शाम आठ बजे जब अंधेरा होने को था, तब दूबे के घर पर पहुँचा मीणा।
रेस्टोरेंट में मीणा तब तक बैठा रहा था, जब तक कि सावी और कामराज ने खाना ना खा लिया। उसके बाद बिल चुकाकर दोनों बाहर आ गये थे। दोनों खुश थे, इस बीच कामराज ने दो बार सावी का हाथ भी पकड़ा था। मीणा पीछे रहकर सब देख रहा था। जब कामराज ने सावी का हाथ पकड़ा तो, मीणा जल-भुन गया था।
उसके बाद दोनों कार में बैठ कर चले गये थे।
मीणा को बहुत दुःख हुआ था सावी की धोखेबाजी देखकर।
पत्नी उसकी और बैठ गई कामराज के पहलू में... ।
दूबे घर पर ही था। उसे देखते ही बोला- “आ गये तुम! मैं तो सोच रहा था कि आओगे नहीं। खिसक गये...”
मीणा कुर्सी पर जा बैठा।
“क्यों गुरु, आज दिन भर क्या किया?”
मीणा ने गहरी सांस ली।
“जो दो हजार तू मेरे से ले गया था, उसमें से कुछ बचा है कि नहीं?” दूबे ने पूछा।
“बचा है।”
“मतलब कि इतना तो होगा कि पीने का खर्च निकल जायेगा।”
“तो उठ। कल वाले ठिकाने पर चल कर पीते हैं... । बातें वहीं होंगी।”
“मन ही नहीं है पीने का...।” मीणा ने उदास स्वर में कहा।
“लगता है आज तेरे साथ कुछ बुरा हुआ?”
“कुछ भी कह लो।”
“उठ, हाथ-मुँह धो ले और पीने चलते हैं। मैंने भी तेरे से बात करनी है। वहीं बातें होंगी।”
“तू पी आ...”
“नहीं, तू भी साथ चलेगा। पी-पा के बातें करेंगे, वक्त बढ़िया कट जायेगा।”
मीणा ने दूबे की बात मानी और उठ खड़ा हुआ।
☐☐☐
“वाह, ये तो कमाल ही हो गया...।” दूबे हंस कर कह उठा- “कार के मालिक के पते पर पहुंचा तो पता चला वो कार तेरे ही नाम रजिस्टर्ड है। और तो और, तेरे को पत्नी और पड़ोसी भी मिल गये...”
“बकवास मत कर।” मीणा मुँह बनाकर कह उठा- “उन लोगों ने मुझे पागल बनाने की पूरी कोशिश की।”
कल वाले ही दारू के अड्डे पर बैंच पर दोनों बैठे थे। बोतल खुली हुई थी। गिलास भरे पड़े थे। चने की दो कटोरियां पड़ी थीं।
शाम का दौर शुरू हो चुका था।
“मैं समझता हूँ... सब समझ गया कि तेरे पर क्या बीती होगी। परन्तु तू बेवकूफ निकला।”
“क्यों?”
“वो तेरे को तेरी पत्नी कह रही थी तो, उसे भोग लेता।” मीणा ने दूबे को घूरा।
“गलत कह दिया क्या?”
“मैं ऐसा इन्सान नहीं हूँ। मैंने सिर्फ अपनी पत्नी में ही, अपना मन लगाया है।”
“वो ही पत्नी, जो कामराज के साथ आजकल मजे ले रही
“जुबान बंद कर ले दूबे... । मीणा गुस्से से कह उठा।
“क्या अभी भी तू खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कहता है।”
“वो मैं हूँ ही। सुबह से शाम होने पर बदल तो जाऊँगा नहीं...।”
“पक्का गुरु आदमी है तू। खैर, फिर क्या हुआ?”
मीणा घूँट भर कर बोला- “तुझे बता तो चुका हूँ कि क्या हुआ...।”
“हैरानी है कि वो लोग तेरे को सुधीर दामले कह रहे थे।”
दूबे ने कहा- “और वो कार भी सुधीर दामले के नाम रजिस्टर्ड थी। अजीब सी बात है ये! तेरे को अजीब नहीं लगा क्या?”
“बहुत अजीब लगा। मैं तो चौंक गया था। उसी वक्त समझ गया था कि वो मेरे को पागल बना रहे हैं। ये सब सावी और कामराज की चाल है। बहुत गहरी साजिश रची है कि मैं खुद को पागल समझने लगूं।”
दूबे सिर हिलाकर कह उठा- “मैं तेरी सारी बातें समझ रहा हूँ-पर एक जगह बात अटक जाती है गुरु।”
“क्या...कहाँ?”
“यही कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है।”
मीणा ने दूबे को घूरा।
दूबे घूँट भर कर बोला- “मीणा के बहुत अहसान मुझ पर... । मैं उसे नहीं भूल सकता। उसे पहचानने में धोखा भी नहीं खा सकता। इसमें को शक नहीं कि तेरा बात करने का अन्दाज कभी-कभी मीणा साहब से मिलता है, परन्तु तू वो नहीं।”
मीणा ने कुछ नहीं कहा।
“पर तू भी नम्बरी हरामी है कि मीणा मीणा की रट छोड़ने वाला नहीं...।”
“दूबे, मैं हरामी नहीं मुसीबत का मारा हूँ...।” मीणा ने गिलास खाली करके कहा- “मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। परन्तु कोई भी जाने क्यों मुझे मीणा मानने को तैयार नहीं। मेरे अपने भी नहीं और पराये भी नहीं। कोई भी मुझे....”
“इसलिये कि तू मीणा नहीं है।” दूबे ने चने मुँह में डालते हुए कहा।
“तेरे कहने से क्या होगा? मैं जो हूँ, वो हूँ। आज मैंने सावी को देखा और कामराज को भी। दोनों उसी रेस्टोरेंट में थे, जहाँ मैं खाना खा रहा था। कितने प्यार से वो एक-दूसरे पर मेहरबान हो रहे थे...।”
“क्या?”
“तू सावी का नाकाम आशिक तो नहीं है, जिसका दिल सावी पर आ गया हो और ख्यालों में उसे अपनी पत्नी मान रहा...।”
“तू भी मुझे पागल हुआ साबित कर रहा है।” मीणा ने टोका।
“फिर तू सावी नाम की उस औरत के पीछे क्यों है?’’ दूबे ने नशे में हाथ पर हाथ मार कर कहा।
“कोई और बात कर...।” मीणा ने उखड़े स्वर में कहा।
“क्यों?”
“तू मुझे मीणा नहीं मान रहा। सावी को मेरी पत्नी नहीं मान रहा। मुझे झूठा समझता है, फिर क्या फायदा बात का...।”
दूबे कुछ पल चुप रहा।
मीणा ने अपना नया गिलास तैयार किया, घूँट भरा। दूबे कह उठा।
“अब तूने क्या सोचा, अपने मामले के बारे में?”
“मेरी बात को कोई भी गम्भीरता से नहीं ले रहा कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”
“ठीक कहा।”
“मैं ऐसा कुछ करूँगा कि सब मेरी बात पर ध्यान दें। मुझे सुनें और समझें।”
“ऐसा क्या करेगा। क्या कुतुबमीनार से लटक जायेगा?”
“ये ही तो सोचना है कि ऐसा क्या करूँ कि सब मेरी बात सुनें।” मीणा ने दाँत भींचकर कहा।
“राष्ट्रपति से शिकायत कर दे।”
मीणा ने दूबे को घूरा।
“सलाह दे रहा हूँ।” दूबे बोला- “मेरा ये मतलब तो नहीं कि तू राष्ट्रपति भवन के बाहर तम्बू लगा ले।”
मीणा ने दूबे से लेकर सिग्रेट सुलगाई।
“पता है, मैं क्या सोच रहा हूँ।” दूबे बोला।
“तू इसी मामले में उलझा रहा तो हम कोई काम कैसे कर सकेंगे?”
“काम?” मीणा ने दूबे को देखा।
“एक है मेरी नज़र में। आज ही उस बारे में पता चला।”
“मेरे लिए खुद को इन्दर प्रकाश मीणा साबित करना जरूरी है।” मीणा कह उठा।
“वो तू कर, साथ में ये काम भी कर लेते हैं।”
“तू एक सब-इंस्पेक्टर को उल्टा काम करने को कह रहा।”
“मैं तेरे को पुलिस वाला नहीं मानता। बल्कि तू तो गुरु आदमी है।” दूबे ने मुस्करा कर कहा।
“दूबे, तू कमीनों जैसी बात कर रहा है। मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा...”
“मैंने एक ऐसी जगह का पता लगाया है, जहाँ डेढ़ सौ करोड़ की रकम मौजूद होगी तब...।”
“कितनी?” मीणा के होठों से निकला।
“डेढ़ सौ करोड़...।”
“तेरा मतलब कि डेढ़ सौ करोड़ हम लूटेंगे?”
“क्यों नहीं? तू गुरु आदमी है। मैं भी कम नहीं। दो-चार और की जरूरत पड़ी तो इकट्ठे कर लेंगे। मैंने हिसाब लगा लिया है। हम ये काम कर सकते हैं। ये इतनी बड़ी रकम है कि दोबारा हमें कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी...और हम आराम से बाकी की जिन्दगी बिता लेंगे। बोल, क्या कहता है?”
मीणा, दूबे को देखता रहा।
“ऐसा मौका फिर नहीं मिलेगा उस्ताद। कमाल दिखा देते
“मैंने ऐसा काम नहीं किया...।”
“वो तो मैं अब तक समझ ही चुका हूँ कि तू कितने पानी में है। मेरी मान तो एक बार कर ले ये काम।”
“पहले मैं अपने को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित करूँगा फिर...”
“तूने अभी कहा ना कि तू कोई ऐसा काम करेगा, जिससे सबका ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर सके।”
“हाँ...”
“ये भी तो बड़ा काम है, जो मैं तेरे को करने के लिए कह रहा हूँ...।”
मीणा, दूबे को देखने लगा।
“ये तो चोरी-डकैती हुई...।”
“तो हम कौन से साधू हैं जो इस काम से हमें परहेज है? 150 करोड़ का मामला है। ले उड़े तो जिन्दगी मजे से कटेगी।”
“पुलिस को भूल गये। उसने पकड़ लिया तो...।”
“पुलिस की परवाह करने लगे तो कर लिए ये काम!’’
दूबे ने मुँह बनाकर कहा- “तेरे जैसा गुरू साथ में है तो चिन्ता कैसी?”
मीणा ने गहरी सांस ली।
“एक बार सुन तो ले मेरी बात।” दूबे ने कहा।
“मुझे अपने को मीणा साबित करने की फिक्र है।” मीणा ने गिलास उठाकर घूँट भरा।
“दोनों काम साथ-साथ करते रहना। तूने मेरे से वादा किया है कि मेरे साथ बड़ा हाथ मारेगा।”
“तो पहले ये मान कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”
“कभी नहीं, मेरे मान लेने का मतलब होगा, तेरे को धोखा देना और मैं यारों को धोखा नहीं देता।” दूबे कह उठा- “तू मीणा साहब नहीं है। पर तू जो भी है, गुरू आदमी है। मैंने तेरे को पसन्द किया है काम के लिए।”
मीणा ने दूबे को देखा।
दूबे ने घूँट मारा, फिर कटोरी से चने निकाल कर मुँह में डाले। दोनों नशे में थे।
“बताऊँ 150 करोड़ के बारे में?” दूबे बोला।
“बता दे।” मीणा ने बे-मन से कहा- “लेकिन मैं तेरी बात की ज्यादा परवाह नहीं कर रहा।”
“ऐसा कहकर दिल मत तोड़ यार। तेरे भरोसे ही तो मैं ये बड़ा काम करने की सोच रहा हूँ।”
मीणा चुप रहा।
“मैं एक ऐसे बैंक के बारे में जानता हूँ जहाँ परसों सुबह 150 करोड़ मौजूद होगा और सासाराम एंड संस की गाड़ी बारह बजे आयेगी और 150 करोड़ लेकर चल देगी! जब वो डेढ़ सौ करोड़ लेकर बैंक से रवाना होगी तो उसके साथ प्राइवेट सिक्योरिटी के अलावा, पन्द्रह पुलिस वालों की दो गाड़ियां होंगी।” दूबे कह कर चुप हुआ।
मीणा ने मुस्करा कर दूबे से कहा- “तू क्या समझता है कि जब सासाराम एंड संस की गाड़ी 150 करोड़ के साथ सड़क पर होगी, हम उसे लूट लेंगे? गाड़ी लेकर भाग जायेंगे? प्राइवेट सिक्योरिटी और पुलिस वाले हाथ जोड़े खड़े रहेंगे? यही बात है ना?”
“सुन तो ले पहले। अगर तेरे को नशा चढ़ गया हो तो सुबह बात करूँ?”
“जो बात है, कहकर अभी खत्म कर दे। मैं नहीं चाहता कि दोबारा ऐसी बात का जिक्र भी करे।” मीणा तीखे स्वर में बोला।
“हम बैंक पर हाथ डालेंगे। सुबह दस बजे बैंक खुलते ही हथियारों के साथ भीतर घुस जायेंगे। एक वैन बैंक के बाहर ही खड़ी रखेंगे। बैंक वालों को मजबूर कर देंगे कि वो पैसा हमारी वैन में रख दें। आधे घंटे में ये सब काम करके हम पैसा लेकर भाग निकलेंगे। एकदम आसान काम है।”
“कह चुका...।”
“हाँ, तेरे को जंची नहीं बात?”
“चुपचाप पी। दोबारा ये बात की तो बोतल तेरे सिर पर तोड़ दूंगा। मैं पुलिस वाला हूँ। सब-इंस्पेक्टर मीणा! मेरे सामने चोरी-डकैती की बात की तो मेरे से बुरा कोई ना होगा।” मीणा ने गुस्से से कहा।
“उल्लू का पट्टा...।” दूबे बड़बड़ाया- “ये, ये नहीं, इसके सिर पर चढ़ी शराब बोल रही है। सुबह बात करूँगा इससे...।”
☐☐☐
अगले दिन इन्दर प्रकाश मीणा की आँख खुली दिन के दस बज रहे थे। दूबे पहले ही उठ चुका था। उसन कहा- “देर से उठने की आदत है तुझे...?”
“रात देर से नींद आई...।”
“देर से नींद आई! क्यों, कल तो तूने खूब पी ली थी।”
“तेरी बात पर सोचता रहा। वो बैंक वाली बात...।”
“अच्छा, तो तू भूला नहीं वो बात।”
“चाय तो बना...”
“अभी ले।” दूबे चूल्हे की तरफ बढ़ता कह उठा- “तो क्या सोचा तूने बैंक के बारे में? रकम याद है?”
“डेढ़ सौ करोड़...।”
“हाथ लग गये तो मजे आ जायेंगे।” दूबे मुस्करा पड़ा।
मीणा सोचों में डूबा लगा।
“तैयार है, बैंक में हाथ मारने के लिए?”
“रात भर मैं ये सोचता रहा कि कैसे मैं दुनियाँ को सख्ती से समझा पाऊँगा कि मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ।’’
दूबे ने गहरी सांस लेकर कहा।
“तू तो कह रहा था कि बैंक के बारे में सोच रहा...।”
“ये दोनों ही बातें हैं।”
चाय बनाता दूबे कह उठा- “ये बता कि बैंक का डेढ़ सौ करोड़ लूटने के लिए तू तैयार है या नहीं?”
“तैयार हूँ...।” मीणा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“खुश कर दिया तूने ये कह कर...।” दूबे हंसा।
“परन्तु काम मेरी प्लानिंग से होगा।”
“तेरी प्लानिंग?” दूबे ने मीणा को देखा।
“हाँ। क्योंकि मैंने सब के सामने ये साबित भी करना है कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ।”
“ये साबित करना है?” दूबे हड़बड़ाया।
“इसी कारण तो मैं बैंक में डकैती करूँगा।”
“पागल तो नहीं हो गया तू? बैंक में डकैती कर रहा है और
उस दौरान तूने ये साबित करना है कि तू इन्दर प्रकाश मीणा है? ये तो सीधा-साधा जेल जाने की तैयारी है।” दूबे बोला।
“ये साबित करना मेरे लिए जरूरी है।”
दूबे ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला कि एकाएक चुप हो गया। फिर सिर हिलाकर कहा- “ठीक है, तू साबित कर। इससे मुझे या तेरे को कोई नुकसान नहीं होगा।”
“क्यों?”
“क्यों कि तू इन्दर प्रकाश मीणा है ही नहीं। बेशक तू साबित करता रहे कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा है।”
मीणा ने दूबे को घूर कर कहा- “मैं साबित करके रहूँगा कि मैं ही, वो हूँ। तुम देख लेना।”
दूबे ने गिलास में चाय डाली और मीणा को थमा दी।
“तेरे को” मीणा ने चाय का घूँट भरा- “मेरे पे भरोसा है?”
