विशाल सिंह की कैद के अगले दिन मोना चौधरी शाम ढले, महाजन के साथ पारसनाथ के रेस्टोरेंट पहुंची। दोनों थके लगे रहे थे।

दोनों सीधा ऊपर पहुंचे।

पारसनाथ उस वक्त रेस्टोरेंट में नहीं था। लेकिन ऊपर डिसूजा मिला। मोना चौधरी और महाजन को वो बखूबी और बहुत अच्छी तरह जानता था।

डिसूजा ने सिर हिलाकर दोनों का स्वागत किया।

“पारसनाथ कहां है?” मोना चौधरी ने बैठते हुए पूछा।

“घंटा भर पहले किसी काम के लिए गए हैं। वापसी में उन्हें दो-तीन घंटे तो लग ही जाएंगे।” डिसूजा ने कहा।

“बढ़िया वाली बोतल दे।” महाजन बोला –“जो पारसनाथ पीता है।”

डिसूजा दूसरे कमरे में गया और बोतल लाकर महाजन को थमा दो। महाजन ने बोतल खोली और होंठों से लगा ली। दो-चार घूंट के बाद बोतल हटाता हुआ बोला।

“बेबी के लिए चाय-कॉफी...।”

“अभी नहीं।” मोना चौधरी ने कहा –“कुछ देर बाद। पहले आराम करूंगी।”

“जैसा तुम ठीक समझो बेबी।”

मोना चौधरी ने डिसूजा को देखा।

“पारसनाथ यहां नहीं है तो तुम यहां क्या कर रहे हो डिसूजा?”

“विशाल सिंह की निगरानी कर रहा हूं।” डिसूजा शांत भाव में मुस्कुराया।

मोना चौधरी चौंक कर खड़ी हो गई।

“विशाल सिंह-कहां है वो?” मोना चौधरी का चेहरा दरिन्दगी से भर उठा।

“पीछे वाले कमरे में बांध रखा है।”

महाजन भी उठ खड़ा हुआ।

“कब पकड़ा उसे?”

“कल दोपहर बाद।”

“आसानी से हाथ में आ गया?”

“जी हां। कोई खास परेशानी नहीं हुई।”

मोना चौधरी और महाजन की आंखें मिली।

मोना चौधरी की आंखों में मौत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे।

“आओ महाजन।” कहने के साथ ही मोना चौधरी दाईं तरफ नजर आ रहे दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

“इस हरामजादे की शक्ल दोबारा देखने में मुझे बहुत खुशी होगी।” दरिन्दगी से भर गया महाजन का स्वर।

डिसूजा उनके पीछे हो गया।

☐☐☐

डिसूजा ने विशाल सिंह को सख्ती से बांध रखा था। ऐसा कि वो न तो बैठ सकता था। न ही हिल सकता था। पीठ पीछे हाथ करके बांध रखे थे। दोनों पिंडलियां आपस में मिलाकर कस कर, नायलोन की डोरी से बांध रखी थी।

विशाल सिंह के चेहरे से ही नजर आ रहा था कि वो तकलीफ और पीड़ा में है।

कदमों की आहट पाकर विशाल सिंह ने चेहरा घुमाया तो उसके चेहरे पर फक्क और पीलेपन के भाव आ गए। आंखों में खौफ और दहशत की परछाईयां स्पष्ट दिखाई देने लगीं। मोना चौधरी और महाजन के चेहरों पर उसकी निगाह जा रही थी। एकाएक ही वो कह उठा।

“तुम दोनों को जिन्दा देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है।” आवाज में सूखापन था –“तुम दोनों जिस विमान में असम गए थे, वो आकाश की ऊंचाइयों में टुकड़े-टुकड़े हो गया था। तुम दोनों बहुत किस्मत वाले हो जो...।”

“हमारे साथ एक किस्मत वाला और भी है विशाल सिंह।” मोना चौधरी खूंखार स्वर में कह उठी।

विशाल सिंह ने मोना चौधरी के चेहरे के भावों को पहचान कर अपने भगवान को याद किया।

“क...कौन?”

“जसबीर वालिया।” मोना चौधरी का लहजा खूंखार ही था।

“ये...ये कौन है?”

“तू बतायेगा कि जसबीर वालिया कौन है। अभी तो तेरे से बहुत बातें करनी हैं।” मोना चौधरी ने उसे वहशी नजरों से देखते हुए डिसूजा से कहा –“इसके हाथ-पांव खोल दो।”

डिसूजा ने जेब से चाकू निकाला और विशाल सिंह की तरफ बढ़ा।

“इस हरामजादे पर हाथ डालने के लिए कितने आदमी लगाने पड़े?” महाजन ने क्रूर स्वर में कहा।

“आठ।” डिसूजा उसके बंधन काटते हुए बोला।

“मरे कितने?”

“एक भी नहीं। इस मामले में किसी भी तरफ का कोई नहीं मरा।”

“इस हरामी को कुछ करने का मौका नहीं मिला होगा। वरना इससे वास्ता रखता काम सूखे-सूखे कभी भी नहीं निपट सकता।” कहने के साथ ही महाजन ने हाथ में पकड़ी बोतल का घूंट भरा।

बंधन खुलते ही विशाल सिंह हाथ-पांवों को मसलने लगा। रह-रह कर वो मोना चौधरी और महाजन को देख रहा था। आंखों में बसा डर स्पष्ट नजर आ रहा था।

“कुर्सी दे डिसूजा।” घूंट भरकर महाजन बोला। नजरें विशाल सिंह पर ही टिकी थी।

कुछ दूर पड़ी, दो कुर्सियां डिसूजा ने उनके पास रख दी।

महाजन कुर्सी खींच कर उस पर बैठा और कहर भरे स्वर में बोला।

“देख तो साला कैसा डर रहा है। आंखें देख-सब कुछ लिखा है। कर्मों की पत्री चेहरे पर नजर आ रही है। कर्म करते हुए इंसान नहीं सोचता, लिस्ट सामने आती है तो...साले का चेहरा तो देखो। डिसूजा, शीशा दिखा इसे। नेई तो बाद में बोलेगा, इसका चेहरा ऐसा नहीं हो सकता।”

डिसूजा दांत भींचे, विशाल सिंह को देखता रहा।

मोना चौधरी भी कुर्सी पर बैठी।

“मुझे...मुझे समझ नहीं आता कि क्यों तुम मेरे पीछे...।”

“इस हरामी को मैं सीधा करता...।” महाजन ने भड़क कर उठना चाहा।

“अभी नहीं महाजन। इसे कुछ नहीं कहना है। तब तक कुछ नहीं कहना है, जब तक ये हमारी बातों का ठीक जवाब देगा।”

मोना चौधरी सर्द स्वर में बोली –“ये भी जानता है कि सच क्या है और हम भी जानते हैं। पहले इससे बातें करेंगे। मेरे से पूछे बिना कुछ कर मत बैठना।”

विशाल सिंह ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। चेहरा और भी फक्क हो गया था।

महाजन ने घूंट भरा।

डिसूजा तीन कदम दूर शांत सा खड़ा था।

मोना चौधरी और विशाल सिंह एक दूसरे को देख रहे थे।

“बोल।” कुर्सी पर बैठे-बैठे मोना चौधरी सख्त स्वर में कहती हुई जरा सी आगे झुकी।

विशाल सिंह ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“बता, किसके कहने पर तूने मुझे और महाजन को उस विमान में पहुंचाया। तेरे को जवाब देने में आसानी हो, इसके लिए तेरे को पहले बता रही हूं कि विमान विस्फोट के कुछ मिनट पहले जसबीर वालिया ने हमें बता दिया था कि ये सारा मामला बख्तावर सिंह से वास्ता रखता है और...खैर, छोड़, सब मैं ही कहूंगी तो तू क्या कहेगा। तू बोल, सारी बात बिना पूछे एक ही बार में बता दे।”

विशाल सिंह ने कई बार सूखे होंठों पर जीभ फेरी। कहा कुछ नहीं। डर की वजह से ऐसा लग रहा था कि वो अभी मर जाएगा।

“हरामजादा ऐसे नहीं बताएगा मैं...।” महाजन ने गुर्रा कर उठना चाहा।

“महाजन!” मोना चौधरी विशाल सिंह को घूरते हुए कह उठी –“अगर इसने मुंह बंद रखा तो, तेरे को मनचाहा करने का पूरा मौका मिलेगा लेकिन इसके मुंह से इंकार सुन लेने दे।”

चुप्पी सी छा गई वहां।

महाजन ने बोतल से घूंट भरा।

“मुंह बंद रखेगा या खोलेगा।” मोना चौधरी मौत भरे स्वर में कह उठी।

नीचे बैठे विशाल सिंह ने उठना चाहा तो मोना चौधरी गुर्राई।

“उठने की कोशिश मत कर। बैठा रह। मेरी बात का जवाब दे। बख्तावर सिंह से तेरा क्या रिश्ता है। क्यों तूने बख्तावर सिंह के कहने पर मुझे और महाजन को, उस विमान में बिठाया और जसबीर वालिया कौन है। इस वक्त कहां पर मिलेगा ये। मुझे अपनी हर बात का जवाब चाहिए।” मोना चौधरी मौत से भरे सर्द स्वर में कह उठी।

विशाल सिंह खौफ भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखने लगा। बोला नहीं।

मोना चौधरी के दांत भिंच गए। चेहरा और भी कठोर हो गया। उसने महाजन की तरफ देखा और इशारा किया। इशारा मिलते ही दांत किटकिटाता महाजन उठा। विशाल सिंह की तरफ बढ़ा। हाथ में बोतल थाम रखी थी।

तभी डिसूजा खतरनाक स्वर में कहते आगे बढ़ा।

“आप क्यों तकलीफ करते हैं महाजन साहब। मुझे बताइये, इसका क्या करना है।”

करीब पहुंचकर महाजन ने जोरदार ठोकर विशाल सिंह की टांग पर मारी।

विशाल सिंह पीड़ा से कराह उठा।

“इसे खत्म करना है। गोली मार कर नहीं। तड़पा-तड़पा कर। इसने हमें ऐसे विमान में जानबूझ कर पहुंचा दिया जिसे आसमान में विस्फोट से उड़ा देने का प्रोग्राम तय...।”

“ये गलत है।” विशाल सिंह जल्दी से बोला –“मुझे नहीं मालूम था कि आगे क्या होने वाला है।”

“क्यों नहीं मालूम था?”

