हत्प्राण के मुंह से निकली आखिरी आवाज, उस हृदय-विदारक चीख, ने काफी लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया था । उस इमारत की और आस-पास की इमारतों की खिड़कियां पट पट करके खुलने लगी थी । सड़क पर लोग जमा होने लगे थे ।
यादव ने नीचे पहुंचते ही सबसे पहले यही मुआयना किया था कि वह जिंदा था या मर चुका था ।
वह मर चुका था ।
जो गत उसकी बनी थी, उसमें उसका जिन्दा रह पाना सम्भव ही नहीं था ।
उसकी आंखें फटी हुई थीं और जुबान बड़े वीभत्स ढंग से मुंह से बाहर लटक रही थी ।
अब मैं उसकी कल्पना मंजुला के हत्यारे के रुप में कर रहा था ।
जरूर वही मंजुला का हत्यारा था ।
अगर ऐसा न होता तो पुलिस का नाम सुनते ही उसके छक्के क्यों छूट जाते और वह वहां से भाग क्यों खड़ा होता ?
मैंने यादव पर अपना विचार प्रकट किया ।
यादव ने बड़ी गंभीरता से सहमति में सिर हिलाया ।
फिर मैंने और यादव ने मिलकर उसे सींखचों से उतारने की कोशिश की लेकिन हम कामयाब न हो सके ।
“सीख कबाब” - हमें अपने पीछे से आवाज आई ।
हम घूमे ।
पीछे वही आदमी खड़ा था जिसने हमारे लिए दरवाजा खोला था और जो जानी के नाम से पुकारा गया था ।
“क्या ?” - यादव बोला ।
“आप लोग इसे सींखचों से उतारने की कोशिश कर रहे थे” - वह बोला - “तो मुझे सीख कबाब याद आ रहे थे ।”
“क्या बकता है ?” - यादव भड़का ।
जानी ने लापरवाही से कन्धे झटकाये ।
“यह सैमुअल जोन्स ही है न ?” - मैंने पूछा ।
जानी ने सहमति में सिर हिलाया ।
“यह भागा क्यों ?” - यादव ने पूछा ।
“मुझे क्या पता ?”
“तुम कौन हो ?”
“मैं इसका साथी हूं । मौर्य के बैंड में इसके साथ ड्रम बजाता हूं ।”
“तुम यहीं रहते हो ?”
“नहीं, बॉस ।”
“ऊपर से जाकर एक बड़ी-सी चादर लाओ ।”
वह सहमति में सिर हिलाता हुआ वहां से चला गया ।
मेरा ध्यान सैमुअल की सूरत की तरफ गया ।
वह लगभग पैंतीस साल का सूरत से काला लेकिन अच्छे नयन-नक्श वाला आदमी था और विशालदत्त और अचरेकर नामक उन दो नमूनों से कहीं बेहतर था जिनसे हम अभी मिलकर आ रहे थे ।
वही सूरत मैं उन रिकार्डस की जैकेट्स पर देख चुका था जो मंजुला के फ्लैट से बरामद हुए थे ।
“क्या हो गया, भाई साहब ?” - बाहर सड़क से किसी ने आवाज लगाकर पूछा ।
“अन्धे हो ?” - यादव भुनभुनाया - “दिखाई नहीं देता ।”
फिर कोई कुछ न बोला ।
सैमुअल सूट पहने था और ताजा-ताजा नहा-धोकर तैयार हुआ मालूम होता था । जरूर वह कहीं जाने की तैयारी में था जब हम लोग वहां पहुंचे थे ।
यादव ने उसकी जेबें टटोलनी आरम्भ की ।
उसके कोट की भीतरी जेब में से एक लम्बा लिफाफा बरामद हुआ । उस लिफाफे को यादव ने खोला तो पाया कि भीतर एक पोलिथीन की थैली थी जिसका मुंह स्टेपल से बन्द किया हुआ था । उस थैली के भीतर एक सफेद पाउडर मौजूद था ।
यादव ने थैली का मुंह खोला । उसने थोड़ा-सा पाउडर अपनी चुटकी में लेकर उसको सूंघा ।
“सत्यानाश !” - वह फौरन बोला - “यह तो हेरोइन है । प्योर । अनकट ।”
“अच्छा ।”
“मुझे इसकी खूब पहचान है । इस थैली में कम से कम पच्चीस हजार रुपये का माल है ।”
मेरे मुंह से सीटी निकल गई ।
“तो यह वजह थी इसके फ्लैट से यूं एकाएक भागने की कोशिश करने की” - मैं बोला - “यह इसलिए नहीं भागा था क्योंकि इसने मंजुला का कत्ल किया था ।”
“दोनों बातें भी हो सकती हैं” - यादव बोला - “यह डोप पैडलर होने के साथ हत्यारा भी हो सकता है । इसकी पिछली रात की करतूत के बारे में तो हमें मालूम होते-होते होता, लेकिन हेरोइन तो इसके पास अभी इसकी जेब में मौजूद थी ।”
मैं खामोश रहा ।
“पुलिस के नाम से ही इसके छक्के छूटे थे । यह जरूर यही समझा था कि पुलिस नारकाटिक्स की फिराक में इसके फ्लैट पर आई थी । अगर सिर्फ कत्ल वाली बात होती तो यह यूं आनन-फानन भागता नहीं । इसका यह कोशिश करना कि यह नारकाटिक्स के साथ पकड़ा न जाये यही साबित करता है कि यह इस सिलसिले में पहले भी पुलिस के फेर में पड़ चुका है । कत्ल का सबूत इसकी जेब से तो नहीं बरामद होने वाला था । लेकिन हेरोइन की इसके पास से बरामदी इसके खिलाफ ओपन एण्ड शट केस होता और यह जेल जाता ही जाता ।”
“आई-सी ।” - मैं बोला । मैं सोच रहा था कि काश वह जिन्दा होता और अपने मुंह से कबूल करता कि मंजुला की हत्या उसने की थी ।
तभी जानी एक बड़ी-सी सफेद चादर के साथ वापिस लौटा । हमने चादर सैमुअल के जंगले पर टंगे शरीर पर डाल दी और चादर के किनारों को जंगले पर इस प्रकार उड़स दिया कि वह उड़ न सके ।
“ऊपर टेलीफोन है ?” - यादव ने जानी से पूछा ।
जानी ने सहमति में सिर हिलाया ।
“चलो ।”
हम तीनों वापिस ऊपर सैमुअल के फ्लैट में पहुंचे ।
जानी ने एक कोने में पड़े टेलीफोन की तरफ इशारा कर दिया और एक कुर्सी पर ढेर हो गया ।
यादव ने सबसे पहले हैडक्वार्टर फोन करके वहां हुए हादसे की सूचना दी ।
फिर उसने दो-तीन जगह और फोन किया । उसकी सूरत से लगता था कि कहीं भी उसका काम नहीं बना था । हर जगह उसने यही कहा कि वह सैमुअल के टेलीफोन नंबर पर - जोकि उसने डायल पर से पढ़ा था - मौजूद था और अगर अगले एक घण्टे में संबन्धित व्यक्ति से सम्पर्क हो तो उसके द्वारा वहां उसे फोन करवा दिया जाए ।
उसने रिसीवर टेलीफोन पर पटका और जानी के सामने आ खड़ा हुआ ।
“इधर मेरी तरफ देखो” - वह कर्कश स्वर में बोला ।
जानी ने सिर उठाया ।
“अगर अपनी खैरियत चाहते हो तो जो मैं पूछूं उसका सच-सच जवाब देना । समझे ?”
“समझा, बॉस” - वह दबे स्वर मे बोला - “क्यों नहीं समझा ?”
“सबसे पहले तुम इसी बात का जवाब दो कि तुम अपनी खैरियत चाहते हो या नहीं ।”
“चाहता हूं । कौन नहीं चाहता ?”
“शाबाश । अब यह बताओ कि क्या तुम्हें मालूम था कि सैमुअल डोप पैडलर था ।”
वह खामोश रहा ।
“यानी कि” - यादव कहर-भरे स्वर में बोला - “तुमने गलत कहा था कि तुम अपनी खैरियत चाहते थे । तुमने मेरे पहले ही सवाल का गलत जवाब दिया था ।”
“मुझे मालूम था” - वह जल्दी से बोला ।
“क्या मालूम था ?”
“कि वह हेरोइन के धन्धे में था ।”
“और तुम भी इस धन्धे में उसके सहयोगी थे ।”
“नहीं । बाई जीसस, नहीं । मैं तो सिर्फ एक ड्रमर हूं और सिर्फ बैंड में उसका सहयोगी हूं, बॉस ।”
“लेकिन तुम्हें उसके दूसरे धन्धे की खबर थी ?”
“यस, बॉस ।”
“कैसे खबर थी ?”
“वह खुद बताया करता था । कई बार वह मुझे सफेद पाउडर की एक पुड़िया-सी दिखाता था और बताता था कि सिर्फ उतनी-सी पुड़िया पांच हजार का माल था, दस हजार का माल था ।”
“उसके पास हेरोइन आती कहां से थी ?”
“मुझे नहीं पता ।”
“वह उसे बेचता कहां था ?”
“मुझे यह भी नहीं पता ।”
यादव ने आंखें निकालकर उसे घूरा ।
ऑफिसर” - वह भयभीत भाव से बोला - “दिस इज गाडस ट्रुथ ।”
“वह खुद नारकाटिक्स का नशा करता था ?”
“यस, बॉस ।”
“तुम करते हो ?”
“नहीं । नैवर, सर ।”
“तुम उसके धन्धे के बारे में कुछ नहीं जानते हो ?”
वह कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला - “मेरे ख्याल से यह धन्धे की बात थी ही नहीं । सैमुअल फेमस म्यूजीशियन था और वैसे ही अच्छे पैसे कमाता था । इसके कई रिकार्डस बन चुके हैं जिनकी इसको नियमित रायल्टी मिलती थी । मेरे ख्याल से नारकाटिक्स के बखेड़े में तो यह सिर्फ इसलिए फंसा हुआ था
क्योंकि यह खुद नशेबाज था । यह डीलर और कन्ज्यूमर के बीच की कड़ी था और यह रोल अदा करने की इसे यह उजरत हासिल होती थी कि इसे अपने इस्तेमाल के लिये हेरोइन सहूलियत से मिल जाती थी ।”
“या शायद इसी बिना पर इसे ब्लैकमेल किया जा रहा हो” - मैं बोला - “और यह काम इससे जबरदस्ती कराया जा रहा हो - इस धमकी के साथ कि अगर वह यह काम नहीं करेगा तो हेरोइन
की इसकी अपनी सप्लाई बन्द कर दी जायेगी ।”
“हो सकता है ।”
“यह कभी पुलिस के फेर में नहीं पड़ा ?” - यादव ने पूछा ।
“दो बार पड़ चुका है” - जानी ने बताया ।
“हेरोइन के ही सिलसिले में ?”
“हां । पुलिस को पता नहीं कैसे कहीं से टिप मिली थी कि वह नारकाटिक्स के धन्धे में दखल रखता था । पहली बार तो पुलिस सिर्फ पूछताछ ही करके चलती गई थी । लेकिन दूसरी बार यहां की बाकायदा तलाशी हुई थी और सैमुअल को डोप पैडलिंग के सन्देह की बिना पर गिरफ्तारी की भी धमकी मिली थी ।”
“दोनों बार पुलिस तुम्हारे सामने आई थी ?”
“यस, बॉस ।”
“दूसरी बार कब आई थी पुलिस ?”
“एक हफ्ता पहले ।”
“सैमुअल पर पुलिस की उस धमकी का क्या असर हुआ था ?”
