अगले दिन ग्यारह बजे सुबह फोन की बेल हुई। देवराज चौहान और जगमोहन तब नाश्ता करके ही हटे थे। फोन बेल बजने पर दोनों की नजरें मिली।

“उसी का फोन हो सकता है।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

जगमोहन ने आगे बढ़कर रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“अब तो देवराज चौहान नींद से उठ गया होगा।” प्रवेश गोदरा की आवाज, जगमोहन के कानों में पड़ी।

“चिन्ता मत कर। नाश्ता भी हो चुका है।” जगमोहन ने सामान्य लहजे में कहा।

“मतलब कि अब मेरी बात हो सकती है।”

“कर लो।” कहते हुए, जगमोहन ने देवराज चौहान को इशारा किया।

देवराज चौहान उठा और करीब आकर रिसीवर लिया।

“हैलो।”

“देवराज चौहान।” प्रवेश गोदरा का गम्भीर स्वर कानों में पड़ा।

“हां। कौन हो तुम, जो डकैती के सिलसिले में सब कुछ जानते हो और तीन अरब रुपये जैसी भारी डिमांड कर रहे...।”

“पहचाना नहीं।”

“नहीं।”

“हमारी फोन पर बात हुई थी। तुम्हें मेरी आवाज पहचान लेनी चाहिये।” प्रवेश गोदरा के स्वर में विश्वास था।

देवराज चौहान के होठों पर शांत-सी मुस्कान उभरी। वो पहचान गया था कि इस आवाज से पहले कहां बात की थी।

“मुझे याद नहीं आ रहा। हो सकता है बाद में याद आ जाये। काम की बात करो।” देवराज चौहान कहे जा रहा था- “जगमोहन ने बताया कि तुम तीन अरब जैसी भारी रकम की डिमांड कर रहे हो, मुंह बंद रखने के लिये।”

“मुंह बंद रखने के लिये नहीं। इस मामले से हट जाने के लिये। यूं समझो कि इस डकैती के लिए तुम्हारे रास्ते से हट रहा हूं। बदले में छोटी-सी रकम भांग रहा हूं। सिर्फ तीन अरब जबकि तुम पच्चीस- तीस अरब बना लोगे। मेरी बात नहीं मानी तो, तुम डकैती नहीं कर सकोगे देवराज चौहान।”

“कैसे रोकोगे?”

“बहुत रास्ते हैं रोकने के। मैं वहा सबको खबर कर सकता हूं कि डकैती के लिये देवराज चौहान आ रहा है। ये सुनते ही आधे ज्वेलर्स तो अपने हीरे-जेवरात वहां लाने से ही इन्कार कर देंगे। यानि कि सीधे-सीधे दौलत आधी हो जायेगी। इसके अलावा अगर बारी-बारी दो दिनों में वहां बम्ब रखने की खबर दी गई तो, तुम्हारे रास्ते में तब और भी अड़चनें पैदा हो जायेंगी। छोटा-सा बम बलास्ट होटल में कर दिया गया तो पक्का फैशन शो कैंसिल करने की नौबत आ जायेगी। सुना है, इंस्पेक्टर वानखेड़े भी दिलचस्पी लेने लगा है। हीरे-जेवरातों के फैशन शो में। व्यक्तिगत तौर पर मैं इंस्पेक्टर वानखेड़े को फोन कर दूं कि तुम वहां डकैती की योजना बना रहे हो तो क्या होगा। वानखेड़े तो वैसे भी तुम्हें गर्दन से पकड़ लेना चाहता है। यानि कि मैं तुम्हें पीछे हटने पर मजबूर कर सकता हूँ। तुम्हारी तरफ से वहां एक फोन कर दूंकि मैं वहां डकैती करने आ रहा हूँ। रोक सकते हो तो रोक लो। तो फिर तुम वहां कभी भी डकैती नहीं कर सकोगे।”

देवराज चौहान के चेहरे पर शांत मुस्कान उभरी।

प्रवेश गोदरा की आवाज पुनः कानों में पड़ी।

“वानखेड़े को मैं रनवीर भंडारी के बारे में खबर कर सकता हूं। भंडारी इतना सख्त आदमी नहीं है कि रनवीर भंडारी का मुंह न खुलवा सके। आधे घंटे में वो सब कुछ बता देता। तुम्हारा बंगला मैं जानता हूं। वानखेड़े को इस बात की भी खबर कर सकता हूं।

अगर मेरी बात सुनने के बाद भी तुम सोचते हो कि तुम्हें, मेरी परवाह नहीं तो फिर बेशक मुझे कुछ न देकर अपनी डकैती में लगे रहो। मैं भी देखता हूं तुम कैसे कामयाब होते हो। मेरी बातों को मात्र धमकी समझने की गलती मत...”

“मैं तुम्हें गम्भीरता से ले रहा हूं।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।”

“स्पष्ट कहो।”

“तुम जो भी हो। मुझे सोचने का वक्त दो।” देवराज चौहान बोला- “बहुत बड़ी रकम बोली है तुमने। सोचना...।”

“मामूली रकम है तुम्हारे लिये। तुमने इतनी बड़ी-बड़ी सफल डकैतियां की हैं कि, तुम्हें खुद पता नहीं होगा कि तुम्हारे पास कितनी दौलत है। तीन अरब रुपया तुम्हारे लिये बड़ी रकम नहीं है। तुम...।”

“इस बारे में मुझे जगमोहन से बात करनी पड़ेगी। दौलत का हिसाब वही रखता है।”

“कर लो।”

“दोपहर बाद फोन करना, तभी इस बारे में कोई बात हो पायेगी।” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने रिसीवर रख दिया।

जगमोहन होंठ सिकोड़े देवराज चौहान को देख रहा था। उसे आशा नहीं थी कि देवराज चौहान, फोन करने वाले से इस तरह आराम से बात करेगा।

“फोन करनेवाला।” देवराज चौहान ने जगमोहन से कहा- “रनवीर हम भंडारी से होटल में बात कर रहे थे। जब एक बार बीच में उसका फोन आया तो टेबल पर पड़े भंडारी के मोबाइल फोन से मैंने बात की, जब भंडारी बाथरूम में था। पूछने पर उसने बताया कि होटल भंडारी का वो आदमी है, जो बाहर तब निगरानी पर रहता था जब के बाहर वो नजर रख रहा था कि बाहर कोई गड़बड़ हो तो पहले ही भीतर खबर कर दे। तब उसने भंडारी को ये बताने के लिए फोन किया था कि बाहर सब ठीक है।”

जगमोहन के होंठ सिकुड़ गये।

“इसे इस बात की सारी जानकारी है कि रनवीर भंडारी और मेरे में क्या बातचीत हो रही है। अंत में मौका पाकर, वो इसी बात का फायदा उठा रहा है कि हमसे दौलत झाड़ ली जाये।”

“फिर तो हम आसानी से इस तक पहुंच सकते हैं और...।”

“इस तक तो पहुंच सकते हैं, परन्तु इसके साथियों तक नहीं पहुंच सकते। इसने मुंह न खोला तो बात वहीं की वहीं रह जायेगी।

इसलिये इससे रनवीर भंडारी के द्वारा नहीं, बल्कि अपने तौर पर ही बात करनी पड़ेगी। रनवीर भंडारी को ये बताना भी ठीक नहीं होगा उसका आदमी गद्दारी कर रहा है। इससे फोन करने वाला भड़क सकता है। देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा- “इसने बहुत नाजुक मौके पर, इस मामले में अपनी टांग फंसाई है।”

“इसे संभाले कैसे?”

“जैसा मैंने तुम्हें रात को बताया था।”देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

जगमोहन के चेहरे पर उखड़ेपन के भाव आ ठहरे।

“उस तरह हमारी पचास लाख की दौलत चली जायेगी।” जगमोहन की आवाज तीखी हो गयी।

“लेकिन मामला संभल जायेगा।” देवराज चौहान ने जगमोहन की आंखों में देखा।

कई क्षणों तक उनके बीच चुप्पी रही।

“तैयारी करो। सूटकेस में या बड़े एयर बैग में तुम्हें एक करोड़ की दौलत तैयार करनी है। पचास लाख के नकली नोट और पचास लाख के असली जेवरात। वो रनवीर भंडारी जैसे ज्वैलर्स के लिये काम करता है तो, जेवरातों को फौरन परखेगा। उन्हें असली पाकर वो यकीन भी करेगा कि नोट भी असली हैं।”

“वो।” जगमोहन के चेहरे पर उखड़े भाव थे- “मान जायेगा?”

“हां। रनवीर भंडारी के लिये काम करने वाले के लिये एक करोड़ की दौलत बहुत होगी। वक्ती तौर पर तो वो फंस ही जायेगा।

उसके बाद क्या करना है, तुम जानते हो। मुझे विश्वास है कि वो रास्ते पर आ जायेगा।”

“और उसके साथी?”

“उन्हें भी रास्ते पर आना पड़ेगा। इसके अलावा वो कुछ कर भी नहीं सकते। इस बात को वो अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे मामले में रुकावट डालने से उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। हमारी बात मान लेने में उन्हें फायदा लगेगा।”

जगमोहन कई पलों तक देवराज चौहान को देखता रहा। फिर

गहरी सांस लेकर कह उठा।

“पचास लाख के नकली नोटों का इतनी जल्दी कैसे इन्तजाम?”

“सोहनलाल से बात करो। वो ऐसे किसी व्यक्ति को जानता है जो असली जैसे नकली नोटों का काम करता है।” कहने के साथ ही देवराज चौहान ने कश लिया और सिग्रेट ऐश ट्रे में डाल दी।

जगमोहन फोन के पास पहुंचा और सोहनलाल का नम्बर मिलाते हुए बोला।

“वो लोना वाला जाने को कह रहा था। मालूम नहीं लौटा है या...।” बेल हुई।

सोहनलाल गहरी नींद में था। कई बार बेल होने पर उसने रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“ये सोने का वक्त है।” जगमोहन ने तेज स्वर में कहा।

“रात को लोना वाला से लौटा हूं। अब सोने दे।”

“काम है।”

“शाम को आऊंगा। तब…”

“अभी का काम है। पचास लाख के नकली नोट चाहिये।”

जगमोहन के इन शब्दों पर ही उधर, सोहनलाल की पूरी आंखें खुल गयी थी।

“धंधा बदल लिया क्या?” सोहनलाल का स्वर कानों में पड़ा।

“कहां से इन्तजाम होगा?’

“कब चाहिये?”

“जल्दी से जल्दी।”

“ठीक है। तीस लाख नकद असली नोट ले आ। तेरे को उस हरामी के पास ले चलता हूं।”

“तीस लाख?”

“पचास लाख के असली दिखने वाले, नकली नोटों के लिये तीस लाख तो देगा कि नहीं। वैसे वो असली में भी असली है। फर्क सिर्फ ये है कि उन्हें सरकार की तरफ से जारी नहीं किया गया। उनकी सीरीज सरकारी रिकार्ड में रजिस्टर्ड नहीं है।”

“वो तो समझ गया। पता कर, शायद बीस लाख में सौदा हो जाये।”

“चूरन वाले नोटों का इन्तजाम कर लेते हैं। हजार-दो हर में ही काम हो जायेगा।”

“पच्चीस लाख में भी काम नहीं बनेगा क्या?”

“मैंने तेरे को बाजार का भाव बताया है। इस भाव से सस्ते नहीं मिलेंगे। जिससे नकली नोट मिलेंगे। उसने भी पीछे से नोटों खरीदा है। वो पचास परसैंट पर लेता है और साठ परसैंट पर है। इतनी कमाई का तो वो हकदार बनता ही है।”

“ठीक है।” उसने गहरी सांस ली- “मैं आ रहा हूं।”

“तीस लाख साथ लाना। इस काम में उधार नहीं चलता। नोटों का धंधा नगद पर होता है।”

☐☐☐

देवराज चौहान, जगमोहन और सोहनलाल बंगले में मौजूद थे उनके पास कंधे पर लटकाने वाला ओवर साईज का बैग था।

बैग में टेबल पर रखी, पांच-पांच सौ के नोटों की गड्डियां करीने रखी जा रही थी। सोहनलाल सारा मामला जान चुका था। सोहनलाल का कहना था कि रनवीर भंडारी का खास आदमी प्रवेश गोदरा जो कि उसे जानता है। यानि कि तीन अरब की दौलत मांगने वाला प्रवेश गोदरा ही हो सकता है।

“प्रवेश गोदरा में इतना दम है कि ऐसे बड़े मामलों में अपनी गर्दन फंसा सके।” जगमोहन ने कहा।

“तगड़ी दौलत नजर आने लगे तो दम ही दम भर आता है इन्सान में।”

“कैसा बंदा है वो?”

“यूँ तो शरीफ है। हरामीपन की भी कमी नहीं। मतलब निकले तो हवा के साथ बहने में उसे कोई एतराज नहीं।” कहने के साथ ही बैग में गड्डियां रखते सोहनलाल ठिठका और गोली वाली सिगरेट सुलगा ली।

“यानि कि हमें फोन करने वाला वो हो सकता है।”

“अवश्य हो सकता है।”

“देखने में कैसा है प्रवेश गोदरा?”

सोहनलाल ने उसका हुलिया बताया।

“हूं। तुम्हें कैसे जानता है?”

“दो साल पहले वो मेरे पास आया था। जाने किसकी तिजोरी उड़ा लाया था। उस खुलवाना चाहता था। मामला गड़बड़ देखकर। तिजोरी खोलने में मैंने पांच लाख मांगे। बे-हिचक वो देने को तैयार हो गया। पांच मिनट में मेरे सामने पांच लाख रख दिए।”

“तिजोरी में मोटा माल होगा?” जगमोहन ने सोहनलाल को देखा।

“हां। खोलने पर मैंने पाया कि उसमें जेवरात भरे पड़े थे। प्रवेश गोदरा के मुंह से निकला कि चालीस लाख के आसपास के जेवरात हैं वो। ये मेरी पहली मुलाकात थी उससे।”

“प्रवेश गोदरा का किन-किन लोगों में बैठना-उठना है। उसके साथी कौन हैं?” जगमोहन ने पूछा।

“इस बारे में मैं कुछ नहीं जानता।” सोहनलाल ने इन्कार में सिर हिलाया।

“वो कहां रहता है?”

