सुबह के आठ बज रहे थे ।


मोना चौधरी तेजी से आगे बढ़ी जा रही थी । यह पथरीला मैदान था । दूर-दूर तक कुछ भी नजर नहीं आ रहा था । कहीं कहीं पहाड़ी चट्टानों के बड़े बड़े टुकड़े नजर आ रहे थे। सूर्य की तीखी धूप उस पर पड़ रही थी । शरीर पसीने से भीग चुका था । परंतु चेहरे पर थकान का नामोनिशान नहीं था ।


सोचें बार-बार शुभसिंह की तरफ भटक जाती ।


वो पत्थर का बुत बना लेटा था, लेकिन उसके छूने से जाने क्या हुआ कि बूत से इंसान बन गया। मोना चौधरी को अभी तक विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा हुआ है और उसने दूसरी बार अपना बुत देखा था । जो कि तिलस्मी नगरी की मालकिन, जिसे कि यहां के लौग देवी कहते हैं, का था । शुभसिंह के मुताबिक वो ही देवी थी, क्योंकि उसके छूने से ही वो दालूबाबा की तिलस्मी कैद से आजाद हुआ है ।


ये दालूबाबा कौन है जो तिलस्मी नगरी का मालिक बना हुआ है ?


मोना चौधरी का मस्तिष्क जब भी इन सोचो में फंसता, सिर फटने लगता । वह बखूबी समझ रही थी कि शुभसिंह को भारी तौर पर कोई गलतफहमी हुई है कि वो उनकी देवी है । वह नहीं जानती की शुभसिंह उसके छूने पर बुत से इंसान कैसे बन गया। परंतु यह तो वह अच्छी तरह जानती थी कि वो मोना चौधरी है । पृथ्वी की वासी है। हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में रहती है और फकीर बाबा ने उसे यहां ताज लेने भेजा है। इस वक्त वो देवराज चौहान के साथ, हार-जीत के मुकाबले में भाग रही है कि जो 'ताज' हासिल कर लेगा, उसे जीत मानकर, दूसरा हमेशा के लिए उसका गुलाम बन जाएगा ।


ऐसे में यहां उसकी मूर्तियां मिलना, उसे कुलदेवी की मालकिन कहना, हैरानी वाली बात नहीं तो और क्या था ?


मोना चौधरी को पूरा विश्वास था कि उसके चेहरे की वजह से, मिलने वाले लोग धोखा खा रहे हैं ।


मोना चौधरी का आगे बढ़ना जारी रहा था ।


शुभसिंह के मुताबिक दालूबाबा नीले पहाड़ पर था और तिलस्मी ताज दालूबाबा की देखरेख में सख्त तिलस्मी पहरेदारी में रखा हुआ था । यानी कि ताज तक पहुंचने के लिए दालूबाबा से मिलना जरूरी था और दालूबाबा से मिलने से पहले, उसे इस तिलस्मी कैद से निकलना था और वह नहीं जानती थी कि तिलस्मी कैद से कैसे निकाला जाए । रास्ता किधर है । किस तरफ जाना है । उसे कुछ नहीं मालूम था, वह आगे बढ़ी जा रही थी यह सोच कर कि कहीं तो कोई रास्ता मिलेगा या फिर रास्ता बताने वाला मिलेगा।


प्यास से मोना चौधरी का गला सूखने लगा। उसने ने खंजर को छुआ और ठिठककर बोली। 


"मुझे पानी चाहिए।"


उसी पल उसके सामने ट्रे में रखा पानी का गिलास आ गया । मोना चौधरी ने पानी पीकर गिलास वापस ट्रे में रखा तो ट्रे नजरों से गायब हो गई । मोना चौधरी ने मन ही मन मुद्रानाथ को धन्यवाद दिया कि जिसने जबरदस्ती उसे तिलस्मी खंजर दिया था कि आने वाले वक्त में ये खंजर तुम्हारी सहायता करेगा। मतलब की मुद्रानाथ जानता था कि उसके सामने कैसा वक्त आने वाला है या फिर ये जानता होगा कि उसके सामने कई परेशानियां आ सकती हैं ? आखिर वो मुद्रानाथ कौन था ?


