हरीचंद ने हवेली का फाटक थपथपाया।

भीतर वालों ने फाटक की छोटी-सी खिड़की से बाहर देखा फिर थोड़ा-सा फाटक खोल दिया। हरीचंद ने मोना चौधरी को साथ लिए भीतर प्रवेश किया।

"जल्दी कर लाजो। रात का खाना तैयार करना है।" हरीचंद बोला--- "पहले ही देर हो गई है।"

सिर पर पल्लू लेते हुए मोना चौधरी, चाल को बूढ़ी बनाती हुई आगे बढ़ी।

"रुक।" वहां मौजूद दो में से एक व्यक्ति ने कहा।

मोना चौधरी ठिठकी। उसने डरी-डरी निगाहों से दोनों को देखा।

"इसे लाया है खाना बनाने के लिए।" एक ने मोना चौधरी को सिर से पांव तक देखा।

"हां। बहुत कठिनता से आने को तैयार हुई है। आदमी बीमार है इसका। अच्छे पैसे दे देना।" हरीचंद ने कहा।

"गांव में रहती है।"

"हां। मेरे घर से आठ घर छोड़कर रहती है। चल लाजो।"

हरीचंद मोना चौधरी को लेकर आगे बढ़ गया।

मोना चौधरी की निगाह हर तरफ घूम रही थी।

छः-सात व्यक्ति वहां नजर आए, जो निगरानी वाले ढंग से वहां टहल रहे थे। दो के हाथ में गन भी थी। मोना चौधरी जानती थी कि बाकी सब भी हथियारबंद होंगे। हवेली के मुख्य दरवाजे के सामने बहुत बड़ी खुली जगह में, खूबसूरत बाग बनाया हुआ था। कई तरह के फूल खिले हुए थे। तरह-तरह के पौधे लगे हुए थे। पेड़ भी थे, जो कि अभी छोटे ही थे।

हर तरफ अच्छी तरह साफ-सफाई की हुई थी।

साफ-सुथरा रास्ता फाटक से, हवेली के दरवाजे तक जा रहा था। बहुत बड़ी और खुली जगह में थी वो हवेली। हवेली के गिर्द घूमने के लिए खुली जगह थी और काफी फासले पर जाकर चारदीवारी की शुरूआत होती थी। तीन मंजिला थी हवेली। करीब तीन-चार सौ साल पहले की बनी लग रही थी। दीवारें बड़े-बड़े पत्थरों की थीं। दरवाजे और खिड़कियों की चौखट इतनी मोटी लकड़ी की थी कि देखते ही बनती थी। वैसे ही मोटे-मोटे पल्ले कि दरवाजा-खिड़की बंद होने पर उन्हें तोड़ पाना, आसान काम नहीं था।

मुख्य दरवाजे के पास पहुंचे तो वहां गन लिए आदमी ने मोना चौधरी को घूरा।

"कौन है तू?" उसने तीखे स्वर में पूछा।

"ला-लाजो।" मोना चौधरी ने अपने स्वर में घबराहट भर ली।

"खाना बनाने के लिए लाया हूं। मेरा हाथ बंटायेगी।"

"हूं। समझा दिया है इसे।" वो पहले जैसे स्वर में बोला।

"क्या?"

"यहां की कोई बात बाहर न करे।"

"सब समझाकर लाया हूं। बेचारी का पति बीमार है। दवा-दारू के लिए पैसे नहीं हैं। ये किसी से बात नहीं करेगी। बहुत समझदार है। कुछ पैसे दे देना कि अपने पति का इलाज करवा सके।" हरीचंद ने सिफारिशी स्वर में कहा।

"ठीक है। ठीक है। खाना बनाने को तैयार करो। अंधेरा होना शुरू हो गया है।"

दोनों भीतर प्रवेश कर गए।

हवेली का ड्राइंगरूम बहुत बड़ा था। उसकी सजावट पर लाखों का खर्च किया हुआ था। बाहर से हवेली जितनी पुरानी लगती थी। भीतर की शानो-शौकत उतनी ही जवान थी।

एक आदमी वहां भी मौजूद था।

"ले आये खाना बनाने वाली को।" उसने मोना चौधरी पर निगाह मारी।

"हां। बहुत मुश्किल से मानी है आने को।" कहने के बाद हरीचंद ने मोना चौधरी से कहा--- "लाजो, साहब को सलाम मारो। यही पैसे देते हैं बता देना, आदमी बीमार है। पैसे की सख्त जरूरत है।"

"स-सलाम साहब।" मोना चौधरी घबराए स्वर में कह उठी।

उसने सिर हिलाया।

"पैसे की फिक्र मत करो। मिल जाएंगे।"

उसके बाद हरीचंद हवेली के कुछ रास्तों से गुजरकर किचन में पहुंचा। वो किचन क्या अच्छा-खासा बड़ा कमरा था। इतनी बड़ी हवेली का ऐसा किचन होना लाजमी था। शैल्फ़ें बनी हुई थीं। ढेरों बर्तन लगे थे। जरूरत का हर सामान, आवश्यकता से अधिक मौजूद था।

"सुनो।" हरिचंद ने धीमे स्वर में कहा--- "अभी खाना तैयार करना है और वो जो पैसा देता है, वो हवेली में घूमता रहता है। इधर भी आता है। तुम किसी काम में लग जाओ कि वो आए तो उसे शक न हो।"

"मुझे सब्जी दे दो काटने के लिए।" मोना चौधरी बोली।

इस तरह मोना चौधरी काम में व्यस्त हो गई।

हरीचंद फुर्ती के साथ खाना बनाने की तैयारी करने लगा।

"जब मैं छोटा था।" हरीचंद कहने लगा--- "तो माँ कहा करती थी, खाना बनाना सीख लो। वक्त का पता नहीं चलता, कब क्या चीज काम आ जाए। बांह पकड़-पकड़कर माँ ने खाना बनाना सिखाया। तब मैं सोचता था, माँ का दिमाग खराब हो गया है। लेकिन अब लगता है माँ ने ठीक किया, खाना बनाना सिखाकर। सीखा हुआ कोई भी काम फिजूल नहीं जाता ।"

मोना चौधरी धीमे स्वर में बोली।

"छत पर कितने आदमी हैं?"

"दो आदमी वहां रहते हैं, बंदूकें पकड़कर।" हरीचंद ने धीमे स्वर में कहा--- "मालूम नहीं ये लोग कब नींद लेते हैं। मैं तो इन्हें हर वक्त घूमते ही देखता हूं। पता नहीं क्या करते हैं।"

"जब से तुम यहां आए हो। कभी तो कोई बाहर से आया होगा?"

"एक भी नहीं आया। जरूरत पड़ने पर इनमें से सिर्फ एक ही बाहर जाता है और किचन का खाने-पीने का सामान ले आता है। वो भी तीसरे-चौथे दिन।"

"ये लोग आपस में क्या बात करते हैं।"

"कुछ खास नहीं। मैंने इन लोगों को न के बराबर बात करते देखा है।"

तभी वही आदमी भीतर आया।

"लाजो, जल्दी कर।" जूतों की आहट कानों में पड़ते ही हरीचंद ऊंचे स्वर में कह उठा--- "जल्दी हाथ चला। साहब लोगों को वक्त पर खाना देना है। आज तो देर हो ही जाएगी।"

"मैं अभी सब्जी चढ़ा देती हूं।" मोना चौधरी ने अपनी आवाज को कमजोर-सी बनाकर कहा।

"किसी चीज की जरूरत तो नहीं?" आने वाले आदमी ने पूछा।

"नहीं साहब जी। सब कुछ मौजूद है। हरीचंद ने काम में व्यस्त कहा।

तभी एक और आदमी भीतर आया और पहले वाले से बोला।

"अंधेरा हो गया है। तारों में करंट 'ऑन' कर दें?"

"हां। हवेली की लाइटें कम ही रोशन करना जैसे कि रोज करते हैं। मैं नहीं चाहता, लाइटें देखकर, दूसरों की निगाहों में, हवेली में मौजूद लोगों के बारे में पता चले।"

"ठीक है।" उस व्यक्ति ने मोना चौधरी पर निगाह मारी--- "बलराम। इस औरत को समझा देना कि यहां की बातें...।"

"समझा दिया है।" बलराम ने कहा।

वो व्यक्ति बाहर निकल गया।

उसके पीछे-पीछे बलराम भी चला गया।

उनकी बातों से मोना चौधरी समझ चुकी थी कि हवेली की चारदीवारी पर जो कांटेदार तारें लगी हैं, उनमें अंधेरा होते ही, करंट चालू कर दिया जाता है। सुरक्षा के ऐसे और भी कई इंतजाम होंगे, जिनके बारे में उन्हें जानना होगा। वरना कभी भी भूल से फंस सकती है।

■■■

दो घंटे में ही खाना बन गया।

मोना चौधरी, हरीचंद की जितनी सहायता कर सकती थी, खाना बनाने में, की। ध्यान बाहर की ही तरफ था और सोचें, अगले कदम के बारे में दौड़ रही थी।

"हरीचंद।" मोना चौधरी बोली।

"हां।"

"बोलना, आज से मैं ही सबको, उनकी जगह पर खाना दे आया करूंगी।"

"कह दूंगा।"

"और ये भी कहना, कल सुबह मैं हवेली साफ करूंगी।"

"बोल दूंगा।"

उसके बाद मोना चौधरी ने वहां मौजूद लोगों को खाना पहुंचाया। हरीचंद खाना डालकर देता रहा और वो दे आती। छत पर भी गई। हवेली के दो भीतरी कमरों में भी गई और बाहर मौजूद आदमियों के पास भी गई। हवेली के कुछ रास्तों के बारे में जानकारी हुई।

फुर्सत पाकर वो किचन में पहुंची थी कि बलराम आ गया।

बलराम ने एक अच्छा-सा थाल उठाकर, उसे खुद साफ किया और बर्तनों में दाल-सब्जी, चपातियां वगैरह रखकर, खाने का थाल तैयार करने लगा।

"मैं डाल देती हूं साहब जी।" मोना चौधरी बोली।

"नहीं।"

मोना चौधरी खामोश हो गई।

जब वो थाल संभाले ले जाने लगा तो मोना चौधरी पुनः बोली।

"मैं ले चलती हूं साहब जी।"

"नहीं।" बलराम ने कहा और खाने के थाल के साथ बाहर निकल गया।

मोना चौधरी ने हरीचंद को देखा।

"ये रोज ही इस तरह खाने का एक थाल, खुद डालकर ले जाता है। बताया तो था।" हरीचंद बोला।

मोना चौधरी समझ गई कि वासवानी या उसका क्लोन, जो भी हो, वो इस हवेली में ही कहीं है और बलराम ही उसे खाना पहुंचाता है। उसकी जरूरतें पूरी करता है।

अब यही मालूम करना था कि वो हवेली में कहां है?

दस मिनट बाद बलराम पुनः भीतर आया और मोना चौधरी से बोला।

"मेरा खाना डालकर, हॉल में मुझे दे दो।" कहकर वो बाहर निकल गया।

हरीचंद ने थाल तैयार किया और मोना चौधरी थाल बलराम को पहुंचा आई।

"इसके बाद और क्या काम करने होते हैं।" मोना चौधरी ने पूछा।

"बर्तनों को समेटना है। वो मैं ले आऊंगा।" हरीचंद बोला।

"बर्तनों को भी, मैं ही लाऊंगी।" मोना चौधरी बोली।

हरीचंद ने कुछ नहीं कहा।

आधे घंटे बाद मोना चौधरी खाने के बर्तनों को ला-लाकर किचन में रखने लगी। चार-पांच चक्कर लगे बर्तन लाने में। वहां के माहौल को काफी हद तक जान चुकी थी। पहले तो उसका इरादा रात को हवेली में छिपकर चक्कर लगाने का था कि वासवानी या उसके क्लोन को तलाश कर सके। परंतु रात में नजर आ जाने से खतरा था। उसने महसूस किया कि अंधेरा होने पर, हवेली में पहरा सख्त हो जाता है।

आखिरकार मोना चौधरी ने यही फैसला किया कि सुबह हवेली की सफाई के बहाने अपनी तलाश शुरू करेगी। ऐसे में वो निश्चिंत होकर अपना काम कर सकेगी और किसी को शक भी नहीं होगा।

"अब?" मोना चौधरी ने हरीचंद को देखा।

"कुछ नहीं।" हरीचंद ने सिर हिलाया--- "खाना खाओ और यहीं फर्श पर चादर बिछाकर सो जाओ। चादर मैं ला देता हूं। सुबह इन सबका नाश्ता तैयार करने के लिए जल्दी उठना होता है।"

■■■

नौ बजे तक, सबको नाश्ता तैयार करके दे दिया गया। रात की भांति मोना चौधरी ने ही हवेली की पहरेदारी पर मौजूद सब व्यक्तियों को नाश्ता दिया था। नाश्ता बनाने का काम सारा हरीचंद ने ही किया था। इस दौरान बलराम ने दो चक्कर किचन के लगाए थे। उसे दिखाने के वास्ते मोना चौधरी ने खुद को यूं ही व्यस्त रखा था। नाश्ते में हरीचंद ने आलू-पूरी तैयार किए थे।

रात की ही भांति बलराम नाश्ते का एक थाल ले गया था।

जब वो अपना नाश्ता लेने आया तो हरीचंद ने कहा था।

"साहब जी। ये हवेली की सफाई कर देगी।"

"ठीक है।" बलराम ने इतना ही कहा था।

मोना चौधरी और हरीचंद भी नाश्ते से फारिग हुए।

"अब मुझसे हवेली की सफाई करवाओ।" मोना चौधरी धीमे स्वर में बोली--- "मुझे वहां छोड़कर आ जाना।"

एक तरफ रखा झाड़ू उठाकर हरीचंद ने उसे थमाया।

"आओ।"

हरीचंद किचन से, मोना चौधरी को साथ लेकर निकला। कुछ आगे, जब वो साफ-सुथरी गैलरी से गुजर रहा था तो सामने से बलराम आता दिखाई दिया।

