सब-इंस्पेक्टर जय नारायण थाने पहुंचा तो इंस्पेक्टर महेन्द्र यादव, सिपाहियों के साथ कहीं जाने की तैयारी में था। जय नारायण को देखते ही उसने कहा।
“कहां गायब रहते हो तुम, विजय बेदी तक नहीं पहुंच पाये ?"
"दो-तीन दिन में पहुंच जाऊंगा सर ।"
"अलादीन का चिराग मिल गया है क्या?" महेन्द्र यादव ने होंठ सिकोड़ कर उसे देखा ।
जय नारायण ने पास खड़े सिपाहियों पर निगाह मारी फिर महेन्द्र यादव से बोला ।
"सर, मैं आपसे अकेले में बात करना चाहता हूं।"
"अभी मैं जा रहा हूं। रात को या कल बात करना ।" महेन्द्र यादव पलटने को हुआ।
“सर, जरूरी बात है।" जय नारायण ने गम्भीर स्वर में कहा।
महेन्द्र यादव ने ठिठक कर उसे देखा फिर सिपाहियों से बोला।
"तुम लोग जीप में बैठो।" फिर जय नारायण से बोला--- “आओ।"
दोनों थाने के भीतर, इंस्पेक्टर महेन्द्र यादव वाले ऑफिस में पहुंचे।
"बोलो।"
जय नारायण ने आस्था के अपहरण की सारी बात बता दी।
इंस्पेक्टर महेन्द्र यादव की आंखें सिकुड़ीं।
"तो अब उसने डाक्टर की बेटी का अपहरण कर लिया है। यह सब तुम्हारी गलती है जय नारायण ।"
"मेरी ?"
"हां, अगर तुमने तेजी दिखाकर पहले ही विजय बेदी को गिरफ्तार कर लिया होता तो यह सब न होता।"
"सर, आप तो जानते ही हैं कि में कितनी कोशिश कर...।"
"मैं कुछ नहीं जानता कि तुम क्या कर रहे हो।" महेन्द्र यादव ने उसे घूरा ।
"मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि तुम सेफ कम्पनी के मामूली से सेल्समैन विजय बेदी को नहीं पकड़ सके। जिसकी पीठ पर किसी का हाथ नहीं। जो अपराधों के मामले में सिरे से अनाड़ी है। पुलिस के दांव-पेंच भी नहीं जानता। उसे तो कब का हवालात में होना चाहिये था। लेकिन वह खुला घूम रहा है और एक के बाद एक अपराध किए जा रहा है।"
"सर, मैं...।"
"जय नारायण मैंने कोई सफाई नहीं मांगी, इसलिये कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है।" महेन्द्र यादव ने उसे घूरा--- "तुम अच्छी तरह जानते हो कि विजय बेदी को गिरफ्तार करना जरूरी है। तुम्हारा ऑफिसर होने के नाते इस वक्त हालातों को सामने रखते हुए सिर्फ यही सलाह दे सकता हूं कि डॉक्टर वधावन का फोन टेप करो। जब विजय बेदी का उसे फोन आये तो कॉल ट्रेस करो कि वह कहां से फोन करता है। ऐसे में चांस है कि वह हत्थे चढ़ जाये।" कहने के साथ इंस्पेक्टर महेन्द्र यादव बाहर निकल गया।
जय नारायण गहरी सांस लेकर रह गया।
■■■
मीना कार चला रही थी। शांता पीछे वाली सीट पर बैठी थी। उसके चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। एकटक वह खिड़की से बाहर देखे जा रही थी।
पौन घंटे के बाद मीना ने कार रोकी तो सामने मैट्रो सिनेमा था। शांता ने कलाई में बंधी घड़ी में वक्त देखा। वक्त हो चुका था। शांता वहां मौजूद लोगों पर नजरें दौड़ाने लगी ।
"यहां किससे मिलना है?" मीना ने पूछा ।
शांता ने कोई जवाब नहीं दिया, नजरें बाहर ही दौड़ती रही लोगों पर।
मीना ने फिर नहीं पूछा।
करीब बीस मिनट बाद शांता की आंखें सिकुड़ीं। चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वे दोनों इकट्ठे खड़े इधर-उधर निगाहें दौड़ा रहे थे। सिकन्दर ने उनके ही हुलिये बताये थे।
"मीना।" शांता के होंठों से निकलने वाला स्वर स्थिर था--- “उन दोनों को यहाँ बुलाकर ला। वो उधर खड़े हैं। एक ने सफेद कमीज पहनी है और दूसरे ने नीली ।"
मीना ने उस तरफ देखा कमीजों के रंगों के कारण फौरन ही उन्हें पहचाना। दोनों चालीस-पैंतालीस की उम्र के बीच के थे और देखने में कम-से-कम इज्जतदार लोग नहीं लग रहे थे।
मीना कार से उतरी और उस तरफ बढ़ गई।
शांता की निगाह मीना पर ही टिकी रही। मीना ने उनके सामने पहुंचकर उनसे बात की, फिर वापस पलट आई। कार में आकर ड्राइविंग सीट पर आ बैठी।
वे दोनों पास पहुंचे। पीछे वाली सीट पर शांता को बैठे पाकर दोनों के हाथ जुड़ गये।
"नमस्कार शांता बहन। हमें नहीं मालूम था कि यहां तुम मिलोगी।" एक ने जल्दी से कहा।
शांता सर्द निगाहों से उन्हें देखे जा रही थी।
“तुम दोनों का नाम कालू और असलम है ?” शांता ने सपाट स्वर में पूछा।
"ह-हां शांता बहन ।"
"सिकन्दर के आदमी हो?"
"ह-हां।"
"कल सिकन्दर ने दोपहर को तुम्हें किसी मकान पर पहुंचने को कहा था।" शांता उसी अंदाज में कहे जा रही थी--- "और तुम लोग नहीं पहुंचे।"
"थोड़ा लेट हो गये थे, वह... ।"
"तुम दोनों को मालूम था कि वह मेरा काम था ?"
"हां, सिकन्दर ने बताया...।"
शांता उसी वक्त नीचे झुकी। पैरों के पास फुटबोर्ड पर पड़ी गन उठाई। उसका मुंह खिड़की की तरफ किया और अगले ही पल ढेरों गोलियां कालू और असलम के शरीरों में प्रवेश कर गईं।
फायरिंग का शोर उठा, लोगों का ध्यान उस तरफ गया।
उसी पल मीना ने कार दौड़ा दी
शांता ने गन को वापस पैरों के पास रख दिया। दांत भिंचे हुए थे। आंखें सुलग रही थीं। वह जानती थी कि ढेरों गोलियां लगते ही दोनों उसी वक्त खत्म हो गये थे। उन्हें सांस लेने का मौका नहीं मिला होगा।
मीना तूफानी अंदाज से कार दौड़ाये जा रही थी।
"फोन देना ।” मीना ने डेशबोर्ड से फोन निकाला और हाथ पीछे करके शांता को थमा दिया।
शांता ने फोन पर सत्या से बात की।
"छोटे लाल का फोन आया ?"
"नहीं।" सत्या ने जवाब दिया।
शांता ने फोन बंद करके पास ही रखा और मीना से कहा।
"कार की स्पीड कम कर और किसी ठीक जगह पर रोक कर नम्बर प्लेटे लगा ले। बिना नम्बर प्लेटों की कार देखकर पुलिस ने रोका तो उन्हें गन नजर आ जायेगी।" शांता का स्वर बेहद शांत था।
■■■
उदयवीर दिन भर गैराज में ही व्यस्त रहा।
बेदी ने केबिन भीतर से बंद कर रखा था और आस्था का निगरान बना बैठा रहा। इस दौरान उसने आस्था से कोई बात करने की कोशिश नहीं की। आस्था ने एक-दो बार कोशिश की, परन्तु बेदी नहीं बोला । आस्था को इतना तो महसूस हो चुका था कि कम-से-कम उसे इन लोगों से कोई खतरा नहीं। तीनों की बातों से वह जान चुकी थी कि ये शरीफ लोग हैं और जो कर रहे हैं मजबूरी में कर रहे हैं। लेकिन इस तरह बंदी बनाकर बैठाये रखने की वजह से वह उखड़ी हुई थी। लेकिन यह सोचकर खामोश थी कि पापा जल्दी ही उसका ऑपरेशन कर देंगे और यह लोग उसे छोड़ देंगे। बेदी उसके प्रति सतर्क था ।
सुबह का गया शुक्रा शाम को वापस लौटा।
गैराज में छोकरों के साथ काम कर रहे उदयवीर से उसने कोई बात नहीं की और केबिन की तरफ बढ़ गया। उसने केबिन का दरवाजा ठकठकाया। बेदी ने यह तसल्ली करके कि बाहर शुक्रा है, दरवाजा खोला।
भीतर प्रवेश करके शुक्रा ने पुनः दरवाजा बंद किया और आस्था पर निगाह मारते हुए कुर्सी पर बैठ गया।
"सारा दिन कहां रहा?"
"यूं ही भटकता रहा।" शुक्रा ने मुस्कराकर बेदी को देखा--- "तेरे लिये बढ़िया खबर है।"
"क्या
"विष्णु जिन्दा है।"
"क्या?" बेदी चौंका। फिर उसके चेहरे पर खुशी से भरी चमक आ गई।
"हां, उसके पेट में गोली लगी और वह बच गया। अब तुम यह नहीं कह सकते कि तुमने किसी की जान ली है।"
"ठ... ठीक कहते हो।" बेदी हौले से हंसा— “वो बच गया, मेरे सिर से बोझ उतर गया।"
आस्था के चेहरे पर भी खुशी नजर आने लगी।
"विष्णु अब कैसा है?" आस्था ने पूछा।
शुक्रा ने उसे देखा ।
"वह बच गया है तो ठीक ही होगा। मैं उसका हाल-चाल तो पूछ कर नहीं आ रहा।" शुक्रा की आवाज में तीखापन आ गया— “उस तक पहुंचना बैंक लूटने से ज्यादा कठिन है। शांता बहन को तुम भूल रही हो।"
“शांता बहन, शांता बहन ।” आस्था गुस्से से कह उठी--- "तुम जान बूझकर मुझे विष्णु के खिलाफ भड़का रहे हो। जाने कौन है शांता बहन, जिसका डर मेरे सिर पर....।"
“मैंने तेरे से शादी नहीं करनी जो तेरे को विष्णु के खिलाफ भड़काऊं ।" शुक्रा दांत भींचकर कह उठा--- "चुपचाप बैठी रह। मेरे से कोई सवाल करने की जरूरत नहीं है।"
आस्था गुस्से से भरी निगाहों से उसे देखने लगी।
"शांता के बारे में पता किया कि विष्णु को गोली लगने के सिलसिले में वो क्या कर रही है?"
