जुगल किशोर और रोनिका नहा-धोकर तब आराम कर रहे थे, जब संतसिंह भीतर आया। बाहर से खाना पैक करा कर लाया था। बर्तनों में डालकर खाना उन्हें भी दिया और खुद भी खाने लगा।
खाने के बीच रोनिका ने कहा।
“आप हम पर खर्चा कर रहे हैं। ये पैसा हमसे ले लीजिए। हम…।”
“कैसी बातें करती हो बेटी। ” संतसिंह कह उठा-“अपने बच्चों से भी भला पैसा लिया जाता है, रोटी के लिए।”
रोनिका ने बहुत कहा।
संतसिंह नहीं माना
ये अपने पास मौजूद पचास हजार की गड्डी का सत्यानाश करके रहेगी।
वे खाना खाकर हटे। रोनिका ने जुगल किशोर से कहा कि कम से कम वो बर्तनों को साफ कर दे। अपने बारे में उसने कहा कि ऐसे काम करने उसे नहीं आते।
नवाब की औलाद है साली। मुझसे बर्तन साफ करने को कह रही है ।
तभी कल्लू वहां पहुंचा। गुस्से में भरा लग रहा था वो जैसे मरने-मारने के इरादे से आया हो। संतसिह उसे देखकर इस तरह घबरा गया कि, गलत वक्त आ गया हो।
“ओह कल्लू भाई।” संतसिंह प्यार से कह उठा- “आ-आ। ये देख मेरे मेहमान।”
“कुएं में जाए मेहमान।” कल्लू भड़क कर बोला-“सीधी तरह मेरे पन्द्रह हजार रुपए मेरे हवाले कर दे। वरना आज तू नहीं या मैं नहीं।” कहने के साथ ही कल्लू ने चाकू निकाल लिया।
“ये क्या करता है।” संतसिह जल्दी से बोला- “मेरे मेहमान आए हैं। तू फिर आकर बातें करना।”
“चाकू नहीं देखा तूने।” कल्लू हाथ में पकड़े चाकू को हिलाकर बोला-“आज मैं खाली हाथ नहीं जाऊंगा। मेरा पन्द्रह हजार रुपया मेरे हवाले कर। नहीं तो तेरे शरीर के टुकड़े कर दूंगा। छः महीनों में चक्कर लगवा रहा है अब मैं नहीं रुक सकता। परसों मेरी बहन की शादी है। मुझे हर हाल में पैसा वापस चाहिए। वरना…।”
संतसिंह हाथ जोड़कर कल्लू के पास पहुंचा ।
“मेरी इज्जत का सवाल है कल्लू । मेरे मेहमान…।”
कल्लू ने हाथ बढ़ाकर संतसिंह के सिर के बाल पकड़े और चाकू उसके पेट से लगा दिया।
“बोल, देता है पन्द्रह हजार।”
जुगल किशोर कुछ कहने लगा कि रोनिका कह उठी।
“ये क्या कर रहे हो तुम।”
“इसकी जान लेने जा रहा…।”
“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा जो…।”
“तुम्हारे पन्द्रह हजार नहीं फंसे। फसे होते तो तुम्हारा दिमाग भी खराब हो जाता।” कल्लू ने खतरनाक स्वर में कहा ।
“छोड़ दो इसे, मैं तुम्हें हजार देती हूं।”
"हो गया मुहूर्त पचास हजार की गड्डी का।"
कल्लू पन्द्रह हजार लेकर चला गया ।
संतसिह ऐसा मुंह बनाये बैठा रहा, जैसे कल्लू की हरकत से उसे बहुत दुख पहुंचा हो ।
“मैं माफी चाहता हूं कि…।” संतसिंह ने रो देने वाले स्वर में कहना चाहा।
“चुपकर।” जुगल किशोर झल्ला उठा-“पन्द्रह हजार की ठुकवा दी और अब माफी-।”
“ये कैसी बातें करते हो जुगल।” रोनिका ने टोका।
“पन्द्रह हजार रुपया।”
“वो मेरा है। मैंने दिया, तुम क्यों?”
“समझा करो रोनिका। इस वक्त जो कुछ भी है हम दोनों का है।” जुगल किशोर ने खुद को संभाला।
संतसिंह करो दुखियों की तरह मुंह लटकाये बैठा था।
रात का वक़्त था ।
कमरे में मध्यम सी रोशनी का बल्ब रोशन था। संतसिंह के घर में एक ही डबल बैड था। जिस पर इस वक्त जुगल किशोर और रोनिका मौजूद थे ।
रोनिका नींद में थी ।
जबकि जुगल किशोर की आंखों में दूर-दूर तक नींद नहीं थी। वो जब कमरे में आया तो रोनिका कपड़े बदल कर, बैड पर लेटी नींद में डूब चुकी थी। पहने जेवरात उतारकर उसने टेबल पर रख दिए थे और दिन वाले कपड़े कुर्सी पर रखे हुए थे।
पचास हजार में से पन्द्रह हजार कम हो गए थे पैंतीस हजार नगद पड़ा था पैंट की जेब में और जेवरात मिलाकर, लाख रुपए का माल पड़ा होगा । जुगल किशोर सोच चुका था कि लाख रुपए का माल ही बहुत है वक्त अच्छा था, सारा माल लेकर निकल जाने का।
संतसिंह सोफे वाले कमरे में दीवान पर सोया पड़ा था ।
जुगल किशोर आहिस्ता से नीचे उतरा और टेबल पर पड़े उसके जेवरात उठाकर अपनी पैंट की जेब में ठुसे और कुर्सी पर पड़ी रोनिका की जेबों को टटोला। पांच सौ की गड्डी मिल गई। उसे भी अपनी जेब में डाला और रोनिका पर निगाह मारकर दबे पांव दरवाजे की तरफ बढ़ा ।
“जुगल…।” तभी रोनिका की आवाज उसके कानों में पड़ी।
जुगल किशोर ठिठका। दिल जोरो से भड़क उठा था, वो पलटा।
रोनिका ने बैड से उतरकर आपनी पेंट के पास पहुँची और उसमें से रेजगारी निकाल कर टेबल पर रखी।
“इसे क्यों छोड़े जा रहे हो।”
जुगल किशोर की हालत देखने लायक थी।
रोनिका ने आगे बढ़कर लाइट ऑन कर दी। उसके चेहरे पर गंभीरता के भाव थे ।
जुगल किशोर गहरी सांस लेकर रह गया ।
“बैठ जाओ ।” रोनिका की नजरें, जुगल किशोर के चेहरे पर थी।
अजीब से भाव लिए जुगल किशोर आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठ गया।
“तुमने तो सोचा भी नहीं था कि मैं तुम्हें रंगे हाथ पकड़ लूंगी।” रोनिका भी बैड के कोने पर बैठ गई ।
मैंने तो बड़े-बड़े मंसूबे बांधे थे। मुझे क्या पता साली की तू जाग रही थी ।
“तुम नींद में नहीं थी।” जुगल किशोर ने गहरी सांस ली।
“नींद में थी।” जब तुम बैड से उठे, तभी आंख खुली।”
“बहुत गलत मौके पर खुली।” जुगल किशोर ने कहा और सिगरेट सुलगा ली ।
रोनिका की निगाह जुगल किशोर पर थी ।
“मुझे पहले से ही पता था कि तुम कोई जासूस वगैरह नहीं होगा।गड़बड़ आदमी हो।” रोनिका ने अपने शब्दों पर जोर देते हुए कहा-“मैंने तुम्हारी हर हरकत पर नजर रखी।”
अब क्या मास्टर की तरह डंडे से मारूंगी मुझे। रंगे हाथ पकड़ लिया तो, पकड़ लिया।
“मैंने तो कोई गड़बड़ नहीं की थी।”
“लेकिन मैंने तुम्हारी आंखों में-“नियत में गड़बड़ पहचान नहीं थी । तुम बातें मुझसे करते थे और नजर मेरे गले में पड़ी सोने की चैन पर होती थी। नोटों की गड्डी देखते ही तुम्हारी आंखों में चमक आ जाती थी।”रोनिका का स्वर शांत और नजरें जुगल किशोर पर थी-“मैंने हमेशा तुम्हारी हर छिपी हरकत पर नजर रखी। संतसिंह को पन्द्रह हजार का उधार चुकाया तो तुम्हारे चेहरे पर ऐसे भाव थे, जैसे तुम्हारे पैसे जा रहे हो।” जुगल किशोर खामोश रहा ।
“कौन हो तुम ?”
“क्या करोगी मेरे बारे में जानकारी।” एकाएक जुगल किशोर मुस्कुरा उठा ।
“बताने में कोई हर्ज है तो मत बताओ ।”
“बताने की जरूरत भी नहीं है।”
“जेब में से मेरा सामान निकाल दो।”
जुगल किशोर ने शराफत से पांच सौ के नोटों की गड्डी और जेवरात निकालकर टेबल पर रखे। रोनिका ने उस सामान को देखा फिर नजरें जुगल किशोर पर जा टिकी ।
“मैं तो सोच रही थी कि काम हो जाने पर तुम्हें पच्चीस लाख दूंगी ।”
“मैं ही मिला था बेवकूफ बनाने को।” जुगल किशोर ने उसे घुरा- “तुमने मुझे फूटी कौड़ी नहीं देनी है, काम हो जाने के बाद। में तुम्हारी बातों में फसने वाला नहीं।”
“तुम मेरी बात को झूठ समझ रहे हो।”
“तुमने ऐसा क्या दिखाया जो मैं सच जानूँ। तुम कौन हो? क्या हो? तुम्हारे साथ क्या हो रहा है? तुम किससे बसना चाहती हो? क्यों बचना चाहती हो? तुम्हें लेकर मेरे पास सवाल ही सवाल है।” जुगल किशोर ने कहा- “मेरे किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए तुम तैयार नहीं हो।”
“इसलिए कि मुझे तुम पर विश्वास नहीं ।”
“मैं जानता हूं तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर रही। तभी तो मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता । तुम्हारी सहायता करने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं। तभी तो तुम्हारा माल लेकर तुम्हें नमस्ते करके जा रहा था।”
“मेरे बारे में जानकर क्या करोगे ?” रोनिका गंभीर हो गई ।
“कम से कम इतना तो विश्वास हो कि तुम पच्चीस लाख देने के काबिल हो।”
“अगर तुम्हें इस बात का विश्वास आ गया तो ईमानदारी से मेरी सहायता करोगे ?”
