आधी रात तक पावली-काकू में मीटिंग चलती रही। साथ में दोनों बस्तियों के बड़े-बूढ़े लोग भी थे। आखिरकार उन लोगों में दोनों बस्तियों को शहर में ले जाकर बसाने की बात तय हो गई। पावली ने कहा कि वो काकू के साथ शहर में, सरकार के पास जाकर बात करेगा कि उन्हें शहर में बसने में सरकार क्या सहायता देगी। कैसे उन्हें शहर में बसाएगी।
आधी रात को ये सब बातें खत्म हुई। साथ ही काकू ने अपना प्रोग्राम तय करके बताया कि कल सुबह वो अपने लोगों के साथ, अपनी बस्ती की तरफ चल देगा। जब शहर जाकर सरकार से बात करनी हो तो उसे बता दिया जाए। वो पावली के साथ चल पड़ेगा।
इसके बाद पावली जब झोंपड़े में पहुंचा तो भोमा उसके पीछे-पीछे आ गया।
“सरदार।” भोमा कह उठा –“आपने ये बात तो की नहीं कि जो शहर नहीं जाना चाहता। वो...।”
“मुझे तुम्हारी बात याद है भोमा।” पावली मुस्कराया –“और मैंने तुमसे कहा भी था कि ये बात कल होगी। जिस मसले पर पहले बात होनी जरूरी थी। वो हो गई। फिक्र मत करो। कल तुम्हारी सरदारी को लेकर बात होगी और जो शहर नहीं जाना चाहेगा। उनके सरदार तुम बना दिए जाओगे। लेकिन इस बात के लिए कल सुबह ही मेरे पास मत आ जाना। काकू ने कल अपनी बस्ती के लिए रवाना होना है। उसे तोहफे देकर भेजने के बाद मैं आराम करूंगा। उसके बाद ही तुम्हारी बात मैं बस्ती के बड़ों के सामने रखूंगा। जल्दबाजी मत दिखाओ भोमा।”
“जल्दबाजी नहीं। मैं तुम्हें याद दिलाना...।”
“मुझे याद है।” पावली ने शांत स्वर में कहा –“रात बहुत हो गई है। मैं आराम करना चाहता हूं।”
भोमा चला गया।
पावली का चेहरा कठोर हो गया।
“भोमा तेरे इरादे मैं कभी भी कामयाब नहीं होने दूंगा। सरदार बनने के लालच में तू बस्ती के कई लोगों को शहर का डरावा दिखाकर रोक लेगा। वो हमेशा के लिए जंगल में ही रह जाएंगे। उनका बनने वाला भविष्य अंधेरे में डूब जाएगा। लेकिन मैं तेरे को कामयाब नहीं होने दूंगा। बस्ती के लोगों को मैं संवारना चाहता हूं। उन्हें दिखाना चाहता हूं असली दुनिया इस जंगल के बाहर बसती है। तेरा कोई इन्तजाम तो मेरे को करना ही होगा।”
☐☐☐
अगले दिन काकू को उसके आदमियों के साथ विदा करने की तैयारियां चल रही थीं। बस्ती में उत्सव जैसा माहौल था। पावली ने एक सूटकेस में रखे नए कपड़ों में से एक-एक जोड़ा काकू और उसके साथ के सब लोगों को दिया। उनमें ये बात भी तय हो गई थी कि तीन दिन के बाद वो-काकू और बस्ती के दो बड़े जंगल से बाहर जाकर शहर में पहुंचकर, सरकार से मिलेंगे। ताकि बस्ती के लोगों के शहर में बसने का इन्तजाम किया जा सके।
दिन के दस बज रहे थे।
मोना चौधरी और महाजन नहा-धोकर, नाश्ता करके पावली के पास पहुंचे।
पावली उस वक्त अकेला था झोंपड़े में।
“हम यहां से जाने को तैयार हैं।” मोना चौधरी बोली –“किसी को हमारे साथ कर दो कि, हमें जंगल से बाहर निकाल दे।”
“हां।” पावली ने मुस्करा कर दोनों को देखा –“मैं अभी किसी को साथ कर देता हूं।”
“भोमा का क्या हुआ?” मोना चौधरी ने पूछा –“कोई हल निकला?”
“नहीं। काकू को विदा करके भोमा के बारे में सोचूंगा।”
पावली गम्भीर हो गया।
मोना चौधरी और महाजन की नजरें मिली।
“पावली।” महाजन बोला –“तुम भोमा को हमारे साथ कर दो।”
पावली की आंखें सिकुड़ी।
“भोमा को?”
“हां।” मोना चौधरी जहरीले अंदाज में मुस्कराई –“मैं भी नहीं चाहती कि भोमा यहां बस्ती का वजूद कायम रखे। यहां वो मासूम लोगों को गुमराह करके अफीम की खेती करवाता रहे और लोगों को अफीम बेचे। मैं चाहती हूं तुम्हारी और काकू की बस्ती के लोग शहर जाकर बस जाएं। अच्छा जीवन व्यतीत करें। तुम्हारी लड़ाई भले के लिए है।”
पावली मोना चौधरी को देखता रहा।
“भोमा को हमारे साथ भेज दो। हमारा काम भी हो जाएगा और तुम्हारा भी।” मोना चौधरी ने पुनः कहा –“वो हमें जंगल के बाहर भी पहुंचा देगा और वापस भी नहीं आ सकेगा। तुम्हारी समस्या भी खत्म हो जाएगी।”
“समझ गया।” पावली ने गम्भीर स्वर में कहा –“भोमा तुम लोगों को जंगल के बाहर पहुंचा देगा।”
“और वापस आने के लिए वो जिन्दा नहीं रहेगा।” महाजन ने ठण्डे स्वर में कहा।
पावली ने भोमा को बुलाया।
“ये दोनों हमारी बस्ती के मेहमान हैं भोमा।” पावली बोला।
“मैं जानता हूं सरदार।” भोमा ने मुस्करा कर दोनों को देखा।
“ये अब जाना चाहते हैं। मैं चाहता हूं तुम इन्हें जंगल से बाहर शहर की तरफ पहुंचा दो। ये जिम्मेवारी वाला काम मैं तुम जैसे जिम्मेवार के हवाले ही करना चाहता हूं, जो अब बस्ती का सरदार बनने जा रहा है।”
भोमा खुलकर मुस्कराया।
“तुमने मुझे सरदार कहा। ये मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।” भोमा के दांत मुस्कराहट की वजह से नजर आने लगे थे –“मैं इस काम को बहुत अच्छी तरह पूरा करूंगा।”
“ये चाहते हैं कि इनके साथ एक ही व्यक्ति हो। साथ में ज्यादा भीड़ नहीं चाहते।”
“मैं ही इन्हें जंगल के बाहर तक छोड़ आऊंगा। अब तो साथ में किसी की जरूरत नहीं। काकू की बस्ती वाले हमारे दोस्त बन गए हैं। पहले तो ये खतरा होता था कि कहीं रास्ते में वो न मिल जाएं।” भोमा ने फौरन कहा।
“ठीक कहा।” पावली मुस्कराया –“तुम वास्तव में सरदार बनने के काबिल हो। इन्हें छोड़ आओ। तब तक काकू भी जा चुका होगा और मैंने भी आराम कर लिया होगा। फिर बस्ती वालों से कहा जाएगा कि जो हमारे साथ शहर में जाकर नहीं बसना चाहते, उनका सरदार तुम माने जाओगे।”
“शुक्रिया सरदार। मैं इन्हें छोड़कर जल्दी वापस आता हूं।” फिर दोनों से कहा –“आओ।” वो बाहर निकलता चला गया।
मोना और महाजन की निगाह पावली से टकराई।
“चलते हैं पावली।” मोना चौधरी बोली –“हमारी मुलाकात अच्छी रही।”
“कहीं भोमा बचकर वापस न आ जाए।” पावली ने धीमे स्वर में कहा।
“हमारे साथ जाने के बाद, भोमा को कभी कोई नहीं देख पाएगा।” मोना चौधरी ने कहा और महाजन के साथ झोंपड़े से बाहर निकल गई।
☐☐☐
जसबीर वालिया ने दिल्ली के ग्रेटर कैलाश जैसे शानदार इलाके के एक बंगले के सामने कार रोकी और उतर कर विशाल गेट की तरफ बढ़ गया। उसने काले रंग का सूट पहन रखा था। टाई लगा रखी थी। आंखों पर चश्मा था। दिन के बारह बज रहे थे। सड़क से कभी-कभार कोई कार निकल जाती थी।
दरबान ने उसे देखते ही, विशाल गेट के बीच बना गेट खोल दिया। उस पर निगाह मारे बिना वो भीतर प्रवेश करता चला गया। मिनट भर में ही वो बंगले के विशाल हॉल में था।
वहां पचास बरस का एक व्यक्ति मौजूद था। उसके अलावा दूसरा कोई भी नजर नहीं आ रहा था। गहरी शान्ति छाई हुई थी वहां।
जसबीर वालिया को देखकर वो व्यक्ति मुस्कराया। हाथ मिलाया।
“बैठो वालिया।”
दोनों सोफा चेयर पर आमने-सामने बैठ गए।
“सफलता के लिए बधाई।” वो बोला।
“सब बढ़िया चल रहा है टंडन साहब?” जसबीर वालिया ने उसकी आंखों में देखा।
“हां। बख्तावर सिंह तुम्हारी बहुत तारीफ कर...।”
“मैं यहां तारीफ सुनने नहीं आया। राजू किधर है?” जसबीर वालिया बोला।
“मुझे नहीं मालूम।”
“बख्तावर सिंह ने बताया नहीं तुम्हें।”
उसने इंकार में सिर हिलाया।
“टंडन।” जसबीर वालिया ने उसे घूरा –“बख्तावर ने तेरे को मेरे बारे में बता दिया। काम हो जाने के बारे में बता दिया। तुम बधाई भी देने लग गए मुझे। लेकिन तुम्हें राजू के बारे में नहीं पता, जो मेरे साथ काम पर था। जो मेरे पीछे-पीछे ही पैराशूट से, विमान से कूदा था।”
“राजू के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम।”
जसबीर वालिया के दांत भिंच गए।
“तुमने राजू के बारे में नहीं पूछा या बख्तावर सिंह ने नहीं बताया?”
“दोनों ही बातें हैं।” टंडन ने अपना हाथ हिलाया। वो शांत था –“मैं अपने काम से मतलब रखता हूं। पूछता कम हूं और जो बख्तावर सिंह बताता है वो याद रखता हूं। बख्तावर सिंह को पसन्द नहीं कि मैं अपने काम से ज्यादा, इधर-उधर की पूछताछ करूं।”
जसबीर वालिया, टंडन को घूरने लगा।
टंडन ने सिगरेट सुलगा ली।
“बख्तावर सिंह ने कहा था कि यहां मेरे दो सूटकेस पड़े हैं। नोटों से भरे हुए।”
“दो नहीं, एक।”
“दो।”
“एक।” टंडन ने उसकी आंखों में झांका –“और वो पड़ा है।” उसने एक तरफ इशारा किया।
जसबीर वालिया ने उस दिशा की तरफ देखा तो वहां खूबसूरत- सा सूटकेस पड़ा दिखा।
“वो हजार की गड्डियों से भरा हुआ है। तुम जानते ही हो कि ऐसे सूटकेस में कितनी दौलत होती है।” टंडन मुस्करा पड़ा।
जसबीर वालिया की सख्त निगाह, टंडन पर जा टिकी।
“गुस्सा क्यों कर रहे हो-क्या हुआ?”
“बात क्या है टंडन?”
“कैसी बात?”
“यहां, इस वक्त दो सूटकेस तैयार होने चाहिए थे। बख्तावर सिंह और मेरे बीच यही सौदा हुआ था।”
“वालिया।” टंडन ने सिर हिलाकर कहा –“मैं नहीं जानता कि तुम्हारे और बख्तावर के बीच क्या सौदा हुआ। मुझे उसने एक ही सूटकेस देने को कहा और जो मैंने तैयार कर रखा है। मैं उस हद तक ही काम करता हूं, जहां तक बख्तावर सिंह मुझे कहता है। बीस सालों से उसके लिए काम कर रहा हूं। मैंने वो ही किया, जो उसने कहा।”
“इसका मतलब, काम हो जाने के बाद बख्तावर सिंह के मन में बेईमानी आ गई है।” जसबीर वालिया गुर्रा उठा –“लेकिन वो जानता नहीं कि जसबीर वालिया को वो मात नहीं दे सकता।”
“तुम खामख्वाह गुस्सा हो रहे...”