"नहीं, कुछ मालूम नहीं हुआ।" शुक्रा ने इन्कार में सिर हिलाया--- "मेरी इतनी हिम्मत कहां कि मैं शांता बहन जैसी हस्ती की क़रीबी खबरें जान सकूं। कोई उड़ती खबर आ जाये तो अलग बात है। लेकिन एक बात तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अपने भाई को गोली लगने के सिलसिले में वह चैन से नहीं। बैठेगी। उसे, जिसने गोली मारी है। यानी कि तेरे को वह जरूर ढूंढ़ रही होगी।"
बेदी गहरी सांस लेकर रह गया।
"लेकिन फिक्र की कोई बात नहीं।" शुक्रा विश्वास भरे स्वर में कह उठा— ''शांता बहन को हमारे बारे में मालूम नहीं हो सकता ।"
बेदी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं दिन भर सोचता रहा कि इस लड़की को यहां से हटाकर, कहां रखा जाये।" शुक्रा ने आस्था पर निगाह मारी--- “क्योंकि इसे यहां पर रखना वास्तव में ठीक नहीं। एक जगह का ध्यान आया, वहां इसे रखा जा सकता है।"
"कौन-सी जगह?" बेदी बोला।
"बाई पास रोड पर, सरकारी क्वार्टर बने हैं। परन्तु किसानों से जमीनी विवाद के कारण वो खाली पड़े हैं। कोर्ट में केस चले रहा है। उन क्वार्टरों के दूर-दूर तक आबादी नहीं है। वहां कोई नहीं आता। हम अपने पांच-सात दिन वहां बिता सकते हैं। उदय खाना-पानी हमें वहां पहुंचाता रहेगा।”
"वो फ्लैट तो मैंने भी देखे हैं। दूर-दूर तक वीरान है। हां वो जगह ठीक रहेगी।" बेदी ने फौरन सिर हिलाया।
"मैं वहां नहीं जाऊंगी।" आस्था कह उठी।
शुक्रा ने आंखें सिकोड़कर उसे देखा।
"तुम...।" बेदी कठोर स्वर में बोला--- "वहां जाओगी, हमारे साथ चलोगी। जो हम कहें चुपचाप मानती जाओ। इसी में तुम्हारी भलाई है और हमारी भी। हमें मजबूर मत करो, कि हमें किसी तरह की सख्ती करनी पड़े।"
आस्था होंठ भींच कर रह गई।
"उदय को बुला।"
शुक्रा उठा और केबिन का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया। मिनट भर बाद ही उदयवीर के साथ लौटा। बैदी को प्रश्नभरी निगाहों से देखा ।
"बाई पास रोड के पास खाली फ्लैट पड़े हैं। वहां कोई आबादी नहीं। इसे लेकर हम वहां रहेंगे।" बेदी ने कहा।
“वो जगह तो छिपने के लिहाज से अच्छी है।" उदयवीर के होंठों से निकला।
"तू छोकरों की छुट्टी कर । कुछ देर में अंधेरा हो जायेगा। हमें वहां छोड़कर आ । उसके बाद तू गैराज पर रहना। वहां खाना-पानी पहुंचाने की ड्यूटी तेरी रहेगी। किसी और काम की जरूरत पड़ी तो वो हम तेरे को बोल देंगे।"
"ठीक है।"
“वहां लाइट नहीं होगी, इसका कोई इन्तजाम कर लेना और भी जिस चीज की जरूरत पड़ती हो देख लेना।"
■■■
उदयवीर ने छः बजे ही छोकरों को छुट्टी दे दी थी।
आठ बजे के करीब जब अंधेरा-सा छाया तो एम्बैसेडर में बैठकर आस्था को लेकर वे सब बाई पास रोड की तरफ रवाना हो गये। आस्था किसी भी हालत में इन्कार करने की स्थिति में नहीं थी।
उदयवीर ने जरूरत का काफी सामान इकट्ठा कर दिया था। जो ध्यान में आया था।
"उदय।" बेदी बोला--- "कहीं से रस्सी लेनी है।"
"रस्सी ?"
"हां, वह वीरान जगह है। आस्था वहां से भागने की कोशिश कर सकती है। इसके हाथ-पैर बांधने पड़ेंगे।"
"मैं हाथ-पांव नहीं बंधवाऊंगी।" आस्था तेज स्वर में कह उठी ।
"जुबान बंद रख।” बेदी गुर्राया--- "हमारी बातों के बीच मत बोल।"
"मैंने कहा ना, मैं हाथ-पांव नहीं बंधवाऊंगी।”
"तेरा तो बाप भी हमारी बात मानेगा।" शुक्रा सख्त स्वर में बोला--- "एक बात कान खोलकर सुन ले। हम सड़क पर हैं। तू ऊंची बोली या चिल्लाई तो देख तेरी क्या हालत बनाता हूँ ।"
बेबस-सी आस्था भला क्या कहती।
"इसके मुंह पर कपड़ा बांध दे।" बेदी बोला--- "अगर यह चिल्लाई।"
"तो यहीं चलती कार में अभी गर्दन दबाकर इसकी जान ले लूंगा ।" शुक्रा खतरनाक स्वर में कह उठा।
आस्था, बेदी और शुक्रा के बीच फंसी बैठी खामोश हो गई। चेहरे पर गुस्सा था।
उदयवीर ने एक दुकान के सामने कार रोकी और उतरकर भीतर प्रवेश कर गया। तीन-चार मिनट बाद जब लौटा तो रस्सी का छोटा सा बंडल उसके हाथ में था। कार में बैठते ही उदयवीर ने पुनः कार आगे बढ़ा दी।
उस वक्त बाई पास रोड के पास बने फ्लैटों में रात का गहरा अंधेरा था। चन्द्रमा की रोशनी में फ्लैटों की ऊंचाइयां चमक रही थीं। वह करीब हजार फ्लैट थे। जो पूरी तरह वीरान थे। चूंकि फ्लैट तैयार होते ही किसानों की जमीन को लेकर उनका सरकार से विवाद हो गया, इसलिये काम रोक दिया गया। लाइट वगैरह का वहां कोई इन्तजाम नहीं था। रात तो क्या दिन में भी कोई इधर नही आता था।
उदयवीर ने कार रोकी, सामने ही फ्लैटों की लाइनें थीं। तीन मंजिला फ्लैट थे। वहां से मुख्य सड़क काफी हटकर थी। वह सब बाहर निकले। बेदी ने आस्था की कलाई पकड़ रखी थी।
"यहां हम कहीं भी रह सकते हैं।" शुक्रा बोला।
"हम पहली मंजिल पर अपना ठिकाना बनायेंगे।" बेदी बोला--- “वहां से बाहर देखना आसान रहेगा।"
"मैं अभी आता हूं।" कहकर उदयवीर फ्लैटों की तरफ बढ़ गया।
रात के गहरे अंधेरे में वह खड़े रहे, बेदी ने आस्था की बांह नहीं छोड़ी।
"तुम लोग मुझे कहां ले आये हो।" आस्था कह उठी--- "मैं यहां नहीं रह सकती ।"
"क्यों?" बेदी ने चांद की रोशनी में उसे देखा--- “जब हम यहां रह सकते हैं तो तुम क्यों नहीं रह सकतीं।"
"मैं-मैं नहीं रह सकती। ऐसी जगह रहने की मुझे आदत नहीं है। मेरा दम घुटता है।"
"अगर तूने हमारी बात नहीं मानी तो तेरा दम हम ही घोंट देंगे।" बेदी ने कठोर स्वर में कहा-- "तुम्हें इसलिये उठाया है कि हमारा काम हो सके। तुम्हें आराम देने के लिये, अपने साथ नहीं रखा हुआ।"
कुछ ही देर में उदयवीर लौट आया।
"यहां किसी फ्लैट में दरवाजे लगे हैं और किसी में नहीं। मैं पहली मंजिल पर दरवाजों वाला फ्लैट देखकर आया हूं, आओ ।" उदयवीर ने कहने के साथ ही कार में से एक लिफाफा और रस्सी उठाई फिर फ्लैटों की तरफ बढ़ गया। बेदी, आस्था को लिए उसके पीछे हो गया, शुक्रा भी।
वे सब सीढ़ियां चढ़कर पहली मंजिल पर स्थित एक फ्लैट में पहुंचे। दरवाजा खुला था। भीतर प्रवेश करते ही उदयवीर ने लिफाफे से मोमबत्ती निकाल कर जलाई। वह छोटा-सा कमरा था। दूसरा कमरा उसके बगल में था। उनके बीच बाथरूम वगैरह था। छोटी-सी बालकॉनी बाहर की तरफ निकली हुई थी।
"यहां नीचे मिट्टी है और सफाई करने के लिये कोई सामान नहीं है।" उदयवीर एक तरफ मोमबत्ती लगाता हुआ कह उठा--- "आज की रात तुम लोगों को ऐसे ही निकालनी होगी। मैं कल में सारा इन्तजाम कर दूंगा।"
"तुम्हारा मतलब कि मैं मिट्टी वाले फर्श पर...।" आस्था ने कहना चाहा।
"चुप कर ।” बेदी ने दांत भींचकर कहा--- “जहां हम रह सकते हैं। वहां तुम भी रह सकती हो। नखरे मत दिखा। यह तेरा ससुराल-मायका नहीं है। उदय बांध दे इसे, शुक्रा पकड़ ।” बेदी ने आस्था को छोड़ दिया।
शुक्रा ने आस्था को पकड़ा और उसकी दोनों बांहें पीछे की तरफ कर दी
"आह, प्लीज ऐसा मत करो। तकलीफ होती है। बांह मत मोड़ो।" आस्था पीड़ा भरे स्वर में कह उठी
"शुक्रा, धीरे कर, इसे दर्द न हो।" बेदी ने कहा।
उदयवीर आगे बढ़ा और रस्सी से आस्था की कलाइयां बांधने लगा।
“मुझे मत बांधों।” आस्था तकलीफ भरे स्वर में कह उठी--- "मैं वायदा करती हूं, भागूंगी नहीं, मैं...।"
"तेरे हाथ-पांव बांधे बिना हमें चैन नहीं मिलने वाला।" शुक्रा ने कहा--- “फिर सवाल यह पैदा होता है कि तुम भागोगी, क्यों नहीं। पहला मौका मिलते ही तुमने तीर हो जाना है। इसलिये झूठी बातें हांकना बंद कर दो।" हाथों को बांधने के बाद उदयवीर ने उसे जबरदस्ती नीचे बिठाया और पैर बांधने लगा।
मोमबत्ती की मध्यम-सी रोशन में सबके चेहरे चमक रहे थे
