आगरा रोड के जिस भाग में विमल उस वक्त मौजूद था, बम्बई की आजादी उससे मीलों दूर रह गई थी । वहां लम्बी, सीधी, सपाट सड़क एक पुल पर से गुजरती थी । विमल ने वही स्थान डायरी और नीलम के आदान-प्रदान के लिए बखिया से निर्धारित किया था ।
उस स्थान की विशेषता यह थी कि एक ही प्वांयट पर खड़े होकर सड़क के दोनों ओर मीलों दूर तक देखा जा सकता था । आसपास कोई आबादी वगैरह नहीं थी और न ही वहां ऊंचे पेडों या झाड़-झंखाड़ों की कोई ओट उपलब्ध थी, इसलिए विमल को गारंटी थी कि कोई छुपकर उसके सिर पर नहीं पहुंच सकता था ।
ऊपर से बखिया को विमल ने इतना थोड़ा समय दिया था कि वह किसी शरारत का अग्रिम इंतजाम करने के लिए हरगिज भी पर्याप्त नहीं था ।
उसने कहा था कि वह वहां अकेला पहुंचेगा इसलिए नीलम के साथ वहां पहुंचने वाला शख्स भी अकेला हो ।
बखिया ने इस बात से इत्तफाक जाहिर नहीं किया था ।
“सरदार !” - उसने कहा था - “डायरी तो बेजान चीज है लेकिन तुम्हारी छोकरी क्या बेजान चीज है ?”
“मतलब ?”
“डायरी को संभालना तेरे लिए कोई समस्या नहीं । उसे तू जेब में भी रख सकता है । लेकिन तेरी छोकरी तो जेब में नहीं रखी जा सकती । ड्राइवर गाड़ी चलाएगा या उसे संभालेगा ?”
“तो ?”
“हमारी तरफ से दो आदमी आने जरूरी हैं । एक गाड़ी चलाने के लिए और दूसरा छोकरी को संभालने के लिए । तू भी बेशक अपना कोई साथी साथ ले आना ।”
“मुझे साथी की जरूरत नहीं । मुझे बखिया की जुबान पर भरोसा है । मुझे विश्वास है कि बखिया अपनी जुबान से नहीं फिरेगा और अपने आदमियों को कोई शरारत करने की इजाजत नहीं देगा ।”
“सरदार, अगर बखिया की जुबान पर तुझे ऐसा ही विश्वास है तो छोकरी को बम्बई से बाहर काले कोस क्यों बुला रहा है ? डायरी लेकर यहां आ और अपनी छोकरी को ले जा ।”
“नहीं । यही प्रोग्राम ठीक है ।”
“मर्जी तेरी ।”
विमल ने अपनी कार पुल से थोड़ा परे झाड़ियों के पीछे खड़ी की थी । वहां कार छुपी तो नहीं हुई थी लेकिन इतना जरूर था कि दूर से नहीं दिखाई दे सकती थी ।
फिलहाल दूर-दूर तक सड़क खाली थी ।
उसने घड़ी पर निगाह ड़ाली ।
मुलाकात का वक्त लगभग हो गया था ।
वह पुल के पास खाई में उकडूं होकर बैठ गया ।
तभी उसे बम्बई की दिशा में सड़क पर बहुत दूर एक वाहन की उपस्थिति का आभास मिला ।
सूरज तब तक डूबा नहीं था लेकिन वातावरण में रात का अंधेरा छा जाना और कुछ ही मिनटों की बात थी ।
वाहन समीप आया तो उसने देखा कि वह एक बस थी ।
बस उसके सामने से गुजर गई ।
आने वाले आधे घंटे में तीन-चार गाड़ियां और वहां से गुजरी लेकिन किसी ने भी पुल पर रुकने या ठिठकने का उपक्रम नहीं किया ।
विमल निराश हो उठा ।
अब उसे बखिया के आदमियों के वहां पहुचने की उम्मीद नहीं रही थी ।
वह खाई में सें निकला और अपनी कार के समीप पहुंचा ।
वह कार में सवार हुआ । उसने डोम लाइट जला ली और रियर व्यू मिरर का रुख अपनी तरफ कर लिया । उसने अपने सिर पर एक गंजे आदमी का विग चढाया और ऊपरी होंट पर अधपकी मूंछे लगा ली ।
अपनी दाईं आंख के नीचे गाल पर उसने एक मोटा-सा मस्सा लगाया और आंखों पर सुनहरी फ्रेम वाले बाइफोकल्स चढा लिए । उसने एक खोजपूर्ण निगाह शीशे में से झांकती अपनी नई सूरत पर डाली और संतुष्टिपूर्ण ढंग से गरदन हिलाई ।
उसी मेकअप में वह वहां तक पहुंचा था ।
आगरा रोड का नाला पार करते वक्त उसे अपनी सूरत में परिवर्तन जरूरी लगा था ।
उसने कार का इजन स्टाट किया और उसे झाड़ियों के पीछे से निकालकर वापिस सड़क पर चढाया ।
वह वापिस बम्बई पहुंचा ।
रास्ते में जो पहला पब्लिक टेलीफोन बूथ उसे दिखाई दिया, उस पर से उसने बखिया को टेलीफोन किया ।
उसने लाइन पर आते ही वह बरस पड़ा - “मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी । यही है बखिया की जुबान ? इसी दम पर आप अपने पुरखों के खून की दुहाई देते थे ? इसी दम पर...”
“अबे छोकरे !” - बखिया झल्लाया - “कुछ बखिया को भी कहने देगा या खुद ही बोले जाएगा ?”
“क्या कहना चाहते हैं आप ?”
“परेरा नीलम को साथ लेकर यहां से रवाना हुआ था ।”
“तो फिर रास्ते में गायब कहां हो गया ?”
“कहीं गायब नहीं हो गया । उसे तुम्हारी छोकरी के साथ वापिस लौट आना पड़ा ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि बम्बई से निकासी के हर रास्ते पर पुलिस बैठ चुकी है । आगरा रोड़ पर ऐसी नाकेबंदी थी कि परेरा कहता है कि अगर वह वहां से गुजरने की कोशिश करता तो नीलम शर्तिया वापिस पुलिस की गिरफ्त में पहुंच जाती और फिर वह भी जेल में होता ।”
“ओह !”
“सरदार, तू क्यों लंबे पचड़ों में पड़ता है ? तू यहीं कहीं क्यो नहीं अदला-बदली कर लेता ? तू क्यों अपनी छोकरी को शहर से बाहर मंगाना चाहता है ?”
“बखिया साहब, मौजूदा हालात में तो और भी जरूरी हो गया है कि आप नीलम को शहर से बाहर पहुंचाएं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि आप ही उसे शहर से बाहर पहुंचा सकते हैं । आपकी साधन-संपन्नता पर मुझे पूरा भरोसा है । मुझे पूरा विश्वास है कि आप कोई ऐसा जरिया निकाल लेंगे जिससे नीलम सुरक्षित शहर से बाहर पहुंच जाएगी । बाद में मुझे भी तो उसे शहर से बाहर निकालना है । यह काम में नहीं कर सकता, लेकिन बम्बई का बादशाह कर सकता है ।”
“लड़के, यह आंखमिचौली का खेल अच्छा नहीं । अगर तुम्हारी छोकरी फिर पुलिस की गिरफ्त में पंहुच गई तो ?”
“तो आप उसे फिर छुड़ा लिजिएगा ।”
“सरदार, तू मूर्ख ही नहीं ढीठ भी है ।”
“कल दोपहर को मैं आगरा रोड़ पर उसी जगह नीलम का इंतजार करूंगा जहां वह आज आने वाली थी । तब तक के लिए नमस्ते ।”
उसने लाइन काट दी ।
वह बूथ से बाहर निकला ।
वह अपनी कार की तरफ बढ रहा था कि उसी क्षण इत्तफाक से उसकी निगाह सड़क से गुजरती एक कार पर पड़ी ।
कार की ड्राइविंग सीट पर उसे देवाराम बैठा दिखाई दिया ।
वह लपककर अपनी कार में सवार हुआ ।
उसने कार देवराम की कार के पीछे दौड़ाई ।
पहले ही चौराहे पर लाल बत्ती की वजह से वहां रुका हुआ देवाराम उसे मिल गया ।
उसने कार को उसकी कार के पहलू में ले जाकर हॉर्न बजाया ।
देवाराम ने उसकी दिशा में देखा ।
विमल को देखकर वह सकपकाया ।
विमल ने उसे चौराहा पार करके कार रोकने का संकेत किया ।
देवाराम ने सहमति में सिर हिलाया ।
तभी बत्ती हरी हो गई ।
चौराहा पार करके दोनों रुके ।
विमल अपनी कार से निकलकर उसकी कार के समीप पहुंचा ।
“तुम इधर क्या कर रहे हो ?” - विमल ने अचरज से पूछा ।
“यूं ही ।” - देवाराम लापरवाही से कंधे झटकता हुआ बोला - “किसी से मिलने आया था ?”
“मेरी तो इत्तफाक से ही तुम्हारे पर नजर पड़ गई थी ।”
“अच्छा हूआ । तुम्हारा काम बना ?”
“नहीं ।”
“क्यों ?”
विमल ने बखिया से मालूम हुई वजह बताई ।
“ओह !” - देवाराम चितित भाव से बोला - “यानी कि बात कल पर टल गई ?”
“हां ।”
“अब क्या इरादा है ?”
“अब” - विमल ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर दृष्टिपात किया - “शांतिलाल की आरती उतारने का इरादा है ।”
“मतलब ?”
विमल ने उसे मतलब समझाया ।
“मैं तुम्हारे साथ चलूंगा ।” - देवाराम बोला ।
“जरूरत नहीं ।”
“विमल, हर बार तुम्हारी जिद नहीं चलेगी ।”
“लेकिन तुम मेरे किस काम आओगे ?”
“यह मैं वहां का माहौल देखकर बताऊंगा ।”
“ठीक है । मर्जी तुम्हारी ।”
“पहले ‘मराठा’ में चलो ।”
“वह किसलिए ?”
“वागले वहां है । उसे भी साथ लेकर चलते हैं । दोनों में से एक कार भी वहां छोड़ देंगे ।”
“बेहतर ।”
***
आठ बजने में पांच मिनट पर शांतिलाल विले पार्ले के लक्ष्मीनारायण मंदिर पहुंचा ।
उस रोज उसके साथ दो की जगह चार बॉडीगार्ड थे ।
तीन बॉडीगार्ड कार से बाहर निकले ।
दो जनों ने बड़ी मुस्तैदी से बाहर से मंदिर की चारदीवारी का चक्कर लगाकर तसल्ली की कि कोई गड़बड़ नहीं थी और तीसरा भीतर जाकर यह तसल्ली करके आया कि भीतर कोई संदिग्ध चेहरा नहीं था और वातावरण में कोई असाधारण बात नहीं थी ।
फिर शांतिलाल ने कार से बाहर कदम रखा । दो बॉडीगार्डों के साथ उसने मंदिर में प्रवेश किया ।
ऐसा उसकी जिंदगी में वह पहला मौका था जबकी मंदिर में भी उसने बॉडीगार्ड के साथ कदम रखा था ।
भीतर मौजूद भक्तजन शांतिलाल को पहचानते थे । सबने बड़े आदर भाव से उसके लिए रास्ता छोड़ दिया ।
शांतिलाल सबसे आगे पहुंचा औह सबसे अगली कतार में जा खड़ा हुआ ।
उसके बॉडीगार्ड भक्तों की भीड़ से अलग हटकर एक तरफ खड़े हो गए । दोनों के दायें हाथ जेब में पड़ी अपनी-अपनी रिवॉल्वर की मूठ पर थे । वे इतने सतर्क थे किसी की टेढी निगाह भी उनकी जानकारी के बिना शांतिलाल की तरफ नहीं उठ सकती थी । वे जानते थे कि उनके बॉस की जान को वहां कोई खतरा नहीं था लेकिन फिर भी बॉस की तसल्ली के लिये वे सतर्कता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे ।
विमल, देवाराम और वागले साढे सात बजे मंदिर पहुंच गए थे । वागले को उन्होंने पिछवाड़े में मंदिर से थोड़ा परे खड़ी की कार में ही रहने दिया था और पिछवाड़े के रास्ते ही वे मंदिर में दाखिल हुए थे ।
पूछने पर पता लगा कि पुजारी पिछवाड़े के कम्पाउंड में ही बने एक-दो कमरों के क्वार्टर में रहता था । वहां से मालूम हुआ कि वह आरती की तैयारी के लिए मंदिर में जा चुका था ।
पिछवाड़े से होकर मंदिर में दाखिल होने का एक रास्ता था । उस रास्ते से वे भीतर दाखिल हुए । उन्होंने पाया कि वह रास्ता मंदिर के उस वक्त तक भक्तों से भरने लगे मेन हॉल में नहीं खुलता था । वह रास्ता लक्ष्मीनारायण की विशाल, भव्य आदमकद प्रतिमाओं वाले कक्ष के पहलू में बने एक अन्य कक्ष में खुलता था ।
उसी कक्ष में उन्होंने पुजारी को मौजूद पाया ।
पुजारी वहां अकेला पुजारी को मौजूद पाया ।
वे दोनों भीतर दाखिल हुए ।
उनके आगमन की आहट सुनकर अधेड़ पुजारी ने सिर उठाया ।
“इधर मत आइए ।” - वह बोला - “कृपया सामने की तरफ से हॉल में जाइए ।”
“हॉल में भी चले जाएगे, महाराज ।” - विमल बोला - “पहले आपसे भेंट तो कर लें ।”
विमल तब तक अपना अधेड़ व्यक्ति वाला मेकअप उतार चुका था । पुजारी की सूरत पर निगाह पड़ते ही उसे अपना वह मेकअप याद आने लगा ।
पुजारी की खोपड़ी भी खलवाट थी और उसके ऊपरी होंठ पर वैसी ही अधपकी मूंछें थी जैसी विमल ने नकली लगाई थीं । और तो और, उसके दायें गाल पर आंख के नीचे मस्सा भी था । केवल चश्मा वह नहीं लगाए था ।
“इस वक्त हमारे से बात संभव नहीं, भक्त ।” - पुजारी बोला - “आरती का वक्त हो रहा है ।”
विमल ने देवाराम को संकेत किया ।
देवाराम ने दरवाजा बंद करके उस पर सांकल चढा दी ।
“अरे, अरे !” - पुजारी हड़बड़ा गया - “यह क्या कर रहे हो ?”
विमल ने रिवॉल्वर निकालकर उसकी तरफ तान दी ।
पुजारी के छक्के छूट गए ।
“तुम” - वह हकलाया - “मंदिर लुटना चाहते हो ? तुम... भगवान के... आभूषण उतारना चाहते हो ?”
“हरगिज भी नहीं ।” - विमल बोला - “हमारे मन में ऐसा अपवित्र ख्याल भी आए तो भगवान करे, हमें नर्क में भी जगह न मिले ।”
“तो फिर ?”
“महाराज ! आज भगवान की आरती हम उतारेंगे ।”
“क...क्या ?”
“हम पहले आपके क्वार्टर में गए थे । बाल-बच्चेदार आदमी हैं आप । आपकी वजह से आपके परिवार पर कोई कष्ट आए, मुझे पूरा विश्वास है यह आपको गवारा नहीं होगा ।”
“मेरा परिवार... मेरा परिवार...”
“हमारा एक आदमी ऐसी ही रिवॉल्वर लिए आपके क्वार्टर में आपके परिवार के सिरहाने बैठा हुआ है । आपने हमें सहयोग न दिया तो आपके परिवार का एक भी प्राणी जिंदा नहीं बचेगा ।” - विमल एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “आप भी नहीं ।”
“मुझे अपनी चिंता नहीं ।”
“लेकिन अपने परिवार की है ?”
पुजारी का सिर जोर से सहमति में हिला ।
“तो फिर अपने परिवार की सलामती की खातिर ही हमें सहयोग दीजिए ।”
“मैं क्या सहयोग दूं ?”
“देवा, जरा पुजारीजी को समझाओ, इन्होंने हमें क्या सहयोग देना है, मैं कार तक होकर आता हूं ।”
देवाराम ने सहमति में सिर हिलाया । उसने अपनी जेब से अपनी जेब अपनी रिवॉल्वर निकाल ली ।
विमल वहां से निकल गया ।
देवाराम बड़े से आत्मीयता-भरे स्वर में धीरे-धीरे पुजारी को समझाने लगा कि उससे क्या सहयोग अपेक्षित था ।
मुहम्मद सुलेमान की मौत के समाचार ने शान्तिलाल को बहुत डराया था । अब उसे लग रहा था कि सोहल मौत की जो धमकी उसे और जोजो को देकर गया था, वह उस पर बखूबी खरा उतर सकता था ।
उसका हाथ बार-बार अपने-आप ही अपनी छाती की तरफ उठ जाता था और वहां जा टिकता था, जहां सोहल अपनी एक उंगली से उसकी छाती पर क्रॉस का अदृश्य निशान बनाकर गया था ।
“शान्तिलाल !” - सोहल की आवाज अनायास ही हथौड़े की चोट की तरह उसके जेहन से टकराने लगती थी - “यू आर ए मार्क्ड मैन !”
और वह अपने कलेजे पर भय की जकड़न महसूस करने लगता था
उस मंदिर में आता तो वह रोज ही था लेकिन आज तो वह खास तौर से वहां अपने मन की शांति तलाश करने आया था ।
उसकी निगाह कई बार हॉल में मौजूद तमाम भक्तजनों पर फिर चुकी थी ।
कोई भी तो अपरिचित चेहरा नहीं था वहां । सब उसके जाने-पहचाने लोग था । ऊपर से हॉल में ही दो निहायत मुस्तैद, सशस्त्र, बॉडीगार्ड मौजूद थे । वहां तो उसे कोई खतरा नहीं था । वहां तो उसे कोई खतरा हो ही नहीं सकता था ।
लेकिन फिर भी उसका मन आंदोलित क्यों था ? किसी अज्ञात खतरे से आशंकित क्यों था ?
उसने अपने दिल को काबू किया और सामने मौजूद लक्ष्मीनारायण की मोहनी मूरत की तरफ मन लगाने की कोशिश की ।
आठ बजे ।
आरती का निर्धारित समय वही था
एकाएक घड़ियाल बजने लगे ।
शंखनाद होने लगा ।
घंटे बजने लगे ।
फिर मंदिर के बगल वाले कक्ष में से पंडितजी हाथ में आरती की थाली लिए प्रकट हुए ।
वे मंदिर की दहलीज पर पहुंचे ।
उन्होंने भगवान की आरती उतारनी आरंभ की ।
“ओम जय जगदीश हरे...”
शांतिलाल को पता नहीं क्यो पंडितजी कुछ बदले-बदले लग रहे थे लेकिन फिर उसने उसे अपना वहम मानकर वह ख्याल अपने मन से झटक दिया ।
वहा अपलक भगवान की प्रतिमा की तरफ निहारने लगा और धीरे-धीरे गाने लगा - “भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे...”
विमल ने पुजारी की धोती उतरवा ली और अपने कपड़े उतारकर उनके स्थान पर वह धोती पहन ली । अपने सिर पर उसने गंजा विग, और होंठों पर नकली मूंछें और गाल पर नकली मस्सा लगा लिया था ।
पंडित सख्त हैरानी से उसके कार्य-कलापों को निहार रहा था ।
हाथ में रिवॉल्वर लिए देवाराम पंडित के सामने बैठा था ।
पंडित द्वारा ही घिसे चंदन से विमल ने अपने माथे पर त्रिपुंड बनाया और उसके ऊपर रोली का लाल टीका लगाया । माथे जैसी ही चंदन की तीन लकीरें उसने अपने दोनों कंधों पर और कंठ पर खींची ।
पंडित का ही यज्ञोपवीत उतारकर उसने अपने गले में पहन लिया ।
फिर वह आरती का थाली की तरफ आकर्षित हुआ ।
आरती की थाली काफी चौड़ी थी । उसके ऐन बीच में देसी घी की जोत प्रचंड थी और उसी के पहलू मे धूप की एक कम-से-कम एक इंच मोटी बत्ती जल रही थी । उन दोनों चीजों को गेंदे के फूलों के मोटे-मोटे हारों ने घेरा हुआ था, जिनकी वजह से थाली पूरी भरी हुई थी ।
उन्हीं हारों के नीचे विमल ने अपनी रिवॉल्वर छुपाकर रखी थी ।
पूरी तैयारी कर चुकने के बाद ऐन वक्त पर उसे अपनी कलाई में पहने कड़े का ख्याल आया ।
उसने कड़ा उतारकर अपने कपड़ों की गठरी के हवाले किया ।
फिर देवाराम ने उसे टोका कि वह अभी तक अपने बूट पहने हुए था ।
बूट उतारकर उसने पुजारी की खड़ाऊं पहनीं ।
अंत में एक बार फिर उसने स्वयं को देवाराम के मुकम्मल मुआयने के लिए पेश किया ।
इस बार देवाराम ने उसे पास कर दिया ।
आरती की थाली उठाए विमल कक्ष से बाहर निकला और सामने के ऊंचे चबूतरे पर कदम रखा ।
शांतिलाल उसे पहली कतार में दिखाई दिया ।
विमल ने तुरंत उसकी तरफ से पीठ फेर ली ।
वह प्रतिमाओं वाले कक्ष के सामने पहुंचा ।
भक्तों की तरफ पीठ और भगवान की तरफ मुंह करके वह खड़ा हो गया ।
आरती आरंभ हुई ।
“ओम जय जगदीश हरे...”
उसका दिल एकाएक बहुत जोर से धड़कने लगा था ।
मंदिर के हॉल के भीतर भी दो बॉडीगार्ड की मौजूदगी उससे छुपी नहीं रही थी ।
क्या सुलेमान ने उससे जानबूझकर झूठ बोला था कि शांतिलाल के बॉडीगार्ड मंदिर में प्रवेश नहीं करते थे ?
या शांतिलाल ने ही वह अतिरिक्त सावधानी अभी से बरतनी शुरु की थी ?