“बख्तावर सिंह से मेरी बात करा।”
“तुम अच्छी तरह जानते हो कि मेरे पास बख्तावर सिंह का नम्बर नहीं होता। मैं उसे फोन नहीं कर सकता। जब उसे जरूरत होती है, वो मुझे फोन करके काम बोल देता है।” टंडन ने मुस्करा कर कहा –“वो सूटकेस लो और चले जाओ। जब भी तुम्हारी बख्तावर सिंह से बात हो, ये बातें उससे पूछ...।”
जसबीर वालिया ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और वो नम्बर मिलाने लगा, जिस पर उसकी बात अभी तक, बख्तावर सिंह से होती आई थी।
नम्बर नहीं मिला।
वालिया ने दूसरी और तीसरी बार नम्बर मिलाया।
परन्तु नम्बर नहीं मिला।
वालिया के दांत भिंच गए। वो उठा। फोन जेब में डाला।
“हरामीपन दिखा गया बख्तावर सिंह।” जसबीर वालिया गुर्राया –“दो सूटकेस की बात की और एक थमा दिया। वो क्या समझता है कि मैं हराम का पैसा ले रहा हूं। काम करता हूं। जान खतरे में डालता हूं। तब पैसा लेता हूं। चैन से नहीं बैठने दूंगा बख्तावर सिंह को।”
टंडन उसके सुर्ख-धधकते चेहरे को देखने लगा।
“तू टंडन। बख्तावर सिंह का खास आदमी है।” जसबीर वालिया की सुर्ख आंखें उस पर जा टिकी।
“हां।”
“बीस सालों से, तू उसके लिए हिन्दुस्तान में काम कर रहा है।”
टंडन ने पर सहमति से सिर हिलाया।
“तेरी मौत से तकलीफ तो होगी बख्तावर सिंह को।” उसकी आवाज में मौत के भाव आ ठहरे।
“क्या?” टंडन के होंठों से हक्का-बक्का स्वर निकला।
अगले ही पल छोटी-सी पिस्टल वालिया के हाथ में नजर आने लगी।
टंडन हड़बड़ा कर खड़ा हो गया।
“ये...ये क्या कर रहा है वालिया?” टंडन के होंठों से निकला।
“जसबीर वालिया इन्तजार नहीं करता। जो करना होता है। कर देता...”
“जो मर्जी करो। लेकिन मुझे क्यों इस मामले में घसीट...।”
“क्योंकि तू बख्तावर सिंह का खास आदमी है और बख्तावर सिंह ने जुबान देकर मेरा एक सूटकेस मार लिया। तेरे से ही शुरुआत कर रहा हूं और छोडूंगा बख्तावर सिंह को भी नहीं।”
“होश में आ वालिया। बख्तावर सिंह का मामला बख्तावर सिंह से...।”
“वो ही कर रहा हूं। लेकिन जब तक बख्तावर सिंह की छाती मेरे निशाने पर नहीं आती, तब तक उसके तुम जैसे सहारों को खत्म करूंगा। ताकि वो जल्द से जल्द मेरे सामने आ सके।” जसबीर वालिया का स्वर क्रूर हो गया।
“तुम बेवकूफी वाली बात कर रहे हो। पहले बख्तावर सिंह से बात तो कर लो कि...”
“मैं नहीं, बात अब बख्तावर सिंह ही मुझसे करेगा।” इसके साथ ही वालिया ने दांत भींचकर हाथ में दबी पिस्टल का नन्हा-सा ट्रिगर दबा दिया। ताली ठोकने जैसी मध्यम-सी आवाज गूंजी वहां।
बारूद की स्मैल जसबीर वालिया की सांसों ने महसूस की।
लेकिन उसकी निगाह टंडन के माथे पर थी।
माथे के ठीक बीचों-बीच छोटा सा सुर्ख बिन्दु चमक उठा था। यानी कि गोली ने उसके जिस्म में माथे से प्रवेश किया था। वहां से खून बहकर नाक और आंखों की तरफ आने लगा। उसी पल टंडन का शरीर पास के सोफे से टकराया और नीचे गिर गया। वो मर चुका था।
चेहरे पर खतरनाक भाव समेटे जसबीर वालिया ने पिस्टल जेब में डाली और बड़बड़ा उठा –“मेरे से गद्दारी। मेरे से गद्दारी। छोडूंगा नहीं तेरे को बख्तावर सिंह।” साथ ही वो सूटकेस के पास पहुंचा।
वो भारी था। कठिनता से उसे उठाकर किसी तरह बाहर तक लाया। गेट पर मौजूद दरबान की सहायता से वालिया ने सूटकेस कार में रखा और ड्राइव करते हुए कार आगे बढ़ा दी।
अब जसबीर वालिया ने अपने ठिकाने पर जाना था।
दिल्ली से बाहर।
कार तेज रफ्तार से दौड़ने लगी थी।
जसबीर वालिया के चेहरे पर दरिन्दगी नाच रही थी।
☐☐☐
“रात का अंधेरा फैल गया था, जब वो जंगल से निकलकर, पैदल ही चलते हुए पास के शहर पहुंचे। थकान से बुरा हाल हो गया था। रात के नौ बज रहे थे।
वो एक छोटे से तिराहे जैसी जगह पर रुके।
मोना चौधरी और महाजन ने पास खड़े भोमा को देखा।
परेशान-सा नजर आ रहा था भोमा ।
“हमारी बातें समझ गए भोमा?” मोना चौधरी का स्वर शांत था।
भोमा ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
“पावली ने तुम्हें खत्म करने को कहा है कि तुम वापस बस्ती न लौटो। ये बात सच है कि अपनी सरदारी के लालच में तुम बस्ती वालों को बहका कर, वहीं रहने को मजबूर कर दोगे। वो फिर कभी ढंग की जिन्दगी नहीं बिता सकेंगे। जंगल में ही जंगली जीवन व्यतीत कर देंगे। जबकि पावली उन्हें अच्छा जीवन देने के लिए शहर ले जाना चाहता है। उसका मकसद अच्छा है और तुम्हारे इरादों में लालच है।” महाजन कह उठा।
भोमा के चेहरे पर व्याकुलता ने उछाल मारी।
“पावली चाहता तो खामोशी से तुम्हें जंगल में खत्म करके, जमीन में दबा देता। लेकिन उसने हम पर विश्वास किया कि हम तुम्हें खत्म कर देंगे। लेकिन हम तुम्हें जीने का एक मौका और दे रहे हैं।” मोना चौधरी ने समझाने वाले स्वर में कहा –“अब वापस बस्ती में जाओगे तो पावली किसी न किसी बहाने तुम्हारी जान ले लेगा। क्योंकि तुम उसकी अच्छी कोशिश में परेशानी खड़ी कर रहे हो।”
“मैं...मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा।” भोमा के होंठों से थका-सा स्वर निकला।
“ये तो तुम कह रहे हो।” मोना चौधरी ने सिर हिलाया –“मुझे यकीन भी है कि सच कह रहे हो। परन्तु अब पावली तुम्हारी किसी बात पर विश्वास नहीं करेगा और तुम्हें खत्म करके ही रहेगा।”
“समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं। मैं तो...।”
“वही करो जो मैं तुम्हें कह चुका हूं।” महाजन बोला –“हमारी तरफ से बंदिश नहीं है कि हमारा कहना मानो। हमने तो तुम्हारी जान नहीं ली। जिन्दा छोड़ दिया तुम्हें। वापस बस्ती में गए तो पावली मार देगा। अच्छा यही होगा कि अपना रास्ता चुन लो। वापस मत लौटो। जंगल और बस्ती भूल जाओ। वापस गए तो जान से जाओगे। जबकि अपना जीवन पहले होता है। हमारी सलाह है कि यहां से दूर किसी दूसरे शहर में बस जाओ। जो भी काम मिले, कर लो। सबसे पहले अपना पेट भरो फिर धीरे-धीरे उस शहर में अपने पैर जमाओ।”
भोमा व्याकुल-सा मोना चौधरी और महाजन को देखने लगा।
“जरूरी नहीं है कि तुम हमारी बात मानो।” मोना चौधरी बोली –“जो तुम्हारा मन कहता है वो करो।”
“तुम दोनों ठीक कहते हो कि मुझे बस्ती में वापस नहीं लौटना चाहिए। इन हालातों में पावली अवश्य मेरी जान ले लेगा।” भोमा ने धीमे किन्तु टूटे स्वर में कहा –“मुझे किसी शहर में ही बसना होगा। शहर में ही बाकी की जिन्दगी बितानी होगी। लेकिन किधर जाऊं।”
महाजन ने पैंट में फंसी बोतल निकाली और नशीले पानी का आखिरी घूंट भरकर खाली बोतल को रास्ते के किनारे पर रख दिया। मोना चौधरी ने जेब से कुछ नोट निकाल कर भोमा को थमाए।
“ये तुमने तय करना है कि किधर जाना है। ये पैसा तुम्हारे दस-पन्द्रह दिन निकाल देगा। तब तक तुम पेट भरने लायक कोई काम कर ही लोगे।” कहने के बाद मोना चौधरी ने महाजन को देखा –“आओ।”
“चलो बेबी।”
दोनों आगे बढ़ गए।
भोमा हाथ में नोट पकड़े.मोना चौधरी और महाजन को जाते देखता रहा। उसकी आंखों में शुक्रिया के भाव थे कि पावली के कहने पर इन्होंने उसकी जान नहीं ली।
“बेबी।” चलते-चलते महाजन ने टोका –“अब किधर?”
“वापस दिल्ली। मामले की शुरुआत वहीं से हुई थी।” मोना चौधरी का लहजा कठोर हो गया –“ऐसे में जसबीर वालिया तक पहुंचने की शुरुआत भी हम, वहीं से करेंगे। बख्तावर सिंह की कोई खबर पा सके तो, दिल्ली से ही पा सकेंगे।”
“विशाल सिंह –जिसने हमें बख्तावर सिंह के इशारे पर, झूठे तौर पर, काम पर असम भेजा और...।”
“हां। शुरुआत वहीं से होनी है।” कहते हुए मोना चौधरी ठिठकी।
महाजन रुका।
मोना चौधरी की निगाह सामने नजर आ रहे एस.टी.डी. बूथ पर थी। इससे पहले कि महाजन कुछ कहता, मोना चौधरी कहते हुए बूथ की तरफ बढ़ी।
“पारसनाथ से बात करके आती हूं।”
महाजन वहीं खड़ा, इधर-उधर नजरें घुमाने लेगा।
☐☐☐
“हैलो।” लाइन मिलते ही, मोना चौधरी के कानों में पारसनाथ का सपाट स्वर पड़ा।
बूथ में और कोई नहीं था। वहां का मालिक दूसरी तरफ बैठा था।
“पारसनाथ।”
“मोना चौधरी।” पारसनाथ का चौंका-सा स्वर मोना चौधरी के कानों में पड़ा।
“हां। पारसनाथ तुम कैसे हो?”
पारसनाथ की तरफ से कोई आवाज न आई।
चंद पल खामोशी में बीते तो मोना चौधरी ने टोका।
“पारसनाथ।”
पारसनाथ के लम्बी सांस लेने की आवाज कानों में पड़ी।
“मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि तुम्हारे जिन्दा होने का जानकर मुझे कितनी खुशी हो रही है।” कानों में पड़ने वाला पारसनाथ का स्वर सपाट ही था –“विमान विस्फोट से बच गई तुम...।”
“हां। मैं...।”
“और महाजन?”
“वो भी किस्मत से बच गया।”
“खुशी हुई ये सब जानकर।” पारसनाथ के स्वर में सोचें थी –“उस विमान से तुम और महाजन ही बचे?”
“नहीं। तीन लोग बचे।” मोना चौधरी का चेहरा सख्त हुआ –“एक और भी बच गया पारसनाथ।”
“कौन?”
“जिसने विमान को उड़ाया। जसबीर वालिया।” मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
पारसनाथ की तरफ से कोई आवाज नहीं आई।
“क्या हुआ?”
“जसबीर वालिया के बारे में याद कर रहा हूं। ये नाम नहीं सुना पहले।”
“तुम्हें एक काम करना है। मैं और महाजन एक-दो दिन में दिल्ली पहुंच रहे हैं।”
“कैसा काम?”
“विशाल सिंह। जिसने मुझे और महाजन को असम भेजा। प्लेन में सीटें बुक कराई। उसे पकड़ो। हम जब दिल्ली पहुंचे तो विशाल सिंह हमारे सामने होना चाहिए।”
“खतरनाक बंदा है वो।”
“हां। वो बख्तावर सिंह के लिए काम करता है।”
“बख्तावर सिंह?” पारसनाथ का चौंकने वाला स्वर कानों में पड़ा –“पाकिस्तानी मिलिट्री का खतरनाक सांड।”
“हां।”
“ओह –तो क्या विमान भी उसी के इशारे पर?”
“हां।” मोना चौधरी उसकी बात काट कर कह उठी –“उसी के इशारे पर मुझे विमान में पहुंचाया गया। उसी के इशारे पर विमान में विस्फोट कराया गया। बख्तावर सिंह मुझे खत्म करना चाहता था, लेकिन मैं बच गई। मर गए, सौ से ज्यादा वो बेगुनाह यात्री जो विमान में सवार थे। इस काम में विशाल सिंह ने बख्तावर सिंह का साथ दिया।”
“समझ गया।” पारसनाथ का कठोर स्वर, मोना चौधरी के कानों में पड़ा।
“कल या परसों तक दिल्ली पहुंच जाएंगे। तुम विशाल सिंह को...।”
“मैं देखता हूं, वो किधर है।” पारसनाथ का भिंचा स्वर मोना चौधरी के कानों में पड़ा।
मोना चौधरी ने रिसीवर रखा और पैसे चुका कर बूथ से बाहर आ गई।
महाजन के पास पहुंची।
“पारसनाथ मिला?”
“हां।”
“क्या बात हुई?”
