शाम हो चुकी थी।

इन्दर प्रकाश मीणा एक घटिया से इलाके में पहुँचा। तंग-भिड़ा इलाका था ये। पतली-पतली गलियाँ। छोटे-छोटे मकान।  कोई मकान बीस गज में बना था, तो कोई पच्चीस में, किसी ने ज्यादा तीर मार लिया तो पचास गज में। कमरे के ऊपर कमरा...कमरे के ऊपर कमरा डाल रखा था, जैसे आसमान को छूने की चाहत हो मन में। परन्तु ये सब गरीबों का बसेरा था।

तंग गलियों में आगे बढ़ता मीणा, एक मकान के दरवाजे पर ठिठका। ये बीस गज की जगह पर बना कमरा था। कमरे के ऊपर कमरा, दो करे डाल रखे थे। बाहर से ही ऊपर को सीढ़ियां चढ़ रही थीं।

वो दरवाजा बंद था। उस पर ताला लटक रहा था।

“उल्लू का पट्ठा!” मीणा बड़बड़ा उठा।

तभी पड़ौस के दरवाजे से एक औरत बाहर निकली तो मीणा ने पूछा-

“दूबे कहाँ है?”

“यहीं तो था दस मिनट पहले...।” औरत ने कहा और आगे चली गई। यहीं था? हूँ...उसे पता है, वो किधर गया होगा!

इन्दर प्रकाश मीणा वहाँ से वापस चला गया। गंदे से इलाके में मौजूद एक दारूखाने पर इन्दर प्रकाश मीणा पहुँचा। शोर सा मचा हुआ था। वातावरण में सिग्रेट और सिग्रेट में पड़ने वाले नशे की स्मैल मौजूद थी। दारूखाने का आगे का हिस्सा पक्के मकान की तरह था। भीतर दो कमरे पक्के थे। जिनमें बोतलों को लकड़ी के रैकों पर सजाकर, बार जैसा रूप देने की कोशिश की गई थी। टूटा-फूटा काऊँटर था। कम उम्र के छोकरे दारू सर्व कर रहे थे। पीछे की तरफ कच्ची खुली जमीन थी, जिस पर लकड़ी के पच्चीस-तीस बैंच रखे हुए थे। वहाँ पर ढेरों लोग बैठे थे। पी रहे थे, शोर भी हो रहा था। वहाँ ज्यादा रोशनी नहीं थी। पीने का काम अंधेरे में ही बाखूबी चल रहा था।

मीणा ने भीतर प्रवेश किया।

लोग भीतर-बाहर आ-जा रहे थे।

मीणा ने गहरी सांस लेकर चारों तरफ नजर घुमाई। जब वर्दी पहन कर यहाँ आया था तो यहाँ के सारे कर्मचारी साब-साब कहकर उसके आगे-पीछे घूम रहे थे और अब उसे देखकर कोई उसकी परवाह नहीं कर रहा था

मीणा आगे बढ़ा और बार काउंटर पर पहुँचा। काऊंटर के पीछे दो व्यक्ति मौजूद थे।

“पीछे चला जा।” एक ने कहा- “छोकरे को बोल देना, जो भी चाहिये हो, वो नोट लेकर माल तेरे को दे देगा।”

“तूने मेरे को नहीं पहचाना?” बोला मीणा।

“मुझे तो नहीं लगता कि तू पहले कभी यहाँ आया है। पीने से मतलब है तुझे, पी और खिसक ले।”

“दूबे किधर है?”

“दूबे?”

“पतला, लम्बा, चोंच जैसी लम्बी नाक। वो हमेशा यहीं पर शाम को पीने...”

तभी दूसरा व्यक्ति कह उठा- “वो अभी-अभी आया है। पीछे ही गया है।”

मीणा ने सिर हिलाया और पीछे की तरफ जाने लगा कि वो पुनः कह उठा-

“कोई लफड़ा तो नहीं है?”

“नहीं।” मीणा ने कहा और पीछे की तरफ बढ़ता चला गया। पीछे खुले आहते में बैंचों पर लोग बैठे दिख रहे थे। अंधेरा होना शुरू हो गया था। आसमान साफ था और चन्द्रमा की रोशनी पूरी पड़ रही थी। मीणा ठिठका और नजरें वहाँ बैठे लोगों पर घूमने लगीं।

कम रोशनी में भी दूबे को पहचानने में कोई दिक्कत नहीं आई। मीणा उसकी तरफ बढ़ गया। दूबे एक बैंच पर बैठा था। पास में बोतल और चने की कटोरी रखी हुई थी।

मीणा उसके पास जाकर बैंच पर बैठ गया।

दूबे ने मीणा को देखा, फिर बोतल से अपना गिलास बनाने लगा।

“दूबे...।” मीणा ने मुस्करा कर कहा- “ऐश हो रही है।”

दूबे ने मीणा को देखा और गिलास होंठों से लगाकर, आधा खाली किया, फिर गहरी सांस लेकर गिलास बैंच पर रखा और चने के कुछ दाने मुँह में डालकर, तसल्ली से उन्हें खाने लगा।

मीणा शांत मुस्कान के साथ उसे देखता रहा।

मुँह हिलाते दूबे ने मीणा को देखा और गर्दन हिलाकर बोला- “मुझे कैसे जानता है?”

“तूने मुझे नहीं पहचाना दूबे?”

“मैंने तो तेरे को पहले कभी देखा भी नहीं... “ दूबे ने पुनः गिलास उठाया और घूँट भरा- “अगर तू सोचता है कि इस वक्त मेरे से यारी गांठ क तू मेरी बोतल में से पी लेगा तो ये तेरी भूल है, ये बोतल मेरा पूरा कोटा है।”

“मेरे ख्याल में अंधेरा होने की वजह से तू मुझे पहचान नहीं रहा...।” बोला मीणा।

“ऐसा तो कुछ नहीं है, मैं तुझे पहचानने वाले हिसाब से साफ देख रहा हूँ। लेकिन तेरा बात करने का अंदाज पहचाना-सा लगता है।”

“दूबे, मैं हूँ, सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।”

दूबे ने उस कम रोशनी में मीणा को घूरा। गहरी निगाहों से देखा।

“तेरे को शायद पता नहीं।”

“क्या?”

“सब-इंस्पेक्टर साहब तो भगवान को प्यारे हो गये। दस दिन पहले ये खबर कहीं से सुनी थी।”

“मैं जिन्दा हूँ दूबे...।”

दूबे ने गिलास उठा कर खाली किया, फिर चने के दाने मुँह में डाले।

“तेरी बात सुनकर मजा आया।”

“क्या?”

“यही कि तू खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहा है।”

“मैं हूँ दूबे-सच में मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ।”

“बोला तो, सुनकर मजा आया... ।” मुँह हिलाते दूबे बोला।

नशा उसके सिर पर मंडराने लगा था।

मीणा ने गहरी सांस ली।

“तो मैं वो सब-इंस्पेक्टर नहीं...।”

“नहीं।” दूबे ने इन्कार में सिर हिलाया।

“मेरे लिये भी पीने को मंगा, हॉफ मंगा ले।” मीणा कह उठा- “आज पीने का मन है।”

“पीने का मन है तो मेरे ऊपर क्यों चढ़ रहा है। नोट निकाल और मंगा ले। मैं क्यों मंगवाऊँ...।”

“सही कहता है मक्कार...।”

“तूने मुझे मक्कार कहा?”

“हाँ। तू तो मुझे देखते ही हमेशा कुत्ते की तरह मेरी टांगों में घुस जाता था...और आज तू मुझे पहचानना तो दूर, बल्कि मेरे में लिये पचास-सत्तर रुपये खर्च करने को कतरा रहा है। मैं तेरे कितने काम आया...”

“मेरे काम आया?” मुस्करा पड़ा दूबे

“सब कुछ भूल गया?”

“अच्छा बता, तू मेरे किस काम आया?”

“तूने जानकी दास जैन को लूटा था-याद है-उसने थाने में तेरी तस्वीर पहचान ली थी?”

दूबे हड़बड़ा उठा।

“तू...तुझे कैसे पता?”

“तब मैंने ही जानकीदास जैन को कोने में ले जाकर समझाया था कि बात बढ़ाने का कोई फायदा नहीं। तेरे को बुलाकर, उसके पांव पकड़वा दिए। तेरे से लूटा माल उसे वापस कराया। तब जाकर वो शांत हुआ था। तेरे को बचाया कि नहीं?”

“वो...वो तो सब कुछ मीणा साहब ने किया...।”

“भूतनी के, मैं ही तो मीणा हूँ, वरना ये बात मुझे कैसे पता होती?” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

दूबे सकपका कर, मीणा का चेहरा देखने लगा।

“और वो किशनलाल, उसे तूने चाकू मार दिया था। लूट के बाद बंटवारे को लेकर तुम दोनों में कहा-सुनी हो गई थी। तब किशनलाल अपनी मरहम-पट्टी कराकर मेरे पास आया कि मैं मामले में दखल दूँ। फिर मैंने तुम दोनों में दोस्ती कराई और माल के तीन हिस्से किए। एक किस्सा मैंने लिया, दूसरा तुझे और तीसरा किशनलाल को दिया।”

“गुरू, तू तो सब जानता है।” दूबे घबरा कर कह उठा।

“क्योंकि मैं ही मीणा हूँ।”

“ये नहीं हो सकता। तुम...।”

“बोस्की की तो याद ही होगी तुझे। तूने बोस्की के आदमी को लूटा था, गलती से। तब बोस्की तुझे जान से खत्म कर देने के लिए तेरे पीछे पड़ गया। कुछ दिन तो तू जान बचाता भागता रहा, फिर जब तुझे लगा कि बोस्की मानने वाला नहीं, वो तेरे को मार के ही रहेगा तो तू मेरी शरण में आ गया। तूने बोस्की को समझाने की एवज में मुझे 25 हजार रुपये दिए। फिर जैसे-तैसे मैंने बोस्की को समझा कर...।”

“मान गया, तू सच में गुरू आदमी है। मेरे बारे में सब कुछ जानता है।”

“फिर वो ही बात! तेरे को कहा ना कि मैं ही सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ...।”

“ये मैं नहीं मान सकता।”

“क्यों?”

“क्यों कि तू मीणा है ही नहीं...।” नशे की मस्ती दूबे पर अब चढ़ने लगी थी।

मीणा का खून खौल उठा, दूबे के बात करने का अंदाज देखकर।

परन्तु ये सोच कर उसने सब्र से काम लिया कि उसे कोई भी नहीं पहचान रहा तो दूबे कैसे पहचान लेता!

“लेकिन ये गम्भीर बात है कि तू मेरे भीतर की बातें जानता है। किसने बताया ये सब? सब-इंस्पेक्टर मीणा ने मरने से पहले बताया होगा या ये बातें मेरे बारे में तूने जान ली होंगी कहीं से...।”

मीणा ने आहत भाव से उसे देखा। फिर बोला-

“तूने ग्रीन अपार्टमेंट में एक बार मोटा हाथ मारा था। वहाँ से तेरे को डेढ़ करोड़ हाथ लगा। सब-इंस्पेक्टर रंजीत सिंह ने पहचान लिया कि ये काम तूने किया है और उसने तेरे को पकड़ लिया।”

दूबे ने गहरी सांस लेकर मीणा को हैरानी से देखा- “गुरू, तू है कौन?”

