रागिनी ने रूम में मौजूद आदमकद शीशे में खुद को सिर से पांव तक निहारा। अभी भी वो सरदार साहब के वेश में थी। शाम के आठ बज रहे थे। बाहर अंधेरा हो चुका था। रह-रहकर उसका चेहरा तनाव से भरा जा रहा था। आंखों में कठोरता आ जाती।
दिलो-दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी कि प्रिया ने ही सारी गड़बड़ की है। अगर वो उसकी वैन लेकर न भागती तो इस वक्त वो कहीं नब्बे करोड़ के साथ ऐश कर रही होती। या फिर वैन में मौजूद बोरों से नब्बे करोड़ न निकाले होते तो, ये सारी मुसीबत ही न आती ।
अब वो और ज्यादा इन्तजार नहीं करना चाहती थी। विजय नब्बे करोड़ के रास्ते से भटक कर, बारह लाख इकट्ठे करने के फेर में पड़ गया था। हालात ऐसे थे कि, वो विजय से इस बारे में कोई बात भी नहीं कर सकती थी। मन ही मन रागिनी ने अपना रास्ता चुन लिया था।
प्रिया को आज रात ही खत्म करना था। लाश का क्या करना है, वो ओबराय देख लेगा। विजय को कहकर ठिकाने लगवा देगा। न भी लगाए। ये उसकी सिरदर्दी है। प्रिया की जान लेने के पश्चात वो नब्बे करोड़ को तलाश करके, यहां से निकल जाएगी।
रागिनी शीशे के सामने से हटी और बैड की तरफ बढ़ गई। जहां मीडियम साइज का सूटकेस और बैग पड़ा था। सूटकेस सीधा करके उसे खोलने लगी कि दरवाजे पर थपथपाहट हुई।
रागिनी ठिठकी। फिर कोट को ठीक करने के बाद दरवाजे की तरफ बढ़ी। दरवाजा खोला तो सामने सुमित्रा को खड़े पाया। वो नमस्कार करके बोली।
"साहब जी। डिनर तैयार है। अगर आप कोई खास चीज खाना चाहते हैं तो बता दीजिए।"
"नहीं।" रागिनी अपनी आवाज में पहले की तरह भारीपन लाकर बोली--- "जो बना है, वही खाऊंगा।"
"जी। खाना आप कमरे में ही खाएंगे या डायनिंग टेबल पर।"
"डायनिंग टेबल पर कौन होता है खाने के वक्त ?"
"कोई नहीं, मालिक-मालकिन अपने कमरों में खाना लेते हैं।"
"तो मुझे भी यहीं ला दो।"
"कितने बजे खाना लाऊं ?"
"एक घंटे बाद।"
सुमित्रा चली गई। रागिनी ने दरवाजा बंद कर लिया। उसके बाद बैड पर पड़े सूटकेस को खोला। ऊपर के कपड़े हटाए तो, भीतर ब्रीफकेस पड़ा नजर आया। जिसमें छः लाख रुपये थे। उसकी साइड में हाथ डालकर लम्बे फल वाला चाकू निकाला। चाकू को देखते ही रागिनी ने बटन दबाया तो उसका फल खुल गया जो कि छ: इंच लम्बा था। एक तरफ धार थी तो दूसरी तरफ दांत से बने हुए थे।
रागिनी कई पलों तक चमकपूर्ण निगाहों से चाकू को देखती रही फिर उसे बंद करके पैंट की जेब में डाल लिया। उसके बाद सूटकेस बंद किया और उसे एक तरफ रख दिया।
उसकी सोचों में ये तय था कि आज रात प्रिया खत्म हो जाएगी। अब वो नहीं बचेगी। प्रिया के खत्म होते ही सारे झंझट खुद-ब-खुद ही निपट जाएंगे। और नब्बे करोड़ फिर उसके पास। विजय के धोखेबाजी पर उतर आने की वजह से अब उसमें उसकी कोई दिलचस्पी बाकी न रही थी। नब्बे करोड़ पर से अब उसका हक खत्म हो चुका था और अब उसे उसके साथ की भी जरूरत महसूस नहीं हो रही थी।
वो और उसके नब्बे करोड़ और कुछ भी नहीं।
■■■
बेदी, ओबराय के पास पहुंचा तब साढ़े आठ बज रहे थे। ओबराय नाइट गाउन में था।
"आओ विजय।" ओबराय ने कहते हुए हौले से सिर हिलाया।
"कैसे हैं आप ?" बेदी ने अपनेपन से पूछा।
जवाब में ओबराय मुस्कराया।
"मैं आपके साथ रहना चाहता हूं।" बेदी बोला--- "जब तक आप सो नहीं जाते।"
"क्या आज भी मुझ पर जानलेवा हमला हो सकता है।"
"मेरा तो यही ख्याल है।"
"आज ऐसा कुछ नहीं होगा। वो जो भी है एक-दो दिन ये सोचकर चुप रहेगा कि अब मैं सतर्क हूं।" ओबराय ने कहा--- "कम से कम एक-दो दिन तो बुरा करने के इरादे से कोई मेरे पास नहीं फटकेगा।"
"ये सोचकर आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं।" बेदी ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा--- "हो सकता है वो, जिसने आपकी जान लेने की कोशिश की थी, भी यही सोच रहा हो कि, आज आप ये सोचकर निश्चिंत रहेंगे कि आज आपकी जान लेने की कोशिश नहीं की जाएगी। ऐसे में आपकी जान लेना बहुत आसान है।"
"तुम फिक्र मत करो। कल मैं सावधान नहीं था। आज सतर्क हूं।"
"अगर मैं आपके साथ रहूँ तो...।" बेदी ने कहना चाहा।
"बेहतर होगा कि तुम उस काम की तरफ ध्यान दो, जो करने के लिए मैंने कहा है।" ओबराय ने मुस्कराकर बेदी की आंखों में देखा--- "वो काम हो गया तो, बाकी सब कुछ खुद ही ठीक हो जाएगा।"
"जी।" बेदी ने सिर हिलाया--- "आज आपके कोई मेहमान आए हैं।"
"हां तुम जाओ और..."
तभी प्रिया ने भीतर प्रवेश किया। वो हाफ पैंट और टाइट टी शर्ट पहने थी। लम्बे बालों को गूंथ कर सिर के ठीक ऊपर खूबसूरत जूड़ा बना रखा था। वो आज भी कयामत ढा रही थी।
"डार्लिंग। डिनर के लिए तैयार हो ?" प्रिया शोख स्वर में कहती हुई आगे बढ़ी।
ओबराय ने मुस्कराकर सिर हिलाया।
पास पहुंच कर प्रिया ने ओबराय की बांह अपनी बांह में फंसा ली।
"कम ऑन। आधा घंटा हम लॉन में घूमेंगे। उसके बाद डिनर करेंगे।"
"ठीक है।"
"मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। देखती हूं कौन तुम्हें उंगली भी लगाता है।"
ओबराय ने मुस्कराकर प्रिया को देखा। कहा कुछ नहीं।
और बेदी, देख रहा था कि हरामी औरतें कैसी होती हैं। क्या.....क्या नाटक करती हैं।
"तुम....।" प्रिया ने बेदी से कहा--- "सुबह गाड़ी तैयार रखना शायद मुझे मार्किट जाना पड़े।"
"जी मालकिन।" बेदी ने फौरन सिर हिलाया।
"कोई काम है साहब से ?" प्रिया ने पूछा।
"नहीं। मैं तो यूं ही...।" बेदी ने कहना चाहा।
"तो जाओ। इस वक्त हमें डिस्टर्व मत करो। "
बेदी चला गया तो प्रिया बोली।
"ये ड्राइवर तुमसे कुछ ज्यादा ही चिपकने की कोशिश करता रहता है।" प्रिया उसका गाल थपथपा कर बोली।
"ऐसी कोई बात नहीं। वो तो पूछ रहा था कि अगर जरूरत हो तो रात को वो मेरी पहरेदारी कर सकता है। लेकिन मैंने मना कर दिया। मुझे किसी की जरूरत नहीं है।" ओबराय ने लापरवाही से कहा।
"ठीक किया। कल तो तुमने सोचा भी नहीं था कि कोई तुम्हारी जान लेने की कोशिश कर सकता है। परन्तु अब मालूम हो गया कि ऐसा भी हो सकता है। इसलिए तुम लापरवाह नहीं होगे।" प्रिया ने प्यार भरे स्वर में कहा--- "पता चला कि कल किसने तुम्हें छत से धक्का दिया था।"
"नहीं। मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया।"
"वो जो कोई भी है। बच नहीं सकेगा।" प्रिया कह उठी--- "वो बंगले में ही रह रहा है।"
ओबराय ने कुछ नहीं कहा।
"आओ डार्लिंग। बाहर लॉन में टहलते हैं।"
■■■
रात के ग्यारह बज रहे थे।
बेदी, शुक्रा के क्वार्टर में मौजूद था।
"लगता नहीं आज काम करने का मौका मिले।" बेदी ने गहरी सांस लेकर कहा ।
"क्यों ?"
"वो भूतनी की तरह ओबराय से चिपकी हुई है।" बेदी उखड़े स्वर में बोला--- "मेरे ख्याल में उसे शायद शक हो गया है कि हम आज रात उसकी जान ले सकते हैं। तभी वो बहाने से ओबराय के साथ...।"
"उसे नहीं मालूम हो सकता कि आज हमारा क्या प्रोग्राम है।" शुक्रा ने पक्के स्वर में कहा।
"कुछ बात तो है ही जो अभी तक वो ओबराय से चिपकी हुई है।" बेदी बोला।
"कहां है वो दोनों ?"
"सामने वाले लॉन में कुर्सियां बिछाए बैठे हैं। डिनर भी ले चुके हैं। उनका सोने का प्रोग्राम बनता नजर नहीं आता।"
"देखते हैं। कब तक बैठे रहेंगे।'
"जब भी प्रिया को खत्म करने का प्रोग्राम बनता है तो कोई अड़चन आ जाती है।"
"अब नहीं आएगी अड़चन ।" शुक्रा ने बेदी को देखा--- "आज मौका न मिला तो कल मिल जाएगा।"
"अभी तक नहीं मालूम हो सका कि कल किसने ओबराय की जान लेने की कोशिश की।" बेदी ने शुक्रा को देखा― "वो जो भी है, हिम्मत वाला है जो इतना बड़ा कदम उठा लिया।"
"इससे भी ज्यादा हैरानी है, ओबराय के बच जाने की।" बेदी ने गहरी सांस ली।
"पट्ठा किस्मत वाला निकला।" शुक्रा मुस्करा पड़ा।
"मैं बाहर का फेरा लगाकर आता हूं।" कहने के साथ ही बेदी उठा और बाहर निकला।
बंगले के पीछे वाले दरवाजे से सुमित्रा निकल कर आती दिखाई दी। वहां पर्याप्त रोशनी फैली हुई थी। पास आते हुए सुमित्रा बोली।
"तुम अभी तक सोए नहीं।"
"नहीं।"
"अब तक तो हर रोज नींद में पहुंच जाते हो।" सुमित्रा करीब आकर रुकी।
"मालकिन-मालिक अभी जाग रहे हैं। सोचा उन्हें कहीं बाहर न जाना पड़ जाए। इसलिए...।"
"उनका तो सोने का प्रोग्राम नहीं लगता।"
"क्यों ?"