यंत्रचालित-सा वह आरती फिराता रहा ।
आरती समाप्त हुई ।
कई घड़ियाल, कई शंख और कई घंटों के सामूहिक तुमुलनाद तथा भक्तों की जय जयकार के साथ आरती का समापन हुआ ।
जैसा कि पुजारी द्वारा उसे समझाया गया था, लोगों के शांत होते ही वह आरती लेकर चबूतरे से नीचे उतरा ।
पहली लाइन के सिरे से उसने आगे बढना आरंभ किया ।
भक्तजन आरती लेने लगे ।
शांतिलाल उस लाइन के मध्य में था और आरती के अपने समीप पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
विमल आरती की थाली संभाले धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ रहा था ।
एकाएक उसकी कनपटियों में खून बजने लगा था और उसका मुंह सूखने लगा था ।
उसने कनखियों से बॉडीगार्डों की तरफ देखा ।
आरती के समापन तक बॉडीगार्ड भी काफी हद तक लारपवाह हो गए थे । उन्हें पूरा विश्वास हो गया था कि वहां शांतिलाल को कुछ नहीं होने वाला था । उन्होंने अपने हाथ तक अपनी अपनी उस जेब से निकाल लिए थे जिसमें कि रिवॉल्वर थी ।
विमल शांतिलाल के सामने पहुंचा ।
वह शांतिलाल के इतना करीब था कि उस वक्त उसके और शांतिलाल के बीच मे केवल आरती की थाली जितना ही फासला था ।
शांतिलाल ने बड़े आदर भाव से आरती लेने के लिए अपने दोनों हाथ आगे बढाए ।
अब तक दोनों हाथों से थाली थामे विमल ने धीरे से थाली को अपने बायें हाथ में संतुलित किया और अपना दायां हाथ स्वतन्त्र कर लिया ।
उसका हाथ हौले से थाली में रखे फूलों के नीचे सरक गया ।
उसी क्षण शांतिलाल की निगाह विमल की निगाह से मिली ।
वह हड़बड़ाकर पीछे हटा लेकिन पीछे जगह नहीं थी । वह अपने पीछे खड़े आदमी से टकराकर रह गया ।
कहना मुहाल था कि उसने किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर ऐसा किया था या उसने अपनी मौत से एक क्षण पहले पुजारी के बहुरूप में अपने सामने मौजूद विमल को पहचान लिया था
तब तक रिवॉल्वर विमल के हाथ में आ चुकी थी ।
“शान्तिलाल, आज गोली का प्रसार ले !”
उसकी रिवॉल्वर ने दो बार आग उगली ।
दोनों गोलियां शान्तिलाल की छाती में दिल के ऊपर धंस गई ।
उसके घटने मुड़े । आरती लेने को आगे को फैले उसके दोनों हाथ आरती की थाली से टकराए और थाली उसके मृत शरीर के साथ ही झनझनाती हुई फर्श पर ढेर हो गई ।
एकाएक चीख-पुकार मच गई ।
इससे पहले कि बॉडीगार्ड कुछ समझ पाते, विमल ने उन दोनों को भी शूट कर दिया ।
हॉल में भगदड़ मच गई ।
विमल दौड़कर वापिस चबूतरे पर चढ गया और निर्विध्न पुजारी वाले कक्ष में दाखिल हो गया ।
“उतर गई आरती ?” - देवाराम ने पूछा ।
“हां !” - वह अपने जूतों और कपड़ों की गठड़ी संभालता हुआ बोला - “चलो ।”
दोनों पुजारी को वहीं बैठा छोड़कर पिछवाड़े के दरवाजे से बाहर भागे ।
ऐन उसी समय भीतर गोलियां चलने की आवाज से आकर्षित होकर शान्तिलाल के बाकी दो बॉडीगार्ड सामने से हॉल में कदम रख रहे थे ।
रिवॉल्वरें उनके हाथ में थी ।
जब तक उन्हें पिछवाड़े के रास्ते का ख्याल आया और वे वहां तक पहुंचे, तब तक विमल और देवाराम पिछबाड़े की चारदीवारी को फांदकर परे सड़क पर खड़ी अपनी कार तक पहुंच चुके थे ।
आनन-फानन वे कार में सवार हुए और फिर कार यह जा वह जा ।
***
शान्तिलाल की मौत की खबर बखिया तक पहुंची ।
अभी वह ईस्टर्न एक्सपोर्ट हाउस पर हुए हमले की चोट को ही सहला रहा था कि वह खबर उस तक पहुंची थी ।
क्रोध और बेबसी क आवेग में वह फिर अपने बाल नोचने लगा ।
पांच मिनट में पौनी बोतल विस्की पी चुकने के बाद कहीं उसके होश ठिकाने आए ।
“इकबालसिंह !” - नशे में थरथराती आवाज में वह बोला - “यह क्या हो रहा है ? कैसे लोग धीरे-धीरे बखिया के जिस्म का एक-एक अंग काटे दे रहे हैं ? ऐसे कैसे बीतेगी ?”
इकबालसिंह खामोश खड़ा रहा । उसके पास बखिया के उस सवाल का जवाब न था ।
“एक बार बखिया की लिटल ब्लैक बुक बखिया के हाथ में आ जाए ।” - बखिया दांत किटकिटाता हुआ बोला - “तो बखिया सोहल को कच्चा चबा जाएगा । वह शान्ताराम के बाकी बचे दो भाइयों की तिक्का बोटी खुद अपने हाथों से अलग करेगा ।”
“बखिया साहब !” - इकबालसिंह झिझकता हुआ बोला - “अगर जान की अमान पाऊं तो कुछ अर्जं करूं ?”
“बोलो !”
“आप डायरी का ख्याल छोड़ क्यों नहीं देते ?”
“क्या !”
“आखिर डायरी के आगे काले पहाड़ की दुनिया खतम तो नहीं । नॉरकाटिक्स की स्मगलिंग हमारा इकलौता धंधा तो नहीं । डायरी हाथ से निकल जाने से यही तो होगा कि सारे एशिया में फैला हमारा नॉरकाटिक्स का धंधा घोटाले में पड़ जाएगा । उससे क्या ?”
“इकबालसिंह !” - बखिया ने बड़े बेसब्रेपन से उसकी बात काटी ।
इकबालसिंह ठिठका । उसने प्रश्नसूचक नेत्रों से बखिया की तरफ देखा ।
“तुम मूर्ख हो ।”
“जी !”
“तुम समझते हो कि बखिया डायरी के लिए सिर्फ इसलिए फिक्रमंद है क्योंकि उसके बिना नॉरकाटिक्स का धंधा नहीं चल सकता ?”
“जी... जी....”
“क्या जी ?”
“जी हां !” - इकबालसिंह बौखलाए स्वर में बोला - “जी हां ।”
“अरे मूर्ख ! लिटल ब्लैक बुक की असली और ज्यादा बड़ी फिक्र बखिया को यह है कि वह हमारे दुश्मनों के हाथ पड़ सकती है और उनके लिए बहुत बड़ी शक्ति साबित हो सकती है । डायरी अगर वाल्ट में जलकर राख हो गई होती तो बखिया इसे अपने और कई नुकसानों की तरह एक नुकसान समझता और किसी तरह उसका गम खा जाता । लेकिन वह डायरी सलामत है और जब तक सलामत है, तब तक वह अंदेशा बखिया को हमेशा बना रहेगा कि वह उसके दुश्मनों के हाथों में पहुंच सकती है । और बम्बई में बखिया के दुश्मनों की क्या कोई कमी है ? उसके तो दोस्त भी उसके दुश्मन हैं, ऐसे दुश्मन जो उसके मुंह पर उसकी दोस्ती का दम भरते हैं और पीठ पीछे बखिया का तख्ता उलटने की तरकीबें सोचते हैं । वे हरामजादे दोस्ती में बखिया के गले भी मिलते हैं तो उसकी पीठ में कोई जगह टटोल रहे होते हैं जहां कि आसानी से छुरा घोंपा जा सके । बखिया के ऐसे किसी ‘दोस्त’ के हाथ में वह डायरी आ गई तो वह फौरन सारी दोस्ती भूल जाएगा और जुगाड़ करने लगेगा बखिया का सिर अपने कदमों मे लुढका देखने का । उस अकेली डायरी के बूते पर एशिया में फैला नॉरकाटिक्स का सारा धंधा हमारे से निकलकर हमारे दुश्मन के हाथों में पहुंच जाएगा । यह इकलौती बात बखिया को इतना कमजोर और दुश्मन को इतना ताकतवर बना देगी कि फिर कोई बखिया को अंडरवर्ल्ड का बादशाह तसलीम नहीं करेगा । आज की तारीख में उस डायरी की असली अहमियत यही है कि पलड़ा उसी का भारी होगा, जिसके पास वह डायरी होगी । समझे ?”
“जी हां ! समझा ।”
“अभी इसे भी गनीमत समझो कि अभी किसी को खबर नहीं है कि लिटल ब्लैक बुक बखिया के हाथों से निकल चुकी है । सोहल ने ऐसा इशारा किया था कि कुछ और लोग उसके पीछे लगे हुए थे । खुदा न करे कि वे लोग डायरी की फिराक में हों । क्योंकि इसका मतलब होगा कि यह बात अब राज नहीं रह गई है कि डायरी बखिया के हाथों से निकल चुकी है ।”
“ओह !”
बखिया खामोश रहा । उसके चेहरे पर चिंता के गहन भाव थे और उसके एक हाथ का घूंसा धीर-धीरे उसके दूसरे हाथ की हथेली पर दस्तक दे रहा था ।
“लेकिन बखिया साहब !” - इकबालसिंह फिर बोला ।
“अभी भी लेकिन ?” - बखिया बोला ।
“आपने मुझे अभयदान दिया है ।”
“बोलो । बोलो । बोलो ।”
“बखिया साहब, आप यहां नहीं थे लेकिन मैं यहां था, जब सुलेमान साहब ने सोहल की छोकरी को काबू में करके सोहल को यहां आने के लिए कहा था । बखिया साहब, मैं जानता हूं कि अपनी छोकरी की दुर्गति के ख्याल से सोहल कैसा तड़पा था ।”
“क्या कहना चाहते हो, इकबालसिंह ?” - बखिया तिक्त स्वर में बोला ।
“मैं यह कहना चाहता हूं कि नीलम की सूरत में हमारे हाथ में लिटल ब्लैक बुक से ज्यादा बड़ा पत्ता है ।”
“तुम चाहते हो कि मौजूदा पेचीदगी से दो-चार होने के लिए बखिया सुलेमान वाला तरीका अपनाए ? वह सोहल की छोकरी पर कहर ढाकर सोहल को डायरी लौटाने के लिए मजबूर करे ?”
“क्या हर्ज है ?”
“हर्ज है ।” - बखिया का घूंसा जोर से उसकी हथेली से टकराया - “यह हर्ज है कि बखिया ने सोहल को जुबान दी है कि अगर वह डायरी लौटा देगा तो उसकी छोकरी का बाल भी बांका नहीं होगा । बखिया अपनी जुबान से नहीं फिरेगा ।”
“और आपको उम्मीद है कि सोहल भी अपनी जुबान से नहीं फिरेगा ?”
“उम्मीद नहीं, गारंटी है । सरदार जुबान देकर फिर जाने वाली किस्म का आदमी नहीं ।”
“बखिया साहब, जुबान तो आपको उसने यह भी दी थी कि भविष्य में शान्ताराम के भाई ‘कम्पनी’ के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएंगे लेकिन वो तो ‘कम्पनी’ पर वार-पर-वार किए जा रहे हैं ।”
बखिया खामोश रहा ।
“और यह कहना अपने-आपको झूठी तसल्ली देना होगा कि आज और कल के ‘कम्पनी’ की खिलाफत के तमाम वाक्यात के पीछे शान्ताराम के भाइयों का हाथ नहीं था ।”
“तुम ठीक कह रहे हो लेकिन किसी और की हरकतों की जिम्मेदारी लेना और खुद अपनी हरकतों की जिम्मेदारी लेना, दो जुदा बातें होती हैं ।”
इकबालसिंह खामोश रहा, लेकिन उसके चेहरे पर आश्वासन के भाव न आए ।
बखिया ने भी वह बात नोट की ।
“कल तक इंतजार करो इकबालसिंह !” - बखिया उसे सांत्वना-सी देता हुआ बोला - “कल अगर डायरी हमारे हाथ आ गई तो नीलम भी वापिस यहां होगी, उसका जोड़ीदार सोहल भी यहां होगा और यहां होंगे उसके दोनों हिमायती तुकाराम और देवाराम ।”
“और अगर डायरी हाथ न आई तो ?” - इकबालसिंह बोला ।
“कल तल इंतजार करो । अपने इस सवाल के जवाब के लिए भी कल तक इंतजार करो ।”
“बेहतर ।” - इकबालसिंह बोला । उसकी सूरत बता रही थी कि उसे बखिया के ख्यालात से इत्तफाक नहीं था ।
“एक बात और ।”
“फरमाइए !”
“जोजो से कह दो कि वह एकदम चौकन्ना रहे और आने वाले एक दो दिनों में किसी भी सूरत में अकेला कहीं न जाए । बॉडीगार्ड के साथ भी सिर्फ वहां जाए, जहां जाना इंतहाई जरूरी हो ।”
“मैं अभी कह देता हूं ।”
“आखिर सोहल ने शान्तिलाल के साथ-साथ उसे भी मौत की धमकी दी थी ।”
“जोजो खुद समझदार है, लेकिन फिर भी मैं उसे समझा दूंगा ।”
“बढिया ।”
***
जोगेश्वरी में कई एकड़ जमीन के विस्तार में बनी वह एक राजमहलों जैसी इमारत थी जिस पर उस वक्त देवाराम की निगाह थी । उस इमारत का परकोटा एक किले की दीवार जैसा ही मजबूत और ऊंचा था । उसके एक पहलू में एक विशाल स्विमिंग पूल था जिसके इर्द-गिर्द बेशुमार लोग मौजूद थे । इमारत और पूल दोनों बड़ी खूबसूरत रोशनियों की जगमग-जगमग से सुशोभित थे । पूल के गिर्द पार्टी का सा माहौल मालूम होता था । कुछ लोग उसके इर्द-गिर्द बैठे या खड़े थे तो कुछ स्विमिंग का आनंद ले रहे थे । कई वर्दीधारी वेटर ट्रेज पर और ट्रालियों पर ड्रिंक्स सर्व करते मेहमानों में घूम रहे थे ।
वह इमारत सोहराबजी नाम के एक बहुत बड़े स्मगलर की मिल्कियत थी और ऐसी पार्टियां वहां की राजमर्रा की घटना थी । शराब और शबाब का रसिया राजबहादुर बखिया भी जब बम्बई में होता था तो उन पार्टियों में जरूर शामिल होता था ! आखिर वह बम्बई का बादशाह था, उसके हमपेशा लोगों की ऐसी कोई पार्टी उसकी हाजिरी के बिना भला कैसे चल सकती थी ?
बखिया उस रोज भी वहां मौजूद था । अपने बॉडीगार्डों के भारी लाव-लश्कर की सुरक्षा में वह वहां पहुंचा था, लेकिन पूल पर वह मुश्किल से पांच मिनट अपने परिचितों से हाथ मिलाने के लिए रुका था । सोहराबजी उसके उस दौर के मूड को पहचानता था, इसलिये वह उसे इमारत के भीतर क बैडरूम में ले गया था, जहां पार्टी से अलग होकर वे दोनों यार जाम से जाम टकराने लगे थे ।
देवाराम उस वक्त जोगेश्वरी के उस सारे इलाके में फैले पेड़ों में से एक ऊंचे पेड़ पर चढा बैठा था । उसने कंधे पर एक झोला लटकाया हुआ था और हाथ में वह शक्तिशाली टेलीस्कोपिक साइट वाली एक रायफल थामे था ।
तुकाराम नीचे पेड़ों के झुरमुट में छुपी एक कार में बैठा था ।
उन्हें मालूम था बखिया सारी-सारी रात चलने वाली सोहराबजी की पार्टियों में अक्सर आता था । उस रोज भी उसके आगमन की उन्हें पूरी उम्मीद थी ।
उन्हें निराश नहीं होना पड़ा था ।
बखिया वहां पहुंचा था ।
लेकिन देवाराम के रायफल ठीक से सीधी भी कर पाने से पहले वह इमारत के भीतर चला गया था ।
अब देवाराम उसके दोबारा स्विमिंग पूल पर पहुंचने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
उस वक्त रात के ग्यारह बजने को थे ।
स्विमिंग पूल पर चल रही पार्टी तो जैसे अभी शुरु हुई थी । लोग धीरे-धीरे नशे की अपनी चरम सीमा की तरफ कदम रख रहे थे । लेकिन अभी तक वहां वह माहौल नहीं बना था जिसमें नशे में धुत्त हो चुके लोग वहां सोहराबजी के सौजन्य से उपलब्ध होस्टेसों को वहशियों की तरह नोचने-खसोटने लगते थे । ऐसा वे यह जानते हुए करते थे कि उन लड़कियों का इंतजाम सोहराबजी की उन पार्टियों में शराब और शबाब की खुली दावत की गारंटी होती थी ।
रायफल की टेलीस्कोपिक साइट में से देवाराम पार्टी का नजारा कर रहा था । टेलीस्कोप की वजह से इतने फासले से भी वे लोग उसे इतने करीब लग रहे थे, जैसे वह भी पार्टी में शामिल हो, जैसे हाथ बढ़ाकर वह किसी को भी छू सकता हो ।
वहां मौजूद एक युवती खास तौर से हर किसी की निगाहों का केंद्र बनी मालूम होती थी । युवती इंतहाई खूबसूरत थी । उसका गोरा जिस्म सांचे में ढला मालूम होता था जिस पर कि वह एक हद से ज्यादा संक्षिप्त बिकीनी स्विम सूट पहने थे । पूल के किनारे-किनारे लोगों के बीच में वह जैसे कूल्हे झुला-झुलाकर चल रही थी, उससे लगता था कि वह इस बात से पूरी तरह से वाकिफ थी कि उस वक्त हर मर्द की तरीफी और हर औरत की ईर्ष्याभरी निगाहें उसी पर पड़ रही थीं और वह उस स्थिति से पूरी तरह से आनंदित हो रही थी ।
उसने एक वेटर की ट्रे में से एक ड्रिंक उठाई और उसे गटागट पी गई ।
फिर पहले से ज्यादा मदमाती चाल चलती हुई वह डाइविंग बोर्ड पर चढ गई ।
सबकी निगाहें उसकी तरफ उठीं ।
युवती एक बैलेट डांसर की तरह अपने पंजों पर उचकी और फिर उसने पानी में छलांग लगा दी ।
कुछ क्षण बाद एक जलपरी की तरह उसने पानी से बाहर अपना सिर निकाला तो पूल के इर्द-गिर्द पानी में टांगें लटकाए बैठे कई मर्दों के मुंह से सिसकारी निकल गई ।
युवती के बिकीनी स्विम सूट का उपरला भाग गायब था । उसके उन्नत उरोज उस वक्त एकदम नग्र थे ।
पता नहीं वह हरकत उसने जान-बूझकर की थी या पानी में छलांग लगाने पर किसी प्रकार खुद-ब-खुद ही उसकी अंगिया खुलकर उसके वक्ष से अलग हो गई थी ।
कई लोगों ने सीटियां बजाई ।
कई लोगों ने बकायादा तालियां बजाई ।
युवती बहुत खुश हुई ।
“शाबाश !”
“गुड गर्ल !”
“ब्रेवो !”
“अब बिकीनी की बिल्कुल ही छुट्टी कर दो !”
“इतना शानदार जिस्म कपड़ों की गिरफ्त में नहीं होना चाहिए !”
“कम ऑन बेबी ! बी ए स्पोर्ट ! रिमूव दि अंडीज !”
युवती ने पहले जोर से अपने वक्ष को एक झटका दिया और फिर आवाजें कसते लोगों को मुंह चिढाया ।
“ये अंगूर खट्टे हैं ।” - वह बोली ।
“अगर ये अंगूर हैं ।” - कोई बोला - “तो मैं मलिका विक्टोरिया हूं ।”
“मैंने तो मुहावरा इस्तेमाल किया था ।” - युवती इठलाकर बोली ।
“वाह ! कुर्बान ! तेरे मुहावरे पर कुर्बान !”
तभी सोहराबजी ने इमारत से बाहर कदम रखा ।
देवाराम को यह देखकर बड़ी मायूसी हुई कि बखिया उसके साथ इमारत से बाहर नहीं निकला था ।
मेजबान का उसे भीतर छोड़कर अकेले बाहर निकलना देवाराम को इस बात की तरफ इशारा लगा कि बखिया का स्विमिंग पूल पर आकर पार्टी में शामिल होने का कोई इरादा नहीं था ।
उसे बड़ी निराशा हुई ।
लेकिन वहां से खाली हाथ लौटने के लिए तो वह भी नहीं आया था ।
एकाएक उसके होंठ भिंच गए और रायफल पर उसकी पकड़ मजबूत हो गई ।
सोहराबाजी ने दूर से ही पूल में मौजूद अर्धनग्र युवती को देख लिया ।
वह जमीन को रौंदता हुआ आगे बढ़ा ।
“अंजली !” - वह रास्ते में ही कलपने लगा ।
अर्धनग्न युवती ने हड़बड़ाकर उसकी तरफ देखा ।
“हां ।” - उसके मुंह से निकला ।
“छाती ढंक अपनी, हरामजादी !” - करीब आकर वह दांत पीसता हुआ बोला ।
युवती ने घबराकर अपने हाथों से अपनी छातियां ढंक लीं ।
“सब लोग” - सोहराबजी युवती को एकटक देखते लोगों से बड़े कठोर, कर्कश स्वर में संबोधित हुआ - “मेरी तरफ देखो ! खबरदार जो किसी ने इस पर निगाह रखी । यह प्राइवेट प्रॉपर्टी है ।”
“किसकी प्राइवेट प्रॉपर्टी है यह ?” - कोई व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “क्या तुम्हरी सोहराबजी ?”