“कैसा भरोसा?”
“पूरा भरोसा?”
“हाँ...है।”
“अगर हम सफल रहे तो मैं सारा पैसा पहले लेकर बैंक से निकलूंगा। तू बैंक में ही रहेगा। ऐसा इसलिये कि मेरे पीछे पुलिस न आये। बैंक के लोग, तब तेरे निशाने पर होंगे।” मीणा कह रहा था- “लेकिन बाद में तेरे को, खुद को ही बचा कर वहाँ से निकल जाना होगा। तब तुझे मेरी सहायता नहीं मिलेगी।”
“ये तो खतरे वाली बात है, मैं फंस जाऊँगा।” दूबे बोला।
“ये ही सुरक्षित रास्ता होगा हमारे पास दौलत को बचाने के लिए ।” मीणा ने कहा।
“लेकिन तेरे को वहाँ से अकेला निकलने की जरूरत ही क्या है... हम दोनों ही....”
“मेरी प्लानिंग सुनेगा तो सब समझ जायेगा।”
“प्लानिंग बता...”
“ये जान लो कि काम होगा तो मेरी प्लानिंग पर होगा, नहीं तो नहीं होगा।” मीणा ने दृढ़ स्वर में कहा।
“प्लानिंग बता।” दूबे गम्भीर हुआ।
इन्दर प्रकाश मीणा ने सब कुछ बताया कि काम कैसे किया जायेगा।
दूबे ने सब्र के साथ सुना।
“ये क्या?” दूबे ने बेचैनी से कहा- “इस तरह तो हम फंस जायेंगे? तुम दौलत लेकर निकल जाओगे और मैं फंसा रह जाऊँगा। बाहर, चारों तरफ पुलिस होगी। मैं वहाँ से कैसे निकल पाऊँगा?”
“उसका इलाज तुम्हें सोचना है।”
“अगर तुम खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित करने का चक्कर छोड़ दो तो हम सब कुछ आसानी से कर लेंगे।”
“मैं तुम्हें पहले ही कह चुका हूँ कि सब काम मेरी प्लानिंग के हिसाब से ही होगा।”
दूबे व्याकुल सा सोचों में डूब गया।
मीणा ने चाय समाप्त करके सिग्रेट सुलगाई।
“तुम्हारे जाने के बाद बाहर पुलिस ही पुलिस होगी। मैं फंस भी सकता हूँ...।” दूबे परेशान सा कह उठा।
“ये तुम सोचो कि...”
“मान लो, तुम्हारी ये प्लानिंग सफल रहती है और मैं भी वहाँ से बचकर निकल आता हूँ तो तुमसे कहाँ मिलूंगा?”
“मुझे आज एक फोन ले देना। बाद में बैंक से निकलकर मुझे मोबाईल पर फोन करना।”
“तुमने कोई जगह सोची है कि पैसा कहाँ रखोगे?”
“उसकी फिक्र मत करो। मैं सब संभाल लूंगा। तुम ये सोचो कि मेरे निकलने के बाद बैंक से कैसे निकलोगे?”
“एक ही रास्ता है...कि मैं पन्द्रह-बीस लोग पहले से ही तैयार रखू और जब जरूरत पड़े तो बाहर मौजूद पुलिस पर वो सब लोग हमला बोल कर, उनका ध्यान बंटा दें और मैं वहाँ से खिसक लूं।”
“एक रास्ता और भी है।” मीणा बोला।
“क्या?”
“तुम अपने साथ बैंक के लोगों को बंधक बनाकर ले चलना। पुलिस को पीछा ना करने की वार्निंग दे देना। इस तरह भी तुम वहाँ से निकल सकते हो।” मीणा ने उसे देखा।
“वो मैं देख लूंगा। तुम मेरे साथ चलो। तुम्हें बैंक दिखा देता हूँ, जहाँ कल सुबह हमने काम करना है और तुम्हारे लिए मोबाईल फोन भी खरीदना है। उठो, वक्त कम है, हमें तैयारी शुरू कर देनी चाहिये।” दूबे कह उठा।
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मीणा को लगा, उसे हिलाया जा रहा है। हड़बड़ा कर उसने आंखें खोली तो सामने गुप्ता को खड़े पाया। तुरन्त ही वो सोचों से बाहर निकल आया। ढीली हो चुकी रिवाल्वर की पकड़ को पुनः ठीक कर लिया। नजरें घुमा कर दूबे की तरफ देखा तो दूबे अपने गालों पर पड़ी टोपी को खुजलाता नजर आया।
“पुलिस वालों का फोन है।” गुप्ता ने मीणा से कहा।
“तो मेरे साथी को बोल देते, वो बात कर लेता।” मीणा रिवाल्वर थामे खड़ा हो गया।
“कहा था उसे, पर वो कहता है कि पुलिस वालों से उसे कोई बात नहीं करनी...।”
मीणा ने टेबल की तरफ देखा, जहाँ पर फोन का रिसीवर हट कर टेबल पर रखा था।
“वो ही इंस्पेक्टर है?” मीणा टेबल की तरफ बढ़ गया।
“नहीं, कोई दूसरा है। वो शायद उसका आफिसर होगा।” गुप्ता साथ चल पड़ा।
“कहता क्या है?”
“कहता है कि डकैतों से बात कराओ।”
“उल्लू का पट्ठा! मुझे डकैत कहता है। तुमने कहा नहीं कि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है।”
“अब तुम ही बात कर लो...।”
टेबल के पास पहुँच कर मीणा ने रिसीवर उठाया।
गुप्ता कुर्सी पर जा बैठा और गर्दन उठाकर उसे देखने लगा।
“कहो...।” मीणा ने उखड़े स्वर में कहा।
“तुम कौन हो?”
“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। तुम कौन हो?”
“मैं इलाके का ए.सी.पी. धीरज कुमार पाटिल हूँ... । क्या तुम सच में सब-इंस्पेक्टर मीणा हो?”
“मैं कह रहा हूं कि हूं तो तुम लोगों को भरोसा करना चाहिए।”
“अगर तुम पुलिस वाले हो तो जो कहना है, आराम से कहा...।”
“आराम से?”
“तुमने बैंक पर कब्जा क्यों कर रखा है? समझदार पुलिस वालों की तरह पेश आओ।” पाटिल का स्वर कानों में पड़ा।
“पहले मैं समझदारों की तरह ही पेश आया था। एक-एक के पास जाकर मैंने अपनी बात कही, परन्तु किसी ने मेरी परवाह नहीं की। कई तो मुझे पागल समझ रहे थे। तभी मैंने बैंक पर कब्जा करने का रास्ता...।”
“अब सब ठीक हो जायेगा।”
“क्यो, अब क्या हो गया जो...।”
“मैं गम्भीरता से तुमसे बात करने आया हूँ, और यहाँ पर चार ऐसे पुलिस वालों को बुलवा लिया है जो सब-इंस्पेक्टर मीणा को अच्छी तरह जानते थे। इसलिए हम तुम्हारे पास आकर बात...”
“जानते थे का क्या मतलब हुआ?”
“सुनने में आया है कि सब-इंस्पेक्टर मीणा 17 दिन पहले एक्सीडेंट में मारा गया है।”
“अच्छा...।” मीणा व्यंग भरे स्वर में कह उठा- “तो फिर मैं कौन हूँ?”
“अब हम ये ही जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर मामला क्या है...।”
“मैं तुम्हें बता दूं कि मेरा वजूद खत्म करने की साजिश ए.सी.पी. कामराज ने रची है। उसके साथ मेरी पत्नी सविता भी शामिल है।” मीणा ने गुस्से से कहा- “वो दोनों हरामी हैं और...।”
“इंस्पेक्टर हीरालाल खरे ने ये बात मुझे बता दी है।”
“तुमने कामराज से बात की?”
“हाँ, मैंने ए.सी.पी. कामराज से फोन पर बात की है। कामराज साहब का कहना है कि सब-इंस्पेक्टर मीणा की एक्सीडेंट में मौत हो चुकी है। उसका क्रियाकर्म हो चुका...।”
“वो हरामी ये ही कहेगा। उसका बस चले तो वो कह दे कि इन्दर प्रकाश मीणा कभी धरती पर पैदा ही नहीं हुआ।” मीणा ने दाँत भींच कर कहा- “कामराज को तो गोली से उड़ा देना चाहिये।”
“तुम फिक्र मत करो। अगर तुम्हारे साथ ज्यादती हुई है तो उसकी पूरी जाँच की जायेगी।”
“सावी के बारे में कामराज क्या कहता है?”
“दो महीने बाद कामराज साहब, मैडम सविता से शादी करने वाले हैं।”
“क्या?” मीणा चौंक कर उछल पड़ा- “ये...ये कैसे हो सकता है? मैं जिन्दा हूँ और...।”
“मुझ पर भरोसा रखो, मैं तुम्हारे साथ ना-इन्साफी नहीं होने दूंगा। तुम हथियार फैक कर बैंक से बाहर आ जाओ। अपने साथी को भी बाहर ले आओ। मैं सब ठीक कर दूंगा।” पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“ठीक कर दोगे? यानि कि तुम मानते हो कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”
“अभी नहीं मानता...।”
“क्या मतलब?”
“यहाँ चार पुलिस वाले ऐसे मौजूद हैं, जो सब-इंस्पेक्टर मीणा को अच्छी तरह जानते थे। वो तुम्हें देखकर मुझे बतायेंगे कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो कि नहीं। मैं उनके साथ बैंक के भीतर आकर तुमसे बात करना चाहता हूँ...।”
मीणा की आँखें सिकुड़ गई थीं। माथे पर बल आ गये थे।
“कामराज, सावी से शादी कैसे कर सकता...।”
“कामराज साहब ने अभी तक शादी नहीं की और मीणा की मौत के बाद उनकी नजर सावी पर पड़ी तो सविता से ब्याह कर लेने का मन बना लिया। सविता को भी कोई सहारा चाहिये था। इसलिये दोनों ने...”
“तुम कुत्ते हो!” मीणा गुर्रा उठा।
“क्या मतलब?”
“तुम्हारी बातों से स्पष्ट लग रहा है कि तुम भी सब-इंस्पेक्टर मीणा को मरा मान रहे हो। ऐसे में तुम मेरे साथ इन्साफ कैसे कर सकते हो? तुम मेरे साथ चाल चल रहे हो। तुम...।”
“मुझे गलत मत समझो। मैं तुम्हारी बातों को गम्भीरता से ले रहा हूँ। तभी मैंने उन चार पुलिस वालों को बुला लिया जो सब-इंस्पेक्टर मीणा को अच्छी तरह जानते थे। तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हो ना?”
“सौ प्रतिशत। इसी का तो मैं ढोल पीट रहा हूँ। तुम लोगों को अब तक यकीन आ जाना चाहिये।”
“सब-इंस्पेक्टर मीणा समझ कर उसका संस्कार कर दिया गया...और सब तुम्हें मरा मानने लगे।”
मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा- “अगर पहले मुझसे इस तरह शराफत से बात की होती तो मैं ये सब नहीं करता।”
“अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। सब ठीक हो जायेगा।”
“तुम कामराज और सावी की शादी रुकवा दोगे?” मीणा ने पूछा।
“पूरी तरह। अगर तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो तो मैं ये शादी कभी नहीं होने दूंगा।”
“तुम्हारी बातें मुझे अच्छी लग रही हैं।” मीणा ने सोच भरे स्वर में कहा।
“सब ठीक हो जायेगा। क्या तुम हथियार गिरा कर बाहर आ रहे हो?” उधर से पाटिल ने पूछा।
“अभी नहीं। जब तक मामला मेरे हक में नहीं सुलझ जाता, तब तक मैं बैंक पर कब्जा जमाये रखूंगा।”
“ठीक है। मैं उन पुलिस वालों के साथ भीतर आता हूँ, जो तुम्हें, यानि कि मीणा को जानते थे।”
मीणा चुप रहा।
गुप्ता गर्दन उठाये मीणा को ही देख रहा था। दूर कुर्सियों पर बैठे देवराज चौहान और जगमोहन की निगाह इसी तरफ थी।
“तुम चुप क्यों कर गये?”
“इस बारे में मुझे अपने साथी से पूछना पड़ेगा।” मीणा ने सोच भरे स्वर में कहा।
“पूछ लो। मैं दस मिनट बाद फोन...।”
“आधे घंटे बाद...” मीणा ने कहा।
“ठीक है, आधे घंटे बाद फोन करूँगा।”
मीणा ने रिसीवर वापस रख दिया।
“सुलझ रहा है मामला?” गुप्ता ने बेचैनी से पूछा।
“अभी कुछ पता नहीं...।” कह कर मीणा पलटा और दूबे की तरफ बढ़ता कह उठा- “पुलिस वाले भीतर आना चाहते हैं।”
ये सुनते ही देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े। वो जगमोहन से कह उठा- “मुझे मामले में दखल देना पड़ेगा।”
“क्यों?” जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
“पुलिस वाले भीतर आये तो वो हमें पहचान सकते हैं। वो हमें गिरफ्तार कर लेंगे। अगर इसका पुलिस वालों के साथ समझौता हो गया तो बाहर बहुत पुलिस है। कोई भी हमें पहचान सकता है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये।”
“ये बात तो तुमने सही कही...।’ जगमोहन के होंठ भिंच गये।
“जबकि हकीकत ये है कि पुलिस इन दोनों को पकड़ लेना चाहती है। वो लोग हर सम्भव कोशिश करेंगे कि ये दोनों हथियार डाल कर बैंक से बाहर जायें। ये होना हमारे लिये ठीक नहीं होगा।”
“लेकिन ये तुम्हारी बात क्यों सुनेंगे?” जगमोहन बोला- “मीणा तो वैसे ही मुझसे चिढ़ा बैठा है।”
“देखता हूँ।” देवराज चौहान ने कहा और कुर्सी से उठकर, मीणा, दूबे की तरफ बढ़ गया।
पास पहुँचने पर दूबे ने धीमें स्वर में मीणा से कहा- “पुलिस क्यों भीतर आना चाहती है?”
“कमिश्नर पाटिल उन पुलिस वालों से मेरी शिनाख्त करवाना चाहता है जो मुझे जानते हैं।”
“तुम्हें नहीं, सब-इंस्पेक्टर मीणा साहब को....।’’ दूबे कड़वे स्वर में बोला।
“वो, मैं ही तो हूँ...।”
“ये बात मुझसे मत कहो। मैं मानने वाला नहीं। लेकिन तुम परेशानी पर परेशानी खड़ी कर रहे हो।”
“वो कैसे?”
“पुलिस वालों के साथ फालतू की बातों के चक्कर में ना पड़ो। वो हमें फांस लेंगे।”
“ये क्यों भूलते हो कि मैं भी पुलिस वाला हूँ। पुलिस की सब चाल समझता हूँ।”
“अब तुमने पुलिस की कौन सी चाल समझी?”
“कमिश्नर पाटिल अभी तो ईमानदारी से काम ले रहा है। वो ठीक लाईन पर चल रहा है।”
“तो तुम उन्हें भीतर आने दोगे?” दूबे उखड़ा।
“अभी सोचा नहीं...”
“उनसे क्या कहा तुमने?”
“यही कि पहले, साथी से बात का बताऊँगा। दूबे खा जाने वाली नजरों से मीणा को देखता कह उठा- “तुम सबकुछ सत्यानाश कर दोग... “
“अभी तक मैंने सब कुछ ठीक किया.....”
“डेढ़ सौ करोड़ नीचे स्ट्रांग रूम में पड़े हैं, योजना के मुताबिक तुम उन्हें लेकर निकल जाओ।”
“ये काम तो कभी भी हो सकता है। पहले मैं अपना वजूद हासिल कर लूं।” मीणा ने सिर हिलाकर कहा।
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो या नहीं हो, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। डेढ़ सौ करोड़ समेटो और.....”
“मुझे फर्क पड़ता है।” मीणा कह उठा- “कमिश्नर पाटिल ने बताया कि कुत्ता कामराज, दो महीने बाद साथी से शादी करने जा रहा है। मैं जिन्दा हूँ, और वो मेरी पत्नी से शादी कर रहा है। सावी इस हद तक गिर जायेगी, यह कह सोचा था।”
“भाड़ में जाये कामराज, सावी और तुम! मुझे तो बस नोट चाहिये...।” दूबे झल्ला उठा-ये सब करते हुए तुम कोई गलती करोगे और पुलिस हमें पकड़ लेगी। तुम्हें तो बैंक को लूटना भी नहीं आता। तुम सो....।
“तुम्हारा काम हो जायेगा। बैंक को हम लूट लेंगे।” मीणा ने विश्वास सारे स्वर में कहा।
ये बात कान खोलकर सुन लो कि पुलिस बैंक में नहीं आयेगी...”
