खाने का समय हो रहा था । इस वजह से झोपड़ों में भीड़ कम थी।  लोग खाने के लिए उधर चले जाते, जिधर खाना चल रहा था । वो आते तो दूसरे चले जाते । ये सारे काम दो साधुओं की देख-रेख में हो रहा था ।

संजीव सिंह एक झोपड़े के बाहर ठिठका । पलटकर पास आती मोना चौधरी को देखा । जब वो पास आई तो वो धीमे स्वर में कह उठा।

"उसने आधी बाजू के सफेद जैसी टी-शर्ट पहन रखी है । वो इसी झोपड़े में है ।"

मोना चौधरी रुकी नहीं । भीतर प्रवेश करती धीमे स्वर में कह उठी ।

"मैं उसे चैक करती हूं।"

मोना चौधरी ने भीतर प्रवेश किया और ठिठक गई ।

वहां करीब अट्ठारह-बीस लोग थे । झोपड़ी में नीचे घास-फूस के ऊपर कपड़े बिछे हुए थे । कुछ औरतें थी । परन्तु अधिकतर मर्द ही थे । आधी बांह की सफेद कमीज एक ही ने पहनी हुई थी । उस पर निगाह पड़ते ही मोना चौधरी को वो, अजबसिंह ही लगा । परन्तु दाढ़ी-मूंछ और गर्दन तक आते लम्बे बालों की वजह से मन में विश्वास पूरी तरह टिक नहीं पाया।

मोना चौधरी आगे बढ़ी और सिर्फ आधी बाजू वाले के करीब जा बैठी । वो हकीकत में अजबसिंह ही था । उसने एक निगाह मोना चौधरी पर मारी फिर दूसरी तरफ देखने लगा ।

"तुम्हें यहां देखकर हैरानी हो रही है अजबसिंह ?" मोना चौधरी ने धीमे स्वर में कहा ।

अजबसिंह दूसरी तरफ ही देखता रहा ।

"तुम क्या समझ रहे हो, मैं यूं ही तुक्का मार रही हूं ।" जबकि मोना चौधरी तुक्का ही मार रही थी ।

अजबसिंह ने मोना चौधरी को देखा ।

मोना चौधरी मुस्कुराई ।

"तुम मेरे बेटे से शादी करने जा रही थी ।" अजबसिंह का स्वर बेहद धीमा था ।

"खूब ! मुझे पहचान लिया ।" मोना चौधरी पुनः खुलकर मुस्कुराई  ।

"अब तुम मेरे बेटे के साथ यहां क्या कर रही हो ? पहले जैसे स्वर में पूछा अजबसिंह ने ।

"यहीं बात करोगे या बाहर चलें?" मोना चौधरी गम्भीर हो गई ।

अजबसिंह ने उसकी आंखों में देखा ।

"संजीव कहां है ?"

"पास ही है ।"

दो पलों की चुप्पी के बाद अजबसिंह बोला ।

"बाहर चलो । मैं आता हूं ।"

"बाहर आते ही दाईं तरफ आ जाना ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी उठी और बाहर निकल गई ।

"क्या हुआ ?" बाहर खड़ा संजीव सिंह कह उठा ।

"वो तुम्हारे पापा ही हैं।" मोना चौधरी ने कहा--- "आ रहा है । तुम अंधेरे में एक तरफ हो जाओ ।"

"पापा ही हैं वो ।" संजीव सिंह हड़बड़ाया--- "बाहर आ रहे हैं ।"

"हां ।"

"क्यों ? किस बात के लिए बाहर...।"

"खामोश रहो सीधे मेरी तरफ हो जाओ । सवाल बाद में कर लेना ।"

संजीव सिंह ने अंधेरे में मोना चौधरी को गहरी निगाहों से देखा।

"क्या देख रहे हो ?" पूछा मोना चौधरी ने ।

"तुम्हारे गुणों को पहचानने की कोशिश कर रहा हूं कि इस वक्त तुम कौन-सा गुण इस्तेमाल कर रही हो ।"

"पहले मैं तुम्हारे बाप के गुण पहचान लूं । उसके बाद तुम मेरे गुण पहचान लेना ।"

संजीव सिंह ने कुछ नहीं कहा और अंधेरे में एक तरफ खिसक गया ।

मोना चौधरी अंधेरे में दाईं तरफ बढ़ गई ।

पांच मिनट बाद अजबसिंह झोपड़े से निकला और उस तरफ सामान्य चाल में बढ़ गया । कुछ फिर आगे गया होगा अंधेरे में मोना चौधरी उसके सामने आ ठहरी ।

अजब सिंह ठिठका ।

"कौन हो तुम ?" अजबसिंह बोला--- "तुम्हारा नाम सुधा है ।

"नाम भी मालूम हो जाएगा ।" मोना चौधरी तीखे स्वर में कह उठी--- "पहले तो ये जान लो कि मैं यहां क्या काम करने आई हूं ।"

"बोलो ।"

"बज्जू ने भेजा है मुझे ।" मोना चौधरी की एकटक निगाह अजब सिंह पर थी ।

अजबसिंह चौंका ।

"बज्जू ?"

"जो इस वक्त तुम्हारे होटल के तहखाने में...।"

"तो सब मालूम है तुम्हें ।" अजब सिंह की आवाज में कठोरता आ गई--- "कब भेजा बज्जू ने तुम्हें ?"

"तुम्हारे पास आने से पहले । एक करोड़ रूपया दिया मुझे । जानते हो क्यों ?" मोना चौधरी मुस्कुरा पड़ी--- "तुम्हारी हत्या के लिए । जब तुम्हारे होटल पहुंची तो मालूम हुआ, उसी रात तुम कहीं चले गए । तब संजीव को आगे करके मालूम किया कि तुम यहां हो और मैं यहां आ गई ।"

"संजीव को अच्छी तरह फंसा रखा है तुमने ।" अजबसिंह भिंचे स्वर में बोला।

"बेशक । वो मेरी उंगलियों पर नाचता है ।" मोना चौधरी हौले से हंसी ।

होंठ भींचे वो, मोना चौधरी को घूरने लगा ।

"तुम्हें डर नहीं लगा कि एक करोड़ लेकर मैं तुम्हारी हत्या करने आई हूं ।"

"तुम जैसी पागल लड़कियों से मुझे डर नहीं लगता । अगर तुमने मेरी हत्या करनी होती तो कभी भी इस तरह आराम से बात नहीं करती । ये नहीं बताती कि तुम मेरी हत्या करने...।"

"अपना-अपना ढंग है । मैं शिकार को पहले सतर्क करती हूं, फिर उसकी जान लेती हूं ।"

"मैं सतर्क हो गया हूं । तुम मेरी जान ले सकती हो ।" अजबसिंह के स्वर में खतरनाक भाव आ गए ।

"छुरी भी अपनी, खरबूजा भी अपना । जल्दी क्या है ।" मोना चौधरी का स्वर व्यंग से भरा हो गया--- "तो तुम स्वामी ताराचंद की ड्रग्स और अन्य तरह के सामान को लूटते हो । उसी दौलत से तुमने होटल खड़े किए और...।"

"अधूरी जानकारी होने से अच्छा है, जानकारी नहीं हो।"

"मेरी जानकारी में कोई कमी है तो ये कि तुम किसके लिए काम करते हो । तुम्हारे साथ कौन है ।"

"इस सवाल का जवाब कभी नहीं पा सकोगी ।" अजबसिंह ने कड़वे स्वर में कहा--- "तुम जो भी हो, इतना तो एहसास होता जा रहा है कि खतरनाक हो । वरना मेरे से इस तरह के बात करने के लिए हिम्मत।"

"हिम्मत बहुत है अजबसिंह । तुम अपनी बात करो । तुम जानते हो कि स्वामी ताराचंद ड्रग्स का धंधा करता है । तुम जानते हो कि मैडम अमेरिकन जासूसी संस्था के लिए काम करती है । लेकिन इस बारे में तुमने कभी पुलिस को खबर नहीं की । जबकि तुम्हें पुलिस को खबर करनी चाहिए । मैडम के बारे में जानना चाहिए कि वो कौन है।"

"मैडम के बारे में नहीं मालूम कर सका । बहुत कोशिश की ।" अजब सिंह ने व्यंग भरे स्वर में कहा--- "तुम्हें इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए । एक करोड़ रुपया तुम्हें मिला है, मुझे मारने के लिए । मैडम के इशारे पर ही तुम्हें रुपया मिला होगा ।"

"मुझे तो नोटों से मतलब है । किसी के भी इशारे पर मिलें ।" इसके साथ ही मोना चौधरी उछली और अजबसिंह के साथ वेग से जा टकराई । अजबसिंह जोरों से लड़खड़ाया । उसने संभलने की चेष्टा की । परन्तु पीछे की तरफ नीचे जा गिरा था ।

मोना चौधरी भी गिरी परन्तु उतनी ही फुर्ती से उठ खड़ी हुई । इससे पहले कि अजबसिंह संभल पाता । मोना चौधरी झपटी और अजबसिंह पर जा गिरी जो उठने की चेष्टा कर रहा था।

एक तरफ अंधेरे में खड़ा संजीव सिंह सब देख-सुन रहा था । वो उलझन और परेशानी में घिर चुका था । पापा का भी उसने नया रूप देखा था और मोना चौधरी का भी नया रूप ही सामने आया था कि वो करोड़ रुपया लेकर, पापा की हत्या के लिए उसे तलाशती फिर रही है।

तभी अपने ऊपर पड़ी मोना चौधरी के पेट पर अजबसिंह ने अपना पैर रखा और पूरी शक्ति के साथ उसे उछाल दिया । मोना चौधरी खुद को संभाल न सकी और दो-तीन कदम दूर जमीन पर जा लुढ़की । इसके साथ ही अजबसिंह फुर्ती से उठा और चीते की तरह मोना चौधरी पर झपट पड़ा । दोनों जमीन पर गुत्थम-गुत्था हो गए।

उसी पल मोना चौधरी का दायां पंजा, लोहे की शिकंजे की भांति अजबसिंह की गर्दन पर कस गया । पकड़ ऐसी थी की अजबसिंह छटपटा उठा । उसने गर्दन आजाद करवाने की चेष्टा की । परन्तु मोना चौधरी की उंगलियां और भी-धंस गई ।

अजब सिंह के होंठों से गुर्राहट निकली ।

"सुधा ।" तभी संजीव सिंह पास पहुंचकर व्याकुलता से बोला--- "पापा को छोड़ दो ।"

"तेरा पापा समझता है कि इस पर कोई काबू नहीं पा सकता।" मोना चौधरी गुर्रा उठी ।

"लेकिन सुधा-तुम तो...।"

"अजबसिंह को छोड़ दो।"

