शुक्रवार : 22 मई

जीतसिंह दोपहर के करीब सोकर उठा।
उसकी पिछली रात बहुत बेचैनी से कटी थी। रात डेढ़ बजे वो घर आ कर लगा था और सवेरा होने को था जब कि उसे नींद आयी थी। सारी रात वो यही सोचता करवटें बदलता रहा था और सोच-सोच कर कलपता रहा था कि कैसे जीती बाजी हार में तब्दील हो गयी थी।
खोटे सिक्के की खोटी किस्मत।
नित्यकर्म से निवृत होने के बाद वो चाय बना रहा था जब कि मोबाइल की घण्टी बजी।
उसने लाइन पर एडुआर्डो को पाया।
‘‘फोन आया?’’—जीतसिंह आशापूर्ण स्वर में बोला।
‘‘जीते!’’—एडुआर्डो की शिकायतभरी आवाज उसके कान में पड़ी—‘‘कोई ‘हल्लो’ तो कर ले। कोई ‘गुड मार्निंग’, ‘गुड आफ्टरनून’ तो कर ले!’’
‘‘सॉरी डैडी। मैं बस...यूँ ही...जरा...’’
‘‘क्या बस? क्या यूँ ही? क्या जरा?’’
‘‘कैसे फोन किया?’’
‘‘उसी वजह से किया जो लगता है कुछ ज्यादा ही तेरे माइन्ड पर हावी है। ऐसा क्यों, जीते?’’
‘‘अरे, कुछ नहीं है। कोई बात नहीं है। अभी बोले तो फोन आया?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘ओह ।’’
‘‘औना पौना फोन नम्बर हाथ आया ।’’
‘‘औना पौना!’’
‘‘हाँ। नम्बर के दस डिजिट्स में से एक—लास्ट वाला—डिजिट नहीं पकड़ में आ रहा ।’’
‘‘बाकी कैसे पकड़ में आये?’’
‘‘जिस नोट पैड पर मैंने उस कालर का नम्बर नोट किया था—जिसका टॉप का पेज, जिस पर कि मैंने नम्बर नोट किया था, जो मैंने बोला था कि फाड़ के फेंक दिया था...जीते, आज मैंने नोट किया कि नोट पैड पर उस नम्बर का इम्प्रेशन था...’’
‘‘मंगल को नम्बर नोट किया, तब के बाद नोट पैड आज शुक्र को देखा?’’
‘‘हाँ, भई। इन बिटविन जरूरत ही न पड़ी उस पर कुछ नोट करने की। आज जरूरत पड़ी तो वो इम्प्रेशन मेरे को दिखाई दिया ।’’
‘‘तो?’’
‘‘तो मैंने उस पर पेन्सिल का सिक्का जेन्टली घिसा तो डिजिड्स दिखाई देने लगे ।’’
‘‘ओह ।’’
‘‘जीते, लास्ट डिजिट क्लियर नहीं है, पकड़ में नहीं आ रहा। बाकी नाइन डिजिट्स बोलता है। माँगता है तो नोट कर ले ।’’
‘‘माँगता है। बोलो!’’
‘‘989787403। टैंथ डिजिट कुछ-कुछ दिखाई देता है, उससे मैं ने अन्दाजा लगाया है कि वो 9 2, 4, 7, 9 नहीं हो सकता। टैंथ डिजिट 3, 5, 6, 8 और 0 में से है। ऐसे पाँच नम्बर बनेंगे, ट्राई करना ।’’
‘‘ठीक!’’
‘‘चाहे तो दस के दस ट्राई करना ।’’
‘‘पाँच ही करूँगा, पण काल आये तो खबर फिर भी करने का ।’’
‘‘श्योर ।’’
सम्बन्ध विच्छेद हो गया।
जीतसिंह कुछ क्षण अपना अगला कदम निर्धारित करने की कोशिश में खामोश बैठा रहा फिर उठा और फ्लैट से निकल कर नीचे सड़क पर पहँुचा। करीब ही पोस्ट आफिस था जिसके बाहर फुटपाथ पर दो पीसीओ थे। वो एक में दाखिल हुआ, एक रुपये के पाँच सिक्के उसने फोन के लोहे के बक्से पर रखे और फिर 9897874030 पर काल लगाई।
तुरन्त उत्तर मिला।
‘‘बद्रीनाथ बोलता है ।’’—वो बोला।
‘‘कौन बद्रीनाथ?’’—पूछा गया।
‘‘जिसके वास्ते कोई वालपोई फोन लगाया ।’’
‘‘कौन वालपोई?’’
जीतसिंह ने लाइन काट दी।
जिसको ये नहीं मालूम था कि वालपोई किसी जगह का नाम था या किसी शख्स का नाम था, वो एडुआर्डो को काल करने वाला नहीं हो सकता था।
उसने दूसरा नम्बर 9897874038 डायल किया।
जवाब जनाना आवाज में मिला।
‘‘बद्रीनाथ बोलता है ।’’
‘‘बॉस आफिस में नहीं है ।’’—आवाज आयी—‘‘फोन इधर छूट गया, इस वास्ते मैं पिक किया ।’’
‘‘ये कौन-सा आफिस है?’’
‘‘मैन, तुम फोन लगाया, तुम्हेरे को नहीं मालूम?’’
‘‘खाली नम्बर मालूम, मैडम ।’’
‘‘ये सिनेविस्टा टेलेन्ट एजेन्सी का आफिस है, आडीशन का वास्ते आना माँगता है तो शाम को फोन लगाना और अप्वायन्टमेंट लेना। नाओ, गैट आफ दि लाइन ।’’
लाइन कट गयी।
जीतसिंह ने उस बार दसवाँ अंक ‘6’ ट्राई किया।
निरन्तर घण्टी बजती रही, कोई जवाब न मिला।
लाइन काटकर उसने ‘6’ की जगह ‘5’ ट्राई किया।
‘‘हल्लो!’’—जवाब मिला—‘‘नाना चौक टैक्सी स्टैण्ड ।’’
‘‘ये टैक्सी स्टैण्ड का नम्बर है?’’—जीतसिंह सावधान स्वर में बोला।
‘‘बरोबर। ट्वेन्टी फोर आवर्स सर्विस। किधर माँगता है टैक्सी?’’
‘‘नहीं माँगता ।’’
आखिरी नम्बर—अंक ‘3’ के साथ—डायल करने पर घोषणा सुनाई देने लगी कि वो ‘टैम्परेरिली स्विच्ड ऑफ’ था।
उसने 9897874036 फिर ट्राई किया।
घण्टी निरन्तर बजती रही, जवाब न मिला।
बहरहाल उसे उन्हीं दो नम्बरों से कोई उम्मीद जान पड़ी जिनके आखिरी अंक ‘6’ और ‘3’ थे, और जिन्हें वो कभी बाद में फिर ट्राई कर सकता था।
वो बूथ से निकलने ही लगा था कि उसे उस मोबाइल नम्बर की याद आयी जो पिछली रात उन्होंने मुरली चेराट से निकलवाया था। उसने अपना मोबाइल निकाल कर वो नम्बर देखा और उसे पीसीओ के फोन पर डायल किया।
‘ये नम्बर मौजूद नहीं है’, की घोषणा होने लगी।
उसको वैसी ही उम्मीद थी। नया सिम हासिल कर लेना हँसी खेल बन गया हुआ था, लोग बाग किसी खास जरूरत के लिये नया सिम हासिल करते थे और जरूरत पूरी हो जाने के बाद उसे फेंक देते थे।
मोबाइल से उसने नवलानी को काल लगाई।
कोई जवाब न मिला।
क्या दिन था!
वो क्राफोर्ड मार्केट के रास्ते में था जबकि फोन की घण्टी बजी।
शेखर नवलानी का फोन था।
उसने काल रिसीव की।
‘‘फोन किया था?’’—नवलानी की आवाज आयी।
‘‘हाँ, साहब ।’’
‘‘मैं बहुत बिजी हूँ आज। मोबाइल की तरफ ध्यान देने का भी टाइम नहीं। क्या बात थी?’’
‘‘कोई खास बात नहीं थी, साहब, ऐसीच फोन किया था कि शायद आपके पास मेरे लायक कोई खबर हो!’’
‘‘भई, है तो सही!’’
‘‘क्या, साहब?’’
‘‘तुम्हारी खुन्नस में कही बात में दम निकल आया है ।’’
‘‘बोले तो?’’
‘‘कल जब कोबरा के आफिस में मिले थे तो तुमने कहा था कि दामाद सेठ जी की मौत से पहले भी इधर हो सकता था। दोनों बेटों में से भी कोई यूं पहले ही इधर हो सकता था। याद आया?’’
‘‘हाँ, साहब। कोई था इधर?’’
‘‘दामाद था। उसकी प्लेन बुकिंग बताती है कि सोमवार ग्यारह मई की सुबह कोलकाता से मुम्बई पहँुचा था। आगे कोबरा की तफ्तीश से पता चला है कि एयरपोर्ट से ही टैक्सी पकड़ कर पूना चला गया था। इस बात की भी तसदीक हुई है कि वहाँ कनाट रोड पर के होटल स्काईलार्क में उसकी बुकिंग थी। तेरह मई बुधवार शाम की उसकी वापिस कोलकाता की फ्लाइट थी। इस लिहाज से ससुरे से अगर वो मिला होगा तो मंगल या बुध को ही मिला होगा ।’’
‘‘सोम को क्यों नहीं, साहब?’’
‘‘क्यों कि ये कनफर्म है कि एयरपोर्ट से सीधा पूना चल दिया था। ससुरे के पास गया होता तो उसी दिन पूना चल देने की कोई तुक बाकी न बचती। वो अपने बिजनेस के सिलसिले में इधर आता है, शाम को पूना पहँुचता तो बिजनेस कैसे अटेंड कर पाता!’’
‘‘ठीक!’’
‘‘वैसे कोई जरूरी नहीं कि वो ससुरे से मिला हो। उसके इधर के इतने ट्रिप लगते थे कि हो सकता है उसने किसी ट्रिप पर ससुरे से मुलाकात जरूरी न समझी हो या उसे मुलाकात का टाइम न मिला हो। जमा, ये न भूलो कि वो दामाद था। हो सकता है वो ऐसी किसी मुलाकात के मुलाहजे में पड़ना जरूरी न समझता हो ।’’
‘‘हो तो सकता है, साहब!’’
‘‘छोटे लड़के अशोक चंगुलानी की भी इधर हाजिरी की औनी पौनी तसदीक हुई है ।’’
‘‘औनी पौनी बोला, साहब?’’
‘‘हाँ। गुरुवार रात ग्यारह बजे की ब्रिटिश एयरवेज की लन्दन की फ्लाइट पर उसकी बुकिंग का पता लगा है लेकिन वो आया कब था, ये अभी पता नहीं लग पा रहा ।’’
‘‘ऐसा?’’
‘‘हाँ। कोबरा के पार्टनर आदिनाथ घनेकर ने ये सम्भावना जाहिर की थी कि वो लन्दन से इन्डिया किसी और शहर में पहँुचा था और फिर वहाँ से कोई लोकल फ्लाइट पकड़ कर मुम्बई आया था। इस लाइन पर उसकी पड़ताल अभी जारी है। कहता है ऐसी जानकारी इण्टरनेशनल एयरलाइंस से निकलवाना आसान होता है, लोकल एयरलाइन्स हुज्जत करती हैं ।’’
‘‘फिर भी साहब, ये तो पक्की है न कि कत्ल से दो दिन पहले वो इण्डिया में था, मुम्बई में था?’’
‘‘हाँ। इस बाबत दूसरे सिरे से भी पड़ताल करने की कोशिश की जा रही है ।’’
‘‘दूसरा सिरा!’’
‘‘इंगलैंड। छोटा लड़का इधर आकर उतरा तो दिल्ली, कोलकाता, मद्रास जैसे किसी भी मैट्रोपॉलिटन टाउन में हो सकता है लेकिन उधर से प्लेन पर चढ़ा तो किसी एक ही जगह से होगा न! मालूम पड़ जायेगा ।’’
‘‘साहब, ये दो भीड़ू—दामाद और छोटा लड़का—वारदात से पहले भी मुम्बई में थे तो अपने मँुह से क्यों न बोले?’’
‘‘तुम्हें क्या पता नहीं बोले! हमें क्या पता नहीं बोले! तुम से क्यों बोलेंगे? मेरे से क्यों बोलेंगे? बोलने वालों से बोला होगा तो हमें क्योंकर मालूम पड़ेगा?’’
‘‘ये भी ठीक है ।’’
‘‘सुष्मिता से बात करना। शायद वो इस बाबत कुछ जानती हो!’’
‘‘ठीक!’’
‘‘वसीयत की बाबत बात की?’’
‘‘टेम नहीं लगा, साहब। अब एक ही बार करूँगा ।’’
‘‘ठीक है। बहरहाल मौजूदा जानकारी के तहत अब इस बात को नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता कि और लोग भी हैं जिनमें से किसी ने कत्ल की सुपारी लगाई हो सकती है। ये कतई जरूरी नहीं कि लड़के ने या दामाद ने ऐसा किया हो, ऐसा यकीन में न आने वाला जुल्म ढाया हो, लेकिन अब ये नहीं कहा जा सकता कि ऐसा हो ही नहीं सकता। मौजूदा जानकारी की रू में ‘लड़के इंगलैंड में, दामाद कोलकाता में, सुपारी उठाने वाला मुम्बई में’ वाली ऑब्जेक्शन दमदार नहीं लगती। यूँ ये बात भी स्थापित होती है कि अकेली सुष्मिता ही नहीं थी जिसकी मर्डर वैपन तक पहँुच थी जो कि चंगुलानी हाउसहोल्ड के फैंसी कटलरी सैट का हिस्सा था। सुष्मिता पर—तुम्हारे पर भी—अगर सच में कत्ल का इलजाम आयद होगा तो ये बातें उसके हक में जायेंगी। गुंजन शाह ने केस पकड़ा तो ये उस के लिए अच्छा अम्यूनिशन साबित होगा ।’’
‘‘अम्यू...अम्यू...बोले तो!’’
‘‘असलाह! युद्ध में काम आने वाला गोला बारूद। गुंजन शाह कोर्ट में केस युद्ध की तरह ही लड़ता है ।’’
‘‘ओह!’’
‘‘मैं कल से उससे कान्टैक्ट की कोशिश में हूँ। हो नहीं पा रहा। होते ही नतीजे की तुम्हें खबर करूँगा ।’’
‘‘थैक्यू बोलता है, साहब ।’’
‘‘बहरहाल तुम्हें बधाई है कि तुम्हारा तुक्का कारगर साबित होता लग रहा है ।’’
‘‘सब आपको बधाई है, साहब ।’’
‘‘बन्द करता हूँ ।’’
जीतसिंह क्राफोर्ड मार्केट पहँुचा।
वहाँ हार्डवेयर स्टोर के बाहर जो उसका अड्डा था, वो पनवाड़ी की दुकान जैसा था। वहाँ कोई काम की चीज थी तो दीवार में फिक्स एक लोहे के पल्लों वाली अलमारी थी जिसमें वो अपने औजार, की-ब्लैंक्स और कुछ बहुत ही पुरानी किस्मों के, अनोखी-अनोखी शक्लों वाले ताले ये स्थापित करने के लिये रखता था कि वो कैसा भी ताला हो, उसे बड़े आराम से हैंडल कर सकता था। उस अलमारी का दूसरा रोल ये था कि वो उसकी कीमती टूल किट को महफूज रखने का ठिकाना था।
वो वहाँ टूल किट ही छुपाने आया था लेकिन दिखावे के लिये थोड़ी देर वहाँ बैठने का भी उसका इरादा था।
उसने अलमारी का ताला खोला और उसके पल्ले खींचे।
अलमारी में एक खास चैम्बर था जिसमें टूल किट को छुपाया जा सकता था। अपना वो विशेष काम करके उसने पीठफेरी ही थी कि दो आदमी उसके सामने आ खड़े हुए।
जीतसिंह सकपकाया।
जैसे एकाएक वो वहाँ पहँुचे थे, उससे न जाने क्यों उसे लगा कि वो उसी के इन्तजार में करीब कहीं मौजूद थे। दोनों सुथरे कपड़े पहने थे, फिर भी सूरत से टपोरी जान पड़ते थे। एक लम्बा था और काली पतलून के साथ खुले कालर वाली नीली कमीज पहने था और उसके गले में ‘अल्लाह’ गुदी ताबीज थी, दूसरा मोटा था और जींस और टी-शर्ट में था।
‘‘जीतसिंह!’’— लम्बा बोला।
जीतसिंह ने सहमति में सिर हिलाया।
‘‘ताला-चाबी? जो ये ठीया चलाता है?’’
‘‘वही। क्या माँगता है?’’
‘‘अरे, तेरे से और क्या माँगता होयेंगा! जो तेरे को आता है, वही तो माँगता होयेंगा!’’
‘‘बोले तो?’’
‘‘एक ताला खोलना है। आटोमैटिक लॉक वाला दरवाजा। लॉक लग गया, चाबी अन्दर रह गयी। चल के खोलने का ।’’
‘‘खाली खोलने का या चाबी भी बनाने का?’’
‘‘खाली खोलने का ।’’
‘‘किधर?’’
‘‘किधर भी। कार में ले के जायेंगा न! क्या वान्दा है?’’
‘‘है न! ठीया बन्द कर के जायेंगा तो इधर काम का हर्जा होयेंगा न!’’
‘‘तो?’’
‘‘किधर पास जाना है तो दो सौ रुपये। दूर जाना है तो पाँच सौ?’’
‘‘भीड़ू, डाक्टर का माफिक चार्ज करता है!’’
‘‘डाक्टर ठीये पर पाँच सौ चार्ज करता है। बड़ा डाक्टर हजार। और विजिट पर जाता ही नहीं ।’’
‘‘ठीक है, ठीक है। भायखला। माउन्ट रोड। पास है या दूर?’’
‘‘दूर ।’’
‘‘ठीक है, चल ।’’
जीतसिंह ने कुछ औजार सम्भाले, अलमारी को ताला लगाया और उनके साथ हो लिया।
मार्केट से बाहर निकल कर वो पार्किंग में पहँुचे जहाँ खड़ी एक वैगन-आर में वे सवार हुए—ड्राइिंवग सीट पर मोटा, उसके बाजू में पैसेंजर सीट पर जीतसिंह और पीछे लम्बा—जैसे लम्बा साहब हो और बाकी दोनों स्टाफ हों।
कार आगे बढ़ी।
मंजिल तक का पूरा रास्ता खामोशी से कटा।
वो एक छ:मंजिला इमारत में दाखिल हुए और लिफ्ट पर सवार हो कर उसके टॉप फ्लोर पर पहँुचे। वहाँ मोटे ने एक बन्द दरवाजे की चौखट में लगी कालबैल बजाई।
एक अधेड़ व्यक्ति ने दरवाजा खोला।
‘‘बिग बॉस किधर है, मिर्चू?’’—लम्बे ने पूछा।
‘‘हाल में है ।’’— जवाब मिला।
‘‘क्या करता है?’’
‘‘बात करता है ।’’
‘‘साथ कौन है?’’
‘‘मांगेश गाबले...’’
जीतसिंह के कानों में घण्टियाँ बजने लगीं।
बिचौलिया! वहाँ!
‘‘...और वाल्ट के दो भीड़ू। मैनेजर और क्लर्क ।’’
क्लर्क!
‘‘हमेरे वास्ते क्या बोल के रखा?’’
‘‘उधरीच जाने का। बड़ा बाप को शक्ल दिखाने का ताकि मालूम पड़े कि लौट आयेला है। बाकी बड़ा बाप खुद बोलेगा ।’’
‘‘ठीक है ।’’
वो आगे बढ़ा। जीतसिंह की कोहनी थामे मोटा उसके पीछे चलने लगा।
‘‘बोले तो—जीतसिंह व्याकुल भाव से बोला—‘‘वो बन्द दरवाजा...ताला...’’
‘‘अभी। अभी ।’’
‘‘पण...’’
‘‘अरे, काहे टेंशन लेता है!’’
‘‘टेम खोटी होता है न!’’
‘‘वान्दा नहीं। ज्यास्ती चार्ज कर लेना। अभी खामोश रहने का ।’’
‘‘बिग बॉस कौन?’’
‘‘अभी बस कर न!’’
‘‘इतना तो बोलो। मेरे को सस्पेंस ।’’
‘‘सुनेगा तो पतलून गीली करेगा ।’’
‘‘बाप, बोलो न!’’
‘‘महबूब फिरंगी ।’’
जीते की बोलती अपने आप ही बन्द हो गयी।
महबूब फिरंगी!
देवा!
वो तो बहुत बड़ा गैंगस्टर था, ‘भाई’ था, दाउद तक उसकी पहँुच बताई जाती थी।
‘आसार अच्छे नहीं थे।’—उसने चिन्तित भाव से सोचा—‘अन्जाने में उसका कदम शेर की माँद में पड़ गया था।’
अब उसका दिल गवाही दे रहा था कि बतौर ताला-चाबी-मिस्त्री उस की वहाँ हाजिरी नहीं थी। और जो दूसरी वजह मुमकिन थी, वो उसके प्राण कंपा रही थी।
देवा! रहम!
एक दरवाजा ठेल कर तीनों ने एक हाल में कदम रखा। हाल के बायें बाजू एक आफिस टेबल के पीछे एक चमड़ा मंढी कुर्सी पर एक पचासेक साल का लम्बा चौड़ा निहायत सख्त मिजाज, मोटी मूँछ वाला व्यक्ति बैठा था जिसके सिर पर कानों से नीचे लटकते लम्बे बाल थे, घनी भवें थीं और लम्बी कलमें थी। वो पूरी बांह की झक सफेद कमीज और वैसी ही पतलून पहने था। उसके गले में सोने की मोटी जंजीर थी, बायीं कलाई पर रौलेक्स की घड़ी थी, दायीं पर सोने का मोटा कड़ा था और उसी हाथ की तर्जनी उंगली में नीलम की अँगूठी थी। उस की त्योरी चढ़ी हुई थीं, होंठ भिंचे हुए था और कुर्सी पर बार-बार पहलू बदलने के अन्दाज से लगता था कि बहुत गुस्से में था।
तो ये था बड़ा मवाली महबूब फिरंगी!
उसके सामने जो तीन आदमी अदब से खड़े थे, उनमें से सबसे पहले जीतसिंह की निगाह मुरली चेराट पर ही पड़ी। वो वाल्ट की यूनीफार्म—काली पतलून, सफेद कमीज, काली टाई—में था और वैसी ही यूनीफार्म से सुसज्जित उसके पहलू में खड़ा, उम्र में उससे कोई दस साल बड़ा, क्लीनशेव्ड, चश्माधारी व्यक्ति था जो मुरली चेराट क्लर्क था तो जाहिर था कि मैनेजर था। उससे थोड़ा परे हट के चैक की लाल कमीज और नीली जींस पहने एक तीसरा व्यक्ति खड़ा था जो कि जरूर बिचौलिया मंगेश गाबले था।
लम्बा बड़े अदब से हौले से खांसा।
बिग बॉस ने सिर उठा कर उन तीनों की तरफ देखा और सहमति में सिर हिलाया।
दरवाजे से जरा भीतर वो तीनों ठिठके खड़े रहे।
‘‘बोले तो’’—जीतसिंह दबे स्वर में बोला—‘‘वो बन्द दरवाजा जो...’’
‘‘श श!’’—लम्बा घुड़कता सा बोला।
जीतसिंह ने होंठ भींच लिये।
क्या माजरा था? वहाँ क्या चल रहा था?
‘‘कैमरा सिस्टम’’—बिग बॉस मैनेजर से मुखातिब था—‘‘सब रिकार्ड काहे नहीं किया?’’
‘‘सब किया, सर ।’’—मैनेजर गिड़गिड़ाता सा बोला—‘‘खाली दस मिनट का एक पीरियड बीच में आया जब कि बेसमेंट वाला...वाल्ट वाला कैमरा फंक्शन न किया ।’’
‘‘क्यों न किया?’’
‘‘ऐसा कभी कभार हो जाता है, सर। कभी कोई कनेक्शन ब्रेक हो जाता है, कोई वायर लूज हो जाता है, कैमरे की मकैनिज्म मैलफंक्शन कर जाती है...सर, दस मिनट बाद ही वो कैमरा प्रापर करके चलने लगा था ।’’
‘‘उसी टेम क्यों बिगड़ा जब वो दो भीड़ू उधर थे?’’
‘‘सर...विद ड्यू रिस्पैक्ट, सर...उसने बिगड़ना था तो किसी टाइम तो बिगड़ना ही था, इत्तफाक था कि उस टाइम बिगड़ा ।’’
‘‘साथ में मानीटर भी वहीच टेम बिगड़ा!’’
‘‘नहीं, सर, मानीटर तो परफेक्ट काम करता था ।’’
‘‘तो जो कुछ वाल्ट में हुआ, वो दिखाई क्यों न दिया?’’
‘‘सर, कैमरा काम कर रहा हो तो तभी तो मानीटर पर कुछ आता है न!’’
‘‘स्क्रीन पर कुछ न आये तो मतलब कैमरा का वर्किंग में लोचा?’’
‘‘यस, सर ।’’
‘‘जब लोचा दिखाई दिया तो कैमरा ठीक काहे नहीं किया?’’
‘‘किया, सर, बराबर किया। डिफेक्ट दिखाई देते ही उसको करैक्ट किया। एक वायर लूज...’’
‘‘दिखाई देने में दस मिनट काहे को लगे?’’
मैनेजर खामोश हो गया।
‘‘सर’’—फिर बड़ी मुश्किल से बोल पाया—‘‘ऐसी जगहों के मानीटर पर कोई पर्मानेंट कर के नहीं बैठता...’’
‘‘काहे को नहीं बैठता?’’
‘‘सर, आज तक वहाँ कोई वारदात नहीं हुई। वहाँ वो इलैक्ट्रानिक्स सर्वेलेंस सिस्टम सरकारी हुक्म पर, सरकारी नियम के तहत इंस्टाल किया गया था। हमने उसकी वहाँ कभी कोई जरूरत नहीं समझी थी। वो सिस्टम महज खानापूरी था। अलबत्ता रिकार्डिंग बराबर होती थी जिसको कभी भी देखा जा सकता था, रिव्यू किया जा सकता था ।’’
‘‘किधर हुई बराबर! दस मिनट नहीं हुई ।’’
‘‘सर, इत्तफाक...’’
‘‘मैं क्या करेगा तुम्हेरा इत्तफाक को! इतना नुकसान हो गया, कौन भरेगा?’’
मैनेजर ने जोर से थूक निगली।
‘‘लॉकर का इतना रेंट चार्ज करता है, उसका सिक्योरिटी का जिम्मेदारी लेने का टेम आता है तो इत्तफाक बोलता है! अभी कैसे रिकवरी होगा? इत्तफाक से होगा?’’
‘‘सर, पुलिस में एफआईआर...’’
‘‘माथा फिरेला है! क्या बोलेगा पुलिस में? क्या रखा था, क्या निकल गया? पुलिस पूछेगा साला कैसा लॉकर रैंट पर देता है जो खाली दस मिनट में खुल गया! क्या जवाब देगा?’’
‘‘सर, वो लॉकर नहीं खुल सकता था...’’
‘‘बोले तो अभी भी बन्द है ऐन फिट करके? मेरा माल सेफ?’’
‘‘...कोई करिश्मा हुआ जो खुल गया ।’’
‘‘कौन किया ये करिश्मा?’’
मैनेजर ने अपने क्लर्क की तरफ देखा।
‘‘सर’’—चेराट कम्पित स्वर में बोला—‘‘मैं पहले ही बोला...’’
‘‘अभी फिर बोल ।’’
‘‘सर, या तो सामान रखा जाने के बाद लॉकर ठीक से बन्द नहीं हुआ था...’’
‘‘वो किस का मिस्टेक है? तुम साला क्यों ठीक से बन्द नहीं किया?’’
‘‘सर, हम लॉकर खुलवाते हैं, उसको वापिस बन्द करने में हमारा कोई रोल नहीं होता। लॉकर को बन्द कस्टमर करता है। अगर कस्टमर की चाबी से लॉकर बन्द न हुआ हो तो...’’
‘‘तो नवें भीड़ू को उधर कदम रखते ही मालूम पड़ जाता है कि पाँच सौ लॉकरों में से कौन सा बन्द नहीं हुआ! या वो एक-एक लॉकर को ट्राई करके देखता है कौन सा बन्द नहीं हुआ था! या वो लॉकर के स्टील के ढक्कन के आर-पार देख सकता है एक्सरे का माफिक!’’
चेराट के मँुह से बोल न फूटा।
‘‘साला भेजे में कुछ हैइच नहीं। गोबर भरा है ।’’
चेराट के गले की घण्टी जोर से उछली।
‘‘अभी तू ‘या’ बोला। या लॉकर बन्द नहीं हुआ या और क्या?’’
