अंधेरा घिर चुका था। शाम ढलने लगी थी। रात के नौ बज रहे थे।
भोपाल सिंह ने लाइट नहीं जलाई थी। अंधेरे में ही बैठा हुआ था। उसके हाथ की उंगलियों में सुलगती सिग्रेट दबी थी। कश खींचने पर सिग्रेट अंगारे समान दहक उठती थी। दिन भर से, कालरा, नारंग और गुलाटी की खून में डूबी लाशें देख-देख कर वो थक गया था। इस महौल से उकताहट होने लगी थी। अंधेरा घिरा तो चैन की सांस ली कि अब लाशें नजर नहीं आयेंगी। लाइट भी इसी कारण नहीं जलाई थी कि फिर सामने पड़ी लाशें ही नजर आने लगेगी।
उसे इन्तजार था उसका, जिसके इशारे पर डकैती की थी।
उसने कहा था कि वो आयेगा आज। इन्तजार करते-करते देर हो गयी थी। वो आया नहीं। वो।
तभी दरवाजे पर थपथपाहट हुई। मध्यम सी आवाज उभरी। भोपाल सिंह सोचों में से बाहर निकला। नज़र दरवाजे की तरफ उठी।
पुन: धीमे से दरवाजा थपथपाया गया।
भोपाल सिंह उठा। अंधेरे में ही नीचे पड़ा नारंग के मृत शरीर से बचकर दरवाजे तक पहुंचा।
“क-कौन?” भोपाल सिंह के होंठों से खरखराता स्वर निकला।
“मैं”
भोपाल सिंह ने फौरन उस आवाज को पहचाना। दिल जोरों से धड़का। फौरन ही हाथों को बढ़ाकर सिटकनी हटाई और दोनों पल्ले खोल दिए।
बाहर भी अधेरा। भीतर भी अंधेरा।
वो स्पष्ट नज़र नहीं आ रहा था। साया सा लग रहा था वो।
सामने वो खड़ा था।
चौड़ा आकार था उसका।
“कैसे हो भोपाल सिंह।” वो ही स्वर कानों में पड़ा।
“अ-अच्छा हूं।” भोपाल सिंह की आवाज लड़खड़ाई।
“बहुत अच्छा काम किया तूने। एक ही झटके में तीनों को साफ कर दिया। कहां से सीखा ये सब?”
भोपाल सिंह से कुछ कहते न बना। वो बोला। ।
“मैं लाईट जलाता हूं।”
“रहने दो। मुझे लाशें देखने की आदत नहीं है। तीस अरब के जेवरातों को कहां रखा है?”
“उधर चादर में, बंधे हुए हैं।
“दिखाओ मुझे।”
भोपाल सिंह पलटकर, कमरे के भीतर की तरफ गया। आने वाले के हाथ में छोटी-सी पैंसिल टार्च की रोशनी चमक उठी। जो कि लकीर की भांति सीधी पड़ रही थी। उसी रोशनी में, नीचे पड़ी लाश से बचते हुए वो भोपाल सिंह के पीछे, कमरे में एक तरफ पड़ी गठरी तक पहुंचा।
“इसमें है वो जेवरात।”
उस लकीर जैसी रोशनी में उसने गठरी में, एक तरफ हाथ मारकर देखा। तसल्ली की कि उसमें जेवरात ही हैं। टार्च की उस रेखा जैसी लकीर में, उस व्यक्ति का चेहरा क्या, शरीर का कोई भी हिस्सा नजर नहीं आ रहा था। वो काला-काला साया सा लग रहा था।
“बहुत हिफाजत से रखे तीस अरब के जेवरात। गुड। इसे उठाओ। बाहर खड़ी मेरी कार में रखो। गठरी भारी है। मैं भी हाथ लगाता हूं इसे उठाने में।”
“ले-लेकिन मेरा हिस्सा।”
“तुम मेरे साथ चल रहे हो। आराम से बैठेंगे। बोतल खोलेंगे। पिएंगे। तुम्हारा हिस्सा भी अलग हो जायेगा। मेरे को कोई एतराज नहीं। कहो तो अभी तुम्हारा हिस्सा निकाल...।”
“ठीक है।” भोपाल सिंह बोला- “मैं आपके साथ चलता हूं। यहां ये लाशें मुझे परेशान करती हैं।”
“बेवकूफ वाली बात करते हो। लाशें कहां परेशान ।”
“आप अपना चेहरा नहीं दिखायेंगे मुझे।”
“क्यों नहीं। जरूर देखना। मेरे साथ ही तो चल रहे हो तुम।”
भोपाल सिंह जबकि अभी उसका चेहरा देखने का. ख्वाहिशमंद था। लेकिन दोबारा नहीं कहा। चेहरा देखने के लिये जोर नहीं दिया। उसके बाद दोनों तीस अरब के जेवरातों की गठरी उठाने लगे। भारी थी वो। परन्तु दोनों ने उठा ली। मेहनत लगी। दोनों ही कुछ थक गये थे, उस गठरी को बाहर खड़ी कार तक ले जाने में। बाहर, पास ही कार खड़ी थी। सामने वाहनों की चलती सड़क थी।
कोई देखता उन्हें, तो भी शक नहीं करता।
गठरी को कार की पीछे वाली सीट पर रख दिया। बड़ी कार थी। गठरी आसानी से भीतर आ गयी। दरवाजा बंद करके, उसने कार लॉक की और भोपाल सिंह से बोला।
“भीतर चलो।”
“भीतर-भीतर क्या करना है?”
“आओ देख लेना। मैं वहां ऐसा कुछ नहीं छोड़ना चाहता कि पुलिस बाद में तुम तक पहुंच सके।” कहने के साथ ही वो व्यक्ति पलटकर मकान के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।
भोपाल सिंह उसके साथ, उसके पीछे था।
दोनों खुले दरवाजे से भीतर पहुंचे।
“लाईट जलाऊं?” भोपाल सिंह बोला।
“जरूरत नहीं।” उस व्यक्ति का स्वर मुस्कराहट से भर गया- “अंधेरा ही काफी है। भोपाल सिंह, तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। कम से कम इस जन्म में तो तेरा किया मैं उतार नहीं सकता। अगले जन्म में ही ये उधार चुका पाऊंगा।”
“क्या-क्या मतलब मैं...।” भोपाल सिंह ने कहना चाहा।
“तुम तीन को मारकर, दस के मालिक बन जाना चाहते हो। साढ़े सात अरब एक ही झटके में कमा लेना चाहते हो। मैं तो एक को मारकर, दस अरब पा लूंगा। हर तरफ से मेरे लिये फायदे का ही सौदा है।” कहते हुए उसकी आवाज में क्रूरता के भाव आ गये। भोपाल सिंह नहीं देख पाया कि साईलैंसर लगी रिवॉल्वर कब से उसके हाथ में दबी हुई थी। बात पूरी होते ही हाथ में दबी रिवॉल्वर से तेज रोशनी के साथ शोला निकला और भोपाल सिंह की छाती में जा लगा।
भोपाल सिंह तीव्र झटके के साथ पीछे जा गिरा।
रिवॉल्वर पर साईलैंसर लगा होने की वजह से, रिवॉल्वर से चांटे जैसी आवाज उभरी थी।
वो देख रहा था अंधेरे में भी कि भोपाल सिंह कहां गिरा है। उसकी कराहटें भी उसके कानों में पड़ रही थी। वो आगे बढ़ा। पास पहुंचा झुका। रिवॉल्वर की नाल भोपाल सिंह के सिर से लगा दी।
“न...हीं।” भोपाल सिंह ने पीड़ा भरे स्वर में कहना चाहा।
तभी गोली चली। चांटे जैसी आवाज पुनः उभरी। गोली भोपाल सिंह के सिर में प्रवेश करके, खोपड़ी की हड्डी को तोड़ती हुई बाहर जाकर कहीं छिटक गयी।
भोपाल सिंह का तड़पना उसी पल बंद हो गया था। मर गया था वो।
वो व्यक्ति सीधा हुआ और साईलैंसर लगी रिवॉल्वर अपने कपड़ों में डालने के पश्चात् पलटा और दरवाजे से निकलकर बाहर खड़ी कार की तरफ बढ़ गया। जिसमें तीस अरब के जेवरात पड़े थे। देखते ही देखते वो कार में बैठा। कार स्टार्ट की हैडलाइट जली फिर कार आगे बढ़ी और सड़क पर जाते ट्रैफिक का हिस्सा बन गयी।
पीछे वो मकान अंधेरे में डूबा पड़ा था। दरवाजा खुला था। उन चार लोगों की लाशें भीतर पड़ी थी। जिन्होंने डकैती डाली थी। जिन्हें पुलिस शहर भर में तलाश कर रही थी। पुलिस के सवालों का जवाब देने के लिये, उनमें से कोई भी जिन्दा नहीं बचा था।
☐☐☐
तब शाम होने वाली थी जब देवराज चौहान, प्रवेश गोदरा के फ्लैट पर पहुंचा था। वो इस बात के प्रति बेहद सावधान था कि आस-पास पुलिस वाले न हों। रूपा ईरानी ने वानखेड़े को सबके बारे में बता दिया था। ऐसे में हो सकता था कि पुलिस वाले, गोदरा के घर पर हों या करीब ही कहीं, नज़र रख रहे हों।
लेकिन ऐसा कोई खतरा उसे महसूस नहीं हुआ।
गोदरा ही नहीं, कमल शर्मा भी वहीं मिला देवराज चौहान को वहां पाकर गोदरा चौंका। फिर संभल गया।
“तुम यहां।” उसके भीतर प्रवेश करते ही गोदरा दरवाजा बंद करते हुए बोला।
“वानखेड़े तुम्हारे बारे में जानता है। वो या पुलिस यहां आ सकती है। तुम सावधान रहना।” देवराज चौहान बोला।
“क्या किया जा सकता है। सावधान ही हूं। रूपा के बयान पर वो कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा हमारा।” गोदरा गम्भीर स्वर में कह उठा- “रनवीर भंडारी आया था दो घंटे पहले।”
देवराज चौहान की निगाह, गोदरा पर जा टिकी।
“वो अपना हिस्सा मांग रहा था। दो अरब तुमने उसे देने को कहा था। लेकिन वो मरने वाली हालत में था और कह रहा था कि पचास करोड़ ही दे दो, ताकि बाजार का उधार चुका कर बच सके।”
“मैंने की है डकैती?” देवराज चौहान का स्वर शांत था।
“नहीं।”
“तो कहां से दे दूं?” देवराज चौहान की आवाज तीखी हुई।
“मैंने तो वो बताया है जो उसने मुझे कहा।”
“इस ढंग से न कहो कि जैसे मैं उसका देनदार होऊ। बात यही थी कि अगर डकैती सफल रही तो दो अरब का हिस्सा उसे मिल जायेगा। हम डकैती नहीं कर सके। कोई दूसरा कर गया। बताया नहीं उसे...”
“मैं कैसे बताता। वो ये बात तो नहीं जानता कि मैं डकैती में तुम्हारे साथ हूं।” गोदरा ने गहरी सांस ली।
“तुम कैसे आये?”
कमल शर्मा कह उठा।
देवराज चौहान की नज़रें गोदरा पर जा टिकी।
“तुम अपनी तस्वीर दो।” देवराज चौहान ने शर्मा को देखा- “तुम्हारी तस्वीर भी चाहिये।”
“तस्वीर की क्या जरूरत पड़- “ गोदरा ने कहना चाहा।
“मेरे पास कोई ऐसा आदमी है, जो उस गद्दार को पहचान सकता है।” देवराज चौहान ने कहा- “उसे तस्वीरें दिखानी हैं कि वो गद्दार को पहचान सके। रूपा ईरानी की तस्वीर भी चाहिये। वो मॉडल्स है। किसी मैग्जीन में उसकी तस्वीर।”
“मेरे पास शर्मा और रूपा की तस्वीरें है।” गोदरा ने गम्भीर में कहा।
“रनवीर भंडारी की तस्वीर कहां से मिल पायेगी।”
प्रवेश गोदरा ने देवराज चौहान की आंखों में देखा।
“भंडारी की तस्वीर भी है। कुछ फोटोग्राफ्स हैं।”
“चल जायेगा। दो मुझे। मेरा यहां रुकना, खतरनाक है।”
गोदरा पीछे वाले कमरे की तरफ पलट गया।
कमल शर्मा की नजरें देवराज चौहान पर थी। “कौन है वो, जो गद्दार को पहचान सकता है?”
“तुम्हें फिक्र हो रही है?”
“मुझे क्यों फिक्र होने लगी।” शर्मा ने शांत स्वर में कहा- “मैंने तो यूं ही पूछा था।”
देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा ली।
गोदरा एक एलबम लेकर, वहां आ गया था। एलबम से तस्वीरें छांटकर देवराज चौहान को दी।
एक तस्वीर में वो शर्मा के साथ था। तस्वीर में लग रहा था कि वो किसी पहाड़ी जगह पर घूमने गये थे। वहां पर ये तस्वीर ली गयी थी। दूसरी में गोदरा रूपा ईरानी के साथ था। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम रखा था। मुस्करा रहे थे दोनों। तीसरी तस्वीर में गोदरा, रनवीर भंडारी के साथ था। दोनों ज्वैलरी शो-रूम में बैठे, कमरे की तरफ देख रहे थे। पास ही टेबल पर गिलास में दो कोल्ड ड्रिंक रखी थी।
देवराज चौहान ने तीनों तस्वीरें जेब में रखी।
“जा रहे हो?” गोदरा कह उठा।
देवराज चौहान ने उसे देखा।
“अगर” गोदरा ने थके-धीमें स्वर में कहा- “डकैती का पैसा हाथ लग गया तो-तो हमें कुछ मिलेगा?”