"साहब जी। लाजो हवेली के सारे कमरे चमका देगी।" हरीचंद ने मुस्कुराकर कहा--- "पहले झाड़ू और फिर पोछा मारकर, एकदम सब बढ़िया कर देगी और मैं धीरे-धीरे दोपहर के खाने की तैयारी करता रहूंगा। फिर ये खाना बनाने में मेरा हाथ बटाएगी। पहले तो मैं बहुत थक जाता था।

बलराम सिर हिलाकर आगे बढ़ गया।

हरीचंद, मोना चौधरी को हवेली के भीतरी हिस्से में छोड़कर वापस चला गया था।

मोना चौधरी ने सतर्क निगाह हर तरफ मारी। हवेली के भीतर सुनसानी थी। लगभग सारे ही आदमी बाहर या छत पर, पहरे पर थे। ऐसे में मोना चौधरी हवेली का कोना-कोना देखकर वासवानी या उसके क्लोन को आसानी से तलाश कर सकती थी।

मोना चौधरी ने धोती में फंसी रिवाल्वर चैक की फिर एक हाथ में झाड़ू पकड़े, हवेली के कमरों के दरवाजे खोलकर, भीतर झांकने लगी। इस वक्त वो पहली मंजिल पर थी और वहां करीब बाईस कमरे थे। वो सब कमरे मोना चौधरी ने देख डाले।

परंतु कोई भी नजर नहीं आया।

मोना चौधरी दूसरी मंजिल पर पहुंची।

वहां भी वो एक-एक कमरे का दरवाजा खोलकर देखने लगी। वहां भी कोई नहीं था। फिर वो तीसरी मंजिल पर पहुंची। और वहां के कमरों को चैक करने लगी।

मोना चौधरी को पूरा विश्वास था कि वासवानी या उसका क्लोन इसी मंजिल के किसी कमरे में होगा। अभी आधे कमरे ही देखे थे कि कदमों की आहट कानों में पड़ी। कोई आ रहा था।

मोना चौधरी जल्दी से झुकी और कमरे के फर्श पर झाड़ू मारने लगी। अधिकतर कमरे खाली ही थे और सामान के नाम पर कुछ भी नहीं था।

तभी दरवाजे पर आकर आहट रुकी।

मोना चौधरी ने झाड़ू देते हुए देखा, वो बलराम था।

तभी मोना चौधरी ने साड़ी का पल्लू नीचे जा गिराया और उसकी सख्त-कठोर, जानलेवा छातियां, उस ढीले-ढाले ब्लाउज में से आधी से ज्यादा नजर आने लगी।

मोना चौधरी ले जल्दी से साड़ी का पल्लू संभाला।

बलराम के होंठों पर कड़वी मुस्कान नाच उठी।

मोना चौधरी मन-ही-मन सतर्क हो उठी।

बलराम हौले से हंसा और इसके साथ ही उसके हाथ में रिवाल्वर नजर आने लगी।

"बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम।" वो कहर भरे स्वर में बोला।

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े। झाड़ू थामें वो सीधी खड़ी हो गई।

"बहुत खूबसूरत है तुम्हारी छातियां।" बलराम पहले वाले स्वर में ही कह उठा--- "और ऐसी छातियां पचास साल की किसी गांव वाली औरत की नहीं हो सकती। जो देखने में लगे कि चार दिन से नहाई न हो। बाल सफेद कर लेने से घोड़ी बूढ़ी नहीं हो जाती। लाल लगाम नजर आ ही जाती है। वैसे भी तुम्हें चलते-फिरते काम करते देखा। कई बार तो तुम थकी-थकी लगी, तो कई बार तुम्हारी चाल में तेजी लगी। दिमाग में तो आया कि ये चाल बूढ़ी घोड़ी की नहीं हो सकती। क्यों कितना दिया हरीचंद को, उसके साथ हवेली में आने के लिए, कौन हो तुम और...।"

बलराम बात पूरी नहीं कर पाया।

मोना चौधरी ने झाड़ू पकड़े हाथ को झटका दिया तो झाड़ू तीव्रता से किसी डंडे की भांति हवा में नजर आया और दूसरे ही पल वेग से, बलराम के रिवाल्वर वाले हाथ से जा टकराया।

रिवाल्वर उसके हाथ से छूट गई।

वह संभल भी नहीं पाया कि, मोना चौधरी का शरीर वेग के साथ उससे जा टकराया। दरवाजे पर खड़ा बलराम, पीठ के बल गिरता हुआ, बाहर गैलरी में जा गिरा। मोना चौधरी भी उसके साथ ही नीचे गिरी। बलराम को संभलने का मौका ही नहीं दिया और एक के बाद एक, दो-तीन घूंसे उसके चेहरे पर जड़ दिए। इसके साथ ही उछलकर उसकी छाती पर बैठते हुए, अपना पंजा उसकी गर्दन पर जकड़ दिया।

एकदम हुए वारों से बलराम संभल नहीं सका।

मोना चौधरी अपना शिकंजा कस चुकी थी। एक हाथ उसके गले पर था और दूसरे हाथ में रिवाल्वर आ चुकी थी। चेहरे पर खतरनाक भाव नाच रहे थे।

"कोई हरकत करने की कोशिश मत करना।" मोना चौधरी गुर्राई।

गर्दन दबी होने के कारण उसका चेहरा सुर्ख-सा हो चुका था।

"तुम्हारी गर्दन ढीली छोड़ रही हूं। आवाज ऊंची मत करना। वरना मैं किसी भी बात की परवाह किए बिना शूट कर दूंगी। अपने साथियों के भरोसे मत रहना।" मोना चौधरी के चेहरे पर खतरनाक भाव नाच रहे थे।

गर्दन दबी होने की वजह से वो क्या बोलता।

मोना चौधरी ने उसकी गर्दन से अपना पंजा ढीला किया। परंतु हाथ वहीं रखा।

वो गहरी-गहरी सांसें लेने लगा।

मोना चौधरी ने रिवाल्वर उसकी छाती से लगा रखी थी।

सांसें कुछ ठीक हुईं तो बलराम बोला।

"कौन हो तुम?"

उसकी बात पर ध्यान न देकर मोना चौधरी ने सख्त लहजे में पूछा।

"अजीत वासवानी या फिर उसका क्लोन इस हवेली में कहां मौजूद है।"

बलराम की आंखें सिकुड़ी।

"क्लोन? मैं समझा नहीं।"

"अजीत वासवानी को जानते हो?" मोना चौधरी के दांत भिंच गए।

"हां।"

"वो इसी हवेली में है।"

"हां।" बलराम की निगाहें मोना चौधरी के चेहरे पर थीं--- "लेकिन तुम जो भी हो, वासवानी साहब से नहीं मिल सकतीं अगर ये सोचो कि रिवॉल्वर या मौत का भय दिखाकर मुझे मजबूर कर दोगी तो, गलत सोचती हो। मैं तुम्हें किसी भी कीमत पर नहीं बताऊंगा कि वासवानी साहब हवेली में कहां मौजूद हैं।"

मोना चौधरी दांत भींचे उसे देखती रही।

"तुम कौन हो?"

"मोना चौधरी।" मोना चौधरी ने भिंचे स्वर में कहा।

बलराम के चेहरे के भाव बदले।

"मोना चौधरी। तो तुम ही वासवानी साहब की हत्या करना चाहती हो।" उसके होंठों से निकला।

"तुम्हें कैसे मालूम।"

"वासवानी साहब ने बताया था।" अब बलराम संभला-सा नजर आने लगा था--- "बहुत बड़ी भूल कर दी तुमने यहां आकर। अब तुम किसी भी कीमत पर बचकर, जिंदा बाहर नहीं जा सकतीं। मुझे मार दो या फिर दो-चार को और मार दो, परंतु तुम्हारा अंत लाजिमी है।"

"मुझे वासवानी से मिलना है।" कहते हुए मोना चौधरी ने रिवॉल्वर की नाल उसके चेहरे पर मारी।

बलराम कराह उठा।

"कुछ भी कर लो। वासवानी साहब की तुम्हें हवा भी नहीं लगेगी।" उसने दृढ़ता भरे स्वर में कहा।

मोना चौधरी कठोर निगाहों से बलराम को देखती रही।

"मैं यहां खून-खराबा या किसी की जान लेने नहीं आई।" मोना चौधरी ने पहले वाले स्वर में कहा--- "वासवानी से मिलने आई हूं। उनसे बात करनी है समझे तुम?"

"हमारी ड्यूटी में ये भी शामिल है कि तुम्हें वासवानी साहब तक न पहुंचने दें।" बलराम उसी लहजे में बोला--- "और इस ड्यूटी के बदले मुझे इतनी कीमत मिल चुकी है कि आने वाले दस साल मैं घर बैठकर आराम से खा सकता हूं। इसलिए मैं हर कीमत पर अपनी ड्यूटी पूरी करूंगा।"

"अगर तुम उस पर काबू पा लेते तो क्या करते?" मोना चौधरी ने पूछा।

बलराम ने उसकी आंखों में झांका।

"मुझे गोली मारते या वासवानी को खबर करते।" उसे खामोश पाकर मोना चौधरी बोली।

"वासवानी साहब को खबर करता।" बलराम ने सख्त स्वर में कहा--- "फिर वो जो कहते, वही करता।"

मोना चौधरी ने उसका गला छोड़ा और छाती से उठ खड़ी हुई।

खुद को आजाद पाते ही बलराम फुर्ती से खड़ा हो गया।

मोना चौधरी ने अपने हाथ में दबी रिवाल्वर बलराम की तरफ उछाली तो बलराम ने तुरंत रिवाल्वर पकड़ ली। चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

"मेरे पास कोई हथियार नहीं है अब।" मोना चौधरी ने एक-एक शब्द चबाकर कहा--- "अब मैं तुम्हारे काबू में हो चुकी हूं। यहां, हर तरफ तुम्हारे ही हथियारबंद आदमी मौजूद हैं। यहां से तुम लोगों की मर्जी के बिना बाहर भी नहीं निकल सकती। जाओ, जाकर वासवानी से बात करो कि, मैं तुम लोगों के काबू में हूं और देखो वो क्या कहता है। उसे कहना, मैं यहां उसकी जान लेने नहीं आई। उससे बात करने आई हूं।"

बलराम, मोना चौधरी को घूरता रहा।

"कुछ और कहना-सुनना पूछना बाकी है तो बोलो।"

"मैं तुम्हारी तलाशी लेना चाहता हूं।" बलराम ने सख्त स्वर में कहा।

"ले लो।"

"इस काम के लिए मैं अकेला कम हूं। मालूम नहीं तुम्हारे मन में क्या है।" बलराम की आवाज में संदेह था।

"दो-चार को और बुला लो।"

"मेरे साथ नीचे चलो।" रिवाल्वर थामे वो सतर्क था।

"चलो।"

मोना चौधरी और बलराम नीचे जाने के लिए सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए।

"हरीचंद को कुछ मत कहना। मैंने उसे मजबूर कर दिया था कि वो मुझे यहां लाये। इसके अलावा उसके पास और कोई रास्ता नहीं था कि वो मेरी बात मानता।"

जवाब में बलराम खामोश रहा।

वो नीचे पहुंचे।

बलराम ने दो आदमी और बुला लिए। मामला समझते ही उनके हाथ में रिवाल्वरें नजर आने लगीं। एक ने कठोर स्वर में कहा।

"उस साले हरीचंद की वजह से ये सारी गड़बड़...।"

"खामोश रहो और इस पर ध्यान दो।" बलराम ने कठोर स्वर में कहा और उसके बाद मोना चौधरी की तलाशी ली और कोई हथियार नहीं मिला।

"एक रिवाल्वर दे सकती हूं तो दूसरी भी दे सकती हूं। ये सब मैंने इसलिए किया है कि मैं हर हाल में वासवानी से बात करना चाहती हूं। कम-से-कम इस बार तो उसकी जान लेने नहीं आई।"

मोना चौधरी को घूरते हुए बलराम ने अपने दोनों साथियों से कहा।

"तुम दोनों इसका ध्यान रखो। अगर ये कोई चालाकी करने की कोशिश करे तो बेशक गोली मार देना।"

"तुम्हारी वापसी तक मैं नहा लेना चाहती हूं।" मोना चौधरी ने सिर से बालों की 'विग' उतारते हुए कहा--- "अगर कोई पैंट-कमीज मिल जाये तो, बेहतर रहेगा।"

दो क्षणों की सोच के बाद बलराम ने अपने आदमियों से कहा।

"इसे बाथरूम तक पहुंचा दो। पैंट-कमीज दे दो। जहां भी ये चालाकी करती लगे। शूट कर देना।" कहने के साथ ही बलराम वहां से आगे बढ़ता चला गया।

■■■

दस मिनट बाद बलराम लौट आया।

मोना चौधरी नहा-धोकर पैंट-कमीज पहनकर पंद्रह मिनट में फारिग हो सकी। शरीर पर लगे मेकअप को उतारने में कुछ मेहनत करनी पड़ी थी।

मोना चौधरी ने गीले बालों में कंघी फेरते हुए प्रश्न भरी निगाहों से बलराम को देखा।

"मिल आए वासवानी से।" मोना चौधरी बोली।

"हां।"

"और वासवानी मुझसे मिलने को तैयार है।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।

"तुम कैसे कह सकती हो कि...।"

"पंछी पिंजरे में कैद हो तो फिर डर कैसा और मैं इस वक्त पूरी तरह तुम लोगों के कब्जे में हूं। तुम भी जानते हो और वासवानी भी जानता होगा कि अब मैं चाहकर भी यहां अपनी मनमानी नहीं कर सकती।" कहते हुए मोना चौधरी के होंठों पर शांत-सी मुस्कान उभर आई थी।

बलराम की निगाह मोना चौधरी के चेहरे पर ही थी।

"तुम्हारे तो हाथ भी किसी हथियार से कम नहीं मोना चौधरी।" बलराम का स्वर सख्त था--- "ऐसे में तुम्हें वासवानी साहब के सामने ले जाना ठीक नहीं। लेकिन वासवानी साहब तुमसे मिलने को तैयार हैं।"

"चलो।"

"हो सकता है इस मुलाकात के बाद तुम्हें खत्म कर दिया जाए।" बलराम का स्वर और भी कठोर हो गया।