‘‘या’’—चेराट के मँुह से निकला—‘‘उस सरदार ने लॉकर खोल लिया ।’’
‘‘कौन था वो?’’
‘‘मालूम नहीं, सर। दूसरे भीड़ू के साथ आया न जो कि लॉकर होल्डर था!’’
‘‘लॉकर होल्डर वो था तो कोई दूसरा उसके साथ क्यों था?’’
‘‘सर, ऐसा हो सकता है। उधर ऐसी कोई पाबन्दी नहीं कि कोई लॉकर होल्डर अपने साथ कोई रिलेटिव या फ्रेंड या कम्पैनियन नहीं ला सकता ।’’
‘‘जब वो दोनों—या उन दोनों में से कोई—अपना कारनामा करता था तो तू किधर था?’’
‘‘सर, कस्टमर की रिक्वेस्ट प्राइवेसी की हो तो मैं उधर नहीं ठहर सकता ।’’
‘‘उधर ठहरा नहीं, मानीटर को वाच नहीं किया, करता तो भी लोचा क्यों कि ऐन वो टेम ही कैमरा खराब। बोले तो वारदात करने वाले को तुम लोग साला हैल्प किया ।’’
‘‘नो, सर! नैवर सर!’’—तत्काल मैनेजर फरियाद सी करता बोला—‘‘इतने सालों से वो वाल्ट उधर है, अगर आफिसर्स की या स्टाफ की ऐसी ऐटीच्यूड होती तो क्या वो कुछ महीने भी चल पाया होता! सर, उधर स्टाफ को बहुत सख्त स्क्रीनिंग के बाद नौकरी पर रखा जाता है, वहाँ मैनेजमेंट के साथ दगाबाजी की ऐसी कोई गुंजायश नहीं ।’’
‘‘तो?’’
‘‘तो, सर, जो हुआ इत्तफाक से हुआ, एक हादसे के तौर पर हुआ ।’’
‘‘कोई घात लगा के वो काम नहीं किया?’’
‘‘अव्वल तो नहीं किया, फिर भी घात लगा के किया तो समझिये आगे इत्तफाक ने, दुर्लभ इत्तफाक ने किसी का साथ दिया ।’’
‘‘मेरा फिर सवाल है। मेरा नुकसान कैसे पूरा करेगा तुम्हारा वाल्ट?’’
‘‘सर हमारे पास तो पुलिस के पास जाने के अलावा कोई चारा नहीं, क्योंकि...’’
‘‘नहीं माँगता। बोले तो मेरे को ही कुछ करने का। दोनों कान खोल के सुनो। अपने बाकी के स्टाफ को खुद सुनाना। जो कोई भी ये वारदात किया, जो कोई भी मेरा माल थामने का डेंजर काम किया, उसको ढूँढ़ तो मैं लेगा बराबर पण तब अगर मालूम पड़ा कि वाल्ट का कोई भीड़ू साजिश में शामिल, तो उसका गला हँसता होयेंगा। क्या!’’
मैनेजर ने तो खाली संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया, चेराट सिर से पाँव तक यूँ कांपा जैसे एकाएक जूड़ी का बुखार चढ़ आया हो। फिर जब बिग बॉस ने खास उसको ललकारा तो उसका बिल्कुल ही दम निकल गया।
‘‘इधर देख! तेरे को बोलता है मैं कुछ ।’’
‘‘यस, सर ।’’—चेराट बड़ी मुश्किल से बोल पाया।
‘‘खाली तू उन दो भीड़ूओं को पहचानता है जो सब किया। तेरे को किसी न किसी तरह उन की शिनाख्त करवाने का। इस वास्ते आने वाले दिनों में कहीं खिसक नहीं जाने का। क्या बोला मैं? समझ में आ गया या मैं और तरीके से समझाये?’’
‘‘आ-आ गया ।’’
‘‘गला कैसे हँसता है, मालूम?’’
चेराट ने भयभीत भाव से जल्दी से इंकार में सिर हिलाया।
‘‘जानना माँगता है?’’
उसने पहले से ज्यादा जल्दी-जल्दी इंकार में सिर हिलाया।
‘‘श्याना है। निगाह में रहने का। कभी भी बुलाये, बुलेट का माफिक आने का। टेम नहीं खोटी करने का। क्या!’’
‘‘यस, सर ।’’
‘‘तू निकल ले ।’’—बिग बॉस मैनेजर से बोला—‘‘ये अभी इधर ठहरेगा ।’’
‘‘यस, सर ।’’—मैनेजर साफ-साफ चैन की सांस लेता बोला, फिर लम्बे डग भरता वहाँ से रुखसत हो गया।
बिना अपने क्लर्क को कोई खुफिया तसल्ली दिये, उस पर आश्वासन की कोई निगाह डाले।
बिग बॉस ने सिर निकाल कर चेराट की पीठ पीछे देखा और लम्बे टपोरी को इशारा किया।
लम्बे ने तत्काल जीतसिंह को आगे धकेल दिया।
भारी कदमों से चलता जीतसिंह बिग बॉस की हाजिरी भरते दो जनों के करीब जा खड़ा हुआ।
‘‘इस नवें भीड़ू को देख’’—बिग बॉस बोला—‘‘जो अभी आके तेरे बाजू में खड़ा हुआ ।’’
चेराट ने सप्रयास उसकी तरफ देखा।
‘‘इसको जानता है?’’
‘‘नो, सर ।’’—चेराट बोला।
‘‘पहचानता है?’’
‘‘नो, सर ।’’
‘‘कभी नहीं मिला? कभी नहीं देखा?’’
‘‘नैवर, सर ।’’
‘‘बाहर जा। पण अभी इधरीच ठहरने का। फूट नहीं लेने का ।’’
‘‘यस, सर ।’’
चेराट वहाँ से रुखसत हो गया।
पीछे मंगेश गाबले पूर्ववत् यथास्थान खड़ा रहा।
‘‘जीतसिंह!’’—बिग बॉस बोला—‘जीतसिंह नाम है तेरा!’’
‘‘हाँ, साहब ।’’
‘‘जीतसिंह वाल्टबस्टर!’’
‘‘नहीं, साहब। बिल्कुल नहीं, साहब। मैं तो बहुत मामूली ताला-चाबी का मिस्त्री हूँ। उधर क्राफोर्ड मार्केट में...’’
‘‘मालूम! मालूम! जो दिखाई देता है वो तू है बरोबर पण जो नहीं दिखाई देता वो भी है। वाल्टबस्टर! तिजोरीतोड़! बड़ा उस्ताद! क्या!’’
‘‘साहब कोई आप को चक्कर दिया। कोई खुन्नस में मुखबिरी किया। मैं वो भीड़ू नहीं है ।’’
‘‘बोले तो एक नाम का दो भीड़ू! दो जीतसिंह! दोनों ताला चाबी मास्टर! दोनों का ठीया क्राफोर्ड मार्केट में! क्या!’’
‘‘साहब, उधर तो खाली मैं ही है बहुत टेम से ।’’
‘‘तो फिर तू हैफेमस वाल्टबस्टर जीतसिंह...’’
‘‘साहब, मैं मामूली मिस्त्री...कैसे...कैसे मैं...’’
‘‘इधर किस वास्ते आया?’’
‘‘जी!’’
‘‘किस वास्ते अहसान और ओमराजे ले के आये तेरे को इधर?’’
तो लम्बे का नाम अहसान था और मोटे का नाम ओमराजे था।
‘‘आ-आटोमैटिक डोर लॉक खोलने के वास्ते ।’’
‘‘बोले तो ये तेरा काम। फीस लेता है, करता है!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘बड़ा काम बड़ी फीस! किसी को वाल्ट में पिराब्लम तो उसको नक्की बोलेगा?’’
‘‘साहब, ऐसी प्राब्लम हो तो उस कम्पनी से मिस्त्री आता है, इंजीनियर आता है जो वाल्ट बनाया, सप्लाई किया ।’’
‘‘कोई वेट नहीं करना सकता, पिराब्लम फौरन नक्की करना माँगता, तो? वाल्ट मुम्बई में, कारखाना साला नागपुर में, अहमदाबाद में, हैदराबाद में तो साला वेट करेगा?’’
जीतसिंह ने इंकार में सिर हिलाया।
‘‘मुंडी नहीं हिलाने का ।’’
‘‘नहीं, साहब ।’’
‘‘वो उस्ताद को कॉल करेगा, जीतसिंह ताला-चाबी-उस्ताद को काल करेगा। कभी किया कोई?’’
जीतसिंह के जेहन में ‘खबरदार’ की दस्तक पड़ने लगी। बड़ा बाप जरूर कुछ जानता था और अपनी जानकारी की बिना पर उसको आजमाता था।
‘‘हाँ, साहब’’—डरता झिझकता वो बोला—‘‘एक बार किया ।’’
‘‘आगे...आगे बोल ।’’
‘‘पणजी में किया, साहब ।’’
‘‘उधर कैसे पहँुच गया?’’
‘‘साहब, इधर धन्धा मन्दा था। उधर एक फ्रेंड था जो बोला उधर ट्राई करने का। मैं अकेला भीड़ू, उधर चला गया। पण उधर भी धन्धा इधर जैसा ही था, तीन महीना वेस्ट किया, फिर वापिस आ गया ।’’
‘‘उधर कोई वाल्ट खोलने का चानस लगा?’’
‘‘हाँ, साहब। जैसे दो भीड़ू मेरे को काम के वास्ते इधर लेकर आया, वैसे मेरे को उधर डबलबुल कैसीनो में ले के गये दो भीड़ू ।’’
‘‘कैसीनो का वाल्ट खोलने का वास्ते?’’
‘‘हाँ, साहब। बहुत ही अर्जेन्ट कर के खोलना था। मँुहमाँगी फीस का आफर था। डबलबुल कैसीनो का बिग बॉस मार्सेलो खुद मेरे को दिया क्योंकि उसकी दस साल की बेटी सोफिया, खेल-खेल में खुले वाल्ट में दाखिल हो गयी और हँसी-हँसी में वाल्ट का दरवाजा बन्द कर लिया। वाल्ट की चाबियाँ उसके हाथ में थीं इसलिये चाबियाँ भी उसके साथ वाल्ट में बन्द हो गयीं। वाल्ट का दरवाजा ऑटोमैटिक था, खुद बन्द होता था लेकिन खुलता तीन चाबियों से था। साहब बच्ची की जान बचाने के लिये मैंने वो वाल्ट खोला। साहब, यहीच एक काम है वाल्ट खोलने का जो मैं अपना अक्खा लाइफ में किया। साहब, इंसानियत के नाते किया, न करता तो लड़की मर जाती ।’’
बिग बॉस की तनी हुई त्योरी कदरन ढीली पड़ी।
जीतसिंह की जान में जान आयी। बिग बॉस को पणजी के उस वाकये की यकीनन इनसाइड इंफर्मेशन थी, जिसके जरिये वो उसका इम्तहान लेता था जिस में जाहिर था कि वो सच बोलने की समझदारी दिखा के पास हुआ था। झूठ बोलता तो उसका अन्जाम बुरा होता।
‘‘बाद में वही वाल्ट एक बार फिर खुला था’’—बिग बॉस बोला—‘‘ये टेम लूट के इरादे से जो कि कामयाब हुई थी। तूने वाल्ट को दो बार खोला—पहले मार्सेलो के बोलने पर, फिर लुटेरों के बोलने पर ।’’
‘‘बिल्कुल नहीं, साहब। मैं तो अगले ही रोज हमेशा के लिये पणजी छोड़कर मुम्बई वापिस चला आया था ।’’
‘‘हूँ। मँुहमाँगी फीस बोला! कितना मिला?’’
साला अभी भी परखता था।
‘‘दस हजार ।’’
‘‘यही सैटल किया था?’’
‘‘साहब, जब मँुहमाँगी बोला गया तो सैटल करने का क्या मतलब!’’
‘‘दस हजार माँगा?’’
‘‘दस हजार मिला ।’’
‘‘बोले तो ज्यास्ती माँगता था?’’
‘‘हाँ, साहब, पण मँुह खोलने का मौका ही न मिला। मैं अभी खाली ‘दस’ बोला, मार्सेलो साहब आगे हजार लगाया, मैनेजर फं्राको को हुक्म दिया, उसने मेरे को दस हजार थमा दिये ।’’
‘‘तू क्या माँगता था?’’
‘‘दस लाख ।’’
‘‘माथा फिरेला है!’’
‘‘तब ऐसीच था बरोबर पण बाद में ठिकाने लग गया था ।’’
‘‘हूँ ।’’—बिग बॉस कुछ क्षण खामोश रहा, फिर बोला—‘‘मार्सेलो ‘डबल बुल’ का मालिक नहीं, पार्टनर था। उस कैसीनो में मेरा भी रोकड़ा लगा था, इस वास्ते मैं पार्टनर। पण साइलेंट पार्टनर ।’’
जीतसिंह खामोश रहा।
‘‘कभी फिलिम में काम किया?’’
‘‘जी!’’—जीतसिंह हड़बड़ाया—‘‘नहीं...नहीं, साहब ।’’
‘‘कोई छोटा मोटा काम! एक्स्ट्रा जैसा! या उन भीड़ू लोगों जैसा फिलिम की जुबान में जिन को जूनियर आर्टिस्ट बोलते हैं?’’
‘‘नहीं, साहब ।’’
‘‘अभी तेरे को टिराई करने का। बोले तो तेरा स्क्रीन टैस्ट लेने का ।’’
‘‘जी!’’
‘‘देखने का तू सरदार होता तो कैसा लगता!’’
जीतसिंह के दिल ने गोता खाया।
तो ये वजह थी मुरली चेराट को ‘अभी रुकने का’ बोला जाने की।
निजात उसे अपने से दूर खिसकती जान पड़ने लगी। जान अभी भी सूली पर थी।
‘‘गाबले!’’—बिग बॉस बोला—‘‘बुला अपने भीड़ू को ।’’
‘‘यस, बॉस!’’
गाबले ने वो काम किया। उसके बुलाये एक उम्रदराज शख्स वहाँ पहँुचा जो—गाबले ने खुद बताया—फिल्मों में मेकअप मास्टर था। वो जीतसिंह को हाल के एक कोने में ले गया जहाँ उसने जीतसिंह को एक कुर्सी पर बिठाया और खुद उसके सामने एक दूसरी कुर्सी पर बैठा।
आइन्दा पन्द्रह मिनट उसने जीतसिंह के साथ उस पर अपनी कारीगरी आजमाने में लगाये। उस दौरान बिग बॉस ने एक काला, नार्मल से लम्बा वैसा सिग्रेट सुलगा लिया था जो कि चुरूट कहलाता था। उसने अपने काम से किनारा किया तो जीतसिंह ने खुद ही उसके बैग में से शीशा उठा कर उसमें अपनी सूरत देखी।
मेकअप मास्टर ने अन्दाजन उसे सिख बनाया था लेकिन उसके अन्दाजन किये काम ने भी जीतसिंह का दिल हिलाने का काम किया।
सिख बना जीतसिंह वापिस बिग बॉस के सामने पेश हुआ।
फिर मुरली चेराट को बुलाया गया।
‘‘इसको देख!’’—बिग बॉस सख्ती से बोला—‘‘ये था वो सरदार जो वाल्ट के कस्टमर के साथ कल रात वाल्ट में पहँुचा था?...साला खामखाह मुंडी नहीं हिलाने का, गौर से देखने का, चौकस करके देखने का, फिर जवाब देने का ।’’
‘‘यस, सर ।’’
चेराट की निगाह जीतसिंह की सूरत पर पड़ी, गड़ी, टिकी, टिकी रही।
जीतसिंह उससे निगाह मिलाने की ताब न ला सका।
आखिर चेराट की निगाह उस पर से हटी, उसने गर्दन घुमा कर वापिस बिग बॉस की तरफ देखा।
‘‘नो, सर ।’’—वो बोला।
जीतसिंह की जान में जान आयी।
‘‘ये वो सिख भीड़ू नहीं?’’
‘‘नो, सर ।’’
‘‘ऐन पक्की कर के बोलता है?’’
‘‘यस, सर ।’’
‘‘बाहर जा ।’’
चेराट ने तुरन्त आदेश का पालन किया।
फिर मेकअप मास्टर ने उसका मेकअप उतारा और वो भी वहाँ से रुखसत हो गया।
‘‘इधर मेरी तरफ देख ।’’—बिग बॉस संजीदगी से बोला, अब उसका लहजा पहले जैसा कड़क नहीं था।
‘‘देखता है, साहब ।’’
‘‘कोई टॉप का ताला-चाबी-मास्टर ही रिकार्ड टेम में वाल्ट का लॉकर खोल सकता था और हर कोई मेरे को बोला कि मुम्बई में ऐसा भीड़ू एकीच था और वो तू था। अभी तू बोलता है तू नहीं था, वो चेराट कर के भीड़ू बोलता है तू नहीं था, अभी बोले तो मेरे को मंजूर। पण...सुनता है?’’
‘‘हाँ, साहब ।’’
‘‘हर धन्धे के बड़े कारीगर एक दूसरे से वाकिफ होते हैं, इस वास्ते मेरे को पक्की कि तेरे को भी मालूम होयेंगा कि तेरे जैसा दूसरा भीड़ू कौन है, तीसरा भीड़ू कौन है जो तेरे जैसा नहीं तो तेरे से उन्नीस होयेंगा, अट्ठरा होयेंगा, क्योंकि कोई तो ये काम किया! कारीगरी का काम तो कोई कारीगर ही किया, अभी कौन होयेंगा ऐसा भीड़ू?’’
‘‘मेरे को नहीं मालूम, साहब ।’’
‘‘मालूम नहीं तो मालूम कर। तेरे वास्ते ये काम आसान। क्या!’’
‘‘हाँ, साहब ।’’
‘‘वो साला हरामी लॉकरबस्टर पकड़ाई में आ गया तो तेरे को ईनाम ।’’
‘‘मैं पूरा कोशिश करेगा, साहब ।’’
‘‘बढ़िया। कोशिश का कोई नतीजा निकले तो गाबले को बोलने का। गाबले!’’
‘‘यस, बॉस ।’’—मंगेश गाबले तत्पर स्वर में बोला।
‘‘इसको अपना नम्बर दे, इसका नम्बर ले ।’’
‘‘यस बॉस ।’’
जीतसिंह और गाबले में मोबाइल नम्बर्स का आदान-प्रदान हुआ।
‘‘अभी मैं जाये, साहब?’’—फिर जीतसिंह आशापूर्ण स्वर में बोला।
‘‘अभी नहीं ।’’—बिग बॉस सहज भाव से बोला—‘‘अभी तेरे को एक लैसन देने का...’’
‘‘लैसन!’’—जीतसिंह सकपकाया।
‘‘...कि श्यानपंती हैल्थ के लिये खराब। साला डेंजर थिंग!’’
‘‘साहब, मैं समझा नहीं!’’
‘‘ठीक, ठीक! पण अभी समझाया किधर कोई! ओमराजे समझाता है न!’’
तत्काल ओमराजे उसके सामने आ खड़ा हुआ और दान्त निकालता उसे देखने लगा।
जीतसिंह ने नर्वस भाव से उसे देखा।
एकाएक ओमराजे का दायाँ हाथ चला, तत्काल जीतसिंह को यूँ लगा जैसे स्टीम रोलर उसके पेट से टकराया हो। पीड़ा से बिलबिलाता वो दोहरा हो गया, उसकी आँखें आँसुओं से भर आर्इं। ओमराजे का घुटना उसकी टांगों के बीच टकराया, उसके मँुह से एक घुटी हुई चीख निकली, वो और आगे को झुका तो दोहत्थड़ की तरह ओमराजे के दोनों बन्धे हाथ उसकी पीठ पर बिजली की तरह गिरे। उसका सिर चकरा गया और आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगा।
एक वजनी घूंसा उसकी पसलियों में पड़ा।
वो त्योरा कर फर्श पर ढेर हुआ।
चेतना लुप्त होने से पहले उसे अहसास हुआ चेराट बीच की चौखट पर खड़ा फटी-फटी आँखों से उसे देख रहा था।
उसे होश आया तो उसने हाल में खुद को अकेला पाया। बिग बॉस समेत सब लोग वहाँ से गायब थे।
कांखता कराहता वो उठ कर अपने पैरों पर खड़ा हुआ। कई क्षण वो आंधी में हिलते पेड़ की तरह झूलता झूमता रहा। धीरे-धीरे उसके हवास ठिकाने आने लगे। उसने हिल डुल कर तजुर्बा किया कि वो चल सकता था, उसकी कांपती टाँगे उसके जिस्म का बोझ सम्भाल सकती थीं, फिर आगे बढ़ा। दरवाजे पर पहँुच कर उसने बाहरले कमरे में कदम रखा।
वहाँ एक टेबल पर आमने-सामने बैठे अहसान और ओमराजे चाय पी रहे थे।
‘‘आ, भई, आ जा ।’’—अहसान उसे देख कर बोला—‘‘आ जा ।’’
जीतसिंह टेबल के करीब पहँुचा।
‘‘बैठ ।’’
जीतसिंह ने बैठने का उपक्रम न किया।
‘‘चाय पियेगा?’’—ओमराजे बोला।
‘‘नहीं ।’’
‘‘मर्जी तेरी ।’’
‘‘मारा क्यों?’’
‘‘अरे, तेरे को नहीं मालूम! बड़ा बाप आर्डर किया न!’’
‘‘कब किया?’’
‘‘जब बोला तेरे को लैसन देने का था। लैसन बोले तो वार्निंग। अगर तू बड़ा बाप को कोई चक्कर देने का कोशिश किया, कोई श्यानपन्ती किया तो...क्या बोला बड़ा बाप?’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘गला हंसता होयेंगा। तेरे को तो मालूम होगा गला कैसे हंसता है!’’
‘‘नहीं मालूम ।’’
‘‘साला श्याना! गले पर कांटी फिरे न एक कान से दूसरे कान की तरफ, तो गला मुँह की तरह खुलता है और हँसना जान पड़ता है। अभी आया मगज में गला कैसे हँसता है!’’
‘‘सब जुल्म है। गरीबमार है ।’’
‘‘बोलना था बड़ा बाप को!’’
जीतसिंह ने जोर से थूक निगली।
‘‘हा हा। खयाल से ही दम निकल गया खजूर का ।’’
जीतसिंह खामोश रहा।
‘‘अभी टलता क्यों नहीं?’’—अहसान बोला—‘‘नक्की क्यों नहीं करता?’’
‘‘करता है। रोकड़ दो ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘रोकड़ा! फीस! पाँच सौ रुपये! ज्यास्ती देने को भी बोला। अभी देने का मेरे को और क्राफोर्ड मार्केट छोड़ के आने का ।’’
‘‘तेरी तो! साले जानता नहीं किधर खड़ेला है!’’
‘‘जानता है। उधर खड़ेला है जिधर जुल्म ही नहीं होता, धोखा भी होता है। बिग बॉस के अन्डर में चलने वाला तुम छोटा लोग जुल्मी ही नहीं, ठग भी है ।’’
‘‘ठहर जा, साले!’’
‘‘मैं बिग बॉस को बोलेगा कि जो पेमेंट मेरे को मिलने का था, वो तुम लोग खुद खा गया ।’’
‘‘अबे, तेरी मौत आयी है!’’
‘‘आयी तो नहीं है, तुमने बुला दी तो बिग बॉस का काम बिगड़ेगा...काम जो तुम्हारे सामने वो मेरे को बोला...फिर बोले तो बॉस किसकी दुम ठोकेगा! किसका गला हँसता होयेंगा!’’
अहसान भौंचक्का सा उसका मँुह देखने लगा।
‘‘अरे, काहे मँुह लगता है!’’—ओमराजे बोला—‘‘दे और दफा कर ।’’
अहसान ने बड़े कठिन भाव से सहमति में सिर हिलाया, फिर उसने जेब से हजार का एक नोट निकाल कर मेज पर डाला।
‘‘फीस भी’’—फिर बोला—‘‘और ज्यास्ती भी जो तू बोला मैं बोला और वापिसी का टैक्सी का भाड़ा भी। अभी राजी?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘उठा ।’’
जीतसिंह ने आगे बढ़कर नोट काबू में किया।
‘‘निकल ले ।’’
जीतसिंह ने सहमति में सिर हिलाया, जाने को मुड़ने से पहले उसने एक शिकायतभरी निगाह ओमराजे पर डाली।
‘‘पर्सनल कुछ नहीं, भीड़ू ।’’—ओमराजे संजीदगी से बोला—‘‘जो हुक्म हुआ, वो किया ।’’
‘‘फिनिश करने का हुक्म होता तो...’’
‘‘इधरीच फिनिश करता। बेहिचक! बरोबर! तू लक्की कि खाली थोड़ा सेकने का हुक्म हुआ, ठोकने का न हुआ। क्या!’’
‘‘ठीक बोला ।’’
‘‘अभी बोल मेरे से कोई शिकायत नहीं ।’’
‘‘कोई शिकायत नहीं। जाता है ।’’
जीतसिंह क्राफोर्ड मार्केट पहँुचने के लिये टैक्सी में सवार था जब कि मोबाइल पर गाइलो की काल आयी।
‘‘किधर है?’’—उसने पूछा।
जीतसिंह ने बताया।
‘‘अभी रोड पर किधर है?’’
‘‘जौहर चौक पहँुचने वाला हूँ ।’’
‘‘उधरीच उतर जा। बाई चानस मैं पास ही है। ग्रांट रोड पर। आता है ।’’
‘‘बात क्या है?’’
‘‘बोलेगा न!’’
पाँच मिनट बाद जीतसिंह गाइलो के साथ उसकी टैक्सी में सवार था।
गाइलो ने टैक्सी को मेन रोड से निकाल कर एक बाइलेन में रोका और इंजन बन्द कर दिया।
‘‘ये अखबार देख ।’’—फिर उसने अखबार को एक खास जगह से मोड़कर जीतसिंह के सामने किया—‘‘ये ‘डेली’ है। बाकी अखबारों की तरह मार्निग में नहीं आता, दोपहर में आता है। इस वास्ते जो इस्पेशल न्यूज इसके फ्रंट पेज पर है वो आज के किसी दूसरे अखबार में नहीं छपी ।’’
‘‘क्या स्पेशल न्यूज है?’’
‘‘देख। न्यूज के साथ लाश का दो फोटू है...एक फुल बाडी, एक क्लोज अप। क्लोज अप में साफ मालूम पड़ता है कोई इयर टू इयर थ्रोट स्लिट किया। न्यूज में लिखा है आज अर्ली मार्निंग ठाणे क्रीक से लाश निकाला पुलिस ।’’
‘‘तो क्या! मुम्बई में साला मर्डर क्या नयी बात है! हमें क्या!’’
‘‘हमें है न!’’
‘‘है?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘पेपर पर निगाह पड़ते ही मैं थोबड़ा फस्र्ट साइट में पहचाना ।’’
‘‘इस लाश को, इस मरने वाले को तू पहचानता है?’’
‘‘वन हण्ड्रड पर्सेंट!’’
‘‘कौन है ये?’’
‘‘मंगेश गाबले ।’’
‘‘कौन?’’
‘‘पनवेल वाली फड़ का आर्गेनाइजर! जो मेरे से चार पेटी रोकड़ स्नैच किया! जौहरी बाजार वाले सैट अप का बिचौलिया! साला रूट का़ज आफ आल ट्रबल्स! जिस से मेरे को रिवेंज माँगता था ।’’
‘‘ये वो भीड़ू है?’’
‘‘बरोबर। फोटू के साथ जो न्यूज में छपा है उससे भी कनफर्म हुआ। न्यूज में साफ छपा है राइट हैण्ड की मिडल फिंगर वन थर्ड हैइच नहीं। अभी पुलिस को इसकी शिनाख्त नहीं हो पायी है। थोबड़े के साथ फिंगर वाला बात बोले तो शिनाख्त के वास्ते ही छपा ।’’
‘‘तू पुलिस के पास जायेगा? इसकी शिनाख्त करेगा?’’
‘‘क्या बात करता है!’’
‘‘तो इसके मरने जीने से हमें क्या?’’
‘‘है न!’’
‘‘क्या?’’
‘‘जीते, सोच! मगज से काम ले! कल रात वाल्ट वाली वारदात हुई, हमने उन का सैटअप बिगाड़ा, सिस्टम ब्रेक किया, माल कब्जाया, माल खोया, सब सिस्टम के आर्गेनाइजर्स का नालेज में। और वो लोग इतना फास्ट एक्ट किया कि आवर्स में बिचौलिये का रिस्पांसिबलिटी फिक्स किया, उसको हाइस्ट के लिये जिम्मेदार ठहराया और पनिश भी कर दिया। जीते, अभी मेरे को लगता है हमने वैरी बिग अन्डरवल्र्ड बासिज का वैरी बिग सिस्टम डिस्टर्ब कर दिया है। हमने रस्सी समझ के सांप को होल्ड कर लिया। बोले तो वुई हैव बिटन मोर दैन वुई कैन च्यू। अभी उन लोगों को पता चला कि वाल्ट में जो करतब किया, हम किया, तो सोच हमेरा भी ऐसीच हाल बनने में कितना टेम लगेगा!’’
