हसीनाबाद, सन 1975।

जमुना ने बग्घी रोक दी। डाकखाना रेलवे स्टेशन के पास था, जहाँ पहुँचने में अभी वक्त था। बस्ती पीछे छूट चुकी थी और फिलहाल उस जगह पर वीरानी के सिवाय और कुछ नहीं था। वातावरण में खामोशी थी। कुहरा इतना घना था कि सामने बह रही नदी, जो महज़ कुछ गज के फासले पर थी, स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही थी। उस पर बने छोटे से पुल की भी महज़ आकृति दिखाई दे रही थी। नदी के उस पार जंगल का सिलसिला कई किमी तक फैला हुआ था, जिसे पार किये बिना, पहाड़ों और जंगल के दामन में बसे उस छोटे मगर ख़ूबसूरत कस्बे से बाहर नहीं निकला जा सकता था।

जमुना ने अपनी छाती टटोली। स्वेटर के नीचे शर्ट की जेब में पशुपति का खत सुरक्षित था। उसने अधरों पर जुबान फेरी और व्यग्र भाव से इधर-उधर देखा। सब कुछ घने कुहरे में जर्फ़ था। हथेलियों को रगड़कर बदन में गर्मी का संचार करने के बाद उसने ख़त बाहर निकाल लिया।

‘ध्यान रहे, किसी भी सूरत में ये खुलना नहीं चाहिए। पोस्ट होने तक अपनी जान से भी बढ़कर इसकी हिफ़ाजत कीजिएगा।’

ख़त को हाथ में लेकर मन ही मन पशुपति की चेतावनी याद करते हुए वह कुछ विचार करने लगा। थोड़ी देर के मनन के बाद उसने पतलून की जेब टटोली, जिसमें मौजूद चीजों की बदौलत वह ख़त को दोबारा बंद कर सकता था।

‘अगर कुछ नगद नहीं भी मिलेगा तो भी ये तो पता चलेगा कि कस्बे में आया वह रहस्यमयी अजनबी भेज क्या रहा है, जिसे किसी की निगाह में नहीं आने देना चाहता है। इतनी सर्दी में यहाँ मुझ पर नजर रखने वाला है ही कौन। ख़त को दोबारा सील करने का सामान भी साथ है।’

उपर्युक्त निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उसने एक बार फिर एहतियात के तौर पर आस-पास देखा तत्पश्चात लिफ़ाफ़े का मुँह इस सावधानी के साथ खोलने लगा कि बाद में उसे जस का तस बनाया जा सके।

“मना किया था न तुझे हरामखोर?”

पशुपति का ठण्डा स्वर कानों में जाते ही पहले जमुना भय से जड़ हुआ फिर धीरे-धीरे सामने की ओर दृष्टि उठायी। कुछ ही कदमों के फासले पर वह खड़ा था। उसका वहाँ होना जमुना को उतना हौलनाक नहीं लगा, जितना हौलनाक उसके चेहरे के भाव लगे। वह उसे यूँ घूर रहा था, जैसे कोई भूखा वहशी जानवर अपने शिकार को घूर रहा हो। उसके नथुने फड़क रहे थे, आँखें आग उगल रही थीं और कानों के पास जबड़ों का उभार साफ़ दिख रहा था। वह अब तक जमुना के साथ सम्मानजनक संबोधन के साथ पेश आया था इसलिए जमुना ने सोचा नहीं था कि सभ्य नजर आने वाला वह इंसान अपशब्दों का प्रयोग करना भी जानता है। कुल मिलाकर उस पर मनोवैज्ञानिक असर ये हुआ कि उसे सामने खड़ा पशुपति वह पशुपति नहीं लगा, जिसे वह पिछले कुछ दिनों से जानता था बल्कि वह पशुपति लगा, जो अपने नाम के अनुरूप पशुवत व्यवहार अपना चुका था। शायद उसके अंदर से एक दूसरा पशुपति निकला था।

