डिनर लेने के बाद मोना चौधरी नींद लेने के लिए बेडरूम जा पहुंची थी। डिनर, सुमन ले आई थी। पास ही के होटल से पैक कराकर। तीनों ने एक साथ ही लिया था।

मोना चौधरी के बेडरूम में जाने के बाद महाजन ने होंठ सिकोड़कर सुमन को देखा।

"अब हम क्या करें?"

"दूसरे बेडरूम में चलते हैं।" सुमन ने अर्थपूर्ण स्वर में कहा।

"तीसरा बेडरूम भी है?"

"क्यों पूछा?"

"कहीं तुम तीसरे में न चली जाओ।"

"चिंता मत करो। लोरी गाकर तुम्हें सुलाने के बाद ही, मैं सोऊंगी।" सुमन हौले से हंसी।

"पक्का?" महाजन ने आँख दबाई।

"बेडरूम में चलो। पक्का भी हो जायेगा।"

"ऐसा।" महाजन उठ खड़ा हुआ--- "फौरन चलो।" कहते हुए उसने सुमन की कमर में हाथ डाला।

"बहुत जल्दी में हो।" सुमन उससे सटती हुई पुनः हंसी।

"जो काम हो जाये, वो ही बढ़िया। बोतल उठा लाओ।"

"मेरे होते हुए बोतल की क्या जरूरत है।" सुमन ने शरारती स्वर में कहते हुए उसका गाल थापथपाया।

"क्यों--- तुममें अल्कोहल है क्या, व्हिस्की का काम भी देती हो।"

"अल्कोहल का टब हूँ। व्हिस्की का ड्रम हूँ। एक बार डुबकी मारकर देखो, निकल नहीं पाओगे।"

"खूब। अब आएगा मजा। मैं भी तो देखूं कि तुम्हारा ड्रम कितना गहरा कि जो निकल नहीं पाऊंगा। नशा भी देख लूं कि उतरता है या और चढ़ता है। बेडरूम का रास्ता दिखाओ।"

"बेडरूम का रास्ता तो दिखा देती हूँ। सुमन महाजन की छाती पर हाथ फेरते हुए बोली--- "लेकिन वहां जाकर किसी और रास्ते के बारे में मुझसे मत पूछना। बाकि के सारे रास्ते तुम्हें ही ढूंढने होंगे।"

"फिक्र मत करो। इन रास्तों पर तो दौड़ लगाने में, मेरा जवाब नहीं। अब चलोगी भी या रात यहीं निकाल दोगी।"

उसके बाद तो महाजन को नहीं, सुमन को जल्दी थी बेडरूम में पहुँचने की। महाजन की बांह कथित नशे की बोतल की, कमर से लिपटी हुई थी। मुकाबले के लिए पूरे तैयार थे दोनों खिलाड़ी।

■■■

उस वक्त रात का एक बज रहा था। मुकाबले का आखिरी दौर समाप्त हो चुका था। दोनों बराबरी पर खरे उतरे थे। गिले-शिकवे-शिकायत की नौबत आने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। उसने ठीक ही कहा था कि वो व्हिस्की का ड्रम है और महाजन ने ड्रम की ढेर सारी व्हिस्की पी थी, लेकिन वो जानता था कि ड्रम का माल खत्म नहीं होने वाला, वो अभी भी ऊपर तक भरा है और भरा ही रहेगा।

फोन की घण्टी बजने पर, सुमन ने फुर्ती दिखाई और आधे-अधूरे कपड़े में ही ड्राइंगरूम में पहुंचकर रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ रतनचंद था।

"सर।" आवाज सुनते ही सुमन के होंठों से निकला।

"मोना चौधरी कहाँ है?"

"वो नींद में...।"

"उसे उठाओ। बात करनी है।"

"यस सर।"

तब तक महाजन कपड़े पहनकर, वहां आ पहुंचा था।

"सर का फोन है। मोना चौधरी से बात करना चाहते हैं।" सुमन ने कहा।

"अभी बुलाता हूँ।" कहने के साथ ही महाजन दूसरे बेडरूम की तरफ बढ़ गया।

सुमन ने रिसीवर फोन के पास ही रखा और पूरे कपड़े पहनने चली गई।

मोना चौधरी ने आकर फोन पर बात की।

"कहो।"

"मोना चौधरी। वो आदमी, जिसके बारे में तुम्हें बताया था कि, जो तुम्हें इंडस्ट्रीयल एरिये के उस मकान में मिला था और मेरे पास भी उसने ऑफिस के बाहर फायर किये थे, उसके बारे में मालूम हुआ है।"

"क्या?"

"अगर तुम अभी उस पर हाथ डालना चाहती हो तो आ जाओ। वो मेरे आदमी की निगाहों में है। इस वक्त उस पर नजर रखी जा रही है।" रतनचंद ने जल्दी से कहा।

"कहाँ आऊं?"

"सुमन को फोन दो। मैं उसे समझा देता हूँ। वो तुम्हें ठीक तरह बता देगी।" रतनचंद की आवाज आई।

तब तक सुमन पूरे कपड़े पहनकर आ चुकी थी।

"रतनचंद से बात करो।" मोना चौधरी ने रिसीवर उसकी तरफ बढ़ाया।

"यस सर।" सुमन ने रतनचंद से बात की।

आधे मिनट बाद रिसीवर रखकर सुमन ने बताया कि उन्हें कहाँ पहुंचना है।"

"मामला क्या है बेबी?"

मोना चौधरी ने बताया।

"उस साले की गर्दन तो मैं तोड़ूंगा।" महाजन दांत भींचकर कह उठा।

तभी सुमन बोली।

"सर ने कहा है कि आप लोग अपनी कार इस्तेमाल न करें। इससे पहचाने जाने का खतरा हो सकता है।"

"कार तो कहीं से दूसरी भी मिल जायेगी।" महाजन बोला।

फौरन ही मोना चौधरी और महाजन बाहर निकलते चले गए।

■■■

कुछ दूरी पर पार्क हुई कार पर उन्होंने कब्जा जमाया और सुमन के बताये रास्ते पर चल पड़े। जहाँ पहुंचना था, वहां पहुँचने के लिए, आधी रात को घूम रहे एक ऑटो वाले से पूछना पड़ा और बीस मिनट में, वहां पहुँच गए। वे कार छोड़कर बाहर निकले।

रतनचंद अँधेरे से निकलकर उनके पास आ पहुंचा।

"कहाँ है वो?" मोना चौधरी की निगाहें अँधेरे में घूमने लगीं।

"आओ मेरे साथ।"

रतनचंद उन दोनों को लेकर, फुटपाथ पर आगे बढ़ गया। रात के वक्त में स्ट्रीट लाइट चमक रही थी। कभी-कभार कोई वाहन सड़क पर से गुजर जाता था। वरना गहरी सुनसानी ही थी।

"तुम्हें कैसे मिला वो?" मोना चौधरी ने चलते-चलते पूछा।

"मुझे नहीं, मेरे असिस्टेंट की निगाहों में आ गया वो।" रतनचंद ने कहा--- "मेरे दो असिस्टेंट शुरू से ही उन लोगों को तलाश कर रहे थे, जो मेरी जान के पीछे थे और जो तुम लोगों के पीछे थे। जब मुझ पर हमला हुआ था तो वो पास ही कार में बैठे थे। उन लोगों ने उन्हें देखा था। इसलिए मैंने उन्हें यह काम सौंपा कि हर अच्छी-बुरी जगह पर, नजर रखे और उन्हें तलाश करें। कुछ देर पहले ही मेरे एक असिस्टेंट का, उस ठिकाने पर फोन आया, जहाँ मैं अपने अन्य असिस्टेंट के साथ मौजूद था। उसने मुझे बताया तो मैंने उसी वक्त तुमसे फोन पर बात की।"

आगे बढ़ते जा रहे थे तीनों।

"पास ही में नाइट क्लब है। जोकि काफी बदनाम है। शाम सात बजे खुलता है और सुबह पांच बजे बंद होता है। शराब-औरत-जुआ, सब कुछ मोटे दामों पर वहां हासिल हो जाता है। पुलिस को मोटी रकम मिलती है वहां से, इसलिए पुलिस उस तरफ से आँखें फेरे हुए है। मेरे असिस्टेंट को वो वहीं, जुआ खेलते दिखा है।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा।

"अकेला है?" मोना चौधरी ने पूछा।

"मैं नहीं जानता। इस बारे में मेरे असिस्टेंट से कोई बात नहीं हुई?"

दो मिनट में ही वे एक गली के किनारे पर पहुंचकर ठिठके।

गली में और बाहर भी फुटपाथ के साथ, कारों की कतार नजर आ रही थी। कमर्शियल इलाका था ये। हर तरफ बड़ी-बड़ी बिल्डिंग नजर आ रही थी।

तभी एक व्यक्ति अँधेरे से निकल, उनकी तरफ बढ़ा। वो पचास वर्ष की उम्र का फुर्तीला व्यक्ति था। सामान्य कद था और स्वस्थ्य नजर आ रहा था।

उसके पास पहुँचते ही रतनचंद ने मोना चौधरी से कहा।

"ये कृष्ण सूरी है मेरा काबिल असिस्टेंट और ये मोना चौधरी और महाजन हैं।"

"उन्होंने हाथ मिलाये और आगे बात हुई।

"वो अभी भीतर ही है।" कृष्ण सूरी ने कहा।

"अकेला है?" मोना चौधरी ने पूछा

"नहीं। दो और हैं उसके साथ और वे भी खतरनाक हैं।" कृष्ण सूरी ने मोना चौधरी से कहा।

"भीतर कहाँ हैं वो।" मोना चौधरी के होंठ भिंच गए--- "इस तरह भीतर के बारे में बताओ कि जब हम भीतर जाएं तो हमें लगे कि, वहां हम पहले भी आ चुके हैं। रास्तों की पूरी पहचान करा दो।"

कृष्ण सूरी गली के भीतर की तरफ इशारा करके बोला।

"भीतर प्रवेश करते ही चौथा दरवाजा है, बाहर कोई बोर्ड नहीं लगा। दरवाजे से ही ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां शुरू हो जाती हैं। पहली मंजिल पर बार है। कुर्सियां-टेबल हैं। व्हिस्की महंगी है। दूसरी मंजिल पर जुआ चलता है। खेलने के लिए टेबलें लगी हैं। जुए की मशीने भी हैं। खेलने वालों को, कम कपड़े पहने लड़कियां व्हिस्की सर्व करती हैं, जो कि ग्राहक भी तलाश करती रहती हैं। कोई जरुरी नहीं कि भीतर जाकर व्हिस्की पीनी है या जुआ खेलना है। सीधे-सीधे लड़की डिमांड भी की जा सकती है। लड़कियां बढ़िया मिलती हैं और कीमत भी ऊँची वसूली जाती है। तीसरी मंजिल पर, इन कामों के लिए खासतौर से केबिन बना रखे हैं। यानि कि जो भी भीतर जायेगा, किसी-न-किसी रूप में जेब हल्की कराकर ही लौटेगा। सीढ़ियां ऊपर जाती जा रही हैं। पहली मंजिल पर काम न हो तो, सीढ़ियां चढ़ते हुए दूसरी मंजिल पर पहुँच जाओ। इसी तरह तीसरी पर। कोई पेचीदा रास्ता नहीं है। सीधा जाने और सीधा आने का यही रास्ता है। वैसे पीछे का रास्ता है। लेकिन वो रास्ता अक्सर बंद रहता है, किसी खास ही स्थिति में खोला जाता होगा।"

"हम आगे के रास्ते से ही काम चला लेंगे।" महाजन होंठ भींचकर कह उठा।

मोना चौधरी ने रतनचंद को देखा।

"तुम्हारा क्या प्रोग्राम है।"

"मैं भीतर जाकर कुछ भी नहीं कर सकता। देखने वालो में कोई-न-कोई मुझे पहचान ही लेगा कि मैं प्राइवेट जासूस रतनचंद हूँ। पुलिस के पचड़े में फंस जाऊंगा।" रतनचंद ने स्पष्ट कहा--- "मैं और मेरा असिस्टेंट बाहर रहकर ही तुम्हारी वापसी का इंतजार करेंगे।"

"आओ महाजन।"

तभी कृष्ण सूरी ने टोका।

"तुम्हारा भी वहां जाना ठीक नहीं होगा।"

"क्यों?" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"इस जगह पर ठीक लोग नहीं आते और तुम वैसे भी खूबसूरत लग रही हो। ऐसे में...।"

"चिंता मत करो।" महाजन ने खतरनाक स्वर में कहा--- "हम भी ठीक लोग नहीं हैं।"

"क्लब की अपनी सिक्योरिटी है।" कृष्ण सूरी ने पुनः कहा--- "सिक्योरिटी क्या, सब नंबरी बदमाश हैं कि अगर कोई गड़बड़ करे, दंगा करे तो उसे उठाकर बाहर फेंका जा सके।"

