छब्बीस दिन

अगले दिन सुबह बेदी और शुक्रा के बीच नाश्ते के दौरान बात हुई। बेदी ने उसे रात प्रिया के साथ की बात बताकर कहा।

“मुझे पूरा विश्वास है कि प्रिया जान चुकी है, मेरी ओबराय के साथ बात हो गई है, उसे मारने की या फिर ऐसा कुछ शक है उसे।" बेदी ने धीमे से एक-एक शब्द चबाकर कहा--- "वरना वो आते ही चिपकने के बहाने, मेरी जेबें टटोलकर डोरी न निकालती और जाते वक्त डोरी वापस जेब में न डाल जाती।"

शुक्रा के होंठ सिकुड़ गए।

"उसे कैसे मालूम हुआ कि तुम्हारे पास कोई डोरी है।" शुक्रा बोला ।

"दिन में मैंने उसे कहा था कि आज बाजार से डोरी लाऊंगा, जिससे ओबराय की हत्या करने में आसानी होगी।" बेदी ने बेचैन परेशान स्वर में कहा--- "समझ में नहीं आता कि ये सब क्या हो रहा है ?"

"इस हरकत के अलावा, किसी और बात पर तुम्हें प्रिया पर कोई शक हुआ ?"

"नहीं। वैसे तो वो, वैसे ही थी, जैसे रात को आने पर होती है।"

"मेरे ख्याल में तुम्हें गलतफहमी हुई है।" शुक्रा सिर हिलाकर कह उठा।

"गलतफहमी ?"

"हां। वो डोरी तुम्हारे गाउन की जेब में ही होगी परन्तु रात के अंधेरे में तुम ठीक तरह जेब चैक नहीं कर सके और बाद में जब गाउन पहनकर हाथ डाला तो, पतली सी डोरी का छोटा सा गुच्छा तुम्हारे हाथ में आ गया।"

बेदी, देखता रहा शुक्रा को ।

शुक्रा उसके जवाब के इन्तजार में खामोश था।

"तुम्हारी बात से दिल को तसल्ली दी जा सकती है।" बेदी गम्भीर बेचैन था--- "अगर मैं जबर्दस्ती खुद को ये समझाना चाहूं कि सब ठीक है। प्रिया को मुझ पर किसी तरह का शक या..."

"मतलब कि मेरी बात तुम्हें नहीं जंची।" शुक्रा कह उठा।

"बेशक उस वक्त कमरे में गहरा अंधेरा था। तब मैं हत्या करने की तैयारी कर रहा था। लेकिन पूरी तरह अपने होशो-हवास में था। संयत था। मैंने बहुत अच्छे ढंग से गाउन की दोनों जेबें चैक की। तब अगर सुई भी जेब में कहीं पड़ी होती तो वो भी मिल जाती।" बेदी दृढ़ता भरे स्वर में कह उठा--- "फिर वो तो डोरी थी। मेरा यकीन मानो, किसी तरह प्रिया समझ चुकी है कि मैं उसकी जान ले सकता हूं।"

शुक्रा दो पल खामोशी के बाद कह उठा।

"ये बात सच है तो, तब भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा।"

"वो कैसे?"

"प्रिया तुम्हें छः लाख दे चुकी है। जो कि उसे वापस मिलने से रहे। तुम्हारे खिलाफ वो इसलिए कुछ नहीं कर सकती कि तुम चिल्ला-चिल्लाकर कहना शुरू कर दोगे कि उसने, तुम्हें ओबराय की हत्या करने के लिए पैसे दिए। अभी तो सब कुछ खामोशी से हो रहा है। इसलिए ओबराय भी अपना काम खामोशी से कर रहा है। बात सबको पता चल गई तो ओबराय जो भी करे, परन्तु सारा नुकसान प्रिया को ही होगा। इस बात से प्रिया भी बाखूबी वाकिफ होगी कि तुम्हें कुछ कहकर उसे नुकसान ही होगा।"

"हां। ये बात तो तुम्हारी ठीक है।"

"अभी हवा का रुख देखो। हो सकता है, तुम्हें कोई गलतफहमी न हुई हो।"

जवाब में बेदी गहरी सांस लेकर रह गया।

"आज क्या करना है ?"

"देखते हैं।" बेदी ने कहा--- "कुछ देर बाद तुम्हें ओबराय और प्रिया से मिलवाऊंगा। इसी बहाने बंगले के भीतर के रास्तों को भी जान लोगे।"

■■■

तब साढ़े दस का वक्त होगा, जब बेदी, शुक्रा के साथ, बंगले के भीतर, प्रिया के बेडरूम के दरवाजे पर पहुंचा और दरवाजा थपथपाया।

"कम इन।"

प्रिया का स्वर कानों में पड़ा तो बेदी दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गया। शुक्रा साथ था।

प्रिया नहा कर हटी थी और सफेद रंग का स्कर्ट ब्लाउज पहने थी। चेहरे पर किसी भी तरह का मेकअप नहीं था। लम्बे-गीले, झूलते बाल कूल्हों को पूरी तरह ढांपे हुए थे ।

शुक्रा ने उसे पहली बार देखा था और देखता रह गया। बेदी ने भी उसे इन कपड़ों में पहली बार देखा था। उसे तो वो हर बार, नई लगती थी।

प्रिया के चेहरे पर मुस्कराहट फैल गई।

“ये तुम्हारा साथी है?"

प्रिया के शब्दों पर बेदी के मस्तिष्क से उसकी खूबसूरती की परत हटी।

"हां।" बेदी ने जल्दी से कहा--- "मेरी ही तरह खतरनाक है। ओबराय अब ज्यादा घंटे जिन्दा नहीं रहेगा।"

प्रिया ने सिर से पांव तक शुक्रा को देखा।

"अपने साथी को होश में लाओ।" शुक्रा की निगाहों को भांपकर, प्रिया मुस्कराकर बोली।

"होश में हूं मैं।" शुक्रा ने शांत स्वर में कहा--- “सामने का नजारा देखने लायक हो तो, देख लेना चाहिए।"

"देख लिया ?" प्रिया हौले से हंसी।

"हां।" शुक्रा चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।

प्रिया के चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई। वो बेदी से बोली।

"अपने साथी को सब बता दिया ?"

"सब पता है इसे।"

"अब तो एक से दो हो गए। काम को जल्दी खत्म करो। तुम्हारा बाकी का छः लाख तैयार है।"

"आज या कल में काम खत्म हो जाएगा।" बेदी ने विश्वास भरे स्वर में कहा।

"गुड।" प्रिया ने दोनों को देखा--- "वो जेवरात बेच दिए या अभी रखे हैं?"

“कहीं पर रखे हुए हैं। ओबराय को खत्म करने के बाद, दूसरे शहर में जाकर उन्हें बेचूंगा। इस शहर में उन जेवरातों को बेचने में खतरा है। बाकी का छः लाख नकद है या वो भी जेवरातों की शक्ल में है ?"

"फिक्र मत करो विजय। ओबराय के खत्म होते ही, मेरे पास बहुत कैश होगा। उसी वक्त तुम्हें छः लाख नकद मिल जाएंगे। अगर तुम जेवरात चाहते हो तो छः लाख के जेवरात...।" प्रिया का स्वर शांत था। नजरें बेदी पर।

"नहीं। मैं छः लाख कैश लेना पसन्द करूंगा।"

"ठीक है। फौरन नकद मिलेगा। दिनेश को जल्दी खत्म करो।"

"सफेद साड़ी है पास में।" शुक्रा खतरनाक स्वर में कह उठा।

"क्या मतलब ?"

"पति के मरने पर तुम्हें सफेद साड़ी पहननी पड़ेगी। कई लोग आएंगे और.....।"

"लाश मिलने पर सफेद साड़ी पहनी जाती है।" प्रिया ने शांत स्वर में कहा--- "शायद तुम्हें विजय ने बताया नहीं कि दिनेश को मारकर, उसकी लाश इस तरह गायब करनी है कि किसी को मिले नहीं और जब मिले तो वो दिनेश की लाश लगे ही नहीं। यानी की दिनेश दुनिया की निगाहों में अचानक गायब हो जाएगा। इस हिसाब से तो मुझे सफेद साड़ी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।"

शुक्रा ने बेदी को देखा तो बेदी ने सहमति में सिर हिला दिया।

"लाश मिल जाए तो क्या हर्ज है ?" शुक्रा प्रिया से बोला ।

"पुलिस सबसे पहले मुझ पर ही शक करेगी। तुम लोगों पर भी शक कर सकती है। कोई भी मुसीबत खड़ी हो सकती है। पुलिस ऐसा कुछ तलाश कर सकती है कि हम फंस जाएं।"

शुक्रा मुस्करा पड़ा।

"सयानी बातें कर रही हो।"

प्रिया सिर्फ मुस्कराकर रह गई।

दोनों ओबराय को जल्दी खत्म करने का वायदा करके बाहर निकल गए।

"गॉड इज ग्रेट।" प्रिया बुदबुदा उठी--- "मैं जानती हूं विजय तुम, दिनेश के फंदे में जा फंसे हो। उसने जो लालच तुम्हें दिया है। उसमें फंस गए हो। वो तुम्हें बड़ी दौलत दे रहा होगा। मैंने जो जेवरात तुम्हें दिए थे, वो दिनेश के पास हैं। मैं नहीं जानती तुममें और दिनेश में क्या सौदा हुआ है। लेकिन इस बात का मुझे पूरा विश्वास है कि तुम दिनेश की नहीं, मेरी जान लोगे। लेकिन कोई फायदा नहीं। मेरी जान नहीं ले सकोगे। इतना आसान नहीं है मुझे मारना।"

■■■

"ये शुक्रा है। कल मैं इसे यहां...।" बेदी ने कहना चाहा।

“देख चुका हूं इसे।” ओबराय ने शांत स्वर में कहा— “छः लाख वाला ब्रीफकेस तुमने इसे ही दिया था।"

"ओह! ये तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि तब आपने इसे देखा होगा।" बेदी ने सिर हिलाया।

शुक्रा ने सिर से पांव तक ओबराय को देखा।

उसे इस तरह देखते पाकर ओबराय मुस्कराया।

"शुक्रा। अच्छा नाम है।" ओबराय बोला--- "जानते हो विजय तुम्हें यहां क्यों लाया है ?"

"किसी की जान लेनी है।" शुक्रा की नजरें ओबराय के सूखे चेहरे पर थीं।

"किसकी ?" ओबराय बराबर मुस्करा रहा था।

"मेरी बातचीत इस सिलसिले में विजय से है। इसलिए मैं आपके ऐसे सवाल का जवाब नहीं दे सकता।"

"समझदार हो।" ओबराय हौले से हंसा-फिर बेदी को देखा--- "अब तो तुम्हारा साथी भी आ गया। काम कब निपटा रहे हो। किसी भी काम में ज्यादा वक्त लगाना ठीक नहीं होता।"

"काम जल्दी हो जाएगा।" बेदी ने कहा--- "मुझे लगता है कि प्रिया को मुझ पर शक हो गया है।"

"कैसा शक ?"