जमुना ने खौफजदा होकर ख़त पर नजर डाली। हालाँकि उसने ख़त को खोलने के ध्येय से हाथ भर लगाया था, उसे अब तक खोला नहीं था मगर इस पल उसका लिफ़ाफ़ा खुला हुआ था।

“म..मैंने..मैंने...इसे नहीं खोला है साहब।” वह गिड़गिड़ा उठा।

पशुपति पर कोई असर नहीं हुआ। उसे आगे बढ़ता देख जमुना ने बग्घी को भगाने की कोशिश की लेकिन घोड़े हिनहिनाकर रह गए, आगे नहीं बढ़े।

“पैसे चाहिए थे तो पहले क्यों नहीं बोला?” पशुपति ने उसकी गर्दन को पंजे में जकड़ा और बग्घी से उठाकर हवा में लटका दिया।

जमुना के हलक से घुटी-घुटी सी आवाज़ आने लगी। हाथों से पशुपति का पंजा छुडाने की कोशिश करते हुए, पाँव झटकते हुए वह यूँ छटपटाने लगा, जैसे फांसी के फंदे पर लटका आदमी अंतिम क्षणों में छटपटाता है। ज्यों-ज्यों उसकी छटपटाहट बढ़ती गयी, त्यों-त्यों पशुपति की आँखों में खून उतरता गया। जल्द ही वह नरपिशाच सदृश दिखाई देने लगा। ठीक उसी पल, जब जमुना की साँसें थमने वाली थीं, उसने उसे दूर उछाल दिया।

पशुपति के फौलादी पकड़ से आज़ाद होते ही जमुना गला पकड़कर खाँसने लगा। उसके बदन का सारा खून चेहरे पर सिमट आया था। भय व आतंक के चलते वह कोशिश करके भी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाया। जब दहशत से भरे कई क्षण गुजर गए तो सबसे पहले उसकी नजर खून से सनी अपनी हथेलियों पर गयी फिर अगले ही क्षण उसने पाया कि उसका स्वेटर भी तेजी से लाल होता जा रहा था। इसके बाद उसके जेहन में एकमात्र ख्याल यही आया कि उसका गला लहुलुहान हो चुका था। उसने अपनी रक्तरंजित हथेलियों को एक नजर देखा और फिर आतंकित होकर पशुपति के उस पंजे पर दृष्टिपात किया, जिसके शिकंजे में कुछ देर पहले उसका गला था।

पशुपति के नाखून अब इंसानों के नाखून नहीं थे। वे किसी दरिंदे के नाखूनों में तब्दील होकर बड़े और नुकीले हो गए थे, जिनसे ताजा गरम खून टपक रहा था। जमुना के लिए ये हैरत का चरम था। उसने बौखलाकर पशुपति के चेहरे की ओर देखा, जहाँ वीभत्स और डरावनी मुस्कान थी।

“क...कौन...हो तुम...? तुम...इंसान नहीं हो सकते।” जमुना कुहनी के बल पीछे सरकता हुआ घिघियाया।

“तूने उस रात पूछा था न कि नरभेड़िये होते हैं या नहीं?” पशुपति धीमी चाल से उसकी ओर बढ़ा।

जमुना के पीछे सरकने की गति तेज हो गयी। साथ ही वह हथियार के रूप में इस्तेमाल किये जाने लायक वस्तु यथा डंडा, पत्थर इत्यादि की खोज में इधर-उधर भी देखता जा रहा था। सहसा पशुपति ने एक लम्बी छलांग भरी और अपने व जमुना के बीच का फासला पल भर में ही तय कर लिया।

“हाँ...।” उसने जमुना का बाल मुट्ठी में जकड़कर उसका चेहरा अपने चेहरे के नजदीक लाया और उसकी आँखों में आँखें डालकर गुर्राया- “होते हैं; नरभेड़िये होते हैं। ये कोई मिथकीय पशु नहीं हैं। ये महज़ किस्से-कहानियों और अंधविश्वासियों की कल्पना में नहीं बसते हैं। ये हकीकत में होते हैं। पूरे चाँद की रात को असली रूप में आते हैं, इंसानों का शिकार करते हैं और चाँदी के खंजर से डरते हैं।”

“क..क्या..क्या तुम भी उन्हीं में से हो?”