“समझा कर, उन लोगों ने मेरी शिनाख्त...”
“तेरी शिनाख्त मैं कर चुका हूँ कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है। मैं मीणा साहब को अच्छी तरह जानता था-वो....”
“साले हारामी....” मीणा ने गुर्राकर दुबे की कमीज का कॉलर पकड़ लिया।
“कॉलर छोड़...” दूखे ने दांत भींच कर कहा।
दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा।
दोनों के हाथ में रिवाल्यरें दबी थीं।
मीणा ने कॉलर छोड़ा और दाँत पीस कर कह - “अपनी औकात मे रह। पहले तू मेरे तलवे चाटा करता था।”
“तेरे नहीं, सब-इंस्पेक्टर मीणा साहब के...।” दूबे ने जहरीले स्वर में कहा।
कुछ कहने लगा कि इसी पल देवराज चौहान पास आ पहुँचा था।
दोनों की निगाहें देवराज चौहान पर गईं।
“तुम दोनों झगड़ा कर रहे थे...।” शांत स्वर था देवराज चौहान का।
“तुझे क्या...।” दूबे उखड़ा- “उधर जाकर बैठ। चल...।”
“मैं तुम लोगों की सहायता करना चाहता हूँ...।” देवराज चौहान ने पूर्ववतः स्वर में कहा।
“सहायता?” मीणा की आँखें सिकुड़ीं- “भला तू क्या हमारी सहायता करेगा?”
“पुलिस वाले भीतर आने को कह रहे हैं। ऐसा क्यों?” बोला देवराज चौहान।
दूबे और मीणा की नजरें मिलीं।
“तू मामा लगता है जो जबर्दस्ती बीच में आकर सलाह दे रहा...”
“मैं नहीं चाहता कि तुम लोग कोई गलत कदम उठाकर फंस जाओ।
“तू क्या तीसमार खाँ है?” मीणा ने उपहास भरे स्वर में कहा।
“बात तो ऐसे कर रहा है जैसे इसने बहत सी डकैतियां डाल रखी हों और...।” दूबे ने व्यंग्य भरे स्वर में कहना चाहा।
“मैं देवराज चौहान हूँ...।
“देवराज चौहान हुआ तो क्या हुआ? हर किसी का कोई नाम तो होता ही है। वहाँ जाकर बैठा जा और अब...।”
“मैं डकैती मास्टर देवराज चौहान हूँ...।” कहना पड़ा देवराज चौहान को।
मीणा चौंका।
दूबे की आँखें सिकुड़ती दिखीं। फिर कह उठा- “बकवास करता है साला! कहाँ वो डकैती मास्टर देवराज चौहान और कहाँ तू...तू तो उसका...।”
“मैं वो ही देवराज चौहान हूँ...।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
“यकीन नहीं होता।” मीणा के होंठों से निकला।
“क्यों?” देवराज चौहान ने मीणा को देखा
“हम पुलिस स्टेशन में कभी फुर्सत में देवराज चौहान के बारे में बात किया करते थे। उसे तो पुलिस आज तक नहीं पकड़ पाई। मुझे नहीं लगता कि तुम वो हो...।” मीणा के स्वर में उलझन थी।
“मैं वो ही हूँ और मुझे इसलिये बीच में आना पड़ा कि अगर तुम लोगों ने पुलिस को बैंक में आने दिया तो पुलिस द्वारा मुझे पहचाने जाने का खतरा पैदा हो जायेगा। अगर पुलिस के साथ समझौता करके हथियार डाल कर बाहर निकल गये तो तब भी पुलिस मुझे पहचान सकती है...क्योंकि यहां जो भी मौजूद हैं, उस स्थिति में पुलिस सबका बयान दर्ज करेगी और इस दौरान कोई भी पुलिस वाला मुझे पहचान लेगा। तुम लोग मुझे फंसवा दो ...।”
मीणा और दूबे की नजरें मिलीं
“तुम बैंक में क्या कर रहे हो?” दूबे ने पूछा।
“किसी के साथ आया था...।” देवराज चौहान ने जवाब दिया।
“तुम सच में डकैती मास्टर देवराज चौहान हो?” मीणा शंकित स्वर में कह उठा।
“हाँ। तभी तो मैं तुम लोगों के पास आया। वरना मैं ये सब बातें क्यों करता?”
“मैंने उस पुलिस वाले का नाम सुन रखा है, जिसके पास तुम्हारा केस है। तुम्हें पकड़ने की जिम्मेवारी उस पर है। तुम नाम बताओ उसका।”
“इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े...।”
मीणा के होंठों से लम्बी सांस निकली।
“तुम्हारा एक साथी भी है। जगमोहन नाम है उसका...।”
“वो उधर खड़ा है।” देवराज चौहान ने कहा।
“जो मेरे से बीस-पच्चीस करोड़ मांग रहा है, वो जगमोहन है?” मीणा बोला।
“हाँ...”
“मैं तसल्ली कर लूं?” मीणा बोला।
“कर लो....”
“तुम इसी तरह खड़े रहना। मैं नहीं चाहता कि तुम अपने साथी को किसी तरह का इशारा कर दो।”
“ठीक है।” – देवराज चौहान ने कहा और उसी तरह खड़ा रहा।
मीणा वहाँ से हटा और सामने सबको देखता हुआ कह उठा – “तुम लोगों में से कोई जगमोहन नाम का इन्सान है तो वो सामने आये।”
जगमोहन फ़ौरन मीणा की तरफ बढ़ आया।
मीणा की निगाह जगमोहन पर जा टिकी जगमोहन पास आकर ठिठका।
“क्या है?”
“तुम्हारा ही नाम जगमोहन है ?” मीणा ने पूछा।
“हाँ।”
“और तुम्हारे साथी का क्या नाम है?”
“देवराज चौहान।”
“क्या करता है वो।”
“वो डकेती मास्टर देवराज चौहान है। खुद को पुलिस वाले कहते हो और देवराज चौहान को नहीं जानते?”
“मैं चेहरे से नहीं पहचानता। नाम बहुत सुन रखा है।” मीणा ने कहा और देवराज चौहान की तरफ बढ़ गया।
“मैं भी आऊं?”
“नहीं.... ।” मीणा ने बिना पलटे जवाब दिया।
मीणा देवराज चौहान के पास पहुंचा और गंभीर स्वर में बोला – “दुबे ये देवराज चौहान ही है।”
“मेरा नाम क्यूँ लेता है?” दुबे ने झल्ला कर कहा।
“कोई फर्क नहीं पड़ता। ये देवराज चौहान ही है।”
“तुझे धोखा भी हो सकता है कि...”
“कोई धोखा नहीं, ये देवराज चौहान ही है। डकेती मास्टर है।
वरना इंस्पेक्टर वानखेड़े हमारे बहुत काम आ सकता है। हमें रास्ता दिखा सकता है।” मीणा गंभीर।
“इसे हम साथ मिला लेंगे तो ये भी नोट मांगेगा।”
“नहीं।” देवराज चौहान कह उठा – “नोटों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है। मैं तो सिर्फ इसलिए बीच में आया हूँ कि कहीं तुम लोगों के फैसले मुझे और जगमोहन को फंसा न दें। क्या तुम लोग हथियार डालने के मूड में हो?”
“नहीं।” दुबे के मुंह से निकला।
“ठीक है, मुझे सब कुछ बताओ कि मामला क्या है और तुम लोग क्या करना चाहते हो?”
मीणा, देवराज चौहान को सब कुछ बताने लगा।
देवराज चौहान ने मीणा की सारी बात सुनी, दुबे भी बीच में कई बार बोला।
आखिरकार देवराज चौहान वो सब कुछ जान गया जो वो दोनों जानते थे।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगाई। वो आखिरी सिगरेट थी। डिब्बी फेंक दी।
“मेरे लिए नहीं है?” पूछा मीणा ने।
“खत्म हो गयी... ।” देवराज चौहान ने कश लेकर कहा- “तुम्हारे मामले को मैं संभालूं तो तुम लोगों को कोई ऐतराज तो नहीं?”
मीणा और दुबे की नजरें मिली।
“भरोसा करके देख लें...।” दूबे ने मीणा से कहा।
“ठीक है देवराज चौहान। तेरा भरोसा किया। सारा मामला हम तेरे पर छोड़ते हैं। बता, आगे क्या करें? लेकिन एक बात याद रख कि जहाँ भी हमें लगा, तू फंसाने वाले काम कर रहा है तो तेरी गर्दन पकड़ लेंगे।”
देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।
“ये नौबत नहीं आयेगी।”
“तेरे पास रिवाल्वर है?” दूबे ने एकाएक पूछा।
“हाँ...।”
“तेरे साथी जगमोहन के पास?”
“उसके पास भी है।”
“ये तो गड़बड़ वाली बात हो गई गुरू। ये दोनों नामी बंदे हैं। डकैतियों का धंधा करते हैं और यहाँ डेढ़ सौ करोड़ की दौलत पड़ी है। इनकी नियत कभी भी खराब हो सकती है, या क्या पता हो भी गई हो। ये हमें गोली मारकर नोट लेकर फुर्र हो सकते हैं।”
“दूबे ठीक कहता है।” मीणा ने गम्भीर निगाहों से देवराज चौहान को देखा।
“ऐसा करना होता तो अब तक ये हो चुका होता। मेरी आदत है कि मैं मेहनत से हासिल की दौलत पर ही यकीन रखता हूं। यूं किसी से इस तरह दौलत छीन लेना मेरी आदत में नहीं है।” देवराज चौहान ने कहा।
“ये तो तू कह रहा है-पर हमें क्या पता?” दूबे ने कहा- “क्यों गुरू?”
मीणा के चेहरे पर उखड़ेपन के भाव आ गये
“मैं तुम्हें बता चुका हूँ देवराज चौहान कि मैं अपने वजूद को कायम करने के बाद ही डेढ़ सौ करोड़ के बारे में सोचूंगा। ये भी कोई बात है कि मैं जिन्दा हूँ और वो मुझे मरा साबित कर रहे हैं! कामराज और सावी शादी की तैयारियाँ कर रहे हैं। मैं किसी भी कीमत पर उन दोनों की साजिश कामयाब नहीं होने दूंगा।” मीणा दाँत भींच कर कह उठा।
“ऐसा करने में खतरा भी खड़ा हो सकता है मीणा।”
“परवाह नहीं! लेकिन मैंने जो सोचा है, वो ही करूँगा।”
“मान जा गुरू।” दूबे आहत भाव से बोला- “ये वक्त नखरे लगाने का नहीं है। फंसे पड़े हैं। बाहर पुलिस है। पैसा लेकर निकल गये तो ये ही बहुत बड़ी बात होगी। क्यों देवराज चौहान?”
देवराज चौहान की नजरें मीणा पर थीं।
“मैं पहले दुनिया के मुंह से सुनना चाहता हूँ कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूं। मेरा वजूद कायम हो गया तो कामराज और सावी की शादी नहीं सकेंगे। उनकी साजिश फेल हो जायेगी...”
“ठीक है।” देवराज चौहान ने सिर हिलाया- “ऐसा है तो ऐसा ही सही। अब मेरी बात ध्यान से सुनो। पुलिस को किसी भी कीमत पर भीतर नहीं आने देना है। भीतर आकर पुलिस यहां की टोह लेगी और फिर प्लॉन के साथ बैंक पर हमला कर सकती है जब तक मुट्ठी बंद है, तभी तक उत्सुकता कायम रहती है। पुलिस की सिर्फ एक ही कोशिश है कि तुम लोगों को पकड़ ले और यहाँ मौजूद सब लोगों को बचा ले। इससे ज्यादा पुलिस की दिलचस्पी किसी बात में नहीं है।”
“तुम ठीक कहते हो...।” दूबे गम्भीरता से बोला।
“लेकिन पुलिस के सामने पड़े बिना मेरी समस्या हल नहीं होने वाली । कमिश्नर पाटिल मेरी शिनाख्त करवाना चाहता है, उस पुलिस वालों से, जो मुझे अच्छी तरह जानते हैं।” मीणा ने बेचैनी से कहा।
“इसके लिए तुम बाहर जाओगे।” देवराज चौहान बोला।
मीणा हड़बड़ाकर उछल पड़ा।
“म-मैं बाहर जाऊँगा?”
“हाँ...”
“वो मुझे पकड़ लेंगे। फिर तो...।”
“वो तुम्हें छुएंगे भी नहीं।” देवराज चौहान ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा- “क्योंकि तुम्हारा एक साथी भीतर होगा और यहाँ के लोग उसके निशाने पर। तुम कह सकते हो उन्हें कि अगर तुम्हें कुछ हुआ तो तुम्हारा साथी सबको मार देगा।”
मीणा, देवराज चौहान को मुस्करा कर देखने लगा।
“लेकिन यहाँ किसी को मारा नहीं जायेगा। क्योंकि अब मैं तुम लोगों के साथ हूँ।” देवराज चौहान ने कहा।
“क्यों तुम इन लोगों की जान नहीं लोगे?” दूबे बोला
“इस तरह नहीं । मासूम और निर्दोष लोगों को मैं कभी नहीं मारता। हो सके तो उन्हें बचाता ही हूँ।”
“तुमने तो बहुत अच्छा हल बताया।” मीणा खुशी से कह उठा- “ये धमकी काम कर जायेगी। पुलिस वाला होने के नाते मैं जानता हूँ कि पुलिस ऐसा रिस्क नहीं लेगी कि, जिसमें मासूम लोगों की जान जाने का खतरा हो।”
“ऐसा ही करना। निश्चित होकर बाहर जाओ।” देवराज चौहान ने कहा-“बाकी, आगे के लिए. मैं सोचता हूँ.....”
“लोग तुम्हें यूँ ही डकैती मास्टर नहीं कहते। तुम सच कमाल के हो देवराज चौहान।” मीणा हंसकर बोला।।।
तभी फोन की बेला बजने लगी।
गुप्ता ने रिसीवर उठाया। बात की।
“हैलो....।”
“उससे बात कराओ मैनेजर गुप्ता...।” दूसरी तरफ से कमिश्नर पाटिल का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा।
“एक मिनट... ।” गुप्ता ने कहा। उसने मीणा को अपनी तरफ आते देख लिया था।
मीणा पास पहुँचा तो गुप्ता ने उसकी तरफ रिसीवर बढ़ाकर कहा- “कमिश्नर पाटिला साहब तुमसे बात करना चाहते हैं।” मीणा ने रिसीवर लिया और बोला- “तुमने दस मिनट पहले फोन कर दिया कमिश्नर.....”
“इतना वक्त बहुत होता है किसी से बात करने के लिए...।” कमिश्नर पाटिल की आवाजा कानों में पड़ी।
“मेरा साथी इस बात के लिए तैयार नहीं है कि पुलिस भीतर आये।” मीणा ने कहा।
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो तो फिर पुलिस को भीतर आने दो। हम खाली हाथ आगे और मेरे साथ के पुलिसवालो तुम्हें देखेंगे
कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो कि नहीं... दो मिनट की तो बात है।” कमिशनर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“तुम्हारी बात से लग रहा है कि तुम बैंक के भीतर आने के लिये व्याकुला हो। ऐसा क्यों?”
“मैं!” कमिश्नर पाटिल का स्वर कुछ शांत हुआ- मामला जल्दी निपसा देना चाहता हूँ, तुम्हारी शिनाख्त करता कर। अगर तुम सच्चे हो तो तुम्हारे खिलाफ एसी.पी. कामराज ने कोई साजिश रची है तो मैं कामरामा के खिलाफ एक्शन लूंगा।”
“ये कहने का शुक्रिया...।”
“तो मैं आऊँ भीतर?”
“मैं बाहर आ रहा हूँ कमिश्नर।।” मीणा ने कहा।
“तुम...”
“हाँ। तुमने मेरी शिनाख्त ही करवानी है पुलिस वालों से। मैं आ जाता हूँ बाहर...”
दो पलों तक लाईन पर खामोशी रही। फिर कमिश्नर की आवाज आई।
“ठीक है, तुम बाहर आ जाओ।”
“लेकिन याद रखना कमिश्ननर साहब! मुझे पकड़ने या शूट करनी की कोशिश ना की जाये मेरा साथी बैंक में लोगों पर हथियार ताने खड़ा है और मैं उससौ कड़ कर निकाल्नंगा कि अगर मुझे कुछ हो जायो तो वो संवा को मार दे। मेरे पासा मोबाईल फोन है और मेरे साथी के पास भी फोन है।। फोन पर हम एक-दूसरे का हाल पूछ सकते हैं।”
“मैं समझ गया। कमिश्नर पाटिल का शांत स्वर मीणा के कानों में पड़ा “इस बारे मैं निश्चित रहो। कोई तुम्हें पकड़ेगा नहीं। कोई गोली नहीं चलायेगा। हम बैंक में मौजूद लोगों को जिन्दा देखना चाहते हैं। तुमा आओ, मैं इंतज़ार कर रहा हूं...।”
मीणा ने रिसीवर रखा और ऊँचे स्वर पलट कर कह उठा- “मैं बाहर पुलिस वालो से बात करने जा रहा हूँ। अगर पुलिस मुझे पकड़ती है या शूट करती है तो तुम यहाँ मौजूद सबको शूट कर देना जरा भी रहम मत करना।” मीणा ये, बात खासतौर से मैनेजर गुप्ता को सुना रहा था, क्योंकि उसकी ही पुलिस वालों से बात होती थी। बीया की वातावो ही पुलिस वालों को बता सकता था- “सुन लो दू...”
