यह सोचना क़तई ग़लत न होगा कि इमरान के क़दम बिना मक़सद टिप टॉप नाइट क्लब की तरफ़ उठ गये थे। उसे पहले ही से ख़बर थी कि सर जहाँगीर आजकल शहर में मुक़ीम नहीं है और वह यह भी जानता था कि ऐसे मौक़ों पर लेडी जहाँगीर अपनी रातें कहाँ गुज़ारती है। यह भी हक़ीक़त थी कि लेडी जहाँगीर किसी ज़माने में उसकी मँगेतर रह चुकी थी और ख़ुद इमरान की हिमाक़तों की वजह से यह शादी न हो सकी।

सर जहाँगीर की उम्र लगभग साठ साल ज़रूर रही होगी, लेकिन जिस्म की मज़बूती के कारण वे बहुत ज़्यादा बूढ़े नहीं मालूम होते थे।

इमरान दम साधे लेटा रहा। आध घण्टा गुज़र गया। उसने कलाई पर बँधी हुई घड़ी देखी और फिर उठ कर ख़्वाबगाह की रोशनी बन्द कर दी। पंजों के बल पर चलता हुआ लेडी जहाँगीर की ख़्वाबगाह के दरवाज़े पर आया जो अन्दर से बन्द था। अन्दर गहरी नीली रोशनी थी। इमरान ने दरवाज़े के शीशे से अन्दर झाँका। लेडी जहाँगीर मसहरी पर औंधी पड़ी बेख़बर सो रही थी।

इमरान पहले की तरह एहतियात से चलता हुआ सर जहाँगीर की लाइब्रेरी में दाख़िल हुआ।

यहाँ अँधेरा था। इमरान ने जेब से टॉर्च निकाल कर रोशनी की। काफ़ी लम्बा-चौड़ा कमरा था। चारों तरफ़ बड़ी-बड़ी अलमारियाँ थीं और दरमियान में तीन लम्बी-लम्बी मेज़ें। बहरहाल, यह निजी लाइब्रेरी से ज़्यादा पब्लिक रीडिंग रूम मालूम हो रहा था।

पूर्वी सिरे पर लिखने की एक मेज़ थी। इमरान सीधा उसी की तरफ़ गया। जेब से वह पर्चा निकाला जो उसे उस ख़ौफ़नाक इमारत से रहस्यमय तरीक़े से मरने वाले के पास मिला था वह उसे ग़ौर से देखता रहा फिर मेज़ पर रखे हुए काग़ज़ात उलटने पलटने लगा।

थोड़ी देर बाद वह हैरत से आँखें फाड़े एक राइटिंग पैड के लेटरहैड की तरफ़ देख रहा था। उसके हाथ में दबे हुए काग़ज़ में और उसमें कोई फ़र्क़ न था। दोनों पर एक ही क़िस्म के निशान थे और यह निशान सर जहाँगीर के पूर्वजों के कारनामों की यादगार थे जो उन्होंने मुग़लिया दौरे-हुक़ूमत में सरअंजाम दिये थे। सर जहाँगीर इन निशानों को अब तक इस्तमाल कर रहे थे। उनके काग़ज़ात पर उसके नाम की बजाय अकसर यही निशान छपे हुए थे।

इमरान ने मेज़ पर रखे काग़ज़ात को पहली-सी तरतीब में रख दिया और चुपचाप लाइब्रेरी से निकल आया। लेडी जहाँगीर के बयान के मुताबिक़ सर जहाँगीर एक माह से ग़ायब थे....तो फिर!

इमरान का ज़ेहन चौकड़ियाँ भरने लगा...आख़िर उन मामलात से जहाँगीर का क्या ताल्लुक़! ख़्वाबगाह में वापस आने से पहले उसने एक बार फिर उस कमरे में झाँका जहाँ लेडी जहाँगीर सो रही थी...और मुस्कुराता हुआ इस कमरे में चला आया जहाँ उसे ख़ुद सोना था।

सुबह नौ बजे लेडी जहाँगीर उसे बुरी तरह झिंझोड़-झिंझोड़ कर जगा रही थी।

‘वेल डन! वेल डन।’ इमरान हड़बड़ा कर उठ बैठा और मसहरी पर उकड़ूँ बैठ कर इस तरह ताली बजाने लगा जैसे किसी खेल के मैदान में बैठा हुआ खिलाड़ियों को दाद दे रहा हो!