“हां ।”
“कोई गड़बड़ मत करना। ये बात याद रखना कि यहां संतसिंह भी है। वो मेरे काम आ सकता है।”
जुगल किशोर उसे देखता रहा ।
“मेरे पापा का नाम जीवन पाल है।”
“जीवन पाल !”
“केशोपुर के मालिक कह सकते हो मेरे पापा को।” रोनिका बोली- “उनके पास कितनी दौलत है,वो खुद नहीं जानते । तुम्हारी पच्चीस लाख जैसी छोटी-सी रकम तो मैं अपने बैंक खाते से निकालकर दे सकती हूं।”
जुगल किशोर अजीब-सी निगाहों से रोनिका को देखता रहा।
रोनिका पाल नाम है मेरा। केशोपुर में कोई पहचानना वाला रहता हो तो उसे फोन करके जीवन पाल के बारे में पूछ…।”
“किसी से पूछने की जरूरत नहीं समझता।” जुगल किशोर ने तीखे स्वर में कहा ।
“क्या मतलब ?”
“मैं नहीं जानता था कि जीवन पाल जैसा हरामी इंसान तुम्हारा बाप है।”
रोनिका ने उसे देखा फिर मुस्कुरा-सी पड़ी ।
“तुम्हारे ये शब्द बता रहे हैं कि तुम वास्तव में मेरे पापा के बारे में बहुत कुछ जानते हो।”
जुगल किशोर कड़वी निगाहों से रोनिका को देखकर रह गया।
“अब तुम्हें विश्वास हो गया कि मैं तुम्हें पच्चीस लाख दे सकती हूं।” रोनिका बोली ।
“विश्वास हो गया। लेकिन तुम किस फेर में हो। ये सब…।”
“इस बारे में सुबह बात करेंगे। नींद ले लो। अगर ये माल लेकर खिसकना चाहोगे तो अब रोकूँगी नहीं तुम्हें।”
वे दोनों इस बात से वाकिफ नहीं थे कि दरवाजे के बाहर संतसिंह उनकी बातें सुन रहा था ।
■■
अगले दिन, नाश्ते के बाद।
जुगल किशोर कुर्सी पर बैठा, सिगरेट के कश ले रहा था।
रोनिका के चेहरे पर सोच के भाव समेटे वहां टहल रही थी। संतसिंह दया का पात्र बना, हुकुम के गुलाम जैसा दिखने का, दिखावा करते हुए कमरे में एक तरफ बैठा था। परंतु पैनी निगाह से देख लेता रोनिका को की वो जीवन पाल जैसे इंसान की बेटी है, जिसके पास बे-हिसाब दौलत है और उसे दौलत की सख्त जरूरत है। नाश्ता बहुत बढ़िया कराया था संतसिंह ने। जाने कहां से गर्म गर्म पूरी छोले ले आया था। मजेदार रहा था नाश्ता।
“रोनिका ।” जुगल किशोर ने टोका।
रोनिका ने ठिठक कर उसे देखा ।
“इस वक्त तुम सुरक्षित जगह पर हो। हो कि नहीं?”
“हूं।”
“तो अब बोलो, आगे क्या करना है ? ”
क्षणिक सोच के बाद रोनिका आगे बढ़ी और पैन से कागज पर फोन नंबर लिखा ।
“ये मेरे पापा का पर्सनल फोन है। उनके कमरे में लगा है। उन्हें बता दो कि मैं यहां हूं। भारी खतरे में हूं। वो किसी तरह मुझे यहां से ले जाए। परंतु खुद लेने ना आए।”
“खुद लेने क्यों ना आएं?”
“केशोपुर से वो बाहर निकलेंगे तो उन लोगों को मालूम हो सकता है, जो मेरी जान लेना चाहते हैं।”
“तुम्हारी जान के दुश्मन केशोपुर में हैं?”
“ऐसा ही समझो ।”
"मामला बहुत गहरा है, बेटे जुगल।"
संतसिंह इस तरह सिर झुकाए बैठा था कि जैसे उनकी बात से उसे मतलब ना हो ।
जुगल किशोर, रोनिका को सोच भरी निगाहों से देखता रहा।
“पापा से कहना कि जिसे भी भेजें, विश्वास बंदे को भेजें। यहां का पता मत बता देना। उनसे पूछ लेना कि कब फोन करूं, ये जानने के लिए किसे भेज रहे हैं। दोबारा जब वो बताएं कि बंदे को भेजने का इंतजाम कर दिया है तो तब बताना कि मैं यहां हूं।”
जुगल किशोर ने सिर हिलाया आगे बढ़कर फोन नंबर ले लिया ।
बेटा जुगल किशोर, इस बार गलती मत कर देना। तेरे हाथ ये लड़की, कारू का खजाना बनकर लगी है। संभल कर चल और माल लूट ले।
“कह देना कि वो जिसे भेजें, उसके हाथ पच्चीस लाख नकद भी भेज दें।” रोनिका बोली।
“मेरे लिए ।”
“जुगल किशोर गहरी सांस लेकर गया ।
“क्या हुआ?”
“पच्चीस लाख जैसी बड़ी रकम को बर्दाश्त करने की हिम्मत इकठ्ठी कर रहा हूं। तुम ही फोन क्यों नहीं करती अपने पापा को।”
“मैं यहां से बाहर नहीं निकलना चाहती।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो लोग मेरी जान के पीछे पड़े हैं। उन्हें मैं अच्छी तरह जानती हूं कि वो कितने खतरनाक है।”
“लेकिन वो तो मुंबई में रह गए। हम तो यहां रथपुर में…।”
“उनके हाथ बहुत लंबे हैं। तुम नहीं समझोगे।” रोनिका बेचैन हुई-“तुम पापा को फोन…।”
तभी जुगल किशोर ने अपने कपड़ों में फंसा रखा लिफाफा निकाला। ये वो ही लिफाफा था, जो शुरू से ही रोनिका के पास देखा जा रहा था। जिस पर मजबूती भरे ढंग से चौड़ी टेप चिपकी थी और जिसकी हिफाजत के लिए वो शुरू से ही चिंतित थी । उसे जुगल किशोर के हाथों में देखते ही चोकीं। तुरंत लपक कर उसके हाथ से ले लिया। उसे अच्छी तरह चैक किया। परंतु वो वैसे ही बंद था जैसे उसने बंद किया था।
“ये तुम्हें कहां से मिला?”
“बैड पर से। तब तुम बाथरूम में, नहा रही थी। क्या है ये?” जुगल किशोर ने पूछा ।
“तुम्हारे काम की चीज नहीं है। पापा को फोन करके आओ।”
जवाब में जुगल किशोर ने कुछ नहीं कहा। कोई सोच उसके मस्तिष्क में नहीं उभरी ।
तभी खामोश दयनीय हाल में बैठा संतसिंह कह उठा।
“ये मामूली-सा फोन में कर आता हूं ?”
“कोई जरूरत नहीं।” जुगल किशोर ने उसे घुराकर देखा- “तुम…।”
“जुगल ! संतसिंह ये फोन कर आएगा।” रोनिका बोली- “तुम मेरे पास ही रहो।”
“ये-तुम इस पर इतना बड़ा विश्वास कर सकती हो।”
“तुम्हीं ने तो कहा था कि विश्वास करने से ही पैदा होता है।” रोनिका ने सिर हिलाकर कहा।
“लेकिन…।”
“संतसिंह, तुमने सुन लिया होगा कि मेरे पापा से कैसे बात करनी है।”
“हां बेटी, समझ गया। सफेद बालों वाला ही, सफेद बालों वाले से अच्छी तरह बात कर सकता है।”
“जुगल फोन नंबर वाला कागज संतसिंह को दे दो।”
जुगल किशोर नहीं चाहता था कि संतसिंह का दखल इस मामले में हो।
संतसिंह पीछे रहे, इस बात का दबाव रोनिका पर, नहीं डाल सकता था ।
■■
सोनू भाटिया ।
रथपुर का बत्तीस वर्षीय दादा। एक ही बार में ढेर सारी दौलत कमा लेने की तमन्ना बरसों से मन में थी। परंतु कहीं भी ढंग का हाथ नहीं लगा था। रथपुर में दबदबा था उसका। जरूरत पड़ने पर अपने काम के ढेरों आदमी खट्टे कर लेता था। जिससे मतलब होता, उसके गले लग जाता था। बहुत कम ही धोखेबाजी पर उतरता था। दो शादियां कर रखी थी और दोनों बीवियां साथ ही रहती थी। बच्चा कोई नहीं था।
सोनू भाटिया की एक बीवी संतसिंह की मुंह बोली बहन बनी हुई थी। सोनू भाटिया से तो उसका ब्याह बाद में हुआ था। बहन पहले से बनी हुई थी। इस नाते सोनू भाटिया, संतसिंह को थोड़ी-बहुत इज्जत करता था।
इस वक्त संतसिंह, सोनू भाटिया से बात कर रहा था। ये जगह सोनू भाटिया ने ऐसा ठिकाना थी कि जहां से वह अपने कई तरह के गैरकानूनी काम संभालता था। ज्यादा लोगों को इस जगह के बारे में नही मालूम था।
“बोले संते। कैसे आया?”