“मिलेगा।” देवराज चौहान पलटते हुए बोला- “तीस अरब के पूरे जेवरात हाथ लग गये तो, तय शुदा पूरा हिस्सा मिलेगा। कम हाथ लगा तो, उसी हिसाब से हिस्सा मिल पायेगा। नहीं कुछ मिला तो मैं मिलने भी नहीं आऊंगा।”
गोदरा गहरी सांस लेकर रह गया।
“तुम्हारा क्या ख्याल है, डकैती के अरबों के जेवरात मिलेंगे हमें?” कमल शर्मा ने एकाएक पूछा।
“मालूम नहीं।” देवराज चौहान पलटा और दरवाजे की तरफ बढ़ गया। उनके देखते ही देखते देवराज चौहान ने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।
दोनों के चेहरों से ऐसा लग रहा था जैसे देवराज चौहान नहीं, अरबों की दौलत जा रही हो।
कमल शर्मा बेचैन सा नजर आने लगा।
“तुम्हारा क्या ख्याल है। मिलेगा हमें पैसा?”
“हमें तो तब मिलेगा, जब देवराज चौहान उस दौलत को पा सकेगा।” प्रवेश गोदरा जैसे खुद को तैयार कर रहा था कि एक बार फिर से जिन्दगी की शुरूआत नये सिरे से करनी है- “मैंने तो आज तक गये पैसे को वापस आते देखा नहीं। देखते हैं कि ये पैसा देवराज चौहान पा लेता है या नहीं?”
“देवराज चौहान का बंगला तुमने भी देखा है। मैंने भी देखा है”
“तो?” गोदरा ने कमल शर्मा को देखा।
“अगर देवराज चौहान की खबर न मिली। वो हमसे न मिला तो देवराज चौहान के बंगले पर जाकर, उससे पूछ सकते हैं कि कहीं उसे दौलत मिल गयी हो, परन्तु वो हमें देना भूल गया हो।”
“मालूम नहीं क्या होता है। ये बाद की बातें हैं। इस वक्त आराम करने दो। सोचने दो मुझे कि मैं बेवकूफों की तरह क्यों देवराज चौहान के साथ डकैती में शामिल हो गया था। मेरा काम तो जौहरियों के यहां जेवरातों को परखना और ग्राहकों को खरीददारी के लिये पटाना था। दिमाग खराब हो गया था मेरा।”
गोदरा मुंह बनाकर कह उठा- “रूपा ने ठीक कहा था तब कि इस काम में हाथ न डालूं। ये खतरनाक काम है। मेरे बस का नहीं। लेकिन लालच मेरे सिर पर सवार था। मेरे ख्याल में हमें इस बात पर ही तसल्ली कर लेनी चाहिये कि पुलिस से बच गये। अभी तक तो पुलिस के पास, हमारे खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं कि वो हमें...”
“क्या पता हो।” शर्मा ने टोका।
“होता तो पुलिस ने भूखे कुत्ते की तरह हम पर टूट पड़ना था। कब का पुलिस ने हमें गिरफ्तार कर...”
“गिरफ्तार तो हम अभी भी हो सकते हैं। मैडम ईरानी ने मुंह फाड़ दिया है।” शर्मा तीखे स्वर में कह उठा।
गोदरा ने शर्मा को देखा।
“आया था उसका फोन।”
“क्या बोली?”
“शादी करने की तारीख पक्का करना चाहती थी।” गोदरा बरबस ही मुस्करा पड़ा।
“शादी की तारीख।” कमल शर्मा उखड़े स्वर में भड़क उठा- “यहां अपने बाजे बज रहे हैं और वो...तो तुमने क्या कहा?”
“टाल दिया। पास में फूटी कौड़ी नहीं। ऐसे शादी कैसे होगी। मैंने तो डकैती से मिलने वाली दौलत के भरोसे उसे शादी के लिये हां की थी। वैसे भी वो नशेड़ी है। स्मैक लेती है। दिल की अच्छी है परन्तु...”
तभी बाहर आहट मिली।
दोनों ने दरवाजे की तरफ देखा। कुछ मिनट पहले ही
देवराज चौहान बाहर गया था। दरवाजा खुला ही था अभी कि चौखट पर दोनों ने वानखेड़े को रुकते पाया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। फिर वानखेड़े को। पहले उन्होंने कभी वानखेड़े को नहीं देखा था।
“कौन हो तुम?”
“वानखेड़े। इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े।” वानखेड़े ने शांत निगाहों से देखते हुए कहा और भीतर आ गया।
☐☐☐
प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा एकाएक वानखेड़े को सामने पाकर ठगे से रह गये थे।
खुद को जल्दी ही संभालने की चेष्टा करता प्रवेश गोदरा कह उठा।
“कौन इंस्पेक्टर वानखेड़े? इस तरह भीतर कैसे आ गये?”
वानखेड़े मुस्कराया। पास आकर कुर्सी पर बैठते हुए बोला।
“अब ये मत कहना कि रूपा ईरानी तुमसे मिली नहीं। शायद न मिली हो। लेकिन अब तक फोन पर तो बात हो ही चुकी होगी कि वो मुझे सब बता चुकी है। ये बात तुम जानते ही हो। रूपा ईरानी से बात कराऊं क्या-उधर फोन रखा है।”
“क्या किया है हमने?” शर्मा ने स्वर को सामान्य रखते हुए कहा।
गोदरा ने फोन को देखा फिर वानखेड़े को।
“मैं कहूँ या रूपा ईरानी के मुंह से कहलवाऊं।”
प्रवेश गोदरा ने तीखी निगाहों से वानखेड़े को देखा।
“बात-बात पर रूपा का नाम क्यों ले रहे हो तुम?”
“तो तुम प्रवेश गोदरा हो। क्योंकि तुमने रूपा का नाम बहुत अपनेपन से लिया और ये कमल शर्मा।” वानखेड़े ने शांत स्वर में कहते हुए सिर हिलाया- “रूपा ईरानी का नाम मैं बार-बार लेकर तुम दोनों को ये साबित करना चाहता हूं कि मेरे से कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं। जितना छिपाओगे, उतना ही फंसोगे। मुझे तुम लोगों की जरूरत नहीं है। अगर मेरी बात के ठीक से जवाब न दिए तो मैं तुम लोगों को गिरफ्तार कर लूंगा। मेरे पास तुम लोगों के खिलाफ सबूत हैं। वो वीडियो कैसिट है, जो डकैती के वक्त हॉल में चल रही थी। जरूरत पड़ने पर और भी बहुत कुछ मिल जायेगा। ये मत सोचो कि रूपा ईरानी अपने कहे शब्दों से पीछे हट जायेगी। उसका बयान तुम दोनों को फंसाने के लिये बहुत है।”
प्रवेश गोदरा शांत निगाहों से वानखेड़े को देखता रहा।
कमल शर्मा परेशान-सा नजर आने लगा।
“काम की बात करो।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “क्या चाहते हो?”
“हर उस बात की जानकारी, जो तुम लोगों को है।”
“तुमने कहा कि तुम्हें हम लोगों की जरूरत नहीं है। तो किसकी जरूरत है?”
“जिन्होंने डकैती की। जो तीस अरब के जेवरात ले गये।
“मेरी पहली जरूरत उन्हें पकड़ना है। इसलिये तुम लोग खुद को बचा सकते हो, मेरी बातों का जवाब देकर।” वानखेड़े ने सख्त स्वर में कहा।
“जो लोग डकैती कर गये हैं, हम उनके बारे में कुछ नहीं जानते।” गोदरा सिर हिलाकर बोला।
वानखेड़े कुछ कहने लगा कि कमल शर्मा कह उठा।
“शायद देवराज चौहान जान गया हो।”
वानखेड़े की नज़रें सिकुड़ी। वो शर्मा को देखने लगा।
“क्या मतलब?”
“कुछ-कुछ देर पहले देवराज चौहान यहां आया था वो...।”
“कितनी देर पहले?” वानखेड़े चौंका।
“तुम्हारे आने से पांच मिनट पहले वो यहां से गया है।” शर्मा ही बोला।
“पांच मिनट।” वानखेड़े ने गहरी सांस ली- “मतलब कि मैं पांच मिनट पहले आ जाता तो-खैर-क्या बताने जा रहे थे तुम?”
कमल शर्मा ने गोदरा को देखा।
गोदरा मुंह फेरे बैठा था।
“उसे मत देखो, मेरे से बात करो।” वानखेड़े ने सख्त स्वर में टोका।
“देखते रहो उसे।” गोदरा ने वानखेड़े से कहा- “मैं उसे कुछ कहने से रोक नहीं रहा।”
वानखेड़े की नज़रें शर्मा पर थी।
“वो मेरी, गोदरा, रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी की तस्वीरें ले गया है कह रहा था कि उसके पास कोई है, जो उस गद्दार को पहचान सकता है। तस्वीरें देखकर, वो बता देगा कि हममें से गद्दार कौन है।'
“इस पर भी तुम यहां बैठे हो।” वानखेड़े गम्भीर स्वर में बोला।
“क्या दिक्कत है, हमारे यहां बैठने में?” गोदरा ने उसे देखा।
“देवराज चौहान गद्दार के बारे में जानकर वापस आयेगा। वो...”
“इंस्पेक्टर साहब।” गोदरा मुंह बनाकर बोला- “आप गलत कोशिश कर रहे हैं। ये तो जाहिर है कि जिसने देवराज चौहान से गद्दारी की है, वो उन लोगों को जानता है, जो डकैती कर गये हैं। लेकिन वो हम नहीं हैं। अगर आप हमारे द्वारा डकैती करने वालों तक पहुंचने की चेष्टा कर रहे हैं तो कोशिश बेकार रहेगी।”
“तुम तो समझदार निकले। मेरी बात फौरन समझ गये।”
गोदरा वानखेड़े को देखता रहा।
“देवराज चौहान ने बताया कि कौन गद्दार को पहचान सकता है?” वानखेड़े ने शर्मा से
“नहीं। इस बारे में उसने कोई बात नहीं की। वो तस्वीरें लेकर चला गया।”
“तुम दोनों के अलावा रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी की तस्वीरें। ये रनवीर भंडारी कैसा आदमी है।” वानखेड़े ने बारी-बारी दोनों को देखा- “वो सब जानता था कि देवराज चौहान क्या करने जा रहा है। ये भी तो वो हो सकता है कि जिसने देवराज चौहान की पीठ पर छुरा घोंपा हो।”
“जो भी होगा सामने आ जायेगा।” शर्मा बोला।
“रनवीर भंडारी हमसे बहुत कम जानता था। इसी तरह रूपा भी हमसे कम ही जानती थी।” गोदरा गहरी सांस लेकर कह उठा- “यानि कि गद्दारी करने के लिये हम दोनों या दोनों में से कोई एक ज्यादा उपयुक्त रहा है, अगर हमने देवराज चौहान से गद्दारी जैसी हरकत की है। वो हमारी तस्वीरें ले गया है। मालूम हो जायेगा कि किसने सारी गड़बड़ की है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है।”
“मालूम है कि देवराज चौहान कहां होगा?” वानखेड़े ने पूछा।
“नहीं। देवराज चौहान के बारे में हम कुछ भी नहीं जानते।” गोदरा बोला- “हमें नहीं मालूम कि वो यहां से कहाँ गया?”
“ऐसी कोई बात जो पुलिस न जानती हो?”
दो पल की चुप्पी रही फिर गोदरा ही बोला।
“डकैती के वक्त बाहर जो दो बारूद मैन थे। वो, वो नहीं थे। जिन्हें देवराज चौहान ने अपनी योजना में फिट करते हुए वहां पहुंचने को कहा था। देवराज चौहान ने आज सुबह अखबार में जीवनलाल नाम के उस बारूद मैन की तस्वीर देखी, जो पकड़ा गया था, तो ये बात सामने आई।”
“तुम कहना चाहते हो कि जिन लोगों ने बाहर पुलिस को बारूद की विस्फोट की धमकी देनी थी। वो नहीं पहुंचे, बल्कि उसके बदले दूसरे ही चेहरे वहां पहुंचे। ये बात देवराज चौहान को अखबार से पता चली।”
“हां।”
“इसका मतलब देवराज चौहान उनको तलाश कर रहा होगा। जिन्होंने उसका ये काम करना था। उनसे ये मालूम करना चाहता होगा कि वो उसके काम के लिये वहां क्यों नहीं पहुंचे। किसी ने उन्हें रोका क्या। ओह-इस तरह देवराज चौहान उन डकैती करने वालों तक पहुंच सकता है। देवराज चौहान ने कुछ बताया कि किन लोगों ने उसका ये काम करना था?”
“नहीं। इस बारे में देवराज चौहान ने हमसे कोई बात नहीं की। ये ठीक है कि हम डकैती में उसके साथ थे, लेकिन इस पर भी वो हमसे वो ही बात करता था। जिसका वास्ता हमसे होता था।” कमल शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा।
वानखेड़े ने कश लिया। गम्भीर, सोच भरी निगाहों से बारी-बारी दोनों को देख लेता था।
“आपने जो पूछा, उसका हम सही और सच जवाब दे रहे हैं।” कमल शर्मा का स्वर धीमा था।
“तो?”