इस आवाज पर मोना चौधरी की गर्दन फौरन घूमी । शिकंजा अजबसिंह की गर्दन पर कसा रहा । ये स्वर कहीं सुना था । मोना चौधरी ने । लेकिन समझ नहीं पाई ।

"कौन हो तुम ?" मोना चौधरी दांत पीसकर कह उठी ।

"वो चार-पांच कदम दूर अंधेरे में खड़ा था ।

"इसे छोड़ दो मोना चौधरी । ये हमारे लिए काम करता है । मैं कौन हूं, ये मुंह से निकालने की गलती मत करना ।"

मोना चौधरी चौंकी । स्पष्ट तौर पर पहचान गई थी कि वो कैप्टन कालिया है ।

"तुम यहां ?" मोना चौधरी के होंठों से हैरानी भरा स्वर निकला ।

"हां मैं । कालिया ।"

दो पलों के लिए चुप्पी छा गई वहां ।

संजीव सिंह ने मोना चौधरी का नाम सुनकर खुद को अजीब-सी स्थिति में पाया।

मोना चौधरी ने अजबसिंह की गर्दन पर रखी, पंजे की गिरफ्त ढीली की और सख्त स्वर में बोली।

"अजबसिंह ! तेरी जान लेने का कोई इरादा नहीं है मेरा । लेकिन तेरी आवाज में तब घमंड था कि, जब तूने कहा, मैं तुझे मार दूं । तुमने सोचा कि तेरे पर कोई काबू नहीं पा सकता । भूल है तेरी । मैं तो तेरी गर्दन अपने हाथों से अभी तोड़ सकती हूं ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी अजबसिंह को छोड़कर उठ खड़ी हुई ।

अजबसिंह हौले से खांसा और अपना गला मसलता उठ खड़ा हुआ ।

"पापा ।" संजीव सिंह ने अजबसिंह की बांह पकड़ी--- "आप कैसे हैं ? आप...।"

"मैं ठीक हूं ।" अजबसिंह गहरी सांसें लेता हुआ धीमे स्वर में कह उठा ।

तभी कैप्टन कालिया ने कहा ।

"अजबसिंह ! तुम भीतर जाकर आराम करो । तुम मेरे साथ आओ मोना चौधरी ।" कहने के साथ ही वो पलटा और कुछ दूर रोशनी के तीव्र घेरे की तरफ बढ़ गया । रोशनी में कई लोग आश्रम के साधुओं के साथ बैठे बातें कर रहे थे । वहां आवाजों और लोगों की रौनक थी ।

मोना चौधरी ने देखा कि कालिया ने आश्रम के साधुओं वाले कपड़े पहन रखे हैं ।

घास पर कैप्टन कालिया नीचे बैठ गया ।

मोना चौधरी भी उसके सामने बैठ गई ।

"तुम्हें यहां देखकर हैरानी हो रही है कालिया ।" मोना चौधरी ने धीमे स्वर में कहा ।

"हैरानी जायज है ।" कालिया का स्वर धीमा था---- "वैसे मैं यहां बीते दिनों से हूं।  देश में आजकल रोजाना नए-नए साधू-संत, स्वामी, महाराज के नाम सुनने को मिल रहे हैं । भगवान एक है, परन्तु देश के हर धर्म वाले जैसे अपना अवतार जनता में लाते जा रहे हैं । हमारे डिपार्टमेंट में इनके लिए शक पैदा होने लगा । क्योंकि पंजाब के और एक महाराष्ट्र के स्वामी को तब पकड़ा, जब वो इस तरह आश्रम बनाकर गैरकानूनी काम कर रहा था । उसके बाद तो हम लोगों ने ऐसी जगहों पर नजर रखनी शुरू कर दी । तब स्वामी ताराचंद का आश्रम में हमारी नजरों में आ गया । जिसका रंग-ढंग हमें ठीक नहीं लगा । मैं किसी दूसरे आश्रम का सिफारिशी पत्र लेकर आया था । इसलिए इन लोगों के बीच घुसने में मुझे किसी भी तरह की दिक्कत नहीं आई।  अभी भी लोग मुझे ट्रेनिंग दे रहे हैं कि श्रद्धालुओं के साथ कैसे बात की जाती है । परन्तु यहां आने के बाद शीघ्र ही मुझे पता चल गया कि ये लोग ड्रग्स का धंधा करते हैं और भी गलत काम।"

"अजबसिंह को कैसे जानते हो?" मोना चौधरी ने पूछा ।

"वो बरसों से हमारे डिपार्टमेंट के लिए काम करता रहा है । कई काम होते हैं, जो हम नहीं कर पाते।  उन कामों को अजबसिंह पूरा करता है । लेकिन वो नहीं जानता कि वो किसके लिए काम करता है ।" कैप्टन कालिया ने गम्भीर स्वर में कहा ।

"मोना चौधरी ने हौले से सिर हिलाया ।

"तुम यहां क्या कर रही हो मोना चौधरी ?"

"अजबसिंह को तुमने स्वामी ताराचंद के पीछे लगा रखा है ?" मोना चौधरी ने उसके सवाल पर ध्यान न देकर पूछा ।

"नहीं । मैंने उसे बरसों पहले, ऐसे लोगों के पीछे लगाया था, जो हिमाचल में पैदा होने वाली ड्रग्स को हथियाकर देश और विदेशों में सप्लाई करते हैं। बहुत बड़े पैमाने पर ये धंधा हो रहा है । इस काम पर, कई बार मैं भी अजबसिंह के साथ रहा । तब हमने पता लगाया था कि इन सब कामों के पीछे कोई औरत है । जिसे मैडम कहा जाता है । वो औरत ही संगठित ढंग से इन सब कामों को चला रही है । उसके बारे में हम इसी नतीजे पर पहुंचे कि, उसे शायद कोई नहीं जानता । उसके आदमियों पर हाथ डालने का कोई फायदा नहीं था । आदमियों की फौज वो फिर खड़ी कर सकती थी । तब हमने यही फैसला किया कि किसी तरह मैडम का पता लगाया जाए । उसके आदमियों को कुछ न कहा जाए । अलबत्ता उनकी ड्रग्स पर अजबसिंह हाथ साफ करता रहे। जो कि अजबसिंह करता रहा और ड्रग्स हमारे हवाले कर देता । परन्तु लम्बी कोशिश के बाद भी उस मैडम का पता नहीं चल सका ।"

मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव थे ।

"कालिया ।" उसके खामोश होने पर मोना चौधरी कह उठी--- "वो मैडम, अमेरिकन संस्था सी•आई•ए• के लिए काम करती है ।" साथ ही मोना चौधरी ने बताया कि किस प्रकार मैडम ने देश की सीमा पर अपना ही आतंकवादी गुट खड़ा कर रखा है । सी•आई•सी• के इशारे पर, मैडम उस आतंकवादी संगठन को बताती है कि अब उन्होंने कहां-कहां तबाही करनी है । ये सब काम करने की एवज में मैडम को सी•आई•ए• तगड़े नोट देती है।"

"ये बातें तुम्हें कैसे पता ?" कैप्टन कालिया ने पूछा ।

"सुबह ही पता चली, जब आश्रम का साधू श्रद्धानंद जंगल में मेरे हाथ लगा ।"

कैप्टन कालिया के चेहरे पर कुछ सख्ती भी उभरी ।

"तुम ठीक कह रही हो । ऐसी ही कई बातों का आभास मुझे भी मिला है । अजबसिंह के साथ तुम्हारी क्या दुश्मनी ?"

"कोई दुश्मनी नहीं । मैडम के लिए काम करने वाले बज्जू ने मुझे एक करोड़ रूपया दिया कि बीचपॉम नाम का जहाज थाईलैंड से आ रहा है । उसमें पड़ा कुछ माल निकालना है । ये काम अजबसिंह को फंसाकर ही किया जा सकता है । लेकिन रुपया लेने के बाद ये काम करने से रह गया तो अगली मुलाकात में बज्जू ने कहा कि उस एक करोड़ के बदले मैं अजबसिंह को कत्ल कर दूं । तब मुझे इस मामले के बारे में जानने की इच्छा हुई।  यहां आकर मैं स्वामी ताराचंद को अच्छी तरह टटोलना चाहती थी कि अजबसिंह सामने पड़ गया । उसकी बातें सुनकर मुझे लगा कि इसे एक बार ये बात समझा देनी चाहिए कि उससे भी बड़े बैठे हैं।"

मोना चौधरी के खामोश होने पर कालिया ने कुछ नहीं कहा ।

"थाईलैंड से आने वाले बीचपॉम जहाज में क्या था ?" एकाएक मोना चौधरी ने पूछा ।

"कुछ भी नहीं ।"

"क्या मतलब ?"

"अजबसिंह भी यही समझता रहा कि उस जहाज में हीरे-जवाहरातों की पेटियां हैं । वो वही समझेगा, जो हम कहेंगे । परन्तु हकीकत में वो सब, दुश्मनों को घेरने के लिए हमारी चाल थी ।" कालिया ने धीमे स्वर में कहा ।

"मैं समझा नहीं ।"

"हमने ये खबर मैडम के आदमियों तक पहुंचा दी कि बीचपॉम जहाज में हीरे-जवाहरात आ रहे हैं । उन हीरे-जवाहरातों को हथियाने के लिए, मेरे ख्याल के मुताबिक वो अपना खास आदमी भेजते । परन्तु उन लोगों ने सावधानी इस्तेमाल की और एक करोड़ रुपये में तुम्हारे हवाले ये काम कर दिया।"

"समझ गई ।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "इस काम को मैं शायद किसी अंजाम पहुंचा देती । परन्तु मेरी वैन का एक्सीडेंट हो गया । इन लोगों ने समझा एक्सीडेंट में मेरी जान चली गई । तब बज्जू खुद ही अजबसिंह के होटल में पहुंच गया कि मौका मिलते ही उसे खत्म कर सके । लेकिन तभी अजबसिंह इस आश्रम की तरफ आया । बज्जू की तब मेरे से मुलाकात हुई तो उसने एक करोड़ का वास्ता देकर हत्या करने के लिए अजबसिंह के पीछे भेज दिया । लेकिन मेरा ध्यान अजबसिंह की तरफ न होकर इस मामले की तरफ हो गया कि इन लोगों के बीच क्या हो रहा है।"

तभी वहां बैठे लोगों के बीच तीन-चार साधू ट्रे थामें नजर आने लगी । ट्रे में कांच के दूध के गिलास रखे हुए थे । दूध के गिलासों को वे श्रद्धालुओं को दे रहे थे । एक साधू ट्रे थामे उनकी तरफ आया । ट्रे में दूध के भरे हुए गिलास थे।