“मीणा, सब-इंस्पेक्टर मीणा...।”

“सच बोल, मजाक बहुत हो गया।”

“ये सच ही है।” मीणा ने गम्भीरता से कहा- “तब रंजीत सिंह ने तेरे को कानून से दूर रखने के फेर में डेढ़ के डेढ़ करोड़ मांगे। सारा पैसा तू देने को तैयार नहीं था। और रंजीत सिंह भी तेरे को छोड़ने के मूड में नहीं था। तब तूने मेरे को फोन किया और मैंने तुम दोनों में फैसला कराया। पचास-पचास लाख तीन जगह बांटा गया। एक हिस्सा तेरा, दूसरा मेरा और तीसरा रंजीत सिंह को दिया गया था।”

“मान गया कि तेरे से बड़ा गुरू कोई नहीं कि मेरी बातों की तेरे को इस हद तक खबर है।” दूबे ने गहरी सांस ली। फिर सामने से जाते लड़के को बुलाया और सौ का नोट उसे देकर बोला- “हॉफ ले आ। चने...गिलास वगैरहा सब कुछ...।”

छोकरा चला गया।

दूबे ने मीणा को देख कर कहा- “अब तो खुश! तेरे लिए हॉफ मंगाया है।”

मीणा मुस्कराया।

“ये तो बता कि तू ये सब बातें कैसे जानता है?”

“क्योंकि मैं ही इन्दर प्रकाश मीणा हूँ...।”

“ये बात मानने लायक नहीं है।” दूबे ने इन्कार में सिर हिलाया- “मजाक मत कर मेरे से।”

“मेरे इस सच को तू मानता क्यों नहीं?” मीणा झल्लाया।

“तू सच मनवाने मेरे पास ही क्यों आया?”

मीणा चुप रहा।

“जवाब दे...”

“क्योंकि कोई भी इस बात को मान नहीं रहा।”

“इसलिए नहीं मान रहा कि तू सब-इंस्पेक्टर मीणा नहीं है। वो मर चुके हैं।”

“मैं जिन्दा हूँ यार...”

दूबे जाने क्या बड़बड़ाया और अपना गिलास फिर से तैयार करने लगा।

मीणा दूबे को देखता रहा। चेहरे पर परेशानी के भाव थे।

“करता क्या है तू?”

“कुछ नहीं...”

“तू पहुँचा हुआ लगता है। कहीं मोटा हाथ मारने का प्लॉन हो तो मुझे साथ रख ले।”

मीणा ने मुँह फेर लिया। तभी छोकरा देसी का हॉफ, चने की प्लेट, गिलास और पानी बैंच पर रख गया।

“मेरी तरफ से।” दूबे हंसकर कह उठा- “गिलास बना और पी ले...”

मीणा थकान महसूस कर रहा था और शराब की भी जरूरत उसे लग रही थी।

मीणा ने अपना गिलास तैयार किया और मोटा घूँट भरा।

इससे राहत सी मिली उसे। वह दूबे से कह उठा- “मैं तो तेरे पास इसलिए आया था कि मुझे भरोसा था, तू मुझे जरूर पहचानेगा।’

“पहचान तो लिया है।”

“क्या?”

“यही कि तू पहुँचा हुआ गुरू आदमी है। बढ़िया लगा तू मुझे...।”

मीणा ने फिर मोटा चूंट भरा। सोच रहा था कि शायद कोई भी उसे ना पहचाने। सावी और ए.सी.पी. कामराज ने कोई खास ही खेल खेला है कि उसे कोई पहचान नहीं रहा।

मीणा ने एक ही सांस में गिलास खाली कर दिया।

“चढ़ा लिया गिलास, चने भी खा ले। मुँह का स्वाद ठीक हो जायेगा।”

“मैं तेरे घर भी गया था।” मीणा ने कहा।

“घर?”

“हाँ। दरवाजे पर ताला लगा था। तेरी पड़ौसी औरत ने बताया कि तू अभी-अभी गया है, तो मैं समझ गया कि शाम के वक्त तू यहीं मिलेगा...और तू मिल गया।”

“यानि कि यहाँ पर तू सिर्फ मेरे से मिलने आया है?” दूबे अचकचा कर कह उठा।

“हाँ...”

“मेरे घर का पता तेरे को किसने बताया? मेरे बारे में तेरे को किसने बताया?”

“मुझे सब पता है।”

“हाँ...” नये गिलास से घूँट भर कर दूबे ने सिर हिलाया- “तेरे को तो सब पता है। मैं भूल गया था ये बात। लेकिन तेरे को मेरी खास बातें बताईं किसने? ये चक्कर मैं अभी तक नहीं समझा...”

“मैं ही मीणा हूं...।”

“पागल मत बना मुझे...।”

“सच कह रहा...।”

“पी जरूर रहा हूँ, परन्तु पीकर मेरा दिमाग खराब नहीं होता कि सामने कोई हो और उसे कोई और समझने लगूं। एक बात को बार-बार मत कह। मुझे बोरियत होती है।”

“तो तू जरा भी नहीं मानेगा कि मैं मीणा हूँ...।”

“नहीं मानूंगा।”

“पांच मिनट के लिए मान ले...।”

“उससे क्या होगा?”

“हो जायेगा, तू मान तो...।”

“मानूंगा तो मन में सबसे पहली बात ये आयेगी कि तू मीणा है और जो मरा था, जिसे फूंका गया था, उसके घरवालों ने, वो कौन था?

“वो कोई और था...।”

“मीणा के घर वाले क्या बेवकूफ हैं जो किसी और को मीणा. मान लेंगे?”

“घर में सिर्फ पत्नी है, सावी। वो और कामराज मिले हुए हैं। ये सब उन्हीं की साजिश है।” मीणा ने दाँत भींच कर कहा।

दूबे ने उसे दखा।

“कामराज कौन है?”

“ए.सी.पी. कामराज, मेरा आफिसर है।”

“तो तेरा ये कहना है कि मीणा की पत्नी और ए.सी.पी. ने मीणा के खिलाफ कोई साजिश रची है?”

“हाँ। मैं ही मीणा हूँ...।”

“मान लिया, तू ही मीणा है।” दूबे मुस्कराया - “तेरी पत्नी और ए.सी.पी. की साजिश का हिस्सा मैं तो नहीं, फिर मैं तुझे यानि मीणा को क्यों नहीं पहचान रहा? तू मीणा है ही नहीं तो पहचानूंगा कैसे?”

होंठ भींचे मीणा दूसरा गिलास तैयार करने लगा। चेहरे पर गुस्सा नजर आ रहा था।

“इधर-उधर की बातें बहुत हो गईं, अब ये बता कि तू कौन ?”

“मैं मीणा ही हूँ दूबे। मैं...।”

दूबे ने उसे इस अन्दाज में घूरा कि मीणा पुनः होंठ भींचकर चुप हो गया। गिलास तैयार करके घूँट भरा, फिर कटोरी से चने लेकर मुँह में डाले। दूबे तभी सिर हिलाकर कह उठा- मीणा ने उसे देखा, कहा कुछ नहीं।

“कहाँ रहता है तू?” दूबे ने पूछा।

“मेरा कोई ठिकाना नहीं। पता नहीं रात कहाँ बिताऊँगा!” मीणा बोला।

“मेरे साथ चल, मेरे घर पर। दोनों दोस्तों की तरह रहेंगे। कहीं बड़ा हाथ मारने का प्लान करेंगे।”

मीणा ने उसे देखा।

“सच में!” दूबे मुस्करा उठा।

मीणा समझ चुका था कि कोई नहीं कहेगा कि वो सब-इंस्पेक्टर मीणा है। सावी और कामराज ने जाने कैसा प्लान रचा था उसके खिलाफ। कोई उसे पहचान नहीं रहा था।

“रहेगा मेरे साथ?”

मीणा खामोश रहा।

“मुझे काम की तलाश है। ऐसे में तुम जैसा हरामी साथी मिल जाये तो हम कोई काम कर सकते हैं।”

मीणा को दूबे के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर अब तकलीफ नहीं हुई उसका वजूद जाने कहाँ छिप गया था?

सब उसे मरा मान रहे थे।

“मेरी बात पर सोच लेना।” दूबे ने कहा- “आज रात मेरे घर पर ही रह ले। सुबह आराम से बातें करेंगे।”

“ठीक है।” मीणा ने कह दिया।

“तू कहाँ का रहने वाला है?”

“यहीं का, इसी शहर का...।”

“और तेरे पास कोई ठिकाना नहीं है रहने को, अजीब बात है ना?”

मीणा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर चुप हो गया।

“कह कह...।” दूबे बोला।

“मैं तेरे को फिर से वो ही कहने वाला था कि मैं मीणा हूँ...।”

“बस कर यार! ऐसा ढोल क्यों बजा रहा है जिसकी आवाज

ही नहीं गूंजती। मान लिया कि तेरे को मेरे बारे में वो बातें पता हैं जो मीणा जानता था। लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि तू मीणा बन गया? रहने दे, खामखाह की गोलियाँ मत चला।”

मीणा ने एक ही सांस में गिलास खाली किया और मुस्करा पड़ा।

“मुस्कराते हुए तू अच्छा लगता है। रोनी सूरत बना के मत रहा कर।”

मीणा ने गहरी सांस ली और आसमान को देखने लगा। तारे टिमटिमाते दिखे, सोच रहा था कि कुदरत उसे जाने क्या खेल दिखा रही है। आगे भी जाने क्या देखना पड़ेगा। किस्मत का खेल भी निराला है।

☐☐☐

इन्दर प्रकाश मीणा और दूबे दारू के ठिकाने से बाहर निकले तो रात के ग्यारह बज रहे थे।

दोनों ठीक-ठाक नशे में थे।

सामने सड़क पर से वाहन निकल रहे थे। हैडलाइटें चमक रही थीं।

“तूने अपना नाम नहीं बताया?” दूबे का स्वर नशे से भरा था।

“बताया तो था, इन्दर प्रकाश मीणा, सब-इंस्पेक्टर इन्दर... ।

“सच में पक्का गुरू आदमी है।” दूबे हंस पड़ा- “तोते वाली रट नहीं छोड़ता तू...।”

“अब तो मेरा भरोसा कर ले दूबे।”

“क्यों, अब क्या हो गया?”

“हम दोनों ने पी रखी है। पीकर तो सच ही बोला जाता है, मेरा यकीन कर, मैं ही सब-इंस्पेक्टर मीणा हूँ।”

“पीने के बाद ये तेरा सच है!”

“तो?”

“पीने के बाद मेरा सच है कि मैंने तुझे पहचान लिया है। तू पक्का हरामी आदमी है।” दूबे ने हाथ हिलाकर कहा।

“पहले तो तू मेरी जी-हजूरी करते नहीं थकता था और अब मुझे हरामी कहता है!’ मीणा ने कड़वे स्वर में कहा।

“पहले?” चलते-चलते दूबे ने मीणा को देखा- “मैं तो तेरे से आज ही मिला हूं।”

मीणा गहरी सांस लेकर कह उठा- “लगता है मेरी बात तेरी समझ में नहीं आयेगी। तेरे पास कार नहीं है?”

“कार? वो क्या करनी है?”

“उस पर घर जायेंगे।”

“मेरे पास कार का क्या काम? टैक्सी, ऑटो, जेब में पैसे न हों तो सरकारी बस मिल जायेगी।”

मीणा ने कुछ नहीं कहा।

“अब तो अपना नाम बता दे। पी के झूठ मत बोल।”

“इन्दर प्रकाश मीणा ही है मेरा नाम।”

‘भाड़ में जा! यारों से पर्दा रखना है तो तेरी मर्जी... ।”

“मुझे गाली मत दे।”

“क्यों, पीकर भी नहीं?”

“जिस मुँह से मैंने जी-हजूरी सुनी हो, उस मुँह से मैं अपने लिए गाली नहीं सुन सकता।”

दूबे ने हड़बड़ा कर उसे देखा, फिर कह उठा- “मैंने कब तेरी जी-हजूरी की?”

“तू मेरे तलवे चाटा करता था।”

“इन्दर प्रकाश मीणा के!”

“हाँ...।

“तो इस बात से मैंने कब इन्कार किया है? मैंने तो ये ही कहा है कि तू, वो नहीं है।”

“तेरे को इतनी बातें बताईं, पर भरोसा नहीं हुआ कि...।”

“गुरू आदमी के लिए बातें जान लेना बड़ी बात नहीं है।”

“बकवास मत कर!” मीणा तीखे स्वर में कह उठा- “चुप कर!”