“हमसे जो हुआ गलती की वजह से हुआ। हम भटक गये थे। शायद देवराज चौहान के सामने आ जाने की वजह से हमें अपने अच्छे-बुरे का ख्याल नहीं रहा। हम हाथ जोड़कर माफी मांगते हैं कि फिर कभी गैर कानून हरकत नहीं करेंगे।”
“मतलब कि तुम लोगों को छोड़ दूं।” वानखेड़े ने कठोर निगाहों से उन्हें देखा।
कमल शर्मा और गोदरा खामोश रहे।
“गैर कानूनी काम गलती से ही होते हैं। इसमें माफी की गुंजाईश नहीं रहती।” वानखेड़े ने उन्हें घूरा- “इस डकैती की जिम्मेवार तुम लोग ही हो। देवराज चौहान ही है। कोई दूसरा कर गया, ये जुदा बात है। हो सकता था, इस वक्त मैं तुम लोगों की ही तलाश कर रहा होता, अगर डकैती करने के लिये, कोई दूसरा तुम लोगों में न आ पाता।”
वे चुप रहे।
“तुम दोनों या रूपा ईरानी मुझे इसलिये मिल गयी कि डकैती तुम लोग नहीं कर सके। अगर तुम लोगों ने ही डकैती की होती तो मेरे हाथ आते क्या?” वानखेड़े की आवाज बेहद कठोर थी- “हर पुलिस वाला मेरे जैसा नहीं होता। दूसरा होता तो पहले तुम दोनों को अन्दर बंद करता उसके बाद बात करता। छूटने की बात तो दूर, तुम दोनों इस बात के लिये हाथ जोड़ रहे होते कि पुलिस अपनी डंडेबाजी रोक दे। जो सबूत है वो, बाकी के तैयार कर लिये जाते। डकैती के जुर्म में, सारी जिन्दगी तुम लोगों की जेल में बीतनी थी, लेकिन मैं तुम दोनों को ही छोड़ रहा हूं।”
दोनों ने ही वानखेड़े की बात पर राहत की सांस ली।
“हो तो तुम लोग नम्बरी हरामी। वरना शरीफ लोग डकैती जैसे काम में हाथ नहीं डालते। सोचते भी नहीं। लेकिन एक मौका मैं तुम लोगों को शरीफ बनने का दूंगा। अगर बाकी की जिन्दगी तुम दोनों ने शराफत से नहीं बिताई तो तुम लोगों को, इस डकैती में हाथ होने का जुर्म खोलकर भी अदालत में रख लूंगा। तुम...।”
“हम-कभी भी कोई गलत काम नहीं करेंगे।” गोदरा ने गहरी सांस लेकर आभार भरे स्वर में कहा।
“ये तो वक्त बतायेगा।” वानखेड़े कड़वे स्वर में कहते हुए खड़े होते हुए कहा- “याद रखना, आज के बाद हर वक्त मेरी नज़र तुम दोनों पर रहेगी। गलत काम करके देखना। उसी वक्त गर्दन मेरे हाथ में होगी।”
“वो दिन कभी नहीं आयेगा।” शर्मा बोला- “हम गलत काम करेंगे ही नहीं।”
वानखेड़े ने खा जाने वाली नज़रों से दोनों को देखा।
“तुम दोनों में से किसी ने देवराज चौहान से गद्दारी की?” पूछा वानखेड़े ने।
“नहीं।” शर्मा ने इन्कार में सिर हिलाया।
“ये क्यों पूछा?” गोदरा ने वानखेड़े को देखा।
“इसलिए कि देवराज चौहान तुम लोगों की तस्वीरें लेकर, ऐसे व्यक्ति के पास गया है, जो गद्दार को पहचानता है। तुम दोनों में से किसी तस्वीर पर उस व्यक्ति ने हाथ रख दिया तो फिर तुम्हारा देवराज चौहान से बच पाना कठिन है। वो अभी पलटकर आयेगा और गोली मार देगा। ऐसे में मैं तुम्हें बचा सकता हूं।”
कुछ पल खामोशी रही वहां।
“मेरे ख्याल में देवराज चौहान को इस काम के लिये हमारे पास नहीं आना पड़ेगा।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।
“अच्छी बात है। मैं जा रहा हूं। फिर आऊंगा या फोन करूंगा।” कहते हुए वानखेड़े ने अपना कार्ड निकालकर सोफे पर रख दिया- “अगर इस मामले में पुलिस के लिये कोई काम की खबर तो फोन कर देना। मुझे मालूम हो गया कि काम की खबर होते हुए ही तुम लोगों ने मुझे खबर नहीं की तो तब अपने आपको इस मामले में गिरफ्तार समझना। दस सालों से कम की जेल नहीं होगी।” वानखेड़े के दांत भिंच गये।
दोनों ने सहमति से सिर हिलाया।
“हम पर विश्वास रखिये इंस्पेक्टर साहब।” गोदरा गम्भीर स्वर में बोला- “आप जो कहेंगे। हम वो ही करेंगे।”
वानखेड़े ने खा जाने वाली निगाहों से दोनों को देखा फिर पलटकर बाहर निकल गया।
कमल शर्मा गिरने वाले ढंग से कुर्सी पर जा बैठा।
गोदरा ने सिग्रेट सुलगाई और टहलने लगा।
“बच गये।” शर्मा ने गहरी सांस ली- “हम इतने बड़े जुर्म के भागीदार रहे और इंस्पेक्टर वानखेड़े ने हमें गिरफ्तार नहीं किया।”
“उसने समझदारी से काम लिया।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीरता से कहा।
“कैसे?”
“वो जानता है कि हमें सजा दिलाकर कुछ हासिल नहीं होगा। वार्निंग देकर छोड़ दिया। उसे सिर्फ डकैती करने वालों की तलाश है। तीस अरब के जेवरातों की तलाश है। इधर-उधर की बातों में पड़कर वो वक्त नहीं गवाना चाहता।”
“ऐसे पुलिस वाले अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं। अगर हमने गैर कानूनी काम किया तो वानखेड़े हमें बुरी तरह रगड़ देगा।”
“हम गैर कानूनी काम करेंगे ही नहीं। एक बार गलती हो गयी सो हो गयी- “ गोदरा ने शर्मा को देखा- “बाकी की जिन्दगी पहले की तरह हम शराफत से बितायेंगे। मेहनत करके ही जिन्दगी निकालनी है। हराम का माल हमें पचेगा नहीं। कोशिश करके देख लिया।”
“शायद कोई नई खबर मिले।”
“कैसी खबर?”
“देवराज चौहान तस्वीरें लेकर गया है। जिसे दिखायेगा, वो जाने किसे गद्दार कहे, किसकी तस्वीर पर उंगली रखे।”
गोदरा ने आगे बढ़कर वानखेड़े का रखा कार्ड उठा लिया।
“तूने गद्दारी की?” गोदरा बोला।
“नहीं।”
“मैंने भी नहीं की। मस्त रह। हमें फिक्र नहीं करना चाहिये।” गोदरा ने गहरी सांस ली –“देवी ने मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। अगर वो पैंतीस लाख लेकर न भागी होती तो, उन पैसों से मैं कोई काम करने की कोशिश कर सकता था। जेवरातों की छोटी सी दुकान शुरू करने की कोशिश कर सकता था। हर तरफ से रगड़ा गया मैं।”
शर्मा ने गम्भीर नज़रों से गोदरा को देखा।
“मेरा तो परिवार है। पत्नी है। बच्चे हैं। कुछ पैसा भी है। गांव में खेती-बाड़ी भी है। मेरी जिन्दगी तो खींच-खींचकर निकल ही जायेगी। अगर तू मेरी बात माने तो, शायद सुखी रहें।”
कमल शर्मा ने सिगरेट सुलगायी।
“क्या?”
“तूने बताया कि रूपा ईरानी का फोन आया। वो शादी की बात कर ।”
“तो?”
“शादी कर ले उससे।” शर्मा ने समझाने वाले स्वर में कहा- “वो हिन्दुस्तान की मशहूर मॉडल है। तेरे पर फिदा है। ये क्या कम है। मैं नहीं जानता कि उसने तेरे में क्या देखा। मौका बढ़िया है, कर ले उससे शादी। उसके पास फ्लैट है। चालीस-पचास लाख तो बना ही लिया होगा। आगे भी बनायेगी। मजे से जिन्दगी बिता सकता है।”
प्रवेश गोदरा के चेहरे पर कड़वी मुस्कान उभरी।
“रूपा स्मैकी है।” गोदरा ने शर्मा को देखा।
“तो क्या हो गया?”
“स्मैक कितना बुरा नशा है तुम जानते ही हो। कितना भी पैसा हो उसके पास, सारे पैसे को बरबाद कर देगी। खुद को बरबाद कर लेगी वो। नशा उसे खत्म कर देगा। मॉडलिंग का काम उसके हाथ में नहीं रहेगा। एक दिन ऐसा आयेगा कि वो बोझ से भी बुरी लगने लगेगी।” प्रवेश गोदरा गम्भीर था- “यानि कि उसके पास कितना भी पैसा हो, बरबाद है वो।”
“तुम उसका नशा छुड़ा सकते हो।”
“हाँ। मेरे में और रूपा में यही बात तय हुई थी कि शादी के बाद मैं उसका नशा छुड़वाऊंगा और वो मुझे पूरा सहयोग देगी नशा छोड़ने को। ये सब बातें तब हुई थी, जब मुझे आशा थी कि मेरे पास दौलत आ जायेगी। लेकिन दौलत नहीं आई। डकैती कोई दूसरा कर गया। बिना पैसे के पति की क्या इज्जत होती है, ये जानते ही हो। जबकि उसके चाहने वालों की लाईन लगी रहती है, उसके घर के बाहर। रूपा से शादी करके मैं अपनी जिन्दगी बरबाद कर लूंगा।”
कमल शर्मा ने कुछ नहीं कहा।
गोदरा ने सिगरेट सुलगा ली।
“घर जाऊंगा मैं। पत्नी बच्चों को लेकर गांव गयी हुई थी। वो वापस आने वाली होगी।” शर्मा बोला।
गोदरा ने उसे देखा भी नहीं।
“क्या करेगा अब?” कमल शर्मा उठता हआ बोला - “रनवीर भंडारी का तो सब कुछ जल्दी नीलाम हो जायेगा।”
“दूसरा जौहरी देख लूंगा। उसके यहां काम मिल जायेगा। मुझे काम की कोई कमी नहीं। हीरे-जेवरातों का पारखी हूं।”
“मैं भी देखूगा कि क्या करना है। लेकिन डकैती जैसे काम में कभी हाथ नहीं डालूंगा।”
“अक्ल आ गयी?”
“अक्ल तो पहले भी थी। मैंने कितना इन्कार किया था। लेकिन तुम पर तो भूत सवार था कि डकैती हो जायेगी। भारी दौलत हाथ में आ जायेगी। वो हो जायेगा। ये हो जायेगा। मुझे भी जर्बदस्ती इस काम में खींच लिया।” इन सब बातों का जानने के लिये पढ़ें दुर्गा पॉकेट बुक्स में प्रकाशित अनिल मोहन का देवराज चौहान सीरीज का उपन्यास- ‘डकैती तेरे नाम की।’
“तू बच्चा था जो मेरी बातों में आ गया।” गोदरा मुस्करा पड़ा।
“दौलत का लालच इन्सान को बच्चा बना ही देता है।” शर्मा भी मुस्कराया।
दोनों एक-दूसरे को मुस्कराते हुए देखते रहे।
“चलूं।”
प्रवेश गोदरा ने हौले से सिर हिलाया।
“पता लगे तो बताना मुझे कि देवराज चौहान ने क्या किया। गद्दार का या तीस अरब के जेवरातों का पता लगा। फोन करूंगा मैं।”
“करना।”
कमल शर्मा बाहर निकल गया।
गोदरा कई पलों तक खुले दरवाजे को देखता रहा फिर कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बंद की।
“अब कहां पता लगेगा तीस अरब के जेवरातों का। दौलत एक बार नजरों से दूर चली जाये तो फिर नजर कहां आती है।”
☐☐☐
राम भाई ने प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा, रनवीर भंडारी और रूपा ईरानी की तस्वीर देखी। एक-एक चेहरे को उसने दस बार-बीस बार देखा। अस्पताल के जनरल वार्ड के बेड पर ही लेटा हुआ था वो। पास में उसकी पत्नी, दोनों बच्चों के साथ मौजूद थी। देवराज चौहान को आया पाकर वो कुछ दूर हट गयी थी।
देवराज चौहान और जगमोहन ही पास में थे।
“नहीं।” रामभाई ने तस्वीरें वापस करते हुए इंकार में सिर हिलाया –“इनमें वो नहीं है। जो मेरे को, तुम्हारे काम करने को मना कर रहा था। जिसने मेरी जान लेने की चेष्टा की।”
ये सुनते ही देवराज चौहान का चेहरा कठोर हो गया।
जगमोहन के होंठ भिंच गये।
“कोई फायदा नहीं हुआ।” बोला जगमोहन।
“मैंने तो कोशिश की थी।” देवराज चौहान की आवाज सख्त ही रही –“नहीं कामयाबी मिली तो, नहीं मिली।”
“आखिर कौन हो सकता है डकैती करने वाला। कौन हर वक्त हम पर नज़र रखता रहा।”
“इसी बात का तो जवाब ढूंढ रहे हैं।” देवराज चौहान बोला –“जरूरी तो नहीं कि इन चारों में से किसी डकैती के लिये हमसे गद्दारी की हो तो, वो खुद ही काम कर रहा हो सारा। किसी दूसरे को भी तो सारे काम करने को कह सकता है।”
जगमोहन देवराज चौहान को देखता रहा।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“हमें उस इंसान के बारे में हर हाल में जानना है, जिसने राम भाई की जान लेने की कोशिश की। उसे जाने बिना हम उस तक नहीं पहुंच सकते, जो हर पल हमारे साथ रहा। गद्दारी करता रहा और हमसे जुदा डकैती की तैयारी करता रहा।”
राम भाई गम्भीरता से उसकी बातें सुन रहा था।
देवराज चौहान ने उसे देखा।
“तुम बता सकते हो कि तुम पर हमला करने वाले का चेहरा कैसा था।”
“मैंने तो पहले ही कहा है कि मैं उसे अच्छी तरह पहचान चुका हूं।” राम भाई बोला।
“उसकी आंखें-नाक-कान-होंठ गाल अलग-अलग हो सकते हैं, बता सकते हो कि वो कैसे थे?”