मोना चौधरी ने सिर हिलाया और रतनचंद से बोली।

"तुम्हारे पास रिवाल्वर होगी।"

"हाँ। लेकिन उसका लाइसेंस मेरे नाम पर है। यहाँ उसका इस्तेमाल करना, मेरे लिए फंसना होगा।"

कृष्ण सूरी ने अपने कपड़ों में हाथ डालते हुए कहा।

"मेरे पास बिना लाइसेंस की रिवाल्वर भी है। मैं देता हूँ।"

मोना चौधरी ने कृष्ण सूरी से रिवाल्वर लेकर चैक की।

महाजन दोनों पर निगाह मारकर बोला।

"अजीब किस्म के प्राइवेट जासूस हो। गैरकानूनी हथियार लिए घूमते हो।"

"सब इंतजाम रखने पड़ते हैं।" रतनचंद ने गंभीर स्वर में कहा--- "अपनी जान को खतरा पैदा हो जाये तो दूसरी रिवाल्वर इस्तेमाल करनी पड़ती है। ताकि पुलिस से वास्ता न पड़े। पुलिस वैसे भी प्राइवेट जासूसों के बारे में अच्छे विचार नहीं रखती।"

मोना चौधरी ने रिवाल्वर अपने कपड़ों में छिपाई और महाजन के साथ गली में प्रवेश कर गई।

गली में चौथे दरवाजे पर वे ठिठके। सीढ़ियां ऊपर जाती नजर आई। गली में कोई भी नहीं था। एक-के-पीछे-एक, कारों की कतार ही नजर आ रही थी।

दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।

"उस हरामी का इंतजाम कैसे करना है?" महाजन का स्वर कठोर था।

"जैसे भी हो उसे वहां से उठा लाना है। तभी उससे कुछ मालूम किया जा सकेगा।" मोना चौधरी ने सर्द स्वर में कहा।

पहली मंजिल पर सीढ़ियां समाप्त हुईं। सामने शीशे का दरवाजा नजर आ रहा था। जिसके पार बार रूम था और लोग टेबलों पर बैठे नजर आ रहे थे। साथ ही घूमती सीढ़ियां ऊपर जा रही थीं। दोनों ने पुनः सीढ़ियां तय की और दूसरी मंजिल पर जा पहुंचे।

वहां शीशे का न होकर, लकड़ी का दरवाजा था। भीतर की मध्यम-सी आवाजें बाहर तक आ रही थीं और कोई वहां नजर नहीं आया।

मोना चौधरी की महाजन से निगाहें मिलीं। आँखों-ही-आँखों में इशारा हुआ। वे आगे बढ़े और लकड़ी का दरवाजा खोलते हुए, भीतर प्रवेश कर गए।

■■■

भीतर काफी बड़ा हॉल था।

बेहद करीने से खेलने के लिए टेबल लगी थी। किसी टेबल के गिर्द चार कुर्सियां थीं तो किसी के गिर्द छः। यानि कि खेलने वाले की जरूरत के मुताबिक कुर्सियां। इधर-उधर सरक जाती थीं। करीब तीस के आसपास टेबलें थीं और हॉल के बाकी हिस्से में जुआ की मशीनें मौजूद थीं। जहाँ काफी लोग खेलने में व्यस्त थे और नंबर लगने पर, भारी हो-हल्ला हो उठता। परन्तु उनकी आवाजें बाहर तक न के बराबर ही पहुँचती थीं।

टेबलों पर ताश खेलने वाले मौजूद थे और अधिकतर टेबलें भरी हुई थीं। टेबलों पर खिलाड़ियों के बीच नोटों के ढेर नजर आ रहे थे। कोई जीतता है या हारता है, इससे क्लब वालों को कोई वास्ता नहीं था। जो खेलने आता उसे फीस के तौर पर, दो हजार रूपये क्लब वालों को देने होते थे।

भीतर प्रवेश करते ही दोनों ठिठके।

दरवाजा बंद हो गया था।

वहां खेलने वालों में चंद औरतें भी थीं। जोकि नशे में लग रही थीं।

कईयों की निगाह उनकी तरफ उठी।

मोना चौधरी और महाजन की निगाह हर तरफ फिर रही थी। मोना चौधरी उस शख्स को पहचानने की, ढूंढने की चेष्टा कर रही थी, जो दिन में इंडस्ट्रीयल एरिये के मकान में उसकी ठुकाई और धमकी देकर गया था। कृष्ण सूरी के मुताबिक वो इस वक्त यहीं था।

तभी वहां का एक कर्मचारी उनके पास पहुंचा और मुस्कुराकर बोला।

"यहाँ पर आपका स्वागत है। मेरे ख्याल में आप लोग यहाँ पहली बार आये हैं।"

मोना चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया।

"मुझे यकीन है कि यहाँ आपको अच्छा लगेगा। खेलने के लिए, फीस के तौर पर प्रति व्यक्ति दो हजार रूपये उस काउंटर पर देकर, पर्ची लेनी होती है। आप वहां...।"

"हम यहाँ खेलने नहीं, अपने दोस्त से मिलने आये हैं।" महाजन मुस्कुराकर बोला--- "उसने बताया था कि वो यहाँ मिलेगा। अगर खेलने का मूड बना तो हम फीस जमा करा देंगे।"

वो कर्मचारी सिर हिलाकर, उनके पास से हट गया।

मोना चौधरी और महाजन आगे बढ़े। वहां की भीड़ में उस व्यक्ति को तलाश करने लगे। जल्दी ही वो मोना चौधरी को नजर आया। उसने दिन वाले ही कपड़े पहन रखे थे। वो जिस टेबल पर ताश खेल रहा था। वहां छः आदमी मौजूद थे और टेबल पर नोटों का ढेर लगा हुआ था।

मोना चौधरी ने धीमे से महाजन को बताया।

महाजन के चेहरे पर सख्ती छाने लगी।

"कृष्ण सूरी ने बताया था कि इसके साथ दो आदमी भी हैं।"मोना चौधरी ने कहा--- "तुम देखना, वो दोनों कहाँ हैं। अभी नजर में आ जाएंगे। मैं, इससे बात करने जा रही हूँ। इसे साथ ले चलना है।"

महाजन वहीं खड़ा रहा।

मोना चौधरी उस व्यक्ति की तरफ बढ़ गई।

■■■

मोना चौधरी सीधी उसकी बगल में पहुंचकर ठिठकी। रिवाल्वर निकाली और नाल गर्दन पर रख दी। वो कुर्सी पर बैठा खेल में व्यस्त था। नाल गर्दन पर लगते ही, पल भर के लिए वो सिहर उठा। उसने फौरन गर्दन घुमाई, तो नजरें मोना चौधरी के दरिंदगी भरे चेहरे पर पड़ी। दो पल तो वो फटी-फटी आँखों से उसे अविश्वास भरी निगाहों से देखता रह गया। उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मोना चौधरी उस तक पहुँच सकती है।

ये सब देखकर अन्य लोग चौंके।

एक-दो तो खिसकने की तैयारी भी करने लगे।

"तुम?" उस व्यक्ति के होंठों से निकला।

"हाँ, मैं...।" मोना चौधरी का स्वर क्रूरता से भर उठा--- "दिन में हुई मुलाकात अधूरी रह गई थी। उसे पूरा करने आई हूँ। तब पूरी तरह मजा नहीं आया था।"

एकाएक उसके चेहरे पर खतरनाक भाव आने लगे।

"मैंने तो सोचा था कि तुम जयपुर से चली गई होगी। नहीं गई, इसका मतलब, मरने का इरादा बना लिया है तुमने। अब तुम यहाँ से बचकर नहीं जा सकती।" वो एक-एक शब्द चबाकर कह उठा।

"कौन मारेगा मुझे।" मोना चौधरी ने गर्दन पर रिवाल्वर की नाल का दबाव बढ़ाया--- "तुम्हारे दो साथी।"

उसके होंठ भिंच गए।

तभी एक भारी, खतरनाक स्वर गूंजा।

"ये क्या हो रहा है।"

मोना चौधरी की निगाह उस तरफ उठी। उसकी आवाज ही नहीं, देखने में भी वो खतरनाक लग रहा था और नशे में भी था। सीधा, बे-खौफ उधर ही बढ़ा आ रहा था।

"वहीं रुक जाओ।" मोना चौधरी गुर्रा उठी।

"तुम।" आगे बढ़ते हुए उसने कहना चाहा।

"मैंने कहा है, वहीं रुक जाओ, अगर मरना नहीं चाहते।" मोना चौधरी का स्वर वहशी हो उठा।

वो रुका। उसके चेहरे पर कठोर भाव नजर आने लगे। सुर्ख आँखों से वो मोना चौधरी को देख रहा था। उसकी पैंट की जेब के उभार से, स्पष्ट मालूम हो रहा था कि वहां रिवाल्वर है।

"रिवाल्वर वापस रखकर बात करो।" उसने दांत भींचकर मोना चौधरी से कहा।

"तुम अपनी बात करो।" मोना चौधरी ने उसी लहजे में कहा।

"कौन हो तुम?"

"बेकार का सवाल है। ये इसका और मेरा मामला है।" मोना चौधरी ने खतरनाक स्वर में कहा। साथ ही वो कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के प्रति पूरी सतर्क थी कि वो कोई हरकत न कर दे।

"यहाँ पर रिवाल्वर का इस्तेमाल करना मना है। यहाँ आज तक गोली नहीं चली।" उसने तीखे स्वर में कहा।

"तभी तो तुम लोगों का धंधा सलामती से चल रहा है। वरना टोकरा कब का उठ गया होता।" मोना चौधरी ने दांत भींचे।

"रिवाल्वर वापस रख...।"

"मैं इसे अपने साथ ले जा रही हूं। अगर कोई मजबूर नहीं करेगा तो यहां गोली नहीं चलेगी।"

"ये अच्छी बात है। इसे बाहर ले जाओ।" उसने तुरंत सहमति में सिर हिलाया--- "जल्दी करो। तुम्हारी वजह से यहां का माहौल बे-मजा हो रहा है। ये सब कुछ यहां नहीं चलता।"

मोना चौधरी की निगाह कुर्सी पर बैठे व्यक्ति पर जा टिकी।

"उठो मेरे साथ चलो।"

जवाब में वो आदमी ऊंचे स्वर में बोला।

"इसे मेरे पास से हटा दो। नहीं तो मेरे आदमी इस पर गोली चला देंगे।"

"नहीं।" चंद कदमों के फासले पर खड़े, उसी व्यक्ति ने कठोर स्वर में कहा--- "यहां गोली नहीं चलेगी।"

"अगर ये इसी तरह रिवाल्वर मेरी गर्दन पर रखी रही तो, गोली चलेगी।" वो दांत पीसकर कह उठा--- "तब पुलिस को जवाब देना, तुम लोगों के लिए भारी पड़ जाएगा। हो सकता है वो, तुम्हारा धंधा ही बंद कर दे। अगर ऐसा नहीं चाहते तो, इसे यहां से हटा दो।"

वो आदमी कुछ कहने लगा तो, मोना चौधरी क्रूर स्वर में कह उठी।

"तुम बीच में मत आओ।"

वो दांत भींचे उसे देखता जा रहा।

"उठो और मेरे साथ चलो। बेशक अपने आदमियों से गोली चलाने को कह...।"

तभी उस हॉल में कानों को फाड़ देने वाला धमाका हुआ।

सबकी निगाहें फुर्ती से घूमी।

एक आदमी छाती पर हाथ रखे, नीचे को गिरता नजर आया। उसके दूसरे हाथ में रिवाल्वर थी। देखने वालों को समझते देर नहीं लगी कि वो मोना चौधरी पर फायर करने जा रहा होगा। साथ ही वहां मौजूद लोगों की निगाह महाजन पर जा टिकी। जिसने उस पर फायर किया था।

कुछ पलों के लिए वहां सन्नाटा छाया रहा।

"मैंने कहा था, यहां फायर नहीं करना।" वो आदमी गुस्से से चीखा। इसके साथ ही दो और व्यक्ति रिवाल्वरें थामें वहां आ पहुंचे थे। वे भी खतरनाक थे।

"ये उसी का साथी था और बेबी पर गोली चलाने जा रहा था।" महाजन ने खा जाने वाले स्वर में कहा--- "अगर तुम चाहते हो कि यहां और खून-खराबा न हो तो दो मिनट के लिए हमारा साथ दे दो।"

"अब गोली मत चलाना।" उसने गुस्से से कहा--- "क्या चाहते हो?"

"उस आदमी को हमने साथ ले जाना है। उसे वहां से उठाओ और बाहर फेंक दो। बाकी हम संभाल लेंगे। जो करना है, जल्दी कर दो। इसका एक साथी और है यहां। जिसे हम नहीं जानते। या तो वो हम पर गोली चला सकता है, या फिर इसकी तरह वो मारा जा सकता है। ऐसे में खून-खराबा बढ़ेगा। अब तुम खुद ही सोच लो कि हमारी सहायता करने में तुम्हें फायदा है?"