उसे पास आया पाकर कालिया मगन भाव में कह उठा ।

"स्वामी ताराचंद जी तो सुख का सागर हैं स्वयं में । पापी और भोगी भी उनके पास आकर पवित्र हो जाते हैं । वे पाप और पुण्य में भेद नहीं रखते । क्योंकि सब कुछ तो भगवान का दिया है । फिर किसी चीज से नफरत क्यों की जाए । एक चीज दूसरे की पूरक है । स्वामी ताराचंद जी तो बुरे और बुराई को भी अपने गले से लगाते हैं । उनके लिए सब एक समान है । स्वामी जी के चरणों में तो शांति का समंदर है । जो उस समंदर में डूब गया । वो तो...।"

"दूध ग्रहण करो श्रद्धालु ।" तभी वो साधू पास आकर ठिठका और ट्रे नीचे करता कह उठा ।

मोना चौधरी ने ट्रे पर नजर मारी फिर सिर हिलाकर कहा ।

"थैंक्स । दूध की इच्छा नहीं...।"

"इंकार नहीं करते श्रद्धालु । दूध तो नींद से पहले आवश्यक होता है । मीठी नींद आती है । बेकार का भय भी नहीं सताता ।"

"ले लो श्रद्धालु ।" कैप्टन कालिया ने प्यार से कहा ।

मोना चौधरी ने ट्रे में से, दूध का गिलास उठा लिया ।

वो साधू ट्रे के साथ दूसरे लोगों की तरफ बढ़ गया।

मोना चौधरी ने पास ही घास पर दूध का गिलास रख दिया ।

"कालिया । जब तुम्हें मालूम है कि ताराचंद क्या कर रहा है तो उस पर हाथ क्यों नहीं डालते ।" मोना चौधरी बोली।

"इसकी वजह मैं बता ही चुका हूं ।" कालिया ने धीमे स्वर में कहा--- "ताराचंद पर हाथ डाल दिया और वो कुछ न बता पाया । मुंह न खोला तो सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी । मैडम ताराचंद की जगह किसी दूसरे को खड़ा कर लेगी । शायद उसके बारे में हमें मालूम भी न हो सके । ताराचंद हमारी नजरों के सामने तो है ।"

मोना चौधरी का चेहरा कठोर हो गया ।

"अब ताराचंद तुम्हारे सामने नहीं रहेगा कालिया ।"

"क्या मतलब ?"

"मैं कल के दिन में उसे खत्म कर दूंगी।"

"नहीं । ऐसा करके तुम हमारे हक में गलत काम करोगी । ताराचंद से हम कई बातें जान...।"

"कालियां । तुम्हारे काम करने का ढंग अलग है और मैं अलग ढंग से काम करती हूं ।" मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर धीमे-कठोर स्वर में कह उठी--- "ताराचंद, मैडम के इशारे पर काम करता है और मैडम सी•आई•ए• के इशारे पर । मैडम देश-विदेश में ड्रग्स ही नहीं, बल्कि देश में अमेरिका के कहने पर आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है । ऐसी वारदातों के लिए उसने अपना आतंकवादी संगठन तैयार कर रखा है । देश को खराब करने में उसने कोई भी कसर नहीं छोड़ी । मैं मैडम तक तो नहीं पहुंच सकती । लेकिन उसके आदमियों को खत्म करते हुए, मैडम को तकलीफ दूंगी । शायद मेरी इस हरकत पर मैडम ज्यादा उछले और अपनी जगह से बाहर आए।"

"बहुत गलत सोच रही हो ।" कालिया कह उठा--- "आज तक का रिकॉर्ड है कि मैडम कभी भी, किसी भी स्थिति में फील्ड में नहीं आती । उसके हाथ बहुत लंबे हैं । पैसा फेंककर वो अपना काम करा लेती है ।"

"ऐसा भी कब तक चलेगा ।" मोना चौधरी के दांत भिंच गए--- "जब उसके सामने आने वाले आदमी एक के बाद एक मरने लगेंगे तो उन लोगों में भी डर फैलेगा । मैडम के नोट कहां तक काम करेंगे ।"

"लेकिन इस तरह मैडम तक नहीं पहुंच सकते।"

"तुम जाने कितने बरसों से मैडम तक पहुंचने की चेष्टा कर रहे हो । क्या पहुंच सके ? नहीं । ऐसे में मैडम के खिलाफ जो होता है, वो होने दो ।" मोना चौधरी का स्वर कड़वा हो गया--- "एक सलाह अवश्य दूंगी कि मैडम के खिलाफ जब तक कोई सख्त कदम नहीं उठाओगे, कोई नतीजा नहीं निकलेगा ।"

कालिया वहां से मध्यम रोशनी में, मोना चौधरी को देखता रहा ।

"कैप्टन ! तुम्हें ये काम बहुत पहले कर देना चाहिए था । मैडम के आदमियों को खत्म करते जाओ । जो सामने आए मार दो । जिसके बारे में पता चले । उसके घर पहुंचकर, उसे खत्म कर दो । ये सिलसिला लंबा चलेगा तो मैडम गुस्से में कोई नई हरकत करेगी । कभी तो ऐसी हरकत करेगी कि फंस जाए । जबकि  तुम लोग उसके आदमियों पर नजर रखते हो । वो अपना काम करते रहते है । मैडम के बारे में पता नहीं चल रहा । ऐसे में कई साल बीत गए ।"

"कानून ने हमारे हाथ बांध रखे हैं । हमें सोच-समझकर कदम उठाने पड़ते...।"

तभी वातावरण में मध्यम-सी घंटी का स्वर गूंज उठा । कालिया एकाएक खामोश हो गया ।

"क्या हुआ ?" मोना चौधरी ने आसपस देखते हुए पूछा । घंटी बजते ही लोग और साधू उठने लगे थे ।

"ये दिनचर्या खत्म होने का संकेत है । अब कोई भी आपस में बात नहीं कर सकता । ये नियम है यहां का ।" कहते हुए कालिया उठा ।

मोना चौधरी भी उठ खड़ी हुई ।

"मिस्टर पहाड़ियां का क्या हाल है। वो...।"

"बात मत करो । हमें भी दूसरों की तरह यहां के नियम का पालन करना चाहिए । वरना देखने वाले शक कर सकते हैं । अगर रात को मौका लगा तो मैं तुमसे बात करने आऊंगा । मुझे पसन्द नहीं कि तुम ताराचंद की हत्या करो ।"

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा । अन्य लोगों की तरह वो भी विश्राम वाले झोपड़ों की तरफ बढ़ गई।

■■■

आधी रात के वक्त जब मोना चौधरी अन्य लोगों के बीच नींद के लिए लेटी तो संजीव सिंह वहां आया । रोशनी का वहां पूरा प्रबंध था । मोना चौधरी ने उसे देखा तो मुस्कुराकर उठ खड़ी हुई ।

संजीव सिंह गम्भीर नजर आ रहा था ।

दोनों झोपड़े के उस हिस्से में बैठ गए । जहां आस-पास लोग नहीं थे ।

अजबसिंह दूसरे झोपड़े में था ।

"मैं पहले ही समझ गया था कि मेरी पत्नी इतनी ज्यादा गुणों वाली नहीं हो सकती ।" संजीव सिंह बोला ।

"कैसे समझे ?" मोना चौधरी पुनः मुस्कुराई ।

"तुम्हारे गुणों को देखकर । नर्स होकर तुम हर काम कर सकती हो ।" संजीव सिंह ने मोना चौधरी को देखा ।

"अब तो तुम्हें अजब सिंह ने मेरे बारे में बता दिया होगा ।" मोना चौधरी ने कहा ।

"हां । पापा ने बता दिया कि मोना चौधरी कैसी खतरनाक शह है ।" कहते हुए संजीव सिंह ने गहरी सांस ली--- "पापा की बातें सुनने के बाद भी विश्वास नहीं आया कि तुम इतनी खतरनाक हो।"

"मेरे बारे में न सोचकर तुम अपने बारे में सोचो । चुपचाप शादी करो और होटल को संभालो ।"

संजीव सिंह कुछ नहीं बोला ।

"अपने पापा को समझाया कि वहां से वापस... ।"

"कहा । लेकिन वो मेरी बात सुनने को तैयार नहीं । कहते रहे मेरे कामों में दखल मत दो ।"

"उनकी तरफ ध्यान न दो तो ठीक रहेगा । अच्छा यही है कि तुम यहां से चले जाओ ।"

"क्यों ?"

"आश्रम वालों को मालूम हो गया कि तुम अजबसिंह के बेटे हो तो, तुम्हारी खैर नहीं ।"

संजीव सिंह ने मोना चौधरी के चेहरे पर नजरें टिका दीं ।

"उस कालिया को तुम अच्छी तरह जानती हो । जिसने तुम्हें कहा कि मेरे पापा को छोड़ दो ।" वो बोला ।

"हां ।"

"कौन है कालिया ?"

"तुम ये बात क्यों जानना चाहते हो ?"

"पापा, उनके लिए काम करते हैं और वो भी नहीं जानते कि उसकी असलियत क्या है ।"

"तुम्हें बड़ो की बातों में आने की जरूरत नहीं । तुम...।"

"पापा का भी मन है कि ये जाने, वो किसके लिए काम करते हैं ।"

"नहीं जान सकेंगे ।" मोना चौधरी गम्भीर स्वर में कह उठी--- "लेकिन अपने पापा से इतना कह देना कि वो गलत लोगों के लिए काम नहीं कर रहे । जो कर रहे हैं । बढ़िया कर रहे हैं।"

संजीव सिंह, मोना चौधरी को देखता रहा ।

"इस तरह क्या देख रहे हो ?"