आस्था को बांधकर उदयवीर और शुक्रा ने फुर्सत पाई।
आस्था मिट्टी से भरे फर्श पर बे-आराम की मुद्रा में पड़ी थी। उसके चेहरे पर तकलीफ के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। वह आंखें फाड़े तीनों को देख जा रही थी।
"मेरे लिये कोई काम ?" उदयवीर ने पूछा ।
"हमारे लिये खाना ले आ। उसके बाद घर जा, मां-बहन के पास। सुबह खाने का सामान लेते आना।"
"कल गैराज खोलने के बाद यहां आ जाऊं, मतलब कि दिन के दस बजे के करीब तो ज्यादा ठीक रहेगा। तब यहां रुक भी सकूंगा। सुबह खाने का सामान लाया तो गैराज खोलने के लिये मुझे भागना पड़ेगा।"
"सुबह कोई जल्दी नहीं, दस बजे आ जाना।" बेदी ने कहा।
“अब तो खाना ला दे, होटल से पैक कराकर, सुबह झाडू, दो-चार चादरें, जो तेरी समझ आये, लेते आना।"
शुक्रा ने कहा और सिगरेट सुलगा ली
■■■
तब रात के नौ बज रहे थे, जब छोटे लाल शांता के पास पहुंचा। सत्या ने दरवाजा खोलकर उसे भीतर प्रवेश कराया और शांता के पास ड्राइंगरूम में पहुंचा दिया।
“अब आया है तू ।" शांता ने होंठ भींचकर उसे देखा।
"शांता बहन ।” छोटे लाल जल्दी से कह उठा--- “आज अथॉरिटी में छापा पड़ गया। इस वजह से कार के नम्बर के बारे में कोई बताने को तैयार नहीं था। आज वहां बहुत बुरा हाल रहा।"
"मां, पैग बना।” छोटे लाल पर निगाहें टिकाये, शांता बोली।
सत्या फौरन वहां से चली गई।
"शांता बहन, विष्णु कैसा है?" छोटे लाल ने पूछा।
"ठीक है, ठीक हो रहा है। जल्दी ठीक हो जायेगा।" शांता का स्वर अब संयत था--- "तू बोल।"
"एम्बैसेडर कार के बारे में बहुत मुश्किल पता चला। वो उदयवीर के नाम रजिस्टर्ड हैं। गैराज का पता दर्ज है, अथारिटी, के रिकार्ड में।" कहने के साथ ही छोटे लाल ने जेब से कागज निकालकर शांता की तरफ बढ़ा दिया--- "यह गैराज का पता है।"
शांता ने कागज थामा। उस पर लिखा पता देखा।
तभी सत्या पैग तैयार करके लाई और शांता को थमा दिया और खड़ी हो गई। कागज पर लिखे पते पर निगाहें टिकाये शांता उठी, घूंट भरा फिर विष्णु के कमरे में पहुंची।
विष्णु बैड पर आराम की स्थिति में लेटा था।
"उन तीनों में से किसी का नाम उदयवीर था?" शांता ने पूछा।
"एक को उदय कहकर पुकारा था उन्होंने।" विष्णु ने पूछा--- "उनका कुछ पता चला?"
शांता बिना कुछ कहे वापस पहुंची। हाथ में पकड़े गिलास से घूंट भरते हुए बैठ गई।
"मां, मीना को बोल चलना है। तैयार होकर आ-जा ।" शांता का स्वर शांत था।
सत्या वहां से चली गई।
"तू उन तीनों को पहचानता है ना?"
"पक्का, सत्या बहन ।” छोटे लाल फौरन बोला।
"तू साथ चलेगा, अभी चलना है जो पता तू लाया है इसी पते पर जाना है।" कहने के साथ ही शांता ने गिलास खाली किया और उठकर अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
दो मिनट में ही मीना चलने की तैयारी के साथ वहां मौजूद थी।
शांता सूट बदलकर आ गई थी। छातियों पर बहुत अच्छे ढंग से दुपट्टा ले रखा था।
"मां, एक पैग और...।"
सत्या ने फौरन पैग तैयार करके शांता को दिया।
“कहां चलना है?” मीना ने पूछा।
"विष्णु पर गोली चलाने वालों में से एक का पता चला है उससे मिलने ।” शांता ने शांत स्वर में कहते हुए हाथ में पकड़े गिलास को खाली करके शांता को थमाया और बाहर की तरफ बढ़ गई।
मीना ने कार रोकी । बगल में शांता बैठी थी। पीछे छोटे लाल । रात के दस बज रहे थे। दो-तीन जगह से पूछने के बाद वे लोग उदयवीर के गैराज के सामने पहुंचे।
“ये तो बंद है।" छोटे लाल के होंठों से निकला ।
"मालूम कर, बंद ही रहता है या खुलता भी है।” शांता ने शांत स्वर में कहा।
छोटे लाल कार का दरवाजा खोलकर बाहर निकला और कुछ दूर नजर आ रही पान की दुकान की तरफ बढ़ गया। पांच-सात मिनट बाद ही लौटा।
"गैराज रोज खुलता है।" छोटे लाल बोला--- "उदयवीर गैराज का मालिक है। सुबह नौ साढ़े नौ बजे खुल जाता है। बंद होने का कोई वक्त नहीं। कभी शाम को छः तो कभी रात के दस बज जाते हैं ।"
"उदयवीर रहता कहां है?" शांता के होंठ हिले ।
"पूछा था, मालूम नहीं हो पाया।"
"तू सुबह साढ़े आठ बजे मेरे पास आना।"
"ठीक है शांता बहन ।"
शांता के इशारे पर मीना ने कार आगे बढ़ा दी।
शांता और मीना घर पहुंची। दामोदर ड्राइंगरूम में ही बैठा था। उसने शांता को देखा फिर बिना कुछ कहे, उंगलियों में फंसी सिगरेट के कश लेने लगा।
मीना अपने कमरे में जा चुकी थी।
तभी सत्या ने भीतर प्रवेश किया। उसके हाथ में खाने का थाल था। जो कि दामोदर के सामने टेबल पर रख दिया। दामोदर ने सिगरेट ऐश-ट्रे में डाली और खाना खाने में व्यस्त हो गया।
"रामजी लाल का फोन आया था शाम को।" शांता सोफे पर बैठती हुई बोली ।
दामोदर खाना खाता रहा।
"पांच दिन पहले तेरे को बोला था रामजी लाल का मकान खाली कराना है, जिस पर किरायेदारों ने कब्जा कर रखा है। लेकिन तूने इस काम को पूरा नहीं किया। पूरी पेमेंट पांच लाख एडवांस ले रखी है उससे।"
दामोदर ने शांता को देखा उसके बाद खाने में व्यस्त हो गया।
"मैं तुमसे बात कर रही हूं दामोदर।" शांता का स्वर सख्त हुआ।
"इस वक्त मैं खाना खा रहा हूं।" दामोदर ने निगाहें उठाकर शांता को देखते हुए तीखे स्वर में कहा।
शांता के माथे पर बल पड़े।
"तू पहली बार नहीं खा रहा और तेरे खाना खाने के बीच मैं पहली बार बात नहीं कर रही।" शांता ने सख्त स्वर में कहा--- "तेरे को हुआ क्या है। सीधे मुंह बात क्यों नहीं करता।"
"मां।" दामोदर ने तीखे स्वर में कहा--- "इसे बोल, खाना खाने दे।"
"मां से क्या कहता है।" शांता के दांत भिंच गये--- "जो बात करनी है। मेरे से कर ।"
"मुझे तेरे से कोई बात नहीं करनी।" दामोदर ने खा जाने वाली निगाहों से शांता को देखा, फिर खाना छोड़कर उठा और ड्राइंगरूम से निकलकर अपने कमरे की तरफ बढ़ता चला गया।
"दामोदर ।" शांता की आवाज गुस्से से कांप उठी ।
दामोदर ने शांता की जरा भी परवाह नहीं की। वह बाहर निकल गया।
शांता कई पलों तक उस दरवाजे को देखती रही, जहां से दामोदर निकला था। अपने गुस्से पर धीरे-धीरे वह काबू पाती जा रही थी। फिर आगे बढ़ी और सोफे पर जा बैठी।
सत्या की पैनी निगाह शांता पर टिकी रही। फिर वहां से गई और शांता के लिये पैग ले आई।
"ले।" सत्या बोली।
शांता ने गिलास थामा और एक ही सांस में खाली कर दिया।
"माँ।" शांता धीमे स्वर में बोली--- “मुझसे कोई गलती हुई क्या?"
"नहीं।"
"फिर दामोदर ।"
"विष्णु वाली बात से उखड़ा हुआ है।" सत्या ने शांत स्वर में कहा--- "सब ठीक हो जायेगा।"
"मैं जो भी काम करती हूं परिवार के भले के लिये करती हूं।" शांता जैसे अपने आपसे कह रही थी--- “आज दामोदर मेरे आगे बोला, पहले तो उसकी इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई कि...।"
"वो ठीक हो जायेगा, तू मन खराब मत कर।"
शांता ने निगाहें उठाकर सत्या को देखा।
"बात कुछ है, दामोदर जान-बूझकर बात बढ़ा रहा है।"
"ऐसा कुछ नहीं ।"
"है मां है, मैं दामोदर को अच्छी तरह जानती हूं। लगता है जैसे वह पहले ही तैयार बैठा था कि झगड़े का कोई मौका मिले और वो विष्णु की बात को लेकर मिल गया।" शांता एक-एक शब्द चबाकर कह उठी--- "तुम देखना मां, बहुत जल्द दामोदर असल बात पर आयेगा।"
सत्या कुछ नहीं बोली।
"मुझे अहसास हो रहा है कि बहुत जल्द हमारा परिवार अलग होने वाला है।" शांता धीमे स्वर में कह उठी।
"बेकार की बात मत सोच, तू... ।"
"मेरी बातें कभी भी बेकार की नहीं होती, पैग बना।"
सत्या कई पलों तक शांता को देखती रही। फिर पलटकर चली गई।
■■■
सत्या, विष्णु को सूप देने गई तो विष्णु बोला।
"मां, वो लोग मिले, जिन्होंने मेरे को गोली मारी ?"