पलभर की चुप्पी के बाद राम भाई बोला।
“हां। उसका चेहरा मेरे दिमाग में अच्छी तरह बस चुका है।”
“जगमोहन।” देवराज चौहान गम्भीर स्वर में बोला –“मैं किसी आर्टिस्ट को लाता हूं जो राम भाई से उसके चेहरे का हुलिया सुनकर स्केच बनाकर उसका चेहरा तैयार करेगा। इस तरह हम उसकी तस्वीर पा सकते हैं।”
☐☐☐
रामभाई के पास ही देवराज चौहान का लाया आर्टिस्ट, रामभाई के बनाये हुलिये के आधार पर कभी गाल बनाता तो कभी नाक। कभी आंखें तो कभी माथा। कभी सिर के बाल तो कभी कान-ठोड़ी।
आठ-दस घंटे लग गये तो राम भाई के बताये ढंग से एक चेहरा सामने आने लगा। तब रात के ग्यारह बज रहे थे। जब स्केच द्वारा कागज पर एक स्पष्ट चेहरा तैयार हुआ।
“यही है।” स्कैच रूप चेहरे की तस्वीर देखते ही राम भाई के होंठों से निकला- “यही है, जिसने मेरे को कहा था कि देवराज चौहान का कहा काम नहीं करना है। यही है जिसने मेरी जान लेने की चेष्टा की।”
देवराज चौहान ने आर्टिस्ट से स्केच वाला कागज लिया और उसे नोट देकर चलता किया।
जगमोहन ने भी स्केच वाले चेहरे को ध्यानपूर्वक देखा।
“ये इंसान मेरी नजरों से पहले कभी नहीं गुजरा।” जगमोहन कह उठा।
“इसकी तस्वीर हमारे पास है। सुबह फोटो-स्टेट से इसकी और भी कॉपियां निकलवा लेंगे।” देवराज चौहान का स्वर शांत था- “अब इसे तलाश करना कठिन नहीं। जो डकैती जैसे काम में हिस्सा ले सकता है। वो अपराधों की दुनिया में वास्ता रखता होगा। ढूंढ लेंगे हम इसे।”
“तुम आराम करो।” जगमोहन राम भाई से बोला- “अब तुम्हें कोई खतरा नहीं।”
राम भाई खामोशी से सिर हिलाकर रह गया।
दोनों अस्पताल से बाहर आ गये।
जिसने राम भाई को उनका काम करने को रोका था। उसके चेहरे का स्केच सामने था। स्पष्ट चेहरा था। उनके लिये ये एक बड़ी सफलता थी।
देवराज चौहान और जगमोहन को पूरा विश्वास था कि ये आदमी जहां भी होगा ढूंढ लेंगे। इसके बारे में जल्दी ही खबर पा लेंगे।
तभी देवराज चौहान की जेब में पड़ा मोबाइल बजा।
“हैलो।” देवराज चौहान ने मोबाइल फोन निकालकर बात की।
दूसरी तरफ सोहनलाल था।
“मैंने घर बदल लिया है एक कमरे का फ्लैट खाली कर दिया है।” सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ी।
“क्यों?” देवराज चौहान के होंठों से निकला।
“वानखेड़े, उस घर के बारे में जानता है। वो मुसीबत बनकर कभी भी मेरे सिर पर आ सकता था।” सोहनलाल की आवाज कानों में पड़ रही थी –“इसलिये तुम लोगों से अलग होते ही आनन-फानन प्रोपर्टी डीलर्स के द्वारा बढ़िया सा फ्लैट ढूंढा और पेमेंट देकर, कागज भी करवा लिए। इस समय मैं नये फ्लैट...।”
“पता बोलो। जगमोहन के साथ मैं वहीं आ रहा हूं।” देवराज चौहान ने कहा।
सोहनलाल ने पता बता दिया।
☐☐☐
बढ़िया फ्लैट लिया था सोहनलाल ने।
लम्बा-चौड़ा हॉल ड्राइंगरूम था। तीन बेडरूम थे। लॉबी थी। काम-चलाऊ फर्नीचर भी डाल लिया था फ्लैट में। जगमोहन ने होंठ सिकोड़कर, सोहनलाल को देखा।
“फ्लैट खरीदने के लिये तेरे पास पैसे थे।”
“हां। ऐसे दस फ्लैट खरीद लूं, तब भी माल बचा रहे।” सोहनलाल ने गोली वाली सिगरेट सुलगाई।
जगमोहन बेड पर अधलेटा सा, कागज पर बने स्केच को देख रहा था।
“इतना माल दबा रखा है।”
“तेरे को तकलीफ है।”
“हां। तेरे से मैंने ढाई लाख रुपया लेना है। वो कब देगा। जब भी कहता हूं तू हाथ तंग होने को कह देता है।”
“हाथ तंग तो है ही।”
“क्या? अभी तो तू कह रहा था कि…।”
“वो तो यूं ही तेरे पे रौब मारने के लिये कह दिया कि।”
“सच कह रहा हूं। मैं –।”
“तेरे पास ढाई लाख रुपया तो है ना? बोल हां। न कहेगा तो झूठ कहेगा।”
“है। लेकिन वो तेरे को देने के लिये नहीं है।” सोहनलाल ने कश लिया –“इतना बड़ा फ्लैट लिया है तो मेरे को भी ऐसा लगना चाहिये कि मैं इसका मालिक हूं। कुछ बन-ठनकर रहना पड़ेगा। कल कपड़े खरीदने जाना है।”
“ढाई लाख के कपड़े लेगा?” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।
“लग ही जायेंगे इतने। लाख-सवा लाख की तो हीरों जड़ी घड़ी लेनी है जो…।”
“तेरे को घड़ी की क्या जरूरत। लोगों से टाइम पूछ लिया कर।” जगमोहन का स्वर तीखा ही रहा –“वैसे भी तेरे को टाइम जानकर करना ही क्या है। बहुत अच्छा टाइम है तेरा। फ्लैट तूने ले लिया अब मेरे ढाई लाख ।”
“अभी नहीं हैं। जब होंगे, तब आवाज मारकर दे दूंगा।”
“नहीं हैं। अभी तो कह रहा था कि है और घड़ी...।”
“घड़ी उधार खरीदनी है। नकद कहां से आयेंगे। तेरा ढाई लाख देना है ना?”
“हाँ।”
“पचास मेरे को दे। फ्लैट खरीद कर हाथ तंग हो गया है। पूरे तीन हो जायेंगे। जल्दी वापस कर दूंगा।”
जगमोहन गुस्से से कुछ कहने लगा कि देवराज चौहान की आवाज सुनाई दी। वो सोहनलाल को बुला रहा था।
सोहनलाल पास पहुँचा।
देवराज चौहान ने स्केच वाला कागज उसी तरफ बढ़ाया।
“इसे देखा है पहले कभी?”
सोहनलाल ने कागज लेकर, उस पर बना चेहरा देखा।
“नहीं।” सोहनलाल के होंठों से निकला –“कौन है ये।”
“ये वो है, जिसने मेरे तैयार किए आदमियों को रोका कि वो मेरा काम नहीं करेंगे। इनमें से एक की जान लेने में सफल रहा जबकि दूसरा हाथ-पांव तुड़वा कर अस्पताल में पड़ा है। डकैती के दौरान उन दोनों ने बारूद पीठों पर बांधकर, पुलिस वालों को धमकाने के लिये बाहर खड़े होना था। बाद में डकैती करने वाले ने अपने आदमी वहां भेजे –।”
“समझा।”
“जो अस्पताल में पड़ा है, उसके बताने पर आर्टिस्ट ने ये स्केच बनाया है।”
“बिल्कुल समझ गया।” सोहनलाल का चेहरा कठोर हो गया –“जायेगा कहां। ढूंढ लेंगे इसे।”
“इसने डकैती की है। या डकैती में, उन लोगों की सहायता की है, जो तीस अरब के जेवरात ले गये हैं। ये हमें उस तक पहुंचा सकता है, जो हमें धोखा देकर खुद कामयाब हो गया।”
जगमोहन स्केच वाले चेहरे को देखता रहा।
“कल सुबह इस कागज की फोटो कॉपियां करवा लेना। इसे ढूंढना है। बहुत जरूरी है इससे बात करना।”
☐☐☐
भीड़ लगी हुई थी उस मकान के बाहर।
सुबह के नौ बज रहे थे। सामने वाहनों से भरी चलती सड़क थी। आते जाते लोग भी रुक रहे थे कि बात क्या है। हर तरफ पुलिस ही पुलिस और पुलिस की गाड़ियां नज़र आ रही थी।
सुबह के सात बजे थे तब जब कागज इकट्ठा करने वाले छोटे-छोटे बच्चे, कागज इकट्ठे करते हुए वहां से निकल रहे थे तो उन्होंने गेट और मकान का दरवाजा खुला देखा। वे ठिठक गये। उनकी सोचों में लालच आया कि शायद घर से कोई चीज़ हाथ लग जाये। एक बच्चा बाहर खड़ा रहा, बाकी के दो पानी पीने के बहाने घर में घुसे। एक-दो आवाजें भी दी पानी पीने के लिये कि कोई भीतर आया पाकर पकड़ न ले।
जब उन्होंने खुले दरवाजे से भीतर झांका तो खून से लथपथ लाशें देखने को मिली। होश उड़ गये उनके। वे पलटकर चीखते हुए बाहर की तरफ दौड़े और खून-खून का शोर मचा दिया। राह चलते लोग भी ठिठके। पड़ोसी भी बाहर आ गये। बच्चों की बात सुनकर एक-दो लोगों ने भीतर झांका। लाशें पड़ी नज़र आई तो तुरन्त पुलिस को खबर दी गयी। उसके बाद तो बाहर लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो गयी।
पुलिस आई।
लोगों को दूर किया।
एक नहीं, पूरी चार-चार लाशें थी। खून जम गया था, बहकर। दिल दहला देने वाला दृश्य था। पुलिस वाले देखते ही समझ गये कि घंटों पहले इस कमरे में खतरनाक माहौल का तूफान आया था। हेडक्वार्टर से फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट और फोटोग्राफर के अलावा अन्य तफ्तीश वाले भी आ गये। वो अपने काम पर लग गये।
पुलिस वालों को समझ नहीं आ रहा था लोगों की हालत देखकर कि क्या हुआ होगा।
आसपास वालों से उस मकान में रहने वालों के बारे में पूछा गया तो यही मालूम हुआ कि इस मकान का मालिक दूसरे शहर रहता है। एक-दो महीने में आ जाता है। वरना मकान तो कब का बंद पड़ा था। एक ने बताया कि परसों रात उसने लाइट जलती देखी तो यही सोचा कि मकान का मालिक आया होगा।
डेढ़ घंटा लगा, जांच वालों को अपना काम खत्म करने में।
उसके बाद पुलिस ने अपना काम शुरू किया। लाशें इस कदर बेतरतीबी से पड़ी थी कि पुलिस वाले नहीं समझ रहे थे कि क्या हुआ होगा। कैसे मरे ये लोग। पुलिस ने सबसे पहले लाशों के कपड़ों की तलाशी लेनी आरम्भ की।
राजेश गुलाटी के कपड़ों की तलाशी में जेब से बेशकीमती हार मिला।
पुलिस वालों ने उस हार को देखते ही अपना काम रोक दिया।
“ये तो कीमती हार लगता है सर –।” सब-इंस्पेक्टर ने अपने ऑफिसर से कहा।
इंस्पेक्टर गम्भीर सा उस हार को देख रहा था।
“मुझे तो कुछ भारी गड़बड़ लग रही है।” इंस्पेक्टर की निगाह पुन: लाशों पर फिरने लगी।
“क्या सर?”
अन्य पुलिस वाले भी पास आने लगे थे।
“पहले तो मैं दूसरे ढंग से सोच रहा था।” इंस्पेक्टर बोला –“लेकिन इस कीमती हार ने, किसी और तरफ ही इशारा किया है। परसों होटल में तीस अरब की डकैती हुई। डकैती करने वाले पांच थे। एक की लाश तो कुछ ही घंटों बाद मिल गयी। बाकी बचे चार। ये चार लाशें हैं और इनमें से एक के पास से ये कीमती हार मिला है। ये वो चारों डकैती करने वाले हो सकते हैं, जिनकी पुलिस को तलाश है।”
कोई कुछ न बोला।
“कोई किसी चीज को हाथ नहीं लगायेगा।” इंस्पेक्टर ने फौरन कहा –“सब बाहर आ जाओ।”
“लेकिन सर –।”
“चुप रहो। हो सकता है ये वो ही डकैती करने वाले हों। किसी चीज से छेड़छाड़ नहीं करनी है। पहले ये बात स्पष्ट हो जानी चाहिये कि कहीं ये चारों, वो ही डकैती करने वाले तो नहीं।”
सब पुलिस वाले बाहर निकल गये।
इंस्पेक्टर ने अपनी शक से भरी बातों की खबर फौरन पुलिस हेडक्वार्टर दी।
घंटे भर में ही इंस्पेक्टर वानखेड़े, इंस्पेक्टर शाहिद खान के साथ वहां आ पहुंचा।
☐☐☐
वानखेड़े और शाहिद खान ने कमरे में बिखरी लाशों को देखा।
राजेश गुलाटी की लाश पर, दोनों की निगाह जा अटकी।
उसका चेहरा उन्होने तस्वीर में देखा था और बेवकूफ पुलिस वाले उस लाश बने चेहरे को नहीं पहचान पाये थे, जिसकी तस्वीर आज को अखबार में छपी थी।
वानखेड़े ने इशारे से उस इंस्पेक्टर को पास बुलाया।
“ये लोग मेरे ख्याल में डकैती करने वाले ही हैं। एक को तो पहचान लिया है। बाकी तीन –।”
“बाकी भी डकैती करने वाले ही हैं।” शाहिद खान शब्दों को चबाकर कह उठा।
वानखेड़े ने अपनी बात रोककर शाहिद खान को देखा।
“वीडियो कैसेट में उन पांचों के चेहरे मैंने अच्छी तरह देखे थे जो बाथरूम में गये थे और फिर रिवॉल्वरों को लिए और नकाबें ओढ़े बाहर निकले थे। इनमें से दो चेहरों को मैंने अच्छी तरह पहचान लिया है। तीसरा राजेश गुलाटी है। ऐसे में बचा चौथा भी डकैती डालने वाला होगा। उसका चेहरा साफ नहीं देखा जा रहा। उसके गले को काटा गया है। चेहरे पर भी खून बिखरा पड़ा है।”
वानखेड़े ने सिर हिलाया फिर जेब से छोटी से एलबम निकालकर पुलिस वाले से बोला।
“वो जेवरात कहां हैं?”
