महाराज की नाक के निचेसे अमर और उसके साथियो ने समर का राजमहल से अपहरह कर लिया, यह बात आग की तरह चारो ओर फैली। किसी शिष्य ने यह बात सम्यकमुनी को बताई। उन्हें बताया गया की अमर और सलोनी दोनों मिलकर समर को कही ले गए और बाकी के महाराज के कैद में है। सम्यकमुनी को पता है की अमर कोई भी ऐसा गलत कदम नही उठाएगा, जिसकी वजह से उसके गुरु का नाम ख़राब हो। वो समझ गए की इसके पीछे अमर का कोई महत्वपूर्ण लक्ष है। उन्होंने अपनी दैवी दृष्टी से उनका पता लगाया। तभी उन्हें दिखाई दिया की वो सब त्रिरिका पहाड़ के पास पहुच चुके है। पर उनके इर्द गिर्द बहोत सारी काली शक्तियां है, जो पग-पग पर ताकदवर हो रही थी। ये सब दृश्य देखके उनको अहसास हुवा की अमर और सलोनी वहा समर को काली शक्तियों से बचा नही पाएँगे, इसीलिए उन्होंने अपने आश्रम में समर, सलोनी और अमर के लिए एक महायज्ञ करने का फैसला किया। जिसकी ताकद से उन्हें काली शक्तियों से मुकाबला करने की ताकद मिलेगी।
राजमहल में महाराज की सच उगल्वाने की हर योजना नाकाम हो रही थी। तभी महारानी और महाराज भोला, शरद और कुश से मिलने तहखाने में गए। तीनो ने देखा की महाराज और महारानी के चेहरे पर अजीबसी घबराहट थी। दोनों ने तीनो के सामने अपने हाथ जोड़े और घुटनों के बल बैठके तीनो से विनती करने लगे, “कृपया हमारे पुत्र का पता बता दो। वो अभी अपनी मौत से सामना करने वाला है। अमर और सलोनी दोनों कितनी देर तक समर को संभाल पाएँगे। जैसे-जैसे दिन बित रहे है, उसके राक्षस बनने का खतरा और ज्यादा गहरा होते जा रहा है। अब समर के पास सिर्फ ६ दिन है और अमर की मदद करने वहा कोई नही है। हमें उनका पता बता दो शायद हम उनकी कुछ मदद कर सके।”
शरद, “महाराज-महारानी साहिबा अगर आप हमसे ऐसे पहले ही पूछते तो हम आपको कबका पता बता देते।”
भोला, “हाँ, खामोखा हमें इतनी मार खिलाई।”
महाराज, “हमें क्षमा करदो पुत्रो।”
कुश, “क्षमा हम आपको बस एक ही शर्त पर करेंगे। हमें भी आपके साथ वहा ले जाना होगा। पता नही हमारे मित्र कैसी हालत में होंगे?”
महाराज, “हाँ, ठीक है। हम आपको हमारे साथ ले जाएँगे, पर यह तो बताओ की वो तीनो गए कहा पर?”
शरद, भोला और कुश तीनो ने एकसाथ कहा, “त्रिरिका पहाड़ी।”
इस पहाड़ी का नाम सुनते ही महारानी ने घबराहट के मारे महाराज का हाथ पकड़ लिया। महाराज भी घबरा गए और कहने लगे, “क्या? त्रिरिका पहाड़ी पर?”
कुश, “हाँ, क्योकि वही हमें समर का इलाज मिलेगा।”
महाराज, “वो तो इस संसार की सबसे भयानक पहाड़ी है। वहा कदम-कदम पर मौत मंडराती है। हिममानव, चुड़ैले, पता नही वहा कितने शैतान वास करते होंगे। हमें तुरंत त्रिरिका की और प्रस्थान करना होगा। (सेनापति को बुलाके) सेनापति तत्काल हमारी सेना को तैयार कीजिए। हमें युद्ध पर जाना है। एक भयानक युद्ध पर।”
महाराज ने तीनो को अपने साथ लिया और अपने पीछे आने को कहा, “अभी तुम सबके पास सिर्फ दुपहर तक का समय है। इतने समय में तुम लोगो को क्या चाहिए वो लेलो। क्योकि हमारा सफ़र कठीनाईयों से भरा रहेगा। और अब वक्त आ गया है अपनी गलतियों को सुधारने का।”
ईधर महाराज युद्ध की तयारी करने लगे, तो आश्रम में सम्यकमुनी ने महायज्ञ की शुरुवात की। आश्रम के सभी सदस्य महायज्ञ में शामिल हुए। मंत्रोका जाप करते हुए, अच्छाई से भरी शक्तियों को आमंत्रित करने लगे।