“ये भी नहीं जानता। दो साल पहले जब उसने तिजोरी खुलवाई यी तो वो तिजोरी जंगल में मिट्टी में दबा रखी थी, जो कि उसने मेरे सामने ही निकाली थी।” सोहनलाल बोला- “मैंने उसका घर नहीं देखा।

नोटों की गड्डियों के बाद सारे जेवरात भी बैग में डाल दिये गये।

पांच सौ के नोटों की पूरी सौ गड़ियां थी। पचास लाख नगद और पचास लाख के असली जेवरात थे। ये अलग बात थी कि पचास लाख के जेवरातों के नाम पर जगमोहन ने पैंतीस लाख के ही जेवरात बैग में रखे थे।

जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।

“शाम के छ: बजे रहे हैं। उसका फोन अब तक आ जाना चाहिए था।” जगमोहन बोला।

“आ जायेगा।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

जगमोहन और सोहनलाल ने देखा देवराज चौहान के हाथ नकली वाली पांच सौ की गड्डियां थी। गड्डी पर नजरें टिकाए देवराज चौहान सोचों में डूबा रह-रहकर नोटों को फुरेरी दे रहा था।

“ये तो नकली वाली गड्डी है। बैग में डालनी है।” जगमोहन बोला।

देवराज चौहान ने गड्डी उछाली। सोहन लाल ने गड्डी को पकड़ा और बैग में रख कर जिप बंद कर दी।

“क्या सोच रहे हो?” जगमोहन ने देवराज चौहान के चेहरे पर सख्ती भरे भाव को महसूस किया।

“नकली नोटों के बारे में सोच रहा हूं।” देवराज चौहान शब्दों को चबाकर कह उठा।

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिली।

“नकली नोट तो नकली होते हैं।” सोहनलाल बोला- “इसमें सोचना क्या?”

“ये कहीं से भी नकली नजर नहीं आ रहे।”

“बनाने और छापने वाले का कमाल है।”

“देश में कितने नोटों की जरूरत है, ये तय करने के बाद ही नोटों को छापा जाता है। अगर बाजार में नकली नोटों को ढेर लग जायेगा तो देश का सारा सिस्टम बिगड़ जायेगा।” देवराज चौहान के चेहरे पर कठोरता के भाव थे- “नोटों को लूटने में और नकली नोट छापने के जुर्म में, जमीन-आसमान का फर्क है।”

जगमोहन की आंखें सिकुड़ी।

“क्या कहना चाहते हो?” सोहनलाल ने पूछा।

“कौन छापता है नकली नोट?”

“मालूम नहीं?”

“ये मिले कहां से?”

“रमेश कालरा से।”

“कौन है वो?”

“गैर कानूनी काम करने वाला बंदा है। हर छ: महीने बाद पुराना धंधा छोड़कर नया धंधा शुरू कर लेता है। जब भी मिलता है पूछना पड़ता है कि अब वह क्या कर रहा है। परन्तु इस बार साल भर से नकली नोटों के धंधे में टिका हुआ है दो नई कारें खरीद चुका है। ये धंधा उसे रास आ गया लगता है।” सोहनलाल ने सामान्य स्वर में कहा।

देवराज चौहान की नजरें सोहनलाल पर जा टिकी।

“रमेश कालरा कहां से लाता है नकली नोटों को?”

“ये तो धंधे की अन्दर की बात है। वो किसी को क्यों बताएगा?”

सोहन लाल ने सिर हिलाया।

देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“डकैती का काम खत्म करके रमेश कालरा से मिलेंगे…”

देवराज चौहान की आवाज में छिपे हुए खतरनाक भाव थे।

“किस वास्ते?” जगमोहन के होठों से निकला।

“ये मालूम करने के लिए कि वो नकली नोटों को कहां से लाता है। कहां छपते हैं ये और..।”

“देवराज चौहान- “ सोहनलाल गम्भीर स्वर में कहा उठा- “नकली नोटों को मामूली बात न समझो। ये बहुत लम्बी कड़ी है। खतरनाक से खतरनाक, दम-खम वाले लोग इस मामले में होंगे उनसे मुकाबला करना नुकसान का मामला भी हो सकता है।”

“यही तो देखना है कि वो कौन लोग हैं और कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं।” देवराज चौहान की आंखों में वहशी भाव आ गये- “ड्रग के धंधे से मुझे सख्त नफरत है। तभी थापर को ड्रग्स का काम खत्म करवा कर, उसे बिजनेस करने के रास्ते पर लगाया। क्योंकि ड्रग्स लोगों को तबाह बरबाद कर देती है, और नकली नोट तो देश को खोखला कर देते हैं। तबाह कर देते हैं और देश में युवा ही नहीं, बच्चे बूढ़े और देश का भविष्य होता है। ड्रग्स से खतरनाक धंधा है। नकली नोटों को छाप कर देश के कोने-कोने में पहुंचाना।”

सोहनलाल व्याकुल निगाहों से जगमोहन को देखने लगा।

“मुझे क्या देखता है।” जगमोहन ने गहरी सांस ली- “देवराज चौहान को देख...”

सोहनलाल ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं।

“इस डकैती को निपटा कर हम उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश करनी है जो नकली नोटों को छापते हैं और...।”

तभी फोन की घंटी बजी।

देवराज चौहान के शब्द अधूरे रह गये।

“उसी का फोन होगा।” जगमोहन कहते हुए उठा और फोन की तरफ बढ़ गया।

“प्रवेश गोदरा का होगा।” सोहनलाल जल्दी से बोला- “मैं उसकी आवाज पहचानता हूं। आवाज सुनूं क्या?”

तब तक जगमोहन रिसीवर उठा चुका था।

“हैलो- “

“कैसे हो जगमोहन?” प्रवेश गोदरा का शांत स्वर कानों में पड़ा।

“तुमने अपना नाम नहीं बताया?” जगमोहन का स्वर भी शांत था।

“नाम की क्या जरूरत है। काम हो जाने पर अपने-अपने रास्ते पर लग जाना है। क्या सोचा, मुझे शाम को फोन करने को कहा था।”

“सोचा तो बहुत, लेकिन बात बनती नजर नहीं आती।” कहते हुए जगमोहन ने जानबूझ कर लम्बी सांस ली।

“क्या मतलब?”

“तीन अरब की रकम का इन्तजाम नहीं हो सकता।” जगमोहन शांत स्वर में कह उठा- “हम डकैतियों का पैसा स्विस खातों में जमा कर देते हैं। पैसा निकालने के लिए हमें स्विटजरलैंड जाना होगा और हमारे पास अब वक्त नहीं वहां जाने का। यानि कि तेरे लिए भी परेशानी खड़ी हो गयी और हमारे लिए भी...।”

प्रवेश गोदरा की आवाज नहीं आयी।

“अगर तूने कुछ दिन पहले बात की होती, स्विटजरलैंड जाने का वक्त रहा होता तो तेरे को वहां से पैसा ला देते या वहीं पर तेरा खाता खुलवा कर पैसा जमा करा देते। लेकिन अब हमारे पास वक्त नहीं बचा। स्वीटजरलैंड जाते हैं तो डकैती बीच में रह जाती है। नहीं जाते हैं तो तू हमें डकैती नहीं करने देगा। कोई न कोई झंझट खड़ा कर देगा।”

“झूठ बोल रहे हो तुम।” कानों में पड़ने वाले, प्रवेश गोदरा के स्वर में कठोरता आ गयी थी।

“झूठ बोलने का फायदा?”

“ये तुम जानो।”

“ऐसी कोई भी बात नहीं है। तीन अरब देकर, पच्चीस-तीस अरब की दौलत पा लेने में भला क्या बुराई है। लेकिन इस वक्त हम मजबूर है। हमारे पास तीन करोड़ भी नहीं है तेरे को देने के लिए। हर जगह देख-भाल लिया। एक करोड़ से ज्यादा नहीं हैं इस वक्त हमारे पास। सारे कोने झाड़ लिए हैं।” जगमोहन ने स्वर को गम्भीर बना लिया- “ये एक करोड़ भी हमने अपने खर्चों के लिए रखा है। मेरे को तो शर्म आ रही है कि अगर तेरे को कहूं अभी एक करोड़ से काम चला ले।”

“कहां तीन अरब और कहां एक करोड़-?” प्रवेश गोदरा का तीखा स्वर कानों में पड़ा।

“वही तो मैं कह रहा हूं कि हमारे बीच वक्ती तौर पर मामला नहीं जम सकता।” जगमोहन ने पहले वाले लहजे में कहा- “अगर हमारी जुबान पर भरोसा है तो फिर सब कुछ ठीक हो सकता है।”

सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगायी। ध्यान जगमोहन की बातों पर था।

देवराज चौहान भी कुर्सी पर पसरा, जगमोहन को देख रहा था।

“क्या ठीक हो सकता है। क्या विश्वास करूं?”

“हम तेरे से वायदा करते हैं कि डकैती सफल होने के बाद तेरे को उसमें से तीन अरब की दौलत दे देंगे।”

“मेरे को बेवकूफ समझते हो।”

“मैंने पहले ही कहा है कि बात हम पर विश्वास करने की है।”

जगमोहन ने जानबूझ कर गहरी सांस ली- “विश्वास करने को तुम तैयार नहीं हो। फिर तो मैं यही कह सकता हूं कि हमारे रास्ते में तुम रुकावट डालना चाहते हो। डाल लो। जो फायदा मिल सकता वो फायदा ही उठा लो। या तुम ही बता दो अगर कोई रास्ता तुम्हें समझ में आये तो...”

दूसरी तरफ से आवाज नहीं आयी।

जगमोहन भी खामोश रहा। कुछ कहने की उसने जरूरत नहीं समझी।

आधे मिनट की चुप्पी के बाद प्रवेश गोदरा की आवाज कानों में पड़ी।

“इसके लिए मुझे अपने साथियों से बातचीत करनी पड़ेगी।”

“कितने साथी हो तुम?” जगमोहन ने पूछा।

“दस-बारह...”

“अच्छी बात है। उनसे सलाह-मश्वरा कर लो। दस-बारह साथी हो तो तीन अरब से ज्यादा की दौलत भी पा सकते हो।”

“वो कैसे?”

“इस काम में कुछ लोगों की जरूरत है। उन्हें हम बाहर से लेंगे तो भारी दौलत भी देंगे। हम ये काम करने जा रहे हैं और तुम तीन अरब की बात कर रहे हो। हमारी दौलत स्विटजरलैंड के बैंकों में है। इसलिए तीन अरब वाली बात तो पूरी हो नहीं सकती। अगर तुम लोग डकैती में हमारे साथ मिल जाओ तो, दस अरब की दौलत पा सकते हो।”

“दस अरब?”

“हां डकैती होते ही हाथों-हाथ हिस्सा कर लेंगे। तीन अरब और दस अरब में बड़ा फर्क होता है।”

“डकैती पच्चीस-तीस अरब की है तो उसमें से दस अरब क्यों आधा-आधा मिलना चाहिए।”

“आधा नहीं हो सकता।” जगमोहन ने अपने स्वर को सख्त कर लिया- “डकैती हमारी। प्लान हमारा। मेहनत हमारी। हमें तो तुम लोगों का थोड़ा सा साथ चाहिए। इसमें आधे की बात कहां से आ गयी। तुम लोग कभी ऐसा ही काम करने जा रहे हो तो, साथियों के तौर पर जिन लोगों को साथ लोगे, उन्हें क्या आधा माल दो। अगर समझदार हो तो, बातों में समझदारी दिखाओ भी। मैं तो कुल मिलाकर छ: अरब से ज्यादा नहीं देता। लेकिन गलती से मुंह से दस अरब निकल गया है। छ: में बात बनानी है तो बना। नहीं तो जो मन में आये कर-।”

“इस बारे में अपने साथियों से बात करता हूं।”

“छ: अरब में...” जगमोहन ने कहा।

“छ: नहीं, दस अरब। जो बात तुमने पहले ही कही तुम्हें उस पर ही टिके रहना चाहिए।”

“कल करोगे फोन?” जगमोहन के होठों पर शांत सी मुस्कान उभरी।

“कल नहीं अभी-आधे घंटे में कर रहा हूं।”

जगमोहन ने रिसीवर रख दिया। उसने देवराज चौहान को देखा।

“इसने यूं ही मान जाना था। एक करोड़ की दौलत की बात करने की जरूरत नहीं थी।”

“बहुत जरूरत थी। एक करोड़ की दौलत ही उसे विश्वास दिलवायेगी कि हम जो कह रहे हैं। सच कह रहे हैं।”देवराज चौहान बोला- “उसने फोन कब करने को कहा?”

“आधे घंटे में- “

“सबसे पहले तो वो दस अरब देने के लिए कहेगा, जिसका जिक्र तुमने किया है। फिर वो डकैती में साथ देने को भी कहेगा।”

“लेकिन उसके साथी कौन हो सकते है।” सोहनलाल बोला- “समझ नहीं आ रहा...”

“सब कुछ सामने आ जायेगा।” देवराज चौहान बोला।

“हम इसे गर्दन से पकड़कर खत्म भी कर सकते हैं।”

“ऐसा करने की जरूरत नहीं।” देवराज चौहान बोला- “हमें अपने काम में आदमियों की जरूरत है। वो आनन-फानन दौलत पा लेना चाहता है। ऐसे में उससे बढ़िया इस काम में हमारा विश्वासी साथी कौन होगा। साथ ही ये मामला आसानी से निपट जायेगा। यही समझता रहेगा कि उसने हमें ब्लैकमेल करके, दबाब में अपने को हमारे साथ रखा है जबकि हम उसे अपनी मर्जी के साथ, साथी के तौर पर अपने साथ रख रहे हैं।”

“और काम होने के बाद उसे अच्छी तरह समझा देंगे कि हमें ब्लैकमेल होने की आदत नहीं।” जगमोहन कड़वे स्वर में कह उठा।

तभी सोहनलाल बोला।

“डकैती के बारे में क्या सोचा है?”