इतना सुनते ही उसने पास खड़े दोनों आदमियों से कहा।

"तुम देखो, कोई रिवाल्वर निकालने की कोशिश न करे।" इसके साथ ही वो तेज-तेज कदमों से मोना चौधरी की तरफ बढ़ा--- "निश्चिंत रहो। मैं इसे बाहर भेजने जा रहा हूं। अगर तुम पहले ही कह देती तो मैं उसे चुपके से यहां से बाहर निकाल देता। मालिक का आर्डर है, बेशक जो भी हो, खून-खराबा यहां नहीं होना चाहिए।" वो पास पहुंचा। उसकी बांह पकड़कर, उसे उठाया--- "और कठोर स्वर में बोला--- "ऐसे ग्राहकों को हम पसंद नहीं करते, जिनकी वजह से यहां गोलियां चलें। यहां से इसी वक्त बाहर निकल जाओ।" कहने के साथ ही वो, उसे दरवाजे की तरफ खींचकर ले गया।

मोना चौधरी उसके साथ हो गई।

सब खामोशी से ये नजारा देख रहे थे।

तभी उसने फुर्ती से जेब में मौजूद रिवाल्वर निकालनी चाही।

परंतु मोना चौधरी सावधान थी। उसे आशा थी कि ऐसा ही होगा। उसने तुरंत उसकी कमर से, सख्ती से रिवाल्वर लगाई और दांत भींचे कह उठी।

"रिवाल्वर मत निकालना।"

उसे दरवाजे की तरफ ले जा रहा आदमी ठिठका।

उसका हाथ जेब में ही रह गया।

मोना चौधरी ने उसका हाथ जेब से निकाला और फिर हाथ डालकर रिवाल्वर बाहर निकाली और तब उसके कमर से रिवाल्वर हटाई।

ये देखकर, क्लब की सिक्योरिटी वाला गुस्से से भर उठा।

"मैं कह रहा हूं यहां गोलियां नहीं चलानी और तू रिवाल्वर निकालता है।" इसके साथ ही उसने पूरी ताकत से उसके गाल पर चांटा मारा। जिसकी आवाज वहां गूंजी--- "दोबारा यहां कदम मत रखना।" दांत पीसकर कहते हुए, उसे खींचता हुआ दरवाजे तक ले गया।

जो हालात पैदा हुए थे, उससे उसकी हालत खराब हो गई थी। उसने तो सोचा था कि क्लब की सिक्योरिटी वाले उसकी साइड लेंगे। लेकिन यहां तो मामला ही दूसरा हो गया था।

"ले जाओ इसे।" वो मोना चौधरी से बोला।

महाजन पास आ पहुंचा था।

"तुम इसे लेकर नीचे, गली के बाहर पहुंचो।" दोनों हाथों में रिवाल्वरें थामे, मोना चौधरी की निगाह हॉल में मौजूद व्यक्तियों पर फिर रही थी, जो इधर ही देख रहे थे।

महाजन ने उसकी बांह मोड़कर, पीठ को लगाई और रिवाल्वर पीठ से लगा दी।

"चल।" महाजन गुर्राया--- "खोल दरवाजा।" इसके साथ ही उसे आगे को धकेला।

बात मानने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं था। एक कदम आगे बढ़ाकर उसने दरवाजा धकेला। महाजन उसे बाहर लेता चला गया।

वहां खड़े व्यक्ति ने मोना चौधरी को घूरा।

"तुम यहां क्या कर रही हो? जाओ।" उसकी आवाज में गुस्सा था।

"उसका एक साथी है यहां। मैं नहीं चाहती कि पीछे से आकर, वो हम पर गोली चला दे।" दोनों रिवाल्वरों को थामे, मोना चौधरी की सतर्क निगाह हॉल में मौजूद लोगों पर फिर रही थी।

"बहुत हिम्मत वाली हो। तुम्हारा रिवाल्वर पकड़ने का ढंग इस बात का सबूत है कि रिवाल्वर का इस्तेमाल करना तुम्हारे लिए बड़ी बात नहीं।" उसने सिर हिलाकर गंभीर स्वर में कहा--- "लेकिन यहां खड़ी रहकर तुम, यहां का माहौल खराब कर रही हो। तुम जाओ। मैं दस मिनट तक, किसी को बाहर नहीं निकलने दूंगा।"

मोना चौधरी ने उसके चेहरे पर निगाह मारी फिर होंठ भींचे पलटकर दरवाजा खोलते हुए बाहर निकल गई। कानों में उसी व्यक्ति का ऊंचा स्वर पड़ा।

"पहले की तरह अपने खेल में मस्त हो जाओ। कुछ नहीं हुआ। सब ठीक है। और तुम, ये लाश और खून ऐसे साफ कर दो कि, कुछ भी हुआ न लगे।"

■■■

मोना चौधरी जब गली के बाहर पहुंचे तो, कार स्टार्ट मिली। ड्राइविंग सीट पर रतनचंद मौजूद था। पीछे वाली सीट पर महाजन और कृष्ण सूरी ने उस व्यक्ति को बीच में इस तरह दबा रखा था कि वह कोई हरकत न कर सके। महाजन ने रिवाल्वर उसकी कमर से सटा रखी थी। मोना चौधरी आगे वाली सीट पर बैठी तो रतनचंद ने कार आगे बढ़ा दी।

"ये लो।" मोना चौधरी ने कृष्ण सूरी की रिवाल्वर, वापस की।

कृष्ण सूरी ने रिवाल्वर लेकर, उस आदमी से सटा दी। दो-दो रिवाल्वरों के बीच फंसा होने की वजह से तो वो वैसे भी कोई हरकत करने की सोच नहीं सकता था। चेहरा अंधेरे में डूबा होने की वजह से, भाव स्पष्ट नजर नहीं आ रहे थे।

"तुम इसी की बात कर रहे थे?" मोना चौधरी बोली।

"हां।" रतनचंद दांत भींचकर कह उठा--- "इसी ने ऑफिस के बाहर मुझ पर फायर किए थे।"

"कहां ले जाना है इसे? वहीं?"

"नहीं। वहां नहीं।" कार ड्राइव करते रतनचंद ने कहा--- "वहां और भी लोग रहते हैं। शोर हो सकता है। दूसरी जगह इसके लिए ठीक रहेगी। वहां हम आराम से इससे बात कर सकते हैं।"

मोना चौधरी ने कुछ नहीं कहा।

कार में खामोशी ही छाई रही।

आधे घंटे के बाद वो नई बन रही कॉलोनी में पहुंचे। जहां एक मकान यहां था तो दूसरा कुछ फासले पर। वहां स्ट्रीट लाइट न होने की वजह से, रास्ता अंधेरे से भरा था।

रतनचंद ने एक मकान के सामने कार रोकते हुए कहा।

"सूरी। गेट खोल।"

कार का दरवाजा खोलते हुए सूरी ने रिवाल्वर जेब में डाली और बाहर निकलकर गेट को पूरा खोला। कार गेट के भीतर प्रवेश करके, छोटे से बरामदे में रुक गई। सूरी ने गेट बंद कर दिया। मोना चौधरी नीचे उतरी और पीछे वाली सीट पर बैठे व्यक्ति की बांह पकड़कर उसे बाहर निकाला। महाजन उसके पीछे-पीछे निकला और रिवाल्वर उससे सटा दी। रतनचंद भी बाहर आ गया।

तभी मकान के भीतर लाइट जली और दरवाजा खुला।

मोना चौधरी और महाजन ने स्पष्ट पहचाना कि दरवाजा खोलने वाला, वही व्यक्ति है जिसने दिन में, रतनचंद के साथ उसका पीछा किया था।

वे सब भीतर आ गए।

महाजन ने उस व्यक्ति को कुर्सी पर बिठा दिया। रिवाल्वर हाथ में ही रखी।

दूसरे कमरे से एक और व्यक्ति निकल आया।

"ये सब मेरे असिस्टेंट हैं। इन्हें दिन में तुम लोग देख चुके हो।" रतनचंद ने कहा--- "ये जगतदास है और ये वीरेंद्र। राधे, दूसरे कमरे में नींद की दवा के असर में सोया हुआ है। उसी के कंधे में गोली लगी थी।"

जगतदास ने, कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को संभालने की जिम्मेदारी ले ली।

महाजन रिवाल्वर जेब में डालते हुए वीरेंद्र से बोला।

"बोतल है?"

वीरेंद्र ने रतनचंद को देखा। रतनचंद के सिर हिलाने पर वीरेंद्र ने कहा।

"लाता हूं।" कहकर वो दूसरे कमरे में चला गया।

सबकी निगाह कुर्सी पर बैठे व्यक्ति पर जा टिकी।

उसका चेहरा डर और गुस्से से भरा था। वो रह-रहकर, कभी मोना चौधरी को देखता तो कभी रतनचंद को। इस बात का एहसास उसे हो चुका था। इन लोगों से पीछा छुड़ाना, बचना, अब आसान नहीं और ये अब उसे बख्शने वाले भी नहीं।

वीरेंद्र उल्टे पांव ही बोतल और गिलास ले आया।

"गिलास अपने लिए रख लो। पानी पीने के काम आएगा।" महाजन ने मुस्कुराकर कहा और बोतल खोलकर होंठों से लगा ली। चौथाई गले में उतरने के बाद ही, बोतल हटाई।

वीरेंद्र, कृष्ण सूरी और जगत दास ने अजीब-सी निगाहों से उसे देखा।

"इस तरह तो लस्सी भी नहीं पी जाती, जैसे तुम इतनी व्हिस्की उतार गए।" वीरेंद्र बोला।

"ठीक कहते हो। मैं इस तरह लस्सी नहीं पी सकता।" महाजन बांह से अपने होंठ साफ करता हुआ बोला--- "लेकिन व्हिस्की पीना बहुत आसान है।"

"ये कौन है सर?" जगतदास ने पूछा।

"ये वही है, जिसे मुझ पर गोलियां चलाकर, मेरी जान लेने की कोशिश की, ये वही है, जो हम लोगों को काम से हट जाने की धमकी दे रहा था और ये वही है, जो मोना चौधरी को भी जयपुर से चले जाने और इस मामले से दूर होने को कह रहा था।" रतनचंद दांत भींचकर गुस्से से कह उठा।

"ओह। फिर तो इससे बहुत कुछ मालूम हो सकता है।" जगतदास के होंठों से निकला। उसका चेहरा कठोर हो गया था।

तभी वीरेंद्र कह उठा।

"सर, आपकी बात मेरी समझ से बाहर है।"

"क्या?"

"आप जयपुर में मौजूद अजीत वासवानी के लिए काम कर रहे हैं और मोना चौधरी दिल्ली में मौजूद वासवानी के लिए काम कर रही है। ये आपको और मोना चौधरी दोनों को एक साथ क्यों रोकेगा। ये एक के लिए काम कर रहा होगा और आप दोनों में से सिर्फ एक को ही रोकेगा। दोनों को तो नहीं।"

रतनचंद की कठोर निगाह उसी व्यक्ति पर थी।

"ये बात तो हमारी भी समझ से बाहर है।" मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर कह उठी--- "और इसका जवाब अब ये देगा। सुनते रहना।"

महाजन बोतल संभाले, चार कदम दूर सोफा चेयर पर जा पसरा।

"तुमने मुझे पहले धमकी दी कि अजीत वासवानी के मामले से हट जाऊं।" रतनचंद उसे कठोर निगाहों से देखता हुआ कह उठा--- "मेरे न मानने पर तुमने मेरी जान लेने की पूरी कोशिश की, लेकिन चूक गए।"

उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

तभी मोना चौधरी कह उठी।

"तुमने मुझे कहा कि दिल्ली में जब मैं दूसरे अजीत वासवानी से मिली, तब से ही मैं तुम लोगों की नजरों में हूं। जयपुर में भी मेरी हरकतों पर निगाह रखी और फिर तुमने, दिन में, उस मकान में मिलकर, मुझे धमकी दी कि मैं शहर छोड़कर चली जाऊं, वरना मुझ खत्म कर दोगे।"

वो मोना चौधरी को देखने लगा था।

"तुमने ये भी कहा कि तुम्हें मालूम था, कि मैं वहां आऊंगी और वहां तुम अपने साथी के साथ मेरे आने का इंतजार कर रहे थे।" मोना चौधरी ने उसकी आंखों में झांका। चेहरे पर खतरनाक भाव थे--- "सबसे पहले मैं ये जानना चाहती हूं कि तुम्हें कैसे मालूम था कि, मैं वहां पहुंचने वाली हूं।"

वो खामोश रहा। आंखों में भय झलक रहा था।

"गोपाल शिराजी के आदमी हो?" मोना चौधरी ने उसी अंदाज में पूछा।

"नहीं।" उसके होंठों से निकला।

"गोपाल शिराजी ने तुम्हें बताया था कि मैं वहां पहुंचूंगी?"