“ये रहा।” इंस्पेक्टर ने जेब से जेवरात निकाला।
वानखेड़े ने उसकी तरफ एलबम बढ़ाई।
“इस एलबम में हर उस जेवरात की तस्वीर है, जो डकैती में चोरी हो गया है। इस जेवरात की तस्वीर देखो, क्या है इसमें।”
“जी।” इंस्पेक्टर ने फौरन एलबम थामी और एक तरफ हो गया।
“उंगलियों के निशान-फोटो वगैरह ले लिए हैं या –?” वानखेड़े ने पूछना चाहा।
“सब काम हो गये हैं सर।” पुलिस वाला फौरन बोला –“लाशों का पंचनामा करना रह गया है।”
वानखेड़े ने सिर हिलाया और लाशों को देखने लगा।
शाहिद खान, नारंग की लाश के पास खड़ा, झुका देख रहा था।
कई मिनट उनको ऐसे ही बीत गये।
“सर।” वो पुलिस वाला पास आता बोला –“इस जेवरात की तस्वीर ये रही, इसी एलबम में।”
वो पास आया। वानखेड़े ने जेवरात को और तस्वीर को देखा। चेहरे पर गम्भीरता थी।
“हां। इस जेवरात की तस्वीर, एलबम में है।” वानखेड़े ने सिर हिलाया –“ये डकैती करने वाली ही है।”
“ओह। इन्हें किसने मारा सर?”
वानखेड़े ने उसे घूरा।
“मालूम हो जायेगा। पुलिस की वर्दी पहन रखी है और ये भी नहीं जानते कि पुलिस के हाथ में चिराग या जिन्न नहीं होता कि सारा मामला हाथों-हाथ खोलकर सामने रख दे।” वानखेड़े का स्वर सख्त था।
“स-सॉरी सर।”
उसके बाद वानखेड़े और शाहिद खान देर तक लाशों को देखते रहे।
पुलिस वाला एक तरफ खामोशी से खड़ा उन्हें देख रहा था।
“क्या हुआ होगा।” शाहिद खान परेशान सा, वानखेड़े को देखकर कह उठा।
वानखेड़े ने सिगरेट सुलगाई।
“कुछ-कुछ समझ में आ रहा है।” वानखेड़े की निगाह लाशों पर जा रही थी।
“क्या?”
“ये।” वानखेड़े ने भोपाल सिंह की लाश की तरफ इशारा किया –“सबसे बाद में मरा।”
“वो कैसे?”
“इसे गोली मारी गयी है। परन्तु रिवॉल्वर कहीं भी नहीं है। स्पष्ट है कि गोली मारने वाला, रिवॉल्वर अपने साथ ले गया। दो चाकू कमरे में हैं। एक तो इसके ठीक दिल वाले हिस्से में धंसा हुआ है। दूसरा उधर गिरा हुआ है। इन्हीं दोनों चाकुओं से तीन मरे। चौथा रिवॉल्वर से –।”
“देखने पर तो लगता है, जैसे इन्होंने आपस में ही एक-दूसरे को मारा हो।” शाहिद खान बोला।
“ऐसा ही हुआ है, परन्तु ये, गोली लगने से मरा।” वानखेड़े ने कहा –“रिवॉल्वर कही नजर नहीं आ रहा। डकैती के जेवरात कहीं नहीं है। सिर्फ एक जेवरात राजेश गुलाटी के पास से मिला। शायद जेवरातों में से एक हार निकालकर चुपके से उसने अपने पास रख लिया होगा।”
“जिसने इसे गोली से मारा वो जेवरात ले गया।” वानखेड़े ने विश्वास भरे स्वर में कहा।
शाहिद खान को आंखें सिकुड़ी।
“तुम कहना क्या चाहते हो?”
“ये बात तुम इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकते हैं?”
“विश्वास तो यहीं से पैदा होता है कि यहां रिवॉल्वर नहीं। जेवरात नहीं। डकैती करने वालों की लाशें यहां हैं।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा –“मेरे ख्याल में डकैती करने वाले यहां आ छिपे थे।”
“तो इनमें क्या हुआ –इन्हें मारा किसने –जेवरात कौन ले गया?”
वानखेड़े खामोश रहा।
“ये काम देवराज चौहान का हो सकता है।”
“कौन सा काम?” वानखेड़े ने शाहिद खान को देखा।
“यहां खून-खराबा करने का काम। यहां...।”
“शाहिद –। ये काम एक का नहीं है। तुम्हें क्या लगता है कि एक का है?”
“नहीं –।” शाहिद खान ने फौरन इंकार में सिर हिलाया –“एक का नहीं है ये काम। मुझे तो लगता है जैसे इन्होंने चाकू आपस, में चलाए हों। या ऐसा ही कुछ...।”
“ठीक कहा। धीरे-धीरे अभी समझ आता चला जायेगा कि यहां क्या हुआ हो सकता है।” वानखेड़े ने कमरे में नज़रें दौड़ाते हुए होंठ भींचकर कहा –“डकैती करने वाले मर गये। तीस अरब के जेवरात कोई ले गया।”
“कोई नहीं देवराज चौहान ले गया।”
वानखेड़े ने शाहिद खान को देखा।
“क्या तुम इंकार करते हो कि ये काम देवराज चौहान ने नहीं किया –।”
“मैं इंकार नहीं करता, लेकिन फैसले पर जल्दी नहीं पहुंचना चाहता। सोचने दो। देवराज चौहान के लिये ये काम करना कहां कठिन है। तीस अरब की दौलत का मामला है ये...और...।”
“कल –।” शाहिद खान ने अपनी शब्दों पर जोर देकर कहा –“तुमने ही कहा था कि देवराज चौहान शायद हमसे पहले डकैतों तक पहुंच सकता है। वो अपने साथियों की तस्वीरें किसी ऐसे आदमी को दिखाने जा रहा है, जो गद्दारी करने वाले को जानता है। और अब तस्वीर सामने हैं। देवराज चौहान इन तक पहुंच गया और –।”
“शाहिद मैं इंकार नहीं कर रहा इस बात से। देवराज चौहान से। लेकिन संभावना और भी।”
“कैसी संभावना?”
“सोचने दो। इस बारे में ऑफिस में बात करेंगे। यहां लाशें पड़ी हैं। इस जगह को अच्छी तरह चेक करो। शायद कुछ मालूम हो सके कि क्या हुआ होगा यहां। या उसके बारे में पता चले जो जेवरातों को ले गया। मेरे ख्याल में इन लोगों की मौत से मामला बहुत पेचीदा हो गया है।”
शाहिद खान की आंखें सिकुड़ी। बोला कुछ नहीं।
☐☐☐
शाम के तीन बज रहे थे।
अभी-अभी वानखेड़े और शाहिद खान हेडक्वार्टर में, अपने ऑफिस में पहुंचे थे। वे दिन भर डकैतों की लाशों के साथ व्यस्त रहे थे। पंचनामा करवा कर, लाशें उठाकर ही दोनों वहां से निकले थे। शाहिद खान ने भीतर प्रवेश करने से पहले ही रास्ते में मिलने वाले पीयून को चाय लाने को कह दिया था।
वानखेड़े कुर्सी पर बैठा। सिगरेट सुलगाई फिर रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाया।
शाहिद खान उसके सामने ही कुर्सी पर बैठ गया।
“हैलो।” वानखेड़े ने बात की –“सक्सेना?”
“एक मिनट।”
कुछ पलों बाद उसके कानों में नई आवाज पड़ी।
“वानखेड़े साहब।”
“सक्सेना, लाशों की तस्वीरें निकल आई?”
“यस सर। प्रिंट आ गये हैं।”
“एक-एक प्रिंट मुझे चाहिये।”
“अभी भिजवाता हूं।”
दूसरा फोन वानखेड़े ने, प्रवेश गोदरा को किया।
“हैलो।” गोदरा का स्वर कानों में पड़ा।
“अभी पुलिस हेडक्वार्टर पहुंचो।” वानखेड़े ने कहा।
“गिरफ्तार करना है।” गोदरा की धीमी आवाज कानों में पड़ी।
“गिरफ्तार करने के लिये इस तरह फोन नहीं किया जाता। गर्दन पकड़कर लाया जाता है।” वानखेड़े ने तीखे स्वर में कहा।
“आता हूं।”
वानखेड़े ने रिसीवर रखा।
तभी पीयून चाय के दो प्याले रख गया।
शाहिद खान ने प्याला अपनी तरफ सरकाया और घूंट भरा।
“क्या सोच रहे हो?” शाहिद खान बोला।
वानखेड़े ने भी घूंट भरा।
“डकैती करने वालों का इस तरह मारे जाना, पुलिस के लिये सिरदर्दी बन सकता है।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा–
“पहले ही कठिनाई आ रही थी, अब परेशानी बढ़ सकती है।”
“वो कैसे?”
“इस बात को समझ पाना बेहद कठिन है कि इन लोगों को किसने मारा होगा।”
“मैं कहता हूं देवराज चौहान को इन लोगों का पता लग गया था। वो अपने साथियों के साथ वहां पहुंचा और सबको मारकर, तीस अरब के जेवरात लेकर चलता बना। तुम्हें ये बात मान लेनी चाहिये।”
“मैं इस बात से इंकार नहीं कर रहा।”
“तो?”
“इसके अलावा भी संभावना है दूसरा कुछ होने की।”
“क्या?”
“कोई जानता हो सकता है कि उन्होंने डकैती की और तीस अरब के जेवरातों के साथ वहां छिपे हैं। मौका ठीक देखकर, वो कुछ के साथ वहां पहुंचा और सबको मारकर दौलत लेकर चला गया।''
शाहिद खान, वानखेड़े को देखने लगा।
वानखेड़े ने घूंट भरा।
“ऐसा भी हो सकता है।” शाहिद खान ने धीमे स्वर में कहा।
“एक बात और खटक रही है।”
“क्या?”
“क्या इन पांचों का छठा साथी नहीं हो सकता, जो पीछे रहकर काम कर रहा हो।”
“पीछे रह कर?”
“हाँ। मैं संभावना व्यक्त कर रहा हूं। शायद ऐसा कुछ भी न हो। लेकिन हो सकता है इनका कोई छठा साथी हो। वो छठा ही देवराज चौहान के ग्रुप में हो और इधर अपनी योजना तैयार करता रहा हो। तभी तो मरने वाले पांचों ने ठीक उसी तरह डकैती की, जैसे देवराज चौहान करने जा रहा था। यहां तक कि रिवॉल्वरें और नकाबें भी वही इस्तेमाल की गयी जिन्हें देवराज चौहान ने अपने लिये रखा था। मतलब कि कोई छठा भी था मरने वालों का साथी। इन बातों से तो यही लगता है। तुम्हारा क्या ख्याल है।”
शाहिद खान देखता रहा, वानखेड़े को।
“मेरी बात ठीक नहीं लगी?”
“लगी। तुमने बिल्कुल ठीक कहा है। उन डकैतों का छठा साथी भी हो सकता है, जो देवराज चौहान से गद्दारी करके, डकैती के लिये, इन लोगों को तैयार करता रहा होगा। और अब मौका देखकर, सबको मारकर, तीस अरब के जेवरातों को लेकर अपने रास्ते पर निकल गया। ऐसा हो सकता है।” शाहिद खान ने गम्भीर स्वर में कहा –“ये भी हो सकता है कि किसी को ये पता चल गया हो कि वो डकैत हैं उनके पास डकैती की तीस अरब की दौलत है। मौका देखकर वो डाका डालने वालों को मारकर, दौलत लेकर चला गया हो।”
“हां। हम सोच सकते हैं कि ऐसा भी हो सकता है।”
वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा –“यानि कि हमारे पास तीन चीजें हैं, जिस पर हमें सोचना है। पहला देवराज चौहान –दूसरा डकैतों का छठा साथी, जो कि देवराज चौहान के साथ भी डकैती के लिये लगा हुआ था परन्तु हकीकत में अपनी ही डकैती की योजना तैयार कर रहा था। तीसरा कोई भी अंजान व्यक्ति जिसे पता चल गया था कि उन लोगों ने डकैती की है। वहां तीस अरब की दौलत भी है। उसने इन डकैतों की हत्याओं को अंजाम दिया।
शाहिद खान ने होंठ सिकोड़ लिए।
कई पलों के लिये खामोश रही वहां।
वानखेड़े उठा और नई सिगरेट सुलगाकर टहलने लगा।
“इन डकैती की हत्याओं के बाद हम खुद को अजीब-सी स्थिति में फंसे पा रहे हैं। ये मामला ही कुछ ऐसा है कि कोई भी रास्ता हमें नहीं मिल रहा। मिलता है तो कुछ कदमों के बाद वो रास्ता बंद हो जाता है। डकैतों की लाशें मिली, दौलत गायब देवराज चौहान का साथ देने वाले हमारे सामने है परन्तु उन्हें गिरफ्तार करने का कोई भी फायदा नहीं। उन्हें गिरफ्तार करने पर पुलिस को पहले ये साबित करना होगा कि ये लोग देवराज चौहान के साथ, डकैती करने जा रहे थे, परन्तु कर नहीं पाये। जबकि ये बात साबित करना बेहद कठिन है। रूपा ईरानी के बयान पर इतनी बड़ी बात साबित नहीं की जा सकती। रूपा ईरानी भी अपनी कही बातों से पीछे हट सकती है। क्योंकि उसने मुझे जो बताया, बंद कमरे में बताया।”
“और असली डकैत मर चुके हैं।” शाहिद खान बोला।
“हां! लाशों की हालत बताती है कि जब हम वहां पहुँचे तो उनकी हत्याएं हुए बारह घंटे हो चुके थे।”
“तो पुलिस के पास क्या रहा करने को?” शाहिद खान बरबस ही मुस्कराया।
“जो डकैती के तीस अरब के जेवरात ले उड़ा है। उसे तलाश करेगी पुलिस।”
“वो हाथ आयेगा?”