“झंझट वाला मामला है। मत पूछ।”

“क्या मतलब?”

“सिक्योरिटी बहुत टाईट है।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा- “मालूम नहीं, अभी क्या होता है।”

“यानि कि इस बारे में शक है कि डकैती हो पायेगी या नहीं?”

“देवराज चौहान से पूछ।”

सोहनलाल ने देवराज चौहान को प्रश्न भरी निगाहों से देखा।

“फैशन शो शुरू होने में चार दिन बाकी है।” देवराज चौहान बोला- “डकैती के बारे में बात करने के लिए अभी हमारे पास वक्त है। मैं योजना तैयार कर रहा हूं। मेरे मस्तिष्क में सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा तो बता दूंगा।”

“पहले इस तीन अरब वाले से तो निपट लो।” जगमोहन कड़वे स्वर में कह उठा- “उसका फोन आता ही होगा।”

☐☐☐

रिसीवर रखकर प्रवेश गोदरा ने कमल शर्मा को परेशान सी निगाहों से देखा।

“क्या हुआ?” कमल शर्मा ने पूछा।

“जैसा हमने सोचा था वैसा बिल्कुल भी नहीं हो रहा- “

“मैं समझा नहीं…”

उसने कमल शर्मा को सारी बात बताई।

दोनों कुछ पलों तक एक-दूसरे को देखते हुए खामोश रहे।

“सारा मामला ही गड़बड़ हो गया।” आखिरकार कमल शर्मा के होठों से निकला।

“हम तो तीन अरब के आने की उम्मीद लगाए हुए थे और।”

“गोदरा साहब।” एकाएक कमल शर्मा बोला- “देवराज चौहान कैसा इंसान है?”

“कैसा-क्या?”

“ईमानदार है या बेईमान?”

“रनवीर भंडारी ने बताया था कि देवराज चौहान के साथ ठीक चला जाये तो, वो भी ठीक चलता है।”

“मतलब कि उस पर विश्वास किया जा सकता है।”

प्रवेश गोदरा ने कमल शर्मा को देखा।

“शर्मा। तुम जो कहना चाहते हो, स्पष्ट कहो।”

“जगमोदन की बात मान लेने में क्या हर्ज है। अगर वो अपनी जुबान पर कायम है तो हमें उनके साथ काम…।”

“पागल मत बनो शर्मा। जो भी हो हम डकैती जैसा काम नहीं सकते।” प्रवेश गोदरा के होठों से निकला।

“ये बात तो देवराज चौहान भी जानता होगा हम डकैती जैसा काम नहीं कर सकते। ये काम तो देवराज चौहान ही कर सकता है।

ऐसे में वो हमें जो भी काम देगा, जो हम कर सकते होंगे।”

प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा को देखता रहा।

“उन्हें साथियों की जरूरत है। वो हमें अपने साथ नहीं लेंगे तो किसी और को साथ कर लेंगे। दौलत दूसरे को मिल जायेगी। ये हमारे लिए सुनहरी मौका है। दस अरब हमें मिल गये तो सोचो, हम कैसी शानदार जिन्दगी के मालिक होंगे।”

“ये डकैती है। खतरे का अनुमान लगा सकते हो कि कितना होगा।” प्रवेश गोदरा एक-एक शब्द चबा कर कह उठा।

“डकैती देवराज चौहान ने करनी है। हमने नहीं।” कमल शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा- “दौलत पाने के लिए खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। सव कुछ उसने ही करना है। हमने तो देवराज चौहान के साथ रहना है।”

प्रवेश गोदरा ने परेशानी भरे ढंग से पहलू बदला।

कमल शर्मा गम्भीर निगाहों से उसे देख रहा था।

दोनों इस बात से अंजान थे कि बगल वाले कमरे के दरवाजे से सटी देवी दोनों की बातें सुन रही थी। सब कुछ अच्छी तरह समझ रही थी। उसके चेहरे पर गम्भीरता और आंखों में सोच के भाव थे।

लम्बी होने वाली खामोशी को प्रवेश गोदरा ने तोड़ा।

“शर्मा...”

“गोदरा साहब।”

“देवराज चौहान का साथ दिया और पुलिस के हाथ पड़ गये तो क्या होगा?”

“खतरा तो है।” कमल शर्मा ने हिचकिचाकर धीमे स्वर में बोला- “दूसरी तरफ दस अरब की दौलत भी है।”

“जगमोहन ने कहा है कि उसके पास एक करोड़ की दौलत है एक करोड़ कम नहीं होता। उसे लेकर हम एक तरफ हट सकते हैं।”

“मर्जी है आपकी गोदरा साहब। आपको एक करोड़ पसन्द है तो एक करोड़ ले लीजिए।” कमल शर्मा सिर हिलाकर कह उठा- “मुझ पर एक मेहरबानी कर दीजिए कि अपने साथी के तौर पर मुझे देवराज चौहान के साथ लगा दीजिए। अगर किस्मत ने मेरा दिया तो दस नहीं तो दो-चार अरब की दौलत तो समेट ही लूंगा।

“तुम नहीं मानोगे।”

“अपनी-अपनी समझ की बात है। देवराज चौहान के साथ काम करने की ऑफर मुझे अच्छी लगी। उसके साथ तो काम करने की कई मरे जा रहे होंगे। यह तो हमारी किस्मत अच्छी है कि हमें, उसके साथ, इतनी बड़ी डकैती पर काम करने का मौका मिल रहा है। इस मौके को छोड़ना नहीं चाहता। जो होगा देखा जायेगा।”  शर्मा गम्भीर था।

प्रवेश गोदरा ने गम्भीरता से भरी सांस ली।

एक बार फिर चुप्पी ने अपने पैर फैला लिए।

“ठीक है।” प्रवेश गोदरा ने फैसले भरे स्वर में कहा- “हम देवराज चौहान के साथ काम करेंगे, दस अरब के लिए।”

कमल शर्मा के होठों पर मुस्कान उभरी।

“आपने ठीक फैसला लिया है गोदरा साहब।”

“जगमोहन ने कहा था कि उसके पास एक करोड़ की दौलत है इस वक्त”

“तो?”

“हम उससे कहेंगे कि वो एक करोड़ की दौलत हमारे हवाले कर दे। जब डकैती सफल हो जायेगी, तो हमारे हिस्से में से एक करोड़ कम कर लिया जाये।” प्रवेश गोदरा गम्भीर स्वर में कह उठा- “इसमें दो फायदे होंगे। एक तो करोड़ रुपया हमारे पास आ जायेगा। दूसरा ये कि उनकी ईमानदारी चैक हो जायेगी अगर करोड़ हमें दे दिया तो...”

“ये भी ठीक है।”

“एक बात और।” प्रवेश गोदरा सोच भरे स्वर में बोला- “मैंने उससे कह दिया कि मेरे दस-बारह साथी हैं। तो ये बात कायम रखनी चाहिए। ताकि कोई गड़बड़ होने से पहले, उन्हें डर रहे कि हमारे- साथी भी हैं। वो सारा मामला जानते हैं। अगर कुछ हुआ तो हमारी तरफ से वो सामने आ जायेंगे।”

“ये अच्छी कही- “

“इस बारे में मैं बात करूंगा उनसे।” प्रवेश गोदरा ने होंठ सिकोड़ कर कहा।

कमल शर्मा उसे देखता रहा।

“इस मामले से वास्ता रखती कोई और बात?”

कमल शर्मा ने इन्कार में सिर हिलाया।

“तो मैं जगमोहन से फोन पर बात करता हूँ?”

देवी सब बातें सुन रही थी।

फोन की बेल होने पर सोहनलाल ने फुर्ती से रिसीवर उठाया।

“हैलो...”

“जगमोहन।” उसके कानों में प्रवेश गोदरा की आवाज पड़ी।

“रुको- “कहने के साथ ही सोहनलाल ने माऊथपीस पर हाथ रखा और बोला- “ये प्रवेश गोदरा ही है। मैंने आवाज पहचान ली है। लो-तुमसे बात करना चाहता है।”

जगमोहन ने पास पहुंच कर रिसीवर थामा।

“कहो। तुम्हारे साथी क्या कहते हैं?”

“तुम्हारे साथ काम करने में, सब डर रहे हैं। फिर भी मैं और मेरा एक साथी तुम्हारे साथ काम कर सकते हैं।”

“मतलब कि दो...और बाकी-?”

“बाकी हर तरफ नजर रखेंगे। इस बात का भी ध्यान रखेंगे कि अगर डकैती का काम ठीक-ठीक निपट गया तो तुम लोग हमारे हिस्से का दस अरब देने में आनाकानी न करो।” प्रवेश गोदरा का स्वर शांत था।

“चिन्ता करने की जरूरत नहीं- “जगमोहन के होठों पर तीखी मुस्कान उभरी- “हम तुमसे भी ज्यादा शरीफ हैं।”

“तो अपनी शराफत साबित करो।”

“कैसे?”

“तुमने कहा था कि तुम्हारे पास एक करोड़ की दौलत है। वो एक करोड़ मेरे हवाले करके अपनी जुबान पक्की होने का सबूत दो। जब दस अरब की दौलत हमें दोगे तो उसमें से एक करोड़ काट लेना।”

“तुम्हें हम पर विश्वास करना...”

“बाकी के दो अरब, निन्यानवें करोड़ का विश्वास ही कर रहा हूं। एक करोड़ मेरे हवाले करके अपना विश्वास बिठाओ। मेरे साथियों का कहना है कि इस मामले की शुरूआत एक करोड़ से ही होगी।”

“ये बात है तो मुझे करोड़ देने में कोई एतराज नहीं। इस जगह के बारे में तुम जानते ही हो। आ जाओ और...।”

“तुम हमारी पसन्द की जगह पर एक करोड़ रुपया दोगे।”

“ये भी मंजूर-बोलो कहां आना है?”

“जगह भी बता देता हूँ। लेकिन वहां में नहीं, मेरा आदमी पहुंचेगा। वो तुमसे करोड़ रुपया लेगा।”

“तुम्हारे आदमी को मैं पहचानूंगा कैसे?”

“वो तुम्हें आसानी से पहचान लेगा। तुम्हें सिर्फ करोड़ रुपया वहां तक लाने की तकलीफ उठानी है। उसके बाद माल की तसल्ली कर लेने के बाद, फोन पर तुमसे बात करेंगे।”

“एक करोड़ की दौलत में पचास-लाख नगद हैं और पचास लाख के हीरे-जेवरात...”

“दौलत तो दौलत ही होती है जगमोहन। बेशक वो किसी भी रंग-रूप में क्यों न हो। अब से एक घंटे बाद उस जगह पर पहुंचो,

जो जगह मैं बताने जा रहा हूं। मेरा आदमी तुम्हें वहीं मिलेगा।”

☐☐☐

देवी कुर्सी पर बैठी गम्भीर सोचों में डूबी थी। कभी-कभार तो हद से ज्यादा बेचैन होकर खड़ी हो जाती और टहलने लगती। ऐसा लगता था जैसे वो किसी फैसले पर पहुंचना चाहती हो। परन्तु कोई बात उसे फैसला लेने से रोक रही हो। सोचों के बीच कभी उसके होंठ भिंच जाते।

पन्द्रह मिनट पहले प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा यहां से गये थे। पहले की और अब की बातें सुनकर वो पूरी तरह समझ चुकी थी कि मामला क्या है और उसका भाई, शर्मा के साथ मिलकर क्या करने जा रहा है।

☐☐☐

प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा के माथों पर रह-रहकर पसीने की बूदें झिलमिला रही थी। जिसे वो आस्तीन से या हाथ की उल्टी हथेली से रह-रह कर साफ कर रहे थे। कमल शर्मा कार ड्राईव कर रहा था। प्रवेश गोदरा बगल वाली सीट पर बैठा था। पांवों के पास जगह में उसने बैग को ठूंस रखा था, जो जगमोहन ने दिया था। प्रवेश गोदरा कार में ही बैठा था धड़कते दिल के साथ, जब कमल शर्मा दूर, जगमोहन से बैग ले रहा था।

उसके बाद उसने जगमोहन को कार में बैठकर जाते देखा।

सावधानी के नाते वो सीधे घर नहीं पहुंचे और ढाई घंटों से सड़क पर भटकते यूं ही कार ड्राईव करते ये देख रहे थे कि जगमोहन या उसका कोई आदमी पीछा तो नहीं कर रहा। आखिरकार उन्हें विश्वास हो गया कि जगमोहन ने कोई चालाकी नहीं की। पीछा नहीं किया जा रहा।

“अब कार, घर को ले ले।” प्रवेश गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

कमल शर्मा ने जल्दी से सिर हिला दिया।

“इस बैग में एक करोड़ रुपया होगा शर्मा?” प्रवेश गोदरा का गला सूख रहा था।

“ह-होना तो चाहिए।”

“क-करोड़ जितना भारी है ये?”

“म-मुझे क्या मालूम करोड़ का कितना भार होता है।” कमल शर्मा की आवाज अजीब सी हो रही थी।

“जरूर होगा। अगर इसमें करोड़ रुपया नहीं तो, जगमोहन को ऐसा ड्रामा करने का क्या फायदा?”

कमल शर्मा ने कुछ नहीं कहा।

दोनों घर पहुंचे। कार से बाहर निकलते वक्त भी उन्होंने हर तरफ सावधानी से देखा। परन्तु ऐसा कोई भी नहीं दिखा कि लगे, वो उनके पीछे है।

प्रवेश गोदरा ने जल्दी से भारी बैग को संभाला और आगे बढ़कर दरवाजे पर लगी कॉल बैल बजाई। दोनों बदहवास से लग रहे थे।

कुछ पलों बाद ही दरवाजा खोला देवी ने।

दोनों जल्दी से भीतर प्रवेश कर आये।

देवी दरवाजा बंद करके पलटी और शांत स्वर में कहा।

“क्या बात है भैया। आपकी तबियत ठीक नहीं...।”

“सब ठीक है। तू पानी पिला...”

