देवराज चौहान की आंख खुली ।


मालूम नहीं फर्श पर लेटे ही लेटे कब नींद में डूब गया था। आंख खुलते ही वो उठ बैठा । सीढ़ियों से कूदकर वो इस कमरे में तो आ गया था, परंतु यहां से निकलने या आगे बढ़ने का रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा था जबकि उस रामनाथ ने सजा के तौर पर उसे नीले पहाड़ पर भेजने का फैसला किया था । लेकिन यहां तो हर तरफ का रास्ता बंद था। चारों तरफ दीवारें थी ।


परंतु कहीं तो कोई रास्ता होगा।


उसे ढूंढना होगा । आखिर कब तक वो यहीं बैठा रहेगा ।


इस सोच के साथ देवराज चौहान उठा और दीवार के पास पहुंचकर पैनी निगाहों से जर्रेजर्रे को चैक करते हुए दीवार के साथ- साथ आगे बढ़ने लगा ।


कमरे की दो तरफ की दीवारें देखने के बाद जब वो तीसरी तरफ की दीवार के पास पहुंचा तो हाथ में दो कील चुभी, देवराज चौहान ने ध्यान से देखा, दीवार में जरा-जरा के फासले पर दो कील ठुके हुए थे । देवराज चौहान के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे । दीवार में इस तरह कील ठुके होने का मतलब उसकी समझ में नहीं आया । जाने क्या सोचकर हाथ से ही, दीवार में धंसे कील को निकालने की चेष्टा करने लगा।


दस मिनट की अथाह कोशिश के बाद वो एक कील निकालने में सफल हो पाया। दीवार से कील निकालते ही, दूसरी तरफ दीवार में छः फीट ऊंचा और चार फीट चौड़ा रास्ता बन गया । उस जगह की दीवार एकाएक जाने कहां गायब हो गई थी ।


देवराज चौहान अजीब सी निगाहों से उस रास्ते को देखने लगा । वह समझ नहीं पाया कि कील निकलते ही, उस तरफ का रास्ता कैसे बन गया ?


जाने क्या सोचकर देवराज चौहान दीवार में ठुके दूसरे कील को भी निकालने में लग गया । हाथ से हिला-हिलाकर, दीवार में धंसी कील की पकड़ को वह ढीला करने लगा । करीब दस मिनट ही लगे, दूसरी कील को दीवार से निकालने में। निकालकर पलटा तो चेहरे पर हैरानी उभरी।


दूसरी दीवार पर एक पहले जैसा ही और रास्ता नजर आने लगा था । जो कि पहले वाले रोस्ते से छोटा था ।


वो कई पलों तक दोनों रास्ते को देखता रहा । स्पष्ट था कि यहां से जाने के लिए उसे दोनों रास्तों में से एक रास्ते को चुनना था । चेहरे पर सोच के भाव लिए वो आगे बढ़ा और बड़े वाले रास्ते में झांका ।


परंतु वहां घूप्प अंधेरा होने की वजह से कुछ नजर न आया। देवराज चौहान ने दूसरे रास्ते पर पहुंचकर उसमें झांका । लेकिन वहां भी अंधेरे का वही आलम था ।


देवराज चौहान समझ नहीं पाया कि वो किसी भी रास्ते पर बढ़े लेकिन गहरा अंधेरा उसके आगे बढ़ने में रुकावट बनेगा । ऐसे में कोई भी खतरा, अचानक उसके सिर पर आ सकता है। बनेगा।


लेकिन अंधेरे की वजह से वो यहां खड़ा भी नहीं रह सकता था । आखिरकार अंधेरे में ही बढ़ने का फैसला किया और बड़े रास्ते को छोड़कर, वो जाने क्यों छोटे वाले रास्ते में प्रवेश कर गया । रास्ता तंग था, परंतु जैसे-तैसे वो आगे बढ़ता जा रहा । तभी तेज आवाज के साथ वो सारी जगह रोशन हो उठी। देवराज चौहान ने फौरन पलट कर देखा।


जिस रास्ते से वो भीतर आया था, वो बंद हो चुका था । उसके बंद होते ही सारी जगह रोशनी से जगमगा उठी थी। देवराज चौहान ने पुनः सामने देखा । तंग रास्ता सीधा आगे जा रहा था ।


देवराज चौहान आहिस्ता-आहिस्ता पुनः आगे बढ़ने लगा । आगे रास्ता बंद होकर बाईं तरफ मुड़ रहा था।


मोड़ पर पहुंचते ही देवराज चौहान ठिठक गया । चेहरे पर अजीब भाव उभरे ।


सामने ही आदमकद बुत रास्ता रोके खड़ा था का । बुत का चेहरा हू-ब-हू मोना चौधरी से मिल रहा था । बुत के दाएं हाथ में कटार जैसा हथियार थमा था, जो की रोशनी में चमक रहा था। दूसरी बार देवराज चौहान ने मोना चौधरी का बुत देखा था । पहले की ही तरह पुनः हैरानी हुई कि मोना चौधरी का बुत तिलस्म में कैसे आ गया ? फिर यही सोचा कि इत्तफाक से बुत का चेहरा, मोना चौधरी से मिलता है ?