"यही कि इतनी ज्यादा गुणों वाली, मेरी पत्नी नहीं हो सकती ।"

"ठीक कह रहे हो । पत्नी का ज्यादा गुणवान होना भी ठीक नहीं होता ।" मोना चौधरी व्यंग में कह उठी--- "दो-चार गुण वाली लड़की देख लो ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी उठने को हुई ।

"जा रही हो ?" संजीव सिंह कुछ बेचैन हुआ ।

"हां। और इसी तरह बार-बार मेरे पास आने की कोशिश मत करो । तुम्हारे लिए ये ठीक नहीं होगा । आने वाले वक्त में आश्रम वाले लोग तुम्हें मेरा साथी समझकर पकड़ भी सकते हैं।"

"मतलब कि तुम यहां गड़बड़ वाला काम करने वाली हो ।" संजीव सिंह के होंठों से निकला ।

"कुछ भी समझ लो ।" मोना चौधरी उठी और वापस अपनी जगह पर पहुंचकर लेट गई ।

तब तक संजीव सिंह झोपड़े से बाहर निकल गया था ।

कैप्टन कालिया रात में मोना चौधरी से मिलने नहीं आया ।

सुबह हो गई।

■■■

स्त्रियों के नहाने का प्रबंध अलग तरफ था । मोना चौधरी उस तरफ से नहाकर आई और जहां नाश्ते का इंतजाम था । वहां से नाश्ता किया । आश्रम के नियम के मुताबिक कोई भी खाली पेट नहीं रहेगा । थोड़ा-बहुत खाना ही पड़ेगा । कोई खाली पेट न रहे, इस बात का ध्यान कुछ साधू अलग से रख रहे थे।

नाश्ते के दौरान अजबसिंह और संजीव सिंह भी नजर आए । एक-दूसरे को देखा । लेकिन कोई बात नहीं हुई । किसी ने बात करने की चेष्टा भी नहीं की । कैप्टन कालिया भी नजर आया जो कि व्यस्त था, वहां के कामों में।

मोना चौधरी नाश्ते के बाद वापस झोपड़े में पहुंची और एक तरफ बैठकर अपने से विचार-विमर्श करने लगी कि किस तरह स्वामी ताराचंद के पास पहुंचे । इतना तो मालूम कर ही चुकी थी कि सुबह दस बजे के प्रवचन में स्वामी ताराचंद नहीं आते। वो सिर्फ शाम के प्रवचन में कुछ देर के लिए आते हैं। तब कभी वो आश्रम में आए श्रद्धालुओं को उपदेश देते हैं तो कभी नहीं देते । यानी कि अगर कोई कोशिश नहीं करती तो शाम से पहले स्वामी ताराचंद को देख भी नहीं सकेगी ।

मोना चौधरी की सोचें कोई रास्ता निकालने की चेष्टा कर रही थी कि तभी उस साधु ने भीतर प्रवेश किया । जो कल शाम आश्रम के गेट के बाहर मिला था । जिससे सिगरेट ली थी ।

"श्रद्धालु को सुबह का प्रणाम ।" वो करीब आकर मीठे स्वर में कह उठा ।

मोना चौधरी ने उसे देखकर हौले से सिर हिलाया ।

"हैलो ।"

"श्रद्धालु को अगर नाश्ते से फुर्सत मिल गई हो तो मेरे साथ आओ ।" वो पहले जैसे स्वर में बोला ।

"कहां ?"

"स्वामी जी के पास ।"

"स्वामी जी के पास ?" मोना चौधरी के होंठों से अजीब-सा स्वर निकला ।

"हां श्रद्धालु । बीती रात तुमने कहा था कि तुम स्वामी जी के दर्शन करना चाहती हो । यहां रहने के लिए आना चाहती हो । तो आज सुबह ही मैंने, स्वामी जी से आग्रह किया कि आप जैसी श्रद्धालु को वो अपना थोड़ा-सा समय दें। मेरे बार-बार कहने पर स्वामी जी ने हामी भर दी । आओ श्रद्धालु । आपको स्वामी जी के पास ले चलता हूं ।" कहते हुए उसकी नजरें मोना चौधरी के कपड़ों पर फिसलने लगी।

"तुम सच में बढ़िया बंदे हो ।" मोना चौधरी उठ खड़ी हुई--- "हरिद्वार में...।"

"यहां की बातें करो श्रद्धालु । दूसरी जगह के बारे में बातें करके हमें क्या हासिल होगा ।"

"चलो ।"

दोनों झोपड़ी से बाहर निकले ।

सुबह के नौ बज रहे थे । सूर्य का उबा देने वाला सफर शुरू हो चुका था ।

वो कुछ ही आगे बढ़ा कि मोना चौधरी ठिठकते हुए कह उठी ।

"पहले एक सिगरेट पिला यार । चुस्ती आ जाएगी ।"

"लेकिन...।"

"नखरे मत दिखा । निकाल सिगरेट ।" मोना चौधरी ने अधिकार भरे स्वर में कहा ।

साधू ने इधर-उधर देखते हुए सिर पर लपेट रखे कपड़े में से हाथ से टटोलकर सिगरेट निकाली और मोना चौधरी को थमा दी । मोना चौधरी ने सिगरेट सुलगाकर कश लिया।

"एक बात तो बताना ।" मोना चौधरी ने उसे देखा ।

"बोल श्रद्धालु ।"

"तुम मुझे श्रद्धालु क्यों कहते हो ?"

"स्वामी जी का यही आदेश है कि आश्रम में आने वालों को श्रद्धालु कहकर ही पुकारा जाए।"

"ठीक है । जब हम अकेले में मिलेंगे तो तब तुम मुझे नाम से बुलाना ।" मोना चौधरी बोली ।

"अकेले में ?" साधु ने हड़बड़ाकर इधर-उधर देखा ।

"क्या हुआ ?" मोना चौधरी मन ही मन मुस्कुरा उठी ।

"क्या नाम है तुम्हारा ?"

"जब अकेले में मिलूंगी तो बता दूंगी ।"

"कब मिलोगी ?"

"मौका मिलते ही । यहां कोई जगह है मिलने की ? आश्रम में मिलने की तो गुंजाइश ही नहीं ।"

"नदी किनारे मिलना । बहुत अच्छी जगह है । घना जंगल है । कोई भी उधर नहीं जाता ।"

"ठीक है ।" मोना चौधरी ने कश लिया--- "ये बताओ कि स्वामी ताराचंद मेरे से क्या बात करेंगे ?"

"बात क्या करनी है श्रद्धालु । वो तो देखना चाहते हैं कि हरिद्वार के आश्रम में रहने वाला श्रद्धालु कैसा है । स्वामी जी-मन के बहुत भले हैं । सबके लिए दया-भाव रखते हैं । स्वामी जी का कहना है कि ये जन्म संवारने के लिए और अलग जन्म पाने के लिए, भगवान के लिए शरीर को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना चाहिए । जो स्वामी के शब्दों का महत्व समझकर, उस पर चलते हैं । उनसे स्वामी जी बेहद प्रसन्न रहते हैं ।"

"समझ गई ।" मोना चौधरी ने मुस्कुराकर तीखे स्वर में कहा--- "मुझे अपने शरीर का इस्तेमाल करने में कोई परहेज नहीं । बशर्ते कि सामने वाले को दूसरे का शरीर इस्तेमाल करना आता हो । चलो-स्वामी ताराचंद के पास ।"

■■■

उसे भीतर प्रवेश करते देखा तो ताराचंद की आंखों में चमक आ गई । उसने सिर से पांव तक तसल्ली भरे ढंग से मोना चौधरी को देखा । देखता ही रहा ।

"स्वामी जी ।" वो साधू कह उठा ।

"कहो  शिष्य ।" स्वामी ताराचंद की नजरें अभी तक मोना चौधरी के शरीर पर फिर रही थी ।

मोना चौधरी के चेहरे पर मुस्कान के साथ कड़वे भाव आ ठहरे थे ।

"मैं इसी श्रद्धालु की बात कर...।" साधु ने कहना चाहा ।

"हम समझ गए । तुम जाओ शिष्य । तुम्हारा काम पूर्ण हुआ ।"

साधू ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया ।

"श्रद्धालु ।" स्वामी ताराचंद ने मुस्कुराकर मोना चौधरी को देखा--- "दरवाजा बंद कर दो । बातचीत के दौरान तीसरा कोई भीतर आए हमें ये पसन्द नहीं । इससे एकाग्रता भंग होती है ।"

मोना चौधरी आगे बढ़ी और दरवाजा बंद करके पलटती हुई बोली ।

"आप तो रंगीन तबीयत के मालूम होते हैं स्वामी जी ।"

"क्या ?" स्वामी ताराचंद वास्तव में अचकचा उठा, मोना चौधरी के शब्दों पर ।

"कुछ गलत कहा क्या ?"

"गलत कहा ।" स्वामी ताराचंद ने सिर हिलाया--- "हम बिल्कुल भी ऐसे नहीं है । परन्तु...।" शांत भाव में स्वामी ताराचंद मुस्कुरा पड़ा--- "जब हमारे सामने अति सुंदर और स्वस्थ शरीर आता है तो हम खुद पर काबू नहीं रख सकते ।"

"मतलब कि इस वक्त आप बेकाबू हुए पड़े हैं ।"

"ऐसा ही समझ लो श्रद्धालु । हम तुम्हें अपने आश्रम में अवश्य जगह दे देते । लेकिन न देने पर मजबूर हैं । क्योंकि हम जानते हैं तुम यहां रुकोगी नहीं मोना चौधरी ।" स्वामी ताराचंद शांत स्वर में कह उठा ।

मोना चौधरी चौंकी । अपनी हैरानी पर उसने काबू पाने की चेष्टा की।

"तुम मुझे कैसे जानते हो ?"

"तुमने जंगल में, नदी किनारे श्रद्धानंद को पकड़ा । उसे...।"

"श्रद्धानंद को मैंने अपना नाम नहीं बताया था ।" मोना चौधरी ने उसकी बात काटी ।

"हां । लेकिन श्रद्धानंद ने तुम्हारा हुलिया मुझे बताया ।" स्वामी ताराचंद ने मुस्कुराकर कहा--- "इस वक्त तुमने मेकअप अवश्य कर रखा है, परन्तु मेरी नजरों से बच पाना आसान काम नहीं ।"

"बस यही बात है कि तुम्हें मेरा नाम कैसे मालूम हुआ ?" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।

"वायरलैस सैट पर मैंने मैडम से बात की । तुम्हारा हुलिया बताया । तब मुझे मालूम हुआ कि तुम मोना चौधरी हो ।"

ये शब्द सुनकर मोना चौधरी ही जानती थी कि उसके मस्तिष्क को कितना तीव्र झटका लगा है । परन्तु खुद को उसने सामान्य बनाए रखा । ऐसा जरूरी भी था । वरना स्वामी ताराचंद को उस पर शक भी हो सकता था ।

"और क्या बता दिया तुम्हें मैडम ने ?" मोना चौधरी के स्वर में लापरवाही आ गई थी ।

"सब कुछ बताया कि बज्जू ने तुम्हें एक करोड़ रुपया दिया है। अजबसिंह की हत्या के लिए । अजबसिंह आश्रम में या पास ही कहीं पर हैं । मेरे आदमी अभी तक अजबसिंह को तलाश नहीं कर पाए ।"

मोना चौधरी का मस्तिष्क तेजी से काम कर रहा था ।

"मुझे तो मैडम ने कहा था कि तुमसे मिल लूं । अजब सिंह को तुमने तलाश कर लिया होगा ?" मोना चौधरी कह उठी ।

"मेरे आदमी कोशिश कर रहे हैं ।"

"बहुत ढीले हो तुम ताराचंद । अब अजबसिंह को तलाश करने में मेरा वक्त खराब होगा ।"

"शायद, मेरे आदमी अजबसिंह को तलाश कर लें कि वो कहां है ।"

"वो यहां क्यों आया है ?" पूछा मोना चौधरी ने।

"यकीन के साथ कुछ नहीं कह सकता । वो हमेशा हमें नुकसान पहुंचाने की चेष्टा में रहता है । हमारा माल लूटने की कोशिश में रहता है । अब भी यही सोचकर यहां आया होगा ।" ताराचंद का चेहरा सख्त हो उठा था--- "उसे किसी तरह खबर मिल गई होगी कि प्यारेलाल से मैं ड्रग्स का बड़ा सौदा करने जा रहा हूं । प्यारेलाल ने एक-दो दिन में ड्रग्स की डिलीवरी इसी जगह पर देनी है ।"

"समझ गई । अजबसिंह वहीं ड्रग्स लूटने आ पहुंचा हैं । कहते हुए मोना चौधरी ने सिर हिलाया ।

कुछ पल उनके बीच चुप्पी रही ।

"जब तुमने श्रद्धानंद को नदी किनारे पकड़ा, तब तुम्हारे साथ कौन था ?" स्वामी ताराचंद ने एकाएक पूछा ।

"मेरा साथी है वो ।"

"अब किधर है ?"