दोनों पर निगाह मार कर देवी खामोशी से दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गई।

प्रवेश गोदरा ने जल्दी से बैग खोलना चाहा। परन्तु बैग के कोने में ताला लगा था।

“चाकू से काट लो बैग को- “ कमल शर्मा ने बेसब्री से कहा।

प्रवेश गोदरा फौरन उठा और टेबल की ड्राअर से ब्लेड निकाल लाया।

तभी देवी दो गिलासों में पानी ले आयी। उसे आया पाकर प्रवेश गोदरा ठिठका।

“गिलासों को टेबल पर रख दे और तू दूसरे कमरे में जा। हम व्यस्त हैं।”

गिलासों को टेबल पर रखकर देवी दूसरे कमरे में चली गयी।

परन्तु दरवाजे की ओट में खड़ी भीतर की बातों को सुनने लगी। चेहरे पर गम्भीरता नजर आ रही थी।

प्रवेश गोदरा ने जल्दी से ब्लेड से बैग को काटा। खोला। दूसरे ही पल दोनों की आंखें हक्के-बक्के अंदाज में फैलती बैग में पांच-पांच सौ की नोटों की गड्डियां ढूंसी हुई थी हीरे जड़े जेवरात चमक रहे थे। कई पलों तक दोनों के मुंह से बोल न फूटा। पैना सन्नाटा छा गया वहां

“शर्मा...”

“ये तो करोड़ रुपया लग रहा है।”

“गि-गिनते हैं।”

दोनों की हालत ऐसी हो रही थी जैसे बेहद खास सगा मर गया हो।

“नोटों की गड्डियां निकाल-।” प्रवेश गोदरा के होठों से थरथराता स्वर निकला।

उसके बाद दोनों ने नोटों की गड्डियां निकालनी शुरू की। नीचे ढेर लग रहा था। उनके होंठों से कोई बात नहीं निकल रही थी। गले सूख रहे थे। पानी के गिलास टेबल पर पड़े थे परन्तु इतनी होश ही कहां कि घूंट भर सकें। कांपते हाथों की थरथराती उंगलियों से सौ-सौ नोटों की गड्डियों को गिना।

“पू-पूरी स-सौ हैं।”

“प-पचास लाख-। ये-जेवरात भी पचास लाख के होंगे।”

“देखता हूं।” प्रवेश गोदरा ने कहा और बैग से जेवरात निकालकर एक-एक जेवरात को चैक करने लगा। जेवरातों का तो वो पारखी था। अच्छी तरह चैक कर रहा था कि जेवरात असली हैं या नकली। असली हैं तो कीमत क्या होगी?

आधा घंटा लगा। सारे जेवरात चैक कर लिए।

कमल शर्मा तब तक गड्डियों को वापस सलीके से लगा चुका था।

“शर्मा, जेवरात तो असली हैं।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली-लेकिन पचास लाख से कम के हैं।”

“कितने के हैं?”

“चौंतीस लाख के-लेकिन हर जेवरात असली है।”

“मतलब कि करोड़ में से सोलह लाख कम हैं। चौरासी लाख की दौलत है। पूरे करोड़ की नहीं।’

“हाँ शर्मा। जगमोहन ने हेरा फेरी की...।”

“नहीं गोदरा साहब। उसने हेरा फेरी नहीं की।” कमल शर्मा ने विश्वास भरे स्वर में टोका- “हेरा फेरी करनी होती तो नकली जेवरात भी दे सकते थे।”

“तो फिर सोलह लाख के जेवरात कम क्यों हैं।”

“वो लोग जौहरी तो हैं नहीं। कीमत आंकने में गलती हो गई होगी जो चौरासी लाख दे सकता है, वो सोलह लाख की हेरा फेरी क्यों करेंगे। बेकार की बात मत सोचिये।”

प्रवेश गोदरा ने पहलू बदल कर सिर हिलाया।

“तुम ठीक कहते हो। जेवरात की कीमत आंकने में उनसे गलती हो गई होगी। लेकिन क्या फर्क पड़ता है। इस समय हमारे पास इतनी दौलत है कि शायद सारी उम्र भी इतनी न कमा पाते। ये हमारी है।”

“आप तो अभी से बहकने लगी गोदरा साहब। दस अरब की दौलत की बात सोचिए, जो जल्दी हमारे पास होगी। ये तो नजराना है।

प्रवेश गोदरा ने मुस्कुराने की चेष्टा की।

“ठी-क कहते हो।”

“अब क्या करना है।” कमल शर्मा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी- “वो तो अपनी बात पर खरे उतरे...”

दोनों की नजरें मिली।

“वहीं करेंगे। जो हमारा प्रोग्राम था।”

“देवराज चौहान के साथ मिलकर डकैती...।”

“हां। तुम उनके सामने कम ही बोलना, जो बात होगी। मैं संभालुंगा।” प्रवेश गोदरा ने कहा।

“जैसा ठीक समझें-।” कमल शर्मा ने सिर हिलाया- “वो हमारे फोन का इंतजार कर रहे होंगे।”

उसी पल प्रवेश गोदरा ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया और नम्बर मिलाने लगा। चेहरा चमक रहा था।

दूसरे कमरे में दरवाजे की ओट में देवी सब कुछ सुन रही थी।

☐☐☐

फोन की बेल बजी।

“आ गया मुर्गे का फोन- “ सोहनलाल ने गोली वाली सिगरेट का कश लेते हुए कहा।”

जगमोहन ने बात की।

“माल गिन लिया होगा।” जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।

“सोलह लाख कम हैं।”

“गलत बात मत बोल। मैंने अपने हाथों से गिनकर नोटों की गड्डियाँ डाली…”

“गड़ियां पूरी हैं। जेवरात चौंतीस लाख के हैं।”

“मैंने तो पचास के ऊपर पांच लाख के जेवरात डाले थे। कम कैसे हो सकते हैं।”

“कम हैं।”

“मैं नहीं मानता।”

“तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं।” प्रवेश गोदरा का स्वर सामान्य था।

“तू झूठ नहीं बोल सकता क्या।” जगमोहन उखड़ा- “देख भाई जो चौरासी लाख इस तरह अंजान आदमी को दे सकता है वो भला कम क्यों देगा। सोलह और भी दे सकता है। गलती तो सब से हो सकती है। हो सकता है, जेवरातों के दाम लगाने में तेरे से गलती हो गयी हो। या फिर मेरे से गलती हो गयी हो। मेरे ख्याल में सोलह लाख ऐसी रकम नहीं कि तू ये बात मेरे से कहता। चौरासी लाख तो मिल गये। मैं क्या तेरे से सौलह लाख की हेरा फेरी करूंगा। कुछ तो शर्म की होती, कहने से पहले। फिर भी नहीं विश्वास तो आकर सोलह लाख ले लो। या फिर जब तेरे से डकैती के पैसे का हिसाब करेंगे तो सोलह लाख दे देंगे। हमारे होते हुए तू पैसे की परवाह मत कर।”

दो पलों तक आवाज नहीं आयी।

“अब क्या नोटों की गिनती करने लग गया।”

“मैं चौरासी लाख के बारे में सोच रहा हूं।”

“क्या?” जगमोहन के होठों से कड़वा स्वर निकला- “बैंक का नाम-पता बताऊं, जहां जमा कराने...।”

“चौरासी लाख भी कम नहीं होते जगमोहन-।”

“जहां दस-बारह हिस्सेदार हों वहां तो चौरासी लाख कुछ भी नहीं। अकेले तेरे वास्ते तो बहुत हैं।”

“मैं अकेला नहीं...”

“तो फिर क्या कहना चाहता है?”

“अगर हम चौरासी लाख लेकर बैठ जायें तो तू क्या करेगा?”

“कुछ भी नहीं। सोचूंगा। सस्ते में जान छूट गयी। अब सीधी बात बोल, आगे का तेरा क्या प्रोग्राम है?”

दो पल की चुप्पी के बाद प्रवेश गोदरा की आवाज आयी।

“पहले तेरे पास मैं आऊंगा। सब ठीक लगा तो अपने एक साथी को और बुला लूंगा। बाकी के साथी अंत तक सारे मामले पर नजर रखेंगे। जरूरत पड़ी तो सहायता के लिए सामने भी आ जायेंगे। वैसे उनकी कोशिश होगी कि वे सामने आये ही नहीं।” प्रवेश गोदरा का स्वर जगमोहन के कानों में पड़ा।

“तू कब आ रहा है?”

“कल...”

“तेरे को लेने कहां आऊं?”

“बंगला मैंने देखा है। कहो तो सीधा पहुंच जाऊं।”

“आ जाना।”

“कल दिन के बारह बजे तक आ जाऊंगा।”

जगमोहन ने रिसीवर रख दिया।

सोहनलाल सिर खुजलाने लगा।

देवराज चौहान ने सिग्रेट सुलगा कर कश लिया।

“ये सब करने के हमें दो फायदे मिले। एक तो ये कि वो हमें ब्लैकमेल करने की कोशिश में था, इस नाजुक मौके पर परन्तु अब उसका ध्यान ब्लैकमेलिंग से हट गया। दूसरे ये कि इस काम में हमें साथी की जरूरत थी। दो-चार लोगों को पैसा या हिस्सा देकर, अपने साथ मिलाते ही। लेकिन भागदौड़ नहीं करनी पड़ी। काम के लिए बन्दे भी मिल गये।”

“इस बात का मुझे पूरा विश्वास है कि चौरासी लाख लेने वाले के पास साथी नहीं है।” जगमोहन बोला।

“प्रवेश गोदरा नाम है उसका।” सोहनलाल बोला- “उसके साथी होंगे भी तो किराये के होंगे।”

“हमारे रास्ते में आकर, बहुत हिम्मत का काम किया है उसने।” देवराज चौहान मुस्कुराया।

“ऐसी हिम्मत नहीं है प्रवेश गोदरा में कि हमारे रास्ते में आये, लेकिन दौलत की खुशबू उसे यहां तक ले आयेगी।”

एकाएक जगमोहन का चेहरा कठोर हो गया।

“लेकिन इसे इस चौरासी लाख के अलावा, कुछ और नहीं देंगे। फूटी कौड़ी भी नहीं।”

देवराज चौहान और सोहनलाल की नजरें जगमोहन पर गयी।

“उसने हमें ब्लैक मेल करने की कोशिश की है सजा तो ये है कि इसे खत्म कर दिया जाये। लेकिन ये भी सजा है कि इस से इस डकैती में अपना काम लेंगे और जो दिया सो दिया, इसके अलावा फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे।”

“मैं तो कहूंगा, जो दिया है, उसमें से भी ज्यादा से ज्यादा वापस लेने की कोशिश की जाये।” सोहनलाल बोला।

“ये मुद्दा नहीं है, हमारी बातों का-।” देवराज चौहान ने कहा।

“लेकिन ये तय है कि इसे बाद में फूटी कौड़ी भी नहीं देनी है।” जगमोहन पुन: बोला- “यही सजा है हमें ब्लैकमेल करने की।”

“चूंकि गलती उसकी है। इसलिए मैं इस मामले में नहीं आऊंगा।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “बेशक उसके साथ तुम कैसा भी सलूक करो। पहले डकैती को कामयाब हो लेने दो। सोहनलाल...”

“हूं।” सोहनलाल ने देवराज चौहान को देखा।

“तुमने अच्छी तरह आवाज पहचानी कि वो तुम्हारी पहचान वाला प्रवेश गोदरा ही है।”

“हां”

“वो कल हमारे पास आयेगा।” देवराज चौहान ने कश लिया- “तब तक तुम उसके बारे में सारी जानकारी इकट्ठी करो कि असल में वो क्या है। उसके साथी कौन-कौन हैं।”

☐☐☐

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर रखा।

कमल शर्मा उसे ही देख रहा था। सब सुन समझ लिया था उसने।

“कल बारह बजे देवराज चौहान के पास जाओगे?” कमल शर्मा ने पूछा।

“हां” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “उनके पास एक-दो दिन रहकर, फिर तुम्हें पास बुलाऊंगा। उन्हें यही कहते रहेंगे कि बाहर हमारे साथी हम पर नजर रख रहे हैं कि सब ठीक है कि नहीं।”

कमल शर्मा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

“क्या हुआ?”

“खतरे की बात सोच रहा हूं।”

“पहले तो तू मेरे को हिम्मत दे रहा था।”

“वो तो अब भी दे रहा हूं। पैसा है तो खतरा होगा ही। फिर भी सोचना तो पड़ता ही है।”

“अब मेरी बात सुन । सोचने का वक्त निकल चुका है। ओखली में सिर दे दिया है। ऐसे में घबरा मत कि जब मूसल पड़ते तो गिनते नहीं। नोट मिले तो नोटों को गिनना।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा।

कमल शर्मा की निगाह सामने पड़े बैग की तरफ गयी। नोटों की गड्डियां और जेवरात, यानि की चौरासी लाख रुपया बैग में मौजूद था। कुछ पलों तक वो बैग को घूरता रहा फिर प्रवेश गोदरा को देखा।

“गोदरा साहब। कल तो आप देवराज चौहान के पास चले जायेंगे। इस बैग को कहाँ रखना है।”

“इस बैग से तुम्हारा कोई मतलब नहीं। जहां भी रखूगा वो जगह सुरक्षित होगी।” प्रवेश गोदरा ने कहा- “सारा काम निपटा लेने दो। अब मैंने सोचा है कि इस काम में तुम मेरे बराबर के हिस्सेदार होंगे।”

“बराबर के?”