"यही कि मैं उसकी जान लेना चाहता हूं।"

ओबराय के माथे पर बल उभरे। कुछ पल वो बेदी को देखता रहा फिर उसकी नजरें वार्डरोब की तरह गई। जिसमें प्रिया वाले जेवरात, लिफाफे रखे थे।

"हो सकता है उसने उन जेवरातों को देख लिया हो, जो तुम मेरे हवाले किए थे। इसके अलावा ऐसी कोई बात नहीं कि तुम पर शक कर सके।" ओबराय का चेहरा सख्त हो उठा--- "कल शाम कुछ देर के लिए वो यहां अकेली थी।"

बेदी के चेहरे पर बेचैनी ने उछाल मारी।

"तुम प्रिया की तरफ से सावधान रहना।" ओबराय ने कहा।

बेदी और शुक्रा सर्वेन्ट क्वार्टर में पहुंचे।

"यहां के हालात तो वास्तव में नाजुक हैं।" शुक्रा कह उठा।

"हां। मैंने तुम्हें पहले ही बताया था।" बेदी गम्भीर था।

"बहुत संभल कर चलना होगा।"

बेदी ने कुछ नहीं कहा। सिगरेट सुलगा ली।

और पूरे दिन जिक्र के काबिल कोई खास बात नहीं हुई।

■■■

पच्चीस दिन

अगला दिन भी सामान्य ही रहा। घटनाक्रम में कोई बदलाव नहीं आया। बेदी ने शुक्रा के साथ बंगले के भीतर का एक चक्कर लगाया था। एक-दो जगह नब्बे करोड़ के लिए निगाहें भी मारी थीं। ओबराय या प्रिया से कोई बात-मुलाकात नहीं हुई और पूरा दिन यूं ही बीत गया।

रात के ग्यारह बज रहे थे।

ओबराय बंगले की छत पर अंधेरे में टहल रहा था। हाथ में सिगार दबा था, जिससे वो कभी-कभाद कश ले लेता था। छत से दूर-दूर तक का अंधेरे से भरा अस्पष्ट सा नजारा नजर आ रहा था। अलबत्ता अन्य बंगलों की जलती रोशनियां चमक रही थीं। आधा घंटा पहले ही वो छत पर, खुली हवा में टहलने के लिए आया था। यूँ तो उसका छत पर आना कभी-कभाद ही होता था।

आधा घंटा और बीत गया।

साढ़े ग्यारह बज गए।

ओबराय ने नया सिगार सुलगा कर तय किया कि इस सिगार के समाप्त होने पर छत के नीचे अपने बेडरूम में जाएगा। ये विचार बार-बार उसकी सोचों में आ रहा था कि प्रिया ने कल शाम उसके कमरे में रहकर, यकीनन वार्डरोब में पड़े अपने वो जेवरात देख लिए हैं, जो उसने, विजय को दिए थे, उसकी हत्या कराने के लिए। तभी तो विजय पर शक करने लगी है वो।

अगर ऐसा है तो अब वो विजय पर भरोसा न करके सतर्क रहेगी। परन्तु खामोश नहीं बैठेगी। क्योंकि वो जान चुकी है कि उसकी चालबाजी खुल चुकी है। ऐसे में वो कोई और खतरनाक हरकत करने की कोशिश करेगी। ओबराय का ख्याल था कि अब वो पहले विजय को खत्म करने की कोशिश करेगी।

ओबराय छत की दीवार के पास पहुंच कर ठिठका। सामने सर्वेन्ट क्वार्टर नजर आ रहे थे। सब क्वार्टरों की लाइटें ऑफ थीं। बाहरी बल्ब रोशन था।

ओबराय वहां से हटा और छत पार करता हुआ सामने की तरफ बढ़ गया। ओबराय के लिए प्रिया कोई समस्या नहीं थी। उसके पास ढेरों ऐसे लोग थे जो किसी को भी, कहीं भी खत्म कर सकते थे। लेकिन ओबराय की पहली कोशिश थी कि प्रिया को, उसी हथियार से मारा जाए, जो उसने, उसके लिए तैयार किया है। यानी कि बेदी के हाथों ही प्रिया की जान ली जाए।

चूहे-बिल्ली के इस खेल में ओबराय को मजा आ रहा था। वो छत की दीवार के पास आकर ठिठका। यहां से बंगले के सामने का लॉन नजर आ रहा था। रोशनी में वहां का काफी बड़ा हिस्सा स्पष्ट हो रहा था। गेट की तरफ जाती छोटी-पतली सड़क भी दिखाई दे रही थी। घुमावदार सड़क होने की वजह से, दूर गेट अस्पष्ट सा नजर आ रहा था।

यूं ही हर तरफ नजर घुमाते ओबराय ने सिगार का कश लिया।

तभी एकाएक जैसे वहां भूचाल सा उठा ।

दो पल तो ओबराय भी नहीं समझा कि क्या हुआ ?

किसी ने, पीछे से उसकी पिंडलियों को थामा और ऊपर उठाकर उसे नीचे गिराने की चेष्टा की। परन्तु ओबराय ने अपनी टांगों को तीव्रता से झटका दिया तो एक टांग पकड़ से छूट गई। दोनों हथेलियों से दीवार की मुंडेर को थाम लिया था। इतना वक्त नहीं था कि गर्दन घुमाकर पीछे देख पाता। आजाद हुई पिंडली पीछे मौजूद इन्सान के पेट पर मारनी चाही, लेकिन पीछे वाले ने पुनः उसकी पिंडली पकड़ ली।

ओबराय समझ गया कि पीछे वाला इन्सान जो भी है, फुर्तीला है। उसे नीचे फेंक कर उसकी हत्या कर देना चाहता है। बचने का कोई और रास्ता न पाकर ओबराय ने दीवार की मुंडेर छोड़ी और खुद को छत पर गिरा लिया। मुंह-पेट नीचे होने की वजह से वो आक्रमणकारी को न देख पा रहा था। खुद को छत पर गिरा लेने की वजह से, अब उसे नीचे फेंकना आसान नहीं था, जितना कि पहले था।

आक्रमणकारी इस बात की भरपूर चेष्टा कर रहा था कि, ओबराय को नीचे फेंक दे।

एकाएक ओबराय खुद में सिमटा और हाथ बढ़ाकर आक्रमणकारी की टांग थामी और जोरों से झटका दिया। वो खुद को संभाल न सका और लड़खड़ा कर नीचे जा गिरा।

पिंडलियां आजाद होते ही ओबराय फुर्ती से उठा और अपने आक्रमणकारी पर झपटा। परन्तु उसके पास पहुंचते ही, नीचे पड़े व्यक्ति ने ठोकर मारी तो ओबराय लड़खड़ाकर दीवार से जा टकराया।

ओबराय फौरन संभला ।

तब तक नीचे गिरा वो इन्सान उठ खड़ा हुआ।

दोनों के बीच तीन कदमों का फासला था।

दांत भींचे ओबराय ने अंधेरे में, चन्द्रमा की रोशनी में, उसे पहचानने वाली निगाहों से देखा, परन्तु पहचान न सका। लगभग साढ़े पांच, सवा पांच फीट की उसकी लम्बाई थी। कद-काठी ठीक थी। चेहरे और सिर पर कपड़ा लपेट रखा था। वहां अंधेरा बहुत ज्यादा था। जिसकी वजह से वो पहचान में नहीं आ रहा था। अंधेरे में कपड़े का रंग समझ से बाहर था।

"कौन हो तुम ?" ओबराय ने कठोर स्वर में पूछा। इस बात पर उसे अफसोस हो रहा था कि रिवॉल्वर बेडरूम में ही पड़ी है। अगर पास में होती तो फिर बात ही कुछ और थी।

तभी वो तीर की तरह झपटा।

ओबराय को कम से कम, फौरन ही उससे ऐसी आशा नहीं थी।

वो ओबराय से टकराया। ओबराय लड़खड़ा कर छत की दीवार से टकराया। उसने ओबराय को संभलने का मौका नहीं दिया। दूसरे ही पल वो फुर्ती से झुका। ओबराय की दोनों टांगें थामी और टांगों को ऊपर उठाते हुए पूरी ताकत से बाहर की तरफ झटका दिया।

ओबराय के पास ऐसी कोई पकड़ नहीं थी कि जिसका सहारा लेकर वो खुद को बचा पाता।

दूसरे ही पल ओबराय ने खुद को हवा में लहराते हुए नीचे गिरते पाया। पांच-सात पल ही बीते होंगे कि ओबराय का शरीर कूल्हों के बल कार की छत से टकराया फिर वो कार से नीचे लुढ़कता चला गया।

रात के वक्त कार की छत से टकराने का तीव्र स्वर वहां गूंजा।

ओबराय की किस्मत अच्छी थी कि वो बच गया था। नीचे खड़ी कार की वजह से बच गया था। कोई हड्डी तक नहीं टूटी थी। कूल्हे में और एक हाथ में थोड़ा-सा दर्द अवश्य था। गाउन के नीचे पहन रखा पायजामा घुटने पर से फट गया था। ओबराय संभल कर खड़ा हुआ और कूल्हों को मसलते हुए ऊपर बंगले की छत की तरफ देखा। वहां कोई भी नजर नहीं आया।

तभी गेट पर से बहादुर भागता हुआ वहां आ पहुंचा।

"क्या हुआ मालिक ? अभी बहुत जोरों की आवाज आई थी।"

ओबराय ने उसे देखा, कहा कुछ नहीं।

बहादुर की निगाह कार की पिचकी हुई छत पर गई। ओबराय के घुटनों पर से फटे पायजामे पर गई। परन्तु समझा नहीं कि क्या माजरा है।

उसी वक्त बंगले के भीतर से प्रिया, सुमित्रा और दयाल निकले। पास पहुंचे।

"क्या हुआ ?" प्रिया बोली--- "ये आवाज कैसी थी ?"

बंगले के पीछे की तरफ से बेदी और शुक्रा भी वहां आ गए।

ओबराय ने बारी-बारी सबको देखा फिर मुस्कराकर, बेदी से बोला।

"तुम यहां के ड्राइवर हो। कारों को गैराज में रखना तुम्हारी ड्यूटी है।"

"ज... जी मालिक।" बेदी बात को समझने की चेष्टा कर रहा था।

"तो ये कार यहां क्यों खड़ी है ?"

सबकी नजरें कार पर गईं। पिचकी हुई छत पर गई।

"कार की छत को क्या हुआ ?" बेदी के होंठों से निकला--- "शाम को तो ये ठीक थी।"

"मैंने तुमसे पूछा है, कार यहां क्यों खड़ी की?" ओबराय ने शांत लहजे में पूछा ।

"भूल हो गई। इसी कार पर मैं अपने, इस रिश्तेदार को लेकर आया था। यहां खड़ी कर दी। कार को गैराज में रखना याद नहीं रहा।" बेदी की नजरें कार की छत पर थीं।

"ये पायजामा कैसे फट गया ?" प्रिया की निगाह घुटनों से फटे पायजामे पर थीं।

ओबराय मुस्कराया, प्रिया पर से निगाहें हटाकर उसने बेदी को देखा।

"कार यहां खड़ी करने का शुक्रिया।" ओबराय ने कहा--- "कार यहां होने की वजह से मेरी जान बच गई।"

"लेकिन हुआ क्या?"

"मैं छत पर टहल रहा था कि किसी ने मेरी जान लेने के लिए मुझे नीचे फेंक दिया। मैं सीधा कार की छत पर गिरा और बच गया। ये जानकर मजा आया कि किसी में मेरी जान लेने की हिम्मत तो है।"

"क्या ?" बेदी का मुंह हैरानी से खुला का खुला रह गया।

“मैं जानता हूं, बंगले में कोई नहीं मिलेगा। फिर भी तुम अपने रिश्तेदार और दयाल के साथ बंगला देख डालो।" कहने के पश्चात ओबराय ने प्रिया को देखा--- "तुम अभी सोई नहीं थीं ?"

"नहीं। मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। सुमित्रा मेरा सिर दबा रही थी और दयाल मेरे लिए चाय बनाने के लिए किचन में गया था, जब जोरों की आवाज आई।" प्रिया के होंठों से निकला--- "लेकिन बंगले में तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारी जान लेने की कोशिश करे। मेरे ख्याल में कोई बाहर से आया होगा और हो सकता है, अभी वो बंगले में ही कहीं छिपा हो।"

"मैं अभी सारा बंगला चैक करता हूं।" बेदी कह उठा।

"बहादुर। तुम गेट पर ठीक तरह से ड्यूटी दे रहे थे। कोई भीतर तो नहीं आया ?" प्रिया ने पूछा।

"मालकिन, मैं बिलकुल चौकस था। कोई भीतर नहीं आया।" बहादुर ने कहा।

"नन्दराम कहां है ?"