“बख्तावर सिंह ने जो बताया, मैंने वो किया। मुझे क्या मालूम कि...” विशाल सिंह ने होंठ भींच लिए।

“डिसूजा। मार-मार दे, मार दे इसे।”

डिसूजा दांत भींचे आगे बढ़ा और विशाल सिंह के सिर के बाल पकड़ लिए।

“ठहरो। ठहरो।” चिल्ला पड़ा विशाल सिंह –“मैं सब कुछ बताता हूं।”

डिसूजा ठिठका।

“बताएगा?” डिसूजा ने उसके सिर के बालों को झिंझोड़ा।

“छोड़ दे।” महाजन तीन कदमों की दूरी पर खड़ा कह उठा –“एक बार इसकी सुन लेते हैं। तू यहीं खड़ा रह। क्योंकि मुझे मालूम है ये साला कुछ नहीं बताएगा।”

डिसूजा ने सिर के बाल छोड़ दिए। पास ही खड़ा रहा।

विशाल सिंह ने गहरी-गहरी सांसें लेते हुए मोना चौधरी को देखा।

“मोना चौधरी।” उसने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर कहा –“मैं सब कुछ बता देता हूं। मेरी जान तो नहीं लोगी?'

“नहीं।” मोना चौधरी का स्वर भिंचा हुआ था।

“वादा करती हो?”

“हां।”

“बाद में वादे से हट तो नहीं जाओगी?” उसके चेहरे पर मजबूरी और खौफ नजर आ रहा था।

“नहीं।”

“पक्का?”

मोना चौधरी ने अपना कठोर चेहरा सहमति में हिला दिया।

विशाल सिंह ने गहरी सांस ली और परेशान सा कह उठा।

“मुझे नहीं मालूम था कि तुम्हारा और बख्तावर सिंह का क्या मामला है। मैं सालों से बख्तावर सिंह के लिए काम करता आ रहा हूं। सच बात तो ये है कि मैं तब से बख्तावर सिंह के लिए काम कर रहा , जब मैं खास कुछ नहीं था। बख्तावर सिंह की तरफ से मिलने वाली दौलत से ही मैंने अपना वजूद और शानो-शौकत खड़ी की। उसकी बात को मैं इंकार नहीं कर सकता। क्योंकि उसी ने मुझे दौलतमंद बनाया है। दूसरे, उसके हाथ इतने लंबे हैं कि वो जब भी चाहे मुझे खत्म कर सकता है। उसके आदमियों का जाल हिंदुस्तान के कोने-कोने में...।”

“तुम जो बता रहे हो, वो में सब जानती हूं।” मोना चौधरी ने कठोर स्वर में कहा –“वो बताओ, जो मैं जानना चाहती हूं। मुझे और महाजन को विमान में क्यों?”

“बख्तावर सिंह का फोन आया था कि मोना चौधरी को किसी विमान में सवार करा कर कहीं भेजूं। इस तरह की विमान में उसकी सीटें बुक हो जाए और उसे मालूम होने के, कम से कम चौबीस घंटे बाद विमान रवाना हो। मेरा पूछना नहीं बनता था कि वो ऐसा क्यों करवाना चाहता है। पूछता तो बताता भी नहीं। उसके बाद मैंने तुम्हारी तलाश करवाई। किसी के द्वारा तुम तक मैसेज पहुंचा कि मैं तुमसे मिलना चाहा हूं तो तुमने फोन पर मुझसे बात की। फिर तुम मुझसे मिलने आई। साथ में महाजन भी था। मैंने तुम्हें असम में पहुंच कर कोई काम करने को कहा। जबकि उधर कोई काम भी नहीं था। मैंने तो बख्तावर सिंह के कहने पर तुम्हें विमान में बिठाना था। तुमने काम की कीमत एडवांस लेने को कहा तो वो भी मैंने दे दी। मैंने ही कहा कि तुम दोनों की टिकटें बुक कराकर बता दूंगा तो तुम बोली कि कल मैं फोन करके टिकटों के बारे में पता कर लूंगी। इस तरह तुम्हें विमान तक पहुंचा दिया।”

“और बख्तावर सिंह को खबर कर दी।”

“हां। एक नम्बर है। उस पर फोन करके जो बख्तावर सिंह से कहा जाए, वो उस तक पहुंच जाता है । उसके बाद बख्तावर सिंह का फोन आया। उसने पूछा कौन सी एयरलाइन्स का विमान है। एयरपोर्ट से कब छूटेगा। सीट नम्बर क्या है ? ये सब जानने के बाद बात खत्म हो गई। मैं भूल गया। फिर खबर मिली कि वो विमान आसमान में टुकड़े-टुकड़े हो गया और कोई नहीं बचा।”

“टुकड़े-टुकड़े क्यों हुआ?' मोना चौधरी ने ठंडे स्वर में पूछा –“तब ये बात तुम समझ गए होंगे?”

विशाल सिंह ने सहमति में सिर हिलाया और सूखे स्वर में बोला।

“खबर सुनने के बाद समझ गया था कि बख्तावर सिंह ने ही ये सब करवाया है। वो तुम्हें खत्म करना चाहता होगा।”

विशाल सिंह के शब्दों के बाद वहां सन्नाटा सा छा गया।

करीब मिनट भर बाद भोना चौधरी शब्दों को चबाकर कह उठी।

“उस विमान को जसबीर वालिया और राजू नाम के व्यक्ति ने उड़ाया। राजू तो खुद को नहीं बचा सका और विमान विस्फोट के साथ ही मर गया, लेकिन जसबीर वालिया पैराशूट से कूद कर बच गया।” मोना चौधरी के स्वर में मौत के भाव कूट-कूट कर भरे हुए थे –“मुझे जसबीर वालिया चाहिए।”

विशाल सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला।

“सुना नहीं तूने कि मुझे जसबीर वालिया नाम का वो व्यक्ति चाहिए।”

“तुम्हारी दुश्मनी तो बख्तावर सिंह से होनी...।”

“बख्तावर सिंह से लेन-देन अपनी जगह पर है। मैं जानती हूं कि वो किसी खास मौके पर ही हाथ आएगा। इस वक्त मुझे जसबीर वालिया चाहिए। जिसने सौ से ज्यादा, मासूम लोगों की जान विमान विस्फोट में ली। जो मुझे मौत के आखिरी मिनट में आतंक का चेहरा दिखाना चाहता था। वो चाहिए मुझे। बता वो किधर मिलेगा?”

पल भर की खामोशी के बाद विशाल सिंह बेचैनी से बोला।

“ये नाम मैंने पहली बार सुना है।”

“पहली बार सुना है या आखिरी बार। ये तुम जानो।” मोना चौधरी गुर्रा उठी –“मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि तू भी बख्तावर सिंह के लिए काम करता है और जसबीर वालिया भी बख्तावर सिंह के लिए। तुम दोनों को जोड़ने वाली कड़ी बख्तावर सिंह है। तुम दोनों ने बख्तावर सिंह के लिये एक ही काम पर काम किया है।”

“मोना चौधरी।” विशाल सिंह समझाने वाले स्वर में परेशान भाव में बोला –“बख्तावर सिंह के लिए सैंकड़ों आदमी हिंदुस्तान में काम करते हैं। जरूरी तो नहीं कि मैं सबको जानता होऊं। तुम...।”

“मैं सिर्फ जसबीर वालिया की बात कर रही हूं। सबकी नहीं।” मोना चौधरी गुर्रा उठी।

“ये हरामी जानता है जसबीर वालिया को।” महाजन खा जाने वाले स्वर में बोला –“लेकिन बता नहीं...।”

“मैं सच कहता हूं कि मैंने ये नाम पहली बार सुना है। मैं नहीं जानता जसबीर वालिया कौन...।”

“नहीं जानते तो जानो।” मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका –“मालूम करो, जसबीर वालिया कौन है और किधर मिलेगा।”

“ये बात मैं कैसे पता कर सकता हूं।” विशाल सिंह तनाव में नजर आने लगा –“ऐसा कुछ करने की कोशिश की तो बख्तावर सिंह को पता चल जाएगा और वो मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेगा।”

“वो तो बाद में मारेगा। उससे पहले मैं ही तुम्हें खत्म कर दूंगी।”

विशाल सिंह ने उसे देखते हुए सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

“तू हमसे ज्यादा आसानी और जल्दी से जसबीर वालिया के बारे में पता कर सकता है। जसबीर वालिया का कहना था कि बख्तावर सिंह के लिए काम करता रहता है। जो इंसान बेहिचक यात्रियों से भरा विमान उड़ा दे, वो गुमनामी की चादर ओढ़े तो रह नहीं रहा होगा। अपनी जगह का नामी बंदा होगा। तुम्हारी तरह। जसबीर वालिया नाम है उसका । नाम के दम पर तुम उसे जल्दी से जल्दी खोज सकते हो। तुम्हारे आदमी भी हर शहर में हैं। उनसे कहो कि वो सब काम छोड़कर ये जानने की कोशिश करें कि जसबीर वालिया कौन है। जो गैर कानूनी काम करता है। आसानी से मालूम हो जाएगा।”

विशाल सिंह फक्क चेहरे से मोना चौधरी को देखने लगा।

“क्या देखता है?”

