पिता का निधन
शनिवार, 3 जनवरी, 1903 की सुबह ऑस्ट्रिया का लिओडिंग शहर जब सर्दी में ठिठुर रहा था। उस समय 65 वर्ष के एलोइस हिटलर टहलने के लिए निकले और अपनी पसंद की एक सराय में रुक गए, जहाँ उन्होंने कुरसी खींची और एक गिलास शराब माँगी। शराब आने से पहले ही वह गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई। हिटलर, जो उस समय 13 वर्ष का था, अपने पिता की निर्जीव देह को देखकर टूट गया और रोने लगा। लिओडिंग के उस छोटे से चर्च में उसके पिता की शोक-सभा में बहुत लोग जमा हुए। पास के लिंज शहर में एक अखबार में उनके निधन की सूचना छपी, जिसमें यह वाक्य शामिल था—‘‘उनके होंठों से कभी-कभी निकले कठोर शब्द उस जोशीले दिल को झुठला नहीं सके, जो उस हट्टे-कट्टे जिस्म के नीचे धड़कता था।’’
एडोल्फ के लिए अब कोई रूखे लफ्ज नहीं होंगे और उसके पिता के साथ अब कोई बहस नहीं होगी। विशेषकर उसकी जीविका चुनने के विषय पर। हिटलर के पिता की जिद थी कि उसे भी उनकी तरह सरकारी सेवा में जाना चाहिए; लेकिन किशोर हिटलर का सपना एक महान् कलाकार बनने का था। हिटलर अब अपने पिता के कठोर शब्द-बाणों और उनकी धौंस एवं तानाशाही से मुक्त हो गया था। वास्तव में किशोर वय एडोल्फ अब पूरे परिवार का मुखिया था और उन दिनों उस हैसियत को कुछ अहमियत दी जाती थी।
जहाँ तक आर्थिक स्थिति का संबंध है, उसके पिता ने हिटलर परिवार के निर्वाह के लिए काफी कुछ छोड़ा था, हिटलर की माँ को अपने पति की आधी पेंशन मिली और निधन संबंधी अन्य लाभ भी प्राप्त हुए। एडोल्फ को हर माह एक छोटी सी रकम मिलने लगी और विरासत में भी कुछ हिस्सा मिला। परिवार के पास लिओडिंग में एक घर भी था, जिसका मूल्य अधिकतर नकद चुका दिया गया था।
सुविधा के लिए हिटलर लिंज में लड़कों के छात्रावास में रहने चला गया, जहाँ वह टेक्नीकल हाई स्कूल में पढ़ाई कर रहा था। ऐसा करने से उसका लिओडिंग के रोजाना जाने-आने का काफी समय बच गया। सप्ताह के अंत में वह अपनी माँ के पास लौट आता था।
छात्रावास चलानेवाली महिला के अनुसार, हिटलर एक व्यग्र बेढंगा-सा लड़का था, जो अपना अधिकांश समय पढ़ने और चित्रकारी में बिताता था। हालाँकि हिटलर को पढ़ने का शौक था, लेकिन स्कूल में उसका व्यवहार एक आलसी, असहयोगी छात्र जैसा था।
हिटलर के हास्यास्पद, परस्पर विरोधी, अपमानजनक एवं तर्कपूर्ण जवाबों से शिक्षक परेशान हो जाते थे और उन लड़कों को मजा आता था, जो कभी-कभी उसकी वाहवाही करते थे। वह कक्षा में कॉकरोच छोड़ देता था, फर्नीचर इधर-उधर कर देता था और अध्यापक जो कहते थे, उसका उलटा करके कक्षा में उलझने पैदा कर देता था।
वर्षों बाद फ्यूहरर का खिताब पाने के पश्चात् भी हिटलर स्कूल में की गई अपनी शरारतों को याद करता था और विश्व युद्ध लड़ते समय भी वह उन शरारतों के किस्से शीर्षस्थ सेनानायकों को सुनाया करता था।
हिटलर सिर्फ अपने इतिहास के अध्यापक डॉ. लियोपोल्ड पोत्श का आदर करता था। वह बीते युग के जर्मनवासियों की जो वीरगाथाएँ सुनाते थे, उनमें हिटलर की दिलचस्पी बनी रहती थी। अपनी किशोरावस्था के आरंभ से ही हिटलर को कला एवं वास्तुशिल्प के साथ-साथ जर्मन राष्ट्रवाद में गहरी रुचि थी।