“हमारे दिल्ली पहुंचने तक, वो विशाल सिंह को पकड़ कर अपने पास संभाल लेगा।” मोना चौधरी भिंचे स्वर में कह उठी।
महाजन ने अंधेरे में मोना चौधरी के चेहरे पर निगाह मारी।
“विशाल सिंह पर हाथ डालना आसान काम नहीं।” महाजन ने गहरी सांस ली।
“ये देखना पारसनाथ का काम है।”
दोनों अंधेरे में आगे बढ़ते हुए, रात बिताने के लिए होटल तलाश करने लगे।
☐☐☐
पारसनाथ ने मोना चौधरी से बात समाप्त होते ही कहीं और फोन मिलाया।
“हैलो।” लाइन मिलते ही उधर से आवाज कानों में पड़ी।
“उस्मान को फोन दे।”
“पारसनाथ?' दूसरी तरफ फोन पर बैठे व्यक्ति के होंठों से निकला।
“उस्मान किधर है?”
“एक मिनट। अभी बुलाता हूं।” इसके साथ ही उस व्यक्ति की आवाजें पारसनाथ के कानों में पड़ने लगी –“इधर टांगे फैलाकर क्या बैठा है। फूट--उस्मान भाई को फटाफट बुला। बोल, पारसनाथ का फोन आया है।”
इसी तरह की आवाजें उसके कानों में पड़ती रही।
मिनट भर बाद उस्मान भाई की आवाज पारसनाथ के कानों में पड़ी।
“पारसनाथ?”
“हां।”
“वाह, आज कैसे याद कर लिया?” उस्मान भाई का हंसी भरा स्वर कानों में पड़ा।
“काम है।”
“आऊं क्या?”
“फोन पर सुन।” पारसनाथ दूसरा हाथ अपने खुरदरे चेहरे पर फेरने लगा –“विशाल सिंह को अच्छी तरह जानता है तू। जानता है कि नहीं?”
“बरोबर जानता हूं। पक्का जानता हूं। साला, हरामी और खतरनाक आदमी है, बड़ी मछली है।”
“मेरे को चाहिए वो।” पारसनाथ का स्वर खतरनाक हो गया।
लाइन पर दो पलों के लिए खामोशी रही। फिर उस्मान भाई का स्वर सुनाई दिया।
“लफड़ा हो गया क्या?”
“अभी कुछ नहीं पता क्या हो गया। मुझे विशाल सिंह जिन्दा चाहिए। इन्तजाम करेगा उसका।”
“वो बड़ी मछली है पारसनाथ।”
“मैंने तेरे को इसलिए ये काम बोला कि तू मेरे को हमेशा बोलता है कि तेरे को सेवा का मौका दूं।” पारसनाथ ने एक-एक शब्द चबाकर कहा –“मैंने तेरे को सेवा का मौका दिया है उस्मान।”
“तेरे वास्ते कुछ करके मेरे को खुशी होगी।” उस्मान भाई का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा –“मैं तो गली छाप हूं। कभी तूने ही मेरे को सहारा दिया और...।”
“मेरे काम के बारे में बात कर।” पारसनाथ ने टोका।
कुछ चुप्पी के बाद उस्मान भाई की आवाज आई।
“सच बोलता है पारसनाथ। विशाल सिंह जैसे हरामी पर हाथ डालना आसान नहीं। तेरा साथ है तो मैं ये काम कर दूंगा। बोल, जरूरत पड़ी तो फोन मारूं तेरे को?”
“मारना। मैं हर वक्त अपने आदमियों के साथ तैयार मिलूंगा।'
“ठीक है।”
“तू अभी से इस काम पे लग। मुझे विशाल सिंह की जल्दी जरूरत है।” पारसनाथ ने सख्त स्वर में कहा।
“समझ। लग गया काम में।”
पारसनाथ ने रिसीवर रखा और इन्टरकॉम का रिसीवर उठाकर बोला।
“डिसूजा को भेजो।” कहकर रिसीवर रख दिया।
पांच मिनट में ही पैंतालीस बरस का डिसूजा पारसनाथ के सामने था। यूं तो वो रेस्टोरेंट के सारे काम देखता था। लेकिन पारसनाथ के हर तरह के काम करता था वो।
“विशाल सिंह-वो दादा-समझा क्या?” पारसनाथ ने उसकी आंखों में देखा।
डिसूजा एकाएक सतर्क हो गया। उसने हौले से सिर हिलाया।
“उसके बारे में सब कुछ पता कर कि वो क्या कर रहा है। मुझे उसकी जरूरत है।” पारसनाथ कठोर स्वर में बोला –“वो किधर मिलेगा। अगर ये मालूम हो जाए तो बोत बढ़िया रहेगा।”
“समझ गया।” डिसूजा ने सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई और कश लेने लगा। खुरदरा चेहरा सख्त हुआ पड़ा था।
☐☐☐
अगले दिन सुबह छ: बजे डिसूजा का फोन पारसनाथ को आया।
पारसनाथ नींद में था। हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
“हैलो।”
“मैं डिसूजा बोल...।”
“कहो।”
“विशाल सिंह के बारे में मालूम किया है।” डिसूजा की आवाज कानों में पड़ी –“दिल्ली-यू.पी. बार्डर पर धागे की फैक्ट्री है उसकी। कहने को ही वहां धागा बनता है। असल में विशाल सिंह अपने गैर कानूनी काम वहीं से जारी रखता है। रात को ही साढ़े तीन सौ रिवॉल्वरों की खेप उस फैक्ट्री में पहुंची है। उन साढ़े तीन सौ रिवॉल्वरों को मेरठ, आगरा और मुम्बई की तरफ आज सुबह ही रवाना कर दिया जाना था।”
“ये बात किससे जानी?”
“विशाल सिंह के एक आदमी से मेरी बात हो गई थी। दस हजार रुपये में सब बताया।”
“आगे।”
“वहीं पर नौ लड़कियां भी कैद हैं। लड़कियां दो दिन से कैद हैं। सब खूबसूरत हैं। पढ़ी-लिखी हैं और उन्हें देश के कई शहरों से जबरदस्ती उठाया गया है। किसी को नौकरी का लालच दिया गया है। यानी कि अब वो कैद है और उनके सामने विशाल सिंह के आदमी ने शर्त रखी है कि वो एक-एक साल तक दूसरे मर्दो का बिस्तर गर्म करेंगी, तब उन्हें आजाद किया जाएगा। इंकार करने पर, अभी से ही उनका बलात्कार किया जाएगा और खाने को कुछ नहीं दिया जाएगा। जब वो मर जाएंगी तो उनकी लाशों को सड़क पर फेंक दिया जाएगा। उनमें से एक लड़की ने कल आत्महत्या करने की चेष्टा की थी। वो मर तो नहीं सकी, परन्तु उसकी हालत नाजुक है।”
पारसनाथ की आंखें पूरी खुल गई। उसके होंठ भिंच गए थे। वो बेड पर ही सीधा बैठा। रिसीवर नीचे रखकर उसने सिगरेट सुलगा कर कश लिया और पुनः रिसीवर उठाकर बोला।
“लड़कियों का मामला मेरी समझ में नहीं आया डिसूजा।”
“विशाल सिंह, नेताओं को खुश करने के लिए लड़कियों का इस्तेमाल करता है और इसी तरह अक्सर हर छ: महीने में लड़कियों को कहीं से उठा लाता है और नेताओं के सामने पेश कर देता है।”
“लड़कियां फैक्ट्री में कहां हैं। मालूम है?”
“हां। बेसमेंट में कमरा है। सबको उसी कमरे में कैद रखा हुआ है।”
“हूं, आगे?”
“विशाल सिंह महारानी बाग के बंगले में अपने परिवार के साथ रहता है। बंगले पर सख्त पहरा रहता है। उसके दो लड़के हैं। एक तो अमेरिका में रहता है और दूसरा कसौली के पास हॉस्टल में पढ़ता है। इसके अलावा विशाल सिंह ने पीतमपुरा के फ्लैट में एक लड़की रखी हुई है। सप्ताह में एक-दो बार वो, उस लड़की के पास जाता है।”
“अब मालूम है वो उस लड़की के पास कब जाएगा?”
“ये नहीं मालूम। शायद मालूम हो भी न सके।”
पारसनाथ ने सोचों में डूबे कश लिया।
“डिसूजा।”
“जी।”
“तुम्हारा क्या ख्याल है। विशाल सिंह पर कैसे हाथ डाला जा सकता है?” पारसनाथ का स्वर सख्त था।
कुछ खामोशी के बाद डिसूजा बोला।
“मेरे ख्याल में विशाल सिंह की हरकतों पर दूर से नजर रखनी चाहिए। पूरी तैयारी के साथ। ऐसे में जब भी मौका मिले। उस पर हाथ डाल देना चाहिए। उसका कोई प्रोग्राम फिक्स तो नहीं जो...आज विशाल सिंह की सत्य प्रकाश के साथ मुलाकात होनी है। विशाल सिंह, सत्य प्रकाश से मिलने उसके पास जाएगा।”
“सत्य प्रकाश-मोती नगर वाला?”
“हां। वो ही जो...।”
“विशाल सिंह क्यों जा रहा है, सत्य प्रकाश के पास?” पारसनाथ की आंखें सिकुड़ गई थी।
“सत्य प्रकाश ने विशाल सिंह की तीस करोड़ की स्मैक लूट ली। बाद में सत्य प्रकाश को पता चला कि वो माल विशाल सिंह का है। लेकिन तीस करोड़ के माल को वापस देने पर सत्य प्रकाश राजी नहीं हुआ। दोनों में बहुत हद तक ठन गई। इसी सिलसिले में दोनों की मीटिंग है आज। कहीं दूसरी जगह मिलने की अपेक्षा सत्य प्रकाश ने उसे अपनी जगह बुलाया है। सिर्फ एक आदमी के साथ रहने की छूट है।”
पारसनाथ गम्भीर नजर आने लगा।
“मीटिंग का वक्त क्या है?”
“मालूम नहीं।”
“खबर पक्की है कि दोनों मिल रहे हैं। मोती नगर में।”
“पक्की खबर है। बाद में उनका प्रोग्राम बदल जाए तो मेरी जिम्मेवारी नहीं।”
पारसनाथ ने कश लिया और हाथ अपने खुरदरे चेहरे पर फेरने लगा।
“डिसूजा। तू मेरे पास आ-जा।”
“जी।”
पारसनाथ ने रिसीवर रखा और सिगरेट समाप्त होने तक सोच में डूबा रहा। फिर सिगरेट को ऐश-ट्रे में डालकर रिसीवर उठाया। उस्मान भाई का नम्बर मिलाया। वो नींद में था। पांच मिनट बाद बात हुई।
“इतनी सुबह-सुबह?” उस्मान भाई का नींद से भरा स्वर पारसनाथ के कानों में पड़ा –“मेरे आदमी विशाल सिंह के बारे में ही पता लगा रहे हैं। काम की बात मालूम होते ही।”
“मेरी सुन।”
“हां।”
“दिल्ली-यू.पी. बार्डर पर धागा बनाने वाली फैक्ट्री है। पता नोट कर।”
“करना क्या है?
“उस फैक्ट्री के बेसमेंट के कमरे में नौ लड़कियां कैद हैं। उन्हें वहां से निकाल कर सुरक्षित भगा देना या फिर समझाकर किसी थाने के सामने छोड़ देना। तैयार होकर जाना। उधर पंगा भी हो सकता है।”
कुछ खामोशी के बाद उस्मान भाई की आवाज आई।
“मामला क्या है?” इस बार उसका स्वर सतर्क था।
“लड़कियां वहां कैद हैं। उन्हें वहां से निकालना है। सब शरीफ हैं। न निकाला तो बरबाद हो जाएंगी।”
“समझा। वो फैक्ट्री किसकी है?”
“विशाल सिंह की।”
“हूँ।”
“काम होगा?”
“क्यों नहीं होगा। पारसनाथ, तेरे को किसी काम का मना नहीं है। ये काम करके मैं तेरे को फोन कर दूंगा।”
“अभी सुबह है। बेहतर है अभी उधर रवाना हो जा। सुबह-सुबह...”
“मैं उधर नहीं जाऊंगा। विशाल सिंह का कोई आदमी मेरे को पहचान लेगा। इस काम के लिए मेरे आदमी ही बहुत हैं। उन्हें अभी उधर भिजवा देता हूं।” उस्मान भाई का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा।
“काम होना चाहिए। जैसे भी करो। काम पूरा करके मुझे फोन मारना।” कहने के साथ ही पारसनाथ ने रिसीवर रख दिया। उसका खुरदरा चेहरा कठोर हुआ पड़ा था।
कुछ देर पारसनाथ सोचों में रहा फिर रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगा।
“हैलो।” बेल होने के पश्चात आवाज कानों में पड़ी।
“सत्य प्रकाश से बात कराओ।” पारसनाथ ने शांत स्वर में कहा।
“कौन हो तुम?”
“पारसनाथ।”
“कौन पारसनाथ?”
“सत्य प्रकाश को बता दो। वो जानता है कौन हूँ मैं।”
“अभी कुछ नहीं हो सकता।” उधर से लापरवाही भरे स्वर में कहा गया।
“क्यों?”