देवराज चौहान ने आगे बढ़ने की सोची।


परंतु वो तंग रास्ता बुत रोके खड़ा था । इस तरह खड़ा था कि उसकी बगल से भी नहीं निकला जा सकता था । देवराज चौहान समझ नहीं पाया कि क्या करे ? आखिरकार मनही-मन उसने तय किया कि बुत को नीचे गिराए बिना आगे नहीं बढ़ सकता ।


बुत को गिराने के इरादे से देवराज चौहान ने हाथ आगे बढ़ाया और बुत को धक्का दिया । परंतु बुत अपनी जगह पर टिका रहा।


देवराज चौहान ने बुत के पैरों को देखा। जो कि जमीन पर ही थे । न कि जमीन के भीतर । इस पर भी बुत हिला तक नहीं था । आखिरकार देवराज चौहान ने दोनों हाथ बुत पर रखे और पूरी ताकत के साथ से उसे धक्का देने लगा। लेकिन बुत अपनी जगह से सूत भर भी नहीं हिला।


देवराज चौहान के सामने अजीब सी समस्या खड़ी हो गई थी । बुत को हटाए बिना वो आगे बढ़ नहीं सकता था और बुत में जाने क्या था कि उसकी ताकत, उसे हिला भी नहीं पा रही थी । उसने आसपास देखा परंतु ऐसी कोई चीज भी नजर नहीं आई कि जिससे बुत को तोड़कर, आगे जाने का रास्ता बना सके ।


तभी जेब में चुभन सी होने लगी, जैसे कोई चीज मिल रही हो।


देवराज चौहान चौंका । उसका हाथ फौरन पैंट की जेब में गया तो उंगलियों से लकड़ी का छोटा-सा टुकड़ा टकराया, जो बेला ने यह कहकर उसे दिया था कि वक्त आने पर तुम्हारी सहायता करेगा । देवराज चौहान लकड़ी के टुकड़े को भूल चुका था, परंतु उसने ही हिलकर अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाया था इस वक्त । देवराज चौहान ने लकड़ी के टुकड़े को बाहर निकाल कर देखा ।


वो समझ नहीं पाया कि लकड़ी का यह छोटा-सा टुकड़ा भला उसके क्या सहायता करेगा। हथेली में रखे, अभी वो यही बात सोच रहा था कि अगले ही पल चौंका । देखते-ही-देखते वो लकड़ी का टुकड़ा, ठीक वैसी ही कटार बन गया, जैसी कटार उस बुत के हाथों में थमी । थी।


देवराज चौहान अविश्वास भरी निगाहों से अपने हाथ में दबी कटार को देखता रहा । फौरन ही समझ गया कि बेला का दिया लकड़ी का टुकड़ा करामाती है । बेला ने ठीक ही कहा था । लेकिन साथ ही वह उलझन में पड़ गया कि पत्थर के बुत पर यह कटार क्या असर करेगी ?


देवराज चौहान ने हाथ में दबी कटार को उलट-पलटकर देखा । इसी दौरान वो कटार बुत के हाथ में दबी कटार से टकरा गई । ऐसा होते, बुत की कटार वाली बांहें तीव्रता से हिली और हाथ में दबी कटार का वार देवराज चौहान के सिर पर होने ही जा रहा था कि देवराज चौहान ने फुर्ती के साथ अपने हाथ में दबी कटार आगे कर दी । दोनों कटारें आपस में टकराई और रुक गई।


देवराज चौहान हक्का-बक्का रह गया कि भला बुत की बांह कैसे हिल गई, जबकि अभी भी वो पत्थर की नजर आ रही थी ।


देवराज चौहान ने बुत को देखा फिर टकराकर रुकी पड़ी दोनों कटारों को कुछ पलों की सोच के बाद देवराज चौहान ने अपनी कटार, बुत वाली कटार से निकाली और एकदम पीछे हट गया ।


देवराज चौहान के देखते ही देखते बुत का कटार वाला हाथ पूरा नीचे आ गया और ऐसा होते ही बगल की दीवार में रास्ता पैदा हुआ और बुत सरकता हुआ उस रास्ते में प्रवेश कर गया और देखते ही देखते वो रास्ता बंद हो गया।


सामने से बुत हट चुका और अब देवराज चौहान ने आगे बढ़ने का रास्ता साफ था। देवराज चौहान ने आंखों में हैरानी लिए, यह सब देखा । फिर हाथ में दबी कटार को देखा।


उसके बाद गहरी सांस लेकर रह गया । वह समझ गया कि तिलस्मी नगरी में ताकत नहीं दिमाग के जोर पर आगे बढ़ना होगा। आने वाली हर मुसीबत से छुटकारा पाने की कहीं कोई ट्रिक अवश्य है ।


उसी क्षण उसके हाथ में दबी कटार गायब हो गई और हथेली पर वही इंच भर की लकड़ी का छोटा-सा टुकड़ा नजर आने लगा।


देवराज चौहान के होठों पर अजीब सी मुस्कान उभरी । उसने लकड़ी के टुकड़े को वापस जेब में डाला और आगे बढ़ने लगा । वह नहीं जानता था कि बेला का दिया लकड़ी का छोटा सा टुकड़ा इतने कमाल का है । कुछ आगे बढ़ने पर वो तंग रास्ता धीरे-धीरे खुला होने लगा । अब देवराज चौहान को आगे बढ़ने में परेशानी कम महसूस होने लगी ।


रास्ते में ज्यों-ज्यों मोड़ आ रहे थे, वो मुड़ता जा रहा था ।


करीब एक घंटे बाद देवराज चौहान उस रास्ते से एक ऐसे कमरे में जा पहुंचा। जहां हर तरफ सांप ही सांप नजर आ रहे थे। उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी कि वे एक के ऊपर एक चढ़ ढेर-सा बनाए हुए थे। उस जगह का फर्श देखना भी कठिन हो रहा था।