“फायदा कराने आया हूं।” संतसिंह मुस्कुराया ।
“फायदे की बात करके दो-चार हजार लेगा। यूं ही ले ले।”
सोनू भाटिया ने कहा-“क्यों बेकार का ड्रामा करता है।”
“मेरे में इतना दम नहीं। छोटे हाथ ही मार सकता हूं। वरना ये फायदा में ही उठा लेता।”
“ऐसी बात ? ” सोनू भाटिया ने उसकी आंखों में झांका ।
“हां ।”
“तो बोल ।”
“जीवन पाल का नाम सुना होगा। वो…।”
“केशोपुर वाले जीवन पाल की बात तो नहीं कर रहा।”
“वो ही ।”
“तेरी उससे क्या रिश्तेदारी बन गई जो जीवन पाल जैसी मालदार आसामी का जिक्र करने की जरूरत पड़ गई।”
“रिश्तेदारी तो तेरी भी बन सकती है।”
“बोल…बोल…कैसे?”
“वो अपनी दोनों बेटियों को कहीं छिपा कर पढ़ा रहा है कि उसके किसी दुश्मन की निगाह उसकी बेटियों पर ना पड़े ।उसका कोई बुरा ना कर दे। दोनों बेटियां जीवन पाल की कमजोरी है। ये खबर मेरे पास बहुत पुरानी है।”
“नई खबर क्या है ? सोनू भाटिया की आंखें सिकुड़ी।
“वो भी बताता हूं। ये बता जीवन पाल की बेटी तेरे कब्जे में आ जाए तो तू क्या करेगा ?”
सोनू भाटिया की आंखें सिकुड़ी।
“हूं। ये बात है ।”
“बता, क्या करेगा ?”
“दो में से एक काम। या तो उससे शादी कर लूंगा।” सोनू भाटिया एकाएक मुस्कुराया- “या उसे वापस करने के बदले तगड़ी रकम वसूल करुंगा। मैं दौलतमंद बनना चाहता हूं। कहां है जीवन की बेटी ।”
“मेरे को क्या मिलेगा ?” संतसिंह ने गंभीर स्वर में कहा ।
“इतना तो तेरे को मिल ही जाएगा कि जब तू मरे तो लाख दो लाख पीछे छोड़ जाए।”
“ठीक है। जीवन पाल की बेटी रोनिका, इस वक्त मेरे घर पर है।”
“तेरे घर पे।” सोनू भाटिया के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे-“पूरी बात तो बता।”
संतसिह ने सब कुछ बता दिया। फोन नंबर लिखा कागज भी टेबल पर रख दिया ।
“ये जीवन पाल के खास फोन का नंबर है।”
होंठ सिकोड़े सोनू भाटिया ने कागज उठाया और फोन नंबर को देखा।
“तू जा संते। जीवन पाल की लड़की का ध्यान रखना। वो वहां से निकले नहीं।”
“उसे वहां रोके रखने का बहुत बढ़िया रास्ता है कि जब वो जुगल किशोर के साथ बाहर निकलो तो उस पर नकली हमला करवा देना। तब वो यही समझेगी कि उसकी जान लेने वाले रथपुर आ चुके हैं। फिर वो मेरे घर से बाहर नहीं निकलेगी । अपने दो आदमी मेरे घर के बाहर निगरानी पर लगा दे।”
“ऐसा ही करता हूं।”
“दस हजार दे दे। जीवन पाल की बेटी की सेवा करना आसान काम नहीं है। महंगा खाना खाने की आदत है उसकी।”
संतसिह को दस हजार दिया तो वो फिर आने को कह कर चला गया।
तब पहला फोन गया सोनू भाटिया का, जीवन पाल को।
■■
सोनू भाटिया की जीवन पाल।”
“कौन भाटिया ? ”
“तेरी बेटी रोनिका मेरे पास है। वो मेरे से शादी करना चाहती है। दो बीवियां पहले भी मेरे पास हैं। सोचता हूं तीसरी बीबी भी रख लूं। फिर सोचता हूं तीसरे का क्या करूंगा।”
“जानता नहीं मेरे को जो तू ऐसी बात कर रहा है ।” जीवन का कठोर स्वर उसके कानों में पड़ा।
“जानता हूं। तभी तो ऐसी बात कर रहा हूं । नों महीने बाद जब अखबार में खबर छपेगी कि वो मेरे बच्चे की मां बन गई मेरी ब्याहता है तो तब तू क्या कर लेगा ? कुछ भी नहीं कर सकेगा। समझ क्या?"
जीवन पाल की तरफ से कोई आवाज नहीं आई।
“फोन नंबर भी तेरी बेटी ने दिया है। सुहाग का जोड़ा पहन कर वो तैयार बैठी है, फेरे पर बैठने के लिए। बोल तो शादी के बाद तेरे पास आशीर्वाद लेने आ जाऊ। दामाद की कुछ तो इज्जत करेगा तू।”
“अगर मेरी बेटी को कुछ हुआ तो…।”
“अभी तक तो तेरी बेटी ठीक है। फूलों की तरह रखा है उसे।”
“कहां से बोल रहा है तू?”
“रथपुर से। यहां की पुलिस जानती है मेरे को। सोनू भाटिया कहते हैं मुझे । उसकी आवाज में खतरनाक भाव आ गए-“कान खोल कर सुन ले अगर तूने या तेरे किसी आदमी ने इस मामले में दखल देने के लिए मेरी इजाजत के बिना रथपुर में कदम रखा तो तेरी बेटी उसी वक्त खत्म जीवन पाल । भाटिया की बात पर पूरा विश्वास कर लेना।”
“बहुत गलत कर रहा है।”
“इस वक्त तू मेरे बारे में नहीं। अपनी बेटी के बारे में सोच। कर लूं ब्याह। नाना बना दूं तेरे को।”
“बकवास मत कर ।”
“ये बकवास नहीं है। शादी की फिल्म बनाकर तेरे को भेजता हूं। उसमें देखना तेरी बेटी कितनी खुश है।”
“क्या चाहिए तेरे को ?” जीवन पाल का भिंचा स्वर, सोनू भाटिया के कानों में पड़ा।
“मैं बोलू, अपनी जायदाद मेरे को दे दे तो क्या दे देगा।”
जीवन पाल की आवाज नहीं आई ।
“इसलिए ये मत पूछ कर मेरे को क्या चाहिए। मेरे को तो सब कुछ चाहिए। तू अपनी कह, क्या देता है ।”
“पांच लाख।”
“तेरी मां ने तेरे को पागल ही पैदा किया या पैसा कमाने के बाद पागल हुआ है।”
“तेरे को बोलने की तमीज नहीं…।”
“बात करनी तेरे को आती नहीं। इतना बड़ा आदमी है तू। केशोपुर को कब्जे में कर रखा है। कितना पैसा है तेरे पास। तेरे को खबर नहीं और अपनी बेटी की वापसी की कीमत पांच लाख लगाता है। पांच-दस लाख तो मैं यूं ही दान कर देता हूं। पचास-पचास लाख की ड्रक्स हर महीने पुलिस पकड़ लेती है। मेरे को सड़क छाप समझता है क्या। पांच लाख के बदले पन्द्रह करोड़ बोलता तो मैं सोचता। सुन-तेरे को कल कोरियर से, तेरी बेटी के ब्याह के वीडियो फिल्म मिलेगी। मजे से वो फिल्म देखना। जो पांच लाख तू मेरे को देना चाहता है, उस रूपए के लड्डू बंटवा देना केशोपुर में ।”
“क्या नाम बताया तुने ? ” जीवन पाल की आवाज आई ।
“सोनू भाटिया। लिखकर रख ले। नहीं तो मेरे को मालूम है तू फिर पूछेगा ।”
“क्या चाहिए तेरे को, सही सलामत मेरी बेटी को वापस करने के लिए ।”
“सीधा बोलूं, या मोल भाव करेगा तू ?”
“सीधा बोल।”
“छः करोड़ । नकद नहीं, हीरो की शक्ल में।”
“छः करोड़ ज्यादा…।”
“भाजी खरीदने वाली बात मत कर । तू अपनी बेटी को वापस लेने के लिए बात कर रहा है । सीधा बोला रहा हूँ छः। पांच नहीं होगा। छः करोड़ के हीरे चाहिए।” सोनू भाटिया की आवाज में खतरनाक भाव आ गए- “बहुत अच्छी तरह मालूम है मेरे को कि तू खतरनाक आदमी है। मेरे से बोत ज्यादा खतरनाक है। तेरे पास कमाल दिखाने वाले बंदे भरे पड़े हैं। लेकिन अपनी ताकत बेटी लेने से पहले और बाद में भी मुझ पर इस्तेमाल करने की कोशिश मत करना। मेरे पास भी फौज है। वैसे भी एक बार ज्योतिषी ने मेरे को बोला था कि जब तू मरेगा तो इक्यावन को साथ लेकर मरेगा और उसमें जीवन पाल का नाम आदमी भी होगा। ये नहीं मालूम कि उस ज्योतिषी ने सच कहा था या झूठ। ये तो आने वाले वक्त में ही पता चलेगा। तेरा क्या ख्याल है, ज्योतिषी सच बोला था।”
“झूठ बोला था।” जीवन पाल का भिंचा स्वर कानों में पड़ा।
“मतलब कि तू छः करोड़ के हीरे भेजने को तैयार है।”
“मैं खुद लेकर आता…।”
“ये गलती मत करना। खुद आएगा तो अपने साथ अपनी बेटी को भी मुसीबत में डालेगा। मैं भी नहीं चाहता कि इस मामले में रथपुर की पुलिस की नजरें मेरी तरफ उठे। पहले ही बहुत लफड़ा रहता है।”
“क्या कहना चाहता है तू ?”