‘ये क्या बेहूदगी है!’ लेडी जहाँगीर झुँझला कर बोली।

‘ओह! सॉरी!’ वह चौंक कर लेडी जहाँगीर को हैरानी नज़रों से देखता हुआ बोला। ‘हैलो! लेडी जहाँगीर! फ़रमाइए। सुबह-ही-सुबह कैसे तकलीफ़ की?’

‘तुम्हारा दिमाग़ तो ख़राब नहीं हो गया?’ लेडी जहाँगीर ने तेज़ लहजे में कहा।

‘हो सकता है!’ इमरान ने बुरा-सा मुँह बना कर कहा और अपने नौकरों के नाम ले-ले कर उन्हें पुकारने लगा।

लेडी जहाँगीर उसे चन्द लम्हे घूरती रही फिर बोली, ‘बराहेकरम अब तुम यहाँ से चले जाओ, वरना...’

‘हाँय, तुम मुझे मेरे घर से निकालने वाली कौन हो?’ इमरान उछल कर खड़ा हो गया।

‘यह तुम्हारे बाप का घर है?’ लेडी जहाँगीर की आवाज़ बुलन्द हो गयी।

इमरान चारों तरफ़ हैरानी से देखने लगा, फिर इस तरह उछला जैसे अचानक सिर पर कोई चीज़ गिरी हो।

‘अरे, मैं कहाँ हूँ? कमरा तो मेरा नहीं मालूम होता!’

‘अब जाओ। वरना मुझे नौकरों को बुलाना पड़ेगा।’

‘नौकरों को बुला कर क्या करोगी? मेरे लायक़ कोई ख़िदमत! वैसे तुम ग़ुस्से में बहुत हसीन लगती हो।’

‘शट अप।’

‘अच्छा, कुछ नहीं कहूँगा!’ इमरान बिसूर कर बोला और फिर मसहरी पर बैठ गया।

लेडी जहाँगीर उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरती रही। उसकी साँस फ़ूल रही थी और चेहरा सुर्ख़ हो गया था। इमरान ने जूते पहने। खूँटी से कोट उतारा और फिर बड़े इत्मीनान से लेडी जहाँगीर की सिंगार-मेज़ पर जम गया और फिर अपने बाल दुरुस्त करते वक़्त इस तरह गुनगुना रहा था जैसे सचमुच अपने कमरे ही में बैठा हो। लेडी जहाँगीर दाँत पीस रही थी, लेकिन साथ ही बेबसी के भाव भी उसके चेहरे पर उमड़ आये थे।

‘टाटा!’ इमरान दरवाज़े के क़रीब पहुँच कर मुड़ा और अहमक़ों की तरह मुस्कुराता हुआ बाहर निकल गया। उसका ज़ेहन बिलकुल साफ़ हो गया था। पिछली रात की जानकारी ही उसकी तसल्ली के लिए काफ़ी थी। मरे हुए आदमी के हाथ में रहस्यमय ढंग से सर जहाँगीर के लेटरपड का पाया जाना इस बात की दलील है कि इस मामले से सर जहाँगीर का कुछ-न-कुछ ताल्लुक़ ज़रूर है! और शायद सर जहाँगीर शहर ही में मौजूद थे। हो सकता है कि लेडी जहाँगीर यह न जानती हो।

अब इमरान को उस आकर्षक आदमी की फ़िक्र थी जिसे इन दिनों जज साहब की लड़की के साथ देखा जा रहा था।