“ऐसा कुछ पता करने की कोशिश की तो बख्तावर सिंह मेरी जान ले लेगा और...”

तभी महाजन गुर्रा उठा।

“डिसूजा।”

पास खड़े डिसूजा ने फौरन उसके सिर के बाल मुट्ठी में जकड़ लिए।

“खत्म कर दे हरामजादे को।”

“ठहरो।” विशाल सिंह घबरा कर चीखा –“मुझे कुछ मत कहना।”

डिसूजा ने प्रश्नभरी निगाहों से मोना चौधरी और महाजन को देखा।

विशाल सिंह हांफ रहा था।

“मैं...मैं जसबीर वालिया के बारे में पता करने की कोशिश करता हूं।'

“कोशिश से काम नहीं चलेगा।” मोना चौधरी मौत भरे स्वर में कह उठी –“तेरे को जिन्दा रहना है तो जसबीर वालिया के बारे में हमें पता करके बताना ही होगा कि वो कहां पर मिलेगा। किधर रहता है।”

विशाल सिंह ने गहरी-गहरी सांसें ली फिर खोखले से स्वर में बोला।

“मुझे-मुझे फोन चाहिए मैं...।”

“डिसूजा।” मोना चौधरी दांत भींचे बोली –“इसे फोन दो।”

“मोबाइल से काम चल जाएगा?” डिसूजा जेब से मोबाइल फोन निकालता हुआ कह उठा।

मोना चौधरी ने सहमति से सिर हिला दिया।

डिसूजा ने मोबाइल विशाल सिंह को थमा दिया।

☐☐☐

विशाल सिंह असंयत था। खुद को संयत करने की चेष्टा में लगा था।

उसने नम्बर मिला कर बात की।

“हैलो।” लाइन मिलते ही उधर से आवाज आई।

“कपाड़िया।” उसकी आवाज पहचान कर विशाल सिंह बोला –“मैं...।”

“सर आप।” उधर से कपाड़िया तेज से स्वर में कह उठा –“आप कहां हैं कल आपका किसी ने अपहरण कर लिया। मैं तो फोन पर बैठा हूं। ये सोच कर कि आपको वापस करने के लिए कोई फिरौती मांगता है तो दे दूं। नोट भी तैयार रखे...!”

“ये नोटों की फिरौती नहीं है। ।”

“तो?”

“जिन लोगों ने मेरा अपहरण किया है। वो नामी लोग हैं। खतरनाक हैं। मेरे से एक आदमी के बारे में जानना चाहते हैं। अगर मैं उसके बारे में न बता सका तो, मेरी जान ले ली जाएगी। कुछ करो कपाड़िया।”

“किस आदमी के बारे में जानना चाहते हैं। पता लगा देता हूं। अगर आपको मालूम हो कि आप कहां हैं तो मैं अभी आदमी लेकर वहां पहुंचता हूं और आपको वहां से छुड़ा लेता...।”

“बेवकूफों वाली बातें मत करो। जिन लोगों ने मुझे फोन दिया है। कैद किया है। वो क्या मामूली लोग होंगे। मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूं कि मेरा अपहरण करने वाले खतरनाक लोग हैं।”

“नाम क्या है उनका?”

“वो मेरे पास खड़े हैं। उनका नाम बताया तो मेरे सिर में गोली उतार देंगे।” विशाल सिंह गुर्राया।

“ओह।”

मोना चौधरी महाजन और डिसूजा की निगाह उस पर टिकी थी।

“तुम अपने काम की बात सुनो कपाड़िया।”

“जी।”

“जसबीर वालिया नाम है उसका, जिसके बारे में जानकारी प्राप्त करनी है। वो गैरकानूनी काम करता है। ऐसे काम कि छिपा नहीं रह सकता। इसके बारे में मालूम किया जा सकता है।” सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए विशाल सिंह ने कहा।

“दिल्ली का ही है?”

“ये नहीं मालूम।”

“तो कहां का है सर?”

“हिंदुस्तान में कहीं का भी हो सकता। बड़े शहरों को पहले चेक करो। दिल्ली-मुंबई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर। लेकिन छोटी जगहों को छोड़ना नहीं है। मेरे ख्याल में ये किसी बड़े शहर में ही मिलेगा।”

“ठीक है सर। इसका हुलिया पता है आपको?”

विशाल सिंह ने मोना चौधरी से पूछ कर जसबीर वालिया का हुलिया बताया और कहा।

“देश भर में मौजूद अपने आदमियों तक ये नाम और हुलिया पहुंचा दो। साथ ही समझा दो कि ये काम सब से जरूरी है। दूसरे काम बाद में।” विशाल सिंह ने आदेश भरे लहजे में कहा।

“जी। मैं अभी भी ये काम करता हूं।”

“रात को फिर फोन करूंगा।” विशाल सिंह ने कहा और फोन बंद कर दिया।

डिसूजा ने उसके हाथ से फोन लिया।

“जो तुमने कहा, वो मैं कर रहा हूं।'' विशाल सिंह थके स्वर में बोला –“अब भी जसबीर वालिया के बारे में मालूम न हो तो मेरा कोई कसूर नहीं। तब गुस्से में मेरी जान मत लेना।”

मोना चौधरी उसे क्रूर निगाहों से देखती हुई बोली।

“डिसूजा। इसके हाथ-पांव बांध दो और हर पल यहीं, इसके साथ रहो।”

☐☐☐

सुदेश कपाड़िया।

दस सालों से विशाल सिंह के साथ काम कर रहा था। वो विशाल सिंह का सबसे करीबी, सबसे विश्वासपात्र था। दोनों एक-दूसरे से खुश थे। कपाड़िया, विशाल सिंह के कर्मों का जीता-जागता चिट्ठा था यानी कि वो विशाल सिंह का सब कुछ था। बख्तावर सिंह के बारे में भी जानता था।

विशाल सिंह से बात करने के बाद उसने रिसीवर रखा और रिवाल्विंग चेयर पर बैठा सोच भरी मुद्रा में हौले-हौले झूलने लगा।

इस वक्त वो खूबसूरत केबिन में मौजूद था। विशाल सिंह की कैद, से वो जरा भी परेशान नहीं था। उसके मर जाने की भी उसे चिन्ता नहीं थी। क्योंकि वो जानता था कि विशाल सिंह की मौत के बाद उसके काम-धंधे का वो मालिक होगा। सच बात तो ये थी कि वो मालिक बनना चाहता था। लेकिन ये तभी हो सकता था कि जब विशाल सिंह ऐसी मौत मरे कि उस पर शक न जाए। विशाल सिंह के सारे आदमी धंधे को चलाए जाने के मामले में, सामान्य तौर पर उसका साथ देना शुरू कर दें।

यानी की उसे विशाल सिंह की मौत का इन्तजार था।

कुर्सी पर झूलना छोड़कर उसने रिसीवर उठाया और नम्बर मिलाया। बात हुई।

“मैं कपाड़िया बोल रहा हूं। बख्तावर साहब के लिए मैसेज दे रहा हूं कि वो फौरन मुझे फोन कर लें।”

“ठीक है।” इतना कहकर उधर से लाइन काट दी गई।

कपाड़िया ने रिसीवर रखा और सिगरेट सुलगा ली।

उसे बख्तावर सिंह के फोन का इन्तजार था।

जो कि आधे घंटे के बाद आया।

“हैलो।” फोन की बेल होते ही कपाड़िया ने रिसीवर उठाया।

“कपाड़िया।” बख्तावर सिंह की आवाज कानों में पड़ी।

“ओह सर, आप-मैंने ही आपके लिए मैसेज छोड़ा था। आपने ही कल फोन करके मुझे कहा था कि विशाल सिंह के बारे में कोई खबर मिले तो आपको बता दूं । अभी-अभी विशाल सिंह का फोन आया था।”

“पूरी बात बताओ।”

कपाड़िया ने सब कुछ बता दिया, जो विशाल सिंह ने उसे कहा था।

“गुड। अब विशाल सिंह रात को फोन करेगा?” बख्तावर सिंह का शांत स्वर कानों में पड़ा।

“जी हां।”

“रात को नहीं, कल दोपहर बाद उसे बताना कि जसबीर वालिया कहां है।”

“लेकिन मैं कैसे बताऊंगा...। मुझे तो मालूम ही नहीं कि जसबीर वालिया कौन...।”

“वो तुम्हें मैं बताऊंगा। जसबीर वालिया का पता मैं बता रहा हूं। नोट कर लो। लेकिन बताना कल दोपहर के बाद। अगर आज बता दिया तो मोना चौधरी को शक हो सकता है कि कोई गड़बड़ है।”

“मोना चौधरी?”

“उसी ने, विशाल सिंह को कैद किया है।”

“ओह! तो मोना चौधरी विमान हादसे से बच गई...।”

“हां। ये बातें बाहर न निकले। वरना...।”

“मैं...मैं समझ गया सर।” कपाड़िया जल्दी से बोला –“लेकिन विशाल सिंह जब वापस आकर पूछेगा कि मुझे जसबीर वालिया का कैसे पता चला तो मैं क्या कहूं...?”

