देवराज चौहान ने केबिन का दरवाजा खोला और भीतर झांका ।

सुमित जोशी कुर्सी पर बैठा, टांगे टेबल पर रखे, आंखें बंद किए हुए था कि दरवाजे की आवाज सुनकर उसने आंखें खोली । उसी पल देवराज चौहान ने होंठों पर उंगली रखकर उसे खामोश रहने का इशारा किया ।

सुमित जोशी के माथे पर बल पड़े।

देवराज चौहान ने उसे खामोशी से बाहर आने का इशारा किया ।

उलझन में फंसे जोशी ने कुर्सी छोड़ी और दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

जोशी बाहर आया तो देवराज चौहान ने आहिस्ता से दरवाजा बंद किया ।

"ये क्या तमाशा कर रहे हो ?" सुमित जोशी ने देवराज चौहान को घूरा ।

"जो बात तुमने मुझे कही थी, वो मैं C.B.I.वालों से कह आया हूं ।" देवराज चौहान ने कहा ।

"वो तो ठीक है, लेकिन तुमने मुझे बाहर क्यों बुलाया ?"

"नई बात पता चली है । वो दोनों C.B.I. वाले जब तुमसे मिलने आये तो टेबल के नीचे माइक्रोफोन लगा गये हैं ।"

"ओह...।" जोशी सकपकाया--- "फिर तो उन्होंने बहुत कुछ सुन लिया होगा ।"

"नहीं सुना । माइक्रोफोन तब चालू हुआ, जब मैं उनसे बातें कर रहा था ।"

"ये तो बहुत गड़बड़ वाली बात हो गई...।"

"शुक्र करो कि हमें इस बात का पता चल गया ।"

सुमित जोशी के चेहरे पर सोचें नाचती रही । फिर बोला---

"तुमने जो उन्हें बताया, उस पर उन्होंने भरोसा किया ?"

"पूरी तरह । वो तुम्हें सुबह नौ बजे कस्तूरबा गांधी मार्ग पर तब घेरेंगे, जब तुम जिम्मी से मिलोगे ।"

"और तब मैं प्रभाकर को जेल से निकाल रहा होऊंगा...।" जोशी ने मुस्कुराकर कहा ।

देवराज चौहान ने सिर हिलाया 

"तुम मेरे बहुत काम आ रहे हो...।"

"अब ये मेरा ही काम है । बेहतर होगा कि माइक्रोफोन को टेबल के नीचे से निकालकर तोड़ दो।"

"साले टेबल के नीचे चिपका गये होंगे माइक्रोफोन को । अब समझ में आया कि वो मेरे पास बात करने क्यों आये । माइक्रोफोन लगाने आये थे । तुम वहां खड़े थे । तुमने भी नहीं देखा है माइक्रोफोन लगाते हुए ?"

"नहीं देखा । मैं लाऊं माइक्रोफोन निकालकर ?"

"नहीं । उसे वहीं रहने दो ।"

"क्या मतलब ?"

"हम उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सुनायेंगे ।" जोशी मुस्कुराया--- "ताकि उनका दिल लगा रहे ।"

देवराज चौहान के होंठ सिकुड़े ।

"उनके हथियार से उन्हें ही मारेंगे ।"

"समझ गया । तुम केबिन में ऐसी बातें करोगे कि जिन्हें सुनकर वो ज्यादा से ज्यादा भ्रम में पड़ें।"

"हां ।"

"कहीं कोई चूक भी हो सकती है ।" देवराज चौहान ने कहा।

"हम सतर्क रहेंगे ।"

"अपने भाई को इस बारे में बता दो । कहीं वो तुम्हारे पास आकर कोई बात न छेड़ बैठे ।"

"ये बात तुम कह आओ उसे। मैं केबिन में जा रहा हूं ।"

■■■

देवराज वापस केबिन में, जोशी के पास पहुंचा।

"सर, मेरे लायक कोई काम हो तो कहिये ?" देवराज चौहान ने कहा ।

"शाम को छः बजे हम निकल चलेंगे । खंडाला रोड पर उस होटल के पास जाना है । रात वहीं रहूंगा । और सुबह नौ बजे तक कस्तूरबा गांधी मार्ग पर पहुंचना है ।" जोशी ने कहा ।

"मुझे याद है सर । मैं C.B.I. वालों के बारे में सोच रहा हूं...।"

"वो पागल हैं।" जोशी ने मुस्कुरा कर कहा--- "खामखाह ही मेरे पे शक करके अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं । न तो मैंने वकीलों की हत्या करवाई है, ना ही बॉडीगार्डस के एक्सीडेंट किए हैं । उनके पास गलत खबर है ।"

"वो तो यही सोचते हैं कि उनके पास सही खबर है ।"

"सोचने दो । अपनी गलती का उन्हें जल्द ही एहसास हो जायेगा ।"

"एक बात तो उन्होंने ठीक कही कि कोई आपको मारना चाहता है ।"

"मेरे कई दुश्मन होंगे ।"

"रात उन दो लड़कों से आप बाल बाल बचे । उन्होंने आपके बदले नौकर को मार दिया ।"

"हां, रात मेरी किस्मत ने साथ दिया सुरेंद्र पाल...।"

दोनों अपनी बातें माइक्रोफोन के द्वारा C.B.I. वालों को सुना रहे थे ।

"प्रभाकर का बेटा जिम्मी कैसा इंसान है ?"

"एकदम घटिया...।"

"वो आपसे कल सुबह क्यों मिलना चाहता है ?"

"उसका बाप जेल में है । वो मुझसे यही कहेगा कि उसे जेल से जल्दी आजाद करवाऊं ।"

"वो खतरनाक है, उससे आपको सतर्क रहना चाहिये ।"

"ऐसे लोगों से मेरा वास्ता पड़ता ही रहता है । सब चूहे होते हैं साले ।" सुमित जोशी कड़वे स्वर में कह उठा।

"मुझे लगता है कि रतनपुरी ने ही कल आपको मारने के लिए लड़के भेजे थे ।"

"हो सकता है ।"

इसी तरह उनकी बातें चलती रही ।

C.B.I. के कानों तक पहुंचती रही ।

शाम छः बजे सुमित जोशी ने कहा ।

"वक्त हो गया है ।" उठते हुए बोला वो--- "अब हमें चलना चाहिये ।"

"लड़की के लिए इतनी दूर जायेंगे ? कल जिसके पास गये थे, वो तो पास में ही है ।"

"वहां जाना ठीक नहीं । वो ठिकाना अब दुश्मनों की नजरों में है । आज भी वहां बस पर हमला हो सकता है ।"

"ये खतरा तो है ।"

"तुम इस बात का ध्यान रखना कि कोई मेरा पीछा ना करे ।"

"आओ ।"

"दोनों केबिन से बाहर निकले । सुमित जोशी मुस्कुराकर बोला-

"C.B.I. वाले खुश हो रहे होंगे कि उन्हें बातें सुनने को मिल रही हैं ।"

देवराज चौहान भी मुस्कुरा पड़ा ।

"मैं जरा प्रदीप से मिल आऊं । तुम रिसेप्शन पर चलो ।" कहकर सुमित एक तरफ चला गया ।

देवराज चौहान रिसेप्शन पर पहुंचा ।

रिसेप्शनिस्ट उसे देखते ही मुस्कुराई और धीमे स्वर में बोली---

"व्हिस्की पीने चलते हो सुरेंद्र पाल । मैंने अभी अपनी सहेली को फोन किया । उसका फ्लैट खाली है । वहीं चलते हैं ।"

"मैं अभी व्यस्त हूं और तुम्हें तीस की हो जाने के बाद व्हिस्की पीनी चाहिये ।"

"बेवकूफ मत बनाओ मुझे, मैं बच्ची नहीं हूं ।"

"वो तो तुम्हारी बातों से ही लग रहा है । तुम व्हिस्की पीने को तैयार हो और तुम्हारी सहेली का फ्लैट खाली है।"

"कई बार तो जगह ही नहीं मिलती । सारा प्रोग्राम खराब हो जाता है ।" वो गहरी सांस लेकर बोली--- "इसलिए मैंने उस सहेली को पटा रखा है । हर दस दिन बाद कोई-न-कोई गिफ्ट देती हूं उसे ।"

"पुरानी पापी हो ।"

"क्या बात करते हो सुरेंद्र पाल । पच्चीस की हूं मैं...।"

"शादी कर लो । सहेली के फ्लैट की जरूरत नहीं पड़ेगी ।"

"तीन महीने बाद शादी हो जायेगी ।" वो मुस्कुराई ।

"तो अभी भी सब्र नहीं...।"

"इसमें बुरा क्या है ? जरूरत है ये...।"

देवराज चौहान ने मुंह घुमा लिया ।

"चलते हो ?"

"मैं व्यस्त हूं । अभी जोशी साहब के साथ जाना है ।"

"तुम कभी फुर्सत में...।"

तभी भीतर से निकलकर सुमित जोशी वहां पहुंचा ।

"चलो सुरेंद्र पाल ।"

"चलिये सर...।"

दोनों शीशे के दरवाजे की तरफ बढ़ गये ।

वे बाहर निकले । पार्किंग में खड़ी कार में जा बैठे । ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दी ।

"मंगल ।" सुमित जोशी ड्राइवर से बोला--- "कोई मेरी कार के पास तो नहीं आया ?"

"नहीं साहब जी...।"

"तुमने किसी को कार खोलकर दिखाई हो ?"

"ऐसा कुछ नहीं हुआ ।"

"होने भी मत देना । कुछ लोग कार में माइक्रोफोन वगैरह लगा सकते हैं, मेरी बातें सुनने के लिए ।"

"समझ गया जी...।"

सुमित जोशी ने देवराज चौहान से कहा---

"प्रदीप से मिला अभी । मुझे देखते ही उसने कहा कि खतरा बढ़ गया है । C.B.I. वाले अब तो माइक्रोफोन भी लगा गए हैं । कहता है कि उसमें अच्छा किया जो देश छोड़ने की प्लानिंग कर ली ।"

देवराज चौहान चुप रहा।

"कमीने को अपनी बहुत चिंता है । मेरे बारे में नहीं सोचा कि वो तो देश से बाहर निकल जायेगा उसके बाद उसके भाई के साथ क्या होगा ? वो सिर्फ अपनी सोच रहा है । डरपोक है । जहाज जब डूबता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं ।" सुमित जोशी ने कड़वे स्वर में कहा । फिर ड्राइवर से बोला--- "बंगले पर जाना है ।"

"जी...।"

"मुझे नहीं पता था कि मेरा भाई इतना घटिया होगा । दौलत का मजा बराबर रहकर लूटा, जब खतरा सामने आया तो पायजामा उठाकर भाग लिया । लानत है ऐसे कमीने भाई पर ।"

देवराज चौहान चुप रहा।

"तुम कुछ कहते क्यों नहीं ?"