‘देख लिया जायेगा!’ वह आहिस्ता से बड़बड़ाया।

उसका इरादा तो नहीं था कि घर की तरफ़ जाये, मगर जाना ही पड़ा। घर गये बग़ैर मोटर साइकिल किस तरह मिलती। उसे यह भी तो मालूम करना था कि वह ख़ौफ़नाक इमारत दरअस्ल थी किसकी। अगर उसका मालिक गाँव वालों के लिए अजनबी था तो ज़ाहिर है कि उसने वह इमारत ख़ुद ही बनवायी होगी। क्योंकि इमारत बहुत पुराने ढंग पर बनी हुई थी। लिहाज़ा ऐसी सूरत में यही सोचा जा सकता था कि मौजूदा मालिक ने भी उसे किसी से ख़रीदा ही होगा।

घर पहुँच कर इमरान की शामत ने उसे पुकारा। बड़ी बी शायद पहले ही से भरी बैठी थीं। इमरान की सूरत देखते ही आग बगूला हो गयीं—

‘कहाँ था रे...कमीने, सुअर!’

‘ओहो! अम्माँ बी, गुड मॉर्निंग...डियरेस्ट!’

‘मॉर्निंग के बच्चे, मैं पूछती हूँ रात कहाँ था?’

‘वह अम्माँ बी क्या बताऊँ? वह हज़रत मौलाना...बल्कि मुर्शिदी व मौलाई सैयदना जिगर मुरादाबादी हैं न...लाहौल विला क़ूवत...मतलब यह है कि मौलवी तफ़ज़्ज़ुल हुसैन क़िब्ला की ख़िदमत में रात हाज़िर था! अल्लाह, अल्लाह...क्या बुज़ुर्ग हैं...अम्माँ बी....बस, यह समझ लीजिए कि मैं आज से नमाज़ शुरू कर दूँगा।’

‘अरे...कमीने...कुत्ते...तू मुझे बेवक़ूफ़ बना रहा है।’ बड़ी बी झुँझलायी हुई मुस्कुराहट के साथ बोलीं।

‘अरे तौबा अम्माँ बी!’ इमरान ज़ोर से अपना मुँह पीटने लगा। ‘आपके क़दमों के नीचे मेरी जन्नत है।’

और फिर सुरैया को आता देख कर इमरान ने जल्द-से-जल्द वहाँ से खिसक जाना चाहा। बड़ी बी बराबर बड़बड़ाये जा रही थीं।

‘अम्माँ बी! आप ख़ामख़ा अपनी तबीयत ख़राब कर रही हैं! दिमाग़ में ख़ुश्की चढ़ जायेगी।’ सुरैया ने आते ही कहा– ‘और ये भाई जान! उन को ख़ुद के हवाले कीजिए!’

इमरान कुछ न बोला। अम्माँ बी को बड़बड़ाता छोड़ कर तो नहीं जा सकता था।

‘शर्म नहीं आती। बाप की पगड़ी उछालते फिर रहे हैं।’ सुरैया ने अम्माँ बी के किसी मिसरे पर गिरह लगायी!

‘हाँय, तो क्या अब्बा जान ने पगड़ी बाँधनी शुरू कर दी।’ इमरान आनन्दित लहजे में चीख़ा।

अम्माँ बी दिल की मरीज़ थीं। कमज़ोर भी थीं। लिहाज़ा उन्हें ग़ुस्सा आ गया। ऐसी हालत में हमेशा उनका हाथ जूती की तरफ़ जाता था। इमरान इत्मीनान से ज़मीन पर बैठ गया। और फिर तड़ातड़ की आवाज़ के अलावा और कुछ नहीं सुन सका। अम्माँ बी जब उसे जी भर के पीट चुकीं तो उन्होंने रोना शुरू कर दिया। सुरैया उन्हें दूसरे कमरे में घसीट ले गयी। इमरान की चचाज़ाद बहनों ने उसे घेर लिया। कोई उसके कोट की धूल झाड़ रही थी और कोई टाई की गाँठ दुरुस्त कर रही थी। एक ने सिर पर चम्पी शुरू कर दी।