“यही कि तू इधर को मत आना। जब तक तेरी बेटी रथपुर में है तू रथपुर आने को भूल जा। चुपचाप किसी एक को भेज दे छः करोड़ के हीरे के साथ। वो हीरे देगा। तेरी बेटी को लेगा वापस तेरे पास। मेरा फोन नंबर नोट कर ले। रथपुर में घुसते ही मेरे को फोन मार लेगा।”
“ये काम इतना आसान नहीं है, जितना कि तुम समझ रहे हो।”
“साफ बोल…।”
“मेरी हरकतों पर नजर रखने वाले बहुत हैं ।अखबार का मालिक सुदर्शन सेठी हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ा है। उसे अगर ये मालूम हो गया कि मेरी बेटी तुम्हारे कब्जे में है, तो अखबारों में ऐसी खबर छापेगा जिससे कि मेरी बदनामी…।”
“वो तुम्हारी मुसीबत है मेरी नहीं…।”
“मैं तुम्हें ये भी नहीं कह सकता कि तुम या तुम्हारा आदमी आकर हीरे ले जाए। अगर अखबार के रिपोर्टर मुझ पर लगा रखे हैं। कहने को तो अखबार के रिपोर्टर हैं वैसे हैं जासूस। उठाई गिरे । सुदर्शन सेठी मेरा नाम मिट्टी में मिलाना चाहता है। ” अपना रोना-धोना मेरे आगे मत रखो । ये सोचो कि छः करोड़ के हीरे कैसे मुझे देकर अपनी बेटी लेनी है। मुझे कोई जल्दी नहीं है। दो महीने बीत जाने पर भी तुम्हारी बेटी सुरक्षित रहेगी। क्योंकि तुमने पुलिस को खबर नहीं की। तुम्हारी तरह से बात बाहर नहीं निकली । तुम किसी तरफ से भी मेरे लिए खतरा बने तो तुम्हारी बेटी गई।”
“मेरी तरफ से बात बाहर नहीं जाएगी।”
“तो तेरी बेटी को कोई नुकसान नहीं होगा।”
“मैं किसी नये आदमी को तलाश करके तुम्हारे पास भेजता हूं। तभी चुपके से काम हो जाएगा।” जीवन पाल का गंभीर स्वर कानों में पड़ा-“मैं इस बात का विश्वास करूं कि तुम मेरी बेटी को कोई तकलीफ नहीं दोगे।”
“तुमने कोई गड़बड़ नहीं की तो, वो मेरी बहन की तरह रथपुर में रहेगी ।”
इसके बाद जीवन पाल और सोनू भाटिया में इसी तरह की बातें होती रहती थी।जीवन पाल अपनी कोशिश की खबर भाटिया को देता रहता था। भारतीय ने अपने कुछ आदमी के केशोपुर भेज दिए थे कि जीवन पाल की हरकतों पर नजर रखी जाए। वो पुलिस को खबर नहीं देता।
सोनू भाटिया को विश्वास था कि छः करोड़ मिल जाएंगे उसे।
नों-दस दिन बीत गए थे ये सब होते-होते ।
उधर, संतसिह यही कहता रहता जुगल किशोर रोनिका को कि, जीवन पाल से उसकी बात होती रहती है। वो जल्दी ही किसी को भेजने को कह रहा है। और अब संतसिंह दस हजार मांग रहा था। जुगल किशोर को जाने क्यों इस बात का विश्वास होने लगा कि संतसिंह कोई गड़बड़ कर रहा है।
संतसिह के जाने के बाद जुगल किशोर रोनिका के पास गया । जो कि कुर्सी पर बैठी थी। उसने जुगल किशोर को देखा।
“तुम क्यों परेशान हो रहे हो।” रोनिका ने लापरवाही से कहा ।
“रोनिका ।” जुगल किशोर ने गंभीर निगाहों से उसे देखा-“तुम्हारे पापा को खबर हो कि तुम यहां हो और दस दिन बीत जाने पर भी वो ना आए। उनका भेजा कोई आदमी ना आए। ये हो सकता है।”
“कभी नहीं । वो तो दौड़े आएंगे।” रोनिका की आंखें सिकुड़ी।
“तो दस दिन हो जाने पर भी वो दौड़े क्यों नहीं आए।”
रोनिका, जुगल किशोर को देखने लगी।
“संतसिह हर दूसरे दिन यही कह देता है कि ये बात हुई। वो बात हुई। सच बात तो ये है कि मुझे संतसिह पर ही शक होने लगा है कि वो हमारे साथ कोई गड़बड़ कर रहा है। ”
“कैसी गड़बड़ ?”
“ये तो मैं नहीं जानता ।” जुगल किशोर ने शब्दों को चबाकर कहा-“मेरी बात मानो तो कहूं।”
“क्या ?”
“अपने पापा को तुम खुद फोन करो । बात करो या मुझे कहो कि मैं उनसे बात करूं।”
रोनिका लंबे पलों तक देखती रही जुगल किशोर को फिर उठ खड़ी हुई।
“चलो । हम दोनों चलते हैं। मैं पापा से बात करूंगी फोन पर। यहां एस.टी.डी...कहां है ?”
“बाहर जाकर देखते हैं। हमें ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा ।” दोनों संतसिंह के घर से बाहर निकले।
“तुम्हारी कार ठीक नहीं हुई ?”
“संतसिह कह रहा था कि आज ठीक होकर आ जाएगी। उधर मार्किट नजर आ रही है। वहीं चलते हैं ।”
सोनू भाटिया के दो आदमी, संतसिंह के घर के बाहर टिके हुए थे। उनका काम इतना ही था कि जब संत सिंह के घर से लड़का- लड़की निकले तो उन पर दिखावटी घातक हमला कर दिया जाए ।
उन दोनों ने उन्हें एक तरफ जाते देखा ।
“करें हमला ?" एक ने जेब में हाथ डाला ।
“अभी कुछ आगे जा लेने दे। इन्हें ये शक नहीं होना चाहिए कि हमें मालूम है ये यही ठहरे हैं। इन्हें यही लगे कि हम इनकी तलाश में थे और इन्हें अचानक ही बाजार में देख लिया।”
“अगर हमारी कोई गोली इन्हें लगी तो…।”
“तो भाटिया तेरे सिर में गोली उतार देगा।”
जुगल किशोर की पैंट घुटनों से फटी हुई थी। कंधे पर दर्द हो रहा था। घुटने पर खून की जमी हुई सुर्खी नजर आ रही थी। रोनिका की कोहनी रगड़ से छिली हुई थी । इस वक्त दवा दारू लगाकर दोनों चैन से बैठे थे संत सिंह ने अभी-अभी गरम-गरम कॉफी लाकर दी थी।
दोनों जब बाजार में पहुंचे थे तो उन पर हमला हो गया था । किसी ने उन पर गोलियां चलाई थी। बाल-बाल बचे थे। दोनों और खुद को बचाने के चक्कर में गिरे और चोट खा बैठे। उसके बाद तो जाने कौन-कौन सी गलियों से निकल कर वो वापस संतसिंह के घर तक पहुंच सके थे ।
तब संतसिंह को घर पर मौजूद पाया ।
उसे बताया कि उन पर गोलियां चलाई गई हैं।
"मुझे समझ नहीं आता कि तुम दोनों बाहर गए ही क्यों।” संत सिंह ने झल्लाकर कहा ।
जुगल किशोर और रोनिका खामोश ही रहे ।
“तुम अपने पापा से फोन पर बात करना चाहती थी।" तेज स्वर में संतसिंह कह उठा ।
रोनिका ने सिर हिलाया सहमति से ।
“तुम्हारा बात करना जरूरी था क्या। मैं बात नहीं कर रहा तुम्हारे पापा से।”
रोनिका कुछ नहीं बोली ।
संतसिंह मन ही मन खुद को बुरा बचा महसूस कर रहा था। अगर इसे केशोपुर फोन करने का मौका मिल जाता तो सारी पोल खुल जाती कि वो क्या कर रहा है। दूसरी तरफ से संतसिंह चैन में था कि अब ये दोनों घर से बाहर निकलने की सोचेंगे भी नहीं।
“दो चार दिन ठहर जाओ।” संतसिंह गंभीर स्वर में कह उठा- “तुम्हारे पापा की मजबूरी है कि वो नहीं आ पा रहे और ऐसा कोई मिल नहीं रहा कि जिसे यहां भेजें । वो कह रहे थे एक-दो दिनों में इंतजाम हो जाएगा । अब बाहर निकलने की गलती मत कर बैठना। दरवाजा भीतर से बंद कर लो। मेरी आवाज सुनकर ही दरवाजा खोलना। इस बार तो बच गए। लेकिन दोबारा कहीं बुरा ना हो जाए। उन लोगों ने तुम्हें यहां आते तो नहीं देखा ?”
जुगल किशोर और रोनिका ही नजरें मिली ।
“नहीं ।” रोनिका ने गंभीर स्वर में कहा ।
संतसिंह चला गया ।
जुगल किशोर ने सिगरेट सुलगाई।
रोनिका ने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया ।
“तुम देर से सोच में हो।” रोनिका बोली।
“हां । मैं सोच रहा हूं कि हम पर गोली चलाने वाले कौन हो सकते हैं।”
“कौन क्या…।” रोनिका के होठों से निकला-“वो ही लोग हैं, जो मुंबई में मेरी जान के पीछे…।”
“मैं नहीं मान सकता।” जुगल किशोर ने इन्कार में सिर हिलाया।
“क्या मतलब ?”