"ये तुम भाइयों की बात है । मेरा कुछ भी कहना ठीक नहीं ।"

"इतना तो कह सकते हो कि वो गलत कर रहा है ।"

"ये बात मैं पहले ही कर चुका हूं...।"

"साला-कुत्ता ।" सुमित जोशी बड़बड़ा उठा।

"तुम उसे रोक भी तो सकते हो ।" देवराज चौहान ने कहा ।

"कैसे ?"

"उसे न जाने को कहकर...।"

"मैं उस कमीने को अच्छी तरह जानता हूं, वो नहीं रुकेगा । अपना पैसा भी बाहर भेज चुका है । उसका प्रोग्राम पक्का है ।"

"तुम्हें भी चुपचाप कहीं खिसक जाना चाहिये ।"

"मैं उसकी तरह डरपोक नहीं हूं।"

■■■

प्रदीप जोशी भी बंगले पर आ गया था । वो सब बंगले के भीतर थे । जबकि देवराज चौहान कल वाले बाहरी कमरे में मौजूद था । लेटा हुआ था । सोचें दौड़ रही थी । उलझा पड़ा था । उसका फोन बजा ।

"हैलो ।" देवराज चौहान ने बात की ।

"जिम्मी से बात हो गई है । नौ बजे उससे मिलना है । आधे घंटे तक हम चलेंगे।"

"ठीक है ।"

"चाय बगैरा पी क्या ?"

"जरूरत नहीं है ।"

"जरूरत क्यों नहीं है ?" बंगले में आ जाओ । एक साथ चाय पिएंगे, फिर निकल चलेंगे ।"

देवराज चौहान बंगले में पहुंचा ।

सुमित जोशी के साथ चाय पी । इस दौरान खूबी वहीं मंडराती रही । उससे देवराज चौहान की आंखें दो-तीन बार मिली । खूबी आंखें मिलने पर हर बार मुस्कुराई थी ।

उसके बाद देवराज चौहान और सुमित जोशी कार में बाहर निकले।

"खूबी तुम पर मेहरबान है ।" सुमित जोशी कह उठा--- "तुम्हें देखकर वो कई बार मुस्कुराई, मैंने महसूस किया ।"

"मुझ पर नहीं, वो अपने पर मेहरबान है ।

"वो कैसे ?"

"वो चाहती है कि तुम पर अब कोई खतरा आये तो मैं तुम्हें न बचाऊं...। बल्कि वो तो चाहती है कि साठ लाख के चक्कर में मैं ही तुम्हें खत्म कर दूं । मुस्कुराने की मेहरबानी अपने लिए कर रही है ।"

"हां, ऐसा ही है ।"

"उसे पता है कि तुम्हारा आज भाई अपने परिवार के साथ इंग्लैंड जा रहा है ?"

"बताया मैंने...।" परन्तु उसने परवाह नहीं की ।"

"उसे तो इस बात की जल्दी है कि तुम मर जाओ और वो तुम्हारे नोट समेटे ।"

"मैं नहीं मरूंगा ।" सुमित जोशी विश्वास से कह उठा  

"मुझे तो लगता है कि तुम कभी भी मारे जा सकते हो । गोलियां चलेंगी और तुम खत्म ।"

"मैं तुम्हारी बातों से डरने वाला नहीं, देवराज चौहान ।"

"मैं तुम्हें डरा नहीं रहा । जिम्मी कहां मिलेगा ?"

"एक रेस्टोरेंट में । कुर्ला में...।"

"वहां उससे मिलने पहले गये हो ?"

"नहीं । उधर पहली बार जा रहा हूं ।"

देवराज चौहान कार के बाद बंद शीशे के बाहर देखने लगा ।

बाहर अंधेरा था । वाहनों की तीव्र रोशनियां हर पल जगमगा रही थीं ।

"मुझे कई बार यकीन नहीं होता कि तुम ही डकैती मास्टर देवराज चौहान हो ।"

"क्यों यकीन नहीं होता ?"

"तुम शरीफ लगते हो ।"

"इसलिए कि तुम्हारे साथ रहकर मेरे पास करने को कुछ नहीं है ।"

"मेरे साथ रहकर बोर तो नहीं हो रहे ?"

"तुम्हारे हालात दिलचस्प हैं। वे मुझे बोर नहीं होने दे रहे ।" देवराज चौहान ने कहा ।

सुमित जोशी मुस्कुरा पड़ा ।

मुझे पूरी आशा है कि मुसीबत आने पर तुम मुझे बचाओगे ।"

"कोशिश तो पूरी करूंगा।"

"बार-बार मेरा दिमाग प्रदीप की तरफ चला जाता है । वो ठीक नहीं कर रहा ।"

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा ।

"वो मेरे को मुसीबत में छोड़कर जा रहा है । अच्छा भाई नहीं है वो ।"

देवराज चौहान की नजरें बाहर ही रहीं ।

"मैंने हमेशा उसका ख्याल रखा, बेवकूफ मुझे खतरे में छोड़कर खुद इंग्लैंड खिसक जाना चाहता है । गलती कर रहा है।"

■■■

कार एक मामूली से रेस्टोरेंट के सामने रुकी । उसकी अपनी पार्किंग नहीं थी । कार को सड़क के किनारे फुटपाथ के पास ही रोकना पड़ा । सुमित जोशी और देवराज चौहान बाहर निकले । रैस्टोरेंट की तरफ बढ़े ।

अभी वो बाहर ही थे कि दो आदमी अंधेरे से निकलकर उनके पास पहुंचे ।

"ये जिम्मी के ही आदमी हैं ।" जोशी ने कहा ।

"तुम बाहर ही रहो ।" एक ने देवराज चौहान से कहा--- "जिम्मी को तुम्हारी सूरत पसंद नहीं है ।"

"ये मेरा बॉडीगार्ड...।" सुमित जोशी ने कहना चाहा।

"तेरे को भीतर खतरा हुआ तो तेरा बॉडीगार्ड, तेरे को बचा लेगा क्या ?" वो उखड़े स्वर में बोला--- "चल तू कार में । तेरे को कार में बिठाकर आता हूं । जिम्मी ने पहले ही मना कर दिया था कि वकील अकेला ही उसके पास आयेगा ।"

दूसरा आदमी, जोशी को लेकर रेस्टोरेंट के भीतर चला गया ।

वो देवराज चौहान को लेकर कार की तरफ बढ़ा।

"तू वकील के साथ रहकर मरेगा । छोड़ दे इसका पीछा ।" उसने देवराज चौहान को सलाह दी ।

"मैं ऐसा ही कुछ सोच रहा हूं ।"

"घटिया आदमी है वकील । कोई भी उसे मार देगा । साथ में तू भी जायेगा ।"

"मैं जल्दी ही इसकी नौकरी छोड़ दूंगा ।"

"वे दोनों कार के पास पहुंचे ।

ड्राइवर आदत के मुताबिक कार के बाहर मौजूद था ।

"अब कार में बैठ जाओ और बाहर मत निकलना । वकील जल्दी वापस आयेगा ।" उसने कहा।

देवराज चौहान ने कार में बैठने के लिए शराफत से दरवाजा खोला कि तभी चौंका । काफी पीछे, सड़क किनारे फुटपाथ के पास मोटरसाइकिल के पास दो लड़के खड़े थे ।

एक ही निगाह में देवराज चौहान ने पहचाना कि वो कल वाले ही लड़के थे । हालांकि अंधेरा था, वे कुछ दूर थे, परन्तु देवराज चौहान ने पहचान लिया था उन्हें ।

देवराज चौहान कार में बैठा ।

सुमित जोशी के लिए, वे लड़के खतरा थे । जोशी बाहर आयेगा तो वे जरूर उस पर गोलियां चलाएंगे । देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़कर फोन निकाला और जोशी का नम्बर मिलाने लगा । बात हो गई।

"क्या है ?" सुमित जोशी की आवाज कानों में पड़ी ।

"कल वाले ही दोनों लड़के, तुम्हारे बाहर आने के इंतजार में हैं ।"

"ओह, तो जरूर वे बंगले से ही पीछे होंगे ।"

"अपने को कैसे बचायेगा ?"

"तू फोन बंद कर । मैं जिम्मी से बात करता हूं ।"

देवराज चौहान ने फोन बंद कर दिया ।

वक्त बीतने लगा ।

ड्राइवर बाहर ही खड़ा था ।

उसे कार में बिठाने वाले जिम्मी का आदमी कुछ दूर टहल रहा था।

तभी देवराज चौहान ने दो आदमियों को रैस्टोरेंट से बाहर आते देखा । वो सीधे कार की तरफ ही आ रहे थे ।

देवराज चौहान ने गहरी सांस लेकर पीछे लड़कों को देखा ।

वो अपनी जगह पर मौजूद थे । जबकि देवराज चौहान चाहता था वो भाग जायें।

दोनों आदमी कार के पास पहुंचे । एक ने भीतर झांकते उससे पूछा---

"वो लड़के किधर हैं ?"