मुद्रानाथ के बारे में जानने के लिए पढ़ें पूर्व प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास 'जीत का ताज'


कुछ दूर मोना चौधरी को सात-आठ फीट की चट्टान खड़ी नजर आई ।


आगे बढ़ते बढ़ते मोना चौधरी की निगाह कई बार चट्टान की तरफ उठी । क्योंकि वो मात्र चट्टान न होकर चट्टान के रूप में कुछ और ही लग रहा था ।


दस मिनट बाद चलते-चलते मोना चौधरी उस पहाड़ी पत्थर के पास पहुंचकर ठिठकी । वो पत्थर लाल रंग का था। सात-आठ फीट ऊंचा परंतु मोना चौधरी को लगा, वो पहाड़ी पर किसी इंसान की आकृति लिए हुए हैं। वह शायद किसी का बुत था । जो कि काफी हद तक टूट-फूट चुका था । बुत के चेहरे पर मूंछे नजर आ रही थी। मोना चौधरी को लगा जैसे बुत वाले चेहरे को कहीं देखा है।


अगले ही पल चिहुंक पड़ी ।


बुत का चेहरा देवराज चौहान से मिल रहा था।


चेहरा काफी हद तक टूटा-फूटा हुआ था, परंतु जिसने देवराज चौहान को देखा होगा, वो पहचान सकता है कि बुत का चेहरा देवराज चौहान का है।


देवराज चौहान का बुत और यहां ?


मोना चौधरी को अपना सिर घूमता सा लगा । 


और करीब पहुंचकर मोना चौधरी ने बुत को छुआ । अच्छी तरह देखा। 


पहले उसे अपना बुत देखने को मिला अब देवराज चौहान का । उसका बुत सफेद था और हिफाजत से रखा हुआ था । परंतु देवराज चौहान का बुत टूटा-फूटा हुआ था। 


उलझनों में घिरी मोना चौधरी आगे बढ़ने लगी तो उसके कानों में आवाज पड़ी । 


"रुक जाओ।"


मोना चौधरी फौरन ठिठकी। आस पास देखा ।


वहां कोई भी नहीं था ।


"कौन हो तुम ?" मोना चौधरी कि निगाह बुत के चेहरे पर जा टिकी ।


"मैं बुत का पहरेदार हूं और आने-जाने वाले को आगाह करता हूं।" आवाज आई। 


"सामने आओ ।'


"मैं सामने नहीं आ सकता और तुम्हें आगाह कर रहा हूं, यहां से गुजरने वाला तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक बुत को पत्थर न मारे । पत्थर उठाओ और बुत पर मारो।"


"क्यों ?"


"ये यहां का रिवाज है । "


"मैं तुम्हारे रिवाज को नहीं मानती और पत्थर नहीं मारूंगी।" मोना चौधरी का स्वर सख्त हो गया ।


"इंकार करके तुम खुद को मुसीबत में डाल रही हो ।" आवाज पुनः आई । "सामने आकर बात करो ।" मोना चौधरी की आवाज में गुस्सा उभरा ।


"नहीं। मैं सामने नहीं आ सकता । तुम नीचे से पत्थर उठाओ और बुत आदेश है।" को मारो। यह मेरा


"मैं किसी का आदेश मानने की पाबंद नहीं हूं । "


"तो फिर तुम यहां से आगे नहीं बढ़ सकती ।" आवाज पुनः कानों में पड़ी --- "न ही तुम वापस लौट सकती हो।"


"मुझे रोकने के लिए क्या करोगे तुम ?" मोना चौधरी की आवाज में गुस्सा था । उसी वक्त मोना चौधरी के चारों तरफ आग भड़क उठी । तीन-तीन फीट ऊंची लपटें उठ रही थी । उस आग की गर्मी मोना चौधरी को महसूस होने लगी । आंखें सिकोड़े मोना चौधरी भड़की आग की लपटों को देखने लगी ।


दूर-दूर तक हर तरफ आग की लपटें ही नजर आ रही थी।


"ये आग तब तक जलती रहेगी, जब तक तुम पत्थर उठाकर बुत को नहीं मारोगी । अगर तुमने आग की लपटों को पार करने की कोशिश की तो जल कर मर जाओगी ।" आवाज पुनः कानों में पड़ी।


मोना चौधरी समझ नहीं पाई कि क्या करें ?


"यह बुत किसका है ?" मोना चौधरी की निगाहें आग की लपटों पर ही फिर रही थी । 


"ये नगरी की देवी के दुश्मन का बुत है । बुत को पत्थर मारो और अपने रास्ते पर चले जाओ।"


जाने क्यों मोना चौधरी के मन में जिद्द गई थी कि वो उस आवाज की कहे मुताबिक, बुत को पत्थर नहीं मारेगी, जिसका चेहरा देवराज चौहान से मिल रहा था । परंतु बुत की बातें माने बिना वहां से जा भी नहीं सकती थी, क्योंकि उसने हर तरफ आग जला रखी थी और आग तब तक नहीं हटेगी, जब तक कि वह बुत को पत्थर मार देती ।


जिद को मन में दबाकर, मोना चौधरी ने को पत्थर मारने का मन बनाया और पत्थर उठाने के लिए नीचे झुकी । तभी कमर पर पैंट में फंसे खंजर की चुभन महसूस हुई झुकने से ।


मोना चौधरी ठिठकी। आंखों में सोच के भाव उभरे । फिर सीधी खड़ी हुई है। और कमर में दबा खंजर निकालकर हाथ में पकड़ लिया और बड़बड़ाई ।