"अपने क्वार्टर में। घंटा भर पहले ही वो जाकर सोया है।" बहादुर ने कहा।

ओबराय वहां से हटा और धीरे-धीरे चलते हुए, बंगले के भीतर प्रवेश कर गया।

उसके बाद बंगले पर सारी रात चैन-अमन रहा। शान्ति रही।

■■■

चौबीस दिन

बीती रात तो बेदी और शुक्रा में बात नहीं हो पाई। अगले दिन शुक्रा नहा-धोकर बेदी के क्वार्टर में पहुंचा तो बेदी को कमीज पहनते पाया। चेहरे पर सोच के भाव थे।

"रात अजीब ही हुआ ओबराय के साथ।" शुक्रा ने बैठते हुए कहा।

"हां।" बेदी ने सिर हिलाया--- "मेरी समझ में नहीं आ रहा कहा कि कौन ओबराय की जान लेने की कोशिश कर सकता है। लाख सोचने पर भी कोई सोचों में नहीं अटक रहा।"

"तुमने-मैंने ये काम किया नहीं।" शुक्रा बोला--- "और कौन है, बंगले पर जो ये कर सके।"

दोनों की निगाहें मिलीं।

"किसी नौकर में इतनी हिम्मत नहीं कि इस तरह ओबराय के पास भी जा सके।"

"तो?"

"ये प्रिया की हरकत हो सकती है।" बेदी बोला।

"नहीं।" शुक्रा ने तुरन्त इन्कार में सिर हिलाया--- "वो इतनी बड़ी बेवकूफी नहीं करेगी। ओबराय को खत्म कराने के लिए वो दसियों लोगों को तैयार कर लेगी। लेकिन अपने हाथों से उसे नहीं मारेगी।"

"तो ओबराय को छत से फेंकने वाला कौन हो सकता है ?" बेदी के होंठ सिकुड़ गए।

"ओबराय से पूछो। शायद उसने अपने दुश्मन को पहचाना हो।"

"बात करता हूं ओबराय से। रात सबके सामने उससे कुछ पूछना ठीक नहीं था।"

"वो हम पर भी शक कर सकता है कि ये काम हमने किया हो।" शुक्रा ने गम्भीर स्वर में कहा--- "यहां के जो हालात हैं, उसके मुताबिक उसका हम पर ही शक करना बनता है।"

"तुम नाश्ता ले आओ किचन से।" बेदी भी गम्भीर था--- "उसके बाद ओबराय से मिलता हूं।"

■■■

बेदी ने दरवाजा थपथपाया तो फौरन ही दरवाजा खुला। दरवाजा खोलने वाली प्रिया थी। दोनों की नजरें मिलीं। परन्तु उनके चेहरों पर ही कोई भाव नहीं आया।

"मालिक से मिलना है।" बेदी बोला।

प्रिया ने वहीं खड़े-खड़े गर्दन घुमा कर पूछा।

"दिनेश। ड्राइवर तुमसे मिलने आया है।"

" आने दो।"

"जाओ।" प्रिया एक तरफ हटते हुए बोली।

बेदी भीतर प्रवेश कर गया।

ओबराय बैड पर अधलेटा सा था। बिल्कुल सामान्य लगा था।

"गुड मार्निंग मालिक।" पास पहुंचकर बेदी बोला--- "अब आपकी तबीयत कैसी है ?"

"मेरी तबीयत रात भी खराब नहीं थी।" ओबराय मुस्कराया--- "नीचे कार मौजूद होने की वजह से पूरी तरह बच गया। वरना मैं नहीं बच सकता था। कार पर गिरने की वजह से भी जो चोट मुझे लगनी चाहिए थी। वो भी नहीं लगी। किस्मत ने उस वक्त पूरा मेरा साथ दिया और मैं बच गया।"

"भगवान सब देखता है मालिक। लेकिन आपकी जान किसने लेने की कोशिश की। मैंने अपने रिश्तेदार और दयाल के साथ बंगले के भीतर और बाहर अच्छी तरह देखा, कोई भी नहीं मिला। आपको छत से धकेलने वाला कहां चला गया। गेट पर तो तब बहादुर था।"

शांत खड़ी प्रिया कह उठी।

"तुम्हारे मालिक को छत से धकेलने वाला बाहर से नहीं आया था। वो बंगले के भीतर का ही आदमी है।"

बेदी ने प्रिया को देखा।

"आपका मतलब कि मालिक की जान लेने वाला, इस वक्त भी बंगले में है।" बेदी के होंठों से निकला।

"हां।"

"इसका मतलब मालिक ने उसे देख-पहचान लिया है और....।"

"ये बात तो तुम्हारे मालिक ही बता सकते हैं।" प्रिया का स्वर गम्भीर था।

बेदी ने ओबराय को देखा।

"आप बताइये मालिक वो कौन है। मैं उसे..."

"छत पर गहरा अंधेरा होने की वजह से मैंने उसे नहीं पहचाना। वैसे भी कपड़े से उसने अपना चेहरा और सिर को ढांप रखा था।" ओबराय ने सामान्य स्वर में कहा--- "उसकी लम्बाई शायद पांच फीट के करीब थी।"

"पांच फीट।” बेदी ने जल्दी से कहा--- "मेरी लम्बाई तो ज्यादा है। मालकिन की भी ज्यादा है। मेरा जो रिश्तेदार आया है। वो भी लम्बा है। बहादुर-नन्दराम, दयाल-ये सब भी लम्बे ही हैं।"

"समित्रा पांच सवा-पांच फीट की है।" प्रिया बोली--- "लेकिन तब वो मेरे पास थी। वैसे भी सुमित्रा में ये सब करने का दम नहीं। लेकिन दिनेश की जान लेने वाला बंगले में से ही कोई है। मेरा ख्याल हैं कि अंधेरे में उसकी लम्बाई पहचानने में गलती हो गई है।"

प्रिया को देखने के बाद बेदी ने ओबराय को देखा।

ओबराय ने शांत भाव में सिगार सुलगाकर कहा।

"हो सकता है, लम्बाई पहचानने में मुझसे गलती हो गई हो। सब कुछ अचानक हुआ था और मैं ठीक से संभल नहीं पाया था। तब अंधेरा भी गहरा था।" ओबराय का स्वर धीमा था--- "देखने-समझने में गलती भी हो सकती है।" कहने के साथ ही वो मुस्करा भी पड़ा।

ओबराय की मुस्कान देखकर, बेदी से कुछ कहते न बना।

ओबराय बैड से उतरा और स्लीपर पहनकर खिड़की की तरफ बढ़ा। उसकी चाल में हल्की सी लंगड़ाहट थी। खिड़की के पास खड़ा होकर वो बाहर देखने लगा।

बेदी ने प्रिया को देखा फिर धीमे स्वर में ओबराय से कहा।

"मालिक। मेरे लायक कोई काम हो तो कहिएगा।"

ओबराय ने कुछ नहीं कहा। बेदी की निगाह उसकी पीठ पर थी।

"मैं जाऊं, मालिक।"

जवाब में ओबराय ने बिना पीछे देखे सिर हिला दिया।

बेदी ने वहां से नजरें हटाकर प्रिया को देखा फिर बाहर निकलता चला गया।

■■■

"क्या बात हुई ?" बेदी के क्वार्टर में प्रवेश करते ही, शुक्रा ने पूछा।

"बात क्या होनी है। वो साथ चिपकी पड़ी थी ओबराय के साथ।"

"कौन, प्रिया ?”

"हां।" बेदी ने बैठते हुए गहरी सांस ली--- "ऐसे में न तो ओबराय खुलकर बात कर सका और न मैं। वो मेरी बातों का घुमा-फिरा कर ही जवाब देता रहा।"

शुक्रा सिर हिलाकर बोला।

"ओबराय की बातों से तुम्हें क्या लगा ?"

"अभी कोई अनुमान नहीं लगा सकता। ओबराय ने जो बातें मुझसे की, वो प्रिया को सुनाने के लिए कहीं या सच में ही वो ही बातें थी। ओबराय से अब मुलाकात होगी तो खुलकर बात होगी।"

"क्या बातें हुई उससे ?"

बेदी ने बताया।

"इन बातों से तो कुछ भी समझ में नहीं आता।"

"वही तो मैं कह रहा हूं कि...।"

तभी दरवाजे पर सुमित्रा आ पहुंची।

"मालकिन ने गाड़ी तैयार करने को बोला है।" सुमित्रा ने कहा।

"ठीक है।" बेदी उठ खड़ा हुआ।

सुमित्रा चली गई।

"कहां जाना है ?" शुक्रा ने पूछा।

"मालूम नहीं।" बेदी के चेहरे पर सोच के भाव थे।

■■■

"विजय बहुत बड़े बेवकूफ हो तुम।" प्रिया कह उठी।

"क्यों ?"

"दिनेश को छत से धक्का देने की क्या जरूरत थी ?"

"मैंने धक्का दिया है।" बेदी के होंठों से निकला--- "भूल में हो। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।"

"तो तुम्हारे दोस्त ने किया होगा।"

"उसने भी कुछ नहीं किया।"

"मेरे सामने तो झूठ मत बोलो।"

"तुमसे मैं झूठ क्यों बोलूंगा।"

प्रिया चुप सी हो गई।

कार सामान्य गति से सड़क पर आगे बढ़ी जा रही थी। बेदी ड्राइवर की वर्दी में था।

"मैं जानता हूं कि ओबराय को ऐसे मारना है कि उसकी लाश भी न मिले। ऐसा ही तुमने कहा था। ऐसे में मैं उसे छत से धक्का देकर, उसकी हत्या होने का ढोल क्यों बजाऊंगा।" बेदी ने कहा।

"तो फिर किसने दिनेश को छत से धक्का दिया।" प्रिया का स्वर शांत था।

"मैं नहीं जानता। तुम ही सोचो, बंगले में कौन है जो उसकी जान ले सकता है।" बेदी का स्वर गम्भीर था--- "ये बात तो मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि ओबराय को धक्का देने वाला बाहर से नहीं आया।"

"यही तो मेरी समझ में नहीं आ रहा।" प्रिया के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।

"तुम्हारा बंगला है ? तुम्हारी जगह, तुम्हारे लोग हैं। ये बात तुम्हें समझ लेनी चाहिए कि वो कौन हो सकता है।"

"मैं नहीं सोच सकी ये बात । तुम्हारा क्या ख्याल है दिनेश उसे पहचान गया होगा ?"

"पहचान गया होता तो ओबराय अब तक खामोश नहीं बैठा रहता।" बेदी गम्भीर स्वर में बोला ।

"हो सकता है किसी वजह से खामोश हो। उसके दिमाग का पता नहीं चलता कि वो कब क्या सोचता है।"

बेदी ने सड़क के किनारे कार रोकी और सिगरेट सुलगा ली।

“हैरानी है।'' बेदी ने गर्दन घुमाकर प्रिया को देखा--- "ओबराय को धक्का किसने दिया ?"

"बुरे आदमी के बहुत दुश्मन होते हैं। लेकिन बंगले में कौन दुश्मन हो सकता है। जो भी हो, अब वो दिनेश की नजरों से नहीं बचेगा। वो ऐसे मामले में बहुत तेज दिमाग रखता है।"

बेदी ने कश लिया।

"तुम्हारे लिए दिक्कत खड़ी हो गई।" प्रिया बोली।

"वो कैसे ?"

"ओबराय अब सावधान हो जाएगा। उसे खत्म करने में तुम्हारे लिए अड़चन पैदा हो सकती है।"

"कोई परेशानी वाली बात नहीं। ओबराय पर मैंने विश्वास जमा रखा है।" बेदी मुस्कराया।

"उसे बेवकूफ मत समझना।"

"इतनी समझ है मुझमें।"

"तुमने एक-दो दिन कहा था और वो वक्त बीत गया है। दिनेश को खत्म करने में देर क्यों लगा रहे हो ?"