देवराज चौहान को देखते ही जाने कितने सांप फुंफकारते हुए उसकी तरफ लपके । हड़बड़ाकर देवराज चौहान वापस पलटा और कमरे से वापस उसी रास्ते पर आ खड़ा हुआ । कई सांप उस तरफ आकर ठहर गए और फन लहराते हुए उसे देखकर फुंफकारने लगे । लेकिन हैरानी की बात है कि कोई भी सांप कमरे से निकलकर उस रास्ते पर नहीं आया, जहां दो कदम दूर देवराज चौहान मौजूद था। 


देवराज चौहान समझ गया कि सांपों की हद उस कमरे तक ही है । वे उस रास्ते पर उसके पास नहीं आ सकते । सांपों की फुंफकारें उसके कानों में किसी तूफान की तरह पड़ रही थी |


देवराज चौहान ने निगाहें उठाकर सांपों वाले कमरे में घुमाई तो कमरे के पार उसे वैसा ही रास्ता नजर आया, जैसे रास्ते पर वो खड़ा था। देवराज चौहान समझ गया कि सांपों का कमरा पार करके उसे उस रास्ते पर ही आगे बढ़ना है, लेकिन वो यह भी जानता था कि सांपों से भरा कमरा पार कर पाना उसके लिए संभव नहीं था । कमरे के मुहाने पर खड़े सांप अभी भी उसे देखते हुए फुंफकार रहे थे । अपने फन लहरा रहे थे। उनकी चमकती आंखें स्पष्ट नजर आ रही थी।


देवराज चौहान कई पलों तक ठगा सा खड़ा रहा । मस्तिष्क में रह-रहकर एक ही बात टकरा रही थी कि वो सांपों वाले कमरे को किस तरह पार कर पाएगा ?


तभी उसका ध्यान लकड़ी के टुकड़े की तरफ गया जो बेला ने उसे दिया था । देवराज चौहान का हाथ फौरन जेब में गया और दूसरे ही पल लकड़ी का टुकड़ा उसके हाथ में था। उसकी खुली हथेली पर पड़ा था । वो, परंतु समझ नहीं पाया कि अब वो क्या करें ?


उसी पल हथेली पर मौजूद, लकड़ी का छोटा-सा टुकड़ा उछला और उसके सिर पर बालों में जा अटका । बालों में उसे सरसराहट सी हुई । देवराज चौहान कुछ कर, सोच पाता, एकाएक उसने खुद को जमीन पर पड़े पाया। वो उठने लगा । परंतु उठ न सका । इसके साथ ही भय से भरी सनसनी उसके जिस्म में दौड़ गई।


अब वो इंसान नहीं रहा था ।


नाग बन चुका था और नीचे पड़ा सिर की भांति अपने फन उठा रहा था।


देवराज चौहान को समझ नहीं आया कि उसके साथ क्या हो गया है । अच्छा-भला वह इंसान था और अब नाग बन चुका है । तभी उसने देखा, उसकी घात में जो नाग, सामने कमरे में मौजूद थे, उसके नाग बनते ही वह वहां से हटकर इधर-उधर जाने लगे ।


वो नाग बना हुआ था, परंतु उसकी सोचें, उसकी अपनी थी ।


उसे ध्यान आया कि नाग बनने से पहले वो लकड़ी का टुकड़ा उसके सिर पर उछलकर गिरा था। इसका मतलब उसी ने उसे नाग बनाया था । ताकि इन नागों और सांपों से उसे कोई नुकसान न पहुंचे और वह कमरा पार कर जाए । देवराज चौहान ने, यानी कि नाग बने देवराज चौहान ने आगे बढ़ने सरकने की चेष्टा की।


उसने खुद को नागों-सांपों की तरह आगे बढ़ते पाया ।


धीरे-धीरे वो नागों वाले कमरे में प्रवेश कर गया और नाग बना रेंगता हुआ, कमरा पार करता हुआ, सामने नजर आ रहे रास्ते की तरफ बढ़ा । इस दौरान उसे कई नागों-सांपों के ऊपर से निकलना पड़ा । नाग बना वो आगे बढ़ा जा रहा था, परंतु किसी नाग-सांप का ध्यान उसकी तरफ नहीं था । सब पहले की तरह अपने आप में मस्त थे ।


सात-आठ मिनट लगे उसे कमरा पार करने में ।


फिर वो जो रास्ता उसे नजर आ रहा था, कमरे से उस रास्ते में प्रवेश कर गया और ठिठका । फन उठाए इधर-उधर देख रहा था और सोच रहा था कि अब नाग से इंसान कैसे बनेगा ? अभी उसने अपने आपको खड़े पाया।


देवराज चौहान के, इंसान के रूप में । यह सब होना बेहद अजीब लगा देवराज चौहान को । उसने पलट कर देखा कमरे को । जहां नाग और सांप ही नजर आ रहे थे । जिसे वह किसी भी स्थिति में पार नहीं कर सकता था । उसे वो कितनी आसानी से पार कर गया, बेला की लकड़ी के सहारे ।


उसे आंखों के सामने वाला कड़ी का टुकड़ा लहराता नजर आया । जैसे कोई उसे हवा में नचा रहा हो । देवराज चौहान ने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ा । मन ही मन बेला का शुक्रिया अदा किया फिर उसे पैंट की जेब में डालकर पलटकर रास्ते पर आगे बढ़ गया।


अब रास्ता खुला होता जा रहा था ।


करीब आधे घंटे बाद देवराज चौहान को खुला आसमान नजर आने लगा । उसने मन ही मन चैन की सांस ली । परंतु वो रास्ता वैसे ही आगे बढ़ा जा रहा था ।


दस मिनट पश्चात ही रास्ता खत्म हो गया और आगे का हाल देख कर सिर से पांव तक कांप उठा । आगे सैकड़ों फीट गहरी घाटी थी, जिसमें घना जंगल नजर आ रहा था। देवराज चौहान उलझन में फंस गया कि क्या करे? उसने सिर उठाकर जरा-सा घाटी में झांका कि शायद नीचे उतरने का कोई रास्ता हो ?