अमर, सलोनी और समर त्रिरिका पहाड़ी के पास पहुच चुके थे। पर अब उनके पास बहोत कम वक्त था। शैतानी शक्तिया बहोत ताकतवर हो रही थी। अमर और सलोनी मिलकर अपने दोस्त समर को पहाड़ी के ऊपर चढ़ा रहे थे। पर समर बहोत कमजोर था। वो पहाड़ी पर चढ़ नहीं पाया। वो निचे गिर पड़ा। तभी उसे सलोनी ने पकड़ लिया। अमर ने निचे मुडके देखा तो सलोनी समर को पकडे हुए थी। वो बड़ी तेजी जे निचे आया। उसने अपने दोस्त को अपनी पीठ से बांध दिया और फिर आगे बढ़ने लगा। एक-एक कदम वह अपनी मंजिल की ओर बढाने लगे। फिर अचानक सामने खडी पहाड़ी आई, तो भी अमर का विश्वास डगमगाया नही। उसने समर को अपने आप से अच्छी तरह से बांध लिया और खडी पहाड़ी पर चढने लगा। एक दो बार वो निचे गिरने वाला था। उसकी पूरी ताकद ख़तम हुई थी, पर उसकी हिम्मत टस से मस नही हुई। उसे अपने और समर के दिन याद आए। सलोनी निचेसे उसकी हिम्मत बढ़ाते हुए ऊपर चढ़ने में उनकी मदत करने लगी। अमर ने एक बार समर को देखा। उसे देखके महसूस हुवा की उसकी हालत और भी ख़राब हो रही है। अमर ने अपने अंदर की सारी ताकद समेठी और पूरी तेजी से आगे बढ़ने लगा। सलोनी भी आगे बढ़ने में मदत कर रही थी। अब शाम होने को आई, थंड बढ़ने लगी। तभी सलोनी ने देखा की काली शैतानी शक्तियां उनके पास पहोच रही है। उसने अमर को बताया। अमर जल्दी-जल्दी जमीं की ओर बढ़ने लगा। शैतानी शक्तियां पास होने के कारन समर झटके पे झटके मारने लगा। सलोनी ने जादुई गोला बाहर निकाला। कुछ देर के लिए शैतानी शक्तियां उन तीनो से दूर हो गई। जैसे तैसे तीनो जमीं पर पहुचे। अमर समर को अपनी पीठ पर लेकर भागने लगा। पर वो कब तक भाग पाता। शैतानी शक्तियोंने उनको पकड़ लिया और उनके उपर हमला कर दिया। तीनो अपने आप को उनसे बचाने की कोशिश कर रहे थे, पर शैतानी शक्तियां बहोत शक्तिशाली थी। उन्होंने अमर और सलोनी को शैतानी पेड़ के जर्ये बांध दिया। सलोनी ने बंधने से पहले जादुई गोला समर के तरफ दे दिया। फिर भी शैतानी शक्तियां समर के पास बिना रूकावट आई। उन शक्तियों ने जैसेही जादुई गोले को छुवा, वह गोला काला पड़ने लगा। उन्होंने समर को पकड़ लिया। समर को पकड़ ने के बाद एक-एक कर शैतानी शक्तियाँ उसके शरीर के अंदर प्रवेश करने लगी। बंधे हुए अमर और सलोनी समर को हिम्मत दे रहे थे।
अमर समर को हिम्मत देते हुए कहने लगा, “हिम्मत रखो भाई, हिम्मत रखो। यह काली शक्तियां तुम्हारा कुछ बिगाड़ नही पाएगी। उन्हें अपने आप पर हावी मत होने देना। तुम उनके नियंत्रण में मत आना। उनके ऊपर तुम्हे नियंत्रण हासिल करना है। अपने आप को खोना मत मेरे भाई। बस हिम्मत से काम लेना।”
जैसे-जैसे शैतानी शक्तियां समर के शरीर में प्रवेश करने लगी, वह शैतान में बदल ने लगा। आखिर कार वह एक खूंखार शैतान में बदल गया। उसने अमर और सलोनी के तरफ देखा। और वहासे शेरो की तरह आवाज करते हुए चला गया। अमर और सलोनी अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करने लगे।
उधर महाराज अपने सैनिको के साथ त्रिरिका पहाड़ी जाने को तैयार था। पर बहोत कम वक्त में त्रिरिका कैसे पंहुचा जाए? ऐसा प्रश्न कुश ने महाराज से किया। तब महाराज अपने विश्वसनीय सैनिक, सेनापती एवं भोला, कुश और शरद को लेकर एक गुफा की और बढ़ने लगे। उधर अमर और सलोनी अपने आप को छुडाने मे कामयाब हो गए। पर अब नई मुसीबत उनके सामने आके खड़ी हो गई। एक हिममानव वहा आया। उसको देखके दोनों एक बड़े पत्थर के पीछे छुप गए। पर हिममानव की नाक बहोत तेज है। उसने अमर और सलोनी को ढूंढ लिया और उन्हें पकड़ने उनके पीछे पड़ा। तभी अमर और सलोनी की खुशबू सुंगते हुए वहा दूसरा हिममानव आया। अमर और सलोनी को पकड़ने के चक्कर में आपस मे ही लड़ने लगे। उधर महाराज अपनी सेना लेके एक शाही गुफा पहुचे। सेनापती ने आगे बढ़के गुफा का दरवाजा खोला।
शरद, “अब ये क्या है?”