"अभी चाय देकर आई हूं। जब तक वो अपने कमरे में नहीं जाते मैं तो नींद भी नहीं ले सकती।"
"दयाल इस वक्त उनकी सेवा में उधर मौजूद है। तुम्हारे क्वार्टर में चलें।" सुमित्रा ने धीमे स्वर में कहा।
"क्वार्टर में...।"
"हां। बातें-वातें करते हैं।" सुमित्रा ने प्यार से कहा--- "आधा घंटा तो आराम से बीतेगा।"
"चुप करो। मेरा रिश्तेदार...।" बेदी ने कहना चाहा।
"ये तो और भी अच्छी बात है। उसे पहरेदारी के लिए बिठा दो।"
"तुम मुझे नौकरी से निकलवा कर ही रहोगी।" बेदी ने मुंह बनाकर कहा और वहां से हट गया।
■■■
रात का एक बज गया था। ओबराय और प्रिया बाहर लॉन में ही थे। कभी वो कुर्सियों पर बैठ जाते तो कभी टहलने लगते। ओबराय ने एक-दो बार कहा कि वो अभी आराम करना चाहता है, परन्तु प्रिया कुछ देर और-कुछ देर और कहकर उसे रोक लेती। ऐसा करके वो वक्त बिता रही थी कि ओबराय जिस सरदार को बहाने से बंगले पर लाया है। वो उसकी जान लेने की चेष्टा न कर सके।
"आज हम सावधान हैं। तभी किसी ने, कल की तरह तुम्हारी जाने लेने की चेष्टा नहीं की।" प्रिया बोली।
"मुझे नहीं परवाह कि कोई मेरी जान लेने के लिए आता है या नहीं।" ओबराय ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
"तुम्हें न हो, मुझे तो है। तुम न रहे तो मैं किसके सहारे बाकी की जिन्दगी बिताऊंगी।"
ओबराय मुस्कराकर रह गया।
रागिनी अपने कमरे की खिड़की से उन्हें लॉन में बैठे देख रही थी। रोशनी बंद थी, इसलिए बाहर से उसे नहीं देखा जा सकता था। वो प्रिया की जान लेने को बेचैन थी। लेकिन ओबराय और प्रिया लॉन से हिलने का नाम नहीं ले रहे थे। इन्तजार में वक्त आगे सरकता जा रहा था। उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वो सोच रही थी कि अगर प्रिया कमरे में होती तो अब तक उसकी जान ले चुकी होती।
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तेईस दिन
बीती रात बहुत कुछ हो जाता शायद, अगर करने वालों को मौका मिल गया होता। परन्तु सावधानी के नाते प्रिया जानबूझकर ओबराय के साथ देर रात रही। दिखावे के तौर पर वो ओबराय को यही कहती रही कि आज रात अगर हमला होता है, तो वे दोनों हमला करने वाले को आसानी से पकड़ लेंगे। जवाब में ओबराय खामोश ही रहा। जबकि ओबराय बाखूबी समझ रहा था कि प्रिया उसके साथ खुले में रहकर वक्त बिता रही है। क्यों ऐसा कर रही है, वो नहीं समझ पाया था।
अगले दिन सुबह शुक्रा ने बेदी के क्वार्टर में आकर उसे नींद से उठाया। रात देर से सोने की वजह से, आंख नहीं खुल पाई थी। आंखों को खोलते ही वो शुक्रा को देखने लगा।
"उठ जा। आठ बज रहे हैं।" शुक्रा कुर्सी पर बैठता हुआ बोला--- "मैंने तो सोचा था, इस वक्त तू ब्रेकफास्ट के लिए तैयार होगा।"
बेदी बैड पर कुछ सीधा हुआ और तिपाई पर रखे पैकिट में से सिगरेट सुलगाई।
"तेईस दिन।" बेदी के होंठों से निकला।
"क्या तेईस दिन
"मेरी जिन्दगी के बाकी बचे दिन।" बेदी बेहद गम्भीर था। शुक्रा ने होंठ भींच लिए।
"अगर कल रात हमें मौका मिल गया होता तो इस वक्त हम कहीं और ही होते।" बेदी ने भारी स्वर में कहा।
"आधी रात हो गई थी। ओबराय और प्रिया लॉन में ही बैठे रहे थे।"
बेदी ने कुछ नहीं कहा।
"कोई बात नहीं।" शुक्रा का स्वर कठोर हो गया--- "आज रात ही सही।"
"देखना इसी तरह रातें बीतती रहेंगी।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा--- "और मैं नहीं रहूंगा।"
"ऐसा मत कह यार। मैं..."
"झूठा हौसला मत दे। जब बारह लाख मेरे सामने रखेगा। तब यारी की बात करना।" बेदी गम्भीर था।
शुक्रा दांत भींचकर रह गया।
कई पलों तक उनके बीच खामोशी रही।
"विजय।" शुक्रा ने चुप्पी तोड़ी--- "वो नब्बे करोड़ किसी सूटकेस-ब्रीफकेस में नहीं आ सकते। इतनी बड़ी दौलत ने काफी बड़ी जगह घेर रखी होगी। उसे हम बंगले में से आसानी से ढूंढ सकते हैं।"
"तुम ढूंढ लो।" बेदी उठता हुआ बोला--- "मुझे प्रिया ने सुबह कार तैयार रखने को कहा था। आठ बज चुके हैं।"
शुक्रा की नजरें बेदी पर जा टिकीं। कई पलों तक वो बेदी को देखता रहा।
"विजय।" शुक्रा के चेहरे पर अचानक ही अजीब से भाव आ ठहरे थे।
बेदी ने उसे देखा।
"कार पर जाती प्रिया पर हमला भी तो हो सकता है। वो इस तरह भी तो मर सकती है।"
बेदी की निगाह, शुक्रा की आंखों से मिली। होंठ सिकुड़ते चले गये।
"हो सकता है ना जानलेवा हमला। प्रिया की जान उसमें जा सकती है।" शुक्रा ने धीमे स्वर में कहा।
बेदी एकाएक सतर्क नजर आने लगा।
"कौन करेगा हमला ?” बेदी के होंठों से फुसफुसाहट भरा स्वर निकला।
"उदय।"
"हमले की वजह क्या होगी ?" बेदी को ऐसा लग रहा था जैसे अब काम हो जाएगा।
"वो गहने-जेवरात पहनकर बाहर निकलती है।"
"हां।" बेदी ने सिर हिलाया--- "गले की चेन, कड़े-अंगूठियां-टॉप्स मिलाकर एक-डेढ़ लाख के गहने तो कम से कम पहने ही रहती है। इससे ज्यादा के भी हो सकते हैं।"
"तो उदय उस पर लूटने के इरादे से हमला करेगा। वो सीधी तरह तो अपने जेवरात देगी नहीं। ऐसे में उदय के किए गए वार उसकी जान ले लेंगे।" शुक्रा होंठ भींचे कह रहा था।
"अकेला, उदय उसे संभाल लेगा ?"
"तुम भी तो वहां होगे।"
"मैं उदय का साथ नहीं दे पाऊंगा। अगर किसी तरह वो बच गई तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊंगा। पैसा हाथ लगने का जो थोड़ा-बहुत चांस है, वो खत्म हो जाएगा।" बेदी ने कहा।
शुक्रा के दांत भिंच गए।
"ठीक है। उदय ही सब संभाल लेगा।"
"तुम क्यों नहीं यहां से बाहर निकलकर उदय का साथ देते ?" बेदी ने कहा।
"इन हालातों में मेरा यहां से निकलना ठीक होगा क्या? और फिर बाहर वालों को कैसे पता चलेगा कि तुम प्रिया के साथ बंगले से निकले हो । बाहर वालों को खबर देने वाला भी तो कोई होना चाहिए।"
"ठीक है। तुम उदय से फोन पर बात करो।"
"उदय से मैं तभी बात कर पाऊंगा जब मुझे इस बात की जानकारी होगी कि तुम प्रिया के साथ कहां-कहां से निकलोगे ?" शुक्रा की निगाह बेदी के चेहरे पर जा टिकी।
"मुझे क्या मालूम प्रिया कहां जाने को बोलेगी।" बेदी ने होंठ भींच कर कहा।
"तुम प्रिया को बाहर ले जा चुके हो। कोई ऐसा रास्ता बता दो, जहां से उदय पीछे लग जाएगा और....।"
"ठीक है।" बेदी कह उठा--- "ऐसा रास्ता मैं बताता हूं। नोट करो।"
"बोलो।"
बेदी बताने लगा।
"ठीक है।" शुक्रा उठता हुआ बोला--- "मैं फोन पर उदय से बात करता हूं।"
"उसे कहना कहीं से कार का और...।"
"सब इन्तजाम कर लेगा वो।" कहने के साथ ही शुक्रा क्वार्टर से बाहर निकल गया।
बेदी चेहरे पर सोच और व्याकुलता लिए, बाथरूम की तरफ बढ़ गया।
■■■
शुक्रा बंगले के हॉल में पहुंचा। वहां कोई भी नहीं था। फोन के पास पहुंचा और आस-पास देखते हुए रिसीवर उठाकर होटल का नम्बर डायल करने लगा।
करीब मिनट भर बाद वो उदयवीर से बात कर रहा था।
"हैलो, उदय।"
"हां।" उदयवीर का बेचैन स्वर उसके कानों में पड़ा--- "कहां से बोल रहे हो ?"
"वहीं, ओबराय के बंगले से।"
"कुछ हुआ?"
"अभी तो नहीं, मैं...।"
"शुक्रा यहां भारी गड़बड़ हो गई है।" उदय का स्वर उखड़ा हुआ था।
"क्या हुआ ?"
"रागिनी को उन छः लाख के बारे में और बंगले पर हो रही हर उस बात का पता था, जो विजय कर रहा है। उसने कहा मुझे बंगले से विजय ने फोन करके बताया है।" उदयवीर ने रागिनी के बारे में सबकुछ बताकर कहा--- "वो मुझे बेवकूफ बनाकर छः लाख लेकर होटल से खिसक गई है।"
शुक्रा के दांत भिंच गए।
"शुक्रा।"
"तूने सारा काम खराब कर दिया उदय।" शुक्रा तीखे स्वर में कह उठा।
"मैंने कुछ खराब नहीं किया। मेरी जगह तू होता तो तू भी उसके चक्कर में आ जाता।"
"विजय जो भी मेहनत कर रहा है, वो सारी मिट्टी में मिल गई। अगर बाकी के छः लाख हासिल भी कर लेता है तो अब बारह लाख फिर भी इकट्ठे नहीं होंगे।" शुक्रा के चेहरे पर गुस्से और अफसोस के भाव थे।
उदयवीर की आवाज़ नहीं आई।
"उदय।"
"अगर विजय सामने पड़े तो इस बारे में उससे कोई बात नहीं करना। वरना छः लाख निकल जाने की सुनकर वो जो काम कर रहा है, वो भी ठीक से नहीं कर पाएगा। मामला और भी खराब हो जाएगा।"
"अच्छा।" उदयवीर का लम्बी सांस लेने का स्वर आया।
"अब तेरे को काम करना है।"
"कैसा काम ?"
शुक्रा ने इधर-उधर नजर मारी फिर धीमे स्वर में बोला।
"खून करना है।"
"क्या ?" उदयवीर का हड़बड़ाया स्वर कानों में पड़ा--- "खून।"
"हां। और ये काम तेरे को हर हाल में करना है। ये बात अच्छी तरह अपने दिमाग में बिठा ले।"
उदयवीर की आवाज कानों में नहीं पड़ी।
"सुना।"
"हां।" उदयवीर की आने वाली आवाज धीमी थी।
"विजय की जिन्दगी का सवाल है। ये समझ कि तू ऐसा करके अपने यार की जान बचाएगा। मैं यहां से बाहर नहीं निकल सकता। वरना इस काम में तेरा पूरा साथ देता।"
"किसकी जान लेनी है।"
"प्रिया की।" शुक्रा सावधानी से रिसीवर में फुसफुसाया--- "मैं तुम्हें सब कुछ समझाता हूं।"
"कहो।"
पांच मिनट लगाकर शुक्रा ने जल्दी-जल्दी सब कुछ उदयवीर को बताया-समझाया।
उदयवीर की तरफ से कोई शब्द नहीं आया।
"उदय।"
"सुन रहा हूं। समझ भी गया।" उदयवीर का आने वाला स्वर धीमा था।
"ये काम तेरे को हर हाल में करना है।" शुक्रा ने अपने शब्दों पर जोर दिया।
"कर दूंगा।"
"कैसे करना है तेरे को बता दिया है। वक्त नहीं है। अभी तैयारी शुरू कर दे। जब विजय, प्रिया को लेकर बंगले से बाहर निकलेगा तो मैं उसी वक्त तेरे को फोन कर दूंगा।"
"ठीक है।"
"उदय । रागिनी के छः लाख ले जाने की वजह से जो गड़बड़ हुई है, कोशिश करने पर उसे सुधारा जा सकता है। अब प्रिया के जेवरात लूटने का नाटक नहीं करना, बल्कि सच में लूट लेते हैं। प्रिया का काम होने पर दस लाख ओबराय से मिलेगा और एक- डेढ़ के जेवरात हो जाएंगे। रकम बारह लाख के करीब हो जाएगी।"
"ठीक है।"
"बंद करूं फोन ?"
"हां। जब विजय, प्रिया के साथ बंगले से निकले तो फोन करना। मैं फोन पर हूं।"
"बढ़िया।" शुक्रा ने रिसीवर रख दिया।
■■■
सुबह नौ बजे सरदार परमजीत सिंह के वेष में रागिनी ने ओबराय के कमरे में प्रवेश किया। ओबराय इस वक्त बैड टी ले रहा था।
"अजीब इन्सान हो तुम।" रागिनी पास पहुंचकर धीमे स्वर में कह उठी।
"मैं समझा नहीं।" ओबराय ने उसे देखा।
“मुझे कहते हो प्रिया को खत्म करने को और खुद रात भर प्रिया को लेकर बाहर बैठे रहे।"
"मेरे ख्याल में प्रिया को तुम पर किसी तरह का शक हो गया है।" ओबराय शांत स्वर में बोला।
"कैसा शक ?"
"यही कि तुम चण्डीगढ़ वाली ब्रांच से न आकर, मैं तुम्हें किसी और काम के लिए बंगले पर लाया हूं। कोई बड़ी बात नहीं कि उसने चण्डीगढ़ के ऑफिस में फोन करके, परमजीत सिंह के बारे में पूछताछ भी की हो।" ओबराय ने गम्भीर स्वर में कहा--- "वरना आज से पहले, कभी ऐसा नहीं हुआ कि प्रिया लगभग जबरदस्ती वाले अंदाज में मुझे लेकर देर रात तक खुले लॉन में बैठी रहे।"
"लेकिन तुम तो उठ सकते थे।"
"मैंने कई बार कोशिश की, परन्तु प्रिया नहीं उठना चाहती थी। और मैं इस बारे में खासतौर से अपनी मर्जी नहीं करना चाहता था कि प्रिया का शक पक्का हो कि, कुछ होने वाला है।"
"अगर ये सब न होता तो मैंने रात को प्रिया को खत्म कर देना था। मैं तैयार थी।"
ओबराय ने घूंट भर कर प्याला तिपाई पर रखा और कह उठा ।
"आज काम निपटा देना।"
"वो तो होगा ही। एक दिन तुमने खराब कर दिया। अगर आज भी प्रिया रात को साथ रही तो ?"