परंतु कोई रास्ता नहीं था ।


लंबी सोच के बाद देवराज चौहान ने यही फैसला लिया कि उसे वापस जाना होगा । क्योंकि यहां से आगे जाने का कोई रास्ता नहीं है । देवराज चौहान वापस पलटा और तीसरे कदम पर ही उसे रुक जाना पड़ा । सामने दीवार जैसी कोई चीज आ गई थी । जो नजर तो नहीं आ रही थी, परंतु उससे टकराते ही उसे महसूस कर लिया था, जबकि पीछे का सारा नजारा उसे स्पष्ट नजर आ रहा था।


देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़कर न नजर आने वाली दीवार को हाथों से टटोला तो स्पष्ट तौर पर उसका आभास पाया । ऐसा होने का मतलब था कि वो वापस नहीं जा सकता । उसे आगे भी जाना होगा। यकीनन यह तिलस्मी का उसूल होगा ?


परंतु आगे तो हजारों फीट गहरी खाई थी ।


कहीं कोई रास्ता नहीं था ।


देवराज चौहान खुद को फंसा सा महसूस करने लगा।


ठीक उसी वक्त देवराज चौहान के जेब में पड़ी, लकड़ी का टुकड़ा हिलता हुआ-सा महसूस हुआ । देवराज चौहान ने फौरन जेब में हाथ डालकर उसे बाहर निकाला और खुली हथेली पर रखकर उसे देखा । जाने क्यों उसे पूरा विश्वास था कि जिस परेशानी में वह है, यह लकड़ी का करामाती टुकड़ा उसकी परेशानी दूर करेगा।


ये सोचें अभी देवराज चौहान के मस्तिष्क में ही थी कि तभी हथेली पर पड़ा लकड़ी का और छोटा-सा टुकड़ा उसका और उसके सिर पर आ पड़ा । सिर पर उसे कुछ रेंगता सा महसूस हुआ । तभी उसने अपने आपमें बदलाव महसूस किया और दूसरे ही पल देवराज चौहान उड़ान भर रहा था ।


वो कबूतर बन चुका था।


घाटी में उड़ान भरते हुए वो नीचे की तरफ जा रहा था।


देवराज चौहान का दिल जोरों से धड़क रहा था । ये सब क्या हो रहा था । इंसान होने के नाते वो कभी इस तरह उड़ने की सोच भी नहीं सकता था । ये सब बेला की दी लकड़ी का कमाल है । यकीनन उस लकड़ी में तिलस्मी गुण हैं । तभी तो वो इस तरह से उसकी सहायता कर रही है ।


करीब पच्चीस मिनट की उड़ान रही उसकी ।


फिर घाटी में पेड़ों को पार करता हुआ नीचे उतर कर जमीन पर आ बैठा । वो हजारों फीट गहरी घाटी में आ पहुंचा था। जहां पहुंचने की वह सोच भी नहीं सकता था। पेश आ रहे हादसों की वजह से देवराज चौहान खुद को रोमांचित सा महसूस कर रहा था।


अगले ही पल उसने खुद को इंसानी रूप में जमीन पर खड़ा पाया ।


घाटी में घना जंगल था । यह तो वह ऊपर से भी देख चुका था और अब भी नजर आ रहा था । घने पेड़ों की वजह से वहां कुछ अंधेरा सा महसूस हो रहा था । जबकि अभी दिन बाकी था।


देवराज चौहान को अपनी आंखों के सामने लकड़ी का वही टुकड़ा नाचता नजर आया । उसके होठों पर मुस्कान उभर आई । उसके हाथ बढ़ाकर, लकड़ी के टुकड़े को थामा और कह उठा ।


"धन्यवाद---।" इसके साथ ही उसने, जेब में डाल लिया। बेला का दिया लकड़ी का यह टुकड़ा उसके पास न होता तो यकीनन वह कब का तिलस्मी चाल में फंस गया होता। देवराज चौहान ने आसपास देखा ।


हर तरफ जंगल ही जंगल था । ऐसा कोई रास्ता नहीं था कि जो आगे बढ़ने के लिए दिशा संकेत हो । इस तरह खड़े रहने का भी फायदा नहीं था । वो यूं ही आगे बढ़ गया । कभी, कहीं तो, कभी कहीं पर कोई रास्ता मिलेगा ? सोच ही रहा था इस तिलस्म से कैसे निकल पाएगा । जो-जो रुकावटें उसके सामने आ रही हैं, उनसे ऐसे कब तक बचता रहेगा । कहीं तो फंसकर रह जाएगा।


देवराज चौहान का आगे बढ़ना जारी रहा।


अंधेरा गहरा चुका था ।


देवराज चौहान को अंधेरे में चलते हुए दो घंटे बीत चुके थे। इस बीच वो कई बार नजर न आने की वजह से पेड़ों के तनों से भी टकराया । परंतु रुका नहीं, आगे बढ़ता रहा। देवराज चौहान तय नहीं कर पा रहा था कि रात के इस गहरे अंधेरे में रुके भी तो कहां रुके ?


हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था, उस जंगल में ।


देवराज चौहान कुछ ही आगे बढ़ा था कि उसे किसी के रोने की आवाज आई । वो ठिठका । निगाहें अंधेरे में इधर-उधर घुमाई, कुछ नजर न आया । वह हैरान था कि अंधेरे से भरे जंगल में रात के इस वक्त कौन है और क्यों रो रहा है ? देवराज चौहान उस तरफ बढ़ा, जिधर से रोने की आवाज आ रही थी।


मिनट भर में ही वहां पहुंच गया ।


देवराज चौहान ठिठका ।


सामने ही छोटी सी गुफा नजर आ रही थी । गुफा में भरपूर प्रकाश था । उसके बाहर बैठा कोई व्यक्ति रो रहा था । घने जंगल में, इस तरह गुफा में प्रकाश होना देवराज चौहान को अजीब सा लगा । वह जानता था कि जंगल में इस तरह रोशनी होने का कोई मतलब नहीं है।


देवराज चौहान रोने वाले व्यक्ति के समीप पहुंचा ।


वह व्यक्ति और कोई नहीं अमरु था।


उसे पास आया पाकर अमरू ने मुंह ऊपर उठाया । गुफा से आती रोशनी में उसका चेहरा स्पष्ट चमक रहा था । गालों पर आंसू बहते नजर आ रहे थे ।


"कौन हो तुम ?" देवराज चौहान ने पूछा--- "यहां बैठे क्यों रो रहे हो ?"


इतना सुनते ही अमरू और जोर-जोर से रोने लगा ।


देवराज चौहान ने फिर उससे पूछा।


"क्या नाम है तुम्हारा ? "


"अमरू।"


"तुम रो क्यों रहे हो ?" देवराज चौहान ने पूछा ।


"वो मेरी बीवी को ले गया।"


"कौन ?"


"जो इस गुफा में रहता है ।" अमरु की आंखों में अभी भी आंसू थे--- "मैं अपनी बीवी के साथ यहां से जा रहा था कि रात हो गई । तभी हमें गुफा नजर आई । सोचा रात यहां बिता लेंगे । मैं अपनी बीवी को लेकर गुफा के भीतर चला गया। लेकिन भीतर पहले से ही एक व्यक्ति था । उसी की गुफा होगी। उसने मेरी बीवी को पकड़ लिया और मुझे मार-मार कर बाहर निकाल दिया। जब दोबारा अपनी बीवी को लेने गया तो वो मेरी बीवी के कपड़े उतार रहा था । उसने फिर मुझे मारकर बाहर निकाल दिया । मैं बहुत कमजोर हूं, वो ताकत वाला है । वो मेरी बीवी को खराब कर देगा । मेरी बीवी आत्महत्या कर लेगी । उसे बचा लो। मैं सदा तुम्हारा आभारी रहूंगा।"


देवराज चौहान ने गुफा की तरफ देखा।


"कितनी देर हो गई, इस बात को ?" देवराज चौहान ने पूछा ।


"अभी-अभी की तो बात है । अगर तुम मेरी सहायता करना चाहते हो तो जल्दी से गुफा में जाकर मेरी बीवी को बचा लो । नहीं तो उसके साथ-साथ मैं भी मर जाऊंगा ।" अमरू पुनः रो पड़ा ।


देवराज चौहान गुफा की तरफ बढ़ा और मुहाने के पास पहुंचकर भीतर झांका ।


भीतर कोई भी नजर नहीं आया ।


"यहां तो कोई भी नहीं है ।" देवराज चौहान ने गर्दन घुमाकर अमरू को देखा । "सामने की दीवार के पार उसका शयनकक्ष है । वो वहीं पर होगा। जल्दी जाओ।" अमरु रोते हुए कह उठा ।


देवराज चौहान गुफा में प्रवेश कर गया ।


रोशनी हर तरफ फैली थी, परंतु रोशनी कहां से फूट रही थी, इसका पता नहीं चल पा रहा था । गुफा की वह जगह बिल्कुल साफ-सुथरी थी । देवराज चौहान आगे बढ़ा और अमरू के बताएनुसार उसने गुफा का दूसरा कमरा ढूंढा वहां से कहीं भी जाने का रास्ता नहीं था । कोई रास्ता न पाकर देवराज चौहान को अजीब सा लगा। अमरू तो कह रहा था कि आगे एक और कमरा है ।


देवराज चौहान पलट कर वापस आया और गुफा के मुहाने से बाहर निकलने लगा । परंतु बाहर नहीं निकल सका । उसे लगा जैसे आगे कोई दीवार आ गई हो । उसने वैसा ही महसूस किया जैसे कि घाटी के ऊपर अदृश्य दीवार से महसूस हुई थी। देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ गई ।


उसने सामने नजर आ रहे अमरू को देखा, जो मुस्कुरा रहा था ।


"कौन हो तुम ?"


"मैं गुलाबलाल का आदमी हूं।" अमरू हंस पड़ा।


"कौन गुलाबलाल ?"