"मुझे इस आग से बचा खंजर ।"


मोना चौधरी के होठों से निकलने वाले शब्द अभी पूरी ही हुए थे कि आग की तपिश जो उस तक पहुंच रही थी । वो एकाएक समाप्त हो गई। मोना चौधरी को वातावरण सामान्य लगने लगा । परंतु वो आग की लपटें अभी भी उठ रही थी ।


कुछ देर सोच भरी निगाहों से मोना चौधरी आगे की उठती लपटों को देखती रही। खंजर के हाथ में आते ही तपिश के दूर होने पर उसका हौसला बढ़ा था । फिर वो आगे बढ़ी और आग की लपटों के पास पहुंचकर ठिककी। आग की जरा भी तपिश उसे महसूस नहीं हुई।


मोना चौधरी ने हाथ आगे बढ़ाया, लपटों को छूने के लिए, फिर फौरन ही वापस खींचा। मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब से भाव आए । उसकी उंगलियां आग की लपटों में से गुजर कर वापस आई थी, परंतु गर्मि या तपिश का जरा भी उसे एहसास न हो पाया था ।


मोना चौधरी ने पुनः अपना हाथ बढ़ाया और आग में दे दिया।


सब ठीक रहा। वो जैसे उसके लिए हवा बन गई थी ।


मोना चली समझ गई कि ये सब तिलस्मी खंजर का ही कमाल है। खंजर हाथ में दबाए वो बे-ख़ौफ आगे बढ़ी और आग की लपटों में से गुजरती चली गई ।


दूर-दूर तक वो लपटें फैली थी ।


पांच मिनट तक मोना चौधरी आगे बढ़ती रही और की लपटों को पार कर गई । आगे फिर जमीन नजर आने लगी। मोना चौधरी ने ठिठककर, लपटों को देखा । परंतु अब वो आग की लपटें कहीं भी नजर नहीं आई। पहले की तरह सामान्य जमीन नजर आ रही थी और दूर उसी लाल से पहाड़ी पत्थर के बुत की पीठ दिखाई दे रही थी ।


मोना चौधरी ने मुस्कुराकर हाथ में दबे खंजर को देखा, फिर उसे कमर में, पैंट में फंसाकर बढ़ गई | मुद्रानाथ का दिया तिलस्मी खंजर इस समय उसके लिए किसी फौज से कम नहीं था।


मोना चौधरी पुनः आगे बढ़ने लगी ।


लेकिन अब उसकी सोचें देवराज चौहान की तरफ पलटा खाने लगी कि देवराज चौहान का बुत इस नगरी में कैसे है ? क्यों है ? वह पहरेदार, वहां से गुजरने वाले हर शख्स को पत्थर मारने का आदेश क्यों देता है । आवाज कह रही थी बुत नगरी के देवी के दुश्मन का है ? मोना चौधरी के मस्तिष्क में उलझनें बढ़ती जा रही थी ।


उसका बुत भी तिलस्मी नगरी में देखने को मिला । देवराज चौहान का भी देखा । ऐसा होना महज इत्तेफाक था या वहम-धोखा नहीं हो सकता । कोई बात तो है ही, लेकिन क्या बात हो सकती है ?


इससे आगे मोना चौधरी नहीं सोच पाई । क्योंकि अपनी सोचों का जवाब उसके पास नहीं था और पास में कोई जवाब देने वाला भी नहीं था ।


मोना चौधरी को आगे बढ़ते-बढ़ते दोपहर हो गई । सूर्य सिर पर चढ़ा आया था । थकान के साथ उसे भूख भी महसूस होने लगी थी तो खंजर छूकर खाने के लिए कहा।


उसी पल सामने टेबल और कुर्सी नजर आने लगी ।


टेबल पर खाने का भरपूर सामान था ।


मोना चौधरी कुर्सी पर बैठी और खाना खाने लगी। खाने के दौरान मोना चौधरी सोच रही थी कि 'ताज' हासिल करना इतना आसान नहीं है, जितना कि उसने सोचा था । अभी जाने कैसे-कैसे हालातों का सामना करना पड़ेगा, तभी उसे महाजन, पारसनाथ, बंगाली और पाली का ध्यान आया कि इन लोगों ने उन सब को कैद करके कहां रखा होगा ? किस हाल में होंगे ?