‘‘गाइलो, तू कुछ ज्यादा ही खौफ खाये बैठा है। जब उन लोगों की—जिन को तू अन्डरवल्र्ड बॉसिज बोला—पड़ताल आगे बढ़ेगी, आगे किसी मुकाम पर पहँुचेगी तो बोले तो वही भीड़ू लोग सब किया जिन के पास से माल बरामद ।’’
‘‘निकाला तो हमने!’’
‘‘इस बात को खाली मुरली चेराट जानता है। हमने उसके मँुह को ताला लगाना है। बस ।’’
‘‘वो दोनों भीड़ू—वो नकली इंस्पेक्टर और हवलदार—जिन्होंने हमेरे से माल छीना, वो भी तो जानते हैं!’’
‘‘ठीक! लेकिन जब माल—पूरा माल या तकरीबन पूरा माल—उनसे बरामद होगा तो मेरे को पक्की उन की बाकी स्टोरी की तरफ कोई कान नहीं देगा, यही समझा जायेगा कि वो स्टोरी खड़ी करके वो अपने गुनाह को हलका करने की कोशिश कर रहे थे। जैसे बोल देंगे उन का तो असल काम से कुछ लेना देना ही नहीं था, वो तो माल के उन लोगों के वास्ते खाली कस्टोडियन थे जिन्होंने कि असल में लॉकर खोल लेने का नामुमकिन लगने वाले काम को अंजाम दिया था। पण देख लेना, उनकी कोई नहीं सुनेगा, उन की दुहाई को उन की कवर अप की नाकाम कोशिश ही माना जायेगा ।’’
‘‘काहे कू? जब वो मुरली चेराट को—जिसने कि उन्हें हमारा सक्सेस का बाबत साउन्ड आफ किया था—बतौर गवाह पेश करेगा...’’
‘‘यही वो काम है जिसको हमने नहीं होने देना है। मेरे भेजे में एक स्कीम है जिस पर हमने फौरन एक्ट करना है। गाइलो, मेरे को पूरा यकीन हम चेराट के मँुह पर ढक्कन ठोकने में कामयाब हो जायेंगे ।’’
गाइलो के चेहरे पर आश्वासन के भाव न आये।
जीतसिंह हँसा।
‘‘हँसता काहे है?’’—गाइलो ने मँुह बिसूरा।
जीतसिंह फिर हँसा।
‘‘साला मेरे को सामने नैक्स्ट वल्र्ड का डोर दिखाई देता हूँ, तू हँसता है!’’
‘‘तो क्या करे?’’
‘‘डोंट! प्लीज!’’
‘‘क्या डोंट! क्या प्लीज! पहले इतना हौसला दिखाया। शेर के मँुह से निवाला निकाल लेने का हौसला दिखाया, अभी दम निकलता है अभी का अभी ।’’
‘‘वक्त वक्त का बात है ।’’
‘‘मैं दे तसल्ली तेरे को?’’
‘‘दे सकता है?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘तो दे न! पण’’—उसके स्वर में संशय का भाव आया—‘‘कैसे करेंगा? कैसे होयेंगा? तू क्या करना सकता इस केस में?’’
‘‘अरे, जो मैं जानता है, जो मैं अभी तेरे को बोलता है वो करना सकता ।’’
‘‘तो बोल न!’’
‘‘ये खबर’’—जीतसिंह ने अखबार को वापिस उसकी गोद में डाल दिया—‘‘जो तेरी जान सुखाये है, अन्डरवल्र्ड किलिंग हैइच नहीं ।’’
‘‘क्या बात करता है!’’
‘‘स्टाइल अन्डरवल्र्ड किलिंग वाला है इस वास्ते तूने बात को लपक लिया कि वाल्ट वाले सिस्टम के अर्गेनाइजर्स ने क्विक एक्शन लिया और जिम्मेदार भीड़ू को पनिश कर भी दिया ।’’
‘‘किया न बरोबर!’’
‘‘किस को?’’
‘‘बिचौलिये को। मंगेश गाबले को ।’’
‘‘ये भीड़ू मंगेश गाबले नहीं है ।’’
‘‘क्या!’’
‘‘तेरे को शीशे में उतारने के लिये इसने खाली बोला कि ये मंगेश गाबले है ताकि बाद में जब तू रिवेंज की अपनी लाइन पर एक्ट करने को निकले तो मंगेश गाबले के पीछे पड़े और जो कुछ तुझे परोसा जाये तू उसे हजम करता जाये ।’’
‘‘मंगेश गाबले की एक उंगली शार्ट बाई वन थर्ड ।’’
‘‘उस भीड़ू की जिसने कि तेरे से चार पेटी रोकड़ा छीना, जिसने अपनी स्कीम के मुताबिक तेरे को टोपी पहनाई और जिसकी लाश समन्दर में तैरती मिली, न कि मंगेश गाबले की ।’’
‘‘तेरे को क्या मालूम!’’
‘‘क्योंकि मैं मंगेश गाबले से मिला ।’’
‘‘क्या!’’
‘‘उस भीड़ू से मिला जो असल में मंगेश गाबले है, अभी पीछे भायखला में उस बड़ा बाप के दरबार में मिला जिस के अन्डर में मंगेश गाबले चलता है ।’’
‘‘बड़ा बाप! बड़ा बाप कौन?’’
‘‘महबूब फिरंगी ।’’
गाइलो के नेत्र फट पड़े।
‘‘तू...तू’’—बड़ी मुश्किल से वो बोल पाया—‘फिरंगी से मिला!’’
‘‘अभी। उसी के दरबार से लौटा अभी। बोला न!’’
‘‘जौहरी बाजार वाले वाल्ट का सैट अप उसका है?’’
‘‘ऐसा ही जान पड़ा मेरे को। तभी तो तड़प के दिखाता था। मेरे को इस वास्ते पकड़ मंगवाया क्योंकि उसको मालूम पड़ा कि मैं टॉप का तालातोड़ था और जौहरी बाजार के वाल्ट वाला काम किसी टॉप के तालातोड़ का था। उसको यकीन भी आ गया कि मैं वो भीड़ू नहीं था, फिर भी ठुकवा दिया ।’’
‘‘ओह, नो!’’
‘‘अभी भी पेट-पसलियाँ दुखती हैं, पीठ दुखती है ।’’
‘‘जीसस!’’
‘‘उधर अपना मुरली चेराट भी अपने वाल्ट मैनेजर के साथ हाजिरी भरता था ।’’
‘‘जीसस! जीसस! फिर भी तू उधर से सेफ निकल आया! वो बोला नहीं तू वहीच भीड़ू जो...’’
‘‘नहीं बोला ।’’
‘‘काहे कू? नहीं, पहले तू मेरे को कम्पलीट इस्टोरी बोल ।’’
जीतसिंह ने सब कुछ सविस्तार दोहराया।
‘‘जीसस, मेरी एण्ड जोसेफ!’’—वो खामोश हुआ तो गाइलो भौंचक्का सा बोला—‘‘वो भीड़ू चेराट तेरा दोनों फेस देखा—प्लेन भी और सरदार वाला भी—फिर भी बोला नहीं पहचानता?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘काहे?फेवर किया?’’
‘‘जो किया, अपने भले के लिये किया, वर्ना उधरीच मरा पड़ा होता ।’’
‘‘तू भी!’’
‘‘बहुत मुमकिन था। पण ये चेराट के वास्ते कोई बड़ी तसल्ली न होती कि साथ में मैं भी मरा ।’’
‘‘बरोबर!’’
‘‘अभी बोले तो जो झूठ उसने उधर बिग बॉस फिरंगी के सामने बोला, उसको अब हमने अपने हक में कैश करना है, अपने फायदे के लिये भुनाना है ।’’
‘‘कैसे?’’
‘‘मालूम पड़ेगा। इस वक्त वो कहाँ होगा? घर में या ड्यूटी पर?’’
‘‘घर में। वो शिफ्ट की ड्यूटी आठ घण्टे की बोला। छुट्टी बारह बजे तो ड्यूटी पर चार बजे ही तो पहँुचता होयेंगा! घर होगा बरोबर ।’’
‘‘और घर तेरे को मालूम है कहाँ हैं!’’
‘‘बरोबर ।’’
‘‘ले के चल ।’’
वो धारावी और आगे मुकन्द नगर पहँुचे।
जहाँ कि मुरली चेराट की रिहायश थी।
कालबैल के जवाब में दरवाजा खुला तो उन्होंने खुद चेराट को ही चौखट पर खड़े पाया।
गनीमत थी कि उनसे पहले वो भायखला से वहाँ वापिस पहँुच चुका था। उन्हें देख कर वो सकपकाया, उसने दरवाजा वापिस बन्द करने की कोशिश की।
‘‘क्या फायदा!’’—गाइलो बोला—‘‘अभी ड्यूटी के लिये भी तो निकलेगा!’’
चेराट की चौखट से पकड़ ढीली पड़ गयी।
‘‘क्या है?’’—वो नर्वस भाव से बोला।
‘‘भाई तेरे को थैंक्यू बोलना माँगता है ।’’
‘‘भाई!’’
‘‘शूटर! अन्डरगिराउन्ड के बड़े गैंग का। भूल गया?’’
उसने इन्कार में सिर हिलाया।
‘‘मुंडी क्या हिलाता है?’’—गाइलो डपट कर बोला।
‘‘ही इज नो भाई! नो शूटर!’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘ये जीतसिंह। बोले तो ताला-चाबी मिस्त्री। असल में वाल्टबस्टर! तिजोरीतोड़! बड़ा उस्ताद! उधर भायखला में बिग बॉस खुद बोला ।’’
‘‘साला सब सुनता था!’’—जीतसिंह बोला।
‘‘क्या करता? कान बन्द कर लेता?’’
‘‘बिग बॉस ने मंजूर किया बरोबर मैं वो भीड़ू नहीं। तेरे सामने। तू सुना। क्या!’’
‘‘चक्कर दिया। गोली दी। पुड़िया सरकाई ।’’
‘‘फिर भी शिनाख्त को ‘नो’ बोला! ‘नो, सर’ बोला!’’
‘‘गलत किया?’’
‘‘गलत तो नहीं किया, पण...’’
‘‘उधर मेरे माइन्ड में और भी कुछ आया ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘तुम बड़ा तिजोरीतोड़,फेमस वाल्टबस्टर...’’
‘‘फिर वही बात! अरे, मैं बोला न...’’
‘‘उधर बोला। क्यों कि उधर बोलना जरूरी। तुम को मालूम क्यों जरूरी! इधर काहे वास्ते बोलता है?’’
‘‘ये बात!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘ठीक है। बोल तू जो बोलना माँगता है!’’
‘‘मैं ये बोलना माँगता है कि वो सरदार...रात वाला...उधर वाल्ट में...वो...तो वो भी...वो भी...अभी तुम समझा मैं क्या बोलता है?’’
‘‘श्याना है। बोले तो इसी वास्ते तेरे को थैंक्यू बोलने आया। एक्सप्रैस करके। क्या!’’
‘‘मेरे को थैंक्यू कबूल। अभी...’’
उसने फिर दरवाजा बन्द करने का उपक्रम किया।
‘‘अभी रुक! रुक!’’
वो ठिठका।
‘‘अभी कुछ बात भी करने का इम्पॉर्टेंट करके ।’’
‘‘क्या बात?’’
‘‘बीवी घर में है?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘कहां है?’’
‘‘अभी सुपर बाजार गयी। वन आवर में लौटेगी ।’’
‘‘फिर भी चौखट पर खड़ा बात करता है! बाजू हट ।’’
‘‘लेकिन...’’
‘‘अरे, हट न! मेहमान है हम! कद्र करना सीख!’’
बड़े अनिच्छापूर्ण भाव से वो चौखट से हटा।
भीतर एक छोटी सी बैठक थी जहाँ एक सोफे पर दोनों जा बैठे।
चेराट ने दरवाजा बन्द किया और उन के सामने पहँुचा।
‘‘बैठ ।’’—जीतसिंह बोला—‘‘खाली दो मिनट बात करने का ।’’
‘‘सिम्पल, इस्ट्रेट बात करने का ।’’—गाइलो बोला—‘‘कोई पंगा नहीं। कोई लोचा नहीं। पिरामिस ।’’
‘‘क्या!’’—जीतसिंह बोला।
सहमति में सिर हिलाता, हिचकिचाता चेराट उन के सामने बैठ गया।
‘‘उधर बिग बॉस के दरबार में’’—जीतसिंह सहज, संजीदा लहजे से बोला—‘‘तूने मेरी शिनाख्त न की, मैं सौ बार थैंक्यू बोलता है, ‘सरदार’ की भी शिनाख्त न की, मैं हजार बार थैंक्यू बोलता है, पण क्यों? क्यों न की?’’
वो खमोश रहा।
‘‘अरे, बोल न!’’—गाइलो आग्रहपूर्ण स्वर में बोला—‘‘बात साला बिटविन फिरेंड्स होता है। बोल न!’’
‘‘मैं सुनता है ।’’—जीतसिंह बोला।
‘‘तुम्हें फेवर किया ।’’—चेराट कठिन स्वर में बोला।
‘‘वो तो किया बरोबर। और भी तो कोई वजह होयेंगा!’’
‘‘और कोई वजह नहीं ।’’
‘‘है। तेरी जुबान पर नहीं आती तो मैं बोलता है ।’’
वो सकपकाया, उसने मँुह बाये जीतसिंह की तरफ देखा।
‘‘अभी सुन गौर से...’’
‘‘विद युअर फुल, अनाडिवाइडिड अटेंशन ।’’—गाइलो बोला।
‘‘...बिग बॉस महबूब फिरंगी को अभी इस बात की खबर नहीं हुई जान पड़ती कि जिन्होंने वाल्ट खोला था, माल उन से छिन गया था और तेरे को इस बात का पूरा-पूरा अहसास था। तू मेरी शिनाख्त करना अफोर्ड नहीं कर सकता था क्यों कि जो चोरों को मोर पड़े थे, उन को हमारी बाबत टिप देने वाला खुद तू था। तू मेरी शिनाख्त करता तो रात तेरे वाल्ट में जो कुछ हुआ, उसमें तेरा रोल खुल के रहता। इसलिये, भीड़ू, इसलिये तूने अपनी खातिर, न कि मेरी खातिर, मेरी शिनाख्त न की। तूने हमें फेवर न किया, खुद को फेवर किया। अभी बोल क्या कहता है?’’
उसके मँुह से बोल न फूटा, वो बेचैनी से पहलू बदलने लगा।
‘‘उधर तूने अपनी आँखों से सब कुछ देखा था इस वास्ते तू खुद गवाह है कि भाई लोगों को मेरे पर यकीन आ गया था कि मैं उन के सिस्टम को हिट करने वालों में शामिल नहीं था, फिर भी मेरे को धुन दिया। पण भीड़ू तू तो—पूरा नहीं तो थोड़ा—ऐन पक्की करके शामिल था, अपना सर्विस का साला फीस कलैक्ट किया ऐन ठोक के। आधा पेटी रोकड़ा काबू में किया। अभी बोल, जब तेरा ये कारनामा बिग बॉस फिरंगी को मालूम पड़ेगा तो तेरा क्या होगा रे, कालिया!’’
उसका चेहरा फक पड़ गया, उसने जोर से थूक निगली।
‘‘कौन यकीन करेगा तेरी दुहाई पर कि तेरे को खबर नहीं कि कौन लोग हमारे वाल्ट से निकलते ही हम से माल छीन कर ले गये!’’
‘‘कौन मानेगा’’—गाइलो बोला—‘‘कि तू साला जिन का हैवीली पेड खबरी, तू उनको जानता हैइच नहीं?’’
‘‘यही सच है ।’’—चेराट ने फरियाद की—‘‘दिस इज गॉड्स ट्रुथ!’’
‘‘ठीक! ठीक! पण कौन मानेगा?’’
‘‘जब फुल ठुकाई होगी’’—जीतसिंह बोला—‘‘हाथ-पाँव-तोड़ मार लगाई जायेगी तो आखिर बोलेगा तो क्या बोलेगा! एक मोबाइल नम्बर बोलेगा जिस पर कि तूने हमारी मुखाबिरी की, जिस पर वाल्ट में हमारी कामयाबी की खबर की। भीड़ू, मैं खुद चैक किया कि वो नम्बर मौजूद नहीं है। जिस काम के लिये वो नम्बर माँगता था, उसके फिनिश होते ही उन लोगों ने सिम को नक्की किया। पण उस नम्बर से भाई लोगों को जवाब नहीं मिलेगा तो वो यही सोचेंगे कि तू उन को चक्क्र देता था। फिर क्या होगा?’’
‘‘क-क्या...क्या होगा?’’
‘‘मार खाता ही मर जायेगा ।’’
उसका शरीर जोर से काँपा।
‘‘बट’’—फिर वो बड़ी मुश्किल से बोल पाया—‘‘दि मैटर इज क्लोज्ड नाओ ।’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘अभी वो बात खत्म है। अभी वो लोग मेरे को माफी दिया, छोड़ दिया क्यों कि उन्हें मेरी बात पर यकीन आया कि मैं तुम्हें नहीं पहचानता था। अभी उनको कैसे मालूम पड़ेगा कि...कि...’’
‘‘हम बोलेंगे न!’’
‘‘तुम...तुम काहे को बोलोगे?’’
‘‘क्यों कि तू हमारे खिलाफ है ।’’
‘‘मैं खिलाफ है!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘अरे, मैं तुम को इतना फेवर किया...’’
‘‘खुद को किया। पहले ही बोला ।’’
‘‘ओके। खुद को किया लेकिन तुम को भी तो किया!’’
‘‘नहीं किया। हो गया। क्यों कि तेरी मजबूरी थी। क्योंकि हम को फेवर किये बिना तू खुद को फेवर नहीं कर सकता था। ऐसा करने की कोई सूरत होती तो तू हमारे लिये उंगली न हिलाता। बढ़-बढ़ के बोलता, और शाबाशियाँ बटोरता, कि वाल्ट में जो किया था हमने किया था ।’’
‘‘फिर भी मैं तुम्हारे खिलाफ...’’
‘‘सीडी भूल गया! जिसकी हूल देता है!’’
‘‘ओह! तो ये बात है!’’
‘‘अभी आई समझ में। अपनी खैरियत चाहता है तो सीडी निकाल ।’’
उसने मजबूती से इन्कार में सिर हिलाया।
‘‘अब वो तेरे किसी काम की नहीं। जिस वजह से वो तूने तैयार की थी, वो वजह अब खत्म हो चुकी है। क्या!’’
वो परे देखने लगा।
‘‘अरे, घौंचू’’—गाइलो झल्लाया—‘‘कुछ मगज में पड़ रयेला है कि नहीं पड़ रयेला कि फिरेंड क्या बोलता है!’’
‘‘तुम मेरे से जबरदस्ती नहीं कर सकते ।’’
‘‘अच्छा!’’
‘‘तुम्हारा वादा था कि तुम जो मैं किया वो भूल जाओगे, उसको फिर कभी याद नहीं करोगे, फिर कभी मेरे पीछे नहीं पड़ोगे। अभी डील से बैक आउट करते हो। ये वादाखिलाफी है ।’’
‘‘वादा इस सोच के तहत था’’—जीतसिंह बोला—‘‘कि वो किस्सा खत्म था। रात की बात दोबारा फिर कभी सिर नहीं उठाने वाली थी। पण ऐसा तो न हुआ! साली अगले रोज ही बड़े घर में पेशी हो गयी—तेरी भी और मेरी भी—किस्सा तो साला खत्म हुआ ही नहीं! साला और बढ़ गया, और पसर गया, और फैल गया। अभी मैं महबूब फिरंगी कर के उस डेंजर अन्डरवल्र्ड बॉस के निशाने पर। ये टाइम तो बिग बॉस ने सैम्पल दे कर ही जाने दिया, अगली बार के लिये बोल के रखा कि गला हँसता होयेंगा। अभी मैं वादा देखे या अपनी जान की सलामती की फिक्र करे!’’
चेराट खामोश रहा।
‘‘वादा आम हालात पर लागू था। तेरे को मालूम अब हालात आम नहीं। हमारे लिये भी नहीं और तेरे लिये भी नहीं। अभी पोजीशन ये है कि रात की बात में हमारा जो रोल है, उससे सिर्फ तू वाकिफ है। सिर्फ वाकिफ होता तो भी वान्दा नहीं, हम जैसे तैसे भुगत लेते पण तू तो साला श्याना भीड़ू सीडी निकाला जिससे हम मुकर नहीं सकते, जिसको हम भुगत नहीं सकते। अभी सीडी साला वो तोता है जिसमें हमारी जान अटकी है और जो तेरे कब्जे में है। इधर कर ।’’
उसने फिर इन्कार में सिर हिलाया।
‘‘अब मुंडी हिलाने से काम नहीं चलेगा। मैं तेरे को हूल नहीं देता, रिक्वेस्ट करता है, सीडी इधर कर वर्ना मैं बिग बॉस के पास जाता है ।’’
‘‘क्या!’’
‘‘महबूब फिरंगी के पास जाता है ।’’
‘‘गोली है। तुम्हें क्या मालूम वो किधर मिलता है!’’
‘‘साला मगज में जाला। अरे, तू उधर था बिग बॉस के दरबार में। तब बिग बॉस के आर्डर पर उसका लेफ्टीनेंट—मंगेश गाबले करके भीड़ू—मेरे को अपना मोबाइल नम्बर दिया कि नहीं दिया?’’
‘‘वो तो दिया ।’’
‘‘तो! मैं लगाता है न अभी तेरे सामने उसको फोन कि मेरे पास बिग बॉस के वास्ते बहुत इम्पार्टेंट कर के जानकारी जो मेरे को बिग बॉस को ही देना माँगता था, पेश हो के देना माँगता था। अभी बोल, बिग बॉस मेरे को बुलायेगा कि नहीं बुलायेगा मोस्ट इमीजियेट करके?’’
‘‘क्या...क्या...क्या बोलोगे उसको?’’
‘‘फुल स्टोरी बोलूँगा। बिग बॉस के दरबार में जिन दो भीड़ू लोगों की शिनाख्त से तूने इतना पुरजोर इन्कार किया, तेरे पास उनकी वाल्ट में इन एक्शन सीडी। अभी बोल, श्याने, फिर और कुछ बोलने को बाकी रह जायेगा!’’
चेराट के गले की घण्टी जोर से उछली।
‘‘फिर जैसे मेरे को सैम्पल, वैसे तेरे को फुल ट्रीटमेंट! फुल ट्रीटमेंट समझता है या मैं समझाये?’’
उसके शरीर ने जोर की झुरझुरी ली।
‘‘तु-तुम्हारा क्या होगा?’’—फिर वो बड़ी मुश्किल से बोल पाया।
‘‘बुरा होगा। पण तू देखने को सलामत किधर होगा! तू तो पहले ही ऊपर गॉड की काल बैल बजाता होगा, बोलता होगा महबूब फिरंगी ने भेजा। क्या!’’
उसने बेचैनी से पहलू बदला।
कई क्षण खामोशी रही।
‘‘लम्बा सोचने का’’—गाइलो बोला—‘‘तो आज ड्यूटी से नक्की कर। हमेरे पास तो टेम है। तब तक बीवी भी आ जायेगी। उसको भी बोलना सोच में हैल्प करने को ।’’
उसने जोर से थूक निगली।
‘‘सीडी की एक कापी अन्डरवल्र्ड बॉस को पहँुचाना माँगता था न!’’—जीतसिंह बोला—‘‘अभी तेरे को कुछ हो जाये या न कुछ हो जाये, पहँुच जायेगी ।’’
‘‘म-मैं...मैं’’—चेराट दबे स्वर में बोला—‘‘सीडी सौंप दूँ तो क्या करोगे?’’
‘‘अगर कोई श्यानपन्ती नहीं करेगा, गारन्टी करेगा कि और कापी नहीं है तो तेरे सामने नक्की करेंगे ।’’
‘‘इधरीच डेस्ट्राय कर के जायेंगे ।’’—गाइलो बोला।
‘‘और कापी नहीं है ।’’
‘‘तेरे ‘सेफ हैण्ड्स’ को एक कापी पुलिस को भी सौंपने का था?’’
‘‘हाँ। लेकिन कापी अभी नहीं है। जब नौबत आती तो बनाता ।’’
‘‘पक्की बात?’’
‘‘हाँ ।’’— वो एक क्षण ठिठका, फिर बोला—‘‘मैंने बात पक्की की, अब तुम भी करो। बोलो, इस बात की क्या गारन्टी है की सीडी डेस्ट्राय हो जाने के बाद भी उस बाबत तुम बिग बॉस को कोई गुमनाम टिप देने की जुगत नहीं करोगे?’’
‘‘अपनी करतूत को हम खुद मोहरबन्द करेंगे?’’
‘‘अपनी करतूत को सेंसर कर के। छुपा के ।’’
‘‘किसलिये?’’
‘‘ताकि मुझे सजा फिर भी मिले ।’’
‘‘और तू गा गा कर हमारा रोल बॉस को सुनाये ।’’
‘‘सीडी के बिना मैं कुछ साबित नहीं कर सकूँगा। अब जवाब दो, क्या गारन्टी है कि बिग बॉस को कोई गुमनाम टिप नहीं दोगे?’’
‘‘देता है। पहले बोल, सजावटी जवाब माँगता है कि आनेस्ट जवाब माँगता है?’’
‘‘आनेस्ट जवाब माँगता है ।’’
‘‘तो आनेस्ट जवाब ये है, भीड़ू, कोई गारन्टी नहीं। जैसे हमें कोई गारन्टी नहीं होने वाली कि तेरे पास सीडी की कोई दूसरी कापी नहीं ।’’
‘‘आई स्वियर एक ही कापी है ।’’
‘‘तो मैं भी कसम खाता है कि बिग बॉस को कुछ नहीं बोलने का। सीडी खत्म होते ही ये बात खत्म हो जायेगी ।’’
‘‘फिर मुकर गये तो?’’
‘‘हम पहले भी नहीं मुकरे। वहम है तेरा मुकरे। हालात ही ऐसे बने कि सीडी की बात को फिर उठाना पड़ा। तूने सोचा था या मैंने सोचा था कि महबूब फिरंगी जैसे अन्डरवल्र्ड डॉन से वास्ता पड़ जायेगा? वो भी इतनी जल्दी?’’
‘‘ठीक!’’
‘‘तो फिर?’’
‘‘मैं सीडी देता हूँ ।’’
जीतसिंह और गाइलो दोनों ने मील की लम्बी साँस ली।
गाइलो की टैक्सी में सवार वो दोनों धारावी से वापिस लौट रहे थे।
जीतसिंह खामोशी से सिग्रेट के कश लगा रहा था।
गाइलो ने सिग्रेट कुबूल नहीं किया था।
‘‘जीते!’’—एकाएक वो बोला—‘‘कमाल किया तूने!’’
‘‘कोई कमाल नहीं किया ।’’—जीतसिंह शान्ति से बोला—‘‘खाली एक ब्लफ चलाया था जिसकी मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि चल जायेगा ।’’
‘‘पण चला बरोबर! नो?’’
‘‘यस ।’’
‘‘तेरे को गारन्टी कि सीडी की कापी नहीं है?’’
‘‘गारन्टी कैसे होगी! पण बोले तो उम्मीद पूरी पूरी है ।’’
‘‘उम्मीद में लोचा तो?’’
‘‘तो अभी हम कुछ नहीं कर सकते। उसके इतना साथ देने के बाद अब कापी का मसला उठा कर फिर उसके पीछे पड़ना ठीक नहीं होगा ।’’
गाइलो खामोश रहा।
‘‘फिर जैसे वो खौफ खाये था उस से लगता नहीं था कि उसने कापी की बाबत झूठ बोला होगा ।’’
‘‘क्या पता लगता है!’’
‘‘वो तो है बरोबर, क्या पता लगता है!’’
‘‘साला टॉप का चिल्लाक भीड़ू! डर गया होने का डिरयामा करता होयेंगा!’’
जवाब देने की जगह जीतसिंह ने सिग्रेट का लम्बा कश लगाया।
‘‘टपकाये साले को?’’
‘‘क्या!’’—जीतसिंह हड़बड़ाया—‘‘क्या बोला?’’
‘‘अरे, फिनिश करे चिल्लाक भीड़ू को?’’
‘‘उससे क्या होगा? कापी का हव्वा फिनिश हो जायेगा?’’
‘‘पहले निकलवायेंगे न कापी की जानकारी!’’
‘‘कैसे?’’