“वो इधर फोन के पास नेई रहता। कहीं और होता है। दस बजे वो सोकर उठता है। उसके बाद ही उससे।”
“मुझे मालूम है वो दस बजे सोकर उठता है। मैं बारह बजे उठता हूं लेकिन आज मुझे भी उठना पड़ा। काम के हिसाब से उठना-सोना लगा रहता है। समझा क्या।” पारसनाथ का स्वर कठोर हो गया –“बात करा उससे मेरी।”
“दस से पहले नेई।”
“अभी बात करा।” पारसनाथ की आवाज हद से ज्यादा कठोर हो गई –“नींद से उठा उसे। मेरा नाम सुनकर तेरे को कुछ नहीं कहेगा। मेरे से बात करेगा वो। उठा उसे।”
कुछ खामोशी के बाद सोच भरी आवाज आई।
“जरूरी काम है?”
“हां।”
“तेरा नम्बर है उसके पास?”
“हां।”
“तू फोन बंद कर। मैं उसे फोन पर तेरे बारे में बताता हूं। उसने तेरे से बात करनी होगी तो वो तेरे को फोन करेगा। नेई फोन आया तो समझना, वो तेरे से बात नेई करना चाहता।”
“उसे बोल मैं, फोन के पास बैठा हूं।” पारसनाथ ने कहा और रिसीवर रख दिया। इन्टरकॉम पर उसने नीचे चाय के लिए कहा और बेड से उतरकर कुर्सी पर जा बैठा। चेहरे पर सोच और गम्भीरता नजर आ रही थी।
पांच मिनट भी न बीते होंगे कि फोन की बेल बजी।
पारसनाथ के होंठ भिंच गए। कुर्सी से उठकर उसने रिसीवर उठाया।
“हैलो।”
“पारसनाथ।”
दूसरी तरफ सत्य प्रकाश था। नींद से अभी उठे होने की वजह से उसकी आवाज भारी हो रही थी।
“नींद से उठा दिया तेरे को।” पारसनाथ शांत स्वर में बोला।
“तूने ही तो उठाया। दूसरे ने तो नहीं।” सत्य प्रकाश की आवाज में हंसी थी –“बहुत देर बाद तेरी आवाज सुनी। अच्छा लग रहा है। ये बता कैसा है तू? तेरा रेस्टोरेंट का धंधा बढ़िया चल रहा है?”
“हां। बढ़िया।”
याद है तेरे को पहले के दिन। बीस-पच्चीस साल पहले हम इकट्ठे ही काम किया करते थे। तब हम दोनों ही इस धंधे में नए-नए आए थे।” सत्य प्रकाश मुस्कराते हुए कह रहा था –“वो बात मुझे कभी नहीं भूलती कि जब बोतल के लिए पैसे नहीं थे। राह चलते एक आदमी को पकड़कर, चाकू उसकी गर्दन पर रख दिया
“तो...”
“वो इतना डर गया कि उसका पेशाब निकल गया।” पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा।
“हां-हां, याद है तेरे को। तब हम बहुत हंसे थे। इतना हंसे कि जब होश आया तो देखा वो भाग गया था। खैर, छोड़ तू बता, आज सुबह-सुबह मेरी याद कैसे आ गई। मालूम है मेरे कू, बिना काम के फोन नेई मारेगा!”
“तेरा बताया फोन नम्बर कहीं और है और रात दूसरी जगह बिताता है।” पारसनाथ बोला।
“करना पड़ता है ऐसा। मालूम नेई कब कौन गला दबा जाए। तू बोल...”
“तेरे से मिलना है। अपना पता बता।”
पलों की चुप्पी के बाद सत्य प्रकाश का गम्भीर स्वर उसके कानों में पड़ा।
“काम है?”
“हां।”
“इधर के बारे में कोई नहीं जानता पारसनाथ। मैं...”
“मेरे बाद भी कोई नहीं जानेगा कि...”
“समझ गया। समझ गया। पता सुन...।”
पता सुनने के बाद पारसनाथ ने कहा कि वो पहुंच रहा है।
☐☐☐
सत्य प्रकाश, पारसनाथ की ही उम्र का छोटे कद का सख्त सा दिखने वाला व्यक्ति था। सिर पर छोटे-छोटे बाल। होंठों पर मूंछे। अक्सर वो सफेद, खादी के कुर्ते-पायजामे में ही देखा जाता था। पांवों में लैदर की चप्पल ही पहनी होती थी। लेकिन दहशत का दूसरा नाम था सत्य प्रकाश। पुलिस जानती थी कि वो क्या काम करता है। उसके सब काम खुले हुए थे। परन्तु
पुराना पापी था वो। सबको सेट कर रखा था। हफ्ता-महीना सब कुछ पुलिस वालों के पास वक्त पर पहुंचता था। सत्य प्रकाश की खास आदत थी कि वो अपने दुश्मनों को भी पुलिस के हाथों ही साफ कराता था। ऐसे कामों के लिए वो पुलिस को ढेर सारा पैसा देता था।
कुल मिलाकर सत्य प्रकाश के गैर कानूनी कामों की गाड़ी बढ़िया ढंग से दौड़ रही थी।
इस वक्त वो दो कमरों के छोटे से फ्लैट में मौजूद था। साधारण-सी कालोनी में वो साधारण-सा फ्लैट था। अंधेरा होने के बाद ही इधर आता था। कोई सोच भी नहीं सकता था कि सत्य प्रकाश जैसा नामी, गैर कानूनी, खतरनाक बंदा यहां मौजूद है।
पारसनाथ, इस वक्त सत्य प्रकाश के सामने कुर्सी पर बैठा था। सत्य प्रकाश बेड पर अधलेटा सा था। कमरे में सिगरेट की स्मैल फैली हुई थी।
“तेरे को सामने पाकर बहुत खुशी हो रही है।” सत्य प्रकाश बोला।
पारसनाथ ने उसे देखा। सिर्फ सिर हिला दिया।
सत्य प्रकाश गम्भीर हो गया।
“बता पारसनाथ। क्या बात है?”
“विशाल सिंह से मिलना है आज तेरे को?” पारसनाथ गम्भीर था।
सत्य प्रकाश चौंका। आंखें सिकुड़ी। पारसनाथ को देखते हुए होंठ सिकुड़ गए।
“तेरे को कौन बोला कि...।”
“बेकार की बातें मत पूछा कर, क्यों मिलना है तेरे को?”
सत्य प्रकाश कुछ संभला-संभला सा दिखा।
“कोई दूसरा होता तो नेई बताता। तेरे को बता रहा हूं। मेरे आदमियों ने वो कार रोक ली। जिसमें तीस करोड़ की स्मैक मौजूद थी। ये तो बाद में पता चला कि माल विशाल सिंह का है। अब वो माल वापस मांगता है। तीस करोड़ का माल इस तरह तो वापस दिया नहीं जाता। मेरे को विशाल सिंह से रिश्ता तो तय नहीं करना।
वो बड़ा है तो होगा। मैं भी इतना छोटा नहीं कि वो मुझे दबा जाए। तीस करोड़ की स्मैक की आज सौदेबाजी है। इस तरह कि हममें दुश्मनी न रहे। दोनों का काम भी बन जाए। आज वो मेरे से बात करेगा। मुझे अपने ठिकाने पर बुला रहा था कि मैंने बोला वो मेरे पास आए। एक ही बार में वो इस तरह मान गया कि जैसे मेरा पुराना यार हो।” सत्य प्रकाश ने ठिठक कर पारसनाथ को घूरा –“क्या मामला है तेरा। तेरा इन बातों से क्या मतलब?”
पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई।
“विशाल सिंह की जरूरत है मेरे को।”
सत्य प्रकाश की आंखें सिकुड़ी।
“विशाल सिंह की जरूरत-क्यों मारेगा उसे?”
“नहीं। किसी को उसकी जरूरत है।” पारसनाथ ने सर्द स्वर में कहा।
दोनों एक-दूसरे की आंखों में देखने लगे।
“साफ बता। बात क्या है?”
“तेरे पे विश्वास है, इसलिए बता रहा हूं।”
“भरोसा रख। सत्य प्रकाश कम से कम तेरे को तो धोखा नहीं देगा। बोल...।”
“मोना चौधरी को जानता...।”
“मालूम है, वो तेरी खास पहचान वाली है। क्या हुआ?”
“विशाल सिंह ने मोना चौधरी से पंगा लिया है।” पारसनाथ सपाट-कठोर स्वर में बोला।
“क्या?” सत्य प्रकाश की आंखें सिकुड़ी –“कैसा पंगा लिया?”
“ज्यादा क्यों पूछता है।”
सत्य प्रकाश ने सिर हिलाया।
“नेई पूछता। लेकिन मामला समझ गया...बोल मैं क्या करूं?”
“विशाल सिंह तेरे से मिलने आएगा। मेरे पास खबर है, वो तेरे पास अपने एक ही साथी के साथ आएगा। उसे मेरे हवाले कर दे।” पारसनाथ के स्वर में खतरनाक भाव आ गए।
“नेई।” सत्य प्रकाश ने सिर हिलाया –“ये नेई हो सकता। विशाल सिंह खतरनाक आदमी है। वो अपने पूरे कुनबे को बताकर आएगा कि, वो मेरे पास है और उसके आदमी गड़बड़ के मौके के लिए तैयार बैठे होंगे। इधर विशाल सिंह को कुछ हुआ, उधर उसके आदमियों ने मेरा सब कुछ उजाड़ देना है। इसमें मैं तेरे काम नहीं आ सकूँगा।”
“मेरे को विशाल सिंह की जरूरत है सत्य प्रकाश।”
“होगी। लेकिन मैं अपने को उजाड़ कर तो विशाल सिंह तेरे हवाले नहीं कर सकता।” सत्य प्रकाश इन्कार में गर्दन हिलाता हुआ कह उठा –“मजबूर हूं मैं। कोई और काम हो तो बता।”
पारसनाथ ने उसे घूरा।
“ऐसे मत देख। खाएगा मुझे क्या?” सत्य प्रकाश अपने मुंह पर हाथ फेरने लगा।
पारसनाथ ने रिवॉल्वर निकाल ली।
सत्य प्रकाश की आंखें सिकुड़ी। उसने रिवॉल्वर को घूरा। पारसनाथ को घूरा।
“रिवॉल्वर दिखाता है मुझे?”
पारसनाथ रिवॉल्वर थामे उसे देखता रहा। फिर बोला।
“आज भी आदत वो ही है मेरी।” पारसनाथ ने सर्द स्वर में कहा –“रिवॉल्वर मैं कभी भी दिखाने के लिए नहीं निकालता। समझा तू...।”
“तो तू मेरे को गोली मारेगा। मेरे को।”
“विशाल सिंह मेरे हाथ न लगा तो कुछ भी हो सकता है।”
पारसनाथ की आवाज में ऐसे भाव थे कि सत्य प्रकाश ने आंखें बंद कर ली। रिवॉल्वर हाथ में दबाए, पारसनाथ कठोर नजरों से सत्य प्रकाश को देखे जा रहा था।
सत्य प्रकाश ने आंखें खोली।
“ये मत समझना, मैं तेरे से डर गया हूं। पुराना प्यार है अपने में। मेरे को ये भी पता है कि तू मेरे को गोली तो क्या-उंगली भी नहीं लगाएगा। रिवॉल्वर जेब में रख।” कहने के पश्चात सत्य प्रकाश ने सिगरेट सुलगाई और कश लिया। वो गम्भीर-सी सोचों में लग रहा था।
पारसनाथ ने रिवॉल्वर वापस जेब में रखी।
कुछ देर बाद कश लेकर वो कह उठा।
“पारसनाथ। विशाल सिंह, हरामी बंदा है। मैं ये तो मान नहीं सकता कि मेरे कहने पर वो सिर्फ एक साथी को ही लेकर मेरे मोती नगर वाले ठिकाने पर आएगा।” सत्य प्रकाश ने पारसनाथ की आंखों में देखा –“साढ़े तीन बजे वो मेरे मोती नगर वाले ठिकाने पर आएगा। आधा-पौन घंटा लगेगा बात में। फिर वो वापस जाएगा।”
पारसनाथ उसे देखता रहा।
“जब वो वापस जाए तो रास्ते में उस पर हाथ डालना। तब उसकी कार के आसपास उसके आदमी कहीं पर अवश्य होंगे। वो सब देख लेंगे कि इस मामले में मेरा हाथ नहीं है। उसे घेरने वाले दूसरे लोग ही हैं।”
पारसनाथ ने सिगरेट सुलगा ली।
“तब भी बात तेरे पे आ सकती है कि तूने विशाल सिंह पर हाथ डाला।” पारसनाथ एक-एक शब्द पर जोर देकर कह उठा –“उसके आदमी यही सोचेंगे कि पक्का कोई झगड़े वाली बात हो गई होगी। मेरा मतलब है कि तब तू खुद को बचा नहीं सकेगा। तेरी बात कोई नहीं सुनेगा।”
सत्य प्रकाश ने पहलू बदला।
“बात तो तेरी ठीक है। ऐसा भी हो सकता है। पक्का हो सकता है कि विशाल सिंह के आदमी, मेरे पे गुस्सा उतारें।”
पारसनाथ ने कश लिया।
“कुछ और करना पड़ेगा।” सत्य प्रकाश ने सिर हिलाया।
“तेरे को पता है विशाल सिंह किस रास्ते से तेरे पास आएगा?”