“नाम मत लो...” दुबे तीखे स्वर में कह उठा।
“कोई भी शरारत करे यामुझे पुलिस पकड़े तो तूने उसी वक्त इन सबको मार देना है।”
“ठीक है।
फिर मीणा पास पहुंचा और देवराज चौहान से बोला- “तुम भी ध्यान रखना कि भीतर सब ठीक रहे।”
“निश्चित रहो...।”
“वैसे ये तो पक्का है ना कि पुलिस मुझे पकड़ने या शूट करने की कोशिश नहीं करेगी?” मीणा बोला।
“तुम्हें क्या लगता है?” देवराज चौहान मुस्कराया
“मेरे ख्याल में तो पुलिस मुझे कुछ भी नहीं करेगी। क्योंकि यहाँ दूबे के निशाने पर लोग हैं।”
“ठीक समझे। पुलिस तुम्हें कुछ नहीं कहेगी। सबसे बड़ी बात है कि तुम्हें अपने पर भरोसा होना चाहिये। भरोसा ही तुम्हें हर तरह के हालातों में सलामत रखेगा। अगर मन में तुम कमजोर पड़े तो समझो तुम हार गये।” देवराज चौहान बोला।
“ये बात तो तुमने ठीक कही देवराज चौहान कि मन में ताकत हो तो बाहर भी ताकत रहती है। मैं ध्यान रखूँगा। तुम इस वक्त मुझे न मिलते तो मैं जरूर कोई गलती कर देता।” मीणा मुस्करा कर बोला- “मैं बाहर जाऊँ?”
“जाओ।”
मीणा पुनः ऊँचे स्वर में बोला- “मैं बाहर जा रहा हूँ, अगर पुलिस मुझे पकड़े या मार दे तो तुम यहाँ सबको उसी वक्त शूट कर देना।”
“मैं खोलता हूँ।” कहता हुआ दूबे, मीणा के पास जा पहुंचा।
जेब से चाबी निकाल कर ताला खोला।
“सावधान रहना।”
“चिन्ता मत कर।” मीणा ने कैंची गेट सरकाया और बाहर निकल गया।
दूबे ने पुनः कैंची गेट बंद करके ताला लगा दिया और वहीं खड़ा रहा। नजरें भीतर भी थीं और बाहर भी थीं। यहाँ से थोड़ा सा बाहर का नजारा दिखाई दे रहा था। बाहर पुलिस ही पुलिस थी। परन्तु बैंक से फासला रखकर, कुछ हट कर खड़ी नजर आ रही थी।
तभी देवराज चौहान पास पहुँच कर बोला- “बाहर के हालात जो भी हों, तुम यहाँ किसी की जान नहीं लोगे।”
“समझ गया। वैसे तुम्हें क्या लगता है कि वो वापस आ जायेगा? पुलिस उसे आने देगी?”
“शत प्रतिशत आने देगी। उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।
मीणा कैंची गेट के बाहर की तीन सीढ़ियां उतर कर ठिठका और हर तरफ नजर मारी।
हर तरफ उसे खाकी वर्दियां ही नजर आई।
हथियारबंद पुलिस वाले।
किसी के हाथ में गन थी तो किसी के हाथ में रिवाल्वर। सब इस तरह पोजिशन लिए हुए थे कि जैसे कभी भी बहुत बड़ी लड़ाई छिड़ सकती है। एक तरफ टी.वी. न्यूज चैनल्स वाले खड़े थे और अपना काम कर रहे थे।
मीणा की कड़वी कठोर निगाह सब तरफ घूम रही थी। मीणा ने अपने दाईं तरफ, दस कदमों की दूरी पर खड़े तीन पुलिस वालों को देखा। एक ने गन पकड़ रखी थी। बाकी दो के हाथों में रिवाल्वरें थीं। वो इस तरह खड़े थे कि कभी भी गोली चला दें।
“सालों ने मेरी बात पहले ही मान ली होती तो ये दिन ना देखना पड़ता इन्हें...।” मीणा बड़बड़ाया।
मीणा के हाथ में भी रिवाल्वर दबी थी। मीणा एकाएक दस कदम पर खड़े पुलिस वालों से कड़वे स्वर में कह उठा- “क्या है? गोली मारोगे मुझे। लो, मारो...मारो मुझे गोली...”
पुलिस वाले सकपका से उठे।
“कमाल है, मैंने बैंक पर कब्जा कर रखा है और इस वक्त तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। चलाते क्यों नहीं गोली? मार दो मुझे। अब तुम्हारे पास अच्छा मौका है मुझे शूट करने का।” स्वर ऊँचा था मीणा का।
पुलिस वाले सकपकाये से खड़े मीणा को देखते रहे।
मीणा एकाएक उनकी तरफ बढ़ा और पास जा पहुँचा।
उसे इतना पास आया पाकर वो बौखला से उठे।
“चलो, हथियार वापस रखो और पीछे हट जाओ। तुम लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। भाग जाओ यहाँ से।” मीणा अपना हाथ में दबा रिवाल्वर काला हाथ हिलाकर कह उठा- “हटो चलो, पीछे हटो..।”
वो तीनों पुलिस वाले कुछ कदम पीछे हटे।
तभी पचास वर्षीय एक व्यक्ति उसकी तरफ बढ़ा। चेहरे से ही जान पड़ता था कि वो पुलिस वाला है।
मीणा ने से जाते देखा तो नजर उस पर टिक गई। वो पाँच कदम दूर ठिठका और मीणा से कह उठा- मैं ए.मी पी. धीरज कुमार पाटिल हूँ...” मीणा ने सिर हिला के कहा – “इन्हें पीछे हटने को कहो। ये मेरे सिर पर चढ़े पा रहे हैं।”
कमिश्नर पाटिल तीनों पुलिस वालों से कह उठा- “पीछे हो जाओ।”
तीनों पुलिस वाले पीछे हटते चले गये।
“यहाँ सब पुलिस वालों ने हथियार स्यों पकड़ रखे हैं? मुझे शूट करना है क्या?”
“नहीं.. नहीं, ऐसी बात नहीं ..।”
“तो उनसे कहो कि पीछे हट जारे और हथियार वापस रख लें।” मीना ने कहा।
कमिश्नर पाटिल पलट कर ऊंचे स्वर में बोला- “हथियार वापस रखो और पीछे हट जाओ। जल्दी करो।”
पुलिस वाले कुछ पीछे हटे। कुछ ने हथियार वापस रखे, कुछ ने नहीं। सामने की सड़क पुलिस ने जाम कर रखी थी। वहाँ ट्रेफिक का आना-जाना बंद हो चुका था।
मीण की निगाह हर तरफ घूमी तो सड़क पार उसे सिग्रेट वाले का खोखा दिखा।
“मैं वहाँ से रिग्रेट ले लूं। खत्म हो चुकी है।”
“हाँ..हाँ, क्यों नहीं।’ पाटिल उसके साथ चल पड़ा-तुम मुझे शरीफ लग रहे हो।”
“पुलिस पाला क्या बदमाश होता है।” मीणा ने मुंह बनाकर कहा।
“ये बात नहीं, मेरा मतलब था कि जैसे दूसरे डकैत होते है, तुम बस नहीं हो।”
“दो बंधकों को छोड़ दो। इससे हम लोगों में अच्छा रिश्ता कायम हो जायेगा।”
मीणा ने चलते-चलते गर्दन घुमाकर पाटिल को घूरा।
“मैंने क्या अपनी लड़की ब्याहनी है जो तुम्हारे साथ अच्छा रिश्ता बनाऊँ...”
“मेरा वो मतलब नहीं था।” पाटिल ने कहा- “हम तुम्हारे साथ नर्मी का व्यवहार कर रहे हैं, तुम भी नर्मी से पेश आओ।”
“मेरी तरफ से नर्मी तब ही होगी, जब तुम मुझे इन्साफ दिलाओगे...।”
“वो तो मैं कोशिश कर ही...।”
“कोशिश नहीं-कुछ करके दिखाओ। सावी और कामराज की साज़िश ने मुझे पागल बना दिया है। मैं...।”
“अगर तुम सच्चे हो तो मैं उन दोनों को सजा दिलवा के रहूँगा।”
“यही कहते रहना। कुछ करके मत दिखाना।” मीणा ने चिढ़े स्वर में कहा।
“शिनाख्त वाला काम हो जाये, उसके बाद मैं सब कुछ कर दिखाऊँगा।”
“जब कर दिखाओगे, तब ही मेरे से बात करना। हैरानी है कि कोई भी मुझे सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं मान रहा...।”
“जल्दी ही सब ठीक हो जायेगा। तुम दो बंधकों को छोड़ क्यों नहीं देते?”
“क्यों छोडूं?
“हमारा व्यवहार देखकर। हम तुम्हारे साथ कितनी शराफत से पेश आ रहे हैं। ये तो तुम देख ही रहे...।”
“ऐसा करना पुलिस वालों की मजबूरी है। क्योंकि बैंक में बीस लोग मेरे साथी ने निशाने पर ले रखे हैं। तुमने मुझे कुछ किया तो मेरा साथी उन्हें मार देगा। अगर ऐसा कुछ न होता तो तुम लोगों ने अब तक मुझे पीट-पीट कर मेरा हाल बिगाड़ देना था। पुलिस वाला हूँ, इसलिये पुलिस वालों को अच्छी तरह जानता हूँ।”
मीणा, पाटिल के साथ सिग्रेट के खोखे पर जा पहुंचा। सिग्रेट वाला ख़ुशी और गर्व के साथ मीणा को सलाम मारता कह उठा- “सलाम साब...।”
पाटिल कसमसा कर रह गया।
“सलाम यार, बड़ी गोल्ड फ्लैक के दो पैकिट, दो नहीं, दस पैकिट दे दे। अभी पता नहीं कितनी देर लग जाये...।”
“देता हूँ साहब जी...।” कहने के साथ ही सिग्रेट वाले ने दस बड़ी गोल्ड फ्लैक के पैकिट लिफाफे में डाले और मीणा की तरफ लिफाफा बढ़ा दिया- “ये लो जी...।”
“कितने पैसे हुए?” मीणा ने जेब से पैसे निकाले।
“पैसे देकर क्यों शर्मिदा करते हैं...मैं तो...।”
“पैसे बताओ, मैं मुफ्त में कुछ नहीं लेता। पास में कमिश्नर साहब खड़े हैं।
“देना ही है... तो फिर जो भी दे दीजिये।”
सिगेट के पैसे चुकता करके, लिफाफा थामे मीणा पलट कर वापस चल पड़ा।
पाटिल उसके साथ था।
“तुम हमसे आराम से बात क्यों नहीं करते?” पाटिल बोला।
“आराम से ही तो बात कर रहा हूँ...।”
“ऐसे नहीं। मेरा मतलब है कि तुम बैंक में क्यों जा रहे हो? बाहर ही रहो। तुम्हारा साथी तो भीतर है ही। हम बाहर बातें करके मसला सुलझाते रहेंगे। चाय मंगवाऊँ तुम्हारे लिये...।”
“मेरा साथी सिर्फ गोली चलाना जानता है। वो जल्दी घबरा जाता है। अकेले उसके बस का कुछ नहीं है, मैं वापस नहीं पहुँचा तो वो गोलियाँ चलाना शुरू कर देगा। क्या तुम भीतर सबकी मौत देखना चाहते हो?”
“नहीं, ये नहीं चाहता मैं...”
“तो मुझे भीतर जाना होगा। तुम्हारे पुलिस वालों ने मेरी शिनाख्त कर ली होगी। अब हम फोन पर बात करेंगे। पहले की तरह। जैसे हमारी बातें पहले होती रही हैं, वैसे ही अब होंगी।”
मीणा ने कहा।
दोनों बैंक की तरफ बढ़े जा रहे थे
“वो देखो, पुलिस वाले फिर करीब आ गये हैं।” मीणा उन तीनों पुलिस वालों को देखते ही कह उठा- “हथियारों को पकड़े खड़े तो ऐसे हैं कि जैसे वो अभी मुझे शूट कर देंगे...।”
पाटिल ने हाथ के इशारे से उन्हें पीछे हटने को कहा।
वो तीनों कुछ कदम पीछे हट गए।
“वो अपनी ड्यूटी दे रहे हैं। तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे।” पाटिल ने कहा।
“मुझे मत बताओ। मैं सब जानता हूँ , पुलिस वाला हूँ इसलिए... ।”
“तुम्हें किसी और चीज की जरुरत हो तो...”
“बता दूंगा।” मीणा ने कहा।
“तुम मेरे साथ चाय पीते तो हम बहुत सी बातें कर लेते... ।” पाटिल बोला
“मुझे फालतू की बात करने की आदत नहीं है। जो काम तुम्हें कहा है, सिर्फ वो ही बात करो।”
“बैंक को लूटने का इरादा नहीं है तुम्हारा?”
“ये बात मैं अभी तुम्हें नहीं बता सकता। वैसे बैंक में डेढ़ करोड़ की दौलत पड़ी है।” मीणा मुस्कुराया।
“हाँ पता लग गया मुझे।” पाटिल ने सर हिलाया।
“अगर मैं दौलत साथ ले जाऊं, तो बुरा भी क्या है।”
“पुलिस वाले होकर डकैती जैसा काम करोगे?”
“पहले मुझे पुलिस वाला साबित करके दिखाओ। यही साबित करने के लिए तो मैंने ये सब किया है।” मीणा की निगाह सफ़ेद मारुती ओमनी पर पड़ी। वो वैसे ही खड़ी थी, जैसा उसे खड़ा किया गया था।
बैंक का गेट आस-पास आ गया था।
मीणा ठिठक कर पाटिल से बोला – “तुम यहीं रुक जाओ। अब मैं बैंक में जाऊँगा।”
“मैं तुम्हें फोन करूँगा।”
“जरुर करना। यहाँ इस ढेर सारी पुलिस का कोई फायदा नहीं है। बाहर दो चार पुलिस वाले ही बहुत हैं।”
वहाँ 200 से ज्यादा पुलिस वाले थे। सबकी निगाह मीणा पर थी।
पाटिल वहीं खड़ा उसे जाता देखता रहा। चेहरे पर गम्भीरता थी।
मीणा ने बैंक की तीन सीढ़ियां चढ़ीं और कैंची गेट के पास खड़ा हो गया।
दूबे जल्दी से, भीतर ताला खोल रहा था।
ताला खुला। कैंची गेट खुला। मीणा ने भीतर प्रवेश किया।
दूबे ने पुनः ताला बंद कर दिया।
सामने ही देवराज चौहान खड़ा था।
मीणा मुस्करा कर उसके पास पहुँचता कह उठा-
“तेरा आईडिया काम कर गया देवराज चौहान। मैं सुरक्षित वापस आ गया। ये ले, सिग्रेट के दस पैकिट लेकर आया हूँ।” उसने देवराज चौहान को लिफाफा थमा दिया।
तभी दूबे पास आकर बोला- “पुलिस वालों से बात हुई?”
“हाँ। वो हर तरह से मुझे मक्खन लगा रहे थे, परन्तु मैं उनकी बातों में नहीं फंसने वाला...।” मीणा मुस्कराया।
“शिनाख्त हो गई तेरी?” दूबे ने पूछा।
“हाँ।”
“तो क्या कहा उन्होंने?”
“कमिश्नर पाटिल अब फोन पर बतायेगा।”
“मैं जानता हूँ वो यही करेगा कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हैं।” दूबे सिर हिलाकर कह उठा।
मीणा ने दाँत भींचकर दूबे को देखा।
दूबे पास से हट गया
“उल्लू का पट्ठा!”
“तू होगा।” वहाँ से दूर जाते दूबे ने पलट कर कहा। मीणा दाँत पीसकर रह गया।
“तुम दोनों आपस में तू-तू मैं-मैं मत करो। वरना इसका फायदा कोई दूसरा उठा लेगा।” देवराज चौहान ने कहा।
“वो हर समय ये क्यों कहता है कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा नहीं हूँ...।” मीणा ने गुस्से से कहा।
“उसे कहने दो। असली फैसला तो पुलिस वालों ने करना
“वो क्या फैसला करेंगे! मैं मीणा हूँ, तो हूँ। कामराज और सावी की साजिश में फंस कर ये गड़बड़ हो गई...।”
“पुलिस वालों से क्या बात हुई?”