‘‘थर्ड डिग्री से ।’’
‘‘तू क्या जानता है थर्ड डिग्री के बारे में?’’
‘‘अभी जानता है न! बड़ा बटाटा ने सिखाया न! पुलिस वालों ने सिखाया न! बड़ा बटाटा मेरे से तेरा पता निकलवाना माँगता था। ठोका तो देना पड़ा न! थानेदार तहरीरी बयान माँगता था कि मैं कोरट में तेरा गलत शिनाख्त किया। साला जानवर का माफिक मार लगाया तो पड़ा न बयान लिख के देना! मार खा खा के मैं भी साला एक्सपर्ट हो गया है इस डिपार्टमेंट में। साला सब जानता है थर्ड डिग्री का बारे में—लेना भी और देना भी ।’’
‘‘भाई लोगों वाली जुबान बोल रहा है ।’’
‘‘कोई वांदा तेरे को?’’
‘‘है न बरोबर! खामखाह खूनखराबा करना बोले तो बेवकूफी। जिस छोटे लैवल पर हमेरे को कुछ करना माँगता है, वो तो हो नहीं रहा, साला टॉप का काम हैंडल करेगा तो हैंडल पेंदे में होगा। भूख ज्यास्ती लगी हो तो भी मँुह में उतना ही निवाला लेना चाहिये जितना कि चबाया जा सके। आई बात समझ में?’’
‘‘नहीं। साला फैंसी बात। सिर पर से गुजर गया ।’’
‘‘तो सिम्पल कर के बोलता है। इम्पार्टेंट कर के कोई भी फैसला हमेशा होश में करने का, जोश में नहीं। साला खून से हाथ रंगा, हमारा फिर भी कुछ न कुछ संवरा तो क्या फायदा हुआ?’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘किस्मत खराब होनी चाहिये, गाइलो, सीडी की कापी हुई तो उस भीड़ू के टपक जाने के बावजूद ऐसा सिर उठायेगी कि हमारा सिर घुटनों में होगा ।’’
‘‘जीसस!’’
तभी जीतसिंह का मोबाइल बजा।
उसने स्क्रीन पर निगाह डाली।
शेखर नवलानी।
जल्दी से उसने काल रिसीव की।
‘‘मैंने बोला था’’—नवलानी की आवाज आयी—‘‘बड़े वकील से कान्टैक्ट हो गया तो तुम्हें खबर करूँगा ।’’
‘‘हुआ, साहब?’’—जीतसिंह आशापूर्ण स्वर में बोला।
‘‘हाँ, आखिर हुआ। वो क्या है कि नया केस डिसकस करने के लिये, कोई मेरे को बोला कि, उसके पास—गुंजन शाह की बात कर रहा हूँ—वीकएण्ड में ही टाइम होता है। इसलिये मेरे को उम्मीद थी कि वो कल शनिवार का या परसों इतवार का कोई टाइम देगा। लेकिन अभी उसके आफिस से फोन आया कि उसने आज शाम चार बजे का टाइम हमारे केस को डिसकस करने को मुकर्रर किया था...’’
‘‘पण, साहब’’—जीतसिंह घबरा गया—‘‘फीस का तो अभी इन्तजाम है नहीं!’’
‘‘चलेगा। पहली मीिंटग क्लायन्ट से, केस से, वाकिफ होने के लिये होती है इसलिए अमूमन चार्ज नहीं होती ।’’
‘‘ऐसा?’’
‘‘हाँ। क्यों कि वो केस को रिजेक्ट भी तो कर सकता है! जब क्लायन्ट को रिप्रेजेंट नहीं करना तो फीस कैसी!’’
‘‘ठीक!’’
‘‘क्लायन्ट टाइम पर न पहँुचे तो उसके आफिस में अप्वायन्टमेंट कैंसल भी हो जाती है—क्योंकि नैक्स्ट क्लायन्ट का टाइम फिक्स होता है—इसलिये ऐन टाइम पर पहँुचना है...बल्कि थोड़ा पहले ।’’
‘‘किसको?’’
‘‘अरे, भई, बोला न क्लायन्ट को!’’
‘‘सुष्मिता को?’’
‘‘और किसको?’’
‘‘अकेले?’’
‘‘जवान जहान लड़की है, पढ़ी लिखी है, क्या प्राब्लम है अकेले?’’
‘‘उसको तो अभी इस बाबत कोई खबर भी नहीं!’’
‘‘क्यों? अभी भी नहीं मिले? अभी भी टाइम नहीं लगा?’’
‘‘अभी क्या बोलेगा, साहब!’’
‘‘अब जा के पता करो उसका। ये मीटिंग बहुत बहुत इम्पॉर्टेंट है, न हो पाई तो दोबारा अप्वायन्टमेंट हासिल होने में बहुत दिक्कत होगी। हो सकता है न भी हासिल हो ।’’
‘‘साहब, मीटिंग तो होगी जरूर, पण ये पक्की कि उसको अकेले जाने का?’’
‘‘उसको कोई प्राब्लम है तो तुम साथ चले जाना ।’’
‘‘मैं! मैं साला बेहैसियत टपोरी!’’
‘‘अब मैं क्या बोलूं! तुम्हारे कम्पलेक्स का तो मेरे पास कोई इलाज नहीं न!’’
‘‘साहब, आप नहीं चल सकते?’’
‘‘मैं बहुत बिजी हूँ—सुबह भी बोला था—बान्द्रा से बहुत दूर हूँ...कल्याण में हूँ...’’
‘‘ओह!’’
‘‘मैं पहँुचने की कोशिश करूँगा। लेकिन न पहँुच पाऊं तो मेरे इन्तजार में टाइम वेस्ट नहीं करने का। समझ गये?’’
‘‘हाँ, साहब। बरोबर साहब ।’’
लाइन कट गयी।
गाइलो की टैक्सी में जीतसिंह चिंचपोकली पहँुचा।
सुष्मिता वहाँ मौजूद थी।
जीतसिंह ने उसे बड़े वकील से अप्वायन्टमेंट की बाबत बताया और उसकी जरूरत की बाबत समझाया।
सुष्मिता भौंचक्की सी उसका मँुह देखने लगी।
‘‘ये सब इन्तजाम किसने किया?’’—वो हैरानी से बोली।
जीतसिंह निगाह चुराने लगा।
‘‘तुमने किया?’’
‘‘मैं कैसे कर सकता था?’’—जीतसिंह जल्दी से बोला—‘‘मेरी ऐसी औकात कहाँ है?’’
‘‘तो किसने किया?’’
‘‘चंगुलानी साहब का एक वाकिफ है। प्राइवेट डिटेक्टिव है। शेखर नवलानी नाम है। उसने किया ।’’
‘‘मैं उससे वाकिफ हूँ। एक दो बार सेठ जी से मिलने तुलसी चैम्बर्स आया था ।’’
‘‘वही। उसी ने किया ।’’
‘‘क्यों? खामखाह क्यों?’’
‘‘क्योंकि उसे तुम्हारे से हमदर्दी है। क्योंकि वो समझता है कि तुम्हारे साथ ज्यादती हुई है ।’’
‘‘इसलिये मेरे लिये स्पेशल सर्विस करता है! क्योंकि मैं चैरिटी केस!’’
‘‘क्योंकि उसे सेठ जी का मुलाहजा है। खुद को सेठ जी के अहसानों के तले दबा मानता है इसलिये समझता है यूँ अहसान का बदला चुका सकता है। बोले तो ये भी हो सकता है कि इस बाबत उसे सेठ जी की कोई हिदायत हो ।’’
‘‘जो मेरे साथ बीती, उसकी उसको खबर कैसे लगी?’’
‘‘वो जासूस है, जासूसी करता है, लगा ली किसी तरह से ।’’
‘‘तुमने की?’’
जीतसिंह परे देखने लगा।
‘‘तुम उससे वाकिफ हो। तुमने की ।’’
‘‘उसका मेरे पर भी तो बहुत बड़ा अहसान है! दो बार मेरी जान बचाई...’’
‘‘मालूम है मेरे को ।’’
‘‘...मेरे से पूछा तो मैं क्या बोलता? मेरे को कुछ मालूम नहीं था?’’
‘‘अभी जो बात हो रही है, उसी पर रहो। तो नवलानी ने सब सुना, सब जाना, सब समझा और गुप्त दान की तरह मेरे लिये काम करना शुरू कर दिया?’’
‘‘सेठ जी की वजह से ।’’
‘‘किसी भी वजह से। वो शख्स सोशल सर्विस करता है, गुड डीड आफ दि डे करता है पर जिसके लिये करता है उससे मिलना जरूरी नहीं समझता, उससे कान्टैक्ट तक करना जरूरी नहीं समझता!’’
‘‘नवलानी साहब भला आदमी है, अहसान नहीं जताना चाहता होगा! या इस बाबत भी हो सकता है उसे सेठ जी की कोई हिदायत हो!’’
‘‘इसलिये वाया ब्रांच लाइन काम करता है!’’
‘‘बोले तो?’’
‘‘वाया जीतसिंह काम करता है!’’
‘‘अव्वल तो ऐसा है नहीं, अगर ऐसा है और तुम्हें इससे ऐतराज है तो...’’
‘‘क्या तो?’’
‘‘कुछ करना जरूरी नहीं। कहीं जाना जरूरी नहीं। नवलानी साहब समझ जायेगा तुमको अहसान नहीं माँगता, चैरिटी नहीं माँगता। चलता हूँ ।’’
‘‘नहीं। नहीं चलते हो!’’
‘‘बोले तो?’’
‘‘मंगलवार के बाद आज दिखाई दिये, कहाँ थे?’’
‘‘कहाँ होना है! ऐसीच इधर उधर भटकता था ।’’
‘‘रात को भी?’’
‘‘रात को भी क्या?’’
‘‘भटकते थे? सोते नहीं थे?’’
‘‘ऐसा कहीं होता है!’’
‘‘नहीं होता। तो भी तो किसी भी रात इधर लौट के न आये!’’
‘‘फ्रेंड हैं न!’’
‘‘खुशकिस्मत हो ।’’
जीतसिंह को आह सी सुनाई दी।
‘‘दो बार क्राफोर्ड मार्केट का भी चक्कर लगाया ।’’
‘‘अच्छा!’’
‘‘एक ताला ठीक काम नहीं करता था। सोचा था उधर फ्री में काम हो जायेगा ।’’
जीतसिंह खामोश रहा।
‘‘तुमने बोला था न, कोई ताला ठीक करवाना हो तो बोलूं तुम्हें!’’
‘‘चलता हूँ ।’’
‘‘फिर! टिके नहीं रह सकते?’’
‘‘किस वास्ते?’’
‘‘ये बताने के वास्ते कि कब चलना है!’’
‘‘अभी। तभी चार बजे पहँुच पाओगी ।’’
‘‘तुम साथ नहीं चलोगे?’’
‘‘मेरा जाना जरूरी नहीं ।’’
‘‘जरूरी है। मैं जगह न ढूँढ़ पायी तो प्राब्लम होगी, देर से ढूँढ़ पायी तो अप्वायन्टमेंट पर लेट हो जाऊंगी ।’’
‘‘ऐसा नहीं होना माँगता। चार बजे पहँुचना जरूरी। लेट होने पर अप्वायन्टमेट कैंसल ।’’
‘‘सब कुछ जानते हो। नवलानी साहब के असिस्टेंट तो नहीं बन गये?’’
‘‘कोई हर्ज है? जब ताला-चाबी का काम नक्की करने का तो कुछ तो करने का!’’
‘‘तो वो काम छोड़ रहे हो?’’
‘‘हां ।’’
‘‘ठीया भी?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘दो बार बेकार गयी मैं वहाँ?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘इसलिये तो नहीं कह रहे हो कि मैं फिर वहाँ न जाऊं?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘अब क्या करोगे?’’
‘‘अभी बोला तो खुद!’’
‘‘नवलानी साहब ने असिस्टेण्ट न रखा तो क्या करोगे?’’
‘‘तो...देखूँगा। सोचूँगा ।’’
‘‘अभी नहीं देखा सोचा?’’
‘‘नहीं। तो अब मैं चलूँ?’’
‘‘हाँ, चलो। लेकिन चल ही न देना ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘मेरे साथ चलना है। बाहर जाओ, दस मिनट में आती हूँ ।’’
जीतसिंह इन्तजार करता टैक्सी में बैठा था जब कि उसके मोबाइल की घण्टी बजी।
उसने स्क्रीन पर निगाह डाली तो नम्बर उसकी पहचान में न आया। काल सुने बिना वो फोन को जेब के हवाले करने ही लगा था कि ठिठका।
वो नम्बर उन पाँच नम्बरों में से एक था जो सुबह उसने पीसीओ से ट्राई किये थे और जिसको डायल करने पर उसे ‘टैम्परेरिली स्विच्ड आफ’ की घोषणा सुनाई दी थी।
उसने कॉल रिसीव की।
‘‘हल्लो!—वो सावधान स्वर में बोला—‘‘कौन बोलता है?’’
‘‘बद्रीनाथ?’’
‘‘कौन पूछता है?’’
‘‘वालपोई के बिग डैडी एडुआर्डो ने तुम्हारा नम्बर दिया, बोला तुम डायरेक्ट बात करना माँगता था ।’’
वो अकेली बात ही स्थापित करने को काफी थी कि लाइन पर सही पार्टी थी।
‘‘मैं भी काल लगाया, भीड़ू’’—वो बोला—‘‘फोन आफ करके रखता है!’’
‘‘कब? कब लगाया?’’
‘‘आज दोपहर के करीब ।’’
‘‘तब थोड़ा टेम बन्द था। सारी बोलता है ।’’
‘‘अभी बोले तो...’’
‘‘बोलता है, पण पक्की तो कर बद्रीनाथ है, कोई दूसरा भीड़ू बद्रीनाथ का फोन नहीं सुन रयेला!’’
‘‘मैं बद्रीनाथ। अभी अपना बोलने का ।’’
‘‘राजाराम ।’’
‘‘क्या माँगता है?’’
‘‘वही माँगता है जिसका एक्सपर्ट है ।’’
‘‘कैसे जाना?’’
‘‘एक ऐसे भीड़ू से जाना जिसके साथ काम कर चुका है ।’’
‘‘नाम बोलने का ।’’
‘‘नयन बलसारा ।’’
‘‘वो साला हरामी! धोखेबाज! मिल जाये तो पहले मगज में बुलेट डालेगा फिर पूछेगा कैसा है ।’’
‘‘कमाल है! वो तो तुम्हारी इतनी तारीफ करता था! बोलता था पूना के होटल ब्लू स्टार में डायमण्ड डीलर्स के लिये बना वाल्ट खोल लिया। बोले तो नामुमकिन काम कर दिखाया। और तुम...साला कोसता है उसको ।’’
‘‘तारीफ में बोला साला हरामी। ये न बोला कि पूना में मेरे चार साथी मार गिराये! लूट का माल अकेले हज्म कर जाने की कोशिश में साला खुल्ला खूनखराबा किया! कभी मिल जाये तो पहले मगज में बुलेट डालूँ और फिर पूछूँ कैसा है भीड़ू ।’’
‘‘देवा! इतना जहर...’’
‘‘किधर पाया जाता है?’’
‘‘कौन?’’
‘‘नयन बलसारा और कौन!’’
‘‘पाया जाता है क्या मतलब?’’
‘‘किधर से है?’’
‘‘तेरे को नहीं मालूम?’’
‘‘मालूम। अभी मालूम करने का कि राजाराम करके भीड़ू को मालूम कि नहीं मालूम!’’
‘‘ओह! बहुत खबरदार भीड़ू है तू!’’
‘‘जवाब देने का ।’’
‘‘सूरत...सूरत से है ।’’
‘‘सूरत में पाया जाता है?’’
‘‘हर जगह पाया जाता है। पूना पहँुचा था कि नहीं पहँुचा था?’’
‘‘कैसे? कैसे हर जगह पाया जाता है?’’
‘‘बिचौलिये की मार्फत ।’’
‘‘नाम बोलने का ।’’
‘‘बख्तावर ।’’
‘‘आदमी है कि औरत?’’
‘‘आदमी ।’’
‘‘सूरत में?’’
‘‘मुम्बई में ।’’
‘‘ठीक है ।’’
‘‘क्या ठीक है? पास हो गया मैं?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘अभी मैं बोले कि...’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘अभी टेम नहीं मेरे को। और मेरे को फोन पर बात करना नहीं माँगता, आमने-सामने बैठ के बात करना माँगता है ।’’
‘‘अरे, ये तो सुन लो कि माजरा क्या है!’’
‘‘मेरे को मालूम। बिग डैडी को बोला न, टॉप का वाल्टबस्टर माँगता है! और जो बोलना हो, सामने बैठ के बोलना ।’’
‘‘सामने बैठ के?’’
‘‘हाँ। ताकि मेरे को मालूम पड़े राजा कैसा होता है, राम कैसा होता है ।’’
‘‘साला मसखरी मारता है!’’
‘‘अगर मसखरी एनजाय करने को फोन लगाया तो कट करता है ।’’
‘‘अरे, नहीं। नहीं। ठीक है, बैठते हैं। टेम बोलो! जगह बोलो!’’
‘‘तुम बोलो!’’
‘‘अरे, खबरदार भीड़ू तो तू है! तू ही बोल क्या बोलता है!’’
‘‘हुज्जत नहीं करने का ।’’
‘‘ठीक है। मैं ही बोलता है। पैरामाउन्ट बार, दादर। रात नौ बजे ।’’
‘‘आज?’’
‘‘और क्या अगले हफ्ते! अगले महीने!’’
‘‘सॉरी!’’
जीता सोच रहा था कि क्या ये महज इत्तफाक था कि मुलाकात के लिये जो बार राजाराम कर के भीड़ू ने चुना था, वो उसका खूब देखा भाला था।
‘‘उधर एन्ट्रेंस पर दायें बाजू केबिन हैं। कतार के आखिर वाले केबिन में। नौ बजे ।’’
‘‘नौ बजे रश का टेम होता है। वो केबिन खाली न हुआ तो?’’
‘‘होगा। देखना ।’’
‘‘ठीक है। देखेगा। पण अकेले आने का ।’’
‘‘बरोबर। तेरे को भी ।’’
‘‘मेरे को मंजूर ।’’
‘‘तो कट करता है ।’’
‘‘अभी एक बात और बोलने का ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘फिर काल लगाने में इतना टेम क्यों लगाया?’’
‘‘नहीं लगाया। मैंने एडुआर्डो को बोला था तीन दिन में फिर काल करूँगा—ताकि तेरे को सोच विचार का पूरा टेम मिले—तीन दिन में काल लगाई न!’’
‘‘ओह!’’
‘‘एडुआर्डो शायद भूल गया ये बात बोलना ।’’
‘‘हो सकता है। अभी कट करता है ।’’
‘‘पैरामाउन्ट बार! नौ बजे! कतार का आखिरी केबिन!’’
‘‘बरोबर!’’
दस मिनट से पहले सुष्मिता ने बाहर सड़क पर कदम रखा।
जीतसिंह ने देखा उसने कपड़े तब्दील कर लिये थे—अब वो जींस टी-शर्ट की जगह नयी शलवार कमीज पहने थी—बाल संवार लिये थे लेकिन चेहरे पर कोई मेकअप लगाने की कोशिश नहीं की थी।
‘‘क्या देखते हो?’’—वो बोली।
‘‘ड्रैस नयी जान पड़ती है!’’
‘‘ओह! ड्रैस देख रहे थे। मैंने समझा था...’’
‘‘क्या समझा था?’’
‘‘कुछ नहीं। एक गुड न्यूज है, मुझे नौकरी मिल गयी है ।’’
‘‘कहाँ...कहाँ मिली?’’
‘‘काला घोड़ा में एक गारमैंट एक्सपोर्टर है, उसके पास। मेरे पिछले चार्टर्ड एकाउन्टेंट एम्पलायर का क्लायन्ट है इसलिये जानता था। कहते ही हाँ बोल दी। मेरी हालत देखकर पिघला तो खुद ही पाँच हजार रुपये एडवांस दे दिये जिससे मैंने कुछ कपड़े और कुछ जरूरी सामान खरीदा ।’’
‘‘गुड न्यूज तो ये बराबर है। तुम्हारी एक प्राब्लम तो हल हुई!’’
‘‘हाँ ।’’
जीतसिंह ने उसके लिये टैक्सी का पीछे का दरवाजा खोला। सुष्मिता टैक्सी में सवार हो गयी तो वो आगे बढ़ कर पैसेंजर सीट का दरवाजा खोलने लगा।
‘‘इधर आ के बैठो ।’’—सुष्मिता कदरन तीखे स्वर में बोली।
‘‘इधर ठीक है ।’’—गाइलो के बाजू में पैसेंजर सीट पर बैठता वो बोला।
‘‘अरे, बात करना है ।’’
‘‘करेंगे न!’’
सुष्मिता ने होंठ भींच लिये।
गाइलो ने टैक्सी आगे बढ़ाई। वो मेन रोड पर पहँुच कर आगे परेल की तरफ दौड़ने लगी तो जीतसिंह पीछे घूमा और तनिक उत्सुक भाव से बोला—‘‘क्या बात करना है?’’
‘‘अब याद नहीं ।’’—सुष्मिता भुनभुनाई—‘‘दिमाग से उतर गयी ।’’
‘‘याद कर लो। आ जायेगी ।’’
‘‘आ जायेगी तो बोलूंगी ।’’
‘‘बोलना। तब तक मेरे को एक बात करना है ।’’
‘‘क्या? क्या बात करना है?’’
‘‘तुम्हें सेठ जी की किसी वसीयत की खबर है?’’
‘‘वसीयत!’’
‘‘जो पहले से चली आ रही हो या शादी के बाद तुम्हारी वजह से, नयी बीवी की वजह से, की हो?’’
सुष्मिता ने सशंक भाव से टैक्सी चलाते गाइलो की पीठ की तरफ देखा।
‘‘फ्रेंड है ।’’—जीतसिंह बोला—‘‘जिगरी! भाइयों जैसा। गाइलो!’’
‘‘ओह!’’
‘‘गाइलो, हल्लो बोल ।’’
‘‘हल्लो, मैडम!’’
‘‘हल्लो, गाइलो ।’’—सुष्मिता अनमने भाव से बोली।
‘‘क्या कहती हो वसीयत के बारे में?’’—जीतसिंह बोला।
‘‘तुम्हें वसीयत से क्या?’’
‘‘मेरे को नहीं। नवलानी साहब को है। नवलानी साहब मेरे को बोला तुम कभी मिलो तो तुमसे पूछूं ।’’
‘‘तुम पूछो?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘वो क्यों नहीं?’’
‘‘वो चिंचपोकली में नहीं रहता...’’
‘‘तुम भी कहाँ रहते हो!’’
‘‘...इस वास्ते मेरे को बोला ।’’
‘‘वसीयत के बारे में सवाल क्यों?’’
‘‘उसमें तुम्हारा जिक्र हो सकता है। है तो ये अपने आप में सबूत होगा कि सेठ जी की जिन्दगी में तुम उनकी ब्याहता बीवी थीं ।’’
‘‘मुझे ऐसी किसी वसीयत की कोई खबर नहीं ।’’
‘‘कभी जिक्र भी न आया?’’
‘‘जिक्र आया बराबर। एक दो बार बोला कि मेरी वजह से नयी वसीयत करने की जरूरत थी लेकिन कुछ किया या नहीं, मुझे नहीं मालूम। मेरे खयाल से नहीं ही किया होगा। अभी सोच ही रहे होंगे कि अब करते है, अब करते हैं कि...’’
उसने असहाय भाव से गर्दन हिलाई।
‘‘ ‘नयी’ वसीयत करने की जरूरत बोला तो इसका साफ मतलब हुआ कि पहले से कोई वसीयत थी!’’
‘‘हुआ तो सही! लेकिन मेरे को पहली किसी वसीयत की कोई खबर नहीं, इस बाबत उन्होंने मेरे से कभी कोई जिक्र नहीं किया था ।’’
‘‘घर में कभी कोई वकील बुलाया था?’’
‘‘किस वास्ते?’’
‘‘नई वसीयत ड्राफ्ट करने के वास्ते!’’
‘‘नहीं, मेरी जानकारी में नहीं। वैसे भी वकील से काम होता तो वो उसे लेमिंगटन रोड अपने स्टोर पर बुलाते जहाँ कि वो सारा दिन होते थे ।’’
‘‘ठीक! तो नयी पुरानी कैसी भी किसी वसीयत की तुम्हें कोई जानकारी नहीं?’’
‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। सिवाय इसके कि इरादा था उन का वसीयत करने का ।’’
टैक्सी तब गोखले रोड पर दाखिल हो रही थी और आगे दादर की तरफ बढ़ रही थी।
‘‘नवलानी साहब को’’—जीतसिंह बोला—‘‘कहीं से कुछ ऐसा इशारा मिला है कि सेठ जी के करीबी वारदात वाले दिन से—शनिवार सोलह तारीख से—पहले भी मुम्बई में थे...’’
‘‘क्या बात करते हो!’’
‘‘इशारा बोला मैं। कोई गारन्टी नहीं बोला ।’’
‘‘ओह! कौन करीबी?’’
‘‘छोटा लड़का! दामाद!’’
‘‘क्या किस्सा है?’’
जीतसिंह ने नवलानी से हासिल हुई जानकारी दोहराई।
‘‘हूँ ।’’—वो खामोश हुआ तो सुष्मिता ने विचारपूर्ण हूंकार भरी।
कुछ क्षण खामोशी रही।
‘‘देखो’’—फिर वो बोली—‘‘दामाद का—लेख अटलानी का—शनिवार से पहले मुम्बई में होना कोई बड़ी बात नहीं। उसका कारोबार ऐसा है कि महाना चक्कर तो लगाता ही है, कई बार महीने में दो बार, तीन बार भी आ जाता है। यूँ जल्दी-जल्दी आता था तो कई बार मिलने नहीं आता था, खाली सेठ जी को फोन कर देता था कि मुम्बई में या आसपास कहीं था लेकिन बहुत बिजी था, मिलने नहीं आ सकता था। कई बार सिर्फ शक्ल दिखाने लेमिंगटन रोड पहँुच जाता था। सेठ जी ऐसी फोन काल का, ऐसी विजिट का, कभी जिक्र करते थे, कभी नहीं करते थे। कहने का मतलब है कि दामाद अगर शनिवार से पहले मुम्बई में था तो कोई हैरानी की बात नहीं। लेकिन अशोक नौ हजार किलोमीटर से—आल दि वे फॉम लन्दन—मुम्बई आया हो और पिता से मिलने न पहँुचा हो, ये हैरानी की बात है ।’’
‘‘बहुत बिजी हो तो?’’
‘‘तो भी ।’’
‘‘कुछ ऐसा पता लगा है कि लन्दन से उसने मुम्बई की फ्लाइट नहीं पकड़ी थी, वो किसी और मेट्रो टाउन में पहँुचा था, वहाँ उसको जो भी काम था उसे निपटा कर लोकल फ्लाइट से गुरुवार को या उससे पहले किसी दिन मुम्बई आया था और इधर से उसने ब्रिटिश एयरवेज की रात ग्यारह बजे की लन्दन की फ्लाइट पकड़ी थी। यूं मुम्बई आने का मकसद उम्मीद है कि पिता से मुलाकात करना ही होगा। वो बेटा है, स्टोर पर शक्ल दिखाकर तो निकल नहीं लिया होगा! ऐसे बाप ही नहीं जाने देगा। अभी बोले तो क्या ऐसा हो सकता है कि वो कोलाबा, तुलसी चैम्बर पहँुचा हो और तुम्हें खबर न लगी हो!’’
वो फिर खामोश हो गयी और त्योरी चढ़ाये सोचने लगी।
‘‘एक ही तरीके से हो सकता है ।’’—फिर बोली—‘‘बुधवार को सारा दिन मैं घर पर नहीं थी। सुबह सवेरे घर से निकली थी और देर रात को लौटी थी ।’’
‘‘कहाँ से?’’
‘‘लोनावला से। बहन के बच्चों से मिलने गयी थी। कुछ दिनों से वो रोज फोन कर रहे थे कि मैं या उन्हें मुम्बई बुलाऊँ या लोनावला उनसे मिलने आऊँ। उन्हें बुलाने से उनकी पढ़ाई का हर्जा होता, इसलिये में मिलने गयी थी ।’’
‘‘ओह!’’
‘‘अशोक अगर आया था तो बुधवार को आया था—यही बात लेख पर भी लागू है—लेकिन फिर भी मुझे सख्त हैरानी है कि वो यूं आनन-फानन आया और आनन-फानन चला गया ।’’
‘‘लेकिन लेख अटलानी का—दामाद का—ऐसे आनन-फानन आना, या न आना, कोई हैरानी की बात नहीं!’’
‘‘हाँ।...अभी एक और भी बात है जो पता नहीं मुझे कहनी चाहिये या नहीं!’’
‘‘क्या?’’