"नहीं।"

"तो किसने बताया?"

वो चुप रहा।

तभी मोना चौधरी का हाथ घूंसे के रूप में चला और उसके गाल से जा टकराया। उसके होंठों से चीख निकली और कुर्सी से नीचे जा गिरा। कृष्ण सूरी ने तुरंत उसकी कमीज का कॉलर पकड़कर खड़ा किया और कुर्सी पर बिठा दिया। भीतर से गाल फटने की वजह से, दांत खून से रंगने लगे थे।

"क्या नाम है तेरा?" रतनचंद का स्वर कठोर था।

"बन्ने कहते हैं मुझे।" वो धीमे स्वर में कह उठा।

"जयपुर में किधर का है?"

"गांधीनगर में रहता हूं। किसी से भी मेरा नाम पूछ लो।" उसके स्वर में बेचैनी थी।

"जिंदा रहना चाहता है या मरना।" रतनचंद गुर्रा उठा।

उसने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।

"बता दे बेटे।" महाजन वहीं बैठा-बैठा सख्त लहजे में कह उठा--- "वरना तेरा वो हाल हो जाएगा कि, बाद में तू बताने को तैयार होगा और हम कहेंगे बाद में। पहले तेरी सेवा-पानी खत्म कर लें।"

वो परेशान-सा नजर आने लगा। आंखों में खौफ व्याप्त रहा।

"मेरे-मेरे पास कुछ नहीं है बताने को।"

"क्या मतलब?" मोना चौधरी के चेहरे पर जहरीले भाव उभरे। होंठ भिंचे हुए थे।

"तुम लोग पूछोगे कि मैं किसके लिए काम करता हूं, जबकि मैं नहीं जानता कि मैं किसके लिए काम...।"

"झूठ बोलते हो तुम।" मोना चौधरी गुर्रा उठी--- "तुमने मुझे कहा था कि, मेरे वहां पहुंचने का अंदेशा देखकर कल ही यहां से क्लोन को, हटा दिया गया है और क्लोन के बारे में, राह चलता नहीं जान सकता। वही जान सकता है जो इस मामले से गहरा वास्ता रखता हो। अगर तुम ये समझते हो कि हम तुम्हारी बातों में आ जाएंगे तो बहुत बड़ी भूल कर रहे हो। मुंह खोल देने से तो शायद तुम्हारी जान बच जाए। ये उल्टे जवाब तुम्हारी जान ले लेंगे। दिन निकलने से पहले ही, तुम्हारी लाश टुकड़ों में सड़कों पर पड़ी होगी। नहीं विश्वास तो, अभी ये बात सामने आ जाएगी।"

बन्ने और भी व्याकुल हो उठा।

"तुम-तुम कौन हो?" उसकी निगाह मोना चौधरी पर थी।

"क्या मतलब?" मोना चौधरी उसी लहजे में बोली।

"ये तो मुझे महसूस हो चुका है कि तुम खतरनाक हो, लेकिन हकीकत में तुम कौन हो। ये पूछ रहा हूं।"

मोना चौधरी कई पलों तक, बन्ने को घूरती रही।

"तुमने उस मकान में मेरा नाम लिया था।"

"हां। याद है। मैंने तुम्हें मोना चौधरी कहा था। ये तो तुम्हारा नाम हुआ। तुम जो जानना चाहती हो, पूछना चाहती हो, वो बाद की बात है। मैं पहले तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूं।"

"मेरे बारे में कुछ नहीं जानते।"

"नाम ही जानता हूं।"

"इसे जानते हो?" मोना चौधरी का इशारा रतनचंद की तरफ था।

"हां। ये प्राइवेट जासूस रतनचंद है। इसके सारे साथियों को पहचान चुका हूं। लेकिन मैं तुम्हारे बारे में पूछ रहा हूं कि देखने में तुम जो लगती हो, वो नहीं हो। मुझे महसूस हो चुका है कि असल में तुम बहुत खतरनाक हो। अपनी जिज्ञासा के लिए मैं ये पूछ रहा हूं।"

"तुम तो कह रहे थे कि मैं दिल्ली से ही तुम लोगों की निगाहों में हूं और अब...।"

बन्ने सिर हिलाकर कह उठा।

"सुनो। मैं जानता हूं कि तुम लोगों के हाथों में ऐसा फंस चुका हूं कि बचना आसान नहीं।" बन्ने ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी--- "मेरे दो-चार सवालों का जवाब दे दो, उसके बाद सारी बात बताऊंगा।"

"बेबी।" महाजन होंठ सिकोड़कर कह उठा--- "मुझे तो मामला गड़बड़ लग रहा है।"

"ये बातों में लगाकर हमें बेवकूफ बना रहा है।" कृष्ण सूरी सख्त स्वर में कह उठा--- "ये...।"

"इसे कोशिश कर लेने दो।" रतनचंद ने उसे कहर भरी निगाहों से देखते हुए कहा--- "हम...।"

"मैं कोई गड़बड़ नहीं कर रहा। किसी को बेवकूफ नहीं बना रहा।" बन्ने परेशान-सा कह उठा--- "मैं इस मोना चौधरी के बारे में नहीं जानता कि हकीकत में ये कौन...।"

"जानते हो या नहीं जानते।" मोना चौधरी एक-एक शब्द चबाकर खतरनाक स्वर में कह उठी--- "हमारी बात छोड़ो। तुम अपनी कहो किसके लिए काम कर रहे हो। किसके कहने पर रतनचंद को वासवानी का काम छोड़ने के लिए कह रहे थे। किसके कहने पर रतनचंद को तुमने शूट करने की कोशिश की और वो कौन है जिसके इशारे पर तुम मेरे रास्ते में आए। वासवानी का क्लोन कहां है और...।"

"ये वासवानी कौन है?" बन्ने के होंठों से निकला।

मोना चौधरी के जबड़ों में कसाव आ गया। चेहरा खतरनाक हो उठा।

"पहले इसे सबका परिचय दे दो।" महाजन कड़वे स्वर में बोला--- "उसके बाद साहबजी मुंह खोलेंगे।"

तभी रतनचंद आगे बढ़ा और उसके सिर के बाल मुट्ठी में पकड़कर गुर्राया।

"क्या इरादे हैं तेरे। मुंह खोलेगा या नहीं।"

"सर।" वीरेंद्र बोला--- "इसे दस मिनट के लिए मेरे हवाले कर दीजिए तब...।"

"मैं तो सीधे-सीधे बात कर रहा हूं। मैंने कब कहा है कुछ न बताने को।" बन्ने जल्दी से कह उठा--- "मुझे मारो। न मारो। जो मन में आए करो। लेकिन मैं तो बताने को तैयार हूं।"

"तो बता।" रतनचंद ने उसके सिर के बाल छोड़े। चेहरे पर कठोरता नाच रही थी।

बन्ने ने गहरी सांस ली और व्याकुल स्वर में बोला।

"पूछो।"

"उसका नाम बता।" मोना चौधरी ने भिंचे स्वर में कहा--- "जिसके लिए तू काम कर रहा है।"

"मैं नहीं जानता उसे।"

"क्या मतलब?"

"फोन पर वो बताता है कि मुझे क्या।"

मोना चौधरी का हाथ चला उसके गाल से जा टकराया।

बन्ने गिरने को हुआ कि कृष्ण सूरी ने उसे संभालकर, ठीक से बिठा दिया।

"फिर झूठ। तुम बहुत कुछ जानते हो। तुम मेरे बारे में जानते हो। वासवानी के बारे में जानते हो। उसके क्लोन के बारे में जानते हो। हर बात का जवाब है तुम्हारे पास। ये लास्ट वार्निंग है तुम्हारे लिए। अभी तक तो मामला शराफत से चल रहा था। अब तुमने मुंह नहीं खोला तो, पक्का जान गंवाओगे।"

चांटे से बन्ने का सिर झनझना उठा था। पीड़ा की लहरें चेहरे पर दौड़ उठी थीं। उसने एक हाथ से अपना गाल मसला और मोना चौधरी को देखा।

"मैं नहीं जानता क्लोन किसका नाम है।" बन्ने के स्वर में परेशानी थी--- "मैं तुम्हें जो कह रहा हूं। बता रहा हूं वो सच है। नहीं तो क्या सुनकर, तुम अपनी तसल्ली करना चाहती हो, वो मुझे बता दो। मैं तुम्हारी हर बात की हां में हां मिला दूंगा।"

"तुम मेरे बारे में सब कुछ जानते हो।" मोना चौधरी ने खतरनाक स्वर में कहा।

"मैं तुम्हारे नाम के अलावा कुछ नहीं जानता।"

"तुम वासवानी और उसके क्लोन के बारे में सब कुछ जानते हो?"

बन्ने ने इंकार में से हिलाया।

"मैं न तो वासवानी के बारे में जानता हूं और न ही क्लोन के बारे में कुछ जानता हूं।" बन्ने एक-एक शब्द पर जोर देकर, विश्वास दिलाने वाले अंदाज में कह उठा।

"वीरेंद्र।" रतनचंद गुर्रा उठा--- "ये इस तरह नहीं मानेगा। इसे सीधे रास्ते पर लाओ।"

वीरेंद्र जल्दी से बन्ने की तरफ बढ़ा।

मोना चौधरी ने टोका।

"अभी कुछ नहीं।"

वीरेंद्र ठिठका।

"क्या मतलब?" रतनचंद ने मोना चौधरी को देखा।

"इसकी भी सुन लेते हैं, ये जो कहना-बताना चाहता है।" मोना चौधरी की कठोर निगाह बन्ने पर थी।

"ये वक्त बर्बाद कर...।" रतनचंद ने कहना चाहा।

"कोई बात नहीं। हमारे पास वक्त बहुत है और ये भी कहीं जाने वाला नहीं।" मोना चौधरी खा जाने वाली निगाहों से बन्ने को देख रही थी--- "बोलो, क्या है तुम्हारे पास बताने को। क्या बताना चाहते हो। हमारे सवालों के बारे में तो तुम जान ही चुके हो।"

बन्ने ने कुर्सी पर बैठे-बैठे पहलू बदला और व्याकुल-सा कह उठा।

"मैं जो कह रहा हूं। वो ही सच है। झूठ नहीं बोल रहा। अब मानो या न मानो। ये तुम लोगों पर है। पैसा लेकर उल्टे सीधे काम करना मेरा धंधा है। तीन-चार बदमाश भी मेरे साथ काम करते हैं। गांधीनगर में तो मेरा नाम चलता है। काम कराने के लिए कोई सीधे-सीधे मेरे पास आ जाता है तो कोई फोन पर काम कहकर रकम भिजवा देता है। तुम दोनों को लेकर मैंने जो-जो भी किया, वो फोन पर बताया गया। बदले में मोटी-मोटी रकमें कोई आदमी वहां पहुंचा जाता है जहां मेरा ठिकाना है।"

उसे रुकते पाकर मोना चौधरी सख्त स्वर में बोली।

"कहते रहो।"

"क्या कहूं। बता दिया जो बताना था। तुमने कुछ पूछना है तो पूछो।" बन्ने ने जल्दी से कहा।

"फोन पर तुमसे बात करने वाला एक आदमी होता है या अलग-अलग आवाजें होती हैं।" मोना चौधरी ने पूछा।

"मेरे ख्याल में एक ही आदमी है।" बन्ने ने कहा--- "मेरी तो उससे दो बार ही फोन पर बात हुई है। वैसे उसके मैसेज, मेरा वो आदमी नोट करता है, जो फोन पर बैठता है।"

"रतनचंद के बारे में तुम्हें क्या कहा गया?"

"वो हर बात अच्छी तरह समझाकर करता है, ताकि कोई गलती न हो।" बन्ने ने सोच भरे स्वर में कहा--- "उसने मुझे बताया कि प्राइवेट जासूस रतनचंद, अजीत वासवानी नाम के आदमी का कोई काम कर रहा है। जो कि उसे नहीं करना है। रोकना है। मैं रतनचंद को कैसे भी धमकाकर अजीत वासवानी के लिए काम करना बंद करवा दूं। मैंने ऐसा ही किया। रतनचंद को धमकी दी। कई बार दी। लेकिन ये नहीं माना। जब मैंने उसका फोन आने पर बताया तो, वो बोला, रतनचंद को खत्म कर दो। तो मैंने मोटी कीमत बताई। उसने बिना मोलभाव किए कीमत मुझ तक पहुंचा दी। उसी शाम मैंने रतनचंद पर गोलियां चलाईं। परंतु ये बच गया। उसका फोन आया कि रतनचंद जहां भी हो, उसे जल्द-से-जल्द खत्म करने की कोशिश करूं। परंतु उस दिन के बाद रतनचंद मुझे या मेरे साथियों को नजर नहीं आया।"

सबकी निगाहें बन्ने पर टिकी थीं।

"रतनचंद के बारे में कोई और बात?"