“वह बहुत भयभीत हुआ था ।”
“लेकिन हेरोइन रखने से बाज तो फिर भी नहीं आया था ।”
“इसी से लगता है” - मैं बोला - “कि वह फंसा हुआ था ।”
यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।
अब पुलिस का नाम सुनते ही सैमुअल का भाग खड़ा होना कोई रहस्य नहीं रहा था । हेरोइन की पुड़िया उसकी जेब में थी और पुलिस की धमकी की तलवार उसके सिर पर लटक रही थी, वह एकदम ऐसा बौखलाया था कि यह उसे सूझा ही नहीं था कि पुलिस किसी और चक्कर में भी उसके पास आ सकती थी । उस वक्त जरूर उसके मन में सिर्फ एक ही बात थी कि हेरोइन के साथ उसने पुलिस की गिरफ्त में नहीं आना था । वह कहीं जाने की तैयारी में था । इससे लगता था कि वह हेरोइन की अपनी जेब में मौजूद थैली को ही ठिकाने लगाने जा रहा था ।
अब मैं इस बात के प्रति पहले जितना आश्वस्त नहीं था कि वह मंजुला का हत्यारा हो सकता था ।
“कल रात यह कहां था ?” - यादव ने नया सवाल किया ।
“मेरे साथ था” - जानी बोला ।
“और तुम कहां थे ?”
“मैं इसके साथ था ।”
यादव ने आंखों से कहर बरसाते हुए एक धमकी-भरा कदम उसकी तरफ बढ़ाया ।
“म....मेरा मतलब है” - वह हकलाया - “मैं अपने साथ था । यानी कि हम दोनों एक साथ थे । वुई वर टूगेदर, बॉस ।”
“कहां ?”
“मौर्य में ।”
“वहां तुम कितना अरसा रहे ?”
“एक बजे तक । हमेशा की तरह । ऐज यूजुअल ।”
तभी टेलीफोन की घंटी बज उठी ।
जानी यंत्रचालित-सा टेलीफोन रिसीव करने की नीयत से उठा । लेकिन यादव ने वापिस उसको कुर्सी पर धकेल दिया ।
उसने खुद आगे बढ़कर रिसीवर उठाया ।
फोन उसी का था और उसके चेहरे पर आये अदब के भावों से लगता था कि वह उसके किसी वरिष्ठ अधिकारी का था ।
“यस सर” - यादव कह रहा था - “आदमी का नाम सैमुअल जोन्स है और यह डोप पैडलर मालूम होता है । वह हेरोइन के साथ भागने की कोशिश में दुर्घटनावश अपनी जान से हाथ धो बैठा है । जी हां । मैंने उसकी जेब से हेरोइन बरामद कि है जो कि इस वक्त मेरे अधिकार में है....। जी नहीं, मैं तो एक कत्ल के केस के सिलसिले में यहां पहुंचा था...। मेरे ख्याल से उसी अधिकारी को फौरन यहां भेजा जाना चाहिए जो पहले दो बार सैमुअल को चैक कर चुका बताया जाता है... । उसका जानी नाम का एक साथी इस वक्त मेरे अधिकार में है । मैं उससे पूछताछ कर रहा हूं, लेकिन अच्छा होगा कि नारकाटिक्स वाले केस पर काम रहा दूसरा अधिकारी भी यहां पहुंच जाये...। थैक्यू सर ।”
यादव ने फोन रख दिया ।
“मेरा नारकाटिक्स से क्या वास्ता ?” - जानी भयभीत भाव से बोला ।
“तुम्हीं बताओ” - यादव उसे घूरता हुआ बोला ।
“मेरा कोई वास्ता नहीं ।”
“तो इतने डर क्यों रहे हो ?”
जानी ने जोर से थूक निगली और अपने खुश्क होंठों पर जुबान फेरी ।
तभी फोन की घंटी फिर बज उठी ।
यादव ने फिर फोन रिसीव किया ।
“हां, कृपालसिंह” - वह माउथपीस में बोला - “मैं यादव बोल रहा हूं । क्या खबर है ?....क्या डेविड की हालत अभी वैसी ही है ?....वह बच तो जायेगा ?.....मर तो नहीं जायेगा ?....ओह ! डेविड का हमारे पास कोई रिकार्ड निकला ?.....निकला है ?...बम्बई का तड़ीपार मुजरिम है यह ?....वैरी गुड । उसके होटल से उसके बारे में कुछ मालूम हुआ ?....नहीं । लेकिन कोई तो अपना स्थायी पता उसने होटल के रजिस्टर में लिखा होगा ।.....वह पता फर्जी है ।...ओह !.....तुम कहते रहो, मैं सुन रहा हूं.....पानीपत में उसका भाई फ्रांसिस गिरफ्तार हो गया ।.....गुड । किरणकुमार ने क्या बयान दिया है ।...यानी कि मंजुला की मौत से उसका कोई रिश्ता नहीं ।...चलो छोड़ो उसे । उसकी गाड़ी पहाड़गंज पुलिस थाने में पहुंचा दो । आगे की कार्यवाही वही लोग करेंगे । हमारा उससे कोई मतलब नहीं ।...कोहली के अड़ोस-पड़ोस से पूछताछ का भी कोई नतीजा नहीं निकला ?....खैर कोई बात नहीं । अब तुम यहां आ जाओ और यहां से भी एक लाश उठवाने का इंतजाम करो ।”
आखिर में उसने टेलीफोन पर सैमुअल का करोल बाग का पता बोला और रिसीवर को वापिस क्रेडिल पर रख दिया ।
वह मेरी तरफ घूमा ।
“तुम्हारे अड़ोस-पड़ोस से कोई जानकारी हासिल होने की मुझे बहुत उम्मीद थी” - वह बोला - “लेकिन बात बनी नहीं । दो-तीन ऐसे लोग तो मिले जिन्होंने रात ढाई बजे के करीब नीचे सड़क से आती कारों की आवाज और ब्रेकों की चरचराहट की आवाज सुनी थी, लेकिन किसी ने बेहद सर्द रात में उठकर खिड़की खोलने की या बाहर झांकने की जहमत गवारा नहीं की थी । किसी ने बाहर सड़क पर झांका होता तो हमें कम से कम इतना तो मालूम हो जाता कि हत्यारा किस प्रकार के वाहन पर वहां तक पहुंचा था ।”
“आई सी ।”
यादव फिर जानी की तरफ आकर्षित हुआ ।
“मैं क्या कह रहा था ?” - वह बोला - “हां । तो तुम और सैमुअल कल रात एक बजे तक मौर्य में थे ?”
“यस, बॉस” - जानी बोला - “ऐज यूजुअल, बॉस ।”
“उसके बाद तुम कहां गये ?”
“यहां आ गए ।”
“हमेशा की तरह ?”
“यस, बॉस” - वह एक क्षण ठिठका और बोला - “मैं एक सवाल पूछ सकता हूं, बॉस ?”
“क्या ?”
“अभी टेलीफोन पर तुम किसी मंजुला का जिक्र कर रहे थे जो कि मर गई है । कौन-सी मंजुला मर गई है ?”
“तुम किसी मंजुला को जानते हो ?”
“जानता हूं, बॉस । तभी तो पूछ रहा हूं । एक मंजुला सैमी की गर्ल फ्रेंड हुआ करती थी । कहीं वही तो नहीं मर गई है ?”
“तुम सैमुअल की सहेली मंजुला का हुलिया बयान कर सकते हो ?” - यादव उसके सवाल को नजरअंदाज करता हुआ बोला ।
उसने किया ।
वह निश्चय ही मेरी भूतपूर्व पत्नी मंजुला का ही हुलिया बयान कर रहा था ।
“तुम्हें मालूम है” - मैंने पूछा - “यह मंजुला रहती कहां है ?”
“यस, बॉस ।”
उसने मंजुला का कर्जन रोड वाला पता दोहराया ।
“क्या वह तुम्हारी भी सहेली थी ?”
“नो, बॉस । आई डू नाट डिग चिक्स ।”
“जब तुम यहां रहते नहीं हो” - यादव ने पूछा - “तो रात को एक बजे के बाद भी तुम यहां क्यों आये ?”
“सैमुअल की नई रिकार्डिग होने वाली थी, बॉस ।” - जानी बोला - “वह मुझे अपने रिहर्सल का टेप सुनाने ले आया था ।”
“मौर्य से तुम सीधे यहीं आये थे ?”
“हां ।”
“तुम मंजुला से कभी मिले हो ?”
“कई बार मिला हूं, बॉस ।”
“आखिरी बार कब मिले थे तुम मंजुला से ?”
“अभी कल ही मिला था, बॉस ।”
“कल कब ?”
“कल रात । कैलेंडर की तारीख के हिसाब से कहा जाये तो आज सुबह ।”
“कहां ?”
“यहीं ।”
“यहां । सैमुअल के फ्लैट में ?”
“यस, बॉस ।”
“कल रात आधी रात के बाद वह यहां आई थी ?” - यादव का स्वर उत्तेजित हो उठा ।
“यही तो मैं कह रहा हूं, बॉस ।”
“साफ-साफ कहो । तरीके से कहो । तरतीब से कहो । समझे ?”
“समझा, बॉस ।”
“अब बोलो ।”
“साफ-साफ ही कह रहा हूं, बॉस । रात एक बजे हम मौर्य से ऑफ हुए थे । वहां से हम सीधे यहां पहुंचे थे । यहां सैमी मुझे अपनी टेप रिकार्डिग सुनाने लगा था । बहुत शानदार कम्पोजीशन बनाई थी इस बार सैमी ने । बड़ा जीनियस म्यूजीशियन है सैमी । मेरा दावा है कि वह एक दिन बहुत-बड़ा म्यूजिक डायरेक्टर बनेगा ।”
“अब क्या बनेगा ?” - मै धीरे से बोला ।
“सारी, बॉस । मैं भूल गया था । अब तो बेचारा सीख कबाब बन गया ।”
“आगे बढ़ो” - यादव बेसब्रेपन से बोला ।
“हम सैमी की नई कम्पोजीशन एनजाय कर रहे थे कि एकाएक सैमी की उस चिक ने एन्ट्री ली ।”
“यहां मंजुला आई ?”
“मंजुला ही आई, बॉस । अभी इतना फेमस तो अपना सैमी हुआ नहीं था कि लता मंगेशकर आ जाती ।”
“बकवास कम करो । मतलब की बात ज्यादा करो ।”
“यस, बॉस ।”
“जिस वक्त मंजुला ने यहां कदम रखा था, टाइम क्या हुआ था उस वक्त ?”
“बॉस, मुझे खूब याद है, उस वक्त छोटी सुई एक पर थी और बड़ी सुई चार के आस-पास थी ।”
“यानी कि एक बजकर बीस मिनट हुए थे उस वक्त ।”
“तकरीबन ।”
“तुम्हारी घड़ी ठीक है ?”
“मेरी घड़ी कौन-सी ?”
“जिसमें तुमने टाइम देखा था ।”
“मेरे पास तो कोई घड़ी है ही नहीं, बॉस ।”
यादव ने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । उसे कहीं कोई टाइम-पीस या वॉल क्लॉक भी न दिखाई दी ।
“तो फिर तुमने टाइम कौन-सी घड़ी में देखा था ?”
“जो मेरे दिमाग में फिट है” - वह एक उंगली से अपनी एक कनपटी ठकठकाता हुआ बोला ।
“क्या ?”
“यस, बॉस” - वह बड़े गर्व से बोला - “मैं वक्त के रिदम से वाकिफ हूं । मेरे दिमाग में फिट घड़ी ने आज तक कभी मुझे धोखा नहीं दिया ।”
“बहरहाल जब मंजुला ने यहां कदम रखा था, उस वक्त एक बीस का टाइम था ।”
“तकरीबन । गिव आर टेक ए मिनट, बॉस ।”
“खैर फिर मंजुला यहां पहुंची । फिर क्या हुआ ?”