"नहीं।"
"मिलने की आशा है?"
"हां।"
विष्णु ने सूप लिया।
"वो लड़की, डॉक्टर की बेटी आस्था, वो अभी भी उन तीनों के ही पास है ?"
"मुझे नहीं मालूम, अब इस मामले को शांता देख रही है।" सत्या ने उसे देखा ।
"शांता को बोलना कि आपसी झगड़े में उस लड़की को कोई नुकसान न हो ।” विष्णु ने कहा।
"क्यों?" सत्या की आवाज तीखी हुई— "वह लड़की मर भी जाये तो तेरा क्या जाता है?"
“वो मुझे अच्छी लगती है ।"
“उससे शादी करेगा क्या?"
विष्णु खामोश रहा।
"तेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं है विष्णु। होश की दवा कर। शांता को ये सुनकर अच्छा लगेगा क्या?"
"तो क्या मैं अपनी मर्जी से कोई काम नहीं कर सकता?"
"कर सकता है लेकिन उस काम का बुरा असर हमारे धंधे पर नहीं पड़ना चाहिये। लड़की के चक्कर में तू खराब हो जायेगा।"
“ऐसी बात नहीं है मां, मैं...।"
"इस बारे में मुझसे बात मत कर। जो कहना हो, शांता से कह।" बोलकर सत्या बाहर निकली। शांता के पास पहुंची।
शांता कश लेती सोफे पर थके अन्दाज में बैठी थी।
"विष्णु बोलता है, वो डॉक्टर की छोकरी को चाहने लगा है।" सत्या बोली।
"मैं जानती थी।" शांता ने सत्या को देखा--- "मां मेरी बात मानो, हमारा परिवार अलग होने वाला है।"
"नहीं, तू वहम वाली बात... ।"
"बहुत जल्दी सामने होगा तेरे सब कुछ, जा खाने को ला दे कुछ।"
सत्या वहां से चली गई।
घंटे बाद सत्या दामोदर के कमरे में गई तो, दामोदर बोतल खोले बैठा था।
"खाना क्यों छोड़ आया ?” सत्या बोली।
"मन नहीं किया।" दामोदर घूंट लेते कह उठा।
"तेरे को शांता से इस तरह बात नहीं करनी चाहिये। वो बहुत दुखी है।"
"तो मैं क्या करूं।" दामोदर की आवाज सख्त हो गई--- "वो जो कहे, उसकी बात मान लूं। जो करने को बोले वो कर दूं। तब वो खुश है। उसका हुक्म बजाता रहूं।"
"शांता जो भी करती है, सबके लिये करती है। तू जो करता है सबके लिये करता है। हम सब एक परिवार के हैं।" सत्या ने उसे समझाने वाले ढंग में कहा--- “गलत मत सोच, तुम... ।”
"परिवार?" दामोदर ने सत्या को देखा--- “किसका परिवार मां?"
सत्या की निगाह, दामोदर पर जा टिकी।
"हमारा परिवार।"
"हमारा नहीं मां, यह तेरा परिवार है। पापा का परिवार है।" दामोदर कठोर स्वर में कह उठा।
"दामोदर।” सत्या का स्वर तीखा हुआ।
"क्यों मां, गुस्सा क्यों आया? मैंने गलत कह दिया क्या?"
"लगता है तेरा दिमाग खराब हो गया है, जो ऐसी बातें कर रहा है।"
"वही तो मैं पूछ रहा हूं मां कि मैंने कौन-सी गलत बात कह दी, यही तो कहा कि यह तेरा परिवार है। मेरा नहीं।"
सत्या ने दामोदर की आंखों में झांका।
"मैं तेरी बात समझ नहीं पा रही दामोदर ।"
"मैंने जो कहा है, स्पष्ट कहा है। इस पर भी तेरी समझ में बात न आये तो मैं क्या करूं?"
सत्या कई पलों तक खामोशी से दामोदर को देखती रही। फिर कुर्सी पर जा बैठी।
"बात क्या है दामोदर। तू पहले तो कभी ऐसा नहीं उखड़ा।"
"क्या बोलू मां।” दामोदर ने घूंट भरा--- "तुम्हारे परिवार में तो तुम्हारी बेटी की चलती है। यहां कोई अपने दिल की कर भी नहीं सकता। मैं इन कामों से तंग आ गया हूं मां।”
"क्या ?” सत्या के होंठों से निकला--- "तू धंधा छोड़ने को कह रहा है ।"
"हां।"
"वजह ?"
"मन नहीं लगता।"
"कोई और बात भी है। सच बोल, मेरे सामने तू झूठ नहीं बोलेगा ।" सत्या सतर्क नजर आने लगी।
"सच तुम्हें पसन्द नहीं आयेगा।" दामोदर ने सत्या की आंखों में देखा।
"नहीं आयेगा तो, तेरा क्या जाता है, तू बोल।"
"तीन दिन पहले मैं बाप बना हूँ। मेरी बीवी को बच्चा हुआ है।" दामोदर ने घूंट भरा।
सत्या हैरान-सी दामोदर को देखती रही।
"तूने शादी कर रखी है?" आखिरकार सत्या के होंठों से निकला।
"हां।"
"कब की ?"
"दो साल हो गये।"
"किससे ?"
"अच्छे घर की लड़की है। समझी मां। वो है मेरा परिवार। मेरा बच्चा बहुत प्यारा है। मैं अपने परिवार के साथ रहकर उनके लिये कुछ करना चाहता हूं। इस धंधे में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है।" दामोदर ने स्पष्ट कहा।
सत्या उठ खड़ी हुई ।
"चल पड़ी मां।" दामोदर व्यंग्य से कह उठा।
"मैं तेरे लिये खाना लेने जा रही हूं। बच्चे भूखे सो जायें तो मां-बाप को कितना दुख होता है। बाप बनने के बाद इस बात का अब तेरे को पता लगेगा।” सत्या मुस्कराई--- "बोतल बंद कर, खाना ला रही हूं। बाकी बातें खाने के बाद होंगी ।" कहने के साथ ही सत्या कमरे से निकल गई।
सुबह सत्या ने शांता को बैड टी दी तो सत्या ने बात की।
"दामोदर ने दो साल पहले शादी की थी। अब उसकी बीबी को बच्चा हुआ है।"
चाय का घूंट लेते-लेते शांता ठिठकी। एकटक सत्या को देखने लगी। आंखों में अविश्वास के भाव थे।
"और क्या बोलता है।" शांता के होंठ हिले।
"बोला, इस काम में उसका मन नहीं है। अपनी बीवी-बच्चे के साथ रहना चाहता है।"
"मैंने तुम्हें बोला था मां, हमारा परिवार टूटने वाला है।" शांता ने खुद को संभाला। चाय का घूंट भरा।
सत्या खामोश रही।
"मैं बाहर ही नजर रखती रही। अपनी नाक के नीचे नहीं देख सकी कि क्या हो रहा है।"
"ऐसा होता है।"
"उधर विष्णु बोलता है, उसे डॉक्टर की लड़की से प्यार हो गया है। हमारे धंधे में एक यही बात नहीं होती। जब कोई दिल से औरत के चक्कर में पड़ जाता है तो वह हमारे धंधे के लायक नहीं रहता। ऐसे लोगों से जबरदस्ती करके उनको धंधे के लायक बनाया भी नहीं जा सकता। कभी भी दगा दे जाते हैं।"
सत्या की निगाह, शांता पर टिकी रही।
शांता ने सत्या को देखा।
"और क्या बोलता है दामोदर, बताओ मां।"
"वो अलग होना चाहता है। बोलता है, यह उसका परिवार नहीं है। उसका परिवार वहां है जहां उसकी बीवी-बच्चा है।"
"कौन है उसकी बीवी ?"
"मालूम नहीं, बोलता है अच्छे घर की है। दामोदर से कहकर उसकी बीवी-बच्चे को बुलवाऊं?"
"नहीं, रिश्तेदारी बढ़ाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।" शांता ने शांत स्वर में कहा--- "वो जाना चाहता है।"
"हां।"
"दामोदर को जाने दो। वो जितना पैसा साथ ले जाना चाहता है उसे दे देना।" कहकर शांता ने चाय का घूंट भरा ।
“सोच कर बोल । तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या?" सत्या का स्वर कठोर हो गया।
शांता की निगाह सत्या पर जा टिकी।
"दामोदर को समझा, बात कर उससे। अगर वो अपने परिवार को नहीं छोड़ना चाहता तो मत छोड़े। लेकिन काम करता रहे।"
“परिवार के लोगों को जबरदस्ती नहीं बांधा जाता। उन्हें खुद समझ होनी चाहिये। जब एक बार दिमाग में आ जाये कि उसे जाना है तो वह जायेगा। अब मैं उसे रोकना नहीं चाहती।" शांता ने सपाट स्वर में कहा।
"सोच-समझकर बात कर शांता, तुम...।"
"विष्णु उठ गया?"
"हां, अभी उसे चाय देकर आई हूं।"
शांता चाय का गिलास हाथ में पकड़े बैड से उतरी और विष्णु के कमरे में पहुंची। सत्या साथ थी।
"कैसी तबीयत है तेरी ?" शांता का स्वर सपाट था।
"ठीक हूं, अब थोड़ा-बहुत चल सकता हूं।"
"तेरे को डॉक्टर की छोकरी से प्यार हो गया है।" शांता ने पूछा।
विष्णु की निगाह सत्या पर गई, फिर वह शांता को देखने लगा।
"बोल ।"
विष्णु ने हौले से सहमति से सिर हिला दिया।
"मैंने तेरे को डॉक्टर की बेटी को फांसने भेजा था और तू खुद फंस गया। हमारे धंधे में तेरे को नहीं रहना क्या?"