“ठहर, बताता हूँ।”

पशुपति उठा और जमुना को बालों से पकड़कर घसीटते हुए नदी के तट की ओर ले जाने लगा। किनारे पर पहुँचकर उसने उसे औंधे मुँह पटक दिया ताकि वह पानी में अपनी मौत का प्रतिबिम्ब देख सके। यकीनन वह मौत का ही प्रतिबिम्ब था क्योंकि पानी में जो पशुपति नजर आ रहा था, वह इंसान नहीं था। उसके धड़ पर भेड़िये का सिर था। जमुना उस आधे मानव और आधे पशु को दो पल से ज्यादा नहीं देख सका और पलटकर सीधा हो गया।

“देखा?” पशुपति पागलों की तरह हँसा- “ये हूँ मैं।”

“हमारी बस्ती में क्यों आये हो?”

पशुपति की अट्टहास गायब हो गयी। उसका चेहरा पत्थर की मानिंद सख्त हो गया।

“महल की तलाश में आया हूँ।” उसने सर्द लहजे में कहा- “लेकिन लोगों को ये बताने के लिए अब क्या तू जिंदा रहेगा?”

अपने जीवन के आख़िरी दृश्य के तौर पर जमुना बस इतना ही देखा पाया कि नुकीले नाखूनों वाला पशुपति का पंजा तेजी से उसके सीने की ओर बढ़ा था इसके बाद उसने पलकें भींच लीं।

“आ.......ह!” उसकी गगनभेदी चीख से वह जनशून्य इलाका दहल उठा। बग्घी में जुते हुए घोड़े उछलते-कूदते हुए जोर-जोर से हिनहिनाने लगे।

जमुना का पूरा शरीर पसीने से तर था, साँसें तेज थीं और वह हाथ बुरी तरह काँप रहा था, जिसमें उसने लिफ़ाफ़ा थामा हुआ था। सबसे पहले उसने अपनी साँसों को संयत किया फिर चेहरे के पसीने को आस्तीन से पोंछकर इधर-उधर देखने लगा। पशुपति कहीं नहीं था। सब-कुछ पहले जैसा था। हाँ, खुली आँखों से अपनी मौत का सपना देखने के बाद उसे जरूर अब इस इलाके में डर लगने लगा था।

“य...ये अभी-अभी कैसा ख्वाब देखा मैंने, वो भी जागती आँखों से?”

जमुना ने खौफ़जदा निगाहों से लिफ़ाफ़े को देखा, जिसे खोलने के लोभ का संवरण नहीं कर पाया था मगर अब कर चुका था। उसने लिफ़ाफ़े को फिर से जेब के हवाले किया और घोड़ों को नदी के पुल की ओर हांक दिया।

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राजनगर, वर्तमान।

उस वक्त रात के दो बजे थे, जब लियाकत के कमरे का दरवाजा जोर-जोर से पीटा गया। उनकी नींद खुली।

“कौन है?” बौखलाकर उन्होंने पूछा।

“म..मैं....मैं हूँ,....।” बाहर से फाह्याज़ की खौफ़जदा आवाज़ आयी।

“फाह्याज़...? इस वक्त?” माथे पर शिकन की बेशुमार लकीरें लिए हुए लियाकत ने पहले कमरे में रोशनी की फिर दरवाजा खोला।