“खास नहीं। कमिश्नर मुझे बातों में फंसा रहा था कि मैं बाहर ही रहूँ और उनसे बात करूँ। वो ये भी पूछ रहा था कि क्या मेरा इरादा बैंक में पड़े पैसों को ले जाने का है या नहीं? उसे मालूम है बैंक में 150 करोड़ की रकम पड़ी है। बहुत मीठा बनकर मुझसे बातें कर रहा था। ये पुलिस वाले बहुत हरामी होते हैं। मैंने भी तो पुलिस की लम्बी नौकरी की है।”
देवराज चौहान वहाँ से पलटा और आगे बढ़ा कि मीणा कह उठा- “अब मुझे क्या करना चाहिये देवराज चौहान?”
देवराज चौहान ठिठक कर पलटा।
“इन्तजार करो कि अब पुलिस वाले क्या कहते हैं। उनका फोन आता ही होगा।” कह कर देवराज चौहान जगमोहन की तरफ बढ़ गया।
“ठीक है। कर लेते हैं इन्तजार... ।” मीणा मुस्कराया और रिवाल्वर वाला हाथ ऊपर करके ऊँचे स्वर में कह उठा- “मैं वापस आ गया दोस्तों। बाहर खड़े पुलिस वालों से मिल आया हूँ। वो सब डरे खड़े हैं और बाहर टी.वी. वाले भी अपने कैमरों के साथ मौजूद हैं। मैं तो मशहूर हो गया। चूंकि तुम लोग भी यहाँ हो तो तुम भी मशहूर हो जाओगे।”
सब चुप। जैसे साँप सूंघ पड़ा हो।
मीणा, मैनेजर गुप्ता की तरफ बढ़ता कह उठा-
“कोई फोन आया था मेरे पीछे से?”
“हाँ। इंस्पेक्टर खरे का आया था। वो पूछ रहा था कि बैंक के भीतर अब क्या पोजिशन है?”
“साले, मौका ढूंढ रहे हैं। तो तुमने क्या कहा?”
“मैंने कह दिया कि कुछ किया तो रिवाल्वर वाला, हम सब की जाने ले लेगा...।”
मीणा कुछ कहने लगा कि एकाएक उसका शरीर जोरों से कांपा।
रिवाल्वर हाथ से छूट कर फर्श पर जा गिरी।
चेहरा एकाएक सुर्ख सा हो उठा। ऐसा लगा जैसे कोई उसका गला घोंट रहा हो। आँखें फट कर बाहर को झलक उठी थीं। तड़प उठा मीणा। एक हाथ दिल वाले हिस्से में जा टिका।
मीणा का बदन एकाएक जोरों से फिर कांपा और वो नीचे जा गिरा। दिल वाले हिस्से पर रखा हाथ और भी कस गया था। फर्श पर पड़े-पड़े तड़प रहा था मीणा।
“क्या हुआ गुरू...।” दूबे चीखा और उसकी तरफ दौड़ा।
देवराज चौहान भी भागा आया।
गुप्ता तो कब का हड़बड़ा कर कुर्सी से उठ खड़ा हो चुका था।
लाला इन सब बातों से बे-परवाह अपनी सुन्न टांग को ठीक करने के लिए, चक्कर लगाने लगा था।
अचानक ही मीणा तड़पते हुए चीख उठा- “हट साले...कुत्ते...। चला जा यहां से।”
“क्या हुआ तेरे को?” दूबे परेशान व्याकुल सा कह उठा।
बैंक के अन्य लोग भी आ गये थे वहाँ।
“दिल का दौसा पड़ा है।” एक ने कहा- “देखो तो कैसे दिल पार हाथ रखा हुआ है....।”
“मेजर अटैक है।”
‘तुम क्या देख रहे हो?” बैंक की एक महिला कर्मचारी ने दूबे से कहा- “ये मर जायेगा। बाहर खड़ी पुलिस को बुलाओ।”
“पुलिस?” दूबे के होंठों से निकला।
“जल्दी करो...”
“वो मुझे पकड़ लेगी। दूबे हड़बड़ाकर कह उठा।
“तुम्हारी साथी हार्ट अटैक से मर गया तो?”
दूबे ने व्याकुलता से देवराज चौहान को देखा।
देवराज चौहान की गम्भीर निगाह, नीचे पड़े तड़पते मीणा पर थी।
मीणा नीचे पड़ा, दिल थामे जैसे अपने से ही लड़ रहा था।
अजीब हाल में था वो।
“इसे क्या हो गया है?’’ दूबे ने देवराज चौहान से कहा।
देवराज चौहान नहीं समझ पा रहा था कि मीणा को क्या हो रहा है।
“चला जा...। ये सब कुछ मेरा है...।” नीचे पड़ा तड़पता मीणा गुर्रा कर कह उठा।
“मेजर हार्ट अटैक में ये बोल कैसे रहा है?” बैंक के एक कर्मचारी ने कहा।
“सुना नहीं तुमने?” बैंक की उसी महिला कर्मचारी ने कहा- “दरवाजा खोलो और बाहर खड़ी पुलिस को बुलाओ। वो इसे अस्पताल ले जायेगी। ये मर गया तो इसका पाप तुम्हें लगेगा। जल्दी से मेरी बात मान लो।”
“चुप कर।” दूबे ने दाँत पीस कर कहा।
“मुझे क्या...मैं तो भले की बात कह रही हूँ तुम से...कि मुझे ही डाँट रहे हो।”
एकाएक मीणा का तड़पना रुक गया।
सबकी निगाह उस पर थी।
मीणा मुँह खोले अब गहरी-गहरी सांसें ले रहा था, इस तरह जैसे मीलों दौड़कर अब रुका हो। दिल पर सख्ती से रखा हाथ अब ढीला पड़ गया था। लाल सुर्ख हो चुका चेहरा अब धीरे-धीरे ठीक होने लगा था।
जगमोहन ने देवराज चौहान से धीमें स्वर में पूछा-
“इसे क्या हुआ?”
“पता नहीं...” देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े थे।
“हार्ट अटैक था?”
“नहीं। हार्ट अटैक में इन्सान इस तरह चीखकर बातें नहीं कर सकता।”
“ये कह रहा था-चला जा, ये सब कुछ मेरा है-इसका क्या मतलब हुआ?”
देवराज चौहान चुप रहा।
“कहीं ये डेढ़ सौ करोड़ की दौलत के बारे में तो नहीं कह रहा था? बाहर पुलिस वालों ने इसे कुछ कहा हो तो इसे सदमा लगा हो?”
“ऐसा कुछ नहीं है।” देवराज चौहान बोला।
“तो फिर कैसा कुछ
“इस बारे में मीणा ही बतायेगा। ये अब ठीक होता जा रहा है।” देवराज चौहान बोला।
मीणा अब भी गहरी सांसें ले रहा था। हालत ठीक हो चुकी थी उसकी। आँखें खोले वो सबको देख रहा था।
“हट जाओ यहाँ से...।” मीणा की आवाज में अभी वो ताकत नहीं थी।
वहाँ खड़े लोग दो कदम पीछे हटे, परन्तु वहीं खड़े रहे। मीणा उठ बैठा
दूबे के चेहरे पर राहत के भाव आये, मीणा को ठीक पाकर।
“ये तुम्हारी रिवाल्वर...।” मिसेज देसाई ने नीचे से रिवाल्वर उठाकर मीणा को दी।
मीणा ने सिर हिलाकर रिवाल्वर थाम ली। अब वो पूरी तरह ठीक था।
मीणा खड़ा हो गया और बोला- “सब अपनी-अपनी जगहों पर चले जाओ।” आवाज में पहले जैसा दम नहीं था। थकी सी आवाज भी उसकी।
सब वापस अपनी जगहों पर जाने लगे। लाला अभी तक अपनी सुन्न टांग को ठीक करने के लिए चहल-कदमी कर रहा था।
“क्या हुआ था तुझे?” दूबे बोला- “मैं तो घबरा ही गया था।”
मीणा ने दूबे को देखा, फिर देवराज चौहान और जगमोहन को।
“मैंने समझा तुम्हें हार्ट अटैक हुआ है।” जगमोहन ने कहा। मीणा शांत भाव में मुस्करा पड़ा। फिर बोला- “सब ठीक है। कुछ नहीं हुआ मुझे। वो यूं ही, ऐसा कभी-कभी हो जाता है मुझे।” मीणा सिर हिलाने लगा।
“तुम किससे बातें कर रहे थे?” देवराज चौहान ने कहा- “तुमने कहा, चला जा...ये सब कुछ मेरा है।”
“अच्छा!” मीणा हंस पड़ा- “मैंने ऐसा कहा?”
“तुमने ये भी कहा-हट, साले कुत्ते...चला जा यहाँ से।” देवराज चौहान पुनः बोला।
“मुझे याद नहीं कि मैंने ऐसा कुछ कहा।” मीणा कह उठा।
“कहा था तुमने ये...।” दुबे बोला।
“कहा होगा, लेकिन मुझे याद नहीं।” मीणा ने जगमोहन से कहा- “मुझे पानी पिलाओगे...।”
“अभी लाया....।” कहकर जगमोहन एक तरफ चला गया।
मीणा रिवाल्वर थामें टहलने लगा। जैसे खुद को संयत कर रहा हो। बड़बड़ा उठा- “अब सब कुछ मेरा है। मैं उसे नहीं आने दूंगा भीतर...। कमीना कहीं का...”
सामने लाला टहल रहा था।
“तेरी टांग अभी ठीक नहीं हुई?” मीणा ने ऊँचे स्वर में पूछा। आवाज की ताकत अब वापस लौटने लगी थी।
“पुरानी बीमारी है।” टहलते हुए लाला ने मीणा से कहा।
“इलाज करा?”
“कोई इलाज नहीं है इसका। डाक्टर कहते हैं कि टांग ऐसी ही रहेगी।”
“सब डाक्टर बे-ईमान हैं। मेहनत करके कोई राजी नहीं होता।”
लाला टहलने के काम में लगा रहा।
“मैनेजर....।” मीणा गुप्ता की तरफ बढ़ता कह उठा- “फोन नहीं आया पुलिस वालों का अभी?”
“अभी तो नहीं.....” कहते-कहते गुप्ता ठिठक गया। फोन की बेल बजने लगी थी।
“आ गया...” मीणा हौले से हंस पड़ा।
गुप्ता ने रिसीवर उठाकर बात की।
“हलो...”
“उससे मेरी बात कराओ।” दूसरी तरफ कमिश्नर पाटिल था।
तब तक मीणा पास आ चुका था।
“लो, बात करो....।” गुप्ता ने रिसीवर मीणा की तरफ बढ़ा दिया।
मीणा ने रिसीवर लिया और कान से लगाता कह उठा- “अब तो हो गई तुम्हारी तसल्ली कमिश्नर...कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”
गुप्ता मुँह उठाये मीणा को देखने-सुनने लगा था।
“तुम्हारी शिनाख्त करने वाले पुलिस वालों ने कहा है कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हो।” पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“खूब...।” मीणा कड़वे स्वर में कह उठा- “तो आखिर तुम भी कामराज के चक्कर में आ गये। कमिश्नर हो, दूसरे कमिश्नर की बात क्यों नहीं मानोगे! वैसे उसने तुम्हें झूठ बोलने के बदले क्या दिया है?”
“ये कह कर सच्चाई पर पर्दा मत डालो...।”
“कैसा पर्दा?”
“यही कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हो। अब ये बताओ कि तुम हो कौन?”
“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हूँ और तुम...
“सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा मर चुका है।” उधर से पाटिल का शांत और दृढ़ स्वर मीणा के कानों में पड़ा- “तुम्हारे कहने से हम ये मानने वाले नहीं कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो। सब जानते हैं कि मीणा मर चुका है, मैंने अभी कामराज साहब से फिर बात की है। वो तुम्हें फ्राड कह रहे हैं। वो कहते हैं कि उन्होंने तुम्हें तब देखा था, जब तुम... ।”
“जब मैं अपने घर में, अपने बैडरूम में गया था।” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “और वहाँ सावी और कामराज को एक-दूसरे की बाँहों में पाया। ये बताया तुम्हें कामराज ने?”
“मुझे इस बात में दिलचस्पी नहीं कि कोई अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी में क्या करता...।”
“दिलचस्पी क्यों होगी! कामराज ने तुम्हें तगड़ा पैसा चढ़ा दिया लगता है।”
“तुम बैंक गये थे मीणा के एकाऊँट मैं से दस हजार निकलवाने...”
“वो मेरा ही बैंक एकाउंट है। मैं अपने खाते से पैसे निकालने गया था।” मीणा ने झल्ला कर कहा।
“बैंक वालों का कहना है कि तुमने हू-ब-हू इन्दर प्रकाश मीणा के साईन किए। कहीं भी, जरा भी फर्क नहीं था।”
“फर्क कैसे हो सकता है? मेरा ही खाता था, मैंने ही साईन किए थे। तुम तो...।”
“अब काम की बात पर आ जाओ...।”
“काम की बात?”
“तुम चाहते क्या हो?”
“तुम लोग ये मानते क्यों नहीं कि मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।” गुस्से से कह उठा मीणा।
“क्योंकि तुम नहीं हो। तुम कोई फ्राड हो। डकैत हो या पागल हो, जो कि बैंक पर कब्जा किए बैठे हो। लोगों को बंधक बनाए हुए हो। और खुद को पुलिस वाला कह रहे हो...जो कि सत्रह दिन पहले मर गया...।”
“मैं जिन्दा हूँ...”
“मैंने पक्की तरह पता लगा लिया है। ये बात कोई नहीं मान सकता कि मीणा जिन्दा है?”
“तुम सब पागल हो गये हो।” मीणा गुर्रा उठा।
“ये सब करके तुम क्या चक्कर चलाना चाहते हो, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। बेहतर होगा कि खुलकर बात करो, जो भी करनी हो। अगर तुम बैंक का पैसा लूटना चाहते हो तो, ले जाओ-लेकिन बैंक में मौजूद सबको आजाद कर दो। परन्तु ये याद रखो कि तुम बच नहीं पाओगे। हम तुम्हें पकड़ लेंगे।”
मीणा का चेहरा गुस्से में लाल सा हो गया था।
“कमीने-कुत्ते, मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”
“ठीक यही होगा कि तुम्हारी जो भी मांग है। स्पष्ट कह दो। हम कोशिश करेंगे कि तुम्हारी बात मान लें।”
“तुम कुत्ते हो...”
“तुम्हारी गालियों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। सीधी तरह काम की बात पर आओ कि तुम...।”
“बहुत बढ़-चढ़ कर बोल रहा है। जुबान लम्बी हो गई है तेरी।” मीणा गुर्रा उठा- “अगर अभी मैं यहाँ लोगों को मारना शुरू कर दूं तो तब तू एकदम ढीला पड़ जाएगा। अचानक तेरा सुर क्यों बदल गया?”
“क्योंकि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है।”
“मुझे गुस्सा दिलाया तो मैं सब को मार दूंगा...।” मीणा दाँत किटकिटा उठा।
“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”
“क्यों नहीं कर सकता...।”
“ये...ये गलत होगा, मासूम लोगों की जान लेना। हम तुम्हारी बात मानने को तैयार हैं, बोलो तुम क्या...।”
“तुम भी कामराज के हाथों की कठपुतली बन चुके हो! बिक चुके हो तुम, तुम क्या करोगे मेरे लिए, तुम कुछ नहीं कर सकते! मैं जिन्दा हूँ और तुम कहते तो कि मैं सत्रह दिन पहले मर चुका हूँ। वो कमीना कामराज मेरी पत्नी सावी के साथ शादी करने जा रहा है और तुम उसे रोकने की अपेक्षा मुझे ही गलत ठहरा रहे हो? मैं तो...।”
“ये नौटंकी छोड़ो।” पाटिल की आवाज कानों में पड़ी- “तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हो, ये अच्छी तरह सुन लो।”
“मैं हूँ...।” मीणा चीख उठा- “तुम भी ये बात अच्छी तरह सुन लो...।”
तभी देवराज चौहान पास पहुंचा। मीणा के कंधे पर हाथ रखा।
मीणा ने गुस्से से भरी निगाहों से देवराज चौहान को देखा।
“फोन रख दो...।” देवराज चौहान ने कहा।
“लेकिन...”
“रख दो मीणा।”
मीणा ने गुस्से से रिसीवर पटक दिया।
“शांत हो जाओ।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में कह उठा- “तुम जो हो, वो ही हो। किसी के कहने से तुम बदल नहीं जाओगे। मुझे यकीन है कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा ही हो।”
“यकीन है?”