"इस बात की तुम क्यों चिंता करते हो। मुझे फिक्र होनी चाहिए।" मोना चौधरी मुस्कुराई।

"आओ।" बलराम सतर्क था मोना चौधरी के प्रति और अपने आदमियों से बोला--- "पहरा टाइट कर दो। कोई बाहर से भीतर न आ सके और ये किसी भी हालत में बाहर न निकल सके। जब ये खुद को मौत के मुंह में खड़ा पाएगी तो यहां से निकलने की कोशिश अवश्य करेगी।"

मोना चौधरी मुस्कुराकर रह गई।

■■■

वो हवेली का तहखाना था।

तहखाने में पहुंचने का रास्ता ऐसा गुप्त और सुरक्षित था कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि वहां तहखाना भी हो सकता था। तहखाने में हॉल कमरा भी था और कुछ कमरे भी। वहां हवा का पूरा इंतजाम था परंतु हवा किधर से आ रही है, ये मालूम नहीं हो रहा था।

वासवानी। अजीत वासवानी सामान्य साइज के छोटे-से कमरे में मौजूद था। सजा हुआ खूबसूरत कमरा था। फ्रीज, टी.वी. जरूरत की हर वस्तु वहां मौजूद थी। एक तरफ डबल बेड था।

बलराम हाथ में रिवाल्वर थामें बेहद सतर्क था कि मोना चौधरी वासवानी पर झपट न पड़े।

कमरे में प्रवेश करते ही मोना चौधरी की निगाह उससे मिली। वो वासवानी ही था जिससे दिल्ली में मोना चौधरी मिली थी। हाथों में हीरे की अंगूठियां। गले में सोने की चेन। कलाई में सोने का भारी कड़ा। सादी-सी कमीज-पैंट। चेहरा शांत था अलबत्ता आंखों में बेचैनी थी।

दोनों कई पलों तक एक-दूसरे को देखते रहे।

मोना चौधरी की निगाह जैसे उसके मस्तिष्क, चेहरे और शरीर को भेद रही थी।

"हैलो।" मोना चौधरी मुस्कुराई--- "मेरे ख्याल में हम दूसरी बार मिल रहे हैं अजीत वासवानी।"

"पहली बार।" उसने बेहद शांत स्वर में कहा।

वही आवाज थी, जिसे मोना चौधरी दिल्ली में वासवानी के होंठों से सुन चुकी थी।

"हो सकता है। लेकिन मुझे लगा मैं दिल्ली में भी तुमसे मिल चुकी हूं।" मोना चौधरी ने कहा।

अजीत वासवानी, मोना चौधरी को खामोशी से देखता रहा।

बलराम सतर्क था मोना चौधरी के प्रति।

"तुम मेरी जान लेने आई हो।" अजीत वासवानी ने पहले जैसे शांत स्वर में कहा--- "जानता हूं। मुझे मालूम हो गया था कि मोना चौधरी मेरी जान लेने के लिए मुझे तलाश कर रही है।"

"और तुमने मेरा रास्ता रोकने की कोशिश की। अपने आदमी मेरे पीछे लगा दिए।"

"मैंने? नहीं, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। मैं तो यहां छिपा बैठा हूं। बलराम अपने आदमियों के साथ मेरी पहरेदारी करता है। बाहर के लोगों से मेरे सारे संबंध कट चुके हैं। मोबाइल फोन है।" उसने जेब थपथपाई--- "आने वाली कॉल्स पर मैं किसी से बात नहीं करता और मुझे कहीं फोन करने की खास जरूरत नहीं पड़ती।" उसकी निगाह मोना चौधरी पर ही थी।

"रतनचंद को तो फोन कर ही कर लेते हो।"

अजीत वासवानी ने गहरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।

"ये बात तुम्हें कैसे मालूम?"

"बात शुरू करने से पहले फोन पर रतनचंद से बात कर लो। वो तुम्हें यकीन दिला देगा कि फिलहाल, तुम्हें इस वक्त मेरे से कोई खतरा नहीं है। मैं तुमसे बात करने आई हूं और ये बात अकेले में ही हो तो ज्यादा अच्छा रहेगा।" मोना चौधरी का इशारा पास खड़े बलराम की तरफ था।

"तुमसे मैं क्या बात करूंगा। तुम तो मेरी जान लेने आई हो और इस काम के बदले तुमने बहुत पैसा लिया होगा। आखिर अजीत वासवानी से वास्ता रखता है ये मामला।" उसकी आवाज में कोई भाव नहीं था।

मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान उभरी।

"तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं यहां हूं।"

"ये बात भी हो जाएगी। पहले रतनचंद से बात कर लो।"

"कोई फायदा नहीं।" अजीत वासवानी ने सिर हिलाया--- "उसका ऑफिस बंद है। उससे फोन पर बात नहीं हो रही। मैं उसे फोन करके थक चुका हूं। वो कहां है, मुझे मालूम नहीं। बलराम ने ये खबर लाकर दी थी कि एक शाम ऑफिस के बाहर उसके ऊपर गोलियां चलाई गईं, उसके बाद वो, वहां नहीं आया।"

"कल उसने ऑफिस खोला है। आज भी वहीं होगा।" मोना चौधरी बोली।

अजीत वासवानी ने सिर हिलाया और मोबाइल से रतनचंद का नंबर मिलाया। बात हो गई।

"तुम कहां थे रतनचंद। मैं...।"

"ओह, वासवानी साहब।" रतनचंद की आवाज, वासवानी के कानों में पड़ी--- "बहुत दिनों बाद आपसे बात हो पाई। मैं आपका ही काम कर रहा हूं। आपको बताया था कि कुछ लोग नहीं चाहते, मैं आपका काम करूं। इसलिए मुझ पर गोलियां चलाई गईं तो मुझे ऑफिस से दूर रहकर काम...।"

"मैंने, तुम्हें उसे खत्म करने को कहा था।" अजीत वासवानी का स्वर सख्त हो गया--- "मैं अपने क्लोन को खत्म हुआ देखना चाहता हूं। आखिर कब तक इस तरह छिपता फिरूंगा उन लोगों से।"

"जल्दी ही आपका काम हो जाएगा। आप निश्चिंत रहें।"

"इस सिलसिले में कोई कदम उठाया है। किसी को कहा है कि...।"

"वासवानी साहब। ये काम जल्दबाजी में नहीं हो सकता। ऐसा किया गया तो ठीक नहीं होगा। आपका क्लोन भारी सिक्योरिटी के बीच रहता है। मेरी बात आप अच्छी तरह समझ रहे हैं। कुछ देर ही सही, लेकिन आपका काम पक्का हो जाएगा और...।"

"इस बारे में मैं फिर बात करूंगा। मोना चौधरी को जानते हो।" अजीत वासवानी बोला।

रतनचंद की आवाज नहीं आई।

"मैंने पूछा है मोना चौधरी को जानते हो?"

"हां।" रतनचंद का स्वर कानों में पड़ा।

"मेरे क्लोन ने, दिल्ली से मोना चौधरी को भेजा है मेरी जान लेने के...।"

"जानता हूं।"

"वो मेरे सामने मौजूद है और...।"

"सामने?" रतनचंद के आने वाले स्वर में हैरानी भर आई थी।

"बीच में मत बोलो। मेरी बात सुनो। मोना चौधरी मेरे सामने बैठी है और मुझसे कोई बात करना चाहती है। उसी ने मुझे, तुम्हें फोन करने को कहा कि, तुम मोना चौधरी के प्रति मेरी तसल्ली करा दोगे कि वो मुझे कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी और...।"

"वासवानी साहब।" रतनचंद का गंभीर स्वर कानों में पड़ा--- "मोना चौधरी, आपसे जो भी बात करना चाहती है वो कीजिए। उसकी बातों को गंभीरता से लेकर, जवाब दीजिए, वरना ये मामला उलझा ही रहेगा।"

"क्या मतलब?"

"आप मोना चौधरी से बात कीजिए। जब फुर्सत मिले तो मुझे फोन कीजिएगा। उसके बाद मैं आपकी बातों का जवाब दूंगा।" रतनचंद का स्वर गंभीर ही था।

अजीत वासवानी ने मोना चौधरी पर निगाह मारी।

"मैं तुम्हारे और मोना चौधरी का वास्ता नहीं समझ पा रहा हूं।" उसके स्वर में उलझन थी--- "तुम मेरे लिए काम कर रहे हो और मोना चौधरी मेरे क्लोन के कहने पर मेरी हत्या...।"

"वासवानी साहब। मोना चौधरी आपसे बात करना चाहती है और इस वक्त आपको उससे कोई खतरा नहीं है। अगर आप मेरी बात का विश्वास कर सकते हैं तो मुझे बहुत खुशी होगी।"

"तुम्हारी बात से लगता है कि, तुम्हें मालूम था मोना चौधरी मेरे पास आ सकती है।"

"ठीक कहा आपने। मोना चौधरी से बात करने के बाद मुझसे बात कीजिएगा, मैं तो ज्यादा अच्छी तरह आपके सवालों का जवाब दे सकूंगा।" रतनचंद का गंभीर स्वर अजीत वासवानी के कानों में पड़ा।

अजीत वासवानी ने फोन बंद किया और जेब में डालते हुए बलराम से बोला।

"तुम कमरे से निकलकर, इतनी दूरी पर खड़े हो जाओ कि यहां की बातें न सुन सको।"

"लेकिन वासवानी साहब। ये बहुत खतरनाक है और आपकी जान...।"

"तुम ठीक कह रहे हो। लेकिन थोड़ा-सा खतरा मुझे उठाना पड़ेगा।" कहते हुए वासवानी ने जेब से रिवाल्वर निकाली और मोना चौधरी से कहा--- "मेरे पास रिवाल्वर है और निशाना भी अच्छा लगा लेता हूं। बलराम यहां, पास ही में है। अगर तुमने कुछ करने की कोशिश की तो कामयाब नहीं हो सकोगी।"

मोना चौधरी मुस्कुराकर वासवानी को देखती रही।

वासवानी का इशारा पाकर बलराम बाहर निकल गया।

मोना चौधरी की अपेक्षा, बात वासवानी ने ही शुरु की।

"मेरे क्लोन ने तुम्हें कहा कि मैं उसका क्लोन हूं। मेरी हत्या कर दो और तुम उसकी बात मान गई।" उसकी आवाज में भरपूर तीखापन था।

मोना चौधरी शांत भाव से उसे देखती रही।

"मैं तुम्हें कसूर नहीं देता। मोटी-तगड़ी रकम मिले तो, तुम क्यों नहीं ये काम करोगी। कितने मिले?"

"तीस करोड़।"

अजीत वासवानी ने दांत भींचकर सिर हिलाया।

"तीस करोड़।" वासवानी ने उसे देखा--- "हूं। ठीक है मैं तुम्हें पचास करोड़ देता हूं। मेरे क्लोन की हत्या करो।"

"मंजूर है। सौदा पक्का।" मोना चौधरी बेहद शांत थी--- "हालांकि ऐसा करना, गलत होगा, क्योंकि मैं उसका काम हाथ में ले चुकी हूं। फिर भी पचास करोड़ आ रहा है तो ईमान खराब हो ही जाता है। लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरी एक बात पूरी करके दिखानी होगी।"

"क्या?" उसने कठोर निगाहों से, मोना चौधरी की आंखों में झांका।

"मेरे सामने ये बात साबित कर दो कि तुम क्लोन नहीं, असली अजीत वासवानी हो।"

अजीत वासवानी के दांत और भिंच गए।

"कैसे साबित करूं?"

"ये तुम जानो।"

"मुझे रास्ता बता दो कैसे तुम्हारी तसल्ली होगी। मैं तुम्हारी तसल्ली करा दूंगा।"

"खुद को वासवानी साबित करने का, बेहतर रास्ता, तुम अच्छी तरह जानते होंगे। इतनी बड़ी हस्ती हो। इस बारे में कुछ कहना बेकार है। क्या तुम साबित नहीं कर सकते कि...।"

"अगर साबित कर सकता होता तो इस तरह छिपने को मजबूर न होता।"

"मतलब कि नहीं साबित कर सकते।"

"नहीं।"

"यानी कि तुम अजीत वासवानी नहीं, उसके क्लोन हो। तुम ही...।"

"क्या बकवास कर रही हो।" वासवानी दांत भींचकर गुर्रा उठा--- "मैं असली अजीत वासवानी हूं।"

"वो भी यही कहता है।"

"वो झूठा है।" वासवानी चिल्ला उठा।

"वो भी इसी तरह चिल्ला रहा था। तुम्हें कोस रहा था। तुम...।"

"मैंने बोला है कि वो फ्रॉड है। मैं असली हूं असली।"

"उसने भी यही कहा था।"

दांत भींचे वो खा जाने वाली निगाहों से, मोना चौधरी को घूरने लगा।

"अगर तुम असली हो तो, कोई रास्ता होगा, जिसके दम पर तुम ये बात साबित कर सको।"

उसका चेहरा और कठोर हो गया। वो कमर पर हाथ बांधे टहलने लगा। फिर बोला।

"जो तुम कह-पूछ रही हो। इस बारे में, मैं ठंडे दिमाग से सोच चुका हूं। उसने मुझे बेबस कर दिया है। हर तरफ से मेरे हाथ-पांव बांध दिए हैं। उन लोगों ने ऐसी योजना बनाई कि मैं फंसकर रह गया। मेरे क्लोन को वहां बिठाने से पहले, सारे इंतजाम उन्होंने कर लिए थे। उस वक्त में क्या-क्या काम कर रहा हूं। किस-किससे मेरी क्या बात हो रही है। मेरा कहां जाने और किस-किससे मिलने का प्रोग्राम है। छोटी-से-छोटी, बड़ी-से-बड़ी बात। मेरे साईन, मेरा सब कुछ, यहां तक कि वो मेरी सोचों को भी काफी हद तक जान चुके थे, तब उन्होंने आगे कदम बढ़ाया। उसके बाद...।"

"वो, जो दिल्ली में बैठा है।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा--- "वो भी कुछ ऐसा ही कहता है। मैं उसकी बातों को झुठला नहीं सकती। मुझे वो सच्चा लगता है।"

अजीत वासवानी का चेहरा गुस्से से सुर्ख हो उठा।

"तो फिर मेरे पास क्या लेने आई थीं। क्या बात करने आई थीं।" वो दहाड़ उठा--- "तुम...।"

तभी कदमों की आहट गूंजी और दूसरे ही पल दरवाजे पर बलराम रिवाल्वर लिए खड़ा नजर आया। इस तरह कि जैसे ट्रिगर दबाने जा रहा हो।

दोनों की निगाह उसकी तरफ उठीं।

कुछ पल उनके बीच शांति रही।

"तुम...।" वासवानी ने मोना चौधरी को देखा--- "उस कमीने से कहो कि ये साबित करे कि वो असली है।"

"मैं उससे कुछ नहीं कह सकती।" मोना चौधरी ने इंकार में सिर हिलाया।

"क्यों?"