"ऐसा नहीं होगा। ऐसी बातें बार-बार नहीं होती।" कहकर ओबराय मुस्कराया--- "तुम वास्तव में खूबसूरत हो। और मेरी बात को बाखूबी समझ लेती हो।"
रागिनी ने गहरी सांस ली।
"प्रिया के सामने ज्यादा मत जाना। मैं नहीं चाहता वो किसी वजह से तुम्हें पहचान ले।"
"वो कैसे पहचान सकती है मुझे।'
"मेरे ख्याल में तुम्हारा चलने-फिरने का ढंग ज्यादा नहीं बदला है।" ओबराय ने कहा।
"ओह।" रागिनी के होंठ सिकुड़े--- "ऐसे में तो विजय और शुक्रा भी पहचान सकते हैं। शक हो सकता है।"
ओबराय ने सहमति में सिर हिलाया।
"मैं अपने कमरे में ही रहूंगी।"
"ये ठीक रहेगा। रात को तुम प्रिया को खत्म कर सकती हो।" ओबराय मुस्करा पड़ा।
रागिनी भी मुस्कराई।
"तुम वास्तव में खूबसूरत हो।"
रागिनी जवाब में कुछ न कहकर मुस्कराती रही।
■■■
बारह बज चुके थे।
बेदी कार गैराज से निकाल कर उसे पोर्च में खड़ी करके पूरी तरह चमका चुका था और प्रिया के आने का इन्तजार करने लगा। इस वक्त वो ड्राइवर की काली वर्दी में था। इन्तजार जब लम्बा होता लगा तो वो किचन में व्यस्त दयाल और सुमित्रा के पास गया और कहा कि वो मालकिन से बाहर जाने के बारे में पूछें। उनके द्वारा बेदी ने यह बात जानबूझकर पूछवाई थी कि, अगर बाहर उदयवीर कामयाब हो जाता है और उसकी लाश को ठिकाने लगाकर अकेला वापस आता है तो, ये कह सके कि प्रिया को रास्ते में कोई मिल गया था तो उसे ये कहकर वापस भेज दिया कि, वो शाम को आ जाएगी। जब वो नहीं लौटेगी तो सुमित्रा-दयाल खुद ही कहेंगे कि मालकिन अपनी मर्जी से बाहर गई थी।
सुमित्रा ने आकर बताया कि मालकिन तैयार है, दस-पन्द्रह मिनट तक आ रही है।
बेदी फौरन शुक्रा के पास क्वार्टर में पहुंचा।
"हां?" उसे भीतर प्रवेश करते पाकर बेदी ने पूछा।
"प्रिया बाहर जाने वाली है। जब मैं उसे लेकर कार पर यहां से चलूं तो फौरन उदय को खबर देना।"
"ठीक है।" शुक्रा होंठ भींचे खड़ा हो गया।
"उदय को एक बार फिर वो रास्ता बता दे, जहां से मैंने गुजरना है।"
"चिन्ता मत करो।"
"मैं जा रहा हूँ।" बेदी पलटकर वहां से चला गया।
शुक्रा दोनों हाथ जेबों में डाले लापरवाही भरे अंदाज में क्वार्टर से बाहर आ गया।
■■■
प्रिया कमीज-सलवार पहने पीछे वाली सीट पर बैठी थी। हाथ में छोटा सा पर्स दबा रखा था। बेदी ने कार आगे बढ़ाई और देखते ही देखते विशाल गेट से बाहर आ गई।
"कहाँ चलना है?" बेदी ने सामान्य स्वर में पूछा।
"ऐसी जगह चलो, जहां मैं आराम से, तुम्हारे से बात कर सकूं।" प्रिया कह उठी।
"क्या बात करनी है। खास है क्या ?" बेदी ने गर्दन घुमा कर उसे देखा।
"मालूम हो जाएगा।" प्रिया की आवाज में कोई भाव नहीं था--- "लेकिन जगह सुनसान नहीं होनी चाहिए।"
बेदी के होंठ सिकुड़े। वो सामने देखने लगा।
"ऐसी जगह पर चलते हैं, जहां कोई न हो और...।"
"प्लीज, विजय। ज्यादा कुछ मत कहो। जो मैंने कहा है वही करो। किसी ऐसी जगह पर कार रोकना जहां और लोग भी हो। लेकिन बात हम कार में बैठकर ही करेंगे।" प्रिया ने कहा।
उसके बाद बेदी ने कुछ नहीं कहा। कार आगे बढ़ाता रहा। उन्हीं रास्तों को तय करता रहा। जिनके बारे में वो पहले ही शुक्रा को बता चुका था और शुक्रा, उदयवीर को।
और एक जगह कार में उदयवीर नजर आया जो ड्राइविंग सीट पर बैठा था। वो हर कार को ध्यान से देख रहा था। इस कार को भी ध्यान से देखा। ड्राइविंग सीट पर बेदी को बैठे देखा तो उसने फौरन अपनी वाली कार स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी। बेदी ने मन ही मन चैन की सांस ली कि सब ठीक है। उदय पीछे है।
कुछ देर बाद बेदी ने कार को एक शॉपिंग सेंटर के पार्किंग में रोका और ईंजन बंद कर दिया। वहां और भी कारें खड़ी थी। कुछ के तो ड्राइवर भी पास ही थे और लोग भी आगे-पीछे आ-जा रहे थे। बेहद सुरक्षित जगह थी।
"ये जगह ठीक है ?" बेदी ने पूछा।
"हां।"
बेदी ने दरवाजा खोला और बाहर निकला। कुछ दूर वो कार भी नजर आई, जिसे उदय ड्राइव करता हुआ, पीछे था। बेदी पीछे वाले दरवाजे की खिड़की के पास खड़ा हुआ तो भीतर बैठी प्रिया ने शीशा नीचे किया। उसके चेहरे पर गम्भीरता थी।
"तुम बाहर नहीं आओगी ?"
"नहीं। तुम ड्राइवर की वर्दी में हो। लोग मुझे पहचान सकते हैं और सोचेंगे कि मैं ड्राइवर के साथ इतनी देर क्या बातें कर रही हूं। ऐसे में मेरा कार में रहना ही ज्यादा बेहतर है।"
बेदी कुछ नहीं बोला।
प्रिया के चेहरे पर सोचों के भाव थे।
"क्या बात करनी है तुम्हें ?" बेदी ने उसके चेहरे पर निगाह मारी।
"तुम दिनेश को खत्म क्यों नहीं कर रहे। किस चीज का इन्तजार है तुम्हें ?" प्रिया बोली।
"वक्त का इन्तजार है। मौके का है। वो बचेगा नहीं।"
प्रिया ने उसकी आंखों में झांका।
"तुम्हें वक्त का इन्तजार है। मौके का इन्तजार है।" प्रिया के स्वर में व्यंग के भाव आ गए--- "मेरे ख्याल में अच्छा यही रहेगा कि तुम ये नौकरी छोड़ कर चले जाओ। मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं रही।"
"इस बात का एहसास तो मुझे हो ही चुका है।" बेदी ने उसे घूरा।
"क्या मतलब ?"
"ओबराय की हत्या के लिए, तुम किसी और को तैयार कर चुकी हो। उसी ने उस रात ओबराय को छत से नीचे धक्का दिया था। तुम्हें मालूम है कि वो ओबराय को खत्म कर देगा। ऐसे में मेरी जरूरत कहां रही।"
प्रिया होंठ भींचकर उसे देखने लगी।
"मेरी बात का जवाब नहीं दिया तुमने।" बेदी का स्वर तीखा था।
"तुम धोखेबाज हो।" वो गुर्रा उठी।
"बकवास मत करो। मैं...।" बेदी ने कठोर स्वर में कहना चाहा।
"चुप हो जाओ। तुम्हारी सारी करतूतों से वाकिफ हूं मैं।" प्रिया खा जाने वाली आवाज में कह रही थी--- "छः लाख के बदले जो जेवरात मैंने तुम्हें दिए थे। वो कहां है। बता सकते हो।"
बेदी ने उसके चेहरे पर निगाह मारी।
"खामोश क्यों हो गए ? बोलो। जवाब क्यों नहीं देते ?"
"वो वहीं हैं, जहां उन्हें होना चाहिए।"
"वो वहां नहीं हैं, जहां उन्हें होना चाहिए।" प्रिया के चेहरे पर गुस्सा नाच रहा था--- "वो इस वक्त वहां पर हैं, जहां उन्हें किसी भी हाल में नहीं होना चाहिए।"
"तुम जानती हो कहां है।" बेदी की आंखें सिकुड़ीं ।
"हां।"
"कहां हैं वे जेवरात ?"
"ओबराय के पास।" प्रिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
"लगता है तुम्हें किसी ने ठोंक-बजाकर बहका दिया है!" बेदी ने लापरवाही से कहा।
"मेरी आंखें बहकती नहीं हैं, जिन्होंने ओबराय के पास वही जेवरात देखे हैं। लिफाफा भी वही था, जिसमें मैंने तुम्हें जेवरात डाल कर दिए थे। तुम खुद को बहुत चालाक समझते हो, जबकि इतने हो नहीं।" प्रिया का गुस्सा उफान पर था।
बेदी से कुछ कहते न बना।
उनके बीच करीब दो मिनट तक शान्ति रही। तनाव रहा।
"विजय।" प्रिया ने कुछ हद तक अपने गुस्से पर, आवाज पर काबू पा लिया था--- "मैं बहुत अच्छी तरह से जानती हूं कि तुम दिनेश से मिल चुके हो और शायद दिनेश ने तुम्हें कहा है कि मुझे खत्म कर दो।"
बेदी समझ नहीं पाया कि क्या कहे।
"चुप रहने से काम नहीं चलेगा। मैं तुमसे स्पष्ट बात कर रही हूं तो मुझे साफ-साफ जवाब भी चाहिए।" प्रिया ने शब्दों को चबाकर कहा।
"ये बात ही ऐसी है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या जवाब दूं।" बेदी ने गहरी सांस ली।
"जो सच है वही कहो। हो सकता है, हम दोनों में शायद फिर बात बन जाए।" प्रिया का स्वर सपाट था।
"ओबराय को मालूम हो गया था कि तुमने मुझसे बारह लाख में सौदा किया है कि, मैं ओबराय को खत्म कर दूं और छः लाख एडवांस के तौर पर, जेवरातों के रूप में, मुझे दिया है।"
"झूठ कहते हो तुम।"
"मैं सच कह रहा हूं।"
"हम दोनों की अकेले में बात हुई थी। ऐसे में ओबराय को कैसे मालूम हो सकता है कि...!"
"मैंने कहा है, उसे उसी दिन मालूम हो गया था। एक-एक शब्द मालूम था।" बेदी दांत भींच कर एक-एक शब्द चबाकर कह उठा--- "मुझसे भी कुछ कहते न बना था।"
प्रिया उसके चेहरे पर नजरें टिकाए रही।
"पहले तो मुझे शक हुआ था कि कहीं तुमने ही तो ये सब बातें नहीं बताई। फिर सोचा तुम क्यों बताओगी।" बेदी, प्रिया को देखते हुए कहे जा रहा था--- "अगले ही दिन सुबह उसने मुझे अपने कमरे में बुलवाया। सारी बात सामने रख दी, जो मेरे और तुम्हारे बीच हुई थी। मुझसे तो कुछ कहते न बन पा रहा था कि क्या कहूं।"
"फिर ?" प्रिया के चिपके होंठ हिले
"फिर उसने मेरे से जेवरात लेकर छः लाख मुझे दे दिए। यानी छः लाख में वो जेवरात उसने खरीद लिए।"
"हूं।" प्रिया के होंठ सिकुड़े।
"उसके बाद उसने मेरे सामने दस लाख की ऑफर रखी कि मैं तुम्हें खत्म कर दूं तो वो मुझे दस लाख देगा।"
"और तुम मान गए।"
बेदी ने प्रिया की आंखों में देखा।
"नहीं मानता क्या ?"
प्रिया उसे देख रही थी।
"मैं फंस चुका था। ओबराय ने एक तरह मुझे रंगे हाथों पकड़ लिया था। उसकी बात पर हां करना मेरी मजबूरी थी, तुम ही बताओ, इन्कार करने की स्थिति में वो मेरा क्या हाल करता। और कुछ नहीं तो नौकरी पर से तो वो आसानी से निकाल देता। मुझे बारह लाख की सख्त जरूरत है। वो पूरी नहीं हो पाती। ऐसे में उसकी बात मानने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। कोई रास्ता था तो तुम ही बता दो।"
प्रिया खामोश थी।
"तुम ही बताओ, मैंने तुम्हें खत्म करने की कोशिश की, जबकि तुम कई बार रात को मेरे पास आई। कार पर मेरे साथ बाहर गई। लेकिन मेरे मन में तुम्हारे लिए कभी बुरा भाव नहीं आया। तुम्हारी जान लेना तो दूर की बात है। ओबराय को मैंने हां अवश्य की, परन्तु तुम्हें नुकसान पहुंचाने का मेरा इरादा दूर-दूर तक नहीं है।"
प्रिया खामोश ही रही।
"मेरी पोजीशन को देखो। तुम्हें मिलता हूं तो तुम कहती हो ओबराय को खत्म करो। ओबराय के सामने जाता हूं तो वो कहता है तुम्हें जल्दी खत्म करूं। बाहर मेरे साथी नब्बे करोड़ की खबर पाने का इन्तजार कर रहे हैं। मैं ऐसा फंसा पड़ा हूं कि चैन की सांस भी नहीं ले सकता। ओबराय को विश्वास दिलाता हूं कि जल्दी ही प्रिया को खत्म कर दूंगा। तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि जल्दी ही ओबराय को मार दूंगा, जबकि मुझे समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं।"
प्रिया, बेदी को देखे जा रही थी।
"इन हालातों से मैं इतना परेशान हो चुका हूं कि यहां से चले जाने को मन करता है। लेकिन दौलत के लालच ने मुझे रोक रखा है। मेरी हालत का अन्दाजा तुम खुद लगा सकती हो।" बेदी ने कहकर कुछ ज्यादा ही लम्बी सांस लीं।
प्रिया ने सिर हिलाया। नजरें बेदी पर ही थीं।
"विजय।"
"कहो।"
"तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि तुम झूठ नहीं कह रहे।" प्रिया का स्वर गम्भीर था।
"शुक्र है, तुम्हें मेरा विश्वास तो आया।"
"अब आगे की बात करो। "
"क्या ?"