"पीछे । मोटरसाइकिल के पास खड़े हैं ।" ना चाहते हुए भी देवराज चौहान को बताना पड़ा।

वो दोनों व्यक्ति लड़कों की तरफ बढ़ गये ।

देवराज चौहान पीछे, उधर ही देखता रहा ।

दोनों लड़कों के पास पहुंचते और उन्हें जेब में से कुछ निकालते देखा ।

उसके बाद देवराज चौहान ने चारों लड़कों को नीचे गिरते देखा ।

साइलेंसर लगी रिवाल्वर का इस्तेमाल किया गया था ।

वो दोनों आदमी आगे बढ़ते गये। फिर वापस नहीं लौटे।

देवराज चौहान ने गहरी सांस ली और सीधा होकर बैठ गया । लड़के के मरने का अफसोस था उसे । मजबूरी में उसे लड़कों की मौजूदगी के बारे में जोशी को बताना पड़ा । वरना जोशी के कर्म ऐसे थे कि उसके मरने से देवराज चौहान को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ।

पांच मिनट बाद ही सुमित जोशी रैस्टोरेंट से निकलकर कार की तरफ आता दिखा ।

वो पास पहुंचा और कार में बैठ गया ।

ड्राइवर पहले ही कार में बैठ चुका था । उसने कार आगे बढ़ा दी ।

"बंगले पर चलो ।" जोशी ने ड्राइवर से कहा और मुस्कुराकर देवराज चौहान को देखा ।

देवराज चौहान खामोश रहा।

"तुमने लड़कों का अंजाम देखा ?" जोशी ने पूछा ।

"हां " देवराज चौहान ने सिर हिलाया ।

"जिम्मी ने अपने आदमी भेजे थे । क्योंकि कल सुबह मैं उसके बाप को जेल से निकालने वाला हूं ।" जोशी हंसा--- "ऐसे में वो कैसे चाहेगा कि कोई मेरा बाल भी बांका करे ।"

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा।

"तुमने आज भी मेरी जान बचाई, लड़कों के बारे में खबर देकर ।"

"उनकी खबर देनी पड़ी। मुझे...।"

"क्योंकि जगमोहन चाहिये तुम्हें ।" वो पुनः हंसा ।

"हां । जगमोहन के खातिर ही मैं तुम्हारे साथ चिपका हुआ हूं ।" देवराज चौहान ने कहा।

"एक हाथ ही दूसरे हाथ को धोता है । तुम मेरी धुलाई करो, मैं तुम्हारी करूंगा । ऐसे ही दुनिया चलती है ।"

"तुम्हें उस पुलिस कमिश्नर से जगमोहन के बारे में बात करनी चाहिये।"

"उसकी फिक्र मत करो । समझा रखा है उसे । मौका लगते ही वो वहां से जगमोहन को दौड़ा देगा ।"

■■■

बंगले पर पहुंचकर देवराज चौहान गार्डरूम में चला गया । पीछे बाथरूम था । वहां नहा-धोकर रात के कपड़े पहने तो खाने के लिए नौकर बुलाने आ गया ।

देवराज चौहान जब भीतर डाइनिंग टेबल पर पहुंचा तो खाना टेबल पर तैयार था । सुमित जोशी और खूबी वहां बैठे थे । देवराज चौहान ने महसूस किया कि खूबी का उसके प्रति मुंह फूला है । स्पष्ट था कि जोशी ने खूबी को बता दिया था कि आज भी उसने, उसकी जान बचाई है । परन्तु ये बात खूबी को क्यों पसंद आयेगी।

"तुम्हारे बच्चे नजर नहीं आ रहे ?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"उनके पेपर चल रहे हैं । वो पढ़ रहे हैं । खाना वे कमरों में ही खायेंगे ।"

"और तुम्हारा भाई ?"

"वो आज फिर बाहर डिनर लेने गया है, अपने परिवार के साथ । वो मुंबई को अच्छी तरह देख लेना चाहता है । क्योंकि कल वो इंग्लैंड जा रहा है, ये देश छोड़कर । फिर जाने उसका आना हो या ना आना हो।"

खाना शुरू किया उन्होंने ।

खूबी बिल्कुल चुप थी ।

कल की तरह खाने के बाद कॉफी का दौर चला ।

उसके बाद देवराज चौहान गार्डरूम में वापस जा पहुंचा ।

घंटे भर बाद खूबी वहां पहुंची । वो गुस्से में थी ।

"मैंने कल तुम्हें क्या कहा था सुरेंद्र पाल...?" उसने तीखे स्वर में कहा ।

"याद है मुझे...।" देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा ।

"तो तुमने आज क्यों बचाया मेरे पति को ?"

"बचाना पड़ा । वरना जो गोलियां चलती, उसमें मैं भी मारा जाता ।"

"तुम झूठ कह रहे हो ।"

"सच कहा मैंने ।" देवराज चौहान मुस्कुराया।

वो देवराज चौहान को घूरने लगी ।

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई ।

"अगर तुमने कल मेरा शहद चखा होता तो शायद तुम मेरे पति को ना बचाते...।"

"मैं शहद के बिना ही ठीक हूं...।"

"मैं तुम्हें साठ लाख के बदले, एक करोड़ दूंगी ।"

"फिर ?"

"तुम मेरे पति को रास्ते से हटा दो ।" खूबी ने धीमे स्वर में कहा ।

"मौका लगा तो मैं ऐसा ही करूंगा ।"

"मौका तुम तलाश सकते हो । मेरा पति हर वक्त तुम्हारे साथ ही रहता है ।"

"कोशिश करूंगा ।"

"एक करोड़ पाने के लिए तुम्हें फौरन मेरे पति को मार देना चाहिये ।"

"तुम्हारे बार-बार कहने से ये काम जल्दी तो होगा नहीं । थोड़ा सब्र रखो ।"

"याद है, ये काम हो जाने के बाद हम दस दिन के लिए गोवा जाकर मौज-मस्ती करेंगे । वहां तुम होगे । मैं होऊंगी । तन्हाई होगी । कितना मजा आयेगा सुरेंद्र पाल, तुम सोच सकते हो ।" खूबी ने अदा के साथ कहा ।

"हां, मैंने पहले ही सोच रखा है ।"

"फिर तो बहुत शरारती हो तुम...।"

देवराज चौहान की निगाह उसके चेहरे पर थी ।

"कल मार दोगे न मेरे पति को ?"

"मौका लगा तो ।"

"ढूंढ लेना मौका ।" वो मस्ती भरे स्वर में कह उठी--- "आज तो शहद चाट लो । लगाऊं क्या ?"

"नहीं । तुम जाओ । तुम्हारा पति देख लेगा तो, बात बिगड़ भी सकती है ।"

खूबी चली गई।

देवराज चौहान उन दोनों लड़कों के बारे में सोचने लगा कि उन्हें किसने भेजा होगा, जोशी को मारने के लिए ।

■■■

अगले दिन सुबह आठ बजे तक देवराज चौहान नाश्ता कर चुका था और चलने को तैयार था । सिर्फ सुमित जोशी के बाहर आने का इंतजार था । जोशी ने सात बजे फोन करके उसे नींद से उठाया था । और आठ बजे तक तैयार हो जाने को कह रखा था। परन्तु जोशी साढ़े आठ बजे बाहर आया । वो फोन पर बात कर रहा था ।

"हां-हां, मैं चल रहा हूं । चालीस मिनट तक जेल पहुंच जाऊंगा । तुम जल्दी क्यों करते हो ? काम मेरे पर छोड़ दिया है तो मुझ पर भरोसा करो । अगर तुम्हारे आदमियों की तरफ से गड़बड़ न हुई तो, मैं प्रभाकर को बाहर ले आऊंगा।"

"याद रख वकील ।" जिम्मी का कठोर स्वर उनके कानों में पड़ा--- "आज मेरा बाप मुझे जेल से बाहर चाहिये ।"

"मैं पूरी कोशिश...।"

"वरना तेरे जिस्म में इतनी गोलियां डाल दूंगा कि पोस्टमार्टम भी नहीं हो सकेगा ।"

"तू बात-बात पर नाराज क्यों होता है जिम्मी ?"

"मेरे बाप को बाहर ला ।"

"तू मेरे को वहीं मिलना । जैसे मैंने रात को तेरे को समझाया था...।" कहकर जोशी ने फोन बंद कर दिया और देवराज चौहान को देखकर बोला--- "हरामजादा मुझे बंधुआ मजदूर समझ रहा है...।"

"तुमने उसका पच्चीस करोड़ खाया है ।"

"तभी तो टेढ़े ढंग से बात कर रहा है कमीना ।"

वो दोनों कार में बैठे ।

कार बंगले से बाहर निकल गई ।

सुमित जोशी ने ड्राइवर को बताया कि कौन-सी जेल जाना है ।

कार सड़क पर दौड़ने लगी ।

सुमित जोशी सोच में डूबा लगा।

देवराज चौहान ने उस पर नजर मारकर कहा---

"क्या सोच रहे हो ?"

"प्रदीप के बारे में ।" सुमित जोशी ने गहरी सांस ली--- "आज वो जा रहा है । मुझे अच्छा नहीं लग रहा ।

"कोई दूसरी बात करो ।"

"वो मेरा भाई है । हम बचपन से ही साथ रहे हैं । मुझे अभी भी विश्वास नहीं आ रहा कि वो मुझे छोड़कर जा रहा है...।"

"तुम्हें इस वक्त प्रभाकर के बारे में सोचना चाहिये । वहां पर तुम फंस सकते हो ।"

"मैं झंझट में फंसा हूं और प्रदीप इन हालातों में मुझे छोड़कर जा रहा है । गलत बात है ना ?"

देवराज चौहान चुप रहा ।

"सुबह प्रदीप से बात हुई । उसे भी इस बात का अहसास है कि वो गलत कर रहा है । मेरे से माफी मांगी । कहने लगा कि वो जानता है कि उसे इस तरह नहीं जाना चाहिये । परन्तु वो मजबूर है । बकवास करता है। ऐसी क्या मजबूरी है उसे ? नाटक कर रहा है रिश्ते का । मुझे खतरों में फंसाकर खुद इंग्लैंड भाग रहा है । अब तो उससे मेरा मन खट्टा हो गया।"

देवराज चौहान ने पुनः कहा ।

"तुम्हें इस वक्त प्रभाकर के बारे में सोचना चाहिये । कोई गलती मत कर बैठना तुम ।"

"मैं गलती नहीं करूंगा । मैंने वहां खास कुछ करना ही नहीं है ।" सुमित जोशी मुस्कुराकर बोला--- "सारा काम तो भीतर के उन पुलिस वालों ने संभालना है, जिन्हें जिम्मी ने तगड़े नोट देकर खरीद रखा है । मैंने तो सिर्फ भीतर जाना है और प्रभाकर को वकीलों वाले कपड़े और काला कोट पहनाकर, अपने साथ ले आना है।"

"पकड़े गये तो ?"

"देखते हैं । लगता तो नहीं कि मैं पकड़ लिया जाऊंगा । बाकी ऊपर वाले की मर्जी ।"

"ऊपर वाले को मानते हो ?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"कभी-कभी । जब मुसीबत में फंसा होता हूं तो उसे याद कर लेता हूं ।"

"वो तुम्हारी सुनता है ?"