"तिलस्मी कैद में फंसे लोगों को और फंसाकर, उन्हें मौत के हवाले करना गुलाबलाल का काम है। मैं उसी के अधीन काम करता हूं।" वो अभी भी हंस रहा था ।


"इसका मतलब तुमने मुझसे झूठ बोला कि--- "


"झूठ नहीं बोला । इसे चालाकी कहते हैं । तुम मेरी चालाकी में फंस गए । अमरू रोकते हुए बोला--- "अभी तक तो तुम तिलस्मी कैद की सतह पर थे । जहां खतरे लेकिन उनसे तुम बच निकले । अब मैंने तुम्हें तिलिस्म के इस पार भेज दिया है, जहां खतरे ज्यादा है । याद रखना, यह तिलस्मी कैद ऐसी है कि आज तक कोई भी जिंदा बचकर बाहर नहीं निकल सका । किसी में इतनी समझ और शक्ति नहीं कि तिलस्म को समझकर उसे तोड़ सके । यानी कि हर हाल में तुम्हारी मौत संभव ही है । "


"लेकिन मुझे तो रामनाथ ने नीले पहाड़ पर भेजा था ।" देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े हुए थे ।


"मालूम है मुझे । इस तिलस्मी कैद को पार करके ही नीले पहाड़ पर पहुंचा जा सकता है और मुझे पूरा भरोसा है कि तुम तिलस्मी कैद में ही भटक कर मर जाओगे | अगर तुम्हें नीले पहाड़ तक जाने का रास्ता आता होता तो, कब के नीले पहाड़ पर पहुंच गए होते। यूं भटक न रहे होते ।"


देवराज चौहान के होठों से गहरी सांस निकली।


"मानना पड़ेगा कि तुम बहुत घटिया इंसान हो ।"


"तिलस्मी कैद में जो फंस जाता है, हम उसकी बात का बुरा नहीं मानते। क्योंकि हमारी निगाहों में वो मरों की तरह होता है । आज नहीं तो कल, लेकिन मौत उसकी किस्मत में लिखी जा चुकी है ।" कहने के साथ ही अमरू पलटा और देवराज चौहान के देखते ही देखते अंधेरे में गुम होता चला गया।


देवराज चौहान ने गुफा से निकलने की पुनः चेष्टा परंतु न नजर आने वाली दीवार ने उसे आगे नहीं बढ़ने दिया । देवराज चौहान पलटा और गुफा में निगाहें दौड़ाने लगा । वो काफी बड़ी और खुली गुफा थी। परंतु वो बंद थी । कोई खिड़की दरवाजा नहीं था ।


उसी पल जोरों से आवाज हुई । गुफा कांप उठी। देवराज चौहान तीन-चार कदम लड़खड़ा उठा । फिर ठिठका । संभला । आवाज का कारण जानने के लिए इधर-उधर निगाह दौड़ाई तो नजरें गुफा के मुहाने पर जा टिकी । जहां कोई बड़ा-सा पत्थर आ लगा था । इस तरह कि अब बाहर का नजारा भी नजर नहीं आ रहा था।


मतलब कि वो गुफा में पूरी तरह कैद होकर रह गया था ।


देवराज चौहान समझ गया कि अब कोई नई मुसीबत सामने आने वाली है।


तभी देवराज चौहान चौंका । उसकी आंखें सिकुड़ गई । गुफा का वो बड़ा-सा कमरा बिल्कुल खाली था । लेकिन अब उसे एक तरफ पड़ी, सिंहासन जैसी खूबसूरत-सी कुर्सी नजर आई, जिस पर स्याह काली, छोटी-सी बिल्ली बैठी हुई थी और अपनी चमकती आंखों से उसे देख रही थी ।


देवराज चौहान को समझ में नहीं आया कि अचानक ही सिंहासन जैसी कुर्सी और उस पर बैठी स्याह काली बिल्ली कहां से आ गई। लेकिन यह बात तो पक्की थी की गुफा का मुहाना बंद होते ही सिंहासन नुमा कुर्सी और बिल्ली वहां नजर आने लगी थी । इतना तो देवराज चौहान समझ चुका था कि इस तिलस्मी कैद में कई हैरतअंगेज बातों का उसे सामना करना पड़ेगा और कोई भी ऐसी घटना, उसकी जान ले सकती है। परंतु उसे इस बात का भी एहसास था कि ऐसी घटनाओं से सतर्क रहकर भी नहीं बचा जा सकता।


देवराज चौहान आगे बढ़ा । सिंहासन नुमा कुर्सी के समीप पहुंचकर ठिकका । निगाहें बिल्ली पर थी ।


"म्याऊं ?"


देवराज बिल्ली के होठों से प्यारी सी आवाज निकली और अगले ही पल वो छलांग मारकर चौहान के कंधे पर आ बैठी । पल भर के लिए देवराज चौहान सकपकाया । बिल्ली से उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी । उसका दांया हाथ कंधे पर बैठी बिल्ली तक पहुंचा। उसे पकड़ा । इरादा था, बिल्ली के कंधे से हटा देने का ।


परंतु ऐसा करते-करते वो ठिठक गया ।


आंखों में अजीब से भाव उभरे ।


बिल्ली के कंधे पर बैठते ही गुफा में तीन रास्ते नजर आने लगे थे ।


दूसरा सीधा समतल रास्ता था ।


देवराज चौहान उन रास्तों को देखता रहा । स्पष्ट था कि बिल्ली के कंधे पर बैठने का उन रास्तों से यकीनन कोई वास्ता था । चैक करने के इरादे से देवराज चौहान ने बिल्ली को कंधे से उतारा और वापस उस सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठा दिया । ज्योंहि देवराज चौहान के हाथ, बिल्ली पर से हटे, देखते ही देख दीवारों में से दरवाजे के रास्ते के साइज के पत्थर निकले और रास्ते पुनः बंद हो गए।