“काले पहाड़ की । यह लड़की बखिया साहब के लिए रिजर्व है ।”
लोगों को सांप सूंघ गया ।
“लड़की न हुई” - कोई हिम्मत करके बोला - “बियर की बोतल हो गई जिसे सोहराबजी बखिया को सर्व करने के लिए पूल में ठंडी कर रहा है ।”
सोहराबजी ने भीड़ की तरफ आंखें तरेरीं लेकिन वह अंदाजा न लगा सका कि कौन बोला था ।
तब तक अंजलि नामक वह युवती अपनी अंगिया तलाश करके पहन चुकी थी ।
वह पूल से बाहर निकली ।
सोहराबजी ने उसे साथ आने का इशारा किया और वापिस घूमा ।
तभी एकाएक उसके पांव फर्श पर से उखड़े और वह यूं पूल में जाकर गिरा जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो ।
फिर उसके इर्द-गिर्द पूल का पानी लाल होने लगा ।
देवाराम के चेहरे पर बड़े संतुष्टिपूर्ण भाव उभरे ।
पहली गोली ऐन निशाने पर लगी थी ।
आनन-फानन कई गोलियां चलीं ।
कई लोग उन गोलियों के शिकार हुए ।
एकाएक वहां भगदड़ मच गई ।
हर कोई, कहीं न कहीं ओट लेने के लिए लपकने लगा ।
पलक झपकते स्विमिंग पूल उजाड़ हो गया ।
पीछे वही लोग पड़े रह गए जो शक्तिशाली रायफल की गोलियों का शिकार होकर दम तोड़ रहे थे ।
देवाराम ने अपने कंधे से लटके झोले में से एक अनोखी चीज निकाली ।
वह एक कबूतर था जिसके इर्द-गिर्द रबर बैंड से कोई कागज बंधे हुए थे ।
उसने कबूतर को इमारत की दिशा में उड़ा दिया ।
जब कबूतर इमारत के परकोटे के बीच में पहुंच गया तो देवाराम ने ताककर रायफल में से एक आखिरी गोली चलाई ।
गोली कबूतर को लगी । वह नीचे को गिरने लगा तो उसके इर्द-गिर्द बंधे कागज भी नीचे झड़ने लगे ।
देवाराम फुर्ती से नीचे उतरा ।
अगले ही क्षण वह कार में अपने भाई की बगल में बैठा हुआ था और कार वहां से उड़ी जा रही थी ।
गोलियों की और चीख-पुकार की आवाज सुनकर बखिया बेडरूम से बाहर निकला ।
बेडरूम के दरवाजे पर उसके अपने दो बॉडीगार्ड तैनात थे ।
“क्या हुआ ?” - वह नशे में थरथराती हुई आवाज में बोला ।
“पता नहीं, साहब ।” - एक बॉडीगार्ड बोला - “एकाएक गोलियां बरसने लगीं थीं ।”
“यहां ?”
“जी हां ।”
“किधर से ? कैसे ?”
“यह भी पता नहीं ।”
“क्या इमारत के भीतर से ?”
“जी नहीं । गोलियों की बाढ आई तो बाहर से ही थी ।”
“ये हवा में कागज से कैसे उड़ रहे है ?”
“पता नहीं । गोलियों के बाद ही ये कागज जैसे आसमान से बरसने लगे थे ।”
गोलियां चलनी बंद हो गई पाकर तब तक लोग ओट से बाहर निकलने लगे थे । हवा में उड़ते कागजों से आकर्षित होकर कुछ ने उन्हें थामा ।
वह एक पैम्फलेट था । सब पर एक ही जैसी इबारत छपी हुई थी ।
हाथ में थमे पैम्फलेट से फिर उठाकर सब अपलक बखिया की दिशा में देख रहे थे ।
तभी एक प्यादा दौड़ा-दौड़ा बखिया के करीब पहुंचा । उसके हाथ में भी एक पैम्फलेट था जो उसने बखिया को थमा दिया ।
लिखा था :
बखिया प्लेग है ।
उससे बचकर रहो ।
उसकी दोस्ती से बचकर रहो ।
बखिया के यहां मरे पड़े दोस्तों से सबक लो ।
आने वाले दिनों में बखिया की दोस्ती का दम मरने वाले हर शख्स का यही हाल होने वाला है ।
बखिया एक ढहता हुआ पहाड़ है ।
डूबते के साथ मत डूबो ।
उससे बचो । प्लेग से बचो ।
दांत किटकिटाते हुए बखिया ने पैम्फलेट की धज्जियां उड़ा दी ।
उसने सिर उठाकर सामने खड़े अपने हमपेशा यार दोस्तों को देखा ।
सब यूं हड़बड़ाकर पीछे हटे जैसे बखिया वाकई प्लेग हो और वे प्लेग के शिकार हो सकते हों ।
“हां, हां !” - एकाएक वह विक्षिप्तों की तरह चिल्लाया - “बखिया प्लेग है । प्लेग है बखिया । उससे बचकर रहो, हरामजादो ! हरामजादो, बचकर रहो उससे । लेकिन बचकर भी कहां जाओगे ? सोहल से बचने के लिए जहां भी जाओगे, वहां बखिया होगा । बखिया से बचने की कोशिश में तुमने से एक भी नहीं बचेगा । कसम है बखिया को उसके पुरखों के खून की, एक भी नहीं बचेगा ।”
सब सहमकर पीछे हट गए ।
बखिया ने जोर से उन लोगों की तरफ थूका ।
उसके बाद एक क्षण के लिए भी वह वहां न टिका ।
अंगारों पर लोटता हुआ अपने लाव-लश्कर के साथ वह वहां से कूच कर गया ।
***
तुकाराम और देवाराम के जोगेश्वरी वाले कारनामों की कथा विमल ने मंत्रमुग्ध होकर सुनी ।
“हैरानी है ।” - वह बोला ।
“किस बात की ?” - देवाराम बोला - “कि हम बखिया पर एक और वार करने में कामयाब हुए ?”
“नहीं । इस बात की कि बखिया के खिलाफ ऐसा रौद्र रूप तुमने तब अख्तियार नहीं किया जबकि उसने शान्ताराम और उसके कुनबे का कत्ल करवाया था ।”
“तब हम डरे हुए थे । तब हम एक पिटे हुए जानवर की तरह दुम दबाकर बैठ गए थे ।”
“दरअसल” - तुकाराम बोला - “हमारे में जो तब्दीली आई है, वह बाले और जीवा से भी नहीं आई । हर आदमी के मन में कायरता का एक चोर बैठा हुआ होता है जो उसे उसके अंजाम से डराता है । कल बखिया के तहखाने में जब हमने मौत को साक्षात अपने सामने खड़ा देखा तो वह चोर हमारे मन से निकल गया । अब हमें अपने अंजाम का डर नहीं सताता । जब अपना सिर काटकर पहले ही अपनी हथेली पर रख लिया हो तो अब हमारा और कौन-सा अंजाम डराएगा हमें ?”
“हमारी मौत तो” - देवाराम बोला - “बखिया के तहखाने में कल ही हो गई थी । मरे हुए आदमी को मारने की धमकी नहीं चलती ।”
“यानी कि बखिया को चोट पहुंचाने का मौजूदा प्रोग्राम अभी और चलेगा ?” - विमल बोला ।
“हमारी आखिरी सांस तक चलेगा ।” - तुकाराम बोला ।
“यह प्रोग्राम” - देवाराम बोला - “अब तभी खत्म होगा जब हम नहीं रहेंगे या बखिया नहीं रहेगा ।”
“आमीन !” - विमल बोला ।
***
अगले रोज निर्धारित समय से काफी पहले विमल फिर आगरा रोड के निर्धारित स्थान पर मौजूद था ।
अपनी कार उसने पूल से परे पहले वाले स्थान पर ही झाड़ियों के पीछे छुपाकर खड़ी कर दी थी ।
वहां तक वह अपने पिछले रोज वाले मेकअप में ही पहुंचा था लेकिन अब उसने वह मेकअप उतार दिया था ।
सड़क दूर-दूर तक खाली थी और आसपास भी कोई छुपा हुआ नहीं था ।
पिछले रोज नीलम के साथ किसी के वहां न पहुंच पाने की जो वजह बखिया ने उसे बताई थी प्रत्यक्षतः उसमें कोई नुक्स नहीं था लेकिन फिर भी न जाने क्यों उसकी पूरी तरह से तसल्ली नहीं हो रही थी और किसी अनहोनी की आशंका उसे बार-बार आंदोलित कर रही थी ।
क्या आज उसके साथ धोखा हो सकता था ?
क्या बखिया अपनी जुबान से फिर सकता था ?
क्या नीलम को उसके हवाले किए बिना उससे डायरी छीनने की कोशिश की जा सकती थी ?
ऐसे कितने ही सवालों से आंदोलित विमल कार से बाहर निकला ।
उसने कार का बोनट उठाया ।
भीतर जहां बैटरी फिक्स थी, वहां से उसने बैटरी को खोल दिया ।
उसने असली डायरी बैटरी के स्थान पर रखी और बैटरी को वापिस उसके ऊपर रख दिया ।
डायरी पूरी तरह से बैटरी के नीचे छुप गई थी ।
उसने बैटरी को फिर पूर्ववत् फिक्स कर दिया और बोनट गिरा दिया ।
नकली डायरी उसकी पतलून की पिछली जेब में थी ।
नीलम को बदले में बखिया को नकली डायरी पहुंचाने का उसका कोई इरादा नहीं था लेकिन उसे लग रहा था कि असली डायरी सौंपने से पहले माहौल का जायजा ले लेने लग में कोई हर्ज नहीं था ।
मुलाकात का वक्त करीब पहुंचा तो वह कार छोड़कर आगे बढ़ा ।
उस वक्त ठंडी तेज हवा चल रही थी ।
वह पूल के पास उसी खाई में उकड़ूं होकर बैठ गया जिसमें वह कल भी बैठा था ।
ऐन वक्त पर उसे बम्बई की दिशा से एक वाहन उधर आता दिखाई दिया ।
वाहन समीप आया तो उसने देखा, वह एक एम्बेसेडर कार थी ।
वह संभलकर बैठ गया ।
कार और समीप आई तो कार की अगली सीट पर दो आदमी बैठे दिखाई दिए ।
जरूर नीलम पिछली सीट पर थी और उन दोनों की ओट में आ जाने की वजह से ही शायद उसे दूर से दिखाई नहीं दे रही थी ।
कार पूल के करीब पहुंची ।
तब उसे साफ दिखाई दिया कि पिछली सीट खाली थी ।
दाता !
क्या मजरा था ?
क्या बखिया का उसे धोखा देने का इरादा बन गया था ?
या शायद वह कार बखिया की थी ही नहीं ? शायद ऐन समय पर इत्तफाक से वहां कोई और कार पहुंच गई थी ?
एम्बेसेडर पुल के समीप आकर रुकी ।
तब उसे अगली सीट पर बैठे दोनों व्यक्तियों की सूरतें दिखाई दीं ।
नहीं । कार तो बखिया की ही थी ।
एकाएक उसका दिल जोर-जोर से उसकी पसलियों के साथ टकराने लगा ।
कार का ड्राइवर उसके लिए सर्वदा अपरिचित था लेकिन उसकी बगल में खुद मैक्सवेल परेरा बैठा हुआ था ।
उन दो जनों के अलावा उसे कार में सवारी न दिखाई दी ।
उनके पीछे दूर-दूर तक सड़क खाली दिखाई दे रही थी ।
नीलम कहां थी ?
ड्राइवर कार से बाहर निकला । उसने कार के सामने आकर बोनट उठाया और भीतर झांकने लगा ।
परेरा कार में ही बैठा रहा
विमल खाई से बाहर निकला ।
थोड़ा आगे जाकर वह सड़क पर चढा और फिर कार की तरफ बढा ।
परेरा की उस पर निगाह पड़ी तो वह भी कार से बाहर निकल आया ।
ड्राइवर ने बोनट उठा रहने दिया लेकिन उसकी तरफ पीठ फेर ली । वह अपलक करीब आते विमल को देखने लगा ।
तेज हवा में विमल का कोट बुरी तरह फड़फड़ा रहा था और अजीब-सी आवाज पैदा कर रहा था ।
वह कार के करीब पहुंचकर ठिठका ।
“डायरी कहां है ?” ­ परेरा बोला ।
“पहले यह बताओ” ­ विमल सख्ती से बोला ­ “लड़की कहां है ?”
“लड़की है ।”
“डायरी भी है ।”
“दिखाओ ।”
“पहले लड़की दिखाओ ।” 
“लड़की कार में है ।”
“मुझे तो कार में कोई नहीं दिखाई दे रहा ।”
“भोले बादशाह, जिस वजह से हम कल यहां नहीं पहुंच सके थे, वह वजह आज भी बरकरार है । आज भी लड़की की वजह से नाके पर कल जितनी ही निगरानी हो रही थी । इसलिए ऐसा इंतजाम जरूरी था कि कार में लड़की दिखाई न दे ।”
“मतलब ?”
“आओ समझाऊं ।”
परेरा ने कार का पिछला दरवाजा खोला ।
पीछे, पिछली और अगली सीट के बीच की जगह में नीचे कुछ कंबल पड़े थे और सीट पर कंबलों के ऊपर तक चढे हुए दो बड़े-बड़े सूटकेस रखे हुए थे ।
परेरा ने पहले सूटकेस और फिर कंबल हटाए ।
नीचे से नीलम प्रकट हुई ।
उसके हाथ-पांव बंधे हुए थे और मुंह पर टेप चढा हुआ था ।
उसकी आंखें बड़े व्याकुल भाव से तेजी से अपनी कटोरियों में फिरीं ।
विमल की जान में जान आई ।
“नाका तुमने ऐसे ही पार किया था ?” ­ विमल के मुंह से निकला ।
“पागल हुए हो ।” ­ परेरा बोला ।
“तो ?”
“नाका पार करते समय यह ताजे जिबह किए गए बकरों से भरे एक ट्रक में थी और बकरों की तरह ही इसी हालत में उनके बीच एक हुक पर टंगी हुई थी ।”
“तौबा !”
“कार में तो उसे नाका पार करने के बाद लादा गया था । इतने इंतजाम के बावजूद हमें डर था कि लड़की कहीं हाथ से निकल न जाए । पुलिस साली...”
“इसे खोलो ।”
“पहले डायरी निकालो ।”
“डायरी मेरी कार में है । लाता हूं ।”
“ठीक है । लेकर आओ ।”
विमल घूमकर चल दिया ।
“ठहरो !” ­ एकाएक परेरा कर्कश स्वर में बोला ।
विमल ठिठका ! तब तक वह सड़क पार कर चुका था । उसने घूमकर परेरा की तरफ देखा ।
“डायरी” ­ परेरा बोला ­ “तुम्हारी पतलून की पिछली जेब में है ।”
तेज हवा के कारण उसके कोट का निचला भाग उड़-उड़ जा रहा था इसलिए रह-रहकर पतलून की पिछली जेब नुमायां हो जाती थी ।
“यह डायरी...” ­ विमल ने कहना चाहा ।
“निकालो ।” - परेरा डपटकर बोला ।
“मैं कह हूं, यह डायरी...”
“निकालो ।” - परेरा के हाथ में एकाएक एक रिवॉल्वर प्रकट हुई ।
“तुम रिवॉल्वर दिखाकर डायरी मुझसे छीनना चाहते हो ?”
“सुना नहीं !”
“अच्छा ! यह लो !”
विमल ने अपनी जेब से डायरी निकाली और उसे फेंककर मारा ।
परेरा ने रास्ते में ही डायरी लपकने की कोशिश की लेकिन डायरी उसके हाथ से टकराकर नीचे सड़क पर जा गिरी ।
उसने रिवॉल्वर वापिस जेब में रख ली और डायरी उठाने के लिए नीचे झुका ।
तभी विमल के कानों में एक शक्तिशाली कार की आवाज पड़ी ।
उसने घूमकर बम्बई की दिशा में सड़क पर देखा ।
एक मर्सिडीज कार बड़ी तेज रफ्तार से उधर बढी चली जा रही थी ।
किसी अज्ञात भावना से प्रेरित होकर विमल ने खड्ड में छलांग लगा दी ।
वह सिर निकालकर सड़क पर झांकने लगा और कार के वहां से गुजर जाने की प्रतीक्षा करने लगा ।
परेरा और उसके साथी का ध्यान भी मर्सिडीज की तरफ आकर्षित हो गया था ।
वे भी उसके गुजर जाने की प्रतीक्षा करने लगे ।
समीप आने पर कार की रफ्तार घट गई ।
फिर एकाएक उसमें से गोलियों चलने लगी ।
विमल ने परेरा के ड्राइवर का सिर तरबूज की तरफ फटते देखा ।
एम्बेसेडर का पिछला दरवाजा उस वक्त भी खुला था । परेरा ने उसके भीतर डुबकी-सी लगा दी । फिर वह पिछली सीट से अगली सीट पर पहुंचने की कोशिश करने लगा ।
उसका साथी सड़क पर पड़ी डायरी के पास औधें मुंह गिरा ।
मर्सिडीज ने बाएं मोड़ काटा ।
एकाएक एक गगनभेदी धमाके के साथ उसकी भरपूर टक्कर एम्बेसेडर के पिछले भाग में पड़ी ।
एम्बेसेडर आगे को लुढक पड़ी ।
अगली सीट पर लगभग पहुंच चुका परेरा पहले पीछे को उछला और फिर उसका सिर गेंद की तरह सामने को उछलकर कार की विंडस्क्रीन से टकराया । एक चटाक की आवाज से विंडस्क्रीन टूटी और परेरा का शरीर कंधों तक विंडस्क्रीन से बाहर निकल गया । आगे कार का बोनट अभी भी खुला हुआ था इसलिए उसकी खोपड़ी सीधी उससे जाकर टकराई ।
कार अभी भी आगे को लुढकी जा रही थी ।
मर्सिडीज सड़क पर पड़ी लाश के करीब गतिशून्य हुई । उसमें से एक आदमी बाहर निकला । उसने झुककर लाश के पास पड़ी डायरी उठा ली ।
विमल ने उस शख्स को साफ पहचाना ।
वह मारियो था ।
आंधी-तूफान की रफ्तार के साथ मर्सिडीज बैक होकर उलटी घूमी और जिधर से आई थी, उधर वापिस दौड़ चली ।
अगले ही क्षण दूर सड़क पर धूल का गुब्बार दिखाई दे रहा था जो कुछ क्षण पहले मर्सिडीज की वहां मौजूदगी की चुगली कर रहा था ।
विमल नीलम की फिक्र से हलकान हुआ जा रहा था ।
मर्सिडीज की एम्बेसडर को लगी ठोकर से उसकी भी कोई हड्डी-पसली टूट गई होना कोई बड़ी बात नहीं थी ।
एम्बेसेडर कोई पचास फुट परे जाकर रुकी थी ।
विमल खड्ड से निकला और एम्बेसेडर की तरफ लपका ।
तभी एम्बेसेडर का इंजन गर्जा ।
उसने सड़क पर यू टर्न लिया और तोप से छूटे गोले की तरह बम्बई की तरफ भागी ।
विमल उसकी चपेट में आने से बाल-बाल बचा ।
ड्राइविंग सीट पर बैठे मैक्सवैल परेरा की उसे केवल एक झलक मिली ।
परेरा का चेहरा इस कदर लहूलुहान था कि खून के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था ।
विमल बगोले की तरह अपनी कार की तरफ लपका ।
लेकिन जब तक वह उसे झाड़ियों के पीछे से निकालकर सड़क पर ला पाया तब तक सड़क पर एम्बेसडर की धूल भी बाकी नहीं थी ।
नीलम उसे मिलकर भी नहीं मिली थी ।
एक छलावे की तरह वह उसकी आंखों के आगे से गायब हो गई थी ।
“दाता !” - वह असहाय भाव से गरदन हिलाता हुआ बोला - “तेरे रंग न्यारे ।”
***
भिंडी बाजार में अकरम की खोली में उसे वागले अकेला बैठा मिला ।
विमल की सूरत पर एक निगाह डालते ही वागले समझ गया कि कोई गड़बड़ हो गई थी ।
“नीलम नहीं मिली ?” - वागले के मुंह से निकला ।
विमल ने बड़े असहाय भाव से इन्कार में गरदन हिलाई ।
“नहीं मिली ।” - वह टूटे स्वर में बोला - “मिलकर भी नहीं मिली ।”
“क्या हुआ ?”
विमल ने बताया ।
“डायरी ?” - वागले के मुंह से निकला ।
“बच गई ।” - विमल बोला ।
“फिर क्या मुश्किल है ? फिर तो हम यथापूर्व स्थिति में हैं । नीलम अब भी बाखिया के पास है, डायरी अब भी हमारे पास है । जो अदला-बदली इस बार नहीं हो सकी, वह फिर हो जाएगी ।”
“बशर्ते कि मर्सिडीज की एम्बेसेडर को लगी ठोकर में वह जिंदा बची हो । वैसे परेरा का जिस्म विंडस्क्रीन को तोड़ता हुआ बाहर जाकर गिरा था, वैसे ही...”
विमल ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया । उसके शरीर ने जोर की झुरझुरी ली ।
“उसे कुछ नहीं हुआ होगा ।” - वागले एक क्षण ठिठका और फिर बोला - “तुमने बखिया को फोन किया होता । खुद ही मालूम हो जाता कि नीलम किस हालत में है ।”
“मैं कई बार फोन करने के बाद यहां आया हूं ।”
“क्या बात है, बात नहीं हुई बखिया से ?”
“बखिया से तो हर बार बात हुई लेकिन परेरा अभी वापिस नहीं पहुंचा ।”
“अच्छा !”
“वह बुरी तरह से लहुलुहान था और उसकी कार की विंडस्क्रीन भी टूटी हुई थी । मुझे डर है, वह नाके पर पुलिस द्वारा गिरफ्तार न कर लिया गया हो । उस सूरत में तो नीलम भी वापिस पुलिस के पास पहुंच चुकी होगी ।”
“बखिया के पुलिस में बहुत भेदिये है । वह चुटकियों में मालूम कर सकता है कि परेरा गिरफ्तार हुआ या नहीं ।”
“आखिरी फोन कॉल के वक्त मैंने यह बात बखिया को कही थी । उसने फोन करने को कहा था । थोड़ी देर में मैं फिर फोन करूंगा उसे ।”
“ओह !”
“तुकाराम कहां है ?”
“बाले और जीवा की लाश क्लेम करने पुलिस के पास गया है । “
“अकेला ?”
