वानखेड़े सीधा पुलिस हैडक्वार्टर पहुंचा। शाहिद खान से मिला। वो ऑफिस में व्यस्त था। उसे देखते ही, वो डकैती के सिलसिले में पुलिस की भागदौड़ की रिपोर्ट देने लगा।

वानखेड़े ने सब सुना। उसके बाद शाहिद खान ने पूछा।

“तुम तो रूपा ईरानो से मिलने गये थे, मिली वो।”

“हाँ।” वानखेड़े ने सिग्रेट सुलगाई- “रूपा ईरानी भीमिली। जगमोहन भी मिला।”

“जगमोहन?” शाहिद खान चौंका- “वो रूपा ईरानी के पास था?”

वानखेड़े ने सब कुछ बताया।

शाहिद खान खामोशी से उसके शब्दों को सुनता रहा।

“गलती की-रूपा ईरानी को गिरफ्तार करके लाना चाहिये था।” उसके खामोश होते ही शाहिद खान तेज स्वर में बोला।

“क्या फायदा?”

“वो डकैती की अपराधी है। उसकी वजह से ही डकैती हो सकी। अगर वो रिवॉल्वरें वहां न पहुंचाती तो डकैती हो पाना सम्भव नहीं था।” शाहिद खान का स्वर सख्त हो गया।

“मैंने पूछा है कि उसे गिरफ्तार करने का फायदा क्या होता?” वानखेड़े बोला।

“फायदा क्या होता है। हमारा काम है अपराधियों को गिरफ्तार...”

“उसे गिरफ्तार करने से वो लोग सतर्क हो सकते हैं जिन्होंने डकैती की।” वानखेड़े ने कहा।

“वो कैसे?”

“अगर उसी ने देवराज चौहान से गद्दारी की है। उसके इशारे पर ही करने वालों ने डकैती की है तो रूपा ईरानी के गिरफ्तार होते ही वो सतर्क हो जायेंगे। कानून की पहुंच से दूर होने भी की चेष्टा कर सकते हैं।” वानखेड़े ने एक-एक शब्द चबाकर कहा- “इस वक्त हमारा एक-एक पल कीमती है। रूपा ईरानी को गिरफ्तार करके उसमें उलझ जायेंगे तो तीस अरब के जेवरात और डकैती करने वालों को निकल जाने का रास्ता मिल जायेगा। क्योंकि हमारा ध्यान उन पर से हट चुका होगा।”

“लेकिन इस बात की क्या गारण्टी है कि रूपा ईरानी ने जो कहा है सच कहा है?”

“उसकी बातों में सच्चाई है।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “हमें इस बात का शक उस पर करना चाहिये कि वो अभी भी हमसे कुछ छिपा रही है। पूरी बात नहीं बताई।”

“तो?”

“तो उस पर नजर रखने का इन्तजाम करो। सादे कपड़ों में उस पर नजर रखी जाये। उसे कुछ नहीं कहना है। सिर्फ यह देखना है कि वो कहां जाती है किस-किस से मिलती है जिससे मिलती है, एक तब उसके पीछे लग जायेगा और पूरी जानकारी हासिल करेगा। कोई उससे मिलने आता है तो उसके बारे में जानकारी इकट्ठी करनी है कि वो कहां जाता है। किधर रहता है कौन है वो।”

“हो जायेगा। अभी इन्तजाम करता हूं।”

वानखेड़े ने कश लिया।

“रूपा ईरानी का कहना है कि इस डकैती की शुरूआत रनवीर भंडारी के इशारे पर हुई। वो किसी तरह देवराज चौहान से मिला और डकैती की पेशकश उसके सामने रखी। रनवीर भंडारी, रूपा ईरानी के मुताबिक़ जाना-माना ज्वैलर्स है। लेकि  फिल्म बनाने की वजह से वो कर्जे में डूब गया। बाजार का उसने पचास करोड़ रुपया देना है जो कि उसके बस का नहीं। न दिया तो बरबाद हो जायेगा। इसी कारण उसने डकैती की सोची।”

वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा।

शाहिद खान ने उसे देखते हुए सिर हिलाया।

“रनवीर भंडारी नाम के ज्वैलर्स के बारे में पता करवाऊं?”