“फिर सैमी ने आंख के इशारे से मुझे यहां से चलता हो जाने के लिए कहा । उसका इशारा समझकर मैं नीचे चला गया । सड़क के मोड़ पर एक खोखा है बॉस, जहां सारी रात चाय बनती है । मैं वहीं चाय पीता और ठंड में ठिठुरता खड़ा रहा ।”
“मंजुला के बारे में बताओ” - मैंने पूछा - “उस वक्त उसका मूड कैसा था ?”
“मुझे तो वह बहुत घबराई हुई लगी थी ।” - जानी बोला - “परेशानहाल । और दहशत की मारी हुई । और दहशत भी ऐसी जैसे खून करके आई हो और उसके पीछे पुलिस लगी हुई हो ।”
“वह खाली हाथ थी ?”
“नहीं । उसके हाथ में एक बड़ा-सा एयर बैग था जिसे वह बहुत मजबूती से थामे हुए थी ।”
“तुम्हारी मौजूदगी में उसने सैमुअल से कतई कोई बात नहीं की थी ? उनका कोई वार्तालाप तुम्हारे सामने नहीं हुआ था ?”
“मंजुला के वहां पहुंचते ही उसके मुंह से निकला सिर्फ एक फिकरा मेरे कानों में पड़ा था, बॉस । उसने कहा था कि उसे सैमी की मदद की जरूरत थी ।”
“और ?”
“बस ।”
“फिर ?”
“फिर थोड़ी देर बाद पहले जैसी ही घबराई-बौखलाई मंजुला इमारत मे बाहर निकली । वह बाहर, इमारत के सामने खड़ी एक काली एम्बैसडर में सवार हुई और यहां से रवाना हो गई ।”
“एयर बैग उस वक्त भी उसके पास था ?” - यादव ने पूछा ।
“हंडरेड परसेंट था, बॉस । न सिर्फ था बल्कि वह उसे यूं अपने कलेजे से लगाये थी जैसे क्या वरजिन मैरी ने जीसस को भी लगाया होगा । यू फालो माई प्वायंट, बॉस ?”
“फिर तुम वापिस फ्लैट में गए ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि अभी मैं इमारत की तरफ बढ़ा ही था कि मुझे सैमी भी इमारत से बाहर निकलता दिखाई दिया । मेरे देखते-देखते उसने कम्पाउन्ड में से अपनी मोटर साइकल निकाली और उस पर सवार होकर वह यूं वहां से भागा जैसे पीछे इमारत में आग लग गई हो ।
“किधर भागा ? उधर ही जिधर अपनी कार पर मंजुला गई थी ?”
“हां ।”
“मंजुला किधर गई थी ?”
“पूसा रोड की तरफ । लेकिन अगर वह पूसा रोड पहुंचने से पहले ही दाएं-बाएं किसी तरफ मुड़ गई थी तो मुझे मालूम नहीं । जहां मैं खड़ा था, वहां से पूसा रोड दिखाई नहीं देती थी लेकिन डायरैक्शन वही थी, बॉस ।”
“यादव कुछ क्षण सोचता रहा, फिर मेरी तरफ घूमा और विचारपूर्ण स्वर में बोला - “सैमुअल ?”
“जानी” - मैं बोला - “मंजुला कितना अरसा यहां ठहरी होगी ?”
“सात-आठ मिनट” - वह बेहिचक बोला ।
“यानी कि आने-जाने में लगा वक्त मिलाकर बड़ी हद दस मिनट ?”
“यस, बॉस ।”
“यादव” - मैं यादव से सम्बोधित हुआ - “इसका मतलब यह हुआ कि वह डेढ़ बजे तक यहां से जा चुकी थी । लेकिन मेरे फ्लैट पर तो वह ढाई बजे पहुंची थी । यहां से मेरे फ्लैट तक पहुंचने में एक घंटा नहीं लग सकता । करोल बाग से ग्रेटर कैलाश पन्द्रह-बीस मिनट से ज्यादा का रास्ता नहीं है कार पर ।”
“इसे टाइम में गलती लगी हो सकती है” - यादव बोला - “हो सकता है वह दो बजे के करीब यहां आई हो ।”
“नो, बॉस” - जानी पहली बार बीच में बोला - “आई तो वह एक बीस के करीब ही थी ।”
“तुम्हारी खोपड़ी में जो घड़ी फिट है, उसमें इस वक्त क्या टाइम हुआ है ?”
उसने अपनी आंखें बन्द कर लीं और अपनी एक उंगली से अपनी कनपटी ठकठकाता हुआ बोला - “छोटी सुई ग्यारह पर और बड़ी सुई नौ पर ।”
“ग्यारह पैंतालीस ?”
“यस, बॉस ।”
मैंने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर निगाह डाली और धीरे से बोला - “आधा घंटा पीछे । सवा बारह बजे हैं ।”
“फिर तो ठीक है” - यादव बोला ।
“कहां ठीक है । वह यहां एक बीस की जगह एक पचास पर आई थी और दो बजे रवाना हुई थी तो भी उसे दो बीस तक ग्रेटर कैलाश पहुंच जाना चाहिए था ।”
“अब दस मिनट का ही तो फर्क रह गया है । क्या पता वह रास्ते में कहीं पैट्रोल के लिए रुकी हो । क्या पता रास्ते में कहीं पूछताछ के लिए वह नाइट पैट्रोल द्वारा रोक ली गई हो । और क्या पता तुम्हीं ने घड़ी में टाइम ठीक न देखा हो । कोहली, हालात पुकार-पुकारकर कह रहे है कि यह इस सैमुअल के बच्चे का ही काम है । वह माल के लालच में मंजुला के पीछे लपका था, उसी ने मंजुला का कत्ल किया था । आखिर वह नशेबाज था । क्या पता कत्ल भी उसने हेरोइन के नशे की पिनक में ही किया हो ।”
“हो सकता है” - मैं बोला - “लेकिन अगर वह जिन्दा होता तो अदालत में उसके खिलाफ कुछ साबित करके दिखाना आसान न होता ।”
“अगर वह जिन्दा होता तो मैंने उसी से कबुलवा लेना था कि तुम्हारी बी...मंजुला का कत्ल उसने किया था ।”
“हूं ।”
“और फिर इस वक्त वक्त के इसके अन्दाजे में आधे घंटे का फर्क है, तब चालीस मिनट का फर्क रहा हो सकता है या मंजुला यहां पर दस मिनट से ज्यादा रुकी हो सकती है ।”
“तुम ठीक कह रहे हो” - मैं कुछ क्षण खामोश रहा और फिर जानी से सम्बोधित हुआ - “सैमुअल के पास मोटर साइकिल कौन-सी है ?”
“एक पुरानी-सी रायल एनफील्ड है” - जानी बोला ।
“वह चलती कैसी है ?”
“चलती तो ठीक है लेकिन खर्र-खर्र बहुत करती है ।”
मुझे उन दोनों कारों की आवाजों का ध्यान आया जो पिछली रात मुझे नीचे सड़क से आती सुनाई दी थीं । उनमें से एक कार की आवाज मुझे ऐसी लगी थी जैसे उसका इंजन खर्र-खर्र करता हो । लेकिन अब मुझे लगा कि वह आवाज किसी खस्ताहाल मोटर साइकल की भी हो सकती थी ।
खेल खतम ।
मुझे इस बात की बड़ी मायूसी हुई कि मंजुला का हत्यारा एक ऐसा आदमी निकला था जो पहले ही मर चुका था । मर चुके आदमी की करतूत की उसे क्या सजा दी जा सकती थी ।
मैं फिर जानी की तरफ आकर्षित हुआ ।
“आज जब तुम सैमुअल से मिले थे तुमने उससे पूछा नहीं था की पिछली रात को वह मंजुला के पीछे क्यों गया था और कहां गया था ?”
“मैंने नहीं पूछा, बॉस” - वह बोला ।
“क्यों नहीं पूछा ?”
“मुझे सूझा ही नहीं पूछना ।”
“सूझता तो पूछते ?”
“शायद नहीं । दरअसल किसी के जाती मामलात में दखल देने की मेरी आदत नहीं है ।”
“उसके व्यवहार से” - यादव ने पूछा - “ऐसा लगता था जैसे वह उत्तेजित हो, जैसे पिछले चंद घंटों में उसके साथ कोई असाधारण घटना घटी हो ।”
“उत्तेजित तो वह बहुत था ।”
“वह उत्तेजना” - मैं धीरे से बोला - “उसकी जेब में मौजूद पच्चीस हजार रुपये की हेरोइन की वजह से भी हो सकती थी जिसे कि वह ठिकाने लगाने जा रहा था ।”
“लेकिन उस कत्ल की वजह से भी हो सकती थी” - यादव बोला - “जो उसने चंद घंटे पहले किया था ।”
“तुम ठीक कह रहे हो” - मुझे कबूल करना पड़ा ।
मैने अपनी जेब से डनहिल का पैकेट निकाला और एक सिगरेट सुलगा लिया ।
“कोहली” - यादव मुझसे सम्बोधित हुआ - “अब मेरी तरफ से तुम फ्री हो ।”
“थैंक्यू”
“अब केस में कुछ नहीं रखा ।”
“हां ।”
“अब तुम कहा जाओगे ?”
“न्यू राजेन्द्र नगर । मंजुला की मां के घर । मंजुला की लाश कब मिलेगी ?”
“पोस्ट मार्टम के बाद ।”
“वह तो मुझे मालूम है लेकिन वह बाद कब होगी ?”
“शाम को किसी वक्त ।”
“कोई अड़ंगा तो नहीं होगा ?”
“अब क्या अडंगा होगा ? अब तो केस ही हल हो गया ।”
“आई सी ।”
“और तुम उपलब्ध रहना । मुझे तुम्हारी दोबारा जरूरत पड़ सकती है ।”
“अब किसलिये ?”
“पता नहीं ।”
मैंने प्रतिवाद नहीं किया । वह मुझ पर अपनी पुलसियों वाली हेकड़ी जता रहा था ।
फिर मैंने उससे हाथ मिलाया और दरवाजे की तरफ बढ़ा ।
“अब मैं भी जा सकता हूं बॉस” - मेरे पीछे जानी बोला ।
“नहीं, तुम अभी नहीं जा सकते” - यादव बोला ।
“लेकिन...”
“चुपचाप बैठो ।”
मैं वहां से बाहर निकल गया ।
***
थका-हारा मैं न्यू राजेन्द्र नगर पहुंचा ।
मृदुला को जब तक पूरी तरह से गारन्टी नहीं हो गई कि मैं ही आया था, उसने दरवाजा नहीं खोला ।
मुझे देखकर उसने अपने होंठों पर जबरन मुस्कराहट लाने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सकी । उसकी आखों में अवसाद की गहरी छाया तैर रही थी ।
अपनी नजर का चश्मा वह इस वक्त भी नहीं लगाये हुए थी ।
मेरे भीतर दाखिल होते ही उसने दरवाजे को मजबूती से बन्द करके चिटकनी चढ़ा दी । डेविड द्वारा उस पर हुए आक्रमण की दहशत, जाहिर था कि, अभी उस पर हावी थी ।
उस समय वह एक सफेद रंग के मोटे कपड़े का ड्रेसिंग गाउन पहने थी जो अंगरखे की तरह एक पहलू में डोरियों से बांधता था ।
“अच्छा हुआ तुम आ गए” - वह कम्पित स्वर में बोली - “यहां अकेले मुझे बहुत डर लग रहा था ।”
“मुझे पुलिस ने अटका लिया था” - मैं बोला - “नहीं तो मैं और भी जल्दी आ जाता ।”
“तुम तो सूरत से बहुत ही थके हुए और परेशान हाल लग रहे हो ।”
“सारी रात सो जो नहीं पाया । ऊपर से धुआंधार भाग-दौड़ ।”
“ओह !”
“लेकिन शुक्र है भगवान का कि सारा सिलसिला निपट गया है ।”
“अच्छा । क्या हत्यारा पकड़ा गया ?”