"क्योंकि वो अजीत वासवानी है और अपनी जगह पर सलामत मौजूद है। मैं कैसे उसके वजूद को झुठला सकती हूं।" मोना चौधरी की निगाह उसके चेहरे पर थी।

वो कुर्सी पर आ बैठा।

"छोड़ो।" अपने क्रोध पर काबू पाता हुआ बोला--- "मेरी बात तुम्हें समझ नहीं आएगी और तुम उसी की साइड लोगी। आज मैं दुश्मनों की चालों में फंसकर इतना मजबूर हो गया हूं कि अपनी ही हस्ती साबित नहीं कर पा रहा हूं। कितनी अजीब बात है।"

"ये जरा भी अजीब बात नहीं है।" मोना चौधरी एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठी--- "मैं खुद कहती हूं कि तुम अजीत वासवानी न होकर उसके क्लोन हो।"

"साबित कर सकती हो।" उसने सख्त स्वर में कहा।

"हां।" मोना चौधरी ने फौरन सिर हिलाया--- "मुझे साबित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। अजीत वासवानी दिल्ली में अपने बंगले में मौजूद है। वहीं उसके पुराने नौकर हैं। वहीं मारवाह है। वो सारे बिजनेस संभाल रहा है। अगर वो अजीत वासवानी न होता तो, कोई-न-कोई तो उस पर शक कर सकता था कि उसकी आदतों में, या फिर किसी और बात में बदलाव आया है। सबसे पहले शक तो मारवाह को ही होता, जो अक्सर उसके साथ ही रहता है। लेकिन ऐसी कोई बात नहीं है। मारवाह से मैं मिली हूं। मारवाह को पूरा यकीन है कि वही अजीत वासवानी है।"

"मारवाह भी धोखा खा चुका है।" उसने दांत भींचकर कहा।

"यानी कि तुम्हारा क्लोन बाजी मार ले गया और तुम कुछ न कर सके। कितनी अजीब बात है। इस बात को कोई नहीं मान सकता। तुम्हारा खेल ज्यादा नहीं चल सकता।" मोना चौधरी की आवाज में कठोरता आ गई--- "तुम्हारे ही किसी आदमी ने, अजीत वासवानी से एक करोड़ रूपया लेकर, उसे पहले ही बता दिया कि, उसका क्लोन तैयार हो चुका है और तुम लोगों की योजना क्या है। यहीं पर तुम लोगों की योजना खराब हो गई। इससे पहले कि तुम या तुम्हारे साथी उसे खामोशी से हटा पाते। तुम अपनी जगह ले पाते, उसने खुद को बंगले पर सुरक्षित बंद कर लिया। लोगों से मिलना बंद कर दिया और मुझसे बात करके, तुम्हें खत्म करने को कहा। बस, यहीं पर तुम लोगों की सारी योजना खराब हो गई। उसे यह भी तुम्हारे आदमी ने बताया कि तुम जयपुर में ही हो। तभी तो तुम्हारी हत्या का काम लेते ही मैं सीधी जयपुर पहुंची।"

वो आंखें सिकोड़े मोना चौधरी को देखता रहा।

"ये सब तुम्हें मेरे क्लोन ने कहा।" उसके होंठ खुले।

"क्लोन ने नहीं, अजीत वासवानी ने कहा।" मोना चौधरी पक्के स्वर में बोली।

उसने बेचैनी से पहलू बदला।

"तुम्हारे साथी कहां हैं, जिन्होंने इस सारी योजना को अंजाम दिया। वो डॉक्टर कहां है, जिसने तुम जैसा क्लोन बनाकर, शानदार काम किया है।" मोना चौधरी मुस्कुराई--- "मेरे ख्याल में इस वक्त वो तुम्हारे पास नहीं आएगा, क्योंकि खुद को अजीत वासवानी साबित करने के लिए, तुम्हें अकेला छोड़ रखा है। तुम्हारे साथ उनका देखा जाना ठीक नहीं होगा। असल-नकल का भेद खुल सकता है।"

वो कुछ नहीं बोला। मोना चौधरी को देखता रहा।

"मेरी मानो तो यहां से कहीं दूर निकल जाओ। खामोशी से जिंदगी बिता लो कहीं। बच जाओगे। नहीं तो तुम्हारा खेल बहुत जल्दी खत्म हो जाएगा।"

"मैं तुम्हारी सलाह को बुरा नहीं समझता।" उसने सोच भरे स्वर में कहा--- "जब सारे रास्ते बंद हो जाएं तो ऐसा ही करना चाहिए। लेकिन मैं हार मानने वालों में से नहीं हूं।"

"वो तो महसूस हो ही चुका है।" मोना चौधरी ने फौरन कहा--- "तुम लोगों ने इतनी मेहनत करके, इतनी लंबी और बड़ी योजना को अंजाम दिया है। कितना पैसा खर्च किया है। ऐसे में कामयाबी के करीब पहुंचकर, हार मानना कौन पसंद करेगा। तुम्हारी मजबूरी मैं समझ रही हूं।"

"खूब। तो तुम मेरी मजबूरी भी समझ गई।" उसने कहर भरे स्वर में कहा।

मोना चौधरी मुस्कुराई।

"इन बातों का कोई फायदा नहीं। तुम बोलो, क्या बात करना चाहती थीं मेरे से।"

"यही सब बातें, जो हो रही हैं।" मोना चौधरी ने उसे घूरा--- "एक बार मैं देखना चाहती थी कि क्लोन कैसा होता है। वो तुम्हें देख लिया। सच में, जरा भी फर्क नहीं। तुम वही हो, अजीत वासवानी से जरा भी जुदा नहीं लगे। वही लंबाई, और आवाज, वैसे ही चेहरे के भाव। वो ठीक कह रहा था कि तुम अगर अपनी योजना में कामयाब हो गए तो उसका अस्तित्व छीन लोगे।"

"बहुत प्रभावित हो चुकी हो, तुम उससे।" उसके कठोर स्वर में तीखापन था।

"मैं तो तुमसे भी प्रभावित हुई हूं।"

"उससे कुछ ज्यादा ही हुई हो। क्योंकि उसने बातों के साथ तीस करोड़ भी दिया है।"

"मैं तो तुम्हारा भी पचास करोड़ लेने को तैयार हूं।" मोना चौधरी के स्वर में सख्ती आ गई--- "किसी एक बात से मेरे मन में शक ही डाल दो कि तुम असली अजीत वासवानी भी हो सकते हो। सच मानो, दिल्ली वाले को खत्म करना मेरे लिए बहुत आसान है। मैं जब भी चाहूं मिलने के लिए उसके पास पहुंच सकती हूं। वो मेरे हाथों से दूर नहीं है। यह बात तो तुम भी समझ सकते हो।"

"मैं हर बात समझ रहा हूं।" उसने कड़वे स्वर में कहा--- "लेकिन एक बात तुम नहीं समझ रही।"

"क्या?"

"मैं तुम्हें यहां से जिंदा नहीं जाने दे सकता। क्योंकि तुम मेरा ठिकाना जान चुकी हो और मेरे क्लोन को भी बता सकती हो। ऐसे में मेरे लिए भारी खतरा पैदा हो सकता है।"

"तुम्हारे क्लोन को नहीं, अजीत वासवानी को।"

"मेरे लिए एक ही बात है। मैं कुछ भी कहूं फिलहाल हालात नहीं बदलने वाले।" उसके दांत भिंच गए।

मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।

"तुमने रतनचंद को पचास लाख एडवांस दिए हैं।"

"हां।"

"लेकिन वो तुम्हारा काम नहीं करेगा।"

उसके माथे पर बल पड़े। चेहरा कठोर हो गया।

"वो करेगा। मैंने बहुत सोच-समझकर उससे बात की थी। वो जैसा भी है, अपने क्लाइंट को धोखा नहीं...।"

"ठीक कहते हो। लेकिन वो पेशेवर हत्यारा भी तो नहीं है। किसी मजबूर को मुसीबत से निकालने के लिए रतनसिंह शायद किसी की जान ले ले। लेकिन किसी के लालच को पूरा करने के लिए किसी की जान नहीं लेगा।"

"मैं समझा नहीं।"

मोना चौधरी ने बेहद शांत स्वर में कहा।

"रतनचंद के मन में शक आ चुका है कि तुम क्लोन हो सकते हो और दिल्ली में बैठे अजीत वासवानी असली है और उसके द्वारा तुम उसकी हत्या करवाना चाहते हो। अब वो समझ नहीं पा रहा कि कैसे जाने कि कौन असली है और कौन नकली। असली अजीत वासवानी की हत्या करवाने के हक में नहीं है वो। कुछ ऐसा ही मेरा ख्याल है। मैं भी शक में हूं कि कौन असली है और कौन नकली। यही वजह है कि तुम्हारी जान लेने से पहले, तुमसे मिलकर, ये बात मालूम करना चाहती थी। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। यानी कि दिल्ली और जयपुर वाले दोनों अजीत वासवानी का काम रुक गया। मैं, तुम्हें नहीं मारूंगी और रतनचंद दिल्ली वाले की हत्या के लिए किसी से नहीं कहेगा।"

"ये कैसे हो सकता है। मैं बात करूंगा रतनचंद से।" वो गुर्रा उठा।

"कोई फायदा नहीं होगा। बेशक बात कर लेना।"

"मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसकी हत्या करने वाले और बहुत मिल जाएंगे।" उसने दांत भींचकर कहा।

"हां।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "ठीक कहते हो। दिल्ली वाले को भी बहुत मिल जाएंगे। मोना चौधरी ने तुम्हारी हत्या नहीं की तो, कोई और कर देगा। एक से बढ़कर एक तीर मौजूद हैं। दौलत की कमान चाहिए और इस मामले में दौलत की कहीं भी कमी नहीं है।"

दांत भींचे खतरनाक भावों से वो मोना चौधरी को घूरने लगा।

मोना चौधरी ने सोच भरे ढंग में सिर हिलाया।

"अब मैं बातों का रुख तुम्हारे हक की तरफ मोड़ती हूं।"

"क्या मतलब?"

"तुम कहते हो कि तुम, अजीत वासवानी हो।"

वो मोना चौधरी को घूरता रहा।

"एक मिनट के लिए तुम्हारी बात को सच भी मान लूं तो सवाल यह पैदा होता है तुम यहां कैसे पहुंचे? और वो जिसे तुम क्लोन कह रहे हो, उसने तुम्हारा सब कुछ कैसे संभाल लिया। अजीत वासवानी जैसी हस्ती के साथ ऐसा कर पाना कोई आसान बात नहीं है।" मोना चौधरी बोली।

"जो लोग मेरा क्लोन बना सकते हैं। इतनी बड़ी योजना बनाने की हिम्मत रखते हैं। उनके लिए भला ये काम कैसे कठिन हो सकता है।" उसने एक-एक शब्द चबाकर कहा--- "यही सब कुछ करने के लिए उन्होंने भरपूर मेहनत की। ऐसे लोग न के बराबर ही असफल होते हैं।"

"तुम यहां तक कैसे पहुंचे?"

"तुम्हें बताने से कोई फायदा नहीं होगा।"

"ये देखना-सोचना मेरा काम है।"

वो मोना चौधरी को खामोश किंतु कठोर निगाहों से देखता रहा। फिर बोला।

"मैं इस बात से पूरी तरह अनजान था कि मेरे खिलाफ कोई साजिश तैयार की जा रही है। सच बात तो यह थी कि मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था कि कोई मेरा क्लोन बना सकता है। उन लोगों ने करीब डेढ़ बरस पहले मेरा अपहरण कर लिया था। और मेरा क्लोन बनाने के लिए मेरे शरीर से, जिस-जिस चीज की जरूरत थी, वो ले गए और चौथे दिन मैं पार्क में घायल मिला। मेरा शरीर कई जगह से जख्मी था। उस वक्त अपने अपरहण का कारण नहीं समझ पाया था। लेकिन अब जान चुका हूं कि तब मेरा शरीर क्यों घायल था और क्यों मेरा अपहरण हुआ।"

"अजीत वासवानी ने भी दिल्ली में मुझे यही कहा थ।" मोना चौधरी ने कहा।

उसने, मोना चौधरी को घूरा।

"जो बात सच है। झूठा भी उसी बात को तो कहेगा क्योंकि सच बात यही है।" उसने शब्दों को चबाकर कहा।