‘‘चंगुलानी साहब को दामाद के आने से ज्यादा उसका न आना पसन्द था ।’’
‘‘ऐसा?’’
‘‘हाँ। उसको कोई खास पसन्द नहीं करते थे और अपना मिजाज उससे छुपाते भी नहीं थे। एक बार तो मैंने खुद उन्हें उससे कहते सुना था ‘यार, तू शोभा के साथ आया कर’। लेख ने उस बात को ये सोच कर हँस के उड़ा दिया था कि पिता को बेटी की याद सताती थी लेकिन असल बात कुछ और ही थी। शोभा बच्चों की वजह से ज्यादा आ नहीं सकती थी इसलिये उनका इशारा होता था कि वो भी ज्यादा न आया करे, लेकिन इशारा वो नहीं पकड़ता था ।’’
‘‘ओह! अभी बोले तो पक्की कर के तुम नहीं कह सकतीं कि पिछले हफ्ते उन दोनों में से कोई मुम्बई में था या नहीं था!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘ठीक!’’
वार्तालाप वहीं समाप्त हो गया।
आगे टर्नर रोड, बान्द्रा वैस्ट तक का सफर खामोशी से कटा।
टर्नर रोड पर हैरीटेज कर्मिशयल कम्पलैक्स तलाश करने में उन्हें कोई दिक्कत न हुई।
कम्पलैक्स की लॉबी के दहाने पर ठिठक कर जीतसिंह ने आशापूर्ण निगाह भीतर और दूर तक आजू बाजू दौड़ाई।
नवलानी उसे कहीं न दिखाई दिया।
‘‘क्या देखते हो?’’—सुष्मिता बोली।
‘‘नवलानी साहब को देखता था ।’’—जीत सिंह बोला—‘‘जब फोन लगाया था, तब कल्याण में था। बोलता था कोशिश करेगा पहँुचने की। अभी नहीं पहँुच पाया। चार बजने में खाली पाँच मिनट बाकी हैं। टेम नहीं खोटी करने का। अकेला जाने का ऊपर पाँचवे माले पर। मैं इधरीच नवलानी साहब का वेट करता है ।’’
‘‘तुम साथ क्यों नहीं चलते?’’
‘‘वकील साहब देखते ही भांप जायेगा मैं साला टपोरी। ठीक नहीं होगा। तुम्हारा हैसियत भी खराब होगा ।’’
‘‘मेरी क्या हैसियत है?’’
‘‘फिर भी! वकील साहब पूछेगा मैं कौन! क्या जवाब दोगी?’’
वो खामोश रही।
‘‘कोई जवाब दे भी लोगी तो वो मेरे को बाहर बैठने को बोलेगा तो क्या करोगी?’’
उसका सिर सहमति में हिला।
‘‘नवलानी साहब होता तो बात कुछ और होती। अब नहीं है तो...अकेले ही जाना पड़ेगा। टेम खोटी नहीं करने का। पाँचवां माला। फ्रंट ।’’
‘‘कैसे मालूम?’’
‘‘वो लिफ्टों के बाजू में जो बड़ा बोर्ड लगा है, उस पर लिखा है ।’’
‘‘ओह! जाती हूँ ।’’
गुजंन शाह उम्र में बासठ साल का रोली पोली व्यक्ति था, उसके बाल उस उम्र में भी काले थे, क्लीनशेव्ड सूरत पर नौजवानी जैसी चमक थी और आँखों में स्थायी गुलाबी डोरे थे जो चुगली करते थे कि शराब और शबाब का खास रसिया था। वो आदतन बहुत सजधज के रहता था, जूतों की पालिश से लेकर बालों की जैल तक कहीं कोई कमी उसे कबूल नहीं थी। जिस कुर्सी पर वो बैठा था वो उसका सिंहासन थी और उसका आफिस उसकी बादशाहत था।
उसने आँख भर कर सुष्मिता की तरफ देखा।
नाइस! नाइस! लैस डेकोरेशन, मोर सबस्टैंस! नाइस इनडीड!
पैन होती उसकी निगाह सुष्मिता पर सिर से पाँव तक यूं फिरी जैसे कोई कल्लाल बकरे को देखकर अन्दाजा लगा रहा हो कि कितने किलो गोश्त निकलेगा!
फिर एकाएक वो मुस्कराया।
‘‘सिट डाउन, माई डियर ।’’—वो मीठे स्वर में बोला।
‘‘थैक्यू ।’’—सुष्मिता झिझकती हुई उसके सामने एक विजिटर्स चेयर पर ढेर हुई।
‘‘आई एम सॉरी अबाउट युअर हसबैंड ।’’
सुष्मिता खामोश रही, उसका सिर स्वयमेव झुक गया।
‘‘शेखर नवलानी पीडी, जिसने तुम्हारा केस रिकमैंड किया है, मेरा फ्रेंड है। एण्ड एनी फ्रेंड आफ नवलानी इज ए फ्रेंड आफ माइन ।’’
‘‘थैंक्यू, सर ।’’
‘‘तुम्हारे कान्टैक्स्ट में नवलानी से मेरी रूबरू मुलाकात नहीं हुई। फोन पर ही उसने मुझे तुम्हारे केस की बाबत बताया था। बहुत मोटे तौर पर। अब तुम यहाँ मेरे सामने बैठी हो, इसलिये खुद अपने केस को तफसील से बयान करो ।’’
‘‘यस सर ।’’
सुष्मिता ने सविस्तार सब बयान किया, ऐन वैसे ही जैसे उसने जीतसिंह के सामने किया था।
आखिर वो खामोश हुई।
‘‘हूँ ।’’—वकील ने लम्बी हूंकार भरी—‘‘तो ये है तुम्हारा केस! तुम्हारे स्वर्गवासी हसबैंड की औलाद का दावा है कि तुम उसकी बीवी नहीं, लिव-इन पार्टनर थीं, शादी के सबूत उन्होंने डेस्ट्राय कर दिये, गवाह या गायब हो गये या मुकर गये, खिलाफ हो गये और पुलिस की सपोर्ट उनको—जालिमों को—हासिल है, न कि तुम्हें—मजलूम को—जिसे कि होनी चाहिये थी। ठीक?’’
‘‘जी हाँ ।’’
‘‘खड़े पैर घर से निकाल दिया जब कि आज की तारीख में लिव-इन पार्टनर के भी कुछ अधिकार हैं ।’’
‘‘मुझे ये बात मालूम नहीं थी ।’’
‘‘कैसे मालूम होती! लिव-इन पार्टनर होतीं तो मालूम होती न! तुम तो बाकायदा, शादीशुदा बीवी थीं। नो?’’
‘‘यस...सर ।’’
‘‘आजकल माडर्न, अरबन सोसायटी में लिव-इन रिलेशंस का बहुत रिवाज है। तुम्हारे मन में कभी ऐसा खयाल आया?’’
‘‘जी! जी नहीं, कभी नहीं ।’’
‘‘बजाय इसके उम्रदराज शख्स से शादी का खयाल आया!’’
‘‘खामखाह न आया ।’’—सुष्मिता का स्वर स्वयमेव ही तीखा हो उठा—‘‘उसकी वजह थी। वो क्या है कि...’’
‘‘जरूर होगी। हर बात की होती है। लेकिन वो मेरा सब्जेक्ट नहीं...’’
तो छेड़ा क्यों, साले घौंचू!
‘‘तुम्हारा केस पुलिस की एक्टिव पार्टीसिपेशन से कम्पलैक्स बन गया है, तुम्हारे लिये डिफीकल्ट बन गया है, वर्ना इस में कुछ नहीं रखा। कोर्ट में केस लगने पर मैं इसकी धज्जियाँ उड़ा सकता हूँ बशर्ते कि मुझे थोड़ा टो होल्ड मिल जाये ।’’
‘‘वो कैसे मिलेगा?’’
‘‘दो तरीके हैं। एक तो ये कि शादी के जो गवाह गायब हैं या गायब कर दिये गये हैं— जैसे कि शादी कराने वाला कश्मीरी पण्डित, स्टोर मैनेजर देवकी नन्दन तिवारी, फोटोग्राफर संतोष वाजपेयी—उनमें से कोई काबू में आ जाये और अदालत में खड़ा होकर मैजिस्ट्रेट के सामने असलियत बयान करे। लेकिन ये काम मेरे स्कोप से बाहर है, इसे शेखर नवलानी ही कर सकता है जो कि काबिल प्राइवेट डिटेक्टिव है, किसी वजह से तुम्हारा हमदर्द है—अलबत्ता वजह मुझे मालूम नहीं—इसलिये मुझे उम्मीद है कि कुछ न कुछ तो कर ही दिखायेगा ।’’
‘‘न कर पाया तो?’’
‘‘तो मैं कुछ करूँगा न!’’
‘‘क्या?’’
‘‘हैट में से खरगोश निकालूँगा ।’’
‘‘जी!’’
‘‘कभी मैजिक शो नहीं देखा? जादूगर सिर से उतार कर दर्शकों को हैट दिखाता है जो कि खाली होता है, पब्लिक कनफर्म करती है कि खाली है, फिर वो उसी हैट में हाथ डालता है और खरगोश निकाल कर दिखा देता है। वक्त आने दो, ऐसा ही कुछ कोर्ट में मैं कर के दिखाऊँगा ।’’
‘‘मैं समझी नहीं ।’’
‘‘समझना क्या है, देखना!’’
‘‘फिर भी...’’
‘‘नो फिर भी। खूबसूरत लड़कियों को दिमाग पर जोर नहीं देना चाहिये—ऐसा करने से खूबसूरती में फर्क आ जाता है—उन का जोर कहीं और ही होना चाहिये ।’’
‘‘और कहाँ?’’
‘‘सोचो!’’
साला लम्पट!
‘‘बहरहाल मेरा यकीन जानो, गुमशुदा गवाहों की तलाश के सिलसिले में शेखर नवलानी कुछ कर पाये या न कर पाये, मैं ऐसा कम से कम एक गवाह अदालत में खड़ा करके यकीनी तौर पर दिखाऊँगा ।’’
‘‘कैसे कर पायेंगे?’’
‘‘माई डियर, मैं गुंजन शाह हूँ। गुंजन शाह से कोई सवाल नहीं करता कि वो क्या, कैसे कर पायेगा!’’
‘‘सॉरी!’’
‘‘जादूगर अपना जादू स्टेज करने के लिये अबराकाडाबरा या गिली गिली तो करता है, मेरे को कोर्ट में अपना एक्ट स्टेज करने के लिये, कामयाबी से स्टेज करने के लिये, वो भी नहीं करना पड़ता। दैट्स वाई आई एम गुंजन शाह। अन्डरस्टैण्ड?’’
‘‘यस, सर। परफेक्टली, सर ।’’
‘‘गॉड ब्लैस यू, माई डियर ।’’
‘‘आपने कहा था टो होल्ड हासिल करने के दो तरीके हैं, एक आपने अभी बयान किया, एक्सप्लेन किया, दूसरा तरीका क्या है?’’
‘‘दूसरा तरीका थोड़ा पेचीदा है और यूं समझो कि उसकी कामयाबी का दारोमदार होपफुल थिंकिंग पर है ।’’
‘‘सर, प्लीज एक्सप्लेन ।’’
‘‘तुम्हारे हसबैंड का कत्ल कारजैकिंग का वाकया बताया जाता है। उस में कारजैक्र्स के लिये बोनस ये था कि साथ में उस रोज की डिपार्टमेंट स्टोर की सेल की रकम भी शामिल थी जो कि बीस बाइस लाख रुपया बताई जाती है। मवालियों ने कार छीनने की कोशिश की, तुम्हारे हसबैंड ने रिजिस्ट किया, नतीजतन जान से गया। शेखर नवलानी के पास एक आल्टरनेट थ्योरी है जो कहती है कि वो क्लियर मर्डर का केस था, कारजैकिंग महज उसका कवर अप था। वो इनवैस्टिगेटर्स को सही राह से भटकाने की कोशिश थी, वो उसे कारजैकिंग ही समझते रहते और मोटिवेटिड मर्डर की तरफ, इरादतन किये या कराये गये कत्ल की तरफ उनका ध्यान ही न जाता, जैसा कि हो रहा है ।’’
‘‘लेकिन इरादतन कत्ल!’’
‘‘खुद सोचो कौन कर सकता है या करा सकता है!’’
‘‘मेरे को सोचते डर लगता है ।’’
‘‘यहाँ डरने की क्या बात है! गुंजन शाह है न यहाँ!’’
आया बड़ा सूरमा! जैसे शेर आ जायेगा तो मूँछ से पकड़ लेगा।
‘‘डैमसेल इन डिस्ट्रेस है जहाँ, एडवोकेट गुंजन शाह है वहाँ। हा हा हा ।’’
साला जोकर! पता नहीं इतना बड़ा वकील कैसे बन गया!
‘‘माई डियर,आजकल औलाद की माँ-बाप में वो निष्ठा आस्था नहीं रही जो कि कभी होती थी। ‘सुत बड़भागी’, ‘पितु मातु वचन अनुरागी’ कभी होते थे, आज नहीं होते। आज आये दिन खबरें छपती हैं, बेटे ने बाप का खून कर दिया, दामाद ने ससुरे का गला काट दिया...’’
‘‘क्या कहना चाहते हैं? मेरे को तो सोच के घबराहट हो रही है!’’
‘‘क्या सोच के?’’
‘‘आप जानते हैं ।’’
‘‘फिर भी?’’
‘‘अब क्या बोलूं!’’
‘‘कुछ भी बोलो। आपसदारी की बात है ।’’
‘‘सर, वारदात के वक्त बेटे इंग्लैंड में थे, दामाद कोलकाता में था ।’’
‘‘कैसे मालूम? इंग्लैण्ड यहाँ से दिखाई देता है? कोलकाता यहाँ से दिखाई देता है?’’
‘‘सर, ये बहुत दूर की कौड़ी है ।’’
‘‘है तो सही न! दूर की हो या पास की हो, तुम्हारे काम आती है तो वैैलकम है ।’’
‘‘सर, वो लोग तो कत्ल का इलजाम कहीं और ही थोपने की तैयारी में हैं!’’
‘‘मैंने सुना है उस बाबत। नवलानी ने मुझे तुम्हारे प्रीमैरिज लव अफेयर की बाबत बताया था...’’
‘‘वो लव अफेयर नहीं था, सम्मोहन था जिसमें एक जना जकड़ा हुआ था और दूसरे को उसका कोई अन्दाजा तक नहीं था ।’’
‘‘कुछ भी था। मैं ये कहना चाहता था कि ऐसा फर्जी, बनाया हुआ केस सेशन कोर्ट में एक दिन नहीं ठहर सकता। ये पुलिस का बड़ा बोल है कि वो यूं किसी के भी खिलाफ कत्ल का फर्जी केस खड़ा कर सकते हैं। पुलिस जिससे पैसा खाती है, मोटा पैसा खाती है, उसके हक में, उसको तसल्ली देने के वास्ते लम्बी-लम्बी छोड़ना पुलिस का फर्ज होता है ।’’
‘‘वो कुछ नहीं कर सकते?’’
‘‘कर सकते हैं। तुम्हें गिरफ्तार कर सकते हैं, तुम्हारे अकम्पलिस को—सुना है जीतसिंह नाम है—गिरफ्तार कर सकते हैं लेकिन गिरफ्तार किये नहीं रह सकते—अब तो बिल्कुल ही नहीं किये रहे सकते क्योंकि गुंजन शाह का दखल है, गुंजन शाह का नाम ही इस बात की गारन्टी है कि वो कोई गलत, नाजायज, गैरकानूनी कदम उठाने से पहले दस बार सोचेंगे, सौ बार सोचेंगे—बहरहाल नियम ये है कि गिरफ्तारी के चौबीस घण्टों के भीतर मुलजिम को चार्ज लगा कर कोर्ट में पेश करना पड़ता है। उनकी माडस अपरांडी ये होती है कि वो लोग कोर्ट से रिमाण्ड हासिल करते हैं जो कि पहली बार तो मिल ही जाता है, दूसरी बार आम और तीसरी बार खास हालात में एक्सटेंड भी हो जाता है। रिमाण्ड के दौरान वो मुलजिम के खिलाफ वो तमाम पैंतरे आजमाते हैं जिनके लिये पुलिस बदनाम है। कनफेशन तक हासिल कर लेते हैं लेकिन ऐसा थर्ड डिग्री से हासिल किया गया कनफेशन कोर्ट में शायद ही कभी ठहर पाता है ।’’
‘‘पुलिस फिर भी ये सब करती है?’’
‘‘हाँ। आदत से मजबूर है। हाथ में ताकत हो तो न आजमाने का क्या मतलब! मार तक डालते हैं मुलजिम को रिमाण्ड के दौरान। कह देते हैं खुदकुशी कर ली ।’’
सुष्मिता के शरीर ने जोर से झुरझुरी ली।
‘‘रिमाण्ड मतलब नर्क का नजारा। शियर नाइटमेयर! लेकिन तुम क्यों डरती हो? तुम मेरी शरण में आयी हो। तुम्हारा मैं बाल नहीं बांका होने दूँगा ।’’
‘‘श्योर, सर?’’
‘‘ऐज श्योर एज युअर डिवाइन ब्यूटी ।’’
‘‘जी!’’
‘‘जानती हो जिस फर्म में बैठी हो उस का मोटो क्या है?’’
‘‘जी नहीं। क्या है?’’
‘‘जो गुंजन शाह का क्लायन्ट है, वो बेगुनाह है। गुंजन शाह का क्लायन्ट हमेशा, हमेशा, हमेशा बेगुनाह होता है, सारी ज्यूडीशियरी इस बात को जानती है ।’’
‘‘ओह!’’
‘‘वो लोग तुम्हें परेशान कर सकते है, पशेमान कर सकते हैं, हलकान कर सकते हैं, लेकिन गुनहगार नहीं हो तो गुनहगार साबित नहीं कर सकते। हो गुनहगार?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘तो चिन्ता करने की कोई बात है?’’
‘‘ऐसे तो नहीं है!’’
‘‘कैसे भी नहीं है। क्योंकि तुम सेफ हैण्ड्स में हो। किसके सेफ हैण्ड्स में हो!’’
‘‘गुंजन शाह के ।’’
‘‘ऐग्जैक्टली। अब लाख रुपये का सवाल ।’’
‘‘वो क्या?’’
‘‘कैन यू अफोर्ड मी?’’
‘‘जी!’’
‘‘आई कम एक्सपेंसिव!’’
‘‘सर, एक्सपेंसिज की कोई बात मेरे से किसी ने नहीं की थी ।’’
‘‘करनी चाहिये थी। आई चार्ज हैवीली। तुम्हारे पहनावे से, रखरखाव से मुझे नहीं लगता कि तुम हैवी चार्जिज़ अफोर्ड कर सकती हो ।’’
सुष्मिता ने बेचैनी से पहलू बदला।
‘‘लेकिन ये कोई बड़ा हैण्डीकैप नहीं है ।’’
‘‘ऐसा!’’
‘‘हाँ। माई डियर, फी कैन बी कलैक्टिड इन कैश ऑर इन काइन्ड। नो?’’
‘‘यस ।’’
‘‘सो नाओ यू गैट माई प्वायन्ट। प्वायन्ट!’’—उसने अपलक सुष्मिता की तरफ देखा तो उसकी निगाह सुष्मिता को अपने वक्ष में गड़ती महसूस हुई—‘‘टू प्वायन्ट्स टू बी एग्जैक्ट। एण्ड ग्रेट प्वायन्ट्स एट दैट ।’’
‘‘सर’’—सुष्मिता हिम्मत जुटाती बोली—‘‘मेरे को बोला गया था कि फस्र्ट टाइम आप क्लायन्ट को—आई मीन वुड बी क्लायन्ट को—केस से फैमिलियर होने के लिये बुलाते हैं, ये जज करने के लिये बुलाते हैं कि केस आप की लाइन का है या नहीं, आप उसे कुबूल करेंगे या रिजेक्ट करेंगे, इसलिये फस्र्ट टाइम आप कोई फीस चार्ज नहीं करते। अभी आपकी बातों से लगता है कि आप को केस कबूल है। यू आर नाट गोर्इंग टु रिजेक्ट इट, सो इट गोज विदाउट सेर्इंग दैट देयर विल डेफीनिटली बी ए नैक्स्ट टाइम। नो?’’
‘‘यस ।’’—वकील के लहजे में बेसब्रेपन का पुट आया—‘‘क्या कहना चाहती हो?’’
‘‘सर, जिस प्वायन्ट पर—प्वायन्ट्स पर—आप का जोर था, उसके बारे में—उन के बारे में—हम नैक्स्ट टाइम बात करें तो कैसा रहे!’’
‘‘काफी...’’
‘‘नो, सर। थैंक्यू ।’’
‘‘...होशियार हो!’’
‘‘ओह! मैं तो कुछ और ही समझी थी!’’
‘‘मुझे पसन्द आयीं ।’’
‘‘जी!’’
‘‘क्लायन्ट के तौर पर ।’’
‘‘ओह!’’
‘‘अब फिर तो कुछ और नहीं समझी थीं?’’
‘‘जी नहीं ।’’
‘‘आल राइट। एनफ आफ दि समार्ट टाक। लैट्स टॉक बिजनेस नाओ ।’’
‘‘यस, सर ।’’
‘‘कितना अरसा हुआ शादी को?’’
‘‘सात महीने ।’’
‘‘इस दौरान हसबैंड की फैमिली से कितनी बार मुलाकात हुई?’’
‘‘इंग्लैंड रहते दो बेटों से एक बार भी नहीं...’’
‘‘एक बार भी नहीं?’’
‘‘जी ।’’
‘‘शादी की बधाई देने भी न आये?’’
‘‘हमें बुलाते थे। ताकि बधाई भी हो जाती और हमारी विलायत की सैर भी हो जाती ।’’
‘‘खैर। आगे?’’
‘‘कोलकाता रहती बेटी से एक बार हुई जब कि शादी के कुछ दिन बाद ही फैमिली के साथ मुम्बई आयी थी, हसबैंड से—सेठ जी के दामाद से—चार पाँच बार हुई क्योंकि वो अपने बिजनेस के सिलसिले में मुम्बई अक्सर आता रहता है ।’’
‘‘मुलाकात पर बेटी ने कोई मिजाज दिखाया? बेमेल शादी पर नाक चढ़ाई?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘जब कि तुम्हारे से बड़ी होगी!’’
‘‘काफी बड़ी। क्योंकि दोनों भाइयों से भी बड़ी है ।’’
‘‘मिजाज न दिखाया, नाक न चढ़ाई, लेकिन शायद मन की भावना को मन में रखा हो। लिहाज किया है!’’
‘‘मेरा?’’
‘‘पिता का। बेटियों को होता है न!’’
‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकती। वो महज दो दिन की मुलाकात थी जिसमें कोई अप्रिय घटना घटित नहीं हुई थी ।’’
‘‘हिन्दी अच्छी है तुम्हारी!’’
सुष्मिता खामोश रही।
‘‘सात महीने कोई बहुत लम्बा अरसा नहीं होता लेकिन फिर होता भी है। इतने अरसे की हर बात रिक्लैक्ट करने को मैं बोलूँ तो शायद तुम नहीं कर पाओगी लेकिन हालिया बातों को दिमाग पर मामूली जोर देकर भी तुम रिक्लैक्ट कर सकती हो ।’’
‘‘कैसी बातें?’’
‘‘ऐसी बातें जिनका मौजूदा केस से, तुम्हारी मौजूदा दुश्वारी से, कोई दखल, कोई ताल्लुक दिखाई दे ।’’
‘‘मैं समझी नहीं ।’’
‘‘कोई ऐसी हालिया बात याद करने की कोशिश करो जो घर में वाकया हुई हो और जो तुम्हें गैरमामूली लगी हो। गैरमामूली लगी होगी तो जाहिर है कि आसानी से भूल नहीं गयी होगी। याद करो कोई ऐसी बात!’’
‘‘है तो सही ऐसी एक बात!’’
‘‘गुड ।’’
‘‘हालिया भी है ।’’
‘‘कितनी हालिया?’’
‘‘हफ्ता पहले की। पिछले गुरुवार की ।’’
‘‘वैरी गुड। क्या बात थी?’’
‘‘गुरुवार शाम सात बजे के करीब की बात है जब कि घर में कोई मेहमान आया था...’’
‘‘मैं बीच में टोक रहा हूँ, चंगुलानी साहब उस वक्त घर होते थे?’’
‘‘नहीं, लेकिन उस रोज घर थे, स्टोर से जल्दी लौट आये थे क्यों कि तबीयत खराब थी ।’’
‘‘आई सी। मेहमान कौन था?’’
‘‘मालूम नहीं ।’’
‘‘मेरा मतलब है कोई जाना पहचाना था या अन्जान था?’’
‘‘नहीं मालूम। मैंने उसकी सूरत नहीं देखी थी। न आते, न जाते, न उसकी वहाँ मौजूदगी के दौरान ।’’
‘‘वजह?’’
‘‘वजह ही तो उस बात को गैरमामूली बनाती है!’’
‘‘ओह!’’
‘‘काल बैल बजी थी तो सेठ जी ने खुद जा के दरवाजा खोला था ।’’
‘‘खुद! इतने रईस आदमी के घर में नौकर चाकर कोई नहीं?’’
‘‘वो वहाँ अकेले रहते थे, लिव-इन हायर्ड हैल्प की जरूरत महसूस नहीं करते थे। फिर शादी के बाद एक से दो हो गये थे तो भी ऐसे किसी नौकर चाकर की जरूरत उन्होंने महसूस नहीं की थी। हमारी जरूरत एक मेड से और एक कुक से पूरी हो जाती थी। मेड सुबह सात बजे आती थी और शाम सात बजे चली जाती थी, कुक दोपहर में आता था और दो टाइम के काबिल कुकिंग कर के जाता था। घर में कोई पार्टी वगैरह होती तो कुक शाम को भी आता था और सर्विस स्टाफ अलग से बुलाया जाता था। उस रोज मेड अभी गयी ही थी जब कि मेहमान आया था। सेठ जी ने उसे दरवाजा खोला था तो चौखट पर ही उसे छोड़कर मेरे पास आये थे और मुझे हुक्म दिया था कि मैं अपने बेडरूम मैं जाऊँ। उनके तब के मिजाज से ही मुझे अहसास हो गया था कि मेहमान की वजह से वो किन्हीं अनप्लेजेंट्रीज की उम्मीद कर रहे थे जिन की पार्टी वो मुझे नहीं बनने देना चाहते थे। उनके हुक्म के तहत मैं अपने बेडरूम में चली गयी थी तो भी वो मेरे पीछे वहाँ आकर मुझे ताकीद कर के गये थे कि जब तक मेहमान विदा न हो जाये, मैं वहाँ से बाहर कदम न रखूँ। इस बात ने मुझे बहुत सस्पेंस में डाला था, मेरा दिल गवाही देने लगा था कि मुझे मालूम होना चाहिये था कि मेहमान कौन था और उसकी आमद क्या डिस्टर्बेंस पैदा कर सकती थी! फैमीनिन क्यूरासिटी, यू नो!’’
‘‘यस, आई डू। प्लीज कन्टीन्यू ।’’
‘‘नतीजतन बैड पर जा कर सैटल होने की जगह मैं दरवाजे के पास जा खड़ी हुई थी और कान खड़े कर के बाहर से आती कोई आवाज सुनने की कोशिश करने लगी थी। अपनी भरपूर कोशिश के बावजूद जब मैं कुछ भी सुन नहीं पायी थी तो मैंने दरवाजे को खामोशी से थोड़ा सा खोलकर उस में एक झिरी बनाने का इरादा किया था। तब मुझे मालूम पड़ा था कि वो दरवाजे को बाहर से बन्द कर गये थे। इस बात ने मेरी उत्सुकता को और बढ़ाने का काम किया था। मैं कुछ सुन नहीं पा रही थी, फिर भी मैं दरवाजे के करीब एक कुर्सी घसीट कर उस पर बैठ गयी थी ।’’
‘‘फिर?’’
‘‘थोड़ी देर तो हालत जस के तस रहे थे, कुछ सुन पाने का हाल पैदा नहीं हुआ था लेकिन फिर एकाएक जोर जोर से बोलने की आवाजें आनी लगी थीं। साफ जान पड़ता था कि बातचीत तकरार में बदल गयी थी और किसी बात पर झगड़ा होने लगा था। झगड़ा भी कोई मामूली नहीं, बहुत जोरों का...’’
‘‘वायलेंट कुअर्ल!’’
‘‘यू सैड इट, सर ।’’
‘‘जोर जोर से बोला जाने पर आवाजें ऊँची हो जाती हैं, लिहाजा सुनाई भी देने लगी होंगी!’’
‘‘जी हाँ ।’’
‘‘कुछ सुना?’’
‘‘सुना तो सही!’’
‘‘याद है?’’