सामने खड़ा बुरी तरह भयभीत फाह्याज़ किसी बच्चे की तरह काँप रहा था। उसके पाँव इस कदर डगमगा रहे थे कि खड़े रहने के लिए उसे दीवार का सहारा लेना पड़ रहा था। पिता को देख उसने दीवार का सहारा छोड़कर अपना पूरा बोझ उनके कंधों पर डाल दिया।

“क्या हुआ...? तुम...तुम इतने डरे हुए क्यों हों?” लियाकत ने उसका भारी-भरकम शरीर संभालने की नाकाम कोशिश करते हुए पूछा।

“मु...मुझे....मुझे शबनम नजर आयी अब्बू।” फाह्याज़ ने लड़खड़ाती जुबान में कहा और किसी ढहती हुई दीवार की तरह फर्श पर बैठ गया।

“य...ये....क्या अनाप-शनाप बक रहे हो तुम?” लियाकत ने एक नजर बिस्तर पर सो रहे हसन पर डाली फिर फाह्याज़ से मुखातिब होकर आगे कहा- “हसन डर जाएगा।”

“मैंने...मैंने...सचमुच उसे देखा।” फाह्याज़ ने लियाकत की दोनों हथेलियों को

थामकर उन्हें यकीन दिलाने की भरसक कोशिश करते हुए, अपने लहजे पर जोर देते हुए कहा- “व...वो...बिना कपड़ों की थी और एक बड़े से कटोरे में भरे खून से किसी को नहला रही थी, जो आधा जानवर था।”

“चुप हो जाओ...।” लियाकत ने अपनी हथेली फाह्याज़ के मुँह पर रख दी- “दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा। ऐसे ही वाहियात सपने तुम्हें तब भी आते थे, जब हॉस्पिटल में शबनम की मौत हुई थी।”

“मैंने कहा न कि मैंने उसे देखा।” फाह्याज़ ने पिता का हाथ दूर झटका और हसन की नींद खुलने की परवाह किये बगैर तेज स्वर में चीखा- “आप यकीन क्यों नहीं कर रहे हैं?”

कमरे में पिन ड्राप खामोशी छा गयी। लियाकत की निगाहें कई क्षणों तक फाह्याज़ पर ही ठहरी रह गयीं फिर उन्होंने गर्दन घुमाकर हसन पर क्षणिक दृष्टिपात किया, जो अब कमरे में हो रही आवाजों के कारण नींद में कुनमुनाने लगा था।

“वो अजीब सी जगह थी।” इस दफे फाह्याज़ ने गिड़गिड़ाते हुए दयनीय स्वर में लियाकत को यकीन दिलाने की कोशिश की- “चारों ओर वीरानी, खामोशी और सफ़ेद धुंध थी। आस-पास काले साए मंडरा रहे थे, मातमी धुनें सुनाई दे रही थीं। वो इंसान आधा भेड़िया था, जो किसी बड़े से कटोरे में भरा खून शबनम के ऊपर उड़ेल रहा था। वह कोई दूसरी दुनिया थी।”

“हाँ, वह दूसरी दुनिया ही रही होगी....।” लियाकत ने ठंडे स्वर में कहा- “क्योंकि शबनम दूसरी दुनिया में जा चुकी है; मौत के बाद की दुनिया में। जितनी जल्दी तुम इस बात को मान लोगे, उतनी जल्दी तुम्हें इन सपनों से छुटकारा मिल जाएगा।”

“लेकिन...लेकिन मैंने...उसे खुली आँखों से देखा।” फाह्याज़ के चेहरे पर ऐसे भाव नमुदार हुए कि वह सहानुभूति का पात्र नजर आने लगा।

“ख्वाब कभी-कभी खुली आँखों से भी नजर आते हैं।” लियाकत ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा- “भटकना बंद करो बेटे। शबनम जा चुकी है। मौत की अँधेरी राहों में गुम हो चुकी तुम्हारी बीवी किसी भी चिराग की रोशनाई में अब नहीं नजर आ सकती। मैं कल मौलाना साहब से कोई ऐसी ताबीज लेकर आऊँगा, जो तुम्हारे जेहन को शांत रखे ताकि वह इन वाहियात ख्यालों की गिरफ्त में न आ सके।”