“नहीं । अकरम और उसके दस आदमियों के साथ । और पुलिस की प्रोटेक्शन के साथ । वह क्या जानता नहीं कि वहां उसका आगमन कभी-न-कभी होना ही है, यह बात बखिया भी समझता होगा । वह इस बात से पूरी तरह से खबरदार है कि उसे वहां से अगवा करने की भी कोशिश की जा सकती है और जान से मार डालने की भी कोशिश की जा सकती है ।”
“हूं ।” - विमल कुछ क्षण खामोश रहा फीर एकाएक उठता हुआ बोला” - “मैं बखिया को फोन करके आता हूं ।”
वागले ने सहमति में सिर हिलाया ।
विमल ने खोली के बंद दरवाजे की तरफ अभी एक ही कदम बढाया था कि एकाएक भड़ाक से खोली का दरवाजा खुला और देवाराम ने भीतर कदम रखा ।
“सरदार !” - हांफता हुआ बोला - “देख, कौन आया है !”
“कौन आया है ?” - विमल हड़बड़ाया ।
देवाराम तनिक दरवाजे से परे हटा । उसने बांह पकड़कर किसी को विमल के सामने कर दिया ।
जो आया था, उसे देखकर विमल भौचक्का रह गया । अविश्वास और आश्चर्य से उसकी आंखें फट पड़ी ।
उसने सामने नीलम खड़ी थी ।
साक्षात !
सही-सलामत !
***
इकबालसिंह ने बखिया के कमरे में कदम रखा ।
“मैंने पुलिस से मालूम किया है ।” - वह बोला - “नाके पर कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है ।”
“तो फिर कहां गायब हो गया मैक्सवैल परेरा ?” - बखिया चिंतित स्वर में बोला - “सोहल कहता है, वह उससे पहले वापिस लौट पड़ा था लेकिन सोहल तो कब का शहर में लौट चुका है ।”
“माजरा क्या है ?”
“सोहल कहता है कि ऐन अदला-बदली के वक्त किसी तीसरी पार्टी ने उन लोगों पर हमला कर दिया था । उस हमले में परेरा घायल हो गया था ।”
“और सोहल ?”
“उसे कुछ नहीं हुआ । कुछ नहीं हुआ उस हरामजादे को ।”
“ओह !”
“वह कहता है, लड़की अभी भी परेरा के कब्जे में है ।”
“और डायरी ?”
“सोहल के ही पास है । जो डायरी तीसरी पार्टी ले गई है, सोहल कहता है कि वह नकली है । यह नकली डायरी” - बखिया ने अपने एक हाथ का घूंसा दूसरे की हथेली पर जमाया - “साली कहां से टपकी ? नकली डायरी का तो बजूद ही शक में डाल रहा है । कहीं यह सरदार का बच्चा बखिया का धोखा देने की फिराक में तो नहीं था ?”
“जरूर यही बात होगी । वर्ना और क्यों वह अपने साथ नकली डायरी लेकर आया होता ?”
“यानी कि बखिया ने सरदार को, उसके जमीर को, गलत पहचाना ?”
“ऐसा ही मालूम होता है ।”
“ठीक है । उसने वादाखिलाफी करके बखिया को भी वादा निभाने की जिम्मेदारी से बरी कर दिया है । अच्छा है उसने बखिया को खुद यह खुशगवार खबर दी कि नीलम अभी तो परेरा के ही कब्जे में है । नीलम को मोहरा बनाकर अब बखिया सोहल के साथ उस तरीके से पेश आएगा जिससे कि तुम चाहते हो कि वह पेश आए ।”
“लेकिन परेरा है कहां ?”
“मालूम करो । खुद मालूम करो । उस सारे रूट पर उसे तलाश करो जहां से कि उसने गुजरना था । वह घायल था । हो सकता है, वह अपनी कार में कहीं बेहोश पड़ा हो या उसने और एक्सीडेंट कर दिया हो ।”
“बेहतर ।”
***
नीलम दौड़कर विमल की बांहों में आ गई ।
विमल ने देखा, उसका माथा एक स्थान से फट गया था और उसके शरीर पर कुछ जगह खरोंचें दिखाई दे रही थीं । उसके अलावा वह सही-सलामत थी । जरूर कार में उस पर पड़े कई कंबलों ने उसे गंभीर रूप से घायल होने से बचा लिया था ।
देवाराम ने दरवाजा बंद कर दिया था और उसके साथ पीठ सटा ली थी ।
“सरदार !” - वह हांफता हुआ बोला - “मैंने कहा था न, मैं तुझे नीलम से मिलवाऊंगा ? देख ले, मैंने अपना वादा पूरा किया है ।”
“कैसे ?” - विमल रोती-सुबकती नीलम को अपने से अलग करता हुआ बोला - “कैसे ?”
“आगरा रोड पर तेरा अकेला जाना मुझे पसंद नहीं था । मुझे लगता था कि तेरे साथ धोखा हो सकता था, इसलिए मैं कल भी तेरे पीछे था और आज भी । नीलम को छुड़ाने का कल मेरा दांव नहीं लग सका था क्योंकि कल परेरा ने आगरा रोड पर कदम रखा ही नहीं था । वह भीड़-भरे इलाके से ही लौट आया था और कल वह अकेला भी नहीं था ।”
“कल इसीलिए तुम मुझे रास्ते में मिले थे ?” - विमल के मुंह से निकला - “तुम अपने किसी काम नहीं गए थे, बल्कि परेरा के पीछे लगे हुए थे ?”
“हां ।”
“फिर ?”
“आज भी मैं परेरा के पीछे लगा हुआ था । दूरबीन की सहायता से बहुत फासले से मैंने पुल पर हुआ सारा नाटक भी देखा था । मैंने डायरी लेकर मर्सिडीज वालों को वहां से भागते भी देखा था ।”
“जो डायरी वो ले गए थे वो नकली थी ।”
“असली अभी भी तुम्हारे पास है ?”
“हां ।”
“फिर तो शुक्र है खुदा का । फिर तो अच्छा हुआ कि डायरी के चक्कर में मैं उन लोगों के पीछे नहीं पड़ा ।”
“तुमने क्या किया ?”
“परेरा के वहां से भागते ही मैं उसके पीछे लग गया था । नीलम मुझे दिखाई नहीं दे रही थी लेकिन क्योंकि मैंने बाकी का सारा वाकया अपनी आंखो से देखा था इसलिए मुझे मालूम था कि थी वह कार में ही । उस वक्त परेरा अकेला था, घायल था और उसे गाड़ी भी चलानी थी । हर बात मेरे हक में थी । मैंने उसे रास्ते में घेर लिया और नी... नीलम को छु... छुड़ा लिया ।”
आखिरी वाक्य कहते-कहते एकाएक उसकी आवाज फंसने लगी । एकाएक उसके होंठों की कोरों पर सुर्ख लाल झागदार खून की एक लकीर-सी बनने लगी ।
“देवा !” - विमल आंतकित स्वर नें बोला और उसकी तरफ लपका ।
देवाराम के घुटने मुड़ने लगे थे लेकिन विमल ने पहले ही आगे बढकर उसे अपनी बांहो में भर लिया । उसका हाथ देवाराम की पीठ पर पड़ा तो उसके मुंह से चीख निकल गई । विमल ने घबराकर उसकी पीठ पर से अपना हाथ हटाया तो देखा कि उसका हाथ खून से रंगा हुआ था ।
“देवा !” - विमल उसे अपनी बांहों में संभालता हुआ पूर्ववत आतंकित स्वर में बोला - “क्या हुआ तुझे ?”
“गोली !” - देवाराम बड़ी कठिनाई से कह पाया - “गोली लगी । पीछे से । ...मैंने... मैंने परेरा को... शू... शूट किया था और... और उसे मरा समझ... समझ लिया था... ल... लेकिन... लेकिन वह जिंदा था । पीछे से एक गोली... मुझे... मुझे मार दी... फिर मैंने... मैंने उसे... खत्म कर दिया...”
“वागले ! डॉक्टर को बुला ।”
“कोई फायदा नहीं... मैं जा रहा हूं... मेरी जान तो... लगता है... नीलम को... नीलम को... तु... तुम्हारे पास पहुंचाने के लिए ही... अ... अ... अटकी हुई थी... गणपति... मेरा वादा... वादा जो पूरा... कराना... चाहता था...”
“देवा !” - विमल कातर स्वर में बोला - “देवा !”
“मैं जा... रहा हूं । ...मेरे भाई को... मेरी... अलविदा...”
“देवा ! मेरे दोस्त ! मेरे भाई !”
“अलविदा... कह... कहना । ...कोई भ... भूल... हु... हुई... हो... तो... तो मा... माफ... क... करना...”
“देवा !”
देवाराम की आंखें उलट गई ।
उसने विमल की बांहों में दम तोड़ दिया ।
विमल कितनी ही देर उसकी लाश से लिपटा रहा ।
फिर वागले ने उसे लाश से अलग किया ।
उसने देवाराम को धीरे से खोली के फर्श पर लिटा दिया और विमल को उससे परे हटाया ।
तकदीर की कैसी मार थी !
भाग्य की कैसी विडम्बना थी !
अपने दो भाइयों की लाश पुलिस से क्लेम करने के लिए गए हुए तुकाराम का इंतजार वहां उसके तीसरे भाई की लाश कर रही थी ।
***
मामूली उपक्रम से ही इकबालसिंह को परेरा की कार मिल गई ।
कार सड़क के एक किनारे लावारिस खड़ी थी और भीतर ‘कम्पनी’ के जुम्मा-जुम्मा आठ रोज के सिपहसालार मैक्सवैल परेरा की लाश पड़ी थी ।
कार में परेरा की लाश के अलावा कुछ न था ।
***
विमल बम्बई सेंट्रल स्टेशन पहुंचा ।
उसने अपनी कार पार्किंग में ले जाकर खड़ी की और फिर अपने करीब बैठी नीलम की तरफ देखा ।
नीलम ने डबडबाई आंखों से उसकी तरफ देखा और फिर झपटकर उसके साथ लिपट गई ।
विमल ने भी उसे अपनी बांहों में कस लिया ।
“मैं नहीं जाऊंगी ।” - वह अविरल आंसू बहाती हुई बोली ।
“फिर वही बात ?” - विमल कठोर स्वर में बोला ।
“हां फिर वही बात । मैं नहीं जाऊंगी ।”
“अरी, गधी । तेरा जाना जरूरी है ।”
“मुझे गधी कहो या बकरी, लेकिन मुझे यहां से न भेजो । मुझे अपने से जुदा न करो ।”
“यह नहीं हो सकता ।”
“या तुम भी साथ चलो ।”
“यह भी नहीं हो सकता ।”
“तो फिर मैं भी...”
“फिर वही बात ! फिर वही बात ! मैंने क्या कसम खिलाई थी तुझे ? मैंने कहा था कि अगर तू मेरा कहना न माने तो मेरा मरे का मुंह देखे ।”
नीलम ने जबरन उसका मुंह बंद कर दिया ।
“तुमने क्यों खिलाई मुझे ऐसी कसम ?” - वह रोती हुई बोली ।
“क्योंकि इसी में हम सबकी भलाई है ।”
“हम मिलकर भी बिछुड़ रहे हैं, इसमें हमारी भलाई है ?”
“हां । नीलम, मैंने तुझे इतना समझाया लेकिन लगता है, तेरी समझ में कुछ नहीं आया ।”
“विमल ! ऐसी कोई बात मेरी समझ में कैसे आ सकती है जिसमें मुझे तुमसे बिछुड़ना पड़े ?”
“अभी भी तो हम बिछुड़े ही हुए थे ।”
“वह मजबूरी का बिछोड़ा था लेकिन अब तुम मुझे मर्जी से बिछुड़ने को कह रहे हो । तुम मुझे जान-बूझकर धक्का दे रहे हो ।”
“यह जरूरी है । यहां के मौजूदा खतरनाक हालात में मैं यहां तुम्हारी सलामती की गारंटी नहीं कर सकता ।”
“मुझे नहीं चाहिए ऐसी कोई गारंटी । मैं अब मरने से नहीं डरती । विमल, मुझे यहीं रहने दो । मुझे अपने से जुदा न करो । जो लड़ाई तुम लड़ रहे हो, उसमें मैं भी तुम्हारा साथ दूंगी । दुश्मन के खिलाफ मैं तुम्हारे हाथ मजबूत करूंगी ।”
“तुम्हारी यहां मौज़ूदगी मेरे नहीं, दुश्मन के हाथ मजबूत करेगी । तुम मुझे कमजोर बनाओगी । तुम मुझे बांध दोगी । पहले की तरह फिर ऐसी नौबत आ सकती है जबकि दुश्मन तुम्हें मेरे खिलाफ मोहरे की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा ।”
“तुम मेरी परवाह न करना ।”
“ऐसा नहीं हो सकता ।”
“तुम समझो, मैं पहले ही मर चुकी हूं ।”
“ऐसा मैं नहीं समझ सकता ।”
“लेकिन मैं...”
“एक मिनट चुप करो और मेरी बात सुनो ।”
“मुझे मालूम है, तुम क्या बात सुनाओगे । इस वक्त मुझे सुनाने के लिए तुम्हारे पास एक ही बात है - चली जा । चली जा । चली जा...”
वह फिर रोने लगी ।
विमल ने बड़े प्यार से उसके आंसू पोंछे ।
“एक मिनट शांति से मेरी बात सुन तो सही ।”
“बोला ।”
“देख । वह लड़का - देवाराम - जो तुझे दुश्मन से छुड़ाकर लाया था, जानती है, उसकी क्या उम्र थी ?”
“नहीं ।”
“वो सिर्फ बीस साल का था । उसने तेरी खातिर, एक ऐसी लड़की की खातिर, जिसकी उसने जिंदगी में कभी शक्ल नहीं देखी थी, अपनी जान दे दी । क्यों जान दे दी ?”
“क्यों दे दी ?”
“क्योंकि उसने मुझसे वादा किया था कि वह मुझे तुझसे मिलवाएगा । उसने अपनी जान देकर अपना वादा पूरा किया । तेरी निगाह में इस बात की कोई कद्र नहीं ?”
“बहुत कद्र है, लेकिन...”
“नीलम ! मेरी जान ! ऐसा ही कोई वादा मैंने उसके इकलौते जीवित भाई से किया है । जिस आदमी ने बखिया के खिलाफ छेड़ी मेरी जंग पर अपने तीन भाई कुर्बान कर दिए, तू चाहती है कि अब उसकी मौजूदा दुश्वारी की घड़ी में मैं उसका साथ छोड़कर तेरे साथ चल दूं ? तू चाहती है कि उस शख्स की निगाह में मैं ऐसा यारमार, नाशुक्रा और अहसान-फरामोश आदमी बनूं जो अपना मतलब हल हो जाने के बाद उसकी शक्ल नहीं पहचानता ?”
“नहीं ।”
“तो फिर क्यों नहीं जाती यहां से ? क्यों नहीं मानती मेरा कहना ?”
“विमल, मैं नहीं । मेरा दिल नहीं मानता । नहीं मानता मेरा दिल । मुझे लगता है, तुम्हारे पीठ फेरते ही हम हमेशा के लिए बिछुड़ जाएंगे ।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा । तू शांति से चंडीगढ पहुंच । मैं बहुत जल्दी, तेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा जल्दी, तेरे पास होऊंगा ।”
“मेरा दिल नहीं मानता ।”
“फिर वही बात !” - विमल झल्लाया - “फिर वही बात ! नीलम ! नीलम ! तेरा यहां से जाना जरूरी है । मैं तुझे गाड़ी पर चढकर ही यहां से टलूंगा ।”
“यूं जबरदस्ती गाड़ी पर चढाओगे तो मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगी ।”
“तू ऐसा करेगी ?” - विमल उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला ।
नीलम ने कुछ क्षण उससे आंखें मिलाई लेकिन फिर विचलित हो गई ।
“नहीं ।” - वह धीरे से बोली ।
“खा मेरी कसम ?”
“मेरी कसम ।”
“अरे तेरी नहीं, मेरी कसम ?”
“खा मेरी कसम ?”
“मेरी कसम ।”
“अरी गधी, मेरी ।” - विमल अपनी छाती अपने अंगूठे से ठोकता हुआ बोला - “मेरी कसम ।”
“मेरी कसम ।”
“अरी, साली । मिडल पास बेवकूफ, विमल की कसम ।”
“मैं तुम्हारी कसम नहीं खाऊंगी ।”
“अच्छा न सही । लेकिन तू मेरा कहना मानकर चंडीगढ जाएगी, सचमुच ही अगले स्टेशन पर नहीं उतर जाएगी ।”
“अगर तुम मजबूर करोगे तो ।”
“जाएगी न ?”
“हां ।”
“शाबाश !”
“शाबाशी देकर भेजने की जगह अगर तुम मुझे दुत्कारकर अपने पास रख लेते तो मैं ज्यादा खुश होती ।”
“फिर पहुंच गई घूम-फिरकर पुरानी जगह पर ?”
“अच्छा-अच्छा ।”
“देख, आज इतवार है न ?”
“हां ।”
“अगले इतवार से पहले अगर मैं न चंडीगढ में तेरे पास होऊं तो कहना ।”
वह खामोश रही ।
“देख । डोगरा के कत्ल के साथ शुरू हुई इस खूंरेज दास्तान का आज ग्यारहवां दिन है । इनमें से दो-तिहाई दिनों में तू मेरे साथ थी । तू खुद बता, मैंने इन दिनों में एक सैकंड के लिए भी चैन की सांस ली है ?”
“नहीं ।”
“तो ? तू क्या समझती है कि मैं इस जिंदगी से राजी हूं ? तू पुलिस की गिरफ्त में थी और मैं समझता था कि तू मर चुकी है । उस दौर के तीन दिन तो मुझ पर और भी भारी गुजरे थे । हर क्षण खून के आंसू रोता था मैं । कसम है मुझे अपने वाहेगुरू की कि जो तेरी सलामती की खबर लगने तक मेरे हलक से अन्न का एक दाना भी उतरा हो, मैं नींद की एक झपकी भी ले सका होऊं !”
“विमल !” - नीलम ने रोते हुए उसे अपने अंक में भर लिया - “विमल ! विमल !”
“अब तू ही सोच, जिस लड़की से मैं इतना प्यार करता हूं, उसकी जान पर मंडराता खतरा मैं क्योंकर बर्दाश्त कर सकता हूं ?”
“तुम किनारा क्यों नहीं करते इस जिंदगी से ?”
“करूंगा । यकीनन करूंगा । ऐसा किनारा करूंगा कि फिर कभी अपनी गुनाहों से पिरोई जिंदगी की तरफ झाकूंगा भी नहीं । मेरा वाहेगुरू मेरी खताएं माफ करे, मैं चंडीगढ आकर तेरे साथ यूं रहूंगा जैसे किसी ईमानदारी से रिजक कमाने वाले मर्द को रहना चाहिए । वहां जाते ही हम शादी कर लेंगे ।”
“नहीं । पहले तुम नया चेहरा हासिल करोगे । उसके बिना हमारी गृहस्थी नहीं बसने वाली ।”
“ठीक ।”
“और एक काम और करोगे ?”
“वह क्या ?”
“मेरे साथ वैष्णो देवी की यात्रा पर चलोगे ?”
“जरूर ।”
“मैं वहां भगवती भवानी के दरबार में तुम्हारी सारी खताएं माफ करवाऊंगी ।”
“मैं जरूर जाऊंगा ।”
“वादा ?”
“हां । वादा और देख लेना, रिजक कमाने के लिए मैं बोझा उठाने वाला मजदूर बन जाऊंगा, गली-गली मूंगफली बेच लूंगा, लेकिन कभी दोबारा गुनाह की दुनिया में कदम नहीं रखूंगा ।”
“ओह, विमल !”
“अगर वाहेगुरू ने हमें कोई औलाद दी, तो उसे मैं उन तमाम लानतों से दूर रखूंगा जिनसे उसका बाप न बच सका । वह उस सरदार सुरेंद्रसिंह सोहल की औलाद होगी जो दो टाइम गुरूद्वारे जाकर मत्था टेकने वाला खुदा का नेक बंदा था, न कि इश्तिहारी मुजरिम विमल कुमार खन्ना उर्फ गिरीश माथुर उर्फ बनवारीलाल तांगे वाला उर्फ रमेश कुमार शर्मा उर्फ कैलाश मल्होत्रा उर्फ बसंत कुमार मोटर मकैनिक उर्फ नितिन मेहता उर्फ कालीचरण की औलाद होगी जिसके पापों का घड़ा इतना भर चुका है कि उसे जो भी सजा मिले वो कम होगी ।”
“सब ठीक हो जाएगा ।” - नीलम फिर उसे अपनी छाती से भींचती हुई बोली - “सब ठीक हो जाएगा, विमल । माता भगवती भवानी पर भरोसा रखो ।”
कितना ही देर वे दोनों एक-दूसरे की बांहों में समाए आंसू बहाते रहे । अंत में विमल ने जबरन उसे अपने से अलग किया ।
“अब दो मिनट चुपचाप बैठना ।” - वह बोला ।
उसने खामोशी से सहमति में सिर हिलाया ।
विमल ने पहले उसके सिर पर एक अधपके बालों का विग चढाया जिसके नीचे उसके स्याह काले बाल छुप गए । उसके माथे की चोट का जगह पहले सिर्फ सर्जीकल टेप लगा हुआ था, विमल ने वहां यूं पट्टी बांधी कि सारा माथा ढंक गया । रूई और सर्जीकल टेप की नकली ड्रैसिंग उसने उसके दायें गाल पर कर दी । फिर उसने घुटने तक उसकी दाई टांग पर प्लास्टर का खोल चढा दिया, जिसकी वजह से साड़ी के नीचे झांकती उसकी टांग यूं लगने लगी जैसे उसमें फ्रैक्चर की वजह से वह प्लास्टर उस पर चढाया गया हो ।
अब वह सौ फीसदी किसी एक्सीडेंट में घायल हुई एक अधेड़ महिला लग रही थी ।
“जब व्हील चेयर पर बैठो” - विमल बोला - “तो अपना एक हाथ स्लिंग में डाल लेना और चेहरे पर ऐसे भाव लाना जैसे तुम बहुत तकलीफ में हो ।”
“अच्छा ।”
“इस वक्त पुलिस को सिर्फ मेरी ही नहीं, तुम्हारी भी तलाश है और स्टेशन पर निगरानी का इंतजाम जरूर होगा ।”
“हूं ।”
फिर विमल रियर व्यू मिरर में देख-देखकर अपने हुलिये की मरम्मत में जुट गया ।
अपने सिर पर उसने गंजा विग, गाल पर मस्सा और मुंह पर अधपकी मूंछें लगा लीं । कार में ही अपने कपड़े उतारकर उसने कुली के नंबर वाला एक बिल्ला बांध लिया और पांव में जूतों की जगह एक टूटी हुई चप्पल पहन लीं । अपने सिर पर उसने लाल रंग की पगड़ी इस प्रकार से लपेटी कि पगड़ी भी बंधी रहे और गंजा सिर भी दिखता रहे ।
फिर वह कार से बाहर निकला ।
कार की डिकी में से उसने एक व्हील चेयर निकाली जिसकी पीठ पर वेस्टर्न रेलवे लिखा था ।
पिछली सीट पर से उसने नीलम का वह सूटकेस निकाला जो वह होटल के सुइट से पहले ही उठा लाया हुआ था ।
फिर उसने नीलम को संकेत किया ।
वह कार से निकलकर व्हील चेयर पर बैठ गई ।
वह बहुत उदास थी । उसके चेहरे पर गम की घटाएं छाई हुई थीं ।
“भेज रहे हो ?” - वह डबडबाई आंखों से उसकी तरफ देखती हुई बोली ।
विमल उससे निगाह की ताब न ला सका । वह परे देखने लगा ।
नीलम ने एक आह भरी और असहाय भाव से कंधे झटकाए ।
अपना बायां हाथ उसने स्लिंग में डाल दिया ।
विमल ने एक हाथ से सूटकेस संभाला और दूसरे से व्हील चेयर धकेलने लगा ।
टिकट का इंतजाम वागले ने एक ट्रैवल एजेंसी के माध्यम से पहले ही कर दिया था । दिल्ली की गाड़ी में सैकंड क्लास एयरकंडीशंड स्लीपर में उसकी बर्थ बुक थी ।
वह स्टेशन के प्रवेशद्वार की तरफ बढा ।
वहां पुलिस वालों की भारी भीड़ थी ।
करीब पहुंचकर उसे मालूम हुआ कि एक-एक पैसेंजर के चेहरे को खुर्दबीन जैसी बारीकी से परखा जा रहा था ।
वहां लेडी पुलिस भी मौजूद थी ।
विमल के देखते-देखते एक बुर्काधारी औरत को पुलिस ने रोका ।
“नकाब उलटो ।” - लेडी सब-इंस्पेक्टर बोली ।
“लाहौल विला कुवत !” - उसके साथ चलता बकरे जैसी दाड़ी वाला एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति भन्नाया - “ऐसा कैसे हो सकता है ? बेगम यूं किसी के सामने भला कैसे नकाब उलट सकती हैं ?”