"अभी तक तो सुन ही रहा है । जब भी उसे से कुछ मांगा, वो उसने मुझे जरूर दिया ।"

"मुझे हैरानी है कि ऊपरवाला तुम जैसे बुरे इंसान की भी सुनता है ।" देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।

"वो सुनता है । जिस दिन तुम मुझसे मिले, उस दिन मैं इस बात को लेकर बहुत परेशान था कि मुझे एक बेहतरीन बॉडीगार्ड चाहिये । समझ में नहीं आ रहा था कि कहां तलाशूं । तब मैंने भगवान से प्रार्थना की थी कि मुझे कोई बढ़िया बॉडीगार्ड दिला दे और उसने तुम्हें मेरे पास भेज दिया ।" सुमित जोशी मुस्कुराकर बोला।

"क्या तुम्हें यकीन है कि मुझे तुम्हारे पास भगवान ने ही भेजा है ?" देवराज चौहान भी मुस्कुरा पड़ा ।

"पक्का भरोसा है इस बात का ।"

"फिर तो कोई भले वाली बात ही होगी, जो भगवान ने मुझे तुम्हारे पास भेजा ।"

जवाब में सुमित जोशी हंस पड़ा ।

"मुझे नहीं मालूम था कि तू मजाक भी करता है देवराज चौहान । बढ़िया आदमी है तू।"

और देवराज चौहान सोच रहा था कि कैसा इंसान है ये ? वकील होकर, एक अपराधी को अकेला ही दिनदहाड़े जेल से फरार करवाने जा रहा था और चेहरे पर एक शिकन तक नहीं थी । या तो ये पागल है या बहुत हौसले वाला ।

साढ़े नौ बजे कार जेल के बाहर जा रुकी ।

सुमित जोशी पास में रखा, वकीलों वाला कोट उठाता हुआ, दरवाजा खोलता बोला---

"चलता हूं देवराज चौहान । जल्दी आऊंगा । शायद एक घंटे के भीतर ही भीतर-ही-भीतर ।"

"शायद न आ सको ।" देवराज चौहान का स्वर शांत था ।

"देखते हैं क्या होता है ।" सुमित जोशी ने कहा और बांह पर काला कोट डाले जेल के दरवाजे की तरफ बढ़ गया जहां गनमैन खड़े थे । एक काला कोट उसने स्वयं पहन रखा था ।

देवराज चौहान उसे तब तक देखता रहा, जब तक कि वो जेल का 'विकेट' दरवाजा खुलवाकर भीतर नहीं घुस गया ।

देवराज चौहान के चेहरे पर सोच के भाव थे ।

वो सुमित जोशी के ही बारे में सोच रहा था कि ऐसा दिलदार बंदा अगर अंडरवर्ल्ड में होता तो अब तक तहलका मचा चुका होता। जरा भी नहीं डरता था हालातों से । जबकि कोई और होता तो अब तक डर के सूख चुका होता । शायद जोशी इस बात को मन-ही-मन स्वीकार कर चुका था कि अगर मौत आ भी जाती है तो परवाह नहीं । परन्तु जान तो सबको ही प्यारी होती है । जोशी जाने किस मिट्टी का बना था कि खुद को हर हालातों में संभाले रहता था । जो भी हो, अब देवराज चौहान को भी मजा आने लगा था जोशी के साथ रहकर । परन्तु वो इस बात को लेकर चिंतित था कि सुमित जोशी सही-सलामत प्रभाकर के साथ जेल से बाहर आ जाता है या नहीं ?

■■■

सुमित जोशी वापस भी आया और बाहर भी आया ।

करीब डेढ़ घंटे बाद उसकी वापसी हुई, तब देवराज चौहान उसके आने की उम्मीद छोड़ने लगा था ।

उसके साथ एक वकील और भी था । जिसके चेहरे पर हल्की दाढ़ी-मूंछें और आंखों पर काला चश्मा था । उसके हाथ में वकालत की मोटी किताब भी नजर आ रही थी । वो फुर्ती के साथ में जोशी से कदम से कदम मिलाकर कार की तरफ बढ़ा चला आ रहा था ।

यकीनन वो प्रभाकर ही था ।

देवराज चौहान गहरी सांस लेकर रह गया ।

सुमित जोशी ने ये कारनामा भी कर दिखाया था।

वे कार के पास पहुंचते तो भीतर बैठे देवराज चौहान ने दरवाजा खोल दिया । प्रभाकर भीतर बैठा तो जोशी ने दरवाजा बंद किया और आगे वाली सीट का दरवाजा खोलकर, ड्राइवर को चलने को कहा ।

उसके भीतर बैठते ही ड्राइवर ने कार आगे बढ़ा दी।

देवराज चौहान ने प्रभाकर को देखा, जो कि लंबा-चौड़ा हट्टा-कट्टा इंसान था । चेहरा भारी था । इस वक्त वो बहुत खुश नजर आ रहा था । भीतर बैठते ही उसने देगा चौहान को देखा और सुमित जोशी से पूछा-

"ये कौन है ?"

"मेरा बॉडीगार्ड है ।" जोशी ने बताया ।

कार आगे दौड़ चुकी थी।

"तो इसे पीछे क्यों बैठाया है ? आगे बिठा । बॉडीगार्ड आगे रहते हैं ।"

"ये पीछे ही ठीक है । कोई हमला करेगा मुझ पर तो, वो पीछे बैठे आदमी को ही मारना चाहेगा ।"

"अपना वकील समझदार है । खूब ! वैसे तेरे को डर किसका है ?" प्रभाकर हंसा ।

"रतनपुरी ने मारने की धमकी दी है । मैं उसके बेटे मक्खन का केस लड़ रहा था, उसे फांसी हो गई है।"

प्रभाकर ने सुमित जोशी को देखा ।

सुमित जोशी सीट पर बैठा, कुछ टेढ़ा हुआ पीछे बैठे प्रभाकर को ही देख रहा था ।

"तूने मेरे को जेल से निकालकर बढ़िया काम किया ।"

सुमित जोशी हौले से मुस्कुराया ।

"लेकिन सच बात तो ये है कि तू एक नम्बर का हरामजादा है । तू मेरा केस भी ठीक से नहीं लड़ा ।"

"क्या करूं मैं, तुम पर एक केस हो तो कुछ करूं, सत्ताईस केस तुझ पर पुलिस ने ठोक रखे हैं।"

"उन पुलिस वालों को तो मैं देख लूंगा । लेकिन तूने 25 करोड़ जज को देने की अपेक्षा खुद हजम कर लिए ?"

"उसी कारण तो मैंने खतरा मोल लेकर तेरे को जेल से बाहर निकाला है ।"

"तू बहुत गलत काम करता है वकील--- तू...।"

तभी सुमित जोशी का फोन बजने लगा ।

"जिम्मी कैसा है ?" प्रभाकर ने पूछा ।

"ठीक है । तेरे से बहुत प्यार है उसे । तेरी चिंता करता है ।" फोन निकाल लेते जोशी बोला।

"क्यों न करेगा, मेरा बेटा है ।"

"हैलो...।" सुमित जोशी ने फोन पर कहा ।

"मेरा बाप कहां है ?" जिम्मी की आवाज कानों में पड़ी ।

"काम हो गया है । वो जेल से बाहर है । हम उधर ही आ रहे हैं । तू वहीं मिलेगा ?"

"हां...।" जिम्मी के स्वर में खुशी के भाव आ गये--- "तूने तो कमाल कर दिया वकील...।"

"अकेला है न तू ? मैं वो जगह किसी और को नहीं दिखाना चाहता ।"

"बिल्कुल अकेला हूं । तूम कितनी देर में...?"

"दस मिनट में तेरे पास होंगे ।" कहकर सुमित जोशी ने फोन बंद किया--- "जिम्मी था ।"

"मेरी बात क्यों न कराई...।"

"वहीं चल रहे हैं । दस मिनट में तुम चीनी से गले मिलोगे ।" सुमित जोशी ने मुस्कुराकर कहा ।

देवराज चौहान शांत बैठा था।

"तेरे को पता है वकील की मेरे बाहर निकलने में जिम्मी ने सिर्फ दो करोड़ खर्चा है ।" प्रभाकर बोला ।

"सस्ते में काम निपटा लिया...।"

"अपने पच्चीस तू भूल गया ? खर्चा तो सत्ताईस का आया ।"

सुमित जोशी सकपकाया ।

"तेरे को वापस देना होगा।  वरना तेरी खैर नहीं...।"

"दे दूंगा । जल्दी वापस कर दूंगा ।"

देवराज चौहान  ने शांत निगाहों से सुमित जोशी को देखा ।

सुमित जोशी के चेहरे पर जैसे पवित्र भाव थे।

"मैंने सच में पच्चीस करोड़ दबाकर बहुत गलत काम किया ।" सुमित जोशी ने कहा--- "कई बार तो परेशानी में रातों में नींद भी नहीं आती कि मैंने इतना गलत काम क्यों कर दिया । मैंने वो सारा पैसा तुम्हें लौटाने के लिए संभाल के रखा है ।"

"जिम्मी को दे । तूने जिम्मी से लिया था ।"

"हां, उसे दे दूंगा ।"

प्रभाकर ने पुनः देवराज चौहान पर नजर मारकर कहा---

"ये विश्वासी है ?"

"पूरी तरह...।"

"ये ड्राइवर तो वो ही है, पुराना वाला ?" प्रभाकर बोला ।

सुमित जोशी ने सिर हिला दिया ।

देवराज चौहान सतर्क-सा सब कुछ देख सुन रहा था ।

"बाहर की हवा कितनी अच्छी है...।" प्रभाकर खुशी से बोला---"जेल में तो मैं पागल होता जा रहा था । तेरा क्या ख्याल है कि मैं कब बाहर निकल पाता वकील ?"

"मैंने इस बारे में सोचा नहीं कभी...।" सुमित जोशी ने धीमे स्वर में कहा ।

"मैंने सोचा है । मेरे हिसाब से मैं जेल में ही मर जाता और केस चलते रहते ।"

सुमित जोशी कुछ नहीं बोला ।

"तब तक तू तो अपने पचास करोड़ बना चुका होता ।" प्रभाकर ने कड़वे स्वर में कहा ।

"अब तू आजाद हो गया है ना--- खुशी मना...।" सुमित जोशी ने मुस्कुराकर कहा ।

"खुशी ही खुशी है । ये बता कि हम कहां जा रहे हैं ?" प्रभाकर ने एकाएक पूछा ।

"ऐसी जगह पर, जिसका इंतजाम मैंने किया है । वहां तू सुरक्षित रहेगा ।" जोशी बोला ।

"ऐसा क्यों ?"

"क्योंकि पुलिस का खतरा बहुत है । अब तेरे साथ मैं भी बंध गया हूं। तेरे को पुलिस ने पकड़ा तो ये अब आम हो जायेगी कि मैंने तेरे को जेल से बाहर निकाला है । ये बात तो पुलिस वाले भी जानते हैं, जिन पर जिम्मी ने दो करोड़ खर्च किया ।"

"तो क्या जिम्मी के पास ठिकाने नहीं रहे छिपने को ?"

"बहुत है । लेकिन कोई भी, मुखबिरी भी कर सकता है कि तू कहां है । आदमियों का क्या भरोसा ।"

"ये आईडिया किसका है ?"

"मेरा । मैं तेरे को कुछ दिन छिपाकर रखना चाहता हूं, जब तक कि मामला ठंडा नहीं हो जाता ।"

"यानी कि तुझे मेरी नहीं, अपनी चिंता है ।"

"दोनों की चिंता है ।"

"अब तक जेल वालों को पता चल गया होगा मेरे जेल से फरार होने का ?"