‘‘हँ-हाँ ।’’
‘‘क्या सुना! नहीं...ठहरो जरा ।’’—उसने एक कागज कलम उसके सामने रखा—‘‘जो सुना, वो लिखो ।’’
‘‘लिखूँ?’’—सुष्मिता सकपकाई।
‘‘हाँ। यूं याददाश्त बेहतर काम करेगी, तरतीब से काम करेगी ।’’
‘‘मैंने यूं पहले कभी लिखा नहीं ।’’
‘‘यूं पहले कभी दुरगत हुई?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘तो?’’
‘‘ओके ।’’
उसने कलम थाम जी और फूलस्केप कागज अपने सामने घसीट लिया।
शाह ने एक सिग्रेट सुलगा लिया और अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर को तिरछी घुमाकर उस पर पसर गया। उसने आँखें मूँद लीं और सिग्रेट के छोटे-छोटे कश लगाने लगा।
तल्लीनता की प्रतिमूर्ति बनी सुष्मिता कलम चलाने लगी।
काफी देर वो सिलसिला चला।
आखिर उसने कलम रख दी और जो कागज पर दर्ज किया था, उसको खामोशी से पढ़ा।
डायलाग की सूरत में जो उसने लिखा था, वो इस प्रकार था :
‘‘ये नहीं हो सकता ।’’
‘‘मैं मदद की गुहार लगा रहा हूँ ।’’
‘‘मैं पहले ही तुम्हारी बहुत मदद कर चुका हूँ ।’’
‘‘मैंने कब इन्कार किया! मैं दिल से शुक्रगुजार हूँ...’’
‘‘जितने हो चुके, उतने पर ही रहो ।’’
‘‘मेरी प्राब्लम है ।’’
‘‘खुद हल करो ।’’
‘‘कर सकता होता तो यहाँ आता!’’
‘‘अभी कितनी बार और ये डायलॉग करोगे? कान पक गये मेरे सुन सुन के। तुम्हारी प्राब्लम्स का तो लगता है कोई ओर-छोर ही नहीं है!’’
‘‘बुरा वक्त किसी का भी आ सकता है ।’’
‘‘मालूम। इसीलिये पहले इतनी बार मदद की। बुरा वक्त लंगर डाल कर ही बैठ गया है तो मैं कुछ नहीं कर सकता ।’’
‘‘अपने ही अपनों के काम आते हैं ।’’
‘‘आया न मैं बराबर काम! कहो कि नहीं आया!’’
‘‘मैंने कब इन्कार किया!’’
‘‘तुमने तो मदद माँगने को अपना कारोबार बना लिया है! इतनी मदद कोई किसी की नहीं कर सकता। कोई अपना हो या पराया, ऐसी बातों की कोई हद होती है। सच पूछो तो मेरे को यकीन ही नहीं है तुम्हें मदद की जरूरत है। तुम इसलिये माँग खड़ी करने आ जाते हो क्यों कि माँग पूरी हो जाती है ।’’
‘‘कोई खामखाह ऐसे हाथ फैलाता है!’’
‘‘कोई नहीं फैलाता। तुम फैलाते हो। क्योंकि तुम्हारी फितरत ब्लैकमेल वाली बन गयी है ।’’
‘‘क्या! क्या फरमाया?’’
‘‘वही जो तुमने सुना। तुम मदद के तालिब नहीं, ब्लैकमेलर हो। नहीं चलेगा ।’’
‘‘मेरे को ब्लैकमेलर बोला!’’
‘‘इमोशनल ब्लैकमेलर ।’’
‘‘आप मेरी तौहीन कर रहे है!’’
‘‘क्यों करा रहे हो?’’
‘‘मैं जरूरतमन्द बन कर दरवाजे पर आ खड़ा हुआ तो आप कुछ भी कह सकते हैं!’’
‘‘कह सकता हूँ। कह रहा हूँ। तुम मत सुनो ।’’
‘‘मेरी मजबूरी सुनवा रही है ।’’
‘‘मजबूरी का हल निकालो। यहाँ बैठे तो नहीं निकलने वाला ।’’
‘‘एक बार और...सिर्फ एक बार...’’
‘‘नो!’’
‘‘वन लास्ट टाइम...’’
‘‘नो!! आई हैव कैरीड यू सो फार, दैट्स एनफ ।’’
‘‘ऊपरवाले ने आपको किसी काबिल बनाया है तो इसका मतलब ये नहीं है कि...’’
‘‘ऊपरवाले ने नहीं बनाया, मैंने बनाया है। एक मामूली किरयाने की दुकान से मैंने इतना बड़ा डिपार्टमेंट स्टोर खड़ा किया है। मेहनत, मशक्कत का जो रास्ता मेरे लिये खुला है, वो तुम्हारे लिये भी खुला है। जाओ, करो जा कर मेहनत ।’’
‘‘कर ही रहा हूँ ।’’
‘‘तो हाय-हाय किसलिये है?’’
‘‘कारोबार में ऊँच नीच किसी के साथ भी हो सकती है ।’’
‘‘ऊँच नीच न! तुम तो ये साबित करने की कोशिश कर रहे हो कि तुम्हारे साथ नीच ही होती है, ऊँच कभी होती ही नहीं ।’’
‘‘तो क्या जवाब है आपका?’’
‘‘झूले लाल! अभी जवाब मिला नहीं तेरे को मेरा!’’
‘‘मैं इतनी आसानी से नहीं टलने वाला ।’’
‘‘मुश्किल से टल जाना। टलना तो पड़ेगा ही ।’’
‘‘तो ये आप का आखिरी फैसला है कि आप मेरी कोई मदद नहीं करेंगे?’’
‘‘ये मेरा आखिरी फैसला है कि मैं तुम्हारी और मदद नहीं करूँगा। आई कैन नाट हैल्प ए प्रोफेशनल बारोअर ।’’
‘‘सब छाती पर रख के ले जाना ।’’
‘‘ले क्यों जाऊँगा? पहले भेज दूँगा ।’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘सब दान कर दूँगा। आगे बड़े सार्इं के घर पहँुचूंगा तो क्रेडिट पहले ही दर्ज होगा ।’’
‘‘आप ऐसा नहीं कर सकते ।’’
‘‘कौन रोकेगा मुझे? तू रोकेगा? रोक। तरीका मैं बताता हूँ ।’’
‘‘आप बताते हैं!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘किचन में जा, एक छुरी ले कर आ और उसे मेरे कलेजे में उतार दे। यूँ बाजिरया वसीयत शायद तेरे कुछ हाथ आ जाये ।’’
‘‘आप पागल हो गये हैं ।’’
‘‘लक्ख दी लानत हई! मेरे घर में मेरे सामने बैठ के मेरे को पागल कहता है!’’
‘‘वो तो खैर मेरे मँुह से निकल गया लेकिन आप...’’
‘‘अब जा यहाँ से। और फिर कभी यहाँ न आना ।’’
‘‘एक बार तो आऊँगा, ओल्डमैन, एक बार तो आऊँगा ।’’
‘‘क्या करने!’’
‘‘मालूम पड़ेगा। जाता हूँ ।’’
उसने कागज वकील के सामने रख दिया।
वकील कुर्सी पर सीधा हुआ, उसने कुर्सी का रुख वापिस सुष्मिता की तरफ घुमाया, मेज पर से रीडिंग ग्लासिज उठा कर नाक की फुंगी पर टिकाये और कागज उठा कर उसका अध्ययन करने लगा।
पाँच मिनट उसने उस काम में लगाये।
‘‘गुड ।’’—आखिर कागज उसने अपने सामने रखा और रीडिंग ग्लासिज को वापिस उन के केस में पहँुचाया—‘‘यू हैव डन ए गुड जॉब!’’
सुष्मिता खामोश रही।
‘‘मैं इसे गौर से फिर पढ़ूँगा, अभी सरसरी तौर पर जो मुझे सूझा है वो मैं बोलता हूँ ।’’
सुष्मिता ने सवाल करती निगाह से उसकी तरफ देखा।
‘‘बल्कि तुम भी पढ़ना। शायद नया कुछ सूझे। शायद कोई भूली बात याद आ जाये। एक कापी मैं तुम्हें देता हूँ ।’’
प्रिंटर वही मौजूद था, वकील ने एक कापी निकाल कर सुष्मिता को सौंपी।
‘‘माई डियर’’—फिर बोला—‘‘ये बात तो बेहिचक कही जा सकती है कि मेहमान कोई करीबी था, कोई गैर हरगिज नहीं था ।’’
‘‘ठीक ।’’
‘‘इस लिहाज से कौन तुम्हारे जेहन में आता है?’’
‘‘दोनो बेटे और दामाद तो आता ही है। और करीबी कौन हैं, मुझे कोई खबर नहीं ।’’
‘‘करीबी और कारोबारी। एक जगह मेहमान कहता दर्ज है कि कारोबार में ऊँच नीच किसी के साथ भी हो सकती है। कारोबारी भी ऐसा, एक अरसे से जिसका बिजनेस घाटे में जा रहा है ।’’
‘‘दामाद! लेख अटलानी!’’
‘‘तुम्हें मालूम है उसका बिजनेस घाटे में जा रहा है?’’
‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं। मुझे बस इतना मालूम है कि कोलकाता में दामाद का हौजियरी का बिजनेस है, नफे नुकसान के लिहाज से उसकी पोजीशन क्या है, इसकी मुझे कोई खबर नहीं ।’’
‘‘माली इमदाद का तालिब अगर दामाद था तो पोजीशन खराब ही होगी!’’
‘‘ये बात तो है!’’
‘‘बेटे इंगलैंड में क्या करते हैं? नौकरी या कारोगार?’’
‘‘मुझे मालूम नहीं। मेरे सामने कभी इस बात का कोई जिक्र नहीं आया। इस सिलसिले में कभी कुछ मालूम पड़ा तो यही मालूम पड़ा कि इंगलैंड में वैल सैटल्ड हैं ।’’
‘‘वैल सैटल्ड कैसे हैं—नौकरी के सदके या कारोबार के सदके—ये नहीं मालूम?’’
‘‘नहीं मालूम। लेकिन एक और बात मालूम है जो शायद किसी काम की हो ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘छोटा लड़का मुम्बई में था। इस बात की तसदीक हुई है कि वापिसी के लिये ब्रिटिश एयरवेज की पिछले गुरुवार रात ग्यारह बजे की फ्लाइट में उसकी बुकिंग थी ।’’
‘‘कैसे तसदीक हुई है?’’
‘‘इसका जवाब तो नवलानी साहब ही बेहतर दे सकते हैं ।’’
‘‘मैं बात करूँगा नवलानी से। बहरहाल ये कनफर्म है कि चंगुलानी साहब का छोटा बेटा अशोक गुरुवार, ग्यारह तारीख को मुम्बई में था?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘लेकिन ये नहीं मालूम कि कब से मुम्बई में था?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘परदेसी बेटा मुम्बई में हो तो उसका बाप से मिलने जाना बनता है ।’’
‘‘आपका मतलब है गुरुवार का मेहमान—सीक्रेट विजिटर—बेटा था!’’
‘‘क्या नहीं हो सकता?’’
‘‘मेहमान बेटा था तो मेरे से छुपाव किसलिये!’’
‘‘उसी की इज्जत रखने के लिये। चंगुलानी साहब को उसकी आमद की वजह पहले से मालूम होगी। वो ये भी पहले से निश्चित किये बैठे होंगे कि वो उसकी कोई माली इमदाद नहीं करने वाले थे और उन के रवैये से तल्खी पैदा हो कर रहनी थी। इसलिये उन्होंने उसकी विजिट तुम से छुपा कर रखी ।’’
‘‘लेकिन वजह तो न छुप पायी! मुझे’’—सुष्मिता ने दोनों के बीच में मेज पर पड़े कागज पर निगाह डाली—‘‘तो सब सुनाई दिया!’’
‘‘चंगुलानी साहब को ऐसी उम्मीद नहीं होगी। उन्हें यकीन होगा कि तुम्हारे बैडरूम के बन्द दरवाजे के पार उनके वार्तालाप की आवाजें नहीं पहँुचेंगी। तकरार में आवाजें ऊँची हो गयी थीं, इस बात का उन्हें अहसास नहीं रहा होगा ।’’
‘‘हो सकता है ऐसा। फिर भी हैरानी की बात है कि बाप बेटे के साथ ऐसी सख्ती से पेश आया ।’’
‘‘औलाद नालायक निकल रही हो तो बड़ों को सख्ती करनी ही पड़ती है!’’
‘‘सर, बुधवार शाम तक दामाद भी मुम्बई में था ।’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘दामाद—लेख अटलानी—की बुधवार शाम की मुम्बई-कोलकाता की फ्लाइट थी।’’
‘‘लेकिन बात तो गुरुवार की हो रही है!’’
‘‘जर्नी पोस्टपोन की जा सकती है। हो सकता है उसने टिकट एक्सटेंड करा ली हो।’’
‘‘ऐसा!’’
‘‘आप का क्या खयाल है?’’
‘‘खयाल तो नेक है। जैसी तल्खी से तुम कहती हो बाप बेटे से पेश नहीं आ सकता वैसी से ससुरा तो दामाद से पेश आ सकता है!’’
‘‘सर, बाई दि वे, अगर वो विजिटर छोटे बेटे और दामाद दोनों में से कोई न हो तो?’’
‘‘तो ये तो फिर भी निश्चित है कि वो कोई नौजवान था, कोई उम्रदराज शख्स नहीं था।’’
‘‘ऐसा आप कैसे कह सकते हैं?’’
‘‘मैं नही, भई, तुम्हीं कह रही हो ।’’
‘‘मैं!’’
‘‘हाँ। ये देखो अपनी तहरीर के आखिर में तुमने क्या लिखा है?’’—उसने फूलस्केप कागज का रुख सुष्मिता की तरफ किया—‘‘ये लाइन पढ़ो—‘एक बार तो आऊँगा, ओल्डमैन, एक बार तो आऊँगा’—कोई बूढ़ा तो बूढ़े को बूढ़ा नहीं कहता! या कहता है!’’
सुष्मिता ने इन्कार में सिर हिलाया।
‘‘सो देयर!’’
‘‘फिर तो वो विजिटर दामाद ही था, क्योंकि कोई बेटा बाप से ऐसी बद्तमीजी से नहीं बोल सकता ।’’
‘‘बद्तमीज बेटा बोल सकता है। तुम्हें मालूम है अशोक तमीज में, अदब में कैसा था?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘सो देयर अगेन ।’’
‘‘सर, उन्होंने ये भी तो कहा, ‘फिर कभी न आना’। बाप बेटे के साथ ऐसी सख्ती बरते, उस पर ऐसी पाबन्दी लगाये, मुझे तो हज्म नहीं होता ।’’
‘‘तुम्हें क्या हज्म होता है?’’
‘‘दामाद को—लेख अटलानी को—वो ऐसा कह सकते हैं। एक बार उन्होंने मेरे सामने दामाद को कहा था कि वो बेटी के साथ—शोभा के साथ—आया करे। ‘फिर कभी न आना’ कहने से उनका मतलब ये हो सकता है कि अकेले फिर कभी न आना ।’’
‘‘यू हैव ए प्वायन्ट देयर ।’’
‘‘शायद आप को ये जान के हैरानी हो कि वो दामाद को कोई खास पसन्द नहीं करते थे...’’
‘‘अच्छा!’’
‘‘और अपना मिजाज उससे छुपाते भी नहीं थे ।’’
‘‘फिर तो दामाद ही सूटेबल कैण्डीडेट जान पड़ता है ‘सीक्रेट विजिटर’ के टाइटल का ।’’
‘‘सर, दामाद की कैण्डीडेचर के मद्देनजर इस डायलॉग पर गौर करें तो इस का सारा मूड, सारा मिजाज उसी की तरफ इशारा करता जान पड़ता है ।’’
‘‘सिवाय एक बात के ।’’
‘‘किस बात के?’’
‘‘डायलॉग के टेल एण्ड पर वसीयत के जिक्र के। दामाद का ससुरे की वसीयत से क्या मतलब!’’
‘‘बेटी का है न! पति पत्नी एक ही इकाई तो होते हैं! वसीयत के जरिये पैसा पत्नी को मिला या पति को मिला, प्रैक्टीकली तो मेरे खयाल से एक ही बात है ।’’
‘‘हाँ। शायद। और?’’
‘‘और आप फरमाइये ।’’
‘‘मेरे खयाल से इतना काफी है। आगे मैं नवलानी से बात करूँगा और उसी से फीस भी डिसकस करूँगा ।’’
‘‘तो मैं चलूं?’’
‘‘हाँ ।’’—वो उठ कर खड़ा हुआ, अपनी विशाल एग्जीक्यूटिव टेबल के पीछे से निकला—‘‘प्लीज कम। आई विल सी यू आउट ।’’
वो आफिस के बन्द दरवाजे पर पहँुची तो उसने बायां हाथ बढ़ा कर दरवाजा खोला और निकासी में मददगार बनने के अन्दाज से सुष्मिता की पीठ पर हाथ रखा, हाथ वहाँ से सरका तो कमर पर पड़ा, कमर से फिसला तो एक कूल्हे को नीचे तक सहलाता चला गया।
बड़े वकील ने ‘फी इन काइन्ड’ की बोहनी कर भी ली थी।
नौ बजे जीतसिंह पैरामाउन्ट बार पहँुचा।
प्रवेश द्वार पर खड़ा होकर उसने एक सरसरी निगाह एक बाजू से दूसरे बाजू दौड़ाई।
बार तब तक पूरी तरह फुल नहीं हुआ था, उसे पिछली बार से जाती तजुर्बा था कि वैसा रात दस बजे के बाद ही होता था।
पैन होती उसकी निगाह बार पर और फिर उसके पीछे मौजूद बारमैन किरपेकर पर ठिठकी। पलक झपकने जितनी देर दोनों की निगाह मिली। तत्काल बारमैन परे देखने लगा। लेकिन उतने में भी जीतसिंह को उसके चेहरे पर एकाएक प्रकट हुए हैरानी के भाव साफ दिखाई दिये जिस से जाहिर होता था कि बारमैन उसे भूल नहीं चुका था। उस रोज से ठीक एक महीना पहले, बुधवार बाइस अप्रैल को, जीतसिंह ने उसे घर ले जाकर ठोका था, रात भर विट्ठलवाडी वाले अपने फ्लैट पर गिरफ्तार रखा था और बिग डैडी एडुआर्डो का कचरा करने वालों की बाबत जानकारी निकलवाई थी।
वो आगे बढ़ा और केबिनों की कतार में आखिरी केबिन पर पहँुचा।
ये देख कर वो ठिठका, सकपकाया, उसके जबड़े भिंचे, कि भीतर टेबल की एक तरफ आजू बाजू दो आदमी बैठे थे। उन में राजाराम कौन था, ये वो नहीं जानता था लेकिन कौन नहीं था, ये वो किसी के बताये बिना भी जानता था।
वहाँ बैठे दो जनों में से जो शख्स उसकी पहचान में आ रहा था, वो वो था जो राजाराम नहीं था।
वो पिछली रात वाला इंस्पेक्टर—नकली इंस्पेक्टर—गोविन्द राव आप्टे था जिसने नकली हवलदार टिंगरे के साथ जौहरी बाजार में उन्हें टोपी पहनाई थी, उनकी कामयाबी को ग्रहण लगाया था।
उसे देखकर उस जैसा ही हाल उस शख्स का न हुआ क्योंकि पिछली रात जौहरी बाजार में उसने उसे सरदार के बहुरूप में देखा था।
क्या माजरा था!
कल के लुटेरों में से एक का नये भीड़ू के साथ क्या काम!
‘‘बद्रीनाथ!—दूसरा शख्स जबरन मुस्कराता बोला।
‘‘हाँ ।’’— जीतसिंह शुष्क स्वर में बोला।
‘‘आ, बैठ ।’’
‘‘नहीं मांगता ।’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘जाता है ।’’
‘अरे, क्यों?’’
‘‘कोई बात याद नहीं रख सकता! दिन से रात होने में भूल गया!’’
‘‘अरे, क्या?’’
‘‘अकेले आने का था!’’
‘‘बरोबर! याद मेरे को। अकेला ही आया है...’’
‘‘तो मैं साला टुन्न! मेरे को डबल दिख रयेला है!’’
‘‘ओह, ये! अरे, ये मेरा बॉडीगार्ड है ।’’
‘‘मेरे को कोई नहीं बोला कि किसी भीड़ू के साथ बॉडीगार्ड हो तो वो अकेला कहलाता है ।’’
‘‘यार, तू तो...’’
‘‘उस में टेम है अभी ।’’
‘‘किस में टेम है अभी?’’
‘‘यार होने में ।’’
उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये जिनको वो यत्न से छुपाता जान पड़ा।
‘‘अभी क्या माँगता है?’’—फिर बोला।
‘‘मैं!’’—जीतसिंह बोला—‘‘मैं तो कुछ नहीं माँगता!’’
‘‘तो ये बात कैसे खत्म होने का?’’
‘‘जा के आता है। सोचना ।’’
जीतसिंह वहाँ से हट गया और बार पर पहँुचा। उसने वहाँ पड़ी ऐश ट्रे से बार काउन्टर ठकठका कर बारमैन किरपेकर का ध्यान अपनी तरफ आर्किषत किया। वो काउन्टर के पार उसके सामने पहँुचा तो जीतसिंह बोला—‘‘अभी मैं उधर कोने के केबिन पर खड़ेला था। देखा था?’’
‘‘एक बार निगाह पड़ी तो थी!’’—बारमैन सावधान स्वर में बोला।
‘‘काफी है एक बार। भीतर दो भीड़ू बैठेला है। आते देखा होगा!’’
‘‘नहीं। मैं इधर बिजी...’’
‘‘वान्दा नहीं। वान्दा नहीं। अभी उनमें से एक बाहर निकलेगा ।’’
‘‘एक!’’
‘‘दोनों भी निकल सकते हैं पण मेरे को पक्की कि एक निकलेगा। क्या!’’
बारमैन ने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया।
‘‘तब उसका थोबड़ा देखने का, गौर से देखने का, और बाद में मेरे को बोलने का कि पहचानता है कि नहीं पहचानता। क्या!’’
‘‘बरोबर!’’
‘‘किरपेकर, कोई गोली नहीं देने का। कोई पुड़िया नहीं सरकाने का। करैक्ट करके ये काम करने का। मगज में मेरे से खुन्नस में कोई खयाल आये तो पिछले महीने बाईस तारीख की रात याद कर लेना। वो टेम पांव-पांव चल के घर गया था मार्निंग में, ये टेम स्ट्रेचर पर जायेगा ।’’
‘‘मैं देखेगा न करैक्ट करके!’’
‘‘थैंक्यू बोलता है ।’’
वो बार पर से हटा और हाल में चलता उधर बढ़ा जिधर एक गलियारे में टायलेट था। उसने टायलेट में दाखिल होने की कोशिश न की, गलियारे के परले सिरे पर खड़े होकर उसने गाइलो को काल लगाई, जवाब मिला तो बोला—‘‘कहाँ पर है?’’
‘‘वहीं ।’’
‘‘कब से है?’’
‘‘अभी आया। अभी पहला हाथ में है ।’’
‘‘साथ कौन है?’’
‘‘सुनेगा तो फ्लैट हो जायेगा। अपना डेविड परदेसी ।’’
‘‘उधर पहँुच गया!’’
‘‘चानस से आया था। चानस से मिल गया। अभी मेरे साथ चियर्स बोलता है ।’’
‘‘गाइलो, बाटम्स अप करने का और उधर से नक्की करने का ।’’
‘‘क्या बात करता है! साला इतने टेम के बाद फिरेंड नम्बर वन मिला...’’
‘‘शट अप!’’
लाइन पर खामोशी छा गयी।
‘‘कोई खास बात है?’’—फिर गाइलो का संजीदा स्वर सुनाई दिया।
‘‘बहुत खास बात है ।’’—जीतसिंह बोला, उसने जल्दी से नकली इंस्पेक्टर की बाबत दोहराया—‘‘वो सच में बॉडीगार्ड है तो जब तक बॉडी इधर है गार्ड भी इधरीच होयेंगा। ये बहुत अच्छा इत्तफाक हुआ है, बाई दि ग्रेस आफ युअर गॉड, कि परदेसी तेरे साथ है। ये भीड़ू—नकली इन्स्पेक्टर—मेरा थोबड़ा नहीं पहचानता पण तेरा गोली की माफिक पहचानेगा। इस वास्ते तेरे को बैकग्राउन्ड में रहने का और परदेसी को अक्खा काम करने देने का। समझ गया?’’
‘‘वो तो मैं समझ गया बरोबर, पण काम क्या करने का? काम तो बोला हैइच नहीं!’’
‘‘बॉडीगार्ड के पीछे लगने का। पता निकालने का कि वो कौन है और किधर पाया जाता है!’’
‘‘बॉडीगार्ड! उसका एम्पलायर नहीं?’’
‘‘वो सच में बॉडीगार्ड है तो एम्पलायर की बाबत ये सब वैसे ही पता चल जायेगा। गार्ड बॉडी को किसी सेफ जगह पहँुचा कर ही तो उधर से नक्की करेगा!’’
‘‘बरोबर बोला ।’’
‘‘गाइलो, आइन्दा ऐसे हालात बनने के आसार हैं कि एम्पलायर से फिर, फिर और फिर मुलाकात होगी। लेकिन बॉडीगार्ड शायद फिर दिखाई न दे। इस वास्ते बॉडीगार्ड के पीछे पड़ने का ।’’
‘‘पण काहे कू?’’
‘‘सोच। मगज से काम ले। बॉडीगार्ड उन दो भीड़ूओं में से एक है जो कल हमें टोपी पहना गये। मैं कल भी बोला ये भीड़ू—जो कल इंस्पेक्टर गोविन्दराव आप्टे बना हुआ था—भाड़े का टट्टू जान पड़ता है, इसी वास्ते आज नवें भीड़ू के साथ नवें काम में लग रयेला है—असल हरामी वो है जो हवलदार गनपतराव टिंगरे बना हुआ था, जो बोलता नहीं था। गाइलो, हमने इस बॉडीगार्ड भीड़ू को उस असल हरामी तक पहँुचने के लिये सीढ़ी बनाना है जो साला कल जौहरी बाजार में हमारी मेहनत हड़प गया। अभी आयी बात समझ में?’’
‘‘बरोबर! ऐन फिट! साला अभी खाली चियर्स बोला तो ये हाल है! अभी बोले तो माल वापिस हासिल होने की उम्मीद निकल आयी है!’’
‘‘अभी कुछ पता नहीं। अभी सब उस बॉडीगार्ड भीड़ू पर डिपेंड करता है। अभी तू दादर पहँुच बुलेट का माफिक ।’’
‘‘तू उधर ही होयेंगा?’’
‘‘हाँ। पण मैं उस भीड़ू के पीछे नहीं लग सकता क्यों कि वो मेरा थोबड़ा देखा अभी। कुछ तो मैं करेगा बरोबर पण अभी नहीं मालूम कि क्या करेगा! अभी कट करता है ।’’
उसने फोन जेब के हवाले किया और हाल में वापिस लौटा।
जैसी कि उसे उम्मीद थी, बॉडीगार्ड भीड़ू केबिन में से गायब था।
‘‘अब राजी?’’—दूसरा शख्स बोला।
जीतसिंह ने लापरवाही से सहमति में सिर हिलाया।
‘‘अब तो बैठ!’’
पूर्ववत् सहमति में सिर हिलाता वो मेज के पार उसके सामने बैठ गया।
‘‘बहुत टेम लगाया लौट के आने में!’’
‘‘खुल्ला टेम दिया न बॉडीगार्ड को समझाने बुझाने के वास्ते!’’
‘‘तेरे साथ कोई बॉडीगार्ड होता तो मेरे को कोई लोचा नहीं था ।’’
‘‘मैं इतना इम्पार्टेंट कर के भीड़ू नहीं है कि मेरे साथ बॉडीगार्ड हो ।’’
‘‘बॉडीगार्ड वहीच काम करता है जो उसका है। बॉडी को गार्ड करता है। अच्छा बॉडीगार्ड गान्धी बाबा का थ्री-इन-वन बन्दर होता है ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘कुछ सुनता नहीं, कुछ देखता नहीं, कुछ बोलता नहीं। क्या!’’
‘‘फिर भी नहीं माँगता ।’’
‘‘अभी नक्की किया न!’’
‘‘थैंक्यू बोलता है। बाप, है तो राजाराम ही न जो डे टाइम में मेरे को फोन लगाया था?’’
‘‘हाँ। राजाराम लोखण्डे। पूरा नाम ।’’
‘‘बढ़िया ।’’
‘‘आजकल क्या कर रहा है?’’
‘‘कुछ नहीं ।’’
‘‘क्यों कि कर के हटा ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘जौहरी बाजार वाला कारनामा ।’’
‘‘कौन सा कारनामा?’’