"आज उसे खत्म करने का प्रोग्राम था। लेकिन रात की घटना के बाद एक-दो दिन चुप रहना होगा।" बेदी ने कहा।

प्रिया की निगाहें बेदी के चेहरे पर टिकी रहीं।

"बाजार से कोई सामान खरीदना है क्या ?"

"नहीं। तुमसे बात करने के लिए ही आई थी। आधा घंटा इधर-उधर और बिता लो, फिर वापस चलते हैं।"

बेदी ने कश लिया और कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

"मैंने छः लाख नकद इकट्ठा कर लिया है। बेशक वो जेवरात मुझे देकर छः लाख नकद ले सकते हो।" प्रिया एकाएक कह उठी ।

"उन जेवरातों को बंगले के बाहर कहीं रखा है। क्या फायदा, उन्हें वहां से लाऊं। तुम्हें दूं। फिर छः लाख लेकर बंगले से बाहर रखकर आऊं। ओबराय को शक हो गया तो गड़बड़ हो जाएगी।"

जबकि प्रिया को मालूम था वो जेवरात, दिनेश के बेडरूम में वार्डरोब के भीतर रखे हैं। जिसका कि स्पष्ट मतलब था कि विजय, ओबराय से मिल चुका है। उसकी योजना ओबराय जानता है। इस पर भी वो खामोश है तो स्पष्ट है कि ओबराय उसके साथ कुछ खास करना चाहता होगा। प्रिया जानती थी कि विजय के ओबराय से मिल जाने की वजह से वो मुसीबत में पड़ चुकी है।

ओबराय ने कान में फंसा रखा ईयर पिन और जेब में पड़ी माचिस के साइज की मशीन निकाली और टेबल के ड्राअर में रख दी। कार में होने वाली प्रिया और बेदी के बीच की सारी बातचीत उसने सुन ली थी। प्रिया की कार में लगा रखा 'बग' बहुत काम आ रहा था। जब कार बंगले से बाहर निकली, तभी से वो बातें सुनने लगा था।

ओबराय का चेहरा सामान्य था। कोई तनाव, उलझन या परेशानी, वहां नहीं थी। चेहरे पर सोच के भाव अवश्य नजर आ रहे थे। वो आगे बढ़ा और वार्डरोब के पास पहुंच कर उसे खोला और कपड़ों के पीछे पड़ा प्रिया के जेवरातों वाला लिफाफा निकाला और उसके भीतर देखा ।

सारे जेवरात लिफाफे में मौजूद थे।

ओबराय के चेहरे पर सोच के भाव छाए रहे।

प्रिया की, बेदी से कही ये बात उसे चुभ रही थी कि वो उसे जेवरात वापस देकर, छः लाख नकद ले सकता है। जबकि ओबराय जानता था कि प्रिया के पास छः लाख नकद नहीं है। यानी कि उसने जानबूझकर जेवरातों की बात छेड़ी, जो वो विजय को दे चुकी थी।

उधर बेदी ने भी कहा था कि प्रिया शायद उस पर शक कर रही है कि वो उससे मिल गया है।

ओबराय ने लिफाफा वापस कपड़ों के पीछे रखा और वार्डरोब बंद करके, टेबल के पास पहुंचा और सिगार उठाकर सुलगा लिया। ओबराय की सोचें अब किनारे पर पहुंचने लगी कि प्रिया कई बार उसके बेडरूम में, उसकी गैर-मौजूदगी में रही। वो आसानी से उसका वार्डरोब देख सकती है और वार्डरोब में पड़ा जेवरातों वाला लिफाफा देखकर, समझ सकती है कि विजय ने उसे सब बता दिया है।

सब कुछ जानते हुए भी प्रिया ने विजय को आभास न होने दिया कि वो सब जान चुकी है। आज भी जानबूझकर उसने विजय को, जेवरातों के बारे में कुरेदा कि शायद विजय उसे सच बता दे। और इस बात का आभास शायद प्रिया को हो चुका है कि विजय उसे (दिनेश को) नहीं मारेगा।

ओबराय की सोचें रात वाली घटना पर आकर ठहर गई। तो क्या प्रिया ने विजय के बदले उसकी जान लेने के लिए किसी और को तैयार कर लिया है। तभी तो रात उसे छत से धकेल कर उसकी जान लेने की चेष्टा की गई। वो जो भी था। बंगले के बाहर का नहीं था। भीतर का ही आदमी था। कौन हो सकता है ?

ओबराय के होंठ सिकुड़े और कश लेता हुआ खिड़की पर जा खड़ा हुआ। वहां से सांप की तरह लहराती छोटी-सी सड़क पर से प्रिया की कार आती नजर आई। कार को देखते ओबराय के चेहरे पर सोच के भाव नाचे जा रहे थे। चेहरे के भाव बता रहे थे कि मस्तिष्क में उसकी सोचें बहुत तेजी के साथ दौड़ रही हैं। इतना तो उसे महसूस हो गया था कि इस मामले को अब ढीला छोड़ना ठीक नहीं था। प्रिया उसकी जान के पीछे थी। विजय और शुक्रा को वह शक भरी निगाहों से देख रहा था। साथ ही बंगले में कोई और भी था जो उसे खत्म कर देना चाहता था।

यानी कि वो घिरता जा रहा था। उसके लिए खतरा बढ़ता जा रहा था। हालातों को ज्यादा ढीला छोड़ना अब ठीक नहीं था।

ओबराय फौरन खिड़की से हटा और फोन के पास पहुंचकर रिसीवर उठाया और नम्बर मिलाने लगा। दूसरी बार नम्बर मिलाने पर लाइन मिली। उधर से किसी ने रिसीवर उठाया।

"हैलो।" उसके कानों में पड़ा।

"ड्राइवर भेजो।" ओबराय के होंठों में कसाव आ गया था।

"यस सर।"

ओबराय ने रिसीवर रख दिया।

■■■

"प्रिया का कहना है कि रात ओबराय के साथ जो हुआ, उसमें उसका कोई हाथ नहीं। वो तो समझ रही थी कि ये सब मैंने या तुमने किया है।" क्वार्टर में पहुंचकर बेदी कुर्सी पर बैठता, शुक्रा से कह उठा।

"ड्रामा करती है साली।" शुक्रा एकाएक तीखे स्वर में कह उठा।

"वो कैसे?" बेदी ने उसे देखा।

"रात उसके इशारे पर ही ओबराय को मारने की कोशिश गई। वरना बंगले में मौजूद किसी भी नौकर में इतनी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो ओबराय पर इस तरह खुलकर हमला कर दे।" शुक्रा ने उसे देखा।

बेदी की आंखें सिकुड़ीं।

"प्रिया ने कहा था कि जब ओबराय को छत से फेंका गया, तब सुमित्रा उसका सिर दबा रही थी और दयाल उसके वास्ते किचन में चाय बना रहा था।" बेदी ने सोच भरे स्वर में कहा।

"भगवान ही जाने सब क्या है। मुझे नहीं लगता कि वो सच बोल रही है।" शुक्रा कह उठा--- "दौलत का लालच दिखाकर प्रिया ने उन्हें अपने कब्जे में कर रखा हो और दोनों में से किसी ने सूखे पतले ओबराय को छत से नीचे फेंका हो। उसे बचाने लिए प्रिया ने ऐसा कह दिया हो।"

बेदी, शुक्रा को देखता रहा।

"क्या देख रहे हो ?"

"सोच रहा हूं।" कहते हुए उसके होंठ सिकुड़े।

"क्या ?"

"जब ओबराय छत से गिरा तो तेज आवाज होने के कारण, सब वहां आ गए। बहादुर, सुमित्रा, दयाल, प्रिया, और मैं तुम लेकिन दूसरा दरबान नन्दराम नहीं आया। बहादुर के मुताबिक वो क्वार्टर में सो रहा था।"

"ऐसा भी हो सकता है। क्योंकि ओबराय को छत से फेंकने वाला बंगले में रहने वालों में से ही कोई है।"

शुक्रा कुछ नहीं बोला।

"नन्दराम को टटोल कर देखता हूं। शायद ये लगे कि उसी ने ओबराय को रात छत से धकेला था।" कहने के साथ ही बेदी उठा और बाहर निकलता चला गया।

■■■

नन्दराम सुबह छः बजे से ही गेट पर ड्यूटी दे रहा था। बेदी जब वहां पहुंचा तो नन्दराम बंद गेट के भीतरी तरफ स्टूल पर बैठा था। उसे देखते ही बोला।

"विजय भाई। ये मैं क्या सुन रहा हूं। रात को किसी ने मालिक को छत से धक्का दे दिया।"

"हां।" बेदी पास पहुंचकर कह उठा--- "मैं तो खुद हैरान हूं कि ऐसा किसने किया?"

"स्टूल ले आ भीतर से।"

बेदी पास ही मौजूद केबिन में गया और स्टूल लाकर उसके बराबर रखकर बैठता हुआ बोला ।

"बहुत दुःख की बात है कि किसी ने मालिक की जान लेने की चेष्टा की।"

"वो तो है। मैं गहरी नींद में रहा। मुझे पता ही नहीं चला क्या हुआ। सुबह बहादुर ने बताया कि...।"

"तेरी नींद तो बहुत गहरी है नन्दराम।" बेदी ने उसे देखा--- "सब उठ गए। तू ही नहीं उठा।"

"क्या करूं। सुबह छः बजे से रात होने तक ड्यूटी देता रहा। बहादुर की तबीयत ढीली थी। वो क्वार्टर में आराम करता रहा, दिन भर। रात को जब चारपाई पर गया तो होश ही नहीं रहा।"

"मालिक की किस्मत तो देखो। इतनी ऊपर से गिरे और खरोंच भी नहीं आई।"

"सब ऊपर वाले का खेल है।" नन्दराम ने सिर हिलाकर कहा।

"मेरा जो रिश्तेदार आया है, वो...।"

"शुक्रा।"

"हां-हां, यही नाम है उसका। रात जब मालिक के कार की छत पर गिरने से शोर हुआ तो कुछ देर बाद ही, उसने पिछवाड़े किसी को देखा था।" बेदी की नजरें उसके चेहरे पर थीं।

"अच्छा, कौन था, किसे देखा था उसने।"

"वो कल ही तो यहां आया था किसी को जानता नहीं। जो पहचान लेता। उसने देखा, परन्तु खास ध्यान नहीं दिया। वैसे भी रात के अंधेरे की वजह से वो उसे साफ नहीं दिखा।"

"हो सकता है, वही हो, मालिक को धक्का देने वाला। शुक्रा से पूछो, शायद उसका कुछ पता चल सके।"

"हां, अभी जाकर फिर उससे पूछूंगा। मुझे तो लगता है मालिक की जान लेने की जिसने कोशिश की, वो बंगले में ही रहता है। बाहर से नहीं आया।" बेदी कह उठा।

"ये बात भी ठीक हो सकती है।"

"नन्दराम, क्या कभी पहले भी मालिक के साथ ऐसा हुआ ?"

"नहीं। सालों से यहां नौकरी कर रहा हूं लेकिन पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ।"

बातों के दौरान बेदी की निगाह, नन्दराम पर ही थी। लेकिन नन्दराम के चेहरे से ऐसा कुछ नहीं झलका कि जिससे लगे, इन बातों से उसका कोई वास्ता हो सकता है।

"मालिक ने नहीं देखा कि उन्हें छत से किसने धक्का दिया ?"