कुश, “मुजे नही पता।”
महाराज, “ये एक दरवाजा है। इसका एक सिरा यहाँ गुफा में, तो दूसरा सिरा त्रिरीका पहाड़ी पर खुलता है।”
महाराज ने अपनी शाही तलवार निकाली और गुफा के मुहाने पर बने ताले में डालकर घुमाया। गुफा का दरवाजा खुल गया। दरवाजा खुलतेही सबसे पहले सेनापती और कुछ सैनिक गुफा के अंदर गए। महाराज सेनापती के आने का इंतजार करने लगे। जैसेही दूसरा सिरा त्रिरिका पे खुला, सेनापती को सामने दो हिममानव दिखाई दिए। उसने देखा की एक हिममानव ने अमर को अपने हाथो में पकड़कर रखा है। उसे छुड़ाने के लिए सेनापती ने हिममानव पे हमला किया, तो हिममानव ने उसको वापस उसी गुफा में फेंक दिया, जहा से वो थोड़ी देर पहले आया था। पर सेनापती कहा हार मानने वाला था। उसने एक सैनिक का धनुषबान लेकर हिममानव पर बानो की वर्षा कर दी। हिममानव बहोत गुस्सा हुवा और सेनापती के पीछे गुफा में चला गया। उसे अपने पीछे देखकर वो भागते हुए गुफा के दुसरे सिरे से बाहर आया।
उसने महाराज को बताया, “अमर और सलोनी खतरे में है।”
महाराज, “समर दिखाई दिया क्या?”
सेनापती, “नहीं, पर एक हिममानव हमारे पीछे आ रहा है।”
अपनी खतरनाक दहाड़ लगाते हुए हिममानव गुफा से बाहर आकर सेना पे हमला करने लगा। महाराज, “सेनापती, आप हिममानव का ध्यान भटकाइये। हमें अन्दर जाना है।”
सेनापती, “ठीक है महाराज, पर अन्दर भी खतरा है। थोडा संभलकर...”
सेनापती और कुछ सैनिको ने मिलकर हिममानव का ध्यान भटकाया। तब महाराज और शैतान मंडली जैसे-तैसे हिममानव को चकमा देके गुफा में प्रवेश कर गए। हिममानव को अंधाधुंध तबाही फैलाते देख सेनापती और सैनिक उसे वापस गुफा के अन्दर ले गए। फिर गुफा अपने आप बंद हो गई। सेनापती और बचे सैनिक गुफा में आए हिममानव के साथ लढाई करने लगे। महाराज और शैतान मंडली दुसरे सिरे से गुफा के बाहर आए। सामने अमर और सलोनी हिममानव के साथ लढाई लड़ रहे थे।
उन्हें मदद करने के लिए महाराज भी हिममानव के साथ लढाई करने लगे। कुश और शरद ने अमर और सलोनी को संभाला। भोला तलवार लेकर महाराज की मदद करने गया। हिममानव ने भोला की तलवार को दो टुकडो में तोड़कर, उसे दूर फेंक दिया और महाराज पर हमला करने लगा। महाराज को बचाने के लिए पास में पड़े तलवार के टुकड़े को हिममानव पर फेंक के मारा। तलवार का टुकड़ा उसके जांग में धस गया। वो बहोत गुस्से मे आया। भोला की तरफ अपने कदम बढाने लगा। गुस्सेसे भरा हिममानव अपने पंजो से भोला पर वार करने लगा। अपने आप को बचा ने के लिए, उसने पास में पड़े काले पत्थर को सामने रखके अपनी जान बचाई। वह कोई काला पत्थर नहीं बल्कि काला पड़ा जादुई गोला था। हिममानव ने गलती से जादुई गोले को खरोचा और उसमे से सफ़ेद चमकीली रोशनी निकली। जिसकी वजह से हिममानव शांत हो गया। शांत होकर महाराज के सामने झुक गया। गुफा के अन्दर जिस हिममानव से सेनापती लढ रहा था, वह भी शांत हो गया। अचानक जंगली से पालतू बन गया। उसी रोशनी की वजह से अमर को बूढ़े पेड़ की कही बाते याद आने लगी। उसके दिखाए दृश्य उसकी आँखों के सामने आए प्रकट हो गए। बादमे सलोनी की कही बाते याद आई की त्रिरिका पहाडीयों में एक ऐसी गुफा है जिसमे दिमाग की कल्पना सत्य में बदल जाती है। यह सारे दृश्य देखकर उसे समझ आया की उसे क्या करना है। बस इस बात का पता किसीको ना चल पाए। तभी उसे महाराज नजर आए। उसे समर के साथ क्या हुवा यह सारी बात बतानी पड़ेगी। इसलिए लंगडाती चाल चलते हुए महाराज के पास गया और उसे समर के साथ घटी सारी बाते बताई। महाराज को अपनी भूल का बोध हुवा। उसने अमर से माफ़ी मांगी और पूछा की अब समर को ढूंडकर कैसे वापस इन्सान बनाया जाये? तब अमर ने महाराज को बताया, “इस पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर जब चाँद अपनी पूरी रोशनी बिखेरेगा, तब उस रोशनी को (एक कांच जैसा पत्थर दिखाके) इस तिलस्मी पत्थर से गुजारकर समर के ऊपर डालना होगा। तभी वह इस श्राप से मुक्त होगा। और ये काम सिर्फ मै कर सकता हु। पर इसमें मुझे आपकी मदद चाहिए।“
महाराज, “क्यों सिर्फ तुम ही क्यों?”