“नहीं पता।”
“पता कर सकता है?”
सत्य प्रकाश दो पल की सोच के बाद बोला।
“क्या चाहता है तू?”
“जब वो तेरे पास मिलने के लिए आ रहा होगा। तब उस पर हाथ डाला जाएगा। मेरा काम भी हो जाएगा और तेरे पर भी कोई उंगली नहीं उठाएगा।” पारसनाथ के स्वर में कोई भाव नहीं था।
“ठीक बोला। लेकिन विशाल सिंह किस रास्ते से आ रहा है, ये जानने के बाद तेरे को बीस-पच्चीस मिनट ही मिलेंगे। तीन रास्तों की तरफ से वो मेरे पास आएगा। मैं उससे पहले ही पता कर लूंगा कि वो किस रास्ते से मेरी तरफ आ रहा है। तब तू उस पर हाथ डाल सकता...।”
“तू कैसे पता करेगा कि वो किस रास्ते आ रहा...।”
“मेरे एक आदमी का सगा भाई, विशाल सिंह के उधर काम करता है। ये मामूली खबर तो वो दे देगा।”
“पता करवा उससे।”
“साढ़े तीन बजे विशाल सिंह ने मेरे पास आना है। अभी तो सुबह है। बारह-एक तक ही खबर मिल पाएगी कि वो किस रास्ते से मेरे पास पहुंच रहा है। किस रंग वाली कौन-सी कार पर आ रहा है।”
“मैं अपने आदमियों के साथ विशाल सिंह पर हाथ डालने के लिए तैयार रहूंगा। मोती नगर के ऐसे प्वाईंट पर रहूंगा कि, तेरे से खबर मिलते ही उस तरफ चल पडूं। तू मुझे मोबाइल फोन पर खबर करना।” कश लेते हुए पारसनाथ ने सत्य प्रकाश की आंखों में देखा।
“नम्बर बता।”
पारसनाथ ने नम्बर बताया।
“ठीक है। मैं खबर करूंगा। लेकिन किसी को मालूम नेई हो कि मैं तेरे को खबर कर रहा हूं। बात खुलेगी तो मैं ही फंसूंगा। इस बात का ध्यान रखना तू।”
पारसनाथ ने सिर हिला दिया।
“विशाल सिंह के खिलाफ काम करना खतरनाक है। एक बात तो पता होगी तेरे को?”
पारसनाथ ने सत्य प्रकाश को देखा।
“मोना चौधरी उसका क्या करेगी? कोई बात करनी है या उसके सिर में गोली मारनी है?”
“मालूम नहीं।”
“मालूम भी होगा तो बताएगा थोड़े ना।” सत्य प्रकाश मुस्करा पड़ा –“मेरा तो एक ही मतलब था कहने का कि अगर मोना चौधरी विशाल सिंह को शूट कर दे तो मैं निश्चिंत होकर तीस करोड़ की स्मैक का मालिक बन जाऊंगा।”
सत्य प्रकाश ने स्पष्ट कह दिया था कि विशाल सिंह को मार दिया जाए तो बढ़िया रहेगा।
“मेरे को नहीं पता कि इस बारे में मोना चौधरी के दिमाग में क्या है। वो, उसका क्या करती है।”
“फिर भी तू मोना चौधरी को मेरी बात के बारे में सलाह देना।”
“बोलूंगा। तूने अभी तक अपने उस आदमी को फोन नहीं किया। जिसका भाई विशाल सिंह के यहां काम करता है।”
“भूल गया।” उसने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया –“अभी बात करता हूं उससे।”
सत्य प्रकाश ने फोन मिलाया। उधर बेल होने के बाद किसी औरत ने रिसीवर उठाया।
“हैलो?”
“भाभी नमस्कार। सत्य बोलता हूं।”
“नमस्कार भाई साहब।”
“वो हरामी अब तो तेरे को तंग नहीं करता?”
“नहीं भैया। जब से आपने समझाया है। उसके बाद मेरे को तंग नहीं...।”
“ठीक है। ठीक है। बच्चे कैसे हैं?”
“अच्छे हैं।”
“नींद में है वो?”
“हां। उठाती हूं भैया।”
कुछ पलों बाद मर्द की नींद भरी आवाज कानों में पड़ी।
“सलाम भाई।”
“सुन।” सत्य प्रकाश धीमे स्वर में बोला –“वो तेरा भाई किधर है?”
“उधर ही है, विशाल सिंह के...।”
“उसे एक काम बोल-बोलेगा?”
“हां।”
“आज विशाल सिंह मेरे को मिलने, मोती नगर वाले ठिकाने पर आएगा। वो किस रास्ते से आएगा। ये मेरे को वक्त से पहले पता चलना चाहिए। ऐसा न हो कि वो मेरे सिर पर पहुंच जाए। तब तू मेरे को बताए।”
“समझ गया। मैं अभी अपने भाई से बात करता...।”
“अपने भाई को काम करने को बोलना। पक्का करना उसे। कब बताएगा तू मेरे को?”
“जल्दी बताऊंगा।”
“मैं इन्तजार में है। फोन मारना मेरे को।” कहकर सत्य प्रकाश ने रिसीवर रखा और पारसनाथ से कहा –“तू जाकर तैयारी कर। अपने आदमी फिट कर ले। मैं तेरे को कभी भी विशाल सिंह की खबर दे दूंगा।”
पारसनाथ उठा।
“इधर ब्रेकफास्ट देने वाला कोई नहीं है।” सत्य प्रकाश मुस्कराया –“नेई तो बैठकर ब्रेकफास्ट करते। बहुत देर बाद मिले हैं, कभी डिनर साथ में करेंगे पारसनाथ।”
“मैं तेरे फोन का इन्तजार करूंगा।”
“करना। तेरे मोबाइल का नम्बर मारूंगा।”
☐☐☐
दोपहर के ढाई बजे थे।
वो नई होन्डा सिटी कार सड़क पर सामान्य स्पीड में दौड़ी जा रही थी। उसके शीशों पर काली फिल्म चढ़ी हुई थी। भीतर कौन बैठा है। क्या कर रहा है। जान पाना संभव नहीं था।
वो कार एक चौराहे से निकली तो स्टैंड लगी मोटर साइकिल के करीब खड़े डिसूजा ने कार का रंग और नम्बर देखा फिर मोबाइल फोन पर बात की।
“वो कार अभी-अभी मेरे पास से निकली है।”
“ठीक है। तुम फासला रखकर कार के पीछे आओ। नजर रखना कि अन्य कौन-सा वाहन होंडा सिटी कार को कवर कर रहा है। तुम्हें पीछे ही रहना है। जहां कार पर, हाथ डाला जाएगा। वहां तुम्हें हरकत में आना है। तब कोई बीच में आए। विशाल सिंह को बचाना चाहे तो उनका निशाना लेना है। तब इस काम के लिए वहां और भी आदमी होंगे। इस बात का ध्यान रखना कि गोली विशाल सिंह को न लगे।” पारसनाथ का सपाट-कठोर स्वर कानों में पड़ा।
“जी।” कहने के साथ ही उसने फोन बंद करके जेब में रखा और मोटर साइकिल स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी। दूर कार जाती नजर आ रही थी।
☐☐☐
वो होंडा सिटी कार ज्यों ही एक मोड़ से मुड़ी तो उसे चलाने वाले ने उसी पल सामने से आती कार से खुद को बचाना चाहा। वो रॉंग साइड से आ रही थी। परन्तु बचाव न हो सका और बचाते-बचाते भी होंडा सिटी कार की साइड उस कार से जा टकराई। तेज आवाज हुई। दोनों कार छिटक कर अलग-अलग दिशाओं में जाकर रुक गई। उस वक्त करीब ही अन्य कोई वाहन नहीं था। वरना वो भी टकरा जाने थे।
दूर से पास पहुंचते वाहनों को ब्रेक लगने लगी। लोग इकट्ठे होने लगे।
होंडा सिटी की कार की पीछे वाली सीट पर विशाल सिंह बैठा था। कारों की टक्कर से उसे बुरी तरह झटका लगा। वो संभला। आगे ड्राइवर के साथ एक और व्यक्ति बैठा था। एक्सीडेंट के बाद कार ड्राइव करने वाले ने गुस्से से बाहर निकलना चाहा कि विशाल सिंह बोला।
“बैठे रहो। कार को सीधा करो और चलो। हमारे पास वक्त कम है।”
“लेकिन उस कार वाले की गलती।” ड्राइवर ने कहना चाहा।
“हमें इस मामले में नहीं पड़ना। चलो यहां से।” विशाल सिंह की शांत आवाज में आदेश के भाव थे।
ड्राइवर ने अपने गुस्से पर काबू पाया और वहां से जाने के लिए कार स्टार्ट की। कार स्टार्ट होते पाकर, वहां इकट्ठी भीड़ में से तीन-चार व्यक्ति चिल्लाकर कार की तरफ दौड़े।
“ओए-जाता कहां है।”
“भाग रहा है।”
“कैसे जाएगा।”
देखते ही देखते उन लोगों ने कार को घेर लिया।
ये देखकर अन्य लोग भी कार के पास आ पहुंचे थे।
तभी कार का ड्राइवर गुस्से से बाहर निकला। इससे पहले कि वो कुछ कहता, दो व्यक्ति चिल्लाते हुए उस पर टूट पड़े कि एक्सीडेंट करके भाग रहा था। देखा-देखी मार-पीट में और लोग भी आ गए। तभी उसकी बगल में बैठा व्यक्ति, ड्राइवर को बचाने के लिए बाहर निकला कि लोग उस पर भी झपट पड़े। नए वाले लोगों को पता चलता कि एक्सीडेंट करके भाग रहे थे तो वो भी दो-चार ठोक देते।
मिनट भर में ही उनकी बुरी हालत होने लगी।
लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी।
पीछे वाली सीट पर बैठा विशाल सिंह ये सब देखकर सुलग उठा। काले शीशे होने की वजह से, अभी बाहर के लोग नहीं देख पाए थे कि पीछे वाली सीट पर कोई है। विशाल सिंह ने गुस्से से भरे, बाहर निकलने के लिए, दरवाजे की तरफ हाथ बढ़ाया कि तभी दरवाजा खुला। वो ठिठक गया।
तीस बरस का डिसूजा दरवाजा खोले भीतर झांक रहा था।
दोनों की नजरें मिली।
“विशाल सिंह।” डिसूजा एकाएक दरिन्दगी भरे स्वर में कह उठा –“ये सब तुम्हारे लिए हुआ है। यहां भीड़ इकट्ठी हो चुकी है। ऐसे में गोली भी चल सकती है।” कहने के साथ ही उसने पैंट में फंसी रिवॉल्वर दिखाई।
रिवॉल्वर की झलक पाते ही विशाल सिंह की आंखें सिकुड़ी।
“क्या चाहता है?”
“बाहर आ। मेरे साथ चल। सवाल नहीं करना।”
विशाल सिंह कहर भरी नजरों से उसे देखता रहा।
“मेरे पास, तेरा सड़ा हुआ चेहरा देखने का वक्त नहीं है।” डिसूजा खतरनाक स्वर में कह उठा –“मैंने पहले ही कहा है कि इस तरह की भीड़ में गोली भी चल जाती है।” कहने के साथ उसने पैंट में फंसी रिवॉल्वर पर हाथ रखा –“बोल चलता है या...।”
“कौन हो तुम?”
“लगता है तू गोली ही खाएगा।” दांत भींचकर डिसूजा ने रिवॉल्वर निकालनी चाही।
“बाहर आ रहा हूं।” दांत भींचे ही विशाल सिंह ने जवाब दिया –“लेकिन ये सब करके तू जिन्दगी की आखिरी गलती कर रहा है। मेरा नाम तू अवश्य जानता है। लेकिन ठीक से मुझे नहीं जानता। मैं...”
“जानने के लिए ही तो तेरे को ले जाने आया हूं साले।” डिसूजा ने जहर बुझे स्वर में कहा।
विशाल सिंह कार से बाहर निकला।
भीड़ थी। डिसूजा ने विशाल सिंह की कलाई पकड़ी और खींचते हुए उसे भीड़ से बाहर ले गया।
“वो देख।” युवक ने विशाल सिंह से कहा –“उधर नीली कार नजर आ रही है।”
कुछ आगे सड़क किनारे नीली कार खड़ी थी।
कार पर निगाह मारकर विशाल सिंह ने खा जाने वाली निगाहों से डिसूजा को देखा।
“उस कार में जाकर बैठ जा। मैं तेरे पीछे हूं। जब मुझे लगेगा कि तू मेरा कहना नहीं मान रहा तो, तेरे को गोली मार दूंगा। मेरा निशाना बहुत अच्छा है।”
विशाल सिंह ने बेबसी से भरी, कहर भरी निगाहों से डिसूजा को देखा।
“जाता है या...।”
“तू बचेगा ,नहीं।” विशाल सिंह ने गुर्राहट भरे स्वर में कहा और शांत कदमों से कार की तरफ बढ़ गया।
पीछे भीड़ के चीखने-चिल्लाने की आवाजें अभी भी आ रही थी।
विशाल सिंह कार के पास पहुंचा ही था कि पीछे वाली सीट का दरवाजा खोल दिया गया। विशाल सिंह थोड़ा-सा झुका। भीतर झांका। पीछे वाली सीट पर पारसनाथ बैठा था। नजरें मिलते ही पारसनाथ ने सीट को थपथपाकर शांत स्वर कहा।
“आओ।”
“कौन हो तुम?”