मोना चौधरी खाने के अंतिम चरण में ही की निगाहें उठते ही ठिठक गई । खाना खाना रुक गया । चेहरे पर अजीब से भाव आ गए । सामने से चालीस बरस का व्यक्ति आ रहा था । बदन पर पैंट और कमीज थी । पांवो में जूते थे । गालों पर दो-चार दिन की शेव बढ़ी हुई थी।


मोना चौधरी ने धीरे-धीरे खाना शुरू किया । मुंह चलना शुरू हुआ । परंतु निगाहें उसी आने वाले व्यक्ति पर टिकी रही । जो उसकी तरफ बढ़ा चला आ रहा था ।


उसके पास आने तक मोना चौधरी के मुंह में पड़ा खाना समाप्त हो चुका था ।


वो वापस आकर ठिठका और सिर हिलाता हुआ कह उठा।


"तुम जानती हो कि, तुम तिलस्मी कैद में फंस चुकी हो ।" उसका स्वर परेशान-सा था । 


"हां।" मोना चौधरी एक तक उसे ही देखे जा रही थी --- "तुम कौन हो ?" 


"मैं...।" ।" उसने गहरी सांस ली --- "मैं भी तुम्हारी तरह मुसीबत का मारा, यहां फंसा हुआ हूं । यह तिलस्म किसी चक्रव्यूह से कम नहीं । इस तिलस्म को कोई तोड़ नहीं सकता।"


"यह तिलस्म किसने बनाया है ?"


"बनाया था कभी । सुनने में आता है कि तिलस्मी नगरी की देवी ने यह तिलस्म बनाया था अपने दुश्मन को कैद करने के लिए। इस तिलस्म का तोड़ या तो हमारी कुलदेवी जानती है या फिर दालूबाबा "


"तुमने कुलदेवी को देखा है ?"


"उसकी मूर्ति देखी है। मैं तो पच्चीस बरस पहले पैदा हुआ हूं । देवी तो डेढ़ सौ बरस पहले होती थी । तब के लोग आज भी जीवित हैं । उन्होंने देवी को देखा हुआ है ।" कहते हुए


उनकी बेचैन-सी निगाह इधर-उधर घूमती जा रही थी फिर टेबल पर पड़े खाने को देखा--- "अगर तुम्हारी इजाजत हो तो मैं खाना खा लूं । भूखा हूं । "


"खा लो।" मोना चौधरी ने सहमति से सिर हिलाया।


आगे बढ़ता टेबल के करीब पहुंचा और खड़े ही खड़े जल्दी से खाने लगा । उसका खाने का ढंग बता रहा था कि जैसे वो बहुत भूखा हो ।


"तुम तिलस्मी नगरी के वासी हो फिर तुम यहां कैसे आ गए ?" मोना चौधरी ने पूछा । 


"गलती की थी। सजा की एवज में मुझे तिलस्मी कैद में भेज दिया गया । इसमें कैद से निकल गया तो आजाद हो जाऊंगा। नहीं तो यही भटकता रहूंगा ।" युवक थके स्वर में कह उठा--- - "महीनों से भटक रहा हूं। परंतु बाहर जाने का रास्ता तलाश नहीं कर पाया।"


मोना चौधरी उसे गहरी निगाहों से देखती रही।


"तुम भी खाओ ।" वो मोना चौधरी को देखकर बोला ।


"मैंने खा लिया है। कहने के साथ ही मोना चौधरी ने पानी का गिलास गिलास रख कर बोली--- "मेरे ख्याल में एक बात और भी है जो तुम भूल रहे हो । "


"मैं---मैं क्या भूल रहा हूं । तुम ही बता दो ।" वो पुनः खाना खाने लगा। 


"मेरा चेहरा देखो।" मोना चौधरी ने कहा । 


उसकी नजरें मोना चौधरी के चेहरे पर आ टिकी । 


"कुछ याद आया ?" मोना चौधरी मुस्कुराई।


"तुम्हारा चेहरा देखकर ?"


"हां ।"


"क्यों---तुम्हारे चेहरे में कोई खासियत है क्या । मुझे तो कोई इबारत लिखी भी नजर नहीं आ रही।"


 मोना चौधरी मुस्कुराई ।


"तिलस्मी नगरी की देवी का चेहरा, मेरे जैसा था ।"


वो मुस्कुराया ।


"किसने कह दिया तुमसे।"


"क्या मतलब---तुमने देवी की मूर्तियां नहीं देखी क्या जो...।"


"बहुत देखी हैं । देवी का रंग-रूप मेरे दिलो-दिमाग में बसा हुआ है। कहां देवी और कहां तुम । तुम्हें किसने कह दिया कि तुम्हारा चेहरा देवी से मिलता है ।" उसकी आवाज में तीखे भाव आ गए।


मोना चौधरी के होठों की मुस्कान कम हो गई । 


"मैंने देवी की मूर्तियां, बुत देखे है । और तुम...।"


खाना खाते-खाते वो हंस पड़ा ।


"लगता है किसी ने खूब तुम्हें बेवकूफ बनाया है ।" अपनी हंसी रोकते हुए उसने कहा--- "तुम्हें किसी ने बहुत बड़े भ्रम में डाल दिया है । गुलाबलाल के आदमियों ने तुम्हारा सिर फिरा दिया होगा ।"


"गुलाबलाल ?"