"दिनेश या मेरे को, किसे खत्म करोगे तुम? कुछ तो सोचा होगा।"
"मैंने तुमसे कहा ही है कि तुम्हारा बुरा करने की जरा भी इच्छा मेरे मन में नहीं है। अगर ऐसा कुछ होता तो मैंने कब का तुम्हें खत्म कर देना था। कई बार तुम अकेले ही मेरे पास रहीं।" बेदी ने अपनेपन भरे स्वर में कहा।
"फिर ?"
"तुमने पहले मुझसे बात की है। मुझे छः लाख दिए हैं। ऐसे में मैं ओबराय को खत्म करूंगा।" बेदी गम्भीर था ।
"कई दिन बीत चुके हैं। दिनेश को, कब का खत्म कर देन चाहिए था।"
"करूंगा। पहले मौका नहीं मिला। अपने साथी के साथ मिलकर अब उसे ही खत्म करूंगा।" बेदी ने कहा।
"तुमने कहा कि दिनेश को हमारी सारी बातचीत मालूम हो गई।" प्रिया का स्वर सोच से भरा था।
"हां।"
"कैसे मालूम हुई?"
"इस बारे में जब भी सोचता हूं, अजीब सी परेशानी में आ जाता हूं कि बंगले से बाहर अकेले में हुई बातचीत को पक्के और पूरे तौर पर ओबराय फौरन कैसे जान गया। मैं, अभी तक समझ नहीं पाया।"
प्रिया सिर्फ सिर हिलाकर रह गई।
बेदी बोला।
"इसी बात पर तुमने अविश्वास करके, किसी और को ओबराय की जान लेने के लिए उसके पीछे लगा दिया।"
"हां।" प्रिया ने बेहिचक कहा--- "दिनेश अच्छी तरह जान चुका है कि मैं उसे खत्म करवा देना चाहती हूं। ऐसे में वो बहुत जल्दी मेरी हत्या करवा देगा। तो किसी को तो आगे करना ही था।"
"कौन है वो, जिसने ओबराय को धक्का दिया।"
प्रिया खामोश रही।
"नहीं बताना चाहती तो मत बताओ। मैंने तो इसलिए पूछा था कि अगर वो हमारे साथ मिल जाए तो, ओबराय को मारने में और भी ज्यादा असानी हो सकती है। और मैं ये भी जानता हूं कि वो बंगले पर ही रहता है।"
प्रिया के चेहरे पर कुछ देर सोच के भाव उभरे रहे फिर कह उठी।
"वो नन्दराम है।"
"नन्दराम ।" बेदी चौंका।
"हां।" प्रिया का चेहरा कठोर हो गया।
"लेकिन वो तो लम्बा है। जबकि ओबराय ने कहा था कि रात जिसने उसे छत से नीचे धकेला उसका कद...।"
"अंधेरे में दिनेश धोखा खा गया होगा देखने में। वो नन्दराम ही था। नीचे कार न होती तो आज दिनेश जिन्दा न होता।" कहते हुए प्रिया के चेहरे पर खतरनाक भाव उभरे--- "लेकिन नन्दराम अब असफल नहीं होगा।"
"ओह।" बेदी ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया--- "नन्दराम को उस काम के लिए तुमने तैयार कैसे किया ?"
"ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी।" प्रिया अजीब से लहजे में मुस्कराई--- "एक ही बार में वो इस काम के लिए तैयार हो गया।"
"समझा।" बेदी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी--- "तुम्हारी खूबसूरती के आगे बड़े-बड़े हां कर दे। वो तो मामूली सा दरबान हैं। ओबराय के गिर्द बढ़िया शिकंजा कसा है तुमने ?"
"और तुम क्या ओबराय को बेवकूफ समझते हो।" प्रिया कड़वे स्वर में कह उठी।
"क्या मतलब ?"
"सरदार परमजीत के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ?" प्रिया की आवाज में खतरनाक भाव आ गए।
बेदी उसे देखता रहा।
"वो चण्डीगढ़ की ब्रांच से आया सरदार परमजीत सिंह नहीं है। मैंने चण्डीगढ़ फोन किया था। वहां का परमजीत सिंह वहीं पर है। दिनेश यूं ही किसी को परमजीत सिंह बनाकर लाया है कि वो मेरी जान ले सके।"
"हो सकता है, तुम्हारा ख्याल गलत हो।" बेदी के होंठों से निकला।
"मैं सच कह रही हूं।" एक-एक शब्द चबाकर कह उठी प्रिया ।
बेदी सोचने लगा कि सरदार परमजीत सिंह के चलने का ढंग उसे भी कुछ पहचाना क्यों लगा था।
"ओबराय किसी को मेरी हत्या के लिए लाया है तो यकीनन वो खतरनाक होगा। तभी तो मैं रात देर तक दिनेश के साथ ही खुले में बैठी रही। सुमित्रा भी जागती रही। मैं उस सरदार को मौका नहीं देना चाहती थी कि वो मेरी हत्या करने में सफल हो सके। लेकिन ऐसा रोज-रोज नहीं हो सकता। आज रात मुझे अपने बचाव के लिए कुछ करना होगा।"
बेदी की सोच भरी निगाह प्रिया के खूबसूरत चेहरे पर ही रही।
"विजय ।"
"हां।"
"आज मैं तुम्हें एक बात और बता देना चाहती हूं। इसलिए बता रही हूं कि तुम दिनेश को जल्दी खत्म करो।"
"कैसी बात ?"
"वो नब्बे करोड़ रुपया मेरे पास है।" प्रिया की आवाज गम्भीरता थी।
"क्या ?" बेदी जोरों से चौंका।
दोनों कई पल एक-दूसरे को देखते रहे।
अचानक प्रिया अजीब से ढंग से मुस्कराई।
"हैरान हो गए।"
"हां।" बेदी अपने पर काबू पाता हुआ, लम्बी सांस लेकर कह उठा--- "हैरान होने वाली बात तो है। मैं...मैं तो समझ रहा था कि... कि नब्बे करोड़ ओबराय के पास हैं।" बेदी अभी तक हैरान था।
"दरअसल मुझे पैसे की जरूरत नहीं है।" प्रिया ने पुनः कहा--- "लेकिन उस दिन वैन को नोटों से भरी देखकर समझ गई कि ये पैसे जिसके भी हैं, वो खतरनाक लोग हैं। कहीं से पैसे लूटे हुए हैं और वो वैन लेने अवश्य आएंगे। जबकि मैं दिनेश से पीछा छुड़ाना चाहती हूं। उसकी हरकतों से, आदतों से मैं तंग आ चुकी हूं। और फिर मुझसे शादी करने के लिए उसने मेरे पिता का बिजनेस बरबाद किया। जिसकी वजह से सदमे से मेरे पिता की मौत हो गई। और मैं इतनी कमजोर हो गई कि बड़ी उम्र वाले, बदसूरत इन्सान दिनेश से मुझे शादी कर लेनी पड़ी। वो मुझसे बच्चा चाहता है, जबकि उसमें कमी होने की वजह से मैं मां नहीं बन पा रही। क्या-क्या बताऊं तुम्हें।" प्रिया का स्वर धीमा हो गया--- "उस दिन वैन में पैसा देखकर मैंने यही सोचा कि अगर पैसा दबा लिया जाए तो, जिनका पैसा है, वो अवश्य पैसा मांगेगे। ऐसे में मैं उनके सामने ये शर्त रख दूंगी कि खामोशी से ओबराय को खत्म करके, उसकी लाश गायब कर दें और अपना रुपया ले लें। इसी कारण मैंने वो नब्बे करोड़, चुपके से सुमित्रा और दयाल के साथ मिलकर वैन से निकाल लिया और.... ।"
"अब नब्बे करोड़ कहां हैं?" बेदी के होंठों से निकला।
"मेरे पास बंगले पर। लेकिन मेरी मर्जी के बिना कोई वहां तक पहुंच भी नहीं सकता।" प्रिया का स्वर शांत था--- "और मैंने तुम्हें ये बात इसलिए बताई है कि जल्दी से दिनेश को खत्म करो और नब्बे करोड़ के साथ अपना बकाया छः लाख भी ले लो। मेरे ख्याल में अब तुम दिनेश को खत्म करने में देर नहीं लगाओगे।"
"हां।" बेदी अपने पर काबू पाता। सिर हिलाकर कह उठा--- "अब देर नहीं लगेगी।"
"साथ में ये भी अपने दिमाग में रखना कि मेरी जान लेने में तुम्हें नुकसान ही नुकसान है और ओबराय की जान लेने पर तुम्हें नब्बे करोड़ छः लाख रुपया मिलेगा।"
बेदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी और कह उठा।
"तुम्हारी जान लेने का इराद तो मेरा कभी था ही नहीं।"
"मेरी बात समझ में आ गई हो तो वापस चलें ?"
बेदी ने सिर हिलाया और ड्राइविंग सीट पर जा बैठा। मस्तिष्क भारी तौर पर उलझा हुआ था। वो सिर्फ ये सोच रहा था कि उसे बारह लाख इकट्ठे करने हैं, अपनी जिन्दगी बचाने के लिए। करोड़ों में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। साथ ही ये भी सोच रहा था कि पहले की तरह इस बार भी ओबराय जान गया कि उनके बीच क्या बातें हुई हैं तो क्या होगा ? क्या वो ओबराय को पहले ही बता दे कि प्रिया ने उससे क्या बात की है ?