इमरान ने जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाया और इस तरह खड़ा रहा जैसे वह बिलकुल तन्हा हो। दो-चार कश ले कर उसने अपने कमरे की राह ली और उसकी चचाज़ाद बहनें ज़रीना और सूफ़िया एक-दूसरे का मुँह ही देखती रह गयीं। इमरान ने कमरे में आ कर फ़ेल्ट हैट एक तरफ़ उछाल दी। कोट मसहरी पर फेका और एक आरामकुर्सी पर गिर कर ऊँघने लगा।

रात वाला काग़ज़ अब भी उसके हाथ में दबा हुआ था। उस पर कुछ हिन्दसे लिखे हुए थे। कुछ पैमाइशें थीं। ऐसा मालूम होता था जैसे किसी बढ़ई ने कोई चीज़ गढ़ने से पहले उसके मुख़्तलिफ़ हिस्सों के अनुपात का अन्दाज़ा लगाया हो। ज़ाहिरा तौर पर उस काग़ज़ के टुकड़े की कोई अहमियत नहीं थी, लेकिन उसका ताल्लुक़ एक अज्ञात लाश से था। ऐसे आदमी की लाश से जिसका क़त्ल बड़ी रहस्यमय स्थिति में हुआ था और इन हालात में यह दूसरा क़त्ल था।

इमरान को इस सिलसिले में पुलिस या इंटेलिजेन्स डिपार्टमेंट की व्यस्तता की कोई जानकारी नहीं थी। उसने फ़ैयाज़ से यह भी मालूम करने की काशिश नहीं की थी कि पुलिस ने इन हादसों के बारे में क्या राय क़ायम की है।

इमरान ने काग़ज़ का टुकड़ा अपने सूटकेस में डाल दिया और दूसरा सूट पहन कर दोबारा बाहर जाने के लिए तैयार हो गया।

थोड़ी देर बाद उसकी मोटर साइकिल उसी क़स्बे की तरफ़ जा रही थी जहाँ वह ख़ौफ़नाक इमारत थी। क़स्बे में पहुँच कर इस बात का पता लगाने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं हुई कि वह इमारत पहले किसकी मिलकियत थी। इमरान उस ख़ानदान के एक ज़िम्मेदार आदमी से मिला जिसने इमारत जज साहब को बेच दी थी।

‘अब से आठ साल पहले की बात है।’ उसने बताया, ‘अयाज़ साहब ने वह इमारत हमसे ख़रीदी थी। मरने से पहले वे उसे क़ानूनी तौर पर शहर के किसी जज साहब के नाम कर गये।’

‘अयाज़ साहब कौन थे? पहले कहाँ रहते थे?’ इमरान ने सवाल किया।

‘हमें कुछ नहीं मालूम। इमारत ख़रीदने के बाद तीन साल तक ज़िन्दा रहे, लेकिन किसी को कुछ न मालूम हो सका कि वे कौन थे और पहले कहाँ रहते थे। उनके साथ एक नौकर था जो अब भी इमारत के सामने वाले एक हिस्से में रहता है।’

‘यानी क़ब्र का वह मुजाविर?’ इमरान ने कहा और बूढ़े आदमी ने हाँ में सिर हिला दिया। वह थोड़ी देर तक कुछ सोचता रहा फिर बोला—

‘वह क़ब्र भी अयाज़ साहब ही ने खोजी थी। हमारे ख़ानदान वालों को तो इसकी जानकारी नहीं थी। वहाँ पहले कभी कोई क़ब्र नहीं थी। हमने अपने बुज़ुर्गों से भी उसके बारे में कुछ नहीं सुना।’

‘ओह!’ इमरान घूरता हुआ बोला, ‘भला क़ब्र किस तरह खोजी गयी थी?’