"जंगल में, दूसरे साथियों के पास ।"

"ओह, तो तुम पूरी तैयारी के साथ आई हो, अजबसिंह को खत्म करने ।" ताराचंद गहरी सांस लेकर कह उठा।

"एक हत्या के लिए एक करोड़ लिया है तो पूरी तैयारी करनी ही पड़ती है ।" मोना चौधरी का सख्त स्वर लापरवाही से भरा था ।

"तुमने श्रद्धानंद को क्यों पकड़ा । सीधे मेरे पास भी आ सकती थी।"

"यहां के हालातों की जानकारी लेनी थी । अजबसिंह के बारे में आश्रम पहुंचने से पहले ही जान लेना चाहती थी । लेकिन श्रद्धानंद से बात करने का कोई खास फायदा नहीं हुआ ।" मोना चौधरी ने जान-बूझकर उखड़े स्वर में कहा ।

स्वामी ताराचंद मोना चौधरी को सोच भरी निगाहों से देखने लगा।

"अब क्या करना है ?" करीब मिनट भर बाद, स्वामी ताराचंद ने ही खामोशी तोड़ी ।

"मैडम से मेरी बात कराओ । उन्हें रिपोर्ट देनी है ।"

"मैडम से ?" स्वामी ताराचंद के होंठों से निकला--- "मैडम ने मुझे नहीं कहा कि मैं उनसे तुम्हारी बात...।"

"बेवकूफ । इस वक्त हम मिलकर चल रहे हैं ।" मोना चौधरी तीखे स्वर में बोली--- "जो मैं कह रही हूं । वो करो । मैडम ने ही मुझसे कहा था कि अगर मेरे से बात करना चाहो तो, ताराचंद से कह दूं ।"

स्वामी ताराचंद ने हिचकिचाहट भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा ।

"क्या सोच रहे हो ?" मोना चौधरी का स्वर तीखा ही रहा ।

स्वामी ताराचंद ने सिर हिलाया और उठ खड़ा हुआ ।

"ठीक है । मैडम से बात करा देता हूं ।"

मोना चौधरी कुछ नहीं बोली ।

स्वामी ताराचंद लकड़ी की पेटी के पास पहुंचा । उसे खोलकर हैडफोन निकाला कि पास पहुंचकर मोना चौधरी ने उससे हैडफोन लिया और सिर पर लगाती हुई शांत स्वर में बोली।

"तुम संबंध बनाओ । मैं बात कर लूंगी ।"

उसने मोना चौधरी को देखा । फिर पेटी में पड़े वायरलैस सैट पर झुक गया ।

कुछ ही पलों में संबंध बन गया । दूसरी तरफ सिग्नल जाने लगा ।

आधे मिनट बाद ही मोना चौधरी के कानों में आवाज पड़ी।

"हैलो । हैलो...।"

मोना चौधरी के होंठ भिंच गए । चेहरा सख्त हो गया । इस आवाज को उसने फौरन पहचान लिया था । कमलेश की आवाज थी वो ।

"हैलो । हैलो ।"  उधर से बराबर कमलेश की आवाज हैडफोन के जरिए कानों में पड़ रही थी ।

दो कदम के फासले पर खड़ा स्वामी ताराचंद मोना चौधरी को देख रहा था।

"क्या हुआ ? स्वामी ताराचंद ने पूछा ।

मोना चौधरी ने झुकते हुए पेटी में पड़े वायरलैस सैट को ऑफ कर दिया है । हैडफोन उतारकर पेटी में रखा।

"मैसेज रिसीव करने के लिए दूसरी तरफ कोई नहीं हैं ।"

"मैडम कहीं और व्यस्त होगी ।" कहते हुए स्वामी ताराचंद ने पेटी बंद की और उस पर कपड़ा बिछा दिया--- "तुम दोपहर को मेरे पास आ जाना । तब मैडम से बात करा दूंगा ।"

मोना चौधरी लापरवाही से आगे बढ़कर बैठी और ताराचंद की आंखों में झांका।

"लता को जानते हो ताराचंद ?"

"हां । दो बार उससे मुलाकात हो चुकी है ।" ताराचंद भी बैठ गया ।

"उससे तुम्हारी कोई दुश्मनी है ?"

"नहीं तो । क्यों पूछा...?"

"उसने मुझे लाख देने का वायदा किया था, अगर मैं तुम्हारी जान ले लूं ।"

"क्या ?" चिहुंक पड़ा ताराचंद--- "मुझे मारने को कहा लता ने ?"

"हां । तभी तो पूछा कि तुम्हारी उससे क्या दुश्मनी है ?"

"तुम्हें सुनने में गलती हुई होगी । वो ऐसा नहीं...।"

"मैं नहीं जानती। उसने जो बात की, वो तुम्हें बता दिया ।"

ताराचंद एकाएक ही बेहद परेशान नजर आने लगा ।

मोना चौधरी की निगाह एकटक, उसके चेहरे के बनते-बिगड़ते भावों पर थी ।

"मैं-मैं मैडम से बात करूंगा कि...।"

"कोई फायदा नहीं ।" मोना चौधरी ने फौरन कहा ।

"क्यों ?" उसकी आंखें सिकुड़ी ।

"मेरे सामने उसने बज्जू से कहा कि इस बारे में मैडम से बात कर ली है । मैडम ने ताराचंद को खत्म करने के लिए हरी झंडी दे दी है । अब ये तुम्हें ही मालूम होगा कि तुम्हारे अपने लोग क्यों तुम्हारी जान लेना चाहते हैं ।"

"ये नहीं हो सकता । वो मुझे क्यों मारेंगे ?" ताराचंद के दांत भिंच गए ।

"तुम सोचो, वो ऐसा कदम क्यों उठा रहे हैं । या तो तुमने अपने साथियों के खिलाफ काम किया है । या अपने काम में कोई हेराफेरी की है । कुछ तो ऐसा किया ही है कि...।"

"मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो...।"

"तो फिर मैडम ने तुम्हारी मौत के लिए हां क्यों की ? काम के बंदे की जान कोई नहीं लेता ।"

ताराचंद दांत भींचे मोना चौधरी को देखता रहा । फैसले नहीं कर पा रहा था कि क्या कहे।

"लता ने अपने आठ खतरनाक आदमी मेरे साथ भेजे हैं कि अजबसिंह की या तुम्हारी हत्या के वक्त मुझे आदमियों की जरूरत पड़ सकती है । यानी कि वो हर हाल में तुम्हें खत्म कर देना चाहती है।"

"मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि ये सब क्या हो रहा है। मैं...।"

उसी पल मोना चौधरी ने साइलेंसर लगी रिवॉल्वर निकालकर उसकी तरफ कर दी ।

ताराचंद की आंखें भय रूपी ढंग से फैल गई।

"ये...ये...।"

"तुम्हारे साथियों ने, तुम्हारी मौत का इंतजाम किया है । मेरी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं । पैसा मिला तो काम कर रही हूं।  मेरे लिए दौलत ही सब कुछ है । काम हाथ में लेकर पूरा करना, मेरा धंधा है । तुम्हारी और अजबसिंह की जान लेने यहां तक आई हूं तो काम पूरा करके ही लौटूंगी ।"

"मुझे मत मारो ।" ताराचंद दांत पीसते हुए कह उठा ।

"तुम्हें खत्म करना जरूरी है, ताराचंद । तुम्हारी मौत के पैसे ले चुकी...।"

"तुम्हें बीस लाख दिया गया है । मैं तुम्हें पचास लाख दूंगा ।" ताराचंद गुर्रा उठा ।

"पचास लाख ?"

"हां । अभी दूंगा ।"

"अगर मैंने तुम्हारी बात मानी तो ये ठीक नहीं होगा । उन लोगों से गद्दारी होगी ।"

"कोई गद्दारी नहीं ।" ताराचंद जल्दी से सख्त स्वर कह उठा--- "ये तो बिजनेस है । तुम...।"

"मुझे लता ने खासतौर से कहा था कि ये बातें तुमसे न कहूं सीधे-सीधे खत्म कर दूं ।"

"तुम यही सोचो कि तुमने मुझे बताया ही नहीं। दूं पचास लाख ?"