“अगर मुम्बई से वो लोग हमारे पीछे थे तो रास्ते में हमें आसानी से घेर सकते थे। कहीं भी तुम्हें खत्म कर सकते थे। लेकिन रास्ते में तो क्या, रथपुर पहुंचे हमें दस दिन हो गए।” जुगल किशोर अपने शब्दों पर जोर देते कह उठा-“दस दिन से हम संत सिंह के मकान के भीतर हैं। हमें इस बात की आहट भी नहीं मिली कि बाहर हमारा कोई दुश्मन मौजूद है। जबकि कोई हमारी ताक में होता, तो दस दिन इंतजार करने की अपेक्षा भीतर आकर हम पर हमला कर देता। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम बाहर निकले तो फौरन हम पर हमला हो गया।”
रोनिका उसे देखती रही ।
“इससे तो एक ही मतलब निकलता है कि, कोई नहीं चाहता कि हम यहां से बाहर निकले।”
रोनिका ने पहलू बदला।
जुगल किशोर होंठ भींचे रोनिका को देख रहा था ।
“तुम कुछ ज्यादा नहीं सोच रहे जुगल ?” रोनिका बोली।
“मैं बिल्कुल ठीक सोच रहा हूं।” जुगल किशोर ने अपने शब्दों पर जोर दिया-“सब कुछ अजीब सा लग रहा है। वो दो थे जिन्होंने हम पर गोलियां चलाई। ज्यादा दूर भी नहीं थे और उनकी एक गोली भी हमें नहीं लगी । जबकि इस तरह हमला करने वाले अनाड़ी नहीं हो सकते। अनाड़ी होते तो भी एक गोली तो लगती। लेकिन नहीं लगी।”
“मैं कुछ नहीं समझ पा रही हूं।”
“मैं ये कहना चाहता हूं कि जिन्होंने हम पर गोलियां चलाई वो मुंबई वाले तुम्हारे दुश्मन नहीं है नया ही रगड़ा है कोई। कोई चाहता है कि हम इसी घर में रहे। बाहर ना निकले।”
रोनिका के होंठ भिंच गए ।
“कोई ऐसा क्यों चाहता है।”
“मैं नहीं जानता।” जुगल किशोर ने रोनिका को देखा-“हो सकता है, कोई नहीं चाहता कि हममें से कोई या तुम अपने पापा से बात करो। शायद तुम अपने पापा से बात ना कर पाओ।”
“ऐसा कौन चाहेगा भला ?”
“संतसिंह के अलावा, यहां पर किसी को हमारे बारे में खबर नहीं।”
रोनिका चौंकीं।
“तुम्हारा मतलब कि संतसिह…।”
“अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।” जुगल किशोर ने टोका- “मैंने तो अपना ख्याल जाहिर किया है।”
“नहीं ।” रोनिका ने सिर हिलाया- “संतसिंह शरीफ आदमी है। इसके बारे में ऐसा मत कहो। वो…।”
“मैंने उसे कुछ नहीं कहा। अपना विचार जाहिर किया है। संतसिह के सामने तुम सामान्य रहना।” जुगल किशोर ने गंभीर स्वर में कहा-“मैं देखूंगा मामला। मुझे लगता है, भारी खतरे में फंसते जा रहे हैं।”
“रोनिका सूखे होठों पर जीभ फेर कर रह गई ।
“तुम इस मामले से बच निकली तो मेरा पच्चीस लाख सलामत मिलेगा मुझे ?”
“हां । विश्वास करो।”
इन हालातों में तो तू मेरे से दस बार ब्याह करने को भी वायदा कर लेगी।
■■
अंधेरा हो चुका था । सोनू भाटिया खुद कार ड्राइव करता, एक गली के किनारे पहुंचा और इंजन बंद करके गली में प्रवेश कर गया। चंद कदम आगे बढ़ा कि ठिठक गया।
गली में अंधेरे का हिस्सा बना, संतसिह खड़ा था। उसने पहचाना ।
“बोल तूने यहां क्यों बुलाया ?” सोनू भाटिया कह उठा।
“बहुत जरूरी काम था।”
“क्या ?”
“तेरी जान खतरे में है भाटिया। मैं तेरे लिए चिंतित हूं कि तू मेरी मुंह बोली बहन का पति है ।”
“क्या मतलब ?”
तभी पीछे से मध्यम सी आहट हुई ।
सोनू भाटिया फौरन पलटा ।
पीछे कल्लू खड़ा हुआ था। उसके हाथ में लोहे की रॉड थी, जो कि उसने पूरी शक्ति के साथ भाटिया के सिर पर दे मारी। भाटिया के होठों से चीख निकली दोनों हाथों से उसने सिर थाम लिया। हाथ सिर से बहते खून से चिप चिपे हो गए । भाटिया को कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला ।
संतसिंह ने हाथ में दबा रखी कलच की तार को फुर्ती से दोनों हाथों में संभाला और भाटिया की गर्दन में लपेट कर, पूरी शक्ति से खींचने लगा
भाटिया तड़पा।
गले से कलच की तार हटाने का असफल प्रयास किया ।
“कल्लू। संतसिंह गुर्राया-“मार साले को।”
कल्लू ने पुनः एक और वार किया, लोहे की रॉड का उसके सिर पर। उधर कलच की तार का बेपनाह खिंचाव उसकी गर्दन पर बढ़ चुका था। आंखे फटती चली गई। हाथ-पैर कांपते हुए बेकाबू होने लगे। वो छटपटाता हुआ नीचे जा गिरा। कुछ ही पलों में उसका शरीर शांत पड़ गया।
संतसिंह गहरी-गहरी सांसे लेता हुआ तार छोड़कर पीछे हटा।
कल्लू लोहे की रॉड थामे हक्का-बक्का का खड़ा था।
“रॉड को साथ ले चल।” संतसिंह बोला- “उंगलियों के निशान साफ करके, यहां से दूर किसी नाले में फेंक देना। चल।”
“ये-ये मर गया।” कल्लू के होठों से घबराहट भरा स्वर निकला।
“पक्का मर गया। निकल ले यहां से।”
उसके बाद दोनों गली से निकले और अंधेरे से भरे फुटपाथ पर आगे बढ़ते चले गए।
सोनू भाटिया की कार वहीं खड़ी रही ।
रास्ते में रॉड पर से उंगलियों के निशान साफ करके, उसे नाले में फेंक दिया था।
“भाटिया के आदमियों को मालूम हो गया कि उसे हमने मारा है तो…।”
“कैसे मालूम होगा।” उखड़े स्वर में संतसिह बोला-“तू बताएगा क्या?”
“मैं…मैं क्यों बताऊंगा।”
“हमने बहुत सफाई से भाटिया को मारा है। किसी को हवा भी नहीं लगेगी।” संतसिंह कड़वे स्वर में कह उठा- “कमीना था भाटिया । पूरी तरह कमीना । छः करोड़ ले रहा था रोनिका के बाप जीवन पाल से रोनिका को वापस करने के लिए और मुझे दे रहा था सिर्फ पांच लाख दे रहा था। सिर्फ पांच लाख, छः करोड़ में से। जबकि रोनिका मेरे पास। सारा प्लान मेरा। बहुत सयाना बन रहा था और मैं ऐसा बढ़िया मौका हाथ लगा है, से नहीं जाने दे सकता था। जिंदगी में पहली बार मौका हाथ लगा है, दो पैसे कमाने का।”
“अब क्या करेगा तू ?”
“मैं संभालूंगा सारा मामला ।” संतसिह दांत भींच कर बोला- “तू फिक्र मत कर । जीवन से माल लेने के बाद हम भाई बनकर रहेंगे मौज करेंगे।”
चलते-चलते कल्लू ने सूखे होठों पर जीभ फेरी ।
“लेकिन…लेकिन ये मामला, तेरी औकात से बड़ा है संतसिंह।”
“मुखिया से बात कर चुका हूं। आधे-आधे पर वो मेरे साथ है मुखिया साथ हो तो फिर क्या नहीं हो सकता।”
“मुखिया ?” कल्लू का मुंह घबराहट से खुला रह गया।
“हां ।माना कि खतरनाक गैंगस्टर है, लेकिन जुबान वाला बंदा है। हर कोई जानता है। इस मामूली से काम के तीन करोड़ उसे मिल जाएं तो, उसके लिए क्या बुरा है।” संतसिंह ने कड़वे स्वर में कहा-“पूरी तरह बात हो चुकी है मुखिया से मेरी। दो दिन पहले ही उसने अपने आदमी केशोपुर में भेज कर अपना जाल फैला दिया है। तू मेरे साथ रह। सारी जिंदगी मजे लूटेगा। ज्यादा देर नहीं लगेगी, जीवन पाल से छः करोड़ आने में मुखिया के सामने तो भाटिया बच्चा था ।उससे मामला गड़बड़ भी हो जाता। अब सब ठीक हो जाएगा।”
■■
मुखिया !
पचास बरस का, गोल-गोल चेहरे वाला सख्त सा दिखने वाला इंसान। सिर के छोटे बाल उसकी सख्ती को और भी उजागर कर रहे थे।रथपुर का माना हुआ गैंगस्टर था। परंतु पुलिस के पास ऐसा कुछ नहीं था कि उसे गिरफ्तार कर सके। वैसे भी पुलिस वालों से खुले दिल से दोस्ती करता था। ऐसे में मुखिया से क्या शिकायत होती किसी को ।
अभी-अभी उसने जीवन पाल का नंबर मिलाया था ।
संतसिंह और कल्लू पास ही खड़े थे ।
भाटिया के मारे जाने की खबर मुखिया को मिल चुकी थी।
“हां।” दूसरी तरफ से जीवन पाल की आवाज सुनते ही मुखिया बोला-“केशोपुर से बोलता है।”
“मुखिया ?”
“मेरे पास है तेरी बेटी। छः करोड़ कैसे पहुंचा रहा है । बहुत देर लगाता है तू।”
“कौन हो तुम ।” जीवन का कठोर स्वर सुनाई दिया- “रोनिका तो किसी भाटिया के पास…।”
“मार दिया भाटिया को। अब तेरी बेटी मेरे पास है। सौदा छः करोड़ में ही होगा । एक करोड़ बढ़ा नहीं रहा। किसी को कानों-कान खबर ना हो कि तू ये सौदा मेरे से कर रहा है। जुबान बंद रखके अपनी बेटी को सेहत का ख्याल रखना।”
उधर से आवाज नहीं आई।
“सुन रहा है क्या ?”
“मेरी बेटी तुम्हारे पास है ?”