“तुम्हें कुछ भी कहना नहीं पड़ेगा। क्योंकि वो जिन्दा वापस नहीं आएगा। मोना चौधरी उसे जिन्दा नहीं छोड़ेगी। उसकी मौत के बाद तुम आसानी से विशाल सिंह की जगह ले सकते हो। कोई परेशानी आए तो मुझे बोलना, ठीक कर दूंगा।”

कपाड़िया का चेहरा खिल उठा।

“थैंक्यू सर। थैंक्यू-थैंक्यू वैरी...।”

“जसबीर वालिया का पता नोट करो।” बख्तावर सिंह का सख्त स्वर उसके कानों में पड़ा।

“जी सर। सिर्फ एक बात और पूछूंगा। अगर आप जवाब दें तो।”

“क्या?”

“जसबीर वालिया कौन है?”

“मेरा आदमी।”

“फिर आप उसका पता मोना चौधरी को क्यों दे रहे हैं। मोना चौधरी के इरादे ठीक नहीं...।”

“मोना चौधरी देर-सबेर में जसबीर वालिया को ढूंढ ही लेगी। दूसरी बात है कि जसबीर वालिया, मोना चौधरी को खत्म करता चाहता है। जब तक वो मोना चौधरी को नहीं मारेगा। चैन से नहीं रह पाएगा। इसलिए मेरा फर्ज बनता है कि दोनों की मुलाकात करा दूं। ताकि जो भी होना है, होकर-मामला एक तरफ हो जाए।”

समझ गया सर। आप जसबीर वालिया का पता बताइये। मैं नोट कर रहा हूं।”

☐☐☐

पारसनाथ आ गया था।

रात के दस बज रहे थे।

पारसनाथ भी सारे हालातों से पूरी तरफ वाकिफ हो चुका था।

लेकिन वो भी सब्र के साथ काम ले रहा था कि जसबीर वालिया का पता चल जाए।

डिसूजा विशाल सिंह के पास ही कुर्सी पर जमा था।

“तुम कब से पारसनाथ के साथ काम कर रहे हो?” विशाल सिंह ने पूछा।

“क्यों?” डिसूजा ने उसे घूरा।

“यूं ही। तुम काम अच्छा करते हो। जरूरत पड़े तो मेरे पास आ जाना। मैं...”

“चुपकर।” डिसूजा ने खा जाने वाले स्वर में कहा –“वरना....।”

तभी दरवाजा खुला और पारसनाथ महाजन ने भीतर प्रवेश किया।

विशाल सिंह ने दोनों को देखा। चेहरे पर घबराहट आ गई थी।

“ये मुझे अपने यहां नौकरी देने की बात कह रहा है।” डिसूजा कड़वे स्वर में बोला।

पारसनाथ अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा। नजरें विशाल सिंह पर जा टिकी।

“मैं तो...।” पारसनाथ की आंखों के भाव देख कर विशाल सिंह ने जल्दी से कहा –“मजाक कर रहा...।”

“इसे फोन दे डिसूजा।” महाजन ने कड़वे स्वर में कहा।

डिसूजा ने उसके हाथ खोले और मोबाइल फोन उसे थमा दिया।

विशाल सिंह ने महाजन को देखा।

“क्या देखता है।” महाजन ने तीखे स्वर में कहा –“अपने हरामी को फोन कर। क्या नाम है उसका, कपाड़िया। मालूम कर उससे कि सोया पड़ा है। या जसबीर वालिया का पता लगा रहा है?”

विशाल सिंह ने फौरन फोन मिलाया।

“हैलो।” उधर से किसी और की आवाज आई।

“कपाड़िया को फोन दे।”

“ओह, मालिक आप...।”

“फालतू बात मत कर कपाड़िया को फोन दे।”

“कपाड़िया साहब तो है नहीं।”

“किधर है?”

“शाम से ही वो किसी काम के लिए गए हैं। फोन पर मुझे बिठा गए...।”

विशाल सिंह ने फोन बंद करके पारसनाथ और महाजन को देखा।

“वो है नहीं। उसके मोबाइल पर बात करूं।”

“जरूरत नहीं।” महाजन बोला –“मोबाइल पर बात की तो डिसूजा के मोबाइल का नम्बर उधर आ जाएगा। दो घंटे बाद उसे फोन करना।”

डिसूजा ने आगे बढ़ कर उसके हाथ से फोन लिया और उसके हाथों को बांधने लगा।

पारसनाथ और महाजन कमरे से बाहर निकलकर, उस कमरे में पहुंचे, जहां मोना चौधरी बैठी थी।

“कपाड़िया नहीं मिला।” महाजन बैठता हुआ बोला।

मोना चौधरी ने पारसनाथ से कहा।

“तुम पता करो कि जसबीर वालिया कौन हो सकता है?”

“उसी के बारे में पता करने गया हुआ था।” पारसनाथ ने सिर हिलाकर सपाट स्वर में कहा –“लेकिन कहीं से भी इस नाम के बारे में खबर नहीं मिली।”

“इसका मतलब ये दिल्ली का नहीं है।” मोना चौधरी के होंठों से निकला।

“मुझे भी ऐसा ही लग रहा है। दिल्ली का होता तो अब तक खबर मिल ही गई होती।”

“बेशक देर लग जाए, ढूंढ तो निकालेंगे इसे।” महाजन कठोर स्वर में कह उठा –“मेरे सिर में बहुत बुरी चोट मारकर गया था। अगर मुझे बस्ती वाले सहायता न देते तो वहीं पड़ा मैं मर जाता। सौ से ज्यादा बेगुनाह लोगों का खून उसके सिर पर है। वो अब बच नहीं सकता।”

“वो मुझे आतंक दिखाना चाहता था।” मोना चौधरी वहशी स्वर में कह उठी –“लेकिन मैं उसका आतंक देखने से पहले बच निकली। अब मेरी बारी है उसे आतंक दिखाने की।”

पारसनाथ अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा। होंठों में कसाव आ गया था।

कई पलों तक उनके बीच चुप्पी रही।

“पारसनाथ।” महाजन बोला –“खाना लगवा।”

पारसनाथ ने इन्टरकॉम पर नीचे रेस्टोरेंट में ऊपर खाना भेजने को कहा।

“बोतल भी दे दे।”

“जाकर ले आ। दूसरे कमरे में पड़ी है।” पारसनाथ ने बैठते हुए सिगरेट सुलगाई।

“घर आए मेहमान की इज्जत भी नहीं करनी आती।” महाजन ने मुंह बनाकर कहा और उठकर दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गया।

☐☐☐

अगले दिन दोपहर बाद ही विशाल सिंह की बात कपाड़िया से हो सकी।

“तू कहां मर गया था?” उसकी आवाज सुनते ही विशाल सिंह झुंझला कर बोला।

“आपका ही काम कर...।”

“तो मुझे फोन तो करता। मैं तेरे को फोन करते-करते थक गया...।”

“आपका नम्बर कहां मेरे पास जो आपको फोन करूं।”

“ओह!” विशाल सिंह एकदम ढीला पड़ गया।

“आप अभी तक कैद में ही हैं या...।”

“अभी तक का क्या मतलब...मैं कैद में हूं और तब तक यहां से नहीं निकल सकता। जब तक जसबीर वालिया के बारे में इन लोगों को न बता दूं कि...।”

“मैंने मालूम कर लिया है, जसबीर वालिया के बारे में।”

“क्या...पता चला गया, जसबीर वालिया के बारे में?” विशाल सिंह चौंका।

“हां। इन्दौर में रहता है वो।”

“इन्दौर में?” विशाल सिंह के होंठों से निकला।

मोना चौधरी और महाजन की नजरें मिली।

पारसनाथ कमरे के दरवाजे पर खड़ा विशाल सिंह को देखे जा रहा था।

“जी हां, वो...।”

“ये जसबीर वालिया वो ही है, या कोई दूसरा।”

“वो ही है सर।” कपाड़िया बात काट कर बोला –“इन्दौर में मौजूद हमारे आदमी ने, जो हुलिया बताया है, वो हुलिया वैसा ही है, जैसा आपने बताया था।”

“हूं, आगे बता।”

“ग्लौरी नाम का रेस्टोरेंट है जसबीर वालिया का। गैर कानूनी काम करता है। लेकिन बड़े कामों में हाथ डालता है, जिसमें दौलत ज्यादा हो। ड्रग्स और डायमंड के कामों में इसकी दिलचस्पी रहती है। क्योंकि मुट्ठी भर ड्रग्स या डायमंड नोटों से उसे भर देते हैं। वो सिर्फ दौलत का बोझ उठाना पसंद करता है। हौसलामंद इंसान है। किसी काम से डरता नहीं। उसका एक साथी भी है राजू। उसी के साथ ज्यादातर कामों को अंजाम देता है।”

“राजू?”