बाहर खड़े होकर ज्यादा सवाल पूछना ठीक नहीं। अन्दर आओ। बैठो। यहां से कदम पीछे मत लेना। वरना वो तुम्हें गोली मार देगा, जिसने तुम्हें इधर आने को मजबूर किया है।” पारसनाथ का स्वर सपाट था। भावहीन था। सख्त था।
विशाल सिंह कई पलों तक पारसनाथ को घूरता रहा, फिर भीतर बैठा। दरवाजा बंद किया।
“क्या चाहते हो?” विशाल सिंह के होंठों से दबी-दबी गुर्राहट निकली।
पारसनाथ ने कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति से कहा।
“चलो।”
उसने कार आगे बढ़ा दी।
विशाल सिंह खा जाने वाली नजरों से पारसनाथ को घूरे जा रहा था।
“कौन हो तुम?”
पारसनाथ ने जेब से रिवॉल्वर निकाली और विशाल सिंह की कमर से लगा दी। कार तेजी से दौड़ती जा रही थी सड़क पर, अन्य वाहनों के बीच।
“अपना रिवॉल्वर दो।”
फंसी वाले ढंग में रिवॉल्वर उसने पारसनाथ को दी। पारसनाथ ने अपनी और उसकी रिवॉल्वरें जेब में डाली और सिगरेट सुलगाकर कहा।
“शान्ति से बैठे रहना। कुछ करने की कोशिश की तो मरोगे।” आवाज में मौत के से भाव थे।
“तुम मेरी बातों का जवाब नहीं दे...।”
“आराम से बैठकर बात करेंगे।” पारसनाथ ने विशाल सिंह पर नजर मारी –“कुछ देर बाद जहां पहुंचेंगे। वहां बातें होगी। खामोश, रहना अब...।”
विशाल सिंह दांत भींचे मौत भरी नजरों से उसे देखता रहा। वो बेबस महसूस कर रहा था और ये भी समझ रहा था कि उस पर हाथ डालने वाला ये जो भी है, मामूली नहीं होगा और वजह भी कोई खास ही होगी, जिसके कारण उस पर हाथ डाला गया है।
☐☐☐
पारसनाथ, विशाल सिंह को रेस्टोरेंट के पीछे वाले हिस्से से ऊपर बने अपने घर में ले गया। विशाल सिंह से उसने कोई रास्ता नहीं छिपाया था। अपनी बेबस हालत पर विशाल सिंह का खून खौल रहा था।
दोनों ड्राईंग रूम में पहुंचे। एक आदमी वहां की झाड़-पोंछ कर रहा था। जो कि पारसनाथ के इशारे पर वहां से चला गया। पारसनाथ ने सिगरेट सुलगाई।
विशाल सिंह दांत भींचे उसे देखे जा रहा था।
“तुम्हें मुझसे डर नहीं लग रहा?” विशाल सिंह गुर्राया।
“डर?” पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा –“क्यों?”
“क्योंकि मैं जान गया हूं तुम कहां रहते हो। जब भी मैं यहां से निकला, तुम्हारी जान ले लूंगा।”
“बैठ जाओ।” पारसनाथ का स्वर भावहीन था –“थक जाओगे।”
विशाल सिंह ने उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और आगे बढ़कर सोफा चेयर पर धंस गया।
“विशाल सिंह का नाम सुनकर ही लोग डरने लगते हैं और तुम मेरी परवाह नहीं कर रहे, जबकि मैं तुम्हारे सामने बैठा हूं। इसका नतीजा बहुत खतरनाक होगा। तुम उस आग से खेल रहे हो जो अपने दुश्मन को छोड़ती नहीं।”
पारसनाथ ने कश लिया और सोफे पर आ बैठा।
“चाय-कॉफी लोगे?” पारसनाथ का स्वर भावहीन था।
“बकवास बंद करो। अपने बारे में बताओ कि...।”
तभी कदमों की आहट उनके कानों में पड़ी।
दोनों की गर्दनें घूमी।
आने वाला डिसूजा था।
डिसूजा को देखते ही विशाल सिंह का चेहरा सुलग उठा।
“तुम...तुम भी बच नहीं सकोगे।” विशाल सिंह दांत भींचकर बोला –“मैं...।”
“सबको मार दोगे तुम।” पारसनाथ के होंठों पर खतरनाक मुस्कान उभरी –“मुझे भी। इसे भी और...।”
“तुम लोगों को पछताने का भी मौका नहीं मिलेगा। मैं ऐसा...।”
“इसे चुप कराऊं।” डिसूजा का स्वर शांत था। परन्तु आवाज में खतरनाक भाव थे।
“जब ये मामला जानेगा तो चुप हो जाएगा। फिर तो बुलाने पर भी नहीं बोलेगा।” पारसनाथ ने सर्द आंखों से विशाल सिंह को देखा।
विशाल सिंह की आंखें सिकुड़ी।
“कौन हो तुम?” उसकी निगाह पारसनाथ पर जा टिकी थी।
“पारसनाथ।”
“पारसनाथ-कौन पारसनाथ?” विशाल सिंह उसी तेज लहजे में बोला।
“मोना चौधरी का साथी।”
विशाल सिंह चिहुंक-सा उठा। चेहरे पर से कई रंग आकर निकल गए। अपनी बिगड़ी हालत को फौरन सामान्य किया और पारसनाथ को देखने लगा।
“तुम ये तो कहने नहीं जा रहे कि मोना चौधरी को नहीं जानते?” पारसनाथ शांत स्वर में बोला।
“क्यों नहीं जानता। बहुत अच्छी तरह जानता हूं उसे। लेकिन तुम क्या चाहते हो?”
“मोना चौधरी को तुमने किसी काम पर भेजा था।”
“हां, वो...।”
“कहां भेजा था?”
“असम, वहां काम था। महाजन भी उसके साथ गया। विमान में उनकी सीटें बुक कराई थी मैंने।” कहने के साथ ही उसने गहरी सांस ली –“ये मुझे अब मालूम हुआ कि वो तुम्हारी दोस्त थी। जो भी हुआ, बहुत बुरा हुआ।”
“क्या बुरा हुआ?”
“विमान में कोई हादसा हो गया। आसमान में ही विमान टुकड़े-टुकड़े हो गया। कोई भी नहीं बचा।”
पारसनाथ कई पलों तक विशाल सिंह को देखता रहा।
“क्या हुआ था विमान में?”
“मुझे क्या मालूम-मैं तो यहां था।”
पारसनाथ ने उसकी आंखों में देखते हुए अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा।
“क्या देख रहे हो?”
“किसके कहने पर तुमने मोना चौधरी को असम भेजा। विमान में सीटें भी बुक करा दी थी।”
विशाल सिंह की आंखें सिकुड़ी।
पारसनाथ के खुरदरे चेहरे पर कठोरता आ गई थी।
डिसूजा सख्त नजरों से विशाल सिंह को देख रहा था।
“मैं नहीं समझा तुम क्या कह रहे...।”
“मैंने पूछा है तुमने किसके कहने पर मोना चौधरी को विमान में भेजा?” पारसनाथ अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा।
“क्या उलटी बातें कर रहे हो। मैं किसके कहने पर मोना चौधरी को भेजता। काम था। मोना चौधरी से मैंने बात की। वो तैयार हो गई। साथ में महाजन भी था। काम के पूरे पैसे उसने एडवांस में मांगे, मैंने दे दिए। लेकिन विमान में जाने क्या हुआ कि आसमान में फट गया और यात्रियों के साथ-साथ वो भी मारे गए। जब मालूम पड़ा तो बहुत दुख हुआ।”
पारसनाथ, विशाल सिंह को देखे जा रहा था।
विशाल सिंह गहरी सांस लेकर कह उठा।
“मोना चौधरी तो अब जिन्दा है नहीं कि, वो बता सके मैंने सच कहा है। क्या इसी बात के वास्ते तुमने मेरा अपहरण किया है।”
“हां।”
“ये बात तो तुम मेरे से वैसे भी कर सकते थे। मेरा अपहरण करने की क्या जरूरत...।”
“ठीक कहते हो। ये बातें तो मैं वैसे भी पूछ सकता था। लेकिन मैंने तुमसे पूछताछ नहीं करनी है।” कश लेने के बाद पारसनाथ ने अपने खुरदरे चेहरे पर हाथ फेरा और सर्द स्वर में कहा –“मोना चौधरी का फोन आया था।”
विशाल सिंह बुरी तरह चौंका। फिर धीरे-धीरे चेहरे का रंग बदलकर पीलेपन में आया।
“मोना चौधरी का फोन?”
“हां।” पारसनाथ ने उसी स्वर में कहा –“उसने मुझे कहा कि वो दिल्ली पहुंच रही है। तब तक मैं विशाल सिंह को पकड़कर उसके लिए तैयार रखूं। वो तुमसे बात करना चाहती है।”
कुछ पल तो विशाल सिंह के होंठों से बोल न फूटा।
“मोना चौधरी तो विमान हादसे में मर गई थी।” उसके होंठों से सूखा-सा स्वर निकला।
“बच गई है। इत्तेफाक ही रहा कि महाजन भी बच गया।” पारसनाथ उसे देख रहा था।
विशाल सिंह ने तुरन्त खुद को संभाला।
“ये तो खुशी की बात है कि मोना चौधरी बच गई। शुक्र है भगवान का। लेकिन मेरा अपहरण करने की क्या जरूरत पड़ गई। मोना चौधरी मुझसे बात करना चाहती है कर ले। मैं तो...।”
“ये तो मोना चौधरी ही जाने कि वो क्या बात करना चाहती है। उसने कहा मैं तुम्हें पकड़ कर रखूं। पकड़ लिया।” पारसनाथ ने कश लिया और सिगरेट ऐश-ट्रे में डाल दी –“बख्तावर सिंह का क्या हाल है विशाल सिंह।”
विशाल सिंह चौंका। फौरन ही संभल गया।
दोनों कई पलों तक एक-दूसरे की आंखों में देखते रहे। एकाएक पारसनाथ मुस्करा पड़ा।
क्या अब तुम ये पूछोगे कि बख्तावर सिंह कौन है । ये जाहिर करोगे कि तुम उसे नहीं जानते। या फिर...”
“तुम जानते हो बख्तावर सिंह को?”
“बहुत अच्छी तरह से।” पारसनाथ की आवाज बेहद कठोर हो गई –“उसका मेरे साथ कई बार टकराव हो चुका है। मैं उसे तुमसे अच्छी तरह जानता हूं।”
विशाल सिंह ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी, बेचैनी से पहलू बदला।
“पारसनाथ। बेकार की बातें छोड़ो। हमारी बातों के बीच बख्तावर सिंह की कोई जरूरत नहीं। हम दोनों अच्छे दोस्त बन सकते हैं। दोस्ती के नाम पर मैं तुम्हें करोड़ों के नोटों का तोहफा दूंगा। हम दोनों में अच्छी पटेगी। मुझे कैद में मत रखो। मोना चौधरी से मैं बात कर लूंगा। सब ठीक हो जाएगा। बख्तावर सिंह से मेरा अलग सम्बन्ध है और मोना चौधरी से अलग। वैसे भी तुम कोई बात स्पष्ट नहीं कर रहे।” विशाल सिंह ने मुस्कराने की चेष्टा की।
विशाल सिंह को देखते हुए, पारसनाथ ने कहा।
“ये बात तुमने ठीक कही कि मैं तुमसे स्पष्ट बात नहीं कर रहा हूँ। शायद इसलिए कि मैं इस मामले की स्पष्ट बातों को जानता नहीं हूँ। मोना चौधरी आ रही है। स्पष्ट बातें वो ही करेगी। बख्तावर सिंह का जिक्र मैंने तुमसे इसलिए किया कि मोना चौधरी के आने तक, तुम सोच-समझ लो कि उसने तुमसे क्या बात करनी है और तुमने क्या जवाब देना है। तब उसके पास इतना वक्त नहीं होगा कि तुम्हारे जवाब के इन्तजार में वो वक्त खराब करे।”
“पारसनाथ, तुम...”
“मोना चौधरी ने जब मेरे से फोन पर बात की तो वो बहुत गुस्से में थी।” पारसनाथ ने सपाट स्वर में कहा –“शायद तुम्हें गालियां भी दे रही हो मैं सुन नहीं पाया। लाइन में तब खराबी आ गई थी। क्या किया है तुमने?”