“पोस्टर छपवाऊं क्या ?”
“रोनिका से मेरी बात कराओ। मैं विश्वास कर लेना चाहता हूं कि…।”
“विश्वास दिलाने के लिए, तेरी बेटी की लाश भेजूं क्या ? अच्छी तरह गले मिल लेना।”
“रोनिका तुम्हारे पास है तो मुझसे बात कराने से तेरे को क्या एतराज।”
“मैं जुबान पर सौदा करता हूं जीवन पाल। कहकर धोखा नही करता। तेरे पैसे को में बाद में हाथ लगाऊँगा।पहले तू अपनी बेटी का पूरा मेडिकल चेकअप करा लेना। तेरे से हरी झंडी मिलेगी तो छः करोड़ चैक करूंगा। समझा क्या ?”
जीवन पाल के गहरी सांस लेने की आवाज आई ।
“किसी को कानो-कान खबर ना हो। एक बंदा आए। पैसे दे जाए। रोनिका को ले जाए। गलत हरकत मत करना। मेरे आदमी पूरे केशोपुर में फैले, तुम पर नजर रख रहे हैं। नहीं विश्वास तो मेरे खिलाफ हरकत करके देख लो।”
“मैं कोई गड़बड़ नहीं करूंगा।” थका सा सर सुनाई दिया जीवन पाल का ।
“पैसा कब पहुंचा रहा है।”
“पैसा तैयार है। मैं किसी ऐसे इंसान की तलाश कर रहा हूं, जो काम कर सके। मैं नहीं चाहता कि पुलिस को इस बात की खबर लगे और रोनिका की जान खतरे में पड़ जाएं।
“समझदार है। जब तेरा आदमी पैसा लेकर चले तो, मुझे मालूम हो जाएगा। सब काम जल्दी करना।” कहने के साथ ही मुखिया ने रिसीवर रखा और संतसिंह को देखा-“फिक्र मत कर। साला अपनी बेटी को पाने के लिए जल्दी नोट देगा। उसकी बेटी रोनिका को संभाल रखा है ?”
“वो ठीक-ठाक है मेरे घर पर।”
“खिला-पिला कर उसे मोटा कर ।” मुखिया ने दांत फाड़े- “बेटी को देखकर बाप ये न कहे कि वो कमजोर हो गई है। उसे खिलाया-पिलाया नहीं।”
उधर संतसिह इसी तरह जुगल किशोर और रोनिका को टाले जा रहा था कि आज कल में जीवन पाल रोनिका को लेने आने वाला है। संतसिंह कुछ वक्त निकालना चाहता था ।
“पापा को कह दिया था कि उसके यहां होने की बात किसी से ना करें।” रोनिका बोली।
“चिंता मत करो बेटी। मैंने सब समझा दिया था। जैसा तुमने कहा था, मैंने वैसा ही कहा।
■■
बसई का फोन आया देवराज चौहान को ।
“कुछ देर पहले ही आशाराम और प्रमोद सिंह किसी को लेकर आए हैं।” बसई ने कहा ।
“मतलब कि शिकार आ गया ?” देवराज चौहान गंभीर था।
“हां।”
“कहां पर ?”
“इस बार जीवन पाल ने नई पार्टी को अपने फार्म हाउस में रखा है। वहां उससे बात करेगा। उसे बाहर नहीं निकलने देगा और चुपचाप अपने काम के लिए आगे भेज देगा।”
“पार्टी फार्म हाउस पर पहुंच चुकी है ?”
“हां, प्रमोद सिंह और आशाराम सावधानी के नाते उसके साथ हैं।”
“पार्टी कहां की है ?”
“मालूम नहीं ?”
“जीवन पाल वहां पहुंच गया ?”
“नहीं ? लेकिन जल्दी पहुंचने वाला होगा। पार्टी से काम की सौदे की बात करेगा।”
“कुछ और ?”
“नहीं ।”
“फार्म हाउस देखा है तुमने। कभी भीतर गए हो ?”
“एक बार गया था।”
“भीतर के रास्ते मालूम है ?”
“हां।”
“मेरे पास आओ और कागज पर फार्म हाउस के भीतर के सारे रास्ते के बारे में बताओ।”
“अभी आया।”
देवराज चौहान रिसीवर रखा ।
तभी फोन की बेल बजी।
“हैलो।” देवराज चौहान ने रिसीवर उठाया ।
“जीवन पाल फार्म हाउस पर, नये लाए बंदे से बात करने जा रहा है मीरा पाल की आवाज कानों में पड़ी ।
बसई ने बता दिया है।”
“मैंने ही उसे खबर देकर, तुम्हें बताने को कहा था। वो जो भी है, उसे खत्म करना है।”
“है कौन वो ?”
“सोनीपत का खतरनाक बदमाश राजेश कटारा है।” मीरा पाल की आवाज आई ।
“जीवन पाल अभी फार्म हाउस पर जा रहा है।”
“हां । कुछ देर में यहां से चल देगा ।एक फाइनल निपटा रहा है। मैं उसके साथ दूंगी।”
“काम हो जाएगा।”
“फार्म हाउस पर जीवन पाल ने अपने गनमैन भी भेजे हैं। सतर्क रहना, लेने के देने भी पड़ सकते हैं।”
“सलाह देने के लिए धन्यवाद ।” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा-“तुम पच्चीस लाख तैयार रखो।”
“तैयार हैं।”
देवराज चौहान ने रिसीवर रख दिया ।
जगमोहन गंभीर निगाहों से देवराज चौहान को देख रहा था।
“शिकार आ गया ?” जगमोहन बोला।
“हां। सोनीपत का बदमाश है, राजेश कटारा। तुम सोनीपत पुलिस को फोन करके राजेश कटारा के बारे में मालूम करो कि वास्तव में वहां इस नाम का बदमाश है कोई । मैं किसी बेगुनाह को नहीं मारना चाहता।”
जगमोहन फोन की तरफ बढ़ा।
“होटल से नहीं। बाहर से एस.टी.डी. से फोन करो।”
जगमोहन फौरन बाहर निकल गया।
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई। कश लिया। फिर सोच भरे ढंग में चहल कदमी करने लगा। वक्त कम था-जल्दी ही यहां से फार्म हाउस की तरफ निकलना था, जहां जीवन पाल ने पार्टी से बात करनी थी ।
कुछ देर में बसई आ गया ।
“तैयार हो ?” बसई गंभीर था ।
देवराज चौहान शांत भाव में मुस्कुराया ।
“मीरा पाल से मालूम पड़ा है कि जीवन पाल के गनमैन फार्म हाउस पर मौजूद है।” बसई बैठते हुए बोला।
“इस बार तो जीवन पाल अपनी सुरक्षा के इंतजाम पूरे करेगा।” देवराज चौहान ने सोच भरे स्वर में कहा-“तुम कागज पर फार्म हाउस के रास्तों और वहां के बंगले के बारे में सारा ब्यौरा दो। जल्दी करो।”
बसई में जेब से कागज पैन निकाला ।
“जगमोहन कहां है ?”
“आने वाला है। तुम अपने काम की तरफ ध्यान दो।” देवराज चौहान ने आगे बढ़कर सिगरेट को ऐश-ट्रे में डाला- “जिस पार्टी को लाया गया है, वो कौन है। कहां से आई है। उसका नाम ?"
“मीरा पाल से पूछा था। मुझे नहीं बताया उसने। लेकिन जो भी होगा। आशाराम और प्रमोद सिंह किसी खतरनाक को ही लाएंगे। क्योंकि जीवन पाल का काम खतरनाक लोग ही पूरा कर सकते हैं।” कहने के साथ ही बसई कागज पर फार्म हाउस के रास्तों और बंगले की जानकारी भरने लगा।
जगमोहन ने भीतर प्रवेश किया।
“सोनीपत का नामी और खतरनाक बदमाश है राजेश कटारा।” जगमोहन ने कहा-“मैंने पुलिस वाला बनकर पुलिस से बात की। तीन-दिन पहले उसे दो आदमियों के साथ देखा गया । उसके बाद उसके बारे में कोई खबर नहीं।”
बसई सिर उठाकर बोला ।
“वो दो आदमी आशाराम और प्रमोद सिंह ही होंगे जो उसे यहां ले आये।”
“हो सकता है।” जगमोहन ने उसे देखा फिर देवराज चौहान से कहा-“राजेश कटारा इतना खतरनाक माना जाता है कि पुलिस भी उस पर हाथ डालने में कतराती है। दो बार उसे गिरफ्तार किया गया। परंतु बच निकला। बाद में वे पुलिस वाले मारे गए, जिन्होंने उसे गिरफ्तार किया था। सोनीपत का डर है, राजेश कटारा।”
“ऐसे आदमी की जान लेने में कोई बुराई नहीं। देवराज चौहान ने गंभीर स्वर में कहा ।
“फार्म हाउस के लिए यहां से चले ? ” जगमोहन बोला ।
“चल रहे हैं। ” देवराज चौहान ने बसई को देखा-बसई से फार्म हाउस के भीतरी रास्तों की जानकारी ले लें ।
■■
आसमान की ठीक बीचो-बीच ठहरा सूर्य, जानलेवा गर्मी फैला रहा था।
दूर-दूर तक सुनसान और चुप्पी ही नजर आ रही थी हो चुकी थी। बहुत दूर वो गरीब किसान बेलों को हल को साथ बांधे कड़कड़ाती धूप में जमीन पर हांके जा रहा था। जब थक जाता तो बैलों को वहीं छोड़कर पास ही नजर आ रहे छायादार पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगता।
कहीं भी कोई चिड़िया चहकती नजर नहीं आ रही थी।
एक चील , जो आसमान में काफी ऊपर देर से उड़ान भर रही थी। बहुत लंबा चक्कर लेकर वो वापस आ जाती।
यहां जगह-जगह फार्म हाउस बने नजर आ रहे थे। परंतु किसी भी फार्म हाउस पर इस दोपहरी में किसी तरह की हलचल महसूस नहीं हो रही थी।
देवराज चौहान इस वक्त साठ फीट ऊंचे पेड़ पर मोटी डाल का सहारा लिए, हाथ में टेलीस्कोप गन का पर आंख लगाए, कुछ दूरी पर मौजूद फार्म हाउस के भीतर का नजारा देख रहा था। फार्म हाउस पर पूरी तरह चुप्पी छाई महसूस हो रही थी। बंगले की पहली मंजिल पर एक कमरे की खुली खिड़की से भीतर का नजारा बहुत हद तक नजर आ रहा था।
कभी-कभाद जीवन पाल टहलता दिखाई दे जाता। मीरा पाल के भी वहां मौजूद होने की झलक मिली थी। इसके अलावा तीन आदमियों को वहां देख कर समझ गया कि उन्हीं में से कोई उसका शिकार है। अगर शिकार के बारे में मालूम होता तो अब तक उसका निशाना ले चुका होता।
परंतु मालूम नहीं था कि कौन सा उसका शिकार है और कौन आशाराम- प्रमोद सिंह है। इन दोनों को उसने पहले कभी नहीं देखा था। इस स्थिति में देवराज चौहान को आधा घंटा बीत चुका था। आखिरकार देवराज चौहान ने मोबाइल फोन निकाला और बसई से बात की।
“क्या हुआ ?” बसई कि आवाज कानों में पड़ी ।
“मैं पांच लोगों को कमरे में देख रहा हूं। जो बारी-बारी नजर आ रहे है। जीवन पाल और मीरा पाल की पहचान है मुझे। बाकी के तीनों में से कौन राजेश कटारा है, मैं नहीं जानता ।”
“जानता तो मैं भी नहीं। लेकिन मेरी बात सुनकर तुम उसकी पहचान कर सकते हो।”
“बोलो।”
“आशाराम और प्रमोद सिंह को मैंने देखा था कुछ देर पहले फार्म हाउस में। आशाराम ने चैक शर्ट पहनी हुई है और प्रमोद सिंह ने नीली शर्ट। तीसरे ने क्या पहना है ?”