“हां। दस अरब जैसी बड़ी दौलत लेकर मैंने क्या करना है। पांच अरब तुम ले लेना।”

“ओह- “ कमल शर्मा की आंखों में चमक आ गयी- “ये तो आपने बहुत अच्छा सोचा।”

“अब सुनो, कल तुमने क्या करना है।” कहने के साथ ही प्रवेश गोदरा उसे समझाने लगा।

करीब पांच मिनट उनकी बात हुई।

“समझ गया- “ कमल शर्मा सिर हिलाकर कह उठा।

“देवराज चौहान के पास जाने से पहले, तुम्हें खबर कर दूंगा। फोन पर ही रहना। अब तुम जाओ। कुछ काम निपटाने हैं मुझे।”

कमल शर्मा चला गया।

प्रवेश गोदरा ने गम्भीर चमक भरी निगाहों से बैग को देखा। फिर देवी को आवाज लगाई।

देवी दूसरे कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी सब बातें सुन-समझ रही थी।

जब दूसरी बार आवाज लगाई तो वो कमरे से निकलकर सामने आ गयी। चेहरे पर हमेशा की तरह रहने वाले सामान्य भाव थे। दिल-दिमाग की हलचल के निशां कहीं से भी झलक नहीं रहे थे।

“भाई साहब चले गये।” देवी बोली- “आपने चाय के लिए नहीं कहा।”

“शर्मा को जल्दी जाना था।” प्रवेश गोदरा ने कहा- “कल से मुझे भी कुछ काम है। शायद पन्द्रह बीस दिन के लिए व्यस्त हो जाऊंगा। मुम्बई से बाहर जाना है मुझे।”

जवाब में देवी ने सिर हिला दिया।

“ये बैग।” प्रवेश गोदरा ने बैग की तरफ इशारा किया- “इसमें चौरासी लाख रुपया है। कुछ जेवरात । कुछ नगद। ये पार्टी की अमानत है। इसका ध्यान रखना।”

“भंडारी साहब का है ये।” सहमति से सिर हिलाते हुए देवी ने पूछा।

“ऐसा ही समझ लो। इसे संभालकर रख लो कहीं।” प्रवेश गोदरा उठते हुए बोला- “मैं देर रात वापस लौटूंगा। खाना बाहर ही खाऊंगा।”

देवी, प्रवेश गोदरा को देखती रही।

“कुछ कहना है?” प्रवेश गोदरा ने पूछा।

“विनोद के बारे में बात करनी है अगर आप...।”

नफरत के भाव आ ठहरे प्रवेश गोदरा के चेहरे पर।

“मैं व्यस्त हूं। इस बारे में बाद में बात करेंगे।” कहने के साथ ही वो खुले दरवाजे से बाहर निकल गया।

“रिश्ते भी तभी कायम रहते हैं भैया, अगर उन्हें कायम रखा जाये।” देवी गहरी सांस लेकर बड़बड़ाई और आगे बढ़कर दरवाजा बंद किया फिर पलटकर बैग के पास आयी और उसे खोलकर भीतर मौजूद नोटों की गड्डियों और जेवरातों को देखने लगी। चेहरे पर गम्भीरता दृढ़ता और सोच के गहरे भाव छाये थे।

☐☐☐

रूपा ईरानी की गम्भीर निगाह, प्रवेश गोदरा के चेहरे पर टिक चुकी थी।

“तो तुमने देवराज चौहान से एक करोड़ की दौलत ले ली।”

एक-एक शब्द चबाकर धीमे स्वर में उसने खामोशी तोड़ी।

“एक करोड़ नहीं। चौरासी लाख।”

“मेरी निगाहों में एक ही बात है।” रूपा ईरानी बोली- “मैं एक करोड़ ही कहूंगी।”

प्रवेश गोदरा ने पहलू बदलकर, रुपा ईरानी के गम्भीर चेहरे को देखा।

“बुरा क्या किया?”

“प्रवेश, तुम क्या सोचते हो कि देवराज चौहान जैसे डकैती मास्टर से नाता जोड़कर तुमने अच्छा किया?”

“डकैती करना देवराज चौहान के लिए मामूली बात है।” रूपा ईरानी बोली- “जबकि तुम्हारे लिए उत्तेजना और घबराहट का वक्त होगा, जब तुम उसके साथ डकैती के लिए आगे बढ़ रहे होंगे।”

प्रवेश गोदरा के चेहरे पर घबराहट सी उभरी फिर लुप्त हो गयी।

“देवराज चौहान के साथ काम करना घाटे का सौदा नहीं।”

“वो कैसे?”

“उसकी आज तक की हर डकैती सफल रही है।” प्रवेश गोदरा सूखे होठों पर जीभ फेरकर कह उठा।

“तुम्हारा मतलब कि इस डकैती में भी वो सफल होगा।”

“क्यों नहीं…”

कुछ पलों तक वो उसे देखती रही फिर बोली। “मेरा ये मतलब नहीं कि वो सफल नहीं होगा। भगवान करे वो पूरी तरह सफल रहे।क्योंकि तुम उसके साथ हो और मैं नहीं चाहती कि तुम्हारा कुछ बुरा हो। लेकिन तुमने खतरनाक काम में हाथ डाल लिया है।”

प्रवेश गोदरा होंठ भींचे, रूपा ईरानी को देखता रहा।

“चौरासी लाख कम नहीं होते प्रवेश- “ एकाएक रूपा ईरानी बोली।

“क्या कहना चाहते हो?”

रूपा ईरानी मुस्कुराई फिर उठी।

“आज रात तो रुकोगे मेरे पास?”

“बात कुछ और हो रही थी कि…”

“वो बात भी हो जायेगी। पहले मेरी बात का जवाब दो। शाम के सात बज रहे हैं। रुकोगे तो रात के लिए तैयारी भी करती रहूं।” उसके स्वर में अर्थपूर्ण भाव आ गया।

“स्मैक की डोज ले लेना चाहती हो।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस ली।

“हां।” रूपा ईरानी हौले से हंसी- “स्मैक की मस्ती में तुमसे प्यार करके, स्वर्ग जैसा महसूस होने लगता है।”

“पूरी रात नहीं रुक पाऊंगा।” प्रवेश गोदरा ने कहा- “वापस भी जाना है।”

“क्यों?”

“घर पर वो चौरासी लाख पड़ा...”

“चौरासी लाख की इतनी चिन्ता हो रही है। जब अरबों की दौलत आ जायेगी, तब तुम्हारा क्या हॉल होगा।” वो हंसी।

प्रवेश गोदा ने जवाब न देकर, सिग्रेट सुलगा ली।

रूपा ईरानी दूसरे कमरे में चली गयी।

दस मिनट बाद लौटी वो। तब तक प्रवेश गोदरा अपनी ही सोचों में उलझा रहा था। रूपा ईरानी की आंखों में हल्की सी मस्ती के डोरे तैर रहे थे। डोज ले ली थी उसने।

“तुम मेरे सामने बैठ कर भी डोज ले सकती थी।” प्रवेश गोदरा ने उसे देखा।

“मुझे शुरू से ही आदत है स्मैक की डोज अकेले में लेने की। खामोशी में डोज लेने में, पूरा लुफ्त उठाया जा सकता है। जैसे हम बेड पर हों और तीसरा पास न होने पर जो मजा आता है वही मजा।”

प्रवेश गोदरा ने उसकी बात काटी। “तुम कुछ कह रही थी। चौरासी लाख के बारे में।”

“हां।” अब उसकी आवाज में मस्ती महसूस की जा सकती थी- “मैं कह रही थी चौरासी लाख कम नहीं होते।”

“किस तरह से कम नहीं होते?”

“मुफ्त के माल के हिसाब से।” रूपा ईरानी ने अपनी नशे से भरी आंखों से उसकी आंखों में देखा- “बिना कुछ किस चौरासी लाख तुम्हारे हाथ लग गया। मजे लो। इतने पैसे में तुम अपनी जिन्दगी का ढर्रा बदल सकते हो। दस-बीस लाख शर्मा को भी देने पड़े तो परवाह नहीं। पैसा दबाकर मस्त हो जाओ।”

प्रवेश गोदरा, रूपा ईरानी को देखे जा रहा था।

“आगे कहो...”

“देवराज चौहान के पास जाने की जरूरत नहीं। उसके साथ काम करके खतरा उठाने की क्या जरूरत है।”

“जरूरत अरबों रुपयों की है।” प्रवेश गोदरा बोला- “जब मेरे पास, डकैती के बाद अरबों रुपये आ जायेंगे तो तब मेरी शानो शौकत देखना। क्या मजा होगा मेरी जिन्दगी का। चौरासी लाख में मेरी तसल्ली नहीं हो रही।”

“दिमाग में अरबों की दौलत की हवा घुस जाये तो फिर चौरासी लाख में तसल्ली हो पानी कठिन हो जाती है।” रूपा ईरानी के चेहरे पर नशे से भरी मुस्कान उभरी- “तुमने बताया कि उन्होंने तुम्हें एक करोड़ रुपया तुम्हारे कहने पर दे दिया। ये भी न पूछा कि कौन हो तुम। कहां रहते हो।”

“हाँ।” रूपा ईरानी पर निगाह टिकाये, प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया।

“देवराज चौहान जैसे इन्सान को तुम बेवकूफ समझते हो कि वो एक करोड़ की रकम, अंजान व्यक्ति को दे देगा।” रूपा ईरानी हंसी- “उसके बारे में कुछ पूछेगा भी नहीं।”

“क्या कहना चाहती हो?” प्रवेश गोदरा की आंखें सिकुड़ी।

रूपा ईरानी खड़े होते हुए बोली।

“तुम्हारे लिए व्हिस्की तैयार कर देती हूं। वरना बाद में तुम एक के बाद एक पैग मांगोगे।” कहकर वो दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गयी।

प्रवेश गोदरा की निगाह हलचल कर देने वाले उसके कूल्हों पर ही थी। लेकिन उसका मस्तिष्क, उसकी सोचे, इस सब बातों से बहुत दूर थी।

रूपा ईरानी लौटी। हाथ में बोतल-गिलास और बगल में कोक की बोतल फंसा रखी थी। सब कुछ टेबल पर रखा। और खुद कुर्सी पर पसर गयी।

प्रवेश गोदरा ने अपने लिए पैग बनाया। घूंट भरा।

“साथ में खाने की जरूरत पड़े तो फ्रिज से कुछ निकाल लेना।” रुपा ईरानी नशे की मस्ती भरे स्वर में कह उठी- “साल भर पहले की बात है। एक शूटिंग के लिए मैं मारीशस गई थी। वहां पर हिन्दुस्तान का बहुत बड़ा बिजनैस मैन मिला। वो अपने प्रोडेक्ट की एक फिल्म में मुझे लेना चाहता था। मैं उसके प्रोडक्ट की पब्लिसिटी करूं। इसके लिए वो मेरे पीछे पड़ गया। आखिरकार मैंने तंग आकर उसके सामने सिर्फ पांच मिनट की फिल्म के लिए, पच्चीस लाख की डिमांड रखी और कहा कि वो एक दिन में अपना काम पूरा कर ले तो मैं तैयार हूं। उसने मेरी सारी शर्ते मान ली। एडवांस पच्चीस लाख दे दिया।

तब वो मुझे दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख लगा। मैंने उसे कहा कि वो स्क्रिप्ट-कैमरा और यूनिट का इंतजाम कर ले। इस ऐड फिल्म से फुर्सत पाते ही उसे फोन कर दूंगी। उसके होटल का नंबर ले लिया।”

रूपा ईरानी ठिठकी।

प्रवेश गोदरा के हाथ में थमा गिलास आधे से ज्यादा खाली हो चुका था।

“फिर?”

“मेरा काम खत्म हुआ तो मारीशस से वापसी की टिकट बुक हो गई। पच्चीस लाख मैंने सूटकेस में ठूंस लिया था। इस बात की मैंने परवाह नहीं कि जिसने पच्चीस लाख दिया है, एक दिन एड फिल्म के लिए, उसके लिए भी निकालना है। प्लेन के वक्त मैं एयरपोर्ट पहुंची तो टिकट दिखाने वाले काउंटर के पास वो खड़ा था। उसे सामने पाकर मेरी तो हवा ही सरक गयी। उसने आराम से मुझे बताया कि उसके चार आदमी बराबर उस पर नजर रखे हैं। उसके बारे में पूरी खबर दे रहे हैं। मैंने सोचा शायद तुम भूल गयी होगी कि तुम्हें मेरे प्रोजेक्ट की मशहूरी के लिए, एक फिल्म में काम करना है। उसने बताया कि सब तैयारी हो चुकी है और कल का पूरा दिन एड फिल्म बनाने में बीतेगा। वो मुझे लेने एयरपोर्ट पर आया है। साथ ही मुझे इस बात का अहसास करा दिया कि एयरपोर्ट पर उसके दो हथियारबंद आदमी मौजूद हैं। जिन्हें मैंने कुछ दूरी पर खड़े देख लिया था। वो मुझे अपने साथ ले गया। शानदार होटल में ठहराया गया। मेरा पूरा ध्यान रखा अगले दिन शूटिंग करके उसने एक फिल्म तैयार की।  उसके बाद वो रात को मुझे प्लेन पर चढ़ाने के लिए एयरपोर्ट पर छोड़ने आया और उसने मुझे एक लाईन कही। वो शब्द मुझे कभी भी नहीं भूलते।”

“क्या?” उसके होठों से निकला।

“कोई दौलतमंत किसी काम के लिए एडवांस में भारी रकम दे दे तो उसे बेवकूफ मत समझना। हम लोग दौलत लेते और देते है। कागजों पर लिखा-पढ़ी नहीं करते। हमारी लिखा-पढ़ी हथियारों की गोलियां करती हैं।”

प्रवेश गोदरा ने बैचेनी से पहलू बदला।

“तु-तुम्हारा मतलब कि देवराज चौहान मेरे बारे में जानता है।” उसके होठों से निकला।

“क्यों नहीं जरूर जानता है। आखिर एक करोड़ जैसी भारी रकम दी है उसने तुम्हें”

प्रवेश गोदरा ने पूरा गिलास खाली किया और लम्बी-लम्बी सांसें ली।

“तुम-तुम ये सब मुझे डराने के लिए कह रही हो।” प्रवेश गोदरा ने खुद को संभाला।

“तुम्हें बात पसन्द नहीं आयी, क्योंकि मेरा कहा तुम्हारे हक में नहीं है।” रुपा ईरानी तीखे स्वर में कह उठी- “लेकिन ये तुम्हें पसन्द करनी चाहिए कि देवराज चौहान के पास तुम्हारे नाम बात पते की पूरी लिस्ट है। उसके बाद ही उसने तुम्हें एक करोड़ दिया प्रवेश गोदरा बेचैन नजरों से रूपा ईरानी को देखने लगा।

“चाहो तो मेरी बात आजमा भी सकते हो।”

“कैसे?” प्रवेश गोदरा के होठों से निकला।

“कल बारह बजे देवराज चौहान के पास मत जाना और फोन पर उसे कह देना कि तुम उनके पास नहीं आओगे। इसके बाद दूसरे घंटे ही वो तुम्हारे सामने होंगे। अपने पैसों के साथ-साथ तुमसे ब्याज भी वसूल कर लेंगे।”

प्रवेश गोदरा, रूपा ईरानी को देखता रहा फिर बोला।

“उन्हें मेरी ऐसी क्या जरूरत है कि वो मेरे पास आयें...”