अमर, “क्योकि आगे की रस्मे मुझे ही पता है। इसलिए मुझे ही सबकुछ करना होगा।”
तभी उन्हें गुफा के दरवाजा खुलने की आवाज आई। गुफा से सेनापती अपने सैनिक और हिममानव के साथ त्रिरिका पहाड़ी पर आया। आतेही महाराज से कहने लगा, “अब मेरे लिए क्या आदेश है महाराज?”
महाराज, “आज आदेश मै नहीं अमर देगा।”
अमर, “सेनापती जी आपको समर कहा है पता लगाना है। जब उसका पता लग जाये तुरंत हमें आगाह कीजिये। ध्यान रहे कोई बेवकूफी मत करिएगा।”
तभी सलोनी वहा आकर सेनापती से कहने लगी, “पर उससे पहले कुछ खा लीजिये, थोडा आराम कीजिये और बादमे उसे खोजने के लिए जाइये।” महाराज और अमर सलोनी की तरफ देखने लगे।
तब सलोनी ने दोनों से कहा, “रात हो रही है। सारे सैनिक हिममानव के साथ लढाई करके थक चुके थे। इसलिए महाराज आपकी आज्ञा हो तो इन्हें थोडासा आराम करने का आदेश दीजिये। रही बात समर की वह इसी पहाड़ी पर है, वह हमें मिल ही जायेगा।“
महाराज मान गए। सारे सैनिक खाना खाके आराम कर रहे थे। पर अमर और उसके दोस्त अभीभी जाग रहे थे। महाराज सेनापती के साथ अमर के पास गया और उससे पुछने लगा की तिलस्मी पत्थर उसे कहा और कैसे मिला? तब अमर ने बताया, “जब मुझे झूट बोलने के जुर्म में राजमहल से बाहर निकाला गया। तब मै अपने आप को सजा देने के लिए, काले जंगल की ओर गया। रास्ते में मुझे एक चमकीला झरना दिखाई दिया। जो चाँद की रोशनी न होने के बावजूद भी चमक रहा था। तब मै चमकीले झरने के पास गया। और उसमे मुझे अपना खुद का प्रतिबिंब दिखा। जो मुझे पानी में उतरने को कहने लगा। मै पानी में उतरा तो अचानक पानी मेरे शरीर के ऊपर चढने लगा और मै एक गुफा में पहोच गया। जहा अपने सारे सवालों के जवाब मिलते है। वही एक बोलने वाला पहाड़ था, जिसने मुझे यह तिलस्मी पत्थर दिया। और कहा की पुरे चाँद की रोशनी इस पत्थर से गुजारो और उस रोशनी से राक्षस को गुजारो जिससे उसका श्राप टूट जाएगा। यही हमारे समर का इलाज है। पर ध्यान रखना जब मै यह काम कर रहा हूँगा, तब कोई भी हमारे आस पास ना हो, वर्ना इलाज का असर नहीं हो पाएगा।“
सलोनी अमर के तरफ देखने लगी, कुछ दिनों से वह उसके साथ सफ़र कर रही है। पर अभी तक उसने इतनी महत्वपूर्ण बात उसे क्यों नही बताई? अमर ने सलोनी की आँखों में पनप रहा सवाल पढ़ लिया और जैसे तैसे वहासे उठकर अलग चला गया। अमर के पीछे-पीछे शरद, कुश और भोला भी गए। उन्होंने अमर को पकड़ा और उससे पुछने लगे की जब तुम्हे राजमहल से निकला गया था, तब हम तुमसे मिले थे। सारा काम हमने मिलके किया था। तब तुमने हमें इस पत्थर के बारे में क्यों नही बताया?
अमर ने जवाब दिया, “तब मेरे लिए पत्थर की बात बताने से ज्यादा जरूरी समर को राजमहल से बाहर निकालना था। उसके बाद तुमको यह सब बताने का मौका नही मिला।”
भोला, “मै जानता हु की तुम्हे तिलस्मी पत्थर के बारे में बताने का मौका नही मिला। पर क्या सचमे तुम हमें सम्पूर्ण सत्य बता रहे हो?”
अमर, “भोला, तुम अपने नाम की तरह ही भोले हो यार। तुम सब मेरे दोस्त हो, भला मै तुमसे क्या छुपा सकता हु?”