“प्यार से बोल। मैंने अपने नोटों से तेरे को पिलाई है।”

“कौन सा तीर मार दिया? मेरा हाथ तेरी पीठ पर नहीं होता, तो तू इस वक्त जेल में सड़ रहा होता।”

“तू मीणा बन कर मेरे से बात क्यों कर रहा है?” दूबे ने झल्ला कर कहा।

“मैं हूँ...तभी…”

“रहने दे, बात बढ़ जायेगी। इस वक्त हम दोनों ने ही पी रखी है।” दूबे बात खत्म करने के अंदाज में कह उठा।

मीणा होंठ भींचकर उसके साथ चलता रहा।

“गुरू, मैंने पक्का सोच लिया है।” दूबे कह उठा।

“क्या?”

“मैं तेरे साथ काम करके बड़ा हाथ मारूँगा। तू मुझे पहुंची चीज लगता है। अपना कोई कारनामा तो बता।”

मीणा ने दूबे को घूरा।

दूबे दाँत दिखाने लगा।

“बता कारनामा।”

“सुबह होश में बात करेंगे। अभी तेरे को मेरा कारनामा समझ में नहीं आयेगा।” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

वे दोनों सड़क के किनारे ही आगे बढ़ रहे थे। कुछ आगे से उन्होंने सड़क पार करनी थी।

परन्तु तभी पीछे से आती एक कार अचानक ही लहरा उठी।

कंट्रोल से बाहर हुई।

वो दोनों पीछे नहीं देख सकते थे। ये ही समझा कि पीछे से कार आ रही है, आगे निकल जायेगी। जैसे कि अन्य वाहन गुजर रहे थे। लेकिन कंट्रोल से बाहर हुई कार की साईड मीणा को जोरों से लगी।

मीणा, दूबे से टकराया। दूबे नीचे जा गिरा।

मीणा उछलकर पांच-छः कदम दूर जा गिरा।

तब तक ड्राईवर ने कार संभाल ली थी और बीस कदम आगे जाकर कार रुकी।

दूबे तब तक संभल चुका था। हकबकाये से उसने कार को देखा।

स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी में, कार की नम्बर प्लेट चमक रही थी। दूबे की निगाह कार की नम्बर प्लेट पर गई और नम्बर को याद कर लिया। वो इस इन्तजार में था कि कार से कोई बाहर निकलेगा।

परन्तु अगले ही पल कार दौड़ती चली गई।

दूबे हक्का-बक्का रह गया। कार को जाते देखता रहा।

फिर उसे होश आया। वो जल्दी से उठा और मीणा की तरफ लपका।

इन्दर प्रकाश मीणा फुटपाथ पर गिरा पड़ा कराह रहा था।

“तेरा सब कुछ सलामत है या टूट-फूट हुई है?” दूबे ने बेचैनी से पूछा।

मीणा ने उठने की कोशिश की

दूबे ने उसे सहारा देकर बिठाया।

“हड्डी-वडी ठीक है?” दूबे ने पूछा।

“हाँ, पीठ पर दर्द हो रहा है। बुरी टक्कर मारी कार ने। कहाँ है कार?”

“भाग गई। कार वाला उसे भगा ले गया। लेकिन फिक्र की बात नहीं है गुरु, मैंने कार का नम्बर नोट कर लिया।”

“ये ठीक किया।” मीणा अपनी पीठ सहलाते हुए कह उठा- “मैं जानता हूँ कि ये सब कुछ जानबूझ के किया गया...।”

“जानबूझ के...किसने?”

“सावी और ए.सी.पी. कामराज मुझे खत्म करना चाहते हैं।”

मीणा गुस्से में कह उठा- “वो जानते हैं कि मीणा चुप नहीं बैठने वाला। उनकी साजिश बे-नकाब कर देगा। इसलिये वो मुझे मार देना चाहते हैं।”

‘तुम?” दूबे ने मुँह बनाया- “अपने आप को सब-इंस्पेक्टर मीणा समझ रहे हो?”

“मैं हूँ कमीने...”

“मेरे सामने तो सीधा हो जा। मुझे तो उल्लू मत बना।” दूबे ने गहरी सांस ली।

“साले, मैं सच कह रहा हूँ...?” मीणा गुर्रा उठा।

“फिर वो ही बात...।” दूबे ने कहना चाहा।

“बकवास मत कर।” मीणा ने गुस्से से उसे हाथ दिया- “उठा मुझे...”

दूबे ने उसकी बाँह खींच कर खड़ा किया उसे।

खड़ा होकर मीणा अपने हाथ-पाँव हिलाने लगा।

“सालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी मुझे मारने में। अब मैं उन्हें नहीं छोडूंगा।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा- “कार का नम्बर बता।”

“नम्बर का तू क्या करेगा?”

“सुबह मालूम करूँगा कि कार किसके नाम है। रात को कौन चला रहा था। मेरी बात का सच सामने आ जायेगा कि सावी और कामराज की ही चाल है मुझे मारने की...कि कहीं मैं उनका खेल ना खराब कर दूँ...”

दूबे के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

“नम्बर बता।”

दूबे कार का नम्बर बता कर बोला- “मैंने तो तुझे इसलिये यार बनाया कि तू मुझे पसन्द आया और पहुँचा हुआ लगा। सोचा था कि तेरे साथ कहीं हाथ मारूँगा। पर तू तो खामखाह के लफड़े में पड़ रहा है। जब तक तू खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कहना नहीं छोड़ेगा, तब तक बात नहीं बनेगी।”

इन्दर प्रकाश मीणा मुस्करा पड़ा।

“फिक्र मत कर, हम बड़ा हाथ मारेंगे।”

“पक्का?” दूबे खुश हो उठा।

“हाँ। लेकिन पहले सावी और कामराज का मामला देख लूं...।”

“ये जरूरी है?”

“बहुत जरूरी। मेरे लिए बहुत जरूरी है।” मीणा का चेहरा कठोर हो गया- “वो दोनों गुलछर्रे उड़ा रहे हैं और मुझे जीते जी मार दिया। मेरा डैथ सर्टिफिकेट तक बैंक में दे दिया। साले का मैं बैंड बजा दूंगा। तू मेरे साथ रहेगा दूबे इस काम में?”

“इस तरह के काम करने नहीं आते मुझे। वैसे भी ये मामला मेरी समझ से परे है कि तू खुद को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा कहे जा रहा है, दबाव डाल रहा है कि मैं ये बात मानूं। जबकि तू मीणा है ही नहीं। तेरा मामला, तू जान। मुझे इस मामले से दूर रख। हाँ, बड़ा हाथ मारने में मैं तेरे साथ हूँ।” दूबे ने सोच भरे स्वर में कहा।

“मुझे तेरी जरूरत नहीं है। ये मामला मैं खुद देख लूंगा। चल, तेरे घर चलते हैं। अब मैं सोना चाहता हूँ।”

☐☐☐

अगले दिन सुबह दस बजे मीणा की आँख खुली। दूबे उठ बैठा था। उसके चेहरे से स्पष्ट लग रहा था कि वो कुछ देर पहले ही नींद से उठा है।

“मैं चाय बनाता हूँ।” दूबे उठकर उस छोटे से कमरे के कोने की तरफ बढ़ा, जहाँ गैस चूल्हा रखा था और कुछ बर्तन वगैरह पड़े थे।

मीणा, दूबे को देखने लगा।

“रात तेरे को पता है ना कि हम में क्या बात हुई थी?” चाय बनाने में व्यस्त दूबे ने पूछ।

“याद है।” मीणा का हाथ कमर पर चला गया, जहाँ अभी भी दर्द था, परन्तु रात से कम था।

“तू खुद को सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा कह रहा था, जो कि पन्द्रह दिन पहले मर चुका है।”

“वो तो मैं हूँ ही...।” मीणा के होंठों से निकला।

दूबे ने उसे देखा, फिर अपने काम में व्यस्त होता कह उठा- “खामखाह की बकवास क्यों करता है? माना कि तू गुरू आदमी है, पर इतना भी गुरू नहीं कि तू रात को दिन कहे और मैं मान लूं।”

“तेरे को यकीन नहीं कि मैं ही मीणा हूँ।”

“यकीन करने का सवाल ही पैदा नहीं होता।”

मीणा ने मुँह घुमा लिया। वो समझ चुका था कि उसकी हकीकत पर कोई यकीन नहीं करेगा। एकाएक ही सब को जाने क्या हो गया है! ये सावी और कामराज की साजिश है। कामराज के हाथ यकीनन बहुत लम्बे हैं।

“जानता है, रात तेरे को मैं अपने साथ क्यों लाया?”

“क्योंकि तू मेरे साथ मिलकर, कोई बड़ा काम करना चाहता है। पैसा कमाना चाहता है।”

“हाँ...।” दूबे मुस्करा पड़ा- “तेरे को तो रात की सब बात याद है। मैंने तो सोचा पी-पा के भूल गया होगा...”

“तेरे पास सिग्रेट है?”

“उधर पड़ा है पैकिट...।”

मीणा उठा और पैकिट से सिग्रेट निकालकर सुलगाई। वापस आ बैठा, फिर कहा- “मैं उस कार का नम्बर पता करूँगा कि किसका है, जिसने रात टक्कर मारी थी।”

“रहने दे, क्यों फालतू के लफड़े में पड़ता है।”

“बहुत जरूरी है। सावी और कामराज मुझे मार देना चाहते हैं कि मैं कोई पंगा ना खड़ा कर दूँ...।”

“वो भला तेरे को क्यों मारेंगे? तेरा उनका क्या वास्ता?”

“वो जानते हैं कि मैं मीणा हूँ...।”

“बकवास! ऐसा कुछ नहीं है।”

“ऐसा ही है।” मीणा ने दृढ़ स्वर में कहा- “उन्होंने बहुत गहरी साजिश रची हुई है। मैं उन्हें कामयाब नहीं होने दूंगा।”

दूबे चाय बना लाया और उसे गिलास थमाता कह उठा- “ले...चाय पी और दिमाग ठंडा रख...”

“यहाँ नहाने-धोने के लिए पानी है?” घूँट भरते मीणा ने पूछा।

“सब इन्तजाम हो जायेगा।”

मीणा ने पुनः घूँट भरा और सोच भरे स्वर में बोला- “तू मेरे साथ नहीं चलेगा?”