“म...मैंने...मैंने तो कुछ भी नहीं किया।”
“तो क्या मोना चौधरी तुम्हें लेकर यूं ही गुस्से में थी। तब तो मुझे लग रहा था कि अगर तुम उस वक्त उसके सामने होते तो वो तुम्हें शायद गोली भी मार देती। इस बात का चांस अब भी है कि वो तुम्हें देखते ही शूट कर दे। तुम और मोना चौधरी ही बेहतर जानते हैं कि मामला क्या है। लेकिन कुछ तो है ही। उधर मोना चौधरी बिगड़ी पड़ी है। इधर जब से तुमने मोना चौधरी के जिन्दा होने की खबर सुनी है। तब से तुम परेशान नजर आ रहे हो।”
“परेशान...नहीं तो...।” विशाल सिंह की आवाज सूख-सी रही थी।
“मुझे तो जो लग रहा है, वो ही तुम्हें बता रहा हूं। मोना चौधरी के आने तक तुम मेरी कैद में रहोगे। इस दौरान सोच लेना कि जब मोना चौधरी सामने पड़े तो उससे क्या बात करनी है। बख्तावर सिंह कहां है इस वक्त। हिन्दुस्तान में या पाकिस्तान में?”
“मु...मुझे क्या मालूम।” विशाल सिंह के होंठों से अजीब-सा स्वर निकला।
“डिसूजा।”
“जी।”
“इसके हाथ-पांव बांधकर, पीछे वाले कमरे में बंद कर दो और तुम चौबीसों घंटे इसके पास रहोगे। इस पर नजर रखोगे। ये गड़बड़ करने की कोशिश करे तो मार देना।”
“पारसनाथ तुम...” विशाल सिंह ने कहना चाहा।
परन्तु डिसूजा पास पहुंच गया और फिर उसे बोलने का मौका ही नहीं मिल पाया।
☐☐☐
जसबीर वालिया।
रात के ग्यारह बजे थे, जब उसकी धूल से अटी कार उस रेस्टोरेंट के पार्किंग में रुकी। रेस्टोरेंट का नियोन साईन बोर्ड रोशनी की लकीरों में चमक रहा था। वो रेस्टोरेंट चौड़ी गली में था। गली के दोनों तरफ सड़क निकलती थी। रोशनियां हर तरफ जगमगा रही थी। वाहनों का शोर भी कानों में पड़ रहा था।
गली में रह-रहकर पैदल भी लोग आ-जा रहे थे।
जहां जसबीर वालिया ने कार रोकी थी। उसके आगे खड़ी कार में बैठा जोड़ा स्पष्ट दिखाई दिया जो कि अपने ही काम में व्यस्त था। वालिया बाहर निकला। कार लॉक की और रेस्टोरेंट के भीतर प्रवेश कर गया। दरबान, वेटर, चपरासी, जो भी उसे देखता सतर्क होकर, सलाम मारने लगा। जहाँ बैठे लोगों से भी उसकी नजरें मिलती तो वो मुस्करा उठते। जसबीर वालिया सबकी मुस्कराहटों का जवाब देता आगे बढ़ता जा रहा था।
तभी काला सूट पहने तीस-बत्तीस बरस का व्यक्ति तेजी से उसकी तरफ बढ़ा।
“वालिया साहब...आप...।”
चलते-चलते वालिया ने हाथ से आगे की तरफ इशारा किया कि अभी बात नहीं। जो भी बात करेंगे। भीतर ही होगी। वो जसबीर वालिया के पीछे हो गया। सामने नजर आ रहे दरवाजे को खोलकर वालिया भीतर प्रवेश कर गया। काले सूट वाले ने भी भीतर प्रवेश किया और दरवाजा बंद कर लिया।
पल भर को ठिठककर जसबीर वालिया ने उस खूबसूरत ऑफिस जैसे केबिन में नजर मारी और आगे बढ़कर टेबल के पीछे मौजूद आरामदायक कुर्सी पर जा बैठा। कुर्सी पर बैठते ही उसके चेहरे पर मुस्कान उभरी।
“कैसे हो भास्कर?”
“अच्छा हूं वालिया साहब। आप तो तीन दिन के लिए गए और पन्द्रह दिन बाद वापस...।”
“मेरे पीछे से कोई मैसेज?”
“बहुत हैं।” कहने के साथ ही भास्कर ने जेब से डायरी निकाली और टेबल पर रखते हुए कहा –“आपके पीछे से आपके लिए जो मैसेज आए, वो इस डायरी में हैं।”
जसबीर वालिया ने डायरी पर नजर मारकर उसे देखा।
“सब काम ठीक से रहे?”
“सब बढ़िया-कोई परेशानी वाली बात नहीं हुई। रेस्टोरेंट के नाइट डांस के लिए रोजी नहीं आई दो दिन। ऐसे में एमरजेंसी के लिए सोली को बुला लिया। उसने रोजी की कमी दूर कर दी और...।”
“रेस्टोरेंट की बातें बाद में।” जसबीर वालिया ने जेब से कार की चाबी निकालकर टेबल पर फेंकी –“कार की पीछे वाली सीट पर सूटकेस पड़ा है। भारी है। किसी को साथ ले लेना। पीछे वाले रास्ते से उसे भीतर लाना। ज्यादा लोगों की नजर उस पर न पड़े। समझ गए या...?”
भास्कर ने मुस्कराकर कार की चाबियां उठा ली।
“आपके बिना कहे ही सब कुछ समझ चुका हूं। मैं अभी...।”
“राजू आया?” एकाएक वालिया ने पूछा।
“नहीं। राजू साहब तो आपके साथ ही गए थे।” भास्कर ने उसे देखा।
वालिया का चेहरा कुछ सख्त-सा हुआ।
“राजू का फोन भी नहीं आया?”
भास्कर ने इंकार में सिर हिलाया।
वालिया कुछ पलों तक उसे देखता रहा फिर बोला।
“सूटकेस लेकर आओ।”
“राजू की बीवी रचना दो बार अवश्य आई थी। राजू को पूछने के लिए।”
वालिया ने कुछ नहीं कहा।
भास्कर बाहर निकल गया।
जसबीर वालिया सच में परेशान था कि राजू की कोई खबर नहीं मिल रही। टंडन भी राजू के बारे में कुछ नहीं बता पाया। बख्तावर सिंह से बात नहीं हो पा रही और उसका भी कोई फोन नहीं आया कि पूछ सके, राजू को जंगल से निकाल कर कहां रखा है?
दस मिनट में ही रेस्टोरेंट के दो कर्मचारी सूटकेस केबिन में छोड़ गए। वालिया कुछ पलों तक सूटकेस को घूरता रहा फिर उठकर पास पहुंचा और उसका लॉक हटाकर सूटकेस खोला। वो हजार-हजार के नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरा पड़ा था। वालिया ने होंठ भींचकर सूटकेस बंद कर दिया। उसे दूसरे सूटकेस की याद आने लगी जो बख्तावर सिंह ने उसे नहीं दिया था और राजू की भी कोई खबर नहीं दी थी।
वापस आकर जसबीर वालिया कुर्सी पर बैठा। सोचों में डूबे उसने रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाया। कुछ देर बेल होने के बाद दूसरी तरफ से रिसीवर उठाया गया और युवती की मीठी आवाज कानों में पड़ी।
“हैलो।”
जसबीर वालिया के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।
“कैसी हो?”
पल भर की खामोशी के बाद युवती की चीख जैसी आवाज आई।
“जस...बी...ऽऽ...र...”
जसबीर वालिया हौले से हंस पड़ा।
“तुम...तुम कहां हो डियर?” स्वर में खुशी और उत्साह भरा हुआ था।
“यहीं-ग्लौरी में...।” जसबीर वालिया हौले से हंस पड़ा।
“ग्लौरी में-कब आए?”
“अभी। अभी आया और तुम्हें फोन किया।”
“सीधे घर क्यों नहीं आए। तुम तो...।”
“ग्लौरी रास्ते में था तो सोचा, घंटा भर यहां ठहर कर घर जाता हूं। मिनी जसबीर वालिया कैसा है?”
“शरारतें कर रहा है। अभी सो जाएगा। पापा-पापा करता रहता है। अब तुम आओ भी।”
“आया। घंटे भर में पहुंचा।”
“शादी से पहले तुम मर्द एक टांग पर खड़े होकर हमारा इन्तजार करते हो और शादी के बाद सारी उम्र औरत को इन्तजार कराते हो। मुझे पहले पता होता तो मैं शादी ही न करती।” युवती का शरारत से भरा स्वर कानों में पड़ा।
“मोनिका। माई लव।” जसबीर वालिया मुस्करा रहा था –“काम भी तो करना पड़ता है। तुम तो जानती हो कि डायमंड बिजनेस भी करता हूं। इसी वास्ते शहर से बाहर...।”
“ग्लौरी रेस्टोरेंट की कमाई बहुत है। तुम क्यों अपनी पत्नी और बच्चे से दूर...।”
“ओ.के., मैं घर पहुंच कर बात करता हूं। तुम तो फोन पर ही डांटने लगी।” जसबीर वालिया हंसा।
“जल्दी आना।” मोनिका की आवाज में शोखी आ गई।
“क्यों?”
“इतने दिनों बाद पत्नी के पास पहुंच रहे हो और पत्नी को पूछ रहे हो कि वो जल्दी आने को क्यों कह रही है।” मोनिका का प्यार भरा स्वर तीखा हो गया।
“हां...यही बात पूछ रहा...।”
“घर पहुँचो फिर ठीक करती हूं तुम्हें। तब तक बंटी सो चुका होगा और मैंने गाउन के नीचे कुछ भी नहीं पहना होगा। बेडरूम तुम्हारे लिए तैयार होगा। अपने पति के लिए और मैं भी तैयार होऊंगी।”
“तुम...तुम गाउन में तैयार होकर क्या करोगी?” जसबीर वालिया छेड़ने वाले स्वर में बोला।
“खाऊंगी तुम्हें। समझे क्या...जल्दी आओ। कितनी देर में पहुंच रहे हो। अब इन्तजार मत कराना।”
“एक-डेढ़ घंटे तक आ जाऊंगा।”
“इससे भी जल्दी आओ।”
“अभी पहुंचा हूं यहां। पन्द्रह मिनट तो भास्कर के साथ लगेंगे ही। उसके बाद चल दूंगा। बाय...।” इसके साथ ही जसबीर वालिया ने रिसीवर रख दिया।
अपनी पत्नी से बात करके और बेटे बंटी के बारे में सुनकर उसे सुकून मिला था। ये ही उसका छोटा-सा परिवार था। यहां से काफी दूर घर ले रखा था उसने। बहुत कम लोग जानते थे कि वो शादीशुदा है और उसका बेटा भी है। वो रेस्टोरेंट के बिजनेस से मोनिका को दूर रखता था। उसे रेस्टोरेंट में आने और उसकी गैर मौजूदगी में, उसे फोन करने की इजाजत नहीं थी। ऐसा उसने सावधानी वश कर रखा था कि, उसके ढेर सारे दुश्मनों में से किसी को उसकी पत्नी और बच्चे की खबर न लगे।
मोनिका को उसने यही कह रखा था कि वो डायमंड बिजनेस भी करता है और खरीदने-बेचने के लिए उसे शहर से बाहर जाना पड़ता है। मोनिका की निगाहों में जसबीर वालिया अच्छा इंसान था। ये बात वो अवश्य जानती थी कि रेस्टोरेंट की आड़ में जसबीर ड्रग्स का काम भी करता है। बहरहाल उसकी गृहस्थी ठीक चल रही थी। वो खुश थी। मस्त थी। कभी-कभार जसबीर वालिया शहर से बाहर जाता था, इसी तरह और वापस आ जाता था। चार साल पहले उसने जसबीर से ब्याह किया था। अब बंटी ढाई साल का था।
तभी भास्कर ने भीतर प्रवेश किया।
जसबीर वालिया की सोचें टूटी।
“सूटकेस पहुंच...।” उसकी निगाह सूटकेस पर पड़ी –“हां पहुंच गया। मैसेज डायरी देखी वालिया साहब।”
“थका हुआ हूं। कल देखूगा। डायरी टेबल पर ही रहने दो।” जसबीर वालिया ने कहा।
“बहुत बढ़िया।”
“कोई खास बात हो तो वैसे ही बता दो।”
“ऐसी तो कुछ खास नहीं। रेस्टोरेंट का कैश, कुछ बैंक में जमा हो रहा है तो कुछ मेरे पास। कहें तो अभी...।”
“सब कुछ कल। तुम्हारे पास जो कैश है, वो यहां पहुंचा देना। मैं लंच के बाद आऊंगा।” कहते हुए जसबीर वालिया की नजरें सूटकेस पर टिकी –“इसे पीछे, कमरे में रख दो।”
“जी।” भास्कर ने आगे बढ़कर सूटकेस को थामा। भारी होने की वजह से ठीक से उठा न सका। जैसे-तैसे उसे जसबीर वालिया की कुर्सी के पीछे तक लेकर आया और दीवार का एक हिस्सा अंगूठे से दबाया तो खामोशी से तीन फीट चौड़ी दीवार एक तरफ सरक गई।
उस दीवार को देखकर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वहां कोई रास्ता होगा। जबकि उस दीवार के पास जसबीर वालिया का प्राइवेट कमरा था।
भास्कर सूटकेस उस कमरे में रखकर वापस आया और दीवार के उसी हिस्से को दबाया तो वो रास्ता पुन: पहले की तरह बंद होकर दीवार नजर आने लगी।
“और बताइये वालिया साहब?” अपनी सांसों को ठीक करता भास्कर बोला –“बहुत भारी सूटकेस है।”
जसबीर वालिया मुस्करा कर कुछ कहने लगा कि फोन की बेल बजी।
“हैलो।” वालिया ने रिसीवर उठाया।
“सुखमय भरी वापसी मुबारक हो।” बख्तावर सिंह का शांत स्वर कानों में पड़ा।
जसबीर वालिया चौंका। फिर संभला। सामने खड़े भास्कर को इशारे से जाने को कहा तो वहां से भास्कर बाहर निकल गया।
उसके चेहरे पर सख्ती-सी आ गई थी।
“तो तुम्हें मालूम हो गया कि मैं ग्लौरी में आ पहुंचा हूं।”
“हां। किसी की ड्यूटी लगा रखी थी कि तुम जब ग्लौरी पहुंचो तो वो मुझे खबर कर दे।”
“ड्यूटी वाला आदमी भी मेरा ही होगा।” जसबीर वालिया ने शब्दों को चबाकर कहा।
“नहीं। अपने कामों में मैं अपने आदमी इस्तेमाल करता हूं। मेरे पास आदमियों की कमी नहीं है।” बख्तावर सिंह का शांत स्वर उसके कानों में पड़ रहा था –“टंडन को मारकर तुमने जल्दबाजी का और बेवकूफी का सबूत दिया।”
जसबीर वालिया का चेहरा कठोर हो गया।
“तुमने मुझे दो सूटकेस देने थे और...।”
“तुमने टंडन को इस मामले में क्यों खींचा। वो मेरा आदमी था और मेरे कहने पर पैसे लेना और देना उसका काम था।” बख्तावर सिंह की आवाज कानों में पड़ी –“तुम्हें मुझसे बात करनी चाहिए थी।”
“मैंने बात करने की कोशिश की, लेकिन सम्बन्ध नहीं बन...”