"उसे झूठा मत कहो।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।

वो, खा जाने वाली निगाहों से मोना चौधरी को घूरने लगा।

"आगे कहो।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।

अपने गुस्से पर काबू पाते हुए उसने कहा।

"मारवाह, मेरा पूरा ध्यान रखता था। वो जानता था कि मेरे कारोबारी दुश्मन बहुत हैं और मुझे खत्म करने के लिए घात लगाए रहते हैं। जब-जब भी मुझे खतरा पैदा हुआ, मारवाह ने सब कुछ ठीक ढंग से संभाला। सब कुछ ठीक ही चल रहा था।" वो सोच भरे, धीमे स्वर में बोल रहा था--- "उस रात मैं दिल्ली के बंगले पर था। आधी रात हो चुकी थी। परंतु नींद नहीं आ रही थी। हर वक्त सुरक्षा के घेरे में रहने की वजह से, ऐसी जिंदगी से तंग आ गया था। तब मेरा मन किया कि मैं अकेला ही बाहर घूमकर आऊं। मारवाह उस वक्त सो चुका था। अगर जाग रहा होता तो, मुझे अकेले न जाने देता। मैंने जल्दी से कपड़े बदले और पोर्च में खड़ी कार में बैठकर बाहर निकला। किसी और में इतनी हिम्मत कहां थी कि मुझे रोकता या अकेला बाहर न जाने की सलाह देता। कार ड्राइव करते हुए मैं, खुली सड़क पर आ गया। अपने आसपास किसी को न पाकर, मुझे बहुत खुशी हुई। लगा किसी जेल से निकला हूं और दस मिनट ही हुए थे मुझे कार ड्राइव करते हुए कि एक खाली सड़क पर मुझे एक कार ने ओवरटेक करके मेरा रास्ता रोका। पांच आदमी बाहर निकले। तीन ने मुझ पर रिवाल्वर तान दी। रिवाल्वर मेरे पास भी थी। लेकिन उनके सामने कुछ नहीं कर सका तब। उन्होंने मुझे कार से बाहर निकाला और अंधेरे में खड़े रहे। एक ने मोबाइल फोन पर किसी से बात की। किसी को बताया कि मैं, उनके हाथ लग गया हूं और वे उस वक्त कहां हैं।"

मोना चौधरी की निगाह उस पर थी।

वो कुछ पल रुकने के बाद बोला।

"मैं नहीं समझ पा रहा था कि वे लोग कौन हैं। मैंने उनसे पूछा तो कोई जवाब नहीं मिला मुझे। मैंने उन्हें कहा कि पैसा लेकर मुझे छोड़ दें। लेकिन वो तो मेरी बात सुनने को तैयार ही नहीं था। मुझे लिए वहीं खड़े रहे। आधे घंटे बाद एक कार वहां और पहुंची। उसमें तीन लोग थे। एक को वे लोग डॉक्टर कहकर बुला रहे थे। दूसरा पचास बरस का रईस-सा नजर आने वाला व्यक्ति था और तीसरा मेरा क्लोन था।"

वो रुका कहते-कहते। उसने मोना चौधरी को देखा।

मोना चौधरी के चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था।

"तब मुझे नहीं मालूम था कि वो मेरा क्लोन है। मैं समझा किसी को मेरे जैसा बनाया हुआ है। उसके बाद रिवॉल्वरों के दम पर मेरे शरीर पर पड़े कपड़े उतरवाए और मेरे क्लोन को पहना दिए। उसके कपड़े मुझे पहना दिए गए। वो मेरे सामने खड़ा था और मेरे जैसा लग रहा था। उनकी मंशा मैं समझ चुका था, मेरे चेहरे वाला बंगले पर जाएगा और वहां से, ज्यादा-से-ज्यादा माल समेटकर भाग लेगा। तब मुझे क्या मालूम था कि वो बेहद खतरनाक खेल खेल रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि ये सब छोड़े। जो भी जायज रकम चाहिए। ले लो। परंतु मेरी बात की तरफ वो जरा भी ध्यान नहीं दे रहे थे। अपने ही काम में व्यस्त रहे। जिन पांच लोगों ने मुझे घेरा था, वो मुझे लेकर चले गए। कार में ही उन्होंने मुझे जाने किस गैस का स्प्रे करके बेहोश कर दिया। और जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को कमरे में पाया। बाहर दिन की रोशनी थी। उन्ही पांच आदमियों में से दो आदमी पास ही कुर्सियों पर बैठे थे। मेरे पूछने पर भी उन्होंने कुछ नहीं बताया। कोई खास बात नहीं की खाने-पीने के अलावा।"

वो कुछ बेचैन, उखड़ा और गुस्से में दिखने लगा था।

मोना चौधरी वैसे ही बैठी, उसे देखे जा रही थी।

आखिरकार वो पुनः कह उठा।

"वह पांचों मेरे आस-पास रहे थे। हर वक्त मुझे घेरे रहते। उनके पास रिवाल्वरें थीं। मैं परेशान और भारी तौर पर उलझन में था कि, ये लोग कुछ मांग नहीं रख रहे। कोई बात नहीं करे। मेरी किसी बात का जवाब नहीं दे रहे। आखिर चाहते क्या हैं। जब मैं उन्हें ज्यादा परेशान करता तो गैस का स्प्रे करके मुझे बेहोश कर देते। इसी तरह एक सप्ताह निकल गया और आठवें दिन वही दोनों व्यक्ति वहां नजर आए, जो मेरे अपहरण के वक्त, मेरे चेहरे वाले यानी कि क्लोन को लेकर वहां पहुंचे थे। मैं तुम्हें पहले भी बता चुका हूं कि उनमें से एक को डॉक्टर कहा जाता था वह कुछ बूढ़ा-सा पैंसठ या सत्तर बरस का रहा होगा। उस दिन मेरी उन दोनों से अकेले में बात हुई। तब मुझे पता चला कि मामला क्या है और बेहद खतरनाक जाल में फंस चुका हूं मैं।"

कहकर वो चुप हुआ और खड़ा होकर टहलने लगा। चेहरे पर क्रोध के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। रह-रहकर उसके दांत भींच रहे थे।

"उन्होंने मुझे बताया कि अपने अपहरण के वक्त मैंने जिस अपने चेहरे वाले को देखा था, वो किसी मेकअप का कमाल नहीं था बल्कि क्लोन था। जो कि अजीत वासवानी बनकर मेरी जगह ले चुका है। अजीत वासवानी के रूप में उसे स्थापित करके ही वो उसके पास पहुंचे हैं। अब हमेशा के लिए वही अजीत वासवानी बना रहेगा। उन्होंने मुझे क्लोन की खूबियां बताईं कि उसे किसी भी तरह से सिद्ध नहीं किया जा सकता कि वो क्लोन है। मैं ठगा-सा रह गया सब कुछ जानकर। उस वक्त मेरी क्या हालत हुई होगी, तुम्हारी सोच उस तक पहुंच भी नहीं सकती।" कहते हुए उसने गहरी सांस ली--- "मैंने उन लोगों से सौदा करने की कोशिश की कि वे ये सब छोड़ दें। मेरे क्लोन को खत्म कर दें। बदले में जितनी बड़ी रकम भी चाहिए, मैं दूंगा। तो जवाब में उन्होंने कहा कि अब तो सब कुछ ही उनका है। उनसे पता चला कि मैं दिल्ली में नहीं हूं बल्कि उसी रातों-रात वो मुझे जयपुर में ले आए थे। दिल्ली में मुझे रखकर, किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे। जयपुर में रहकर ही उन्होंने मेरा क्लोन बनाकर, जाने कैसे बड़ा कर लिया था। क्लोन बनाने के दौरान उनका असल ठिकाना वही था, जहां उन्होंने मुझे कैद किया था। वो किसी भी कीमत पर अपने इरादों से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हुए। क्लोन को किसी तरह का भविष्य में खतरा पैदा न हो इसके लिए वो मेरी जान लेने की तैयारी करने लगे। वो मुझे खत्म करने जा रहे थे। उन्होंने मुझे ये भी बताया कि वो मुझे जहर से मारेंगे और लाश को कहीं फेंककर खतरा मोल नहीं लेंगे, बल्कि लाश के लिए तेजाब का ड्रम आने वाला है। लाश को तेजाब के ड्रम में डाल देंगे और जब हड्डियां ही रह जाएंगी तो उन्हें तोड़-फोड़कर कहीं फेंक देंगे। वे लोग इस तरह बात कर रहे थे, जैसे मुझे कहानी सुना रहे हों। लेकिन मेरे तो होश उड़ गए थे। मेरा तो बुरा हाल हो चुका था यह मानकर कि वे लोग जल्द ही मेरी जान भी लेने जा रहे हैं।"

कहते-कहते उसके दांत भिंच गए थे।

मोना चौधरी खामोश-शांत थी।

"मैं जानता था कि एक हथियारबंद लोगों का मुकाबला नहीं कर सकता। वे खाली हाथ होते तो भी मैं उनका मुकाबला नहीं कर सकता था। मौत मेरे सिर पर थी और जान तो कोई भी नहीं गंवाना चाहता। जान बचाने के लिए बड़े-बड़े डरपोक भी जान पर खेल जाते हैं। मैंने उसी रात जान बचाने के लिए अपनी हिम्मत से भी ज्यादा बड़ा हौसला दिखाया और मैं वहां से निकल भागा। मुझे आज भी विश्वास नहीं कि कैसे मैं भागने में सफल हुआ। लेकिन मैं ये भी जानता था कि वे लोग मुझे तलाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। मैं इतना घबराया हुआ था कि मुझे ये भी नहीं मालूम कि उन लोगों ने मुझे कहां कैद कर रखा था।"

"मतलब कि अब मैं तुमसे पूछूं कि तुम्हें उन लोगों ने कहां कैद कर रखा था, तो तुम्हें नहीं मालूम।" मोना चौधरी बोली।

"नहीं।" उसने इंकार में सिर हिलाया--- "एक तो उस वक्त रात थी, दूसरे मेरे सिर पर मौत का डर सवार था। जब मैं वहां से भागा तो, पीछे मुड़कर देखने का मतलब ही नहीं था। जाने किस गली। किस सड़क से निकला। कुछ होश नहीं। तब मैं यही सोच रहा था कि उन लोगों ने मेरी तलाश शुरू कर दी होगी। वो जुदा बात होगी कि शायद उन्हें मेरे भाग जाने का पता, अगले दिन सुबह लगा हो।"

वो खामोश होकर मोना चौधरी को देखने लगा।

"उसके बाद तुमने क्या किया?" मोना चौधरी बोली।

"मैं। दिन का उजाला होने से पहले ही, तेज-तेज चलता हुआ, पैदल ही इस हवेली में आ गया। जितना उस रात भागा। चला। उतना शायद कभी नहीं चला था।"

"इस हवेली के बारे में तुम्हें पहले पता था कि...।"

"ये हवेली मेरी ही है।"

"तुम्हारी?" मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।

"हां। नीलामी में इसे मैंने ही खरीदा था। और...।"

"यानी कि इस हवेली के बारे में दिल्ली वाले वासवानी को कोई खबर नहीं।" मोना चौधरी के होंठों से निकला।

"नहीं। उसे हवेली के बारे में जानकारी होती तो सबसे पहले, वो लोग यहीं पर मुझे तलाश करते।"

"फिर तो तुम मेरी निगाहों में ये बात साबित कर सकते हो कि तुम ही असली अजीत वासवानी हो। क्लोन नहीं हो। ये बात कई लोग जानते होंगे कि नीलामी में हवेली तुमने खरीदी। किसी को न भी मालूम हो तो सरकारी रिकॉर्ड को चैक किया जा सकता है कि हवेली अब तुम्हारे नाम पर है। दिल्ली वाले वासवानी से मैं मालूम करूंगी कि उसने कोई हवेली खरीदी है क्या? उसके इंकार करने पर, ये बात साफ हो जाएगी कि वो क्लोन है?" मोना चौधरी ने सामान्य स्वर में कहा।

"कोई फायदा नहीं।" उसने दांत भींचकर इंकार में सिर हिलाया।

"क्या मतलब?"

"ये हवेली, सरकारी रिकॉर्ड में, मेरे नाम पर नहीं है।"

मोना चौधरी के माथे पर बल नजर आने लगे।

"दरअसल, मैं कोई ऐसी जगह लेना चाहता था, जहां जब भी चाहूं आराम से रह सकूं और मेरे दुश्मनों को भी इसका पता न चले। थोड़ा, खुली हवा में भी घूम सकूं। ऐसे में मैंने ये हवेली, किसी खास पहचान वाले की मार्फत खरीदी। हवेली उसी के नाम पर खरीदी गई। मेरे कहने पर उसी ने हवेली की मरम्मत कर, साफ-सफाई कराकर, रहने के लायक बनाया। सोचा था, जब रहने आऊंगा तो बाकी के काम अपनी देखरेख में करवाऊंगा।" उसने गंभीर स्वर में कहा--- "और तो और मैंने अभी तक मारवाह को भी नहीं बताया था, इस हवेली के बारे में।"

"मतलब कि तुम ये भी साबित नहीं कर सकते कि नीलामी में यह हवेली तुमने खरीदी थी।"

"जिसके मार्फत खरीदी थी। वो ही, ये बात तुम्हें बता सकता है।" उसने मोना चौधरी को देखा।

"वो तुम्हारे इशारे पर कुछ भी बता देगा कुछ भी कह देगा। उस पर तो विश्वास नहीं किया जा सकता।" मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़कर कहा--- "यानी तुम्हारे पास कोई ठोस सबूत नहीं है खुद को अजीत वासवानी साबित करने का। सब कुछ हवा-हवा में ही है।

वो होंठ भींचकर रह गया।

"खैर, हवेली में आकर तुमने क्या किया?" मोना चौधरी बोली।

दो पल की चुप्पी के पश्चात वो सिर हिलाकर कह उठा।

"मैं चार दिन हवेली में ही छुपा रहा। कुछ भी नहीं था खाने को मेरे पास। तुम यकीन करोगी... नहीं करोगी। अजीत वासवानी जैसी हस्ती खेतों में काम करने वाले मजदूरों से, उनकी सूखी रोटी मांग कर खाता रहा। लेकिन बहुत स्वाद था उस रोटी में। एक ही रोटी में पेट भर जाता था। गेहूं की असली महक थी, उस रोटी में।" कहकर उसने गहरी सांस ली--- "चार दिनों में मेरी शेव बढ़ गई थी। कपड़े मैले हो गए थे। इतना गंदा बनकर मैं कभी नहीं रहा। पांचवें दिन मैं खतरा उठाकर हवेली से बाहर गया और दो मील पैदल चलकर, दुकान पर मौजूद फोन पर पहुंचा। वहां से फोन करके, अपने उस पहचान वाले को अकेला आने को कहा, जिसकी मार्फत मैंने हवेली खरीदी थी। वो आया, उसके साथ कार में वापस हवेली में आया। मुझे इस हाल में देखकर वो हैरान था। तब मैंने सारे हालात उसे बताए। देर तक मैं, उसके साथ इस मुद्दे पर बात करता रहा और अंत में इसी नतीजे पर पहुंचे कि, मामला इस हद तक गंभीर हो चुका है कि सामने जाना, खुले में आना भी खतरे से खाली नहीं। वो लोग मुझे देखते ही फौरन खत्म कर देंगे और यकीनन उनके आदमी जयपुर का चप्पा-चप्पा ठोक-बजाकर देख रहे होंगे, मेरे लिए। यानी कि सारी बातें छोड़कर, अहम बात ये सामने आ गई कि मैं इन हालातों में अपनी जान कैसे बचाऊं। बाकी मामले के बारे में तो बाद में भी सोचा जा सकता है और मैं सबसे ज्यादा इसी हवेली में सुरक्षित था, क्योंकि हवेली के बारे में, मेरे उस पहचान वाले के अलावा और कोई नहीं जानता था। इन हालातों में जयपुर से बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं था।"