“नहीं। क्योंकि तेरे मामले का मुझे सिर-पैर समझ में नहीं आ रहा।” दूबे ने मुस्करा कर कहा।

“मैं तेरे कितने काम आया... और आज तू मुझे ये जवाब दे रहा है?” मीणा ने नाराजगी से कहा।

“मैं रात से पहले तक, मेरे को जानता नहीं था। तू मेरे काम कहाँ से आ गयो? रही बात कि तू मीणा है, तो भूल जा कि मैं तेरी बातों में फंसूंगा, क्योंकि तू मीणा है ही नहीं।”

मीणा खामोश रहा। चाय के घूँट भरता रहा।

“मैं कोई मामला देखू, जहाँ हम मिलकर बड़ा हाथ मार सकें?” दूबे ने कहा।

“जो मर्जी कर, लेकिन पहले मैं अपना मामला निपटाऊँगा।”

☐☐☐

चलने से पहले मीणा ने दूबे से दो हजार रुपये भी लिए। उसके बाद मीणा शाम चार बजे तक भाग-दौड़ करता रहा, फिर कहीं जाकर उसे उस कार के नम्बर से, कार के मालिक का पता मिल सका। इसके लिए उसने हजार रुपये की रिश्वत दी थी। जिस कार ने रात उसे टक्कर मारी थी, वो किसी सुधीर दामले के नाम रजिस्टर्ड थी।

सुधीर दामले का पता उसे मिल चुका था।

मीणा ने टैक्सी पकड़ी और उस पते पर रवाना हो गया। मस्तिष्क में सोचें दौड़ रही थीं कि सुधीर दामले को डण्डा चढ़ा कर पूछेगा कि रात किसके कहने पर उसकी जान लेने की कोशिश की गई। वो जानता था कि आखिरकार इसका जवाब ये ही होगा कि ये काम उसने सावी या कामराज के कहने पर किया था। और उसे गवाह और सबूतों की जरूरत थी कि सावी और कामराज उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। कोई भी उसे पहचान नहीं रहा। टैक्सी उस इलाके में जा पहुंची, जहाँ का पता उसके पास था। मीणा ने किराया चुकता करके टैक्सी छोड़ दी और पैदल ही आगे बढ़ता उस पते को तलाशने लगा।

तभी सामने से आते एक आदमी ने उसे सलाम किया मीणा ने भी गर्दन हिला दी।

वो आदमी आगे बढ़ता चला गया।

जबकि मीणा ठिठक कर उस आदमी को देखता सोच रहा था कि लोग अब उसे पहचान रहे हैं।

जल्दी ही मीणा उस पते पर पहुँच गया। वो फ्लैट था। पहली मंजिल का फ्लैट। उसके ऊपर भी फ्लैट बने हुए थे। मीणा ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।

तभी सीढ़ियों से उसे पचास बरस का आदमी उतरता दिखा। उसे देखते ही मुस्कराया।

मीणा ठिठक सा गया।

वो पास आता खुशी से कह उठा-

“ओह दामले साहब। कैसे हैं आप? कल सुबह आप कहाँ चले गये थे? भाभी बहुत परेशान हैं आपके वापस न आने से। किसी ने खबर दी थी कि पास ही चौराहे पर कल सुबह किसी कार ने आपको बुरी टक्कर मारी थी। आप उछल कर दूर जा गिरे थे और मिनट भर बाद ही आप उठे और भागते हुए वहाँ से चले गये।”

“कल सुबह? कार ने तो मुझे रात में टक्कर मारी...।”

“रात कहाँ जनाब, कल सुबह टक्कर मारी थी। पीछे की गली वाले हैं ना सपरा साहब। उन्होंने देखा था। उसके बाद से तो हम लोग आपको शहर भर के हस्पतालों में ढूंढते फिर रहे हैं। भाभी की हालत मुझसे देखी नहीं जा रही।”

मीणा के चेहरे पर कशमकश के भाव चमक उठे थे।

“कहाँ चले गये थे आप?”

“कहीं नहीं...।” मीणा के होंठों से निकला- “मैं तो...।”

“आप ठीक-ठीक वापस आ गये...ये ही बहुत है दामले साहब। भाभी के पास जाईये। वो परेशान हो रही...।”

“मैं दामले नहीं हूँ... । मीणा हूँ।”

“मीणा?”

“हाँ। इन्दर प्रकाश मीणा। सब-इंस्पेक्टर...।”

उसने गहरी निगाहों से मीणा को देखा, फिर सिर हिलाकर कह उठा-

“लगता है एक्सीडेंट की वजह से आपके सिर पर चोट लगी है और दिमाग पर असर हुआ...।”

“मैं ठीक हूँ...। ये कैसी बातें कर रहे हैं आप...।”

“आप?” वो अजीब से स्वर में कह उठा- “दामले साहब, मैं सुरेन्द्र हूँ...”

“लेकिन मैं आपको नहीं जानता...।”

“ओह! यकीनन कल सुबह हुए एक्सीडेंट का असर आपके दिमाग पर हुआ है। आप बातें भूल रहे हैं।”

“दिमाग खराब हो गया आपका...।” झल्ला कर कहते मीणा सीढ़ियां चढ़ता चला गया।

मीणा पहली मंजिल के 40 नम्बर फ्लैट पर पहुँचा। दरवाजा खुला ही था, मीणा ने कॉलबेल बजाई।

फौरन ही पैंतालिस बरस की औरत सामने आई। उसके चेहरे पर उदासी और चिन्ता थी। उसकी आँखें बता रही थीं कि रात को वो नींद भी नहीं ले पाई। सिर के बाल कुछ बिखरे से थे।

खूबसूरत थी वो।

इन्दर प्रकाश मीणा पर नजर पड़ते ही उसका चेहरा खिल हुए उठा।

“अ...आप...।” उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो आगे बढ़ी और मीणा से जा लिपटी- “आप तो...।”

मीणा ने उसी पल उसे छिटक दिया।

औरत हड़बड़ा कर दो-तीन कदम पीछे हुई और हैरानी से उसे देखने लगी।

“क्या हुआ?” औरत के होंठों से निकला।

“शर्म नहीं आती आपको इस तरह मेरे से लिपटते मीणा ने नाराजगी से कहा।

“ये आप क्या कह रहे हैं...मैं आपकी पत्नी तारा हूँ...।”

औरत के होंठों से निकला- “कल सुबह से आप...।”

“मैडम! मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। आपका पति नहीं हूँ...।”

“ये आप कैसी बात कर रहे हैं।”

“कैसी क्या, मैं जो कह रहा हूँ, वो ही सही है। नीचे सुरेन्द्र नाम का आदमी मिला, वो मुझे दामले कह रहा...।”

“सुरेन्द्र भाई साहब? ओह, वो भी आपकी तलाश में कल से भागे फिर रहे हैं। पूरा मौहल्ला परेशान...।”

“मैडम, आप मुझे दामले क्यों बना देना चाहती हैं? जबकि मैं यहाँ सुधीर दामले को ढूंढता हुआ आया हूँ...।”

“सुधीर दामले?” तारा अचकचा उठी- “वो तो आप ही हुए?”

“मैं?” मीणा चौंका।

“हाँ, भूल गये क्या, सुधीर दामले आप ही तो हैं। मुझे कल सुबह बताया गया कि सामने चौराहे पर, आपको किसी कार ने जोरों से मारा है। आप काफी दूर जा गिरे। फिर मिनट भर में ही आप उठे और वहां से भाग गये...।”

“भाग गया?”

“हाँ। दूसरी गली में कोई आदमी है, ये सब उसने होता देखा तो हमें बताया, तब से ही मैं परेशान हूँ...कि आप कहाँ भाग गये। सब ठीक हो। चोट ज्यादा ना आई हो। दिन भर मैं आपके लौटने का इन्तजार करती रही। शाम के बाद मैं और मोहल्ले वाले आपको ढूंढने निकले। आपकी तलाश में, सारे हस्पताल छान मारे। रात भर ये ही होता रहा। पुलिस स्टेशन जाकर पूछा आपके लिये। तीन आदमी एक्सीडेंट में कल मारे गये थे, उन्हें देखा कि कहीं वो आप न हों। मैं तो कल से पागल हो गई आपकी तलाश में।” तारा सुबक उठी- “अब तो मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी कि पता नहीं आप मिल भी पायेंगे कि नहीं। भगवान ने आपको वापस भेज दिया।

लेकिन आप परायों की तरह बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। मुझे यानि अपनी पत्नी को नहीं पहचान रहे। यहाँ आकर कहते हैं कि आप सुधीर दामले को ढूंढते हुए आये हैं। घर की चौखट पर खड़े हैं और भीतर नहीं आ रहे। ये क्या हो गया है आपको...?”

मीणा के मस्तिष्क में एक ही बात आई कि ये सब सावी और कामराज की ही साजिश का हिस्सा है। वो इस औरत की बातों में नहीं फंसेगा। सतर्क रहना होगा उसे।

“तुम्हारी सब बातें बकवास हैं।”

तारा की आँखों में आंसू पुनः चमक उठे।

“ये ही दिन देखना बाकी रह गया था...। आखिर आप नाराज क्यों हैं मुझसे?”

“घर में और कौन-कौन है?”

“घर में कोई भी नहीं?”

“तुम्हारा परिवार नहीं है क्या? अकेली रहती हो?”

“पागल इन्सान!” तारा भड़क उठी- “तुम मेरे पति हो। हमारा एक बच्चा है, जो कि पूना में हॉस्टल में रहकर पढ़ता है।”

“मैं तुम्हारा पति नहीं हूँ,.. । मैं सब-इंस्पेक्टर मीणा...।”

तभी पीछे कदमों की आहट सुनाई दी।

मीणा ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा तो सुरेन्द्र को खड़े पाया।

“देखिये भाई साहब।” तारा गीली आँखों से बोली- “इन्हें क्या हो गया है... । मुझे नहीं पहचान रहे। अजनबियों की तरह बातें कर रहे हैं। मेरे परिवार के बारे में पूछ रहे हैं और कहते हैं कि यहाँ सुधीर दामले से मिलने आया हूँ...।”

“कोई बात नहीं।” सुरेन्द्र बोला- “एक्सीडेंट की वजह से पहचानने में परेशानी आ रही होगी। एक-दो दिन में दामले साहब ठीक हो जायेंगे। फिर भी कोई परेशानी रहे तो मुझे बताना, इन्हें डाक्टर साहब के पास ले चलेंगे।”

मीणा सुरेन्द्र को घूरे जा रहा था।

“जाईये दामले साहब, भीतर जाईये। आराम कीजिये। भाभी को और परेशान मत कीजिये।”

मीणा के माथे पर बल नजर आने लगे थे।

तभी तारा ने आगे बढ़कर मीणा का हाथ थामा और उसे भीतर ले गई।

मीणा ने कोई एतराज नहीं किया। वो पहले सारा मामला समझ लेना चाहता था। परन्तु ये तो उसे महसूस हो चुका था कि उसके खिलाफ बहुत ही तगड़ी साजिश रची गई है। उसका दिमाग घूम कर रह गया था। वो इन्दर प्रकाश मीणा है, परन्तु सावी और बाकी के सारे लोग उसे पहचानने को स्पष्ट तौर पर मना कर रहे हैं और जिन्हें वो जानता तक नहीं, वो लोग उसे अपना कह रहे हैं। आखिर उसके साथ ये क्या हो रहा है?

“भाई साहब!” तारा ने सुरेन्द्र से कहा- “जरूरत पड़ी तो मैं आपको बुला लूंगी...”

“ठीक है।” सुरेन्द्र ने सिर हिलाया, फिर मीणा से कहा- “सब्र से काम ले दामले साहब, आप ठीक हो जायेंगे।”

मीणा की आँखों के सामने सावी और कामराज के चेहरे नाचे। मन ही मन उसे उस साजिश की तारीफ करनी पड़ी जो कि उसके खिलाफ रची गई थी।

कमरे में आकर मीणा ने नजरें दौड़ाईं।

ये छोटा-सा और साधारण-सा ड्राइंग रूम था।

“बैठिये आप, मैं पानी लाई।” कहकर तारा भीतर के दरवाजे की तरफ बढ़ गई।

मीणा ने भरपूर नजरों से हर तरफ कमरे में देखा। दिमाग तेजी से दौड़ रहा था।

वो समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उसके साथ ये सब क्यों हो रहा है?

तारा पानी का गिलास लिए आ गई।

“अरे, आप अभी तक खड़े हैं। ये लीजिये पानी...।”

मीणा ने पानी पीकर गिलास लौटा दिया।

“बैठिये तो...।” तारा ने हाथ पकड़ कर मीणा को सोफे पर बिठाया- “पता नहीं आपको क्या हो गया है। पहले तो आप घर में घुसते ही तूफान खड़ा कर देते थे कि ये लाओ, वो लाओ...और आज इतने चुप-चुप से हैं। तबीयत तो ठीक है?”

“हाँ...” मीणा ने तारा को देखा।

तारा सामने सोफे पर बैठती कह उठी- “चाय लाऊँ?”

“नहीं...”

“आखिर आपको हो क्या गया है?” तारा ने पूछा

“मुझे कुछ नहीं हुआ। मैं पूरी तरह अपने होशोहवास में हूँ।” मीणा ने चुभते स्वर में कहा।

“तो फिर बहकी-बहकी बातें क्यों कर...।”

“तुम कौन हो?”