शरद, “हम तुम्हारी रग-रग से वाकीब है। तुम्हारी बातो से यही प्रतीत हो रहा है की तुम हमें सम्पूर्ण सत्य नही बता रहे।”
अमर, “आज तुम तीनो को क्या हो गया है यार? तुमको ऐसा क्यों लग रहा है की मै तुमसे सम्पूर्ण सत्य छुपा रहा हु। मै तुमसे सत्य नही छुपा सकता मित्रो। मुझपे विश्वास करो। मै सच कह रहा हु। अभी जाके विश्राम करो कल हमें सुबह होने के पहले, समर को खोजने निकलना है।” कहकर उनको टालने की कोशिश करने लगा, किन्तु उसे सलोनी ने अकेले में पकड़ ही लिया और पूछा, “तुम क्या छुपा रहे हो हमसे?”
अमर, “कुछ नहीं?”
सलोनी, “ज्यादा बनो मत! तुम क्या छुपा रहे हो? मुझे बता दो। तुम्हे हमारे प्यार का वास्ता।”
अमर, “ठीक है सब बताऊंगा पर मुझे वचन दो की तुम मेरे कार्य में किसी तरह की कोई भी बाधा नहीं डालोगी।”
सलोनी, “वचन देती हु अब बताओ।”
अमर ने खुदके दिमाग में क्या चल रहा है और कैसे वह समर को श्राप मुक्त कर सकता है इस बारे में सलोनी को बता दिया। यह सारी बाते सुनके वो चिंतित हो उठी और बोली, “और तुम्हारा क्या होगा? नहीं तुम ऐसा नहीं कर सकते। इसके अलावा कोई दूसरा मार्ग अवश्य होगा।”
अमर, “अब मुझे इस बारे में कोई बात नहीं करनी। मुझे ये सब करना ही होगा। अब तुम आराम करो, मुझे भी विश्राम की जरूरत है।”
अमर आराम करने जाते वक्त सलोनी के तरफ देखता है, तब उसकी आँखों में अश्रु थे। अमर ने इशारे से उसे अपने अश्रु पोछने को कहा और उसने वैसा किया भी। भोला और सेनापती आराम कर रहे थे, तभी उन दोनों के बिच में हिममानव आया। हिममानव को देखके दोनों की जान हालत में अटक गई, जैसे साप सुंग गया हो। रात को सोते वक्त जब हिममानव श्वास लेता, तब सेनापती के बाल हिममानव की नाक के तरफ उड़ने लगते। जब वो श्वास छोड़ता, तो उडते हुए बाल वापस सेनापती के मुह पर आकर गिरते। ऐसा ही सारी रात चलता रहा। जब हिममानव भोला की तरफ मुड़ता तो भोला परेशान होता। जब वो सेनापती की तरफ मुड़ता तो सेनापती परेशान होता। कभी भोला, तो कभी सेनापती दोनों रात भर परेशान रहे। आख़िरकार दोनों वहासे उठे और दूसरी जगह जाकर सो गए। तो वहा दूसरा हिममानव आके उनके बिच सो गया। वो भी उन्हें वैसेही परेशान करने लगा।
उधर शैतान बना समर अँधेरी पहाड़ियों की गुफाओं में छुपकर बैठ गया। उसका शरीर भलेही शैतान का था, पर अभीभी वो दिल से इंसान था। उसे अपने दोस्त याद आने लगे। उनकी याद में वो रोने लगा। उसकी आँखों से आसू बाहर निकल रहे थे। जो आसू निचे जमीन पर गिरे वो अचानक एक चमकदार रात कीड़े में बदल गया। और समर के हाथ पर आके बैठ गया।
समर अपने हाथ पर बैठे रातकिडे से बात करने लगा, “अरे छोटेमिया! तुम मेरे आसुओसे कैसे बन गए? क्या तुम भी मेरी तरह शैतान हो। तुम्हे पता है, पहले मै इंसान हुवा करता था। पर अब तुम मुझे शैतान कह सकते हो। कल का दिन मेरे लिए बहोत ही अशुब है। कल मै पूरी तरह से हैवान बन जाऊंगा। क्या पता जब मै हैवान बन जाऊंगा तो मेरे दोस्त, मेरे भाई बहन, गुरुवर्य मुझे याद रहेंगे भी की नहीं। या फिर मै उन्ही पे हमला कर उनको ही चोट पंहुचा दूंगा। मुझे कुछ समज में नही आ रहा। मुझे मेरे चाहने वालो से बेहद दूर जाना होगा। मै नही चाहता की मेरे वजह से उन्हें कोई तकलीफ हो।” और बस रात ऐसेही बित गई।