“नहीं । लेकिन मालूम हो गया है कि मंजुला की हत्या किसने की थी ।”
“किसने की थी ?”
“हत्यारे का नाम सैमुअल जोन्स है । वह एक म्यूजीशियन था और मंजुला का दोस्त था । कल रात मंजुला उसके पास गई थी । डकैती का माल उस वक्त मंजुला के पास था । लगता है उस आदमी को पैसे का लालच आ गया था । उसने मंजुला का मेरे घर तक पीछा किया था ।”
मृदुला के मुंह से एक सिसकारी भी निकली । फिर उसने अपने जबड़े कस लिए ।
मैंने समीप पहुंचकर उसका कन्धा थपथपाया ।
“हौसला रखो, मृदुला” - मैं बोला - “अब रोने-धोने का कोई फायदा नहीं ।”
वह मेरे साथ लग गई । उसने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया ।
“अब सारी कहानी खतम हो गई है” - मैंने उसे बताया - “खुद हत्यारा भी मर चुका है । उसने पुलिस से भागने की कोशिश की थी और इसी कोशिश में एक एकसीडेन्ट का शिकार होकर वह अपनी जान गंवा बैठा है । डेविड भी पुलिस की गिरफ्त में आ चुका है । यानी कि अब तुम्हें यहां किसी तरह का कोई खतरा नहीं है ।”
“ओह !”
“तुम मां से मिली थी ?”
“हां । सुबह हस्पताल गई थी मैं । लेकिन....लेकिन मैंने उसे मंजुला के बारे में कुछ नहीं बताया । सुधीर, मां मंजुला की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर सकेगी ।”
“लेकिन यह बात उससे छुपाकर भी तो नहीं रखी जा सकती ।”
“ठीक है लेकिन...लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई उसको कुछ बताने की । हो सके तो तुम्हीं कुछ करना ।”
“वैसे तबीयत कैसी है मां की ?”
“अब ठीक है ।”
“ठीक है । मैं ही मिलूंगा मां से ।”
“शुक्रिया ।”
“तुमने अड़ोसियों-पड़ोसियों को कुछ बताया ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
“मैंने सोचा था कि जब लाश आयेगी तो सबको खुद ही मालूम हो जायेगा ।”
“ओह !”
“लाश कब मिलेगी ?”
“शाम तक ।”
उसका शरीर एकबार जोर से कांपा । फिर उसकी आंखें डबडबा आईं ।”
मैं उसे दिलासा देता रहा ।
फिर एकाएक वह मेरे से अलग हुई । उसने अपने आंसू पोंछे और बोली - “मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूं ।”
“नहीं, कोई जरूरत नहीं ।”
“मैं भी पिऊंगी । मैंने सुबह से चाय नहीं पी ।”
मैंने फिर एतराज नहीं किया ।
“तुम भीतर बैडरूम में चले जाओ । वहां थोड़ी देर लेट कर आराम कर लो ।”
मैं बैडरूम में चला गया ।
वह चाय बनाने किचन में चली गई ।
मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और पलंग पर अधलेटा-सा बैठा उसके कश लगाने लगा ।
मेरा सिगरेट समाप्त होने तक वह दो गिलासों में चाय ले आई ।
उसे आता देखकर मैंने उठकर सीधा बैठने की कोशिश की ।
“तुम लेटे रहो” - वह बोली ।
उसने एक गिलास मुझे थमा दिया और खुद अपने गिलास के साथ मेरे सामने एक स्टूल पर बैठ गई ।
मैं एक कोहनी के सहारे थोड़ा उचककर चाय की चुस्कियां लेने लगा ।
“मृदुला” - मैंने पूछा - “तुमने मंजुला के मुंह से कभी किसी सैमुअल जोंस का नाम सुना था ?”
उसका ध्यान कहीं और था । वह कुछ और ही सोच रही थी ।
“मृदुला !”
“क....क्या ? क्या कहा तुमने ?” - वह हड़बड़ाकर बोली ।
मैंने अपना प्रश्न दोहराया ।
“नहीं ।” - वह बोली । उसकी आखें फिर डबडबा आईं ।
“घर में कोई एस्प्रो या सैरीडॉन है ?” - मैं बोला - “है तो दो । मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है ।
“चाय पीकर तुम लेट जाओ । मैं तुम्हारा सिर दबा देती हूं ।”
“नहीं । मेरे सिर का गूमड़ भी तो दुख रहा है ।”
“पिस्तौल की मूठ मारी थी तुम्हारे सिर पर हत्यारे ने । मैंने देखा था । तुम्हें किसी डॉक्टर को दिखाना चाहिए था ।”
“शाम को दिखाऊंगा ।”
“मैं एस्प्रो लाती हूं ।”
वह अलमारी में से एस्प्रो की दो गोलियां निकाल लाई । उसने गोलियां मुझे दीं और स्वंय पलंग पर मेरे पास ही बैठ गई ।
मैंने चाय के साथ गोलियां निगल ली ।
अपनी चाय का गिलास उसने स्टूल पर रख दिया और अपनी उंगलियों से हौले-हौले मेरा सिर सहलाने लगी ।
मुझे बहुत सुकून हासिल हुआ ।
“जाने दो” - लेकिन मैं बोला ।
“क्यों ?” - वह बोली - “अच्छा नहीं लग रहा ?”
“अच्छा लग रहा है, लेकिन…”
“एक बात बताओ, सुधीर ।”
“पूछो ।”
“मंजुला के अन्तिम संस्कार के बाद आज की रात तुम यहां ठहर सकते हो ?”
“ठहर जाऊंगा ।”
“शुक्रिया” - वह बोली ।
थकावट की वजह से मुझे ऊंघ आ रही थी । रह-रहकर मेरी आंखें अपने आप मुंदने लगती थीं ।
“तुम थोड़ी देर में सो जाओ” - वह बोली । उसने मेरे हाथों से चाय का गिलास ले लिया ।
मैं हिचकिचाया ।
“थके हुए हो” - उसने जिद की - “चैन आ जायेगा ।”
मैंने और जिद नहीं की । मैंने केवल जूते, कोट और अपना शोल्डर होल्स्टर उतारा और फिर पलंग पर लम्बा लेट गया ।
उसने मुझे रजाई उढ़ा दी ।
मैंने घड़ी पर निगाह डाली ।
एक बज चुका था ।
“अगर मुझे बहुत गहरी नींद आ जाये” - मैं बोला - “तो चार बजे तक मुझे हर हाल में जगा देना, क्योंकि तब मुझे लाश क्लेम करने के लिए मोर्ग में जाना होगा ।”
“ठीक है ।” - वह बोली ।
मैंने आंखें मूंद ली ।
उसने उठकर कमरे में जलती ट्यूब लाइट बन्द कर दी और बन्द खिड़की पर और दरवाजे पर पर्दा खींच दिया ।
वह फिर मेरे सिरहाने आ बैठी और हौले-हौले मेरा सिर सहलाने लगी ।
पता नहीं कब मुझे नींद आ गई ।
नींद में भी मुझे मंजुला के ही सपने आते रहे ।
रह-रहकर उसका खूबसूरत चेहरा मेरे जहन पर उभरता था । फिर वह मुझे अपनी बाहों में दिखाई देती थी - कभी अभिसाररत तो कभी दम तोड़ती हुई ।
सुधीर - वह मुझे कहती लग रही थी-अगर तुमने मेरी बात पर यकीन किया होता कि निम्फोमैनिया एक बीमारी होती थी और तुमने मेरी मदद की होती तो हम आज भी पति-पत्नी होते, मैं आज भी जिन्दा होती । मैं पतन के गर्त में गिरती न चली गई होती । मैं डकैती जैसे खतरनाक काम में शामिल न हुई होती । तुमने मुझे कभी नहीं अपनाया, सुधीर, लेकिन अब तो मुझे अपना लो । अब तो मुझे अपनी बाहों में ले लो ।
सपने में मैंने उसे अपने से परे धकेलने की कोशिश की लेकिन मैं कामयाब न हो सका । वह और कसकर मेरे साथ लिपट गई ।
हे भगवान ! - यह कैसा सपना था ?
फिर एकाएक मुझे एहसास हुआ कि वह सपना नहीं था ।
वह रजाई में मेरे साथ लेटी हुई थी ।
पता नहीं वह दो मिनट से वहां थी या दो घन्टे से ।
पता नहीं मैं सोया था भी या नहीं ।
वह लता की तरह मेरे साथ लिपटी हुई थी । उसका सिर मेरे एक कन्धे के साथ लगा हुआ था और वह आंखो में एक अजीब सा भाव लिए हुए मुझे देख रही थी ।
“मृदुला !” - मेरे मुंह से निकला - “हे भगवान !”
नींद में मेरा एक हाथ उसके कूल्हे पर जा पड़ा था और दूसरा उसके जिस्म के नीचे कहीं दबा हुआ था । अब मुझे यकीनन मालूम न होता कि मैं जागा हुआ था और वह मृदुला थी तो मैं कसम खाकर कह सकता था कि मेरे जिस्म से सटा हुआ जिस्म मंजुला का था । हर बात वैसी थी । वही हरारत । वही अहसास । जिस्म के वही उभार । वही खम । वही अंदाज ।
मैंने अचकचाकर उसे अपने से अलग करने की कोशिश की तो वह और कसकरमेरे साथ लिपट गई ।
“सुधीर” - वह याचनपूर्ण स्वर में बोली - “मुझे तुम्हारी जरूरत है । मुझे तुम्हारी सख्त जरूरत है । भगवान के लिए मुझे अपने से अलग न करो । मुझे यूं ही थामे रहो । मुझे यूं ही अपने साथ लगाये रहो ।”
हे भगवान ! यह क्या हो रहा था ? यह तो सपना नहीं था । इस शैतानी हरकत में किसका दोष था ? मेरा ? मृदुला का ? हम दोनों का ?
क्या संसार भर के सारे विकृत व्यक्तित्व मेरे ही पल्ले पड़ने थे ?
मैं क्या करूं उस औरत का जो उस वक्त मेरी बांहों में थी, वो कभी मेरी साली थी और जिसे हमेशा मैंने किसी आंटी-वांटी की निगाह से देखा था ।
उसकी बाहें मेरी गर्दन से आ लिपटी थीं और उसने मुझे बुरी तरह दबोच लिया हुआ था । उसके उन्नत उरोजों का उभार मुझे अपनी छाती पर महसूस हो रहा था । उसकी जांघे मेरी जांघों से टकरा रही थीं । और मैं ?
मैं जैसे उसकी बाहों में शहीद हुआ जा रहा था ।
पता नहीं कब से प्यासी वह औरत, लगता था, आज एक ही बार में तृप्त हो जाना चाहती थी ।
मैं मन ही मन फैसला करने की कोशिश कर रहा था कि जो कुछ हो रहा था, वह मुझे अच्छा लग रहा था या बुरा ।
“सुधीर !” - उसके मुंह से मेरा नाम लेती आवाज यूं निकली जैसे वह किसी कुएं के पेंदे में से आ रही हो । फिर उसके आतुर होंठ मेरे चेहरे पर हर जगह फिरने लगे । उसकी टांगों ने मुझे अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया । उसके शरीर में जैसे ज्वार उठने लगा ।
वह मुझे एक भूखी बिल्ली की तरह झंझोड रही थी, मुझे खा रही थी, मुझे समूचा हज्म करने पर आमादा मालूम होती थी ।
“सु…सुधीर” - उसके मुंह से फिर एक कराह-सी निकली ।
सुधीर क्या कहता ? सुधीर क्या करता ?