"नहीं चला तो एक-आध घंटे में चल जायेगा । ये वकीलों वाला कोट और दाढ़ी-मूंछें चश्मा उतार दे।"

प्रभाकर ने कार में बैठे-ही-बैठे वकीलों वाला कोर्ट, दाढ़ी चश्मा उतार दिया । जेल से बाहर आ जाने की खुशी उसके चेहरे पर फूट रही थी । शायद उसे अभी भी यकीन नहीं आ रहा था ।

कार तेजी से दौड़ी जा रही थी । सुमित जोशी, ड्राइवर को रास्ता बताता जा रहा था । दिन के साढ़े ग्यारह बज रहे थे । इसी पल जोशी का फोन बजा ।

"हैलो ।" उसने बात की ।

"तुम ठीक हो ?" प्रदीप की आवाज उसके कानों में पड़ी । वो घबराया-सा लग रहा था ।

"हां...।"

"प्रभाकर का क्या हुआ ?"

उसे बाहर निकाल लाया हूं।"

"ओह ! मतलब कि तुमने काम पूरा कर दिया, जो जिम्मी चाहता था ।" प्रदीप के स्वर में हैरानी थी ।

"हां...।"

"विश्वास नहीं होता । किसी को तुम पर शक तो नहीं हुआ ।"

"नहीं ।"

"प्रभाकर कहां है--- तुम कहां हो इस वक्त ?"

"हम दोनों साथ में हैं । इस वक्त गुप्त ठिकाने पर जा रहे हैं ।" सुमित जोशी ने कहा ।

"सावधान रहना । जिम्मी उन पच्चीस करोड़ को भूला नहीं होगा । उसका काम हो गया है । वो तुम्हें मार सकता है ।"

"मैं देख लूंगा । बाद में बात करूंगा तुमसे...।" कहकर सुमित जोशी ने फोन बंद किया ।

"कौन था ?" प्रभाकर ने पूछा ।

"मेरा भाई प्रदीप...।"

"वो साला हरामी है । पर्दे के पीछे रहता है, लेकिन तेरे से कम नहीं । कमीने हो तुम दोनों।"

"इन गालियों का क्या फायदा ।" सुमित जोशी ने मुस्कुराकर कहा--- "अपनी आजादी की खुशी मनाओ ।"

"उसके लिए सारी जिंदगी पड़ी है । पहले तेरे को जी-भर कर गालियां तो दे लूं । तीन साल से मैं जेल में बंद रहा और तूने ऐसी कोई भरपूर कोशिश नहीं की कि मैं जेल से निकल सकूं । ये भी जिम्मी की कोशिश रही।"

"जेल से तो तुझे मैं ही बाहर लाया ।"

"लाना पड़ा।  वरना जिम्मी तेरी खोपड़ी खोल देता ।"

सुमित जोशी ने गहरी सांस लेकर सामने देखा, फिर ड्राइवर से बोला---

"आगे बायीं तरफ मोड़ आ रहा है । उस पर मुड़ते ही कार रोकना । वहां जिम्मी खड़ा होगा ।"

ड्राइवर ने सिर हिलाया ।

प्रभाकर खुशी हो उठा ।

"जिम्मी-मेरा बेटा ।"

"एक मिनट बाद वो तुम्हारे पास होगा ।"

आगे जाकर ड्राइवर ने मोड़ काटा तो वहां किनारे पर एक कार खड़ी देखी।

"इस कार के पीछे ही रोको...।" जोशी बोला ।

ड्राइवर ने कार रोकी ।

तभी वहां खड़े कार का दरवाजा खुला और जिम्मी बाहर निकला ।

प्रभाकर ने फौरन दरवाजा खोला और चिल्लाकर बोला---

"जिम्मी....। आ...जल्दी अंदर आ...।"

प्रभाकर पर नजर पड़ते ही जिम्मी का चेहरा खिल उठा । वो जल्दी से भीतर बैठा । दरवाजा बंद हो गया । जोशी के इशारे पर ड्राइवर ने तेजी से कार आगे बढ़ा दी । जिम्मी के सीट पर आ जाने की वजह से देवराज चौहान को थोड़ा सिकुड़कर बैठना पड़ा । सुमित जोशी ने देवराज चौहान से कहा।

"देख तो, कोई कार पीछे तो नहीं आ रही ?"

देवराज चौहान समझ गया कि जोशी जानना चाहता है कि जिम्मी वाली कार पीछे तो नहीं है ।

देवराज चौहान ने पीछे देखा । सब ठीक था।

प्रभाकर और जिम्मी कार में ही जोरों से गले मिले ।

"समझदार हो गया है तू...।" प्रभाकर उसे अलग करता बोला--- "अपने बाप को तूने बाहर निकाल लिया ।"

"सॉरी पापा । आपको तीन साल जेल में रहना पड़ा । कुछ देर लगा दी मैंने।"

"मैंने आराम कर लिया । वरना बाहर आराम ही कहां मिलता था । सब ठीक चल रहा है ?"

"हां...।"

"बांटू और गोवर्धन का क्या हाल है ?"

"वो भी मजे से हैं । सारे धंधे वो ही संभाल रहे हैं । छः महीने से मैं आपको जैसे निकालने में लगा हुआ था ।"

"मैं तुझसे बहुत खुश हूं जिम्मी ।"

जिम्मी मुस्कुराया।

"वकील अपनी किसी जगह पर हमें ले जा रहा है ।"

"हां पापा । कुछ दिन आपको पूरी तरह छिपकर रहना होगा । आपके जेल से भागने की सुनकर पुलिस की भागा-दौड़ी शुरू हो जानी है ।"

"ये वकील भरोसे के लायक नहीं है ।"

सुमित जोशी ने मुंह फेर लिया।

"ऐसा मत कहिये पापा । इसने हमारा बहुत साथ दिया है ।" जिम्मी ने शराफत से कहा ।

"वो पच्चीस करोड़...।" प्रभाकर ने कहना चाहा ।

"छोड़िए पापा । अभी वक्त के हालातों पर चलिये...।"

"सच में तेरे में समझदारी आ गई है ।"

जिम्मी ने सुमित से पूछा---

"वो जगह कितनी दूर है ?"

"आधा घंटा लगेगा ।"

कार तेजी से दौड़ जा रही थी ।

जिम्मी ने देवराज चौहान को देखकर कहा ।

"इसकी क्या जरूरत थी...।"

"आदत-सी हो गई है बॉडीगार्ड साथ रखने की ।" सुमित जोशी बोला।

"पापा ।" जिम्मी खुशी से कहा उठा--- "आपके साथ बैठकर, मुझे बहुत अच्छा लग रहा है ।"

"जिम्मी ! मेरे बेटे ! प्रभाकर ने जिम्मी को पुनः गले से लगा लिया।

■■■

कार मुंबई से बाहर जाने वाले रास्ते पर आ गई थी । ट्रैफिक यहां न के बराबर था । हाईवे था ये ।

"तुम हमें मुंबई से बाहर ले जा रहे हो ?" जिम्मी बोला ।

"मुम्बई के भीतर ही है वो ठिकाना । बाहर नहीं जाना ।" सुमित जोशी बोला--- "दस मिनट और...।"

देवराज चौहान बेहद शांत बैठा था । कार तेजी से दौड़े जा रही थी ।

"बांटू और गोवर्धन बढ़िया ढंग से काम कर रहे हैं ?" प्रभाकर ने पूछा ।

"मेरे दोनों चाचा ईमानदार और काबिल हैं । उन्होंने मुझे काम-धंधे की बहुत बातें सिखाई हैं।"

"मैंने उनकी लगन देखकर ही उन्हें दस साल पहले उन्हें धंधे में शामिल किया था । वो दोनों शानदार हैं। कोई खास परेशानी तो नहीं आ रही धंधे में ? कोई तंग कर रहा हो ?" प्रभाकर ने जिम्मी को देखा।

"ऐसा कुछ भी नहीं है पापा । ऐसी कोई समस्या आती है तो गोवर्धन ठीक कर देता है । गोवर्धन चाचा को तो वैसे भी किसी की जान लेने में मजा आता है । जब उन्हें पता चलता है कि उन्हें किसी का शिकार करना है तो वो खुश हो जाते हैं ।"

प्रभाकर हंस पड़ा।

"और बांटू...?"

"बांटू चाचा तो हर वक्त धंधे में लगे रहते हैं । असल में सारे काम वो ही संभाल रहे हैं । ठीक से नींद लेना भी नहीं मिल पाता उन्हें ।" जिम्मी ने मुस्कुरा कर कहा--- "गोवर्धन चाचा तो उन पर यूं ही रौब डालते रहते हैं ।"

"हूं...।"

"महीना भर पहले पाकिस्तानी आई.एस.आई,. का एजेंट मिला था बांटू से...।"

"किस काम के लिए ?"

"पता नहीं । मेरा सारा ध्यान तो आपको जेल से निकालने पर था । वो दो-तीन बार मिल चुका है ।"

"हमें आई.एस.आई. के लिए कोई काम नहीं करना है ।"

"ये बात आप खुद ही बांटू से कर लेना।"

"फोन दे देना मुझे । बांटू से बात कर लूंगा ।" प्रभाकर ने सोच भरे स्वर में कहा।

एकाएक कार धीमी होने लगी ।

सुमित जोशी बेचैन-सा अपनी नजरें हर तरफ दौड़ा रहा था ।

"ये सुनसान हाईवे था । सौ की रफ्तार से वाहन दौड़ रहे थे । कोई इधर को तो कोई उधर को । सड़क के दोनों तरफ जंगल जैसी जगह थी । बाहर से ऊपर का वक्त हो रहा था। खिली धूप तेजी से जमीन पर पड़ रही थी ।

"थोड़ा आगे...।" सुमित जोशी ने ड्राइवर से कहा ।

"वकील ।" प्रभाकर बोला--- "ठिकाना भूल तो नहीं गया ?"