विष्णु खामोश रहा।
"सोचकर बता देना।" शांता ने कहा और पलटकर बाहर निकल गई।
विष्णु ने सत्या को देखा।
"तुमने शांता को सब बता दिया।” विष्णु की आवाज में शिकायती भाव थे ।
“दामोदर शादी कर चुका है। तीन दिन पहले उसकी बीवी को लड़का हुआ है।” सत्या सपाट स्वर में बोली--- “वो परिवार से और धंधे से अलग होना चाहता है।"
"दामोदर ऐसा बोला?” विष्णु के होंठों से निकला।
"हां।" कहने के साथ ही सत्या बाहर निकल गई।
■■■
केदारनाथ होटल मूनलाइट से सुबह पांच बजे लौटा था। जब से खान का मूनलाइट होटल संभाला था, तब से उसे वक्त ही नहीं मिला था। सुबह पांच-छः बजे लौटना। दिन भर सोना और शाम को फिर होटल पहुंच जाना, क्योंकि मूनलाइट का धंधा शाम को शुरू होकर, सुबह खत्म होता था ।
शांता के कहने पर सत्या ने केदारनाथ को उठाया।
केदारनाथ शांता के पास ड्राइंगरूम में पहुंचा।
"कोई ख़ास लफड़ा है क्या ?" आंखें मलते केदारनाथ ने पूछा ।
“पापा तेरे को खुशी भरी खबर देनी है। तुम दादा बन गये हो।" शांता ने शांत स्वर में कहा।
"दादा!" केदारनाथ ने अजीब से स्वर में कहा--- "तो क्या विष्णु हॉस्टल में रहकर शादी कर आया है?"
"दामोदर ने शादी कर रखी है। अब उसकी बीवी को बच्चा हुआ है। मुंह मीठा नहीं कराओगे।"
"कमाल है।" केदारनाथ ने अजीब-से स्वर में कहा--- “दामोदर ने ऐसा किया।"
"दामोदर बोलता है, धंधे से अलग होना है। अपनी बीवी-बच्चे के पास जाना चाहता है।"
"धंधा छोड़ना चाहता है।" केदारनाथ की आंखें सिकुड़ीं।
"उधर विष्णु को काम बोला तो वो लड़की से प्यार करने लगा। पापा तू संभाल सकता है तो संभाल ले। परिवार बिखर रहा है। बाहर की बात होती तो हल हो चुकी होती। दामोदर और विष्णु का गला नहीं काट सकती मैं। कई साल पहले तेरी जगह मैंने ली थी। आज तेरे को सब कुछ वापस करती हूं। जो मन में आये कर। परिवार वाले ही मेरे साथ नहीं तो इस काम को संभालने में मेरा मन होगा ?"
"यह तू क्या कह रही है शांता? अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रही है ?" केदारनाथ के स्वर में सख्ती आ गई--- "तू जानती है, तेरे ऐसा करने से कितना बड़ा नुकसान होगा।"
"मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती। दामोदर को रोका भी जाये तो कोई फायदा नहीं। उसका दिमाग धंधे से भटक चुका है। उधर विष्णु की आदतें बता रही हैं कि देर-सबेर में वो भी ऐसा ही कोई रंग दिखायेगा।" शांता ने सपाट स्वर में कहा--- “सारे काम को तू संभाल ले पापा। अब मुझे छुट्टी दे। बाहर वालों से मैं दुश्मनी लेती रहूं और परिवार मेरे साथ न हो। ऐसा धंधा करने का कोई फायदा नहीं ।"
केदारनाथ के दांत भिंच गये।
“शांता, बात को समझा कर, तेरे नाम का सिक्का चलता है, तू...।"
“परिवार में नहीं चलता तो बाहर चलने वाला सिक्का भी जल्दी ही खोटा हो जायेगा। मैं खोटा सिक्का नहीं बनना चाहती। तेरा काम है तू संभाल। मैंने तेरे धंधे को बढ़ाया ही है। तेरा नाम आगे ही किया है, तू... ।"
“शांता ।” केदारनाथ गुस्से से समझाने वाले स्वर में बोला--- “तू बात को समझती नहीं। जब बाहर ये खबर फैलेगी कि तू धंधे से हट गई है तो जो दबे बैठे हैं, वो खुलकर सामने आ जायेंगे। मैंने कब से धंधा छोड़ रखा है। संभालने में मुझे वक्त लगेगा और तब तक सब कुछ खत्म हो जायेगा। तू क्या समझती है कि खान, मूनलाइट होटल देकर खुश है। जब उसे पता चलेगा कि तू परिवार से अलग हो गई तो सबसे पहले अपने इलाके से मुझे भगाकर होटल पर कब्जा करेगा, वो सिर्फ तेरे डर से चुप है, और... ।"
"पापा।" शांता ने कठोर निगाहों से केदारनाथ को देखा--- “परिवार के सारे सदस्य मेरे साथ हो तो अलग बात है। वरना मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती। तू दूसरों को समझा सकता है तो समझा ले। वैसे भी अब उनके समझ जाने में मजा नहीं क्योंकि गांठ तो पड़ ही जाती है। अच्छा यही होगा कि तू ही सब कुछ संभाल ले।"
"शांता, तू जल्दी मत... ।'
शांता उठ खड़ी हुई।
"पापा, मैंने इसी वक्त सारे कामों से हाथ खींच लिया है। सिर्फ एक काम मेरी निगाहों में ऐसा है, जो पूरा करना है, क्योंकि वह अधूरा है।" शांता होंठ भींचकर कह उठी--- "जिसने विष्णु को गोली मारी, उससे बात करनी है। उसने विष्णु के हाथों से डॉक्टर की बेटी को छीना है। जिसे वापस पाकर, डॉक्टर से भारी रकम वसूल करनी है। यही है मेरा आखिरी काम। तब तक तू समझाकर देख ले अपने बेटों को । इतना वक्त दिया।" कहने के साथ ही शांता अपने बेडरूम की तरफ बढ़ने को हुई कि फोन की बैल बजी।
सत्या ने रिसीवर उठाया, बात की। फिर वहां से जाती शांता को देखा।
“शांता, फोन ।” सत्या ने पुकारा।
परन्तु शांता नहीं रुकी।
सत्या ने केदारनाथ को देखा, फिर फोन बंद करके वापस रख दिया।
"शांता को क्या हो गया है सत्या? मुझे तो अपनी बेटी पर गर्व था ।" केदारनाथ दांत भींचकर बोला।
"शांता को नहीं, दामोदर को हुआ है।” सत्या ने सख्त स्वर में कहा— “दामोदर की हिम्मत कैसे हुई, शांता के कहने से बाहर जाने की। परिवार उसूलों में बंधा रहे तो वह कभी नहीं टूटता।"
"दामोदर, शादी। विश्वास नहीं होता।"
"दामोदर ने छिपाकर इतना बड़ा कदम उठाया। अपने ही धोखा देने लगे तो शांता क्या करेगी।"
“दामोदर की इतनी हिम्मत हो गई कि धंधे से, परिवार से अलग होने की बात कहने लगे।" केदारनाथ ने दांत भींचकर कहा-- "ये सब क्या हो रहा है।"
"विष्णु भी धंधे में दिलचस्पी नहीं ले रहा।" सत्या ने दांत भींचकर कहा।
"मैं इन दोनों को सीधा कर दूंगा।" केदारनाथ के होंठों से गुर्राहट निकली--- "मैं...।"
"तुम कुछ नहीं कर सकते !" सत्या की आवाज कठोर ही थी।
"क्यों ?"
"वो दोनों जवान हैं और तुम बूढ़े हो चुके हो।" सत्या ने केदारनाथ की आंखों में झांका।
केदारनाथ का चेहरा गुस्से से स्याह हो गया।
"इतना भी बूढ़ा नहीं हो गया कि जवान बेटों से डर लगने लगे।" केदारनाथ की आवाज में बेहद गुस्सा था।
"एक बात बोलूं?"
"बोल ।"
"बेटों से आराम से बात करो, गुस्से से बात नहीं बनेगी।"
केदारनाथ दांत भींचकर सत्या को देखने लगा।
तभी दरवाजे पर खड़ी मीना आगे बढ़ी, पास पहुंची।
"मां।” मीना ने शांत स्वर में कहा--- "दामोदर धंधे से अलग होना चाहता है। अपनी बीवी-बच्चे के पास जाना चाहता है तो जाने दो।"
सत्या और केदारनाथ की निगाह मीना पर गई।
"धंधा तेरा बाप संभालेगा, इस उम्र में।” सत्या ने उसे घूरा ।
“विद्रोह करने के बाद दामोदर बेशक सीधे रास्ते पर आ जाये यह जुदा बात है। लेकिन पहले की तरह उसका मन नहीं लगेगा। इसलिये उसे जाने देना ही बेहतर है।" मीना बोली--- "अब वो बाप बन गया है।"
"हमारे परिवार में से एक का भी अलग होना, बाहर के लोगों की निगाहों में हमें कमजोर बना देगा।"
"तुम किस-किस को रोकोगी मां।” मीना ने स्थिर स्वर में कहा।
"क्यों, तूने भी जोड़ा बना लिया है क्या?" सत्या ने उसकी आंखों में झांका।
“दो महीने हो गये मेरे पेट को।” मीना ने पल भर के लिये निगाहें चुराई, फिर सत्या को देखा--- "उससे मैं शादी करने वाली हूँ। मैं रुक नहीं सकती।"
"क्या?" केदारनाथ के होंठों से निकला।
सत्या हक्की-बक्की रह गई। शांता की बात सच होती नजर आने लगी कि परिवार अब बिखरने वाला है। आंखें फाड़े वो मीना को देखती रही।
"कौन है वो ?" सत्या के होंठों से फटा-फटा-सा स्वर निकला।
"मुन्ना।"
"कौन मुन्ना।" सत्या की आंखें सिकुड़ीं--- “वो जो दारू की भट्टी चलाता है।"
"तो हम कौन-सा मिल खोले बैठे हैं। वो भी अपने जैसा ही हुआ।" मीना का जवाब था।
“ठीक बोलती है तू।” केदारनाथ ने खा जाने वाली निगाहों से उसे देखा--- "ठीक बोलती है।"
मीना ने दोनों को देखा फिर पलटकर चली गई।
सत्या और केदारनाथ के बीच कई पलों तक खामोशी रही।
"सुना तूने।" केदारनाथ ने गुस्से से कहा--- "देख लिया अपनी औलादों को।"
"एक का बच्चा पैदा हो गया है और दूसरी पेट में लिये फिर रही है।" सत्या शब्दों को चबाकर कह उठी--- "ये लोग धंधे को क्या संभालेंगे। इनका तो जाने क्या होगा, हमारा धंधा खत्म हो जायेगा। हमें पीछे हटते देखकर हमारे दुश्मन हमारी जान लेने की कोशिश करेंगे। इस धंधे से तो मर कर हटा जा सकता है।"
“मैं इस धंधे को बंद नहीं होने दूंगा। बहुत मेहनत से जमाया है मैंने इसे।” केदारनाथ गुस्से से कह उठा ।
"चारपाई के पैर न हो तो उसे बिछाया नहीं जा सकता।" सत्या ने सपाट स्वर में कहा--- "चारों पैर टूटने जा रहे हैं। दामोदर और मोना ने स्पष्ट कर दिया है। विष्णु भी इसी रास्ते पर जा रहा । इन सबके रंग-ढंग देखकर शांता ने पीछे हटने का मन बना लिया है।"
केदारनाथ ने सिगरेट सुलगाई।
“सत्या, किसी तरह सब ठीक करना होगा।"
"मेरे ख्याल में अब ठीक नहीं हो सकता।"
“हो जायेगा, मैं करूंगा ठीक।"
सत्या की निगाह केदारनाथ के धधकते चेहरे पर जा टिकी।
"वो कौन है, जो दामोदर के बच्चे की मां बनी है।" केदारनाथ की आवाज में मौत के भाव आ गये।
"क्या करोगे तुम जानकर?"