“हां...।”
“तुम्हें कैसे यकीन है कि मैं मीणा...।”
“अब तक मैंने तुम्हें जितना पहचाना है, उस हिसाब से तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हो।”
“ये...ये बात तुम बाहर खड़े पुलिस वालों को बताओ कि...।”
“वो तुम्हारी नहीं सुन रहे तो मेरी कहाँ सुनेंगे।” देवराज चौहान मुस्कराया।
कुर्सी पर बैठा गुप्ता गर्दन उठाये दोनों को देखे जा रहा था।
देवराज चौहान, मीणा के कंधे पर हाथ रखे, मीणा को एक तरफ ले गया।
“एक बात बताओ।” देवराज चौहान गम्भीर था।
“क्या?”
“तुम्हें सब मरा हुआ क्यों मान रहे हैं?”
“ये कामराज और सावी की चाल है, तभी तो...।”
“कोई भी चाल इतनी गहरी नहीं हो सकती कि हर कोई तुम्हें पहचानने से इन्कार कर दे।”
“तुम्हारे सामने ही है, जो मेरे साथ हो रहा है।”
“तुमने ये जानने की कोशिश नहीं की कि सब तुम्हें मरा क्यों कह रहे...।”
“कोशिश क्या करनी है, मैं तो जानता हूँ कि मेरे खिलाफ साजिश रची जा रही है। कामराज पॉवरफुल पुलिसवाला है और सावी के साथ उसका चक्कर है। उसे पाने के लिए ही, कामराज ने साजिश रचकर मेरा पत्ता साफ किया। और वो अपनी कोशिश में पूरी तरह कामयाब भी रहा। मैं जिन्दा हूँ...और मुझे मरा माना जा रहा है।”
“जो भी हो, मुझे पूरा यकीन है कि तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो।” देवराज चौहान बोला।
“ये यकीन बाहर खड़े पुलिस वालों को होता। हर किसी को होता तो कितना अच्छा होता।”
“तुम ऐसा कुछ सोचो कि जिससे तुम दुनिया को इस बात का यकीन दिला...”
“बहुत कोशिश कर ली मैंने। तभी तो हार कर मैंने बैंक पर कब्जा कर लिया कि मेरी बात सब गम्भीरता से सुनेंगे। परन्तु लगता है ये सब करने का भी कोई फायदा नहीं हुआ...।” मीणा के चेहरे पर दर्द था- “सावी की दगाबाजी की वजह से ये सब हुआ है। वो ठीक होती तो कामराज ज़रा भी कामयाब नहीं हो सकता...।”
“तुम्हारा अन्तिम संस्कार किया गया...।”
“हाँ। सुना है मैंने कि हरामियों ने मेरे जीते जी मेरा अन्तिम संस्कार भी कर दिया है!” मीणा गुर्रा उठा।
“ये कैसे सम्भव है कि तुम जिन्दा हो और तुम्हारा अन्तिम संस्कार भी हो...”
“कैसे सम्भव है?” मीणा फाड़ खाने वाले स्वर में कह उठा- “सम्भव हो चुका है। तुम सब कुछ देख ही रहे हो कि मेरे साथ क्या हो रहा है! कामराज और सावी की साजिश से ही ये सम्भव हो गया है। मेरा वजूद ही उन्होंने गुम कर दिया। जीते जी मार दिया मुझे। जिसके पास भी मैं गया, किसी ने नहीं पहचाना मुझे। मैं तो हर...।”
“ये कैसे हो सकता है कि हर कोई तुम्हें मीणा मानने से इन्कार कर दे?”
“ये सब हो चुका है मेरे साथ...।” मीणा दाँत भींचकर बोला- “अब भी हो रहा है...।”
“तुम्हारा मतलब है कि हर कोई कामराज के इशारे पर ये सब कर रहा है?”
“हाँ...”
“मैं इस पर यकीन नहीं करता।” देवराज चौहान ने कहा।
“यकीन नहीं करते?” मीणा ने आँखें सिकोड़कर देवराज चौहान को देखा- “अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम्हें यकीन है कि मैं मीणा हूँ...”
“वो यकीन तो अब भी है, परन्तु ये यकीन नहीं कि कामराज के इशारे पर दुनिया तुम्हें पहचानने से ही इन्कार कर दे।”
“ये तो हो रहा है देवराज चौहान। ये तो...।”
“कुछ तो गड़बड़ है....।” देवराजे चौहान ने होंठ सिकोड़ कर कहा।
“गड़बड़?” मीणा भड़का- “तो अब तुम्हें मेरे इन्दर प्रकाश मीणा होने में गड़बड़ लगने...।”
“इस बात पर मुझे पूरा यकीन है कि तुम मीणा ही हो।”
“तो परेशानी कहाँ है?”
“यहाँ है कि तुम्हें कोई पहचान क्यों नहीं रहा? तुम पुलिस में सब-इंस्पेक्टर थे। इस नाते तो तुम्हें पहचाना जाना चाहिये। अब तुम कहो कि कामराज के इशारे पर कोई भी तुम्हें नहीं पहचान रहा तो ये मैं नहीं मानता।
“फिर तुम ही कहो कि मुझे क्यों नहीं पहचाना जा रहा?”
“ये मेरी समझ से बाहर है, और यहीं पर गड़बड़ है मीणा। ये समझ में आ जायेगा तो सब ठीक हो जायेगा।”
“अब मैं क्या करूँ देवराज चौहान?” मीणा गुस्से से कह उठा।
“मुझे सोचने का वक्त दो। ये उलझा मामला है।”
“ज़रा सी बात पर तुम्हारा दिमाग खराब हो गया-ये सोचो कि मेरा क्या हाल हो रहा होगा?”
“मैं समझ सकता हूँ। परन्तु तुम सब्र के साथ काम लो। अपने पर हर तरह का कंट्रोल रखो। कोई हल निकलेगा।”
“तब तक मैं पागल ना हो जाऊँ देवराज चौहान...।” मीणा रो देने वाले स्वर में कह उठा।
“इस वक्त तुम्हें बहुत सब्र से काम लेना होगा। ये तुम्हारे इम्तिहान की घड़ी है।”
मीणा गहरी सांस लेकर रह गया।
देवराज चौहान पलटा और दूबे की तरफ बढ़ गया।
तभी फोन बज उठा। गुप्ता ने फौरन रिसीवर उठाया।
“हैलो...”
“उससे मेरी बात कराओ।” दूसरी तरफ कमिश्नर पाटिल था।
गुप्ता ने मीणा को देखा।
मीणा उसे ही देख रहा था और इशारा पाकर गुप्ता के पास आ पहुँचा।
“बात कर लो। कमिश्नर है।”
मीणा ने रिसीवर लेकर बात की।
“कहो...।”
“सब-इंस्पेक्टर मीणा वाली बात छोड़कर, हम तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हैं।”
मीणा के होंठ भिंच गये।
“तुम बैंक में मौजूद लोगों को कुछ नहीं कहोगे। किसी की भी जान मत ले लेना।”
मीणा का दिल नहीं किया कुछ कहने का।
“तुम मुझे बताओ, जो भी चाहते हो। बैंक का पैसा चाहिये, तो बेशक वो ले जाओ।”
“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ और ये चाहता हूँ कि तुम सब ये बात मानो और कामराज-सावी को उनके किए की सजा दो। ये ही मेरी मांग है।” मीणा ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा।
“तुम समझते क्यों नहीं कि दुनिया जानती है कि मीणा मर चुका है।” पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“बकवास मत करो। मैं जिन्दा हूँ...।”
“तुम इस बात के अलावा जो भी कहोगे, तुम्हारी बात पूरी की जायेगी।”
“मेरी पहली और आखिरी ये ही मांग है।” मीणा ने कहा और रिसीवर रख दिया।
तभी गुप्ता कह उठा- “तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो और तुम्हें कोई भी सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं मान रहा?”
“तुम्हारी बीवी अच्छी है। नहीं तो तुम्हारा भी ये ही हाल होता।” मीणा ने थके स्वर में कहा।
“मुझे तुम्हारी हालत पर बहुत तरस आ रहा है। पुलिस वाले कहते हैं कि तुम मर गये हो...।”
“मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूँ न?”
“हाँ...।” गुप्ता ने सिर हिलाया।
“तो फिर मैं मरा कैसे हो गया?” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।
“तो सब ऐसा क्यों कह रहे हैं कि...।”
गुप्ता ने सिर हिलाया और दूर देवराज चौहान पर नजर मार कर बोला-
“वो भी तुम्हारे साथी हैं?”
“कौन?”
“वो जिससे तुम अभी उधर जाकर घुट-घुट कर बातें कर रहे थे।”
“नहीं, ये मेरा साथी नहीं, हम दो ही हैं।”
“लेकिन तुम तो उससे इस तरह बातें कर रहे थे कि जैसे उसे पुराना जानते हो।”
“ऐसा कुछ नहीं है।”
“फिर तुम उसे क्यों कह रहे थे कि बताओ, मैं आगे क्या करूँ?”
मीणा ने गुप्ता को देखा और नाराजगी से कह उठा- “तुम सवाल बहुत करते हो?”
“यूँ ही, अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए, पूछ रहा था।” गुप्ता मुस्करा पड़ा।
“चुप रहो। मैं पहले ही बहुत परेशान हूँ।”
“चाय पिओगे?”
“चाय, यहाँ?”
“बैंक में चाय बनाने का इन्तजाम है। मैं अभी बनवा देता ये इन्तजाम मैं अपने लिए रखता हूँ।” कहते हुए गुप्ता उठा और काऊंटर के पीछे बैठे बैंक के स्टॉफ से कह उठा- “मीणा साहब को चाय बना के दो।”
“पत्ती तेज हो...।” मीणा ने कहा।
“तेज पत्ती की चाय।” गुप्ता पुनः कह उठा।
“पांच-छ: कप बनवा लो। सब लग जायेगी।”
“इतना तो दूध नहीं है। तीन कप बन जायेगी।” फिर गुप्ता कह उठा- “तीन-चार कप जितनी बन जाये, बना लेना।”
देवराज चौहान, दूबे के पास जा पहुंचा था।
“क्या हो रहा है अब?” दूबे के स्वर में नाराजगी के भाव थे।
“पुलिस वाले उसे मीणा नहीं मान रहे।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “और ये बात तुमने पहले ही कह दी थी कि वो तुम्हें मीणा नहीं मानेंगे। तुमने पहले ही ये बात कैसे कह दी?”
“क्योंकि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है ही नहीं....।” दूबे तीखे स्वर में बोला
“ये बात तुम कैसे कह सकते हो?”
“क्योंकि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा साहब को पुराना जानता हूँ। वो ये नहीं है।”
“मेरा दावा है कि ये मीणा ही है। वो ही मीणा है।” देवराज चौहान ने दृढ़ स्वर में कहा।
“तुम पागल हो, जो उसकी बातों में आ गये।”
“मैं उसकी बातों में नहीं आया, बल्कि हालातों को समझ कर ये बात कह रहा हूँ।”
“बेवफूकी वाली बात मत कहो। मुझसे ज्यादा अच्छी तरह भला मीणा को कौन जानेगा!” दूबे ने टोपी को गालों पर खुजलाते हुए कहा- “ये साला कोई महागुरू चीज है। पहुँचा हुआ इन्सान है। अब इन बातों में कुछ नहीं रखा। तुम देख ही चुके हो कि कोई भी उसे मीणा नहीं मान रहा। क्योंकि वो मीणा नहीं है। वो...।”
“वो मीणा है।” देवराज चौहान ने दृढ़ता से कहा। दूबे ने देवराज चौहान को देखकर कहा- “छोड़ो इन बातों को कि वो है कि नहीं। इस वक्त वो तुम्हारी बात मान रहा है। तुम पर भरोसा कर रहा है। तुम उसे समझाओ कि समझदारी इसी में है कि पैसा लेकर चलता बने।”
देवराज चौहान सोचों में रहा।
“तुमने तो आज तक बहुत डकैतियां की हैं देवराज चौहान।” दूबे ने कहा।
“तो?”
“तुम्हें यहां के हालातों से इस बात का एहसास होगा कि यहाँ से दौलत को ले जाना आसान काम नहीं। बाहर पुलिस फैली है। सब की नजरें इधर ही हैं। पुलिस को जितना ज्यादा वक्त मिलेगा, वो हमें फांसने का उतना ही पक्का इन्तजाम करेगी। उसे समझाओ कि पुलिस को ज्यादा वक्त ना दे और नोटों को लेकर निकल जाने की सोचे।” दूबे गम्भीर था।
देवराज चौहान के चेहरे पर भी गम्भीरता थी।
“मैं तुमसे ये आशा रखता हूँ कि तुम उसे समझाओ...।”
“सोचने का वक्त दो मुझे।” देवराज चौहान ने कहा और जगमोहन की तरफ बढ़ गया।
जगमोहन कुर्सी पर बैठा था।
देवराज चौहान उसके बगल में पड़ी कुर्सी पर जा बैठा।
“क्या हुआ?” पूछा जगमोहन ने।
“पुलिस वालों ने इसे सब-इंस्पेक्टर मीणा मानने से इन्कार कर दिया है।” देवराज चौहान ने कहा।
“तो वो सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं होगा, तभी...।”
“वो सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही है।” देवराज चौहान ने दृढ़ स्वर में कहा।
जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा, फिर कहा- “तुम्हें यकीन है इस बात पर?”
“पूरी तरह...।”
“यकीन का आधार?”
“यकीन का आधार तुम्हें नहीं समझा सकता। परन्तु आधार मेरे मन में है कि ये मीणा ही है।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “ये मीणा न होता तो इस प्रकार कोशिश ना करता खुद को मीणा साबित करने की।”
“तो पुलिस ने क्यों नहीं माना?”
“नहीं जानता कि क्यों नहीं माना...।”
“कहीं ये दिमाग फिरा हुआ इन्सान तो नहीं, जो खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहा है?”
“मुझ पर यकीन करो, ये सब-इंस्पेक्टर मीणा ही है।”
“ऐसी बात है तो फिर ये सच ही कह रहा होगा कि इसकी पत्नी ने कमिश्नर कामराज से मिलकर साजिश रची...”
“ऐसी भी क्या साजिश कि इसे कोई भी ना पहचाने...।”
“क्या कहना चाहते हो?”
“बीच में कोई बात है जरूर, जो कि अभी तक किसी की समझ में नहीं आ रही...।” देवराज चौहान बोला।
“तुम्हारी बातें मुझे उलझन में डाल रही हैं।”
“मैं खुद उलझन में हूँ कि आखिर पूरी बात मुझे समझ में क्यों नहीं आ रही...”
“ये बैंक में डकैती डालने आया है या खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित करने?” जगमोहन ने पूछा।
“दोनों ही बातें हैं।”
“परन्तु ये अब बैंक का पैसा नहीं ले जा पायेगा। बाहर पुलिस ने घेराबन्दी कर ली है।
“लेकिन वो सोचता है कि वो ले जायेगा।”
“कैसे?”
“इस बारे में उसका प्लान उसके ही पास है। मुझे नहीं बताया।”
“तो उसे कह दो कि बाकी बातें छोड़कर दौलत ले जाने की तरफ ध्यान दे।”
“वो खुद को मीणा साबित करने की जिद्द में है।” देवराज चौहान बोला- “मुझे नहीं लगता कि कोई उसकी बात मानेगा। हैरानी तो ये है कि जो उसका साथी बन कर डकैती करने आया है, वो भी उसे मीणा नहीं मान रहा जबकि वो कहता है कि सब-इंस्पेक्टर मीणा को वो पुराना जानता है और ये मीणा नहीं है।”
“फिर तो ये मीणा नहीं होगा।” जगमोहन कह उठा।
“ये सब-इंस्पेक्टर मीणा ही है।” देवराज चौहान ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
“मुझे समझ नहीं आता कि तुम ये बात दावे के साथ क्यों कह रहे हो?”