“फिर वो ही बात, मैं आपकी पत्नी तारा...।”

“तुम मेरी पत्नी नहीं हो, मेरी पली तो सविता है।”

“सविता?” तारा के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे- “ये सविता कौन है?”

“मेरी पत्नी। सारी जिन्दगी मैं इसी के साथ रहा हूं...।”

“सारी जिन्दगी?” तारा के चेहरे के भाव देखने वाले थे।

“हाँ...”

“सुरेन्द्र जी ठीक कह रहे थे... कि आपको डाक्टर की जरूरत है।” तारा गम्भीर स्वर में बोली- “मैं आज शाम की अप्वाइंटमें ले...”

“बकवास मत करो।” मीणा ने कठोर स्वर में कहा- “मुझे पागल घोषित करने की कोशिश मत करो। मैं तुम्हारी बातों में नहीं फंसने वाला। ये सब तुम किसके कहने पर कर रही हो? कितना पैसा दिया गया है तुम्हें, ये सब करने के लिए?”

“ये आप मुझसे कैसी बातें कर रहे हो?”

“मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश मत करो। मैं पुलिस वाला हूँ और...”

“पुलिस वाले हो?” तारा मुस्करा पड़ी- “बहुत हो गया मजाक! तुम संगमा इन्टरनेशनल में एकाऊँटेंट की नौकरी करते हो और खुद को पुलिस वाला कह रहे हो? पतिदेव! ये तो हंसने वाली बात हो गई...”

“तुम झूठ बोल रही...”

“पड़ौसियों से पूछ लो। मोहल्ले से पूछ लो। अपने आफिस फोन कर के पूछ लो। मैं समझती हूँ कि एक्सीडेंट की वजह से तुम कुछ समझ नहीं पा रहे। शायद मुझे भी पहचान नहीं...।”

“सुधीर दामले कहाँ है?”

“वो तुम हो तुम! इस वक्त मेरे सामने बैठे हो।” तारा ने खीज कर कहा।

“मैं हूँ? खूब!” मीणा के चेहरे पर कड़वी मुस्कान उभरी- “चलो, मान लिया कि मैं हूँ। मेरे पास कार है?”

“हाँ...”

मीणा कार का नम्बर बता कर बोला- “इस नम्बर वाली कार है?”

“हाँ। तुम्हारी कार है तो तुम्हें नम्बर क्यों नहीं पता होगा?” तारा मुस्कराई।

“बकवास मत करो। रात इस नम्बर वाली कार ने मझे मारने की कोशिश की। कार मेरे ऊपर चढ़ाई गई, पर कार की साईड ही मुझे लग पाई और मैं फुटपाथ पर जा गिरा। फिर कार भाग गई। मेरे साथी ने कार का नम्बर नोट कर लिया था। नम्बर के दम पर ही मैं कार के मालिक का पता लगाकर, यहाँ आया हूँ...।”

तारा के चेहरे पर अजीब से भाव आ ठहरे थे।

“कार भागी नहीं, रुकी थी।” तारा के होंठों से निकला।

“हाँ शायद, पाँच-दस सैकिण्ड के लिए रुकी थी. फिर भाग गई। तुम्हें कैसे पता ये?” मीणा के माथे पर बल पड़े।

“मैं ही तो चला रही थी तब कार को।” तारा अफसोस भरे स्वर में कह उठी।

इन्दर प्रकाश मीणा के चेहरे पर कठोरता नाच उठी।

“आप के लिये सुबह से ही परेशान हो रहे थे। शाम होने पर आपकी तलाश में हस्पतालों में जाने लगी। रात तब भी मैं एक हस्पताल से पूछताछ करके, दूसरे में जा रही थी कि परेशानी की वजह से स्टेयरिंग बहक गया। साथ में सुरेन्द्र भाई साहब और उनकी पत्नी भी थी। मैं नहीं जानती कि जिसे मेरी कार की साईड लगी, वो आप थे। मैं तो तब वहाँ रुककर देखना चाहती थी कि क्या हुआ, परन्तु सुरेन्द्र भाई साहब बोले कि हम पहले से ही परेशान

यहाँ रुके तो कोई नई मुसीबत ना खड़ी हो जाये... तो मैंने कार को आगे बढ़ा दिया।”

मीणा का चेहरा कठोर ही रहा।

“हे भगवान! रात मुझ से कैसी भूल हो गई... । मैंने आप ही को टक्कर मार...।”

“तुम्हें रुकना चाहिये था तब.....”

“हाँ, सच में। अगर मैं रुकती तो तब ही आपको पा लिया होता। लेकिन आपके साथ हुआ क्या? दिन भर और रात भर आप कहाँ रहे? कल सुबह आपको क्या सच में चौराहे पर किसी कार ने टक्कर मारी थी?”

“पता नहीं...”

“याद नहीं आपको?”

मीणा उसे घूरता रहा।

“आपके शरीर पर तो कोई चोट नजर नहीं आ रही, आप तो...”

“तुम जो भी हो, मैं तुम्हारी बातों में फंसने वाला नहीं।” मीणा एकाएक कठोर स्वर में कह उठा- “तुम जो झूठ बोल रही हो, वो एक पुलिस वाले से कह रही हो। मालूम है ना तुम्हें कि जब पुलिस का डण्डा चढ़ता है, सच बाहर आ जाता है।”

इस बार तारा ने बेहद अजीब निगाहों से मीणा को देखा। न

“किस तरह की बात कर रहे हैं आप? क्या आपको हमारा रिश्ता भी याद नहीं?”

“बकवास मत करो।” मीणा गुर्रा उठा- “तुम बहुत चालाक बनने की कोशिश कर रही हो।”

तारा के चेहरे पर गुस्सा उभरा।

“तुम पागल तो नहीं हो गये, जो ऐसी बातें कर रहे हो?” मीणा गुर्रा उठा।

“मुझे सच बताओ कि किसके कहने पर तुम ने टक्कर मारी मुझे...और अब किसके इशारे पर ड्रामा कर रही हो?”

तारा के चेहरे गुस्सा और उलझन आ गई।

“जवाब दो, वरना मैं तुम्हें गोली मारने में भी पीछे नहीं हटूंगा।” पुनः गुर्राया मीणा।

“तो तुम मुझे, यानि कि अपनी पत्नी तारा को गोली मारोगे?”

“हाँ...”

“अच्छा! कैसे मारोगे गोली?” तारा अजीब से स्वर में बोली- “उसके लिए तो हथियार चाहिये होता है।”

अगले ही पल मीणा ने रिवाल्वर निकाल ली।

रिवाल्वर देखते ही तारा की आँखें हैरानी से फैल गईं।

“ये...ये तो रिवाल्वर है! तुमने कहाँ से लिया?” तारा हड़बड़ाये स्वर में कह उठी।

“तुमने सुना नहीं कि मैं पुलिस वाला हूँ और शायद तुम जानती भी हो। ये बात तुम्हें, सावी और कामराज ने जरूर....”

“कौन सावी...कौन कामराज?” तारा परेशान हुई पड़ी थी- “तुम कैसी बातें कर रहे...।”

“बकवास बंद कर हरामजादी!” मीणा गुर्रा उठा- “बहुत सुन ली तेरी! और अब तू मेरी सुन। तू अच्छी तरह जानती है कि तेरा पति नहीं हूँ, तू मेरी पत्नी नहीं है। तेरे को सब पता है कि तू किसके कहने पर ये ड्रामा कर रही है। मैं उन लोगों का नाम तेरे मुँह से सुनना चाहता हूँ, जिन्होंने तेरे से कहा कि मेरे को कार से कुचल दो। परन्तु तू रात को सफल नहीं हो सकी और मैं कार के नम्बर के सहारे, तुझ तक पहुँच गया। मुँह खोल दे सीधे-सीधे, वरना मैं सारी की सारी गोलियाँ तेरे पर चला दूंगा।”

तारा हक्की-बक्की सी मीणा को देखे जा रही थी। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।

“सुना नहीं तूने?” मीणा रिवाल्वर वाला हाथ हिलाकर, दाँत किटकिटा उठा।

“अ...आप पागल हो गये हैं।”

मीणा उठा और तारा के पास पहुँच कर रिवाल्वर उसके सिर पर रख दी।

तारा थरथरा उठी। आँखें फट सी गई थीं।

“बता, किसके इशारे पर तूने रात मेरे को मारना चाहा और ये सब बातें किसके इशारे पर मेरे से कर रही है?”

तारा के मुँह से कोई बोल न फूटा।

“बता! नहीं तो गोली...।”

एकाएक तारा फफक कर रो पड़ी।

मीणा के दाँत भिंच गये। वो एक कदम पीछे हटा।

रोते हुए तारा का चेहरा आँसुओं से भर उठा था।

जबकि मीणा के चेहरे पर दरिन्दगी नाच रही थी।

“आप होश में क्यों नहीं आते. ।” रोते हुए तारा कह उठी- “मैं आपकी पत्नी हूँ। पहचानो मुझे...।”

तभी मीणा का हाथ घूमा और तारा के गाल पर जा पड़ा। तारा के होंठों से चीख निकली और सोफे की पुश्त सिर जा टकराया। सिर घूम गया था तारा का। दो पल लगे उसे संभलने में। परन्तु अब उसका रोना बंद हो गया था। चेहरा आँसुओं से उसका से भरा था।

“बता हरामजादी, मुँह खोल...।” मीणा पुनः दाँत किटकिटा उठा।

“आपने मुझे जिन्दगी में पहली बार थप्पड़ मारा है...।” तारा के होंठों से गम्भीर स्वर निकला।

“अभी तेरे को गोली भी मारूँगा।”

“आप अपने होश में नहीं हैं।” तारा मुकाबला करने के अन्दाज में कह उठी- “अब मुझे विश्वास हो गया है कि कल सुबह एक्सीडेंट में आपके सिर पर गहरी चोट लगी है...कि आपका दिमागी संतुलन बिगड़ गया...।”

“मुझे पागल मत बना हरामजादी!” मीणा तड़प कर आगे बढ़ा और रिवाल्वर की नाल उसकी गर्दन पर रख दी- “मैं तेरी बातों में नहीं फंसने वाला । तू मुझे बेवकूफ नहीं बना सकती।”

“तुम पागल हो चुके...”

मीणा ने रिवाल्वर की नाल गुस्से से तारा के गाल पर मारी। तारा चीख उठी।

उसने दोनों हाथों से गाल को थाम लिया। आवाक सी वो मीणा को देखने लगी थी।

“तुम पूरे पागल हो...।” दर्द से तड़पती तारा ने गुस्से में कहा।

“मुझे उसका नाम बता, जिसके इशारे पर तू काम कर रही है!” मीणा गुर्रा उठा- “मैं तेरे को इस तरह छोड़ कर जाने वाला नहीं। अगर तूने मुँह नहीं खोला तो मैं तेरे को मार कर यहाँ से जाऊँगा।”

“तुम पुलिस वाले हो?” एकाएक तारा ने तीखे स्वर में कहा।

“हाँ। सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा...।” मीणा ने शब्दों को चबाकर कहा।

“मैं पुलिस को बुलाना चाहती हूँ...।”

मीणा के दाँत भिंच गये।

“क्यों?”

“पुलिस ही इस बात का फैसला करेगी कि तुम मेरे पति हो या पुलिस वाले हो।” तारा ने गुस्से से कहा।

मीणा के होंठों से गुर्राहट निकली।

तारा उठ खड़ी हुई और बोली-

“मैं पुलिस को बुलाने जा...।”

मीणा ने उसे धक्का दिया तो वो वापस सोफे पर जा गिरी।

“तुम सिर्फ मेरी बात का जवाब दोगी कि किसके कहने पर तुम...”