"बता ।"
“मैं नहीं जानती ।” सत्या की आंखें सिकुड़ चुकी थीं--- "लेकिन एक बात जरूर कहूंगी।"
"क्या ?"
"कोई भी गलत हरकत करके दामोदर को मत छेड़ देना।" सत्या ने चेतावनी भरे स्वर में कहा।
"सत्या, मैं अपनी आंखों से सब कुछ बिखरता नहीं देख सकता।" केदारनाथ दांत भींचकर कह उठा ।
"तो मामले को आराम से संभालो, मेरे ख्याल में हालात इतने बुरे नहीं हैं कि सब कुछ ठीक न किया जा सके।" सत्या ने कहा।
केदारनाथ होंठ भींचे खामोश रहा।
"दामोदर कहां है?"
"सो रहा है।"
"बुला उसे।" केदारनाथ ने खा जाने वाले स्वर में कहा ।
"उसे नींद पूरी कर लेने दो और तुम अपने गुस्से पर तब तक काबू पा लो।" सत्या ने कहा--- "दोनों की अक्ल ठिकाने पर होगी तो बात की जा सकेगी। नहीं तो सिर फटने की नौबत भी आ सकती है।"
"तुम मुझे डरा रही हो?"
"नहीं बता रही हूं कि दामोदर को रात तुमसे ज्यादा गुस्सा आया था। उसे अपनी नींद उठ लेने दो। यह भी उसकी शराफत है कि वह बताकर आराम से अपनी बीवी-बच्चे के पास जाना चाहता है।" सत्या ने सपाट स्वर में कहा--- "अगर वह सीधा-सीधा अपने जाने के बारे में कहे तो कौन रोकेगा उसे ?"
केदारनाथ के चेहरे पर विवशता के भाव नजर आने लगे।
"और मीना ?"
“उसकी फिक्र मत करो, शांता के एक फोन पर ही मुन्ना, मीना को भूल जायेगा।" सत्या बोली--- “बड़ा मसला दामोदर का है। दामोदर रास्ते पर नहीं आता तो मीना को रोकने का भी कोई फायदा नहीं।"
केदारनाथ को भी लगा जैसे सब कुछ बिखरने जा रहा हो। फिर एक बार संभालने की पूरी कोशिश करेगा। अपनी हिम्मत से भी ज्यादा जोर लगाकर, सब ठीक कर लेगा। दामोदर उसकी बात मान जायेगा।
■■■
छोटे लाल ठीक वक्त पर पहुंचा।
शांता तैयार थी। वो नीचे उतरी, पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
छोटे लाल ने ड्राइविंग सीट संभाली।
"उदयवीर के गैराज पर जाना है।" शांता ने शांत स्वर में कहा।
छोटे लाल ने कार आगे बढ़ा दी।
न तो शांता ने मीना को साथ चलने को कहा था, न ही मीना साथ चलने को बोली थी।
जब उनकी कार गैराज पर पहुंची तो सवा नौ बजे थे। उसी वक्त ही उदयवीर वहां पहुंचा और गैराज खोलकर हटा था। छोकरे भी पहुंचने वाले थे।
उदयवीर को देखते ही छोटे लाल बोला ।
"शांता बहन, उन तीनों में से एक ये भी था।"
शांता कार का दरवाजा खोलकर बाहर निकली। छोटे लाल भी निकला।
उदयवीर फौरन उनके पास पहुंचा।
"गुड मार्निंग मैडम। कार में कोई खराबी आ गई क्या?" उदयवीर ने मुस्कराकर पूछा।
शांता ने गहरी निगाहों से उदयवीर को देखा।
"अभी तक तो ठीक है।" शांता ने स्थिर लहजे में कहा।
"कोई और सेवा ?"
"तेरे दोनों साथी कहां हैं?" शांता ने दुपट्टा ठीक करते हुए पूछा।
"दोनों साथी ?" उदयवीर को कुछ समझ नहीं आया।
“वो ही जिनके साथ मिलकर तूने लड़की को उठाया था ।" शांता की आवाज में किसी तरह का भाव नहीं था।
उदयवीर चौंका।
"लड़की?" उसके होंठों से निकला।
"डॉक्टर वधावन की लड़की।" शांता ने पहले वाले स्वर में कहा।
समझकर भी उदयवीर कुछ नहीं समझा।
"मैं...।" उदयवीर इतना तो समझ गया था कि हालात ठीक नहीं हैं---"अभी भी नहीं समझा कि आप... आप क्या कहना चाहती हैं?"
"विजय और शुक्रा कहां हैं?" शांता ने सीधे-सीधे उसे देखा— “और वो लड़की, जिसे तुम लोग उठाकर ले गये थे। कहां छिपा रखा है उसे?"
उदयवीर को एहसास हो गया कि कोई नई मुसीबत आने वाली है। उसने छोटे लाल पर निगाह मारी।
"बोल, जवाब दे ।"
उदयवीर की समझ में न आया कि क्या जवाब दे । सामने खड़ी युवती सब बात इस तरह से कर रही है जैसे पूरा यकीन हो कि वह ठीक कह रही है। जबकि बिलकुल ठीक कह रही थी, कौन हो सकती है यह?
शांता कुछ कहने ही वाली थी कि गैराज पर काम करने वाले तीनों छोकरे आ पहुंचे। वहां खड़ी गाड़ी को देखा फिर एक उदयवीर के पास पहुंचकर बोला।
"इस गाड़ी को देखना है?" उसने शांता वाली कार की तरफ इशारा किया।
उदयवीर के कहने से पहले ही छोटे लाल कह उठा।
"तुम्हारे मालिक के रिश्तेदार हैं, गाड़ी ठीक है।"
छोकरा सिर हिलाकर वहां से हट गया।
"तुम...!" शांता ने उदयवीर से कहा--- "तुम्हारी हालत में समझ रही हूं। तुम्हें हैरानी का सामना करना पड़ रहा है कि अचानक सामने आकर मैं तुमसे ऐसी बात कर रही हूं जिसके बारे में तुमने सोचा कि तुम लोगों के अलावा कोई नहीं जानता । अन्दर कोई जगह है, बैठकर बात करने के लिये?"
"छोटा सा केबिन है। उदयवीर के होंठों से निकला।
"चल वहीं बैठते हैं।" शांता ने छोटे लाल को देखा--- "तुम इधर ही रहना, मैं अन्दर हूँ ।" कहने के साथ ही शांता गैराज के, भीतर प्रवेश कर गई।
उदयवीर उलझन में फंसा उसके पीछे चल पड़ा।
छोटे लाल बतौर पहरेदार सावधानी से वहीं खड़ा रहा।
छोकरे कपड़े बदलकर कल की फंसी एक कार पर जा चिपके थे, जिसे आज पूरी तरह फिट करना था।
शांता केबिन में कुर्सी पर बैठी और उदयवीर को देखा जो कुर्सी खींचकर बैठ गया था।
"मेरे को जानता है?" शांता की निगाह, उदयवीर के चेहरे पर जा अटकी ।
"नहीं।" उदयवीर का दिमाग तेजी से दौड़ रहा था।
"शांता बहन कहते हैं लोग मुझे।"
उदयवीर हड़बड़ाकर उठ खड़ा हुआ। चेहरे पर से कई रंग आकर गुजर गये।
"मतलब कि मेरा नाम सुन रखा है।" शांता का स्वर शांत था।
"ह... हां।" उदयवीर के होंठों से निकला---- "विष्णु तुम्हारा भाई है।"
"जिसे तुमने गोली मारी थी।"
"मैंने नहीं।" उदयवीर के होंठों से निकला।
“किसने मारी ?" शांता की आंखें सिकुड़ीं।
उदयवीर ने होंठ भींच लिए ।
"बोल ।"
उदयवीर के होंठ नहीं खुले ।
"नहीं बोलेगा ?"
उदयवीर नहीं बोला। अलबत्ता चेहरे पर व्याकुलता उभर आई थी ।। शुक्रा से शांता बहन के बारे में जो सुना था उसे याद करके उसका दिल धड़क उठा था। लेकिन शांता पर निगाह मारता तो दिल यकीन नहीं करता कि सामने खड़ी सीधी-सादी खूबसूरत शरीफ युवती इतनी खतरनाक भी हो सकती है।
"सुन...!" शांता की आंखों में कठोरता उभरी--- "मैं जितना बोल रही हूं, उतना बोलने की मेरी आदत नहीं है। तेरी चुप्पी मेरे को अच्छी नहीं लग रही। अब की बार जो पूछूं उसका जवाब बोलना, डरना मत, जो बोलना है, साफ-साफ कह देना। मेरे को गुस्सा नेई आयेगा।"
उदयवीर का दिमाग तेजी से चल रहा था।.
"शुरू से बात शुरू करते हैं। झूठ नहीं बोलना। दिल में बात नहीं रखना, नेई तो नुकसान खायेगा।" शांता बोली--- "डॉक्टर की लड़की कहां है? किस जगह पर रखा है उसे, तेरे दोनों साथी भी उसी के पास हैं ?"