बेदी कुछ कहने लगा कि तभी गेट के पार कार का दो बार हार्न बजा।

नन्दराम फौरन उठा। गेट की छोटी सी खिड़की से बाहर देखा। उसके बाद फौरन ही गेट के दोनों पल्ले खोल दिए। बाहर कार थी जो भीतर आती चली गई।

नन्दराम गेट बंद करके वापस आ बैठा।

"कौन आया है ?" बेदी ने पूछा

"मालिक का ड्राइवर।" नन्दराम ने कहा--- "मालिक ने कहीं जाना होगा।"

"ड्राइवर बुलाने की क्या जरूरत थी। मैं उनकी कार चला देता।"

"ये तो अब मालिक ही जाने।"

"चलता हूं। फिर आऊंगा। गैराज से मालिक की कार निकाल दूं।" कहते हुए बेदी उठा और बंगले की तरफ बढ़ गया। गैराज से उसने ओबराय की कार निकाली। उस पर कपड़ा मारा।

कार पर आया ड्राइवर पास आ गया।

"मालिक को बाहर ले जा रहे हो भैया ?" बेदी ने सरल स्वर में पूछा।

उसने सिर हिलाया।

"मालिक ने खामखाह तुम्हें तकलीफ दी। हम कार चला देते।"

तभी तैयार हुआ ओबराय मुख्य द्वार से बाहर निकला। उसने सूट पहन रखा था। चाल में हल्की सी लंगड़ाहट थी। चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था।

ओबराय के पास पहुंचने पर उस ड्राइवर ने सतर्क अंदाज में सलाम मारा।

"मालिक।" बेदी हाथ जोड़कर बोला--- "कार चलाने की सेवा का मौका मुझे दे देते।"

"दूर जाना था।" ओबराय ने शांत स्वर में कहा।

ड्राइवर ने कार का दरवाजा खोल दिया।

ओबराय भीतर बैठने लगा तो बेदी ने कहा।

"मालिक, रात को...।"

"वापस आकर बात करूंगा।" कहते हुए ओबराय कार के भीतर सीट पर जा बैठा। ड्राइवर ने दरवाजा बंद किया और स्टेयरिंग सीट पर बैठ कर कार स्टार्ट की और आगे बढ़ा दी।

■■■

"नन्दराम से बात हुई?" बेदी के क्वार्टर में प्रवेश करते ही, शुक्रा ने पूछा।

"बात तो हुई, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका।" बेदी बोला--- "वो कहता है सुबह छः बजे का उठा हुआ था। इसलिए तब बहुत गहरी नींद में था।"

"लेकिन कोई तो है, जिसने ओबराय को धक्का दिया है। वो बंगले में ही रहता है।"

बेदी ने सोच भरी निगाहों से शुक्रा को देखते हुए सिर हिलाया।

"शुक्रा। एक बात अजीब सी है।"

"क्या ?"

"मैंने तेरे को बताया था कि प्रिया को शक हो चुका है कि मैं ओबराय से जा मिला हूं और उसकी जान ले सकता हूं। तभी तो परसों रात मेरे गाउन की जेब से डोरी निकाल ली और जाते हुए डोरी वापस गाउन की जेब में डाल दी। स्पष्ट है कि मेरे पास होते हुए वो सावधानी इस्तेमाल कर रही है कि कहीं मैं उसकी जान न ले लूं।" बेदी ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा।

"तो ?"

"जब वो मुझसे किसी तरह का खतरा महसूस कर रही है तो आज मेरे साथ बाहर क्यों गई। चिकनी-चिकनी बातें क्यों की। मैं बाहर भी तो कहीं, उसको नुकसान पहुंचा सकता था।"

"हो सकता है उस डोरी के मामले में तुमसे गलती हुई हो और वो जेब में ही...।"

"नहीं। वो जेब में नहीं थी। वो उसने गले मिलने के बहाने निकाल ली थी और बाद में डाल दी थी।" बेदी अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठा--- "तुम मुझे बेवकूफ समझते हो क्या ?"

शुक्रा कुछ न कह सका।

"और फिर ओबराय पर जानलेवा हमला हुआ। उसे छत से नीचे धकेल दिया गया।"

"मैं समझा नहीं।"

"मैं समझाता हूं। प्रिया को मुझ पर शक है कि मैं ओबराय के साथ हूं। जिस व्याकुलता से वो मुझे पहले कहती थी कि मैं ओबराय को खत्म करूं, उसकी आवाज में अब वो चीज नहीं रही। सामने होने पर सीधे-सादे शब्दों में ओबराय को खत्म करने वाली बात दोहरा देती है। लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि कल रात ओबराय की जो जान लेने की कोशिश की गई, उसका इन्तजाम प्रिया ने ही किया था। बेशक प्रिया ने बंगले के किसी नौकर को इस काम के लिए तैयार किया हो या फिर फोन करके बाहर से किसी को चुपके से बुलवा लिया हो और वो रात को बंगले में आ गया हो। हमला करने के बाद या तो बंगले से रात को ही दीवार फांद कर चला गया होगा या फिर प्रिया की सरपरस्ती में, बंगले में ही छिपा होगा।"

शुक्रा, बेदी को देखता रहा।

"उधर ओबराय की आवाज में भी अब वो दम नहीं है कि मैं प्रिया को खत्म करूं।"

शुक्रा की आंखें सिकुड़ीं।

"मैं समझा नहीं।"

"सच बात तो ये है शुक्रा कि ओबराय और प्रिया मुझे बेवकूफ बना रहे हैं। प्रिया जान चुकी है कि मैं ओबराय के साथ हो गया हूँ। ऐसे में वो मुझ पर अब विश्वास नहीं कर रही। विश्वास करने का दिखावा कर रही है कि अभी सब बातों पर पर्दा पड़ा रहे। और ओबराय को साफ करने के लिए खामोशी से किसी दूसरे का इन्तजाम कर लिया। इधर ओबराय भी इसी तरह की चालबाजी करेगा। दिखावे के तौर पर वो प्रिया को खत्म करने के लिए मुझे कहता रहेगा, लेकिन प्रिया के लिए वो कोई दूसरा इन्तजाम करेगा। ओबराय मुझ पर विश्वास नहीं कर रहा, क्योंकि आखिरकार मैंने उसकी हत्या का सौदा बारह लाख में किया हुआ है।"

"तुम्हारी बात का तो मतलब यही निकलता है कि ओबराय और प्रिया ने तुम्हें दीवार बना रखा है और इस दीवार की ओट लेकर, वो अपने-अपने ढंग से एक-दूसरे को खत्म करने की कोशिश करने लगे हैं।"

"हां। यही कहना चाहता हूं मैं, दोनों मुझे फुटबाल की तरह इस्तेमाल करते हुए वक्त बिता रहे हैं। सच बात तो ये है कि उन दोनों में मैं खामखाह पिस रहा हूं। अपना काम निकालकर, जो बचेगा वो मुझे लात मार कर चलता कर देगा, या फिर दूसरे की हत्या के मामले में मुझे ही फंसा दे। अब फूटी कौड़ी भी मुझे नहीं मिलने वाली। वो छः लाख जाने कैसे हत्थे चढ़ गए।"

शुक्रा के होंठ भिंच गए।

"एक ही रास्ता है नोटों के मिलने का।" बेदी बोला।

"क्या ?"

"दोनों में से किसी की भी जान सीधे-सीधे जाकर ले लूं और दूसरे से नोट लूं।" बेदी के चेहरे पर सख्ती नजर आने लगी--- "मुझे तो लग रहा जैसे सारा मामला गड़बड़ हो गया है। ओबराय ने बाहर जाना था तो कार चलाने के लिए मुझे कह सकता था। लेकिन अभी बाहर गया है, अपना ड्राइवर बुलवा कर। मुझे पूरा विश्वास है कि वो कोई नया इन्तजाम करने गया है प्रिया का।"

शुक्रा के चेहरे पर गम्भीरता आ ठहरी थी।

"अगर तुम्हारी बातें सही हैं तो हमें यहां से निकल चलना चाहिए।" शुक्रा बोला।

"क्या मतलब ?"

"छः लाख हाथ आ चुके हैं। बाकी के पैसों का कहीं और से इन्तजाम कर...।"

"पागल तो नहीं हो गया तू।" बेदी उखड़ गया--- "चौबीस दिन मेरी जिन्दगी के बाकी बचे हैं और तू कह रहा है कि चौबीस दिन में बाकी के छः लाख का इन्तजाम हो जाएगा।"

शुक्रा कुछ न कह सका।

"तू भी जानता है शुक्रा कि अब मेरे पास इतना वक्त नहीं बचा कि पैसों का इन्तजाम करने के लिए कोई नया रास्ता तलाश कर सकूं। मुझे फौरन ही ओबराय या प्रिया में से किसी की जान लेनी होगी कि पैसों का इन्तजाम करके अपने दिमाग में फंसी गोली निकलवा सकूं। अपनी जान बचा सकूं। मेरी हालत तू समझ नहीं रहा कि...।"

"नब्बे करोड़ को भूल रहा है।"

"क्या मतलब ?"

"किसी को खत्म करना है तो वो भी कर देंगे। ओबराय बाहर गया है प्रिया अपने कमरे में होगी। अगर बंगले में छिपा रखे नब्बे करोड़ को ढूंढें तो क्या बुरा है।"

"लेकिन...।" बेदी ने कहना चाहा।

"मैं खाली वक्त को इस्तेमाल करने को कह रहा हूं। शायद सारी परेशानियां दूर हो जाएं। नब्बे करोड़ मिल ही जाएं। उसमें से ऑपरेशन के लिए पैसे उठाकर यहां से निकल जाएं। "

बेदी के चेहरे पर असहमति के भाव थे।

"आ। कोशिश करने में क्या हर्ज है।" कहते हुए शुक्रा उठा।

अनमने मन से बेदी भी उठ खड़ा हुआ।

■■■

पीछे वाली सीट पर बैठा ओबराय खिड़की से बाहर देख रहा था। कार तेजी से दौड़ रही थी। दिन के वक्त काफी संख्या में वाहन सड़क पर थे। सोचों में डूबा, ओबराय एकाएक चौंका।

"कार रोको।" ओबराय के होंठों से निकला।

ड्राइवर ने फुर्ती के साथ कार को साइड किया और रोक दी।

सामने वो होटल था जहां रागिनी ने डेरा डाल रखा था और ये इत्तफाक ही था कि ओबराय को होटल से बाहर निकल रही रागिनी नजर आई थी। काली स्कर्ट, काला टॉप बेहद हसीन लग रही थी। उसके पैदल ही बाहर निकलने का मतलब था कि वो पास ही कहीं जा रही है।

"कार से निकल कर मेरे पास आओ। इस तरफ।"

ड्राइवर फौरन बाहर निकला और पीछे वाले दरवाजे की खुली खिड़की के पास आया।

"उधर देखो। वो काली स्कर्ट और वैसे ही टॉप में युवती होटल से निकली है।"

ड्राइवर ने फौरन उधर देखा ।

"यस सर।"

"उसे मेरे पास लाओ लेकिन उसे मालूम नहीं होना चाहिए कि वो मेरे पास लाई जा रही है।"

"जी।" कहकर वो पलटने को हुआ।

"सुनो।"

"सर।" उसने ओबराय को देखा।

"उसे हर हाल में लेकर आना है।" ओबराय के लहजे में सख्ती थी--- "बिना शोर के।"

"मैं समझ गया सर।" कहकर वो जल्दी से रागिनी की तरफ बढ़ गया।

ओबराय ने सिगार निकाल कर सुलगाया और कश लिया। चेहरे से ही स्पष्ट हो रहा था कि उसके मस्तिष्क में दौड़ती सोचों ने तीव्र रफ्तार पकड़ ली थी।

ड्राइवर के कहने पर रागिनी ने कार तक जाने में कोई एतराज नहीं उठाया। एक-दो बार पूछा अवश्य बात क्या है तो ड्राइवर ने कहा, मालिक ही बताएंगे। कार के पास पहुंच कर रागिनी की निगाह पीछे वाली सीट पर मौजूद ओबराय पर पड़ी तो वो हैरानी से चौंकी।

ओबराय शांत भाव से उसे देखता रहा। फिर ड्राइवर को इशारा किया तो वहां से दूर हट गया।

"छः लाख मिल गए ?" ओबराय के होंठ खुले ।

"क...कौन से छः लाख ?" रागिनी हैरानी से बाहर आने लगी।

"जो मैंने विजय बेदी को दिए थे और उसने वो छः लाख अपने दोस्त शुक्रा को दिए थे।"

रानिगी के माथे पर बल पड़ गए।

"मुझे नहीं मालूम मिस्टर ओबराय आप किन छः लाख की बात कर रहे हैं। मैंने जब से देवली सिटी में कदम रखा है, तब से पहली बार किसी छः लाख का जिक्र सुन रही हूं।"

ओबराय के होंठों पर मुस्कान उभरी।।

"मेरा भी ऐसा ही ख्याल था कि तुम्हें छः लाख के बारे में कुछ नहीं मालूम होगा।"

"क्या मतलब ?"