फिर वह मेरे ऊपर चढ़ गई । अब उसके नंगे जिस्म का सारा भार मेरे ऊपर था ।
फिर धीरे-धीरे ज्वार उतरने लगा । तूफान जैसे प्रबल हुआ था, वैसे ही शान्त होने लगा ।
वह निढाल होकर मेरे ऊपर से हटी और मेरे पहलू में लेट गई ।
खुद मुझे भी सांस उखड़ी-उखड़ी-सी आ रही थी ।
“सुधीर” - वह बहुत धीमी आवाज में यूं बोली जैसे ख्वाब में बड़बड़ा रही हो - “तुम कहीं चले न जाना । तुम मुझे छोड़ना नहीं । तुम यहां से हिलना भी नहीं ।”
“कब तक ?” - मैं बड़ी कठिनाई से कह पाया ।
“सुधीर” - उसने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं, वह अपनी ही कहती रही - “मुझे तुम्हारी जरूरत है । मुझे तुम्हारे सहारे की जरूरत है ।”
सर्दी के मौसम में भी उसका सारा जिस्म पसीने से भीगा हुआ था । उसका चेहरा तमतमाया हुआ था और उसकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी ।
मैंने हाथ वढ़ाकर उसके आंसू पोछने की कोशिश की ।
उसने कस कर मेरा हाथ थाम लिया ।
“सुधीर” - वह रोती हुई बोली - “मैं तुम्हें बता नहीं सकती कि मैं तुम्हारे लिए कितनी फिक्रमंद थी । पुलिस वालों से बात करने के बाद तुम यहां से चले गए । मुझे उम्मीद थी कि तुम यहां फोन करके अपनी कुशलता की खबर दोगे । जब तुम्हारा फोन नहीं आया तो मुझे दशहत होने लगी । मुझे लगने लगा कि शायद..शायद...”
उसका गला रूंध गया ।
“मृदुला !” - मैं बोला - “हौंसला रखो ।”
“मैं यही समझी” वह बड़ी कठिनाई से कह पाई - “कि पुलिस ने नोटों से भरा एयरबैग तुम्हारे फ्लैट से बरामद कर लेने के बाद तुम्हें गिरफ्तार कर लिया था और अब वे मंजुला के कत्ल का इल्जाम तुम पर लगा रहे थे ।”
मैंने इतनी कसकर उसके दोनों कंधे थामे कि एकाएक उसके गले से एक दर्दभरी कराह निकल गई ।
उसका मुंह मेरे से केवल तीन इंच दूर था । उसकी गरम सांसें मेरे चेहरे से टकरा रही थीं । मैं फटी-फटी आंखों से उसकी सूरत देख रहा था ।
मेरे कानों में खतरे की घंटियां बज रही थी ।
एक सवाल - एक खतरनाक सवाल - हथौड़े की तरह दर्द से पहले से ही सनसनाते मेरे दिमाग में बज रहा था - इस औरत को कैसे मालूम था कि मेरे फ्लैट से कोई नोटों से भरा एयरबैग बरामद हुआ था ?
***
परे पड़े अपने कोट को करीब घसीटकर कांपते हाथों से मैंने उसमें से अपना डनहिल का सिगरेट का पैकेट और और लाइटर निकाला ।
बड़ी मुश्किल से मैं एक सिगरेट सुलगा पाने में कामयाब हो पाया ।
साधारणतया बहुत सुकून देने वाला डनहिल का धुआं अपने मुंह में मुझे जहर जैसा लगा ।
जानी के भेजे में फिट घड़ी ने कल रात गलत वक्त नहीं दिया था । कल रात उसने मंजुला के सैमुअल जोन्स के फ्लैट पर आगमन के वक्त का एकदम सही अंदाजा लगाया था । मंजुला रात डेढ़ बजे करोल बाग से चलकर ढाई बजे तक ग्रेटर कैलाश इसलिए नहीं पहुंची थी क्योंकि रास्ते में वह कहीं और भी गई थी ।
मोटर साइकिल पर उसके पीछे लपके सैमुअल को तो शायद उसकी हवा भी नहीं मिली थी, उसे तो शायद यह भी नहीं पता लगा था कि पूसा रोड पहुंचकर मंजुला की कार दाएं घूमी थी या बाएं घूमी थी । जानी थोड़ी देर और करोलबाग ठहरा होता तो उसे तभी पता लग गया होता कि सैमुअल की मोटरसाइकिल लगभग फौरन ही वापस लौट आई थी ।
मृदुला अभी भी मेरे पहलू में लेटी हुई थी ।
अब उसका चेहरा फक्क था । अब तक शायद उसे भी एहसास हो चुका था कि अनायास ही उसके मुंह से कितनी खतरनाक बात निकल गई थी ।
“वो” - मैंने बिना उसकी ओर देखे सवाल किया किया - “यहां आई थी ?”
उसने उत्तर नहीं दिया । रजाई उसके उन्नत वक्ष पर से सरक कर उसकी कमर के खम तक पहुंच गई थी । उसने उसका एक सिरा अपने दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर खींचा और अपनी ठोड़ी के नीचे दबा लिया ।
नीम अंधेरे में मुझे उसका जितना जिस्म दिखाई दिया था, वह खूबसूरती में मंजुला से किसी भी कदर कम नहीं था ।
“यानि कि लूट के माल का उसके कत्ल से कोई रिश्ता नहीं था” - मैं फिर बोला ।
“हां ।” - वह धीरे से बोली ।
“क्या हुआ था ? क्या हुआ था, मृदुला ?”
“बताती हूं ।”
वह खामोश हो गई ।
मैं उसके दोबारा बोलने की प्रतीक्षा करने लगा ।
“मृदुला !” - अंत में मैंने तंग आकर उसे फिर पुकारा ।
“वह कल रात यहां आई थी” - वह यूं बोली जैसे टेपरिकॉर्डर चल रहा हो - “उस वक्त डेढ़ या पौने दो का वक्त था । वह बहुत आतंकित थी । उसने मुझे पानीपत की डकैती और उसमें अपने योगदान की सारी कहानी कह सुनाई थी । उसने मुझे नोटों से भरा एयरबैग भी खोलकर दिखाया था । उसने बहुत डर-डरकर मुझे बताया था कि लूट का माल जिस आदमी से चुराकर वह वहां आई थी, वह आदमी उसका भारी अहित कर सकता था । सुधीर, यही मंजुला की फितरत थी । उसे दूसरों की याद हमेशा अपनी संकट की घड़ी में आती थी । मां बीमार थी । हस्पताल में भरती थी । वह मर भी सकती थी । यह उसे मालूम था, लेकिन वह मां को एक बार देखने तक नहीं आई थी और कल आधी रात को आई थी तो एक मुसीबत अपने साथ लेकर । मैंने उसे यही कहा कि वह आंखमिचौली का खेल बंद करे और या तो वह लूट का माल उसी आदमी को दे आए जिसके पास से वह उसे चुरा कर लाई थी और या फिर पुलिस के पास पहुंच जाए । लेकिन वह तो शायद मेरी बात ठीक से सुन भी नहीं रही थी । मैं उसे समझा रही थी और वह टेलीफोन कर रही थी । फिर उसने फोन पर कुछ कहे बिना रिसीवर वापस रख दिया था । उसने एयरबैग उठाया और बाहर को दौड़ चली । मैंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नहीं रूकी । मैंने जल्दी से एक पुलोवर पहना, एक शाल लपेटा और उसके पीछे भागी । बाहर वह मुझे एक काली एम्बैसडर में सवार होती दिखाई दी । मैंने उसे आवाजें दी लेकिन पता नहीं आवाजें उसने सुनी नहीं या कार के इंजन के शोर में उसे सुनाई नहीं दी । मुझे उस वक्त उसके पीछे भागने अलावा और कुछ न सूझा । आजकल देर-सबेर हस्पताल जाना पड़ता था, इसलिए मौरिस माइनर इस्तेमाल हो रही थी । मैं झपटकर भीतर गई और उसकी चाबियां ले आई । मैं उस पर सवार होकर उस दिशा में लपकी जिधर मैंने काली एम्बैसडर जाती देखी थी ।”
“उस वक्त तुम्हें बाहर कोई रायल एनफील्ड मोटर साइकिल पर सवार आदमी दिखाई दिया था ?”
“नहीं, रास्ते सुनसान पड़े थे । कहीं कोई नहीं था ।”
“फिर ?”
“फिर शंकर रोड पर काली एम्बैसडर मुझे दिखाई दे गई । वह पहाड़ी की तरफ बढ़ रही थी । हॉर्न बजाकर मैंने मंजुला का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की । अपनी कार की स्पीड बढ़ाकर मैंने एम्बैसडर के समीप आने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सकी । मेरी खटारा गाड़ी नई एम्बैसडर का मुकाबला नहीं कर सकती थी । यही गनीमत थी कि उस पर मैं एम्बैसडर के पीछे लगी रही थी । मैं उसके पीछे कार चलाती रही और उसके कहीं रुकने का इंतजार करती रही । उस वक्त मुझे तो यह भी पता नहीं लग रहा था कि मैं शहर की किन सड़कों से गुजर रही थी । एम्बैसडर मेरी निगाहों से ओझल हो जाती तो शायद न्यू राजेन्द्र नगर का रास्ता किसी से पूछे बिना मैं घर भी न लौट पाती ।”
“आगे बढ़ो ।”
“फिर एक स्थान पर एकाएक उसने कार रोकी । उस वक्त मुझे यह नहीं सूझा था कि वह ग्रेटर कैलाश पहुंच गई थी और कार को तुम्हारे घर के आगे रोक रही थी । मैंने भी अपनी कार को उसकी कार के पीछे ले जाकर रोका । तब वह इलाका मुझे पहचाना-पहचाना सा लगा और मैंने महसूस किया कि वह तुम्हारे पास आई थी । तब मुझे वहां अपनी मौजूदगी बेमानी लगने लगी । मैंने उसके तुम्हारे पास पहुंच जाने तक वहां रुकने का फैसला किया । मैंने कार से बाहर निकलने का उपक्रम नहीं किया । वह अपनी कार से बाहर निकली । उसने पीछे देखा तो तुरंत मौरिस माइनर को पहचान लिया । वह लंबे डग भरती हुई मेरे पास पहुंची । मैंने बाहर निकलने की नीयत से कार का दरवाजा खोला तो वह बोली - तकलीफ मत करो, दीदी । अब मुझे तुम्हारी जरूरत नहीं । अब मुझे एक मर्द की जरूरत है और उस मर्द के पास मैं पहुंच चुकी हूं । वह जरूर मेरी मदद करेगा । दीदी, तुम लौट जाओ क्योंकि वैसा मर्द तुम्हें आज तक कभी अपनी जिंदगी में हासिल नहीं हुआ और न अब कभी होगा । अब तो मर्द हासिल होने लायक तुम्हारी उम्र भी नहीं रही - वह हंसने लगी । सुधीर, वह हंसने लगी । चाहे उसकी नीयत मुझे अपमानित करने की या मेरी खिल्ली उड़ाने की नहीं थी, लेकिन उस वक्त उसकी बातें मेरे कलेजे में तीर की तरह लगीं । उस क्षण मेरे तन-बदन में आग लग गई और मेरी अक्ल पर, मेरे विवेक पर, पर्दा पड़ गया ।”
वह खामोश हो गई ।
मैं उसके दोबारा बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।
“तौबा !” - वह धीरे से बोली - “कितना अहंकार था उस लड़की में । अपनी करतूतों पर शर्मिंदा होने की जगह वह उनकी शेखी बघारती थी और उस वक्त उन्हीं की वजह से वह अपने आपको मेरे से बेहतर साबित करने की कोशिश कर रही थी और मुझे जलील कर रही थी ।” - वह एक क्षण ठिठकी और फिर बोली - “सुधीर, मैं उन्नीस साल की थी जब हमारा बाप मरा था । उस वक्त मंजुला नौ साल की थी । मां तब भी आज जैसी ही बहरी थी, बीमार रहती थी और किसी काम-काज के काबिल नहीं थी । उस उम्र में भी यह घर मुझे चलना पड़ता था । मंजुला की जो देखभाल, उसका जो लालन-पालन, मां को करना चाहिए था, वह भी मुझे करना पड़ता था । मैं करती थी । बिना किसी की शाबाशी और वाहवाही हासिल करने की इच्छा के करती थी । अब तुम ही सोचो । उन्नीस साल की जिस लड़की पर अपनी पढ़ाई करने के अलावा घर चलाने की भी जिम्मेदारी हो, उसके पास किसी और काम के लिए वक्त होता ? उसकी तवज्जो मर्दों के साथ आशनाई की तरफ जाती ? वह ठीक कहती थी । अपनी जिंदगी में में मुझे कोई मर्द हासिल न हो सका, लेकिन क्यों हासिल न हो सका ? इसलिए हासिल न हो सका क्योंकि ऐसे कामों के लिए जो उम्र होती थी, वह मैंने अपने बाप की हाउसकीपर बन के अपनी मां की नौकरानी बन के और अपनी बहन की आया बन के गुजार दी । लेकिन मंजुला के पास ऐसे कामों के लिए बहुत वक्त था । जैसा कि मैंने सुबह भी बताया था, ऐसे कामों के अलावा उसे और कोई काम था ही नहीं । जो काम मैं वक्त पर नहीं कर सकी, उन्हें वह वक्त से पहले करने लगी थी । मैं उसके भले के लिए उस समझाती थी तो वह यूं जाहिर करती थी जैसे मैं खामखाह उसके कान खा रही थी । उसके लिए यह कितनी बहादुरी की बात थी, सुधीर, कि अभी वह पूरे पंद्रह साल की नहीं हुई थी कि गर्भवती हो गई थी ।”
“क्या ?” - मैं हैरानी से बोला ।
“मैं सच कह रही हूं । मैंने उससे इस बारे में पूछा तो क्या वह रत्ती भर भी शर्मिंदा हुई ? जब मैंने उससे पूछा था कि उसके पेट में किसका पाप था तो जानते हो उसने क्या जवाब दिया था, पंद्रह साल की उम्र की उस छोकरी से मुझे क्या जवाब मिला था ?”