इस नाम पर मोना चौधरी और महाजन चौंके।

“हां। दोनों अक्सर कई दिनों के लिए इन्दौर से गायब हो जाते हैं। कहां जाते हैं मालूम नहीं। लेकिन जब वापस आते हैं तो सुना है, पास में माल होता है।”

मोना चौधरी के इशारे पर विशाल सिंह बोला।

“होल्ड कर। समझा, होल्ड कर, रिसीवर नहीं रखना।”

“ठीक है।”

विशाल सिंह ने फोन कान से हटाकर, मोना चौधरी को देखा।

“राजू की क्या बात है?” मोना चौधरी ने शब्दों को चबाकर पूछा।

“कपाड़िया ने इन्दौर में रहने वाले जसबीर वालिया नाम के व्यक्ति का पता लगाया है। वहां उसका ग्लौरी नाम का रेस्टोरेंट है। उसका हुलिया भी तुम्हारे बताये हुलिये से मिलता है। कपाड़िया का कहना है कि उसे खबर मिली है कि उस जसबीर वालिया के साथ राजू नाम का व्यक्ति रहता है। दोनों अक्सर इकट्ठे ही...।”

“यही जसबीर वालिया है, जिसकी हमें जरूरत है।” मोना चौधरी सर्द स्वर में कह उठी –“इसका इन्दौर का पूरा पता नोट करो। ऐसा पता कि हमें इस तक पहुंचने में कोई परेशानी न हो। इसके बारे में और जो भी मालूम कर सको। वो पता करके हमें बताओ।”

विशाल सिंह खुल कर मुस्कराया कि अब वो इस कैद से आजाद हो जाएगा।

“कपाड़िया –पता बोल, इन्दौर वाले जसबीर वालिया का।”

कपाड़िया ने पता बताया। विशाल सिंह साथ-साथ दोहराता रहा। डिसूजा ने पॉकेट डायरी निकाल कर जसबीर वालिया का इन्दौर का पता नोट कर लिया।

“हो गया?” विशाल सिंह बोला –“अब और बता इसके बारे में?”

“और क्या?”

“तूने इसके ग्लौरी रेस्टोरेंट का पता बताया है। घर का नहीं। घर कहां है। घर में कौन-कौन... ।”

“सर। इतनी गहराई में जाने में तो वक्त लगेगा। मैं इन्दौर फोन करके अपने आदमी से ये सब पता करने को...।”

“रुक। होल्ड कर।” विशाल सिंह ने कहा और फिर फोन नीचे करके बोला –“और कुछ नहीं पता। पता करवा सकता हूं।”

“कोई जरूरत नहीं।” महाजन के दांत भींचे हुए थे –“बाकी हम इन्दौर पहुंच कर पता कर लेंगे।”

विशाल सिंह ने सिर हिला कर फोन पर कपाड़िया से कहा।

“इतना ही बहुत है। रख तू रिसीवर।”

“आप कब आ रहे हैं सर?”

“अभी पहुंचा। इधर से चाय-पानी पीकर निकलता हूं। मेरा इन्तजार करना।”

“जी।”

विशाल सिंह ने फोन बंद करके डिसूजा को थमाया।

“लो हो गया काम।” वो खुश था।

डिसूजा ने फोन जेब में डाला। मोना चौधरी जो कि उसे ही देख रही थी। शांत स्वर में बोली।

“विशाल सिंह, तेरे कितने आदमी इन्दौर में हैं?”

“मेरे तो हर बड़े शहर में...।” कहते-कहते विशाल सिंह टिठका। दो पलों के लिए आंखें बंद कर ली।

“क्या हुआ?” मोना चौधरी का स्वर शांत था।

विशाल सिंह ने आंखें खोली और सोच भरे स्वर में बोला।

“इन्दौर में हमारा एक आदमी था, लेकिन वो हफ्ता पहले पुलिस की गोली से मारा गया। दूसरा आदमी तो इन्दौर भेजा नहीं अभी कि जो उसकी जगह ले। फिर कपाड़िया ने किससे इन्दौर की खबर पा ली।”

मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।

महाजन ने मोना चौधरी को देखा।

“मैं अभी कपाड़िया से पूछता...।”

“कोई जरूरत नहीं।” मोना चौधरी ने शांत स्वर में कहा –“इतना बता दो कि कपाड़िया, बख्तावर सिंह के बारे में जानता है।”

“हां।” विशाल सिंह ने उलझन भरी आंखों से उसे देखते हुए सिर हिलाया।

“वो चाहे तो बख्तावर सिंह से बात कर सकता है?”

विशाल सिंह ने हां में सिर हिला दिया।

मोना चौधरी के चेहरे पर जहरीली मुस्कान आ ठहरी।

“क्या हुआ?” विशाल सिंह के होंठों से निकला।

“तुम्हारे समझने की बात नहीं है कि क्या हुआ।” मोना चौधरी खुल कर मुस्करा पड़ी।

विशाल सिंह ने महाजन और पारसनाथ पर नजर मारी फिर कहा।

“मैंने तुम्हारा काम कर दिया है। मुझे जाने दो अब।”

“जरूर।” कहते हुए मोना चौधरी पलटी –“मैं अभी आई।”

वो बाहर निकल गई।

महाजन और पारसनाथ की नजरें मिली।

कोई कुछ न बोला।

आधे मिनट में ही मोना चौधरी वापस आई। उसके हाथ में रिवॉल्वर था। नाल पर साइलेंसर चढ़ा स्पष्ट नजर आ रहा था। विशाल सिंह की आंखें भय से फैल कर, चौड़ी हो गई।

“ये...ये क्या...।”

“विशाल सिंह। तूने मुझे और महाजन को मौत के मुंह में धकेल दिया था। वो तो हमारी किस्मत ठीक थी कि हम बच गए। वरना तूने तो कोई कसर नहीं।”

“लेकिन तुमने तो वादा किया था कि मुझे छोड़...।” विशाल सिंह ने तेज स्वर में कहना चाहा।

“तेरे जैसे कुत्तों के साथ मैं कभी भी खरा वादा नहीं करती।”

“प्लीज मोना चौधरी।” विशाल सिंह की आंखों में आंसू चमक उठे –“मुझे माफ कर...।”

मोना चौधरी ने रिवॉल्वर वाला हाथ सीधा किया।

“नहीं...ऽ...ऽ...ऽ।” विशाल सिंह गला फाड़ कर चीखा और दोनों हाथ आगे कर लिए –“मुझे मत मारना। मैं...।”

तभी हल्की सी पिट की आवाज हुई।

कमरे में बारूद की स्मैल फैल गई।

विशाल सिंह के आगे बढ़े दोनों हाथों में से, एक हाथ में गोली छेद करते हुए माथे में जा धंसी। विशाल सिंह के शरीर को झटका लगा। वो उसी तरह दोनों बांहें फैलाए, नीचे जा गिरा। मर गया था वो।

दांत भींचे मोना चौधरी ने रिवॉल्वर वाला हाथ नीचे किया।

“डिसूजा।” पारसनाथ सपाट-कठोर स्वर में बोला –“अंधेरा होते ही इसकी लाश ठिकाने लगा देना।”

डिसूजा ने फौरन सिर हिला दिया।

☐☐☐

मोना चौधरी ने पारसनाथ और महाजन पर निगाह मारते हुए गंभीर स्वर में कहा।

“यहां भी बख्तावर सिंह ने कपाड़िया के द्वारा हमसे चाल खेलने की कोशिश है। वो हमारी हरकतों पर या विशाल सिंह के गायब होने पर नजर रख रहा है। उसे मालूम था कि हम विशाल सिंह को कैद करके, उसे जसबीर वालिया की तलाश के लिए मजबूर करेंगे। इस बारे में विशाल सिंह अवश्य, कपाड़िया को फोन करेगा और बख्तावर सिंह ने कपाड़िया को पहले ही तैयार कर रखा था कि उसने क्या कहना है, कैसे कहना है?”

“हां।' पारसनाथ बोला –“इन्दौर में इस वक्त विशाल सिंह का कोई भी आदमी तैनात नहीं है। जो था वो हफ्ता पहले मारा गया। लेकिन कपाड़िया ने विशाल सिंह से कहा कि इन्दौर में मौजूद उसके आदमी ने उसे जसबीर वालिया के बारे में खबर दी। जबकि विशाल सिंह के मुताबिक इन्दौर में उसका कोई आदमी नहीं है।”

“स्पष्ट है कि कपाड़िया ने जो कहा, प्लान के साथ कहा। वो बख्तावर सिंह से सीखा-सिखाया था। बख्तावर सिंह के बताने पर ही उसे जसबीर वालिया का पता चला और बख्तावर सिंह की कही बातें ही उसने विशाल सिंह को बताई कि वो हम जान सकें। क्या खयाल है बेबी, जसबीर वालिया का पता ठीक बताया गया है?”

“हां। जसबीर वालिया का पता गलत नहीं बताया गया हमें।” मोना चौधरी के होंठ भिंचने के साथ चेहरे पर जहरीली मुस्कान थिरक उठी –“पता हमें ठीक बताया गया है। बख्तावर सिंह अब नया खेल शुरू करना चाहता है।”

“कैसा नया खेल?” पारसनाथ का हाथ खुरदरे चेहरे पर फिरने लगा।

“वो जानता है कि मैं जसबीर वालिया के पास इन्दौर जाऊंगी। मेरे वहां पहुंचने से पहले ही बख्तावर सिंह, जसबीर वालिया को सतर्क कर देगा कि मैं आ रही हूं, मेरी मौत का सामान तैयार रखे।” मोना चौधरी के होंठों से छोटी सी, मौत से भरी हंसी निकली –“बख्तावर सिंह, जसबीर वालिया के द्वारा एक बार फिर मेरी जान लेने की चेष्टा करेगा। तभी तो कपाड़िया द्वारा हमारे कान में डलवा दिया कि जसबीर वालिया कहां पर मौजूद है।”

महाजन के दांत भिंच गए।

बेहद कठोर हो गया पारसनाथ का चेहरा।

“सच में।” महाजन गुर्राया –“ये ही बात होगी।”

“हम इन्दौर चलेंगे।” पारसनाथ ने ठंडे स्वर में कहा।

“जरूर। इन्दौर जाएंगे। जसबीर वालिया से मिलेंगे। लेकिन योजना के साथ।'” मोना चौधरी कठोर स्वर में कह उठी –“क्योंकि हम ये सोच कर चल रहे हैं कि जसबीर वालिया को हमारे वहां पहुंचने की खबर है। वो इस बात की तैयारी पूरी तरह कर चुका है कि हम वहां पहुंचे और वो अपने बिछाये जाल में हमें फंसा कर, जान से खत्म कर दे।”

पारसनाथ और महाजन की निगाह मोना चौधरी पर थी।

“हमें ये बात हमेशा याद रखनी है कि उसके पीछे बख्तावर सिंह का दिमाग काम कर रहा है।” मोना चौधरी पुनः बोली।

महाजन ने घूंट भरा।

“कैसी योजना की बात कर रही हो?”