“हां। और उसके आगे-पीछे का सारा हाल पता करो कि रूपा ईरानी सच कह रही है या झूठ।”

“इस काम का भी अभी इन्तजाम करता हूं।” शाहिद खान गम्भीर था।

“प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा के बारे में पता करना है। गोदरा, रनवीर भंडारी के लिये ही काम करता है। थोड़ी-सी पूछताछ पर उसका पता मिल जायेगा।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा।

“ये नई समस्या है कि प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा और रूपा ईरानी में से ये जानना कि कौन गद्दार है अगर ये बात पुलिस को पता चल जाये तो, हम जल्दी डकैतों के पास, जेवरातों के पास पहुंच सकते हैं।”

“रूपा ईरानी हमारे सामने है। उसे हम देख रहे हैं।”

वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा देवराज चौहान के साथ होंगे। देवराज चौहान बेवकूफ तो हैं नहीं। उन्हें आसानी से नहीं छोड़ने वाला। उन दोनों को वो देख लेगा। लेकिन उसके देखने का कोई फायदा नहीं होगा। क्योंकि हम नहीं जान सकते कि वो क्या कर रहा है। जिसने उसे धोखा दिया उससे वो खुद निपटेगा। जिन लोगों ने डकैती की है, उन्हें भी वो ही देखना पसन्द करेगा। उसकी पूरी कोशिश होगी कि तीन अरब के जेवरातों तक पहुंच सके।”

“ये आसान काम नहीं है। एक तरफ हम लोग हैं। दूसरी तरफ देवराज चौहान है। बीच में तीस अरब के जेवरात और वो लोग हैं, जिन्होंने डकैती की है।” कहते-कहते शाहिद खान के चेहरे पर गम्भीर मुस्कान आ ठहरी- “उधर देवराज चौहान चाहता है कि उन लोगों तक जल्दी पहुंच जाये, इधर हम उन तक पहले पहुंचने की कोशिश में हैं। पूरे शहर में पुलिस भागदौड़ करती फिर रही है। अजीब से हालात पैदा हो चुके हैं कि...”

वानखेड़े कुछ नहीं बोला।

“अभी भी मानो। रूपा ईरानी को गिरफ्तार कर लो। उससे कोई नई बात मालूम हो सकती है।” शाहिद खान ने कहा।

“अगर डकैती में उसका हाथ है तो वो कुछ भी नहीं बतायेगी। गिरफ्तार होते ही सतर्क हो जायेगी। अनजाने में ही उससे कुछ जाना जा सकता है। उस पर नजर रखकर। अगर उसने कोई गड़बड़ की है तो।”

“तुम रूपा ईरानी को गिरफ्तार करने से पीछे क्यों हट...”

“मैं पीछे नहीं हट रहा। मैं चाहता हूं, हम जल्द से जल्द तीस अरब के जेवरातों तक पहुंचे। उन तक पहुंचे, जिन लोगों ने डकैती की है। रूपा ईरानी को गिरफ्तार करने की जरूरत है तो उसे बाद में भी गिरफ्तार किया जा सकता है। इस वक्त हमें सिर्फ असल मुद्दे पर ध्यान लगाना चाहिये। क्या फायदा होगा हमें रूपा ईरानी की गिरफ्तारी से बल्कि उस पर नजर रखकर हमें शायद ज्यादा फायदा मिले।”

“जैसा तुम ठीक समझो।”

“रूपा ईरानी देश की नामी मॉडल है। उसकी गिरफ्तारी से अलग से हंगामा खड़ा हो जायेगा। इस वक्त हमें ऐसा कोई भी काम नहीं करना है कि जिससे हमारा वक्त बरबाद हो।”

शाहिद खान ने सिर हिलाया।

“तुम रनवीर भंडारी, प्रवेश गोदरा और कमल शर्मा के अलावा, रूपा ईरानी के बारे में भी पता करो शायद रूपा ईरानी के बारे में कोई नई बात मालूम हो सके। उसके बारे में खासतौर से पता करो कि उसका कैसे लोगों में उठना-बैठना है। संदिग्ध नाम नजर आये तो उसे नोट करो।”

शाहिद खान ने पुनः सिर हिलाया फिर बोला।

“जगमोहन तुम्हारे हाथ से बच निकला है। वो क्या करेगा?”