“मेरे ख्याल से दो जरूरतें हो सकती हैं।” रूपा ईरानी ने अपने नशे से भरे चेहरे पर हाथ फेरा- “पहली तो यह कि तुम उन्हें ब्लैक मेल कर रहे हो। तुम्हें इस रास्ते से वो हटाना चाहते हैं। साथ ही उन्हें इस काम में दूसरे लोगों की भी जरूरत होगी। इस तरह उनके दो काम हो जायेंगे। तुम्हारा खतरा भी उनके सिरों से हट जायेगा और उन्हें साथी भी मिल जायेंगे। इसके लिए एक करोड़ खर्च करना पड़ा तो, ये उनके लिए मंहगा सौदा नहीं...”

“प्रवेश गोदरा की नजरें रूपा ईरानी पर रही।

“क्या देख रहे हो?”

“कुछ नहीं?” कहने के साथ ही प्रवेश गोदरा ने व्हिस्की का दूसरा गिलास तैयार किया और एक ही सांस में खत्म करके, पुनः गिलास तैयार करने लगा। कहा कुछ नहीं।

“तुम्हारे ख्यालों में है कि सब कुछ तुम्हारी मर्जी से चल रहा है, जबकि ये वहम है तुम्हारा।” रूपा ईरानी की नशे भरी खूबसूरत आंखें प्रवेश गोदरा के चेहरे पर टिकी, जहां व्हिस्की ने असर दिखाना शुरू कर दिया था- “दरअसल सब कुछ देवराज चौहान की मर्जी से हो रहा है। तुम उसे दबा नहीं पाये। वो तुम्हें दबा गया।”

“रूपा।” प्रवेश गोदरा ने होंठ सिकोड़ कर कहा- “तुम जरूरत से ज्यादा समझदारी की बातें कर रही हो।”

“नहीं करनी चाहिए क्या?”

“इतनी अक्ल तुमने कहां से ली?”

“जमाने ने सिखाई। सोलह साल की उम्र में मैंने जमाने के रंग देखने शुरू कर दिए थे। मां न वाप। अकेली थी मैं। सब कुछ दुनिया ने सिखा दिया कि कौन सी बात क्यों हो रही है।” रूपा ईरानी मुस्कुराई- “इसी समझ के दम पर आज मैं देश के चुनिंदा मॉडलों में हैं। दोनों हाथों से दौलत कमाती हूँ।” कहकर वो उठी।

“डोज लेने जा रही हो। प्रवेश गोदारा ने कहा।

“हां। मस्ती कम हो रही है।”

“तुमने स्मैक ले रखी है। ज्यादा लेना अच्छी बात नहीं...”

“वही तो मैं कह रही हूं।” रूपा ईरानी हौले से हंसी- “एक करोड़ की दौलत तुम्हारे पास है। दौलत का ज्यादा लालच करना अच्छी बात नहीं। लेकिन तुम माने? नहीं माने। यानि कि मर्जी अपनी, मजे अपने।”

रूपा ईरानी दूसरे कमरे में चली गयी थी।

तीसरे गिलास के छोटे-छोटे घूंट भरता प्रवेश गोदरा सोचों में डूबा रहा। ये बात तो मन में तय कर रखी थी कि जो भी हो देवराज चौहान के साथ, इस डकैती में रहकर, वह जुआ अवश्य खेलेगा। हार होती है, या जीत, ये बाद की बात है। जो किस्मत को मंजूर होगा, वो ही होकर रहेगा।

देर होने लगी। रूपा ईरानी नहीं लौटी।

“रूपा।” उसे पुकारते हुए प्रवेश गोदरा उठने को हुआ कि रूपा ईरानी आ गयी।

उसकी आंखें नशे में लाल हो रही थी। कदम जैसे बहक से रहे थे। चेहरा कुछ इस कदर नशे में धधक रहा था कि वो बे-पनाह खूबसूरत लगने लगी थी।

“तगड़ी डोज ले ली।”

“मजे करो- “ वो हाथ हिलाकर कह उठी। झूमी। लड़खड़ाई।

फिर संभल गयी।

“आराम से।”

“चिन्ता मत कर। मैं ठीक हूं। इतनी मस्ती तो आनी ही चाहिए।”

सोफे पर बैठते हुए कह उठी- “होटल में फोन करके खाना मंगवा लो। घर में खाने को कुछ नहीं है।”

“अभी खाने का मन नहीं है।” व्हिस्की का नशा, पूरी तरह उसके चेहरे पर आ गया था- “पहले प्यार करेंगे। फिर खाना होगा। उसके बाद फिर प्यार होगा...”

रूपा ईरानी हंसी।

“सब सोच लिया।”

“तुम- प्रवेश गोदरा ने पूछा- “शो के लिए कब व्यस्त होओगी?”

“परसों।”

“जेवरातों का शो, कब से शुरू होगा?”

“परसों से अगले दिन...”

मैं भी शो के करीब ही रहूंगा प्रवेश गोदरा ने गिलास उठाकर घूंट भरा- “लेकिन वहां हमारी मुलाकात नहीं होगी।”

“ठीक कहते हो।” नशे से भरे ढंग में वो मुस्कुराई- “जिन जेवरातों को मैं अपने शरीर पर डाल कर उनकी नुमाईश कर रही होऊगी। तब तुम उन्हीं को लूटने के लिए अपनी योजना को अंजाम रहे होगे।”

प्रवेश गोदरा के चेहरे पर मुस्कान उभरी।

“दौलत आ भी गई, तब भी ऊटी में बंगला नहीं बनाऊंगा तुम्हारी जमीन पर-। अगर तुम ड्रग्स लेने की आदत छोड़ दो तो शायद मैं बंगला बनाने के बारे में फिर से विचार...”

“प्रवेश। क्यों मेरा नशा खराब कर रहे हो। ये फालतू की बातें फिर कर लेंगे। उठो, बैडरूम में चलते हैं।” कहते हुए वो उठी। जरा सी लड़खड़ाई फिर संभल गयी- “मुझे पूरा यकीन है कि अगर तुम्हारे पास दौलत आ गयी तो तुम बंगला भी बनाओगे और मेरे साथ शादी भी करोगे।”

“यानि कि तुम्हें यकीन है कि मैं दौलत पाने में सफल रहूंगा।”

“इसी बात का तो यकीन नहीं प्रवेश।” रूपा ईरानी ने अपने नशे से भरे चेहरे पर हाथ फेरा- “तुम बहुत गलत फैसला ले चुके हो। उस दिन मैंने तुम्हें समझाया भी था दोबारा फोन करके। अब तो तुम देवराज चौहान को छोड़ना भी चाहो तो, वो तुम्हें नहीं छोड़ेगा। क्योंकि, तुम उसके प्लान से वाकिफ हो चुके हो।”

“लेकिन मुझे विश्वास है कि मैं दौलत पाने में कामयाब रहूंगा।”

प्रवेश गोदरा एक-एक शब्द चबाकर कह उठा।

“मुझे भी अच्छा लगेगा, अगर तुमने दौलत को हासिल कर लिया।”

☐☐☐

सुबह चार बजे प्रवेश गोदरा घर पहुंचा था।

ग्यारह बज रहे थे। जब प्रवेश गोदरा नाश्ते से फारिग हुआ। वो तैयार था। चेहरे पर गम्भीरता और मस्तिष्क में सोचें दौड़ रही थी।

देवी रोज की तरह सामान्य बात कर रही थी। छिपी निगाहों से अवश्य उसे देख लेती थी।

“देवी- “ प्रवेश गोदरा ने एकाएक पूछा- “वो बैग कहां है?”

“पीछे वाले कमरे में संभालकर रखा है। लाऊं क्या?” देवी ने शांत स्वर में कहा।

“नहीं। उसे संभालकर रखना। घर खाली छोड़कर, ज्यादा देर तक बाहर मत रहना…”

देवी ने सहमति से सिर हिला दिया।

तभी फोन की बेल बजी।

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर उठाया।

दूसरी तरफ कमल शर्मा था।

“तुम्हारा फोन नहीं आया। मैं कब से इंतजार कर रहा हूं। तुमने कहा था, जाने से पहले फोन करोगे।”

“हां अभी गया नहीं हूं।” प्रवेश गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “जाने की तैयारी में हूं।”

कमल शर्मा ने गहरी सांस लेने की आवाज आयी।

“क्या हुआ?” प्रवेश गोदरा के होठों से निकला।

“संभल कर रहना। तुम दस अरब लेने जा रहे हो। जब से तुमने मुझे आधे का हिस्सेदार बनाया है, तब से मुझे दस अरब की ज्यादा ही चिन्ता रहने लगी है। रात भर ठीक से सो भी नहीं पाया। पांच अरब ही याद आते रहे।”

“अगर तुम्हारा यही हाल रहा तो, आगे के काम ठीक से नहीं कर पाओगे।”

“इस बारे में फिक्र मत करो। अपने काम करने मुझे आते हैं।”

“कल जो बताया था सब याद है कि क्या…”

“मुझे जो करना है रटा हुआ है। तुम कब चल रहे हो?”

“अभी। देवराज चौहान का फोन नम्बर है तुम्हारे पास?”

“पक्की स्याही से लिख रखा है। बंगला देख रखा है।” कमल शर्मा बोला- “मेरा दिल धड़क रहा है। तेजी से।”

“आदत पड़ जायेगी दिल को- “ प्रवेश गोदरा ने सिर हिलाया- “ओ०के जल्दी मिलेंगे।”

“ठीक है। लापरवाह मत होना मेरे पांच अरब डूब जायेंगे।”

“तुमने एक बजे वहां फोन करना है शर्मा- “ कहने के साथ ही प्रवेश गोदरा ने रिसीवर रख दिया। वो बेचैन था।

तभी पास खड़ी देवी कह उठी।

“आप कुछ परेशान हैं भैया।”

“नहीं- “प्रवेश गोदरा ने देवी को ऐसे देखा जैसे उसकी मौजूदगी को भूल गया हो- “मैं परेशान नहीं। सब ठीक है। अचानक ही काम का बोझ बहुत आ गया है। खैर-फिर से सब ठीक हो जायेगा। मैं कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं।”

“कब लौटोगे?”

“दस या पन्द्रह-दिन- “ कहते हुए प्रवेश के स्वर में हल्का सा कम्पन उभर आया था।

देवी ने सिर हिला दिया।

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर उठाकर देवराज चौहान का नम्बर मिलाया।

“हैलो-।” दूसरी तरफ से रिसीवर उठाये जाने पर, जगमोहन की आवाज कानों में पड़ी।

“मैं आऊँ ?” प्रवेश गोदरा के मुंह से निकला।

“एक करोड़ लेकर बैठ जायेगा क्या-आयेगा नहीं?”

“आता हूं।” उसने सूखे होठों पर जीभ फेरकर कहा और रिसीवर रख दिया।

देवी पास ही खड़ी थी।

प्रवेश गोदरा उठा। सोचों में डूबे उसने देवी को देखा।

“मैं जा रहा हूं। देवी।”

“अच्छा।” देवी ने सामान्य स्वर में कहा- “साथ ले जाने के लिए कपड़ों का बैग तैयार भी किया?”

पल भर के लिए प्रवेश गोदरा ठिठका। जैसे कपड़े याद आ गये

हों। फिर सिर हिलाकर बोला।

“कोई जरूरत नहीं।” वो दरवाजे की तरफ बढ़ा- “उन पैसों का ध्यान रखना।” कहने के साथ ही उसने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।

देवी कई पलों तक अपनी जगह पर ही खड़ी रही फिर खुले दरवाजे के पास पहुंची। बाहर देखा तो प्रवेश गोदरा कार में बैठा, कार स्टार्ट करता नजर आया कि कार आगे बढ़ गयी।

देवी दरवाजा बंद करके पलटी। चेहरे पर दृढ़ता के भाव थे। निगाहें फोन पर जा टिकी। फिर वो सख्ती भरे अंदाज में कदम उठाती फोन के पास पहुंची और रिसीवर उठाकर नम्बर मिलाने लगी।

दो मिनट की कोशिश के बाद लाईन मिली।

“हैलो।” दूसरी तरफ से विनोद खुराना की आवाज आयी।

“कैसे हो विनोद?” देवी के होठों से निकला।

“ओह देवी। मैं तो ठीक हूं। तुम कैसी हो?”

“ठीक हूं। आ रहे हो?”

“कहां?”

“घर पर।”

“तुम्हारा भाई वहां...”

“कोई नहीं है आ जाओ। व्यस्त तो नहीं हो।”

“बहुत व्यस्त हूं लेकिन तुम्हारे लिए वक्त ही वक्त है। एक घंटे में पहुंचता हूं देवी।

देवी ने रिसीवर रख दिया। शांत गम्भीर निगाह, सोचों में डूबी कमरे में फिरने लगी। फिर नजरें टेबल पर पड़े खाली बर्तनों पर टिकी। वो प्रवेश गोदरा के नाश्ते के खाली बर्तन थे।

☐☐☐

“मुझे घर पर बुलाने का आज कैसे मन कर आया?” विनोद खुराना के भीतर आने पर, देवी ने दरवाजा बंद किया, वो कह उठा।

“फुर्सत थी। भैया कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गये हैं। तुमसे मिलने का मन भी कर रहा था।” देवी मुस्कराई।

“लो मैं आ गया।” विनोद खुराना मुस्कुराते हुए बैठ गया- “आज तो तुम्हारे हाथ का खाना भी खाऊंगा और चाय भी पिऊंगा। बुलाया तुमने अपनी मर्जी से है। लेकिन जाऊंगा अपनी मर्जी से…”

देवी चेहरे पर गम्भीर भाव समेटे कुर्सी पर बैठ गई।

“क्या बात है?”