“मैं नहीं बताऊंगा।" उदयवीर ने हिम्मत करके कहा।
“मुझे ऐसे शब्द सुनने की आदत नहीं है। लेकिन तेरे से सुनूंगी, क्योंकि ये मामला मेरे को बहुत अच्छा लग रहा है। विष्णु मेरा भाई है, इस पर भी तुम लोगों ने विष्णु को गोली मारी, बहुत बड़ी बात है।"
उदयवीर बेचैन हो उठा।
“तू बोला, तेरे मुँह से निकला, तूने गोली नहीं मारी, बता किसने मारी गोली विष्णु को ?"
उदयवीर खामोश रहा।
"चुप रहने से काम नहीं चलेगा, जवाब बोल ।”
"मैं नहीं बताऊंगा।” उदयवीर ने पक्के स्वर में कहा।
"क्यों ?"
“विजय और शुक्रा मेरे यार हैं। यारों के खिलाफ मैं कोई भी बात मुंह से नहीं निकाल सकता।"
"पसन्द आई तेरी बात, लेकिन तेरे से किसी बात का जवाब नहीं मिला, मजा नहीं आया, लड़की पर हाथ क्यों डाला?"
"ये भी नहीं बता सकता।"
शांता का चेहरा कठोर हो गया।
"तू क्या समझता है, तेरी न-न सुनकर मैं वापस चली जाऊंगी।" शांता एकाएक उखड़ गई। साथ ही कपड़े में छिपा रखी रिवॉल्वर निकालकर दुपट्टा ठीक किया और रिवॉल्वर उदयवीर की तरफ कर दी।
उदयवीर का चेहरा फक्क पड़ गया।
"अब देगा मेरी बात का जवाब।"
घबराये से उदयवीर ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। दिलो-दिमाग में भय का तूफान उठा।
"देगा जवाब?"
“मैं नहीं दे सकता, वो मेरे दोस्त हैं।"
"मुझे डॉक्टर की लड़की चाहिये, कौन देगा जवाब ?"
"विजय।" उदयवीर के होंठों से निकला।
“हूं, तो यह बात है। तीनों में वो तुम्हारा लीडर है।" शांता के होंठ सिकुड़े।
"हम तीनों ही लीडर हैं और कोई भी लीडर नहीं ।" उदयवीर ने हिम्मत करके कहा--- "सारी बात यहां आकर खत्म होती है कि तुम जो भी पूछना-जानना चाहती हो, उसका जवाब सिर्फ विजय ही दे सकता है। अगर उसकी इच्छा हो तो।"
शांता ने रिवॉल्वर वापस कपड़ों में रख ली।
"लड़की अभी तुम लोगों के पास है?"
उदयवीर हिचकिचाया।
"इस बात का जवाब नहीं दिया तो गोली मार दूंगी।" शांता के दांत भिंच गये।
"हां।" उदयवीर के होंठ हिले ।
"ठीक-ठाक है?"
"हां।"
शांता ने कलाई पर बंधी घड़ी देखी।
"दस बज रहे हैं। बोल कितने बजे आऊं, विजय से बात करने के लिये ?" शांता का स्वर सपाट था।
उदयवीर की समझ में न आया कि क्या कहे।
"सुन, मैं शाम को चार बजे आऊंगी। विजय को यहां होना चाहिये। भेजे में बात आई ?"
"यहां?" उदयवीर के होंठों से निकला।
चेहरे पर सख्ती लिए शांता उठ खड़ी हुई।
"ठीक चार बजे, अगर विजय यहां नहीं हुआ तो तू जान से जायेगा।" शांता का स्वर कठोर था--- "बोत प्यार से पेश आ रही हूं मैं । किस्मत वाला है तू, आज मेरा मूड ठीक नहीं है। बच गया, वरना तेरी पहली न पर ही तेरे को गोली मार देती।" कहने के साथ ही शांता केबिन से बाहर निकलती चली गई।
छोकरे कार पर लगे हुए थे। उन्होंने एक बार भी शांता की
तरफ नहीं देखा।
छोटे लाल बाहर सतर्क मुद्रा में खड़ा था। शांता को आते देखा तो फौरन ड्राइविंग सीट पर जा बैठा।
शांता के पीछे वाली सीट पर बैठते ही कार आगे बढ़ा दी।
"कहां चलूं शांता बहन ?”
"घर जाने का मन नहीं है।" शांता ने खिड़की से बाहर देखते हुए शांत स्वर में कहा--- “चार बजे वापस इसी गैराज पर पहुंचना है। तब तक कहीं भी ले चल। किसी ऐसी जगह जहां किसी को यह न पता हो कि मैं शांता बहन हूं।"
कार ड्राइव करते हुए छोटे लाल ने शीशे से शांता को देखा। फिर ध्यान सामने लगा दिया।
"शांता बहन, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही। मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकता हूं क्या?" छोटे लाल बोला।
शांता खामोशी से खिड़की से बाहर देखती रही।
छोटे लाल ने फिर कुछ नहीं कहा, पूछा।
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"शुक्रा।"
"हूं।"
"मैं ठीक हो जाऊंगा।"
"क्यों नहीं होगा, पक्का ठीक हो जायेगा, वधावन की लड़की हमारे पास है। वह ऑपरेशन करेगा तेरा, तेरे को ठीक करेगा। उसे अपनी औलाद की अवश्य जरूरत होगी।"
बेदी ने जवाब में कुछ नहीं कहा। आंखों में पानी चमक उठा था।
"क्या बजा है?".
बेदी ने खुद को संभाला। कलाई पर बंधी घड़ी में वक्त देखा।
"साढ़े ग्यारह।"
"उदय क्यों नहीं आया ?" शुक्रा ने बुरा-सा मुंह बनाया और खड़ा होकर खिड़की के पास पहुंचा और बाहर देखने लगा। हर तरफ फ्लैटों का जाल बिछा नजर आया। वीरानी-ही वीरानी, कोई इंसान वहां नहीं था।
"किसी काम में फंस गया होगा।" बेदी ने कहा और आस्था पर निगाह मारी।
आस्था के हाथ पीठ पीछे बंधे थे। दोनों पैर भी बांध रखे थे। वह उकडू-सी धूल भरे फर्श पर पड़ी थी। रात भर से कहते-कहते थक गई थी कि उसे खोल दो। वह नहीं भागेगी। परन्तु उसे नहीं खोला गया था। इस वक्त वह ऐसे पड़ी नजर आ रही थी। जैसे शरीर में जान ही न बची हो। उसके चेहरे पर जो चमक थी। वह अब गायब हो चुकी थी। रात भर ठीक से न सो पाने के कारण, आंखें और चेहरा सूजा-सूजा सा लग रहा था।
एकाएक बेदी उठा और आस्था के बंधन खोलने लगा। पहले पीठ पीछे बांध रखी कलाइयों के खोले फिर पैरों को खोलने लगा। चेहरे पर गम्भीरता थी। तभी शुक्रा खिड़की से पलटा और उसे बंधन खोलते पाकर कह उठा।
"यह क्या कर रहा है?"
“इसके हाथ-पांव खोल रहा हूं। तकलीफ हो रही होगी इसे, रात से बंधी है।" बेदी ने कहा।
"मत खोल, भाग जायेगी।"
"मैं ध्यान रखूंगा, भागने नहीं दूंगा।"
"विजय।" शुक्रा ने कहना चाहा कि उसके बंधन खुले पाकर चुप हो गया।
आस्था ने फौरन अपने हाथ-पांव सीधे किए और खड़ी हुई। खड़े होते ही वह गिरने को हुई कि बेदी ने उसे फौरन संभाल लिया। आस्था ने शांत निगाहों से उसे देखा। बेदी ने उसे छोड़ दिया। खड़े-खड़े आस्था ने अपने हाथ-पांव सीधे करने के लिए हिलाये फिर दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई।
"तुम लोगों को किसी के औरत होने का जरा भी लिहाज नहीं।" आस्था ने धीमें स्वर किन्तु शिकायती लहजे में कहा--- “किसी औरत को इस तरह बांधा जाता है।"
"बांधना जरूरी है।" बेदी बोला।
"क्यों ?"
"अगर तुम भाग जाती तो हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता। इस वक्त तुम्हें कुछ देर के लिये खोला गया है।" बेदी ने शांत स्वर में कहा--- “कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ने की कोशिश मत करना ।"
"मेरा विश्वास करो, मैं नहीं भागूंगी, मैं खुद चाहती हूं कि पापा ऑपरेशन करके तुम्हारे दिमाग में फंसी गोली निकाल दें।"
“क्यों, तुम क्यों चाहती हो, हमने तो तुम्हारा अपहरण किया है ?" बेदी ने उसे घूरा।
"सिर्फ इसलिये कि तुम शरीफ आदमी हो।" आस्था ने धीमे स्वर में कहा।
शुक्रा तीखे स्वर में कह उठा।
"हमने तुम्हारा अपहरण किया, दो रातों से तेरे को कैद कर रखा है और तू हमें शरीफ आदमी कहती है।"
आस्था ने शुक्रा को देखा।
"हां, तुम दोनों और तुम्हारा दोस्त शरीफ आदमी हैं।" आस्था की आवाज में विश्वास का भाव था--- “वरना अकेली जवान लड़की को तो आजकल सड़क पर चलते, खा जाने को तैयार रहते हैं और मैं तुम लोगों के पास बंधी हूं। दो दिन से तुम लोगों ने मुझे उंगली भी लगाने की कोशिश नहीं की।"
“तो इस वजह से हम शरीफ हुए।" शुक्रा का स्वर तीखा ही था।
"हर वजह से तुम लोग शरीफ हो। जो कर रहे हो मजबूरी में कर रहे हो।"
"विजय।" आस्था को घूरते शुक्रा ने कड़वे स्वर में कहा ।
"हां।"
"इसकी बातों पर मत जाना। औरत जब प्यार से बोले तो समझ ले बेवकूफ बना रही है। मीठी-मीठी बातें करके यह भागने की फिराक में हो सकती है। अंजना भी कुछ इसी तरह की बातें किया करती थी। लगा गई चूना बाद में।"
"मैंने औरतों पर विश्वास करना बंद कर दिया है। अंजना के अंजाम के बाद अब नहीं करता।" बेदी की आवाज में गुस्सा आ गया--- "मैंने इन्सानियत के नाते इसके हाथ-पांव खोले हैं।"
"समझी तुम।" शुक्रा ने आस्था को घूरा--- "तरस खाकर तेरे हाथ-पांव खोले हैं। कोई खुशफहमी मत पाल लेना।"
आस्था ने बारी-बारी दोनों को देखा। कुछ कहा नहीं।
“वो उदय...।" शुक्रा कहते-कहते रुका। तभी बाहर कार रुकने की आवाज आई।
शुक्रा फौरन खिड़की पर पहुंचा। नीचे रुकी एम्बैसेडर से उदयवीर उतरता नजर आया।
"उदय आ गया।" शुक्रा ने पलटकर बेदी को देखा।
बेदी के चेहरे पर कुछ राहत उभरी।
“ये कोई आने का वक्त है? सुबह से भूखे पड़े हैं।" शुक्रा उखड़े स्वर में कह उठा ।
कुछ पलों बाद उदयवीर ने कमरे में कदम रखा। उसके पास बड़ा बोरा था। जिसमें जरूरत का सारा सामान भरकर लाया था। सामान में चादरें, झाडू, खाने का व अन्य तरह की जरूरतों का सामान था।
शुक्रा ने सारा सामान चैक किया फिर बोरे में से झाडू निकालकर आस्था की तरफ फेंका।
"कमरा साफ कर दे।"
"क्या ?" आस्था के होंठों से निकला--- “मैं साफ करूं?"