"नहीं। यही सब है, रतनचंद के बारे में बताने को।"

मोना चौधरी ने रतनचंद को देखा।

"तुम्हें फोन पर कौन धमकियां देता था।"

"यही। इसकी आवाज मैं अच्छी तरह पहचान चुका हूं।" रतनचंद दांत भींचकर कह उठा--- "एक-दो बार दूसरी आवाज भी थी।"

"वो आवाज फोन पर बैठे, मेरे आदमी की थी। जब मैं व्यस्त होता तो ठीक वक्त पर तुम्हें फोन कर देता था।"

मोना चौधरी की निगाह बन्ने पर जा टिकी।

"मेरा नाम कैसे जानते हो?"

"उसी ने बताया था कि तुम मोना चौधरी हो। दिल्ली से आई हो। अजीत वासवानी की तलाश कर रही हो जयपुर में। तुम्हें धमकाऊं कि ये काम छोड़कर तुम वापस दिल्ली चली जाओ। कुछ इस तरह कि तुम्हें ज्यादा से ज्यादा गुस्सा आए। इसी कारण मैंने तुम्हारी ठुकाई की थी।" बन्ने बोला।

मोना चौधरी की आंखें सिकड़ी।

"मतलब कि तुम मुझे इस तरह धमकाओ कि मुझे ज्यादा-से-ज्यादा गुस्सा आए।"

"हां। वही कोशिश मैंने की।"

"बेबी।" महाजन कह उठा--- "ये बात कुछ सोचने वाली है।"

मोना चौधरी की सिकड़ी आंखें महाजन पर गई फिर बन्ने पर जा टिकी।

"तुम्हें कैसे मालूम था कि मैं इंडस्ट्रीयल एरिये के उस मकान में जाऊंगी।"

"फोन करने वाले ने ही बताया था और कहा था कि तुम्हारे वहां पहुंचने से पहले ही मैं वहां पहुंच जाऊं और तुम पर काबू पा लूं। दो-चार हाथ भी ठोक दूं। मैंने वही किया।"

"मेरी जान लेने के लिए नहीं कहा गया?"

"नहीं।" बन्ने ने सिर हिलाया।

"तुमने कहा था कि मेरे आने का तुम्हें पहले ही पता था इसलिए कल ही क्लोन को यहां से हटा दिया गया।"

"मैंने तुम्हें वही कहा, जो मुझसे कहने को कहा गया। अपनी तरफ से मैंने एक शब्द भी नहीं कहा।" बन्ने ने सिर हिलाकर गंभीर स्वर में कहा--- "उसके बाद, अभी तक उस आदमी का फोन नहीं आया।"

"दिन में, कार में तुम्हारे आदमी थे, जो मारे गए?"

"हां। वो तुम्हारे पीछे थे। तुम पर निगाह रख रहे थे और उन्हें रतनचंद नजर आ गया। वो जानते थे कि रतनचंद को खत्म करना है। मैंने उन्हें कह रखा था। लेकिन वे दोनों, शायद इन लोगों के हाथों मारे गए। रतनचंद का निशाना लेने का उन्हें मौका नहीं मिल पाया।"

मोना चौधरी बन्ने को घूरती रही।

"ये हमें बेवकूफ बना रहा है।" रतनचंद कठोर स्वर में कह उठा--- "असली बात तो...।"

"तुमने जो कहा। मैंने सुना।" मोना चौधरी रतनचंद की बात पर ध्यान न देकर बन्ने से बोली--- "जो भी तुमने बताया है, उसे कैसे साबित करोगे कि सच कहा है।"

बन्ने के गंभीर चेहरे पर, सोच के भाव उभरे।

"मैं बताती हूं।" मोना चौधरी बोली।

"क्या?"

"तुम अभी अपने आदमी को फोन करो। सिर्फ इतना कहो कि दो आदमी उनके पास आ रहे हैं। वो जो भी पूछें सच-सच बताना। अगर जरा भी झूठ बोला गया तो, तुम जिंदा नहीं बचोगे। इतना ही कहना है।"

"ठीक है। मैं अभी फोन कर देता हूं। मेरे एक-दो आदमी तो फोन के पास ही इस वक्त नींद में होंगे।"

"लेकिन...।" रतनचंद ने कहना चाहा।

"खामोश रहो।"

बन्ने ने फोन किया और वही बोला जो, मोना चौधरी ने कहा था।

"गांधीनगर का पता दो। जहां तुम्हारे आदमी हैं।"

बन्ने ने बताया।

मोना चौधरी ने रतनचंद से कहा।

"अपने दो आदमी इस पते पर गांधीनगर में भेजो। जो बातें मैंने पूछी हैं, वही बातें इसके साथियों से पूछो। अगर वो भी, बन्ने जैसा जवाब देते हैं तो समझो ये सच कह रहा है।"

"हो सकता है, बन्ने और उसके साथियों में पहले से ही तय हो कि...।" रतनचंद ने कहना चाहा।

"नहीं। ये बातें पहले से तय नहीं हो सकतीं। वैसे भी बन्ने सपने में भी नहीं सोच सकता था कि यह हम दोनों के हत्थे चढ़ जाएगा। हम इसे तलाश कर लेंगे। आराम से सोचो तो मेरी बात ठीक लगेगी।"

रतनचंद ने वीरेंद्र और जगतदास को देखा।

"तुम दोनों ने सब कुछ सुना।"

"जी।"

"बन्ने की बताई जगह पर जाकर, इसके आदमियों से यही पूछताछ करो।"

तीसरे मिनट ही वीरेंद्र और जगतदास बाहर निकल गए।

मोना चौधरी अपनी जगह से हिली और कुर्सी पर बैठी।

"तुम कोई चालाकी मत करना।" रतनचंद ने कठोर स्वर में बन्ने से कहा--- "किसी भी हाल में मत सोच लेना कि यहां से भाग जाओगे। सीधी पीठ पर गोली लगेगी।"

"मैं इसके सिर पर ही खड़ा हूं सर।" कृष्ण सूरी कह उठा।

"मैं कुछ भी नहीं करूंगा। आराम से बैठा हूं।" बन्ने ने गंभीर स्वर में कहा--- "क्योंकि तुम लोग मेरा पता-ठिकाना जान चुके हो। यहां से निकल जाने में सफल हो भी गया तो तुम लोग मुझे ढूंढ निकालोगे। एक बात तो बताओ।"

"क्या?"

"तुम लोग अब मेरा क्या करोगे?"

जवाब में रतनचंद के चेहरे पर खा जाने वाले भाव उभरे।

"मेरी-तुम्हारी कोई पक्की दुश्मनी तो है नहीं। तुम अपना धंधा करते हो और मैं अपना।" बन्ने गंभीर और बेचैन था--- "पुलिस को बीच में मत लाना। मेहरबानी होगी।"

रतनचंद दांत भींचे उसे देखता रहा।

परंतु महाजन व्यंग्य से कह उठा।

"चिंता मत कर। तेरे को तो सजाकर घोड़ी पर बिठाएंगे। बाजा भी बजेगा और शहनाई भी।"

बन्ने की आंखों में खौफ की झलक स्पष्ट मिल रही थी।

रतनचंद ने कृष्ण सूरी से कहा।

"सुशील की कोई खबर है तुम्हारे पास?"

"सुशील। नहीं सर। कोई खास बात? वो किसी काम पर है?" कृष्ण सूरी के होंठों से निकला।

"हां। वो...।" रतनचंद कहते-कहते ठिठका। बन्ने को देखा फिर बोला--- "इस बारे में फिर बात करूंगा।"

कृष्ण सुरेश समझ गया कि रतनचंद ये बात बन्ने के कानों में नहीं पड़ने देना चाहते।

भोर के उजाले के साथ ही वीरेंद्र और जगतदास वापस लौटे।

■■■

"ये ठीक कहता है।" वीरेंद्र ने कहा--- "जो इसने कहा, बताया--- वही इसके साथियों ने बताया। उनकी बातों ये नहीं लगा कि वो झूठ बोल रहे हैं।"

रतनचंद ने होंठ भींच लिए।

मोना चौधरी की निगाह बन्ने पर गई। जो अभी तक कुर्सी पर ही बैठा था।

"मैंने तो पहले ही कहा था कि मैं सच कह रहा हूं।" बन्ने के होंठों से निकला।

"माना कि तुम जिसके लिए काम कर रहे हो, उसकी हकीकत नहीं जानते। तुम्हें नहीं मालूम वो कौन है।" मोना चौधरी ने कहा--- "लेकिन उसके बारे में कोई ऐसी बात पता हो, उसके मुंह से कुछ निकला हो, कि जिसके दम पर उस तक पहुंचा जा सके?"

"नहीं। मैं फालतू बातों की तरफ ध्यान नहीं देता। अपने काम और आने वाले नोटों को देखता हूं।" बन्ने ने गंभीर स्वर में कहा--- "मैं उसके बारे में कुछ नहीं बता सकता।"

"मामला अटक गया।" महाजन ने गहरी सांस ली।

मोना चौधरी ने रतनचंद से कहा।

"इसका क्या करना है।"

रतनचंद के कुछ कहने से पहले ही, बन्ने घबराए स्वर में कह उठा।

"मुझे कुछ मत कहो। मैंने किया उसके लिए माफी चाहता हूं। अब मैं तुम लोगों से वास्ता नहीं रखूंगा। उसका फोन आएगा तो काम के लिए मना कर दूंगा। मुझे जाने दो।"

"मेरा तो मन कर रहा है तुम्हें खत्म करके, लाश...।" रतनचंद गुस्से में था।

"ऐसा मत करना। तुम जितनी बार कहो, मैं उतनी बार माफी मांग लेता हूं।" बन्ने ने सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कहा--- "मुझे कुछ मत कहना। मेरे लायक कोई काम हो तो बताओ, मैं सच्चे मन से करूंगा। हमारी कोई दुश्मनी तो है नहीं कि इन हालातों में भी एक-दूसरे की जान लें।"

रतनचंद खा जाने वाली निगाहों से बन्ने को देखता रहा।

"इसे छोड़ना ठीक नहीं होगा।" मोना चौधरी ने कहा--- "ये हमारे दुश्मन को यहां का ठिकाना बता सकता है। बदले में उससे मोटी कीमत वसूल करेगा।"

"मेरा विश्वास करो। मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा। कभी भी तुम लोगों के रास्ते में नहीं आऊंगा।" बन्ने ने मोना चौधरी को देखा--- "मेरी बात को सच मानो और...।"

"चुपकर।" रतनचंद दांत भींचकर कह उठा--- "तू कितना धर्म-कर्म वाला है। हम जान चुके हैं।"

बन्ने ने बेचैनी से पहलू बदला।

"रतनचंद।" मोना चौधरी ने कहा--- "इसे इसी मकान में तब तक कैद रखो, जब तक हमारा काम खत्म नहीं हो जाता। कैद के दौरान अगर ये भागने की कोशिश करे तो बेशक इसे गोली मार देना।"

"तुम्हारा मतलब कि मैं अपना एक आदमी, इसके साथ लगा दूं। उसका वक्त बर्बाद करूं।" रतनचंद उखड़े स्वर में कह उठा--- "अच्छा यही होगा कि इसे खत्म कर दो।"

"बिना खून-खराबे के काम चलता हो तो, खून बहाने से परहेज करना चाहिए।"

न चाहते हुए भी रतनचंद ने जगतदास से कहा।

"ले जाओ इसे। कमरे में बंद कर दो। नजर रखना इस पर। जब जरूरत समझो गोली से उड़ा देना।"

"मैं कोई गड़बड़ नहीं करूंगा। मुझे गोली मत मारना।" बन्ने ने जल्दी से कहा।

"तेरे को दामाद जैसा दर्जा मिल रहा है।" महाजन कड़वे स्वर में कह उठा--- "जबकि मेरे मेरे ख्याल में तेरा बैंड बजना चाहिए।"

"उठ।" जगतदास ने, बन्ने की बांह पकड़कर उठाया और बाहर ले गया।

अपने क्रोध पर काबू पाते हुए रतनचंद ने वीरेंद्र को देखा।

"सुशील का पता करो, वो कहां है।"

"सर, आपका फोन आने के बाद, सुजान सिंह सुशील की तलाश में चला गया था। वही कोई खबर लाएगा।"

रतनचंद ने सोच भरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।

"बन्ने के हाथ आने पर भी, कोई मामला नहीं जम पाया।"

"बन्ने से काम लेने वाले, जो कि क्लोन के मामले से ही वास्ता रखते हैं, बहुत चालाक हैं।" मोना चौधरी सोच भरे स्वर में कह उठी--- "पैसे के दम पर वो अपनी हर कोशिश को कामयाब बनाने पर लगे हैं। कभी वो गोपाल शिराज़ी जैसे इंसान से काम ले रहे हैं तो कभी बन्ने से। परंतु अपनी हवा भी नहीं लगने दे रहे और उनकी हरकतें जानकर दिमाग और भी उलझ गया है। ऐसी क्या बात है कि हम दोनों को अपने काम से पीछे हटने पर मजबूर किया जा रहा है। जबकि तुम यहाँ मौजूद वासवानी के लिए काम कर रहे हो और मैं दिल्ली वाले वासवानी।"

"मेरे ख्याल में हम दोनों को रोकने का मामला कोई तीसरी पार्टी कर रही है।"

"मेरा ख्याल है कि इस मामले में तीसरी पार्टी है ही नहीं।"

"वो कैसे?"