ओबराय ये बातें जान गया हो और वो ओबराय को न बताए तो ओबराय पक्का सोचने लगेगा कि वो उसकी (ओबराय की) जान लेने की सोच चुका है।
ये बाद की बात है। बेदी ने कार स्टार्ट करते हुए उधर निगाह मारी, जिधर उदयवीर कार के साथ मौजूद था। कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा उदयवीर इधर की देख रहा था। बेदी ने कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। बैक मिरर में देखा, उदयवीर की कार भी पीछे आने लगी थी।
"नब्बे करोड़ के बारे में जानकर, मुझे अभी तक हैरानी हो रही हैं कि वो तुम्हारे पास हैं। ऐसा है तो तुमने मुझे छः लाख नकद क्यों नहीं दिए। जेवरात क्यों दिए।" बातचीत का सिलसिला जारी रखने के इरादे से बेदी बोला।
"वो सब रुपये तुम लोगों के ही थे और मुझे लगा कहीं तुम लोग, किसी वजह से उन रुपयों की पहचान कर ये न समझ जाओ कि नब्बे करोड़ मेरे पास है। इसलिए मुझे जेवरात देने पड़े।"
"तो अब तुमने क्यों बताया कि नब्बे करोड़ तुम्हारे पास हैं।"
"इसलिए कि अब हालात पहले वाले नहीं रहे। मामला आर-पार हो जाना चाहिए। इसलिए नब्बे करोड़ पाने की शर्त मैंने तुम्हारे सामने रख दी, ताकि तुम जल्दी दिनेश को खत्म करो।"
कुछ ही देर बाद कार खाली सी सड़क पर पहुंच गई। बेदी ने बैक मिरर में देखा कि एकाएक उदयवीर की कार तेज हो गई। बेदी ने कार की रफ्तार सामान्य रखी थी। देखते ही देखते उदयवीर की कार ने ओवरटेक किया और आगे जाकर कार को ठीक सामने लाकर, धीमी करते हुए रोक दी।
ठीक आगे उदयवीर की कार आ जाने की वजह से बेदी ने फौरन कार रोकी। साथ ही उसका दिल धड़क उठा कि अब उदयवीर प्रिया को लूटपाट के बहाने, जान से मार देगा। उसके बाद सारे झंझट खत्म हो जाएंगे।
"क्या हुआ।" प्रिया कह उठी--- "कार क्यों रोकी ?" साथ ही उसकी निगाह आगे खड़ी कार पर जा टिकी।
"आगे वाली कार ने अचानक ब्रेक...।" बेदी ने कहना चाहा। कि तभी उनके देखते-ही-देखते उदयवीर कार का दरवाजा खोलकर बाहर निकला और खतरनाक अंदाज में, हाथ में चाकू लिए पास पहुंचकर बेदी पर गुर्राया ।
"खबरदार जो कोई हरकत की। चुपचाप बैठे रहना। हिलना मत।"
"लेकिन तुम...।" बेदी ने कहना चाहा।
"चुप।" उदयवीर ऊंची आवाज में गुर्राया कि बेदी ने फिर कुछ नहीं कहा।
उदयवीर ने फौरन पीछे वाला दरवाजा खोला और फुर्ती के साथ भीतर बैठते हुए चाकू की नोक प्रिया की कमर से लगा दी।
चेहरे पर खतरनाक भाव नाच रहे थे।
प्रिया के होंठों पर कसाव आ गया था। आंखों में व्याकुलता झलक उठी थी।
"खबरदार जो शोर डालने की कोशिश की।" उदयवीर बदमाशी भरे स्वर में कह उठा--- "जो भी है चुपचाप निकाल दे वरना चाकू से काटकर फेंक दूंगा। जल्दी कर वरना....।"
"मैं तुम्हें सब कुछ दे रही हूं। चाकू पीछे कर लो।" कहने के साथ ही प्रिया ने अपने शरीर पर पहने जेवरात उतारने शुरू कर दिए। देखते ही देखते सारे गहने उतारकर कार की सीट पर रख दिए ।
उदयवीर उसे आराम से गहने देते देखकर हड़बड़ा सा उठा था। उसने तो सोचा था कि ये ना-नुकर करेगी और उसे चाकू मारने का बहाना मिल जाएगा। लेकिन... ।
■■■
"सोच क्या रहे हो।" प्रिया ने कहा--- "ले लो जेवरात । यही चाहिए थे न तुम्हें।"
उदयवीर समझ नहीं पाया कि क्या करे।
प्रिया आंखें सिकोड़े उसे देखने लगी।
"कैश निकालो।" उदयवीर गुर्राया, वह खुद को उलझन में फंसा महसूस कर रहा था।
बेदी मन ही मन झल्ला रहा था कि अब तक उदयवीर को चाकू से पांच-सात घातक वार कर देने चाहिए थे। लेकिन वो ये भी समझ रहा था कि उदयवीर घबरा सा गया है।
प्रिया ने पास ही रखा छोटा सा पर्स उठाकर, सीट पर रख दिया।
"ये हैं कैश। इसमें है।"
उदयवीर पलभर के लिए हिचकिचाया फिर सारे जेवरात और पर्स उठाकर जेब में ठूंसा और कार से बाहर निकल आया। हाथ में अभी भी खुला हुआ चाकू था।
"खबरदार जो मेरे पीछे आए।"
बेदी गुस्से भरी निगाहों से उदयवीर को देख रहा था। गुस्सा इस बात का था कि उसे प्रिया को लूटने के बहाने खत्म करने को कहा गया था, जबकि वो लूटकर खिसक रहा था। देखते ही देखते उदयवीर कार में बैठा और स्टार्ट करके कार आगे बढ़ा दी।
कार को दूर जाते देखते हुए बेदी ने खुद पर काबू पाया और कह उठा।
"ये तो बहुत बुरा हुआ।"
"मेरी नजरों में ठीक हुआ। चलो यहां से।" प्रिया के चेहरे पर अजीब से भाव थे।
बेदी ने प्रिया पर निगाह मारी फिर कार आगे बढ़ा दी।
"विजय।" प्रिया ने होंठ सिकोड़कर कहा--- "ये जो आदमी चाकू लेकर आया था, मुझे लूटने नहीं, बल्कि शायद मेरी जान लेने आया था, लेकिन ठीक वक्त पर घबरा गया।"
"मैं समझा नहीं।" बेदी को उदयवीर पर गुस्सा आ रहा था।
"उसने मुझसे गहने मांगे और उसे आशा थी कि मैं देने के लिए इन्कार करूंगी। तो इस बहाने से वो मेरी जान ले लेगा। लेकिन जब मैंने सारे जेवरात फौरन उसके हवाले कर दिए, तो वो समझ नहीं पाया कि किस बहाने से मुझे मारे। शरीफ बंदा था वो, शायद पहले उसने किसी की जान नहीं ली थी। तभी वो मुझ पर वार नहीं कर पाया।"
बेदी ने गहरी सांस ली।
"मेरी समझ से बाहर है तुम्हारी बात।" बेदी इतना ही कह सका।
"सीधी सी बात है कि वो मेरी जान लेने आया था।" प्रिया गम्भीर थी--- "दिनेश के अलावा और भला कौन चाहेगा कि मैं मर जाऊं। लेकिन दिनेश ऐसे किसी बेवकूफ आदमी को मेरी जान लेने के लिए नहीं भेजेगा।"
"तो फिर किसने भेजा होगा।"
प्रिया ने जवाब में कुछ नहीं कहा।
"ये सारा रगड़ा तुम्हारा ही पैदा किया हुआ है।" बेदी लापरवाही किन्तु गम्भीर स्वर में कह उठा--- "अगर तुम नब्बे करोड़ की रकम अपने पास नहीं रखती तो ये सब नहीं होना था, जो अब हो रहा है।"
"तुमने शायद मेरी बात सुनी नहीं कि मैंने जान-बूझकर, ये सोचकर नब्बे करोड़ रुपये रखे कि जब तुम लोग रुपये लेने आओगे तो, रुपये वापस करने की ये शर्त रखूंगी कि दिनेश को खत्म कर दो और रुपये ले जाओ। करोड़ों रुपया वापस पाने के लिए, तुम लोग बेहिचक एक की जान लेने को तैयार हो जाओगे और मैं दिनेश से छुटकारा पा लूंगी। उसकी सारी जायदाद मेरी हो जाएगी। और जिन्दगी भर मौज-मस्ती करूंगी।"
बेदी गहरी सांस लेकर रह गया।
"अब रास्ते में कोई कार रुकवाने की कोशिश करे तो किसी कीमत पर मत रोकना।" प्रिया ने उसे सतर्क किया।
"ठीक है।"
■■■
बेदी बंगले पर पहुंचा और कार को पोर्च में रोकने तक प्रिया ने दस बार उसे आगाह किया कि नब्बे करोड़ पाने की खातिर वो जल्दी से दिनेश को खत्म करे। कार को पोर्च में छोड़कर बेदी सबसे पहले शुक्रा से, क्वार्टर में मिला।
"हो गया काम ?" शुक्रा उसे देखते ही बोला ।
"सब गड़बड़ कर दिया उदय ने।" बेदी होंठ भींचकर कह उठा।
"क्या हुआ ?" शुक्रा के माथे पर बल पड़े।
"उदय के बस का नहीं है किसी की जान लेना। बेशक मेरी जान ही क्यों न खत्म होने वाली हो।"
"हुआ क्या ?"
"वो घबरा गया, ठीक वक्त पर पूरा मौका उसके हाथ में था। नहीं मारा उसने प्रिया को।"
"ओह ।"
"प्रिया ने जो जेवरात पहन रखे थे, उन्हें लूटकर चला गया। बेवकूफ।" बेदी गुस्से में था।
"ये तो बहुत गलत हुआ।" शुक्रा मुंह बनाकर कह उठा--- "सब कुछ तो समझा दिया था उदय को।"
"जब वार करने का वक्त आया तो वो घबरा गया। प्रिया की जान ले लेता तो मेरे ऑपरेशन के लिए पैसों का इन्तजाम हो जाता। मेरी थोड़े से दिनों की जिन्दगी, लम्बी हो जाती। मैं इस तरह हर रोज तिल-तिल करके न मरता।"
दोनों में कुछ देर खामोशी रही।
"प्रिया ने और भी कई बातें की।" बेदी धीमे स्वर में बोला।
"कैसी बातें ?"
"वो कहती है नब्बे करोड़ उसके पास है।"
"क्या ?"
"उसने स्पष्ट कहा कि उसने जो जेवरात मुझे दिए थे वो ओबराय के पास उसने देखे हैं। मैं ओबराय से मिल चुका हूं और उसकी जान लेना चाहता हूं।" बेदी गम्भीर हो उठा था।
"ओह ।"
बेदी ने अपने और प्रिया के बीच होने वाली सारी बातें बताई।
शुक्रा, बेदी के थकान से भरे चेहरे को देखता रहा।
"ये बातें तो एक तरफ रही।" बेदी बोला--- "मैं कुछ और ही सोच रहा हूं।"
"क्या ?"
"पहले प्रिया और मेरे में जो बातें हुई थीं, उन्हें ओबराय फौरन जान गया था। मैं नहीं समझ पाया कि उसे सारी बातें कैसे मालूम हुई।" बेदी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "हो सकता है, वो अब भी सब जान गया हो कि मेरे और प्रिया के बीच क्या-क्या बातें हुई हैं। या फिर जल्दी ही जान जाएगा।"
"तुम कहना क्या चाहते हो ?"
"यही कि ओबराय का विश्वास पाने के लिए, मुझे ये सब बातें उसे पहले से ही बता देनी चाहिए। मेरी और प्रिया के बीच होने वाली बातें उसे मालूम हो तब, न मालूम हो तब भी, मुझ पर उसका कुछ तो विश्वास बैठेगा कि मैं उसकी तरफ हूं। ओबराय या प्रिया में से किसी एक का तो विश्वास जीतना होगा। तभी कुछ हो सकेगा।"
शुक्रा उसे देखता रहा।
"क्या ख्याल है तुम्हारा ?"
"मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या कहूं। हमने तो दोनों में में किसी एक को खत्म करना है जो भी पहले हाथ लग जाए।"
"तो फिर क्या हर्ज है ये बातें ओबराय को बताने पर। फायदा हो या न हो। नुकसान तो नहीं होगा।"
एकाएक शुक्रा का चेहरा सख्त हो उठा।
"जो तुम्हार मन में आए करो।" शुक्रा दांत भींचकर बोला--- "मैं आज रात पक्का प्रिया को खत्म कर दूंगा।"
"ओबराय या प्रिया किसी को भी...।"
"नहीं। प्रिया को खत्म करूंगा। ओबराय दस लाख देगा। उदय प्रिया के जो जेवरात ले गया है, वो भी एक-दो लाख के होंगे। इस तरह बारह लाख की रकम इकट्ठी हो ही जाएगी।" शुक्रा कह उठा।
"छः लाख तो पहले से ही हमारे पास पड़े हैं।"
शुक्रा चाहकर भी नहीं कह सका कि वो छः लाख रागिनी ले भागी है।
"हो जाएगा बारह लाख का इन्तजाम।" शुक्रा ने लापरवाही से कहा--- "आज रात प्रिया को खत्म करूंगा।"
"प्रिया को खत्म करने का फायदा ये भी है कि बंगले में छिपा रखे नब्बे करोड़ को भी लिया जा सकता है।"
"हां विजय। प्रिया की मौत से ही हमारे काम संवर सकते हैं।" शुक्रा गम्भीर था।
"वो सरदार परमजीत सिंह भी प्रिया को खत्म करने के लिए आया है। प्रिया का ऐसा ही ख्याल है।" बेदी ने कहा।
"प्रिया का ख्याल ठीक हो सकता है। लेकिन मैं रात को प्रिया को, पहले ही खत्म कर दूंगा।" शुक्रा के स्वर में पक्कापन था--- "वो सरदार, प्रिया की जान नहीं ले सकेगा।"
■■■
बेदी, ओबराय से उसके बेडरूम में मिला।
ओबराय कुर्सी पर पसरने वाले ढंग में बैठा, दाएं हाथ की उंगलियों से कुर्सी की बाजू को धीमे-धीमे थपथपा रहा था। उसने बेदी को भीतर प्रवेश करते देखा तो शांत भाव में मुस्कराया, परन्तु कुर्सी की बांह को, उसका थपथपाना जारी रहा। चेहरे पर सामान्य भाव थे।
बेदी ने ओबराय को देखकर हौले से सिर हिलाया और पास आ पहुंचा।
"तुमने लंच नहीं लिया ?" ओबराय मुस्कराया।
"नहीं। लेकिन आपको कैसे मालूम कि....।" बेदी के होंठों से निकला।
"तुम प्रिया को लेकर बाहर गए थे और कुछ पहले ही कार के आने की आवाज सुनी थी।"
"जी। मैं लंच लेने ही वाला था कि सोचा पहले आपसे मिल आऊं।" बेदी कह उठा। उसका दिमाग तेजी से चल रहा था कि ओबराय उसके आने-जाने का पूरा हिसाब रखता है।
ओबराय की निगाहें उस पर थी और उंगलियों से कुर्सी का हत्था थपथपा रहा था।
"प्रिया ने बहुत ही खास बातें मुझसे की हैं।"
ओबराय की हिलती उंगलियां थम गई। नजरें बेदी पर रहीं।
"उसने मुझे दिए वो जेवरात आपके पास कहीं देख लिए हैं, जिसके बदले आपने मुझे छः लाख दिया था।"
ओबराय के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
"वो जानती है कि आपने उसकी हत्या करने के लिए मुझे कहा है।"
ओबराय की मुद्रा में कोई फर्क नहीं आया।
"कोरियाई वैन में से नब्बे करोड़ प्रिया ने ही निकाले थे। जो कि उसने बंगले पर ही कहीं छिपा रखे हैं। उसका कहना है कि नब्बे करोड़ वापस पाने हैं तो, आपकी हत्या करके, ले लूं।"
ओबराय मुस्कराया।
"बहुत बड़ा लालच दे दिया है उसने तुम्हें।" स्वर शांत था।
बेदी ने गहरी निगाहों से ओबराय को देखा।
"मेरी बातें सुनकर आपको हैरानी नहीं हुई?" बेदी कह उठा ।
"नहीं। क्योंकि इनमें से कोई बात भी मेरे लिए नई नहीं है।" ओबराय ने कहा--- "नब्बे करोड़ के लिए अब तुम मेरी जान लोगे।"
"ये आप क्या कह रहे हैं। अगर ऐसा कुछ होता तो मैं क्या आपको बताता कि प्रिया से मेरी क्या बातें हुई हैं।"
"और क्या बात हुई।"
बेदी ने सब कुछ बता दिया।
ओबराय खामोश बैठा सुनता रहा।
"एक बात नहीं बताई तुमने।" उसकी बात पूरी होने पर ओबराय ने कहा।
"क्या ?"