लियाकत उठे और बेडसाइड टेबल पर रखे जग का पानी गिलास में उड़ेलकर वापस लौटे।

“जाओ, सो जाओ।” उन्होंने गिलास फाह्याज़ की ओर बढ़ाते हुए कहा- “रात बाकी है, अभी केवल दो बजे हैं।”

फाह्याज़ कुछ कहना चाहता था लेकिन जब उसने देखा कि हसन उठकर बैठ चुका है तो उसने खामोशी से गिलास थामा और खाली करके लियाकत को लौटा दिया।

“मैं तुम्हें कमरे तक छोड़ दूँ?”

“नहीं।” उसने उठते हुए कहा- “मैं चला जाऊंगा, शुक्रिया।”

लियाकत तब तक दरवाजे पर ही खड़े रहे जब तक फाह्याज़ अपने कमरे में नहीं चला गया तत्पश्चात दरवाजा बंद करके बिस्तर पर आ गए। उनके चेहरे पर तनाव था। जेहन किन्हीं गहन विचारों में उलझा हुआ था।

“क्या अम्मी ज़िंदा है दादाजान?” हसन के सवाल से उनकी तंद्रा भंग हुई।

“नहीं।” लियाकत ने लिहाफ़ उसके धड़ तक खींचते हुए जवाब दिया।

“फिर वो अब्बू को क्यों नजर आती है?”

“तुम्हारे अब्बू को वो ख्वाब में नजर आती है।”

“तो मेरे ख्वाब में क्यों नहीं आती? मुझे उसे देखना है। उससे बातें किये हुए बहुत दिन हो गए हैं।”

लियाकत ने कुछ देर तक हसन के मासूम चेहरे को देखा फिर कहा- “मरे हुए लोगों का ख्वाब में आना अच्छा नहीं होता है हसन।”

“क्यों?”

“क्योंकि वो रूहानी दुनिया की बलाएं अपने साथ ले आते हैं। चलो अब अल्लाह मियाँ का नाम लो और सो जाओ।” लियाकत ने खुद भी लिहाफ़ धड़ तक खींच लिया और सोने का उपक्रम करने लगे।

हसन ने आँखें बंद तो कर लीं मगर इस तमन्ना के साथ कि ख्वाब में उसे भी माँ नजर आयेगी।

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हसीनाबाद, सन 1975।

“तेरा मुँह क्यों उतरा हुआ है?” कुक्कू ने जमुना से पूछा, जो बग्घी पर बैठा, स्टेशन से निकल रहे मुट्ठी भर लोगों को देख रहा था। जब उसने कोई जवाब नहीं दिया तो कुक्कू ने भी उन यात्रियों पर एक नजर डाली फिर कहा- “ये स्टेशन वैसे भी वीरान है, ऊपर से ठण्ड का मौसम; ऐसे में सवारियों की किल्लत कोई नयी बात नहीं है। ये तू भी जानता है, फिर थोबड़ा क्यों लटकाये हुए है? जा देख, वो साहब कहाँ जायेंगे। अगर जाने वाले होंगे तो तू ले जा उन्हें, मैं दूसरी सवारी देखता हूँ।”

रेलवे स्टेशन से सवारी ढोने वाली नियमित बग्घियों की संख्या बहुत कम थी।

वजह वही थी, जो कुक्कू अभी-अभी बयां करके हटा था। यूँ तो हर बग्घी वाला ‘कमाओ और कमाने दो’ के नियम से बंधकर सौहार्दपूर्ण धंधा करता था लेकिन कुक्कू और जमुना में दांत काटी रोटी थी।

“मेरे परेशान होने की वजह कुछ और है कुक्कू।” जमुना ने गहरी साँस लेकर वर्तमान में वापसी की।

“क्या हो गया? परिवार में फिर कोई लफड़ा हुआ क्या?”