“ये बाद की बात है। उसे तलाश करना हमारा काम है।”
वानखेड़े ठिठका।
“वो अपनी हवा नहीं लगने देगा कि जेवरातों के साथ शाहिद खान ने कहना चाहा।
“जिसके पास तीस अरब के जेवरात हैं।” वानखेड़े ने विश्वास भरे स्वर में कहा –“जेवरात बेचते हुए वो अवश्य फंसेगा।”
शाहिद खान, वानखेड़े को देखने लगा।
“देर-सवेर में वो फंसेगा।”
“जितनी चालाकी से वो काम कर रहा है, उसे देखते हुए मुझे नहीं लगता कि कभी वो हाथ आयेगा या जेवरातों को बेचते हुए पकड़ा जायेगा।”
“वो देवराज चौहान भी हो सकता है।” वानखेड़े ने टोका।
“कोई भी हो सकता है।” शाहिद खान ने सिर हिलाया –“मरने वाले डकैतों के बारे में टटोलना पड़ेगा। शायद किसी डकैती करने वाले ने, अपने किसी करीबी को डकैती के बारे में कुछ बताया हो। उससे पुलिस को कोई फायदा हो।”
“ठीक कहते हो। भागदौड़ तो जारी रखनी ही पड़ेगी। हम –।”
तभी चपरासी ने भीतर प्रवेश किया और एक लिफाफा टेबल पर रखते हुए बोला।
“सक्सेना साहब ने ये लिफाफा दिया है।”
वानखेड़े ने सिर हिलाया। लिफाफा उठाया कि चपरासी कह उठा।
“सर। रिसेप्शन पर मिस्टर प्रवेश गोदरा मौजूद हैं। वो आपसे...।”
“उन्हें मेरे पास ले आओ।”
चपरासी बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने लिफाफे में से तस्वीरें निकाली और उन्हें देखने लगा। ये लाशों के चेहरों की तस्वीरें थी। मरने वालों के चेहरे बहुत हद तक स्पष्ट नजर आ रहे थे। वानखेड़े कुछ पलों तक तस्वीरों को देखता रहा। फिर आगे बढ़कर ड्राअर से, त्रिखा की लाश वाली तस्वीर निकाली और उनके साथ लिफाफे में डाल दी।
शाहिद खान सोचों में डूबा नजर आया।
“क्या सोच रहे हो?”
“पता नहीं।” शाहिद खान ने गहरी सांस ली।
तभी कदमों की आवाज कानों में पड़ी। फिर चपरासी ने गोदरा के साथ भीतर प्रवेश किया। वानखेड़े के इशारे पर चपरासी चला गया। गोदरा कुछ उलझन में था।
“बैठो।” वानखेड़े ने कहा –“कुछ पूछने के लिये बुलाया है। घबराने की जरूरत नहीं।”
गोदरा बिना कुछ कहे आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठ गया।
“देवराज चौहान आया?” वानखेड़े ने पूछा।
“देवराज चौहान...?”
“वो या उसका फोन-फौरन जवाब दो। सोचने की जरूरत नहीं।” वानखेड़े का स्वर सख्त हो गया।
“कल ही आया था वो। उसके बाद आप आये तो बताया था आपको। मैं...।”
“उसके बाद, मैं उसके बाद की बात कर रहा हूं।” वानखेड़े ने अपने शब्दों पर जोर देकर कहा।
“उसके बाद देवराज चौहान से मेरी बात नहीं हुई। न तो देवराज चौहान आया और न ही उसका फोन –।”
“अगर मुझसे झूठ बोले तो –।”
“इंस्पेक्टर साहब।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा –“अब तक मुझे इतना तो समझ आ ही गया है कि आपसे बोलने का मुझे कितना बड़ा नुकसान हो सकता है। मैं आपसे झूठ न तो बोलूंगा और न ही बोल रहा हूं।”
वानखेड़े ने सोच भरी नजरों से शाहिद खान को देखा।
“इसकी उंगलियों के निशान लेकर लेबोरेट्री भेजो। वहां मिले निशानों से मिलाओ।” कहते हुए वानखेड़े की नजर गोदरा पर जा टिकी –“कोई बड़ी बात नहीं, वो कमाल इसने दिखाया हो सकता है।”
“कैसा कमाल?”
शाहिद खान बाहर निकल गया।
“कैसा कमाल?” गोदरा ने वानखेड़े को देखा।
“अभी चुपचाप बैठा रह।” वानखेड़े ने उसे घूरा।
गोदरा ने फिर न पूछा।
मिनट भर बाद शाहिद खान वापस आया। उसने रूमाल से एक शीशे का गिलास पकड़ा हुआ था। गिलास को उसने गोदरा के सामने टेबल पर रखकर कहा।
“गिलास पकड़। अच्छी तरह से पकड़। तेरी उंगलियों के निशान लेते हैं। दोनों हाथों से गिलास पकड़ –।”
उलझन में फंसे गोदरा ने दोनों हाथों की उंगलियों की छाप गिलास पर दी।
शाहिद खान गिलास को सावधानी से रूमाल से थामे बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने कश लिया और सिगरेट ऐश ट्रे मे डाल दी।
“सिगरेट सुलगा लूं?” गोदरा ने पूछा।
“आराम से बैठा रह।” वानखेड़े ने उखड़े स्वर में कहा।
गोदरा ने गहरी सांस लेकर मुंह दूसरी तरफ फेर लिया।
शाहिद खान वापस आया। कुर्सी पर बैठा।
“कमल शर्मा, रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी की उंगलियों के निशान लेने हैं।” वानखेड़े बोला।
शाहिद खान ने सिर हिलाया।
“तुम कमल शर्मा के पास जाओ। उसका पता पुलिस पार्टी की फाइल से नोट कर लेना। उसे टटोलो। उसके बाद उसकी उंगलियों के निशान ले लेना। अभी निकल जाओ। जो काम इस मामले में जल्दी हो जाये, वो बढ़िया मैं चूकना नहीं चाहता।”
शाहिद खान उठा और बाहर निकल गया।
“हुआ क्या?”, गोदरा बोला –“कल तो उंगलियों के निशानों की जरूरत नहीं थी।”
वानखेड़े ने लिफाफे में से तस्वीरें निकाली और उसके सामने रख दी।
“इन तस्वीरों को देखो और बताओ कि इसमें से किस-किस को जानते हो?”
शाहिद खान ने तस्वीरें उठाई। देखी।
वो डकैती करने वालों की, लाशों के चेहरे की तस्वीरें थी।
वानखेड़े खामोशी से गोदरा के चेहरे पर आने-जाने वाले भावों को देख रहा था। गोदरा ने दो तस्वीरें अलग कर दी। बाकि की तीन को देर तक देखता रहा फिर उन्हें एक तरफ रखकर पहले रखी दोनों तस्वीरों की तरफ इशारा किया।
“इनकी तस्वीरें कल की अखबारों में देखी थी। ये त्रिखा और राजेश गुलाटी हैं। अखबार में छपा था कि ये तीस अरब की डकैती में शामिल रहे थे।” कहते हुए गोदरा ने वानखेड़े को देखा।
“बाकी की तीन तस्वीरें?”
“उन्हें मैं नहीं जानता।”
“कहीं भूल-चक से देखा हो।”
“नहीं।” गोदरा ने इंकार में सिर हिलाया।
वानखेड़े, गोदरा को देखता रहा। कहा कुछ नही।
“अखबार में दिया था कि त्रिखा की लाश मिली।” गोदरा बोला –“लेकिन राजेश गुलाटी नाम का डकैत भी मरा हुआ है। उसके चेहरे को देखकर लगता है कि मृत अवस्था में उसकी तस्वीर ली गयी है।”
“गैर कानूनी काम करेगा तो मरेगा ही।” वानखेड़े ने कड़वे स्वर में कहा।
गोदरा ने हड़बड़ाकर दूसरी तरफ मुंह फेर लिया।
“बाकी तीन के बारे में नहीं पूछेगा। उनके चेहरों की तस्वीरें भी मरने के बाद ही ली गयी हैं।”
गोदरा ने वानखेड़े को देखा।
“कुल मिलाकर ये पांच मृत चेहरों की तस्वीरें हैं और डाका डालने वाले कितने थे?”
“पांच।” गोदरा के होंठों से निकला, दूसरे ही पल चौंका।
वानखेड़े को देखने लगा।
“क्या हुआ?”
“तुम-तुम कहना चाहते हो कि ये पांचों डकैती डालने वालों की तस्वीरें हैं।” वो हैरान रह गया।
“मारे गये वो?”
“हां। लेकिन तुम लोग किस्मत वाले निकले जो बच गये! वरना यहां तुम्हारे मरे चेहरे की भी तस्वीर होती।”
“क्या मतलब?”
“भगवान यही चाह रहा था कि जिसने भी ये डकैती की है वो मर जाये। तुम लोगों की तैयारी भी तो पूरी थी। परन्तु ये जुदा बात रही कि तुमसे पहले ही कोई दूसरा कर गया। तुम लोगों ने डकैती की होती तो, तुम सब मर गये होते।”
गोदरा से कुछ कहते न बना।
चुप्पी रही उनके बीच। वानखेड़े ने तस्वीरें समेटकर लिफाफे में डाल ली।
तभी शाहिद खान ने भीतर प्रवेश किया।
“मैं कमल शर्मा के पास जा रहा हूं। अगर ये तस्वीरें ले जाऊं तो...।” शाहिद खान ने कहना चाहा।
“ये मेरे पास रहने दो। तुम तस्वीरों का दूसरा सेट ले लो।” वानखेड़े बोला।
“ठीक है। लेकिन रूपा ईरानी और रनवीर भंडारी की उंगलियों के निशान भी–।”
“इन दोनों से मैं मिलूंगा।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा –“रनवीर भंडारी से कभी मिला नहीं। उससे भी मुलाकात हो जायेगी और रूपा ईरानी से मैं पहले बात कर चुका हूं। ऐसे में मैं उससे बढ़िया ढंग से बात कर लूंगा। इसकी उंगलियों के निशानों की रिपोर्ट आ जाये। उसके बाद मैं भी यहां से निकलता हूं। जरूरत होने पर मोबाइल फोन पर बात करना।”
“बढ़िया।” शाहिद खान बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने बेल मारकर चपरासी को बुलाया।
“जी साहब जी।” चपरासी फौरन पहुंचा।
“सेल में मदनलाल बंद है। उसे लेकर आना।” वानखेड़े बोला।
“सेल इंचार्ज मेरी कहां सुनेगा। वो कहेगा मदनलाल को बाहर निकालने के ऑर्डर दिखाओ।”
वानखेड़े ने टेबल पर पड़े पैड पर कुछ लिखा और फाड़कर कागज चपरासी को दिया।
“ये सेल इंचार्ज को दे देना। वो मदन लाल को तुम्हारे हवाले कर देगा।”
“जी।” पैड का कागज थामे चपरासी बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने सिगरेट सुलगाई और पैकेट गोदरा की तरफ किया।
“लो।”
ढेरों सोचो-उलझनों में डूबे गोदरा ने सिगरेट सुलगाई।
“तुम्हें मेरा एहसानमंद होना चाहिये कि मैंने तुम्हें गिरफ्तार नहीं किया।” वानखेड़े की आवाज में उखड़ापन था।
“मैं आपका एहसानमंद हूं।”
“भाड़ में जा।” वानखेड़े ने उसी लहजे में कहा।
गोदरा ने कश लिया और धीमे स्वर में बोला।
“डकैती करने वाले पांचों मर गये। तीस अरब के जेवरात मिल गये। अब तो मामला...।”
“किसने कहा तेरे से कि जेवरात मिल गये?” वानखेड़े ने उसे देखा।
“नहीं मिले?”
“नहीं। कोई इन्हें मार गया और जेवरातों को ले गया। पुलिस के पल्ले इनकी लाशें ही आई।”
गोदरा ठगा सा बैठा, वानखेड़े को देखता रह गया।
“क्या देख रहा है अब –मुंह से फूटा कर। भगवान ने बात करने के लिए मुंह में...।”
“कौन मार गया इन्हें?”
“यही तो जानने की कोशिश की जा रही है। कल तेरे पास देवराज चौहान आया। वो तेरी, शर्मा, रूपा और रनवीर भंडारी की तस्वीरें ले गया कि, कोई उससे गद्दारी करने वाले को जानता है। यानि कि जिसने डकैती की। जो जानता है लेकिन उसके बाद देवराज चौहान उन चारों में से किसी के पास नहीं पलटा।”
“क्या पता आया हो –आपने पता किया?”
“सब पर पुलिस की नज़र है। ऐसा कुछ हुआ होता तो –।”
“आह! तो कल जब देवराज चौहान मेरे पास आया। तब पुलिस मुझ पर नजर रख रही थी?”
“नहीं। उसके बाद ही मैंने इन्तजाम किया तुम लोगों पे नज़र रखने का।” वानखेड़े ने कश लिया –“देवराज चौहान किसी के पास नहीं आया। क्या मालूम उसे किसी तरह डकैतों का पता चल गया हो। उसके पास पहुंचा और उन्हें खत्म करके तीस अरब के जेवरात लेकर चलता बना।”
“क्या मालूम, क्या हुआ। मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता।”
गोदरा व्याकुल-सा कह उठा –“अगर देवराज चौहान ने ऐसा कुछ किया है तो उसे मेरे पास आना चाहिये था। मेरे पास नहीं आया। किसी के पास भी नहीं आया तो उसके मन में बेईमानी आ गयी होगी। हमें हिस्सा नहीं देना चाहता होगा।”
वानखेड़े मुस्करा पड़ा। कड़वे ढंग से।
“क्या हुआ?”