"मेरा धर्म खराब कर रहे हो, हेराफेरी सिखा रहे हो मुझे ।" मोना चौधरी ने लंबी सांस ली फिर बोली--- "लाओ, पचास लाख ।"

"उसके बाद तो तुम्हारे-मेरे रास्ते अलग-अलग होंगे ।" ताराचंद ने मोना चौधरी की आंखों में  देखा ।

"हां । मैं तुम्हारी तरह टेढ़ी आंख करके भी नहीं देखूंगी । पचास लाख  दो । ये बातें खत्म करो। मैं जाऊं ।" मोना चौधरी ने कहा--- "लेकिन ये बात याद रखना कि मेरे हट जाने से, मैडम या लता किसी दूसरे को तुम्हारी हत्या के लिए भेज देंगे ।"

ताराचंद का चेहरा सुलग उठा ।

"पहले मैं इन बातों से अंजान था । अब बात दूसरी है । सब संभाल लूंगा ।" कहने के साथ ही वो उठा और उस कमरे को पार करके दूसरे कमरे में चला गया।

मोना चौधरी रिवॉल्वर थामे उठी और टहलती हुई दूसरे कमरे के दरवाजे पर जा खड़ी हुई । सामने ही बैड पर ताराचंद नोटों की गड्डियां बिखेर चुका था और अब एक थैले में, वो नोटों की गड्डियां डाले जा रहा था । तभी उसकी निगाह मोना चौधरी पर पड़ी तो वो ठिठक गया ।

"चिंता मत करो ।" मोना चौधरी बोली--- "मैं यहां सिर्फ इसलिए खड़ी हूं कि तुम कोई चालाकी न करो ।"

ताराचंद ने कुछ नहीं कहा। पुनः नोटों की गड्डियां थैले में डालने लगा । चेहरा गुस्से से भरा हुआ था ।

मोना चौधरी वहीं खड़ी रही।

चौथे मिनट वो नोटों से भरा थैला लेकर करीब आया ।

"लो । थैले में पूरे पचास लाख हैं। दो गड्डियां ऊपर ही डाली है।"

मोना चौधरी ने थैला संभाल लिया ।

"मैडम की बातों से सतर्क रहना । ये जानकर कि मैंने तुम्हें बता दिया है । वो तुम्हें बातों में फंसा सकती है ।"

"मैं बच्चा नहीं हूं । मैडम शायद इस बात से नाराज हो सकती है कि मैं या मेरे चेले आश्रम में आने वाली औरतों को फंसा लेते हैं । वो मुझे एक-दो बार मना भी कर चुकी है कि ये काम बंद कर दूं । परन्तु ये काम बंद नहीं हो सकते । मैं और मेरे साथी अकेले पड़े रहते हैं । हमें भी रंगीनियों की जरूरत है । वरना बे-मौत मर जाएंगे हम ! परवाह नहीं । ये बात ठीक है कि मैडम के लिए काम करता हूं, लेकिन मुझे मैडम के सहारे की जरूरत नहीं । मेरे हाथ लंबे हैं । खुद को संभाल सकता हूं मैं । मोना चौधरी, मैं मैडम से नहीं । मैडम, मुझ जैसे लोगों की वजह से अपना अस्तित्व कायम रखती है।"

"फिर भी तुम्हें सतर्क रहने की सख्त जरूरत...।"

उसी पल वहां आरती की धुन गूंज उठी ।

मोना चौधरी चौंकी ।

"ये आवाज कैसी ?"

"वायरलैस सैट पर, मैडम है ।" ताराचंद ने दांत भींचकर कहा और क्रोध से पेटी की तरफ बढ़ा ।

"क्या जरूरत है बात करने की ।"

"हर्ज ही क्या है । कमीनी मैडम को बता तो दूं कि ताराचंद पर हाथ डालना आसान नहीं ।" उसने पेटी खोली ।

मोना चौधरी ने नोटों वाला थैला नीचे रख दिया । दूसरे हाथ में अभी भी रिवॉल्वर दबी थी ।

ताराचंद हैडफोन कानों से लगा चुका था ।

"कहो ।" गुर्राहट निकली ताराचंद के होंठों से ।

"तुम्हारी आवाज को क्या हो गया ताराचंद ?" मैडम का स्वर कानों में पड़ा ।

"मेरी आवाज ठीक है । तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है ।" ताराचंद की आवाज में खतरनाक भाव आ गए थे--- "तुम क्या समझती थी कि मोना चौधरी को भेजकर, मेरी हत्या करवा दोगी । बीस लाख में मेरी जान का सौदा।"

"क्या कह रहे हो ताराचंद ।" कमलेश का भिंचा स्वर उसके कानों में पड़ा ।

"शटअप । बहुत हो गया । मैं तुमसे सारे संबंध तोड़ता हूं । तुम...।"

"मोना चौधरी तुम्हें मिली ?"

"हां । वो अभी भी मेरे पास...।"

"क्या कहा उसने तुम्हें ?"

"जो तुमने सुना । तुमने सोचा कि मुझे पता नहीं चलेगा और मोना चौधरी मेरी हत्या करके...।"

"गलत कहा है तुम्हें । उसकी बातों में मत आना । वो...।"

"तुम कभी भी नहीं कहोगी कि तुमने या लता ने मोना चौधरी को मेरी हत्या के लिए यहां भेजा ।"

"मेरी बात सुनो ताराचंद ।" कमलेश का कठोर स्वर कानों में पड़ा--- "मोना चौधरी तुम्हें अपनी बातों से भटका रही है । वो क्यों ऐसा कर रही है । मैं नहीं जानती । लेकिन ऐसा कहकर, वो अपना सोचा पूरा करना चाहती ।"

"बस मैडम ! बहुत हो गया । अब मैं तुम्हारी बातों में नहीं आने वाला । मैं तुम्हारे लिए खतरों से खेलता रहा और तुमने मुझे क्या दिया । धोखा...। तुम्हारा-मेरा रिश्ता खत्म । मेरे रास्ते में मत आना और अपनी ताकत मुझे पर आजमाने की कोशिश मत करना ।"

"ताराचंद । तुम बोल रहे...।"

गुस्से में कांपते हुए ताराचंद ने वायरलैस सैट ऑफ किया और हैडफोन उतारकर पेटी में रख दिया । उसका चेहरा धधककर सुर्ख हो रहा था। दांत भिंचे हुए थे ।

मोना चौधरी की आंखों में कहर भरे भाव आ ठहरे ।

"मैडम, इतनी आसानी से तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी ।"

"मुझे पीछा छुड़ाना आता है ।" गुर्रा उठा ताराचंद, मोना चौधरी को देखकर--- "और तुम भी इस बात का ध्यान रखना कि मैंने तुमसे डरकर,  तुम्हें पचास लाख नहीं दिए । इसलिए दिए कि मैं आश्रम में शोर-शराबा नहीं चाहता ।"

"मैं जानती हूं तुम बहादुर...।"

तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई।

मोना चौधरी की निगाह फौरन दरवाजे की तरफ गई ।

ताराचंद अपने गुस्से से भरे चेहरे पर काबू पाने की चेष्टा करने लगा ।

"कौन है बाहर ?" मोना चौधरी ने पूछा ।

"चिंता मत करो । यहां तक कोई बाहरी बंदा नहीं आ सकता ।" कहते हुए ताराचंद दरवाजे की तरफ बढ़ा ।

मोना चौधरी ने रिवॉल्वर अपने कपड़ों में छिपा ली 

ताराचंद ने दरवाजा खोला तो बाहर मुनीराम को पाया ।

"आओ ।" मुनीराम भीतर प्रवेश कर गया । मोना चौधरी पर नजर पड़ी तो ठिठक गया । एकाएक उसे ध्यान आया कि स्वामी ताराचंद के चेहरे पर भी ठीक भाव नहीं है--- "क्या बात है स्वामी जी । तबीयत तो ठीक है।"

ताराचंद ने गुस्से से भरे स्वर में धीमे से कहा ।

"मैडम ने मोना चौधरी को यहां मेरी हत्या के लिए भेजा है ।"

"आपकी हत्या के लिए ?" मुनीराम चौंका--- "भगवान की इच्छा के विरुद्ध है ये कार्य ।"

तभी माना चौधरी ने नीचे पड़ा थैला उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ती हुई बोली ।

"मैं जा रही हूं ।"

"ये मोना चौधरी है स्वामी जी ?" मुनीराम की निगाह उस पर जा टिकी ।

"हां ।"

"थैले में क्या है ?"

ताराचंद ने मोना चौधरी को देखा ।

"किधर जाओगी ।"

"ये पैसा कहीं रखकर वापस आ जाऊंगी । अभी अजबसिंह को तलाश करना है ।"

"मैं चाहता हूं तुम यहां से चली जाओ ।"

"मेरा भी रुकने का मन नहीं है । अजबसिंह को निपटाते ही चली जाऊंगी । तुम उसे तलाश करने की कोशिश करो ।" कहने के साथ ही मोना चौधरी थैला संभाले बाहर निकल गई ।

मुनीराम अगर वहां न पहुंचता तो, मोना चौधरी ने उसे शूट करने का फैसला कर लिया था । परन्तु अब अपना फैसला कुछ वक्त के लिए आगे बढ़ा दिया था । पचास लाख नगद रुपया था, उसके पास । आश्रम में रखना ठीक नहीं था । यही सोचा कि रुपयों से भरा थैला कहीं जंगल में छिपा आती है और पुनः मौका मिलते ही, ताराचंद को शूट करके यहां से निकल जाएगी।

"हुआ क्या स्वामी जी ।" बोला मुनीराम ।

"मैडम ने मेरी सेवाओं का ये सिला दिया ।" ताराचंद दांत भींचकर धीमे स्वर में गुर्रा उठा--- "बीस लाख रुपया मोना चौधरी को देकर, मेरी हत्या करने को कहा ।"

"मैडम ने ?"

"हां । ये तो अच्छा हुआ कि मोना चौधरी ने मुझे बता दिया और मैंने सब ठीक कर लिया ।"

"कैसे ठीक कर लिया ?"

"पचास लाख देकर मोना चौधरी को वापस भेज दिया । बहुत बुरा किया मैडम ने ।"

मुनीराम मुस्कुराया । जहर से भरी मुस्कान ।

ताराचंद की आंखें सिकुड़ी ।

"क्या हुआ तेरे को ?"

"स्वामी जी ।" मुनीराम कह उठा--- "साल भर से मैडम ने मेरे पास एक ट्रांसमीटर पहुंचाया हुआ है । उस ट्रांसमीटर के जरिए मैडम मेरे से बात कर लेती है और जरूरत पड़ने पर मैं मैडम से बात कर लेता हूं ।"

ताराचंद चौंका ।

"मैडम ने ट्रांसमीटर तुम्हारे पास भेजा हुआ है ?" उसके होंठों से निकला ।

मुनीराम के चेहरे पर वही मुस्कान उभरी रही ।

"मैं समझा नहीं मुनीराम ।"

"मैडम का मुझे आदेश है कि तुम्हारी हरकतों पर नजर रखूं और उन्हें खबर करता रहूं । मैं बेशक आपके साथ काम करता हूं । लेकिन हम सब हैं तो मैडम के लिए काम करने वाले ही ।"

ताराचंद का चेहरा गुस्से से भर उठा।

"तुम मैडम को जानते तक नहीं । मेरे लिए काम करते हो । मेरे से खर्चा-पानी लेते हो । तुम मेरे आदमी हो । न कि मैडम के । फिर तुमने मैडम की बात क्यों मानी । क्यों उसे यहां की खबरें देते रहे ।"

"वो तो बात बहुत पुरानी हो गई ताराचंद जी । आगे तो सुनिए । अभी-अभी मैडम ने मुझसे बात की कि ताराचंद गद्दारी पर उतर आया है । उसे खत्म कर दूं तो मैं फौरन यहां आ पहुंचा ।"

"ओह ।" दरिंदगी नाच उठी ताराचंद के चेहरे पर--- "तू मेरी जान लेने आया...।"

"कैसी बातें करते हो ताराचंद जी । मैं भला आपकी जान ले सकता हूं ।" मुनीराम मुस्कुरा उठा--- "मैं तो आपको बता रहा हूं कि मैडम ने मुझे क्या कहा।"

ताराचंद कई पलों तक मुनीराम को देखता रहा । फिर गुस्से से बोला ।

"मैडम सच में कमीनी औरत है । वो...।"

"आप ये क्यों नहीं सोचते कि मोना चौधरी झूठ कह रही है कि मैडम या लता ने उसे आपकी हत्या करने के लिए कहा है ।"

"वो झूठ क्यों बोलेगी ?"