“क्योंकि मीणा जो कह रहा है, हकीकत में कह रहा है। ड्रामा नहीं कर रहा। वो मुझे समझदार इन्सान लगता है, हर तरफ से। वो मीणा ही है। मैं उसे सब-इंस्पेक्टर मीणा मानता हूँ। परन्तु गड़बड़ कहीं पर तो है।” देवराज चौहान होंठ सिकोड़ कर कह उठा।
“तुम दो-तरफा बात कह रहे हो। उसे मीणा भी कह रहे हो और गड़बड़ होने की बात भी कह रहे हो।”
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा और सिग्रेट सुलगा ली। मीणा गुप्ता के पास ही कुर्सी पर फैला बैठा था। आँखें बंद कर रखी थीं। रिवाल्वर उसने टेबल पर रख दी थी। गुप्ता बार-बार टेबल पर पड़ी रिवाल्वर को देख रहा था। आखिरकार उसने मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया।
कुछ देर में बैंक की एक महिला कर्मचारी चाय बना लाई। छोटी सी ट्रे में तीन कप चाय थी।
“सारे दूध की मैंने चाय बना दी...।” महिला ने गुप्ता से कहा- “तीन ही कप बनी है।”
“थैक्यू मिसेज शर्मा...।” गुप्ता बोला- “इन्हें दो।” उसने मीणा की तरफ इशारा किया।
मीणा ने आंखें खोली और सीधा होकर बैठ गया। चाय का एक प्याला ट्रे से उठाकर बोला- “एक चाय मेरे साथी को दे दो और एक उसे।” मीणा ने
देवराज चौहान की तरफ इशारा किया।
“जी...।” मिसेज शर्मा ने थामे दूबे की तरफ बढ़ गई।
“तुम्हारे लिए चाय नहीं बची।” मीणा ने गुप्ता से कहा।
गुप्ता मुस्करा कर रह गया।
मीणा ने घूँट भरा।
“अब तुम क्या करोगे?” गुप्ता ने पूछा।
“मैं?” मीणा तीखे स्वर में बोला- “मैं कुछ नहीं करूँगा। सोचा नहीं।’
“बाहर पुलिस है।”
“परवाह नहीं, जब तक मेरे पास यहाँ लोग हैं, पुलिस कुछ भी नहीं कर सकती मेरे खिलाफ...।”
“वो तुम्हें मीणा मानने को तैयार नहीं...।”
“कुत्ते हैं साले। कामराज ने हर चीज पर काबू पा रखा है। साले ने मेरी जिन्दगी हराम कर दी।”
तभी कुत्ते वाली औरत, कुत्ता थामे पास आती दिखी।
मीणा ने चाय का घूँट भरा और उसे देखने लगा।
“हैलो मिस्टर मीणा...।” पास आकर वो बेहद प्यार से कह उठी। उसका कुत्ता मीणा के जूतों के आस-पास सूंघने लगा। मीणा उसे देखता रहा।
गुप्ता गर्दन उठाकर उसे देखने लगा था।
“प्लीज, मुझे डेट पर जाने दो। शाम तक मैं कठिनता से तैयार हो पाऊँगी। वक्त ज्यादा नहीं बचा। मिस्टर मैनेजर, वक्त क्या हुआ है?”
“तीन बजे हैं।” गुप्ता ने कहा।
“ओह, तीन बज गये। शाम सात बजे मुझे उससे मिलना है मीणा, प्लीज मुझे जाने दो। उसके बाद तुम कभी मेरे साथ डेट पर जाना चाहोगे तो मुझे फोन कर देना। मैं तुम्हें अपना फोन नम्बर दे देती हूँ...।”
गुप्ता ने उसे देखते हुए पुनः घूँट भरा।
“प्लीज...।” वो गहरी सांस लेकर बोली- “जाने दो ना!”
“तुम जैसी औरतों के यार ही कामराज जैसे होते हैं और भुगतना पड़ता है तुम जैसों के पति को... । जैसे कि मैं भुगत रहा हूं...” मीणा ने कड़वे स्वर में कहा- “चली जाओ मेरे पास से...।”
“मान जाओ ना...।” वो बेहद प्यार से बोली।
तभी दूर खड़े दूबे की आवाज आई- “ये डेट पर जाने को कह रही है तो इसे गोली मार दो।”
“ओह, नहीं! मुझे गोली मत मारना।” वो घबरा कर कह उठी- “अच्छा मेरे कुत्ते को भूख लग रही है। इसे खाने को कुछ दे दो। ये बेचारा भूख से मर जायेगा।”
“यहाँ कुछ भी नहीं है खाने को।”
“ये बिस्कुट खाता है। वो कुत्ते के खाने वाले बिस्कुट होते हैं ना, वो ही...”
“मैं बिस्कुट कहाँ से लाऊं?” मीणा झल्लाया- “तुम जाओ यहां से...”
वो सहमी सी कुत्ते के साथ वापस चल पड़ी।
मीणा ने गहरी सांस ली और चाय का घूँट भरा।
“तुम कब तक सब को यहाँ इस तरह रखोगे?”
“पता नहीं...।” मीणा उखड़े स्वर में बोला।
“यहां के लोग अब परेशान होना शुरू हो...।” गुप्ता की बात अधूरी रह गई।
फोन बज उठा था।
मीणा ने मुँह बनाकर फोन को घूरा, फिर कहा- “वो ही कुत्ता होगा...”
गुप्ता ने रिसीवर उठाया।
“हैलो...।” फिर ऊँचे स्वर में कह उठा- “मिसेज देसाई, तुम्हारे पति का फोन है।”
“आई...।” दूर से मिसेज देसाई की आवाज आई।
मीणा चाय पीता रहा। इधर-उधर नजरें दौड़ाता रहा। मिसेज देसाई ने रिसीवर लेकर बात की।
“हैलो...हाँ... यहाँ सब कुछ वैसा ही है... क्या तुमने अभी तक प्लेन की टिकट कैंसिल नहीं कराई...फिर हनीमून... तुम्हें अक्ल कब आयेगी? यहाँ डकैती पड़ रही है, बैंक पर डकैतों का कब्जा हैं और तुम हो कि प्लेन की टिकटें हाथ में पकड़े हनीमून की रट लगाए हुए हो। टिकटों को कैंसिल करा दो, बाद में कराओगे तो वो आधे से ज्यादा पैसा काट लेंगे...अभी मेरी वापसी का कुछ पता नहीं है, रात के खाने का इन्तजाम तुम ही करना... मेरे में हिम्मत नहीं है कुछ बनाने की... क्या...ये नहीं हो सकता। वो नहीं मान
रहा...बात करने का भी कोई फायदा नहीं...ठीक है, रुको एक मिनट...।” फिर मिसेज देसाई ने रिसीवर कान से हटाया और मीणा से बोली- “क्या तुम मुझे जाने दे सकते हो यहाँ से?”
मीणा ने चाय का आखिरी घूँट भर कर, प्याला टेबल पर रखा और मुस्करा पड़ा।
मिसेज देसाई को लगा कि वैसे वो हाँ कहने वाला है।
“मैंने तुम्हें जाने भी दिया तो बाहर खड़ी पुलिस तुम्हें नहीं छोड़ेगी।” मीणा बोला।
“नहीं छोड़ेगी, क्या मतलब?”
“पूछताछ के लिए पुलिस तुम्हें अपने पास रख लेगी। दस तरह के सवाल पूछेगी तुमसे। ये सब कुछ एक घंटा नहीं घंटों तक चलेगा। वो तुमसे पूछेगी कि भीतर क्या हो रहा है। क्यों हो रहा। हम क्या करने का इरादा रखते हैं। ऐसे ही सैंकड़ों सवाल, जिनसे तुम पागल हो जाओगी और तुम्हारे पास किसी भी बात का जवाब नहीं होगा। हनीमून को तो तुम बिल्कुल ही भूल जाओगी। अगर सुखी रहना चाहती हो तो अभी बाहर जाने की जरा भी ना सोचो।”
मिसेज देसाई का चेहरा उतर गया।
“तुम मुझे जाने दो, मैं पुलिस से निपट लूंगी।” मिसेज देसाई ढीले स्वर में कह उठी।
“नहीं। अभी यहाँ से कोई भी बाहर नहीं जायेगा।” मीणा ने दो टूक स्वर में कहा।
मिसेज देसाई ने नाराजगी भरे अन्दाज में रिसीवर पुनः कान से लगाया।
“तुम टिकटें कैंसिल करा दो। वो मुझे बाहर नहीं जाने दे रहा।” मिसेज देसाई ने कहा और रिसीवर रखकर वहाँ से चली गई।
गुप्ता ने मीणा को देखा।
“मुझे समझ नहीं आता कि हनीमून के नाम पर दूसरे शहर में जाकर रहने की क्या जरूरत है? जो वहां करना है, वो यहाँ भी किया जा सकता है।” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा।
“तुम भी तो गये थे, तुमने बताया था...।”
“हाँ, गया था। तब मुझे पता होता कि सावी दगाबाज औरत है तो मैं उसे तभी पहाड़ से फेंक देता।”
“ऐसी बात मत करो।” गुप्ता ने पहलू बदला।
“क्यों, तुम्हें क्यों तकलीफ हुई...?”
“तुम कौन होते हो किसी को सजा देने वाले? ऊपर वाला बैठा है ना, सबका हिसाब रखता...।”
“तो फिर ऊपर वाले ने मेरे साथ इन्साफ क्यों नहीं किया? तुम देख नहीं रहे कि मेरे साथ क्या हो रहा है?” मीणा नाराजगी से बोला।
“इन्साफ करेगा ऊपर वाला।” गुप्ता ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
“तुम तो ऐसे कह रहे हो कि ऊपर वाले के तार जैसे तुमसे ही जुड़े हुए हैं और वो सब कुछ बताता रहता है तुम्हें...।”
“भरोसा रखो। ऊपर वाला इन्साफ जरूर करेगा। मैं तुम्हें कोई सलाह दूं...?”
“दो....”
“तुम खुद को पुलिस के हवाले कर दो...।”
“पागल हो! कामराज के इशारे पर मेरा ऐसा बुरा हाल हो जायेगा कि तुम मुझे कभी पहचान नहीं सकोगे।”
“मैंने कहा है ना कि ऊपर वाला इन्साफ करेगा। तुम ही सारे काम निपटा लेने की मत सोचो। खुद को पुलिस के हवाले करके, ये सब खत्म कर दो। तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो तो तुम्हें पहचाने जाने का कोई रास्ता भी सामने आ जायेगा।”
“तुम मेरा दिमाग खराब करने की कोशिश कर रहे हो मैनेजर...” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।
“मेरी बात बुरी लगी हो तो माफी मांग लेता हूँ... “
“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और वो मान नहीं रहे। कोई भी नहीं मान रहा। मेरे जीते जी कामराज मेरी पत्नी से शादी कर रहा...”
तभी टेबल पर पड़ा फोन बजने लगा।
गुप्ता ने फौरन रिसीवर उठा कर बात की। फिर रिसीवर मीणा की तरफ बढ़ाया।
“लो, बात करो...”
मीणा ने रिसीवर लिया और कान से लगाते उखड़े स्वर में कह उठा- “अब क्या है?”
“तुम्हारे पत्नी तुमसे बात करने आ रही है।” कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“वो बात करने आ रही है, मुझसे?” मीणा के चेहरे पर राहत के भाव उभरे
“हाँ...।”
“तो अकल ठीक हो गई उसकी...।”
“वो कुछ देर में मेरे पास पहुँचने वाली है। अपने फोन पर मैं तुमसे बात करा दूंगा।”
“अब तो तुम मानते हो ना कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”
दो पल की खामोशी के बाद कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी- “नहीं मानता। ये बात मैं मान ही नहीं सकता।”
“आखिर क्यों?”
“जब तुम्हारी पत्नी तुमसे बात करेगी तो, पता चल जायेगा तुम्हें।”
“ठीक है। देख लेता हूँ कि वो ऐसी क्या बात करने वाली है।” मीणा बोला- “तब तक तुम एक काम करो।”
“कहो...।”
“कुत्ते के खाने वाले बिस्कुट चाहिये।”
“कुत्ते के खाने वाले? कौन खायेगा इसे?”
“कुत्ता ही खायेगा, मैं तो खाने वाला नहीं!” मीणा ने व्यंग्य भरे स्वर में कहा- “बैंक की एक ग्राहक, अपने साथ कुत्ता भी ले आई थी। वो भीतर ही है। उसके कुत्ते को भूख लग रही है। कुत्ते को बिस्कुट चाहिये।”
“ठीक है, कुछ और भी चाहिये... तो बता दो।”
“कुछ और....क्यों मैनेजर।” मीणा ने गुप्ता से पूछा- “खाने-पीने का सामान मंगवा लूं?”
“मंगवा लो। तुम पता नहीं कितना वक्त लगाओगे अभी...” गुप्ता ने कहा।
“कमिश्नर।” मीणा बोला- “खाने-पीने का सामान भी भिजवा दो। नमकीन, बिस्कुट, गर्म समोसे, कोल्ड ड्रिंक, इसके अलावा और जो भी तुम ठीक समझो। सामान का ‘बिल’ दे देना। मैं तुम्हें पैसे दे दूंगा।’
“उसकी फिक्र करने की तुम्हें जरूरत नहीं...।”
“सामान को बैंक के कैंची गेट के बाहर सीढ़ी पर रखा जायेगा। समझ गये।”
“ऐसा ही होगा।”
“मेरी पत्नी कितनी देर तक आ जायेगी?”
“पन्द्रह बीस मिनट में...।”
“ठीक है, अब उसके आने पर ही मुझे फोन करना।” मीणा ने कह कर रिसीवर रख दिया।
गुप्ता मुस्करा कर कह उठा- “तुम्हारी पत्नी आ रही है। तुमसे बात करेगी। अब शायद मामला सुलझ जायेगा।”
“कमिश्नर की बात से लगा जैसे सावी मुझे कुछ खास कहना चाहती है।”
“मैंने कहा था ना कि ऊपर वाला इन्साफ करता है।” गुप्ता बोला।
“लेकिन वो कमिश्नर अभी भी कहता है कि मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं हूँ।” मीणा उलझा सा कह उठा।
“सब ठीक हो जायेगा। धीरे-धीरे...।”
मीणा उठा और देवराज चौहान की तरफ बढ़ गया।
“इधर आ...।” दूबे ने उसे आवाज लगाई।
मीणा दूबे के पास जा पहुंचा।
“बोल... ।”
“क्या हुआ? अब किसका फोन था? दूबे ने धीमे स्वर में पूछा।
“उसी कमिश्नर का। वो कहता है कि सावी मुझसे बात करने आ रही है।” मीणा ने गहरी सांस लेकर कहा।
“वो तेरे से बात करके क्या करेगी?”
“मुझे क्या पता-वो आ रही है तो बात करने में...।”
“क्या वो बैंक में आकर बात करेगी?”
“फोन पर। कमिश्नर अपने फोन पर उससे बात करायेगा।”
“गुरू, तू ये सारे पंगे छोड़ और पैसा लेकर निकल ले...।”
“अंत में तो मैंने ये ही करना है...।”
“सावी से बात करना छोड़ दे। बाहर खड़ी वैन में डेढ़ सौ करोड़ रख और...।”
“मुझे खुद इन्दर प्रकाश मीणा साबित कर...।”
“क्या होगा ये सब करने का? वैसे भी ये गारण्टी मैं तुझे देता हूं कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है, दौलत ले और...।”
“तू खुजैला कुत्ता है।” मीणा ने गुस्से से कहा।
“तू होगा...”
होंठ भींचे मीणा वहाँ से हटा और देवराज चौहान के पास पहुँच कर बोला- “सावी, मुझसे बात करने आ रही है।”
देवराज चौहान ने गम्भीर निगाहों से उसे देखा।
“कमिश्नर अपने फोन पर सावी से मेरी बात करायेगा।” मीणा ने पुनः कहा।
“तुम्हारे लिए खतरा बढ़ रहा है।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।
“क्या मतलब?”
“पुलिस वाले तुम्हारी पत्नी द्वारा तुम्हें फंसाने के फेर में हो सकते हैं। उसकी बातें तुम्हें आत्मसमर्पण के लिए भी मजबूर कर सकती हैं। वो जो भी कहेगी, वो पुलिस वालों ने ही उसे समझाया होगा।” देवराज चौहान बोला।
“मैं उस कमीनी की बातों में फंसने वाला नहीं।” मीणा ने दाँत भींचकर कहा- “उसकी वजह से मैंने बहुत तकलीफें उठाई हैं।”
“तुम मेरी राय लेना चाहोगे?” देवराज चौहान गम्भीर था।
“क्यों नहीं...”
“जिस काम में तुम लगे हुए हो, खुद को मीणा साबित करने वाले काम में, इस काम को छोड़ो और बैंक का पैसा ले जाने की सोचो।”
मीणा ने दाँत भींच लिए।
“अगर मेरी बात तुमने ना मानी तो बुरे हालातों में फंस जाओगे।”
मीणा होंठ भींचे देवराज चौहान को देखता रहा, फिर बोला- “तुम चाहते हो कि मैं कामराज और सावी की साजिश के सामने हार जाऊँ?”