“दौलत से यारी हो जाये तो, उसे इंसानों की यारी की जरूरत कहां पड़ती है।” वानखेड़े ने कहा –“मेरे ख्याल में तो अगर देवराज चौहान तुम लोगों को हिस्सा देता है तो वो बहुत बड़ा बेवकूफ होगा।”
“तुम लोग डकैती में उसके साथ थे कि अगर डकैती होती है तो हिस्सा मिलेगा। यही ना?”
“हां।” गोदरा ने सहमति से सिर भी हिलाया।
“डकैती वाला मामला तो खत्म हो गया। अब देवराज चौहान अपने तौर पर ही डाका डालने वालों को तलाश...।”
“लेकिन देवराज चौहान ने कहा है कि अगर उसे जेवरात मिल गये तो हमें हिस्सा देगा।”
“कहा है तो ये उसकी शराफत है। उसकी मर्जी है। मैं तो ये बता रहा था कि उसूल के तौर पर अब तुम किसी भी तरह के हिस्से के हकदार नहीं बनते।”
वानखेड़े ने उसे घूरा –“एक बात बताना।”
“क्या?”
“जब तुम डकैती में शामिल थे। तब तुम्हें कानून का ध्यान नहीं आया कि फंस गये तो... ।”
“नहीं।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में इंकार किया –“मुझे कानून का जरा भी ध्यान नहीं आया। तब मुझे हर तरफ दौलत ही दौलत और सफलता नज़र आ रही थी। कानून और पुलिस तो मेरी सोचों से भी दूर था। बहुत दूर। मुझे लग ही नहीं रहा था कानून भी कुछ होता है लेकिन अब मुझे सिर्फ कानून ही नज़र आ रहा है। खाकी वर्दियां ही नजर आ रही हैं। जेल और अदालतें ही दिखाई दे रही हैं। बरबादी ही बरबादी नजर आ रही है।”
“ठीक कहते हो।” वानखेड़े खा जाने वाले स्वर में बोला– “जुर्म के बाद, इंसान को यही सब नजर आता है। कानून के पास पहुंच जाये इंसान तो इन्हीं बातों में घूमता रहता है। कानून से दूर निकल जाये तो कानून बेवकूफ लगता है कि उसने क्या कर लिया मेरा। कोई किस्मत वाला ही कानून से बच पाता है। अपराध करने के बाद, वरना देर-सवेर सब पकड़े जाते हैं।
गोदरा ने पश्चाताप भरे भाव में मुंह फेरा और हमारी तरफ देखने लगा।
तभी चपरासी मदनलाल को वहां छोड़ गया।
☐☐☐
भीतर आते ही मदनलाल की निगाह, प्रवेश गोदरा पर पड़ी तो ठिठका। आखें सिकुड़ी।
“क्या हुआ?” वानखेड़े ने पूछा।
“आपको तो पता ही है कि क्या हुआ।” मदनलाल मुस्करा कर बोला – “आप तो जानते ही हैं कि मैंने इसे देखा हुआ है। इसने आपको फांसा और देवराज चौहान ने आपको मेरे हवाले किया कि मैं आपको कैद में रखूं –पकड़ लिया इसे। इस बार तो पुलिस ने बहुत तेज काम किया। कुछ जल्दी ही पकड़...।”
वानखेड़े को घूरते पाकर, चुप सा हो गया मदनलाल। फिर बोला।
“मैं तो यूं ही मजाक।” मदनलाल ने धीमे स्वर में कहना चाहा।
“बैठो।”
“सच में? पहले जब मैं बैठने को बोला था तो आपने मना कर –।”
“बैठो।”
मदनलाल बैठा तो वानखेड़े ने लिफाफे में से तस्वीरें निकालकर दिखाई।
“इनमें से किसी को पहचानते हो।”
तस्वीरों पर नज़र पड़ते ही मदनलाल बोला।
“मार दिया। एनकाउंटर में मारा होगा। तभी –।”
“एनकांउटर में मारा हो तो इनकी शिनाख्त की जरूरत नहीं पड़ती।” वानखेड़े ने कड़वे, सख्त स्वर में कहा –“जब तुम एनकाउंटर में मरोगे, तो पुलिस को तुम्हारी शिनाख्त की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि कई जानते होंगे कि तुम मदनलाल...।”
“भगवान का नाम लो। मैं एनकाउंटर में क्यों मरूं।” मदनलाल कुछ लम्बी ही सांस लेकर बोला।
वानखेड़े सख्त निगाहों से उन्हें देखने लगा।
मदनलाल ने तस्वीरों पर नजरें टिका दी।
प्रवेश गोदरा रह-रह कर, मदनलाल को देख लेता था।
वानखेड़े ने, मदनलाल के चेहरे के भावों को बदलते स्पष्ट नोट किया। परन्तु खामोश रहा। दो-तीन मिनट के बाद मदनलाल ने तस्वीरों से नज़रें हटाई। गम्भीर नज़र आ रहा था वो।
“क्या हुआ?” वानखेड़े ने पूछा।
“एक बात का जवाब देंगे। उसके बाद मैं आपकी हर बात का जवाब दूंगा।”
“क्या?”
“किस मामले में आप ये सब कर रहे हैं?” वानखेड़े की निगाह उसके चेहरे पर थी।
“डकैती के मामले में। तीस अरब की डकैती इन पांचों ने डाली है। डकैती के बाद ये कहीं छिप गये। लेकिन वहां पर किसी ने इन्हें मार दिया और तीस अरब के जेवरातों को ले गया।”
“समझ गया। ये तो होना ही था एक दिन।”
“क्या मतलब?”
“इंस्पेक्टर साहब। इनमें से एक को जानता हूँ मैं।”
मदनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा –“बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। उसकी मां को भी, बाप को भी सब को जानता हूं। जो उसके परिवार में है। साला एक नम्बरी हरामी था। कमीना था। कुत्ता था। इसके मरने पर मेरे जैसे कमीने को चैन मिला है तो दूसरे लोगों को कितना मिला होगा। मदनलाल के चेहरे पर कठोरता के भाव आ गये। नज़रें वानखेड़े पर थी।
“किसको जानता है?” वानखेड़े सतर्क सा नजर आने लगा।
तस्वीरों में से एक तस्वीर निकालकर, वानखेड़े के सामने कर दी।
“इसे।”
भोपाल सिंह की तस्वीर थी वो। चेहरे की तस्वीर। चेहरे पर एक तरफ गोली का निशान नजर आ रहा था।
वानखेड़े ने तस्वीर देखी फिर मदनलाल को।
“कौन है ये?”
“मेरा बड़ा भाई। भोपाल सिंह।”
वानखेड़े के दांत भिंच गये।
प्रवेश गोदरा भी हैरानी से चौंका।
“तुम्हारा बड़ा भाई। भोपाल सिंह?”
“हां। इसका अता-पता क्या, जहां ये रहता था उस घर का नक्शा भी बता देता हूँ। क्योंकि कभी मैं वहां रहा करता था। वो मेरा ही घर था। मेरे बाप का बनाया हुआ है तो मेरा ही होगा। भोपाल का भी होगा। लेकिन बाप के मरते ही, भोपाल ने लात मारकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया। क्या करता। बड़ा दादा रहा है वो। रिवॉल्वर रखता था। मैं तो यूं ही आवारागर्दी किया करता था। भोपाल को मुकाबले का जवाब कैसे देता। मुकाबला कर भी लेता, लेकिन मां ने भोपाल की ही साईड ली और मेरा मन खट्टा हो गया दोनों से। भोपाल के डर से कम, खट्टास ज्यादा होने की वजह से मैंने वो घर ऐसा छोड़ा कि पलटकर भी उधर नहीं गया। किसी से मां का भी हाल नहीं पूछा। उधर नये इलाके में जम गया। जैसे-तैसे करके, पेट पालने लगा। दादागिरी वाला ही तो धंधा कर सकता था मैं।”
“कहां रहता है भोपाल सिंह?”
मदनलाल ने घर का पता बताकर भारी मन से कहा।
“जब बच्चा था तो मां कहा करती थी उसके दो बच्चों में एक सिंह है और दूसरा लाल। बहुत प्यारे हैं लेकिन जब बड़ा हुआ तो लाल को लात मारकर निकाल दिया और सिंह को घर पर रख लिया। क्योंकि सिंह की दादागिरी चल पड़ी थी। वो दो पैसे घर पर ले आता था। लाल तो यूं ही आवारागर्दी किया करता था।” मदनलाल के चेहरे पर थकान के भाव नज़र आ रहे थे –“भोपाल के मरने से मेरे को कोई तकलीफ या हैरानी नहीं हुई। गैर कानूनी काम करने वाली कभी भी मर सकते हैं। पुलिस के हाथों। दुश्मनों के हाथों। कभी भी कुछ भी हो सकता है। मुझे दुःख नहीं है, इसके मरने का। चैन मिला मेरे को घर से निकालकर, इसने बहुत गलत किया था मेरे साथ।”
वानखेड़े ने तस्वीर एक तरफ रखी। कश लिया।
“हैरानी है कि इतनी बड़ी डकैती में हाथ डाल दिया भोपाल ने।” मदनलाल गहरी सांस लेकर बोला।
“बड़ी डकैती में हाथ तो डाला ही।” वानखेड़े समझाने वाले स्वर में बोला – “साथ ही इसने देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर के खिलाफ काम किया। देवराज चौहान जिस डकैती की तैयारी कर रहा था, उसे ये पांचों कर गये। ठीक उसी तरह, जिस तरह देवराज चौहान करने जा रहा था। यहां तक कि डकैती ने जिन रिवॉल्वरों और नकाबों का इस्तेमाल देवराज चौहाने ने करना था उन्हीं का इस्तेमाल, इन्होंने कर लिया।”
“ओह।” मदनलाल के होंठ सिकुड़े –“इसका मतलब, कोई देवराज चौहान पर नजर रख रहा था। कोई देवराज चौहान की भीतरी बातों की खबर बाहर दे रहा था।”
“हां। यही हुआ-परन्तु इन बातों से पुलिस को कोई वास्ता नहीं।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा –“मदनलाल। मुझे भोपाल सिंह के बारे में जानकारी चाहिये कि वो इन दिनों किस-किस के साथ काम कर रहा था। उसके आस-पास कौन-कौन लोग रहते थे। इस डकैती का जिक्र शायद उसने किसी से किया हो। मेरे ख्याल में इनका कोई छटा साथी भी हो सकता है। आजकल तुम्हारा भाई किस-किस से ज्यादा मिल रहा था। समझे-मैं कोई ऐसी बात जानना चाहता हूं कि जिससे मुझे मालूम हो सके कि इन लोगों ने डकैती की तैयारी कैसे की। किसने इनकी सहायता की?”
“इंस्पेक्टर साहब...।” तभी फोन की बेल बजी तो मदनलाल खामोश रह गया।
वानखेड़े ने तुरन्त रिसीवर उठाया।
“हैलो।”
“वानखेड़े साहब।” लेबोरेट्री विभाग के इंचार्ज की आवाज कानों में पड़ी – “शाहिद साहब कुछ देर पहले गिलास पर किसी की उंगलियों की छाप मेरे पास लाये...।”
“हां। रिपोर्ट तैयार हो गयी?”
“जी।” दूसरी तरफ से आवाज आई –“चारों लाशों के पास से उठाये गये उंगलियों के निशानों से वो निशान मेल नहीं खाते।”
“मतलब कि गिलास वाले प्रिंट बेकार रहे इस मामले में।”
“जी।”
“ओके। अभी आपके पास तीन लोगों के फिंगर प्रिंट आयेंगे। उनकी रिपोर्ट भी इसी तरह जल्दी चाहिये होंगी।”
“मैं जल्दी तैयार कर दूंगा।” उधर से आवाज आई।
वानखेड़े ने रिसीवर रखा। प्रवेश गोदरा को देखा।
“तुम जा सकते हो। बच गये।”
“मैंने।” गोदरा उठता हुआ गम्भीर स्वर में बोला –“जो गलत काम किया, वो आपसे कह ही चुका हूं, जो नहीं किया...।”
“ज्यादा भोले बनकर बातें करने की जरूरत नहीं है।”
वानखेड़े का स्वर सख्त था –“चुपचाप जाकर घर में बैठ जाओ। आज की तारीख में तुम भूल कर भी शर्मा, रूपा ईरानी या भंडारी को फोन नहीं करोगे। अगर उनका फोन आ जाये तो तुम भूलकर भी नहीं कहोगे कि पुलिस उनके फिंगर प्रिंट लेने की तैयारी –।”
“मैं मुंह बंद रखूंगा।”
“अगर मेरे कहने के बाद भी मुंह खोला तो, केस तैयार करके तुम्हें बंद कर दूंगा। आजमा लेना।”
“मेरे से आपको शिकायत नहीं होगी।”
“इस बीच अगर देवराज चौहान तुमसे सम्पर्क करे, तो बताए कि उसने डकैतों को मार दिया है। जेवरात मेरे पास हैं तो तुम इस बात की खबर फौरन मुझे दोगे। तब चालाकी की तो।”
“नहीं करूंगा इंस्पेक्टर साहब। कोई चालाकी नहीं करूंगा। मैं आपका भरोसा नहीं तोडूंगा।”
“जाओ।” वानखेड़े ने उसे घूरते हुए कहा।
गोदरा ने गम्भीर भाव में सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
वानखेड़े ने मदनलाल पर निगाह मारी। वो सोचों में डूबा उसे ही देख रहा था।
“हां।” वानखेड़े के होंठ हिले।
“सोच रहा हूं इंस्पेक्टर साहब।” मदनलाल गम्भीर स्वर में बोला –“कि मुझे भोपाल के बारे में कुछ नहीं पता कि वो क्या कर रहा था। छ: साल से मैंने उससे नाता तोड़ रखा...।”
“मालूम तो कर सकते हो कि इन दिनों वो किसी फेर में था। कौन-कौन उसके खास थे जो –।”
“वो तो सब मालूम कर लूंगा।”
“करो। मैं तुम्हें तुम्हारी मां के घर ही मिलूंगा। जो पता तुमने मुझे बताया है, वहीं मिलोगे क्या?”