‘‘तेरे को मालूम ।’’
‘‘नहीं, नहीं मालूम मेरे को ।’’
‘‘फिर तो बात ही खत्म है ।’’
‘‘हाँ, खत्म है। और खत्म ही माँगता है। अभी आजू बाजू का बातें करने का या असल बात पर आने का?’’
‘‘यार, तू तो मिजाज दिखाता है!’’
जीतसिंह खामोश रहा।
‘‘हूँ ।’’—राजाराम बोला।
‘‘क्या हूँ?’’
‘‘कुछ पियेगा?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘क्यों? पीता नहीं?’’
‘‘पीता है पण अभी इम्पार्टेंट कर के बात करने का न!’’
‘‘टाइम तो है!’’
‘‘बात का?’’
‘‘घूँट लगाने का ।’’
‘‘बाप, अभी डायलॉगबाजी की प्रैक्टिस करता है तो’’—जीतसिंह ने उठने का उपक्रम किया—‘‘जो बोलना है किसी और टेम बोलना, अभी मेरे को और भी काम...’’
‘‘अरे, बैठ! बैठ!’’
जीतसिंह ने अपना शरीर कुर्सी पर वापिस ढीला छोड़ा।
‘‘भाव नहीं खाने का ।’’—राजाराम बदले स्वर में बोला—‘‘मैं किसी वजह से जौहरी बाजार वाली वारदात का नाम लिया ।’’
‘‘मालूम कैसे पड़ा उधर कहीं कोई वारदात हुई?’’
‘‘मालूम पड़ने के वास्ते हर बात गजट में छपना ही जरूरी नहीं होता। वो बड़ी वारदात थी, किसी ने बहुत ऊपर हाथ मारा था, बहुत बड़ा पंगा लिया था, खुसर पुसर हो के रहती है। जितना बड़ा पंगा, उतनी ही ज्यादा खुसर पुसर। एक बार बात निकलती है तो बहुत दूर तक जाती है। नहीं?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘मैंने वालपोई काल लगाई, तेरे वास्ते मैसेज छोड़ा, तेरा कोई जवाब न मिला तो मैंने यही सोचा कि तू दूसरे काम में बिजी था ।’’
‘‘गलत सोचा ।’’
‘‘ठीक! ठीक! पण उस वारदात का सुना तो खयाल तो गया न अपने आप तेरी तरफ!’’
‘‘बाप, मेरे से बहुत बड़े-बड़े कारनामेबाज बैठेले हैं इस दुनिया में। खाली खबर नहीं तुम्हेरे को ।’’
‘‘तेरे को तो होगी!’’
‘‘काहे को?’’
‘‘भई, एक पेशे के भीड़ू आपस में वाकिफ होते हैं ।’’
‘‘मैं नहीं वाकिफ। अभी काम की बात करें तो...’’
‘‘जरूर। पहले एक जरूरी बात!’’
‘‘सुनता है ।’’
‘‘रश का टाइम है, हम केबिन में बैठे हैं, कुछ आर्डर नहीं करेंगे तो मालिक सिर पर आ खड़ा होगा। इस वास्ते कुछ तो आर्डर करने का। नहीं?’’
‘‘हाँ। ठीक है ।’’
‘‘क्या पियेगा?’’
‘‘बिल कौन भरेगा?’’
‘‘काहे को पूछता है?’’
‘‘मेरे को भरने का तो पीटर वर्ना स्कॉच। कोई भी ।’’
वो हँसा, फिर उसने वेटर को बुला कर जानीवाकर ब्लैक लेबल का आर्डर दिया।
आर्डर सर्व होने तक दोनों में खामोशी व्याप्त रही। उस दौरान जीतसिंह ने एक सिग्रेट सुलगा लिया, राजाराम की बाबत मालूम हुआ कि वो धूम्रपान नहीं करता था।
दोनों ने चियर्स बोला।
‘‘अभी सुनता है ।’’—जीतसिंह गम्भीरता से बोला।
‘‘वो क्या है कि’’—राजाराम भी वैसी ही गम्भीरता से बोला—‘‘एक बड़ी रकम मेरे निशाने पर है ।’’
‘‘कितनी?’’
‘‘पन्द्रह करोड़। बीस भी हो सकती है ।’’
‘‘किधर है? बैंक में!’’
‘‘अरे, नहीं, भई ।’’
‘‘किसी के प्राइवेट ठीये पर!’’
‘‘नहीं। जब होगी, आन रोड होगी। आन दि मूव होगी ।’’
‘‘किधर?’’
‘‘मुम्बई और गोवा के बीच में ।’’
‘‘ये रकम इधर से गोवा भेजी जानी है?’’
‘‘ले के जाई जानी है ।’’
‘‘आगे बोलो ।’’
‘‘दस दिन बाद गोवा में विधानसभा के इलैक्शन हैं। इधर की एक पार्टी पहली बार महाराष्ट्र से बाहर गोवा में कदम डाल रही है ।’’
‘‘कौन सी पार्टी?’’
‘‘मराठा मंच। जिसका प्रेसीडेंट बहरामजी कान्ट्रैक्टर है जो कि पहले स्मगलर और काला बजारिया होता था, अब सफेदपोश, गान्धी टोपीधारी नेता बन गया—हाउस में मराठा मंच पार्टी के चालीस एमएलए की ताकत वाला नेता बन गया। लोकसभा में तीन एमपी भी, जिन में से एक मधुकरराव साबले को हाल ही में उसी के घर में उसी के बड़ा बटाटा करके एक खास भीड़ू ने शूट कर दिया। एमपी साहब खल्लास, खास भीड़ू जेल में ।’’
‘‘हिस्ट्री छोड़ो न, बाप!’’
‘‘पार्टी प्रेसीडेंट बहरामजी कान्ट्रैक्टर की औकात बताने के वास्ते ये छोटा मोटा जिक्र जरूरी है। इस जिक्र का आगे लिंक अप है ।’’
‘‘फिर वान्दा नहीं ।’’
‘‘नेता जी बहुत ऊँचा उड़ता है। बोलता है इधर महाराष्ट्र में विधानसभा के अगले इलैक्शनों में उसकी पार्टी की ताकत डबल हो जायेगी, किसी दूसरी बड़ी पार्टी की—जैसे कि कांग्रेस, बीजेपी, शिवसेना वगैरह—एब्सोल्यूट मैजोरिटी नहीं आयेगी इस वास्ते हर पार्टी उसकी सपोर्ट की मोहताज होगी। इस डवैलपमेंट के तहत चीफ मिनिस्टर तक बन जाने का सपना देख रहा है एक्स समगलर और काला बाजारिया ।’’
‘‘कमाल है!’’
‘‘गोवा में उसकी पार्टी ने कुछ कर दिखाया तो पार्टी रिजनल नहीं, नेशनल कहलायेगी। इस वास्ते गोवा के आने वाले इलैक्शन में अपनी अच्छी हैसियत, अच्छी जीत दर्ज कराने पर उसका बड़ा जोर है। जो भीड़ू वहाँ के इलैक्शन का उस का इंचार्ज है, उसका नाम उत्तमराव पाटिल है। हाल ही में मुम्बई लौट कर उसने पार्टी प्रेसीडेन्ट को रिपोर्ट पेश की है कि उधर मराठा मंच की स्थिति कमजोर है क्योंकि वहाँ मुकाबला वोट का नहीं, नोट का बनता जा रहा है। वोटरों को रिझाने के लिये दूसरी पार्टियाँ वहाँ वोटरों में साड़ियाँ बाँट रही हैं, कम्बल बाँट रही हैं, सिलाई मशीन बाँट रही हैं, साइकलें बाँट रहीं हैं, मोबाइल बाँट रही हैं। इन हालात का मुकाबला करने के लिये मराठा मंच पार्टी के लिये जरूरी है कि वो यही रुख, यही लाइन अख्तियार करे वर्ना उन के एक भी कैण्डीडेट का जीत पाना मुमकिन न होगा। नतीजा ये हुआ है कि बहरामजी कान्ट्रैक्टर ने भी और र्पािटयों की तरह पैसा लड़ाने का फैसला किया है और सोमवार को पैसे की पहली खेप—कम से कम पन्द्रह करोड़ रुपया—पणजी रवाना की जा रही है ।’’
‘‘कैसे? नहीं, पहले ये बोलने का कि तुम्हेरे को इतनी बातें, इतनी खुफिया बातें, कैसे मालूम हैं?’’
‘‘भई, जाहिर है कि भेदिये के बिना तो मालूम नहीं हो सकतीं!’’
‘‘मराठा मंच पार्टी में तुम्हारा कोई भेदिया है?’’
‘‘हाँ! और वो भी बाउन्ड्री लाइन पर नहीं, अन्दरूनी दायरे में ।’’
‘‘तभी ।’’
‘‘अब ‘कैसे’ का जबाव सुनो। इधर मुम्बई में एक सिक्योरिटी एजेंसी है जो बैंकों के एटीएम भरने का काम करती है। हर बड़े बैंक के मुम्बई और आसपास सैंकड़ों की तादाद में एटीएम हैं। सिक्योरिटी एजेन्सी के पास एक बहुत ही माडर्न इम्पोर्टिड, आर्मर्ड वैन है...’’
‘‘आ-आर...आरमर्ड वैन बोले तो!’’
‘‘बख्तरबन्द गाड़ी। वाल्ट जैसी। फ्रंट में ड्राइवर और पैसेंजर चैम्बर, पीछे वाल्ट ।’’
‘‘ओह!’’
‘‘बैंक एटीएम के ठिकानों की और हर जगह भरी जाने वाली रकम की लिस्ट कुल जमा रकम के साथ सिक्योरिटी एजेन्सी को सौंप देता है और बैंक के एक जिम्मेदार अफसर को उन के साथ जोड़ देता है। यूँ वो सिक्योरिटी अपनी जिम्मेदारी पर एटीएम मशीनों में रकम भरती है और अपनी फीस चार्ज करती है ।’’
‘‘साथ में हथियारबन्द गार्ड भी होते होंगे?’’
‘‘होंगे। क्योंकि हमें उससे मतलब नहीं, क्योंकि हमारा निशाना एटीएम का रोकड़ा तो नहीं है न!’’
‘‘क्यों नहीं है? वो रकम भी तो कोई कम नहीं होगी!’’
‘‘ठीक! लेकिन मुम्बई की भीड़भरी चलती सड़कों पर उस आर्मर्ड वैन पर हाथ डालना खुदकुशी करने जैसा काम होगा ।’’
‘‘हूँ ।’’
‘‘मुम्बई और पणजी के बीच में हाइवे पर कहीं घात लगा कर ये काम किया जा सकता है ।’’
‘‘हाइवे पर वैन के साथ हथियारबन्द गार्ड नहीं होंगे?’’
‘‘सुना है नहीं होंगे। खाली ड्राइवर ही हथियारबन्द होगा और जरूरत पड़ने पर गार्ड का काम करेगा ।’’
‘‘अकेला ड्राइवर—हथियारबन्द ही सही—घात को रोक लेगा?’’
‘‘वो अकेला नहीं होगा। साथ खुद नेताजी होंगे, उनके चमचे होंगे। वो लोग एक कॉनवॉय की सूरत में—काफिले की सूरत में—रोड पर मूव करेंगे। नेता जी खुद आर्मर्ड वैन के फ्रंट में ड्राइवर के साथ। आगे पायलट का काम करती एक जीप जिसके हुड पर खासतौर से पार्टी का झण्डा लहरा रहा होगा, उसके पीछे एक कार और वैन के पीछे और चार कार। तमाम कारों पर पार्टी के बैनर, नेताजी के पोस्टर, हार जैसी झण्डियों वगरैह। मुम्बई-गोवा राजमार्ग पर कई जगह पुलिस की नाकाबन्दी होती है जहाँ कि अक्सर गाड़ियों को रोक कर उनकी तलाशी ली जाती है। नेता जी की खुद की मौजूदगी और वो सजावटी कॉनवॉय इस बात को पक्की करेगा कि न कोई उन्हें रोकेगा और न तलाशी लेने की हिम्मत करेगा ।’’
‘‘बढ़िया ।’’
‘‘इतनी बड़ी रकम को 568 किलोमीटर ढोने का और कोई सेफ तरीका नहीं ।’’
‘‘बाकी पार्टियाँ भी यही करती हैं?’’
‘‘छोटी पार्टियाँ ये नहीं तो मिलता-जुलता कुछ करती होंगी लेकिन बड़ी पार्टियों की हैसियत बड़ी होती है, उनके साधन बड़े होते हैं। वो किसी बड़े बैक से गठजोड़ करती हैं—एक जगह बैंक को नकद रकम सौंपती हैं और दूसरी जगह नगद रकम हासिल कर लेती हैं। छोटी पार्टियों की ये खिदमत करने को अमूमन कोई बैंक तैयार नहीं होता। फिर बात लीक हो जाने का खतरा होता है। ऐसी किसी बड़ी रकम की मूवमेंट की बात एक्सपोज होने पर लेने के देने पड़ सकते हैं ।’’
‘‘क्या हो सकता है?’’
‘‘इलैक्शन कमिश्नर ऐसी पार्टी के उस रिजन के कैण्डीडेट्स की कैंडीडेचर खारिज कर सकता है, पुलिस रकम को सीज कर सकती है, इन्कम टैक्स का महकमा उसके सोर्स के बारे में सवाल कर सकता है, और भी बहुत कुछ हो सकता है ।’’
‘‘पण ये सब बहरामजी कान्ट्रैक्टर के साथ नहीं हो सकता?’’
‘‘वो समझता है कि नहीं हो सकता। इसी वास्ते तो आर्मर्ड कार में खुद मौजूद होगा! इसी वास्ते तो कॉनवॉय के साथ चलेगा!’’
‘‘घात के लिये कोई जगह छांटी हुई है?’’
‘‘हाँ। मुम्बई-गोवा राजमार्ग पर मडगाँव से पहले कुंकॉली नाम की एक छोटी सी जगह है। उससे आगे निकलने के बाद सड़क कदरन संकरी हो जाती है क्योंकि दो पहाड़ियों के बीच में से गुजरती है। नेताजी के काफिले को वहाँ अचानक जाम मिलेगा और हालात दंगे जैसे बने होंगे। वजह ये बताई जायेगी कि किसी ट्रक ने एक बच्ची को कुचल दिया था और गाँव वालों ने भड़क कर ट्रक को आग लगा दी थी और बाकी आते-जाते वाहनों पर भी पत्थर बरसा रहे थे ।’’
‘‘ये जाम तुम खड़ा करेगा?’’
‘‘जाम का ड्रामा हम खड़ा करेंगे। ताकि पुलिस आकर नेता जी की सुरक्षा की दुहाई दे और उन को—खाली उनको, यानी कि आर्मर्ड वैन को—डाइवर्शन के लिये तैयार करे ।’’
‘‘पुलिस कौन?’’
‘‘हम ।’’
‘‘बढ़िया! नेता जी मान जायेगा?’’
‘‘हालात का ऐसा हव्वा खड़ा किया जायेगा कि मेरे को यकीन है कि मान जायेगा ।’’
‘‘फिर?’’
‘‘करीब ही भैरवनाथ मन्दिर के खण्डहर हैं जो कि चारों तरफ से पेड़ों, झाड़ झंखाड़ों से यूँ घिरे हुए हैं कि कोई इलाके से अंजान आदमी करीब की कच्ची सड़क पर से गुजर रहा हो तो उसे वो खण्डहर दिखाई तक नहीं देते। वहाँ खण्डहरों में कहीं वो आर्मर्ड वैन खड़ी हो तो क्या किसी को दिखाई देगी?’’
‘‘सब इन्तजाम पहले से ही फिट हैं, बाप!’’
‘‘सिवाय वाल्टबस्टर के। अब वो इन्तजाम भी फिट है। नहीं?’’
जीतसिंह ने जवाब न दिया, उसने गिलास में से विस्की चुसकी और सिग्रेट का आखिरी कश लगा कर उसे ऐशट्रे में झोंका।
‘‘उन खण्डहरों में तुम पूरे इत्मीनान से बिना किसी विघ्न बाधा के वाल्ट पर अपना हुनर आजमा सकते हो ।’’
‘‘उस दौरान ड्राइवर और नेता जी क्या कर रहे होंगे? वाल्ट खुलने का इन्तजार कर रहे होंगे ताकि मेरी कामयाबी पर ताली बजा सके?’’
‘‘मजाक मत करो ।’’—पहली बार उसके चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव आये—‘‘ये गम्भीर मसला है ।’’
‘‘सारी बोलता है, बाप ।’’
‘‘इस प्रोजेक्ट पर मेरा बहुत कुछ दाँव पर है। वो माल के लिये मेरे को पहले अपना रोकड़ा खर्च करना पड़ना है। वो भी कम नहीं, काफी सारा ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘फूँकने को ट्रक माँगता है। जाम लगाने को, गलाटा करने को किराये के भीड़ू माँगता है। पुलिस की जीप माँगता है। नकली पुलिस वाले माँगता है। और भी बहुत इन्तजाम माँगता है ।’’
‘‘और इन्तजाम क्या?’’
‘‘सब से बड़ा इन्तजाम तो ये कि जब ड्रामा हो रहा हो, तब असली पुलिस न आ जाये ।’’
‘‘ठीक! ड्रामे में शामिल भीड़ू लोगों को क्या बोलोगे?’’
‘‘फिल्म का शूटिंग चलता है। इस वास्ते शूटिंग के सामान का, कैमरा क्रेन वगैरह का, इन्तजाम करना पड़ेगा, उस सामान को हैंडल करने वालों का इन्तजाम करना पड़ेगा ।’’
‘‘बड़ा प्रोग्राम है! सब हैंडल कर लेगा, बाप?’’
‘‘हाँ। जो मैंने करना है—या आर्गेनाइज करना है—वो ऐन फिट होगा, तुम उसकी फिक्र न करो ।’’
‘‘सब भाड़े के भीड़ू! अपना कोई नहीं?’’
‘‘मेरे अलावा तीन भीड़ू और होंगे जो कि इस हाइस्ट में पार्टनर होंगे, तुम पार्टनर बनना कबूल करोगे तो दो भीड़ू और होंगे। क्या कहते हो?’’
‘‘बाद में बोलूँगा। अभी ड्राइवर और नेता जी का बोलो ।’’
‘‘जब आर्मर्ड वैन मन्दिर के खण्डहरों में छुपी खड़ी होगी तो वो वहाँ नहीं होंगे ।’’
‘‘कहाँ होंगे?’’
‘‘उसकी तुम फिक्र न करो ।’’
‘‘टपकाने का इरादा तो नहीं है?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘पक्की बात?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘तुम बोलता है तो...’’
‘‘मैं बोलता हूँ। वो कहीं भी हों, तुम्हारे काम में तुम्हें डिस्टर्ब करने के लिये तुम्हारे करीब नहीं होंगे ।’’
‘‘हूँ ।’’
‘‘अब बोलो, क्या कहते हो? बल्कि पहले बोलो, कर लोगे ये काम?’’
‘‘आज तक तो किसी ने पूछा नहीं मेरे से ये सवाल!’’
‘‘यानी कर लोगे?’’
‘‘अरे, बाप तुम्हेरे को मालूम। वर्ना इधर बैठे होते! वालपोई फोन लगाते होते!’’
‘‘सिर्फ वाल्ट खोलोगे या पूरा साथ दोगे?’’
‘‘वाल्ट खोलूंगा। अभी रोकड़ा बोलो!’’
‘‘तुम बोलो!’’
‘‘पन्द्रह ।’’
‘‘मंजूर ।’’
‘‘करोड़ ।’’
‘‘माथा फिरेला है!’’
‘‘मेरे को बोला न बोलने को! मैं बोला ।’’
‘‘सब तेरे को माँगता है तो मैं साला वालंटियर है! तालातोड़ों के वास्ते सोशल सर्विस करता है!’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘तो?’’
‘‘जो रोकड़ा बरामद हो, उसका दस फीसदी। पन्द्रह करोड़ बरामद हो तो डेढ़ मेरे को। बीस करोड़ बरामद हो तो दो मेरे को ।’’
‘‘ज्यास्ती है। बहुत ज्यास्ती है ।’’
‘‘बाप, इसी वास्ते बोला तुम बोलो ।’’
‘‘तुम्हारा सेफ काम है। तमाम खतरा हमने उठाना है। कहीं फच्चर पड़ा तो हमने भुगतना है। कामयाब न हो सके तो मेरा रोकड़ा डूबेगा। पकड़े गये तो जेल की हवा खानी पड़ेगी। तुम्हारा कोई रिस्क नहीं। तुमने सेफ, नीट, स्ट्रेट काम करना है...
‘‘मालूम! मालूम! अभी कुछ बोलने का या नहीं बोलने का!’’
‘‘दस। दस पेटी ।’’
‘‘तुम ओके भीड़ू है, मेरे को पसन्द आया, इस वास्ते एक खोखा ।’’
‘‘ज्यास्ती है बहुत...’’
‘‘मैं तरकीब बताता है न सस्ते में काम होने की!’’
‘‘क्या?’’
‘‘बारूद लगाने का और उड़ा देने का। कुछ नोट जल जायेंगे, जो बाकी बचेंगे वो भी कम नहीं होंगे ।’’
‘‘उस वैन का वाल्ट वाला हिस्सा बमप्रूफ है, बुलेटप्रूफ है। वो वाल्ट चाबी से खोलने से खुल सकता है वर्ना नहीं खुल सकता ।’’
‘‘बोले तो प्राब्लम है...तुम्हारी ।’’
‘‘ ‘डबलबुल’ का वाल्ट तूने दस हजार में खोला था ।’’
‘‘ये भी जानता है, बाप!’’
‘‘गलत बोला मैं?’’
‘‘नहीं। पण माँग दस लाख की थी। धोखा हुआ मेरे साथ ।’’
‘‘तो दस लाख फाइनल कर न!’’
‘‘बाप, ये चिखचिख आधी रात तक खत्म नहीं होगी। तुम भाजी नहीं खरीद रयेला है जो एक जगह भाव से नहीं मिलेगी तो दूसरी जगह चला जायेगा। तुम्हेरे को मालूम ये काम खाली मैं कर सकता है फिर भी भाव ताव करता है। ये इस्पेशल कर के काम, मैं इस्पेशल कर के भीड़ू तो फिर फीस इस्पेशल करके काहे वास्ते नहीं?’’
‘‘पण...’’
‘‘नो पण। अभी मैं फाइनल बात बोलता है। नामंजूर हो तो बिल मंगवाना। मैं अभी जरूरतमन्द है, इस वास्ते बोलता है, न होता तो कभी न बोलता। हाफ एडवांस दो तो पचास ।’’
‘‘एडवांस! पच्चीस लाख एडवांस!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘न खोल सके तो?’’
‘‘तो तमाम रोकड़ा दूध से धो के वापिस करेगा ।’’
‘‘तब तक ठिकाने लगा दिया तो?’’
‘‘तो भी ।’’
‘‘तो कैसे?’’
‘‘सुपारी उठायेगा। किसी का गला काट के रोकड़ा खड़ा करेगा तुम्हेरे को लौटाने के वास्ते ।’’
‘‘जब जरूरतमन्द है, ऐसा कर सकता है, तो अभी क्यों नहीं करता?’’
‘‘अभी वेट करता है न! जब कुछ नहीं बनेगा, कहीं पेश नहीं चलेगी तो यहीच करेगा न!’’
‘‘जैसी खतरनाक बातें करता है, वैसा शक्ल से तो नहीं लगता!’’
‘‘है भी नहीं मैं। पण मजबूरी...सब करा देती है। मैं साला पक्की किया था कि कुछ टेम कोई पंगेवाला काम नहीं करने का पण बैठेला है न इधर!’’
‘‘अगर ये डील सैट न हुआ तो क्या करेगा? कैसे जरूरत पूरी करेगा?’’
‘‘है एक आसान तरीका। पण उस पर एक्ट नहीं करने का मेरे को ।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि आदमियत का कोई जज्बा अभी मेरे में बाकी है ।’’
‘‘क्या है आसान तरीका?’’
‘‘बाप, सुनेगा तो भाव खा जायेगा। भड़क जायेगा ।’’
‘‘नहीं। तू बता मेरे को ।’’
‘‘जा के नेता जी को—बहरामजी कान्ट्रैक्टर को—खबरदार करता है न फीस लेकर कि सोमवार को उसके गोवा जाते काफिले को डाकू पड़ने वाले हैं!’’
राजाराज के चेहरे ने कई रंग बदले।
‘‘तू ऐसा करेगा?’’—दान्त पीसता सा वो बोला।
‘‘नहीं करेगा। करना होता तो बोलता तुम्हेरे को!’’
उसके चेहरे पर नर्मी के भाव लौटे।
‘‘अच्छा लड़का है तू ।’’—फिर बोला।
‘‘अच्छाई कही नीलाम होती हो तो बोलो मेरे को। मैं जाये उधर। पच्चीस पेटी खड़ा करे ।’’
‘‘क्यों जरूरत है फौरन तेरे को पच्चीस पेटी की?’’
‘‘लम्बी कहानी है। तुम्हेरे को सुनना भारी पड़ेगा, मेरे को कहना भारी पड़ेगा ।’’—जीतसिंह ने अपना गिलास खाली किया—‘‘अभी नक्की करे मैं गुडनाइट बोल के?’’
‘‘अभी रुक। हमारी बात बने न बने, एक ड्रिंक और ले मेरे कहने पर ।’’—वो एक क्षण ठिठका और फिर बोला—‘‘मेरे हुक्म पर ।’’
‘हुक्म’ वाली बात उसने ऐसी आत्मीयता से कही कि जीतसिंह को जरा बुरी न लगी।
‘‘ठीक है ।’’—वो बोला।
राजाराम ने नये ड्रिंक्स मंगवाये और साथ ही वेटर को बिल भी अदा कर दिया।
‘‘फिर से चियर्स बोल ।’’—वो बोला।
जीतसिंह ने जोश से उसके गिलास से गिलास टकराया और चियर्स बोला।
‘‘ये बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है ।’’—वो कदरन धीमे, गम्भीर लेकिन सन्तुलित स्वर में बोला—‘‘बहुत बड़े खर्चे वाला प्रोजेक्ट है। मेरा सब कुछ दाँव पर है,फेल हो गया तो...अभी क्या बोलेगा! सारे प्रोजेक्ट को हैण्डल करने का खर्चा इतना है कि अभी ठीक से तो मेरी समझ में भी नहीं आया। परसों तक सारी पिक्चर क्लियर होगी, तभी तेरे को मालूम पड़ेगा कि मेरे पल्ले क्या बचा। कहने का मतलब ये है कि परसों ही मैं जवाब दे पाऊँगा कि मैं तेरी एडवांस वाली माँग पूरी कर पाऊँगा या नहीं। मैं गणपति की कसम खा के बोलता हूँ कि झूठ नहीं बोलूंगा। अगर एडवांस की गुंजायश हुई तो मैं जरूर दूँगा। मैं तेरे से उम्र में बहुत बड़ा हूँ इसलिये अपनी उम्र का सदका दे कर तेरे से उम्मीद करता हूँ कि मैं एडवांस न दे पाऊँ तो साथ देने का अपना इरादा बदल न देना। कोई पच्चीस पेटी साथ ले के तो फिरता नहीं! मैं हां बोले तो भी कल शाम से पहले तो तेरे वास्ते इन्तजाम कर नहीं पाऊँगा! कोई फच्चर न पड़ा, तूने वाल्ट खोल लिया तो सोमवार शाम तक तो तेरी फुल फीस तेरे काबू में होगी। तो बोले तो खाली दो दिन की ही तो बात है! बद्री, तू परसों शाम तक एडवांस की बाबत मेरे जवाब का इन्तजार कर, जवाब तेरे मन माफिक हो तो समझना तेरी पचास पेटी वाली बात मेरे को कबूल हुई, मन माफिक न हो, मैं एडवांस न दे पाऊँ तो तेरी फीस एक खोखा मेरे का मंजूर। अभी हाँ बोल मेरे पर अहसान कर के वर्ना मैं ये प्रोजेक्ट ही ड्रॉप करता हूँ—जो खर्चा मैं कर चुका, जैसे भेदिये की फीस भरी, नकली कैमरा क्रियु को, स्टंट्समैन को एडवांस देकर सैट किया, और भी कई खर्चे किये, उनका गम खाता हूँ—क्यों कि मेरे को पक्की कि तेरे अलावा वो वाल्ट कोई नहीं खोल सकता। अगर तू मेरे साथ नहीं तो ये काम नहीं हो सकता। अब बोल, क्या बोलता है?’’