देवराज चौहान के होंठ सिकुड़े। उसकी निगाह पुनः बिल्ली पर जा टिकी ।


बिल्ली ने पुनः छलांग मारी और उसके कंधे पर आ बैठी । ऐसा होते ही उन तीनों रास्ते के पत्थर पुनः सरककर दीवार का ही हिस्सा बन गए और रास्ते नजर आने लगे । देवराज चौहान समझ गया कि काली बिल्ली उन रास्तों को खोलने की चाबी है । इसे साथ लेकर ही आगे चलना होगा ।


आगे बढ़कर देवराज चौहान ने तीनों रास्तों को देखा।


एक रास्ते की सीढ़ियां ऊपर की तरफ जा रही थी ।


और तीसरे रास्ते की सीढ़ियां नीचे की तरफ जा रही थी ।


d सोचने के बाद देवराज चौहान ने समतल रास्ते पर जाने के लिए कदम उठाया तो उसके कंधे पर बैठी काली बिल्ली ने उछाल मारी और उस रास्ते पर पहुंच गई, जिस रास्ते की सीढ़ियां ऊपर की तरफ जा रही थी।


देवराज चौहान ठिठका ।


तभी बाकी दोनों रास्ते पर सड़क पर पत्थर आ लगे । अब सिर्फ वही रास्ता नजर आ रहा था । जिसकी सीढ़ियां ऊपर की तरफ जा रही थी । जहां बिल्ली खड़ी उसे देख रही थी ।


देवराज चौहान समझ गया कि बिल्ली उसे उस रास्ते पर चलने को कह रही है। बिल्ली की हरकतें देवराज चौहान की समझ से बाहर थी कि वो उसे उसी रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर कर रही है ? और अब उसी रास्ते पर जाना मजबूरी थी क्योंकि बाकी के दोनों रास्ते बंद हो चुके थे।


देवराज चौहान उसी रास्ते में प्रवेश कर गया ।


काली बिल्ली उछलकर पुनः उसके कंधे पर बैठी ।


देवराज चौहान सामने नजर आ रही सीढ़ियां चढ़ने लगा । जो कि सीढ़ी ऊपर जा रही थी । बिल्ली शांत सी, उसके कंधे पर बैठी थी । करीब एक घंटा वो लगातार सीढ़ियों चढ़ता रहा । फिर वो ठिठा ।


आगे ही सीढ़ियां दो दिशाओं में बंट रही थी । एक दाईं तरफ जा रही थी, दूसरी बाईं तरफ । अब उसे उन दोनों में से एक रास्ते को चुनना था और वो दोनों रास्तों की सीढ़ियां अब ऊपर की तरफ न जाकर, नीचे की तरफ जा रही थी । इससे पहले कि देवराज चौहान तय कर पाता कि उसे किस रास्ते पर बढ़ना है...।


तभी कंधे पर बैठी काली बिल्ली ने छलांग लगाई और बाईं तरफ वाले रास्ते की सीढ़ी पर बैठी, फिर अपनी चमकदार निगाहों से देवराज चौहान को देखा । 


"म्याऊं।"


वो इस तरह बोली, जैसे उसे इसी रास्ते पर आगे बढ़ने को कह रही हो । रास्तों के जानना देवराज चौहान के लिए दाएं-बाएं के दोनों रास्ते बराबर थे । क्योंकि वह दोनों बारे में अनजान था कि वो किस तरफ जाते थे, साथ ही वो मन ही मन यह भी चाहता था कि बिल्ली उसे किस रास्ते पर ले जाना चाहती है, ऐसे में बिना कुछ सोचेसमझे, देवराज चौहान बाईं तरफ वाले रास्ते की तरफ बढ़ा ।


बिल्ली उछल कर वापस कंधे पर आ बैठी ।


देवराज चौहान सीढ़ियां उतरने लगा, जोकि अब नीचे जा रही थी ।


अभी वह कुछ ही सीढियां उतरा होगा कि रुक जाना पड़ा था । सामने देखकर देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ गई। सीढ़ियों पर एक आदमी बैठा था । सादे से कपड़े पहन रखे थे । छोटे-छोटे बाल थे। दाढ़ी बढ़ी हुई थी, देवराज चौहान को देखते ही वो सीढ़ी से उठ खड़ा हुआ।


देवराज चौहान एकटक उसे देखता रहा ।


देवराज चौहान को देखकर वो व्यक्ति शांत स्वर में बोला ।


"इस बिल्ली के इशारे पर मत चलो। यह तुम्हें मौत के रास्ते पर ले जा रही है । "


"तुम कौन हो ?" देवराज चौहान के माथे पर बल उभरे ।


"मैं भटके लोगों को रास्ता दिखाता हूं । यह तिलस्म, मौत का रास्ता नाम है और मैं तिलस्म में भटके लोगों को मौत से बताता हूं। मैं जानता हूं इस रास्ते पर तुम्हें यहां बिल्ली लाई है । यह॒ तुम्हें मौत के मुंह में ले जा रही है। पहले भी यहां कईयों को इस रास्ते पर ला चुकी है । जो मेरा कहना मान कर वापस चले गए, वो बच गए, जो नहीं माने, वो मौत के मुंह में चले गए।"