"हां । दालूबाबा का मुंह लगा आदमी है। कोई भी उसे खास पसंद नहीं करता । गुलाबलाल के आदमी बाहरी लोगों को, ऐसा कुछ करके ही बेवकूफ बनाते हैं, इसी तरह तुम्हारी शक्ल की मूर्ति तुम्हें दिखाकर, उसके किसी आदमी ने बहका दिया कि देवी का चेहरा, तुमसे मिलता है।" उसने मुस्कुराकर कहा ।


मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े। 


"बहुत अजीब बात कर रहे हो तुम।"


"सच बातें, हमेशा अजीब होती है । "


"तुम्हारा नाम क्या है ?" मोना चौधरी ने पूछा ।


"अमरू।"


"गुलाबलाल कहां रहता है ?"


"अपने महल में । तिलस्मी विद्या में माहिर है । इससे दालूबाबा उसकी इज्जत करता है।' ।


"कहां है गुलाब लाल का महल ?"


"तुम यहां के रास्तों से वाकिफ हो ?"


"नहीं।"


"तो फिर मेरे बताने पर भी तुम्हें उस महल का रास्ता कैसे समझ में आएगा ?"


"दालूबाबा कहां रहता है ?"


"नीले पहाड़ पर । लेकिन दालूबाबा तक उसकी इजाजत के बिना कोई नहीं पहुंच सकता ।" अमरू बोला ।


"क्यों ?" मोना चौधरी बोली--- "वो तो नीले पहाड़ पर रहता है । कोई भी पहाड़ चढ़कर उस तक पहुंच...।"


"देखने में तो समझदार लगती हो लेकिन बातें बेवकूफी वाले कर रही हो ।" अमरु मुस्काया


"क्या मतलब ?"


"तुम क्या समझती हो कि दालूबाब पहाड़ पर बैठा है कि चढ़े और मिल लिए ।"


"तो ?"


"नीले पहाड़ के भीतर उसने शानदार महल बना रखा है । सुना तो यही है । मैंने नहीं देखा । वहां सिर्फ दालूबाबा के खास ही पहुंच सकते हैं और तो और उस पहाड़ को कोई छू भी नहीं सकता ।"


"मैं समझी नहीं।"


"सारे पहाड़ के गिर्द उसने तिलस्म फैला रखा है । जिसने भी पहाड़ को छूने की कोशिश की, वो अपनी जान से हाथ धो बैठेगा। परंतु उससे खास आदमी आ-जा सकते हैं, क्योंकि उनके पास दालूबाबा का दिया तिलस्म खंजर होता है। वो खंजर पास होने पर तिलस्म उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाता ।" अमरू ने बताया ।


मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। अजीब बात तो उसे ये लग रही थी कि अगर उसका चेहरा, तिलस्मी नगरी की देवी से नहीं मिलता तो मुद्रानाथ ने उसे देवी क्यों कहा ? फिर गीता लाल ने उसे देवी क्यों कहा । शुभसिंह ने उसे देवी मानकर इतनी ज्यादा इज्जत क्यों दी । यह सब क्या हो रहा है ? वो सब झूठ थे या जो अमरू कह रहा है, वो गलत है ?


अमरु की आवाज सुनकर उसकी सोचें टूटी ।


"तुम मुझे देवी का बुत दिखा सकते हो ?" एकाएक मोना चौधरी ने कहा ।


"क्यों नहीं । कुछ ही दूर देवी का आराधना स्थल है । वहां देवी का बुत स्थापित है।" मोना चौधरी फौरन उठ खड़ी हुई । 


"दिखाओ मुझे।"


"चलो । लेकिन ठहरो । पहले मैं खाना खा लूं । जाने फिर कब खाने को मिले ?" कहने के साथ ही अमरु जल्दी-जल्दी खाने लगा।


दो घंटे का रास्ता तय किया, मोना चौधरी ने अमरु के साथ। तब भी कोई जगह नजर नहीं आई तो मोना चौधरी ने पूछा ।


"अभी और कितना आगे जाना होगा ?"