"आपका विश्वास पाने के लिए । आपसे दौलत लेने के लिए।"

"नहीं । मोना चौधरी ऐसा झूठ नहीं बोलेगी । विश्वास तो उसने मेरा तब ही पा लिया था । जब मालूम हुआ कि उसे अजबसिंह की हत्या के लिए भेजा गया है ।

तभी मुनीराम ने बिजली की तेजी से अपने कपड़ों में छिपाया आठ इंच लंबे फल वाला चाकू निकाला और पलक झपकते ही पूरी ताकत से ताराचंद की गर्दन पर वार कर दिया ।

ताराचंद को संभलने और समझने का मौका ही नहीं मिला ।

चाकू उसकी गर्दन में आधे से ज्यादा उतरता चला गया ।

ताराचंद का शरीर जोर से कांपा, फिर एकाएक बे-हरकत हुआ और दाईं तरफ नीचे जा गिरा । मर चुका था वो । उसे इस बात का भी एहसास नहीं हो पाया था कि वो मौत के करीब आ पहुंचा है।

मुनीराम दांत भींचे कई पलों तक उसकी लाश देखता रहा । फिर मध्यम से स्वर में पुकारा ।

"श्रद्धानंद ।"

"दूसरे ही पल दरवाजे से श्रद्धानंद ने भीतर प्रवेश किया ।

"ताराचंद जी स्वर्ग की तरफ रवाना हो गए हैं ।" मुनीराम ने श्रद्धानंद के चेहरे को देखा । जहां अभी भी ठुकाई के निशान नजर आ रहे थे--- "जाने से पहले वो अपना स्थान मुझे सौंप गए हैं ।"

"जी मुनीराम जी । मैं बाहर खड़ा सब सुन रहा था । स्वामी जी ने अपना शरीर त्याग दिया है ।" श्रद्धानंद बोला ।

"अब मैं यहां का स्वामी बनूंगा । मुनीराम स्वामी कहा जाएगा मुझे ।"

"अच्छा नाम है मशहूर हो जाएगा ।"

"तुम मेरे खास सेवक रहोगे । जैसे मैं ताराचंद जी का सेवक रहा ।"

"सब समझ गया।"

"इसके गले से चाकू निकालो और साफ करके मुझे दो । गर्दन भी साफ करके कपड़ा लपेट देना । कोई जख्म को न देख सके । आज ही इसका संस्कार कर देते हैं ।"

"ऐसे कार्य तो तुरन्त कर देने चाहिए ।" कहने के साथ ही श्रद्धानंद आगे बढ़ा और गर्दन में फंसा चाकू निकालकर, धो-साफ करके मुनीराम को थमाया तो मुनीम ने चाकू अपने कपड़ों में छिपा लिया ।

श्रद्धानंद लाश को ठीक करने में व्यस्त हो गया ।

"तुम्हें कितनी देर लगेगी, इस शरीर को सामान्य बनाकर रखने में ?"

"आधा घंटा।"

"ठीक है । मैं मैडम को खबर करता हूं कि उनका काम पूरा हो गया । आधे घंटे बाद आश्रम में ये बात कह दूंगा कि संसार में पाप ज्यादा हो गए हैं । ये बात स्वामी जी ने सुबह मुझे बताई कि, रात भगवान ने सपने में आकर कहा था । ये भी कहा कि पापों को कम करने के लिए, उनके प्राणों की आवश्यकता है तो उन्होंने अपनी जिम्मेवारियां मुझे सौंपते हुए, संसार से पापों को कम करने के लिए प्राण त्याग दिए ।"

"ये ठीक रहेगा ।"

"ध्यान रहे श्रद्धानंद । जब स्वामी जी ने प्राण त्यागे तब तुम मेरे साथ थे ।"

"मैं तो वास्तव में आपके समीप ही था।"

"पूछने पर सबसे यही कहना है कि स्वामी जी के मुंह से सफेद दूधिया रंग का प्रकाश पुंज निकला और उस खुली खिड़की से बाहर निकलता चला गया । दूसरों को इस बात का विश्वास दिलाना है कि ऐसा ही हुआ । तभी इस आश्रम का नाम फैलेगा । दूर-दूर से श्रद्धालु मोटा चढ़ावा लेकर आएंगे । कब से मेरी तमन्ना है कि दिल्ली में मेरी कम से कम पच्चीस बसें चलें । अब इतना पैसा आ जाएगा कि दिल्ली की सड़कों पर सी.एन.जी. वाली मेरी बसें दौड़ने लगेंगी ।"

"लेकिन उन बसों की देख-रेख कौन करेगा ? आप तो आश्रम के कार्यों में व्यस्त होंगे ।"

"ये कोई समस्या नहीं । दिल्ली में किसी से ब्याह कर लूंगा । उसके घर वाले मेरा ये बिजनेस संभाल लेंगे ।"

"ये ठीक रहेगा । लेकिन दिल्ली के साथ आपको इतना प्यार क्यों है ?"

"कभी मैं दिल्ली में बस कंडक्टर हुआ करता था । बहुत बरस हो गए इस बात को ।"

"ओह । फिर तो दिल्ली से आपको प्यार होना ही चाहिए । लेकिन वो बोर शहर है ।"

"तुम्हें कैसे मालूम ?"

"पांच साल मैंने दिल्ली में पॉकेट मारी का धंधा किया था । सज-संवर के लोग चलते हैं। पर्स में पैसे नहीं होते । तंग आकर मैंने दिल्ली ही छोड़ दी । भूखे मरने की नौबत आ गई थी । यहां बढ़िया है।  मजे ही मजे हैं ।"

"जो कहा है । वो करो । मैं ट्रांसमीटर पर मैडम को खबर करके आता हूं ।" मुनीराम बाहर निकल गया।

■■■

इंस्पेक्टर विमल नेगी और मोदी, आधी रात के बाद ही जंगल में पहुंच गए थे । अपनी दोनों कारें उन्होंने पीछे ही छोड़ दी थी कि, आश्रम वाले हैडलाइट की रोशनी में सतर्क न हों । उसके साथ आए थे इंस्पेक्टर दौलतराम और हवलदार सुरेशचंद, पूरनचंद।

आश्रम से कुछ हटकर, जरा सी जगह पर उन्होंने वक्ति डेरा जमा लिया था । रात को आश्रम की तरफ जाना, शक का केंद्र बनने की बात थी । इसलिए उन्होंने दिन की रोशनी में उधर जाने का प्रोग्राम बनाया और जब वो लेटे तो सुबह के साढ़े चार बज रहे थे ।

दोनों हवलदार नहीं सोए । वो पहरे पर रहे ।

जब उनकी आंख खुली तो सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे ।

वे सब बारी-बारी नदी पर जाकर नहाए । फिर ब्रेड-जैम का नाश्ता करते हुए बात करने लगे कि कैसे आश्रम पर जाना है और वहां मोना चौधरी को तलाश करने के लिए क्या-क्या करना है । मोदी उनकी बातों में कम ही दखल दे रहा था । बातें सुन अवश्य रहा था।

महाजन और पारसनाथ इन लोगों से ज्यादा दूर नहीं थे । वो सुबह उजाला होने से कुछ पहले ही उस जंगल में पहुंच गए थे । वो आश्रम को तलाश करते हुए जंगल में टॉर्च के सहारे इधर-उधर घूम रहे थे । उनकी नजर दूर चमकती टॉर्च पर पड़ी तो उन्होंने सावधानी के नाते फौरन टॉर्च बंद कर दी ।

"उधर कोई है ।" महाजन ने जेब से छोटी बोतल निकालकर घूंट मारी ।

"आओ ।"

महाजन और पारसनाथ दबे पांव उस तरफ बढ़ गए ।

कुछ दूर ठिठककर उन लोगों को देखने लगे । दो व्यक्ति जगे हुए टहल रहे थे । उनके हाथों में टॉर्च थी । तीन अन्य जमीन पर चादरें बिछाए गहरी नींद में थे ।

"कौन है ये लोग ?" महाजन दबे स्वर में कह उठा ।

"जो भी हो । कम से कम आश्रम वाले नहीं हो सकते । आश्रम वाले होते तो यहां नींद नहीं लेते । आश्रम में जाते।"

"अंधेरे की वजह से इन लोगों के बारे में स्पष्ट नजर नहीं आ रहा ।"

"कुछ ही देर में दिन का उजाला फैलने वाला है । तब तक इंतजार कर लेते हैं ।" पारसनाथ ने धीमे खुरदरे स्वर में कहा ।

करीब पैंतालीस मिनट बाद दिन का उजाला फैलना शुरू हो गया ।

दस-बारह मिनट में स्पष्ट दिखने लगा ।

जब उन्होंने मोदी को पहचाना तो चौंके । इंस्पेक्टर सुनील नेगी को भी पहचाना । उसके बाद धीरे-धीरे वहां से पीछे हट गए । इस वक्त जंगल में ठंडी हवा चल रही थी ।

"ये लोग जैसे लेटे हुए हैं । उससे स्पष्ट है कि हमसे कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं ।" पारसनाथ ने कहा ।

"हां । रात के वक्त इन्होंने आश्रम में जाना ठीक नहीं समझा होगा ।" महाजन के चेहरे पर सोच के भाव थे ।

"ये यहां मोना चौधरी के लिए आए हैं । अब ये आश्रम में जाकर मोना चौधरी को तलाश करेंगे महाजन।"

पारसनाथ को देखते हुए महाजन ने सिर हिलाया ।

"मेरे ख्याल में हमें भाग-दौड़ की जरूरत नहीं पड़ेगी पारसनाथ । इन पर नजर रखनी पड़ेगी । ये आश्रम को भी तलाश करेंगे और बेबी को भी । अगर बेबी यहां आई है तो ।"

"ठीक कहा । इन लोगों पर नजर रखने से हमारा काम बन सकता है । ये जो करेंगे, मोना चौधरी तक पहुंचने के लिए ही करेंगे ।" कहते हुए पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा और नजरें दूर नजर आते, उन लोगों पर टिका दीं ।