"तुम कहीं जा रही थी।"

"यूँ ही सामने ब्यूटी पार्लर तक जा रही थी। वैसे वहां जाना जरूरी नहीं है।" रागिनी के चेहरे पर उलझन थी।

"कार ड्राइव करनी तो तुम्हें आती ही है।"

"हां।"

"आओ। तुम कार ड्राइव करो। कहीं चलकर बात करते हैं।" ओबराय ने कहा।

"मैं समझ नहीं पा रही हूं कि....।"

“जो नहीं समझ पा रही। जो नहीं मालूम। वही तो बताना है तुम्हें। मेरे ख्याल में तुम विजय की मौजूदा हरकतों से पूरे तौर पर अनजान हो। मेरे बंगले पर रहकर वो क्या कर रहा है, जानना नहीं चाहोगी।"

रागिनी की आंखें सिकुड़ीं। ओबराय की बातें उसकी समझ में इसलिए नहीं आ रही थी कि अभी तक उसने स्पष्ट तौर पर कोई बात नहीं की थी। वो इतना ही समझ पाई थी कि कुछ गड़बड़ है और ओबराय उससे कुछ बात करना चाहता है। और उन बातों को अब रागिनी भी जान लेना चाहती थी।

"कार ड्राइव करूं ?" रागिनी बोली।

ओबराय ने सहमति में सिर हिलाया और दूर खड़े ड्राइवर को इशारे से बुलाकर कहा।

"जब तक मैं वापस नहीं आता। तुम यहीं मेरी वापसी का इन्तजार करते रहोगे।"

"यस सर।"

रागिनी तब तक ड्राइविंग सीट पर बैठकर, कार स्टार्ट कर चुकी थी।

"कहां चलूं ?"

"व्यू होटल ले चलो।"

"मुझे रास्ता नहीं पता।" रागिनी ने पीछे देखा।

"चलो, रास्ता मैं बता देता हूँ।"

रागिनी ने कार आगे बढ़ा दी।

"तुम बहुत खूबसूरत हो।" ओबराय एकाएक मुस्करा कर कह उठा।

रागिनी के चेहरे पर पल भर के लिए अजीब से भाव उभरे फिर बोली।

"आपकी पत्नी मुझसे ज्यादा खूबसूरत है।"

"मेरी आंखों से देखो तो समझ जाओगी कि, तुम कितनी खूबसूरत हो।"

"ऐसा है तो जब मैं कोरियाई वैन लेने आई थी, तब मुझसे बात क्यों नहीं की ?"

"क्योंकि तब मैं अपनी पत्नी प्रिया को अच्छी औरत समझता था। लेकिन वो विजय को बंगले पर ले आई और उसके साथ सोने लगी तो मेरे लिए वो बदसूरत औरत बन गई।"

जवाब में रागिनी के होंठ सिकुड़ गए। कहा कुछ नहीं।

■■■

"खूबसूरती तब फीकी लगने लगती है, जब सामने वाला महसूस करे कि इस औरत में उतनी भी अक्ल नहीं है, जितनी कि होनी चाहिए। तुम्हारा क्या ख्याल है।" ओबराय ने मुस्कराकर उसकी आंखों में झांका।

"ठीक कह रहे हो।" रागिनी मुस्करा पड़ी।

"तो मैं आशा करूं कि तुम समझदारी से काम लोगी।"

"हां।"

"मेरे से सच बात करके फायदे में रहोगी। जिस तरह प्रिया मुझे धोखा दे रही है, उसी तरह विजय तुम्हें धोखा दे रहा है। शायद तुम ऐसी कई बातें सुनो, जिससे तुम्हें हैरानी हो।"

"मेरे नब्बे करोड़ कहां हैं ?"

"जो बातें मैं तुमसे करने जा रहा हूं उसमें तुम्हारे हर सवाल का जवाब आएगा।" ओबराय ने शांत स्वर में कहा और सिगार सुलगा कर कश लिया।

इस समय दोनों व्यू होटल के प्राइवेट केबिन में बैठे थे। बीच में मौजूद टेबल पर रागिनी के लिए कॉफी और ओबराय के लिए कोल्ड ड्रिंक मौजूद थी।

कुछ पलों की खामोशी के बाद ओबराय ने कहा।

"तुम्हारी कोरियाई वैन में मौजूद थैलों में भरे नब्बे करोड़, यानी कि नोटों की गड्डियां मैंने देखी थीं। ये तो मुझे बाद में मालूम हुआ कि तुम्हें वो करोड़ों रुपया नहीं मिला। जिसे ढूंढने के लिए, तुमने विजय को बंगले पर ड्राइवर बनाकर भेजा।"

ओबराय के खामोश होने पर रागिनी ने सहमति में सिर हिलाया। मन ही मन वो हैरान थी कि इसे सब कुछ मालूम है तो ऐसे में विजय बंगले पर कैसे टिका हुआ है और तो और शुक्रा को भी वहां ले गया।

"तुम्हें क्या कहता है विजय कि बंगले पर वो क्या कर रहा है?"

"वो... नब्बे करोड़ को ढूंढ रहा है।"

"इसलिए वो शुक्रा नाम के साथी को भी बंगले पर ले गया।" ओबराय मुस्कराया।

"हां।" अपनी हैरानी को दबाए रागिनी ने सिर हिलाया।

"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि विजय, बंगले में मौजूद नब्बे करोड़ को नहीं ढूंढ रहा, बल्कि कुछ लाख के फेर में पड़ा हुआ है, जो कि मेरे लिए वास्तव में हैरानी की बात है।"

"क्या ?" रागिनी के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे।

"छः लाख वो झाड़ भी चुका है।"

"उसे-उसे बारह लाख की सख्त जरूरत है।" रागिनी के होंठों से निकला।

ओबराय खुलकर मुस्कराया।

"मेरी हत्या का सौदा विजय ने प्रिया से बारह लाख में तय किया है और छः लाख उसने एडवांस लिए हैं। जिन्हें कि शुक्रा को कुछ दिन पहले ही दे दिए थे और शायद उन छः लाख की तुम्हें खबर नहीं।"

"नहीं।"

"विजय की इस हरकत की भी खबर नहीं।"

"नहीं।"

"उसके बाद विजय ने मेरे से सौदा किया प्रिया को खत्म करने का दस लाख में और इस बात का शक शायद प्रिया को भी हो गया है। ऐसे में विजय मेरा और प्रिया का विश्वास खो चुका है। हम दोनों ही एक शक अवश्य करेंगे कि कहीं वो मुझे ही न मार दे।" ओबराय ने सिगार का कश लिया।

"ये कैसे हो सकता है।" रागिनी के चेहरे पर अजीब से भाव थे--- "वो तो नब्बे करोड़ ढूंढने गया है।"

"वो सिर्फ दस-बारह लाख के फेरे में है।"

"समझी।" रागिनी के दांत भिंच गए।

ओबराय ने कोल्ड ड्रिंक का घूंट भरा।

"वो नब्बे करोड़ कहां हैं?" रागिनी ने पूछा।

"मैं नहीं जानता। मेरे पास नहीं है। मैंने उन्हें नहीं छेड़ा।" ओबराय मुस्करा पड़ा--- "और प्रिया के साथ इस वक्त हालात कुछ ऐसे हैं कि इस बारे में उससे भी नहीं पूछ सकता। लेकिन वो बंगले पर ही कहीं है।"

"वो मेरे हैं।" रागिनी दांत भींच कर कह उठी।

"मैं जानता हूं।"

"मुझे मेरा नब्बे करोड़ वापस चाहिए।"

"मेरे पास होता तो दे देता और प्रिया आसानी से देगी नहीं।" रागिनी, ओबराय को देखने लगी।

"तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि विजय तुम्हें मारने के लिए बारह लाख में सौदा..."

"अपने काम की बातें पूछो। विजय को प्रिया ने अपने खूबसूरत शरीर के जाल में फंसाकर मेरी जान लेने के लिए तैयार किया है। उन दोनों का रिश्ता पति-पत्नी से भी ज्यादा है।" ओबराय मुस्कराया।

"मुझे सिर्फ ये बताओ कि मैं अपना नब्बे करोड़ कैसे ले सकती हूं।" रागिनी दांत भींचे एक-एक शब्द चबाते हुए कह उठी।

"प्रिया को खत्म करके।"

"क्या ?"

"मेरे पास ऐसे बहुत लोग हैं जो मेरे इशारे पर प्रिया को फौरन खत्म करके उसकी लाश को भी गुम कर दें। इस वक्त मैं इसी काम के लिए ऑफिस जा रहा था कि तुम पर नजर पड़ गई। सोचा अपने नब्बे करोड़ पाने के लिए तुम अवश्य प्रिया की मौत में दिलचस्पी लोगी। सोचने की बात ये है कि क्या तुममें किसी की हत्या करने की हिम्मत है।"

"नब्बे करोड़ पाने के लिए मैं किसी की भी जान ले सकती हूं।"

"जान लेना आसान होगा तुम्हारे लिए। लाश ठिकाने भी लगानी है।" ओबराय ने उसकी आंखों में देखा।

"वो भी कर दूंगी।"

"सोच लो, जब तक प्रिया जिन्दा रहेगी, तुम नब्बे करोड़ नहीं हासिल कर पाओगी।" ओबराय ने कहा।

"इस बात की क्या गारण्टी है कि प्रिया की मौत के पश्चात नब्बे करोड़ मुझे मिल जाएगा।"

"प्रिया ने वो नब्बे करोड़ बंगले में ही कहीं छिपाया है। उसकी मौत के बाद आराम से ढूंढ लिया जाएगा।"

"हो सकता है, वो नब्बे करोड़ तुम्हारे पास हो।"

ओबराय मुस्कराया।

"तुम्हें नब्बे करोड़ से मतलब होना चाहिए। वो तुम्हें मिल जाएगा। क्योंकि प्रिया इतनी बड़ी रकम को, मेरी नजरों में आए बिना बाहर नहीं ले जा सकती। वो बंगले में ही कहीं हैं।" ओबराय ने शांत स्वर में कहा।

रागिनी, ओबराय को देखने लगी।

ओबराय ने सिगार का कश लिया।

"कुछ और भी पूछना चाहती हो तो पूछ सकती हो।"

"वैसे तो सारे हालात मेरे सामने स्पष्ट हो गए कि बंगले पर क्या हो रहा है।" रागिनी एक-एक शब्द चबाकर कह उठी--- "फिर भी कई बातें हैं, जो बाद में पूछ लूंगी। मुझे बंगले पर जाने और नब्बे करोड़ पाने का मौका मिल रहा है और मैं ये मौका नहीं छोडूंगी। विजय बेवकूफ है जो बारह लाख के फेर में, नब्बे करोड़ भूल गया।"

ओबराय पुनः मुस्कराया।

"तुम वास्तव में खूबसूरत हो।"

"मैं बंगले पर कैसे आऊं। प्रिया-बेदी-शुक्रा और नौकर मुझे पहचान सकते हैं।"

"तुम सच में खूबसूरत हो। समझदार वाली खूबसूरत भी। रास्ता निकाल सकती हो।"

रागिनी ने ओबराय की आंखों में देखा।

"लेकिन याद रखना। बंगले पर आकर नब्बे करोड़ को ढूंढने मत लग जाना। ये सोचकर तुमने बंगले में कदम रखना है कि जब तक प्रिया को खत्म नहीं करोगी, तब तक तुम नब्बे रुपये भी नहीं पा सकोगी।"

"समझ गई।"

"समझदार हो।" ओबराय शांत था--- "अब कैसे, किस तरह तुमने बंगले पर आना है, वो बात करो।"

■■■

रागिनी ने दरवाजा खोला और उदयवीर के कमरे में प्रवेश कर गई। उदयवीर लंच के लिए रूम सर्विस को आर्डर देकर हटा ही था। उदयवीर उसे देखते ही कह उठा---

"लंच के लिए कहा । तुम्हारे लिए भी...।"

"लंच को मारो गोली। अभी विजय का फोन आया था। लगता है कोई गड़बड़ हो गई है।"

"क्या मतलब ?"