“काले रंग की कमीज ।”
“वो ही तुम्हारा शिकार है, देवराज चौहान।” बसई की आवाज कानों में पड़ी ।
देवराज चौहान के होंठ भिंच गए।
“पक्का ?”
“हां । काली कमीज आशाराम और प्रमोद सिंह में से किसी ने नहीं पहनी।”
देवराज चौहान ने फोन बंद करके जेब में रख लिया ।
आंख पुनः टेलिस्कोप पर लगा दी। उंगली ट्रेगर पर। वो तैयार था निशाना लेने के लिए। परन्तु खिड़की पर कोई भी नजर नहीं आया। टेलीस्कोप पर आंख टिकी रही।
आधा मिनट बीता। खिड़की पर मीरा पाल दिखी। कुछ पल वो खिड़की पर खड़ी रही। फिर वहां से हट गई। जीवन पाल कमरे के भीतर यदा-कदा नजर आ जाता था ।
देवराज चौहान टेलीस्कोप पर आँख टिकाये रहा ।
तभी वो खिड़की पर नजर आया । काली कमीज पहनी थी उसने। चेहरे पर चाकू का पुराना निशान।
खतरनाक चेहरा। शरीफ आदमी उसे देखे तो, खामोशी से बगल से निकलने का ही प्रयास करे।
तभी देवराज चौहान की उंगली हिली ।
टेलिस्कोप में देवराज चौहान ने स्पष्ट देखा उसकी छाती पर छेद होते और खून को बाहर निकलते। काली कमीज होने के कारण खून ज्यादा नहीं चमका। परंतु उसका बहना नजर आ गया था। फिर वो पीछे को पीठ के बल गिरता दिखा। उसका चेहरा बता रहा था कि गिरने से पहले ही, उसकी जान जा चुकी है।
देवराज चौहान ने उसी पल जेब से फोन निकाला और बसई से बात की बसई ने कहा था कि पार्टी के खत्म होते ही उसे फौरन सूचना दे। ये नहीं बताया बसई ने कि ऐसा क्यों ? इतना ही कहा कि इस वक्त बिना कुछ पूछे उसकी बात मान लो। बाद में फायदा ही फायदा है। बसई बराबर हर काम में साथ दे रहा था, इसलिए देवराज चौहान ने उसकी बात मानने में कोई बुराई नहीं समझी ।
“हां।” बसई की आवाज कानों में पड़ी ।
“तुमने कहा था, खबर कर देना।” देवराज चौहान ने सपाट स्वर में कहा ।
“ओह ! काम हो गया ।”
“हां । तुम…।”
“बाकी बातें फिर। तुम सावधानी से नीचे उतरकर कार तक पहुँचो। जगमोहन को भी लेते आना। ” इसके साथ ही उधर से बसई ने फोन बंद कर दिया था।
देवराज चौहान ने फोन बंद करके जेब में डाला और नीचे उस तरफ देखा, जिधर जगमोहन था। वो वहीं खड़ा था । उस खिड़की पर नजर मारी वहां कोई नहीं दिखा। फिर वो गन थामे सावधानी से पेड़ से नीचे उतरने लगा। इस बात का पूरा ध्यान रख रहा था कि पेड़ से हिले नहीं।
■■
जीवन पाल, मीरा पाल, आशाराम और प्रमोद सिंह हक्के बक्के से सामने पड़ी लाश को देख रहे थे। मीरा पाल की आंखों में न नजर आने वाली चमक थी। और जीवन पाल की आंखों में दरिंदगी के भाव नाच रहे थे । दांत भिंच चुके थे ।
आशाराम और प्रमोद सिंह हक्के-बक्के, गुस्से से भरे काली कमीज वाले की लाश को देखे जा रहे थे। आंखों में अविश्वास था कि यहां पर कोई इसका कैसे निशाना ले सकता है ।
“खिड़की बंद करो।” जीवन पाल गुर्राया- “गोली उधर से ही आई है। लेकिन फार्म हाउस से बाहर से चलाई गई है। कोई भीतर आने की हिम्मत नहीं करेगा।”
प्रमोद सिंह सावधानी से आगे बढ़ा और खिड़की के पल्ले बंद कर दिए।
“हैरानी की बात है कि मैं जिसे भी अपने काम के लिए तैयार करता हूं उसे कोई गोली मार देता है। बाहरी आदमी को कैसे पता चल सकता है कि मैं कुछ कर रहा हूं। वो ठीक मौके पर कैसे पहुंचकर उस आदमी का निशाना ले लेता है, जिसे मैं काम के लिए तैयार करता और तो और मेरे दुश्मन को भी मालूम होता है कि मैं कहां पर, कितने बजे मुलाकात कर रहा हूं।”
“गोली चलाने वाला बाहर ही होगा। उसे पकड़ा जा…। ”आशाराम ने कहना चाहा।
“कोई जरूरत नहीं। ”जीवन पाल ने खा जाने वाली निगाहों से आशाराम को देखा-“जो यहां तक आकर गोली मारने की सोचेगा, वो निकल जाने का रास्ता पहले ही तैयार रखेगा ।”
“ऐसा कब तक चलेगा।” प्रमोद सिंह के उठा- “कोई हमारे इंतजाम की आदमियों को मारता…। ”
“एक बात आपने किसी को भी नहीं बताई।” मीरा पार गंभीर स्वर में कह उठी-“कि आप किसी आदमी को अपने काम के लिए तैयार करा कर, उससे क्या काम लेना चाहते…।”
“तुम बारहवीं बार ये सवाल पूछ चुकी हो।” जीवन पाल ने उसे धूरा-“जबकि मैं ये सवाल ही सुनना नहीं चाहता। ये मेरी पर्सनल बात है। इससे तुम्हें कुछ भी लेना-देना नहीं।”
मीरा पाल ने मुस्कुराकर सिर हिलाया ।
“नाराज क्यों होते हो। मैंने तुमसे जोर जबरदस्ती नहीं की। तुम नहीं बता रहे तो यकीनन न बताने लायक ही बात होगी ।”
“पाल साहब ।” प्रमोद सिंह बोला-“आप…।”
तभी जीवन पाल के मोबाइल पर फोन की बेल बजी। उसने जेब से फोन निकाला और उसकी स्क्रीन पर चमकते नंबर को देखा। कुछ पलों तक उस नंबर को देखता रहा है ।
“हैलो ।” फिर उससे बात की ।
“जीवन पाल ।” बसई का स्वर कानों में पड़ा।
“हां।” होंठ भिंच गए जीवन पाल के।
“समझदारी तो इसी में है कि हममें जो बात हो, उसका आभास तेरे पास खड़े आशाराम, प्रमोद सिंह तेरी बीवी को भी ना हो।वरना नुकसान तेरा ही होगा।” बसई की आवाज में सख्ती थी ।
“बोल ।”
“तू अपने काम के लिए जितने भी बन्दों का इंतजाम करेगा,वो इसी तरह मरते रहेंगे।”
जीवन पाल के होंठ भिंच गए ।
“कहता रह।”
“हम तेरे कष्टों को दूर कर देंगे।”
“तो एक से ज्यादा हो तुम लोग।”
“सुनता रह अगर मेरी बात पसंद हो तो मानना, नहीं तो नहीं । तेरे सारे काम हो जायेंगे। हम करेंगे। उससे पहले तू अपने सामने खड़े तीनों को बोल दे कि अब तेरे को किसी बंदे का इंतजार नहीं करना। ये मामला यहीं खत्म।”
“ऐसा क्यों ?”
“ क्योंकि हमें काम देने वाला इन तीनों में से ही कोई एक है।” बसई की आवाज कानों में पड़ी ।
जीवन पाल के होंठ भिंच गए ।
“समझा क्या ?”