क्यों नहीं उलट सकतीं ?”
“किसी गैर-मर्द के सामने !”
“मैं तुम्हें मर्द दिखाई देती हूं ?” - सब-इंस्पेक्टर आंखें निकालकर बोली ।
“लेकिन... लेकिन... मोहतरमा... आखिर इसकी जरूरत क्या है ?”
“है जरूरत ।”
“यह तो धांधली है । क्या मुल्क में इतनी बद्अमनी फैल गई है कि शरीफजादियों के नकाब उलट-उलटकर उनके चेहरे उरियां किए जाते हैं ?”
“अब जाने भी दो मियां !” - एकाएक बेगम बोल पड़ी - “क्यों इतनी मामूली बात को इतना लंबा घसीट रहे हो । यह लो, साहिबा !” - उसने नकाब उलट दी - “देखो मेरी सूरत ।”
“हां, हां !” - मियां झल्लाकर बोला - “तुम्हें भला क्यों एतराज होने लगा ? तुम्हें शौक जो ठहरा अपनी खूबसूरती की नुमायश करने का ।”
सब-इंस्पेक्टर महिला ने एक निगाह युवती के चेहरे पर डाली और बोली - “जाइए ।”
दोनों आगे बढ गए ।”
बुर्के में नीलम को स्टेशन पर लाने का ख्याल उसे भी आया था । वह नजारा देखकर उसने मन-ही-मन शुक्र मनाया कि उस ख्याल पर उसने अमल नहीं किया था ।
वह आगे बढा ।
पुलिस वालों ने एक उड़ती-सी निगाह उन पर डाली और फिर उनके पीछे आ रहे मुसाफिरों की तरफ तवज्जो देने लगे ।
तभी उसकी निगाह पुलिस वालों से थोड़ा परे खड़े दो व्याक्तियों पर पड़ी ।
विमल ने नोट किया कि वे भी पुलिस वालों जैसी ही बारीकी से हर सवारी को परख रहे थे ।
उसे दोनों सूरतें पहचानी हुई लगीं ।
फिर एकाएक उसे याद आ गया कि वे सूरतें उसने पहले कहां देखी थीं ।
वे सूरतें उसने पिछले सोमवार को बोरीवली स्टेशन के बाहर खड़ी एक काली फियेट में तब देखी थीं, जब वह उस रोज की तरह ही कुली बना, नीलम का सामान उठाए उसे टैक्सी पर बिठाने के लिए स्टेशन से बाहर निकला था ।
वही दो शख्स बाद में रेलवे लाइन पर भी उसके पीछे भागे थे ।
वे ‘कम्पनी’ के आदमी थे ।
उसके दिल की धड़कन एकाएक तेज होने लगी ।
वह उनके आगे से गुजरा ।
दोनों में से किसी ने उसकी तरफ कोई खास ध्यान न दिया ।
कुछ आगे निकल जाने पर उसने एक पीछे घूमकर देखा ।
उन दोनों में से कोई भी उनकी तरफ नहीं देख रहा था ।
विमल की जान में जान आई ।
व्हील चेयर ठेलता हुआ वह ट्रेन की तरफ बढ ।
“ट्रेन पर पहुंचने के बाद” - विमल चेतावनी-भरे स्वर में बोला - “मुझसे कोई बात न करना ।”
“क्यों ?”
“लोगों को शक होगा कि मुसाफिर कुली से गप्पें मार रही है ।”
“अच्छा ।”
वे ट्रेन पर पहुंचे ।
विमल ने उसका डिब्बा तलाश करके उसे गाड़ी में चढा दिया ।
नीलम कातर निगाहों से उसकी तरफ देखती रही ।
विमल चाहकर भी उससे निगाह नहीं मिला पा रहा था ।
वह प्लेटफॉर्म पर कुलियों के विशिष्ट अंदाज में उकडूं होकर बैठ गया । उसने एक बीड़ी सुलगा ली और उसके कश लगाने लगा ।
तभी उसके सामने से मारियो गुजरा ।
उसकी सूरत देखते ही हड़बड़ाहट में बीड़ी का धुआं उसके हलक में लगा और वह खांसने लगा । उसकी खांसी की आवाज से आकर्षित होकर मारियो ने एक सरसरी निगाह उस पर डाली और फिर आगे बढ गया ।
दाता ! - विमल मन-ही-मन बोला - क्या माजरा था ? इतने सारे दादे इत्तफाक से वहां मौजूद थे, या सब उसकी फिराक में थे ?
वाहेगुरु सच्चे पातशाह ! तेरी मेहर की छतरी नीलम के सिर से कभी न हटे । वह सुरक्षित चंडीगढ पहुंच जाए ।
फिर गाड़ी की सीटी बजी ।
और कुछ क्षण बाद गाड़ी आगे सरकने लगी ।
नीलम खिड़की में से उसकी तरफ हाथ हिला रही थी ।
अपनी मौजूदा हालत में विमल की वह मजबूरी थी कि वह उस इशारे की अलविदा का जवाब इशारे से नहीं दे सकता था ।
नीलम वाला डिब्बा उसके आगे से गुजर गया ।
यह देखकर उसने बड़ी तसल्ली महसूस की कि तब तक भी कोई संदिग्ध व्यक्ति उस डिब्बे में नहीं चढा था । सारी गाड़ी उसके आगे से गुजर गई ।
“धन्न करतार !” - उसके मुंह से निकला ।
वह उठा और शहर की तरफ बढा ।
“अबे, ओये !”
विमल को लगा कि कोई उसे ही पुकार रहा था ।
उसने घूमकर पीछे देखा ।
अभी वह जहां से उठा था, वहां व्हील चेयर के पास एक टिकट एग्जामिनर खड़ा था ।
“साले !” - वह बोला - “व्हील चेयर कहां छोड़े जा रहा है ? कोई ले गया इसे तो इसकी कीमत तेरा बाप भरेगा ?”
हड़बड़ाहट में विमल के मुंह से बोला न फूटा ।
“इसे जहां से लाया है, वहां छोड़कर आ ।”
“अच्छा बाप !”
तब उसे याद आया कि व्हील चेयर कुलियों को बीमार या अपाहिज मुसाफिर ढोने के लिए अपना टोकन नंबर लिखवाकर असिस्टेंट स्टेशन मास्टर के ऑफिस से मिलती थी । जो व्हील चेयर प्रत्यक्षतः उसे ए.एस.एम. के पास वापिस करके आनी चाहिए थी, वह उसे वहीं छोड़े जा रहा था ।
व्हील चेयर की अब उसे जरुरत जो नहीं रही थी ।
उससे उसका मतलब हल जो हो गया था ।
उसने व्हील चेयर संभाल ली और उसे बाहर को धकेलने लगा ।
‘कम्पनी’ के जो आदमी स्टेशन पर पुलिस वालों के करीब मौजूद थे, वे उस्ताद और दामू थे ।
“उस्ताद !” - एकाएक दामू बोला ।
“क्या है ?” - उस्ताद वहां पहुंचते मुसाफिरों पर से निगाह हटाए बिना बोला ।
“व्हील चेयर धकेलता अभी जो कुली भीतर से निकलकर उधर कार-पार्किंग की तरफ गया है, उसे देखा ?”
“देखा ।”
“बाप, वह कार-पार्किंग की तरफ क्यों गया ?”
“अबे, साले ! यह भी कोई पूछने की बात है ? वह किसी अपाहिज सवारी को लेने गया होगा ।”
“लेकिन बाप, कुली को क्या सपना आया था कि उधर कार-पार्किंग में किसी अपाहिज सवारी को व्हील चेयर की जरुरत थी ?”
“क्या मतलब ?”
“वह तो सीधा भीतर से निकला और व्हील चेयर धकेलता हुआ कार-पार्किंग की तरफ बढ गया ।”
उस्ताद सोचने लगा ।
“और उस्ताद !”
“और क्या ?”
“अगर सपना आया भी था तो अपाहिज सवारी कार-पार्किंग में क्या कर रही होगी ?”
“क्या मतलब ?”
“बाप, व्हील चेयर की तलबगार अपाहिज सवारी स्टेशन पर या तो अकेली आई होगी या किसी के साथ आई होगी ।”
“इसमें तूने कौन-सी भारी अक्ल की बात कर दी है । यह तो यूं हो गया कि या तो दिन है या रात है । एक बात तो होगी ही दोनों में हो गया कि या तो दिन है या रात है । एक बात तो होगी ही दोनों में से । स्साला कहता है अकेली आई होगी या किसी के साथ आई होगी ।”
“बाप, सुनो तो !”
“क्या सुनूं ?”
“फर्ज करो, तुम्हारा टांग टूटेला है ?”
“क्या ?” - उस्ताद आंखें निकालकर बोला ।
“फर्ज करो, बाप, सिर्फ करो ।”
“अच्छा । किया ।”
“अब अगर तुम अकेला का है तो टैक्सी में आएगा । नहीं ?”
“हां !”
“लेकिन टैक्सियां तो यहां हमारे पोर्टिको में आकर रुकती हैं । उनको पार्किंग में जाने का क्या काम ?”
“कोई काम नहीं । लेकिन अगर अपाहिज मुसाफिर किसी के साथ प्राइवेट कार पर आया हो तो ?”
“तो भी कार पहले तो यहां आनी चाहिए । कार वाला पहले मुसाफिर को वहां उतारेगा और फिर परे बनी कार-पार्किंग में कार ले जाकर खड़ी करेगा । कुली लोग तो बाप, इधर ही बैठेला है । पार्किंग में तो कोई कुली नहीं ।”
“हो सकता है कि हो !”
“तो भी वह पहले यहीं वापिस आकर स्टेशन से व्हील चेयर लेगा, उसे पार्किंग में लेकर जाएगा और फिर अपाहिज सवारी को लादकर यहां लाएगा । जब गाड़ी यहीं आकर खड़ी हो सकती है तो इतने झमेले का क्या फायदा ?”
“वह अपनी गाड़ी खुद चला रहा हो सकता है ?”
“हीं-हीं-हीं ! कोई यूं पार्किंग में गाड़ी छोड़कर लंबे सफर पर जाता है ?”
“क्या पता वह लोकल की सवारी हो ?”
“बाप, लोकल की अपाहिज सवारी अपनी कार छोड़कर गाड़ी में क्यों बैठेगी ?”
उस्ताद सोचने लगा ।
“और बाप” - दामू रहस्य-भरे स्वर में बोला - “बोरीवली स्टेशन का वाकया याद है ?”
“याद है ।”
“वहां भी सोहल हमें कुली के भेष में ही दिखाई दिया था ।”
“हरामजादा ! उल्लू का पट्ठा !” - एकाएक उस्ताद फट पड़ा - “साला, हमेशा एक घंटे में मतलब की बात बककर देता है । साफ नहीं बोलता कि कुली में कोई घोटाला है ।”
“अपुन तो बराबर बोला ।”
“हरामी का पिल्ला ! हमेशा फारसी में बोलता है । कभी सफा-सफा हिंदोस्तानी में नहीं बोलता ।”
“उस्ताद, अपुन तो...”
“थोबड़ा बंद ! मैं उसके पीछे जाता हूं । तू जाकर सारे आदमियों को खबर कर । वह व्हील चेयर वाला कुली स्टेशन से निकलकर न जाने पाए । भाग ।”
दामू एक तरफ को लपका ।
उस्ताद उधर दौड़ चला जिधर व्हील चेयर धकेलता कुली गया था । अंधेरे की वजह से कुली अब उसे दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन होना उसने उधर ही था ।
विमल ने अपने पीछे करीब आते भागते कदमों की आवाज सुनी ।
अपनी कार से पीछे वह काफी परे था ।
उसने घूमकर पीछे देखा तो उसने उस्ताद को लगभग अपने सिर पर पहुंच गया पाया ।
उसके हाथ में रिवॉल्वर थी ।
“रुक जा, हरामजादे !” - वह सांप की तरह फुंफकारा ।
विमल व्हील चेयर को जोर से उसकी तरफ धक्का दिया ।
व्हील चेयर उस्ताद की टांगों से टकराई । उसका शरीर दोहरा हुआ और वह व्हील चेयर से उलझता-उलझता जमीन पर ढेर हो गया ।
लेकिन रिवॉल्वर उसके हाथ से न छूटी ।
उसने विमल पर एक फायर किया जिससे वह बाल-बाल बचा ।
अब कार तक पहुंचने की कोशिश करना बेकार था । जितनी देर में वह चाबी लगाकर कार का दरवाजा खोलता, उतनी देर में उस्ताद उसके सिर पर पहुंच सकता था ।
और गोली चलने की आवाज पुलिस ने भी सुनी हो सकती थी ।
हो सकती थी क्या, सुन ही ली थी ।
एकाएक वातावरण पुलिस की सीटियों से गूंजने लगा ।
विमल कारों के बीच में से होता हुआ सिर पर पांव रखकर सामने अंधेरे में भागा ।
तभी उसे उधर से भी करीब आते कई कदमों की आहट सुनाई दी ।
वह बायें कन्नी काट गया ।
वैसा ही भगदड़ का आलम उधर भी था ।
अपने चारों तरफ उसे दौड़ते कदमों की आवाजें सुनाई दे रही थीं ।
अपना वहां से बच निकलना उसे असंभव दिखाई देने लगा ।
फिर भी वह संतुष्ट था कि नीलम को उसने सुरक्षित गाड़ी पर चढ़ा दिया था ।
अब हालत यह थी कि जिस दिशा से भी कम कदमों की आवाज उसे सुनाई देती थी, वह उधर दौड़ पड़ता था लेकिन लगभग फौरन ही उसे वह रास्ता भी छोड़ना पड़ जाता था ।
वातावरण पुलिस की सीटियों से भी बदस्तूर गूंज रहा था ।
पता नहीं उसके पीछे पुलिस वाले ज्यादा थे या ‘कम्पनी’ के आदमी ज्यादा थे ।
और पता नहीं किनकी बांहों में जाकर गिरना उसकी किस्मत में लिखा था ।
“वाहेगुरु सच्चे पातशाह !” - उसके मुंह से निकला - “तू मेरा राखा सबनी थाहीं !
अब कई दिशाओं से उसे करीब होते कदमों की आवाज आ रही थी ।
अब उसका फंस जाना अवश्यम्भावी था ।
लेकिन किसी तरफ तो उसने भागना ही था, इसलिए वह भागा ।
वास्तव में अब और भगने की शक्ति भी उसमें बाकी नहीं रही थी ।
कारों की एक लंबी कतार के बीच मे से भागता हुआ वह पार पहुंचा ।
वहां अपेक्षाकृत अंधेरा था ।
भागते कदमों की और पुलिस की सीटियों को आवाजें उसे बदस्तूर सुनाई दे रही थी ।
कारों की कतार से पार वह अभी निकला ही था कि एकाएक किसी का रोड़ी कूटने वाले इंजन की ठोकर जैसा घूंसा उसकी छाती से टकराया । वह पीछे को उलटा और एक कार के बोनट पर जा गिरा । उसकी टांगें उसे पानी-पानी हो गई लगने लगीं । वह बोनट पर से फिसला और नीचे पहिए के पास जमीन पर ढेर हो गया ।
दो भारी बूट उसे अपनी नाक से मुश्किल से दो फुट दूर दिखाई दिए ।
बड़ी मेहनत से उसने सिर उठाया तो एक रिवॉल्वर अपनी तरफ तनी पाई ।
उसकी निगाह और ऊंची उठी तो पीक कैपधारी एक युवा पुलिस अधिकारी से मिली ।
पुलसिया अपलक उसे देख रहा था ।
विमल ने गहरी सांस ली ।
खेल खत्म !
“सोहल !” - वह बड़े कर्कश स्वर में बोला । रिवॉल्वर पर उसकी उंगलियां कस गई ।
विमल ने सहमति में सिर हिलाया ।
उसने उठने का उपक्रम किया तो पुलसिया सांप की तरह फुंफकारा - “खबरदार !”
“मैं उठने लगा था ।” - विमल बोला ।
“खबरदार !”
विमल ने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया ।
“कोई हरकत न हो ।”
“कोई हरकत हो भी तो क्या है ?” - विमल बोला - “मैं जिंदा या मुर्दा, दोनों तरीको से तुम्हारे लिए सवा लाख रुपये का हूं ।”
तभी कारों की कतार के पार, उस दिशा में जिधर से विमल भागकर आया था, एक जीप आकर रुकी ।
“सब-इंस्पेक्टर दामोदर राव !” - कोई उच्च स्वर में बोला ।
“सर !” - विमल के सामने उसकी तरफ रिवॉल्वर ताने खड़े पुलसिये ने उत्तर दिया ।
“वह आदमी इधर तो नहीं आया ?”
“नो, सर !”
“कमाल है ! कहां चला गया वो ? दौड़ा तो वह इधर ही था ।”
“इधर कोई नहीं आया, साहब ।” - वह अपलक विमल की तरफ देखता हुआ बोला - “इधर आएगा तो जिंदा बचकर कैसे जाएगा ?”
“ठीक है । मुस्तैद रहना । वह इधर आ सकता है ।”
“इधर आएगा तो शर्तिया पकड़ा जाएगा ।”
“किधर भी जाएगा तो पकड़ा जाएगा । सारा इलाका हमने घेरा हुआ है ।”
“फिर बचकर कहां जाएगा ?”
जीप स्टार्ट होने की आवाज आई ।
पीछे सन्नाटा छा गया ।
विमल स्तब्ध जमीन पर पड़ा रहा ।
सब-इंस्पेक्टर अभी भी अपलक उसे देख रहा था ।
“मैं” - फिर सब इंस्पेक्टर धीरे से बोला - “उन लोगों की जात से नफरत करता हूं जो अपने-आपको कायदे-कानून और सरकार से ऊंचा समझते हैं । मैं बड़े अरमान से पुलिस की नौकरी में भरती हुआ था और समझते था कि अकेला ही शहरे से - शहर से क्या, मुल्क से - अपराध और अपराधियों का समूल नाश कर दूंगा । कैसा बेवकूफ था मैं ? कायदे-कानून की जद में रहकर कहीं अपराधियों का नाश होता है ? पुलिस में भरती होने के बाद ही मुझे मालूम हुआ है कि हमारे सारे कायदे-कानून तो अपराधियों के हक में है और उन्हीं की हिफाजत के लिए गढ़े गए मालूम होते हैं । चला था सब-इंस्पेक्टर दामोदर राव अपराध और अपराधियों का समूल नाश करने जबकि हकीकत यह है कि वह एक मामूली जेबकतरे को सजा नहीं दिला सकता । मेरा जी चाहता है, मैं अपनी इसी सर्विस रिवॉल्वर से एक-एक दादा को, एक-एक मवाली को, शूट कर दूं लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता, ऐसा करने का मुझे अधिकार नहीं । ऊपर से मुझे उन मवालियों के पास तक फटकने की सुविधा प्राप्त नहीं । कैसे हो ? वे तो पुलिस कमिश्नर से बगलगीर होकर मिलते है, चीफ मिनिस्टर के साथ बैठकर चाय पीते हैं । बखिया को मार सकोगे ?”
उसका सवाल इतना अप्रत्याशित और अप्रासंगिक था कि विमल हड़बड़ा गया ।
फिर उसने हड़बड़ाहट में ही सहमति में सिर हिलाया ।
“गुड ! वैसे तो तुम खुद भी गोली मार देने के काबिल आदमी हो लेकिन आजकल समाज के लिए एक भला काम कर रहे हो, जो मेरी हसरत थी कि यह नामुराद वर्दी मुझे करने की इजाजत देती । बखिया को मार सको तो समझ लेना, तुम्हरी आज की जानबख्शी तुम्हारा एडवांस इनाम था ।”
विमल को अपने कानों पर विश्वास न हुआ ।
“उकड़ूं-उकड़ू सामने की तरफ भाग जाओ ।” - सब इंस्पेक्टर बोला - “थोड़ा आगे एक दीवार है । उसको फांदते ही तुम पुलिस के घेरे से बाहर होवोगे ।”
“शुक्रिया ! शुक्रिया, सब-इंस्पेक्टर साहब !”