"पहुंच गए समझो।"


मोना चौधरी ने हर तरफ नजरें घुमाई । हर तरफ पथरीली जमीन थी । दूर-दूर तक ऐसी कोई जगह नजर नहीं आ रही थी कि लगे, उन्हें वहां तक जाना है ।


"मुझे तो ऐसा कुछ भी नजर आ रहा कि लगे, पहुंच जाएं।" मोना चौधरी बोली ।


"तुम यहां के रास्तों से वाकिफ नहीं हो । चलती रहो ।" अमरू ने कहा ।


मोना चौधरी खामोश रही ।


पन्द्रह मिनट बाद अमरू, मोना चौधरी को लेकर जहां पहुंचा, उस जगह को देखकर मोना चौधरी हक्की बक्की रह गई । नजारा ही ऐसा था, जो कि दूर से नजर नहीं आता था ।


सामने, आधे किलोमीटर के व्यास में, जमीन की सतह के पांच सौ गज नीचे, शहर बसा नजर आ रहा था । जमीन से उस जगह तक जाने के लिए कई जगह से नीचे जाती सीढ़ियां नजर आ रही थी । नीचे रास्ते थे, मकान से । आदमी-औरतें जैसे अपने कामों में व्यस्त आ जा रहे थे । कई बड़े-बड़े दरवाजे नजर आ रहे थे । कुछ लोग उनमें प्रवेश कर रहे थे तो कुछ बाहर आ रहे थे ।


मोना चौधरी एक-डेढ़ मिनट हैरानी से हर तरफ देखती रही ।


"यह कैसी जगह है ?" मोना चौधरी ने अमरू को देखा ।


"तिलस्मी कैद में ऐसी जगहें बहुत है । तुमने अभी तिलस्म देखा ही कहां है ?" अमरु मुस्कुराया ।


मोना चौधरी के चेहरे पर अजीब से भाव अभी तक उभरे हुए थे ।


"देवी का बुत कहां है ?" एकाएक मोना चौधरी ने पूछा ।


"वो बीचोबीच देखो । जहां छोटा सा बाग है । "


मोना चौधरी ने उस तरफ देखा ।


"यहां से तुम्हें ऐसा लग रहा होगा कि जैसे वहां कोई खड़ा है और सफेद कपड़े से उसने खुद को ढांप रखा है।"


"हां ।" मोना चौधरी की निगाह वहीं पर थी ।


"वो देवी का बुत है, जिसे चादर से ढांप रखा है । जाओ, जाकर कपड़ा हटाओ और देवी का चेहरा देख लो । "


मोना चौधरी ने गर्दन घुमाकर अमरु को देखा ।


"मैं जाऊं, तुम नहीं चलोगे क्या ?" मोना चौधरी ने पूछा ।


अमरु वहीं जमीन पर बैठता हुआ बोला ।


"मैंने बहुत बार देवी के दर्शन कर रखी है। वैसे भी इस वक्त देवी का चेहरा देखने की इच्छा तुम्हारी है, मेरी नहीं। मैं यहां बैठकर आराम करता हूं, तुम हो आओ।" 


"देवी के बुत पर कपड़ा क्यों दे रखा है। वो...।"


"यहां का यही रिवाज है। देवी के दर्शन कर आओ । उसके बाद दोनों मिलकर, इस तिलस्म कैद से निकलने का कोई रास्ता तलाशते हैं, नहीं तो सारी उम्र यहीं बीत जाएगी।" परेशान सा अमरु कह उठा ।


क्षणिक सोच के बाद मोना चौधरी आगे बढ़ी और सीढ़ी पर पांव रखकर फिर पलटकर अमरु को देखा । वो वैसे ही परेशान अवस्था में बैठा था । मोना चौधरी सीढ़ियां उतरने लगी ।


पांच मिनट में ही वो सीढियां तय करके नीचे पहुंच गई। वहां से एक रास्ता छोटे से बाग में खड़े बुत की तरफ जा रहा था, मोना चौधरी उसी रास्ते पर आगे बढ़ गई । रास्ते में मिलने वाले लोग उसे देखते सिर झुकाते, फिर आगे बढ़ जाते।


किसी ने मोना चौधरी से बात नहीं की ।


मोना चौधरी ने भी किसी से बात नहीं की । वह जल्दी से जाकर देवी के बुत का चेहरा देखना चाहती थी, ताकि यह जान सके कि अमरु झूठ बोल रहा है या पहले मिलने वाले ने उससे झूठ बोला था कि तिलस्मी देवी से उसका चेहरा मिलता है और उसे नजर आने वाले बुत नकली थे ।


दस मिनट में ही वो बुत तक पहुंची और पलटकर ऊपर देखा । अमरु सीढ़ियों के पास ही खड़ा उसे देख रहा था । उसके देखने पर, अमरू ने हाथ हिलाया।


मोना चौधरी ने पुनः बुत को देखा फिर हाथ बढ़ाकर चादर को खींचा ।


चादर हटते ही बुत स्पष्ट नजर आने लगा।


मोना चौधरी चौंकी ।


यह बुत भी उसके चेहरे वाला था । इसका मतलब अमरु झूठ बोल रहा है ? दूसरे ही पल मोना चौधरी चिहुंक पड़ी। अजीब सी ऐसी गड़गड़ाहट हुई कि जैसे पहाड़ टकराए हों, जमीन पर तीव्र कम्पन सा होता महसूस हुआ । मोना चौधरी ने बुत की बांह थाम ली । वरना शायद गिर जाती ।