सुबह हो रही थी। अमर और उसके दोस्त जाग चुके थे। सेनापती ने महाराज को जगाया। समर को खोजने के लिए, अमर ने दो गुट बनाए। एक गुट में अमर, सलोनी, कुश और कुछ सैनिक थे। दुसरे गुट में शरद, भोला, सेनापती और महाराज अपने सैनीको के साथ थे। दोनो गुटमे एक-एक हिममानव था। दोनों गुट पहाडियों में समर को खोजने लगे। अँधेरी गुफाओ मे समर अपने शैतानी रूप में सोया था। तभी उसने किसीकी आवाज सुनी। वो जागा, उसने चारो तरफ देखा पर वहा कोई नही दिखा। बादमे वो शांति से बैठा। तो उसने अपने सामने देखा की एक परछाई धिरे-धीरे बड़ी हो रही है। उसने तुरंत पीछे मुडके देखा। पर पीछे कोई नही दिखा। फिर जब उसने अपना सर सीधा किया तब उसे कुछ काली शक्तियां अपने सामने दिखाई दी।
वो काली शक्तियोंसे बचके भागा। उनसे लढने लगा। पर कोई फायदा नही, उन शक्तियों के सामने समर की एक भी न चली। काली शक्तियां समर के शरीर में प्रवेश कर गई और वह अब पूरी तरह से शैतान में बदल गया। कौन अपना और कौन पराया? अब उसे कुछ नही पता। वह पूरी तरह से जंगली शैतान बन गया और दहाडते हुए अपने शिकार की ओर निकल पड़ा। समर के दहाड की आवाज दोनों गुटों को सुनाई दी। ये उनके लिए खतरेकी घंटी थी।
अमर ने अपने गुट को सावधान करते हुए कहा, “सतर्क रहना दोस्तों हमारा भाई यही कही है।”
सेनापती ने अपने गुट को सतर्क कर दिया। उधर सम्यकमुनी महायज्ञ के अंतिम चरण पर थे। महाराज ने अपने सैनिको को आदेश दिया, “ध्यान रखना सैनिको, वो शैतान आपके राज्य का होने वाला महाराज है। तो उसे बिना चोट पहुचाए जिन्दा पकड़ना है।”
सभी को महाराज का आदेश मिल चूका था की तभी एक सैनिक के चिखने की आवाज आई। उसकी तलवार निचे जमीं पर पड़ी थी और वह अपनी जगह से गायब था। हिममानव वहा आया। उसने जगह को सुंघा और अचानक पीछे की ओर भागा। तभी ओर एक सैनिक के चिल्लाने की आवाज आई। वहासे भी एक सैनिक गायब हो गया। अब सारे सैनिक सतर्क हो गए। हिममानव सबसे ज्यादा सतर्क हो गया। वो समर की गंघ के मुताबिक हिल रहा था। की तभी उसे अपने दाई ओर से समर की गंघ मिली। वो तुरंत उस जगह दौड़ा। शैतान बना समर ओर एक सैनिक पर हमला करने वाला था की तभी हिममानव ने उसका हाथ पकड़ लिया। समर इतना शक्तिशाली था की उसने हिममानव को एक झटके मे उठाकर दूर फेंक दिया। सारे सैनिक समर पर काबू पाने का प्रयत्न करने लगे, पर वो बहोत शक्तिशाली था। सैनिको की चीख पुकार दुसरे गुट को सुनाई दी। अमर समझ गया की समर ने हमला कर दिया है। वो सभी तुरंत मदद के लिए दौड़े। महाराज देख रहे थे की शैतान बना समर कैसे उनके सैनिको को निर्दयता से ख़त्म करते जा रहा है। उनसे बर्दाश्त नही हुवा। वो सोचने लगा की अगर हम इसे इंसान बनाने मे कामयाब नही हुवे, तो ये हमारे पुरे राज्य को बर्बाद कर देगा और ऐसा करने से उसे कोई नही रोक पाएगा। तभी महाराज ने एक कठोर निर्णय लिया। वो निर्णय था समर को ख़त्म करने का। उसने अपने बचे हुए सैनिको को आदेश दिया, “इस शैतान को यही ख़त्म किया जाए। मैंने जो आपको कहा था वो सब भूल जाओ और मार डालो इस शैतान को।”
सैनिक शैतान पे हमला करने लगे, पर कोई भी उसके सामने टिक नही पाया। हिममानव शैतान को थोड़ी बहोत टक्कर दे रहा था, पर शैतानी शक्तियां बहोत शक्तिशाली थी। शैतान ने हिममानव को जमीं पर पटक दिया। अब वो उसे ख़त्म करणेही वाला था की तभी दूसरा हिममानव दौड़ते हुए अपने दोस्त की मदद के लिए आया। उसने शैतान के कमर को पकड़कर उसे दूर फेंक दिया। फिर हिममानव और सैनिक मिलके शैतान को मारने लगे। शैतान की शक्ति कमजोर होने लगी। तभी अचानक सूर्य ग्रहण होने लगा और शानिश्राप उल्कापिंड के गुजरने का वक्त करीब आने लगा। वहा मौजूद सारे लोक अचंबित हो गए की आज सूर्य ग्रहण