“जसबीर वालिया के एक ही ठिकाने के बारे में हमें मालूम हुआ है वो ग्लौरी रेस्टोरेंट। योजना की बात तो उसके सामने स्पष्ट होगी कि मैं जब भी उसकी तलाश में पहुंचूगी, ग्लौरी रेस्टोरेंट में ही पहुंचूंगी। उसने ग्लौरी रेस्टोरेंट में मेरे लिए पूरा जाल बिछा लिया होगा या बिछा लेगा। वो मुझे और महाजन को बखूबी जानता है। लेकिन पारसनाथ तुम्हें नहीं...।”

“ठीक कहती हो।” पारसनाथ के होंठ खुले –“वो मुझे नहीं जानता होगा। उसने मुझे नहीं देखा होगा।”

“लेकिन बख्तावर सिंह तुम्हारा हुलिया जसबीर वालिया को बता सकता है पारसनाथ।”

पारसनाथ अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरने लगा।

“ये हो सकता है।” महाजन ने सिर हिलाया।

पारसनाथ ने सिगरेट सुलगा ली।

“पारसनाथ, तुम इन्दौर के लिए अभी चल दोगे। वहां पहुंचकर, हुलिया बदल कर जसबीर वालिया के बिछाये जाल को पहचानने की चेष्टा करोगे। महाजन अलग से वहां पहुंचेगा और मैं अलग से। हम तीनों को वहां खास मौके के अलावा इकट्ठे नहीं होना है। हम वहीं एक-दूसरे को पहचान कर बताएंगे कि हम कहां-कहां ठहरे है। महाजन तुमने भी जसबीर वालिया के बारे में पूरी जानकारी पानी है और जरूरत पड़ने पर पारसनाथ की सहायता करनी है।”

पारसनाथ ने कुछ नहीं कहा। मोना चौधरी को देखता रहा।

“बेबी। मैं और पारसनाथ अगर इकट्ठे ही इन्दौर जाएं...।”

“जैसा तुम ठीक समझो महाजन। अगर तुम दोनों कोई योजना बना कर वहां जाना चाहो तो जुदा बात है।” कहने के साथ ही मोना चौधरी ने पारसनाथ को देखा –“इस बात का ध्यान रखना कि जसबीर वालिया ड्रग्स और डायमंड में दिलचस्पी रखता है।”

पारसनाथ ने सिर हिलाया।

“महाजन तुम ये जानने की चेष्टा करना कि जसबीर वालिया के आगे-पीछे कौन...।”

“सब मालूम कर लूंगा।”

“मैं इन्दौर में ही मिलूंगी। जसबीर वालिया को सामने देखकर तैश में मत आ जाना महाजन। सब्र के साथ काम लेना। ये मत भूलना कि उस जैसा इंसान अपने ठिकाने पर है और उसने हमारे लिए वहां जाल भी बिछा रखा है।”

कुछ खामोशी के बाद पारसनाथ बोला।

“बेहतर है कि हम ये बात थोड़ी सी स्पष्ट कर लें कि हमें वहां जाकर कैसा-किस तरह का काम करना है। ऐसा न हो कि हम वहां जो काम करें, वो एक-दूसरे के कामों में रुकावट डालने लगे।”

उसके बाद तीनों आधे घंटे तक आपस में बात करते रहे।

☐☐☐

उसी दिन की शाम, इन्दौर में।

ग्लौरी रेस्टोरेंट।

रेस्टोरेंट का पूरा चक्कर लेकर, जसबीर वालिया अपने केबिन में पहुंचा और कुर्सी पर बैठकर सिगरेट सुलगा ली। वो शांत और निश्चिंत था। अभी शाम के साढ़े छ: बजे थे। वो जानता था कि वक्त बीतने के साथ-साथ रेस्टोरेंट में भीड़ बढ़ती चली जाएगी। रात तीन बजे तक सारा रेस्टोरेंट व्यस्त रहेगा।

डायनिंग हॉल में लोग टेबल खाली होने के इन्तजार में खड़े रहते है। यहां का खाना इसलिए बहुत बढ़िया होता था कि इन्दौर के जाने-माने खानसामा उसके पास थे और डांसिंग फ्लोर वाले हॉल में भी पांव रखने की जगह नहीं होती रोजी के डांस की वजह से। उसके डांस में जबरदस्त गर्मी होती थी। पहला शो रात के साढ़े ग्यारह बजे होता था। दूसरा एक बजे और तीसरा दो बजे ।

दो बजे वाले शो के इन्तजार में लोग बैठे रहते थे। क्योंकि वो शो पहले हो चुके शोज से अलग होता था। रात का जलवा होता था तब रोजी के डांस में और शो का अन्तिम हिस्सा तेज रोशनी और बिना कपड़ों के होता था। तीनों शोज में डांसिंग हॉल भरा रहता था। जिन्हें बैठने के लिए जगह नहीं मिलती थी, वो दीवारों से सट कर खड़े-खड़े ही रोजी का डांस देखते थे। एक तरफ बने बार रूम के स्टूलों पर लोग बैठे रहते थे और ऐसे में बार रूम में व्हिस्की की तगड़ी बिक्री होती थी।

जसबीर वालिया ने चंद कश लेने के बाद रिसीवर उठाया और नम्बर मिलाने लगा।

“हैलो।” दूसरी तरफ से लाइन मिलने पर आवाज आई।

“सुन्दर प्रसाद।”

“ओह।” उसके कानों में आवाज पड़ी –“वालिया साहब।”

“बढ़िया क्वालिटी की स्मैक है या इन्तजार करूं?” जसबीर वालिया सीधे-सीधे बोला।

“आज ही माल आया है वालिया साहब। वाह कैसा शानदार माल है। देखकर ही नशा होने लगता है। स्पेशल आर्डर पर माल बनवाया है। अमेरिका से पार्टी आ रही है उसे लेने। मुंह मांगी कीमत दे रही है पार्टी। लेकिन पहले चेक करेगी। मैंने कहा चेक कर ले। माल बढ़िया है तो चेक कराने में अपना क्या जाता है। आप कहें तो आपको भेज दूं। लेकिन मेरी आदत वही है पुरानी। नोट पहले, माल बाद में। क्या करूं, लोगों ने ही आदत बिगाड़ी है। पहले माले ले जाते थे और पैसे के लिए पीछे-पीछे भागना पड़ता था। लेकिन अब पहले पेमेंट। फिर माल। खरा सौदा करना आदत बन गई है। कई बार लोग कह देते हैं कि विश्वास नहीं है क्या-

ऐसे बेवकूफों को क्या कहूं । विश्वास है तो तभी उनसे धंधा करता हूं। लेकिन अपने को भी तो नोट चाहिए। अपने को भी तो नोट इधर-उधर देने पड़ते...।”

“कितना माल पड़ा है। बढ़िया क्वालिटी वाला?”

“ढाई किलो। विदेश में ढाई किलो की कीमत ढाई करोड़...।”

“देश की कीमत बताओ।”

“आप आधी दे देना। सवा करोड़।”

“ज्यादा मुंह मत फाड़ो। पच्चीस लाख नकद दूंगा।”

“सिर्फ पच्चीस?”

“मैं जानता हूं कि ढाई किलो स्मैक तुमने ज्यादा से ज्यादा कितने की ली होगी।” जसबीर वालिया मुस्कराया –“मुझे इतनी खबर रहती है कि सुन्दर प्रसाद पीछे से कितने रुपये किलो लेता है।”

“वो तो ठीक है, लेकिन विदेशी बाजार में एक करोड़ पर एक किलो बिकती।”

“तो क्या स्मैक लेकर विदेश जाओगे बेचने।”

“विदेशी आ रहे हैं खरीदने। वो..।”

“बकवास मत कर। मेरे से झूठ मत बोला कर। विदेशी आ रहे हैं खरीदने तो जा, बेच उन्हें। मेरे सिर क्यों खपा रहा है। मैं सब जानता हूं। कोई नहीं आ रहा। ये सब कह कर तू स्मैक के भाव बढ़ाना चाहता है। पच्चीस लेना है तो फोन कर देना। नहीं तो मजे कर।”

“आपसे पचास ले लूंगा वालिया साहब।”

“पच्चीस।”

“चालीस से एक पैसा भी कम नहीं।”

“पैंतीस भिजवा रहा हूं। अपना आदमी भेजूं हाथ में पैंतीस देकर।”

“भेज दो।”

“उससे नोट ले लेना। स्मैक मत देना उसे। स्मैक कोई और लेने आएगा। फोन पर उसके बारे में बता दूंगा।”

“ठीक है।”

जसबीर वालिया ने फोन बंद किया। दूसरी जगह नम्बर मिलाया ।

“हां।” दूसरी तरफ से रिसीवर उठाया गया।

“अनूप लाल से बात करा।”

“कौन?”

“साले, मेरी आवाज नहीं पहचान रहा।”

कुछ पलों की चुप्पी के बाद आवाज आई।

“पहचान ली आवाज। बुलाता हूं।”

दो मिनट बाद लाइन पर नई आवाज उभरी।

“कहो वालिया.. कैसे हो?”