"नहीं...।"

"इस जगह पर ठिकाना कैसे हो सकता है ?" जिम्मी बोला ।

"अभी देख लेना ।" सुमित जोशी ने मुस्कुराकर जिम्मी को देखा, फिर सामने देखने लगा ।

मिनट भर और भी ताकि सुमित जोशी ने ड्राइवर से कहा---

"बस । यहीं रोक दे । किनारे की तरफ लगाकर।"

ड्राइवर ने कार थोड़ी-सी सड़क किनारे पर उतारकर रोक दी । इंजन बंद किया ।

"हां, ठीक है ।" सुमित जोशी दरवाजा खोलता बोला--- "चलो, नीचे उतरो । जल्दी करो । अब हमें खुले में नही रहना है।"

पहले जिम्मी निकला, फिर प्रभाकर ।

उधर का दरवाजा खोलकर देवराज चौहान भी बाहर आ गया ।

"आओ...।" जोशी उधर पेड़ों की तरफ बढ़ता कह उठा ।

प्रभाकर और जिम्मी की नजरें मिलीं ।

देवराज चौहान भी आगे बढ़ गया था ।

"यहां तो कोई ठिकाना नजर नहीं आ रहा जिम्मी ?" प्रभाकर बोला।

"ठिकाना जरूर होगा पापा । ये वकील बड़ा हारामी है । मुझे तो हैरानी है कि ये वकील कैसे बन गया ? इसे तो अंडरवर्ल्ड में होना चाहिए ।"

प्रभाकर और जिम्मी जोशी की तरफ बढ़ गये ।

"जल्दी करो...।" सुमित जोशी पलटकर बोला--- "अब तक पुलिस को पता चल गया होगा कि तुम जेल से फरार हो गये हो।"

दोनों जोशी के पास आ पहुंचे ।

देवराज चौहान उनसे चार कदम पीछे रहकर चल रहा था और आसपास देखता सोच रहा था कि यहां पर कोई ठिकाना बना पाना संभव नहीं । नजर भी नहीं आ रहा ठिकाना । आखिर जोशी करना क्या चाहता है ?

"आओ, आओ ।" आगे बढ़ता जोशी कह उठा--- "तेज चलो।"

"हमें तो यहां कोई ठिकाना नजर नहीं आ रहा ?" जिम्मी बोला ।

"मेरा ठिकाना है । तुम्हें कैसे नजर आयेगा ? बीस-पच्चीस दिन यहां रहना खामोशी से । सब ठीक हो जायेगा ? पुलिस तुम्हारी तलाश में थककर शांत हो जायेगी । खतरा कम हो जायेगा । फिर यहां से निकलना।"

"पच्चीस करोड़ जो हजम किए हैं, उसकी पूरी वसूली दे रहा है ।" जिम्मी ने कड़वे स्वर में कहा ।

"वो पच्चीस भी वापस दे दूंगा । संभाल के रखे हैं मैंने ।" आगे जाता सुमित जोशी बोला ।

"इतना शरीफ तू लगता नहीं...।"

"दिखा दूंगा कि मैं शरीफ ही हूं...।"

आसपास जंगल जैसा, झाड़ियों वाला इलाका था । सुनसान जगह ।

देवराज चौहान ने ठिठककर, पलभर को पीछे देखा ।

वे सड़क से काफी दूर आ गये थे । अब तो सामने खेत भी नजर आने लगे थे ।

देवराज चौहान ने पुनः आगे बढ़ने लगा ।

"खेतों के पार है वो जगह ?" प्रभाकर बोला ।

उसी पल देवराज चौहान चिहुंक पड़ा । उसकी आंखें फैल गई ।

आगे जाते सुमित जोशी को एकाएक उसने पलटते देखा । चेहरे पर इस वक्त दरिंदगी के भाव नजर आ रहे थे। भिंचे होंठ । आंखों में खूंखारता और हाथ में रिवाल्वर दबी थी।

तभी एक के बाद एक दो धमाके हुए ।

दो गोलियां जिम्मी की छाती में जा लगी । वो जोरों से लड़खड़ाया । फिर नीचे झुकता गया।

देवराज चौहान ठगा-सा खड़ा रह गया ।

कम से कम सुमित से उसे ऐसी आशा नहीं थी कि वो ये सब कैसे कर बैठेगा।

तभी जोशी ने एक और गोली चलाई जो जिम्मी के माथे में लगी और वो नीचे गिर गया।

प्रभाकर तो काटो तो खून नहीं। वो अवाक-सा जोशी को देख रहा था ।

"ये...तूने क्या किया ?" प्रभाकर के होंठों से फटा-फटा-सा स्वर निकला ।

सुमित जोशी ने दांत भींचकर प्रभाकर पर गोली चलाई--- जो कि उसकी छाती में लगी । प्रभाकर छाती को दोनों हाथों से थामें नीचे बढ़ता चला गया । चेहरा पर पीड़ा और अविश्वास के भाव थे।

सुमित जोशी वहशी अंदाज में आगे बढ़ा और प्रभाकर के सिर से नाल टिकाकर ट्रेगर दबा दिया ।

गोली की आवाज उभरी और प्रभाकर जमीन पर लुढ़क गया ।

शांति छा गई ।

जोशी रिवाल्वर थामें दोनों की लाशों को खा जाने वाली नजरों से देख रहा था ।

देवराज चौहान बुत की तरह खड़ा था ।

कुछ पल बीते, फिर सुमित जोशी ने दोनों को चैक किया। वे मर चुके थे । सुमित जोशी के चेहरे पर खुशी और तसल्ली के भाव उभरे । रिवाल्वर उसने वापस जेब में रखे और देवराज चौहान को देखा । चेहरे पर जहरीली मुस्कान नाच रही थी । कठोरता अब पहले से कुछ कम हो गई थी ।

"काम खत्म हुआ देवराज चौहान...।"

"तुमने ये सब करने की सोच रखी थी ?" देवराज चौहान ने गहरी सांस ली।

"हां...।"

"मुझे कल ही शक हुआ था कि तुम गलत भी कर सकते हो । परन्तु मैंने इस बारे में गंभीरता से नहीं सोचा ।"

"इसके बिना दूसरा रास्ता भी नहीं था ।"

"तुमने इन दोनों को धोखे से मारा ।"

"ये दोनों बहुत खतरनाक थे । धोखे से मारा, तभी तो सफल हो सका । वरना देर-सवेर ये मुझे मारते ।"

"तुमने जिम्मी से बात करते वक्त ही आज का प्लान बना लिया था ?" देवराज चौहान कह उठा ।

सुमित जोशी ने सहमति से सिर हिलाया । फिर कहा---

"अपनी जान बचाने के लिए मुझे ये करना पड़ा । वैसे मुझे किसी की जान लेकर खुशी नहीं होती ।"

देवराज चौहान ने सुमित जोशी के चेहरे पर निगाह मारी ।

"तुमने पहले भी इस तरह लोगों की जानें ली हैं ?"

"नहीं, ये पहली बार है । पहले मैं दूसरों से ऐसे काम करा लेता था।"

"तुम फंस जाओगे।  अपनी रिवाल्वर से तुमने इन दोनों को मारा है ।"

"ये रिवाल्वर रजिस्टर्ड नहीं है । खरीदी हुई है ।" कहकर सुमित जोशी ने जेब से रिवाल्वर निकाली और उसे अच्छी तरह साफ करके उंगलियों के निशान मिटाये और उसे लाश के पास फेंककर मुस्कुराया--- "अब तो ठीक है देवराज चौहान ?"

"तुमने इन्हें इसलिए मारा कि पच्चीस करोड़ वापस ना देने पड़ें?"

"ये पच्चीस करोड़ वापस पाकर भी मुझे मार देते । क्योंकि मैंने इनसे पच्चीस करोड़ को धोखे से हड़पा था । जानता हूं इन दोनों को । जिम्मी तो मुझे मारे बिना ना रहता। मैंने इन्हें मारकर खुद को बचा लिया है।"

देवराज चौहान ने गहरी सांस ली । बोला---

"तुमने मुझे नहीं बताया कि तुम क्या करने वाले हो ?"

"क्या जरूरत थी ! मुझे खुद पर भरोसा था कि मैं सब संभाल लूंगा । कहीं चूकता तो तुम अवश्य संभाल लेते।"

"जो भी हो, तुमने गलत किया ।"

"बेवकूफ हो । ये मुझे मार देते तो क्या वो ठीक रहता ?"

"पता नहीं...।" मुस्कुरा पड़ा देवराज चौहान--- "लेकिन तुम खतरनाक हो जोशी ।"

सुमित जोशी ने देवराज चौहान को देखा ।

"मैं नहीं जानता था कि तुम इस हद तक खतरनाक हो ।" देवराज चौहान ने पुनः कहा ।

"क्रिमिनल वकील हूं । ऐसे लोगों से मिलते-मिलते मैं भी इन जैसा हो गया ।" सुमित जोशी मुस्कुरा पड़ा--- "लेकिन अब सब ठीक कर लूंगा।  रतनपुरी ही अब बचा है, जो मेरी जान लेना चाहता है ।"

"तो तुम रतनपुरी को भी मारोगे ?"

"जो भी हो, उससे खुद को बचाना तो पड़ेगा ही । देखूंगा कि क्या होता है । क्या कर सकता हूं । यहां से निकलो ।"

दोनों पलटे और सड़क की तरफ बढ़ गये।

"तुमने सच में बहुत हौसले वाला काम किया । जरा भी घबराए नहीं ।"

"मैं घबराता तो जिम्मी मुझे मार देता । मैं सोच चुका था कि कोई बात किए बिना ही गोली मार दूंगा । वैसा ही किया ।"

"तुम चूकते तो जिम्मी उसी पल तुम्हें मार देता ।"

"मैं नहीं चूका ।" सुमित जोशी गंभीर था--- "मैंने खुद को बचा लिया ।"

"तुम उसके पच्चीस करोड़ के पूरी तरह मालिक बन गये ।"

"बात अब पच्चीस करोड़ की नहीं थी । जिंदगी और मौत की बात थी मेरे लिए ।"

दोनों सड़क किनारे खड़ी कार में पहुंचे । भीतर बैठे ।

"वापस घुमाओ और ऑफिस चलो ।" जोशी ड्राइवर से बोला ।

ड्राइवर ने ऐसा ही किया ।

"गोलियों की आवाजें आई थीं यहां तक ?" जोशी ने ड्राइवर से पूछा ।

"मध्यम-सी।" ड्राइवर ने कहा।

"मतलब कि ज्यादा नहीं । ठीक है ।" सुमित जोशी ने आंखें बंद करके सीट की पुश्त से सिर टिका लिया ।

देवराज चौहान ने जोशी के चेहरे पर निगाह मारी । वो शांत लग रहा था ।

देवराज चौहान शराफत का चोला ओढ़े इस शरीफ वकील के बारे में ही सोच रहा था ।

एकाएक उसने आंखें खोलीं और देवराज चौहान को देखकर मुस्कुराकर बोला ।

"जब मैंने जिम्मी पर गोली चलाई तो तुम्हें कैसा लगा ?"