किशोर हिटलर ने अपनी सारी उम्मीदें एक महान् कलाकार बनने के सपने में सँजो रखी थीं, विशेषकर जब हाई स्कूल में उसकी कुछ कर दिखाने की संभावनाएँ फीकी पड़ने लगी थीं। कुछ अध्यापक भी चाहते थे कि उसे स्कूल से निकाल दिया जाए, क्योंकि वे उसकी शरारतों से तंग आ गए थे।
एक शिक्षक ने बाद में याद करते हुए कहा, ‘‘लड़कपन में हिटलर सलाह या फटकार के बदले विद्वेष के साथ प्रतिक्रिया करता था। इसके साथ ही वह अपने सहपाठियों से अपेक्षा करता था कि वे बिना शर्त उसकी चापलूसी करें, उसकी बात मानें; क्योंकि वह खुद को एक नेता के रोल में देखता था। इसके अलावा वह बहुत सी ऐसी छोटी-मोटी शरारतें किया करता था, जो आमतौर पर अपरिपक्व लड़के किया करते हैं।’’
मई 1904 में, 15 साल की आयु होने पर, एडोल्फ हिटलर को लिंज गिरजाघर में—धार्मिक संस्कार के अंतर्गत कैथोलिक मतानुयायी स्वीकार कर लिया गया। किशोरावस्था में उसने कभी पुरोहित बनने की बात सोची थी। लेकिन जब वह परिपक्व हुआ, उसे अपने धर्म में कोई रुचि नहीं रही और इस कदर ऊब गया कि धार्मिक समारोहों में बुलाए जाने पर भी वह उनमें शामिल होने की परवाह नहीं करता था।
इसके कुछ ही समय बाद हिटलर ने लिंज हाई स्कूल छोड़ दिया। एक नकली परीक्षा में उसे फ्रेंच में उत्तीर्ण होने लायक अंक इस शर्त पर दिए गए कि वह स्कूल में वापस नहीं आएगा। सितंबर 1904 में उसे लिंज से 25 मील दूर ‘स्टिमर’ नाम के एक छोटे से शहर में स्थित एक दूसरे हाई स्कूल में दाखिला ले लिया। वहाँ वह छात्रावास में रहने लगा। उसके साथ एक और लड़का भी उसके कमरे में रहता था। वे दोनों कभी-कभी चूहों का शिकार करके अपना मन बहलाया करते थे।
हिटलर को नए स्कूल में पहले सेमिस्टर (छमाही परीक्षा) में बहुत खराब अंक प्राप्त हुए। वह गणित, जर्मन और फ्रेंच में फेल हो गया तथा हस्तलेख में भी उसे घटिया ग्रेड मिला। दूसरे सेमिस्टर में उसने बेहतर प्रदर्शन किया और उसके इस सुधार को ध्यान में रखते हुए उसे बताया गया कि अगर वह पतझड़ के मौसम (फॉल) में पहले एक विशेष परीक्षा में बैठ जाए तो हो सकता है, वह डिग्री हासिल कर ले। किंतु, ग्रीष्म के दौरान, हिटलर को फेफड़ों से खून आने की बीमारी हो गई, जो उसे विरासत में मिली थी।
उसकी सेहत ठीक हो गई और सितंबर 1905 में उसने परीक्षा पास कर ली, जिसका उसने अपने सहपाठियों के साथ शराब पीकर जश्न मनाया। वह नशे में इतना धुत हो गया कि अगली सुबह ग्वालिन ने उसे सड़क के किनारे पड़ा पाया। इसके बाद उसने शराब से तौबा कर ली और फिर कभी शराब नहीं पी।
लेकिन हिटलर डिप्लोमा पाने के लिए अंतिम परीक्षा देने नहीं आया। उसने खराब स्वास्थ्य का बहाना बनाकर सोलह साल की उम्र में स्कूल छोड़ दिया, जहाँ उसे फिर कभी लौटकर नहीं आना था। उसके बाद उसने जो कुछ सीखा, खुद सीखा। उसने पढ़ने का शौक जारी रखा और अपने ही अर्थ लगाता रहा। उसकी अपनी सपनों की रची वास्तविकता थी और अपनी ही बनाई हुई सच्चाई थी।
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