उसने खामोश होकर मोना चौधरी को देखा।

"तुमने पचास लाख रतनचंद को दिए। ये लोग पहरे पर हैं, इन्हें भी मोटी रकम दी है। ये सारा पैसा कहां से आया। जबकि तुम छिपे हुए हो।"

"मेरे उसी पहचान वाले ने दिया है। पैसा मेरे लिए कोई अहमियत नहीं रखता। जितने का भी इस इंतजाम चाहूं, यहीं बैठे-बैठे कर सकता हूं। मोबाइल फोन भी उसी से मंगवाया था। पहरे पर जो आदमी मौजूद हैं, इनका इंतजाम मेरे पहचान वाले ने ही किया है। मेरे खर्चे पर। उसी से बात करके, ये फैसला किया गया कि रतनचंद जैसे तेज-तर्रार प्राइवेट जासूस से इस मामले पर बात की जा सकती है। फोन पर मैंने रतनचंद से, मुलाकात तय की। बाहर ही उससे मिला और सारी बात उसके सामने रखकर, उसे विश्वास दिलाया। तब वो मेरे क्लोन को, खत्म करने को तैयार हुआ। मेरी पहचान वाला, रतनचंद के सामने नहीं आया। इसलिए कि बात खुल सकती है और मेरे दुश्मन उसके द्वारा मुझ तक पहुंच सकते हैं। इस काम की रतनचंद ने जो फीस मांगी। मैंने मान ली। आधी रकम एडवांस में भी दे दी और तब से मैं हवेली में ही छिपकर रह रहा हूं। इधर मेरी पहचान वाला मेरे कहने पर हर जगह पर नजर रख रहा था। उसने ही बताया कि, मेरे क्लोन ने, मेरी हत्या के लिए मोना चौधरी नाम की खतरनाक शख्सियत, यानी कि तुम्हें, बड़ी रकम देकर जयपुर भेजा है और तुम यहां पर मुझे ढूंढ रही हो। ये बात मैंने बलराम को बताकर और भी सतर्क रहने को कहा। ये है सारा मामला।"

"ये तो तुम कहते हो।" मोना चौधरी बोली।

"क्या मतलब?"

"जो भी कहा है, तुम कहते हो। लेकिन तुम्हारी कोई बात ये साबित नहीं करती कि तुम क्लोन न होकर, असली अजीत वासवानी हो।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका।

"तुमने जो पूछा था, मैंने बताया। साबित होता है या नहीं। तुम जानो।" उसने होंठ भींचकर कहा।

मोना चौधरी ने गंभीर स्वर में कहा।

"तुम जानते हो, मैंने तुम्हारी हत्या करने का प्रोग्राम क्यों एक तरफ छोड़ रखा है। इसलिए कि मालूम कर सकूं कि कहीं मैं असली अजीत वासवानी की हत्या तो खामखाह नहीं करने जा रही। यही बात रतनचंद के काम के आड़े आ रही है। इसी वजह से उसने मुझसे मुलाकात करके, बात की कि वो या मैं, कोई एक गलत इंसान की हत्या की चेष्टा में है, और ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए पहले ये मालूम करना है कि कौन क्लोन है और कौन असली। अगर ये बात स्पष्ट नहीं होती तो, तुम्हारे और दिल्ली वाले, यानी कि दोनों के लिए ही आने वाला वक्त खतरनाक हालातों से घिरा हो सकता है।"

वो व्याकुल-सा मोना चौधरी को देखता रहा।

"खामोश क्यों हो गए?"

"बोलकर भी क्या करूंगा।" उसने दांत भींचकर कहा--- "मैंने तो सब कुछ तुम्हारे सामने रख दिया है।"

"लेकिन मुझे तो दिल्ली वाला ही, असली वासवानी लगता है।" मोना चौधरी बोली--- "तुम्हारी कही बातों में ऐसी कोई बात नहीं है कि मैं सोचने पर मजबूर हो जाऊं कि तुम असली भी हो सकते हो।"

"मैं असली अजीत वासवानी हूं। समझी तुम।" वो दांत पीसते हुए गुर्रा उठा।

"तुम्हारे बारे में बात करते हुए वो दिल्ली वाला वासवानी भी इसी तरह गुस्से में आता था। मुझे तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि जैसे मैं तुमसे दूसरी बार मिल रही हूं।"

"पहले कब मिली थीं?"

"दिल्ली में। तीस करोड़ तुमने ही तो दिए थे।" मोना चौधरी की निगाह उसके चेहरे पर थी।

वो सख्त निगाहों से मोना चौधरी को घूरता रहा।

"मैं तुमसे आज पहली बार मिला हूं।" वो एक-एक शब्द चबाकर कह उठा।

"हो सकता है।" मोना चौधरी मुस्कुराई--- "और अब तुम्हारे पास, इस मसले को हल करने का कोई रास्ता नहीं।"

"कितनी बार कहूं।" उसने खा जाने वाले लहजे में कहा।

"लेकिन मेरे पास एक रास्ता है।" मोना चौधरी का स्वर गंभीर था--- "मैं वो ढंग इस्तेमाल नहीं करना चाहती थी। परंतु मुझे लगता है कि वही रास्ता इस्तेमाल करना होगा। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुम्हें मेरी बात पसंद आती है या नहीं।"

वो सवालिया निगाहों से मोना चौधरी को देखने लगा।

"तुम्हें और उसे, एक-दूसरे के आमने-सामने आना होगा।" मोना चौधरी ने कहा।

उसके माथे पर फौरन बल नजर आने लगे।

"क्या पागलों वाली बातें कर रही हो।" वो उखड़ा।

"क्यों? इसमें पागलों वाली बात कहां से आ गई।"

"मैं उसके सामने गया तो वो या उसके साथी मुझे छोड़ेंगे? वो तो पहले से ही मुझे तलाश कर रहे होंगे। देखते ही मुझे शूट कर देंगे। मैं उनसे छिप रहा हूं और तुम मुझे सामने आने को कह रही हो। जबकि मैंने तुम्हें नहीं, मेरे क्लोन ने पैसे दिए हैं। तुम तो...।"

"जल्दबाजी मत करो। आराम से मेरी बात सुनो।" मोना चौधरी ने कहा--- "बाद में चाहो तो रतनचंद से भी इस बारे में सलाह ले लेना। मैं तुम पर अपना फैसला नहीं थोप रही।"

वो मोना चौधरी को घूरता रहा।

"ये बात मैं तुमसे तो कर सकती हूं, लेकिन दिल्ली वाले से नहीं। क्योंकि उससे मैंने, तुम्हारी हत्या करने की कीमत ली है। अगर तुम असली हो तो मेरी बात अवश्य मानोगे।"

"क्या कहना चाहती हो तुम?"

"तुम्हें मेरे साथ दिल्ली चलना होगा। वहां किसी खास जगह पर मैं, दिल्ली वाले वासवानी को फोन करके बुलाऊंगी, लेकिन सामने नहीं आऊंगी। तुम दोनों सामने होगे। अगर तुम सच्चे हो तो अकेले में आसानी से उसके मुंह से निकलवा सकते हो कि वो क्लोन है। या उसने तुम्हारी जगह ले ली है। ऐसी पचासों बातें हैं। कोई एक बात भी सामने आ गई तो सच-झूठ मेरे सामने होगा।"

"मोना चौधरी।" उसने शब्दों को चबाते हुए कहा--- "ये काम मेरे लिए कठिन नहीं। वो सामने आ जाए तो मैं आसानी से उसके मुंह से ऐसी दसियों बातें निकलवा लूंगा। लेकिन मुझे कौन बचाएगा।"

"क्या मतलब?"

"तुम नहीं जानतीं, वो लोग बहुत सतर्क हैं।" उसने गुस्से में कहा--- "तुम्हारे बुलाने पर वो बाहर निकलकर खुद को खतरे में नहीं डालना चाहेगा। मजबूर होकर निकला भी तो, पहले उस डॉक्टर या अपने दूसरे साथी से बात करेगा। वो जहां भी आएगा, उसके वो साथी उसकी सुरक्षा के लिए आसपास होंगे। मुझे देखते ही वो गोलियां चलाने में देर नहीं लगाएंगे।"

"ऐसी नौबत आई तो तुम्हें बचाने की जिम्मेवारी मेरी।"

"तुम बताओगी मुझे?"

"हां।"

"और अगर न बचा पाई तो...?"

"तुम्हें कुछ नहीं होगा।"

"मैं कहता हूं अगर हो गया। मैं मारा गया। उन्होंने मुझे मार दिया तो---तब? बाद में जो भी होता रहे। मेरी जान तो गई।" उसने तीखे स्वर में कहा--- "ढेर सारी गोलियां एक साथ मेरी तरफ आई तो तुम किस-किस गोली से मुझे बचाओगी। बेकार की बात है। तुम ऐसे मौके पर मुझे नहीं बचा सकती। जानबूझकर मुझे मौत के मुंह में धकेल रही हो। इतनी आसानी से मैं फंसने वाला नहीं।"

मोना चौधरी मुस्कुराई।

"नहीं तो, क्या करोगे?"

उसने होंठ भींच लिए।

"कुछ नहीं कर सकते। यूं ही छिपे रहोगे और ज्यादा देर नहीं छिपे रह सकते। वो बेशक असली हो या क्लोन। उसके साथी तुम्हें ढूंढ ही निकालेंगे और ये मामला खत्म हो जाएगा।" मोना चौधरी एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठी--- "अगर तुम असली अजीत वासवानी हो तो तुम्हें फौरन मेरी बात मान लेनी चाहिए। बहुत ही खूबसूरत मौका है, तुम्हारे सामने। अगर तुम असली अजीत वासवानी हो तो।"

वो मोना चौधरी को घूरता रहा।

"पसंद नहीं आई मेरी बात?"

"नहीं।" उसने सख्ती भरे ढंग से सिर हिलाया।

"मतलब कि तुम ही क्लोन हो।"

"बकवास। मैं अजीत वासवानी हूं।"

"अजीत वासवानी होते तो, मेरी बात फौरन मान लेते।"

"मैं अजीत वासवानी जरूर हूं। पागल नहीं हूं।" वो गुस्से से गुर्रा उठा।

"मर्जी तुम्हारी।" मोना चौधरी ने उसे घूरा--- "मुझे चलना चाहिए।"

"तुम यहां से जिंदा नहीं जा सकतीं। तुम्हें जिंदा छोड़कर, अपनी मौत को बुलावा नहीं भेज सकता।" वो खतरनाक स्वर में कह उठा--- "मुझे तो हैरानी है कि तुम मुझ तक पहुंचीं कैसे?"

"इस बात को रहने दो।"

"मालूम कर लूंगा मैं। रतनचंद ने माना है कि वो, जानता था कि तुम, मुझ तक पहुंच सकती हो। जिस तरह तुम मुझ तक पहुंची हो, वो मैं रतनचंद से मालूम कर लूंगा। तुम्हारी ही तरह अगर क्लोन के आदमी मुझ तक पहुंच गए तो बहुत बुरा होगा। इसलिए, मेरे वास्ते जानना जरूरी है कि तुम यहां कैसे पहुंच गईं। अब...।"

"मैं रतनचंद से बात करना चाहती हूं।" एकाएक मोना चौधरी ने कहा।

"क्यों?"

"जो बात भी होगी। तुम्हारे सामने होगी। फोन तुम्हारे पास है। तुम्हें रतनचंद से बात कराने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। बेशक, लाइन तुम मिलाकर, मुझे फोन दे दो।"

कुछ पल वो मोना चौधरी को घूरता रहा, फिर खुद ही रतनचंद का नंबर मिलाकर फोन उसे दिया।

मोना चौधरी की रतनचंद से बात हुई।

■■■

"पता चला वो असली है या नकली?" रतनचंद की आवाज कानों में पड़ी।

"नहीं मालूम हो सका।" मोना चौधरी ने उस पर निगाह मारी--- "दोनों ही असली लगते हैं और दोनों ही नकली। इस बात का फैसला ले पाना आसान नहीं है। जिस रास्ते से सच्चाई सामने आ सकती हैं, वो मैंने बताया, लेकिन इसे मेरी बात पसंद नहीं आई।"

"क्या? क्या रास्ता बताया तुमने?"