तभी बिल्ली ने देवराज चौहान के कंधे पर पंजा मारा ।


बिल्ली क्या कहना चाहती है, देवराज चौहान नहीं समझा। 


"अगर मैं तुम्हारी बात न मानूं तो ?" देवराज चौहान बोला।


"तुम्हारी मर्जी । फिर भी इस रास्ते पर आगे जाने का तुम्हें मना करूंगा । पूरी कोशिश करूंगा कि तुम्हें यहां से वापस भेज सकूं " उस व्यक्ति का स्वर शांत ही था ।


बिल्ली ने पुनः उसके कंधे पर पंजा मारा।


देवराज चौहान ने गर्दन घुमा कर बिल्ली को देखा ।


"म्याऊं ।"


"वो पुनः मुंह खोल कर बोली इस तरह गर्दन हिलाई जैसे उसे आगे बढ़ने को कह रही हो।


एकाएक उस व्यक्ति के चेहरे पर क्रोध आने लगा ।


"शैतान ।" वो गुस्से से बिल्ली से बोला--- "तू कितनों को मौत के मुंह में भेजेगी।" जवाब में बिल्ली के होंठों से गुर्राहट निकली।


"तो नहीं मानेगी । तो आज तुझे सबक सिखाना ही पड़ेगा।" कहने के साथ ही उसने अपने कपड़ों के बीच छुपा रखा खंजर निकाला और उसकी नोक बिल्ली की तरफ की। तभी नोक से बिजली जैसी लहर निकलकर, कंधे पर बैठी बिल्ली की तरफ बढ़ी । उस पल बिल्ली की आंखों से चिंगारी निकली ।


वो लहर और चिंगारी आपस में टकराई | अजीब सी आवाज उभरी फिर सब कुछ शांत हो गया । अपना वार खाली जाता पाकर उस व्यक्ति का चेहरा क्रोध से स्याह पड़ गया । "तो आज तूने मेरे मुकाबले पर उतरने की हिम्मत की । मैं तेरे को जिंदा नहीं...।"


उसके शब्द पूरे भी नहीं हुए थे कि देवराज चौहान के कंधे से बिल्ली ने छलांग मारी और सामने वाले व्यक्ति की छाती पर जा चिपकी और देखते-ही-देखते, बिल्ली के आगे वाले दोनों पक्षों ने, भयानक रूप अख्तियार कर लिया, जैसे अब वो किसी शेर के पंजे हो और वे दोनों पंजे उस व्यक्ति की गर्दन पर जा टिके। पंजों के नाखून गर्दन में धंसने लगे।


देवराज चौहान हक्का-बक्का सा यह सब देखता रहा । मासूम सी, प्यारी सी नजर आने वाली बिल्ली का यह बदला खतरनाक रूप, देवराज चौहान को हैरत में डाल देने के लिए काफी था।


उस व्यक्ति की गर्दन से खून बहने लगा । बिल्ली के शेर जैसे पंजे, नाखूनों सहित उसकी गर्दन में धंस चुके थे । खंजर उस व्यक्ति के हाथ से छूट चुका था । तड़पता चीखताचिल्लाता, वो दोनों हाथों से बिल्ली को अपनी छाती से अलग करने का प्रयत्न कर रहा था । परंतु बिल्ली तो जैसे चमगादड़ की तरह उसकी छाती से चिपक चुकी थी। वो बिल्ली को अलग करने की कोशिश में सफल नहीं हो पाया।


मिनट भर में ही बिल्ली ने उस व्यक्ति की आधी से ज्यादा गर्दन उधेड़ दी। उस व्यक्ति की सांसे टूटने लगी उसकी हरकतें शिथिल पड़ने लगी ।


देखते ही देखते वो व्यक्ति नीचे गिर गया। बिल्ली अभी भी उसी मुद्रा में उसकी छाती पर सवार थी । कुछ ही पलों बाद, उसकी सांसे टूट गई । वो व्यक्ति मर चुका था । इसके साथ ही बिल्ली के आगे वाले शेर जैसे बने पंजे, सामान्य अवस्था में आ गए । बिल्ली उसकी छाती पर उछलकर नीचे आ गई और एक तरफ खड़ी होकर उसके मृत शरीर को देखने लगी। से वि


तभी जैसे बिजली चमकी हो ।


सामने पड़ा उस व्यक्ति का मृत शरीर और बहा खून एकाएक गायब हो गया । अब वहां कुछ भी नहीं था । न वो मरा हुआ आदमी न खून न उसका खंजर । उस जगह को देखकर, कोई कह नहीं सकता था कि वहां अभी बिल्ली और आदमी के बीच अविश्वास भरी लड़ाई हुई है।


देवराज चौहान को देखा, काली बिल्ली चमक भरी निगाहों से उसे देख रही है । फिर वो आगे बढ़ी और उछलकर पुनः देवराज चौहान के कंधे पर आ बैठी।


"म्याऊं।"


"वो बोली । जैसे उसे आगे बढ़ने को कह रही हो ।


देवराज चौहान ने महसूस किया कि बिल्ली के पंजे पर खून जैसी कोई भी चीज नहीं है । जबकि कुछ पल पहले उसके पंजे खून में डूब चुके थे । देवराज चौहान नहीं जानता था कि वो आदमी सत्य था या ये बिल्ली उसे सही रास्ते पर ले जा रही है। सच्चाई जानने का उसके पास कोई रास्ता नहीं था ।

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