"बन्ने के द्वारा, मुझसे कहा गया कि कल ही वहां से क्लोन को हटाया है। अगर कोई तीसरी पार्टी हमें रोकने की चेष्टा कर रही होती तो वो मुझ तक ये शब्द न पहुंचाती। क्योंकि उसका तो क्लोन से कुछ लेना-देना ही नहीं होगा।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "मुझे लग रहा है कि इस मामले की उलझन बहुत बढ़ गई है। असल हालात हमारी समझ से दूर हैं। जब तक तुम्हारा क्लाईंट अजीत वासवानी सामने नहीं आता, ये मामला नहीं सुलझ सकता।"

तभी महाजन बोला।

"बेबी। बन्ने ने कहा था कि, उसे कहा गया था, वो तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करे कि तुम्हें ज्यादा गुस्सा आये।"

"हाँ। ये बात खास है।" मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़े--- "भला मुझे गुस्सा दिलाकर किसी को क्या मिलेगा।"

"कुछ तो मिलेगा। बन्ने को ये बात बिना वजह तो कहीं नहीं होगी।" महाजन ने सिर हिलाकर कहा--- "इसमें कोई गहरी बात अवश्य है। सोचने की बात तो ये आती है कि तुम्हें गुस्सा आएगा तो, फिर तुम क्या करोगी?"

मोना चौधरी सोच भरे ढंग से महाजन को देखती रही।

"तुम सोचो बेबी। मैं भी सोचता हूँ और नींद भी ले लेते हैं। सुबह हो गई है। दो-चार घण्टे की नींद ले लेते हैं। उसके बाद एक बार फिर मामले पर गौर करेंगे।"

■■■

दोपहर के दो बज रहे थे।

तब वे सब लंच ले रहे थे जो बाहर से पैक कराकर लाया गया था और खाने के दौरान बातें करते हुए इस नतीजे पर पहुँचने की कोशिश कर रहे थे कि जो बन्ने या गोपाल शिराज़ी से काम ले रहा था, उस तक कैसे पहुंचा जाये या फिर जयपुर वाले अजीत वासवानी को कैसे खोजा जाये।

उसी वक्त रतनचंद का असिस्टेंट सुजान सिंह वहां पहुंचा। जोकि कल रतनचंद का फोन आने पर सुशील की तलाश में निकल गया था। साथ में सुशील भी था। जो कि स्मार्ट-सा नजर आने वाला पच्चीस बरस का युवक था। उसे देखते ही रतनचंद के होंठों से निकला।

"तुम कहाँ थे सुशील। उस दिन के बाद न तो तुम आये और न ही तुम्हारा फोन।"

"जनाब तो शादी की तैयारी में लगे हुए हैं।" सुजान सिंह व्यंग्य से कह उठा।

"क्या मतलब?" रतनचंद के माथे पर बल पड़े।

"कल आपका फोन आने पर मैं इसकी तलाश में निकला। इसके घर से मालूम हुआ कि आठ-दस दिन पहले अजमेर में, शादी के लिए किसी लड़की को देखने गया है और घर फोन आ चुका है कि ये कुछ दिन बाद लौटेगा। मैं पता लेकर रातोंरात अजमेर पहुंचा तो वहां, उस लड़की से इश्क लड़ाते मिले। जिससे शादी करने वाले हैं। लड़की देखने गया था और शायद इसका इरादा, दहेज में बच्चा लेकर, अजमेर से लौटने का था। मुझे वहां से चलता कर रहा था कि कुछ दिन बाद आऊंगा। आपका नाम सुनने पर सीधा हुआ।"

रतनचंद की उखड़ी निगाह, सुशील पर जा टिकी।

"तुम जानते हो सुशील हमारे काम में लापरवाही नहीं चलती।"

"सर, मैंने कहाँ लापरवाही की है।"

"उस दिन मैंने तुम्हें उस आदमी का पीछा करके उसका पता-ठिकाना मालूम करने को...।"

"वो तो मैंने मालूम कर लिया था सर। उसके तीसरे दिन मैं अजमेर गया था और...।"

"तो तुमने मुझे खबर क्यों नहीं की कि उसका पता-ठिकाना कहाँ है।" रतनचंद ने सख्त स्वर में कहा।

"सर, मैं कुछ व्यस्त हो गया था। आपका भी फोन नहीं आया, पूछने के लिए। मैंने सोचा जब जरुरी होगा तो आप मालूम कर लेंगे। फिर शादी के लिए लड़की देखने जाना पड़ा। वहीं फंस गया।" सुशील मुस्कुरा पड़ा--- "मुझे क्या मालूम था कि, आपको जवाब जल्दी चाहिए था।"

"ये कभी नहीं सुधर सकता।" वीरेंद्र ने मुंह बनाकर कहा।

"शादी के बाद शायद सुधर जाए।" कृष्ण सूरी मुस्कुराकर कह उठा।

"तो कहां ठहरा है वो आदमी, जिसके बारे में मालूम करने को कहा था।"

उसने मोना चौधरी और महाजन को देखा।

"ये कौन हैं सर?"

रतनचंद ने सुशील और सुजान सिंह का उनसे परिचय कराया।

उसके बाद सुशील ने बताया।

"सर, कुछ महीने पहले ही, जयपुर में, उजाड़ इलाके में बनी, टूटी-फूटी एक हवेली नीलाम हुई थी...।"

"जो माल रोड पार करने के बाद, जंगल जैसे इलाके में हवेली है, उसकी बात कर रहे हो?" रतनचंद की निगाह सुशील पर जा टिकी--- "कुछ महीने पहले उसी की नीलामी...।"

"यस सर। मैं उसी की बात कर रहा हूं।" सुशील ने कहा--- "वो आदमी आपसे मिलने के बाद उसी हवेली में गया था। साथ में तीन खतरनाक लगने वाले आदमी थे, जो कि उस वक्त कुछ दूर थे, जब आपने मुझसे मुलाकात की थी। पहले वो हवेली उजाड़ थी। परंतु उस दिन देखा, उसे ठीक करके बहुत अच्छा कर लिया गया है। मुझे तो वहां कुछ ठीक नहीं लगा।"

"क्या मतलब?"

सबका ध्यान सुशील की बातों पर था।

"सावधानी के नाते मैं हवेली में ज्यादा करीब तो नहीं जा सका। ऐसे में उन्हें शक हो सकता था कि उनका पीछा किया जा रहा है। दूर रहकर ही मैंने हवेली पर करीब दो घंटे नजर रखी थी। हवेली के फाटक पर दो-तीन दादा से लगने वाले आदमी नजर आए। उन्होंने ही खोला था फाटक। उसके बाद मैंने हवेली की छत पर दो व्यक्तियों को कड़कती धूप में टहलते देखा। मेरे ख्याल में वो नजर रख रहे थे। आसपास कुछ और लोगों की भी वहां चहल-पहल देखी। उनके हाथ में गनें भी नजर आईं। मेरे ख्याल में वहां कुछ गड़बड़ है।" सुशील ने रतनचंद को देखा--- "उस गड़बड़ के बारे में आप ही अंदाजा लगा सकते हैं, क्योंकि उस आदमी से, आप ही मिले थे।"

रतनचंद ने सोच भरे अंदाज में सिर हिलाया।

"अगर इस बात की तुम मुझे पहले खबर दे देते तो, मैं हवेली की निगरानी पर किसी को लगा देता। वहां के बारे में और जानकारी मिल सकती थी।" रतनचंद ने कहा।

सुशील खामोश रहा।

"वो हवेली नीलामी में किसने खरीदी थी?" रतनचंद ने पूछा।

"इस बारे में कोई खबर नहीं।" सुशील ने सिर हिलाया।

"मालूम करो।"

"जी।"

"और अब तुम गायब नहीं होओगे। जो भी खबर हो, मुझे देते रहोगे।"

"श्योर सर।" सुशील ने सिर हिलाया--- "मैं मालूम करता हूं वो हवेली किसने खरीदी थी।" कहकर वो उठा--- "सर आप मुझे पक्के तौर पर नौकरी पर रख लीजिए। कभी-कभी ही आप मुझे...।"

"जिस दिन लापरवाही छोड़ दोगे। उस दिन तुम्हें ऑफिस में जगह मिल जाएगी।" रतनचंद बोला--- "जो काम कहा है, उसे पूरा करो। ये जल्दी वाला मामला है।"

सुशील बाहर निकल गया।

रतनचंद ने मोना चौधरी से कहा।

"मुझसे मुलाकात करके, अजीत वासवानी उस हवेली में गया था।"

"वही जगह उसने ठिकाना बना रखा होगा।" महाजन बोला--- "और जो आदमी वहां देखे गए। वो उसकी सुरक्षा के लिए होंगे। वो हवेली भी उसकी ही होनी चाहिए।"

"अजीत वासवानी की?" मोना चौधरी ने महाजन को देखा।

महाजन ने होंठ सिकोड़े।

"वो हवेली, उन लोगों की भी हो सकती है, जो इस सारे मामले के पीछे हैं और वो अजीत वासवानी न होकर, उसका क्लोन भी हो सकता है। वो ठिकाना उनका हो सकता है।" मोना चौधरी का स्वर भी गंभीर था--- "वहीं पर उन्होंने क्लोन तैयार किया हो सकता है।"

महाजन सिर हिलाकर रह गया।

"रतनचंद।" मोना चौधरी बोली--- "तुम जाओगे, वहां पर?"

"मेरे ख्याल में, मेरा वहां जाना किसी भी सूरत में ठीक नहीं होगा।" रतनचंद ने सोच भरे स्वर में कहा।

"क्यों?"

"अगर वो असली अजीत वासवानी है तो वो कभी ये पसंद नहीं करेगा कि, उसने अपना ठिकाना छुपाया और मैंने पीछा करके, जान ही नहीं लिया, बल्कि उससे मिलने भी पहुंच गया। वो यही सोचेगा कि मेरे वहां पहुंचने पर, मेरा पीछा करके दुश्मन उसका ठिकाना जान सकते हैं। तब वो ज्यादा खतरा महसूस करेगा। मैं नहीं चाहता कि वो ये मामला मेरे हाथों से वापस ले ले और लाखों की मोटी रकम का नुकसान हो। अगर वो क्लोन है, तो उस पर भी यही बात लागू होती है।" रतनचंद ने सोच भरे स्वर में कहा--- "उससे फोन पर बात की जा सकती थी, परंतु मेरे ऑफिस के अलावा कहीं का भी फोन नंबर उसके पास नहीं है। वह कहां है, ये बात मालूम हो चुकी है। तुम अपने तौर पर उस तक पहुंच सकती हो। इस तरह तुम्हारा वहां जाना खतरे से खाली नहीं, लेकिन वहां जाए बिना, वासवानी से मिले बिना किसी नतीजे पर भी नहीं पहुंचा जा सकता। पीछे रहकर मुझसे जो सहायता हो सकेगी। वो मैं करता रहूंगा। मैं चाहता हूं तुम अपने तौर पर मालूम करो कि कौन असली है और कौन नकली। बन्ने यहां कैद रहेगा। मैं आज ही अपना ऑफिस खोलता हूं। ताकि ये जान सकूं कि जो मुझे इस काम से हटाना चाहता है अब वो मुझे सामने पाकर, क्या कदम उठाता है। उस तक मैं कैसे पहुंच सकता हूं। दो रास्तों से हम आगे बढ़ेंगे तो शायद ये काम जल्दी निपट सके।"

"ठीक है।" मोना चौधरी ने सिर हिलाया--- "तुम मुझे हवेली दिखाओ, वो कहां है।"

■■■

आबादी से हटकर, जंगल जैसे इलाके में, वो हवेली मौजूद थी। उसे देखकर सोचा जा सकता था कि कभी अवश्य वह शानदार रही होगी। परंतु अब रख-रखाव की कमी और वक्त के थपेड़ों की वजह से उसकी हालत बेहद खस्ता हो रही थी, लेकिन दोबारा मरम्मत हुई स्पष्ट नजर आ रही थी और उसका रंग रूप काफी निखर गया था। देखने में वो बुरी नहीं लग रही थी।