"मुझे लगा कि तुम पागल हो गये हो।"

"हैरान हो गए होगे तुम तो कि जोशी ने ये क्या कर दिया ?" वो हंस पड़ा ।

"हां ।" क्योंकि तुम ऐसा कुछ करोगे, मुझे आशा नहीं थी। ये तब मैंने सोचा भी नहीं था ।" देवराज चौहान ने कहा ।

सुमित जोशी ने पुनः आंखें बंद कर लीं।

तभी देवराज चौहान का फोन बजने लगा । उसने बात की ।

"हैलो...।"

"सुरेंद्र पाल, मैं रमेश सिंह-C.B.I...।"

देवराज चौहान संभला । चौंका । फिर कह उठा---

"ओह चाचा जी, कैसे हैं आप ? अस्पताल जाकर डॉक्टर को देख लिया ?"

सुमित जोशी ने देवराज चौहान को देखा ।

"तुमने हमें गलत खबर दी कि कस्तूरबा गांधी मार्ग पर वकील जिम्मी से मिलने वाला है।" रमेश सिंह की आवाज कानों में पड़ी--- " वहां पर कुछ नहीं हुआ, दोनों में से कोई भी नहीं पहुंचा...।"

"चाचा जी, मैं घंटे भर बाद आपको फोन करूंगा ।" देवराज चौहान ने कहा और फोन बंद कर दिया ।

"कौन था ?"

"C.B.I. ।"

"ओह, उन्हें तो मैं भूल ही गया था ।" सुमित जोशी ने माथे पर हाथ मारा ।

"अब वो मेरे को कह रहे हैं कि मैंने गलत खबर दी ।"

"वो तो कहेंगे ही, परन्तु मुझे विश्वास है कि तुम उन्हें संभाल लोगे।"

"तुम अपने साथ-साथ अब मुझे भी झंझटों में फंसाने लगे हो ।" देवराज चौहान बोला ।

"थोड़ा बहुत असर तो तुम पर होगा ही...।"

देवराज चौहान गहरी सांस लेकर रह गया ।

"पहली बार तो मुझे शानदार बॉडीगार्ड मिला है ।" सुमित जोशी मुस्कुरा पड़ा ।

"मेरी मजबूरी है तुम्हारे साथ रहना ।" देवराज चौहान बोला--- "जगमोहन के बारे में पता करो ।"

"वो ठीक है । उसकी फिक्र मत करो ।"

"कमिश्नर से कहो कि उसे जल्दी निकाले।"

"बार-बार कहना ठीक नहीं । जब भी उसे मौका लगा, वो काम कर देगा ।"

कार तेजी से दौड़ी जा रही थी ।

"बीच में शीशे की दीवार खड़ी करो, ताकि ड्राइवर बातें न सुन सके...।"

जोशी ने बटन दबाया तो बीच में दीवार खड़ी हो गई ।

"इस ड्राइवर को सब पता रहता है कि तुम क्या करते फिर रहे हो ?" देवराज चौहान बोला ।

"हां--- तो ?"

"ये तुम्हारे लिए खतरा बन सकता है ।"

"इसकी चिंता मत करो । ये चार खून कर चुका है। और मैंने इसे बचाया है । ये अहसानमंद है मेरा ।"

देवराज चौहान ने होंठ सिकोड़कर उसे देखा ।

"क्या देख रहे हो ?"

"जब तुम्हें लगेगा कि ड्राइवर तुम्हारे लिए खतरा बन सकता है तो तुम इसे भी मरवा दोगे ।"

"अभी वो वक्त नहीं आया ।"

"लेकिन एक दिन तुम इसकी हत्या करवा दोगे ।"

"पता नहीं...।"

"तुम्हारा विश्वास बनना भी खतरनाक है । पहले तुम लोगों को अपना विश्वासी बनाते हो । जब वो तुम्हारे राजदार हो जाते हैं, तुम्हें लगता है कि उनका मुंह खोलना तुम्हें फंसा न दे तो तुम उनकी हत्या करवा देते हो ।"

"बात तो ऐसे कर रहे हो, जैसे कि तुम दूध के धुले हो देवराज चौहान ?"

"मैं तुम्हारी तरह खामखाह लोगों की जानें नहीं लेता रहता ।" देवराज चौहान ने कहा ।"

"लेकिन तुमने भी बहुत कुछ किया है ।"

"मेरे...तुम्हारे में बहुत फर्क है ।"

"सच में ।" सुमित जोशी ने मुस्कुराकर गहरी सांस ली--- "बहुत फर्क है। तुम जाने-माने डकैती मास्टर और मैं...।"

"खरगोश की खाल में छिपे भेड़िये...।"

सुमित जोशी हंस पड़ा ।

"मैं जैसा हूं वैसा नजर आना चाहता हूं, परन्तु तुम लोगों को धोखा देने के लिए खाल ओढ़कर रहते हो ।"

"शरीफ हूं तो शरीफ नजर आना भी जरूरी है।"

"लानत है तुम्हारी शराफत पर ।" देवराज चौहान बड़बड़ा उठा ।

"तुम मेरे बॉडीगार्ड हो । मेरे बारे में अच्छे विचार रखो ।" सुमित जोशी ने कहा ।

"मजबूरी के सौदे में फंसा हूं, वरना बॉडीगार्ड बनने का मुझे कोई शौक नहीं है ।"

"फंसे पड़े हो, यही न ?" जोशी ने मुस्कुराकर उसे देखा ।

"हां ।"

"मैं जगमोहन को पुलिस के हाथों से निकालूंगा... ये छोटा काम नहीं है।"

"अपने केबिन में पहुंचकर ठीक से बात करना । माइक्रोफोन को मत भूल जाना जो...।"

"याद है, मुझे भूलने की आदत नहीं है । वकील हूं, बेवकूफ नहीं हूं...।"

■■■

ये दोनों ऑफिस में, जोशी एंड जोशी एसोसिएट्स पहुंचे ।

सुमित जोशी अपने केबिन में चला गया ।

देवराज चौहान रिसेप्शन पर ठिठका । रिसेप्शनिस्ट उसे देखकर मुस्कुराई । देवराज चौहान भी मुस्कुराया ।

"सुनो...।" रिसेप्शनिस्ट ने धीमे स्वर में उसे पुकारा ।

देवराज चौहान उसके पास पहुंचा ।

"आज रात चलोगे ,सहेली के फ्लैट पर, दोनों व्हिस्की पिएंगे ।" वो आहिस्ता से बोली ।

"आज तो बिल्कुल नहीं ।"

"क्यों ?"

"कल पी थी । वो ही नहीं उतरी ।"

"अच्छा, किसके साथ पी ?" उसने दिलचस्पी से पूछा ।

"अकेले ही...।"

"ये तो गलती की । मेरे साथ पीते तो हाथों-हाथ उतार भी देती । तुमसे बहुत मेहनत करवाती ।" उसने अर्थपूर्ण स्वर में कहा ।

देवराज चौहान गहरी सांस लेकर रिसेप्शन से पीछे हट गया।

"अफसोस हो रहा होगा कि बीती रात मेरे साथ नहीं थे ।" रिसेप्शनिस्ट मुस्कुराई--- "कोई बात नहीं, आज रात सही...।"

"भूल में हो । मैं दस दिन में एक बार ही पीता हूं ।"

"इतने भोले मत बनो । दस दिन में एक बार तो कुछ भी नहीं होता ।"

देवराज चौहान की तरफ भीतर की तरफ बढ़ गया।

केबिन में पहुंचा । सुमित जोशी कुर्सी पर पसरा पड़ा था ।

"आओ सुरेंद्र पाल ।" जोशी कह उठा--- "आज का तो सारा दिन खराब हो गया । रात उसने इतनी पिला दी कि कब सुबह नौ बजे तक आंखे ही ना खुली । साली ने जानबूझकर मुझे ज्यादा पिलाई थी ।" कहकर जोशी हंस पड़ा था।

देवराज चौहान समझ गया कि जोशी, C.B.I. वालों को ये बातें सुना रहा है ।

"मैं तो बाहर कार में गहरी नींद में सोया ।"

"तुम्हें सुबह मुझे उठा देना चाहिए था ।" सुमित जोशी ने कहा ।

"मैंने एक बार भीतर आने की कोशिश की थी सर । परन्तु मैडम ने ये कहकर रोक दिया कि साहब ने उठाने को मना किया है ।"

"शरारती है वो...।"

"आज क्या काम है सर ?" देवराज चौहान ने पूछा ।

"कुछ नहीं । कहीं भी नहीं जाना मुझे । तुम्हें छुट्टी चाहिये तो ले सकते हो ।" सुमित जोशी ने कहा ।

"मुझे कोई काम नहीं कि छुट्टी लूं ।"

देवराज चौहान केबिन से बाहर निकला और रिसेप्शन में पहुंचा । रिसेप्शनिस्ट वहां नहीं थी । देवराज चौहान ने रमेश सिंह का नम्बर मिलाया । तुरन्त ही बात हो गई ।

"कहां हो ?" देवराज चौहान ने पूछा।

"बाहर...।"

"मैं आ रहा हूं...।" कहकर देवराज चौहान ने फोन बंद करके जेब में रखा और शीशे के दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

देवराज चौहान ऑफिस के बाहर पहुंचकर  ठिठका और सिगरेट सुलगाते हुए उसने देख लिया कि रमेश सिंह और दयाल की कार किधर है । वो उसी तरफ बढ़ गया । पास पहुंचने पर पिछला दरवाजा खोल दिया गया । वो भीतर जा बैठा ।  दरवाजा बंद हो गया । देवराज चौहान ने सिगरेट का कश लेकर दोनों को देखा ।

दोनों उसे घूर रहे थे ।

कल की तरह रमेश सिंह आगे था और दयाल पीछे वाली सीट पर बैठा था ।

"अब इसमें मेरा क्या कसूर कि मेरी खबर गलत निकली मैंने जो सुना बता दिया...।" देवराज चौहान बोला--- "रात वकील ने उस लड़की के साथ बहुत पी ली थी, सुबह उसकी आंख ही नहीं खुली । सारा प्रोग्राम गड़बड़ा गया ।"

"हमें दस मिनट पहले एक और खबर मिली है...।"

"क्या ?"प्रभाकर जेल से भाग गया है ।"

"प्रभाकर ?"

"जिम्मी का बाप...।"

"ओह ! अच्छा...।" देवराज चौहान ने सिर हिलाया--- "इससे मेरा क्या मतलब ?"

"वकील सुबह कहां था ?" दयाल ने पूछा ।

"बताया तो, वो खंडाला रोड पर एक फ्लैट में लड़की के पास था...और मैं बाहर कार में था ।"

"पक्का ?"

"मैं तुम लोगों से झूठ नहीं बोल सकता । मुझ पर शक मत करो ।"

दयाल ने रमेश सिंह से कहा---

"इसका मतलब प्रभाकर को बाहर निकालने में वकील का हाथ नहीं।"

"एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि उधर प्रभाकर जेल से भागने वाला था, इधर जिम्मी, नौ बजे वकील से मिलने जा रहा था, जबकि वहां अगर वकील नहीं पहुंचा तो जिम्मी को तो आना चाहिये था ।"

"तुम्हारा मतलब इसने हमें गलत खबर दी है ?"