"वो इसी से पूछ लेना। मैंने दूसरी वजह से तुमसे बात की है।" मोना चौधरी बोली--- "ये मुझे खतरा मानकर मुझे खत्म कर देना चाहता है। मैंने इसका ठिकाना देख लिया है। इसका ख्याल है कि मैं दिल्ली वाले को बता सकती हूं कि ये कहां पर छिपा हुआ है। मेरे ख्याल में तुम इसे समझा सकते हो कि जब तक असली-नकली का फैसला नहीं होता। तब तक इसे कोई खतरा नहीं होगा मेरी तरफ से और न ही मैं इसके ठिकाने के बारे में किसी से जिक्र करूंगी। अगर ये वास्तव में अजीत वासवानी है तो इसे, मुझसे जरा भी खतरा नहीं होगा।"

रतनचंद की आवाज नहीं आई।

"बोलो।" मोना चौधरी ने पुनः कहा।

"वो इस वक्त जिन हालातों में फंसा हुआ है।" रतनचंद का गंभीर स्वर कानों में पड़ा--- "वो हालात, उसे इस बात की छूट नहीं देते कि, किसी पर विश्वास करे। खासतौर से तुम पर। लेकिन फिर भी मैं उससे बात करता हूं। कह नहीं सकता कि वो मेरी बात मानेगा या नहीं। फोन उसे दो।"

मोना चौधरी ने उसकी तरफ फोन बढ़ाते हुए कहा।

"रतनचंद तुमसे बात करना चाहता है।"

मोना चौधरी को कठोर निगाहों से देखते हुए उसने फोन थामा।

"कहो।" उसके होंठ भिंचे हुए थे।

"वासवानी साहब।" रतनचंद का स्वर उसके कानों में पड़ा--- "अगर आपको मुझ पर यकीन है तो, मेरी बात का विश्वास कीजिए, मोना चौधरी आपके लिए खतरा पैदा नहीं करेगी।"

"किया तो, मैं तुम्हें कहां ढूंढता रहूंगा।" अजीत वासवानी ने कड़वे स्वर में कहा--- "जब मेरी जान, मोना चौधरी की वजह से जा रही होगी तो, तुम मुझे कैसे बचाओगे। मर गया तो तुमसे कौन कहेगा कि मेरी जान तुम पर भरोसा करने की वजह से गई और सबसे पहले तो मैं तुमसे पूछना चाहता हूं, जो मेरी जान लेना चाहता है। तुम उसकी तरफदारी क्यों कर रहे हो। तुम मेरे लिए काम कर रहे हो या बिककर, दूसरे के लिए काम कर रहे हो। मैंने तो सुना था कि कम-से-कम तुम अपने क्लाइंट से हेराफेरी नहीं करते। तभी मैंने तुमसे बात की। लेकिन तुम्हारी हरकतें बता रही हैं कि तुम मेरा काम ठीक से नहीं कर रहे।"

रतनचंद की आवाज नहीं आई।

"मुझे जवाब चाहिए रतनचंद। मैं तुम्हारा क्लाइंट हूं। मैंने तुम्हें मुंह मांगी फीस दी है और पूछने का हक रखता हूं।"

"मैंने इसलिए कुछ नहीं कहा कि, पहले आपकी सुन लेना चाहता हूं।" रतनचंद का स्वर गंभीर था।

"और क्या सुनोगे। जितना कहा है, उसका जवाब दे दो।" वो सख्त स्वर में बोला।

"मैं आपकी हर बात का जवाब दूंगा। लेकिन उससे पहले ये भी जानना चाहूंगा कि मोना चौधरी ने आपको क्या रास्ता बताया कि जिससे असली-नकली का पता चल सके।"

"रतनचंद तुम...।" उसने गुस्से से कहना चाहा।

"आप मुझे जो भी कहिए। लेकिन यह बात अवश्य जानना चाहूंगा।" रतनचंद की आवाज में पक्कापन था।

उसने मोना चौधरी को सख्त निगाहों से देखते हुए, फोन पर रतनचंद को बताया कि मोना चौधरी ने उसे क्या रास्ता बताया है।

"वासवानी साहब।" सुनने के के बाद रतनचंद का सोच भरा स्वर आया--- "अब बात फोन पर नहीं हो सकती। हमें मिलकर बात करनी होगी।"

"क्यों?"

"बात लंबी हो जाएगी। फोन पर बात करके शायद कोई नतीजा भी न निकले। इसलिए...।"

"मैं जहां हूं वहां से नहीं निकल सकता। तुम्हें जो बात करनी हो, फोन पर ही करो।" उसने दांत भींचकर कहा।

क्षण भर की चुप्पी के बाद रतनचंद की आवाज कानों में पड़ी।

"मैं, आपके पास आ जाऊं।"

उसकी आंखें सिकुड़ी।

"तुम जानते हो, मैं कहां पर हूं।"

"हां।"

कई पलों तक वो दांत भींचे रहा।

"ठीक है।" उसने शब्दों को चबाते हुए कहा--- "आ जाओ।" इसके साथ ही उसने फोन कर बंद करके जेब में डाला।

मोना चौधरी उसे ही देख रही थी।

"तुमने रतनचंद को बताया कि मैं यहां हूं या रतनचंद ने तुम्हें।" उसने शब्दों को चबाते हुए पूछा।

"ये सवाल रतनचंद से ही करना।" मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा।

चेहरे पर सख्ती समेटे उसने ऊंचे स्वर में आवाज लगाई।

"बलराम।"

दूसरे ही पलों में रिवाल्वर थामे बलराम चौखट पर नजर आया।

"रतनचंद आ रहा है। आने देना। बाहर जाकर बोलो और वापस आ जाओ।"

बलराम सिर हिलाकर वहां से चला गया।

चालीसवें मिनट रतनचंद वहां मौजूद था।

■■■

रतनचंद को देखते ही वो कठोर स्वर में बोला।

"तुम मेरी जासूसी कर रहे थे।"

रतनचंद ने मोना चौधरी को देखा तो मोना चौधरी ने कंधे उचकाए।

रतनचंद के चेहरे पर गंभीरता, व्याकुलता और सोच के भाव स्पष्ट झलक रहे थे। लगता था जैसे बहुत कुछ कहना चाहता हो, लेकिन उलझा पड़ा हो।

"सबसे पहले मुझे बताओ कि तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि मैं यहां...।"

"वासवानी साहब मैं आपसे अकेले में बात करना चाहता हूं।" रतनचंद ने कहा।

उसने गुस्से से रतनचंद को देखा फिर बलराम को बुलाकर कहा।

"मोना चौधरी को यहां से बाहर ले जाओ। हमें कुछ बात करनी है। गड़बड़ करे तो बेशक इसे शूट कर देना। सोचने में वक्त मत गंवाना।" स्वर में खतरनाक भाव आ गए थे।

"ठीक है।" बलराम के चेहरे पर खतरनाक भाव उभरे।

मोना चौधरी मुस्कुराकर, बलराम के साथ बाहर निकल गई।

कमरे में उसकी कभी ऊंची और गुस्से से भरी आवाज आने लगती तो कभी एकदम शांति छा गई। काफी वक्त बीता। डेढ़ घंटे बाद, बलराम को पुकारा गया। मोना चौधरी के वास्ते। बलराम, मोना चौधरी को भीतर छोड़कर, वापस बाहर आ खड़ा हुआ।

■■■

रतनचंद के चेहरे का हाल बता रहा था कि वो मेहनत के बुरे दौर से गुजरकर हटा है। ऐसा कौन-सा भाव था, जो उसके चेहरे पर नहीं था। वह बहुत थका हुआ लग रहा था। आंखों के पोपटे भी भारी हो रहे थे। पस्त-सा कुर्सी पर बैठा था।

और उसका हाल भी कुछ जुदा नहीं था।

वो भी थका-टूटा हारा कुर्सी पर पसरा पड़ा था। जैसे आराम करना चाहता हो। परंतु चेहरे पर अब गुस्से की जगह, मजबूरी-सी नजर आ रही थी। अनिच्छा के लक्षण उसके हाव-भाव में मौजूद थे। आंखें बंद कर रखी थीं। मोना चौधरी के कदमों की आहट पर भी उसने आंखें नहीं खोलीं।

"क्या हुआ?" मोना चौधरी ने दोनों पर निगाह मारकर रतनचंद से पूछा।

"ये रतनचंद ने लंबी सांस ली--- "मेरा मतलब है कि वासवानी साहब तुम्हारी बात मानने को तैयार हो गए हैं।"

"कौन-सी बात?" मोना चौधरी कुर्सी पर बैठ गई।

"दिल्ली में जो वासवानी मौजूद है, उसके सामने जाने की।"

मोना चौधरी ने गंभीरता से सिर हिलाया।

"लेकिन ऐसा करने में इन्हें जान का पूरा-पूरा खतरा है। ये तुम भी समझती हो।" रतनचंद ने कहा।

"खतरा है अवश्य। लेकिन मैं इसका कुछ बिगड़ने नहीं दूंगी।" मोना चौधरी ने अपने स्वर में पक्कापन लाकर कहा--- "अगर ये क्लोन निकला तो, इसे मैं अपने हाथों से शूट करूंगी।"

आंखें बंद किए वो वैसे ही पड़ा रहा। मोना चौधरी के शब्दों पर वो जरा भी नहीं हिला।

"ये ही अजीत वासवानी साहब हैं।" रतनचंद ने बेचैन स्वर में कहा।

उसने आंखें खोली और मोना चौधरी को देखकर थके स्वर में बोला।

"मैं असली हूं या क्लोन। वक्त आने पर पता चल जाएगा। बहुत लंबा खिंच गया है ये मामला। जैसे भी हो, आर या पार, मैं यह मामला खत्म हुआ देखना चाहता हूं।"

मोना चौधरी ने मुस्कुराकर, रतनचंद को देखा।

"इसे लाइन पर लाने के लिए तुम्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी है। इस बात का एहसास है मुझे।"

"मैं और मेरे दो साथी इसे सुरक्षा देने के वास्ते, इसके साथ दिल्ली जाएंगे।" रतनचंद बोला।

"मुझे क्या एतराज हो सकता है।"

"बलराम भी मेरे साथ रहेगा।" उसने शांत स्वर में मोना चौधरी से कहा।

"बेशक जिसे भी साथ ले लो।" मोना चौधरी बोली--- "लेकिन योजना, मेरी होगी। करना वही होगा, जैसा मैं कहूंगी। इसके अलावा जो मन में आए करो, मुझे कोई एतराज नहीं।"

रतनचंद ने उसे देखा।

"आज रात दिल्ली के लिए चल पड़ें वासवानी साहब?"

"मुझे कोई एतराज नहीं।" वो बेचैन-सा हो उठा था।

"हरीचंद मुझे हवेली के भीतर लाया। इस बात को लेकर, उसे कुछ न कहा जाए।" मोना चौधरी ने उससे कहा।

उसने सहमति में सिर हिला दिया।

मोना चौधरी ने रतनचंद को पारसनाथ का फोन नंबर बताते हुए कहा।

"दिल्ली पहुंचकर मुझे इस नंबर पर फोन कर लेना।"

रतनचंद ने सहमति में सिर हिलाया।

मोना चौधरी उठ खड़ी हुई।

"मैं जा रही हूं।"

"बलराम।" उसने पुकारा।

बलराम तुरंत चौखट पर नजर आया।

"मोना चौधरी को जाने दो।"

■■■

बाहर आकर मोना चौधरी महाजन से मिली।

महाजन कल शाम से ही अपनी जगह पर डटा हुआ था। तब से न तो उसने कुछ खाया था और व्हिस्की खत्म हो जाने की वजह से, मुंह-गला और पेट खड़के पड़े थे।

"क्या रहा बेबी।" महाजन तुरंत उसके पास जा पहुंचा--- "जब रतनचंद को हवेली के भीतर जाते देखा तो तभी समझ गया था कि कोई नई बात पैदा हो गई है।"

मोना चौधरी ने सब बताया। भीतर जो हुआ था।

सुनकर महाजन के होंठ सिकुड़ गए।

"मतलब कि दोनों वासवानी के आमने-सामने होने पर मामला निपट जाएगा।" महाजन के होंठों से निकला।

"हां। तब कुछ तो ऐसा होगा कि नकली की पहचान आसानी से हो जाएगी।" मोना चौधरी बोली।

"तो आज वापस दिल्ली?"

"हां। सीधा, पारसनाथ के पास। रतनचंद को उसी का नंबर दिया है। वो वहीं फोन करेगा।"

दोनों कार में बैठे। महाजन ने कार आगे बढ़ाते हुए कहा।

"बेबी, सबसे पहले तो मैं व्हिस्की लूंगा और डटकर खाना खाऊंगा। उसके बाद दिल्ली की तरफ।"

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।

"लेकिन एक बात अभी तक समझ में नहीं आई।" महाजन बोला।

"क्या?"

"रतनचंद और हमारे पीछे कौन था। वो कौन था, जिसने...।"

"महाजन। अभी तक कोई भी बात समझ में नहीं आई और ये ऐसा मामला है कि, जब खुलेगा तो सब कुछ खुलता चला जाएगा। दोनों का सामना होने दो।" मोना चौधरी होंठ सिकोड़कर कह उठी।

"तब भी कुछ फायदा न हुआ तो।"

"कुछ तो होगा ही। मेरे ख्याल में तो पूरा होगा।"

शहरी इलाके में प्रवेश करते ही, महाजन ने व्हिस्की की शॉप के सामने कार रोकी और उतरकर तेजी से उस तरफ बढ़ गया। मोना चौधरी ने आंखें बंद कर लीं।

रात के बारह बजे के करीब मोना चौधरी और महाजन दिल्ली पहुंचे, पारसनाथ के रेस्टोरेंट में।

पारसनाथ ने फौरन उनका 'डिनर' कमरे में लगवाया। इस दौरान वो सारे मामले को जान चुका था। पारसनाथ भी उनके साथ डिनर लेने लगा।

"ये मामला तो वास्तव में उलझ गया है।" पारसनाथ खाने के दौरान बोला।

"उलझा हुआ अवश्य है।" मोना चौधरी बोली--- "लेकिन अब सुलझ जाएगा।"

पारसनाथ ने मोना चौधरी को देखा।

"उन दोनों को आमने-सामने कराना ठीक नहीं। पारसनाथ ने गंभीर स्वर में कहा--- "मेरे ख्याल में वे दोनों ही, आनन-फानन में एक-दूसरे की जान लेने की कोशिश करेंगे और अगर एक भी मर गया तो हमें बचे हुए को ही असली मानना होगा।"

मोना चौधरी ने मुस्कुराकर पारसनाथ को देखा।

"मुझे पूरा विश्वास है कि आमने-सामने होने पर, दोनों में से कोई भी, दूसरे की जान लेने की कोशिश नहीं करेगा। जयपुर वाला जानता है कि उसने क्या करना है, उससे मिलकर, और मैं पास ही हूं। दूसरे को मैं बुलाऊंगी, तो उसे भी पता होगा कि मैं पास हूं या पहुंचने वाली हूं। जयपुर वाले को सामने देखकर वो चौंकेगा जरूर। लेकिन उसकी जान लेने की अपेक्षा, पहले मौजूद हालातों को समझने की चेष्टा करेगा। उसी दौरान उन दोनों की बातें होगी, जिससे हम जान सकते हैं कि कौन असली है या कौन नकली।"

"तो तुम कहना चाहती हो कि उन दोनों के मिलने पर कोई खून-खराबा नहीं होगा और...।"

"होगा। बहुत कुछ होगा।" मोना चौधरी पुनः मुस्कुराई--- "सोचो, कौन करेगा?"