‘उन्होंने ख़्वाब में देखा था कि इस जगह कोई शहीद मर्द दफ़्न हैं। दूसरे ही दिन क़ब्र बनानी शुरू कर दी।’

‘ख़ुद ही बनानी शुरू कर दी।’ इमरान ने हैरत से पूछा।

‘जी हाँ, वे अपना सारा काम ख़ुद ही करते थे। काफ़ी दौलतमन्द भी थे, लेकिन उन्हें कंजूस नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह दिल खोल कर ख़ैरात करते थे।’

‘जिस कमरे में लाश मिली थी, उसकी दीवारों पर प्लास्टर है। लेकिन दूसरे कमरों में नहीं। इसकी क्या वजह है?’

‘प्लास्टर भी अयाज़ साहब ही ने किया था।’

‘ख़ुद ही?’

‘जी हाँ!’

‘इस पर यहाँ क़स्बे में तो बड़ी काना-फ़ूसी हुई होगी।’

‘क़तई नहीं जनाब...अब भी यहाँ लोगों का यही ख़याल है कि अयाज़ साहब कोई पहुँचे हुए बुज़ुर्ग थे और मेरा ख़याल है उनका नौकर भी बुज़ुर्गी से ख़ाली नहीं।’

‘कभी ऐसे लोग भी अयाज़ साहब से मिलने के लिए आये थे जो यहाँ वालों के लिए अजनबी रहे हों?’

‘जी नहीं...मुझे तो याद नहीं। मेरा ख़याल है कि उनसे कभी कोई मिलने के लिए नहीं आया।’

‘अच्छा बहुत शुक्रिया!’ इमरान बूढ़े से हाथ मिला कर अपनी मोटर साइकिल की तरफ़ बढ़ गया।

अब वह उसी इमारत की तरफ़ जा रहा था और उसके ज़ेहन में एक साथ कई ख़याल थे। अयाज़ ने वह क़ब्र ख़ुद ही बनायी थी। और कमरे में प्लास्टर भी ख़ुद ही किया था। क्या वह एक अच्छा राजगीर भी था? क़ब्र वहाँ पहले नहीं थी। वह अयाज़ ही की खोज थी। उसका नौकर आज भी क़ब्र से चिमटा हुआ है। आख़िर क्यों? उसी एक कमरे में प्लास्टर करने की क्या ज़रूरत थी?

इमरान इमारत के क़रीब पहुँच गया। बाहरी बैठक, जिसमें क़ब्र का मुजाविर रहता था, खुली हुई थी और वह ख़ुद भी मौजूद था। इमरान ने उस पर एक उचटती हुई नज़र डाली। वह अधेड़ उम्र का मज़बूत कद-काठी का आदमी था। 

चेहरे पर घनी दाढ़ी और आँखें सुर्ख़ थीं, शायद वह हमेशा ऐसी ही रहती थीं।

इमरान ने दो-तीन बार जल्दी-जल्दी पलके झपकायीं और फिर उसके चेहरे पर पुराने बेवक़ूफ़ी के लक्षण उभर आये।

‘क्या बात है?’ उसे देखते ही नौकर ने ललकारा।

‘मुझे आपकी दुआ से नौकरी मिल गयी है।’ इमरान विनम्र लहजे में बोला, ‘सोचा, कुछ आपकी ख़िदमत करता चलूँ।’

‘भाग जाओ।’ क़ब्र का मुजाविर सुर्ख़-सुर्ख़ आँखें निकालने लगा।

‘अब इतना न तड़पाइए!’ इमरान हाथ जोड़ कर बोला, ‘बस, आख़िरी दरख़्वास्त करूँगा।’

‘कौन हो तुम...क्या चाहते हो?’ मुजाविर यकायक नर्म पड़ गया।

‘लड़का, बस एक लड़के के बग़ैर घर सूना लगता है। या हज़रत तीस साल से बच्चे की आरज़ू है।’

‘तीस साल! तुम्हारी उम्र क्या है?’ मुजाविर उसे घूरने लगा।

‘पच्चीस साल!’

‘भागो! मुझे लौंडा बनाते हो! अभी भसम कर दूँगा...’