“भोपाल मर गया तो वहीं रहूंगा। वहीं मिलूंगा। अब भला मुझे कौन बाहर निकालेगा। वो मेरे बाप का घर था। आप मुझे अपने अपहरण के लिये, गिरफ्तार नहीं करेंगे?”
“नहीं। मैंने जो काम कहा है, वो दिल लगा कर करोगे तो, गिरफ्तार नहीं करूंगा। भोपाल के बारे में पूरी खबर –।”
“दूंगा।” मदनलाल उठ खड़ा हुआ –“सब मालूम करता हूं। इसे मैं अपना काम समझकर करूंगा।”
दोनों की नजरें मिली।
“जाओ। मुझे फोन कर लेना जरूरत पड़ी तो।” वानखेड़े बोला –“नहीं तो मैं कल आऊंगा तुम्हारे पास।”
“जी।” मदनलाल ने सलाम वाले ढंग में हाथ ऊपर उठाया और पलटकर बाहर निकल गया।
☐☐☐
“हैलो इंस्पेक्टर।” दरवाजा खोलते ही इंस्पेक्टर वानखेड़े पर निगाह पड़ी तो रूपा ईरानी मुस्करा कर कह उठी – “आपसे पूछकर ही होटल छोड़कर मैं फ्लैट पर आई हूँ। आप मेरे पीछे-पीछे आ गये। भीतर आईये।”
“पुलिस वाले इसी तरह बे-वक्त ही लोगों के पास पहुंचकर, उन्हें परेशान करते हैं।” वानखेड़े भीतर आया।
“बे-वक्त तो मानती हूं, लेकिन बे-वजह नहीं। बैठिये-कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूं। क्या लेंगे आप चाय-कॉफी। मौसम गर्म है। ठण्डा चलेगा क्या?”
“कुछ नहीं चाहिये। आप बैठिये।”
रूपा ईरानी बैठ गयी।
वानखेड़े ने जेब से तस्वीरों वाला लिफाफा निकाला और टेबल पर रख दिया।
“इस लिफाफे में पांच चेहरों की तस्वीरे हैं। देखकर बताईये कि इनमें से आप किस-किस को जानती हैं।”
“ये तो बहुत आसान बात है।” कहते हुए रूपा ईरानी ने लिफाफा उठाया और खोलने लगी।
वानखेड़े की पैनी निगाह उसके चेहरे पर टिक चुकी थी।
लिफाफा खोलकर उसने तस्वीरें निकाली तो उन पर नज़र पड़ते ही घबरा उठी। शरीर जोरों से हिला।
“ये-ये तो मरे हुओं की तस्वीरें हैं।” उसके होंठों से तेज स्वर निकला।
“हाँ। किस-किस को जानती हैं आप?”
रूपा ईरानी ने गहरी सांस लेकर खुद को संभाला फिर तस्वीरों को देखा।
मिनट भर ऐसे ही बीत गया।
“इनमें से मैं किसी को भी नहीं जानती।” उसने वानखेड़े को देखा और तस्वीरें टेबल पर रख दी।
“एक बार फिर ध्यान से देखिये।”
“जरूरत नहीं। एक बार देखना ही बहुत है। इनमें से किसी को भी नहीं जानती। कौन है ये?”
“डकैती करने वाले।”
“ओह!” रूपा ईरानी ने लम्बी सांस ली –“डकैती करने वाले पकड़े गये –लेकिन ये तो उनकी लाशों की तस्वीरें हैं।”
“मर गये सब, जिन्होंने डकैती की।”
“क्या?” मुंह खुला रह गया रूपा ईरानी का –“मर गये सब?”
वानखेड़े ने सहमति से सिर हिलाया। एकटक उसे देख रहा था।
“सब कैसे मर सकते हैं। उस दौलत को-तीस अरब के बेशकीमती जेवरातों को पाने के लिये कोई तो जिन्दा रहा होगा।”
वानखेड़े ने टेबल पर पड़ी तस्वीरें उठाकर लिफाफे में डाली। लिफाफा जेब में।
रूपा ईरानी उसे ही देखे जा रही थी।
“ठीक कह रही हो तुम। सब नहीं मर सकते। तीस अरब के जेवरातों को पाने के लिये कोई तो जिन्दा होगा।” वानखेड़े के होंठों पर शांत-गम्भीर मुस्कान उभरी –“वो जिन्दा है, जिसके पास जेवरात हैं।”
“गुड।” रूपा ईरानी के होंठों से तेज स्वर निकला –“पकड़ लिया उसे?”
“पकड़ा जायेगा। पता लगने की देर है।”
रूपा ईरानी की आंखें सिकुड़ गयी।
“मैं समझी नहीं।”
“कोई डकैती करने वालों की हत्या करके, तीस अरब के जेवरात ले गया है। ये लोग कहीं छिपे हुए थे। वहां के हालात देखकर तो ऐसा लगता है कि उनमें, झगड़ा हो गया हो। उन्होंने ही एक-दूसरे को मार दिया। परन्तु एक, जिसका नाम भोपाल सिंह है, वो बच गया आपसी झगड़े में।”
“फिर?” रूपा ईरानी के होंठों से निकला।
“फिर किसी ने उसे गोली मारी। जिस रिवॉल्वर से गोली चलाई गयी, वो रिवॉल्वर नहीं मिली। रिवॉल्वर मिलती तो शायद पुलिस सोचती कि वे सब हो आपसी झगड़े में मरे। ऐसे में स्पष्ट है कि उस आखिरी व्यक्ति को जिसने गोली मारी, वो ही दौलत ले गया।”
“और वो कौन है?” रूपा ईरानी वानखेड़े को देख रही थी –“तीस अरब जैसी मोटी रकम के जेवरात कौन ले गया?”
“नहीं मालूम।” वानखेड़े ने उसे देखा –“ये काम कोई भी कर सकता है।”
“कोई कौन?”
“तुम-गोदरा-कमल शर्मा-देवराज चौहान-वो ज्वैलर्स रनवीर भंडारी।” रूपा ईरानी गहरी सांस लेकर रह गयी।
“किसी को भी खबर लग सकती है कि जेवरातों की डकैती करने वाले कहां छिपे हैं। वे वहां गया। वहां पहले से ही उनमें झगड़ा चल रहा था। खून-खराबा हो रहा था। वो देखता रहा। जब उनमें से आखिरी बचा तो उसे गोली मार दी। फिर जेवरात लेकर चला गया। बहुत आसान रहा होगा उसके लिये जेवरात पाना।”
रूपा ईरानी गम्भीर निगाहों से वानखेड़े को देखती रही।
“क्या देख रही हो?” वानखेड़े ने सिगरेट सुलगाई।
“कुछ नहीं। तुम्हारी बातें ही सोच रही हूं इंस्पेक्टर।” रूपा ईरानी ने सिर हिलाकर कहा –“ऐसा कुछ हुआ है तो कम से कम मैंने कुछ नहीं किया। इस मामले से मेरा जितना वास्ता था। बता दिया मैंने।”
“पुलिस को सब पर शक करना पड़ता है।”
“बेशक करो। मुझे कोई एतराज नहीं।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा – “बल्कि मैं तो चाहती हूं कि सबसे पहले मुझ पर ही शक करो और मुझे ही शक से फारिग करो।”
“इतनी जल्दी क्या है शक से फारिग होने की?”
“इंस्पेक्टर। कोरिया में अगले महीने फैशन शो हो रहा है। कपड़ों का। उसके लिये कोरियन कम्पनी से बात चल रही है। अगर बात पक्की हो गई तो उस शो के लिये मुझे कोरिया जाना पड़ेगा। इस शो से मेरा कैरियर ऊंचा उठ सकता है। अगर इस शो में मैं दूसरी मॉडलों से बेहतर रही,तो मुझे यूरोप के लिये काम मिल सकता है। कोरियन कम्पनी से जो बातचीत हो रही है उसमें ये बात शामिल है कि जो भी मॉडल बेहतर रही शो में। जिसको अंक ज्यादा मिलेंगे, उसे वो कम्पनी यूरोप में मॉडलिंग के बेहतर मौके दिलवायेगी।”
वानखेड़े, रूपा ईरानी को घूरने लगा।
“क्या हुआ?” रूपा ईरानी ने बेचैनी से पहलू बदला।
“तुम्हारा कैरियर तो पुलिस भी बना सकती है, तुम डकैती में देवराज चौहान की सहायक रही। तुम्हारे पहुंचाये हथियारों से ही डकैती करने वाले, डकैती में कामयाब हो सके।” वानखेड़े ने कड़वे स्वर में कहा।
रूपा ईरानी ने होंठ भींच लिए। आंखें बंद कर ली।
“इंस्पेक्टर।” रूपा ईरानी ने आंखें खोली और हाथ जोड़कर थके स्वर में बोली –“मैं अपनी गलती की माफी चाहती हूं। पागलपन में हुआ ये काम मुझसे। अंजाने में हुआ मैं ऐसी नहीं हूं।” उसकी आंखों मे पानी चमकने लगा था – “प्रवेश से मैं प्यार करने लगी थी। उससे शादी करना चाहती थी। न चाहते हुए भी उसकी गलत बात मान ली। अब तो मुझे अपने से ही नफरत हो जाती है कि मैं कैसे डकैती जैसे काम में हाथ डाल बैठी। जब से इस चक्कर में फंसी हूं, उसके बाद से तो प्रवेश भी मुझे कम अच्छा लगने लगा है। मालूम नहीं क्यों, बीते कुछ घंटों से ही सोच रही हूं कि उससे शादी करूं कि नहीं?”
वानखेड़े उसे देखता रहा।
रूपा ईरानी ने हथेली से गालों पर लुढ़क आये आंसुओं को पोंछा।
“इस बार मुझे माफ कर दो। भविष्य में कभी गलत काम करूं तो बेशक जो भी सजा दे देना। तुम मुझसे वादा कर चुके हो कि इस मामले में मुझे गिरफ्तार नहीं करोगे।” रूपा ईरानी के स्वर में भारीपन आ गया था।
“दिल तो नहीं करता तुममें से किसी को भी छोड़ने का।” वानखेड़े की आवाज में चुभन थी –“लेकिन सब को छोड़े जा रहा हूं। किसी को भी अभी तक गिरफ्तार नहीं किया।”
रूपा ईरानी ने कुछ नहीं कहा।
“देवराज चौहान मिला तुमसे?”
“देवराज चौहान नहीं तो –।”
“उसका फोन आया?”
“नहीं।” रूपा ईरानी ने इंकार में सिर हिलाया।
“अपना कार्ड मैंने तुम्हें दे रखा है। देवराज चौहान की जेवरातों की या पुलिस के काम की कोई भी खबर हो तो मुझे फौरन फोन करना। अगर मुझे पता लगा कि खबर तुम्हारे पास थी और तुमने मुझे फोन नहीं किया तो –।”
“ऐसा नहीं होगा।” रूपा ईरानी गम्भीर स्वर में कह उठी –“ऐसे मौके पर मैं आपको उसी वक्त फोन करूंगी।”
वानखेड़े उठ खड़ा हुआ। कश लिया।
“मैं तुम्हारे फ्लैट की तलाशी लेना चाहता हूं।”
“मुझे कोई एतराज नहीं।”
उसके बाद वानखेड़े ने रूपा ईरानी के पूरे फ्लैट की अच्छी तरह तलाशी ली।
आधा घंटा लग गया।
परन्तु उसके काम की कोई चीज़ भी हाथ नहीं लगी।
“चाय बनाऊँ इंस्पेक्टर साहब?” रूपा ईरानी उसके चेहरे पर थकावट के भाव देखकर कह उठी।
“नहीं। शीशे का खाली गिलास लाओ।”
“क्या?”
“खाली गिलास शीशे का।” वानखेड़े ने उसे घूरा।
रूपा ईरानी किचन से शीशे का खाली गिलास ले आई।
वानखेड़े ने वहां पड़े अखबार में गिलास रखवाया और उसमें लपेट लिया।
“गिलास का आप क्या करेंगे?” रूपा ईरानी उलझन में थी।
“पुलिस का काम है। कोई तो वजह होगी।”
रूपा ईरानी सिर हिलाकर रह गयी।
“तुम मुझे बताये बिना कोरिया नहीं जाओगी।”
“अच्छा।” रूपा ईरानी के होंठ हिले।
“अगर चुपचाप चली गयी तो कानून अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके, तुम्हें फौरन कोरिया से वापस बुलवा लेगा।”
“आपको ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। चोर इस तरह भागते हैं। मैं चोर नहीं हूं।” रूपा ईरानी ने गम्भीर स्वर में कहा –“मैं जब भी जाऊंगी, आपको बता कर जाऊंगी। आपकी इजाजत लेकर जाऊंगी।”
वानखेड़े अखबार में शीशे का गिलास लपेटे बाहर निकला और पुलिस कार तक पहुंचा। शाम हो चुकी थी। अंधेरा कब का फैल चुका था। वानखेड़े ने अखबार में लिपटा गिलास देकर, ड्राईविंग सीट पर बैठे पुलिस वाले से कहा।
“ये लो। इस गिलास पर रूपा ईरानी की उंगलियों के निशान हैं। संभालकर इसे हैडक्वार्टर ले जाना। मालूम है ना, क्या करना है।”
“यस सर।” अखबार में लिपटा गिलास थामते हुए पुलिस वाले ने कहा – “आप साथ नहीं चलेंगे?”
“नहीं। मुझे कहीं और जाना है। दो-तीन घंटे बाद आऊंगा। तुम्हें जो काम कहा है वो करो।”
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