"रास्ते में किसी ने प्रिया के जेवरात लूटे।"
बेदी चौंका फिर गहरी सांस लेकर रह गया।
"वो बताना मुझे भी ध्यान नहीं रहा।" बेदी धीमे स्वर में कह उठा।
"बहुत बेकार आदमी हैं तुम्हारे। आते हैं हत्या करने और लूटकर चले जाते हैं।" ओबराय का स्वर शांत था।
बेदी ने कुछ नहीं कहा।
"इन्तजाम करना था तो बढ़िया करते।"
"गड़बड़ हो ही गई मालूम नहीं मौके पर वो क्यों घबरा गया।" बेदी ने आहिस्ता से कहा।
"अब मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूं। साफ-सही जवाब दोगे तो ठीक रहेगा।" ओबराय बोला।
"क्या ?"
"मैं कब का महसूस कर चुका हूं कि तुम बदमाश नहीं हो। शरीफ आदमी हो। नब्बे करोड़ जैसी बड़ी रकम से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं कि तुमने उसे लूटने में हिस्सा लिया हो। " ओबराय उसे देख रहा था।
"आप ठीक कहते हैं।" बेदी के होंठों से निकल गया।
"मैंने ये भी महसूस किया है कि नब्बे करोड़ में तुम्हारी कोई दिलचस्पी नहीं है।"
खुद-ब-खुद ही बेदी की गर्दन सहमति में हिल गई।
"तुम सिर्फ कुछ लाख इकट्ठे करने में दिलचस्पी ले रहे हो।"
"ठीक कहा।" बेदी के चेहरे पर गम्भीरता आ गई।
"मुझे ये बताओ कि नब्बे करोड़ में तुम्हारी दिलचस्पी क्यों नहीं है।" ओबराय ने पूछा।
"क्योंकि मुझे सिर्फ बारह लाख की जरूरत है।"
"क्या करोगे, बारह लाख का ?" ओबराय की निगाह बेदी पर जा टिकी।
"दिमाग का ऑपरेशन कराऊंगा। नहीं तो अगले तेईस दिनों में मैं मर जाऊंगा।"
"मैं समझा नहीं।" ओबराय के माथे पर बल पड़े।
पल भर खामोश रहकर बेदी कह उठा।
"ज्यादा वक्त नहीं बीता इस बात को। मैं अपने ऑफिस के काम के लिए...।"
"कहां काम करते थे तुम?"
"रायल सेफ कम्पनी। दिल्ली में।" कहते हुए बेदी ने गहरी सांस लेकर अपने कंधों को झटका दिया।
"हूं। बोलो।"
"ऑफिस के काम से बैंक गया तो वहां कुछ लोग बैंक को लूट रहे थे। ऐसे में उनकी चलाई गोली मेरे सिर में जा लगी और बेहोश हो गया। बाद में डॉक्टरों ने बताया कि दिमाग दो हिस्सों में बंटा होता है। बीच में लचीली हड्डी युक्त जोड़ होता है, ठीक वहीं, मेरे सिर में लगी गोली जा फंसी है। यूं तो आम डॉक्टर भी ऑपरेशन करके उस गोली को निकाल सकता है। परन्तु ऐसा करने पर गोली का जहर फैलने का खतरा है। डॉक्टर इस बात की गारण्टी नहीं लेते कि ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहेगा। और जो डॉक्टर गारण्टी लेता है वो सनकी बूढ़ा है। ऑपरेशन के बारह लाख मांगता है। इसलिए अपनी जिन्दगी बचाने के लिए मुझे बारह लाख की जरूरत है। ऐसे करोड़ों किस काम के कि जिन्दा ही न रहूं।"
ओबराय ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया।
"अब समझा तुम्हारी जरूरत को।"
"छः लाख मेरे पास हैं। और अब मुझे छः लाख की जरूरत है। अपनी जिन्दगी बचाने के लिए।" बेदी की आवाज में भारीपन आ गया--- "अगर आप मुझे छः लाख दे दें तो...।"
"मैंने कब मना किया है। मैं तुम्हें दस लाख दूंगा। जो कि हममें तय हो चुका है।" एकाएक ओबराय मुस्करा पड़ा--- "प्रिया को खत्म करो। उसकी लाश ठिकाने लगाओ और दस लाख ले लो।"
बेदी गहरी सांस लेकर, ओबराय के मुस्कराते चेहरे को देखता रहा। चेहरे पर कमीनेपन के अलावा और कुछ भी नजर नहीं आ रहा था।
"किसी के पास भी फालतू दौलत नहीं होती कि वो बांटता फिरे। हां, मेहनताना देने में मुझे कभी हिचक नहीं होती। काम खत्म करो। दस लाख तुम्हारे सामने होंगे।" ओबराय की नजरें बेदी पर ही थी।
बेदी को समझ नहीं आया कि क्या कहे।
"जाओ। लंच ले लो। अपने दोस्त के साथ भी बात करो। कुछ करो। दस लाख उसी वक्त मिलेगा।"
खामोश सा बेदी पलटा और बाहर निकल गया।
■■■
शाम ढल गई। अंधेरा छाने लगा था।
बेदी अपने क्वार्टर में बैड पर अधलेटा सा सोचों में डूबा हुआ था। लाइट भी उसने ऑन नहीं की थी। शुक्रा जब आया तो उसने रोशनी की।
"क्या बात है ?" शुक्रा पास ही कुर्सी पर बैठता हुआ बोला--- "ऐसे क्यों लेटा हुआ है ?"
बेदी ने उसे देखा। कुछ सीधा होकर बैठ गया। कहा कुछ नहीं।
"चुप क्यों है ?" शुक्रा ने उसके चेहरे पर नजरें टिका दी।
"मन नहीं है बोलने का।" बेदी ने भारी स्वर में कहा।
"विजय। दिल छोटा क्यों...।" शुक्रा ने कहना चाहा।
"मैं जानता हू शुक्रा। जाने क्यों मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैं अपने को बचा नहीं पाऊंगा। बारह लाख इकट्ठा नहीं कर पाऊंगा। मैं... मैं कुछ ही दिनों बाद मर जाऊंगा।" बेदी की आंख में पानी चमक उठा।
"मुझ पर विश्वास कर विजय।" शुक्रा मन ही मन तड़प उठा, उसकी आंखों में आंसू देखकर--- "तुझे कुछ नहीं होगा। मैं आज रात हर हालत में प्रिया को खत्म कर दूंगा। बदले में दस लाख ओबराय देगा। तेरे दिमाग के बीचो-बीच फंसी गोली को निकलवाने के लिए, हमारे पास पैसा इकट्ठा हो जाएगा। डॉक्टर वधावन तेरा ऑपरेशन...।"
"क्यों झूठी तसल्ली देता है।" बेदी ने कहते हुए, हथेली से आंखें साफ कीं ।
"मेरी बात को झूठ मानता है।" शुक्रा के चेहरे पर पक्कापन आ गया--- "आज रात देख लेना, तेरा यार अपनी बात का कितना पक्का है। बेशक लाख अड़चन आए। लेकिन कल की सुबह प्रिया नहीं देख पाएगी।"
बेदी क्या कहता।
"खुद को ठीक रख, उठ। हाथ-मुंह धो। रोज की तरह नजर आ । सब ठीक हो जाएगा।"
■■■
"डार्लिंग।" प्रिया ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा--- "डिनर का वक्त हो चुका है।"
ओबराय कुर्सी पर बैठा था। सामने टेबल पर दो फाइलें पड़ी थी। एक उसके हाथ में थी। पास ही में सरदार परमजीत सिंह बनी रागिनी खड़ी थी। ओबराय ने दिन में प्रिया और बेदी के बीच होने वाली सारी बातचीत सुन ली थी। वो जानता था कि प्रिया चण्डीगढ़ वाले ऑफिस से फोन पर बात कर चुकी है परमजीत सिंह के बारे इस में। और प्रिया बाखूबी जानती है कि उसके पास मौजूद परमजीत सिंह नकली है।
ओबराय ने सिर उठाकर प्रिया को देखा फिर मुस्करा पड़ा।
"फाइलें चैक कर रहा हूं। आधा घंटा और लगेगा।" ओबराय ने कहा।
प्रिया ने शांत सी निगाह सरदार जी बने रागिनी पर मारी फिर ओबराय से बोली।
"ओ. के. । ठीक आधे घंटे बाद डायनिंग टेबल पर आ जाना।"
ओबराय ने मुस्कराकर सिर हिलाया तो प्रिया बाहर निकल गई।
रागिनी ने ओबराय को देखकर धीमे स्वर में कहा।
"कल की तरह आज भी प्रिया को लेकर आधी रात तक मत बैठ जाना।"
"डिनर, के बाद मैं सोने जा रहा हूं।" ओबराय ने फाइल बंद करते हुए कहा ।
रागिनी की आंखों में खतरनाक भाव मचल उठे।
"और तुम सो मत जाना।" ओबराय की आवाज में हल्की सी सख्ती आई--- "ये रात, प्रिया की आखिरी रात होनी चाहिए।"
"आखिरी ही होगी।" रागिनी के स्वर में मौत के भाव शामिल हो गए थे।
ओबराय उठ खड़ा हुआ।
"प्रिया ने नब्बे करोड़ कहां रखे हैं। उन्हें तलाश करने में तुम मेरा साथ देना।" रागिनी बोली।
"मिल जाएगा पैसा। ये खबर मेरे पास पक्की है कि तुम्हारा पैसा प्रिया ने ही बंगले में कहीं छिपा रखा है। इस काम में उसने दो नौकरों दयाल और सुमित्रा की सहायता ली है।" ओबराय की आवाज में कठोरता आ गई--- "ज्यादा परेशानी नहीं आएगी। उस पैसे को ढूंढने में। तुम पहले अपना काम निपटाओ।"
■■■
रात के बारह बज रहे थे। बंगले पर खामोशी छा चुकी थी। रोजमर्रा की तरह जरूरत की लाइटें भीतर-बाहर रोशन थी। दयाल-सुमित्रा-नन्दराम-बेदी और शुक्रा सर्वेन्ट क्वार्टरों में मौजूद थे।
बेदी और शुक्रा इस वक्त जाग रहे थे।
बेदी अभी-अभी बंगले के किचन से आया था और किचन में इस्तेमाल होने वाला दस इंच लम्बा और डेढ़ इंच चौड़ा छुरा निकालकर शुक्रा की तरफ बढ़ाया।
शुक्रा ने छुरा लेकर चैक किया और होंठ भींच कर कह उठा।
"ये ठीक रहेगा। एक ही बार में उसका काम हो जाएगा।"
"कर दोगे उसे खत्म। उदय की तरह घबरा तो नहीं जाएगा।" बेदी ने धीमे किन्तु सख्त स्वर में कहा।
"यार के लिए तो जान भी दे दूं फिर ये तो सिर्फ दूसरे की लेने की बात है।" शुक्रा ने खतरनाक स्वर में कहा।
बेदी उसे देखता रहा। कुछ कह नहीं सका।
"दो बजे के करीब बंगले में जाऊंगा। तब सब गहरी नींद में होंगे। प्रिया भी...।"
बेदी सिर हिलाकर रह गया।
और ठीक इसी वक्त, प्रिया के बेडरूम में।
■■■
प्रिया के बेडरूम में नाइट बल्ब का हल्का सा प्रकाश फैला था।
वो नाइटी में बैड पर पीठ के बल लेटी थी। परन्तु उसकी आंख में नींद नहीं थी। मस्तिष्क सक्रिय था, इन सब हालातों को लेकर आज नन्दराम ने उसे विश्वास दिलाया था कि वो दिनेश को खत्म कर देगा। उधर उसे पूरा विश्वास था कि नब्बे करोड़ पाने की खातिर विजय भी अब ओबराय को खत्म करने में देर नहीं लगाएगा परन्तु जब तक दिनेश खत्म नहीं होता, उसकी परेशानी खत्म नहीं हो सकती।
प्रिया को अपना भी डर लगा हुआ था।