‘आप ग़लत समझे या हज़रत! मैं अपने बाप के लिए कह रहा था...दूसरी शादी करने वाले हैं!’

‘जाते हो या...’ मुजाविर उठता हुआ बोला।

‘सरकार...’ इमरान हाथ जोड़ कर विनम्र लहजे में बोला, ‘पुलिस आपको बेहद परेशान करने वाली है।’

‘भाग जाओ! पुलिस वाले गधे हैं! वे फ़क़ीर का क्या बिगाड़ेंगे!’

‘फ़क़ीर के साये में दो ख़ून हुए हैं।’

‘हुए होंगे! पुलिस जज साहब की लड़की से क्यों नहीं पूछती कि वह एक मुस्टण्डे को ले कर यहाँ क्यों आयी थी।’

‘या हज़रत पुलिस वाक़ई गधी है! आप ही कुछ रास्ता दिखाइए।’

‘तुम खुफ़िया पुलिसमैन हो।’

‘नहीं सरकार! मैं एक अख़बार का रिपोर्टर हूँ। कोई नयी ख़बर मिल जायेगी तो पेट भरेगा।’

‘हाँ, अच्छा बैठ जाओ। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता कि वह मकान जहाँ एक बुज़ुर्ग का मज़ार है, बदकारी का अड्डा बने। पुलिस को चाहिए कि उसकी रोक-थाम करे।’

‘या हज़रत मैं बिलकुल नहीं समझा।’ इमरान मायूसी से बोला।

‘मैं समझाता हूँ।’ मुजाविर अपनी सुर्ख़-सुर्ख़ आँखें फाड़ कर बोला, ‘चौदह तारीख़ को जज साहब की लौंडिया अपने एक यार को ले कर यहाँ आयी थी...और घण्टों अन्दर रही!’

‘आपने ऐतराज़ नहीं किया...मैं होता तो दोनों के सर फाड़ देता। तौबा-तौबा इतने बड़े बुज़ुर्ग के मज़ार पर....’ इमरान अपना मुँह पीटने लगा!

‘बस, ख़ून के घूँट पी कर रह गया था...क्या करूँ! मेरे मुर्शिद मकान उन लोगों को दे गये हैं, वरना बता देता।’

‘आपके मुर्शिद?’

‘हाँ...हज़रत अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! वे मेरे पीर थे। इस मकान का यह कमरा मुझे दे गये हैं ताकि मज़ार शरीफ़ की देख-भाल करता रहूँ!’

‘अयाज़ साहब का मज़ार शरीफ़ कहाँ है?’ इमरान ने पूछा।

‘क़ब्रिस्तान में...उनकी तो वसीयत थी कि मेरी क़ब्र बराबर कर दी जाये। कोई निशान न रखा जाये।’

‘तो जज साहब की लड़की को पहचानते हैं आप!’

‘हाँ पहचानता हूँ! वह कानी है।’

‘हाय!’ इमरान ने सीने पर हाथ मारा। मुजाविर उसे घूरने लगा।

‘अच्छा हज़रत! चौदह की रात को वह यहाँ आयी थी और सोलह की सुबह को लाश पायी गयी।’

‘एक नहीं, अभी हज़ारों मिलेंगी।’ मुजाविर को जलाल आ गया। ‘मज़ार शरीफ़ की बेहुर्मती है!’

‘मगर सरकार! मुमकिन है कि वह उसका भाई रहा हो!’

‘हरगिज़ नहीं! जज साहब के कोई लड़का नहीं है।’

‘तब तो फिर मामला...हिप!’ इमरान अपना दाहिना कान खुजाने लगा!