तुरंत ही पैदा होने वाली हलचल थम गई ।


इसके साथ ही मोना चौधरी की आंखें फैलती चली गई ।


वहां पहले जो कुछ भी नजर आ रहा था अब कहीं भी नहीं था, वो अब कहीं भी नहीं था। न लोग थे । न रास्ते थे। न वो बड़े-बड़े दरवाजे थे, जहां लोग आ-जा रहे थे । सब कुछ गायब हो चुका था । जहां वो खड़ी थी, वही छोटा-सा बाग और बुत बचा था । तभी उसके कानों में अमरू के हंसने की आवाज पड़ी ।


मोना चौधरी ने फौरन ऊपर देखा ।


ऊपर किनारे पर खड़ा अमरु उसे देखता हुआ हंस रहा था। ऊपर जाने की सीढ़ियां भी गायब हो चुकी थी । वहां पथरीली, उजाड़-सी जगह ऊपर जाती दिखाई दे रही थी। इस वक्त मोना चौधरी आधा किलो मीटर व्यास के गड्ढे में खड़ी थी ।


मोना चौधरी समझ गई कि अमरु ने साजिश के तहत उसे यहां पहुंचाया है।


हंसी रोककर अमरु बोला ।


"पहले तुम तिलस्मी कैद की ऊपरी सतह पर थी । अब और भी खतरनाक कैद में पहुंच गई हो । इसी तिलस्म में भटक भटक कर तुम खुद ही मौत को गले लगा लोगी ।"


मोना चौधरी को अजीब सा लगा कि अमरू इतनी दूर है फिर भी उसकी आवाज इस तरह कामों में पड़ रही है, जैसे वो करीब ही खड़ा बोल रहा हो ।


"तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?" मोना चौधरी सामान्य स्वर में बोली । परंतु उसके शांत शब्द ऊपर खड़े अमरू ने सुने ।


"यही मेरा काम है। जिन लोगों को कैदी बनाकर तिलस्म में भेजा जाता है, मेरा काम उन्हें खतरनाक से खतरनाक तिलस्म में फंसाना है । जैसे कि अब तुम्हें पहुंचाया है ।" अमरू मुस्कुराकर बोला ।


"मैं यहां से, आसानी से ऊपर आ सकती हूं।" मोना चौधरी ने कहा।


"भ्रम में मत रहना । यह तिलस्म है । जो रास्ता पार कर लिया। उस पर तो, तिलस्म भी तुम्हें वापस नहीं भेज सकता । अब तुम्हें यहां आगे ही बढ़ना है। अपनी मौत तलाशनी है तुम्हें ।" अमरू ने हंसकर कहा ।


मोना चौधरी का दिमाग तेजी से चल रहा था ।


"मेरा चेहरा इस मूर्ति से मिलता है ।"


"मालूम है मुझे ।" अमरू की आवाज आई।


"क्या मैं तुम लोगों की कुलदेवी नहीं हो सकती ?"


"नहीं ।" अमरू हंसा--- "तुम देवी नहीं हो सकती । क्योंकि ये सारा तिलस्म देवी का ही बनाया हुआ है । इसे तोड़ना देवी के लिए मामूली काम है और तुम तो सामान्य लोगों की तरह मेरी बातों में फंस गई। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारी सूरत, हमारी देवी जैसी ही है।" इसके साथ ही अमरू पीछे हटता चला गया ।


वो मोना चौधरी को दिखाई देना बंद हो गया ।


मोना चौधरी ने गहरी सांस लेकर आसपास देखा ।


दूर-दूर तक पथरीली बंजर जगह के अलावा कुछ नजर न आया । सूर्य पश्चिम की तरफ झुकता जा रहा था और इस जगह से सूर्य नजर भी नहीं आ रहा था, धूप अवश्य वहां की कुछ जगहों पर पड़ रही थी । मोना चौधरी ने कोई रास्ता तलाश करने के लिए, उस सारी जगह को देखना जरूरी समझा और आगे बढ़ गई। चेहरे पर गंभीरता से नजर आ रही थी ।


तब दिन ढल चुका था और अंधेरा सिर पर सवार था, जब मोना चौधरी को उसी गड्ढे की दीवार में एक साथ तीन दरवाजे देखने को मिले । उन दरवाजों की ऊंचाई पांच फीट से ज्यादा नहीं थी । तीनों दरवाजे तीन-तीन फीट के फासले पर थे । परन्तु उलझन में डालने वाले वो शब्द थे जो उन दरवाजों पर लिखे हुए थे । उसकी नजरें उन्ही शब्दों पर फिरती रही।