“शटअप !”
विमल खामोश हो गया ।
“मूव !”
विमल संभला और नीचे को सिर झुकाए सामने को भागा । सब-इंस्पेक्टर ने खुद उसे छोड़ा था लेकिन फिर भी हर क्षण उसे यही लगता रहा कि कोई गोली उसकी पीठ से आकर टकराई कि टकराई ।
वह अभी दीवार से परे ही था कि एकाएक कोई चिल्लाया - “कौन है ?”
उत्तर में विमल पूरी शक्ति से दीवार की तरफ भागा ।
“रुक जाओ ।” - कोई चिल्लाया - “वर्ना गोली मार देंगे ।”
साथ ही एक फायर हुआ ।
गोली उसे अपने दाएं कान के पास से गुजरती हुई महसूस हुई ।
“पकड़ो ! पकड़ो !”
फिर भागते कदमों की आवाजें ।
फिर सीटियों का शोर ।
किसी प्रकार विमल दीवार फांदने मं कामयाब हो गया ।
लेकिन आगे कोई ओट नहीं थी, सुरक्षा का कोई साधन नहीं था ।
उसी की तरह दीवार फांदकर दर्जनों पुलसिए किसी भी क्षण वहां प्रकट हो सकते थे ।
फिर भी वह जान छोड़कर भागा ।
एकाएक एक मेटाडोर ऐन उसके पहलू में आकर रुकी ।
मेटाडोर का स्लाइडिंग डोर खुला ।
“कैलाश ।” - कोई भीतर से चिल्लाया - “जल्दी ।”
विमल लपककर मेटाडोर में सवार हो गया ।
दरवाजा फौरन बंद हो गया ।
मेटाडोर बगोले की तरह वहां से भाग निकली ।
खिड़की में से झांककर उसने पीछे देखा तो पाया कि एक साथ कई सशस्त्र, वर्दीधारी पुलसिए उस स्थान पर पहुंचे थे जहां कि वह केवल दो क्षण पहले मौजूद था ।
दो मिनट में दो बार वह बाल-बाल बचा था ।
उसका वाहेगुरु वाकई सब जगह उसका रखवाला था ।
तभी किसी ने हाथ बढ़ाकर मेटाडोर की पिछली खिड़की पर एक पर्दा खींच दिया । बाकी खिड़कियों पर पर्दे पहले से पड़े हुए थे ।
कुछ क्षण वह अपनी उखड़ी सांसों पर काबू पाने की कोशिश करता रहा ।
फिर उसने मेटाडोर के भीतर निगाह दौड़ाई ।
उसके सामने की सीट पर एक आदमी बैठा था लेकिन वह उसकी शक्ल न पहचान सका । भीतर कोई रोशनी नहीं जल रही थी और खिड़कियों पर पर्दे पड़े होने की वजह से बाहर की रोशनी भीतर नहीं आ रही थी ।
तभी उसे ध्यान आया कि मेटाडोर में से उस कैलाश के नाम से पुकारा गया था ।
वह सकापाकया ।
उसने मेटाडोर के ड्राइवर की तरफ निगाह उठाई ।
उसी क्षण विपरीत दिशा से आते हुए एक वाहन की हैडलाइट्स की रोशनी ड्राइवर के चेहरे पर पड़ी ।
विमल चौंका ।
वह मारियो था ।
वह वापिस अपने सामने बैठे आदमी की तरफ घूमा ।
“अंधेरे में मुझे तुम्हारी शक्ल दिखाई नहीं दे रही” - विमल शांति से बोला - “लेकिन मुझे अंदाजा है कि तुम कौन हो सकते हो ।”
“कैसे अंदाजा है ?” - पूछा गया ।
“ड्राइवर मारियो है इस वजह से और वजह से कि अभी मुझे कैलाश के नाम से पुकारा गया था । कैलाश मेरा तब नाम था जब मैं गोवा में अलफांसो साहब की सोलमर नाइट क्लब का कैशियर हुआ करता था और मारियो तब उस आदमी का बॉडीगर्ड हुआ करता था जिसकी आवाज मैं इस वक्त सुन रहा हूं ।”
“समझदार आदमी हो । पहले भी समझदार आदमी थे । आज भी समझदार आदमी हो ।”
“आगे भी समझदार आदमी रहूंगा ।”
“अगर रहे तो ।”
विमल खामोश ही गया ।
उस आदमी ने हाथ बढाकर मेटाडोर की साइड में लगा एक स्विच ऑन किया ।
मेटाडोर की डोम लाइट जल उठी ।
उस रोशनी में विमल ने अपने सामने बैठे आदमी की सूरत पर निगाह डाली ।
उसने उसे ठीक पहचाना था ।
वह एंथोनी एल्बुकर्क था ।
एंथोनी एल्बुकर्क गोवा का बहुत साधन-सम्पन्न, बहुत शक्तिशाली दादा था । कम-से-कम गोवा उसके प्रभुत्व को चैलेंज करने वाला कोई नहीं था । जुआ और शराब उसके प्रमुख धंधे थे जिनको उसने मुकम्मल तौर से अपने काबू में किया हुआ था । उसकी शुरू से ही यह अभिलाषा रही थी कि किसी वह इतना बड़ा आदमी बन जाए कि उसके ऊपर कोई न हो ।
लेकिन यह उसकी बदकिस्मती थी कि उसके ऊपर हमेशा ही कोई-न-कोई होता था जिसका कि खौफ उस पर हावी रहता था ।
पहले जब बम्बई के अंडरवर्ल्ड का बादशाह विशम्भरदास नारंग होता था तो वह अनुभव करता था कि केवल नारंग के न होने से वह टॉप पर पहुंच सकता था । फिर खुद विमल की वजह से ही गोवा में छिड़ी भयंकर गैंगवार के अंतिम चरण में जब विमल के ही हाथों विशम्भरदास नारंग मारा गया था और गोवा में उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मैगुअल अलफांसो ने अपना जुए का धंधा ही छोड़ दिया था उसे लगा था कि तब उसका सितारा इतना बुलंद होने का वक्त आ गया था जितना कि वह हमेशा चाहता था कि कभी हो ।
लेकिन तब नारंग की जगह का एक नया दावेदार जैसे आसमान से टपक पड़ा था ।
वह नया दावेदार राजबहादुर बखिया उर्फ काला पहाड़ था जिसने कि एल्बुकर्क की शहनशाह बनने की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था ।
वह अकेला भी होता तो शायद एल्बुकर्क उससे भिड़ जाता लेकिन तभी उसका गंठजोड़ जॉन रोडरीगुएज से हो गया । वे दोनों एक और एक मिलकर ऐसे ग्यारह हुए कि नारंग का सिंहासन हथियाने के लिए बम्बई के अंडरवर्ल्ड में छिड़ी भयंकर गैंगवार में उनके सामने कोई न टिक सका । नतीजा यह हुआ कि बखिया नारंग से भी ज्यादा शक्तिसाली अंडरवर्ल्ड का बादशाह बन गया और एल्बुकर्क की मंजिल उससे और दूर सरक गई ।
लेकिन ‘शहनशाह’ बनने का जुनून एल्बुकर्क के सिरे से कभी उतर न पाया । वह तो सिकन्दर बनना चाहता था । वह तो दुनिया फतह करना चाहता था । जैसे मकदूनिया में बैठ-बैठे सिकन्दर दुनिया फतह नहीं कर सकता था, वैसे ही गोवा में बैठे-बैठे वह भला शहनशाह कैसे बन सकता था !
लेकिन बखिया से टक्कर लेना भी तो उसके बूते की बात नहीं थी ।
फिर एक रोज उसे बखिया की लिटल ब्लैक बुक की कहानी सुनने को मिली ।
इतना तो वह जानता था कि बखिया की तीन-चौथाई शक्ति नॉरकाटिक्स की स्मगलिंग की वजह से थी, लेकिन उसे यह नहीं मालूम था कि सारे एशिया में फैले बखिया के उस धंधे का सारा कंट्रोल एक मामूली डायरी में केंद्रित था ।
उसे भी डायरी वह तोता लगी जिसमें बखिया नाम के राक्षस की जान थी ।
लेकिन जल्दी ही उसे यह भी मालूम हो गया कि वह डायरी हथिया पाना एक सपना था ।
जिस वाल्ट में वह डायरी रखी जाती थी उसे खोल पाना असंभव था ।
उस डायरी की महिमा, क्योंकि अंडरवर्ल्ड में बच्चे-बच्चे को मालूम थी, इसलिए गाहे-बगाहे उसे हथियाने की कोशिशें होना स्वभाविक था ।
कभी ऐसी कोई कोशिश कामयाब नहीं हो पाई थी ।
लेकिन मुसलसल नाकामयाबियों का आखिरी पड़ाव भी तो कामयाबी ही होता था ।
एल्बुकर्क का दिल गवाही देता था कि कभी-न-कभी वाल्ट को खोलकर उसमें से डायरी निकाल लेने वाला कोई महारथी भी पैदा हो ही जाना था ।
कोई चीज ‘पर्फेक्ट’ नहीं होती ।
इसी उम्मीद के सहारे उसने सुवेगा के कफ परेड वाले ऑफिस की निरंतर निगरानी का इंतजाम किया हुआ था ।
उसके लिए वाल्ट खोल पाना मुमकिन नहीं था लेकिन अगर कोई वाल्ट खोल लेता तो उससे डायरी हथिया लेना मुमकिन हो सकता था ।
कभी-न-कभी बखिया का वाल्ट खुल जाएगा, उसकी यह बात सच निकली थी ।
उसका लंबा इंतजार कामयाब हुआ था ।
उसका सब्र रंग लाया था ।
चोर की चोरी करने वाली उसकी योजना भी सफल हुई थी ।
लेकिन उसके हाथ नकली डायरी लगी थी ।
मारियो के डायरी लेकर आने पर डायरी पर एक निगाह डालते ही उसने पहचान लिया था कि डायरी नकली थी ।
लेकिन अभी वह नाउम्मीद नहीं हुआ था ।
असली डायरी अभी भी उसके हाथ आ सकती थी ।
डायरी को तो अब उसने हथिया कर रहना था ।
उसे तो उन दिनों यूं लग रहा था जैसे बम्बई में जो कुछ हो रहा था, वह कोई अदृश्य शक्ति उसी की अभिलाषापूर्ति के हेतु करवा रही थी । सब कुछ उसी के हक में हो रहा था ।
बखिया के तकरीबन सारे टॉप के लेफ्टिनेंट जन्नतनशीन हो चुके थे । बखिया को इतना कमजोर उसने कभी नहीं पाया था । उस दौर में डायरी का उसके हाथ लग जाना बखिया की मुकम्मल तौर से कमर तोड़ सकता था ।
अपनी बादशाही एल्बुकर्क को अब अपने बहुत करीब दिखाई दे रही थी ।
मेटाडोर में इस वक्त उसके सामने बैठे आदमी के अधिकार में वह हथौड़ा था जिसका एक ही वार बखिया को बौना बना सकता था और वह हथौड़ा वह उस आदमी से हथियाकर रहने वाला था ।
“गाड़ी कहीं रोको ।” ­ एल्बुकर्क बोला ­ “चलती गाड़ी में बात होती नहीं ठीक से ।”
मारियो ने सहमति में सिर हिलाया ।
कुछ क्षण बाद उसने गाड़ी रोकी ।
एल्बुकर्क कुछ क्षण अपलक विमल को देखता रहा ।
एकाएक वह मुस्कराया ।
“मुझे पहचाना, बरखुरदार ?” - वह बोला ।
“हां !” - विमल सहज भाव से बोला - “पहचाना ।”
“मैं वही आदमी हूं, गोवा में मैगुअल अलफांसी के साथ मिलकर तुमने जिसका जीना हराम कर रखा था ।”
विमल खामोश रहा ।
“मिरांडा और इंस्पेक्टर सोनवलकर के कत्ल के बाद तुम्हारे गोवा से एकाएक गायब हो जाने के बाद ही मुझे पता लगा था कि असल में तुम क्या चीज थे । तब अपनी अक्ल को बहुत कोसा मैंने । मैं तुम्हें समझता था सोलमर नाइट क्लब का मामूली कैशियर कैलाश मल्होत्रा और तुम निकले मशहूर इश्तिहारी मुजरिम सरदार सुरेन्द्रसिंह सोहल । वाह !” - वह हंसा - “आजकल खूब ढक्कन ठोका हुआ है तुमने बखिया को । वह भी तुम्हें कोई मामूली आदमी ही समझ रहा है या उसे मालूम है कि असल में तुम कौन हो ?”
“मालूम है ।”
“हूं ।” - वह क्षण ठिठका और फिर बोला - “अभी स्टेशन पर तो तुम फंस ही गए थे । बखिया के आदमियों के हाथ न पड़ते तो पुलिस के हाथ पड़ जाते । अच्छे मौके पर दिखाई दिए तुम हमें । देख लो, कैसे मक्खन में से बाल की तरह से निकालकर लाए हैं हम तुम्हें वहां से ।”
“शुक्रिया ।” - विमल शुष्क स्वर में बोला - “अभी जुबानी शुक्रिया कबूल फरमाइए, बाद में घर जाकर चिट्ठी भी लिख दूंगा ।”
एल्बुकर्क हंसा ।
तभी स्लाइडिंग डोर खुला और मारियो भीतर आकर विमल की बगल में बैठ गया । दरवाजा उसने दोबारा बंद कर दिया ।
“अलफांसो साहब कैसे हैं ?” - विमल ने उत्सुक भाव से पूछा ।
“ठीक हैं ।” - एल्बुकर्क बोला - “ठाठ कर रहे हैं ।”
“आप से टकराव नहीं होता उनका ?”
“अब नहीं होता । अब वे मेरे धंधे में जो नहीं रहे । जब से उन्होंने कैसीनो के धंधे से किनारा किया है, तब से वे भी सुखी हैं और मैं भी सुखी हूं । कैसा करिश्मा है ! अलफांसो साहब सुधरे भी तो किसकी सोहबत में आकर ! एक खूनी, एक डकैत, एक इश्तिहारी मुजरिम की सोहबत में आकर । उनसे क्या छुपा होगा कि जिस आदमी ने सारी बम्बई को ढक्कन ठोका हुआ है, वह उनकी नाइट क्लब का भूतपूर्व कैशियर कैलाश मल्होत्रा है ।”
“अलबर्टो कैसा है ?”
“वो भी ठीक है । बहुत याद आते हैं तुम्हें अपने पुराने यार-दोस्त ?”
“यार-दोस्त ही नहीं । कद्रदान । मेहरबान ।”
“आजकल तुम किस नाम से जाने जाते हो ? कैलाश के ही नाम से या...”
“आप मुझे विमल कहकर पुकार सकते हैं ।”
“विमल ? हूं । तो मतलब की बात पर आयें, विमल ?”
“मतलब की बात कौन-सी हुई ?”
“लिटल ब्लैक बुक की बात ।”
“आई सी ।”
“कहां है डायरी ?”
“डायरी !” - विमल ने बगल में बैठे मारियो की तरफ संकेत किया - “इसके पास है ।”
“वह डायरी नकली है । असली डायरी कहां है ?”
विमल हंसा ।
“हंस क्यों रहे हो ?” - एल्बुकर्क सकपाया ।
“बड़े आशावादी आदमी हैं आप !” - विमल बोला - “जो समझते हैं कि आप पूछेंगे, डायरी कहां है और मैं बता दूंगा, डायरी कहां है ।”
“तो कैसे बताओगे ?”
“कैसे भी नहीं ।”
एल्बुकर्क खामोश हो गया ।
“बॉस !” - मारियो बोला - “इससे यह भी पूछिए कि जिमी और बाबू कहां गायब हो गए हैं ।”
“हां ।” - विमल बोला - “इस सवाल का जवाब तो मैं तुम्हारे बॉस के पूछे बिना ही दे सकता हूं ।”
“कहां गए वो दोनों ?”
विमल ने मेटाडोर की छत की तरफ उंगली उठा दी ।
“मर गए ?” - मारियो ने पूछा ।
“हां ।”
“तुम लोगों ने मार डाला उन्हें ?”
“और क्या करते ? वे डायरी जबरन हथियाने की फिराक में थे और यह समझने को तैयार नहीं थे कि यह जबरदस्ती होने वाला काम नहीं था ।”
“बरखुरदार” - एल्बुकर्क बोला - “इतना तो कबूल करता हूं कि डायरी तुमसे जबरदस्ती नहीं हथियायी जा सकती । क्यों जबरदस्ती नहीं हथियाई जा सकती, यह मुझे नहीं मालूम, लेकिन है यह हकीकत । अगर ऐसा मुमकिन होता तो बखिया कब का डायरी वापिस हासिल कर चुका होता । अगर ऐसा मुमकिन होता तो ‘कम्पनी’ का मौजूदा सिपहसालार मैक्सवैल परेरा तुमसे मिलने बम्बई से बाहर आगरा रोड पर न गया होता । और फिर हर किसी की जानकारी में होटल सी व्यू में तुम यूं सरेआम आते-जाते हो जैसे तुम ‘कम्पनी’ के दुश्मन नहीं, बखिया के दामाद हो । नहीं दोस्त, डायरी जबरन नहीं हथियायी जा सकती तुमसे, इसलिए मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करूंगा ।”
“पहले से काफी समझदार हो गए हैं आप !” - विमल प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “ऐसी समझदारी गोवा की गैंगवार के दौरान तो आपमें नहीं दिखाई दिया करती थी ।”
“आज तुम आगरा रोड पर परेरा को डायरी सौंपने वाले थे ?”
“हां ।”
“लेकिन नकली ?”
“नहीं ।”
“तो फिर नकली डायरी कहां से टपकी ?”
“वहां से टपकी जहां से असली टपकनी थी । नकली डायरी मैंने अपने पास सिर्फ यह तसल्ली करने के लिए रखी हुई थी कि परेरा मुझे धोखा देने का तो इरादा नहीं रखता था ?”
“उसका ऐसा कोई इरादा था ?”
“नहीं था । और मैं उसे असली डायरी देने ही वाला था कि आंधी-तूफान को तरह यह” - उसने मारियो की तरफ इशारा किया - “वहां पुहंच गया था और नकली डायरी झपटकर वहां से कूच कर गया था ।”
“ओह ! यानी कि हमने जरा सब्र किया होता तो असली डायरी हाथ में आती ?”
“हां ।”
“अब असली डायरी कहां है ?”
“एल्बुकर्क साहब !”
“हां ।”
“आपके कोट का कपड़ा बहुत शानदार है । इम्पोर्टेड है ?”
“साला मसखरी मार रहा है ।” - मारियो भड़ककर बोला - “बॉस मेरी समझ में नहीं आता कि क्यों इससे जबरन नहीं कुबुलाया जा सकता कि असली डायरी कहां है ! यह हमारे कब्जे में है तो...”
“मारियो !” - विमल बड़े प्यार से बोला - “मेरे बच्चे ! यह बड़े लोगों की बाते हैं । तेरी समझ में नहीं आ सकती ।”
“मैं दस मिनट में तेरे से कुबुलवा सकता हूं कि असली डायरी कहां है ।”
“मुझे क्या समझता है ? यह बात अपने बाप को समझा और पूछ इससे कि यह तुझे दस मिनट का वक्त क्यों नहीं देता ?”
“अबे, साले ! मैं तेरी...”
“मारियो !” - एल्बुकर्क तीखे स्वर में बोला !
मारियो ने उसकी तरफ देखा ।
एल्बुकर्क ने गोवानी में उसे कुछ कहा ।
मारियो तुरंत शांत हो गया ।
“कैलाश !” - एल्बुकर्क बोला - “आई मीन विमल !”
“हां ।”
“इधर मेरी तरफ देखो ।”
“बोलो ।”
“परेरा को डायरी तुम किस चीज के बदले में सौंपने वाले थे ?”
विमल खामोश रहा ।
“फोकट में तो डायरी तुम उसे सौंपने वाले होगे नहीं । तुमने ऐसा करना होता तो तुम उसे होटल सी व्यू में ही फेंककर आ सकते थे । परेरा से जैसे तुमने आगरा रोड पर मुलाकात फिक्स की थी, उसी से लगता है कि डायरी के बदले में तुम्हें परेरा से कुछ हासिल होने वाला था । क्या हासिल होने वाला था, बरखुरदार ?”
विमल सोचने लगा ।
एल्बुकर्क की बातों से साफ जाहिर हो रहा था कि उन्हें परेरा की कार में नीलम की मौजूदगी की खबर नहीं थी । जरूर उन्हें नीलम के अस्तित्व की भी खबर नहीं थी । खबर अखबार में छपी होने की वजह से अगर उन्हें नीलम के अस्तित्व की खबर थी तो उसकी अहमियत की खबर नहीं थी । होती तो उन्हें यह भी सोचना सूझता कि विमल रेलवे स्टेशन पर क्यों आया था ।
“बीस लाख रुपया ।” - प्रत्यक्षत: वह बोला ।
“डायरी के बदले में तुम्हें परेरा से बीस लाख रुपया हासिल होने वाला था ?”
“हां ।”
“तुम डयरी को पैसा हासिल करने का जरिया बनाना चाहते हो ?”
“और क्या मैंने उसे शहद लगाकर चाटना है ?”
“गुड ! आई लाइक इट ।”
“क्या लाइक किया आपने ?”
“तुम्हारा बिजनैसमैन वाला रवैया । आदमी को ऐसा ही प्रैक्टिकल होना चाहिए । तुम्हारे पास एक चीज है जिसे तुम किसी को अच्छे दामों पर बेचना चाहते हो ।”
“हां ।”
“अगर तुम्हें और अच्छे दाम मिलें तो ?”
“तो इससे ज्यादा खुशी की बात और क्या हो सकती है ?”