"ये तो मुझे भी नहीं मालूम। पहले वो तुम्हें फोन करता रहा। लाइन नहीं मिली होगी तो मुझे फोन किया। उसने कहा है कि छ: लाख को होटल से हटा दिया जाए। नहीं तो फंस जाएंगे।"

"क्या ?" उदयवीर चौंका। वो समझ नहीं पाया कि विजय ने रागिनी को छः लाख की बात कैसे कह दी। छः लाख का मामला तो पूरी तरह इससे छिपाया गया था।

"सोच क्या रहे हो।" उसे खामोश पाकर रागिनी फौरन उठी--- "सब कुछ बता दिया है मुझे, विजय ने। इस बारे में बाद में बात करेंगे। पहले रुपयों को होटल से हटाओ। विजय ने ऐसा कहा है तो खास ही बात होगी।"

उलझा-उलझा सा उदयवीर खड़ा हो गया।

"कहीं विजय ने ओबराय या प्रिया को खत्म तो नहीं कर दिया।" रागिनी कह उठी।

"हो सकता है।" हिचकिचाहट भरे स्वर में उदयवीर ने कहा।

"यही हुआ होगा। तभी तो उसने छः लाख फौरन हटाने को कहा है। देर मत करो। कहां है छः लाख ?"

"होटल के क्लाक रूम में पड़े हैं।"

"क्लाक रूम की रसीद ।"

"मेरे पास है।" उदयवीर का हाथ जेब में गया।

"जल्दी लेकर आओ। किसमें रखे हैं रुपये ?"

"ब्रीफकेस में।"

"ले आओ। मैं यहीं हूं।"

उदयवीर जल्दी से कमरे से बाहर निकल गया।

रागिनी के चेहरे पर जहरीली मुस्कान नाच उठी।

"तो ओबराय ने हर बात ठीक ही कही है।" रागिनी खतरनाक स्वर में बड़बड़ा उठी--- "विजय ने अपने दोस्तों को बुला लिया। अपनी मनमानी करने लगा। अपने लिए बारह लाख का इन्तजाम करने लग गया और मेरे नब्बे करोड़ डूबने के लिए छोड़ दिए। मुझसे चालबाजी, नहीं विजय, मैं तुम्हें सफल नहीं होने दूंगी।"

पांच मिनट ही बीते होंगे कि वेटर, उदयवीर के आर्डर वाला लंच सर्व कर गया।

उसके बाद के पांच मिनट में उदयवीर ने ब्रीफकेस थामे भीतर प्रवेश किया।

"तुम इसे इस वक्त अपने पास मत रखो।" रागिनी जबरदस्ती वाले अंदाज में ब्रीफकेस उससे लेते हुए बोली--- "लंच खत्म करो तब तक में चेंज करती हूं। रेलवे स्टेशन के क्लाक रूम में ब्रीफकेस जमा करा देंगे।"

उदयवीर न समझने वाले भाव से खड़ा उसे देखता रहा।

"वक्त क्यों खराब कर रहे हो। लंच शुरू करो। मैं अपने कमरे में चेंज करती हूँ।" रागिनी बोली--- "मुझे तो अभी विजय ने बताया कि असल में वो क्या कर रहा है। मेरे से पहले बात की होती तो मैं ये सारा मामला निपटाने का कोई और भी बढ़िया रास्ता बता देती। खैर, ये बातें बाद में करेंगे। रुपयों को रेलवे स्टेशन के क्लॉक रूम में रखना है। लंच खत्म करके आ जाओ।" कहने के साथ ही ब्रीफकेस थामे रागिनी बाहर निकल गई।

उदयवीर अनिश्चित सा खड़ा रहा। वो कुछ भी नहीं समझ पा रहा था कि क्या मामला है। रागिनी को सब कुछ मालूम है तो जाहिर है कि विजय ने ही बताया होगा। लेकिन विजय ने कैसे बता दिया। बाद की बात है ये, पहले ब्रीफकेस में मौजूद छः लाख रागिनी के साथ, रेलवे स्टेशन के क्लॉक रूम में रख आए।

उदयवीर टेबल पर मौजूद लंच की तरफ बढ़ गया।

रागिनी को पूरा विश्वास हो चुका था कि ओबराय ने उससे जो-जो बातें कहीं हैं, बिल्कुल सच कहीं हैं। छः लाख उसके पास था और उदयवीर ने भी उसकी कही किसी बात पर इन्कार नहीं किया था। देख लेगी वो सबको। अपने कमरे में ब्रीफकेस थामे पहुंची। उसके बाद आनन-फानन अपने दो-चार कपड़ों को उसने समेट कर अपने बैग में डाला, जिसमें जेवरात और नगद रुपया पड़ा था।

और तो कोई सामान था नहीं उसके पास।

बैग कंधे पर लटकाए, हाथ में ब्रीफकेस थामे कमरे से निकली और शांत ढंग से सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई। वो जानती थी, उदयवीर दस मिनट से पहले उसके कमरे में पहुंचेगा नहीं। रिसेप्शन, पर पहुंचकर उसने 'बिल' चुकता किया और पार्किंग में खड़ी अपनी कोरियाई वैन में पहुंची और स्टार्ट करने के बाद वैन होटल से बाहर लेती चली गई।

रागिनी के होंठ भिचे हुए थे। आंखों में सख्ती थी। विजय की हरकत पर उसे गुस्सा आ रहा था, लेकिन वो जानती थी कि अभी गुस्से को दबाकर चलना होगा। जब तक नब्बे करोड़ नहीं मिल जाते। तब तक सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करते जाना होगा।

पूछते-पाछते आधे घंटे बाद रागिनी ने कोरियाई वैन एक ऐसी दुकान के सामने रोकी जिसके बाहर लगे बोर्ड पर लिखा था--- "यहां नाटक ड्रामे का सामान मिलता है।"

■■■

उदयवीर ने अपने हिसाब से लंच जल्दी ही समाप्त किया और हाथ-मुंह धोकर रागिनी के कमरे में जा पहुंचा। खुला दरवाजा और कमरे को खाली सा पाकर उसे अजीब सा महसूस हुआ। उसने जल्दी से बाथरूम वगैरह चैक किया। न रागिनी मिली न ही उसका कोई समान नजर आया।

उदयवीर का दिल जोरों से धड़का। वो समझ गया कि गड़बड़ है । रागिनी कहीं भी नहीं थी। छः लाख भी ले गई। उसी वक्त दरवाजे पर आहट हुई। उदयवीर फौरन पलटा ।

वेटर भीतर प्रवेश कर रहा था।

"साहब आप।" वेटर ने उसे देखा।

"मेमसाहब कहां है। यहां तो... ।" उदयवीर ने कहना चाहा।

"मेमसाहब तो 'चैक आउट' कर गई है। दस-पन्द्रह मिनट हो गए।"

उदयवीर हक्का-बक्का सा खड़ा रह गया।

"क्या हुआ साहब ?" वेटर उसकी हालत देखकर कह उठा।

"कुछ नहीं।" उदयवीर ने गहरी सांस ली। उसका दिल किया, अपना माथा पीट ले। जाने कितनी कोशिश और कैसे-कैसे जुगाड़ भिड़ाकर बेदी ने छः लाख का इन्तजाम किया था और उन्हें वो ले भागी।

"मेमसाहब तो आपको जानती थी साहब जी ।"

"हां। बहुत पुरानी जान-पहचान थी।" उदयवीर ने गहरी सांस ली और कमरे से बाहर आ गया।

उदयवीर जानता था कि इस वक्त उसका मन कितना खराब हो रहा था। लेकिन रागिनी ने ऐसा क्यों किया। अपने कमरे में पहुंचकर भारी मन से उदयवीर कुर्सी पर जा बैठा। धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि रागिनी को विजय का फोन नहीं आया। उसे ये सब बातें कहीं और से मालूम हुई हैं। और चालबाजी से उन्हीं बातों के दम पर, उसे बेवकूफ बनाकर छः लाख ले गई।

बहुत बुरा हुआ।

विजय को ये सब बताना चाहिए।

लेकिन दो बातें सोचकर उदयवीर ने बताने वाली सोच को इस्तेमाल नहीं किया। एक तो यह कि ओबराय के बंगले पर फोन करने से, विजय के लिए कोई दिक्कत न खड़ी कर दे। दूसरी सोच ये कि यहां हुई गड़बड़ के बारे में सुनकर, विजय अपना काम न खराब कर ले।

आखिरकार उदयवीर इसी नतीजे पर पहुंचा कि विजय या शुक्रा का फोन आया तो उस वक्त हवा का रुख देखकर ही उन्हें बताएगा कि छः लाख हाथ से निकल गए हैं। रागिनी खिसक गई। है। साथ ही उदयवीर अपने पर झल्ला रहा था कि रागिनी ने कितनी आसानी से उसे बेवकूफ बना दिया। वो जानता था कि अब रागिनी को तलाश करने का कोई फायदा नहीं। वो मिलने वाली नहीं।

■■■

शाम के पांच बज रहे थे।

ओबराय के बंगले के गेट के पास टैक्सी आकर रुकी। टैक्सी के पीछे वाला दरवाजा खोलकर सरदार जी बाहर निकले। फिर उन्होंने मीडियम साइज का सूटकेस और सीट पर रखी कुछ फाइलें उठाई। ड्राइवर को सौ का नोट दिया। ड्राइवर ने टैक्सी बैक की और चला गया।

सरदार जी ने गहरे हरे रंग का सूट पहन रखा था। लाल पगड़ी सिर पर थी। दाढ़ी काली थी। लम्बाई सामान्य थी। वो सूटकेस उठाए गेट के पास पहुंचे।

गेट के भीतरी तरफ खड़ा नन्दराम, सरदार जी को ही देख रहा था। सरदार जी ने सूटकेस नीचे रखा और एक हाथ से पैंट ऐसे ऊपर की जैसे नीचे खिसक रही हो। दूसरे हाथ में फाइलें थी ।

"किससे मिलना है सरदार जी ?" नन्दराम ने पूछा।

"तुम यहां के दरबान हो ?" सरदार जी की आवाज न मोटी, न पतली थी।

"हां। लेकिन...।"

"तो फिर देखता-पूछता क्या है। कुण्डा खोल। अन्दर आने दे।" सरदार जी ने कहा।

"आप हैं कौन ?" नन्दराम ने उलझन भरे स्वर में कहा।

"ओए, ओबराय साहब ने तेरे को बताया नहीं। उनकी चण्डीगढ़ वाली कम्पनी से आया हूं। कम्पनी का हिसाब-किताब लेकर। उन्होंने ही बुलाया था। एकाउंटेंट हूं मैं।"

"मैं अभी मालिक से बात करता हूं।"

"क... कर। किसी से भी बात कर।" कहने के साथ ही सरदार जी ने पुनः पैंट ऊपर खींची--- "लेकिन जरा जल्दी कर बहुत लम्बे सफर से आया हूं।"

नन्दराम पलटकर केबिन में प्रवेश कर गया।

मिनट भर बाद ही बाहर निकला।

"पूछ लिया मेरे बारे में दरबान।"

"हां जी पूछ लिया।" नन्दराम बोला--- "आपका नाम क्या है?"