“समझ गया।”
“अब क्या करेगा तू ।”
“जो तुमने कहा।”
“तो तीनों को फार्म हाउस से निकाल दे। तू वही रहना। बेशक रात हो जाए। वही रहना। गनमैनों को भी चलता कर दे। सब ठीक पाया तो हम तेरे से आकर मुलाकात करेंगे।”
“मंजूर है।” जीवन के दांत भिंच गए।
दूसरी तरफ से बसई ने फोन बंद कर दिया था।
जीवन पाल ने फोन जेब में रखा चेहरे पर गंभीरता थी।
“किसका फोन था। ”मीरा पाल कह उठी ।
जीवन पाल ने तीनों को देखा फिर कुर्सी पर बैठता हुआ बोला।
“तुम लोग जाओ। मुझे अकेला छोड़ दो।”
“क्या मतलब ?” मीरा पाल के होठों से निकला- “फार्म हाउस पर आपका अकेला रहना ठीक नहीं। आप…।”
“गनमैन तो है यहां ।” प्रमोद सिंह के उठा ।
“उन्हें भी यहां से जाने को कह दो।” जीवन पाल ने कहा और सिगरेट सुलगा ली-“इसकी लाश को यहां से उठाकर, केशोपुर से बाहर फेंक देना। ”
“लेकिन बात क्या है आप क्या…।” मीरा पाल ने कहना चाहा ।
“अभी कोई सवाल मत पूछो। बाद में तुम्हारी बात का जवाब दूंगा।”
तभी आशाराम ने पूछा- “किसी और का इंतजाम करें पाल साहब। इस बार हम और भी सतर्कता…।”
“रहने दो। मैं ये मामला यहीं खत्म कर देना चाहता हूं।” जीवन पाल ने गहरी सांस लेकर कहा-“कोई हाथ धोकर पीछे पड़ा है कि मैं जो काम करना चाहता हूं वो ना कर पाऊं। सुदर्शन सेठी की हरकत हो सकती है ये। विश्वास के साथ कुछ नहीं कह सकता। यही सोचा है मैंने कि अपनी कोशिश को यहीं छोड़ दूं।”
“आप तो हार मान रहे हैं।” आसाराम तेज स्वर में कह उठा- “एक मौका और दीजिए। हम…।”
जीवन पाल ने इनकार में हाथ उठाकर हिलाया ।
“नहीं । मैं ये बात यहीं खत्म कर देना चाहता हूं । इस लाश को उठाकर ले जाओ।”
■■
मीरा पाल बंगले पर पहुंची ही थी कि फोन की बेल बजी। चेहरे से वो भारी तौर पर हुई थी कि जीवन पाल को उस वक्त किसका फोन आया। ऐसा उसे क्या कहा गया कि उसका व्यवहार बदल गया। वो वहां फार्म हाउस पर क्यों रुक गया और सबको वहां से क्यों वापस भेज दिया ।
“हैलो।”मीरा पाल ने उलझन में डूबे रिसीवर उठाया।
“मैडम।” बसई की आवाज आई-“काम हो गया है ।”
“हां।” मीरा पाल के होंठ हिले।
“वो पच्चीस लाख के लिए कह रहे हैं।”
“खान से ले लेना। अभी फोन कर देती हूं।” मीरा पाल सोच में डूबी बोली-“और देवराज से कह देना कि अब उसकी जरूरत नहीं। फिर कभी जरूरत पड़ती तो याद करूंगी।”
“मतलब कि मामला खत्म ?”
“हां।”
“यानी कि देवराज चौहान कोई दूसरा काम पकड़ ले। ”
“ओ.के. मैडम। मैं अभी देवराज चौहान से कह देता हूं। खान से पच्चीस लाख ले लूंगा।”
“एक काम करना बसई।”
“क्या मैडम ?”
“जीवन पाल फार्म हाउस पर है। वो वहां किसी से मिलने वाला है। तुम बता सकते हो कि वो किससे मिला ?”
“मैं अभी फार्म पर नजर रखनी शुरू कर देता हूं। जो भी पाल साहब से मिलने आएगा ।उसके बारे में मालूम कर लूंगा।”
“मुझे फौरन खबर करना।”
“पक्का मैडम ।”
मीरा पाल ने रिसीवर रखा।चेहरे पर गंभीरता थी।
तभी दरवाजा थपथापहट हुई।
“आ जाओ ।” मीरा पाल ने दरवाजे की तरफ देखा ।
दरवाजा खुला। वहां लेखा खड़ा दिखाई दिया ।
मेरा पाल के होठों पर मुस्कान फैल गई ।
“मालकिन ।” लेखा ने शांत स्वर में कहा-“किसी चीज की जरूरत तो नहीं ?”
“है।” उसकी मुस्कान गहरी हो गई ।
“हुकुम कीजिए।”
“तुम्हारी जरूरत है । जीवन के आने में वक्त है। मेरी सारी थकान तुमने दूर करनी है।”
लेखा ने भीतर आकर दरवाजा बंद किया और मेरा पाल के पास जा पहुंचा ।
“अब तो मालूम हो गया कि असली औरत क्या होती है। ” मीरा पाल हौले से हंसी ।
बिना कुछ कहे लेखा उसकी साड़ी उतारने लगा ।
“पसीने से भरी हुई हूं । नहा तो लेने दो। ”
“अब नहीं रुक सकता।” लेखा ने सपाट स्वर में कहा । उसके हाथ, उसके कपड़े उतारते रहे ।
मीरा पाल के हाथ उसके शरीर पर जा टिके थे ।
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देवराज चौहान और जगमोहन की आंखें मिली ।
“मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा देवराज चौहान । ” बसई कह उठा-मीरा पाल को अब तुम्हारी जरूरत नहीं। वो तुमसे अपना काम करवा चुकी है। अब तुम कोई भी काम करने को आजाद हो। माना कि तुम मीरा पाल के लिए काम कर रहे थे। परंतु ये बात कहां लागू होती है कि जीवन पाल के लिए काम नहीं कर सकते। ”
देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई।
जगमोहन सिर खुजलाने लगा ।
“जीवन पाल परेशान हुआ पड़ा है उसका काम नहीं हो रहा। ऐसे में अब वो मुंह मांगी रकम देगा, काम करने के लिए ।”
“तुम बाद में यही बात बताने को कह रहे थे ?” जगमोहन बोला ।
“हां । और इस बार इस काम की कमीशन भी लूंगा।” बसई ने सिर हिलाया-“मेरा हक बनता है।”
“मेरे ख्याल में ये ठीक नहीं होगा कि मेरा पाल का काम खत्म होते ही, जीवन पाल का वो काम हाथ में लिया जाए, जिसे रोकने के लिए, मीरा पाल ने हमसे काम लिया।” देवराज चौहान बोला ।
बसई की अपेक्षा, जगमोहन कह उठा ।
“मीरा पाल कह चुकी है कि उसे अब हमारी जरूरत नहीं। हम उसके खूंटे से नहीं बंधे। उसका काम पूरा कर दिया। अब किसी और को हमारी जरूरत है और वो तगड़ी कीमत दे सकता है तो, हमें अपने नोट बनाने चाहिए।”
“फंसा हुआ है जीवन पाल। तगड़े नोट देगा।” बसई ने फौरन कहा ।
“पहले पता तो चले कि काम क्या करवाना चाहता है? ” जगमोहन बोला-“तुम्हें नहीं पता।”
“नहीं। फार्म हाउस पर हमारा इंतजार कर रहा है।”
“गनमैनों सहित सब जा चुके हैं। उससे बात की जा सकती है । मेरे ख्याल में तो सौदा पटने में कोई दिक्कत नहीं आएगी।”
जगमोहन ने देवराज चौहान से कहा ।
“जीवन पाल का काम करने में तुम्हें तो कोई एतराज नहीं।”
“नहीं।” देवराज चौहान ने गंभीर स्वर में कहा-“लेकिन जीवन पाल से उसके फार्म हाउस पर मिलने में खतरा भी हो सकता है। उसके गनमैन हमारे लिए वहां छिपे हो सकते हैं।
“हां। जगमोहन ने सिर हिलाया-“ऐसा हो सकता है।” कहकर उसने बसई को देखा।”
“ये खतरा तो उठाना ही पड़ेगा।” बसई ने देवराज चौहान को देखा-“तुम बताओ, इन हालातों में क्या किया जाए ?”
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फोन की बेल बजते ही जीवन पाल ने बात की-
“हैलो।”
“पहचाना ।” बसई की आवाज उसके कानों में पड़ी।
“मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।” जीवन पाल शब्दों को चबाकर कह उठा ।
“मैंने तुम्हें कहा था कि फार्म पर कोई गनमैन आ रहे।” बसई की आवाज में सख्ती आई ।
“मैंने सबको भेज दिया।”
“अगर तुम चलाकी कर रहे हो कि हमें गनमैनों द्वारा शूट करा…।”
“गलत मत कहो। बल्कि मैं तो सोच रहा हूं कि यहां अकेला रह कर मैंने गलती तो नहीं की। तुम लोग मेरे दुश्मन के भेजे हुए भी हो सकते हो। मुझे अकेला पाकर मेरी जान…।”
“फार्म हाउस पर इस वक्त कौन-कौन है ?”
“एक दरबान । तीन अन्य नौकर। कुल चार।”
“हम तुमसे बात करने आ रहे हैं। सौदा पटाने। जान लेने नहीं। तुम बाहरी गेट पर पहुंचो।”
“क्यों ?”
“हम आ रहे हैं । हमारा स्वागत नहीं करेगा क्या ?” बसई ने ठंडे स्वर में कहा- “किसी भी तरह की चालाकी मत दिखा देना वरना, केशोपुर वाले कल तेरी शव यात्रा में शामिल होंगे।”
“तुम आओ। मैं तुम लोगों के स्वागत के लिए मौजूद रहूंगा।” जीवन पाल ने शब्दों को चबाकर गंभीर स्वर में कहा।
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