“नहीं।” जमुना यात्रियों से निगाहें फेरकर कुक्कू से मुखातिब हुआ- “अच्छा एक बात बता।”

“पूछ।”

“नरभेड़िये होते हैं न?”

“क्यूँ नाम ले रहा है?” कुक्कू ने रोनी सूरत धारण करके कहा- “रात को जंगल पार करके घर जाना होता है। इस तरह की बातें याद आएंगी तो नरभेड़िया मारे या न मारे; उसका डर जरूर मार देगा हमें।”

“यानी तू भी उन्हें मानता है?”

“हर कोई मानता है। कबीले के लोग उन्हीं से बचने के लिए पूर्णिमा की रात ढोल नगाड़े पीट-पीटकर जोर-जोर से गाना गाते हैं। किसी के मुँह से मैंने सुना था कि अगर आस-पास कोई नरभेड़िया होता है तो उनके गाने से खुश होकर शिकार किये बिना वहाँ से गुजर जाता है। शार्ट में बोलूँ तो उस गाने के जरिये वे नरभेड़िया को खुश करते हैं, उससे रहम की भीख माँगते हैं।” बोलते-बोलते कुक्कू के नेत्र संकुचित हुए- “पर तू ये सब क्यों पूछ रहा है?”

“ये नरभेड़िये हमारे बीच ही रहते हैं न, इंसानों की शक्ल में?” जमुना ने कुक्कू का सवाल नजरअंदाज करके पूछा।

इस बार कुक्कू ने जवाब नहीं दिया। उसकी भाव-भंगिमाएं संजीदा हो गयीं।

“बोलता क्यों नहीं?”

“पहले तू बता कि ये सब पूछ क्यों रहा है?” कुक्कू ने सख्त लहजे में कहा-“बताया न कि दिन भर ऐसी बातें करने पर रात का सफ़र करने में दिक्कत होती है, जंगल से गुजरने में डर लगता है।”

“और अगर किसी रोज हमें उस डर के साथ जीना पड़ गया तो?” जमुना ने अर्थपूर्ण लहजे में पूछा।

“अबे खूसट, बताता क्यों नहीं कि आज तू नरभेड़िये की माला क्यों जप रहा है?” कुक्कू झल्लाया।

“क्योंकि मैंने उसे देखा।” जमुना के मुँह से यकायक निकल गया।

वह तो कहकर खामोश हो गया लेकिन उसके कहे हुए ने कुक्कू की खोपड़ी

में भूचाल ला दिया।

“क...क्या..क्या बोला तूने...?” वह जर्द लहजे में हकलाया।

“यही कि मैंने नरभेड़िया देखा; भले ही सपने में देखा, लेकिन देखा।” जमुना ने बेतकल्लुफ अंदाज में जवाब दिया।

“हो गयी आज की कमाई।” कुक्कू अपनी बग्घी की ओर बढ़ा- “आज अँधेरा होने से पहले घर जाऊँगा।”

“सुन तो।” जमुना बग्घी से नीचे उतरा और कुक्कू की बाँह पकड़कर उसे अपनी ओर खींचते हुए बोला- “ये तो बता कि क्या सच है कि महीने के बाकी दिन नरभेड़िये इंसानों की शक्ल में होते हैं और केवल पूरे चाँद की रात को ही आधा इंसान और आधा दरिंदा बनते हैं?”