“बढ़िया।”

“कहां रहे बारह दिन। फोन किया कई बार। तुम तो मुझे बढ़िया क्वालिटी की स्मैक देने वाले थे। आगे बात कर रखी है मैंने । वो लोग मेरी जान खा रहे है। और तुम बिना बताये चले गए।”

“तुम्हारा मैसेज मिल गया है। डायमंड बिजनेस के सिलसिले में बाहर जाना पड़ गया। अब ढाई किलो स्मैक है।'”

“बढ़िया क्वालिटी का?”

“एकदम बढ़िया। स्पेशल आर्डर पर तैयार करवाई है। बाहर की पार्टी को देनी थी। वो वक्त पर नहीं पहुंची। तू बोल...!”

“भाव क्या लेगा?”

“वही जो पहले था।”

“चालीस लाख पर एक किलो?”

“हां। ढाई का एक करोड़ हुआ।”

“भाव कम नहीं होगा?”

“ये बढ़िया क्वालिटी की है। दूसरी क्वालिटी पर भाव कम ले ले।”

“ये ही ठीक है।”

“कीमत भिजवा। माल तो ले।”

“पचास लाख भिजवा देता हूं। पचास लाख अगले हफ्ते...।”

“ठीक है। आज ही पचास लाख भिजवा दे और जो पैसा लेकर आएगा। वो स्मैक भी ले जाएगा।” कहने के साथ ही जसबीर वालिया ने रिसीवर रखा। कश लिया और सिगरेट ऐश-ट्रे में डाल कर उठा और पीछे बने गुप्त दरवाजे को खोल कर एक छोटे से कमरे में प्रवेश कर गया। वहां आराम करने को बेड था। एक छोटी सी टेबल और कुर्सियों के अलावा टी.वी. फ्रिज थे। कीमती कारपेट बिछा हुआ था। वहां रखे सूटकेस में से उसने हजार-हजार के नोटों की पैंतीस गड्डियां निकालकर एक लिफाफे में भरी। फिर दूसरे लिफाफे में दस गड्डियां डाली और बाहर आ गया।

दरवाजा बंद किया और कुर्सी पर बैठते हुए भास्कर को बुलाने के लिए बेल बजा दी।

दस मिनट बाद भास्कर आया।

“सॉरी वालिया साहब, मैं रेस्टोरेंट में व्यस्त था। आने में वक्त लगा।”

“ये लिफाफा।” जसबीर वालिया ने टेबल पर रखे लिफाफे की तरफ इशारा किया –“पैंतीस लाख है इसमें किसी के हाथ सुन्दर प्रसाद तक पहुंचा दो। कहना स्मैक तैयार रखे, आज रात ही कोई लेने आएगा। बंद मुंह के साथ माल उसे दे दे। उससे कोई बात नहीं करनी है। कुछ पूछे तो जवाब नहीं देना है।”

भास्कर ने सिर हिलाया।

“और ये लिफाफा-दस लाख हैं। राजू के घर, उसकी बीवी को खुद तुम देकर आओ। उसे कहना कि वो राजू के आने का इन्तजार न करे। घर-परिवार संभाले। बच्चों को पढ़ाए इसी तरह पैसा उसे मिलता रहेगा। बहुत पूछे तो कह देना, काम के दौरान राजू की जान चली गई। ये भी उसे समझा देना कि अगर ये बात बाहर गई तो उसे पैसा नहीं दिया जाएगा। खामोशी से जिन्दगी बिताये।”

“समझ गया।” भास्कर गंभीर नजर आने लगा। वो धीमे स्वर में बोला –“राजू साहब नहीं रहे?”

“नहीं।” जसबीर वालिया ने गहरी सांस ली –“किस्मत खराब थी। अपनी जान नहीं बचा सका।”

भास्कर खड़ा उसे देखता रहा।

“जाओ।”

भास्कर दोनों लिफाफे लेकर बाहर निकल गया।

कुर्सी पर बैठे-बैठे आंखें बंद करके, जसबीर वालिया ने कुर्सी की पुश्त से सिर टिका दिया।

☐☐☐

पांच मिनट बाद ही फोन की बेल हुई।

जसबीर वालिया ने आंखें खोली। सीधा हुआ। रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“आराम कर रहे हो?”

जसबीर वालिया की आंखें सिकुड़ी। दूसरी तरफ बख्तावर सिंह था।

“हम जैसों की जिन्दगी में आराम नहीं होता बख्तावर सिंह। हम लोग दौड़ते हुए पैदा होते हैं और दौड़ते-दौड़ते ही मर जाते हैं।”

“एक खबर है। यूं तो ऐसी खबरें मेरे पास रहती हैं। जिन्हें मैं सुनकर भूल जाता हूं। लेकिन ये खबर तुमसे वास्ता रखती है और तुम मेरे बेहद खास आदमी हो।” बख्तावर सिंह का शांत स्वर उसके कानों में पड़ा।

“कहो।”

“मोना चौधरी को तुम्हारे इन्दौर में होने की खबर मिल गई है। वो इन्दौर रवाना हो चुकी होगी या होने वाली होगी। यानी कि कल का दिन तुम्हारे लिए मुसीबत भरा हो सकता है। ये भी हो सकता है कि कल के बाद तुम जिन्दा न रहो।”

जसबीर वालिया के दांत भिंच गए।

“मैं जिन्दा रहूंगा। मोना चौधरी के मरने की खबर ही तुम सुनोगे।”

“तुम्हारी बात सुनकर मुझे अच्छा लगा। लेकिन मोना चौधरी की जान शायद तुम न ले सको।”

“बख्तावर सिंह।” जसबीर वालिया का चेहरा खतरनाक भावों से भर उठा –“एक बार सुन लो, हजार बार सुन लो। मोना चौधरी मरेगी। इन्दौर से वो जिन्दा वापस नहीं जाएगी।”

“मोना चौधरी से मेरा सीधे-सीधे कई बार टकराव हो चुका है। इसमें कोई शक नहीं कि ज्यादा बार उसने मुझे मात ही दी। पाकिस्तान की धरती पर मैं उससे हारा। हिंदुस्तान की जमीन पर मैं उससे हारा। तभी तो प्लेन में बम बलास्ट से उसे पक्की मौत दे देना चाहता था। लेकिन वो वहां से शातिराना अंदाज में बच निकली।”

“हर बार। किस्मत उसी का साथ नहीं देगी।”

“मेरा भी यही ख्याल है कि हर बार किस्मत उसी का साथ नहीं देगी।” बख्तावर सिंह की सख्त आवाज उसके कानों में पड़ी –“लेकिन मोना चौधरी को घेरने के लिए। उसे मारने के लिए खास तैयारी करनी होगी। तब शायद वो...।”

“तैयारी तो मैं ऐसी करूंगा कि मोना चौधरी ने सोचा भी नहीं होगा कि उसके साथ ऐसा भी हो सकता है।”

“मुझे तुम पर पूरा भरोसा है और मोना चौधरी पर भी पूरा भरोसा है कि वो अपनी गर्दन किसी को आसानी से नहीं पकड़ने देगी लेकिन इस बात का फायदा तुम उठा सकते हो कि तुम्हें उसके यहां पहुंचने की खबर है और ये बात वो नहीं जानती।”

“वो नहीं बचेगी। मरेगी। कल तक आएगी यहां?”

“हां। आज ही उसे मालूम हुआ है। हो सकता है वो रास्ते में हो। आधी रात के बाद मोना चौधरी इन्दौर आ पहुंचे। मैं नहीं जानता कि वो अकेली आएगी या साथ में महाजन होगा। उसका एक साथी और भी है जिसके बारे में तुम नहीं जानते। पारसनाथ नाम है उसका। हुलिया सुन लो। शायद तुम्हारे काम आ जाए।” बख्तावर सिंह ने पारसनाथ का हुलिया बताया।

“मैं सब संभाल लूंगा।” जसबीर वालिया वहशी स्वर में कह उठा।

“गुड! तुम पर विश्वास है मुझे। याद है मैंने तुम्हें कहा था कि अगर तुमने मोना चौधरी को खत्म कर दिया तो मैं खुद सूटकेस लेकर तुम्हारे पास आऊंगा।” बख्तावर सिंह के लहजे में हौसला बढ़ाने वाला अंदाज था।

“ऐसी बातें मैं कभी नहीं भूलता बख्तावर सिंह।”

दूसरी तरफ से बख्तावर सिंह ने लाइन काट दी।

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अगले दिन शाम के आठ बजे पारसनाथ ने ग्लौरी रेस्टोरेंट में प्रवेश किया रेस्टोरेंट की रोशनियां अपनी पूरी चमक पर थी। प्रवेश द्वार के बाद रेस्टोरेंट का कॉमन हॉल था। जहां चाय-कॉफी स्नैक्स आदि सर्व किए जाते थे। करीब तीस टेबल शानदार तरीके से उधर लगाई गई थी। स्मार्ट वेटर वहां घूम रहे थे। चालीस-पैंतालीस लोग वहां बैठे थे।

पारसनाथ एक टेबल के करीब पड़ी कुर्सी पर जा बैठा।

इस वक्त पारसनाथ का हुलिया पूरी तरह बदला हुआ था। होंठों पर मूंछे और चेहरे पर हल्की दाढ़ी थी। काले रंग की पैंट और मैले हो रहे शूज पहन रखे थे। सिर के बाल बेतरतीबी से बिखरे हुए थे। सफेद रंग की कमीज डाली हुई थी। जो कि कुछ मैली हो रही थी। आंखों पर नजर का चश्मा था। इस हुलिये में उसका कोई करीबी भी उसे नहीं पहचान सकता था। पारसनाथ ने आंखों से चश्मा उतारकर साफ किया और उसे पुनः पहन लिया।

पारसनाथ थका-थका सा नजर आ रहा था।

तभी बीस वर्षीय युवक पास पहुंचा और पानी के गिलास के साथ मीनू रखा।

“आर्डर सर?”