“पुलिस को बुलाने में तुम्हें क्या तकलीफ है?” तारा ने जले-भुने स्वर में कहा।

“मैं पुलिस वाला जरूर हूँ, पर ये मेरा व्यक्तिगत मामला है। मैं जो पूछ रहा हूँ, उसका जवाब दो।”

तारा ने आहत भाव से, मीणा को देखा।

“बता...बता... “ मीणा ने उसे देखते हुए रिवाल्वर वाला हाथ हिलाया।

“तुम्हारे सिर में चोट लगने की वजह से तुम अंट-शंट हरकतें कर रहे...।”

“बकवास बंद कर कुतिया...।” मीणा पाँव पटकने वाले अन्दाज में कह उठा।

“तुमने कभी मुझे गाली नहीं निकाली... । कभी मुझे मारा नहीं...और आज सारी कसर पूरी कर...।”

मीणा ने रिवाल्वर वाला हाथ उसके चेहरे पर कर दिया।

“मारूँ गोली या बताती है?”

तारा, मीणा को देखने लगी, फिर उसका रिवाल्वर वाला हाथ पीछे करके उठ खड़ी हुई।

“बैठ जाओ।” मीणा ने खतरनाक स्वर में कहा।

“तुम्हारी ही बातों का जवाब देने के लिये उठी हूँ...।” तारा की आँखें गीली थीं।

“ठीक है, बोल...।”

तारा दूसरे कमरे की तरफ बढ़ गई।

मीणा ने उसकी पीठ को घूरा, फिर उसके पीछे चल पड़ा।

वे दूसरे कमरे में पहुंचे, जो कि बैडरूम था।

वहाँ बैड के साथ फ्रेम की तस्वीर को उठा कर मीणा की तरफ पलट कर बोली- “ये देखो...”

मीणा ने तस्वीर देखी।

तस्वीर में तारा और वो खुद था।

“क्या है ये?”

“मैं तुम्हें याद कराने की चेष्टा कर रही हूँ... कि तुम मेरे पति हो।” तारा भीगे स्वर में कह उठी।

“बकवास मत करो। ऐसी नकली तस्वीरें आजकल बाजार से दस मिनट में बनाई जा सकती हैं। ये सब चाल है मेरे खिलाफ। सब तैयारी पहले ही कर रखी है। किसने करके दी तैयारी?”

“मैं तुम्हें, हमारी शादी की एलबम दिखा सकती हूँ।” तारा ने दुःखी स्वर में कहा।

“खूब! तो एलबम तक तैयार करवा रखी है। मैं जानता हूँ कि पक्की साजिश रची गई है मेरे खिलाफ, लेकिन कान खोलकर सुन लो-मैं सारी साजिश को बेनकाब करके रहूँगा। तुम मुझे उलझाने की चेष्टा मत करो और सीधे-सीधे बताओ कि तुम्हारे पीछे कौन लोग हैं?”

“प्लीज सुधीर। तुम मेरे साथ डाक्टर के पास चलो। वो तुम्हें ठीक कर देगा। तुम फिर से...।”

मीणा ने दाँत भींचकर हाथ बढ़ाया और तारा का गला पकड़ कर रिवाल्वर की नाल उसके माथे पर लगा दी। मीणा के चेहरे पर इस वक्त दरिन्दगी नाच रही थी।

“बता...सब कुछ बता। मेरे सब्र का इम्तिहान मत लो...।”

तारा ने गुस्से से अपना गला छुड़ाया और चीखकर कह उठी- “चला गोली... चला मुझ पर। मार दे। ये ही कसर बची है, पूरे कर ले वो भी...।” साथ ही रो पड़ी।

दो पलों के लिये मीणा हक्का-बक्का रह गया।

“मार...।” तारा चीखी- “मारता क्यों नहीं? चला दे गोली।”

मीणा के चेहरे पर पागलपन नाच उठा।

तभी ड्राईंग रूम की तरफ आहटें उभरी और एक आदमी की आवाज आई-

“दामले साहब...कहाँ हो?”

मीणा ने चौंक कर तारा को देखा।

तारा अपने आंसू साफ करते कह उठी-

“मेहता साहब आये हैं। सुरेन्द्र भाई साहब ने आपके आने के बारे में बताया होगा। भगवान के लिए कोई तमाशा खड़ा मत करना। सब तुम्हारी इज्जत करते हैं। तुम्हें अच्छा आदमी मानते हैं...और तुम हो भी। उन्हें पता ना चले कि तुम्हारे पास रिवाल्वर है। इसे जेब में रख लो। बेचारे मेहता साहब भी दो लोगों के साथ रात भर तुम्हें तलाश करते रहे। सब आपको चाहते हैं, उनके साथ ठीक तरह पेश आना।”

मीणा कठोर निगाहों से तारा को देखता रहा।

“अब चली भी...।” तारा पुनः कह उठी।

“दामले साहब, घर में हो क्या?” मर्द की आवाज पुनः आई।

“आये भाई साहब...।” तारा ने कहा।

मीणा पूरे जा रहा था तारा को।

“क्या हुआ?” तारा ने प्यार से पूछा।

“तुम लोगों ने मेरा दिमाग खराब करने के लिए पूरा जाल बिछा रखा है। सारे इन्तजाम कर रखे हैं। बहुत सोच-समझ कर साजिश रची गई है... । लेकिन मैं तुम लोगों की चाल पूरी नहीं होने दूंगा। तुम लोगों का भांडा फोड़ के ही रहूँगा। मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ, अभी तुम मुझे ठीक से जानतीं नहीं...।”

मीणा को देखते तारा की आँखें डबडबा उठीं।

“चलो, मेहता साहब से मिल लो।” तारा ने आँखें साफ करते हुए कहा- “ये रिवाल्वर जेब में रख लो। मुझे समझ नहीं आता कि 36 घंटे तुम गायब रहे...और क्या से क्या होकर, वापस लौटे हो।”

“तुझे देख लूंगा हरामजादी!” रिवाल्वर जेब में रखता मीणा बोला- “तुम लोग कितने हो?”

“क्या मतलब?”

“इस साजिश में कितने लोग हैं, जैसे कि सुरेन्द्र, अब मेहता, इनके अलावा और भी हैं क्या?”

“ये हमारे पड़ौसी हैं सुधीर...।”

“चुप कर! दाँत तोड़ दूंगा...।” मीणा ने कहा और पलट कर कमरे से बाहर चल पड़ा।

तारा उसके पीछे हो गई।

दोनों ड्राईंग रूम में पहुंचे।

पचपन बरस थी मेहता की उम्र। पचास की उनकी पत्नी राधिका थी।

“आह...।” मेहता, मीणा को देखते ही कह उठा।

“तुम तो भले-चंगे हो दामले।” पास पहुँच कर खुशी से मीणा का हाथ थाम लिया- “हमने तो सुना था कि सामने चौराहे पर तुम्हें कार ने बुरी तरह टक्कर मारी थी...”

उसकी पत्नी राधिका कह उठी- “आपको घर पर देखकर हमें बहुत खुशी हुई। सुरेन्द्र भाई साहब ने बताया तो हमसे रहा नहीं गया...फौरन आ गये। अब तो तू खुश है ना तारा! कल से तेरी परेशानी देखी नहीं जा रही थी।”

तारा की आँखों में आंसू चमक उठे। उसने मीणा को देखा।

इन्दर प्रकाश मीणा की निगाह मेहता और राधिका पर थी।

मेहता ने अभी तक, मीणा का हाथ थाम रखा था।

“तेरी तबीयत तो ठीक है ना दामले?” मेहता ने पूछा।

मीणा के हाथ छुड़ाया और कह उठा- “मेरा नाम क्या है?”

“क्या?” मेहता हैरान हुआ- “क्या पूछा तूने दामले?”

“मेरा नाम क्या है?”

“सुधीर। सुधीर दामले...।” मेहता अभी हैरानी में था।

राधिका के चेहरे पर उलझन दिखने लगी थी।

तारा बेचैन दिखने लगी।

“तुम कब से यहां इन फ्लैटों में रह रहे हो?”

“बीस बरस हो गये। पर तू...।”

“मैं कब से यहाँ रह रहा हूँ?” मीणा का स्वर सख्त हुआ।

“तेरे को बीस बरस हो गये। हम दोनों एक ही महीने में, बीस साल पहले आयें थे।” मेहता बोला।

मीणा, मेहता को देखता रहा।

“दामले, क्या बात है? तू ऐसी बातें क्यों पूछ रहा...।”

“भाई साहब।” तारा बोल पड़ी, “ये जब से आये हैं, ऐसी ही बातें कर रहे हैं। ये खुद को सुधीर दामले नहीं मान रहे। अपने को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहे हैं। मुझे भी नहीं पहचान रहे...।”

“कल सुबह जो कार ने टक्कर मारी, उससे लगता है इनके सिर के भीतर कहीं चोट आई है। उसी की वजह से सब कुछ भूले जा रहे हैं...।” राधिका ने उसी पल कहा- “इन्हें तो डाक्टर को दिखाना चाहिये।

मीणा के चेहरे पर कड़वे भाव उभरे।

“तू घबरा मत दामले, मैं एक समझदार डाक्टर को जानता...”

“कामराज का क्या हाल है?” मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

“कामराज...ये कौन है?”

मीणा के चेहरे पर विषैली मुस्कान नाच उठी।

“सविता के बारे में भी ये ही कहोगे कि, कौन सविता?”

“कौन सविता?” मेहता के होंठों से निकला।

मीणा, मेहता को घूरने लगा।

मेहता भारी उलझन में था।

“सविता को अपनी पत्नी मान रहे हैं। कहते हैं इनकी पत्नी सावी है, मैं नहीं...।” तारा ने कहा।

“सावी?” राधिका कह उठी- “ये कौन है?”

“मेरी पत्नी। जिसके साथ मैं अट्ठाइस साल से रह रहा हूँ।”

मीणा ने तीखे स्वर में कहा।

“ये क्या मजाक है? बीस साल से तो अपनी पत्नी के साथ रह रहे हो। हम गवाह हैं।” मेहता बोला।

“गवाह?” मीणा कटु स्वर में कह उठा- “चोर-चोर मौसेरे भाई...”

“क्या?” मेहता की आँखें सिकुड़ीं- “किसे चोर कह रहे हो?”

“तुम्हें...।”

“और मेरा मौसेरा भाई कौन है।”

“कामराज।”

“फिर कामराज!” मेहता ने गहरी सांस ली और तारा से कहा- “दामले के दिमाग में कुछ फर्क आ गया है। राधिका ठीक कहती है कि कल सुबह कार ने जो टक्कर मारी थी, उससे सिर के भीतर कहीं चोट लगी और...।”

“बकवास मत करो।” मीणा कठोर स्वर में कह उठा- “मुझे पागल बनाने की कोशिश मत करो। तुम सब की बातों में नहीं आने वाला मैं। यहाँ जो भी हो रहा है, सावी और कामराज के इशारे पर हो रहा है। लेकिन कोई फायदा नहीं, मैं तुम सब की बातों में आने वाला नहीं। बताओ, तुम किसके इशारे पर मुझे सुधीर दामले कह रहे हो?”

मेहता ने तारा को देखा।

तारा गीली आँखें लिए, कभी मीणा को देखती तो कभी मेहता को।

यही हाल राधिका का था।

अजीब सा महौल वहाँ बन गया था।

“खुद को संभालो दामले। तुम मीणा नहीं हो। हम तुम्हारी हालत को समझ रहे...।”

“मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूं।” मीणा ने तीखे स्वर में कहा- “मुझसे पंगा मत लो।”

“ठीक है, नहीं लेता पंगा।” मेहता कह उठा- “मैं मान लेता हूं दामले कि तू मीणा है।”

“ये ही सच है। तुम लोग किसके इशारे पर मुझे सुधीर दामले कह रहे हो?”