"तो क्या मैं करूंगा।" शुक्रा के माथे पर बल पड़े।
"मुझे ये सब करना नहीं आता। ये काम तो नौकर लोग करते हैं।" आस्था ने कहा।
“तू भी करना सीख ले। कल को ब्याह करके पराये घर जाना है। वहां नौकर न हुए तो बहुत तकलीफ होगी।"
आस्था कभी झाडू को देखती तो कभी शुक्रा को ।
"इसके बंधन क्यों खोले ?" उदयवीर बोला।
"विजय ने खोले हैं। शायद इसके बंधे रहने की तकलीफ नहीं देख सका होगा।"
बेदी आगे बढ़ा। उसने नीचे पड़ा झाडू उठाया और आस्था के हाथ में थमाकर बोला।
"कमरा साफ करो ।"
आस्था को उनकी बात माननी पड़ी। वह धूल से अटा कमरा साफ करने लगी।
बेदी दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया कि कहीं झाडू देने की आड़ में वह निकल न भागे। जब तक कमरा साफ होता कोई कुछ नहीं बोला। उसके बाद शुक्रा ने बोरे में से चादर निकालकर फर्श पर बिछाई और बैठ गया, बेदी भी बैठा। आस्था खड़ी रही, शुक्रा ने उसे देखा ।
"बोरे में खाना है, वो निकाल, उसमें बर्तन हैं। उनमें डाल लो । एक चादर निकालकर अलग से बिछा ले अपने लिये। तू भी खा और हमें भी खिला, जल्दी कर भूख लगी है।"
आस्था बिना किसी इन्कार के, शुक्रा के कहे काम में लग गई।
चेहरे पर गम्भीरता के भाव लिये उदयवीर बैठा और कह उठा।
"आज सुबह शांता बहन गैराज पर आई थी।"
“क्या?" बेदी के होंठों से निकला।
"शांता बहन?" शुक्रा अचकचा उठा।
आस्था की निगाह भी उनकी तरफ उठी फिर अपने काम में व्यस्त हो गई।
दोनों अविश्वास भरी निगाहों से उदयवीर को देखने लगे ।
"वो-वो तेरे पास कैसे पहुंची।" बेदी अजीब से स्वर में बोला--- "उसे कैसे पता चला कि-कि...।"
"मैंने उससे नहीं पूछा कि वह मेरे तक कैसे आ पहुंची।" उदयवीर ने गम्भीर स्वर में कहा--- “लेकिन उसे सब कुछ पता था। गैराज पर आकर उसने इस तरह बात की, जैसे सब कुछ उसके सामने हुआ हो। वह हम लोगों के नाम जानती है। वह जानती है कि डॉक्टर की बेटी को विष्णु से छीनकर हम ले आये हैं। वह सब जानती है। पूछ रही थी कि विष्णु को गोली किसने मारी। मेरे मुंह से निकल गया, मैंने नहीं मारी। लेकिन उसके पूछने पर भी नहीं बोला कि किसने मारी।”
बेदी और शुक्रा की निगाहें मिलीं।
"जिस नई मुसीबत का डर था, वही हो गई।" शुक्रा का स्वर व्याकुल हो उठा।
"पूरी बात बता, तेरी उससे क्या बात हुई ?" बेदी के होंठ भिंच गये थे ।
उदयवीर ने सारी बात बता दी
आस्था ने बर्तनों में खाना डालकर उनके सामने रख दिया था और खुद दूसरी चादर बिछाकर उस पर बैठकर खाने लगी थी। ध्यान उनकी बातों की ही तरफ था।
"वो इस लड़की को वापस पाना चाहती है।" उदयवीर ने खामोशी तोड़ी।
"ये कैसे हो सकता है? बेदी की आवाज में गुस्सा उभरा--- "डॉक्टर की लड़की हमारे पास रहेगी तो वो मेरा ऑपरेशन करके दिमाग में फंसी गोली निकाल देगा, नहीं तो इसी तरह कोशिश करते-करते मर जाऊंगा।"
"जो भी हो लड़की उसके हवाले करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।" शुक्रा ने दृढता भरे स्वर में कहा।
इन बातों के दौरान तीनों के चेहरे परेशान थे।
"अब क्या किया जाये ?" उदयवीर बोला--- "शाम को चार बजे तुमसे गैराज पर मिलने आयेगी शांता बहन। वो कहती थी, अगर तुम वहां न मिले तो वह मुझे गोली मार देगी।"
बेदी और शुक्रा की निगाहें मिलीं।
"विजय का शांता बहन से मिलना ठीक नहीं होगा।" शुक्रा बोला।
"लेकिन मिलना तो पड़ेगा।" बेदी ने होंठ भींचकर कहा--- "नहीं तो वह उदय को कुछ भी कर देगी।"
"इसका भी एक रास्ता है।" उदयवीर सोच भरे स्वर में बोला।
"क्या?" कुछ दिन के लिये गैराज पर जाना ही छोड़ दूं।"
"ऐसा करना तो और भी गलत हो जायेगा।" बेदी ने बेचैनी से कहा।
"क्यों?"
"मैं उससे न मिला, उधर तू उसे नजर न आया तो वह और भी गुस्से में आ जायेगी। जिस तरह वह गैराज तक आ पहुंची है। उसी तरह वह तेरे घर का भी पता लगा लेगी। जहां तेरी माँ-बहन है। वह उनको नुकसान पहुंचा सकती है।"
"मैं घर से माँ और बहन को भी हटा देता हूँ। उनके रहने का इन्तजाम कहीं और कर देता हूँ।"
"यह ठीक रहेगा।" शुक्रा के होंठों से निकला।
"नहीं, यह बचाव का रास्ता नहीं है। कब तक हम छिपते रहेंगे।” बेदी बोला--- "तुम ने शांता के बारे में जो बताया है उसे सोचते हुए कह सकता हूं कि वह हमारा पीछा नहीं छोड़ेगी। हम तो दौड़ ही रहे हैं। उदय की मां-बहन को भी परेशान कर देंगे। गलत बात है।"
"तो क्या तू शांता बहन से मिलेगा ?" शुक्रा ने उसे देखा ।
बेदी ने सोच भरे ढंग में आहिस्ता से सिर हिलाया।
"कोई और रास्ता न मिला तो शांता से मिलना जरूरी है।" बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा--- "मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से वो उदय को कोई नुकसान पहुंचा दे।"
"लेकिन तेरा उसके सामने जाना खतरनाक है।" शुक्रा ने दांत भींचकर कहा--- "तूने उसके भाई को विष्णु को गोली मारी है। ऐसे में शांता बहन तेरे को छोड़ने वाली नहीं। लेने के देने पड़ जायेंगे ।"
उदयवीर ने बेचैनी से पहलू बदला।
“मैं न मिला तो वह उदय को नुकसान पहुंचा देगी।” बेदी ने दांत भींचकर कहा ।
"मतलब कि मिले या न मिले, दोनों रुख से ही मुसीबत का सामना करना पड़ेगा।" शुक्रा ने कहा।
कोई कुछ न बोला, परेशान-व्याकुल निगाहों से एक-दूसरे को देखने लगे।
खामोश बैठी आस्था खाना खाते-खाते रुकी और बोली।
"ऐसे में, तुम्हारा शांता बहन से मिलना ही ठीक रहेगा।"
तीनों की निगाह आस्था की तरफ गई।
"तुमसे किसी ने राय नहीं पूछी।" शुक्रा ने उखड़े स्वर में कहा।
आस्था खाना खाने में लग गई। लेकिन बेदी उससे बोला।
"मैं उससे मिला तो वह कहेगी डॉक्टर की लड़की यानी कि तुम्हें, उसके हवाले कर दूं। जबकि मुझे तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। उससे कहीं ज्यादा जरूरत है। मेरे इन्कार पर वह मेरी भी जान ले सकती है। अगर तुम्हें उसके हवाले करता हूं तो मेरा ऑपरेशन नहीं होगा और तुम्हारी जान के लिये वह खतरा भी बन सकती है। दूसरी बात मैंने उसके भाई को गोली मारी है। इस बात को वह नहीं भूलेगी। मतलब कि मेरे को पूरा-पूरा खतरा है कि....।"
“उससे अकेले मत मिलो, अपने दोस्त को साथ ले लो।" आस्था ने बेदी को देखा--- "तुम्हारे पास रिवॉल्वर भी है। अगर तुम्हें खतरा लगे तो, तुम रिवॉल्वर ...।"
"इसके हाथ में दो रिवॉल्वरें पकड़ा दो और वह खाली हाथ हो, तब भी वह भारी पड़ेगी।" शुक्रा कड़वे स्वर में बोला ।
“तो रिवॉल्वर तुम पकड़ लो ।”
“तब भी ऐसा ही होगा। ऐसी चीजों का इस्तेमाल करना, हम जैसे लोगों के बस का नहीं है।" शुक्रा का स्वर गम्भीर था ।
आस्था कुछ नहीं बोली, खाना खाने में व्यस्त हो गई।
वहां कई पलों तक खामोशी छाई रही। हर कोई एक-दूसरे को उलझन-व्याकुल निगाहों से देखे जा रहा था। शांता से मिलते हैं तो मुसीबत, नहीं मिलते तो मुसीबत ।
आखिरकार बेदी ने गम्भीर स्वर में कहा।
“उदय, तू आस्था के पास रहेगा, मैं और शुक्रा चार बजे गैराज पर, शांता से मिलेंगे ।"
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