“विनोद” देवी ने धीमे स्वर में कहा- “तुम्हारा बच्चा मेरे पेट में है। वो दो महीने का हो गया है। वक्त बीतते देर नहीं लगती। एक आध महीने में लोग ये महसूस कर लेंगे कि पेट में बच्चा है।”

विनोद खुराना ने व्याकुल निगाहों से देवी को देखा।

“तुमने अपने भाई से बात की शादी के बारे में…”

“भैया हमारी शादी को तैयार नहीं। तुम्हें अच्छा नहीं मानते।” देवी ने स्पष्ट कहा।

“जो भी मुझे जानेगा। वो मुझे अच्छा नहीं कहेगा। कहे भी क्यों। मैं काम ही बुरा करता हूं।” विनोद खुराना ने धीमें स्वर में  कहा- “लेकिन कोई भी मेरी मजबूरी को नहीं समझता कि कितना मजबूर होकर मैं ये काम कर रहा हूं।”

देवी की गम्भीर निगाह, विनोद खुराना पर थी।

“मैं तुम्हारी नहीं, अपने और पेट में पल रहे बच्चे की बात कर रही हूं।” देवी ने गम्भीर स्वर में कहा- “भैया को तुम पसन्द नहीं। और तुम्हारे पास ढंग का काम नहीं कि मुझसे शादी कर…।”

“मैं तुमसे अभी शादी कर…।”

“ऐसे नहीं।” देवी के स्वर में दृढ़ता थी- “मेरी भी कुछ बातें

हैं। कुछ सोचें हैं। जो तुम्हें पूरी करनी होगी। अगर तुम सच में मुझे प्यार करते हो, तो तुम्हें तुरन्त ये काम छोड़कर, मुझसे शादी करने का फैसला करना है। मैं ये नहीं सुनूंगी कि तुम्हारे पास पैसा आये और तुम अच्छा काम करोगे तो ये काम छोड़ोगे। मैंने तुम्हें खाना खिलाने या चाय पिलाने नहीं, ये बात करने के लिए बुलाया है। तुम बच्चे नहीं हो जो ये कहो कि किसी से सलाह करके इस बात का जवाब दोगे। मैं आज ये बात इधर या उधर कर देना चाहती हूं।”

विनोद खुराना, देवी को देखता रहा।

“ये ठीक है कि मैंने तुमसे प्यार किया है, लेकिन तुम्हारे इस बुरे काम की छाया मैं अपने पर और अपने बच्चे पर नहीं पड़ने दूंगी।”

देवी ने पहले वाले स्वर में कहा- “मेरा हाथ पकड़ना है तो तुम्हें फौरन ये काम छोड़ना होगा। अभी से छोड़ना होगा।”

विनोद खुराना की मुद्रा में फर्क नहीं आया।

“अगर मेरी बात नहीं पसन्द तो जा सकते हो। मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं।” उसे खामोश पाकर देवी ने स्पष्ट स्वर में कहा।

“मेरा इम्तिहान ले रही हो तुम” विनोद खुराना के होंठ खुले।

“मैं सीधी बात कर रही हूं। जवाब भी सीधा चाहिए।”

“काम छोड़ दूंगा तो खायेंगे क्या। तुम कहती हो कि अभी फैसला लूं और अभी काम छोड़ दूं। ये बातें सिर्फ कहने भर के लिए है। जब रहना-खाना नहीं मिलता तो...”

“तुम जो भी दोगे। मैं खा लूंगी। जैसी भी जगह होगी, रह गूंगी। जहां भी ले जाओगे चलूंगी। लेकिन सारा काम इज्जत के साथ होना चाहिए। मैं भी कहीं नौकरी कर लूंगी। यानि कि तुम्हारे पास बहाने की कोई गुंजाइश नहीं।”

विनोद खुराना मुस्कुराया।

“तुम्हारे सामने मैंने कभी बहाना नहीं बनाया। मैंने तुम्हें मन से चाहा है। मुझे तुम्हारी बात मंजूर है। जरा भी एतराज नहीं। मैं अभी से अपनी बीती जिन्दगी को छोड़ देता हूं। सब कुछ छोड़ा अपनी देवी के लिए। तुम जो कहोगी। मैं वो ही करूंगा। तुम्हें पाकर मैं खोना नहीं चाहता। तुम्हारे अलावा मुझे कोई भी समझ नहीं सका।”

देवी की आंखों में आंसू छलक आये।

विनोद खुराना उठा और देवी के करीब आ पहुंचा।

“अब ये आंसू क्यों?”

“खुशी के है।” देवी का स्वर कांपा।

विनोद खुराना ने उसे बांहों में समेट लिया।

“खाना खिलाओगी अब तो-चाय भी पीनी है।” विनोद खुराना हौले से हंसा।

“अभी नहीं।”

“अब क्या हुआ?”

“मन्दिर में चलो। शादी करो। इसके बाद यहां से चलो। जिसे मैं अपना घर कह सकू।”

“मंजूर है। तुम्हारी किसी बात पर एतराज नहीं। चलो।”

☐☐☐

चार बजे देवी और विनोद खुराना लौटे।

देवी की मांग में सिन्दूर चमक रहा था। चेहरे पर खुशी और राहत थी। विनोद खुराना जो कभी-कभी पराया सा लगने लगता था। अब पूरी तरह अपना और सिर्फ अपना लगने लगा था।

“मैं अपने कपड़े सूटकेस में डाल लूं। फिर निकल चलते हैं।” देवी ने कहा।

विनोद खुराना ने सिर हिलाया।

“जाना कहां है?”

“मैं नहीं जानता। पहले मेरी जिन्दगी का कोई मतलब नहीं था। लेकिन अब मतलब भी है। साथ भी है मैं जो काम कर रहा हूं, वो इस शहर में मुझे इज्जत से नहीं रहने देगा। स्टेशन पर चलेंगे। जो भी ट्रेन चलने वाली होगी। उसमें बैठ जायेंगे। नई जिन्दगी शुरू करने के लिए किस्मत कहां ले जायेगी। वहीं चले जायेंगे। कुछ पैसे हैं जेब में। दस-पन्द्रह दिन निकल जायेंगे। तब तक कोशिश करूंगा कि कोई काम मिल जाये। जिससे दो वक्त की रोटी चल जाये।”

देवी के होठों पर मुस्कान उभरी और दूसरे कमरे में चली गयी। वहां उसने जरूरी कपड़े छोटे से सूटकेस में पैक कर लिए। फिर अन्य सूटकेस को खाली किया, जो कि बड़ा था और एक तरफ रखे बैग के पास सूटकेस रखा। बैग में जेवरात और पचास लाख के नोटों के गड्डियाँ थीं।

“विनोद- “ देवी ने पुकारा।

विनोद खुराना कमरे में आ गया।

“इस बैग के सामान को सूटकेस में डाल लो। इसे भी साथ ले जाना है।” विनोद खुराना सिर हिलाकर आगे बढ़ा और करीब पहुंचकर बैग पर निगाह पड़ी तो ठिठक गया। आंखों में जहान भर की हैरानी आ ठहरी। मुंह खुला का खुला रह गया।

देवी की निगाह उसके चेहरे पर ही टिकी थी।

“य-ये-?” विनोद खुराना के होंठ हिले।

“तुम्हें बताया था कि भैया किस चक्कर में है?”

“मालूम है। वो डकैती-देवराज चौहान, और-और क्या डकैती कर ली?” विनोद खुराना के होठों से हैरानी भरा स्वर निकला।

“नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं है।” देवी ने सिर हिलाया- “ये पैसा डकैती का नहीं है।”

“तो?”

“पैसा ये हेराफेरी का ही है लेकिन इस पैसे को मैं अपने और अपने बच्चे पर खर्च कर सकती हूं।”

“पैसा आया कहां से?” विनोद खुराना ने खुद को संभाला।

देवी ने सारी बात बतायी।

“ओह-।” विनोद खुराना गम्भीर स्वर में कह उठा- “तुम्हारा

भाई बहुत खतरनाक खेल खेल रहा है। तुम देवराज चौहान को नहीं जानती। वो बहुत ही खतरनाक डकैती मास्टर।”

“मुझे देवराज चौहान से नहीं, तुमसे मतलब है?” देवी ने टोका।

दोनों की आंखें मिली।

दोनों ही मुस्कुराये।

“विनोद।” देवी प्यार भरे स्वर में कह उठी- “इस पैसे से तुम कोई अच्छा काम कर सकते हो। उसके बाद भी बहुत सारा बच जायेगा। जानते हो, कितना है ये?”

“कितना?” विनोद खुराना के होठों से निकला।

“कहने को एक करोड़। वैसे चौरासी लाख।”

“ओह-।” विनोद खुराना खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था- “ये पैसा तो हमारी जिन्दगी को स्वर्ग बना देगा। सच ही कहते हैं कि औरत लक्ष्मी होती है। अभी तुमसे शादी की और इतनी बड़ी दौलत मिल गयी। लेकिन मेरी सब से बड़ी दौलत तुम हो। तुम्हारे पेट में पल रहा बच्चा मेरी दौलत है लेकिन…”

“क्या लेकिन?”

“ये दौलत तुम्हारे भाई की है?”

“तो?” देवी के चेहरे पर गम्भीरता आ गयी।

“इस पैसे को साथ ले चलने को कह रही हो। क्या ये गलत नहीं देवी?” विनोद खुराना ने उसे देखा।

“विनोद। मेरी ये हरकत तब गलत होती,जब भैया हमारी शादी को राजी होते। हमारी शादी कर देते। बेशक तीन कपड़ों में मुझे घर से विदा करते। जरा भी एतराज नहीं था मुझे। लेकिन भैया ये जानते हुए भी कि मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा पल रहा है, तुमसे शादी कराने को तैयार नहीं।” देवी कहउठी- “तुम्हारा जिक्र आते ही उनके चेहरे पर नफरत के भाव नजर आने लगते हैं। ऐसे में वो मेरा भाई ही कहाँ रहा। प्यार का असली रिश्ता तो खत्म हो गया। ऊपर से ये दौलत हेरा-फेरी की है। जिसके हाथ लगे। उसी की है ये।”

विनोद खुराना सूखे होठों पर जीभ फेरकर रह गया।

“औरत की जिन्दगी में एक वक्त भी आता है, जब उसे अपने मायके या अपने पति में से एक की ही बेहतरी के बारे में फैसला लेना पड़ता है। अब तुम मेरे पति हो। मेरे पति को दौलत की जरूरत है, अपने परिवार का जीवन संवारने के लिए। इसके लिए हमारी बुरी हालत हो जायेगी। यानि कि इस पैसे की जरूरत हमें ज्यादा है। भैया तो अपना काम चला ही लेंगे।”

विनोद खुराना की निगाह पुनः बैग पर जा टिकी।

“नोटों और जेवरातों को सूटकेस में डालो और यहां से हमेशा के लिए चलो विनोद...”

बिना कुछ कहे ही विनोद खुराना नीचे बैठा और बैग में पड़ी दौलत को सूटकेस में डालने लगा।

ऐसा करते समय उसके हाथों में रह-रहकर कम्पन हो जाता था। माथे पर पसीना चमक उठा था। उसने एक गड्डी को फुरेरी दी और अचानक ही वो नोटों को ध्यानपूर्वक देखने लगा।

मिनट भर बीत गया।

“क्या हुआ विनोद-?” देवी के होठों से निकला।

“ये नोट, गड्डियां कितनी हैं?” विनोद खुराना ने देवी के चेहरे पर निगाह मारी।

“मैंने गिनती तो नहीं की। भैया की बातों से जाना कि गड्डियां पचास लाख की हैं और जेवरात चौंतीस लाख के...”

“ये नोट नकली लग रहे हैं।”

“नकली?” देवी चौंकी।

“हां। आम आदमी के लिए इन नोटों को लेकर फर्क कर पाना कठिन है कि ये असली हैं या नकली-।”

“फिर तुमने कैसे जान लिया?”