"लगता तो ऐसा ही है । जिम्मी नहीं पहुंचा वहां, क्योंकि तब वो जेल से अपने बाप को निकालने में व्यस्त होगा ।"

"मैंने सही खबर दी है ।" देवराज चौहान बोला ।

"अगर जिम्मी कस्तूरबा गांधी मार्ग पर पहुंचा होता तो हम।

"तुम मुझ पर शक कर रहे हो । जबकि मैं शरीफ शहरी का फर्ज निभा रहा हूं ।" देवराज चौहान उखड़ा ।

"तो फिर जिम्मी भी वहां क्यों नहीं पहुंचा ?"

"अब मैं क्या कहूं । उन्होंने फोन पर बात करके प्रोग्राम बदल लिया होगा ? तब मैं वकील के पास नहीं रहा होऊंगा । हर वक्त तो मैं उसके साथ चिपका नहीं रह सकता ।" देवराज चौहान ने कहा--- "मैंने जो सुना, वो तुम लोगों को बता दिया था।"

"ठीक है ।" दयाल ने कहा--- "हो सकता है, उनका प्रोग्राम बदल गया हो और तुम्हें पता न हो ।"

"यही हुआ होगा।" देवराज चौहान ने कहा ।

"वकील ने तुमसे, प्रभाकर की कोई बात की ?"

"नहीं ।"

"तो उसे प्रभाकर के भागने का अभी पता नहीं है ।" दयाल ने रमेश सिंह से कहा ।

"जल्दी पता चल जायेगा।"

"तुम कोई और खबर बताओ सुरेंद्र पाल...।"

"अभी तो और कुछ पता नहीं ।"

"पता लगते ही हमें बताना ।"

"बाद में वो बात भी आगे-पीछे हो गई तो तुम लोग कहोगे मैंने गलत खबर दी है ।"

"नहीं कहते । तुम खबर देना ।"

"ये ठीक है । आज कुछ नोट मिलेंगे कि नहीं ?"

रमेश सिंह और दयाल की नजरें मिलीं।

"दे दो...।" रमेश सिंह ने कहा ।

दयाल ने पांच सौ के दो नोट निकालकर देवराज चौहान को थमा दिए ।

देवराज चौहान ने मुस्कुराकर नोटों को फौरन जेब में डाला ।

"मैं तुम लोगों को बढ़िया खबर दूंगा।"

"वकील के साथ चिपके रहो । खबर खुद ही मिल जायेगी । हम जान चुके हैं कि वो गलत कामों में उलझा पड़ा है । सबूत की जरूरत है, बस ।"

देवराज चौहान कार से निकलकर जोशी एंड जोशी एसोसिएट्स के ऑफिस की तरफ बढ़ गया । उसे इस बात की तसल्ली थी कि C.B.I. वालों ने उस पर किसी तरह का शक नहीं किया । उसकी बातों को सामान्य ढंग से लिया ।

देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश किया तो रिसेप्शनिस्ट चाय पीती दिखी ।

"सुरेंद्र पाल ।" वो बोली--- "मालिक प्रदीप सर के केबिन में हैं ।"

देवराज चौहान सिर हिलाकर आगे बढ़ा । रिसेप्शन के पास से निकला तो आहिस्ता से बोली---

"मान जाओ न, व्हिस्की पीने के लिए...।"

"तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो ?" देवराज चौहान ठिठका--- "यहां और भी तो ढेरों लोग हैं ।"

"मुझे बड़ी उम्र वाले पसंद हैं ।"

"बड़ी उम्र का तो जोशी है ।"

"उसे रहने दो । हर वक्त गुस्से में ही रहता है । तुम ठीक ।" वो मुस्कुराई।

"फिर तो उम्र बीत जायेगी तुम्हारी, इंतजार पूरा ना होगा ।" कहकर देवराज चौहान आगे बढ़ गया ।

वो प्रदीप के केबिन में पहुंचा ।

सुमित जोशी वहां बैठा था । उसे देखते ही कह उठा---

"मैंने सोचा इस केबिन में बैठना ठीक है । यहां माइक्रोफोन नहीं है ।"

"इस तरह तो C.B.I. वालों को पता चल जायेगा कि तुम्हें माइक्रोफोन का ज्ञान हो गया है कि...।"

"थोड़ा-बहुत उधर भी बैठ जाऊंगा । उन्हें शक नहीं होगा । तुम कहां गये थे ?"

"C.B.I. वालों से मिलने...।"

"कमीनों ने बाहर ही अपना दफ्तर खोल रखा है ।" जोशी ने मुंह बनाया--- "क्या बात हुई ?"

"वो सोच रहे थे कि मैंने उन्हें गलत खबर दी है । परन्तु मैंने समझा दिया कि तुम्हारा और जिम्मी का प्रोग्राम बदल गया था ।"

"और ?"

"उन्हें खबर मिल गई है प्रभाकर के जेल से फरार होने की ।"

"अच्छा...फिर ?" सुमित जोशी मजे वाले ढंग से कह उठा ।

"फिर कुछ भी नहीं । वो जानने की कोशिश कर रहे थे कि इस काम में तुम्हारा हाथ न हो ।"

"तसल्ली करा दी उनकी ?"

"करा दी ।"

"साले खमखाह बाहर जमे बैठे हैं ।"

देवराज चौहान बैठा और सुमित जोशी को देखने लगा ।

"कोई बात ?" सुमित जोशी बोला ।

"नहीं। मैं सोच रहा हूं कि तुम बहुत सारे अंदाज में कितने खतरनाक खेल खेलते हो । इस वक्त तुम्हें देखकर कोई कह नहीं सकता कि तुम प्रभाकर और जिम्मी जैसे अंडरवर्ल्ड का दादाओं को खत्म करके आ रहे हो"

"कोई नहीं कह सकता ।" सुमित जोशी शान से मुस्कुराया ।

"नहीं...।"

"तो मैं फंस भी नहीं सकता । आधे से ज्यादा लोग तो अपराध करने की घबराहट की वजह से पकड़े जाते हैं ।" सुमित जोशी छाती फुलाकर कह उठा--- "लेकिन मैं घबराता नहीं । पीछे की नहीं सोचता । आगे की सोचता हूं ।"

"लेकिन तुम फंसोगे ।"

"कैसे ?"

"कभी तो पहाड़ के नीचे आओगे।"

"मैं नहीं आऊंगा ।"

"कभी-न-कभी सब आते हैं । बचता कोई भी नहीं । जो बच जाता है, समझो वो भी नहीं बचता ।"

"लेकिन मुझे कुछ नहीं होगा । मैं बुढ़ापे में तुमसे मिलकर ये बात पूछूंगा ।"

देवराज चौहान मुस्कुराकर रह गया।

"आज मैं खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं । मैंने अपने पर से मौत का खतरा हटा दिया ।"

"रतनपुरी को तुम भूल रहे हो...।"

"रतनपुरी जैसे कई हैं, जो मुझे मारना चाहते हैं । इन सबकी परवाह करने लगूं तो वैसे ही मर जाऊंगा ।" सुमित जोशी ने सिर हिलाकर कहा--- "लेकिन रतनपुरी परवाह करने लायक है । उसे हवा में नहीं उड़ाया जा सकता है ।"

"एक का खतरा टला तो दूसरे का सिर पर सवार हो गया । ये तुम्हारी जिंदगी है ।"

"सब ठीक हो जायेगा । रतनपुरी का मामला भी संभाल लूंगा ।" सुमित जोशी ने जैसे अपने आपसे कहा।

"तुम्हें सोचना चाहिए कि वो दो लड़के कौन थे जो मारने के लिए तुम्हारे पीछे थे ।"

"वो तो मर गये । अब तो ये बात जानी नहीं जा सकती ।"

"जिसने उन दोनों को तुम्हारे पीछे लगाया था, वो अब किसी और को तुम्हारे पीछे लगा सकता है ।"

"वो रतनपुरी के भेजे...।"

"नहीं, वो लड़के रतनपुरी के भेजे नहीं हो सकते । वो गैंगस्टर तुम्हें इतने हल्के ढंग से नहीं लेगा । उसने तुम्हें फोन करके सतर्क किया है कि वो तुम्हें मार देगा । ऐसे में वो तुम्हारा कोई पक्का इंतजाम करेगा ।"

सुमित जोशी ने चिंतित निगाहों से देवराज चौहान को देखा ।

"तुम गलत हो सकते हो देवराज चौहान । वो लड़के रतनपुरी के भेजे हो...।"

"इस बात से तुम खुद को तसल्ली देना चाहते हो तो यही सोच लो । मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता ।" देवराज चौहान ने कहा ।

सुमित जोशी व्याकुल-सा उसे देखता रहा ।

तभी इंटरकॉम बजा ।

"कहो...।" सुमित जोशी ने रिसीवर उठाकर कहा ।

"सर, पुलिस वाले आपसे मिलने आये हैं ।"

"मुझसे ?" सुमित जोशी बुरी तरह चौंका--- "पुलिस वाले ?"

"जी सर । इस वक्त रिसेप्शन में हैं ।"

देवराज चौहान की निगाह सुमित जोशी पर टिक गई थी ।

"दो मिनट बाद उन्हें मेरे केबिन में भेजना । मैं वहीं जा रहा हूं ।" कहकर जोशी ने रिसीवर रखा--- "पुलिस आई है ।"

"तुम मुम्बई के मशहूर क्रिमिनल लॉयर हो ।" देवराज चौहान मुस्कुराकर बोला--- "पुलिस के लिए आसान नहीं है तुम पर हाथ डालना । फिर तुम्हारे पास पुलिस का आना बड़ी बात भी नहीं है। तुम इसलिए घबरा रहे हो कि सुबह तुमने प्रभाकर को जेल से निकाला और उसके बाद मुझे प्रभाकर और जिम्मी कि तुमने हत्या कर दी ।"

"बात तो ठीक है तुम्हारी...।"

"कोई ये साबित नहीं कर सकता कि तुमने ही...।"

"मुझे मत समझाओ ।" मुस्कुराया सुमित जोशी--- "ये बातें तो मैं लोगों को समझाता हूं ।"

देवराज चौहान मुस्कुराया ।

"अभी तो उन लोगों की लाशें भी नहीं मिली होंगी ।" सुमित जोशी बड़बड़ा उठा--- "प्रभाकर, जिम्मी की हत्या से मेरा कोई वास्ता नहीं है । मैं तो वकील हूं । शरीफ और इज्जतदार शहरी और कानून को जानने वाला ।"

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