“दो-चार घंटे रुक कर दोबारा फोन कर लेते।”
“बख्तावर सिंह।” जसबीर वालिया कह उठा –“खामख्वाह मुझ पर हावी होने की चेष्टा मत करो। तुम्हारी जुबान दो सूटकेस देने की थी। लेकिन तुमने काम होने के बाद एक दिया। तुमने राजू को भी जंगल से निकालना था, लेकिन राजू की खबर मुझे कहीं से नहीं मिली। शायद तुमने उसे वहां से निकाला ही नहीं। अब तुम बेईमान होने लगे हो। हर तरह की हेराफेरी करने लगे...।”
“ये सब कहकर तुम फिर जल्दबाजी और बेवकूफी कर रहे हो।” बख्तावर सिंह का स्वर पहले जैसा ही रहा –“तुम्हें पूछना चाहिए कि दो का एक सूटकेस कैसे हो गया?”
जसबीर वालिया के दांत भिंच गए।
“पूछो।”
“दूसरा सूटकेस तुमने क्यों नहीं दिया?” जसबीर वालिया ने शब्दों को चबाकर पूछा।
“हां। ऐसे बात करते हैं।” बस्तावर सिंह की आवाज में पहली बार मुस्कराने के भाव आए –“हर चीज का तरीका होता है। टंडन मेरा कीमती आदमी था। तुमने खामख्वाह उसकी हत्या कर दी। फिर भी मैं गुस्से में नहीं आया। तुम्हारी तरह मेरी आदत होती तो अब तक मैं अपने आदमियों को कह चुका होता कि जसबीर वालिया को खत्म कर दो। वो तुम्हें गोली मार भी चुके होते। लेकिन मैं तुम्हारी तरह बेवकूफ नहीं हूं। टंडन तो तुम्हारी गलती की वजह से मर गया। लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि मेरी गलती से तुम मरो। तुम भी मेरे काम के आदमी हो।”
“दूसरा सूटकेस तुमने क्यों नहीं दिया?” जसबीर वालिया ने पहले की ही भांति शब्दों को चबाकर पूछा।
“दो सूटकेस, दो काम। हममें यही बात हुई थी?”
“हां।”
“एक काम हुआ। एक नहीं हुआ। जो हुआ, उसका सूटकेस तुम्हें मिल गया।”
“बकवास मत करो बख्तावर सिंह । तुम्हारे दोनों काम मैंने पूरे किए हैं। विमान में विस्फोट भी किया और मोना चौधरी भी मारी गई। और तुम...।”
“मोना चौधरी जिन्दा है।”
बख्तावर सिंह के शब्द पिघले शीशे की तरह उसके कान में पड़े।
हक्का-बक्का रह गया जसबीर वालिया।
“मोना चौधरी जिन्दा है?”
“हां।”
“ये...ये नहीं हो सकता।” जसबीर वालिया अभी तक ठगा-सा बैठा था।
“तुम विमान से पहले कूद आए। महाजन ने जाने कैसे तुम्हारी टांगें पकड़ ली थी। ये तुम्हें मालूम होगा। उसके बाद जो हुआ। वो तुम्हें भी नहीं मालूम और मुझे भी नहीं मालूम। मेरे आदमियों ने वहां की जो खबर दी वो ही तुम्हें बता रहा हूं, वालिया कि दूसरे पैराशूट से राजू नहीं विमान से मोना चौधरी कूदी थी।”
बुत-सा बना, रिसीवर थामे, जसबीर वालिया बैठा रहा।
“वालिया।”
वालिया का शरीर हिला। पुतलियां हिली।
“ह...हां।”
“अब तुम्हें इस बात का भी जवाब मिल गया होगा कि राजू कहां है।” बख्तावर सिंह का स्वर कानों में पड़ा।
“मर गया वो?”
“हां। विमान में जब विस्फोट हुआ तो तब वो विमान में ही था। राजू की मौत का मुझे इसलिए दुःख नहीं कि वो अपनी बेवकूफी की वजह से ही मरा है। जो पैराशूट उसके लिए था, वो मोना चौधरी के इस्तेमाल में नहीं आना चाहिए था। स्पष्ट है कि उसने काम में लापरवाही बरती। तभी तो वो विमान में रह गया। मोना चौधरी उसके पैराशूट से कूदकर बच निकली। यानी कि एक काम हुआ और एक सूटकेस तुम्हें मिल गया।”
जसबीर वालिया के दांत भिंचे हुए थे। आंखों के सामने मोना चौधरी का चेहरा नाच रहा था।
“क्या अब भी तुम्हें मुझसे शिकायत है वालिया?”
“न...हीं।”
“लेकिन मुझे तुमसे शिकायत है कि तुमने टंडन की खामख्वाह जान ली।”
“सॉरी।”
“भविष्य में इस तरह की जल्दबाजी करना छोड़...।”
“बख्तावर सिंह।” एकाएक जसबीर वालिया के होंठों से आग सी निकली –“दूसरा सूटकेस भी तैयार रखो।”
पलभर के लिए बख्तावर सिंह की आवाज नहीं आई। फिर आई।
“मोना चौधरी को मारोगे।”
“हां।”
“एक तो मरेगा। तुम या मोना चौधरी। उसे ढूंढने के लिए तुम्हें कहीं नहीं जाना पड़ेगा। वो जल्दी ही तुम्हारे पास पहुंचेगी वालिया। तुम्हें खत्म करने के लिए। मेरे लिए ये दिलचस्प खेल होगा कि कौन मरता है।”
“स्पष्ट करो।”
“मेरे आदमी विशाल सिंह ने उसे किसी काम के बहाने उसे असम भेजा था। जिस विमान में वो बैठी। विशाल सिंह ने मुझे खबर कर दी और मैंने विमान विस्फोट और उसकी मौत की योजना बना ली।”
“तो?”
“कुछ घंटों पहले ही भीड़ भरी सड़क पर से, विशाल सिंह का अपहरण कर लिया गया है।” बख्तावर सिंह की आवाज जसबीर वालिया के कानों में पड़ रही थी –“इस वक्त विशाल सिंह का अपहरण करना, मोना चौधरी की तरफ इशारा करता है। वरना विशाल सिंह पर हाथ डालना आसान नहीं। मोना चौधरी समझ गई होगी कि ये सब कुछ उसके लिए ही किया गया है। ऐसे में वो जंगल से निकली और पास के शहर से दिल्ली फोन कर दिया अपने आदमियों, को कि विशाल सिंह को पकड़ो, तब तक वो दिल्ली आ रही है। मेरा ख्याल है कि ऐसा ही हुआ होगा...।”
“विशाल सिंह मेरे बारे में जानता है?”
“मेरे ख्याल से तो नहीं जानता। अपने तौर पर जानता हो तो कह नहीं सकता। ये बस बातें मैंने तुम्हें इसलिए बताई है कि सावधान हो जाओ। मोना चौधरी कभी भी तुम तक पहुंच सकती।”
“मुझ तक पहुंचना और मुझ पर हाथ डालना आसान नहीं...।”
“वो मोना चौधरी है। उसे, तुमसे ज्यादा मैं अच्छी तरह जानता हूं। वो तुम तक अवश्य पहुंचेगी।” बख्तावर सिंह की सख्त आवाज कानों में पड़ रही थी –“वो तेरा नाम जानती है?”
“हां। मैंने बताया था।”
“अपनी मौत को तूने नाम नहीं, अपना पता-ठिकाना बता दिया है। किसी को ढूंढने के लिए नाम ही सबसे मजबूत कड़ी होती है और उसने तो तुम्हें अपनी आंखों से देखा है। तुम्हारा हुलिया जानती है। सावधान रहना, वो तुम्हारी जान लेने के लिए तुम तक कभी भी पहुंच सकती...।”
“तुम सूटकेस तैयार रखना बख्तावर सिंह। मोना चौधरी की लाश...।”
“इस बार सूटकेस पहले तैयार नहीं किया जाएगा।” बख्तावर सिंह का शांत स्वर कानों में पड़ा –“क्योंकि मुझे आशा नहीं कि तुम काम पूरा कर सकोगे। मोना चौधरी को टक्कर दे सकोगे। वैसे तो ये तुम्हारा और मोना चौधरी का मामला बन गया है। तुम्हें खत्म करने के लिए मोना चौधरी तुम तक पहुंच सकती है। जाहिर है खुद को बचाने की खातिर तुम उसकी जान लोगे। यानी कि जो करोगे अपने लिए करोगे। फिर भी वादा रहा कि अगर तुमने मोना चौधरी को मार दिया तो सूटकेस देने मैं खुद तुम्हारे पास आऊंगा।” इसके साथ ही लाइन कट गई।
जसबीर वालिया ने रिसीवर कान से हटाया। उस पर निगाह मारी और वापस रख दिया। वो जानता था कि बख्तावर सिंह कोई भी बात यूं ही नहीं कहता। अगर उसने मोना चौधरी को खतरनाक कहा है तो ठोस वजह के तहत ठीक ही कहा होगा। यानी कि उसे अपनी तरफ से तैयारी पूरी रखनी होगी। सावधान रहना होगा कि मोना चौधरी उस पर वार करने यहां तक आए तो वो वार न कर सके और उसे खत्म भी कर दे।
जसबीर वालिया समझ गया कि कभी भी मोना चौधरी उसके सामने खतरनाक हालात खड़े कर सकती थी और ये भी हो सकता था कि मोना चौधरी को उसका पता ही न लगे।
सोचो में डूबे उसने टेबल के नीचे लगी बेल बजाई।
मिनट भर में ही भास्कर आ गया।
“हुक्म।”
जसबीर वालिया ने सिगरेट सुलगाई और उसे देखा।
“जो बता रहा हूं उसे अपने तक ही रखना।”
“जी।”
“मोना चौधरी नाम की खतरनाक लड़की मेरी तलाश में है। वो मेरी जान लेने के लिए मुझे तलाश कर रही...।”
“सिर्फ लड़की?”
“तुमने सुना नहीं कि वो खतरनाक है।” जसबीर वालिया के दांत भिंच गए।
“जी समझ गया।” भास्कर सतर्क दिखा।
“वो इश्तिहारी मुजरिम है। कानून उसके पीछे है अण्डरवर्ल्ड में उसका नाम है। सोचोगे तो शायद ये नाम तुम्हें कहीं पर सुना हुआ याद आ जाए। वो कभी भी मेरी तलाश में यहां तक आ सकती है। ऐसा कुछ हो तो फौरन मुझे खबर करनी है। मेरे बारे में उसे इस रेस्टोरेंट से ज्यादा कुछ नहीं मालूम होना चाहिए। और पहला मौका मिलते ही उसे खत्म करना है। अपने आदमी तैयार रखना।”
भास्कर की आंखों में खतरनाक चमक उभरी।
“अगर वो रेस्टोरेंट में आती है तो बचकर नहीं जा सकेगी। उसे मारने के कई रास्ते तैयार हो जाएंगे।” भास्कर की आवाज में सख्ती आ गई थी –“लेकिन मैंने उसे देखा नहीं। पहचानूंगा कैसे-कोई तस्वीर है वालिया साहब?”
जसबीर वालिया ने उसे देखा और इंकार में सिर हिलाते हुए कहा।
“मेरे पास उसकी कोई तस्वीर नहीं है। तस्वीर का इन्तजाम भी नहीं हो सकता। लेकिन बारीकी से उसका हुलिया बता सकता हूं। इस तरह कि उसके सामने आने पर तुम उसे आसानी से पहचान सको।”
“ये भी चलेगा। आप उसका हुलिया बताइये?”
जसबीर वालिया बारीकी से उसे मोना चौधरी का हुलिया बताने लगा।
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