कैसे? पर ये एक नक्षत्र था जिसकी वजह से सूर्य ग्रहण होने को आया। अमर वहा पंहुचा। वो देख रहा था की समर की शक्ति कम हो रही थी। पर जैसे ही सूर्यग्रहण होने लगा। अचानक शैतानी शक्ति बढ़ने लगी। उधर सम्यकमुनी ने अच्छाईयों से भरी शक्तियों को आमंत्रित कर लिया और उन्हें अमर की मदद करने को कहा। अमर के सामने उसका दोस्त उसके लोगो को मार रहा था। तभी अमर ने हिममानव को अपने पास बुलाया और कहा, “समर को पहाडी की सबसे ऊँची चोटी पर ले जाना है। उसका ध्यान अपनी तरफ खिचो और मुझे भी ले चलो।”
अमर के बताए अनुसार हिममानव ने समर का ध्यान अपनी तरफ खीचा। समर बहोत ज्यादा गुस्से में था। वह हिममानव का पीछा करने लगा। हिममानव अमर को उठाकर सबसे ऊँची चोटी की ओर निकल पड़ा, उसके पीछे गुस्से से भरा शैतान बना समर था। हिममानव और शैतान दोनों ही चोटी पर पहुच गए। दूसरा हिममानव भी वहा पंहुचा और उनके बिच घमासान युद्ध होने लगा। तभी सम्यकमुनी की अच्छाई से भरी शक्तियां अमर के सामने आई। अमरने उन शक्तियों को हिममानवो के अंदर डाल दिया और हिममानव ओर ज्यादा ताकदवर हो गए। उन्होंने तुरंत शैतान पर काबू पाया। तभी अमर ने तिलस्मी पत्थर बाहर निकाला ओर उसे सूरज के सामने रखा। जैसेही पूरा सूर्यग्रहण हुवा शनिश्राप उल्कापिंड दिखाई देने लगा। वहा कुछ तारे तीर का आकार बनाने लगे। उस तीर की रोशनी तिलस्मी पत्थर पर पड़ी और उसी रोशनी में शैतान को हिममानवनो पकडके रखा। उस चमत्कारी रोशनी की वजह से समर के अंदर की सारी शैतानी शकियाँ बाहर आई। महाराज, समर के दोस्त, सलोनी, सेनापती, सैनिक सभी चोटी पे पहुच चुके थे। वो सारे लोग अपनी आँखों से यह दृश देख रहे थे। तभी सलोनी रोने लगी। वहा मौजूद किसी को भी समझ नही आया की वो क्यों रो रही है। शैतानी शक्तियाँ समर के अंदर से निकलकर अमर के चारो तरफ घुमने लगी। अमर ने तिलस्मी पत्थर को सामने किया और सारे शैतान पत्थर के अन्दर चले गए। और शैतान बना समर पुनः समर बन गया। पर किस्सा यही ख़त्म नही हुवा। वो शैतानी शक्तियां तिलस्मी पत्थर से बाहर निकली और अमर के शरीर को चीरती हुई वापस काले जंगल की ओर चली गई। अचानक अमर जोर-जोर से चिल्लाकर शैतान में बदलने लगा। सभी ने देखा की अमर देखते ही देखते पूर्णता शैतान बन गया। उसने सलोनी की ओर देखा अपना हाथ आगे बढाया की तभी हिममानवो ने अमर पर हमला कर दिया। जैसे तैसे उनसे पीछा छुड़ाकर शैतान बना अमर वहासे भाग निकला। किसीको समझ नही आया की वहा क्या हुवा? महाराज ने अपने पुत्र समर को उठाया और अपने साथियों के साथ उसे राजमहल ले आए।
राजमहल आने के बाद राज्य में उत्सव का वातावरण निर्माण हो गया। क्योकि राज्य को अपना युवराज सही सलामत मिल गया था। पर सलोनी, भोला, शरद और कुश बेहद दुखी थे। इन चारों के अलावा किसी को भी अमर की चिंता नहीं थी। उन्होंने आज अपने सबसे अच्छे और सच्चे दोस्त को खो दिया। महाराज ने एक सभा बुलाई जहा अमर का सम्मान होना था। महाराज सभा में आए। सभा में राज्य के सारे माननीय महोदय उपस्थित थे।
महाराज ने सभा को बताया, “हमारा राज्य बड़ा ही भाग्यशाली है की हमें अमर जैसा शूरवीर सपूत मिला। उसी के कारन आज राज्य को अपना वारिस मिला है। पर एक कटु सत्य यह भी है की उसी शूरवीर के कारन आज हमारे राज्य पर खतरा आ सकता है। अमर जिसके सम्मान में सभा बुलाई गई वो अब एक खूंखार शैतान बन चूका है। उसे हमें जल्दी से जल्दी ख़त्म करना होगा, वर्ना क्या पता वो हमारे राज्य को किस हद तक हानी पहुचाए?”