इमरान वहाँ से भी चल पड़ा। वह फिर क़स्बे के अन्दर वापस जा रहा था। तीन घण्टे तक वह मुख़्तलिफ़ लोगों से पूछ-ताछ करता रहा और फिर शहर की तरफ़ रवाना हो गया।

***

कैप्टन फ़ैयाज़ काम में व्यस्त था कि उसके पास इमरान का पैग़ाम पहुँचा। उसने फ़ैयाज़ को उसके ऑफ़िस के क़रीब ही रेस्तराँ में बुलवा भेजा था। फ़ैयाज़ ने वहाँ पहुँचने में देर नहीं लगायी। इमरान एक ख़ाली मेज़ पर तबला बजा रहा था। फ़ैयाज़ को देख कर अहमक़ों की तरह मुस्कुराया।

‘कोई नयी बात?’ फ़ैयाज़ ने उसके क़रीब बैठते हुए पूछा।

‘मीर तक़ी मीर ग़ालिब तख़ल्लुस करते थे!’

‘ये इत्तला तुम डाक के ज़रिये भी दे सकते थे।’ फ़ैयाज़ चिढ़ कर बोला।

‘चौदह तारीख़ की रात को वह महबूबा एक आँख वाली कहाँ थी?’

‘तुम आख़िर उसके पीछे क्यों पड़ गये हो?’

‘पता लगा कर बताओ!...अगर वह कहे कि उसने अपनी वह रात अपनी किसी ख़ाला के साथ बितायी है तो तुम्हारा फ़र्ज़ है कि उस ख़ाला से बात की तहक़ीक़ करके हमदर्द दवाख़ाने को फ़ौरन इत्तला कर दो, वरना ख़तो-किताबत ख़ुफ़िया न रखी जायेगी।’

‘इमरान, मैं बहुत मशग़ूल हूँ!’

‘मैं भी देख रहा हूँ! क्या आजकल तुम्हारे ऑफ़िस में मक्खियों की कसरत हो गयी है! कसरत से यह मुराद नहीं कि मक्खियाँ डण्ड पेलती हैं।’

‘मैं जा रहा हूँ।’ फ़ैयाज़ झुँझला कर उठता हुआ बोला।

‘अरे, क्या तुम्हारी नाक पर मक्खियाँ नहीं बैठतीं।’ इमरान ने उसका हाथ पकड़ कर बिठाते हुए कहा।

फ़ैयाज़ उसे घूरता हुआ बैठ गया! वह सचमुच झुँझला गया था।

‘तुम आये क्यों थे?’ उसने पूछा।

‘ओह! यह तो मुझे भी याद नहीं रहा। मेरा ख़याल है शायद मैं तुमसे चावल का भाव पूछने आया था, मगर तुम कहोगे कि मैं कोई नाचने वाली तो हूँ नहीं कि भाव बताऊँ...वैसे तुम्हें यह इत्तला दे सकता हूँ कि इन लाशों के सिलसिले में कहीं-न-कहीं एक आँख वाली महबूबा का क़दम ज़रूर है...मैंने कोई ग़लत लफ़्ज़ तो नहीं बोला...हाँ!’

‘उसका क़दम किस तरह!’ फ़ैयाज़ यकायक चौंक पड़ा।

‘एनसाइक्लोपीडिया में यही लिखा है।’ इमरान सिर हिला कर बोला, ‘बस, यह मालूम करो कि उसने चौदह की रात कहाँ गुज़ारी!’

‘क्या तुम संजीदा हो?’

‘ओफ़्फ़ोह! बेवक़ूफ़ आदमी हमेशा संजीदा रहते हैं!’

‘अच्छा, मैं मालूम करूँगा।’

‘ख़ुदा तुम्हारी मादा को सलामत रखे। दूसरी बात यह कि मुझे जज साहब के दोस्त अयाज़ के मुकम्मल हालात की जानकारी चाहिए। वह कौन था? कहाँ पैदा हुआ था? किस ख़ानदान से ताल्लुक़ रखता था? उसके अलावा दूसरे रिश्तेदार वग़ैरह कहाँ रहते हैं? सब मर गये या अभी कुछ ज़िन्दा हैं?’