पहले दरवाजे पर लिखा था- यह मौत का दरवाजा है ।


दूसरे दरवाजे पर लिखा था- यह जिंदगी का दरवाजा है ।


तीसरे दरवाजे पर लिखा था-इस दरवाजे के पीछे जिंदगी और मौत दोनों ही है ।


मोना चौधरी ने दरवाजे पर लिखे शब्दों का मतलब समझा। परंतु धोखे से भरपूर तिलस्म में किसी भी बात पर विश्वास करना अपनी मौत को दावत देना था और किसी बात पर विश्वास किए बिना, मंजिल तक भी नहीं पहुंचा जा सकता था । स्पष्ट था कि अब उसे किसी एक दरवाजे में तो प्रवेश करना ही था ।


मोना चौधरी ने पुनः तीनों दरवाजे पर लिखे शब्दों पर निगाह मारी । चेहरे पर फैसले के भाव आए । यह फैसला तीसरे दरवाजे में प्रवेश करने का था, जिस पर लिखा था इस दरवाजे के पीछे जिंदगी और मौत दोनों ही है ।


मोना चौधरी दरवाजे के पीछे पहुंची। हाथ बढ़ाकर दरवाजे को धक्का दिया ।


दरवाजे के दोनों पल्ले खुलते चले गए ।


बाहर अब अंधेरा फ़ैलना शुरू हो गया था ।


पक्के इरादे से मोना चौधरी ने कदम आगे बढ़ाया और दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गई ।


यह सामान्य सा कमरा था और रोशनी का पूरा इंतजाम था । परंतु कमरे की रोशनी दरवाजे के बाहर जमीन पर नहीं पड़ रही थी । पूरा कमरा खाली था । फर्श पर तीन जगह, दो फीट ऊंची और दो फीट चौड़े तीन चबूतरों जैसी, छोटी सी जगह बनी हुई थी, जैसे कि तिपाई होती है और सामने की दीवार पर स्पष्ट शब्दों में लिखा था--- इनमें से किसी एक पर बैठ और अपनी पसंदीदा यात्रा का आनंद लो।


मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े । उसने तिपाई जैसी तीनों सीटों को देखा, जो पक्के सीमेंट जैसी चीज से बनी हुई थी उसके बाद पुनः दीवार पर लिखे शब्दों को पढ़ा ।


इतना तो समझ चुकी थी कि उसे इन तीनों में से किसी एक के सीमेंट पर की सीट को चुनना होगा । वरना वो आगे नहीं जा सकेगी। लेकिन सीट पर बैठने के बाद क्या होगा ? यह सोचकर पल भर के लिए उसका दिल धड़का। फिर जाने क्या सोचकर, वो खुले दरवाजे की तरफ बढ़ी।


लेकिन दरवाजे के समीप पहुंचकर रुक जाना पड़ा । वो बाहर नहीं जा सकी । लगा जैसे उसके रास्ते में कोई दीवार आ गई हो । इस तरह जिस्म टकराया, जबकि सामने खुला दरवाजा नजर आ रहा है । मतलब कि वो बाहर नहीं जा सकती अब । अमरु के शब्द ध्यान में आए कि इस तिलस्म में आगे बढ़कर पीछे नहीं लौटा जा सकता। मोना चौधरी ने पुनः कोशिश की ।


परंतु न नजर आने वाली दीवार ने उसे आगे नहीं बढ़ने दिया ।


मोना चौधरी दांत भींचकर पलटी और जो होगा देखा जाएगा, यह सोचकर वो आगे बढ़ती सीमेंट-नुमा सीट पर जा बैठी। एक पल बीता । दो पल बीते ।


छठे पल मोना चौधरी को लगा जैसे वो कमरा जोरों से हिला हो । वह तीव्र कंपन हुआ । उसने जल्दी से वहां से उठना चाहा । परंतु जैसे उस सीट से पकड़ लिया हो वो उठ न सकी ।


तभी उसके पैरों के पास से, देखते ही देखते कमरे का फर्श फटता चला गया । मोना चौधरी के चेहरे पर हड़बड़ाहट के भाव उभरे । उसी क्षण फटे फर्श में से, नाग के फन की भांति लोहे की जंजीर निकली और मोना चौधरी की पिंडली के साथ सख्ती से लिपटती चली गई ।


मोना चौधरी ने पिंडली को बचाने की पूरी चेष्टा की । परंतु सफल न हो

 सकी ।


उसी समय जंजीर ने जोर से झटका दिया ।


मोना चौधरी का शरीर उछला और जंजीर के साथ कमरे के फटे फर्श के भीतर गायब होता चला गया और वो फर्श वापस अपनी जगह पर इस तरह आ गया कि देखने पर कहा नहीं जा सकता था कि कभी वो फर्श फटा भी होगा। मोना चौधरी उसमें समा गई होगी ।


अब कमरे में सब कुछ पहले जैसा, सामान्य नजर आने लगा । तभी खुला दरवाजा खुद-बखुद बंद होता चला गया। इसके साथ ही कमरे में घुप्प अंधेरा छा गया ।

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