पारसनाथ ने मीनू पीछे सरकाते हुए कहा।

“कॉफी के साथ कुछ खाने को ला दो। भूख बहुत लगी है। अभी थोड़ा सा खाऊंगा। घंटे भर बाद डिनर लूंगा।”

“ठीक है सर। सैंडविच ले आऊं?”

“हां। दो ले आना।”

वेटर चला गया।

पारसनाथ कुर्सी पर थकान भरे ढंग से पसर गया। उसकी नजरें यूं ही इधर-उधर जा रही थी। सब कुछ उसे सामान्य लगा। ऐसा कुछ न लगा कि वहां पर नजर रखने का कोई खास इन्तजाम हो। हर कोई अपने काम में व्यस्त नजर आ रहा था। रेस्टोरेंट में बैठे लोगों के ठहाके कभी-कभार वहां गूंज उठते थे।

चौथे मिनट ही वेटर कॉफी और सैंडविच ले आया।

“लीजिए सर।” वो टेबल पर सामान रखता हुआ बोला –“आप यहां पहली बार आए लगते हैं। पहले आपको नहीं देखा।”

“हां।” पारसनाथ सिर हिलाकर सीधा बैठते हुए बोला –“मिलना है किसी से। उसने यहां का वक्त दे दिया। क्या बजा है?”

“सवा आठ बज रहे हैं।” वेटर ने बताया।

“आठ बजे उसे आ जाना चाहिए था।” पारसनाथ बड़बड़ाया फिर सैंडविच उठाकर इस तरह खाने लगा, जैसे बहुत भूख लगी हो। आस-पास का उसे जरा भी होश न हो।

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प्रवेश द्वार के पास ही छोटा सा केबिन था। रेस्टोरेंट में वीडियो कैमरे लगा रखे थे। जिसका कंट्रोल इसी केबिन से होता था। केबिन के बाहर दरवाजे पर मोटा-मोटा प्राइवेट लिखा था।

केबिन के भीतर छोटे से काउंटर पर दो टी.वी. सेट पड़े थे। जिनमें रेस्टोरेंट का डिनर हॉल और डांसिंग हॉल का दृश्य बार-बार स्पष्ट नजर आ रहा था। स्क्रीनों के सामने दो व्यक्ति कुर्सियों पर बैठे थे। जहां का दृश्य उन्हें दोबारा देखना होता, पास ही मौजूद बोर्ड पर लगे बटनों को दबा कर उस दृश्य को पुनः देख लेते।

वो दोनों खासतौर से रेस्टोरेंट में आने वाले नए लोगों पर नजर रख रहे थे।

भास्कर की तरफ से उन्हें सख्त आदेश था कि रेस्टोरेंट में जो नया चेहरा आए, कैमरा उस पर फोकस कर दो और उसकी हरकतों पर पूरी तरह नजर रखो। जरा भी लगे कि वो कोई पूछताछ कर रहा है। रेस्टोरेंट के भीतरी कामों में दिलचस्पी ले रहा है तो फौरन उसे खबर की जाए। रेस्टोरेंट के हर वेटर के कानों में भी ऐसे आदेश पहुंच चुके थे।

आज जसबीर वालिया के केबिन में वालिया नहीं था। भास्कर बैठा था। एक कैमरे का कंट्रोल वहां भी था। वो रेस्टोरेंट के कॉमन हॉल के दृश्यों को स्क्रीन पर देख रहा था। और जसबीर वालिया भी रेस्टोरेंट में था। ये बात किसी को मालूम नहीं थी सिवाय रोजी डांसर के। क्योंकि वो रोजी के मेकअप रूम में था। वहां किसी बाहरी व्यक्ति का आना नहीं होता था। इसलिए जसबीर वालिया की उधर मौजूदगी का किसी को कुछ पता नहीं था। रोजी साढ़े दस से पहले रेस्टोरेंट में नहीं आती थी। एक कैमरे का कंट्रोल ड्रेसिंग रूम में भी दे दिया था और वहां बैठा जसबीर वालिया टी.वी. स्क्रीन पर भीतर प्रवेश करने वालों पर नजर रखे था।

जब से पारसनाथ ने भीतर प्रवेश किया था, तब से केबिन वाले दोनों व्यक्तियों ने उसे पूरी तरह स्क्रीन पर तो ले लिया था और उसकी हरकतों पर नजर रखने लगे थे। क्योंकि ये चेहरा पहली बार आज रेस्टोरेंट में नजर आया था। आज से पहले उसे यहां नहीं देखा था।

केबिन में बैठे भास्कर की निगाह भी स्क्रीन पर नजर आ रहे पारसनाथ पर थी।

ड्रेसिंग रूम में मौजूद जसबीर वालिया भी स्क्रीन पर नजर आ रहे, पारसनाथ को होंठ सिकोड़े देख रहा था।

जसवीर वालिया ने इन्टरकॉम पर भास्कर से बात की।

“भास्कर-कॉमन हॉल में सफेद कमीज वाला...।”

“उसी को देख रहा हूं वालिया साहब। वो आज से पहले कभी नजर नहीं आया।” भास्कर की आवाज कानों में पड़ी।

“वेटर ने उससे बात की है। पता करो क्या बात हुई?”

“जी। मैं जाता हूं। उसके बाद कंट्रोल रूम वाले केबिन में जाऊंगा-वहां...।”

“आदमी सब वैसे ही तैयार हैं ना, जैसे मैंने कहा था?”

“जी।”

जसबीर वालिया ने रिसीवर रख दिया।

भास्कर केबिन से निकला और अपने रूटीन के हिसाब से मुस्कराता हुआ कॉमन हॉल में जा पहुंचा। पारसनाथ पर भी नजर मारी। पारसनाथ का पूरा ध्यान कॉफी पीने में था। एक-दो लोगों ने भास्कर को हैलो कही, जिसका जवाब भास्कर ने मुस्करा कर दिया।

वहां के किचन में पहुंचकर भास्कर ने उस वेटर को पकड़ा।

“तुमने सफेद कमीज वाले को कॉफी और स्लाइज सैंडविच सर्व किया है।” भास्कर बोला।

“यस सर।” उस युवक ने सिर हिलाया।

“उससे क्या बात हुई?”

युवक वेटर ने बताया।

“ओ.के.।” भास्कर ने सिर हिलाया –“उस पर नजर रखो। कोई नई बात हो तो मुझे फौरन बताना।”

“यस सर।”

“उसने कहा है कि किसी ने उसे मिलने का, यहां का वक्त दिया है आठ बजे का?”

“जी।”

“नजर रखना उस पर।” कहने के साथ ही भास्कर किचन से निकला और जेबों में हाथ डाले लापरवाही से आगे बढ़ गया। इस बीच उसने छिपी निगाह पारसनाथ पर मारी। पारसनाथ को उसने अपने में ही व्यस्त पाया। कॉफी पी चुका था और सस्ती सी कोई सिगरेट सुलगा रहा था।

भास्कर कंट्रोल रूम वाले केबिन में पहुंचा।

वहां दोनों व्यक्ति स्क्रीन पर पारसनाथ को देख रहे थे।

“बेवकूफों की तरह दोनों एक ही काम मत करो।” भास्कर ने स्क्रीन पर निगाह टिकाए एक के कंधे को थपथपाया –“तुम अपने कैमरे का फोकस प्रवेश द्वार पर करो। वहां से कोई और नया आदमी भी आ सकता है।”

दृसरे की स्क्रीन से पारसनाथ हट गया और वहां प्रवेश द्वार का नजारा स्पष्ट दिखाई देने लगा।

“भास्कर साहब।” वो व्यक्ति बोला, जिसके सामने टी.वी. स्क्रीन पर पारसनाथ नजर आ रहा था –“इस आदमी को मैंने पहली बार अपने रेस्टोरेंट में देखा है। मुझे तो स्थानीय व्यक्ति भी नहीं लगता।”

“स्थानीय क्यों नहीं लगता। इन्दौर का, कहीं का भी रहने वाला हो सकता है।” भास्कर बोला।

“हो सकता है इन्दौर का ही रहने वाला हो। लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये इन्दौर का स्थानीय व्यक्ति है। इसके बाल उलझे हुए हैं कि रेस्टोरेंट में आने वाला बाल ठीक करके आता है। कमीज भी मैली सी लग रही है। ये यहां पर जबरदस्ती वाले अंदाज में आया व्यक्ति लग रहा है।”

भास्कर स्क्रीन पर नजर आ रहे पारसनाथ को देखता रहा। फिर बोला।

“कोई नई बात?”

“नहीं। वेटर से इसने तीन-चार लाइनों में बात की। उसके बाद ये अपने में ही मस्त है। इधर-उधर देखने की चेष्टा नहीं की। प्रवेश द्वार की तरफ अवश्य नजर मार लेता है, जैसे वहां से किसी ने आना हो।”

“कोई शक वाली बात?”

“नहीं।”

भास्कर ने इन्टरकॉम से, जसबीर वालिया से बात की।

“वालिया साहब। वेटर ने बताया कि वो किसी का इन्तजार कर रहा है। अभी तक उसमें कोई शक भरी बात देखने को नहीं मिली।”

“उस पर बराबर नजर रखो।”

“जी।”

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