“जब से बाजार में नकली नोटों का ज्यादा चलन आया है, तब से मैंने उन निशानियों को पहचानना शुरू कर दिया था कि असली-नकली की पहचान कैसे होती है। ये उम्दा क्वालिटी के नकली नोट हैं। मैं तुम्हें समझा नहीं सकता कि असली-नकली की पहचान कैसे होती है। ये फुर्सत की बात है।”

“जेवरात असली हैं।” देवी ने फौरन अपने पर काबू पाया- “भैया ने चैक किए थे। चौंतीस लाख के हैं और नई जिन्दगी शुरू करने के लिए चौंतीस लाख कम नहीं हैं। सब कुछ करके, इसमें से भी पैसा बच जायेगा।”

“हां।” विनोद खुराना बोला- “शराफत की जिन्दगी बिताने के लिए, चौंतीस लाख बहुत बड़ी रकम है।”

“इन्सान सब्र से काम ले तो, जिन्दगी बिताने के लिए सच्चा साथी और सिर्फ दो वक्त की रोटी चाहिए।”

विनोद खुराना के होठों पर मुस्कान उभरी।

“ठीक कहती हो देवी।”

“नोटों की गड्डियों को यहीं छोड़ दो। नकली नोट पास में होना, ठीक नहीं। जेवरातों को लिफाफे में डालकर कपड़ों वाले सूटकेस में डालो और चलो यहां से-। अब हम नई जिन्दगी शुरू करने जा हैं।

दोनों ने प्यार भरी निगाहों से एक-दूसरे को देखा।

अगले दस मिनट में दोनों सूटकेस के साथ बाहर थे, जिसमें चौंतीस लाख के जेवरात भी मौजूद थे।

☐☐☐

देवराज चौहान और जगमोहन ही थे बंगले पर, जब प्रवेश गोदरा वहां पहुंचा। मन-ही-मन वो कुछ डरा-सा था। परन्तु चेहरे पर हिम्मत करके सामान्य भाव बना रखे थे।

सोहनलाल बंगले पर नहीं था।

पोर्च में जब कार रुकने की आवाज सुनाई दी तो जगमोहन खिड़की पर जा पहुंचा था। दोपहर के दो बज बजे थे। कार में से उसने प्रवेश गोदरा को उतरते देखा। इस बात की उसने अच्छी तरह तसल्ली कर ली कि वो अकेला ही यहां आया है।

प्रवेश द्वार से उसने भीतर प्रवेश किया।

देवराज चौहान और जगमोहन की निगाह उस पर टिकी।

प्रवेश गोदरा ने दोनों को देखा। ठिठका-सा कई पलों तक उन्हें देखता रहा। चेहरे पर घबराहट उभरी, जिसे उसने दबाकर खुद को सामान्य दर्शाने की चेष्टा की।

“रुक क्यों गये?” जगमोहन उसे घूर रहा था- “तो तुम्हारा नाम प्रवेश गोदरा है।”

प्रवेश गोदरा चौंका। चौंकना उनसे छिपा न रहा।

“तुम्हें-कैसे मालूम?” उसके होठों से निकला।

“गद्दारी की रनवीर भंडारी से।” जगमोहन ने उसी लहजे में कहा- “पहले तो उससे जान लिया कि डकैती कैसे-कहां-कब होनी है। उसके बाद तू हमें हाथ के नीचे लेने में लग गया। अभी रनवीर भंडारी को तेरी हरकत का पता नहीं है। पता होता तो वो अपने हाथों से तेरी गर्दन तोड़ देता। उसके बाद वो मुझे कहता कि तुम्हारी लाश ठिकाने लगा दूं तो मैं खुशी-खुशी ये काम करता। तेरे को एक करोड़ रुपया दिया। तो क्या हमें तेरा नाम-पता भी मालूम नहीं होगा।”

प्रवेश गोदरा को रूपा ईरानी के शब्द याद आ गये कि एक करोड़ रुपया देने वाला बेवकूफ नहीं हो सकता। वो उसके बारे में सब कुछ जानता होगा। दोनों को देखते हुए उसने गम्भीर स्वर में पूछा।

“मुझे कैसे पहचाना कि...”

“तुमने मुझसे फोन पर बात की थी।” देवराज चौहान बोला- “मैंने तुम्हारी आवाज पहचान ली थी।”

“फोन पर तो तुमने ये बात नहीं कही”

“तुम्हें मालूम हो जाता कि मैंने तुम्हें पहचान लिया है तो तुम थोड़ा-बहुत सतर्क अवश्य हो जाते।” देवराज चौहान ने कहते हुए सिग्रेट सुलगा ली- “जब तुम्हें मालूम हुआ कि मैंने तुम्हें नहीं पहचाना तो निश्चित रहे।”

“करोड़ का माल कहां रखा है, जो हमसे झटका है तूने...”

“क्यों?”

“इसलिये पूछ रहा हूं कि कहीं वो कमजोर जगह न हो। चोर..” जगमोहन तीखे स्वर में कह उठा। चोरी न कर ले।” जगमोहन ने शब्दों को चबाकर कहा।

“बैंक के लॉकर में रख दिया है।” प्रवेश गोदरा ने शांत स्वर में कहा।

“अच्छा किया। वैसे एक ही लॉकर में पूरा माल तो नहीं आया होगा।”

प्रवेश गोदरा ने कुछ नहीं कहा।

“अकेला आया है?”

“हां”

“तूने तो कहा था एक ओर को साथ लेकर...”

“वो व्यस्त था। जल्दी यहां आ जायेगा।”

“सब को ही ले आता। हम पर नजर ही रखनी थी तो, करीब रहकर रख लेते।”

“इस बात का जवाब मेरे पास नहीं है।” प्रवेश गोदरा बोला- “मेरी और मेरे साथियों की यही राय थी कि सिर्फ दो लोग तुम्हारे साथ काम करेंगे और बाकी दूर रहकर सारे मामले पर नजर रखेंगे।”

जगमोहन कुछ कहने लगा कि फोन की बेल बजी। वो फोन की तरफ बढ़ने को हुआ।

प्रवेश गोदरा ने टोका।

“ये मेरा फोन है। मुझे ही बात करने दो।”

जगमोहन ने उसे घूरा और करीब पहुंचकर रिसीवर उठाया।

“हैलो”

“वो मर गया कि जिन्दा है।” उखड़ी-सी आवाज कानों में पड़ी- “अभ्भी मारा तो नेई उसे?”

“किसे?” जगमोहन के होंठ सिकुड़े।

“वो अपना गोदरा। सलामत पहुंच गया ना तेरे पास?”

“सलामत है। तस्वीर खींच कर भिजवा दूं उसकी?” जगमोहन के स्वर में तीखापन आ गया।

“जरूरत नहीं। फोटो की जरूरत नहीं। उसको सलामत ही रखना। समझा। नेई तो तू मरेगा। गोदरा को कुछ नहीं होना चाहिए। बात करा उससे। उसकी सलामती की खबर ‘भाई’ को देनी है।”

“भाई?”

“हां भाई को, गोदरा से बात करके अभ्भी ‘भाई’ को कराची फोन

लगाऊंगा। बात करा।”

“सुन” जगमोहन होंठ सिकोड़े सामान्य स्वर में कह उठा।

“बोल”

“अपने ‘भाई’ को जगमोहन का सलाम बोलना।”

“हां-हां, बोल देगा। बात करा।”

जगमोहन ने गोदरा को देखा।

“बात कर ले।”

प्रवेश गोदरा फौरन करीब आया और रिसीवर लेकर बात की।

“मैं ठीक हूं। हां-मालूम है-ये लोग ठीक है। कोई शरारत नहीं करेंगे-क्या भाई का फोन आया करांची से? ओह-ठीक है, भाई को बोलना फिक्र नहीं। पांच अरब उसका है। रखता हूं-।” कहने के साथ ही गोदरा ने फोन बंद किया।

जगमोहन तीखी निगाहों से उसे देख रहा था।

“तू तो बहुत ऊंची चीज है।” जगमोहन कड़वे स्वर में कह उठा- “तेरी तो कराची में बैठे ‘भाई’ तक पहुंच है।”

प्रवेश गोदरा ने मुस्कुरा कर सिर हिलाया।

“मेरे को तो लगता है, अभी यहां पर कराची से ‘भाई’ का फोन आयेगा। तेरे बिना ‘भाई का काम ही नहीं चलना होगा।”

“क्या मतलब?”

“मतलब समझाने लगा तो वक्त लम्बा हो जायेगा। काम की बात करते हैं। बैठ”

प्रवेश गोदरा एक तरफ मौजूद कुर्सी पर जा बैठा। देवराज चौहान पहले ही वहां बैठा था। जगमोहन ने भी वहां कुर्सी सम्भाल ली।

“हमें मिल-जुलकर रहना चाहिए।” प्रवेश गोदरा ने कहा- “डकैती पर हम लोगों ने एक साथ काम करना-।”

“तेरे पास डकैती के लिये कोई प्लान है?”

“प्लान? वो तो तुम बताओगे।”

“मैंने इसलिये पूछा कि तेरी बात से लगा, तू बहुत डकैतियां डाल चुका है।”

“मैं-मैंने तो एक भी डकैती नहीं डाली।” प्रवेश गोदरा जल्दी से बोला- “जो करना है, तुम लोगों ने करना है। योजना भी तुम लोगों की होगी। मुझे तो ये बता देना कि डण्डा पकड़कर कहां खड़े होना है।”

“खूब।” जगमोहन ने उसे खा जाने वाली नजरों से देखा- “भाई के लिये काम करता है और हथियार के नाम पर डण्डे की बात करता है। भाई, की नाक कटवाएगा क्या?”

प्रवेश गोदरा सकपकाया फिर जल्दी से कह उठा।

“हम लोग अपनी भाषा में, गन को डण्डा कहते हैं।”

“जल्दी सीख लूंगा तेरी भाषा।” जगमोहन ने सिर हिलाकर कड़वे स्वर में कहा।

प्रवेश गोदरा ने देवराज चौहान को देखा।

“अब तक तो तुमने योजना बना ली होगी कि डकैती कैसे करनी है?” प्रवेश गोदरा ने कहा।

“बन रही है। जल्दी बन जायेगी योजना।”

“हैरानी है। अभी तक तुमने योजना नहीं बनाई। परसों हीरे-जेवरातों का फैशन शो शुरू हो रहा।”

“हमारे पास अभी नौ दिन का वक्त है।”

“नौ दिन का वक्त?”

“हां।” देवराज चौहान ने सिग्रेट ऐश-ट्रे में डालते हुए कहा- “सात दिन जेवरातों की नुमाईश होनी है। शुरूआत होने में दो दिन बाकी हैं। उसके बाद के तीन दिन हमारे हैं। उस तीन में से किसी एक दिन हमने डकैती के लिये तय करना है। यानि कि अभी हमारे पास बहुत वक्त है।”

“लेकिन योजना तो अब तक तैयार हो...”

बाहर कार रुकने की आवाज आई।

देवराज चौहान और जगमोहन की नजरें मिली।

“बाहर कोई आया है?” प्रवेश गोदरा ने जल्दी से कहा।

“भाई है।” जगमोहन उठते हुए बोला।

“भाई-?” प्रवेश गोदरा ने जगमोहन को देखा।

“हां। हमारा ‘भाई’ मुम्बई में ही रहता है। हम उसी के इशारे पर सब कुछ करते हैं।”

तभी सोहनलाल ने भीतर प्रवेश किया।

उसे देखते ही प्रवेश गोदरा हड़बड़ाकर खड़ा हो गया।

“तुम?”

“हैरानी क्यों हो रही है तुम्हें।” सोहनलाल ने शांत स्वर में कहा- “भूल गये क्या मुझे?”

प्रवेशे गोदरा सूखे होठों पर जीभ फेरकर, सोहनलाल को देखता रहा।

“उधर रनवीर भंडारी से सब कुछ जान लिया और इधर माल खाने में लग गया।” सोहनलाल करीब आकर ठिठका और मुस्कुराकर बोला- “मेरी निगाहें में ये घटिया और कमीनी हरकत है।”

“रनवीर भंडारी कौन-सा बढ़िया काम कर रहा है।”

“रनवीर भंडारी किसी की पीठ पर छुरा नहीं भौंक रहा। तुम उसके साथ थे। भंडारी ने तुम पर विश्वास किया। रनवीर भंडारी की किसी हरकत से हमें कोई नुकसान नहीं था। लेकिन तुम्हारी हरकत तो हमें सीधे-सीधे दस अरब का नुकसान दे रही है।”

“दस में से पांच अरब कराची वाले ‘भाई’ का है।” जगमोहन व्यंग से बोला।

“भाई-?” सोहनलाल के चेहरे पर हैरानी उभरी।

“समझ जायेगा।” जगमोहन ने प्रवेश गोदरा को देखा- “अभी फिर फोन आयेगा कि-।”

तभी फोन की बेल बजी।।

“ले आ गया ‘भाई’ का फोन-।” जगमोहन कड़वे स्वर में कहकर फोन की तरफ बढ़ा।

प्रवेश गोदरा ने सूखे होठों पर जीभ फेरी।

“हा- “ जगमोहन रिसीवर उठाते ही बोला- “दुबई से ‘भाई’ बोलता है क्या?”

“दुबई से?” दूसरी तरफ कमल शर्मा था।

“तेरा भाई कराची में, मेरा दुबई में। बोल क्या चाहता है?” जगमोहन ने कहा।

‘प्रवेश गोदरा से बात करनी है।”

“तू कौन है?”

“मैं उसका साथी हूं।”

“मुम्बई वाला साथी या कराची वाला?”

पल भर की खामोशी के बाद कमल शर्मा का संभला स्वर कानों में पड़ा।

“मुम्बई वाला...”

जगमोहन ने रिसीवर कान से हटाकर प्रवेश गोदरा से कहा।

“बात कर, तेरी खैर-खैरियत जानने के लिये, फोन आया है।”

प्रवेश गोदरा चेहरे पर गम्भीरता समेटे करीब आया और रिसीवर लेकर बात की।

“हां”

“सब ठीक है। आऊं मैं?” कमल शर्मा की आवाज कानों में पड़ी।

“सब ठीक है।” प्रवेश गोदरा कहने के पश्चात् जगमोहन से बोला- “मेरा साथी आना चाहता है।”

“बुला ले- “ जगमोहन ने शांत स्वर में कहा।

“शर्मा को यहां भेज दे कलसी।” प्रवेश गोदरा ने फोन पर कहा।

“ठीक है। समझ गया।” शर्मा की आवाज कानों में पड़ी- “आ रहा हूं।”

प्रवेश गोदरा ने रिसीवर रख दिया।

तभी सोहनलाल ने देवराज चौहान से कहा।

“मेरे साथ भीतर चलो। तुमसे कुछ बात करनी है।”

देवराज चौहान ने सोहनलाल को देखा फिर कुर्सी से उठते हुए बोला।

“किस सिलसिले में?”

“जिस काम के लिये तुमने मुझे भेजा था।”

देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।

“हम भीतर जा रहे हैं।” देवराज चौहान बोला।

“मैं इसके पास हूँ-1” जगमोहन ने कहते हुए प्रवेश गोदरा को देखा।

देवराज चौहान और सोहनलाल बंगले के भीतरी हिस्से की तरफ बढ़ गये।

“तेरा साथी कब तक पहुंचेगा यहां?”

“एक घंटे में आ जायेगा।” प्रवेश गोदरा ने धीमे स्वर में कहा।

“लंच करके आया है ना?” जगमोहन बोला- “यहां खाने-पीने का कोई इंतजाम नहीं है।”

“मेरा मन नहीं है खाने का।”

“भगवान करे, सदा ही तेरा, इसी तरह पेट भरा रहे।”

☐☐☐