पारसनाथ और महाजन की नजरें मिलीं।

मोना चौधरी कह उठी।

"ये खून-खराबा क्लोन के साथी करेंगे। मसलन डॉक्टर या उसका साथी। उनके इशारे पर उनके आदमी। वो हर हाल, हर कीमत पर असली को खत्म करना चाहेंगे। जो क्लोन है, वो अपने ढंग से, मौजूदा हालातों की खबर अपने साथियों तक पहुंचा रहा है और भी कोई नई खबर पाने को सतर्कता से हर तरफ नजर रखे होंगे। अगर जयपुर वाला क्लोन है तो अपने साथियों को बताएगा कि मोना चौधरी के कहने पर खतरनाक जुआ खेलने जा रहा है और वो दूसरे को खत्म कर लेंगे। दिल्ली वाला क्लोन है तो वो अपने साथियों को तुरंत खबर करेगा कि मोना चौधरी ने जाने किस वजह के तहत उसे बाहर बुलाया है। ऐसे में जब वो बाहर निकलेगा तो उस पर नजर रखने वाले उसके साथी आसपास ही होंगे और दूसरे को देखते ही वो उसे खत्म करने की पूरी चेष्टा करेंगे। यानी कि तब होगा तो बहुत कुछ।"

पारसनाथ और महाजन, मोना चौधरी को देखते रहे।

मोना चौधरी ने दोनों पर गंभीर निगाह मारी।

"और हमें पूरी कोशिश करनी है कि दोनों के आमने-सामने होने पर खून-खराबा न हो। खासतौर से अजीत वासवानी और उसके क्लोन का कुछ नहीं बिगड़े। ये मालूम होने से पहले कि क्लोन कौन है, दोनों में से किसी की जान भी नहीं जानी चाहिए। इसके लिए हमें अपनी तरफ से तगड़ा इंतजाम करना होगा।"

"दोनों की आमने-सामने कब करना है?" पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा।"

"कल।"

"जयपुर वाला वासवानी दिल्ली कब पहुंचेगा?" पारसनाथ ने मोना चौधरी को देखा।

"आज रात किसी भी वक्त वो दिल्ली पहुंचकर, यहां फोन करेगा।"

सुबह चार बजे पारसनाथ के यहां रतनचंद का फोन आया।

"आधा घंटा पहले ही हम दिल्ली पहुंचे हैं।" बात शुरू होते ही रतनचंद की आवाज कानों में पड़ी।

"इस वक्त कहां हो?"

"मैं अपने किसी जानकार के यहां हूं। वासवानी के साथ होने की वजह से, किसी होटल में ठहरना ठीक नहीं था।"

"साथ में कौन-कौन हैं?"

"मेरे दो असिस्टेंट कृष्ण सूरी और वीरेंद्र हैं और बलराम है। यानी कि कुल पांच।"

"तुम घंटों से उसके साथ हो। उसमें ऐसी बात पता चली जो हमारे काम की हो।" मोना चौधरी की आवाज आई।

"नहीं। ऐसी तो कोई बात नहीं। जिससे उस बारे में भी अंदाजा लगा सकें।" रतनचंद का आने वाला स्वर धीमा था।

"मेरे जाने के बाद उसने कहीं फोन किया अपने मोबाइल से?" मोना चौधरी ने पूछा।

"किया भी हो तो मुझे मालूम नहीं। तुम्हारी जाने के, आधे घंटे के बाद ही, मैं हवेली से ऑफिस रवाना हो गया था। दिल्ली जाने की तैयारी करनी थी। उस दौरान वासवानी ने कहीं फोन पर बात की है तो मुझे खबर नहीं। मैंने रात दस बजे उसे हवेली से 'पिकअप' किया और दिल्ली के लिए चल पड़े।"

मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

"अब?" रतनचंद की आवाज कानों में पड़ी।

"अपना फोन नंबर दो।"

रतनचंद ने वहां का फोन नंबर बताया, जहां वो ठहरा था।

"ठीक है। मेरे फोन का इंतजार करना। न आए तो, दिन में नौ-दस बजे तुम फोन कर लेना। वैसे इस वक्त वो कैसी मानसिक स्थिति से गुजर रहा है।" मोना चौधरी ने पूछा।

"वो।" रतनचंद का कानों में पड़ने वाला स्वर धीमा हो गया--- "परेशान है। व्याकुल है। कभी-कभी तो जाने किस गहरी सोच में डूब जाता है। खुद उसने शायद ही कोई बात की हो। पूछने पर ही थोड़ा-बहुत जवाब देता है।"

"तुम्हें इस बात की हैरानी नहीं कि अगर वो अजीत वासवानी सच में है तो इस तरह क्यों छिप गया। अगर उसकी जगह क्लोन ने ली है तो, वो पचासों रास्तों से साबित कर सकता है कि वही अजीत वासवानी है और उसका क्लोन, उसका अस्तित्व खुद में समेटने पर लगा हुआ...।"

"मोना चौधरी।" रतनचंद के स्वर में बेचैनी आ गई--- "वो ही असल में अजीत वासवानी है।"

"ये कहने की वजह?"

"मेरा दिल कहता है।"

"दिल नहीं।" मोना चौधरी ने व्यंग्य से कहा--- "वो पचास लाख कहते हैं, जो तुमने एडवांस लिए हैं और बाकी के वो पचास लाख भी कहते हैं, जिन्हें झाड़ लेने की भरपूर कोशिश कर रहे हो।"

"ये बात पर भी लागू होती है।" रतनचंद का उखड़ा स्वर मोना चौधरी के कानों में पड़ा--- "तुमने इस मामले के लिए तीस करोड़ लिया है। अगर यही तीस करोड़ तुम्हें जयपुर वाले वासवानी से मिला होता तो तुम उसे ही असली वासवानी कहतीं। दिल्ली वाले वासवानी को असली कहकर तुम उसके दिए तीस करोड़ की कीमत चुकता कर रही हो।"

मोना चौधरी के होंठों पर मुस्कान नाच उठी।

"ये बात दिन में साफ हो जाएगी कि असली-नकली कौन है।" मोना चौधरी बोली--- "मैं तुम्हें फोन करूंगी या नाश्ते के बाद तुम फोन कर लेना।" मोना चौधरी ने रिसीवर रख दिया। चेहरे पर सोच के भाव थे।

"क्या हुआ?" महाजन ने पूछा। फोन की बेल बजने पर उसकी आंख खुली थी।

"रतनचंद, जयपुर वाले वासवानी को दिल्ली ले आया है। साथ उसके दो असिस्टेंट और बलराम है। अब मुझे दिल्ली वाले वासवानी को फोन करके मिलने के लिए जगह और वक्त तय करना है।"

"अभी, सुबह के चार बजे?"

"अभी करने से उसे लगेगा वास्तव में कोई खास बात है। मिलना बहुत जरूरी है। सामान्य वक्त में फोन किया गया तो, किसी स्थिति में वो टाल सकता है।" मोना चौधरी ने कहा और रिसीवर उठाकर नंबर मिलाने लगी। एक ही बार में लाइन मिल गई।

तीन-चार बार बेल बजने के पश्चात रिसीवर उठाया गया।

"हैलो।" इस आवाज को मोना चौधरी ने पहले नहीं सुना था।

"अजीत वासवानी से मेरी बात कराओ। मैं मोना चौधरी बोल रही हूं।"

"वासवानी साहब नींद में हैं। वो...।"

"तुमने सुना नहीं। मैंने अभी बात करनी है। उसी जगा दो।" मोना चौधरी की आवाज में कठोरता आ गई।

पल भर की खामोशी के बाद उसकी आवाज कानों में पड़ी।

"होल्ड करो।"

इसके बाद करीब मिनट बीता कि मारवाह का स्वर कानों में पड़ा।

"मोना चौधरी।"

"हां। वासवानी से मेरी बात कराओ।"

"क्लोन को खत्म कर दिया?" मारवाह ने जल्दी से पूछा।

"समझो हो ही गया।"

"क्या मतलब?"

"इस वक्त मेरे पास इन बातों के लिए वक्त नहीं है। मैं फोन बंद करने जा रही हूं। कुछ लोग मेरे पीछे हैं। बहुत जल्दी में हूं। वासवानी से मेरी बात कराते हो या नहीं।" मोना चौधरी ने ऐसे कहा, जैसे अभी फोन रख देगी।

"मेरे से बात करके काम नहीं चल सकता।"

"नहीं। फोन बंद करूं क्या?"

"रुको। मैं अभी वासवानी साहब से बात कराता हूं।"

मोना चौधरी रिसीवर थामें, होंठ सिकोड़े खड़ी रही।

दो मिनट बाद अजीत वासवानी का स्वर कानों में पड़ा।

"मोना चौधरी, मेरे क्लोन को खत्म कर दिया।"

"खत्म ही समझो।"

"समझो?" अजीत वासवानी के स्वर में उलझन आ गई--- मैं...।"

"मैंने कहा है, अपने क्लोन के बारे में निश्चिंत हो जाओ। अभी मेरे पास इतना वक्त नहीं कि तुम्हारे सवालों का जवाब दे सकूं। मैं तुमसे मिलना चाहती हूं।" मोना चौधरी ने आवाज में जल्दबाजी भरकर कहा।

"आ जाओ। मैं इंतजार कर...।"

"मैं आ नहीं सकती और अपनी स्थिति बताने का वक्त नहीं है मेरे पास। मैं खतरे में हूं। तुम्हारा क्लोन जिन लोगों ने बनाया है, वो मेरी जान लेना चाहते हैं और तुमसे मिलना, बात करना बहुत जरूरी है। दो-चार घंटों में मैं उनसे पीछा छुड़ा लूंगी। बाहर ही मिलने के लिए, कोई जगह तय...।"

"दिल्ली में हो।" अजीत वासवानी का स्वर कानों में पड़ा।

"हां। तुम्हारे क्लोन को खत्म करके अभी जयपुर से लौटी हूं और...।"

"ये जानकर मुझे बहुत खुशी और सुकून मिला कि तुमने मेरा क्लोन खत्म कर दिया। मेरे सिर पर आई मुसीबत को हटा दिया। अब मैं चैन से...।"

"वासवानी ये बातें बाद में, पहले मिलने की जगह और वक्त तय करो। मैं फोन बंद कर रही...।"

"बाहर निकलने से मैं खतरे में पड़ सकता हूं, क्लोन के साथी...।"

"मैं कुछ नहीं जानती। तुम मिलते हो या नहीं।" मोना चौधरी कठोर आवाज में बोली।

"मोना चौधरी।" अजीत वासवानी का सोच भरा स्वर कानों में पड़ा--- "तुमने मेरे क्लोन को खत्म करना था और अभी कहा कि तुमने उसे खत्म कर दिया। इसके बाद हमारे मिलने की क्या जरूरत।"

"तुम्हारे क्लोन के पास से कुछ ऐसे कागजात मिले हैं, जो कि किसी के हाथ लग गए तो, तुम्हारे लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। उन कागजों को किसी और के हवाले नहीं कर सकती। उन्हें लेने में, तुम्हारी दिलचस्पी है तो ठीक, नहीं तो...।"

"ठीक है।" अजीत वासवानी की आवाज में सोच थी--- "बोला, कहां आना है?"

"अपने साथ भीड़ मत लाना और चोरी-छिपे बंगले से निकलना। मैं नहीं चाहती कि क्लोन के बचे हुए साथी, जो मेरे पीछे, जयपुर से दिल्ली आए हैं, वो तुम्हें किसी तरह का नुकसान पहुंचा दें और मिलने के लिए भीड़भाड़ वाली जगह न चुने तो ठीक रहेगा। सुनसान जगह मुलाकात के लिए सुरक्षित रहेगी।"

"मुझे कोई एतराज नहीं।"

उनके बीच मिलने की बात तय हुई, दिल्ली-गुड़गांव रोड पर मौजूद, जंगल जैसी वीरान जगह और वक्त दिन के बारह बजे और साथ, सिर्फ मारवाह होगा।

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उसके बाद सुबह सात बजे फोन की बेल पर उनकी आंख खुली। पारसनाथ ने फोन पर बात की। दूसरी तरफ रतनचंद था। फोन मोना चौधरी के पास पहुंचा दिया गया।

"हैलो, रतनचंद।" मोना चौधरी ने कहा--- "बात हो गई है उससे।"

"क्या रहा?"

"आज के दिन के बारह बजे, उसे मिलने का वक्त तय हुआ है।"

"कहां।"

मोना चौधरी ने जगह बताकर कहा।

"तुम लोग नौ बजे मोती बाग रेड लाइट पर मिलो। लेट मत होना। आगे क्या करना है उस सिलसिले में बात करनी है कि...।"

"समझ गया, मैं वासवानी साहब को लेकर, ठीक नौ बजे मोती बाग लालबत्ती पर मिलूंगा।"

मोना चौधरी ने रिसीवर रखा और पारसनाथ से बोली।

"तुम भी साथ चलोगे पारसनाथ।"

"मैं तैयार मिलूंगा।" पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा।

"आज का दिन बहुत व्यस्त रहेगा।" मोना चौधरी के चेहरे पर गंभीरता नजर आ रही थी--- "कुछ भी हो सकता है, जब वे दोनों आमने-सामने आएंगे। लेकिन हमें किसी भी हालत में, दोनों में से किसी की जान नहीं जाने देना। मैं नहीं चाहती कि असली वासवानी मरे। इस बारे में, रास्ते में बात करेंगे। महाजन को नींद से उठा दो। वो...।"

"महाजन अभी उठा है। नाश्ते पर मिलते हैं।"

"उसे तैयार होने को बोलो।" मोना चौधरी उठ खड़ी हुई।

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