“किसी के नहीं। हमें लगा कि तुम सुधीर दामले हो तो कह दिया। फिर मेहता तारा से कह उठा- “इसे किसी अच्छे डाक्टर की जरूरत है। अच्छा होगा कि शाम को ही...।”

मीणा के होंठों से गुर्राहट निकली और जेब से रिवाल्वर निकाल कर मेहता की तरफ कर दी।

रिवाल्वर देखकर मेहता की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

तारा घबरा उठी।

राधिका की आँखें फैल गईं।

“ये आप क्या कर...।”

“वहीं खड़ी रह हरामजादी!” मीणा वहशी स्वर में गुर्रा उठा।

तारा का चेहरा फक्क पड़ गया।

मीणा, मेहता की आँखों में देखता मौत भरे स्वर में बोला- “बोल, कुत्ते की औलाद, तू...।”

“तुम मेरे पति को गाली दे रहे हो-।” एकाएक रिवाल्वर भूल कर राधिका गुस्से से कह उठी।

“गोली मारूँ?” मीणा ने खतरनाक स्वर में कहा।

“तू चुप रह राधिका...।” मेहता गम्भीर स्वर में कह उठा।

राधिका ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी और चुप हो गई।

मीणा के चेहरे पर इस वक्त सच्ची दरिन्दगी नाच रही थी।

मीणा और मेहता की आँखें मिलीं।

“तू किसके इशारे पर ये सब नाटक कर रहा है?” मीणा गुर्राया।

“कैसा नाटक?” मेहता के होंठों से निकला।

“मुझे सुधीर दामले बनाने के लिये तुझे किसने कहा?”

“तुझे याद नहीं आ रहा, पर तू सुधीर दामले ही है।” मेहता बाला।

‘चटाक!’

मीणा का हाथ घूमा और मेहता के गाल पर जा पड़ा।

मेहता के होंठों से चीख निकली और लड़खड़ा कर नीचे जा गिरा।

“क्यों मार रहे हो मेरे पति को।” राधिका चीख कर मेहता की तरफ दौड़ी और उसे संभाला- “हमने गलती की यहां पर आकर... । हम तो पड़ोसी के नाते यहाँ...।”

“चुप कर राधिका। दामले अपने होश में होता तो मेरे से ऊँची आवाज में बात भी नहीं करता। ये अपनी याददाश्त खो चुका है। किसी को नहीं पहचान रहा... और खुद को सब-इंस्पेक्टर मीणा कह रहा...।”

“उल्लू के पट्टे!” मीणा गला फाड़ कर चीखा- “मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा ही हूँ...।”

मेहता गम्भीर निगाहों से उसे देखता उठ खड़ा हुआ।

राधिका, मीणा को देखते तीखे स्वर में कह उठा- “ये रिवाल्वर नकली है। खिलौना ले आया है कहीं से और...।”

मीणा ने उसी पल रिवाल्वर की नाल फर्श की तरफ की और ट्रेगर दबा दिया।

‘धाय!’

तेज आवाज उभरी और गोली फर्श को उधेड़ती, एक तरफ छिटक गई।

राधिका के होंठों से चीख निकल गई।

मेहता भी सहम सा गया।

तभी तारा पास आयी और तेज स्वर में कह उठी- “ये आप क्या कर रहे...।”

“जुबान बंद रख और वहीं रुक जा।” मीणा दाँत भींच कर बोला।

तारा ठिठक गई, परन्तु बोली- “होश में आईये, आप कैसी हरकतें कर रहे ...।”

“चुप कर जा हरामजादी! वरना गोली मार दूंगा।”

तारा से ना उगलते बन रहा था ना निगलते। परेशानी उसके चेहरे पर नाच रही थी।

“मैं तुम सब को मार दूंगा।” मीणा गुर्राया- “वरना बता दो, तुम लोगों के पीछे कौन है?”

“दामले!” मेहता गम्भीर स्वर में बोला- “सब्र रख। तेरे को सब पता चल जायेगा। पहले डाक्टर के पास...।”

मीणा, मेहता पर झपटा और जोर का चाँटा उसके गाल पर दे मारा।

मेहता का सिर झनझना उठा।

“मार दिया मेरे पति को...।” राधिका तड़प कर कह उठी- “इससे तो अच्छा था कि तुम वापस ही न आते...।”

तारा हक्की-बक्की खड़ी थी।

मेहता ने खुद को संभाला।

मीणा दरिन्दगी भरी नजरों से तीनों को देखता कह उठा- “मुझे मजबूर मत करो कि मैं तुम लोगों को शूट कर दूं....। जो मैं पूछ रहा हूं, सीधी तरह जवाब दे दो कि...।”

तभी बाहरी दरवाजे पर सुरेन्द्र दिखा। वो भीतर आता कह उठा- “मैंने पटाखा चलने की आवाज सुनी, ओह, मेहता तुम भी यहाँ हो...मैं तो...।”

“आईये सुरेन्द्र भाई साहब... ।” राधिका व्यंग्य भरे कड़वे स्वर में कह उठी- “बस आपकी कमी थी। मजा ले लीजिये...।”

“क्या मतलब?” सुरेन्द्र ने कहा। तभी उसकी निगाह मीणा के हाथ में दबे रिवाल्वर पर पड़ी तो उसके होंठों से निकला- “दामले, ये तुमने क्या पकड़ रखा है? रिवाल्वर है ये तो! तो क्या अभी मैंने गोली चलने की आवाज सुनी थी?”

“ठीक समझे...।” मीणा शब्दों को चबाकर सुरेन्द्र को घूरता कह उठा- “तुम किसके लिये काम करते हो?”

“काम...मैं?” सुरेन्द्र ने अजीब सी निगाहों से मीणा को देखा- “अरे दामले, मैं तो सरकारी नौकर हूँ। बैंक में काम करता हूँ, भूल गये, साल पहले तुम्हारे बेटे ने पूना पढ़ने जाना था तो ऐजूकेशन लोन मैंने ही बैंक से पास कराकर दिया था?”

“बहुत घिसे हुए लोग हो तुम सब। पढ़ाने वाले ने तुम लोगों को अच्छा सबक पढ़ाया है।”

“मैं समझा नहीं, तुम क्या कह रहे हो?”

“तुम लोगों को किसने कहा कि मुझे दामले कहो?’ गुर्रा उठा मीणा।

“किसने कहा?” सुरेन्द्र के माथे पर बल पड़े- “हमें कौन कहेगा भला? तुम दामले हो तो, तुम्हें दामले ही कहेंगे ना...”

मीणा ने दाँत किटकिटाकर, तारा से कहा-

“किसके इशारे पर तुमने रात मुझे कार से कुचल कर मारने की कोशिश की?”

“ये आप क्या कह रहे हैं? मैं ऐसा क्यों करूँगी? आप मेरे पति हैं। आपके बिना मेरी जिन्दगी ही नहीं है। वो तो मैंने आपको पहले भी बता दिया था कि रात मैं परेशान और थकी हुई थी, कार बहक गई और सड़क के किनारे जाते आदमी से कार की साईड लग गई। मुझे क्या मालूम कि वो आप थे। ये तो अब आपने बताया। सुरेन्द्र भाई साहब और उनकी पत्नी भी तब साथ में...।”

“हाँ...हाँ, मेरे सामने ही ये हुआ था...।” सुरेन्द्र कह उठा- “तब हम तुम्हें ढूंढते हुए ही परेशान हो रहे थे। पता नहीं तुम्हें क्यों वहम हो रहा है कि हम सब किसी के कहने पर ये सब कर रहे...।”

“भाई साहब!” तारा की आँखें भर आई- “ये तो मुझे भी नहीं पहचान रहे।”

“याददाश्त भूल गया है दामले...।” मेहता ने कहा।

“मैं इनके साथ कितनी खुश रही जिन्दगी भर। परन्तु आज तो ये मेरी पिटाई कर रहे हैं। गालियाँ दे रहे हैं। मेहता भाई साहब को भी इन्होंने चांटे मारे। ये किसी की परवाह नहीं कर रहे...।”

“मैंने दामले की बात का, हाथ उठाने का बुरा नहीं माना।” मेहता ने गम्भीर स्वर में कहा- “क्योंकि मुझे पता है कि दामले मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता। कल सुबह इसे कार ने टक्कर मारी, तो मुझे पूरा यकीन है कि इसके सिर के भीतर कहीं चोट लगी है और ये याददाश्त भूल गया। तभी तो...।”

“चुप हो जाओ हरामजादो!” मीणा रिवाल्वर वाला हाथ लहरा कर चीख उठा- “मैं तुम लोगों की बातों में फंसने वाला नहीं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं सब-इंस्पेक्टर इन्दर प्रकाश मीणा हूँ और सविता नाम की औरत मेरी पत्नी है। मेरा घर कहाँ है, वो भी मैं जानता हूँ। एक-एक बात याद है मुझे... मैं...।”

“सविता तुम्हारी पली है?” सुरेन्द्र ने अजीब से स्वर में कहा।

“हाँ, सविता ही...”

“और तुम्हें ये भी पता है कि वो कहाँ रहती है।”

“मुझे मेरा घर क्यों ना पता होगा?” मीणा भड़क उठा।

“गुस्सा मत करो। मैं तुमसे बात कर रहा हूँ...।” सुरेन्द्र बोला- “तो तुम अपने घर क्यों नहीं गये?”

“गया था।” मीणा एकाएक बेचैन हो उठा।

“तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें पहचान लिया?”

“हरामजादे!’’ मीणा सुरेन्द्र को देखता गुस्से से बोला- “तुम लोग अच्छी तरह जानते हो कि सावी ने मुझे नहीं पहचाना। तब मैंने सावी को कामराज की बाँहों में देखा था। ये सारी साजिश ही उन दोनों की रची हुई है...और तुम लोग जो भी कर रहे हो, वो सब सावी और कामराज के इशारे पर हो रहा है। पर मैं तुम्हारे मुँह से उनका नाम सुनना चाहता हूँ। कह दो कि उन दोनों के इशारे पर ही तुम लोग मुझे दामले साबित कर रहे हो। ये सब करने के लिए तगड़ा पैसा दिया होगा उन्होंने...।”

सुरेन्द्र ने मेहता को देखा।

मेहता ने तारा को देखा।

राधिका, सुरेन्द्र को देख रही थी।

खामोशी सी आ ठहरी थी वहाँ।

हाथ में रिवाल्वर थामे मीणा तड़फड़ा रहा था।

“दामले...।” सुरेन्द्र व्याकुल स्वर में कह उठा- “सब ठीक हो जायेगा। मैं तेरे को डाक्टर के पास ले चलता हूँ... । वो ठीक कर...”

“हरामजादे कहीं के!” मीणा ने गुस्से से कहा और आगे बढ़कर सुरेन्द्र की छाती पर रिवाल्वर की नाल लगा दी।

सुरेन्द्र की टांगें काँप उठीं। वो बोला- “गोली मत मार देना दामले...।”

“जब तक तुम लोग सच नहीं बोलोगे, तब तक मैं तुम लोगों को छोडूंगा नहीं। कहो कि सावी और कामराज के कहने पर...।”

तभी तारा पास आई और मीणा की बाँह पकड़ कर दुःखी स्वर में कह उठी-

“होश में आईये। आप तो पागलों से भी बुरी हरकतें कर रहे हैं...। डाक्टर के पास क्यों नहीं चलते?”

मीणा ने सुरेन्द्र की छाती से रिवाल्वर हटाई और तारा की तरफ पलट कर बोला-

“क्या नाम है तुम्हारा?”

“तारा।” उसके होंठों से निकला।

“अगर तुम्हें कोई कहे कि तुम सुनीता हो, तो क्या तुम मान लोगी?” कड़वे स्वर में कहा मीणा ने।

“नहीं।”

“इसी तरह मैं भी नहीं मान सकता कि मैं दामले हूँ। मैं इन्दर प्रकाश मीणा हूँ। मैं दामले नहीं हूँ, ये कहने पर तुम लोग मुझे पागल साबित करके डाक्टर के पास ले जाना चाहते हो? दिल तो चाहता है कि सबको शूट कर दूं।” मीणा एक-एक शब्द चबाकर कह रहा था- “सावी और कामराज ने मुझे पागल बनाने का पूरा इंतजाम कर रखा है। लेकिन मैं भी मीणा हूँ मीणा! मैं अपने होश नहीं खोने वाला। सावी और कामराज से कह देना कि मैं उन्हें छोडूंगा नहीं। उनकी साजिश का भंडाफोड़ करके ही रहूँगा। कामराज को तो मैं अच्छा सबक सिखाऊँगा।” कहने के साथ ही मीणा ने रिवाल्वर

जेब में रखी और पांव पटकने के से अन्दाज में बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ता चला गया।

“आप कहाँ जा रहे हैं...।” तारा चीखी, “रुकिये तो...भाई साहब इन्हें रोकिये...”