“उनके बारे में जो कहानियाँ सुनी हैं, पढ़ी हैं; उसकी बिनाह पर तो सच यही है कि सामने से आ रहा वो इंसान भी...।” उसने एक आदमी की ओर इशारा करते हुए कहा- “नरभेड़िया हो सकता है। मैं भी हो सकता हूँ, तू भी हो सकता है, कोई भी हो सकता है।”

जमुना गंभीर हो गया। उसके चेहरे पर तनाव और भय नजर आने लगा।

“सिर्फ सपने की बात नहीं है, कुछ और भी है, जो तू मुझसे छिपा रहा है। है न?” उसकी हालत देख कुक्कू की आँखें गोल हो गयीं।

“मुझे लगता है कुक्कू कि मैं कस्बे में एक नरभेड़िया लेकर आया हूँ।” कहने के बाद जमुना ने प्रतिक्रिया जानने के लिए कुक्कू की ओर देखा।

“तू उसी इंसान की बात कर रहा है, जिसे ले जाने के लिए एक दिन तुझे देर रात तक यहाँ रुकना पड़ा था?”

“हाँ, उसका नाम पशुपति है। लगभग पंद्रह दिन पहले यहाँ आया था और डाकबंगले में ठहरने की व्यवस्था करके जाते वक्त मुझे ये हिदायत दे गया था कि फलां तारीख को देर रात जब वह अपने सामान के साथ स्टेशन पर उतरेगा तो उसे डाकबंगले तक ले जाने के लिए मैं वहाँ मौजूद रहूँ। एडवांस भी दिया था उसने।”

“पशुपति?” कुक्कू ने मुँह बिचकाया- “काफी अलग किस्म का नाम रखा है। वैसे यहाँ आया किस सिलसिले में है?”

“नहीं पता। बड़ा अजीब सा इंसान मालूम होता है। भूतों-पिशाचों और भेड़िया मानवों की किताबें पढ़ता है। मैंने पूछा कि नरभेड़ियों पर यकीन करते हैं या नहीं तो बात को गोल-गोल घुमाकर टाल दिया। रास्ते में जब मेरे मुँह से महल के बारे में बात निकली तो चपड़-चपड़ करके उसके बारे में सब कुछ जानने की कोशिश करने लगा। पूछ रहा था कि उसमें रहने वाले साए को किसी ने देखा भी है क्या।” जमुना ठहरकर कुक्कू को घूरने लगा, जो आँखें फाड़े हुए, कान खड़े

किये हुए उसकी बात सुन रहा था।

“फिर?” कुक्कू ने पूछा।

“फिर कुछ नहीं। उसे डाकबंगले तक छोड़कर मैं घर चला गया।”

“बस इतने से ही वह तेरी नजर में भेड़िया-मानव हो गया?” कुक्कू की जिज्ञासा विनोद में परिणित हो गयी। वह हँसने लगा।

“पूरी बात तो सुन।” जमुना ने उसकी पीठ पर हल्की सी धौल जमाई- “आज उसने मुझे एक लिफ़ाफ़ा पोस्ट करने के लिए दिया था।”

“तो तू उसकी चाकरी भी कर रहा है?”

“नया है हमारे कस्बे में, इसलिए उसकी थोड़ी सी मदद कर देता हूँ और बदले में वह मुझे कुछ पैसे दे देता है तो क्या बुरा है। यहाँ स्टेशन पर खड़े रहकर झक्क मारना, सवारियों के नखरे उठाना तो चाकरी से भी बुरा काम है।”

“बराबर, अब आगे बोल।”

“उसने लिफ़ाफ़े को राज़ रखने की सख्त हिदायत दी थी। उड़ते परिंदे को भी वह ये भनक नहीं लगने देना चाहता था कि लिफ़ाफ़े में मौजूद ख़त किस मसले पर है। तू तो जानता है कि मैं कौतुहल को दबा नहीं पाता हूँ इसलिए पोस्ट करने से पहले मैंने उस लिफ़ाफ़े को खोलकर देखने की कोशिश की थी।” जमुना बड़ी सफाई से उक्त हरकत के पीछे निहित अपनी वास्तविक मंशा को छुपाकर बोला।