“इसे हारना नहीं कहते-वक्त के साथ खुद को ढालना कहते हैं।”
“मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और ये बात कोई मान नहीं...।”
“मैं मान रहा हूँ कि तुम मीणा ही हो।” देवराज चौहान कह उठा- “इस वक्त किसी की बात पर मत जाओ। सिर्फ मेरी बात सुनो। कसम से, मैं सच कह रहा हूँ कि तुम सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश ही हो। मैंने तुम्हें सही पहचाना है।”
“तो फिर ये बात बाकी क्यों नहीं पहचान...।”
“दूसरों की बात छोड़ दो।” देवराज चौहान गम्भीर था- “मेरा ख्याल है कि इस वक्त तुमने गलत राह पकड़ रखी है कि बैंक पर कब्जा करके खुद को मीणा साबित करने की कोशिश करना। ये राह तुम्हें जेल में पहुँचा देगी।”
“मैं जेल नहीं जाना चाहता।”
“तो तुम्हें चाहिये कि दौलत को ले जाने के बारे में सोचो।”
“पर मैं एक बार सावी से बात जरूर करूँगा। वो मुझसे बात करने आ रही है।”
“कर लेना। तब तक बाकी काम कर लो। डेढ़ सौ करोड़ की दौलत कहाँ है?”
“नीचे, बैंक के बेसमेंट में। वहीं स्ट्रांग रूम है। मैनेजर ने बताया था।” मीणा बोला।
“किस में रखी हुई है दौलत?”
“बड़े-बड़े मजबूत थैलों में। शायद छः या पाँच थैले हों।”
“दौलत को नीचे से ऊपर लाने का इन्तजाम करो।”
“समझ गया...।”
“अपनी हर तरफ की तैयारी रखो, क्या पता कब निकलना पड़ जाये।”
“मैं ऐसा ही करता हूँ...।”
“अब एक बात बताओ...।” देवराज चौहान ने कहा।
“क्या?”
“तुम्हारा प्लान क्या है। दौलत को कैसे यहाँ से ले जाओगे?” मीणा ने देवराज चौहान को देखा।
“बाहर पुलिस है। वो तुम्हें आसानी से जाने नहीं देगी।
मीणा के चेहरे पर कड़वी मुस्कान फैल गई। बोला- “मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ और पुलिस के लटके-झटके बाखूबी जानता हूं। मैंने सब सोच रखा है।”
देवराज चौहान उसे देखता रहा।
जगमोहन के होंठ सिकुड़ गये थे।
“क्या सोच रखा है तुमने?” देवराज चौहान ने पूछा।
“तुम क्यों पूछ रहे हो?” “इसलिये कि अगर तुमने गलत सोच रखा है तो उसे ठीक कर दूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम सफल रहो।”
“तुम मेरे लिए इतनी अच्छी बात कैसे सोच सकते हो?” स्वर में शंका थी।
“क्योंकि मैं डकैतियां करता हूँ। जानता हूँ कि बहुत मेहनत लगती है इस काम में। हर समय जान हथेली पर रखकर चलना पड़ता है। क्योंकि जरा सी चूक हुई और खेल खत्म।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में कह रहा था- “तुम शरीफ इन्सान हो। डकैती जैसा काम करना तुम्हारे बस का नहीं है। अपनों की ही तकलीफ का खामियाजा तुम भुगत रहे हो। ऐसे में मैं अवश्य चाहूंगा कि कम से कम तुम दौलत ले जाने में सफल रहो।”
“मेरी दौलत पर तुम्हारा, हाथ डालने का तो इरादा नहीं है?”
“नहीं।” मुस्करा पड़ा देवराज चौहान- “मैंने पहले भी कहा है कि मैं इस तरह दौलत हासिल नहीं करता। मैं सच्चे मन से तुम्हारी सहायता करने की कोशिश कर रहा हूँ...”
“जो लेंगे, मांग के लेंगे। धोखा नहीं देंगे।” जगमोहन जल्दी से कह उठा।
मीणा ने जगमोहन को घूरकर देखा, फिर कहा- “तुम तो अपना मुँह बंद रखो।”
“मेरे से क्यों खुन्दक खा रहे हो।” जगमोहन आहत स्वर में कह उठा।
“क्योंकि तुम्हारे मन में शुरू से ही है कि मेरे से नोटों को झाड़ सके।”
“तो क्या हो गया? मैं ईमानदारी से ये सब करने की कोशिश कर रहा हूँ...”
“सुना नहीं तुमने कि चुप रहो।”
जगमोहन गहरी सांस लेकर दूसरी तरफ देखने लगा
मीणा ने देवराज चौहान को देखा।
“बताओ, यहाँ से निकलने का तुम्हारा प्लॉन क्या है?” देवराज चौहान ने पूछा।
दो पल चुप रह कर मीणा कह उठा- “बाहर वैन खड़ी है। मैं सारे पैसे को वैन पर रखकर निकल जाऊँगा। दूबे यहीं रहेगा।”
“क्यों?”
“ताकि मैं निकल सकूँ। बैंक के लोग दूबे के निशाने पर होंगे कि अगर पुलिस मेरा पीछा करने या मुझे रोकने, पकड़ने की कोशिश करे तो बंधकों को गोली मारने की बात कह कर उन्हें रोका जा सके।”
“हूँ। ये प्लान अच्छा है। तुम दौलत के साथ निकल जाओगे पुलिस पीछे नहीं आयेगी। पर दूबे का क्या होगा?”
“दूबे बाद में यहाँ से निकल जायेगा।”
“कैसे?”
“दूबे ने पन्द्रह आदमियों को तैयार रखा हुआ है। उसे जब यहाँ से निकलना होगा तो दूबे फोन पर उन्हें कर देगा कि बाहर खड़े पुलिस वालों पर हमला कर दो। वो ऐसा करेंगे तो इसी आड़ में भगदड़ में दूबे निकल जायेगा।”
“ऐसा हो जायेगा?”
“क्यों नहीं होगा?”
“दूबे वाला प्लान कच्चा है। इस तरह वो पकड़ा जा सकता है-या फिर मारा भी जा सकता है।
मीणा ने नजरों को घुमाकर दूर खड़े दूबे को देखा।
“दूबे खुद निपट लेगा।” मीणा शांत स्वर में बोला- “अब प्लान बदला नहीं जा सकता।”
“ये तुम जानो। परन्तु दूबे यहाँ से निकलने का प्लान कच्चा है।”
मीणा ने देवराज चौहान को देखकर कहा- “तो अब मैं नीचे से दौलत को ऊपर लाने का इन्तजाम करूँ?”
“हाँ। तुम्हारी यहां रहना खतरे से खाली नहीं। तुम्हें यहाँ से निकल जाना चाहिये।”
“मुझे इस बात का अफसोस रहेगा कि मैं खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा साबित नहीं कर सका। सावी और कामराज कामयाब रहे...”
“तुम सब-इंस्पेक्टर मीणा हो। मैं इस बात का दावा कर सकता हूं। दुनिया की परवाह मत करो। दुनिया रिश्तों के दम पर नहीं, नोटों के दम पर चलती है। तुम डेढ़ सौ करोड़ ले जाने में सफल रहे तो शानदार जिन्दगी बिता सकोगे।”
मीणा ने गहरी सांस ली।
“यहाँ पर ज्यादा देर रह कर खुद को फंसाओ मत। पुलिस मौका ढूंढ रही है तुम्हें पकड़ने का। नोट लो और भाग लो यहां से। कहीं दूर जाकर तुम इन्दर प्रकाश मीणा के नाम से जिन्दगी शुरू कर सकते हो। वैसे समझदारी इसी में है कि इस नाम को छोड़कर कोई नया नाम इस्तेमाल में लाना। तब तुम ज्यादा सुरक्षित रहोगे।”
“मैं पैसा ऊपर लाने का इन्तजाम करता हूँ...।” मीणा ने कहा और वहाँ से हटकर दूबे से ऊँचे स्वर में कह उठा- “डेढ़ सौ करोड़ को ऊपर लाने का इन्तजाम करने जा रहा हूँ...।”
“ये बढ़िया खबर है।” दूबे टोपी वाला गाल खुजलाता कह उठा- “नोट लेकर जाने की सोच ली तुमने?”
“शायद ये ही ठीक रहेगा।” मीणा ने सिर हिलाकर गम्भीर स्वर में कहा।
“तुमने मेरी बात नहीं मानी। शायद देवराज चौहान ने ये सब समझाया होगा तुम्हें....”
मीणा मैनेजर के पास पहुंचा।
कुर्सी पर बैठा गुप्ता गर्दन उठाकर मीणा को देखने लगा था।
“मैनेजर!” मीणा उसके पास पड़ी कुर्सी पर बैठता कह उठा- “वो डेढ़ सौ करोड़ यहाँ लाना है...।”
“ओह, तो तुम पैसा लेकर जा रहे हो?” गुप्ता के होंठों से निकला
“हाँ, मैंने सोच लिया है कि बाकी बातें भाड़ में जायें, मुझे पैसा लेकर चले जाना चाहिये.....”
“तुम्हारी पत्नी तुमसे बात करने आ रही... “
“कर लूंगा बात। मैं कौन सा दस मिनट में निकल जाऊँगा। सारा पैसा ऊपर लाने में और वैन में रखने में काफी वक्त लगेगा। तब तक सावी बाहर पहुँच जायेगी और कमिश्नर मेरे से बात करा देगा।”
गुप्ता ने सिर हिला दिया।
“तुम पैसे को ऊपर लाने का इन्तजाम करो।”
“मैं?”
“हाँ। अपने स्टॉफ की सहायता लो। नोटों से भरे थैलों को वे ऊपर लेकर आयें। ये काम जल्दी से जल्दी पूरा करने की कोशिश करो। मैंने बहुत वक्त खराब कर लिया।” मीणा सर हिलाकर कह उठा।
“लेकिन बाहर तो पुलिस है, तुम नोटों और अपने साथी के साथ कैसे...”
“मैं जा रहा हूँ नोट लेकर, मेरा साथी नहीं...।” मीणा ने तीखे स्वर में गुप्ता से कहा- “मेरा साथी तुम सब लोगों को निशाने पर रखेगा कि अगर पुलिस मुझे पकड़ने या मारने की चेष्टा करे तो, मेरा साथी यहाँ तुम सब को मार दे। ये बात तुम कमिश्नर से कह देना, जब उसका फोन आये। समझ गये?”
गुप्ता ने सिर हिला दिया।
“वैसे मैं अपने साथ एक को बंधक बनाकर ले जाऊँगा।
ये सब बातें पुलिस को बता देना।”
गुप्ता ने पुनः सिर हिलाया। हो
“उठो अब. नोटों के थैलों को ऊपर लाने का इन्तजाम करो। सारे स्टॉफ को नीचे ले चलो। मैं भी तुम लोगों के साथ चलता हूँ। जाते वक्त तुम्हें पाँच लाख दे जाऊँगा मैनेजर। तुम अच्छे इन्सान हो।”
“पाँच लाख!” गुप्ता के होठों से निकला।
“दस दे दूंगा...”
“लेकिन मैं करूँगा क्या उस पैसे का? ये तो बैंक का पैसा है।” गुप्ता के होंठों से निकला।
“मतलब कि तुम इस पैसे को नहीं ले सकते?”
“नहीं...।”
“तो फिर नहीं दूंगा।” मीणा उठ खड़ा हुआ- “खड़ा हो, जल्दी कर।”
गुप्ता उठा और काऊंटर के पीछे कुर्सियों पर बैठे बैंक के स्टाफ से बोला- “तुम सब हमारे साथ नीचे चलो। डेढ़ सो करोड़ के थैले ऊपर लाने हैं...”
सब तुरन्त उठने लगे।
मिसेज देसाई उसी पल कह उठी- “मिस्टर मीणा, क्या तुम पैसा लेकर जा रहे हो?”
“हाँ। अब मैंने यहाँ से निकल जाने का फैसला कर लिया है।” मीणा ने कहा।
“ओह, ये तो अच्छी खबर है। मैं अपने पति को फोन कर दूं कि वो टिकटें कैंसिल न कराये। मैं आ रही हूँ...।” मिसेज देसाई ने प्रसन्नता भरे स्वर में कहा और जल्दी से उस फोन वाली टेबल के पास आ पहुंची।
“कोई फायदा नहीं फोन करने का।” मीणा बोला- “क्योंकि मैं जा रहा हूं। मेरा साथी यहीं रहेगा।”
“बाद में वो भी तो जायेगा।” मिसेज देसाई ने कहा।
“तब तक तुम्हारे हनीमून की फ्लाइट निकल चुकी होगी।”
“ओह...।” मिसेज देसाई का चेहरा उतर गया।
“मिसेज देसाई!” गुप्ता कह उठा- “स्ट्रांग रूम में चलो। सारा पैसा सबने ऊपर लाना है।”
मीणा उनके साथ नीचे आने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
जगमोहन झल्ला कर देवराज चौहान से कह उठा- “तुमने उसे क्यों नहीं कहा कि मैं भी साथ में काम पे लग जाता...”
“तुम हर वक्त पैसे के बारे में मत सोचो।” देवराज चौहान ने उसे देखा
“समझा करो-मुफ्त में बीस-पच्चीस करोड़ मैं उससे झाड़ लूंगा।” जगमोहन ने झल्ला कर कहा।
देवराज चौहान ने घूर कर जगमोहन को देखा।
जगमोहन ने दूसरी तरफ मुँह फेर लिया।
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली।
तभी दूबे पास आया और देवराज चौहान से आभार भरे स्वर कह उठा।
“मैं यही चाहता था कि तुम मेरी बात मान कर उसे समझाओ और तुमने उसे समझा दिया...।”
“मैंने तुम्हारे कहने पर उसे नहीं समझाया।” देवराज चौहान बोला- “हालात ही ऐसे बन रहे हैं कि अब यहाँ काम करके निकल जाना चाहिये। यहाँ रुकना खतरनाक है।”
“ये ही तो मैं कब से कह रहा हूँ।” दूबे की आवाज में प्रसन्नता थी। वो अपना गाल खुजलाने लगा।
मीणा, गुप्ता और बैंक वालों के स्टॉफ के साथ बेसमेंट की सीढ़ियां उतर रहा था।
वो नीचे उतर कर, नजरों से ओझल हो गये।
लाल उसी पल कुर्सी से उठा। टांग को दो-तीन बार झटका दिया और चहल कदमी करने लगा।
देवराज चौहान सोचों में डूबा कश लेने लगा था।
दूबे रिवाल्वर थामे वापस अपनी जगह पर पहुँच गया था। कुत्ते वाली औरत शान्ति के साथ कुर्सी पर बैठी थी कि दूबे से कह उठी- “मेरे कुत्ते के लिये बिस्कुट नहीं आये...। ये भूखा मर जायेगा।
“देखता हूँ...।” कह कर दूबे कैंची गेट की तरफ बढ़ गया।
वहाँ से बाहर की सीढ़ियों पर देखा, कोई सामान नहीं था बाहर, तो दूबे पलट कर ऊँचे स्वर में कह उठा- “अभी तक कोई सामान नहीं आया।”
तभी फोन की बेल बजने लगी
दूबे ने फोन को देखा, फिर देवराज चौहान को।
देवराज चौहान दूबे को देखने लगा था।
“मैं पुलिस वालों से बात नहीं करना चाहता। तुम बात करो...।” दूबे ने कहा।
देव चौहान कुर्सी से उठा और फोन की तरफ बढ़ गया। फोन बजे जा रहा था।
“मेरे कुत्ते के लिए बिस्कुट पूछना...।” कुत्ते वाली औरत कह उठी।
पास पहुँचकर देवराज चौहान ने रिसीवर उठाया।
“हैलो...।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा। पल भर की खामोशी के बाद कमिश्नर पाटिल की आवाज कानों में पड़ी।
“तुम कौन हो? मैनेजर गुप्ता कहाँ है?”
“वो व्यस्त है, तुम जो कहना चाहते हो, कहो...।”
“कहीं उसे तुम लोगों ने मार तो नहीं...।”
“मैं उन लोगों में से नहीं हूँ। बंधकों में से हूं। मैनेजर और वो लोग इस वक्त किसी काम में व्यस्त हैं।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“मुझे अपना नाम बताने पर मनाही है। सुना तुमने!” देवराज चौहान बोला- “कोई बात है तो करो, नहीं तो फोन रख दो।”
“खाने-पीने का सामान बैंक के गेट के बाहर सीढ़ियों पर रखा जा रहा है। भीतर से उन पर गोली मत चलाए कोई...।”
“समझ गया।” देवराज चौहान ने कहा और रिसीवर रख कर दूबे से बोला- “वो बाहर सामान रख रहे हैं।”
“ठीक है।”
“तुमने पूछा नहीं कि उस सामान में कुत्ते वाले बिस्कुट हैं कि नहीं?” कुत्ते वाली औरत कह उठी।
देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा और कुर्सी की तरफ बढ़ गया।
“मर्द तो मेरे से बात करने को मरते हैं और तुम हो कि मेरी बात का जवाब नहीं दे रहे।” वो मुँह बनाकर बोली।
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