“उसके पास रिवाल्वर है। वो पागल हुआ पड़ा है। मुझे गोली भी मार सकता है।”

☐☐☐

इन्दर प्रकाश मीणा ने पब्लिक बूथ से सावी के मोबाईल पर फोन किया।

मीणा सिर से पाँव तक गुस्से में भरा हुआ था। वो महसूस कर चुका था कि सावी और कामराज ने उसके खिलाफ बहुत भंयकर साजिश रची उसी साजिश का ही नतीजा है कि उसे लाख कोशिशों के बाद भी कामयाबी नहीं मिल पा रही है कि अपने वजूद को साबित कर सके। सावी तो उसके साथ इस तरह अजनबी बन चुकी है कि उसे पहचानने को भी तैयार नहीं...और जिन लोगों को वो जानता तक नहीं, वो उसे अपना कह रहे हैं।

जबर्दस्त खेल, खेला जा रहा है उसके साथ। मीणा के तौर पर कोई भी उसे नहीं पहचान रहा।

हर कोई ये ही कहता है कि वो पन्द्रह दिन पहले हादसे में अपनी जान गवां बैठा है।

जबकि वो जिन्दा है।

लेकिन मीणा भी जिद्दी था। अपने जिन्दा होने को, साबित करके दिखायेगा।

सावी और कामराज की साजिश के पुर्जे को तार-तार कर देगा।

रात उसे कार से कुचलने की चेष्टा की जाती है और जब कार के नम्बर के सहारे पते पर पहुँचता है तो पता चलता है कि कार उसी के नाम रजिस्टर्ड है। उस पते पर मौजूद औरत उसे अपनी पत्नी कहती है। कुछ लोग उसके पड़ौसी होने का दावा करते हैं। यहाँ तक कि उसे नाम भी दे दिया गया, सुधीर दामले!

लेकिन वो जानता था कि वो सुधीर दामले नहीं, इन्दर प्रकाश मीणा है। पुलिस वाला है।

मीणा बूथ में रिसीवर कान से लगाए रहा। दूसरी तरफ बेल जा रही थी।

“हैलो...।” फिर सावी की आवाज कानों में पड़ी।

“सविता...मैं हूं इन्दर...।”

“तुम?” सविता की आवाज तीखी हो गई- “तुम्हें अभी तक पुलिस ने पकड़ा नहीं?”

“मुझे क्यों पकड़ेगी?”

“मैंने तुम्हारी रिपोर्ट कर दी है पुलिस में... । अब तुम नहीं बचोगे।”

“सावी...सावी, ये तुम्हें क्या हो गया है?”

“पागल इन्सान!” सावी का गुस्से से भरा स्वर कानों में पड़ा- “सावी कहकर मुझे सिर्फ मेरा पति इन्दर ही बुलाता था। तुम...”

“मैं इन्दर ही तो हूँ... तुम्हारा पति...।”

“अपनी गंदी जुबान बंद रखो।” सविता का खा जाने वाला स्वर कानों में पड़ा- “इन्दर को मरे पन्द्रह दिन हो गये हैं। उसका क्रियाकर्म सब कुछ मेरी आँखों के सामने हुआ। वो मर गया...।”

“वो कोई और होगा। मैं जिन्दा हूँ सावी...।”

“तुम कोई पागल हो। बहुत बड़े पागल.....।” सविता ने पूर्ववत स्वर में कहा।

“मैं पागल नहीं, इन्दर । इन्दर प्रकाश मीणा...।”

“तुमने कल बताया कि तुम बैंक गये थे, जहाँ इन्दर का बैंक एकाऊँट है।”

“हाँ, मैं गया था, पर वहाँ...।”

“तुम्हारी बात की सच्चाई जानने के लिए मैंने बैंक फोन किया था। तुम तो हू-ब-हू इन्दर के साईन कर लेते हो।”

“क्या मतलब?” मीणा के होठों से निकला।

“बैंक वालों ने बताया कि तुमने इन्दर के एकाऊँट से दस हजार निकालने के लिए, विड्राल फार्म भरा। वहाँ पर इन्दर के साईन किए, जो कि ठीक वैसे ही थे जैसे इन्दर करता था। बैंक वालों का कहना है कि वो साईन असली जैसे ही हैं।”

मीणा ने गहरी सांस ली, फिर कहा- “असली जैसे नहीं, वो असली साईन ही हैं। मैं मीणा हूँ सावी...”

“तगड़ी प्रैक्टिस की है इन्दर के हस्ताक्षर की...”

“तुम यकीन क्यों नहीं करतीं कि मैं ही मीणा...।”

“पुलिस को यकीन दिलाना। वो तुम्हें तलाश कर रही है।” उधर से सविता ने कहा और फोन बंद कर दिया।

मीणा रिसीवर थामें ठगा सा खड़ा रह गया।

सावी मानने को तैयार नहीं कि वो जिन्दा है। कोई भी नहीं मान रहा।

दूबे तक नहीं मानता।

कुछ तो बात है!

परन्तु वो तो मीणा है। वो खुद ये बात अच्छी तरह जानता है। इसके लिए उसे गवाही की जरूरत नहीं।

सावी ने उसके बारे में पुलिस को खबर कर दी है। वो खुद पुलिस वाला है, परन्तु पुलिस के पचड़े में नहीं पड़ना चाहता। क्योंकि पुलिस तक उसे मरा हुआ मान रही है। अब पुलिस के हाथ लग गया तो वे उसे जेल में ढूंस देंगे।

कोई उसकी बात की परवाह नहीं कर रहा।

सब उसकी बात को हल्के से ले रहे हैं।

उसे कुछ ऐसा करना होगा कि सब उसकी बात सुनने को मजबूर हो जायें। जो वो कहता है, उसे सुनें और गम्भीरता से लें। कुछ करना होगा उसे। अब ये विचार इन्दर प्रकाश मीणा ने दृढ़ता से अपने मन में बसा लिया था कि अपनी बात सुनाने के लिए उसे कोई खास ही रास्ता तैयार करना होगा।

फोन बूथ से बाहर निकल कर मीणा ने फोन के पैसे दिए और आगे बढ़ गया। भूख महसूस कर रहा था। उसे ध्यान आया कि इस इलाके में एक जगह बढ़िया खाना मिलता है। जब भी वो लंच के वक्त इस जगह के पास होता था तो यहीं पर लंच लेता था। वो काफी मशहूर रेस्टोरेंट था।

इन्दर प्रकाश मीणा उसी तरफ चल पड़ा।

दस मिनट पैदल का रास्ता था। इस तरह उसे पैदल चलना तकलीफ दे रहा था। वर्दी पहन कर मोटर साईकिल पर चलने की उसे आदत थी। कुछ चलने के बाद पसीना आया तो रूमाल से चेहरे का पसीना पौंछा। दस-बारह मिनट में वो उस शानदार रेस्टोरेंट में जा पहुँचा। पार्किंग में कारें खड़ी थीं।

मीणा रेस्टोरेंट के भीतर प्रवेश कर गया।

वैसी ही चहल-पहल थी, जैसी कि हमेशा होती थी। वी एक खाली टेबल की तरफ बढ़ गया।

अगले ही पल वो ठिठका।

ए.सी.पी. कामराज को आते देख लिया था उसने। एक टेबल पर वो तीन पुलिस वालों के साथ बैठा था। कामराज के शरीर पर सादे कपड़े थे और बाकी के तीनों पुलिस वाले वर्दी में थे। कामराज उनसे बातें कर रहा था।

मीणा फौरन एक ऐसी सीट पर बैठ गया, जहाँ से वो कामराज को देख सके, परन्तु कामराज उसे ना देख सके।

कामराज यहाँ क्या कर रहा है?

मीणा के मस्तिष्क में उथल-पुथल मच गई थी।

मीणा ने मन ही मन फैसला किया कि वो कामराज पर नज़र रखेगा। शायद कोई काम की बात पता चले।

तभी वेटर आया तो मीणा ने उसे खाने का आर्डर दे दिया। रह-रह कर मीणा का खून खौल रहा था कामराज को देखकर।

कामराज ने सावी पर जाने कैसा जादू कर दिया था कि वो उसे पहचानने से भी मना कर रही है। कामराज और सावी का चक्कर जाने कब से चल रहा है...और उसे इस बात की हवा तक ना लगी।

साले, तेरे को छोडूंगा नहीं...। मन ही मन कह उठा मीणा। कुछ ही देर में वेटर उसका खाना ले आया।

मीणा ने खाना शुरू कर दिया। नज़रें कामराज पर ही थीं, जो कि पुलिस वालों से बातें कर रहा था। वो खाना नहीं खा रहे थे। टेबल पर पानी के गिलास रखे थे और बातें कर रहे थे। फिर उसने कामराज को कलाई घड़ी पर नज़र मारते देखा। कहीं जाना होगा इसे, तभी टाईम देख रहा है!

दो-तीन मिनट बाद वो तीनों पुलिस वाले उठ खड़े हुए। उन्होंने कामराज से विदा ली और बाहर की तरफ बढ़ गये।

मीणा सब देख रहा था। साथ ही खाना खा रहा था।

कामराज अब टेबल पर अकेला बैठा था।

मीणा समझ नहीं पाया कि कामराज अब यहाँ क्यों बैठा है?

क्या किसी का इन्तजार कर रहा है?

मीणा धीरे-धीरे खाना खाता रहा। खून उबल रहा था उसका कामराज को देखकर।

दस मिनट बीते। मीणा का खाना समाप्त होने को था। तभी मीणा ने कामराज को मुस्कराते और उठते देखा। वो एक तरफ देख रहा था।

मीणा की निगाह तुरन्त उस तरफ घूमी।

‘धक’ से बज उठा मीणा का दिल।

वो सावी थी। सजी-संवरी, खूबसूरत लग रही थी। मीणा ने महसूस किया कि रेस्टोरेंट के और लोग भी सावी को देख रहे हैं। जल उठा मीणा। वो उसकी बीवी है और उसे नहीं पहचानती! कामराज के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही है! टेबल के पास पहुँचकर सावी को दिलकश मुस्कान उछालते देखा, कामराज की तरफ।

कामराज भी इस वक्त पक्का आशिक लग रहा था।

सब देखकर मीणा सिर से पाँव तक सुलग उठा था।

“कमीने...।” बड़बड़ा उठा मीणा- “ये सब ज्यादा देर नहीं चलने दूंगा। ऐसी-तैसी फेर दूंगा तुम दोनों की।” परन्तु इस वक्त मीणा मजबूर था। खामोशी से, छिपा सा बैठा रहा। अगर कामराज या सावी ने उसे देख लिया तो उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर देंगे। जबकि इनकी साजिश को खत्म करने के लिए उसका आजाद रहना जरूरी था।

कामराज की टेबल पर वेटर पहुँचा तो सावी और कामराज उसे आर्डर देने लगे।

“हे भगवान!” मीणा दुःखी स्वर में बड़बड़ा उठा- “ये सब मुझे क्यों दिखा रहा है? मेरे जिन्दा होते हुए भी मेरी पत्नी...”

मीणा खाना खा चुका था।

वेटर बर्तन ले गया। मीणा ने उसे कॉफी लाने को कह दिया था। चोर नज़रें कामराज और सावी पर थीं।

☐☐☐