“मैं तुम्हें इक्कीस देता हूं ।”
“वह तो कोई खास फर्क न हुआ ।”
“बाइस ।”
“तीस ।”
“पच्चीस ।”
“चलेगा ।”
“डन । लेकिन मैं पहले डायरी को परखूंगा । मैं नहीं चाहता कि पच्चीस लाख रुपया खर्च कर भी मेरे हाथ में नकली डायरी ही आए । पहले मेरी तसल्ली होनी चाहिए कि मेरी रकम के बदले में मुझे खरा माल हासिल हुआ है ।”
“एल्बुकर्क साहब !” - विमल हंसता हुआ बोला - “अगर मैंने परखने के लिए डायरी आपको सौंप दी तो फिर आपके लिए उसकी कीमत अदा करना जरूरी नहीं रह जाएगा ।”
“तो फिर इस खरीद-फरोख्त का हमें कोई ऐसा इंतजाम करना पड़ेगा जिसमें दोनों की तसल्ली हो और दोनों तरफ से ही किसी धोखाधड़ी की गुंजायश न हो ।”
“मतलब ?”
“मतलब कि हम मुलाकात के लिए कोई जगह मुकर्रर कर लेते हैं । वहां तुम डायरी लेकर आ जाना, मैं रोकड़ा लेकर आ जाऊंगा । तुम रोकड़े की बाबत तसल्ली कर लेना, मैं डायरी की बाबत तसल्ली कर लूंगा । जब दोनों की तसल्ली हो जाए तो तुम अपनी राह लगना, मैं अपनी राह लगूंगा ।”
“और मुलाकात की जगह को पहले से आपके दर्जन आदमी घेरकर बैठे होंगे जो मेरे डायरी लेकर वहां पहुंचते ही या रोकड़ा लेकर वहां से कूच करते ही मुझे दबोच लेंगे ।”
“ऐसा नहीं होगा ।”
“क्या गारंटी है ।”
“मुलाकात की जगह तुम चुनना । यही गारंटी है । मुझे वक्त के वक्त बताना कि रोकड़ा मैंने कहां पहुंचाना है । वहां अगर मैं तुम्हें अकेला आता न दिखाई दूं तो बेशक मुझसे न मिलना ।”
“ओह !”
“वैसे तो शक तुम मुझ पर कर रहे हो, वह मैं भी तुम पर कर सकता हूं । तुम तो अपने आदमी वहां जमा कर सकते हो और मुझे डायरी दिए बिना मुझसे रोकड़ा छीनने की कोशिश कर सकते हो ?”
“मैं ऐसा नहीं करूंगा ।”
“क्या गारंटी है ?”
“मेरी नीयत मेरी गारंटी है और मारियो उसका गवाह है ।”
“मतलब ?”
“इसने आगरा रोड के पुल पर मुझे देखा था । इससे पूछो, क्या मैं वहां अकेला नहीं था ?”
“हूं ।”
“अगर मैंने परेरा से रोकड़ा छीनने का सामान नहीं किया था तो आपके साथ भी...”
“ओके ! ओके ! मुझे तुम पर एतबार है । तुम भी मुझ पर एतबार करो । अब बोलो, कब मुलाकात होती है ?”
“यह मैं कल बताऊंगा ।”
“मंजूर । मारियो तुम्हें एक टेलीफोन नंबर देता है । जब मुलाकात का जगह और वक्त निर्धारित कर लो, उस पर खबर कर देना ।” 
“ठीक है ।”
मारियो ने एक कागज पर एक नम्बर घसीटा और कागज उसे थमा दिया ।
“अब एक आखिरी बात और ।” - एल्बुकर्क बोला ।
“वह भी बोलिए ।”
“स्टेशन पर कुली की वर्दी में तुम क्या कर रहे थे ?”
विमल ने एक गहरी सांस ली । तो आखिरकार एल्बुकर्क को वह सवाल पूछना सूझ ही गया था ?
“पहले यब बताओ ।” - वह बोला - “कि तुम्हें स्टेशन पर मेरी मौजूदगी की खबर कैसे लगी ?”
“हमारा एक आदमी स्टेशन पर तैनात था । उसने हमें खबर की थी ।”
“आई सी ।”
“दरअसल यह मालूम होते ही कि डायरी नकली थी, हमें तुम्हारी तलाश हो गई थी । ‘मराठा’ समेत हम जिन कोई जगहों की निगरानी करवा रहे थे, उनमें स्टेशन भी एक था ।”
“ओह !”
“तुम किस फिराक में थे ?”
“मैं कुली की वर्दी की ओट में बम्बई से फूट जाने की फिराक में था । यह शहर आब मेरे लिए बहुत खतरनाक जो हो गया था । डायरी के लिए रोकड़ा लेकर कहीं भी आने के लिए मैं बखिया को मजबूर कर सकता था इसलिए बम्बई में टिका रहना अब मुझे बेकार और खामखाह का खतरा उठाने का काम लग रहा था । कुली बनकर पुलिस या बखिया के आदमियों की निगाहों में आए बिना मैं प्लेटफॉर्म पर पहुंच भी गया था, ऐन वक्त पर दिल्ली की गाड़ी में सवार हो गया था लेकिन साले गाड़ी के कंडक्टर ने मुझे कुली ही समझा और जबरदस्ती गाड़ी से उतार दिया ।”
“ओह !”
“तुम्हारे आदमी ने मुझे स्टेशन में दाखिल में दाखिल होते वक्त देखा था या बाहर निकलते वक्त ?”
“बाहर निकलते वक्त ।”
इसीलिए उन्हें नीलम की खबर नहीं थी - विमल ने मन-ही-मन सोचा ।
“अब एक काम मेरा भी करवाइए ।” - प्रत्यक्षत: वह बोला ।
“क्या ?”
“स्टेशन की पार्किग में मेरी कार खड़ी है । वह मुझे स्टेशन से परे कहीं मंगवाकर दीजिए ।”
“तुम्हारे ख्याल से तुम्हारी कार की निगरानी हो रही हो सकती है ?”
“जरूरी तो नहीं लेकिन मुमकिन तो है ।”
“मारियो को कार का नंबर वगैरह बताओ ।”
विमल ने बताया ।
“वापिस स्टेशन चलो !” - एल्बुकर्क मारियो से बोलो ।
मारियो ने सहमति में सिर हिलाया ।
मारियो ने स्टेशन से बहुत परे जब उसे कार लाकर सौंपी तो कार बुरी तरह उधड़ी हुई थी । उसकी गद्दियां और सइड की रेक्सीन तक फाड़कर देखा गया था कि डायरी भीतर कहीं छुपी हुई तो नहीं थी ।
विमल ने कहर-भरी निगाहों से मारियो की तरफ देखा ।
मारियो पूरी बेशर्मी से हंसा ।
“पच्चीस लाख रुपये में” - वह बोला - “पच्चीस हजार बार कार की मरम्मत हो सकती है और ऐसी पचास कारें खरीदी जा सकती है ।”
विमल की जान में जान आई ।
मारियो द्वारा अभी भी पच्चीस लाख रुपये का हवाला दिया जाना साबित करता था कि डायरी उसके हाथ नहीं लगी थी ।
फिर भी उनसे जुदा होने के बाद पहला सुरक्षित मौका हाथ में आते ही उसने तसल्ली कर ली कि डायरी मारियो के हाथ नहीं लगी थी । डायरी बैटरी के नीचे सुरक्षित मौजूद थी ।
“बॉस !” - मारियो बोला - “आप सोहल पर दबाव डालले के हक में क्यों नहीं ?”
“दबाव नहीं चल सकता ।” - एल्बुकर्क बोला ।
“क्यों नहीं चल सकता ?”
“वजह मुझे नहीं मालूम लेकिन दबाव नहीं चल सकता । चल सकता होता तो बखिया से बेहतर ऐसे कामों को कौन अंजाम दे सकता है ? दबाव चल सकता होता तो वह सोहल की हर बात मानता दिखाई देता ?”
“लेकिन...”
“और जब सीधी उंगलियों से घी निकल रहा है तो उन्हें टेढी करने का क्या फायदा ?”
“बॉस, सीधी उंगलियां पच्चीस लाख रुपये भी तो खर्चवा रही हैं ।”
एल्बुकर्क हंसा ।
“मारियो !” - वह बोला - “एक बार डायरी हाथ में आने दे । फिर देखना हमारा रोकड़ा वापिस हमारे पास होगा और यह सोहल का बच्चा ऊपर खुदा के घर के जिमी और बाबू के पास पहुंचा हुआ होगा ।”
“ऐसा ?”
“हां । ऐसा !”
“फिर ठीक है ।”
“अभी सोहल के पीछे तुमने कोई होशियार बंदा लगाया है न ?”
“बहुत होशियार बंदा लगाया है । फर्नांडो को लगाया है ।” 
“वैरी गुड !”
***
विमल मैरीन ड्राइव पहुंचा ।
वहां जोजो और इकबालसिंह की बीवी के प्रेम घरौंदे की निगारनी के लिए जो आदमी तैनात था, उसे विमल पहचानता था । उसका नाम इरफान था और तुकाराम ने उसे उसके सामने मैरीन ड्राइव के उस फ्लैट की निगरानी का काम सौंपा था ।
उसने इरफान को तलाश किया ।
“कोई खबर ?” - उसने पूछा ।
“कोई खबर नहीं, बाप ।” - इरफान जम्हाई लेता हुआ बोला - “फ्लैट के इर्द-गिर्द पंछी ने भी पर नहीं मारा । शुक्रवार शाम से ही खाली पड़ा है ।”
“ऐसे कैसे काम बनेगा ?” - विमल बड़बड़ाया - “ऐसे तो हो सकता है, यहां कोई हफ्ता न रखे, दो हफ्ते कदम न रखे ।”
“अपुन भी यही सोचेला है, बाप ।”
विमल कुछ क्षण सोचता रहा । फिर उसने मन-ही-मन एक फैसला किया ।
“आसपास टेलीफोन है कहीं ?” - वह बोला ।
“बाजू में पेट्रोल पम्प है, वहां पब्लिक टेलीफोन है ।”
“मैं फोन करके आता हूं ।”
“बरोबर ।”
विमल पेट्रोल पम्प पर पहुंचा और वहां एक कोने में बने पब्लिक टेलीफोन में दाखिल हो गया ।
उसने इकबालसिंह के खार स्थिात बंगले का नंबर डायल किया । कुछ क्षण बाद दूसरी ओर से किसी ने रिसीवर उठाया ।
“हल्लो !” - एक मधुर स्त्री-स्वर विमल के कान में पड़ा ।
“कौन ?” - विमल सावधान स्वर में बोला ।
“आपको किससे बात करनी है ?”
“बाई, अपुन होटल से बोल रहा है । अपुन को बॉस की मिसेज से बात करने का है ।”
“बोलो, क्या कहना है ? मैं मिसेज इकबालसिंह बोल रही हूं ।”
“बाई, बॉस ने बोलने को बोला है कि वो रात घर नहीं आने का है ।”
“यह तो साहब भी फोन पर बोल चुके हैं ।”
“अच्छा ! कब ?”
“आधा घंटा हो गया है ।”
“बाई !” - विमल गिड़गिड़ाया - “थोड़ी देर कू वास्ते फोन करने की बात अपुन के भेजे से निकल गई । बाई, बॉस को मत बोलना कि अपुन आधा घंटा लेट फोन किया । बोल देना का पीछू-पीछू ही फोन आ गया था, नहीं तो अपुन का नौकरी खलास और अपुन...” 
“अच्छा ! अच्छा !”
“थैंक्यू ! थैंक्यू बाई !”
विमल ने संबंधविच्छेद कर दिया ।
यह उसके लिए बड़ी अच्छी खबर थी कि इकबालसिंह पहले ही बीवी को बोल चुका था कि वह रात को घर नहीं आने वाला था । अब उसकी योजना ज्यादा विश्वसनीय ढंग से कार्यान्वित हो सकती थी ।
उस कॉल से एक यह भी फायदा हुआ‍ था कि वह इकबालसिंह की बीवी की आवाज पहचान गया था ।
कुछ मिनट बाद उसने फिर उसी नंबर पर रिंग किया ।
इस बार जवाब मिलने तक उसने जेब से रूमाल निकालकर माउथपीस पर लपेट लिया ।
फोन इस बार भी इकबालसिंह की बीवी ने ही उठाया ।
“लवी ?” - विमल फुसफुसाता-सा बोला ।
“हां !” - तुरंत उत्तर मिला - “जोजो ?”
“फोन पर नाम मत लो ।”
“सॉरी !”
“आने का है ।”
“इस वक्त ?”
“हां !”
“लेकिन...”
“तुम्हारा साहब रात को घर नहीं आने वाला ।”
“वह तो मुझे मालूम है लेकिन...”
“आ जाओ । प्लीज ! जल्दी चली जाना ।”
“अच्छा आती हूं ।”
“आधे घंटे में पहुंच जाना ।”
“अच्छा । लेकिन सुनो ।”
“बोलो ।”
“तुम्हारी आवाज को क्या हो गया है ?”
“हो गया है कुछ । आकर देख लेना । आधे घंटे बाद ।”
“लेकिन...”
विमल ने जान-बूझकर लाइन काट दी ।
ठीक आधे घंटे बाद इमारत के सामने एक सफेद रंग की वोल्क्स वैगन कार आकर रुकी । कार की ड्राइविंग सीट पर एक अनिंद्य सुंदरी बैठी थी । उसने कार को इमारत के कंपाउंड के भीतर ले जाने के स्थान पर उसे फुटपाथ पर चढाकर खड़ा कर दिया और बाहर निकली ।
मुहम्मद सुलेमान से सुने उसके हुलिए की बिना पर विमल ने उसे फौरन पहचान लिया ।
वह इकबालसिंह की बीवी थी । 
वह इतनी सुंदर थी कि अगर उसे पहले से न मालूम होता कि वह कौन थी तो वह जरूर उसे कोई फिल्म स्टार समझ बैठता ।
वह इमारत में दाखिल हुई और रात के उस समय बिना अटैण्डर के चलने वाली लिफ्ट में सवार हो गई ।
लिफ्ट का जगला बन्द होने से पहले ही विमल लिफ्ट में दाखिल हो गया ।
लवलीन की तरफ मुंह करके वह निरर्थक-सी हंसी हंसा ।
लवलीन के चेहरे पर कोई भाव न आया ।
लिफ्ट ऊपर की उठने लगी ।
“तुम्हें मैंने फोन किया था ।” - विमल बंद जंगले को निहारता हुआ बोला ।
वह चौंकी ।
“तुम मुझे जानते हो ?” - वह बोली ।
“नहीं ।” - विमल बोला - “मैं इस बंद जंगले से मुखातिब था, इकबालसिंह की बीवी से नहीं ।”
वह फिर चौंकी ।
“तुम मुझे जानते हो ?” - वह बोली ।
तब उसने लवलीन की तरफ गरदन घुमाई और सहमति में सिर हिलाया ।
“कौन हो तुम ?” - इस बार उसके स्वर में घबराहट का पुट था ।
“फ्लैट में चलकर बताता हूं ।”
“कौन-सा फ्लैट । वह फ्लैट जो तुम्हारा और जोजो का लव-नैस्ट है । अब यह भी बताऊं, कौन जोजो !”
उसके चेहरे का रंग उड़ गया ।
“तुम क्या चाहते हो ?” - अब उसकी आवाज कांप रही थी ।
“यह भी मैं फ्लैट में चलकर बताता हूं ।”
तभी लिफ्ट चौथी मंजिल पर रुकी ।
विमल ने हाथ बढाकर उसका जंगला खोला ।
“चलो ।” - विमल बोला ।
“कहां ?” - वह फंसे स्वर में बोली ।
“वहीं, जहां जाने के लिए यहां आई हो ।”
“म... मैं... मैं...”
“मिमिया भी वहीं चलकर लेना ।”
वह न हिली ।
“अब” - एकाएक विमल कर्कश स्वर में बोला - “चलती हो या घसीटकर लेकर चलूं ?”
“तुम... तुम ऐसा नहीं कर सकते ।” - इस बार तनिक दिलेरी से बोली । 
“अच्छा ! नहीं कर सकता ?”
“तुमने मेरे साथ कोई जोर-जबरदस्ती करने की कोशिश की तो मैं शोर मचा दूंगी ।”
“कोई एतराज नहीं ।” - विमल ने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली - “शुरु करो ।”
“क... क्या ?”
“शोर मचाना ।”
उसने जोर से थूक निगली ।
“शोर मचाने के लिए अगर तुम्हारा मुंह खुला तो मैं इस रिवॉल्वर की नाल तुम्हारे हलक में घुसेड़ दूंगा ।”
“तुम क्यों मेरे पीछे पड़े हो ?” - एकाएक वह रुआंसे स्वर में बोली ।
“बहुत मुनसिब सवाल है यह, लेकिन इसका जवाब भी फ्लैट मे चलकर मिलेगा ।”
वह खामोश रही ।
“मैं तुम्हें वहां जबरन भी ले जा सकता हूं ।”
“अच्छा ।” - वह मरे स्वर में बोली - “चलती हूं ।”
“दैट्स लाइक ए गुड गर्ल ।”
दोनों लिफ्ट से बाहर निकले ।
***
जोजो के फोन की घंटी बजी ।
उसने एक बार ग्यारह बजाती वाल क्लॉक की तरफ निगाह डाली और फिर रिसीवर उठाया ।
“हैलो !” - वह माउथपीस में बोला ।
“जोजो !” - दूसरी ओर से आवाज आई ।
“हां ।” - जोजो संभलकर बोला । आवाज उसने फौरन पहचान ली थी - “तुम ?”
“मैं लवी बोल रही हूं ।”
“इस वक्त ! क्या बात है ? कहां से बोल रही हो ?”
“वहां से ।”
“वहां से कहां से ?”
“जो हमारी जगह है ।”
“मे... मेरिन ड्रा...”
“हां, हां । वहीं से ।”
“इस वक्त वहां क्या कर रही हो ?”
“तुम्हारा इंतजार ।”
“क्या ?”
“उसका फोन आया था । वह रात घर नहीं आने वाला ।”
“लेकिन...”
“बातों में वक्त जाया न करो, फौरन यहां आ जाओ ।”
“लेकिन...”
“कहा न, बातों में वक्त जाया न करो । इतने-इतने दिन तुमसे मिले बिना मैं नहीं रह सकती ।”
“इतने-इतने दिन ? अभी चार दिन पहले ही तो हम मिले हैं !”
“चार दिनों में तो कयामत आ जाती है ।”
“आज तो तुम कविता कर रही हो ! मुझे यूं लग रहा है जैसे तुम किताब में से पढकर डायलॉग बोल रही हो या जैसे कोई तुम्हें प्रॉम्ट (Prompt) कर रहा है ।”
“मैं फोन बंद कर रही हूं । जल्दी आना ।”
“लेकिन - सुनो तो !”
लाइन कट गई ।
उसने असहाय भाव से गरदन हिलाई और रिसीवर को धीरे से वापिस क्रेडल पर रख दिया ।
विमल ने लवलीन के हाथ से रिसीवर लिया और उसे क्रेडल पर रख दिया ।
“शाबाश !” - वह बोला ।
“वह समझ गया था” - वह कंपित स्वर में बोली - “कि मैं किसी के कराये से फोन कर रही थी । वह कह रहा था कि कोई मुझे प्रॉम्ट कर रहा था ।”
“इसीलिए तो मैंने जल्दी से लाइन काट दी । उसे थोड़ा शक हुआ होगा लेकिन इश्क में अंधे हुए आदमी की अक्ल थोड़े शक से नहीं चेतती ।”
“अब इतना तो बता दो कि तुम कौन हो और क्या चाहते हो ?”
“तुम्हारे दोनों सवालों का जवाब मैं दूंगा लेकिन पहले तुम मेरे सवाल का जवाब दो ।”
“पूछो !”
“तुम चाहोगी कि इकबालसिंह को तुम्हारी इस करतूत की खबर लगे ?”
“हरगिज भी नहीं ।” - उसके शरीर ने जोर की झुरझुरी ली - “वह मेरा गला काट देगा । वह बहुत बुरी मौत मारेगा ।”
“और जोजो का क्या करेगा वो ?”
“उसे भी जिन्दा नहीं छोड़ेगा वो ।”
“तुम जोजो के साथ मरना पसंद करोगी या जिंदा रहकर यह चाहोगी कि तुम्हारी और जोजो की आशनाई की खबर इकबालसिंह को कभी न हो ?”
“मैं मरना नहीं चाहती ।”
“एग्जैक्टली । आखिर आशिक और आशिकी के आगे दुनिया खत्म तो नहीं । तभी तो किसी ने कहा है कि जान है तो जहान है । जिंदा रहोगी तो जोजो जैसे कई मिल जाएंगे । मर गई तो सब कुछ खत्म । यह तौबशिकन हुस्न ! ये दिलफरेब अदाएं ! यह काफिर जवानी ! ये आसमान छू लेने को आमादा उमंगें ! सब खतम !”
“मैं मरना नहीं चाहती ।” - उसने फिर दोहराया ।
“इसीलिए कहता हूं कि किसी तरह से जोजो की मौत का गम झेल लेना । वक्त बड़-बड़े गम भुला देता है ।”
“तुम... तुम जोजो का कत्ल करना चाहते हो ?”
“हां ।”
“क्यों ?”
“वजह समझाने का न मेरे पास वक्त है और न सब्र ।”
“उसने तुम्हारा कोई नुकसान किया है ?”
“हां ! ऐसा नुकसान किया है कि जिसकी भरपाई उसकी जान से भी नहीं हो सकती ।”
“फिर क्यों लेना चाहते हो उसकी जान ?”
“ताकि मेरे कलेजे को ठंडक पड़ सके ताकि मैं अपने-आपको तसल्ली दे सकूं कि मैंने जालिम का जुल्म सहकर उसके हाथ मजबूत नहीं किए ।”
“तुम कौन हो ?”
विमल ने बताया ।
जोजो के लिए वह बड़ी दुविधा की घड़ी थी । उस वक्त उसे मेरीन ड्राइव जाना भी गवारा नहीं था और न जाना भी गवारा नहीं था । बखिया की उसे खास हिदायत थी कि वह बॉडीगार्डो के बिना कहीं न जाए और जहां उसने जाना था, वहां वह किसी के साथ जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता था ।
लवलीन का फोन भी उसे उलझन में डाल रहा था । ऐसा तो नहीं था कि लवनीन ने कभी अपनी तरफ से फोन उसके साथ मुलाकात का प्रोग्राम न फिक्स किया हो लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था कि उसकी टेलीफोन कॉल उसे अल्टीमेटम जैसी लगी हो और उसने पहले ही मेरीन ड्राइव पहुंचकर वहीं से फोन किया हो ।
वहां पहले पहुंचने का क्या तुक थी ?