उसे पूरा विश्वास था कि दिनेश, सरदार परमजीत सिंह को उसकी हत्या करवाने के लिए बंगले पर लाया है। उधर विजय पर भी मन ही मन वो पूरा भरोसा नहीं कर पा रही थी क्योंकि उसने दिनेश से उसकी हत्या का सौदा कर लिया था। हो सकता है दिनेश की अपेक्षा उसकी ही जान ले ले। तभी तो आज उसने बेदी को नब्बे करोड़ के बारे में स्पष्ट बता दिया था कि उसके पास है। ताकि वो जल्दी दिनेश को खत्म करे।
इन सब बातों के बावजूद भी प्रिया को चैन नहीं था। वो जानत थी कि दिनेश ने जिन्दगी में कभी किसी से हार नहीं मानी थी। हिम्मत वाला खतरनाक इन्सान है। उसे पार पाना आसान नहीं । नब्बे करोड़ की रकम तो उसने इसलिए दबा ली थी कि जिनक पैसा है, वो वापस पाने के लिए आसानी से दिनेश को खत्म कर देंगे। चंद ही घंटों में खत्म कर देंगे। कोई शोर-शराबा भी नहीं होगा। अगर उसे पता होता कि मामला इस तरह लम्बा खिंच जाएगा तो शायद वो ऐसा कदम न उठाती। उठाती तो और भी पक्का इन्तजाम करके उठाती ।
अपने ही पैदा किए हालातों में वो इस तरह घिर गई थी कि चैन हराम हो गया था। कोई और रास्ता न पाकर, विजय को ओबराय की तरफ झुका पाकर उसने बौखलाकर नन्दराम को अपने शरीर का जलवा दिखाया। रातभर उसे अपने शरीर से खेलने दिया, इस शर्त के साथ कि वो दिनेश को खत्म करेगा।
और नन्दराम ने कोशिश भी पूरी की।
परन्तु किस्मत का धनी, दिनेश बच निकला। आज शाम नन्दराम ने उसे पूरा भरोसा दिलाया था कि वो रात को दिनेश को खत्म करके रहेगा। इस वक्त मन ही मन प्रिया, दिनेश के मारे जाने का इन्तजार कर रही थी।
इन्हीं सोचों में उलझी, कभी उसकी आंखें बंद हो जातीं तो कभी आंखें खोल लेती।
दूर-दूर तक सोच रही थी वो। परन्तु अपने पास की उसके पास कोई खबर नहीं, कोई एहसास नहीं था कि बैड के नीचे से, आहिस्ता से, बेआवाज सरक कर रागिनी, सरदार जी के वेष में बाहर निकल रही थी।
धीरे-धीरे से रागिनी सरककर बैड के नीचे से, पूरी तरह बाहर निकल आई। वो तव बैड के नीचे छिपी थी, जब प्रिया डिनर के लिए डायनिंग टेबल पर, ओबराय के साथ थी। और रात गहरी होने का इन्तजार कर रही थी।
इस समय प्रिया करवट लेकर जरा सा नीचे देखती तो रागिनी को पीठ के बल लेटा पाती। परन्तु वो तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि कमरे में कोई हो सकता है। क्योंकि जब वो कमरे में आई थी तो पूरी तरह कमरा चैक किया था। दरवाजा, खिड़कियां चैक की थी। अच्छी तरह बंद करके वो लेटी थी।
नीचे पीठ के बल लेटे ही लेटे रागिनी ने जेब से चाकू निकाला। जो एक तरफ धार वाला था और दूसरी तरफ पैने दांत नजर आ रहे थे। उस चाकू से ठीक तरह वार किया जाए तो एक ही वार काफी हो सकता था। चाकू हाथ में आते ही रागिनी की आंखों में दरिन्दगी नाचने लगी।
प्रिया शांत भाव से आंखें बंद किए, सोचों में डूबी हुई थी।
रागिनी हौले से बैठी फिर फर्श पर हाथ रखते हुए उठ खड़ी हुई। दाएं हाथ में चाकू का दस्ता जकड़ा हुआ था। वहशीपन लिए आंखें प्रिया पर जा टिकी थीं। दूसरे ही पल उसने चाकू वाला हाथ ऊपर किया, उसी पल ही यूं ही प्रिया ने आंखें खोलीं।
आंखें खोलते ही वो सकते की सी हालत में रह गई। एक क्षण के लिए तो उसे कुछ समझ में नहीं आया। आंखों के सामने चाकू थामे हाथ नजर आया। चाकू वाला हाथ रफ्तार के साथ प्रिया की छाती की तरफ बढ़ा।
प्रिया को जैसे होश आया। उसने फौरन दोनों हाथ आगे बढ़ाए जो कि रागिनी की कलाई पर जा टिके। छाती में धंसने वाला चाकू रास्ते में ही थम गया।
उधर रागिनी को लगा जैसे उसकी कलाई किसी शिकंजे में फंस गई हो। प्रिया की ताकत का उसे पूरी तरह एहसास था। जब प्रिया उससे कोरियाई वैन छीनकर भागी थी तो उसके एक ही घूंसे से वो बे-दम हो गई थी। अपनी कलाई प्रिया के हाथों में फंसते देखकर, वो दांत किटकिटा उठी।
प्रिया ने फौरन उधर देखा ।
मध्यम सी रोशनी में उसने, उसे सरदार परमजीत सिंह के रूप में पहचाना। उसे सामने पाकर प्रिया के चेहरे पर खतरनाक भाव मचल उठे। दूसरे ही पल उसने टांग घुमाई। तीव्र ठोकर रागिनी के पेट में लगी। इसके साथ ही उसने कलाई छोड़ दी। रागिनी लुढक कर दूर जा गिरी। चाकू उसके हाथ में रहा। वो फौरन खड़ी हो गई। सामने प्रिया को खड़े पाया। दोनों हाथ कमर पर रखे सुर्ख आंखों से उसे देख रही थी।
“तो मेरी जान लेने के लिए दिनेश तेरे को लेकर आया है।" प्रिया खतरनाक स्वर कह उठी।
चाकू थामे रागिनी सुर्ख आंखों से उसे देखती रही। उसने तो सोचा था कि प्रिया को नींद में ही खत्म कर देगी। लेकिन अब मुकाबला सीधे-सीधे सामने का हो गया था और रागिनी जानती थी कि वो प्रिया जैसी ताकतवर औरत का मुकाबला नहीं कर सकती।। अपनी जगह पर खड़ी वो प्रिया को देखती रही।
"तू मेरी जान लेने आया था और अब तू ही मरेगा।" प्रिया खतरनाक ढंग से उसकी तरफ बढ़ी।
रागिनी की समझ में नहीं आया कि क्या करे।
इससे पहले प्रिया उसके करीब पहुंचती, रागिनी फौरन हड़बड़ाए स्वर में कह उठी।
"पकड़ो इसे।"
रागिनी के इन शब्दों पर प्रिया फौरन घूमी ।
इतना ही वक्त बहुत था रागिनी के लिए। वो बिल्ली की तरह झपटी और हाथ में थमा चाकू पूरी ताकत के साथ प्रिया की पीठ में धंसा दिया। प्रिया के होंठों से घुटी-घुटी चीख निकली। वो पलट भी न सकी कि रागिनी ने जोरदार ठोकर उसके कूल्हों पर मारी।
प्रिया लड़खड़ा कर बैड पर जा गिरी। चाकू की मूठ पर रागिनी का पंजा जमा था। इसी वजह से प्रिया के आगे जाते ही चाकू पुनः उसके हाथ में आ गया। वो पुनः झपटी और बैड पर गिरी प्रिया की बांह पकड़कर अपनी तरफ घुमाया और आनन-फानन चाकू उसकी गर्दन पर फेर दिया।
प्रिया के शरीर को तीव्र झटका लगा। कुछ पल वो तड़पी फिर शांत पड़ गई।
रागिनी दांत भींचे, चाकू थामे मध्यम सी रोशनी में, प्रिया की लाश को देखती रही। चाकू का फल खून से सुर्ख हो रहा था। उसका दिल धाड़-धाड़ बज रहा था। वो जानती थी कि प्रिया पर काबू पाना आसान काम नहीं था। फिर भी किस्मत ने बाजी उसकी तरफ फेंक दी थी।
चंद गहरी-गहरी सांसें लेने के पश्चात रागिनी खुद पर काबू पाने की चेष्टा करने लगी। चाकू को उसने प्रिया की लाश के पास ही फेंक दिया। हाथ की चिपचिपाहट बता रही थी कि वहां खून ही खून है। वो वहां से हटी और बाथरूम जाकर हाथों को अच्छी तरह धोया।
उसके बाद वो कमरे से निकली और सीधी ओबराय के कमरे में पहुंची। दरवाजा बंद था। थपथपाने पर दरवाजा खुला। सामने ओबराय था।
"इस वक्त।" ओबराय ने कहना चाहा।
रागिनी उसे एक तरफ करके भीतर प्रवेश कर गई।
ओबराय ने पलटकर उलझन भरी निगहों से उसे देखा।
"प्रिया को मार दिया है मैंने।" अपने स्वर पर काबू पाते हुए, रागिनी ने धीमे स्वर में कहा। उसके चेहरे पर उभरी उत्तेजना स्पष्ट नजर आ रही थी।
ओबराय की आंखें सिकुड़ी। दूसरे ही पल उसके होंठों पर मुस्कान उभर आई।
"हो सकता है, उसकी सांसें अभी भी चल रही हों।"
"वो मर चुकी है।" रागिनी ने शब्दों पर जोर देकर कहा ।
"तुम...।" ओबराय खुलकर मुस्कराया--- "वास्तव में बहुत खूबसूरत हो।"
"उसकी लाश ठिकाने लगा दो तो ठीक रहेगा।"
ओबराय आगे बढ़ा और तिपाई पर से सिगार उठाकर सुलगाया।
"लाश कौन ठिकाने लगाएगा ?" रागिनी ने पूछा।
"विजय।"
"वो। उसने मनाकर दिया तो ?" रागिनी के होंठों से निकला।
"नहीं मना करेगा। उसे पैसे की सख्त जरूरत है।" ओबराय ने कहा--- "और फिर जब वो प्रिया को मरा देखेगा तो किसी स्थिति में इन्कार नहीं कर सकेगा। पैसे कमाने का ये मौका उसके लिए आखिरी होगा।"
रागिनी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं प्रिया की लाश देखकर आता है।" कहने के साथ ही ओबराय बाहर निकल गया।
रागिनी वहीं रही।
दूसरे मिनट ही ओबराय वापस लौटा।
"ठीक है।" कमरे में प्रवेश करते ही ओबराय कह उठा--- "लाश ठिकाने लगाने के लिए मैं विजय को बुलाकर लाता हूँ।"
"जल्दी करना। मैंने नब्बे करोड़ तलाश करने हैं।" रागिनी ने ओबराय को देखा।
ओबराय मुस्कराया।
"नब्बे करोड़ की फिक्र मत करो। अब तुम्हारे पास वक्त ही वक्त है उन रुपयों को ढूंढ़ने के लिए...।"
"मैं अपने कमरे में जा रही हूं।"
ओबराय ने सिर हिलाया तो रागिनी बाहर निकल गई।
■■■
ओबराय अंधेरे में खुद गया बेदी को बुलाने। नीचे के क्वार्टर में लाइट बंद किए, कमरे में बैठे शुक्रा को देखा तो उसने, शुक्रा से कहा कि विजय को लेकर मेरे कमरे में आ जाओ। चौथे मिनट ही बेदी और शुक्रा, ओबराय के सामने उसके कमरे में थे ।
उन्हें देखते ही कुर्सी पर बैठा ओबराय मुस्कराया।
"कोई खास काम है ?" बेदी की निगाह, ओबराय के मुस्कराते चेहरे पर जा टिकी।
"हां।"
"क्या ?"
"मैं तुम्हें रुपये कमाने का बहुत अच्छा मौका देना चाहता हूं।" ओबराय ने कहा।
"मैं समझा नहीं।" बेदी ने कहा। पल भर के लिए शुक्रा को देखा।
"सीधी-सीधी बात का कोई मतलब नहीं होता विजय ?"
दो पलों की चुप्पी के बाद बेदी बोला।
"कैसे मिलेंगे रुपये ?"
"लाश को ठिकाने लगाकर।"
"लाश?" बेदी जोरों से चौंका--- "किसकी?"
शुक्रा की आंखें सिकुड़ गई।
"प्रिया की।"
"प्रिया की।" बेदी चिंहुक उठा--- "प्रि... प्रिया मर गई ?"