"इन लोगों के पास इस बात की भी खबर है कि आश्रम के लोग हिमाचल प्रदेश में ड्रग्स तस्करी से वास्ता रखते हैं । ऐसे में ये लोग आश्रम की अच्छी तरह छानबीन करेंगे ।" मोदी ने कहा और घूंट भरा ।

"इन लोगों पर नजर रखते हैं । सब सामने आ जाएगा ।"

दोनों घनी झाड़ियों की ओट में छिपे । उन पर नजर रखते रहे ।

वो नींद से उठे । नदी पर जाकर नहाए-धोए । फिर वो बातें करते हुए नाश्ता करने लगे । दोनों की नजरें उन पर थी । यदा-कदा वो बात कर लेते थे।

तब दस बज रहे थे । जब उन्होंने वहां से चलने की तैयारी की । वो सब सादे कपड़ों में थे ।

"वे लोग अब उस आश्रम को तलाश करेंगे । जिसके बारे में...।"

"महाजन ।" पारसनाथ के खुरदरे स्वर में तेजी आ गई--- "वो देखो । मोना चौधरी लगती है ।"

महाजन ने भी उधर देखा ।

"बेबी ।" उसके होंठों से निकला ।

मोना चौधरी पचास लाख के नोटों से भरा थैला उठाए उस तरफ ही बढ़ रही थी । वो कोई ऐसी सुरक्षित जगह की तलाश में थी,  जहां वो एक-दो दिन के लिए पैसों को छिपा सके । खासतौर से कोई छोटा-सा गड्ढा । जिसमें थैला डालकर, ऊपर मिट्टी डालकर, उसे छिपाया जा सके । उसके बाद वो पुनः आश्रम पहुंच जाना चाहती थी ।

"मोना चौधरी ।" इंस्पेक्टर विमल कुमार मोदी के होंठों से निकला।

"क्या ?" इंस्पेक्टर सुनील नेगी ने, उसे देखा ।

"वो देखो । मोना चौधरी इधर ही आ रही है । शायद कोई थैला उठा रखा है उसने ।"

नेगी ने ही नहीं इंस्पेक्टर दौलतराम और हवलदार सुरेशचंद पूरनचंद ने भी उधर देखा।

अभी दूर थी मोना चौधरी और इसी तरफ आ रही थी ।

"सब ओट में हो जाओ ।" सुनील नेगी दबे-सतर्क स्वर में कह उठा--- "पेड़ झाड़ियों के पीछे छिप जाओ । मोना चौधरी को शक न हो कि कोई इधर है । उसे आने दो ।"

इसके साथ ही पांचों सावधानी से ओट में हो गए ।

नजरें मोना चौधरी पर रही ।

तीन-चार मिनट में मोना चौधरी करीब आ पहुंची थी ।

सुनील नेगी ने इशारा किया और छिपी जगह से बाहर आ गया। इंस्पेक्टर दौलतराम के साथ हवलदार सुरेशचंद और पूरनचंद भी खुले में आ गए । सबके हाथों में हथियार थे ।

उन्हें देखते ही मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी और वो ठिठक गई ।

वो चारों उसके गिर्द बिखरते जा रहे थे ।

मोना चौधरी ने नोटों से भरा थैला नीचे रख दिया ।

इंस्पेक्टर सुनील नेगी करीब आ पहुंचा था । चेहरे पर जहरीले भाव नाच रहे थे ।

"सच में ।" नेगी ने शब्दों को चबाकर कहा--- "चुड़ैल हो । चुड़ैल एक्सप्रेस ही । मुझे बाद में खबर मिली कि आश्रम की आड़ में गलत काम होते हैं । लेकिन तुम पहले पहुंच गई । क्या तुम भी आश्रम वालों के साथ गलत काम करती हो या तुम्हारा यहां पहुंचना महज इत्तेफाक ही है ।"

मोना चौधरी बारी-बारी सबको देखने लगी ।

मोदी अपनी जगह पर छिपा देख रहा था ।

"सोच लो । मुझे जवाब की कोई जल्दी नहीं है ।"

महाजन और पारसनाथ की नजरें उसी तरफ थी । मोना चौधरी को सही-सलामत सामने पाकर उन्हें तसल्ली मिली थी । मोना चौधरी की मौत के डर से वे दूर हो गए थे ।

"उन लोगों ने बेबी को घेर लिया है ।" महाजन दांत भींचकर कह उठा ।

"देखते रहो । हम भी यहीं हैं । वो भी सामने हैं । जाने वे क्या करते हैं ।" पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा ।

"मोदी अभी तक सामने नहीं आया ।"

"आएगा । आखिर कब तक छिपा रहेगा ।"

दोनों की नजरें वहां हो रही हरकतों पर टिकी रही ।

सुनील नेगी आगे बढ़ा ।

"इतने खतरनाक एक्सीडेंट के बाद भी तुम बच गई । ये हैरत की बात है । तुम्हें खुशी होनी चाहिए ।"

"मैं खुशी मना चुका हूं ।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा--- "तुम यहां कैसे ?"

"तुम्हारे पीछे-पीछे ।"

"कैसे मालूम हुआ कि मैं यहां हूं।"

"मालूम हो जाता है ।" करीब पहुंचकर नेगी ने थैले में हाथ मारा तो नोटों की ढेर सारी गड्डियां देखकर चौंका । उसने हैरानी से नोटों पर से नजरें हटाकर मोना चौधरी को देखा--- "कितने है ?"

"पचास लाख ।"

"तो तुम आश्रम वालों की ड्रग्स रैकेट में काम करती हो । या ऐसा ही कुछ...।"

"ऐसा कुछ भी नहीं है ।"

"तुम्हारे कहने पर कौन विश्वास करेगा ।"

"तुम ।"

"मैं बहुत कम किसी पर विश्वास करता हूं ।" नेगी ने कठोर स्वर में कहा फिर अपने साथियों से बोला--- "पकड़ लो इसे ।"

अगले ही पल इंस्पेक्टर दौलतराम और दोनों हवलदारों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया ।

मोना चौधरी के दांत भिंच गए ।

"गलत कर रहे हो इंस्पेक्टर नेगी ।"

"एक बार तो तुम मेरी गिरफ्त से भाग गई थी । अब मैं तुम्हें भागने का मौका नहीं दूंगा मोना चौधरी ।" नेगी ने शब्दों को चबाकर कहा--- "इसके हाथ-पांव डोरी से अच्छी तरह बांध दो ।"

"कसकर पकड़ो इसे।" इंस्पेक्टर दौलतराम ने कहा और वहां से सामान के पास पहुंचा । उसमें से नाइलोन की डोरी निकालकर करीब आया और मोना चौधरी के हाथ-पांव अच्छी तरह बांध दिए।

मोना चौधरी उकड़ू-सी बैठ गई ।

तभी गहरी सांस लेकर मोदी ओट से बाहर आ गया ।

उसे देखते ही मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी ।

"तो ये सब तुम्हारे इशारे पर हो रहा है ।" मोना चौधरी के स्वर में कड़वापन आ गया ।

"नहीं ।" मोदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "मैं तो इस सारे मामले में मूकदर्शक हूं ।"

"इसके साथ हो, मूकदर्शक हूं ।"

"हां । ये जो कर रहे हैं । उसमें मेरी राय भी शामिल नहीं है ।" मोदी ने गम्भीर स्वर में कहा ।

सुनील नेगी ने तीखी निगाहों से मोदी को देखा ।

"जरा इससे पूछो तो, ये पचास लाख रुपया किस सौदे के तहत इसने लिया है ।"

"तुम्हारा मामला है ।" मोदी ने कहा--- "मेरा पूछना नहीं बनता ।"

"मेरे कहने पर तो पूछ सकते हो ।"

टांगे कसकर बंधी होने के कारण मोना चौधरी ठीक से खड़ी न हो पा रही थी । आखिरकार वो धीमे से नीचे बैठ गई । ताकि खुद को ठीक महसूस कर सके ।

मोदी आगे बढ़ा और नोटों से भरे थैले को देखा ।

"इतना पैसा-पच्चीस लाख रुपया कहां से लाई ?" मोदी ने पूछा ।

मोना चौधरी शांत भाव से मुस्कुराई ।

"हाथ-पांवों के बंधनों के कारण तंगी महसूस कर रही हूं । ऐसे में मैं किसी बात का जवाब ठीक से नहीं दे पाऊंगी ।"

मोदी ने सुनील नेगी को देखा।

"अगर इससे कुछ पूछना चाहते हो तो हाथ-पांव खोल दो ।"

"कोई जरूरत नहीं ।" नेगी ने मोना चौधरी को घूरते हुए कड़वे स्वर में कहा--- "देर सवेर में ये ऐसे ही सब कुछ बता देगी ।"

मोदी गहरी सांस लेकर पीछे हट गया ।

"तुम ऐसे ही बंधी पड़ी रहोगी ।" नेगी ने शब्दों को चबाकर कहा--- "अगर मेरे से जल्दी रियायत चाहती हो तो ये जो पूछता है, बता दो। तब मैं कोशिश करूंगा कि तुम्हें किसी बात की ज्यादा तकलीफ न हो ।"

"मेरी फिक्र मत करो । मुझे तकलीफें सहने की आदत है ।" मोना चौधरी कठोर किंतु व्यंग भरे स्वर में कह उठी ।

महाजन के दांत भिंच चुके थे ।

पारसनाथ रह-रहकर अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेर रहा था । नजरें उधर ही थी ।

"बेबी के बचने का रास्ता नजर नहीं आता । बचकर निकल नहीं सकेगी ।" महाजन बोला ।

पारसनाथ कठोर निगाहों से, वहां के हालातों को देखता रहा ।

"मोदी भी हम लोगों के साथ है ।" महाजन के स्वर में तीखापन था ।

पारसनाथ ने खुरदरे चेहरे पर पुनः हाथ फेरा और सपाट स्वर में  कह उठा ।

"वे पुलिस वाले हैं । उनके पास रिवॉल्वरें हैं । वो पांच हैं । हम दो हैं ।"

"तो ?" महाजन का स्वर उखड़ गया ।

"ऐसे में उन पर काबू पाना या मोना चौधरी को छुड़ाना आसान काम नहीं ।" पारसनाथ बोला ।

"हम बेबी को उनके पास नहीं छोड़ सकते ।"

"मैंने कब कहा कि मोना चौधरी को हम छुड़ाएंगे नहीं ।"

दोनों की नजरें उधर ही थीं ।

"ये सब ज्यादा देर नहीं चल सकता ।" महाजन ने गुस्से से कहा और घूंट भरकर बोतल पैंट में फंसा ली--- "मैं उधर जा रहा हूं।  जैसे भी होगा । बेबी को वहां से निकालूंगा ।"

"जल्दी मत करो । मैं भी साथ हूं । पहले ये तय कर लेते हैं कि क्या कदम उठाना है ।"

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