हवेली तक जाने वाले रास्तों के कुछ पुराने निशान अवश्य बचे हुए थे, परंतु वे रास्ते अब इस्तेमाल करने के लायक नहीं रहे थे। हवेली के मुख्य गेट तक चौड़ी-सी, नई बनी सड़क जा रही थी। पेड़ों और झाड़ियों को का-छांट करके, आसपास की साफ-सफाई हुई नजर आ रही थी।

कृष्ण सूरी, मोना चौधरी महाजन को यहां तक लाया था। दूर से ही हवेली दिखाकर चला गया था। रतनचंद कई दिनों से बंद रखे, ऑफिस को खोलने चला गया था और उस मकान में कैद बन्ने की पहरेदारी और घायल राधे की देखभाल के लिए, जगतदास वहीं मौजूद था।

"ये हवेली कभी तगड़ी शानदार रही होगी।" महाजन ने कहा और कपड़े में छिपा रखी बोतल निकालकर घूंट भरा--- "किसी गड़बड़ वाले काम को अंजाम देने के लिए इससे बढ़िया जगह और कोई नहीं हो सकती। भीतर कुछ भी हो। किसी को पता नहीं चलेगा।"

"ठीक कहते हो।" मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव थे। उनकी निगाहें दूर से ही हवेली पर फिरती रहीं। वे पेड़ों के पीछे थे। इसलिए हवेली की तरफ से उन्हें आसानी से देखा जाना संभव नहीं था।

"महाजन।" मोना चौधरी बोली--- "हवेली की छत पर कोई टहल रहा है।

"आसपास नजर रखने वाले होंगे।"

"हां। मेरे ख्याल में, हवेली में सुरक्षा के इंतजाम के बारे में मालूम हो जाए तो, भीतर प्रवेश करने में आसानी रहेगी। हम सोच-समझकर कदम उठा सकेंगे।"

"ये मालूम करना आसान नहीं।" महाजन बोला--- "यहां सुरक्षा के इंतजाम कर रखे हों और बाहरी आदमी का आना-जाना न के बराबर हो तो ये बातें मालूम नहीं की जा सकतीं।"

"ये बात ठीक हो सकती है। यहां अजीत वासवानी या उसका क्लोन जो भी रह रहा है। छिपकर रहा है। ऐसे में वह न तो बाहरी आदमी को आने देंगे और बाहर वालों से वास्ता भी नहीं रखेंगे। लेकिन हमारा उस तक पहुंचना जरूरी है। रात को हम हवेली में प्रवेश करेंगे।"

"दोनों की निगाहें बराबर हवेली पर घूम रही थीं।

"चारदीवारी बारह फीट ऊंची है और उस पर तीन-तीन फीट ऊंची कांटेदार तार लगा रखी है। कुछ ज्यादा ही सतर्कता बरत रहे हैं ये लोग।" महाजन बोला।

"फाटक पर मुझे दो आदमी नजर आ रहे हैं।" मोना चौधरी ने कहा--- "लेकिन भीतर देखने को कुछ नहीं मिल रहा। यानी कि भीतर क्या हो रहा है, बाहर से जानना संभव नहीं लगता।"

"रात को ही भीतर घुसेंगे।" महाजन ने मोना चौधरी पर निगाह मारी।

"हां। लेकिन रात होने तक हवेली पर नजर रखनी पड़ेगी। शायद अजीत वासवानी या उसका क्लोन, जो भी है, नजर आ जाए। लेकिन नहीं, वो नजर नहीं आएगा।" मोना चौधरी का सिर इंकार में हिला।

"क्यों?"

"इन हालातों में वो किसी भी कीमत पर खुले में नहीं आएगा।" मोना चौधरी अपने शब्दों पर जोर देकर कह उठी।

"ये भी ठीक कहा तुमने।"

"रात होने का इंतजार करो। शाम के चार बज रहे हैं। ग्यारह-बारह बजे भीतर प्रवेश करेंगे।" मोना चौधरी ने सोच भरे स्वर में कहा--- "तुम यहीं रहो। मैं हवेली का चक्कर लगाकर इस बात का फैसला करती हूं कि रात को किस तरफ से भीतर प्रवेश करना ठीक रहेगा।"

"ठीक है बेबी। लेकिन जरा ध्यान से। छत वालों की निगाहों में न आ...।"

महाजन कहते रुका।

दोनों की निगाहें हवेली के फाटक पर जा टिकीं, जिसे खोला जा रहा था। वे देखते रहे। देखते-ही-देखते थोड़ा-सा फाटक खुला और पचास-पचपन बरस के एक व्यक्ति ने बाहर कदम रखा और फाटक बंद हो गया। दोनों की निगाहें उस पर जा टिकीं।

देखने में वो मेहनतकश व्यक्ति लग रहा था। उसने कमीज और पायजामा पहन रखा था। कंधे पर अंगोछा जैसा कोई कपड़ा रखा था। बाहर निकलते ही, हवेली के दीवार के साथ-साथ वो बाईं तरफ बढ़ गया।

मोना चौधरी और महाजन की नजरें मिलीं।

"भीतर क्या हो रहा है। ये जानकारी, इसके अलावा और कोई नहीं दे सकता।" मोना चौधरी बोली।

"ये बताएगा?" मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े--- "कहीं ऐसा न हो कि हमें बताएं नहीं और भीतर वालों को जाकर कह दे कि बाहर कोई उनके बारे में पूछताछ कर रहा था। इससे वे सतर्क हो जाएंगे। रात को भी पहरा सख्त कर देंगे और हमने रात को भीतर प्रवेश करना है।"

मोना चौधरी के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

वो आदमी हवेली की दीवार के साथ-साथ आगे बढ़ता जा रहा था।

दोनों की निगाहें उस पर ही थीं।

और फिर दीवार समाप्त होते ही वो मुड़ गया।

"तुम यहीं रहकर हवेली पर नजर रखो। मैं देखती हूं, वो कहां गया है।" कहने के साथ ही मोना चौधरी पीछे हटी और पेड़ों के तनों में से गुजरती हुई लंबा चक्कर लेकर, उस तरफ बढ़ने लगी, जिधर वो आदमी गया था।

■■■

हवेली के पीछे, कुछ दूर खाली जगह थी। उसके बाद पुनः पेड़ों-झाड़ियों का सिलसिला शुरू हो गया था। वो आदमी उन्हीं पेड़ों से गुजरता हुआ आगे बढ़ता रहा। कुछ देर बाद पेड़ खत्म हो गए और सामने ही दूर-दूर तक खेत नजर आने लगे। उन्हीं खेतों के पार, कच्चा-पक्का गांव नजर आ रहा था।

वो एक पेड़ की छांव में बैठा और कमीज की जेब से बीड़ी निकालकर सुलगा ली। वह थका-सा लग रहा था। कुछ सोच में था और कुछ परेशान भी लगा। इधर-उधर खेतों में निगाहें दौड़ाते अभी आधी बीड़ी पी होगी कि, मोना चौधरी चेहरे पर मुस्कान लिए, उसके सामने आ गई।

उसने अचकचाकर मोना चौधरी को देखा कम-से-कम इस जगह पर तो उसने ऐसी हसीन सूरत देखने की सोची भी नहीं होगी।

"क्या बात है चाचा, कुछ परेशान लग रहे हो।" मोना चौधरी ने मुस्कान भरे स्वर में पूछा।

"यूं ही।" उसने बीड़ी का कश लिया--- "तुम कौन हो?"

उसकी बात पर ध्यान न देकर मोना चौधरी बोली।

"कहां रहते हो चाचा?"

"गांव में।" कहते हुए उसकी निगाह धूप में झुलसते गांव की तरफ उठी।

"लेकिन तुम तो हवेली की तरफ से आ रहे हो।" मोना चौधरी पास ही पड़े पत्थर पर बैठ गई।

"हवेली में रहने वाले लोगों के लिए खाना बनाने का काम करता हूं। आजकल वहीं रह रहा हूं।" उसने सरल लहजे में कहा--- "बहुत दिक्कत वाला काम है। पन्द्रह-पन्द्रह लोगों का खाना बनाना पड़ता है। दिन-भर लगा रहकर भी काम पूरा नहीं हो पाता। थक जाता हूं। लेकिन क्या करूं। जमीन तो है नहीं कि खेतीबाड़ी कर लूं। काम करके पेट तो भरना ही है। यहां काम मिल गया। पंद्रह-बीस दिनों से अच्छा पैसा दे रहे हैं। लेकिन मैंने तो आज साफ-साफ कह दिया कि इतना काम मेरे अकेले के बस का नहीं। बहुत कठिनता से राजी किया है उन लोगों को कि गांव से किसी औरत को लाकर खाना बनाने में अपने साथ लगा लूं। वरना वो राजी ही नहीं होते थे की हवेली में कोई और पैर भी रखे। लेकिन परेशानी तो यहां आ गई है कि कौन अपनी औरत को दिन-रात के लिए यहां भेजेगा।"

"हां। ये बात तो है।" मोना चौधरी ने फौरन उसकी हां-में-हां मिलाई--- "हवेली में कोई औरत नहीं है?"

"राम का नाम लो।" बरबस ही उसके होंठों से निकला--- "मुझे तो उनकी शक्लें भी पसंद नहीं है। बदमाश जैसे लगते हैं वे सब। दो पैसे मिल रहे हैं तो उनका काम कर रहा हूं। नहीं तो उधर देखूं भी नहीं।"

"ये कैसे हो सकता है कि पंद्रह आदमियों का तुम खाना बनाते हो और वहां एक औरत ही नहीं।"

"तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं।" एकाएक तेज स्वर में कह उठा।

"मेरा ये मतलब नहीं था।" मोना चौधरी उसके मूड को संभालते हुए बोली--- "मैं तो ये कहना चाहती थी कि जहां कोई औरत न हो। आदमी-ही-आदमी हों, वहां कोई औरत कैसे रह सकेगी। गांव की औरत तो बिल्कुल भी नहीं। उसके घर वाले उसे भेजने से रहे। हवेली वाले लाख शरीफ ही क्यों न हों।"

"वोई तो मैंने पहले कहा था। लेकिन तुम कौन हो?"

"हवेली में आने-जाने वालों के लिए तुम्हें चाय-पानी भी बनाना पड़ता होगा।"

"कौन ससुरा वहां आवे है।" उसने मुंह बनाकर कहा--- "कोई बाहर भी नहीं निकले हो। पता नाही का खिचड़ी बनावे हैं वे सब। हाथों में बंदूक भी रखे हो।"

"फिर तो गलत आदमी होंगे वे सब।"

"वो तो हौवे ही। लेकिन ज्यादा पैसा दे रहे हैं। इसलिए चुप हूं। बेटी सत्रहवें में पहुंच गई है। ब्याह भी पक्का कर दिया हो। दहेज के पचास हजार का जुगाड़ नहीं हो रहा। हवेली वालों से भी बीस-पच्चीस हजार ही इकट्ठा हो पाएगा। पंद्रह हजार तो मुझे दे चुके हैं।"

"पंद्रह हजार। इतने ज्यादा।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"हां। उसो में शर्त ये हौवे कि मैं भीतर की कोई भी बात, बाहर किसी से न करूं। मेरा क्या जाता है। पैसे मिल रहे हैं। नहीं बताता, भीतर की बात।" उसने आखिरी कश लेकर बीड़ी फेंकी।

"लेकिन मुझे तो बता दी चाचा।" मोना चौधरी मुस्कुराई।

उसने मोना चौधरी को घूरा।

"तुम कौन हो। शहरी छोकरी लगती हो।"

"बेटी का ब्याह करना है।"

"क्या मतलब?"

"दहेज का पचास हजार इकट्ठा मिल सकता है।"

"क---कैसे?"

"दस-बीस और ऊपर मिल जाएंगे।" मोना चौधरी ने होंठ सिकोड़े।

"क---क---कैसे?"

"मुझे खाना बनाने वाली बनाकर हवेली के भीतर ले चलो।"

उसने अजीब-सी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।

"क्यों?"