"हां।"
"किसने मारा ?" बेदी के चेहरे पर जहान भर की हैरानी इकट्ठी हो चुकी थी।
"ये बताना जरूरी नहीं समझता। तुम लाश ठिकाने लगाओ और पैसे लो।" ओबराय ने बेदी की आंखों में देखा।
बेदी और शुक्रा की नजरें मिलीं।
"उस सरदार जी ने प्रिया को मारा होगा।" बेदी अपनी हालत पर काबू पाते कह उठा।
ओबराय ने मुस्कराते हुए सिगार का कश लिया।
"आज रात मैं प्रिया को खत्म करने जा रहा था।" शुक्रा तीखे स्वर में कह उठा--- "प्रिया को किसी दूसरे ने मार दिया। इससे हमारा नुकसान हो गया।"
"तुम लोग सोचते रहे। काम करने वाले कर गए। फिर भी लाखों के नुकसान में से कुछ तो हासिल कर सकते हो प्रिया की लाश ठिकाने लगाकर।" ओबराय का स्वर बेहद शांत था।
"कितना देंगे लाश ठिकाने लगाने का ?" बेदी ने पूछा।
"लाख रुपया।"
"सिर्फ लाख ?" बेदी के होंठों से निकला।
"हमें मंजूर नहीं।" शुक्रा ने तीखे सख्त स्वर में कहा--- “कहाँ दस लाख और कहां लाख।"
ओबराय पुनः मुस्करा पड़ा।
"जिसने प्रिया की हत्या की है, लाश उसी से ठिकाने लगवा लो।” बेदी का चेहरा गुस्से से भरने लगा। आंखों के सामने प्रिया का खूबसूरत चेहरा और बेमिसाल हुस्न नाच उठा।
"लाश ठिकाने लगाने का क्या मेहनताना चाहते हो?" ओबराय ने पूछा। स्वर में लापरवाही भरी हुई थी।
"सवाल मेहनताने का नहीं जरूरत का है।" बेदी ने कहा--- "और मुझे इस वक्त छः लाख की सख्त जरूरत है। मैंने आपको बताया ही था कि ऑपरेशन के लिए बारह लाख चाहिए। जिनमें से छः लाख इकट्ठे हो चुके हैं। "
शुक्रा एकाएक विचलित हो उठा। उसने बेदी को देखा। परन्तु लाख कोशिश के बाद भी हिम्मत इकट्ठी नहीं कर पाया बताने की कि, जो छः लाख इकट्ठा हुआ था, उसे रागिनी ले उड़ी है।
"छः नहीं। तुम्हारे पास अब आठ इकट्ठा हो चुका है।" ओबराय ने होंठ सिकोड़ते हुए कहा।
"आठ लाख।"
"हां। कल तुम्हारे साथी ने प्रिया के जो जेवरात लूटे थे, वो दो लाख के ऊपर के थे। मैं जानता हूं।"
बेदी, ओबराय को देखता रहा।
"हमें क्या मालूम। ये तो तुम कह रहे हो।" शुक्रा कह उठा--- "हो सकता है, उनकी कीमत पच्चीस हजार से ज्यादा न हो। उन जेवरातों को हमने तो देखा नहीं है।"
"मैंने तो देखा है।"
"तुम्हारे देखने से क्या होता है।" शुक्रा की आवाज पहले जैसी ही थी--- "बाद में वो सारे जेवरात दस हजार के ही निकले तो क्या होगा। तब तो तुम हमें घास भी नहीं डालोगे। तुम्हारे काम तो निकल चुके होंगे।"
ओबराय मुस्कराया।
"हम लाश ठिकाने लगाने का छः लाख लेंगे।" शुक्रा ने पुनः कहा--- "अगर तुम्हारी मजबूरी है तो तुम दोगे।"
"मैं सिर्फ चार लाख दूंगा। एक पैसा भी ऊपर नहीं।" ओबराय मुस्करा रहा था।
"चल विजय। हम...।" शुक्रा ने गुस्से से कहना चाहा।
"रुक जा शुक्रा।" बेदी ने शुक्रा की बांह पकड़ी--- "हमें चार लाख मिल रहे हैं।"
"तो...?" शुक्रा ने तीखी निगाहों से बेदी को देखा।
"छः लाख नगद हमारे पास हैं। उदय डेढ़-दो के जेवरात ले जा चुका है। अगर हमें चार लाख मिल जाएं तो करीब बारह लाख हमारे पास पूरे हो जाएंगे।" बेदी के स्वर में आग्रह और समझाने वाले भाव थे।
बेदी ने होंठ भींच लिए। वो समझ नहीं पाया कि छः लाख निकल जाने के बारे में उसे कैसे बताए। ये सब सुनकर तो वो अपना पूरा हौसला खो बैठेगा।
बेदी के शब्दों पर ओबराय मुस्कराया।
"विजय।" शुक्रा कह उठा--- "इस वक्त ये फंसा हुआ है। लाश ठिकाने न लगाई गई तो यहां पर पुलिस ही पुलिस होगी। इसके सामने कई नई मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी। ये हमें दस लाख भी देगा, जो इसने प्रिया की हत्या के लिए तय किए थे। जल्दबाजी मत करो।"
बेदी ने ओबराय को देखा।
ओबराय हौले से हंसा फिर सिगार का कश लिया।
"मैं सिर्फ चार लाख दूंगा। एक पैसा भी ऊपर नहीं।"
"तुम लाश ठिकाने लगाने के लिए दस लाख भी दोगे।" शुक्रा अपने शब्दों पर जोर देकर बोला।
"नहीं। भूल में हो। अगर चार लाख में ये काम मंजूर नहीं तो मत करो।" ओबराय ने कहा।
"हमें नहीं मंजूर। आओ विजय।" शुक्रा ने बेदी की कलाई थाम ली ।
बेदी अपनी जगह से नहीं हिला।
"विजय।"
"ये काम चार लाख में ही होगा।" ओबराय मुस्करा रहा था--- "क्योंकि विजय को ऑपरेशन कराना है। इसे चार लाख की जरूरत है। ऑपरेशन न हुआ तो इसकी जान जा सकती है।"
"इसे चार लाख की नहीं, दस लाख की जरूरत है।" शुक्रा ने गुस्से से कहा।
"चार की जरूरत है।" ओबराय ने कहा--- "क्यों विजय ?"
"हां चार की जरूरत है।" बेदी ने उखड़े स्वर में कहा फिर शुक्रा को देखा--- "तुम जिद्द क्यों कर रहे हो शुक्रा । काम हो रहा है। होने दो। चार लाख मिलते ही हमारे पास लगभग बारह लाख होंगे।"
शुक्रा होंठ भींचकर रह गया।
"हमें मंजूर है। बताओ लाश कहां है ?"
"लाश, उसके ही बेडरूम में है। जाकर देख लो। लाश जब मिले तो पहचान में नहीं आनी चाहिए। लाश ले जाने के लिए गैराज से कोई भी कार ले जा सकते हो। ये काम करते हुए तुम लोगों को कोई देख न सके।" ओबराय बोला।
बेदी ने सहमति में सिर हिलाया फिर शुक्रा से बोला ।
"आओ शुक्रा।"
शुक्रा की कठोर आंखें ओबराय के चेहरे पर थीं।
"प्रिया ने कल विजय से कहा था कि वो नब्बे करोड़ उसके पास है। उसने छिपा रखे हैं।" शुक्रा कह उठा।
"तो...।" ओबराय ने सिर हिलाया।
"वो नब्बे करोड़ हमारे हैं। हमें चाहिए।"
"मैंने कब मना किया है। लाश ठिकाने लगाओ। वापस आकर नब्बे करोड़ तलाश कर लो। ले लो।" ओबराय की आवाज में लापरवाही थी--- "नब्बे करोड़ में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है।"
शुक्रा कठोर अंदाज में पलटते हुए बोला।
"आओ विजय।"
प्रिया की लाश ठिकाने लगाने के लिए बेदी और शुक्रा बाहर निकल गए।
"विजय।" बाहर निकलते ही शुक्रा रुकते हुए गम्भीर स्वर में कह उठा।
"हां।" बेदी भी रुका।
"एक बात बताना भूल गया। या फिर इसलिए नहीं बताई कि मालूम होने पर तेरे को दुःख होगा।" शुक्रा के स्वर में व्याकुलता आने लगी।
"क्या ?" बेदी बेचैन सा नजर आया--- "क्या हुआ ?"
"वो जो छः लाख होटल में रखा था। उसे चालाकी दिखाकर रागिनी ले गई है। " शुक्रा ने अफसोस भरे स्वर में कहा।
"क्या ?" बेदी का मुंह खुला का खुला रह गया।
"हां। रागिनी वो छः लाख लेकर होटल से अपना सामान समेट कर खिसक चुकी है।"
कुछ पलों तक तो बेदी के होंठों से बोल तक न फूटा।
"ये कैसे हो सकता है। रागिनी को कैसे मालूम हो सकता है कि...।"
"मैं इस बारे में ज्यादा नहीं जानता। उदय से फोन पर मेरी बात हुई थी। उसने बताया कि रागिनी ने सब बातें उससे इस तरह की, कि उसे सब कुछ मालूम है। उसकी चालाकी में उदय फंस गया। और...।"
"शुक्रा।" बेदी के गले से फंसा-फंसा-सा स्वर निकला--- "म...मेरा ऑपरेशन कैसे होगा। उन्हीं छः लाख के भरोसे तो मैं अभी तक भागदौड़ कर रहा था कि बाकी के पैसों का इन्तजाम करके, ऑपरेशन... ।"
"ऑपरेशन हो जाएगा।" कहते हुए शुक्रा ने हौले से सिर हिलाया।
"क... कैसे ?"
"नब्बे करोड़ को भूल रहे हो। जिन्हें प्रिया ने बंगले पर छिपा रखा है।" शुक्रा ने गम्भीर स्वर में कहा--- "लाश को ठिकाने लगाकर वापस आकर उन करोड़ों को ढूंढने में हमें कोई परेशानी नहीं होगी और.... ।"
"तुमने कहा कि रागिनी छः लाख लेकर होटल छोड़कर चली गई है।" एकाएक बेदी कह उठा।
"हां। वो...।"
"मैं नहीं मान सकता।" बेदी के दांत भिंच गए।
"क्यों ?" शुक्रा की निगाह उसके चेहरे पर जा टिकी।
"वो औरत नब्बे करोड़ के लिए पागल हुई पड़ी है। मरी जा रही है वो। मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ। नब्बे करोड़ के बिना वो कहीं नहीं जा सकती और तुम कहते हो, वो होटल छोड़कर चली...।"
"हां। उदय ने यही कहा है और वो कम से कम मुझे ये खबर गलत नहीं दे सकता।" शुक्रा ने कहा।
बेदी होंठ भींचे, शुक्रा को देखता रहा ।
"क्या देख रहे हो ?"
"शुक्रा। रागिनी नब्बे करोड़ के बिना कहीं नहीं जाएगी।" बेदी के स्वर में विश्वास भरा पड़ा था।
"वो जा चुकी है।"
"नहीं। वो नहीं जा सकती।" बेदी का चेहरा अजीब से भावों से भरा पड़ा था--- "वो नब्बे करोड़ के लिए पागल है। उस पैसे के लिए उसने अपना बसा-बसाया घर छोड़ दिया। अपना पति छोड़ा। बहुत अमीर आदमी की बीवी थी वो। नब्बे करोड़ के लिए उसने सब कुछ छोड़ा, ऐसे में वो नब्बे करोड़ कैसे छोड़ सकती है। "
शुक्रा आंखें सिकोड़े बेदी को देखता रहा।
"तुम्हारा मतलब कि वो छः लाख लेकर होटल छोड़कर जा चुकी है, लेकिन उसकी नजरें इधर ही हैं।"
"हां।" बेदी ने फौरन अपना सख्त हुआ पड़ा चेहरा हिलाया--- "उसकी नजरें इधर ही हैं। वो नब्बे करोड़ के बिना कहीं नहीं जा सकती। उसकी जान नब्बे करोड़ में बसी हुई हैं। वो कहीं नहीं जा सकती।"
शुक्रा चेहरे पर गम्भीर भाव लिए देखता रहा बेदी के सख्त चेहरे को ।
"शुक्रा।" बेदी की आंखों में उलझन भरे भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे।
"क्या ?"
"वो छः लाख की खातिर, होटल नहीं छोड़ेगी। ये मैं दावे के साथ कह सकता हूं। बात कुछ और है।"
"और क्या ?"
"मालूम नहीं। लेकिन वो छः लाख की नहीं, नब्बे करोड़ की लालची है। अगर उसने होटल छोड़ा है तो समझो उसके दिमाग में खास बात है। कुछ खास करना चाहती है वो। वरना तुम ही सोचो कि वो होटल क्यों छोड़ेगी।"
शुक्रा के होंठ सिकुड़ गए। वो धीमे से सिर हिलाने लगा।
"शायद तुम ठीक कह रहे हो विजय।"
"मैं पक्का ठीक कह रहा हूं।" बेदी के स्वर में गुस्सा और उलझन थी।
"ये बातें फिर करेंगे। रात-रात में लाश को ठिकाने लगाकर वापस आना। आ, पहले लाश तो देख लें।"
दोनों रागिनी को लेकर उलझन में फंसे आगे बढ़ गए।
"अब मेरे दिमाग का ऑपरेशन तभी हो सकता है, जब नब्बे करोड़ हमारे हाथ लगे।" बेदी एकाएक बेचैन हो उठा।
"हां। बारह लाख पूरे करने के लिए नब्बे करोड़ को तलाश करना जरूरी है इसके अलावा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं।" शुक्रा ने गहरी सांस ली।
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डेढ़ घंटा लगा बेदी और शुक्रा को प्रिया की लाश समेटने में।
बैड पर पड़ी बड़ी चादर में उन्होंने लाश को बांधा। चाकू भी उसी में था। चादर का एक हिस्सा खून में डूबा पड़ा था। लाश वाली गठरी को दूसरी चादर में बांधा। फिर खून में डूबे गद्दे को उलटा करके बिछाया और अलमारी से दूसरी चादर निकालकर, बैड पर बिछा दी।
जहां भी खून नजर आया, अच्छी तरह साफ किया।
"लाश की गठरी कार की डिग्गी में डालकर बाहर ले जाएंगे।" बेदी ने धीमे स्वर में कहा फिर सूखे होंठों पर जीभ फेरी--- "मैं बाहर जाकर देखता हूं कि सब ठीक है कि नहीं। रास्ता साफ पाकर मैं कार को तैयार करता हूं। यहां से ऐसे बाहर निकलना है कि किसी को हमारे बाहर जाने का पता न चले।"
"पता तो लगेगा। बाहर दरबान होगा कोई...।" शुक्रा ने कहना चाहा।
"उसकी कोई बात नहीं दोनों दरबान बहुत अच्छी तरह जानते हैं मुझे। कह दूंगा तुम्हारी तबीयत खराब है। डॉक्टर के पास ले जा रहा हूं।"
"ठीक है।"
"अभी आता हूं।" कहने के साथ ही बेदी दरवाजा खोलकर बाहर निकलता चला गया।
शुक्रा गठरी को और भी टाइट करने लगा कि कार की डिग्गी में गठरी आराम से आ जाए।
अगले पैंतालीस मिनट में दोनों ने खामोशी से प्रिया की लाश की गठरी को पोर्च के पास अंधेरे में खड़ी कार की डिग्गी में डाला और कार सहित बाहर निकलते चले गए। गेट पर खड़े बहादुर को बेदी ने यही बताया कि उसके रिश्तेदार की तबीयत ठीक नहीं। मालकिन से कहकर, शुक्रा को डॉक्टर के पास ले जा रहा है।
बहादुर को भला उनके बाहर जाने में क्या एतराज हो सकता था।
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