‘तो ऐसा करो, आज शाम की चाय मेरे घर पर पियो।’ फ़ैयाज़ बोला।

‘और इस वक़्त की चाय?’ इमरान ने बड़े भोलेपन से पूछा।

फ़ैयाज़ ने हँस कर वेटर को चाय का आर्डर दिया। इमरान उल्लू की तरह आँखें घुमा रहा था। वह कुछ देर बाद बोला-

‘क्या तुम मुझे जज साहब से मिलाओगे?’

‘हाँ, मैं तुम्हारी मौजूदगी में ही उनसे उसके बारे में गुफ़्तगू करूँगा।’

‘ही...ही...मुझे तो बड़ी शर्म आयेगी।’ इमरान दाँतों तले उँगली दबा कर दुहरा हो गया।

‘क्यों...क्यों बोर कर रहे हो...शर्म की क्या बात है।’

‘नहीं, मैं वालिद साहब को भेज दूँगा।’

‘क्या बक रहे हो?’

‘मैं अपनी शादी ख़ुद तय करना नहीं चाहता।’

‘ख़ुदा समझे! अरे, मैं अयाज़ वाली बात कर रहा था।’

‘लाहौल विला क़ूवत।’ इमरान ने झेंप जाने की ऐक्टिंग की।

‘इमरान, आदमी बनो।’

‘अच्छा!’ इमरान ने आज्ञाकारिता से सिर हिलाया।

चाय आ गयी थी। फ़ैयाज़ कुछ सोच रहा था। कभी-कभी वह इमरान की तरफ़ भी देख लेता था जो अपने सामने वाली दीवार पर लगे हुए आईने में देख-देख कर मुँह बना रहा था। फ़ैयाज़ ने चाय बना कर प्याली उसके आगे खिसका दी।

‘यार फ़ैयाज़...वह शहीद मर्द की क़ब्र वाला मुजाविर बड़ा ग्रेट आदमी मालूम होता है।’ इमरान बोला।

‘क्यों?’

‘उसने एक बड़ी ग्रेट बात कही थी।’

‘क्या...?’

‘यही कि पुलिस वाले गधे हैं।’

‘क्यों कहा था उसने।’ फ़ैयाज़ चौंक कर बोला।

‘पता नहीं, लेकिन उसने बात बड़े पते की कही थी।’

‘तुम ख़ामख़ा गालियाँ देने पर तुले हुए हो।’

‘नहीं प्यारे! अच्छा, तुम यह बताओ! वहाँ क़ब्र किसने बनायी थी? और उस एक कमरे के प्लास्टर के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है?’

‘मैं बेकार बातों में सर नहीं खपाता!’ फ़ैयाज़ चिढ़ कर बोला। ‘इस मामले में उनका क्या ताल्लुक़?’

‘तब तो किसी अजनबी की लाश का वहाँ पाया जाना भी कोई अहमियत नहीं रखता।’ इमरान ने कहा।

‘आख़िर तुम कहना क्या चाहते हो?’ फ़ैयाज़ झुँझला कर बोला।

‘ये कि नेक बच्चे सुबह उठ कर अपने बड़ों को सलाम करते हैं। फिर हाथ-मुँह धो कर नाश्ता करते हैं...फिर स्कुल चले जाते हैं। किताब खोल कर अलिफ़ से उल्लू, ब से बन्दर...पे से पतंग...!’

‘इमरान, ख़ुदा के लिए!’ फ़ैयाज़ हाथ उठा कर बोला।

‘और ख़ुद को हर वक़्त याद रखते हैं।’

‘बके जाओ।’

‘चलो ख़ामोश हो गया। एक ख़ामोशी हज़ार टलाएँ बालती है...हाँय, क्या टलाएँ...लाहौल विला क़ूवत...मैंने अभी क्या कहा था?’

‘अपना सर।’

‘हाँ शुक्रिया! मेरा सर बड़ा मज़बूत है...एक बार इतना मज़बूत हो गया था कि मैं उसे बैंगन का भुर्ता कहा करता था।’

‘चाय ख़त्म करके दफ़ा हो जाइए।’ फ़ैयाज़ बोला, ‘मुझे अभी बहुत काम है। शाम को घर ज़रूर आना।’

***