"ज्यादा सवाल मत करो। तुम्हें बेटी के ब्याह के लिए अभी पैसे दे दूंगी। खाना बनाने वाली बनाकर मुझे हवेली में ले चलो। हवेली में मुझे काम है किसी की तलाश है। सिर्फ यही बात है। वैसे भी गांव में तुम्हें ऐसी कोई औरत नहीं मिलेगी जो हवेली में जाकर खाना बनाने का काम करने को तैयार हो जाए और इतना तो मुझे पूरा विश्वास है कि तुम अपनी बेटी को, खाना बनाने के लिए वहां नहीं ले जाओगे।"

"राम का नाम लो। उन बुरे लोगों के बीच मैं अपनी बेटी को क्यों ले जाऊंगा।" वो तेज स्वर में कह उठा।

"यही तो मैं कह रही हूं कि वहां, कौन अपनी बेटी-बहू-बहन को पैसे के लालच में भेजेगा। जो भी सुनेगा, फौरन इंकार कर देगा। मेरे से बढ़िया खाना बनाने वाली तुम्हें नहीं मिलेगी।"

उसने गहरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा।

"क्या सोच रहे हो चाचा।"

"सोच रहा हूं कि तुम मुझे बेवकूफ समझ रही हो और मैं इतना मैं हूं नहीं।" उसने सिर हिलाकर कहा--- "हवेली वाले तो गलत लोग हैं ही, मुझे तो तुम भी ठीक नहीं लग रही। हवेली में जाने के लिए, मुझे पचास-साठ-सत्तर हजार जैसी बड़ी रकम दे रही हो। कहती हो, वहां किसी को ढूंढना है। अपना हाल-हुलिया तो देखो। वो तो तुम्हें देखते ही तुम पर हाथ डाल देंगे। छोड़ेंगे नहीं तुम्हें और फिर तुम किधर से खाना बनाने वाले लगती हो। तुम तो किसी फिल्म की हीरोइन लगती हो।"

"अगर सिर्फ यही परेशानी है तो वो ठीक हो जाएगी।"

"कैसे?"

"मैं अपना हुलिया बदल लूंगी। पूरी गांव वाली लगूंगी। मुझे देखकर कोई कह भी नहीं सकेगा कि मैं गांव वाली नहीं हूं। उस हालत में उन्हें कह सकते हो कि मैं तुम्हारी बीवी हूं और...।"

"नहीं। मैं उन्हें बता चुका हूं कि मेरे परिवार में सिर्फ बेटी है। बीवी को मरे दस साल हो गए।"

"कोई बात नहीं। तुम मुझे गांव की औरत बता देना, जिसे खाना बनाने के लिए लाए हो।"

वो सोच में डूब गया।

"अब क्या कमी रह गई चाचा।"

"अगर उन लोगों को मालूम हो गया कि मैंने हेराफेरी की है तो वो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।"

"उन्हें नहीं मालूम होगा। मुझ पर भरोसा रखो।"

"तुम अकेली उनका क्या कर लोगी?"

अब मोना चौधरी क्या जवाब देती।

"सोच लो चाचा। मेरी बात मानकर तुम्हें फायदा होगा। अपनी बेटी का ब्याह भी कर लोगे। तुमने तो सिर्फ मुझे खाना बनाने वाली बनाकर भीतर ले जाना है और...।"

"ठीक है।" जैसे उसने अपना फैसला ले लिया--- "पहले पैसे लूंगा।"

मोना चौधरी ने कमीज के भीतर हाथ डाला और कमर के साथ पैंट में फंसा रखी पांच-सौ रुपये की नोटों की एक गड्डी निकाली और उसे दिखाकर बोली।

"यह पूरे पचास हजार हैं।"

"मालूम है पांच सौ के नोटों की गड्डी पूरी हो तो वो पचास हजार होता है।" कहने के साथ ही वो जल्दी से उठा और आगे बढ़कर नोटों की गड्डी ले ली। उसे अच्छी तरह चैक किया फिर मोना चौधरी को देखा। आंखों में लालच स्पष्ट नजर आ रहा था--- "तुमने कहा था दस-बीस, पचास के ऊपर होंगे।"

मोना चौधरी ने मुस्कुराकर, एक गड्डी और निकाली।

जो कि उसने तुरंत थामते हुए कहा।

"ये तो दस हुआ। बीस तो पूरा कर दो।"

मोना चौधरी ने एक और गड्डी निकाली। वो भी उसके पास पहुंच गई। उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था। वो अविश्वास भरी निगाहों से तीनों गड्डियों को थामे, कांपती उंगलियों से फुरेरी दे रहा था।

"अब तो तुम्हारी बेटी का ब्याह हो जाएगा?"

"हां। लड़के वालों का खाना-पीना भी हो जाएगा। बहुत परेशान था मैं। सब ठीक हो गया।" उसने खुशी से कांपते स्वर में कहते हुए नोटों पर से नजर हटाकर मोना चौधरी को देखा--- "मैं---मैं अभी इन्हें घर पर रखकर आता हूं। तुम यहीं रहना।"

"खिसक मत जाना।" मोना चौधरी ने उसे घूरा।

"राम का नाम लो।"

"गांव में सूती धोती। ब्लाउज, जो भी और ठीक लगे, मेरे पहनने-ओढ़ने के लिए। वो ले आना।

उसने सिर से पांव तक मोना चौधरी को देखा।

"साड़ी-ब्लाउज पहनकर तुम्हारा रूप कैसे बदलेगा।"

"वो तुम्हें बाद में नजर आ जाएगा। तुम्हारा नाम क्या है?"

"हरीचंद।"

"ठीक है। जल्दी जाओ और जल्दी आओ।"

उसने नोटों की गड्डियों को कंधे पर रखे कपड़े में छिपाया और खेतों को पार करता हुआ तेजी से आगे बढ़ गया। मोना चौधरी की निगाह उस पर टिकी रही। हवेली में प्रवेश करने का रास्ता मिल गया था। अब भीतर क्या हालात पैदा होते हैं, वो देखना था।

आधे घंटे में ही हरीचंद लौट आया। वो खुश था। धोती ब्लाउज ले आया था।

मोना चौधरी ने अजीत वासवानी की तस्वीर निकालकर, उसे दिखाई।

"इसे देखा है कभी?"

तस्वीर पर निगाह पड़ते ही हरिचंद के होंठों से निकला।

"हां। एक बार हवेली में ही देखा था।"

"एक बार?"

"हां। दोबारा तो ये नजर नहीं आया। मेरा काम तो खाना बनाना है।" हरीचंद ने मोना चौधरी को देखा--- "बर्तनों में डालकर देना है।" पल भर के लिए वो ठिठका--- "सब अपना-अपना खाना, या अपने साथ किसी दूसरे का भी ले जाते हैं। मैंने ही कह रखा है। अकेला बंदा हूं। बनाकर सबके पास खाना भी पहुंचाऊं। ये मेरे बस का नहीं है। तभी वो खाना किचन से ही ले जाते हैं। परंतु एक आदमी हर बार, खासतौर से एक थाल सजाकर किसी के लिए ले जाता है। मैंने एक-दो बार पूछा तो मुझे डांटकर कहा कि मैं अपने काम से मतलब रखूं। जब वो थाल ले आता है तो फिर अपने लिए खाना लेता है।"

मोना चौधरी के होंठ सिकुड़े।

"तो वो थाल इसी आदमी के लिए जाता होगा।" मोना चौधरी ने हाथ में पकड़ी तस्वीर हिलाई।

"पक्का नहीं कह सकता।"

"तुमने इसे एक बार ही देखा है।"

"हां। उसके बाद नहीं देखा। हवेली बहुत बड़ी है। अगर ये हवेली में है तो कहीं भी हो सकता है। मेरा काम तो किचन का है, हवेली के भीतरी हिस्सों में ऐसा कोई काम नहीं कि मैं उधर जाऊं। तीन-चार दिन में कभी-कभार वो हवेली की सफाई करा लेते हैं मुझसे, परंतु ये नजर नहीं आया।"

मोना चौधरी तस्वीर को जेब में रखते हुए सोच भरे स्वर में कह उठी।

"जब तुम हवेली में मुझे लेकर जाओगे तो बोल देना, किचन में आने की कोई जरूरत नहीं। ये औरत अब से खाना भी पहुंचाया करेगी।"

"तुम्हें इस तस्वीर वाले की तलाश है।"हरीचंद ने उसे देखा।

"हां।"

"क्यों?"

"इस क्यों को अपने दिमाग में न लाओ। बेटी की शादी के बारे में सोचो।" मोना चौधरी एकाएक मुस्कुराकर कह उठी--- "और ध्यान रखना। खाना वगैरह मुझे बनाना खास नहीं आता। सारा काम तुम्हें ही...।"

"छोड़ो ये बात। तुमने मेरी बेटी के ब्याह के लिए पैसे दिए हैं। मैं क्या तुमसे खाना बनवाऊंगा।" हरीचंद मुस्कुराकर कह उठा--- "मैं पंद्रह क्या तीस आदमियों का भी खाना बना लूंगा और थकूंगा भी नहीं।"

"हवेली की सफाई भी मैं करूंगी।"

"नहीं। वो मैं...।" हरीचंद ने कहना चाहा।

"बात को समझने की कोशिश करो। सफाई के दौरान मुझे देखना है कि तस्वीर वाला आदमी हवेली में है या नहीं।"

हरिचंद की गर्दन फौरन हिली।

"समझा।"

"आओ।" मोना चौधरी कहकर आगे बढ़ी।

"कहां।"

"हवेली के सामने, पेड़ों के बीच मेरा साथी मौजूद है। उसके पास चलना है।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"लेकिन हवेली वालों ने मुझे जल्दी से गांव से खाना बनाने वाली औरत लेकर आने को कहा है। रात का खाना बनाना है। शाम हो रही है।" हरीचंद कह उठा।

"जब औरत मिलेगी तभी तो उसे लेकर जाओगे। देर भी तो हो सकती है।" मोना चौधरी मुस्कुराई।

"सो तो है।" हरीचंद समझने वाले ढंग से सिर हिला उठा।

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मोना चौधरी, हरीचंद को लेकर, लंबा चक्कर काटकर इस तरह महाजन के पास पहुंची कि हवेली की छत पर मौजूद व्यक्तियों की निगाह उन पर न पड़ सके।

महाजन को सारा मामला मालूम हुआ।

"बेबी, तुम हवेली में अकेली जाओगी।" महाजन की आंखें सिकुड़ी।

"हां।" मोना चौधरी की निगाह हवेली की तरफ उठी--- "ऐसा कोई रास्ता नहीं कि तुम्हें साथ ले जा सकूं। मुझे भीतर जाने का सुरक्षित रास्ता मिल गया है, यही बड़ी बात है।"

महाजन हालातों को बखूबी समझ रहा था।

"तुम अभी बाजार जाओ और मेकअप का सामान ले आओ। सामान में क्या-क्या चाहिए, ये सुन लो और जल्दी आना।" कहने के साथ ही मोना चौधरी सामान के बारे में बताने लगी।

एक घंटे में ही महाजन, मोना चौधरी का सामान ले आया।

मोना चौधरी मेकअप में व्यस्त हो गई। सिर पर चुटिया वाली 'विग' रखकर जमा ली। इस सारे काम में महाजन, पूरी तरह हाथ बंटा रहा था। एक तरफ बैठा हरीचंद, मोना चौधरी का रंग-रूप बदलते देख रहा था। तने की ओट में जाकर मोना चौधरी ने कपड़े बदल लिए थे।

करीब एक घण्टा ही लगा, मेकअप का काम खत्म होने में।

अब मोना चौधरी करीब पचास बरस की औरत लग रही थी। विग के बाल आधे सफेद और आधे काले थे। चुटिया कमर तक, बे-ढंगी-सी जा रही थी। साड़ी और ब्लाउज पुराना और घिसा हुआ था। महाजन के लाये सामान में तीन तरह का पाउडर था, जिन्हें मिलाकर, पांवों बांहों और चेहरे पर लगा लिया था, जिससे शरीर का रंग मैला नजर आने लगा था और चेहरा मुर्झाया-सा हो गया था। अब वो देखने में ऐसी औरत लग रही थी, जो गरीबी की मारी हो, तमाम उम्र मेहनतकश में गुजर गई हो। फिर भी ठीक से दो वक्त का खाना न मिल पाता हो।

"एकदम फिट मेकअप है बेबी।" महाजन ने तसल्ली भरे स्वर में कहा।

हरीचंद के चेहरे पर हैरानी थी।

"तुम तो पहचानी ही न जावो। लगो जैसे गांव में म्हारे पड़ोस में रहो हो।"

मोना चौधरी के नंगे पांव होने की वजह से, मेकअप में और भी सच्चापन नजर आ रहा था। विग के कुछ बाल लटों के रूप में माथे पर इस तरह थे जैसे बाल बनाना भूल गई हो।

"चलें हरीचंद।"

हरीचंद फौरन सिर हिलाकर उठ खड़ा हुआ।

"बेबी।" महाजन गंभीर स्वर में बोला--- "मैं यहीं रहूंगा।"

"मुझे वक्त भी लग सकता है। एक दिन भी, तीन दिन भी।" मोना चौधरी ने उसे देखा।

"कितना भी वक्त लगे। मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा। अगर हवेली में कोई गड़बड़ हो जाती है तो उस मौके पर तुम्हें मेरी जरूरत पड़ सकती है।" महाजन कह उठा।

मोना चौधरी ने महाजन को देखकर सिर हिलाया फिर हरीचंद के साथ आगे बढ़ गई।

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