“क्या ?” - मैं मंत्रमुग्ध स्वर में बोला ।
“वह खी-खी करके हंसती हुई बोली कि दीदी अगर कोई कांटों के झाड़ में हाथ डाल दे और उसके हाथ में कई कांटें चुभ जाएं तो क्या बाद में जख्मी हाथ देखकर कोई यह बता सकता है कि सबसे गहरा जख्म किस कांटे ने किया था ।”
“तौबा !”
“मैंने जब उससे यह पूछा कि जो बात वह बता रही थी, वह उसकी गंभीरता समझती थी ? वह जानती थी कि अगर वह बात लोगों को मालूम हो जाती तो परिवार की कैसी नाक कटती और खुद उसकी कैसी जगहंसाई होती ? जवाब में उसने यूं जताया जैसे मैं उसे खामखाह दहशत में दाल रही थी । उसका रवैया ये था कि यह सिरदर्दी उसके घरवालों की थी कि अब उन्होंने क्या करना था ? उसने तो जो करना था, कर दिया था । उसकी निगाह में गर्भवती हो जाना या टांग तोड़ लेना या सिर फोड़ लेना एक ही जैसे काम थे । जैसे उसकी टांग को पलास्टर चढ़वाने की या उसके सिर की मलहमपट्टी करवाने की जिम्मेदारी उसके अभिभावकों की थी, वैसे ही उसका गर्भवती हो जाना भी एक ऐसा काम था जिसका जो कुछ करना था उसके घरवालों ने ही करना था ।”
“फिर ?”
“फिर क्या ? फिर उसी की जीत हुई । वह तो समझती नहीं थी की जो कुछ उसने किया था, उससे आस्की आने वाली जिंदगी का कैसा सत्यानाश हो सकता था । उल्टे नासमझी में वह कोई ऐसा कदम भी उठा सकती थी जिससे कि उसकी जान ही चली जाती तो कोई बड़ी बात न होती । वह कोई उल्टी-सीधी दवा खा सकती थी । उसने मुझे कहा भी था कि उसकी कोई सहेली कह रही थी कि अगर उसकी मां को गर्भ ठहर जाता था तो वह कुनेन की ढेर सारी गोलियां खा लेती थी और फिर सब-कुछ ठीक हो जाता था । सुधीर, उस छोकरी की खातिर मैंने अपनी सहेलियों से पचास-पचास रुपए उधार मांगकर चार सौ रुपए इकट्ठे किए और फिर घरवालों से चोरी उसका गर्भपात करवाया । तुम्हारे से शादी होने तक वह तीन बार गर्भपात करवा चुकी थी ।”
मेरी आंखों के सामने मंजुला का भोला-भाला चेहरा घूम गया ।
“पहली दो बार मैंने पैसे खर्च कर घरवालों से चोरी, उसका गर्भपात करवाया था लेकिन तीसरी बार तक तो वह खुद नौकरी करने लगी थी और हम लोगों से अलग रहने लगी थी । लेकिन तब भी वह मेरे पास आई थी और मुझसे दरख्वास्त करने लगी थी कि मैं इस बार भी साथ चलकर उसकी खलासी करवाऊं । आगे-पीछे जो लड़की मेरी सुध लेना भी जरूरी नहीं समझती थी, संकट की घड़ी में वह दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आ जाती थी और अपनी मुसीबत का सारा भार मुझ पर डाल देती थी । दूसरे की एडवांटेज लेना उस खुदगर्ज लड़की को खूब आता था ।”
मैं खामोश रहा ।
“सुधीर, वह गर्भवती हो जाती थी और उसे यह तक नहीं मालूम होता था कि उसके पेट में किसका बच्चा था । वह अपनी कोख में से बच्चे को यूं उधेड़कर अलग करवा आती थी जैसे उंगली का नाखून कटवाया हो । उसे बच्चा नहीं चाहिए होता था और मैं बच्चे की खातिर अपनी जान दे सकती थी । मेरे मन में पति से ज्यादा औलाद की चाह थी । मैं...मैं ...”
वह खामोश हो गई ।
मैंने उसे आगे बढ्ने के लिए उकसाया नहीं ।
“फिर” - थोड़ी देर बाद वह खुद ही बोली - “आनन-फानन उसने तुमसे शादी कर ली । मेरे दिल ने बहुत सुख माना । मुझे लगा कि अब उसकी जिंदगी में ठहराव आ जाएगा । गृहस्थ बन कर वह जिम्मेदार भी बन जाएगी । आखिर उसको तुम्हारे जैसा शानदार पति मिला था जिसे खो देना वह कैसे अफोर्ड कर सकती थी लेकिन तुम्हारे से उसकी शादी पूरा एक साल भी न चली । वह फिर अपनी पुरानी, गुनाहों से पिरोई - लेकिन उसे अजीज, उसे पसंद - जिंदगी में लौट गई । सुधीर, मैं नहीं जानती कि रात को तुम्हारे घर के सामने यह बात उसने जान-बूझकर कही थी या यह अनायास उसके मुंह से निकाल गई थी, लेकिन यह हकीकत है कि यह बात उसने मेरे मुंह पर एक फटकार की तरह खींचकर मारी थी कि वह जब चाहती तुम्हारे पास वापिस लौट सकती थी । वह अपनी बेवफाई के बावजूद भी जब चाहती तुम्हें दोबारा हासिल कर सकती थी जबकि मैं तो अपनी पूरी जिंदगी कैसा भी मर्द हासिल करने में नाकामयाब रही थी, कोई मर्द हासिल होने की ख्वाहिश दिल में लिए-लिए बूढ़ी हो गई थी । मैं ओल्ड मेड बन गई थी । सुधीर, अपनी जिस बहन की खातिर मैंने अपनी जिंदगी तबाह कर दी थी, उसने मुझे ओल्ड मेड कहा था । ओल्ड मेड । मैं ओल्ड मेड थी । मैं बुढिया थी ।”
वह एक क्षण ठिठकी और फिर बोली - “घर में सब्जी काटने के लिए कोई ढंग की छुरी नहीं थी । आज सुबह मेरे बंधन काटने के लिए किचन में से जो छुरी तुम उठाकर लाए थे, उसकी हालत तुमने देखी ही थी । मैंने कल शाम को एक नई छुरी खरीदी थी जिसे मैं कल कार से निकालकर किचन में ले जाना भूल गई थी । वह छुरी उस वक्त भी मेरी कार में मौजूद थी । सुधीर, मैं सच कहती हूं, पता नहीं कब वह छुरी मेरे हाथ में आई और कब अपने सामने खड़ी, मेरी खिल्ली उड़ाती, अपनी बहन पर मैंने उससे वार किया । मुझे तो छुरी के फल पर खून सना दिखाई दिया था तो मुझे सूझा था कि मैंने क्या कर दिया था । मैंने अपनी उस बहन का खून कर दिया था जिसकी हर मुसीबत मैं अपने सिर लेती आई थी जिसकी हर ज्यादती मैं बर्दाश्त करती आई थी लेकिन..लेकिन...कल रात ...कल रात मुझे उसकी बातें बर्दाश्त न हुई ... कल मेरे धीरज का बांध टूट गया, सुधीर, और मैंने .. मैंने ..”
उसका गला रूंध गया और वह हिचकियां ले-लेकर रोने लगी ।
मैंने उसे रोने दिया । जो टेंशन उसके भीतर बनी हुई थी उसका यही इलाज था । यूं ही उसका दिल हल्का हो सकता था ।
“मेरी घायल बहन” - हिचकियां लेती-लेती ही वह बोली - मेरी मेरे हाथों से घायल बहन, लड़खड़ाती हुई कार से परे हटी और तुम्हारे फ्लैट वाली इमारत के फाटक की तरफ बढ़ गई । छुरी मेरे हाथ से निकलकर कार के फर्श पर गिर गई और मैं हक्की-बक्की से उसे देखती रही । मैं उसे पुकारना चाहती थी लेकिन मेरे मुंह से आवाज न निकली, मैं दौड़कर उसके पीछे जाना चाहती थी, मैं हमेशा की तरह उसे अपनी बांहों में ले लेना चाहती थी और उसकी सारी बलाएं अपने सिर ले लेना चाहती थी, लेकिन मैं अपनी जगह से हिल भी न सकी । फिर वह फाटक ठेलकर भीतर दाखिल हो गई ...”
“उस वक्त एयरबैग कहां था ?”
“वह मेरी कार के पास सड़क पर पड़ा था । उसके घायल होते ही वह उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया था । लेकिन उसने उसे उठाने की कोशिश नहीं की थी ।”
“फिर ?”
“वह एयरबैग सड़क पर से मैंने उठा लिया । फिर मैं वहां से भाग खड़ी हुई । लेकिन अभी मैं मूलचंद हस्पताल के चौराहे पर ही पहुंची थी कि मैंने कार रोक दी । हस्पताल की शक्ल देखने का कोई ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव मेरे दिल पर हुआ कि मैं आगे न बढ़ सकी । मैंने सोचा पता नहीं तुम अपने फ्लैट पर मौजूद थे भी या नहीं । मैंने सोचा कि शायद वह गंभीर रूप से घायल न हुई हो और वक्त रहते हस्पताल पहुंचा दिये जाने पर उसकी जान बच सकती हो । लेकिन अगर तुम उसे फ्लैट पर न मिले तो उसे कौन हस्पताल पहुंचाता । सुधीर, मेरा दिल पुकार-पुकारकर कहने लगा कि मुझे उसको यूं असहाय छोड़कर भाग नहीं खड़ा होना चाहिए था । आखिर वह मेरी बहन थी, मेरी मां-जाई थी ।”
“तुम वापिस लौटीं ?”