“क्या मिला तुझे उसमें? नरभेड़िया?” कुक्कू की उत्कंठा चरम पर पहुँच रही थी।

“मैं लिफ़ाफ़ा खोलने ही जा रहा था कि मेरी खुली आँखों के सामने एक ख्वाब चमका।”

और फिर जब जमुना अपनी आपबीती सुनकर खामोश हुआ तो कुक्कू का चेहरा कोरे कागज़ की मानिंद सफ़ेद पड़ा हुआ था।

“वो ख्वाब तुझे इसीलिए दिखाई दिया था ताकि तू लिफ़ाफ़े को खोलने का इरादा छोड़ दे।” लम्बी खामोशी के बाद कुक्कू ने निष्कर्ष निकाला।

“तभी तो कह रहा हूँ कि हो न हो, वो पशुपति की ही माया थी। इधर मैंने लिफ़ाफ़ा खोलने का विचार किया होगा, उधर उसे मेरे इरादों का एहसास हो गया होगा। वह मायावी है। जरूर वह इंसानों की खाल वाला भेड़िया होगा।”

“तूने लिफ़ाफ़ा पोस्ट तो कर दिया न?”

“हाँ, कर दिया।”

कुक्कू बेचैनीपूर्वक इधर-उधर विचरने लगा। थोड़ी देर पहले जो हालत जमुना की थी, वही हालत अब उसकी भी थी। सवारी उठाने का ख्याल दोनों के जेहन से निकल चुका था।

“तू उससे दूर रह। चार पैसे कमाने के लालच में अपनी जान की बाजी मत लगा। आज तो उससे बिल्कुल भी मत मिलना क्योंकि आज की रात पूरे चाँद की रात होगी।”

“पर कब तक?” ‘पूरे चाँद की रात’ सुनते ही जमुना सिहर गया- “खतरा तो अब हमारे पूरे कस्बे पर ही है। पता नहीं वह खबीस किस इरादे से यहाँ आया हुआ है।”

“क्या पता वह नरभेड़िया न हो। तुझे सपना इसलिए आया हो क्योंकि तेरे दिमाग में पहले से ही उसके नाम और उसकी आदतों को लेकर शुबहा पैदा हो गया था।” कुक्कू ने उम्मीद के खिलाफ़ संभावना व्यक्त की।

“लेकिन कुक्कू ऐसे सपने भी कहीं आते हैं क्या किसी को? पूरी नींद तो छोड़, मैं आधी नींद में भी नहीं था, दारू भी नहीं पी थी, फिर जागती आँखों से सपना कैसे देख लिया मैंने। मुझे तो डर लग रहा है।” जमुना ने पहलू बदला- “मैंने लोगों को कहते सुना है कि भोर में या जागती आँखों से देखे हुए सपने अक्सर सच होते हैं।”

“मैं तुझे डराना नहीं चाहता लेकिन लोग सच कहते हैं।” जमुना ने कातर भाव से कुक्कू ओर देखा जबकि कुक्कू ने आगे कहा- “इसलिए तुझसे बोला कि कमाने के लालच में उसके करीब रहने की कोशिश मत कर। दूर रहकर उसके चाल-चलन पर नजर रख। जब पूरा यकीन हो जाएगा कि वह नरभेड़िया है तो कस्बे के बाकी लोगों को बताकर उसका कोई जतन करेंगे।”

जमुना ने कुछ कहे बगैर होठों पर जुबान फेरा।

“घबरा मत।” कुक्कू ने उसका कंधा थपथपाया- “बस सावधान रहना शुरू कर दे, कुछ नहीं होगा।”

इसके बाद दोनों की बातचीत का पटाक्षेप हो गया क्योंकि दूर गूँजे ट्रेन के हॉर्न के रूप में उन्हें ये संकेत मिल गया था कि कुछ ही समय में स्टेशन पर सवारियों की जमघट लगने वाली है।