सलोनी महाराज की बाते सुन रही थी। उसे बहोत गुस्सा आया और वो महाराज की बातो को काटते हुए बिचमे बोल पड़ी, “हाँ, महाराज आपने ठीक कहा मेरा अमर अब शैतान बन चूका है। उसे ख़त्म करनाही चाहिए। पर वो शैतान किसके लिए बना? वो शैतान बना सिर्फ और सिर्फ उसके दोस्त के लिए, आपके पुत्र के लिए, इस राज्य के युवराज के लिए। अमर ने मुझे बताया था की वो समर का श्राप अपने ऊपर लेने वाला है....... और इस तरह सलोनी ने अपनी और अमर की बातचीत राजदरबार में बताना शुरू कर दिया।
Flashback : अमर, “मुझे वचन दो की तुम मेरे कार्य में किसी तरह की कोई भी बाधा नहीं डालोगी। और यह सारी बाते अपने तक ही सिमित रखोगी।”
सलोनी, “वचन देती हु अब बताओ।”
अमर, “मै अमर का श्राप अपने ऊपर लेने वाला हु। अगर मै स्वइच्छा से ऐसा करूँगा तो उसका श्राप ख़त्म हो जायेगा।”
सलोनी, “नहीं तुम ऐसा नहीं कर सकते?”
अमर, “मुझे क्षमा कर दो, पर अब यही एक मार्ग शेष बचा है। मै एक आम नागरिक हु। मेरे होने या ना होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। दूसरी तरफ समर एक राज्य का होने वाला महाराज है। उसके ऊपर सारे राज्य की जिम्मेदारी है। और मुझे विश्वास है की वो अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाएगा।”
सलोनी, “और मेरा क्या? मै तुम्हारे बिना कैसे जिउंगी?”
अमर, “हमारा कोई भविष्य नहीं है। मुझे भूल जाओ। अगर तुमने मुझसे सच्चा प्यार किया है; तो कल मुझे तुम नहीं रोकोगी और इस बारे में किसीको कुछ भी नहीं बताओगी।”
सलोनी, “ठीक है, तुम भी सुन लो, मै सिर्फ तुमसे प्रेम करती हु और आखरी श्वास तक तुमसे ही प्रेम करुँगी।”
अमर, “अब तुम आराम करो, मुझे भी विश्राम की जरूरत है।” Flashback खत्म।
अमर का यह सच जानतेहि दरबार के सारे दरबारी शांत हो गए। महाराज की आँखों में आसू आने लगे। वह अपने आंसू पोछते हुए, “हमें पता है। हम अमर के कर्जदार है। पर हमने शैतान की शक्तियाँ देखि है। जब समर शैतान बन चूका था, तब उसने बहोत तभाही फैलाई। मै भी उसे चोट नहीं पहुचाना चाहता। अगर वह हमारे राज्य आया तो हमें उससे कौन बचाएगा? हमारी प्रजा का रक्षण कौन करेगा? कोई जवाब है तुम्हारे पास?”
सलोनी, “हम उसे इन्सान बना सकते है। हम कालसमितुल को खोजकर सबकुछ पहले जैसा कर सकते है।”
महाराज, “पुत्री, हम तुम्हारी भावनाओं की क़द्र करते है। इसीलिए हम तुम्हे वचन देते है की जब तक अमर हमारे राज्य को किसी तरह से कोई नुकसान नहीं पहुचता, तब तक हम उसे किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुचाएगे। पर जिस दिन उसने राज्य पर बुरी नजर डाली उस दिन वह उसके जीवन का आखरी दिन होगा।”
सलोनी, शरद, भोला और कुश सभी महाराज के वक्तव्य से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें बस अपने दोस्त अमर की चिंता सता रही थी। भला कोई ऐसा करता है क्या? अपने दोस्त को शैतानी श्राप से मुक्त करने के लिए उसका श्राप खुद अपने ऊपर लेता है क्या? पर ऐसा हुवा। अमर ने ऐसा किया। सिर्फ और सिर्फ अपने दोस्त के खातिर, अपनी दोस्ती के खातिर। जब यह बात समर को पता चली तो वो फुटफुटकर रोने लगा। उसने कसम खाई की चाहे कुछ भी हो जाए वो अमर को ढूंढेगा और उसे वापस इंसान बनाएगा। सलोनी अमर को इंसान बनाने के लिए कालसमितुल की खोज में जुट गई। कालसमितुल की खोज में कुश, भोला, और शरद सलोनीका साथ दे रहे है। समर सलोनी की हर संभव मदद कर रहा है। सम्यकमुनी अपनी योगसाधना से अमर के बारे में सलोनी और उसके दोस्तों को बताते रहते है की वो क्या कर रहा है? अभी कहा है? और हमारी कहानी का हीरो काले जंगल में गुमनाम है। हर चांदनी रात को वो अचानक इंसान बन जाता है और अपने दोस्तों को याद करता है। उसे यकीन है की उसके दोस्त उसे खोजते हुए उस तक जरूर पहुचेंगे। आखिर इसी दोस्ती को तो “जिवलगा” कहते है।
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समाप्त
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