“हां । फौरन । लेकिन इस बार मैंने अपनी कार परे ही छोड़ दी । कार का इंजन बहुत खर्र-खर्र करता था । पहली बार तो मुझे इस बात की परवाह नहीं थी और न ही इस बात से कोई फर्क पड़ता था, लेकिन इस बार मैं नहीं चाहती थी कि कार के खर्र-खर्र करते इंजन की वजह से घटनास्थल पर अगर कोई व्यक्ति मौजूद हो तो उसकी तवज्जो मेरी तरफ जाये । सड़क पर उगे पेड़ों की ओट लेती हुई मैं पैदल आगे बढ़ी । मंजुला का एयरबैग मैंने कार से निकाल लिया था और वह उस वक्त मेरे पास था । मैं तुम्हारे फ्लैट वाली इमारत के थोड़ा करीब पहुंची तो मुझे सड़क पर तुम दिखाई दिये । तुम मंजुला वाली एम्बैसडर के पास खड़े किसी से बात कर रहे थे । फिर तुम उस आदमी को, जो कि शायद कोई शराबी था, छोडकर भीतर चले गए । मैं वहीं ठिठकी खड़ी रही । मैं फैसला नहीं कर पा रही थी कि अब, जबकि मुझे दिखाई दे गया था कि तुम अपने फ्लैट पर मौजूद थे, मुझे मंजुला की सहायता के लिए आगे बढ़ना चाहिए था या नहीं । तभी तुम दोबारा इमारत से बाहर निकले । मैंने तुम्हें फाटक के पहलू में बने लैटर बॉक्स को खोलते और बंद करते देखा । फिर तुम काली एम्बैसडर पर सवार होकर वहां से चले गए । तुम्हारे जाने के बाद मैं ओट से बाहर निकली और आगे बढ़ी । मैंने तुम्हारा लैटर बॉक्स खोलकर देखा तो भीतर मुझे एक चाबी दिखाई दी । वह चाबी मैंने वहां से निकाल ली । ऊपर जाकर मैंने उस चाबी से तुम्हारे फ्लैट का दरवाजा खोला । मैं भीतर दाखिल हुई । वह फर्श पर पड़ी थी । वह....वह मर चुकी थी । मेरा जी तो चाह रहा था कि मैं अपनी बहन की लाश के पास बैठ जाऊं और तुम्हारे लौटने का इंतजार करूं लेकिन मैं ऐसा करने की ताव न ला सकी । मैं भला कैसे यह भूल सकती थी कि अपनी बहन को मौत की गोद में पहुंचाने वाली मैं थी ।”
वह फिर रोने लगी ।
“फिर क्या हुआ ?” - मैं इस बार उतावलेपन से बोला ।
“फिर मैंने एयर बैग पलंग के नीचे डाल दिया और वहां से बाहर निकल गई । मैंने फ्लैट के दरवाजे को ताला लगा दिया और चाबी पहले की तरह लैटर बॉक्स में डाल दी । फिर मैं मोड़ पर आकर अपनी कार में सवार हुई और वहां से रवाना हो गई । रास्ते में खून से सनी छुरी को उठाकर मैंने सड़क के किनारे उगी झाड़ियों में फेंक दिया । मैं घर लौट आई । सुधीर, मुझे यह तो मालूम नहीं था कि मंजुला मरने से पहले तुम्हें मेरे बारे में कुछ बता सकी थी या नहीं, लेकिन जिस ढंग से तुम लाश को अपने कमरे में छोडकर वहां से रवाना हुए थे, उससे मुझे यही लगा था कि तुम मेरी ही तलाश में निकले थे । मैं यहां आ गई और किसी भी क्षण तुम्हारे यहां आगमन की प्रतीक्षा करने लगी । यही वजह है कि जब उस बदमाश डेविड ने यहां आकर घंटी बजाई थी तो मैंने यही समझा था कि तुम आए थे । इसीलिए मैंने फौरन दरवाजा खोल दिया था और वह आदमी मुझ पर चढ़ दौड़ा था । बाद में जब तुम यहां आए थे तो तुम्हारी सूरत पर एक निगाह डालते ही मैं समझ गई थी कि मंजुला ने मरने से पहले मेरे बारे में तुम्हें कुछ नहीं बताया था ।”
“अजीब बात है” - मैंने सिगरेट को पलंग की पट्टी के साथ मसलकर नीचे फर्श पर फेंक दिया और गहरी सांस लेकर बोला - “जिस बहन को तुमने मां बनकर पाला, उसका तुमने इसलिए खून कर दिया क्योंकि उसकी कोई चुभने वाली बात तुमसे बर्दाश्त न हुई । मृदुला, जरूर कोई और भी बात होगी । तुमने जो कुछ किया जरूर वैसा कुछ कर डालने की इच्छा तुम्हारे अचेतन मन में बहुत पहले से पनप रही थी, सिर्फ अपना विकराल रूप उस इच्छा ने कल प्रकट किया था । मृदुला, मंजुला से ताल्लुक रखती जरूर कोई और भी बात होगी जो तुम्हें हमेशा सालती रहती थी, कचोटती रहती थी ।”
“है ।” - वह क्षीण स्वर में बोली ।
“मैं सुन रहा हूं ।”
“सुबह” - वह बोली - “मैंने तुम्हें बताया था कि मंजुला जब आठ साल की थी तो उसके साथ क्या हादसा हुआ था । क...कैसे किसी आदमी ने उसके साथ जबरदस्ती अपना मुंह काला किया था । सुधीर वह आदमी जिसने मंजुला के साथ बलात्कार किया था वह...वह...उसका नाम प्रभात कुमार था । वह मेरी एक सहेली का भाई था और तब लगभग उनत्तीस साल का था । तब हमारे डैडी भी जिन्दा थे और वह हमारे ही घर ठहरा हुआ था ।”
“यहां ?”
“हां ।”
“वह किसलिए ?”
“क्योंकि उससे मेरी शादी होने वाली थी । मेरी उसके साथ विधिवत सगाई भी हो चुकी थी । मेरी सहेली और उसका परिवार पहले दिल्ली में ही रहता था, लेकिन बाद में वे लोग प्रभात के पिता की ट्रांसफर हो जाने की वजह से बनारस चले गये थे । प्रभात तब पहली बार दिल्ली आया था । दिल्ली में उसका कोई और रिश्तेदार नहीं था इसलिए वह हमारे ही यहां ठहरा था । आखिर वह इस घर का होने वाला दामाद था ।”
“आई अंडरस्टैंड ।”
“वे लोग जब दिल्ली में रहते थे तो प्रभात मुझे पसन्द करने लगा था । मुझे भी वह अच्छा लगा था । फिर मेरी सहेली ने बिचौलिया बनकर बात बनवा दी थी और हमारे परिवार वाले हमारी शादी करने देने के लिए तैयार ही गये थे । मेरे डैडी को वह लड़का ज्यादा पसन्द नहीं था क्योंकि एक तो उनकी निगाह में वह उम्र में बड़ा था और दूसरे वे समझते थे कि अभी मैं भी शादी की उम्र तक नहीं पहुंची थी ।”
“तुम्हारी तब क्या उम्र थी ?”
“अट्ठारह ।”
“बात तो तुम्हारे पिता की ठीक ही थी । वह तुमसे ग्यारह साल बड़ा था ।”
“ठीक है लेकिन क्योंकि मुझे एतराज नहीं था इसलिए मेरे डैडी मान गये थे । हमारी सगाई हो गई थी और और छ: महीने बाद हमारी शादी भी होने वाली थी । सुधीर, मैं प्रभात से इतना प्यार करती थी कि मैं शादी से पहले ही उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बना बैठी थी । मैं अपना सर्वस्व प्रभात पर न्योछावर कर चुकी थी । मैं मन, वचन, कर्म से उसकी हो चुकी थी जब उसने वह जलील हरकत की थी । उसने मेरी आठ साल की बहन के साथ बलात्कार किया । उसने मेरे मुकाबले में मेरी बहन को पसन्द किया । जिस सुबह उसने मंजुला के साथ वह सब किया था उससे पहली रात को भी वह मेरे पास आया था । जब हमारे मम्मी-डैडी सो चुके थे तो वह चुपचाप मेरे कमरे में घुस आया था और सारी रात मेरे शरीर से खिलवाड़ करता रहा था । फिर भी अगली सुबह उसने मंजुला वो साथ वह हरकत कर डाली ।”
“ऐसा काम कोई नोर्मल आदमी तो नहीं कर सकता । जरूर उसके मस्तिष्क में कोई विकार रहा होगा ।”
“भगवान जाने क्या बात थी, लेकिन जो कुछ हुआ बहुत हौलनाक हुआ । बाद में वह मंजुला को जान से मारकर तुगलकाबाद के खंडहरों में ही कहीं फेंक आने की फिराक में था, लेकिन कुछ टूरिस्टों ने उसे देख लिया था । उसे पुलिस पकड़कर ले गई थी । मंजुला को हस्पताल में पहुंचा दिया गया था । मेरी तरफ किसी की तवज्जो नहीं थी । कोई मेरे दिल की हालत नहीं जानता था । कोई मेरे दिल की हालत समझना भी नहीं चाहता था । आखिर वह कमीना मेरी जिंदगी भी तो तबाह कर गया था । लेकिन हर किसी की हमदर्दी मंजुला के साथ थी । डैडी को तो दिल का दौरा ही पड़ गया था । उस हादसे का उन पर ऐसा असर हुआ था कि एक दौरे को तो वे झेल गये थे लेकिन दूसरा दौरा पड़ने पर उनका काम तमाम हो गया था ।”
“आई सी ।”
“जब मंजुला हस्पताल में भरती थी तो मैं और मम्मी डैडी बाहर हस्पताल के वेटिंग रूम में मौजूद थे । हमें तब अभी मंजुला की हालत की सही खबर नहीं थी । कोई कह रहा था कि इतनी कम उम्र लड़की के साथ बलात्कार होने पर वह मर भी सकती थी । मंजुला के अंजाम से दहशत खाई हुई मैं रो रही थी, मेरी मम्मी रो रही थी, और मेरे डैडी का भी बुरा हाल था । फिर एकाएक डैडी के धीरज का बांध टूट गया । वे पागलों की तरह मुझ पर बरसने लगे । उन्होंने सारी घटना के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया । उन्होंने कहा कि मेरी ही वजह से प्रभात के हमारे घर में कदम पड़े थे और वह नौबत आई थी । उस क्षण मेरे डैडी ने, मेरे पैदा करने वाले ने, मुझे यूं फटकारा, जैसे में उनकी बेटी नहीं थी, जैसे मैं कोई गैर थी, कोई अजनबी थी । जानते हो कई लोगों के सामने उन्होंने मुझे क्या कहा ? उन्होंने कहा - क्यों तू हर किसी की तरह एक नोर्मल इंसान से गठजोड़ न कर पाई ? क्यों तुझे ये वहशी दरिंदा ही पसंद आया था ? फिर तभी उन्हें दिल का दौरा न पड़ा होता तो वे और पता नहीं क्या-क्या कहते ।”
“ओह !”