यह भी तो हसे सकता था कि वह उसे फोन पर न मिलता ।
फिर तो खार से मेरिन ड्राइव तक और मेरिन ड्राइव से खार तक खामखाह की परेड़ ही होती ।
उसे शक होने लगा कि शायद उसने ठीक से नहीं सुना था कि वह मेरिन ड्राइव से बोल रही थी ।
ऐसा कैसे हो सकता था ?
उसने मेरिन ड्राइव फोन करने का फैसला किया ।
घंटी बजनी शुरू होने के काफी देर बाद फोन उठाया गया ।
“हल्लो !”
“लवी !” - वह सावधानी से बोला ।
“अरे !” - आवाज आई - “तुम अभी वहीं हो ? चले नहीं अभी तक वहां से ?”
“लवी, देखो तुम...”
“मैं क्या देखूं ? तुम देखो । मैं यहां तड़प रही हूं और तुम अभी फोन पर ही वक्त जाया कर रहे हो । कैसे मर्द हो तुम ?”
“अच्छा, अच्छा । आ रहा हूं ।”
“फौरन !”
“हां ! फौरन ।”
“शुक्रिया !”
“लेकिन फिर भी एक बार फिर सोच लो कि...”
लाइन कट गई ।
***
एक विशाल इम्पाला कार होटल सी व्यू की मारकी से निकलकर सड़क पर आई ।
उस कार में पांच आदमी मौजूद थे । उनमें से एक इकबालसिंह था और चार सशस्त्र बॉडीगार्ड थे । एक बॉडीगार्ड गाड़ी ड्राइव कर रहा था, दूसरा उसकी बगल में बैठा था और बाकी दो के बीच पिछली सीट पर सैडविच बना इकबालसिंह बैठा था ।
इतनी रात गए इकबालसिंह घर जा रहा था, अपनी खूबसूरत बीवी को फोन कर चुकने के बावजूद कि वह रात को घर नहीं लौटेगा, वह घर जा रहा था ।
बखिया जानीवॉकर ब्लैक लेबल की एक पूरी बोतल पीकर और अंजलि नामक अत्यंत दिलफरेब युवती को अपने पहलू में दबोचकर नींद के हवाले हो चुका था और इकबालसिंह जानता था कि सुबह नौ-दस बजे से पहले वह सोकर नहीं उठने वाला था । तब से बहुत पहले वह खार से वहां वापिस लौट सकता था ।
पुलिस में उनके भेदिये ने बताया था कि शांताराम के दो मृत भाइयों की लाशें तुकाराम को कल सुबह सौंपी जाने वाली थीं । यानी कि रात-भर के लिए हर कोई फारिग था ।
इसीलिए अपनी बीवी को रात घर न आने के लिए कहकर भी वह घर जा रहा था । वह घर जा रहा था अपनी बेहद खूबसूरत बीवी के आगोश में डूबकर अपनी तमाम दुश्वारियां भूल जाने के लिए ।
इकबालसिंह एक गैंडे जैसी शक्ल-सूरत और आकार वाला गढवाली था जो अपनी इंतहाई खूबसूरत बीवी से उम्र में बीस साल बड़ा था । लवलीन उससे शादी करने से पहले छोटे-मोटे रोल करने वाली एक ऐसी मामूली फिल्म अभिनेत्री थी जो कि समझती थी कि आज नहीं तो कल उसने सुपर स्टार बन ही जाना था । इकबालसिंह जब पहली बार जोगेश्वरी में सोहराबजी के यहां एक पार्टी में मिला था तो फौरन, गोली की तरह, दिलोजान से, उस पर फिदा हो गया था ।
वह लवलीन का बड़ा अहसान मानता था कि उसने उसके प्यार की कद्र की थी और उससे शादी करने के लिए हामी भरी थी जबकि हकीकत यह थी कि लवलीन उसे मोटा बकरा मानकर तभी उससे शादी की थी जबकि वह अपने फिल्म कैरियर से मायूस हो गई थी, जबकि फिल्म इंडस्ट्री के दर्जन-भर बड़े लोगों की गोद में उछाली जाती रहने के बाद भी उसे स्टार बनने का अपना सपना पूरा होता नहीं दिखाई दिया था ।
अपनी खूबसूरत बीवी को इकबालसिंह दिलोजान से चाहता था । उसका बस चलता तो वह कभी अपनी बीवी के पहलू से अलग न होता लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं था । बखिया की बम्बई में मौजूदगी के दौरान तो ऐसा कभी भी मुमकिन नहीं होता था ।
उस वक्त आधी रात के करीब उसकी बीवी का प्रबल आकर्षण उसे घर ले जा रहा था ।
तभी कार इस इमारत के करीब पहुंची जिसमें होटल के तहखाने से शुरु होने वाली खुफिया सुरंग आकर खुलती थी ।
वह इमारत भी ‘कम्पनी’ की प्रॉपर्टी थी ।
उसी क्षण उस इमारत में से एक कार निकली और तेजी से उनके आगे सड़क पर दौड़ चली ।
“बॉस !” - इम्पाला का ड्राइवर एकाएक बोला - “यह तो जोजो की कार है !”
“और” - उसकी बगल में बैठा बॉडीगार्ड बोला - “इसे जोजो ही चला रहा है ।”
“अकेला ?” - इकबालसिंह के मुंह से निकला ।
“अकेला ही मालूम होता था ।” - ड्राइवर बोला ।
इकबालसिंह सोच में पड़ गया ।
बखिया की हिदायत के बावजूद, कि वह अकेला कभी कहीं न जाए, जोजो कहां जा रहा था अकेला ?
“उसके पीछे चलो !” - उसने आदेश दिया ।
“मैं उसे रोकूं ।” - ड्राइवर बोला ।
इकबालसिंह ने तुरंत उत्तर न दिया ।
यह बात भी उसे खटक रही थी कि जोजो सिर्फ अकेला ही नहीं था बल्किल वह चोरों की तरह वहां से निकला था । होटल से कूच करने के लिए उसने लॉबी में से होकर बाहर कदम नहीं रखा था बल्कि वहां से निकासी का खुफिया रास्ता इस्तेमाल किया था जो कि केवल इमरजेंसी में ही इस्तेमाल किया जाता था । उसका दिल गवाही दे रहा था कि जोजो के यूं चोरों की तरह वहां से निकलने के पीछे कोई खास ही भेद था ।  
“नहीं ।” - अंत में वह बोला - “सिर्फ पीछा करो ।”
***
ट्रैफिक से तकरीबन खाली सड़कों पर कार चलाता हुआ जोजो मेरीन ड्राइव पहुंचा ।
वह वहां तक निर्वघ्न पहुंच गया था, इस बात ने उसका हौसला बहुत बुलंद किया था । अब वह यहां ये सोच रहा था कि लोगों ने सोहल को खामखाह का हौवा बनाया हुआ था । उसकी जो चंद कामयाबियां ‘कम्पनी’ को त्रस्त किए हुए थीं, वे जरूर इत्तफाकियां थी । उस वक्त उसकी आंखों पर वासना का पर्दा न चढा हुआ होता तो कम-से-कम उसने इस बात को जरूर अहमियत दी होती कि जिन तीन आदमियों को सोहल ने मौत की धमकी दी थी, उनमें से दो जहन्नुम रसीद हो चुके थे ।
वैसे भी शुक्रवार को होटल की बेसमेंट में सोहल ने उसे और शांतिलाल को जो मौत की धमकी दी थी, उससे वह आशंकित तो था लेकिन आतंकित नहीं था ।
सोहल आखिर खुदा तो नहीं था ।
वह कोई जादूगर तो नहीं था जो उसे मालूम होता कि जोजो किस वक्त कहां पहुंचने वाला था ।
उसके इकबालसिंह की बीवी के अफेयर की और उनके मेरिन ड्राइव वाले लव-नैस्ट की जब किसी को भी खबर नहीं थी तो सोहल को भी कैसे हो सकती थी ?
अपने लव-नैस्ट वाली इमारत के सामने उसे लवलीन की सफेद वोल्क्स वैगन खड़ी दिखाई दी । लवलीन की गाड़ी देखकर ही उसकी आंखों में रंगीन डोरे तैर गए ।
अपनी कार उसने कंपाउंड के भीतर ले जाकर खड़ी की ताकि वह कार से निकलता और फौरन इमारत में दाखिल हो जाता ।
उसके मन के किसी कोने में इस बात कि आशंका जरूर सिर उठा रही थी कि उसने वहां अकेले आकर बखिया का कहना नहीं माना था । लेकिन क्या हो रहा था उसे वहां ?
इमारत तो सुनसान पड़ी थी । आस-पास भी कोई इंसान का बच्चा नहीं दिखाई दे रहा था ।
फिर भी जेब में पड़ी रिवॉल्वर को मूठ पर हाथ रखे वह बड़ी सावधानी से कार में से निकला ।
वह निर्विघ्न इमारत में दाखिल हुआ और लिफ्ट के सामने पहुंचा ।
लिफ्ट का इंडीकेटर बता रहा था कि वह चौथी मंजिल पर खड़ी थी ।
उसने कॉल बटन दबाया ।
इंडीकेटर पर से चार के अंक की बत्ती न बुझी । जरूर किसी ने चौथी मंजिल पर लिफ्ट का जंगला खुला छोड़ दिया था ।
सीढियों के रास्ते वह चौथी मंजिल पर पहुंचा ।
अपने फ्लैट के बंद दरवाजे में अपनी चाबी लगाकर उसने उसे खोला और भीतर दाखिल हुआ ।
“कहां हो ?” - उसने आवाज लगाई ।
“यहां ।” - बैडरूम से आवाज आई ।
उसने पीछे दरवाज बंद किया और आगे बढा ।
उसने बैडरूम में कदम रखा ।
लवलीन अब पहले जैसी भयभीत नहीं थी । यह मालूम हो जो के बावजूद कि विमल कौन था, वह भयभीत नहीं थी । अब तो उल्टे वह आश्वस्त थी कि न उसकी पोल खुलने वाली थी और न उसकी जान पर आ बनने वाली थी ।
जोजो की मौत का अफसोस वह अभी से मनाने लगी थी लेकिन उस अफसोस में वही भावना निहित थी जो किसी भौतिक, सांसारिक वस्तु की हानि में होती थी ।
उसकी आंखों के सामने जोजो का विशाल शरीर और कामदेव जैसा सुन्दर चेहरा घूम गया ।
क्या मर्द था ! उसने मन-ही-मन सोचा - पहाड़ की तरह गिरता था उस पर । उसके चार मन वजन के नीचे वह पिस जाती थी लेकिन फिर भी पिसी ही रहना चाहती थी ।
जोजो बहुत याद आया करेगा उसे ।
जोजो अभी मरा नहीं था लेकिन लवलीन की व्यवहारिक बुद्घि, उसका कारोबारी दिमाग, पहले ही उसका कोई विकल्प सोचने लगा था ।
ऐसी औरत थी लवलीन जिसके प्यार में अंधा हुआ जोजो वहां जान देने चला आया था ।
बैडरूम के भीतर पहला कदम रखते ही वह ठिठक गया ।
सोहल की रिवॉल्वर उसकी छाती की तरफ तनी हुई थी ।
जोजो बुरी तरह चौंका ।
सोहल सृष्टि का आखिरी आदमी था जिसकी वहां मौजूदगी की वह कल्पना कर सकता था । फिर उसकी निगाह अपने-आप ही परे बैठी लवलीन की तरफ उठ गई ।
वह उसे निगाहें चुराने लगी ।
“लवी ।” - जोजो आहत भाव से बोला - “तूने मुझे धोखा दिया ।”
“इसने मुझे मजबूर किया था ।” - वह धीरे से बोली ।
“तूने मुझे धोखा दिया ।” - उसके मुंह से फिर निकला ।
“अपने हाथ” - विमल बोला - “अपने सिर पर रख लो ।”
जोजो ने आदेश का पालन किया
“और मरने के लिए तैयार हो जाओ ।”
जोजो ने अपने खुश्क होंठों पर जुबान फेरी ।
“तुम खुशकिस्मत हो ।” - विमल बोला ।
“किस बात में ?” - वह धीरे से बोला ।
“कि मैं तुम्हें एक बड़ी आसान मौत मारने जा रहा हूं । जो हालत दुगने जीवाराम की बनाई थी, मैं तुम्हारी उससे ज्यादा बुरी हालत बनाकर तुम्हारी जान लेना चाहता था । मैं तुम्हें वैसे ही तड़पाकर मारना चाहता था जैसे जीवाराम मरा था । मैं तुम्हारा वो अंग काट लेना चाहता था जिससे तुमने नीलम के साथ बलात्कार किया था ।”
“मैंने उसकी उंगली भी नहीं छुई थी ।” - वह फंसे स्वर में बोला ।
“उंगली भी नहीं छुई थी या उंगली ही नहीं छुई थी ? हरामजादे, यूं तेरी जानबख्शी नहीं होने वाली । याद है, तेरे बाप बेरामेंट में मैंने तेरी छाती पर निशान लगाया था ?”
“हां, लेकिन...”
“अब पास कर कि गोली सही निशान पर लगी है या नहीं ?”
विमल की रिवॉल्वर ने आग उगली ।
जोजो पछाड़ खाकर बेडरूम के कालीन बिछे फर्श पर गिरा । लवलीन के मुंह से एक घुटी हुई चीख निकली । उसने तुरंत परे मुंह फेर लिया ।
विमल ने एक और फायर जोजो की छाती पर उसके दिल के ऊपर किया ।
जोजो का शरीर ऐंठने लगा ।
“मैंने... उसकी... उंग... उंगली... भी... न... नहीं... छुई... थी ।”
जोजो के मुंह से निकले वे आखिरी शब्द थे ।
लवलीन पर निगाह भी डाले बिना विमल वहां से निकल गया ।
***
इकबालसिंह ने इमारत के सामने फुटपाथ पर खड़ी अपनी बीवी की सफेद वोल्कस वैगन को यूं पहचाना जैसे वह अपनी सूरत को पहचानता था ।
इतनी रात गए लवलीन की गाड़ी वहां क्या कर रही थी ?
फिर जोजो भी वहां !
उसके जेहन में बहुत बुरे-बुरे ख्याल आने लगे ।
“मैं भीतर जा रहा हूं ।” - एकाएक वह बॉडीगार्डों से बोला - “तुम लोग यहीं रहना ।”
“लेकिन बॉस” - एक बॉडीगार्ड विरोधपूर्ण स्वर में बोला - “आपका अकेले जाना मुनासिब न होगा ।”
“सुना नहीं ?” - इकबालसिंह डपटकर बोला ।
“लेकिन...”
“मेरे लौटने तक तुम चारों में से कोई जाना कार से बाहर कदम न रखे । समझ गए ?”
सबने बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से सहमति में सिर हिलाया ।
वह अकेला इमारत में दाखिल हुआ । 
उसकी जो जिल्लत, जो हत्तक, उस इमारत में कहीं उसका इंतजार कर रही थी, उस तक वह अपने बॉडीगार्डों की सूरत में अपने साथ गवाह भला कैसे ले जा सकता था ?
लिफ्ट काम नहीं कर रही थी । कार में से जोजो को उसने सीढियों की तरफ कदम बढाते देखा था ।
वह कान लगाकर सुनने लगा ।
सीढियों पर पड़ते भारी कदमों की आवाज बहुत ऊपर से आ रही थी । जरूर जोजो कई मंजिलें चढ गया था ।
फिर आवाज आनी बंद हो गई ।
तब कहीं जाकर इकबालसिंह ने पहली सीढी पर कदम रखा ।
दबे पांव वह ऊपर चढने लगा ।
तीन मंजिल वह बिना ठिठके तय कर गया । जोजो के कदमों की आहट से इतना उसे अंदाजा था कि वह तीसरी मंजिल से आगे हीं कहीं गया था ।
तभी उसके कानों में एक के बाद एक, दो बार ठांय जैसी आवाज पड़ी ।
उस आवाज को वह बखूबी पहचानता था ।
वह गोली चलने की आवाज थी और ऊपरली मंजिल से आई थी ।
वह ऊपर को लपका । वह अभी रास्ते में ही था कि ऊपर से उसे लिफ्ट का जंगला बंद होने की आवाज आई ।
वह चौथी मंजिल पर पहुंचा तो उसने पाया कि लिफ्ट वहां नहीं थी । इंडीकेटर बता रहा था कि वह नीचे जा रही थी ।
लिफ्ट के सामने के फ्लैट का दरवाजा खुला था और भीतर रोशनी का आभास मिल रहा था ।
वहां के बाकी तीन फ्लैटों के दरवाजे बंद थे ।
प्रत्यक्षत: वहां किसी ने गोली की आवाजें नहीं सुनी थीं ।
उसने रिवॉल्वर निकालकर हाथ में ले ली और तनिक झिझकते हुए फ्लैट के खुले दरवाजे के भीतर कदम रखा ।
हॉल खाली था लेकिन दाईं ओर एक और दरवाजा खुला था । वह उस दरवाजे पर पहुंचा ।
वह एक बैडरूम का दरवाजा था जिसके फर्श पर दरवाजे के पास जोजो की लाश पड़ी थी और -
भीतर उसकी बीवी मौजूद थी ।
इकबालसिंह पर निगाह पड़ते ही लवलीन की आंखें फट पड़ीं । उसका शरीर पत्ते की तरह कांपने लगा । उसने अपने दोनों हाथ यूं अपनी छाती पर भींच लिए जैसे अपनी जगह से उखड़ आने को तत्पर कलेजे का दबाए हुए हो ।
जोजो की लाश को यूं सावधान से लांघकर, कि फर्श पर फैल रहे खून में उसके पांव न पड़ें, इकबालसिंह बैडरूम के भीतर दाखिल हुआ । 
वह अपनी बीवी के करीब पहुंचा ।
लवलीन यूं अपलक इकबालसिंह को देखने लगी जैसे बकरी कसाई को देखती है ।
इकबालसिंह कई क्षण अपनी खूबसूरत बीवी के चेहरे को निहारता रहा ।
“मैं उलझन में हूं ।” - अंत में इकबालसिंह गहरी सांस लेकर बोला - “समझ नहीं पा रहा हूं कि ‘कम्पनी’ के एक ओहदेदार के कत्ल का अफसोस मनाऊं या अपनी बेवफा बीवी के यार की मौत पर खुश होऊं ।”
लवलीन के मुंह से बोल न फूटा ।
“यह” - इकबालसिंह ने जोजो की लाश की तरफ इशारा किया - “सोहल का काम है ?”
लवलीन ने सहमति में सिर हिलाया ।
रह-रहकर उसकी निगाह अपने पति के चेहरे से हटकर उसके हाथ में थमी रिवॉल्वर की तरफ उठ जाती थीं ।
“वैसे तुम्हें मालूम है न कि मैं तुमसे बहुत मुहब्बत करता हूं ? किसी जोजो या ऐसे ही किसी और शख्स से कहीं ज्यादा ? दिलोजान से चाहता हूं मैं तुम्हें ?”
लवलीन ने जोर से थूक निगली । उसकी आंखें अभी भी फटी पड़ रही थीं ।
इकबालसिंह ने रिवॉल्वर जेब में रख ली और उसकी तरफ हाथ बढाया ।
लवलीन ने सकपकाकर अपनी तरफ बढे हाथ की तरफ देखा ।
“आओ !” - वह बोला ।
“क... कहां ?” - लवलीन के मुंह से निकला ।
“घर । और कहां ? एक पत्नी की जगह उसके पति के घर में ही होती है । मैंने सोचा था तुम्हें मालूम होगा । आखिर मुझसे ज्यादा पढी-लिखी हो ।”
लवलीन ने उसका हाथ न थामा लेकिन वह उठकर खड़ी हो गई ।
“मुझे”- वह कंपित स्वर में बोली - “म... माफ कर दो ।”
“वो तो मैंने कर ही दिया है ।” - इकबालसिंह के होंठों पर एक विषादपूर्ण हंसी आई - “वरना तुम भी अपने यार की बगल में भरी न पड़ी होतीं ?”
लवलीन के शरीर ने जोर से झुरझुरी ली ।
“जोजो सुंदरता में कामदेव का अवतार माना जाता था लेकिन इस वक्त इसकी सूरत पर निगाह डालने से उबकाई आती है । कैसा वीभत्स बना दिया है मौत ने इसके चेहरे को ! खूबसूरती में तुम भी रति से कम नहीं । यह सोचकर मेरी रूह कांपती है कि मर जाने पर तुम भी ऐसे लगोगी । इसीलिए तुम जिंदा हो और मेरे साथ घर चल रही हो - यूं घर चल रही हो जैसे कुछ हुआ ही न हो । आओ ।”
यंत्रचालित-सी लवलीन उसके साथ हो ली ।
अपने उस प्रेम घरौंदे में जिस मर्द के पहलू में लेटकर उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती मालूम होती थी, वहां से निकलते समय उसने एक बार उसकी तरफ झांककर भी न देखा ।
ग्राउंउ फ्लोर पर लिफ्ट के पहुंचने के बाद विमल ने अभी जंगले की तरफ हाथ ही बढाया था कि जंगला एकाएक बाहर की तरफ से खुला ।
वह हड़बड़ाकर एक कदम पीछे हट गया । उसका हाथ अपने आप ही रिवॉल्वर की मूठ पर जाकर पड़ा ।
लेकिन भीतर दाखिल होने वाला शख्स इरफान था । उसने जंगला बंद किया और पहली मंजिल का बटन दबाया ।
“बाहर कम्पनी के चार प्यादे मौजूद हैं” - उसने बिना पूछे ही बताया - “और इकबालसिंह अभी ऊपर गया है ।”
“क्या ?” - विमल चौंका - “वो यहां कैसे पहुंच गया ?”
“यह अपुन को नहीं पता लेकिन इस वक्त अगर तुमने बाहर कदम रखा होता तो बहुत बुरा होता ।”
लिफ्ट पहली मंजिल पर रुकी ।
“यहां किसलिए ?” - विमल ने पूछा ।
“पिछवाड़े का दरवाजा मजबूती से बंद है, वह नहीं खुलने का । लेकिन पिछवाड़े की किसी खिड़की से नीचे प्रोजेक्शन पर उतरा जा सकता है और वहां से पिछवाड़े की गली में छलांग लगाई जा सकती है।”
“गुड !”
सुनसान इमारत में दोनों दबे पांव पिछवाड़े की तरफ बढने लगे ।