"परमजीत सिंह। घर का पता भी बताऊं क्या ?"

"उसकी कोई जरूरत नहीं।" कहते हुए नन्दराम ने विशाल गेट के भीतर का छोटा सा पल्ला खोला--- “भीतर आ जाइए। मैं अभी नौकर को बुलवाकर, आपको मालिक तक पहुंचा देता हूं।"

सरदार जी सूटकेस उठाए भीतर आ गए।

सरदार परमजीत सिंह और कोई नहीं, रागिनी ही थी। जो इस वेष में बंगले पर आ पहुंची थी और जरा भी पहचान में नहीं आ रही थी।

■■■

सुमित्रा, सरदार परमजीत सिंह (रागिनी) को लेकर ओबराय के पास पहुंची।

"मालिक, ये साहब।" सुमित्रा ने कहना चाहा।

ओबराय सिर हिलाकर कह उठा।

"हां। इसने आना था।"

"गुड ईवनिंग सर।" सरदार के वेश में रागिनी ने कहा।

"ईवनिंग।" हौले से कहने के पश्चात ओबराय, सुमित्रा से बोला--- "इनके रहने का इन्तजाम कर दो।"

“जी नीचे के कमरे में...।"

"मेरे बगल वाले कमरे में ये रहेंगे। ऑफिस का हिसाब चैक कराकर फौरन वापस भी ये जाएंगे।"

सुमित्रा वहां से चली गई।

रागिनी ने दरवाजा बंद किया और पलट कर मुस्कराई।

ओबराय भी मुस्कराया।

"तुम तो पहचानी नहीं जा रही।" ओबराय ने कहा।

"बहुत बढ़िया मेकअप कराया है।"

"गुड। लेकिन मैं चाहता हूं, जिस काम के लिए तुम यहां आई हो वो काम जल्दी से खत्म कर दो।"

रागिनी की आंखों में खतरनाक भाव उभरे।

"काम जल्दी खत्म करना है। तभी तो आई हूं।" रागिनी की धीमी आवाज में दरिन्दगी भर आई थी।

"मेरे बगल वाले कमरे में तुम्हारे रहने का इन्तजाम किया है।" ओबराय बोला--- "प्रिया का कमरा कौन सा है। कुछ देर बाद तुम्हें बता दूंगा। सावधान रहना। किसी को भी शक न हो कि तुम रागिनी हो।"

"पूरी तैयारी के साथ आई हूं। ऐसे में किसी को शक नहीं होने दूंगी।" रागिनी की आवाज में पक्कापन था ।

"दूसरों की नजरों में तुम चण्डीगढ़ से लम्बा सफर तय करके आई हो। इसलिए तुम्हें एक-दो घंटे आराम करना चाहिए।"

"ठीक है। बगल वाला कमरा किस तरफ है। दाईं या बाईं तरफ ?"

"बाईं तरफ।" कहने के साथ ओबराय ने हाथ से दिशा का इशारा भी किया।

"विजय और शुक्रा कहां है ?" रागिनी ने पूछा।

"बंगले के पीछे, सर्वेन्ट क्वार्ट्स में। उनके सामने पड़ने की जरूरत नहीं। अपने काम की तरफ ध्यान दो।"

जवाब में रागिनी मुस्कराई और बाहर निकल गई।

ओबराय ने सिगार उठाया और शांत भाव से सुलगा लिया।

पन्द्रह मिनट बाद ही प्रिया ने ओबराय के कमरे में प्रवेश किया।

"आज तुम टहलने के लिए कमरे से बाहर नहीं निकले ?" प्रिया ने प्यार से पूछा।

"यूं ही।" ओबराय मुस्कराया।

"चिन्ता मत करो। आज मैं तुम्हारे साथ रहूंगी।" प्रिया पास आ गई--- "अगर आज फिर किसी ने तुम पर हमला किया तो वो आसानी से पहचाना जाएगा। मैं...।"

"कोई जरूरत नहीं। मुझे अकेला छोड़ दो। तुम क्या समझती हो, ऐसी बातों से मैं डर गया हूं।" ओबराय ने उसे देखा।

"मेरा ये मतलब नहीं था, मैं...।"

"छोड़ो इन बातों को। मुझे अपना ध्यान रखना आता है।" ओबराय ने लापरवाही से कहा।

"सरदार साहब कौन हैं ?"

"वो परमजीत सिंह है। चण्डीगढ़ की ब्रांच से आया है, हिसाब चैक कराने के लिए बुलाया है।"

"चण्डीगढ़ गए, तुम्हें बहुत वक्त हो गया है।"

"हां। तभी तो वहां का हिसाब मंगवाना पड़ा।"

"मैं चलती हूं। डिनर एक साथ लेंगे।" प्रिया ने मुस्कराकर कहा।

ओबराय भी मुस्कराया।

प्रिया बाहर निकल गई। वो अपने कमरे में पहुंची। चेहरे पर सोच के भाव नाच रहे थे। उसने टेबल के ड्राअर से डायरी निकाली और वहां लिखे फोन नम्बरों को चैक करने लगी। जल्दी ही उसे चण्डीगढ़ वाली ब्रांच का नम्बर मिल गया। उसने घड़ी में वक्त देखा। छः बजने वाले थे। वो जानती थी अभी ऑफिस बंद नहीं हुआ होगा। फोन के पास पहुंची और रिसीवर उठाकर चण्डीगढ़ वाली ब्रांच के नम्बर मिलाने लगी।

एक ही बार में लाइन मिली। उधर से रिसीवर उठाया गया।

"हैलो।" कानों में आवाज पड़ी।

"जी आपके यहां मिस्टर परमजीत सिंह काम करते हैं।"

"यस। वो एकाउंट्स डिपार्टमेंट में हैं। आप कौन हैं ?"

"मैं उनकी रिश्तेदार बोल रही हूं।" प्रिया ने शांत स्वर में कहा--- "उनसे बात करा दीजिए।"

"होल्ड कीजिए।"

करीब आधा मिनट लाइन में खामोशी रहने के पश्चात आवाज आई ।

"हैलो।"

"परमजीत सिंह जी। "

"जी हां। मैं बोल रहा हूं। आप कौन हैं ?" दूसरी तरफ से आवाज आई।

"आपके ऑफिस में कोई और सरदार साहब का नाम परमजीत सिंह तो नहीं है ?" प्रिया ने पूछा।

"जी नहीं। ऑफिस में परमजीत सिंह सिर्फ मैं ही हूं। आप कौन..."

प्रिया ने रिसीवर रख दिया। होंठ भिंच से गए थे।

"गॉड इज ग्रेट। तो दिनेश मुझे खत्म कराने के लिए किसी को सरदार परमजीत बनाकर ले आया है।" प्रिया होंठों ही होंठों में बड़बड़ा उठी--- “मैं जानती थी कि अपने पर कल रात हुए हमले की वजह से दिनेश कोई कदम अवश्य उठाएगा।"

■■■

शाम के सात बज रहे थे। दिन की रोशनी अभी कायम थी। बेदी अपने क्वार्टर से निकला और सीढ़ियां उतरकर नीचे आ गया। पास ही शुक्रा का क्वार्टर था। वहां जाने के लिए पलटने लगा कि ठिठक गया। उसकी निगाह कुछ दूर टहलते सरदार साहब पर पड़ी। शरीर पर सूट पहन रखा था।

बेदी ने अजीब सी निगाहों से सरदार साहब की तरफ देखा। सरदार साहब ने भी दूर से उसे देखा और चलते हुए बंगले के साथ मुड़ते हुए आगे चला गया। बेदी उलझन भरी निगाहों से उधर ही देखता रहा। उसे, अपनी सोचों में हल्की सी चुभन महसूस हुई।

तभी दयाल नजर आया। जो अपने क्वार्टर से निकला था।

"दयाल।"

"हां।" दयाल ने उसे देखा।

"सरदार साहब कौन हैं जो...।"

"ये चण्डीगढ़ वाली ब्रांच से आए हैं। मालिक को खाते-वाते दिखाने...।"

"हूं।"

"एक-आध दिन यहीं रहेंगे।" कहते हुए दयाल आगे बढ़ गया।

बेदी पलटा और शुक्रा के क्वार्टर में प्रवेश कर गया।

कुर्सी पर बैठे शुक्रा ने बेदी का चेहरा देखा तो कह उठा।

"क्या बात है विजय ?"

"खास नहीं।" कुर्सी पर बैठते हुए बेदी ने कहा--- "और खास हो भी सकती है।"

"क्या मतलब ?"

"ओबराय की कम्पनी की, चण्डीगढ़ वाली ब्रांच से एक सरदार साहब आए हैं। अभी मैंने उसे देखा। लेकिन उसकी चाल मुझे पहचानी सी लगी।"

"यूं ही ऐसा लगा होगा।"

"हो सकता है।" बेदी ने कहा और शुक्रा को देखा--- "कल रात ओबराय की जान लेने की कोशिश की गई और आज दिन में ओबराय बाहर गया फिर शाम को चण्डीगढ़ वाली ब्रांच से कोई बंगले पर आ गया।"

शुक्रा की आंखें सिकुड़ीं।

"तुम...तुम कहना क्या चाहते हो ?"

"वही जो मैंने तुम्हें पहले भी कहा था कि अब ओबराय अपनी तरफ से कोई इन्तजाम करेगा।"

शुक्रा चौंका।

"तुम्हारा मतलब कि ओबराय, प्रिया को खत्म करने के वास्ते किसी को बहाने से लाया है।"

"हां। यही काम प्रिया कर चुकी है। मेरी ओट में ओबराय और प्रिया अपना ही खेल, खेलने में लगे हैं। दोनों में से कोई भी मुझ पर विश्वास नहीं कर रहा। क्योंकि दोनों की निगाहों में मैं थाली का बैंगन बन चुका हूं जो अपने मतलब की खातिर कहीं भी लुढक सकता है। दोनों की नजरों में मेरी सिर्फ इतनी कीमत है, मैंने उनके बीच चुप्पी और खामोशी की दीवार खड़ी कर रखी है। वो...।"

"हो सकता है तुम्हारा ख्याल गलत हो। सरदार साहब वास्तव में ओबराय की कम्पनी से...।"

"ऐसा हो सकता है। परन्तु मेरा दिल नहीं मानता। उसके चलने का ढंग भी जाने क्यों मुझे पहचाना सा लग रहा है।" कहते हुए बेदी का चेहरा सख्त हो गया--- "शुक्रा, यहां पर मेरा काफी वक्त खराब हो रहा है।"

"मैं समझा नहीं।"

"आज रात हम काम निपटा देंगे।" बेदी के दांत भिचते चले गए।

"तुम्हारा मतलब कि...."

"हां। सिर्फ एक कत्ल। यही मतलब है मेरा।" बेदी ने पहले वाले स्वर में कहा--- "मेरे ख्याल में हम गलत चल रहे हैं, मौका ढूंढ रहे हैं हत्या करने का। मौका इस तरह नहीं मिलता। बल्कि तलाशा जाता है।"

शुक्रा, बेदी को देखता रहा।

"तैयार है तू ?" बेदी ने उसे देखा।

"हां विजय।" शुक्रा गम्भीर था--- "इन्कार का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। किसे खत्म करना है।"

"ओबराय-प्रिया। जो भी हाथ लग जाए। आज रात काम खत्म कर देना है।" बेदी का स्वर कठोर था।

"टोह लेनी शुरू कर देते हैं कि ओबराय या प्रिया इस वक्त क्या-क्या कर रहे हैं। सात तो बज ही चुके हैं।"

■■■