जीतसिंह सोचने लगा।
‘‘मेरे को अन्दर से आवाज थी कि मैं तेरा भरोसा कर सकता था, इसी वास्ते मैंने तेरे से कुछ न छुपाया; हर बात खुल कर, खोल कर की वर्ना अपनी कहानी मैं बहरामजी कान्ट्रैक्टर का नाम लिये बिना भी कर सकता था, मुम्बई गोवा हाइवे का जिक्र किये बिना भी कर सकता था, जो रकम हाथ आने वाली थी, उस का जिक्र किये बिना भी कर सकता था। तूने बोला तू जाके नेताजी को सब खबर करता था और ईनाम बटोरता था तो तेरा क्या खयाल है, इतनी सी बात मेरे मगज में नहीं आयी थी! बराबर आयी थी। फिर भी मैंने तेरे से कोई छुपाव जरूरी नहीं समझा था क्योंकि मेरे को विश्वास था कि हासिल जानकारी का तू कोई बेजा इस्तेमाल नहीं करने वाला था। अगर मेरे विश्वास में लोचा तो अभी बोल ऐसा!’’
जीतसिंह ने इंकार में सिर हिलाया।
‘‘तो फिर क्या जवाब है तेरा?’’
‘‘मैं एडवांस की बाबत तुम्हेरे फोन का इन्तजार करूँगा, तुम एडवांस को नक्की बोलेगा तो भी तुम्हेरे साथ काम करूँगा ।’’
‘‘थैंक्यू। थैंक्यू, बद्री ।’’
राजाराम ने उठ कर बड़ी गर्मजोशी से जीतसिंह से हाथ मिलाया और उसे गले लगाने में कसर न छोड़ी।
‘‘अभी तू निकल ले ।’’—फिर बोला—‘‘मेरे को घुमरे को फोन करके इधर बुलाने का ।’’
‘‘घुमरे कौन?’’
‘‘अनिल घुमरे। मेरा बॉडीगार्ड ।’’
‘‘कब से साथ है?’’
‘‘क्यों पूछता है?’’
‘‘कोई खास वजह नहीं। बेशक न जवाब दो। अभी आगे तुम्हारे साथ वास्ता पड़ने का तो इस के साथ भी पड़ने का। इस वास्ते पूछा ।’’
‘‘ओह! आज से ही है मेरे साथ ।’’
‘‘आज से ही फीलिंग आया कि साथ बॉडीगार्ड होना माँगता था?’’
‘‘अरे, नहीं रे! पहले भी था पण मेरे को पहले वाले से शिकायत रहती थी। झोल था उसकी चौकसी और मुस्तैदी में। घुमरे मिल गया तो उसको नक्की किया ।’’
‘‘घुमरे पहले किसके पास था?’’
‘‘मेरे को नहीं मालूम। न उसने बताया, न मैंने पूछा ।’’
‘‘ओह! ठीक है! गुडनाइट बोलता है ।’’
राजाराम ने सहमति में सिर हिलाया।
जीतसिंह ने अपना गिलास खाली किया और केबिन से निकल गया।
‘‘साला इमोशनल ईडियट!’’—पीछे राजाराम कुटिल भाव से होंठों में बुदबुदाया—‘‘मामूली सैड स्टोरी से फ्लैट हो गया। एडवांस माँगता है साला ढक्कन। मेरे को बाद में भी कुछ नहीं देने का ।’’
जीतसिंह बार पर पहँुचा।
और फिर बारमैन किरपेकर के रूबरू हुआ।
‘‘क्या देखा?’’—जीतसिंह ने बार काउन्टर पर से उसकी ओर झुक कर दबे स्वर में पूछा।
‘‘मैं पहचाना उस भीड़ू को बरोबर ।’’—बारमैन भी वैसे ही दबे स्वर में बोला।
‘‘बढ़िया। कौन है?’’
‘‘अनिल घुमरे। टपोरी है। कैसा भी काम पकड़ने को तैयार रहता है ।’’
‘‘तू कैसे जानता है?’’
‘‘इधर आता जाता रहता है। जब खाली होता है तो मेरे को ही बोलता है आजू बाजू फैलाने के वास्ते कि खाली है ।’’
‘‘फिर तो दोस्त हुआ तेरा!’’
‘‘हाँ, हुआ तो सही कम ज्यादा। दोस्त नहीं तो वाकिफ तो बरोबर हुआ ।’’
‘‘किसी एक काम में नहीं टिकता?’’
‘‘टिकने वाला काम इसके हाथ लगता ही नहीं। कोई देता ही नहीं। बोले तो कैजुअल वर्कर ।’’
‘‘भाड़े का टट्टू!’’
‘‘वही ।’’
‘‘जिस भीड़ू के साथ आज है, उसके साथ बस आज से ही है। कल तक किसके साथ था, मालूम?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘मालूम कर सकता है?’’
‘‘उसी से पूछना पड़ेगा ।’’
‘‘वो बतायेगा?’’
‘‘शायद बताये ।’’
‘‘कोशिश करके देखना। कोई और तरीका हो तो उसके बारे में भी सोचना ।’’
‘‘ठीक है ।’’
‘‘पाया कहाँ जाता है?’’
‘‘जब भीड़ू का ही नहीं पता तो पते का क्या पता होगा!’’
‘‘अरे, मैं अनिल घुमरे की बात करता है। ये कहाँ पाया जाता है? कहाँ रहता है? घर मालूम उसका?’’
‘‘मालूम तो है बाई चांस!’’
‘‘तो बोल न!’’
‘‘चूना भट्टी मालूम?’’
‘‘मालूम ।’’
‘‘उधर स्वदेशी मिल रोड पर मंगलदास लॉज ।’’
‘‘लॉज!’’
‘‘चाल ही है, जरा अच्छी हालत में है, इस वास्ते लॉज ।’’
‘‘वो वहाँ रहता है?’’
‘‘हाँ। दूसरा माला। सीढ़ियों से ऐन परले कोने का कमरा ।’’
‘‘तेरे को इतना सब कुछ कैसे मालूम है?’’
‘‘एक टेम मैं उधरीच रहता था उसके बाजू के कमरे में ।’’
‘‘तभी। तभी बोला दोस्त नहीं तो वाकिफ ।’’
वो खामोश रहा।
‘‘दूसरे भीड़ू का क्या बोलता है?’’
‘‘क्या बोलू?’’
‘‘सूरत देखी?’’
‘‘अभी देखी। तुम्हेरी पीठ है उधर पण मैं देख रयेला है उठ के जा रहा है। घुमरे साथ है ।’’
‘‘पहचानता है?’’
‘‘नहीं ।’’
‘‘मुलाकात के लिये ये जगह उसने चुनी थी। यानी पहले से इस जगह से वाकिफ था ।’’
‘‘कभी आया होगा। मेरे नोटिस में नहीं आया होगा। या मेरे ऑफ के टेम आया होगा ।’’
‘‘हूँ। मंगलदास लॉज, स्वदेशी मिल रोड, चूना भट्टी, धारावी ।’’
‘‘बरोबर ।’’
‘‘थैंक्यू बोलता है ।’’
वो चूना भट्टी पहँुचा।
वहाँ स्वदेशी मिल रोड और आगे मंगलदास लॉज तलाश करने में उसे कोई दिक्कत न हुई।
वहाँ से बराबर तसदीक हुई कि जो जानकारी उसे पीछे बार से हासिल हुई थी, वो दुरुस्त थी।
लॉज से बाहर आकर उसने गाइलो का मोबाइल बजाया।
‘‘कहाँ पर है?’’—जवाब मिला तो उसने पूछा।
‘‘लोअर परेल। चेतना रेस्टोरेंट के सामने ।’’
‘‘उसके पीछे है?’’
‘‘बरोबर ।’’
‘‘मेरे को फिकर थी तू पैरामाउन्ट बार पहँुच पायेगा या नहीं!’’
‘‘पहँुचा न बरोबर!’’
‘‘वो अन्दर है?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘बॉडीगार्ड भी?’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘कितना टेम हुआ?’’
‘‘अभी पाँच मिनट पहले पहँुचा ।’’
‘‘पहले क्या करता था?’’
‘‘वरली में किसी के घर में गया। अभी भीतर रेस्टोरेंट में किसी भीड़ू से मीटिंग करता है ।’’
‘‘जब रेस्टोरेंट में है, पाँच मिनट पहले ही पहँुचा, मीटिंग करता है तो कुछ टेम रुकेगा ।’’
‘‘मैं बोले तो काफी टेम रुकेगा ।’’
‘‘मीटिंग में बॉडीगार्ड साथ बैठेला है?’’
‘‘नहीं, नहीं। वो परे दूसरा टेबल पर है ।’’
‘‘बढ़िया। अभी जो मैं बोलता है, वो गौर से सुन ।’’
‘‘सुनता है ।’’
‘‘परदेसी को किसी वाफिककार टैक्सी ड्राइवर की टैक्सी बुला के दे। उसको बोल आगे उसने अकेले आपरेट करना है और बॉडीगार्ड के एम्पलायर पर—नाम राजाराम लोखण्डे है—फोकस रखना है। बॉडीगार्ड जब भी ड्यूटी खल्लास करके उससे अलग हो जाये तो उसके पीछे नहीं लगना पण मेरे को इमीडियेट करके फोन लगाना है ।’’
‘‘क्या बोलता है! बॉडीगार्ड के पीछे नहीं लगने का! तू तो बोलता था कि असल भीड़ू वही है...’’
‘‘बरोबर ऐसीच है। पण जिस काम के वास्ते उसके पीछे लगना था, वो बाई चानस पहले ही हो गयेला है ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘अभी मेरे को उसका नाम पता सब मालूम है ।’’
‘‘क्या बात करता है! मालूम कर भी लिया!’’
‘‘चानस लगा न!’’
‘‘पण कैसे...’’
‘‘बोलेगा। बोलेगा। मिलेगा तो बोलेगा। अभी तेरे को मेरे को लोअर परेल के लोकल के स्टेशन पर मिलने का। मेरे को तेरा टैक्सी माँगता है ।’’
‘‘इस्पेशल करके?’’
‘‘उसमें इस्पेशल कर के कुछ सामान मौजूद है, उसके वास्ते टैक्सी माँगता है ।’’
‘‘क्या सामान?’’
‘‘बोलेगा ।’’
‘‘तू है किधर?’’
‘‘चूना भट्टी ।’’
‘‘आता है ।’’
गाइलो की टैक्सी के ग्लव कम्पार्टमेंट में मेकअप का वो सामान था जो जीतसिंह ने पिछली रात सरदार का बहुरूप धारण करने के लिये इस्तेमाल किया था।
दाढ़ी, मूँछ, फिफ्टी, पगड़ी।
गनीमत थी कि गाइलो ने वो सामान अब गैरजरूरी जान के फेंक नहीं दिया हुआ था।
क्राफोर्ड मार्केट से उसने अपनी फैंसी, कीमती, दुर्लभ—जर्मनी की बनी—टूल किट उठाई।
‘‘क्या चक्कर है?’’—गाइलो तनिक चिन्तित भाव से बोला।
जीतसिंह ने बताया।
गाइलो के नेत्र फट पड़े।
‘‘तू...तू’’—वो बोला—‘‘मरेगा ।’’
‘‘मरेगा या जियेगा, जो साला हरामी हम को कल रात टोपी पहनाया उन से बदला लेने के लिये जो कर रहा है, वो जरूर करेगा ।’’
‘‘ऐसे रोकड़ा तो वापिस हाथ नहीं आने वाला!’’
‘‘न आये। साला चैन तो पड़ेगा, तसल्ली तो मिलेगा कि ठोक के बदला लिया! साला कुत्ते का माफिक टाँगों में दुम दबा के छुप के नहीं बैठ गया ।’’
‘‘वो तो बरोबर बोला तू पण महबूब फिरंगी का मामला है, साला बड़ा बाप का मामला है, कहीं उलटी न पड़ जाये!’’
‘‘देखेंगे। पड़ जायेगी तो भुगतेंगे ।’’
‘‘ठीक!’’
आगे चूना भट्टी तक का सफर खामोशी से कटा।
मंगलदास लॉज में अनिल घुमरे का ताला जीतसिंह ने चुटकियों में खोल लिया। दोनों भीतर दाखिल हुए। गाइलो ने पीछे दरवाजा बन्द किया, जीतसिंह ने दीवार पर लगा स्विच बोर्ड ढूँढ कर बिजली का एक स्विच आन किया।
वो एक छोटा सा कमरा निकला जिसमें एक सिंगल बॉक्स बैड, एक लकड़ी की झोलझाल अलमारी, एक मेज, एक स्टूल और दो कुर्सियों के अलावा कुछ नहीं था। कमरे के पिछवाड़े में एक बिना दरवाजे की मुश्किल से पाँच गुणा चार फुट की रसोई थी और उससे भी छोटा बाथरूम था।
‘‘ये टूल किट’’—जीतसिंह दबे स्वर में बोला—‘‘और ये सरदार के मेकअप के सामान वाला पोलीथीन का बैग हमने यहाँऐसी जगह छुपाना है जो भरपूर तलाशी के नतीजे के तौर पर ही निगाह में आये। ऐसा न हो कि उस भीड़ू के घर लौटने पर उसकी उसी जगह पर निगाह पड़े ।’’
‘‘फिर अलमारी और बॉक्स बैड का बॉक्स तो आउट है ।’’—गाइलो बोला।
‘‘और सोच!’’
‘‘किचन में कहीं?’’
‘‘कहाँ?’’
गाइलो ने किचन का मुआयना किया और फिर स्वयमेव ही इंकार में सिर हिलाने लगा।
बाथरूम में टायलेट की टंकी वो थी जो सिर से ऊँची, दीवार पर टांगी जाती थी और जंजीर खींचने से चलती थी।
जीतसिंह ने जंजीर खींची।
कोई नतीजा सामने न आया।
वो बाहर से स्टूल उठा कर लाया और उस पर चढ़ कर उस टंकी का लोहे का ढक्कन उठा कर भीतर झाँका।
‘‘खराब है ।’’— फिर बोला—‘‘पता नहीं कब से खराब है। भीतर से बिल्कुल खुश्क है। मग्गा-बाल्टी से ही काम चलता है इधर। ये जगह है हमारे काम की ।’’
‘‘कोई टंकी ठीक करने आ गया तो?’’—गाइलो ने शंका व्यक्त की।
‘‘ये टेम! ग्यारह बजे! वो भीड़ू आधी रात के बाद कभी इधर पहँुचेगा तो किसी को टंकी ठीक करने के वास्ते बुलायेगा—ऐसी टंकी ठीक करने के वास्ते बुलायेगा जो कब से खराब है और पता नहीं ठीक हो भी सकती है या नहीं!’’
‘‘बोले तो मैं साला अक्खा ईडियट!’’
‘‘तो ये जगह पास?’’
‘‘हाँ। पण जीते, तेरी कीमती टूल किट...कितने की होगी?’’
‘‘पचास हजार रुपये की ।’’
‘‘हाथ से निकल जायेंगा ।’’
‘‘वान्दा नहीं मेरे को। कुछ पाने के वास्ते कुछ खोना भी पड़ता है। मेरे को हर हाल में इन दोनों को फुल फिट करने का जिन्होंने हमारी मेहनत पर पानीफेरा, हमारी किरकिरी की, हमारी इज्जत उतारी ।’’
‘‘एक को तो करेगा—कर रहा है—दूसरे को कैसे करेगा?’’
‘‘एक को हम करेंगे। दूसरे को ये भीड़ू करेगा...करने की वजह बनेगा। ये बातें हम बाद में करेंगे। अभी काम कर के निकल लेने का ।’’
जीतसिंह ने दोनो चीजें सम्भाल कर टंकी में रखीं, उस पर उसका ढक्कन बदस्तूर लगाया और स्टूल को वापिस उसकी जगह पर पहँुचाया। फिर बिजली का स्विच आफ कर के वो बाहर निकले।
‘‘अभी ताला वापिस बन्द करने का ।’’—जीतसिंह दरवाजा बन्द करता बोला।
‘‘कैसे करेगा? तेरी टूल किट तो अन्दर बन्द हो गयी!’’
‘‘तो? इसे खोला मैंने टूल किट के औजारों की मदद से था?’’
‘‘अब्बे, हाँ! टूल किट को तो तूने खोला ही नहीं था!’’
जीतसिंह ने जेब से वही मुड़ा तुड़ा तार का टुकड़ा निकाला जिसकी मदद से उसने ताला खोला था और ताले को वापिस बन्द करने में उतना भी टाइम न लगाया जितना कि खोलने में लगाया था। फिर चुपचाप वो वहाँ से निकले और वापिस सड़क पर और आगे गाइलो की टैक्सी में पहँुचे।
जीतसिंह ने मोबाइल निकाल कर मंगेश गाबले का नम्बर बजाया।
काफी देर घण्टी बजने के बाद जवाब मिला।
‘‘क्या है?’’—वो झुंझलाई आवाज में बोला—‘‘कौन बोलता है?’’
‘‘जीतसिंह बोलता है ।’’
‘‘कौन जीतसिंह?’’
‘‘सुबह भायखला में बिग बॉस के हुक्म पर जिस से मोबाइल नम्बर एक्सचेंज किया, वो जीतसिंह ।’’
‘‘ये कोई टेम है बात करने का!’’
‘‘मेरे को कोई टाइम टेबल नहीं मिला था कि कब बात करने का, कब बात नहीं करने का ।’’
‘‘क्या माँगता है?’’
‘‘मै नहीं माँगता, बिग बॉस माँगता है ।’’
‘‘अरे, साफ बात काहे नहीं करता?’’
‘‘करने कहाँ दे रयेला है, बाप! अभी तो नुक्स निकालता है मेरे फोन करने में भी! तुम्हेरे को काल रिसीव करने में प्राब्लम तो मैं कट करता है ।’’
‘‘खबरदार!’’
‘‘है न बरोबर!’’
‘‘तू अपने जैसे किसी दूसरे बड़े कारीगर का पता निकाला?’’
‘‘उससे बड़ा काम किया ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘उन दो भीड़ूओं में से एक का पता निकाला जिन्होंने सब गलाटा किया ।’’
‘‘बोले तो!’’
‘‘जिन्होंने वाल्ट के सिस्टम को हिट किया, खास लॉकर खोल लिया, बिग बॉस का माल नक्की किया, उसका पता निकाला ।’’
‘‘क्या!’’
‘‘उस बड़े कारीगर भीड़ू का पता निकाला जिसने वाल्ट खोला ।’’
‘‘अरे, बंडल तो नहीं मार रयेला?’’
‘‘कैसे करेंगा, बाप! मेरे को क्या खुदकुशी करने का!’’
‘‘कौन है वो? किधर पाया जाता है?’’
‘‘बिग बॉस को बोलेगा न!’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘बाप, टॉप का काम किया, कोई ईनाम भी तो मिलेंगा कि नहीं मिलेंगा! वो बड़ा बाप ही तो देंगा!’’
‘‘क्या ईनाम?’’
‘‘जो पता निकालने वाले की अक्खी दुनिया में फीस होता है ।’’
‘‘फाइन्डर्स फी!’’
‘‘यही बोलते होंगे ।’’
‘‘साला हरामी! दस पर्सेंट माँगता है तेरे को!’’
‘‘बाप, रिवाज हैं न! बड़ा बाप खुशी से देंगा। मैं बात करता है न! देखना...’’
‘‘ये टेम बड़ा बाप को डिस्टर्ब नहीं किया जा सकता ।’’
‘‘तो?’’
‘‘मेरे को बोल सब। मैं आगे बात करेगा जब मौका लगेगा ।’’
‘‘ठीक है, बोलता है। बाप, तुम्हेरा माल लुटा, तुम्हेरे को मालूम माल क्या, उसकी वैल्यू क्या! अगर मेरी वजह से माल वापिस काबू में आता है तो बिग बॉस को क्या एतराज होगा दस पर्सेंट के बराबर की शाबाशी मेरे को सरकाने में?’’
‘‘तेरे को मालूम है माल किधर है?’’
‘‘नहीं। पण उस भीड़ू की खबर है जिसको मालूम है माल किधर है। जिस भीड़ू की मेरे को खबर है, वो एक्सपर्ट वाल्टबस्टर है, उसका काम वाल्ट को बस्ट करना था जो कि वो किया ऐन फिट कर के। इस काम का उसको क्या रोकड़ा मिला, मेरे को नहीं मालूम। ये दूसरा भीड़ू बोलेगा जो ये काम करवाया और जिसके पास वाल्ट खोल के नक्की किया ब्रीफकेस है ।’’
‘‘पण दूसरे भीड़ू की तो तेरे को खबर नहीं!’’
‘‘पहले की है न ऐन पक्की करके! उसको थामोगे तो वो खुद गा गा के बोलेगा कि दूसरा भीड़ू कौन!’’
‘‘हूँ। नाम बोल। पता बोल ।’’
‘‘पण मेरा ईनाम!’’
‘‘बड़ा बाप देगा ।’’
‘‘कब?’’
‘‘कल सुबह नौ बजे भायखला में उधरीच पहँुचने का जिधर मार्निंग में अहसान और ओमराजे तेरे को लाये थे। तब बड़ा बाप भी उधरीच होयेंगा। लेना इनाम। अभी बोल जो पूछा!’’
‘‘नाम अनिल घुमरे। पता मंगलदास लॉज, स्वदेशी मिल रोड, चूना भट्टी, धारावी ।’’
‘‘घुमरे! बोले तो मराठा!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘पण वो क्लर्क मुरली चेराट तो बोला कोई सरदार!’’
‘‘बाप, सुबह जब मेरे को सरदार बनाया तो मैं लगता था न सरदार बराबर!’’
‘‘हाँ ।’’
‘‘कोई उसको सरदार बनाया होगा या वो खुद सरदार बना होगा तो क्या नहीं लगता होगा!’’
‘‘ठीक ।’’
‘‘बोले तो कल मुरली चेराट को भी उधर बुला के रखना ताकि...’’
‘‘काबू में रह। इतनी अक्ल है मेरे में ।’’
‘‘और ज्यास्ती होयेंगा, बाप। ऐसा रिस्पांसिबल करके भीड़ू अक्लमन्द नहीं होयेंगा तो कैसे उसको बिग बॉस महबूब फिरंगी के अन्डर में चलने का चानस मिलेंगा! अक्ल वाला तो तुम बरोबर फिर भी मेरे को एक लोचा ।’’
‘‘क्या?’’
‘‘बाप, कल सुबह उस भीड़ू को थामेगा तो पंछी पहले ही उड़ गया तो?’’
‘‘माथा फिरेला है! उसको अभी थामने का। कल सुबह तो उसको बिग बॉस के सामने पेश करने का ।’’
‘‘सॉरी बोलता है, बाप। साला इतना सा बात मेरे मगज में न आया। अभी और बोले तो बाप, उसकी खोली की तलाशी भी लेने का। क्या पता ब्रीफकेस उधरीच हो! या ब्रीफकेस का माल उधर हो! या ऐसा कुछ उधर हो जिससे साबित होता हो कि वो हिट में शामिल था ।’’
‘‘बहुत बोलता है। अब बस कर। और कट कर ।’’
सम्बन्ध विच्छेद हो गया।
जीतसिंह ने मोबाइल जेब के हवाले किया, गाइलो की तरफ घूमा और कुटिल भाव से बोला—‘‘क्या!’’
‘‘बहुत डेंजर दाँव खेला, जीते!’’—गाइलो संजदगी से बोला—‘‘बुरा होगा उस भीड़ू का ।’’
‘‘हो न फुल करके! जिसने हमारा बुरा किया, उसका हमारे से ज्यास्ती बुरा हो तो हमेरे को कोई वान्दा है?’’
‘‘ये बात भी ठीक है ।’’
‘‘अभी देखना...’’
तभी गाइलो के मोबाइल की घण्टी बजी।
गाइलो ने स्क्रीन पर निगाह डाली।
‘‘डेविड परदेसी का फोन है’’—फिर बोला—‘‘तू बात करेगा या मैं करे?’’
‘‘तू कर ।’’
‘‘ठीक ।’’
दो तीन मिनट गाइलो फोन पर बिजी रहा।
आखिर उसने लाइन काटी और जीतसिंह से मुखातिब हुआ।
‘‘वो भीड़ू’’—वो बोला—‘‘राजाराम लोखण्डे घाटकोपर में होटल आनन्द में रहता है ।’’
‘‘होटल में रहता है तो इस का मतलब है कहीं बाहर से है ।’’
‘‘हो सकता है ।’’
रूम नम्बर बोला?’’
‘‘हाँ। छ: सौ पाँच। ये भी बोला कि होटल छोटा है पण थ्री स्टार रेिंटग वाला है ।’’
‘‘फिर तो खासा बढ़िया होटल हुआ!’’
‘‘तू बोलता है तो हुआ। हाइट में बोला कि ग्यारह माले तक उठा हुआ है ।’’
‘‘बॉडीगार्ड का क्या बोला?’’
‘‘उसको होटल पहँुचा के घर गया अपने। अभी डेविड ने चूना भट्टी से ही फोन लगाया ।’’
‘‘तू उसको क्या बोला?’’
‘‘अनिल घुमरे को! मैं उसको कैसे...’’
‘‘ढक्कन! डेविड को ।’’
‘‘उसको! उसको बोला नक्की करे ।’’
‘‘ठीक बोला। अभी देखना, आधे घण्टे के अन्दर ये अनिल घुमरे श्याना भाई लोगों के कब्जे में होगा ।’’
‘‘हमारे कब्जे में काहे नहीं?’’
‘‘क्या बोला?’’
‘‘दूसरे भीड़ू के बारे में, लीडर भीड़ू के बारे में अगर भाई लोग उसकी जुबान खुलवा सकते हैं तो ये काम हम भी तो कर सकते हैं! जब हम साला अक्खा माल वापिस कब्जा सकते हैं तो दस पर्सेंट से सब्र करने का क्या मतलब! जब कि दस पर्सेंट की अभी कोई गारन्टी भी नहीं!’’
‘‘माथा फिरेला है! गाइलो, जब तूने वाल्ट वाले सिस्टम को हिट करने का प्लान बनाया था, तो तब तेरे को मालूम था तू उस ‘भाई’ की, अन्डरवल्र्ड डॉन की मूँछ का बाल उखाड़ता था? नहीं मालूम था। मालूम होता तो जो किया, वो करने का हौसला करता?’’
‘‘बोले तो...’’
‘‘क्या बोले तो! देखा नहीं महबूब फिरंगी का एक्शन कितना फास्ट था! साला परसों रात को वारदात हुआ, कल दोपहर से पहले हर सस्पैक्ट भीड़ू उसकी हाजिरी भरता था। अभी ईनाम की उम्मीद में हम उसको हिन्ट सरकाया कि उसका माल उसको कैसे वापिस मिल सकता था, हम ऐसा न करते तो तू क्या समझता है कि वो कुछ न करता? कुछ न कर पाता? सब करता। थोड़ा ज्यास्ती टेम लगता पण उसका डेंजर भीड़ू लोग सब करके दिखाता। अभी जो ‘बुरा होगा’ तू उस भीड़ू का सोच रहा है, फिर वो हमारा होता है। क्या!’’
गाइलो परे देखने लगा।
‘‘मेरे को मालूम होता कि वो सैट अप बड़ा बाप महबूब फिरंगी का था तो मेरे को जौहरी बाजार के करीब भी फटकना कबूल नहीं होता ।’’
‘‘ठीक बोला तू। अभी कल तू जायेगा उधर?’’
‘‘जाना पड़ेगा। हुक्म हुआ है इतने बड़े अन्डरवल्र्ड डान का ।’’
‘‘सेफ लौट आयेगा?’’
‘‘उसका काम किया मैं, ईनाम के काबिल काम किया मैं, क्यों नहीं?’’
‘‘ईनाम के साथ!’’
‘‘उसकी कोई गारन्टी नहीं पण पूरी तरह से नाउम्मीदी भी नहीं। देखेंगे ।’’
‘‘मेरे को तेरी फिकर ।’’
‘‘कर न! आखिर यार है ।’’
‘‘मैं कुछ नहीं कर सकता?’’
‘‘नहीं। ये टेम तू कुछ नहीं कर सकता। ये टेम जो होगा, मेरे को ही भुगतना पड़ेगा। अभी इधर से हिल ।’’
गाइलो ने इंजन स्टार्ट किया और टैक्सी को रोड पर डाला।
‘‘अभी तो मेरे को विट्ठलवाडी ही चलने का न तेरे को ड्राप करने का वास्ते?’’
‘‘जौहरी बाजार ।’’
‘‘उधर क्या है अब?’’
‘‘मुरली चेराट है। अभी’’—जीतसिंह ने अपनी कलाई घड़ी पर निगाह डाली—‘‘टेम है उस की शिफ्ट खत्म होने में ।’’
‘‘उससे क्या माँगता है?’’
‘‘कल के वास्ते मेरे को उसको कुछ समझाना माँगता है, कुछ बुझाना माँगता है—कुछ फरियाद कर के, कुछ मनुहार करके, या फिर धमका के, हड़का के, दहशत में डाल के। कल सुबह बिग बॉस के सामने उसका एक खास तरीके से बिहेव करना जरूरी है ।’’
‘‘ठीक ।’’