“उस रोज मैं भी मर ही गई होती, लेकिन मेरी किस्मत में क्योंकि आज का दिन देखना लिखा था, इसलिए बच गई ।”
मैं खामोश रहा ।
“और मंजुला ! वह बाद में सब कुछ भूल गई । इतना हंगामा मचा, डैडी की जान चली गई, मेरी जिन्दगी तबाह हो गई और मंजुला सब-कुछ भूल गई । जिस हादसे की याद को मैं भरपूर कोशिश करने के बावजूद कभी अपने जहन से न निकाल पाई, वह मंजुला बड़ी सहूलियत से भूल गई । बाद में उसे देखकर तो लगता था जैसे कुछ हुआ ही नहीं था । सुधीर, उसकी उस बदकिस्मती के लिए मैं उम्र भर अपने आपको गुनाहगार करार देती रही, बाद में उसका जो पतन हुआ, उसके लिए भी मैं अपने आपको जिम्मेदार ठहराती रही, इसीलिए वह अपनी जिन्दगी का तिनका तिनका बिखेरती रही और मैं उसे बीनती रही । मैंने हमेशा अपनी हस्ती को गर्क करके, अपना आपा भूलकर उसका कोई भला करने की कोशिश की, उसके किसी काम आने की कोशिश की और उसने कल रात तुम्हारे घर के सामने वही बातें फेंककर मारी जो कभी मेरे डैडी ने भी कहीं थीं । उसने कहा कि मैं कभी तुम्हारे जैसा कोई मर्द हासिल नहीं कर सकती थी, क्योंकि वैसा मर्द हासिल होने लायक अब मेरी उम्र नहीं रही थी । उसने मुझे ओल्ड मेड कहा । मुझे बुढ़िया कहा । सुधीर, अगर मैं ओल्ड मेड थी तो क्या यह बात एक गंदी गाली की तरह मुझ पर उछालते समय एक क्षण के लिए भी उसने सोचा था की ओल्ड मेड मुझे किसने बनाया था? किसने बनाया था मुझे ओल्ड मेड ?”
एकाएक उसने एक झटके से अपने शरीर पर से रजाई परे उतार फेंकी ।
“सुधीर” - वह बोली - “इधर मेरी तरफ देखो । और खुद ही फैसला करो । क्या मैं ओल्ड मेड हूं ? क्या मैं बुढ़िया हूं ? देखो मेरी तरफ ।”
मैं उससे निगाह मिलाने की, उसके नंगे जिस्म की तरफ देखने की, ताव न ला सका । मैंने रजाई का एक सिरा पकड़ा और उसे फिर उसके जिस्म पर डाल दिया ।
“और फिर रात को जो कुछ हुआ” - एकाएक वह रुआंसे स्वर में बोली - “जो कुछ हुआ क्या वह मैं करना चाहती थी? उस वक्त मेरी अक्ल न मारी गई होती, मुझ पर शैतान न हावी हो गया होता, तो क्या मैं अपनी छोटी बहन की जान लेती ? उस वक्त क्या मुझे मालूम था कि मैं अपनी बहन की जान ले रही थी ? सुधीर, तुम कल्पना नहीं कर सकते कि उसकी मौत के बाद मेरे दिल पर क्या बीत रही है । मैं कहती हूं कि अच्छा ही हुआ कि तुम्हें मालूम हो गया कि उसका कत्ल मैंने किया है और मैंने भी अन्दर ही अन्दर घुटते रहने के स्थान पर अपने मन की भड़ास निकाल दी । मैं तो आज सुबह ही तब तुम्हें सब-कुछ कह देने वाली थी जब मंजुला के सन्दर्भ में प्रभात कुमार की करतूत का जिक्र आया था लेकिन तब भय ने मेरी जुबान न खुलने दी । बाद में जब तुम यहां से चले गए तो मुझे तुम्हारी चिंता भी सताने लगी । मैं सोचने लगी कि कहीं पुलिस यह न समझने लगे कि कत्ल तुमने किया था । मैंने तुम्हारे फ्लैट पर फोन किया था लेकिन दूसरी तरफ से तुम्हारी जगह कोई सब-इंस्पेक्टर यादव बोल पडा था । मैंने घबराकर फौरन टेलीफोन बंद कर दिया था । मैं उससे यह तक पूछने की हिम्मत अपने में नहीं जुटा पाई थी कि तुम वहां थे या नहीं थे । फिर तुम दोबारा यहां पहुंचे और तुमने मुझे बताया कि मंजुला का कत्ल किसी सैमुअल जोन्स ने किया था और खुद सैमुअल जोन्स मर चुका था । मैंने सोचा कि अब कभी किसी को असलियत की खबर न हो पायेगी और अब मुझे भी मंजुला की मौत की हकीकत को अपनी जुबान पर नहीं लाना पड़ेगा लेकिन....सुधीर, भगवान कसम, मैं उस की जान नहीं लेना चाहती थी, लेकिन जिस अभिमान से उसने तुम्हारे पास जाने का जिक्र किया था और मेरी खिल्ली उड़ाई थी, अगर उसने...” - वह ठिठक गई । उसने एक गहरी सांस ली और बोली - “अब बार-बार एक ही बात दोहराने का क्या फायदा ?”
कमरे में एक बोझिल सन्नाटा छा गया ।
“मर्द को अपने बस में कर लेने की अपनी शक्ती की डींग” - थोड़ी देर बाद वह फिर बोली - “उसने तुम्हारे सन्दर्भ में मारी थी । उसने यह तुम्हारे बारे में कहा था कि अपनी बेवफाई के बावजूद वह जब चाहती तुम्हें दोबारा हासिल कर सकती थी । ऐसा उसने किसी और के बारे में कहा होता और एक जनरल बात के तौर पर कहा होता तो भी मैं बर्दाश्त कर लेती, लेकिन उसने यह बात खास तुम्हारे बारे में कही । सुधीर, मेरी निगाह में तुम्हारा इमेज बहुत उंचा है । मैंने अपनी बहन को कभी तुम्हारे काबिल नहीं समझा । मैं हमेशा सोचती थी कि तुम्हारे जैसे मर्द के पल्ले मंजुला जैसी छिनाल औरत बंधना तुम्हारे साथ जुल्म था । सुधीर, मैं हमेशा मन ही मन तुम्हारे सपने देखा करती थी और तुम्हारे और अपने साथ की कल्पना किया करती थी । जब तुम्हारा उससे तलाक हुआ था तो मैं सोचा करती थी कि क्या कोई ऐसा करिश्मा हो सकता था कि तुम्हारा-मेरा साथ बन जाये, कि मुझे तुम मिल जाओ । मैं सोचा करती थी कि यह आदमी अगर मुझे अपनी पांव की जूती बनाकर भी रखना चाहे तो मुझे ऐतराज नहीं होगा । मैं मन ही मन तुम्हारी पूजा करती थी, सुधीर । और मंजुला ने मुझे कहा कि उसकी तमाम बदकारियों के बावजूद भी तुम्हारे जैसा मर्द उसका हो सकता था, मेरा नहीं । सुधीर, मेरा पहले से ही छलनी दिल इतनी बड़ी तौहीन बर्दाश्त न कर सका । मैं पागल हो गई । और पागलपन में मैंने उस पर छुरी से वार कर दिया ।”
वह फिर सिसकने लगी ।
थोड़ी देर बाद उसने मेरी तरफ निगाह उठाई । उसकी आंखों में ऐसा कातर भाव था जैसे कोई बकरी जिबह की जाने वाली हो ।
“मेरी जिन्दगी” - वह आंसुओं में डूबी आवाज में बोली - “एक ऐसी बंजर धरती की तरह है जिस पर कभी कोई ओस की बूंद नहीं गिरी, जिस पर कभी कोई फूल नहीं उगा । तनहाई के अंधेरों के सिवाय मेरी जिन्दगी में कुछ नहीं । मेरा जिस्म तनहा है, मेरी जान तनहा है, मेरी दुनिया तनहा है । कितने साल-कितने साल मैंने यूं ही गुजार दिये । मेरी वीरान जिन्दगी में कभी कोई बहार न आई । पहले प्रभात की करतूत की दहशत मुझ पर हावी रही और बाद में जब मैंने अपनी जिन्दगी के उस पहलू के बारे में सोचा जिसमे मर्द का अहम रोल होता है तो तब तक बहुत देर हो चुकी थी । सुधीर, आज...आज सत्तरह साल बाद मैंने अपने शरीर पर किसी पुरुष का स्पर्श महसूस किया है । आज मैंने महसूस किया है कि मैं एक भरपूर औरत हूं और किसी भी औरत से, खास तौर से मंजुला से, ज्यादा भरपूर औरत हूं । सुधीर, मैंने मंजुला का खून किया है । मैं उस खून की सजा की हकदार हूं । मैं कोई रिआयत नहीं चाहती, मैं किसी के रहमोकरम की भीख नहीं हासिल करना चाहती । तुम बेशक मुझे पुलिस के हवाले कर देना, लेकिन ऐसा करने से पहले एक बार फिर...एक बार फिर मुझे अपनी बाहों में ले लो । मुझे अपने कलेजे से लगा लो और कह दो कि मैं ठंडी औरत नहीं हूं । कह दो कि मैं ओल्ड मेड नहीं हूं ।”
वह लता की तरह मेरे साथ लिपट गई । उसके दो हाथ हजार हाथ बनकर मेरे जिस्म के हर हिस्से पर फिरने लगे । उसने मुझे यूं कस कर अपने साथ भींचा कि मुझे सांस ले पाना दूभर लगने लगा । वह रो रही थी, कराह रही थी, सुबक रही थी और साथ-साथ बुदबुदा रही थी - “मुझे छोड़ना नहीं । छोड़ना नहीं मुझे, अभी मुझे अपने आप से अलग न करना । मैं कत्ल की सजा भुगत लूंगी लेकिन मेरी सजा को अभी मुझसे दूर रखो ।”
अब वह फिर मेरे ऊपर चढ़ गई थी । उसकी सांस धौंकनी की तरह चलने लगनी थी । उसका सारा जिस्म पारे की तरह हिल रहा था । मुझे लग रहा था कि मैं उसके उस नामुराद जनून की बलि चढ़ाया जा रहा था ।
लेकिन फिर एकाएक उसका शरीर यूं स्थिर हो गया जैसे बिजली बन्द हो जाने से कोई मशीन बन्द हो जाती है । मैं कुछ क्षण बिना हिले-डुले पलंग पर पड़ा रहा । फिर मैंने धीरे से उसे अपने ऊपर से परे धकेला । अभी तक आग का गोला बनी हुई वह औरत एक रेत के बोर की तरह मेरे पहलू में लुढ़क गई ।
मैं उसके पहलू से यूं उठा जैसे कयामत आकर गुजर गई थी और मैं ही इकलौता मुर्दा रह गया था जो अभी तक अपनी कब्र में से उठकर खड़ा नहीं हुआ था ।
पलंग के पास फर्श पर मेरे कपडे पड़े थे जो पता नहीं कब उसने मेरे जिस्म से अलग कर दिये थे ।
मैंने एक सरसरी निगाह उसकी दिशा में डाली ।
हर औरत जन्मजात अभिनेत्री होती है । मृदुला को खूब मालूम था, सबसे पहले मालूम था, हत्यारे से पहले हत्या की बात और कौन जान सकता है, कि उसकी बहन की हत्या हो चुकी थी, फिर भी सुबह जब मैंने उसे वह खबर सुनाई थी तो वह यूं चौंकी थी जैसे उस क्षण से पहले वह उस बारे में कतई कुछ नहीं जानती थी और फौरन यूं हिचकियां ले लेकर रोने लगी थी जैसे कोई औरत ही रो सकती थी ।
वह पलंग पर चित्त पड़ी थी । उसकी आंखे बंद थी और चेहरे पर शान्ति के भाव थे । केवल उसकी सांस अभी भी तेज चल रही थी । उसकी सांसों के साथ उसकी पहाड़ जैसी छातियां तेजी से उठ गिर रही थी ।
मैंने उसकी तरफ से पीठ फेर ली ।
मशीन की तरह मैंने अपने कपडे पहने ।
मैंने कलाई पर बंधी अपनी घडी पर दृष्टिपात किया ।
ठीक ढाई बजे थे ।
तब से ऐन बारह घंटे पहले मंजुला का कत्ल हुआ था ।
मुझे लग रहा था कि उन बारह घंटों में मैं एक पूरी जिंदगी जी कर मर चुका था ।
मैं भारी क़दमों से चलता हुआ टेलीफोन के पास पहुंचा । कांपते हाथों से मैंने रिसीवर उठाकर कान से लगाया ।
फिर मैंने सब-इंस्पेक्टर यादव का नंबर डायल कर दिया ।
समाप्त
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