वानखेड़े ने गम्भीर निगाहों से शाहिद खान को देखा।

“जगमोहन-देवराज चौहान सतर्क हो गये होंगे। कम से कम वो रूपा ईरानी के गिर्द आने से रहे। देवराज चौहान समझ गया होगा कि रूपा ईरानी पर हमारी नजर है और वो मेरे सामने मुंह खोल चुकी है। वो जो भी करें, रूपा ईरानी की तरफ नहीं आयेंगे। क्योंकि उधर पुलिस है।”

“मतलब कि वो अब प्रवेश गोदरा और शर्मा को अच्छी तरह चैक करेंगे कि कहीं उन्होंने धोखेबाजी तो नहीं की।”

“ठीक कहते हो। इसके साथ ही वो उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश करेंगे, जिन्होंने डकैती की है। उन तक पहुंच गये तो उनसे जानने की चेष्टा करेंगे कि इन तीनों में से कौन उनके साथ मिला हुआ है।”

“ये डकैती तो बहुत पेचीदा हो चुकी है।”

“हां। बहुत कुछ उलझा हुआ है।” वानखेड़े ने गम्भीर स्वर में कहा- “शहर में हर जगह नाकेबंदी है?”

“नाकाबंदी सख्ती से चल रही है। डाका डालने वालों का जेवरातों के साथ शहर से निकल जाना आसान नहीं।”

“मेरे ख्याल में वो शहर से निकलेंगे भी नहीं। देवराज चौहान के मामले में हाथ डाला है उन्होंने। सब्र से काम लेंगे। वो जानते होंगे कि शहर से निकलने की कोशिश में वो फंस सकते हैं।” वानखेड़े ने सोच भरे स्वर में कहा- “एक-दो दिन लगेंगे। तब शायद कोई नई बात सामने आये।”

वानखेड़े और शाहिद खान में देर तक इसी मुद्दे पर बातें होती रही।

शाहिद खान ने फोन पर ही प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा, रनवीर भंडारी और रूपा ईरानी के बारे में छानबीन करने को भरोसेमंद पुलिस वालों को कह दिया था।

☐☐☐

सोहनलाल सुबह अखबार लाया था।

“इसमें।” वो देवराज चौहान की तरफ अखबार बढ़ाता हुआ बोला- “डकैती करने वालों की तस्वीरें हैं। जगमोहन ठीक कह रहा था। वानखेड़े ने भी सच बोला था, लेकिन खबर में दिया गया है कि एक की लाश मिली थी कार में।”

देवराज चौहान ने अखबार लेकर खोली। फ्रंट पेज पर नजरें टिका दी।

जगमोहन, प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा फर्श पर ही चादर बिछाये नींद में पड़े थे। देवराज चौहान के चेहरे से लग रहा था कि उसने कम ही सही, लेकिन नींद ली है।

देवराज चौहान ने त्रिखा और राजेश गुलाटी की छपी तस्वीरें देखी। दोनों चेहरे उसके लिये नये थे।

डकैती का ब्यौरा दिया हुआ था। नीचे एक तस्वीर और थी। बारूद मैन जीवनलाल की।

देवराज चौहान ने सरसरी तौर पर तस्वीर देखी फिर नीचे के शब्द पढ़े तो आंखें सिकुड़ती चली गयी। माथे पर बल आने लगे।

सोहनलाल ने सिग्रेट सुलगा ली थी। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे।

देवराज चौहान अखबार थामें फौरन उठा और नींद में डूबे जगमोहन के पास पहुंचा।

“जगमोहन।”

“हूँ।” जगमोहन ने फौरन आंखें खोली।

“अखबार में तुम्हारे काम की खबर है।”

“क्या?” जगमोहन फौरन उठ बैठा।

देवराज चौहान ने अखबार उसे थमा दी।

“देखो। पढ़ो।” कहने के साथ ही वो वापस कुर्सी पर आ बैठा।

सोहनलाल के चेहरे पर उलझन का जाल बिछ चुका था।

“क्या बात है?” सोहनलाल ने देवराज चौहान से पूछा।

“जगमोहन बताता है।” देवराज चौहान के चेहरे पर कड़वे भाव फैल गये- “इन्तजार करो।”

सोहनलाल सतर्क नजर आने लगा। समझ गया कि बेहद खास बात है।

तभी जगमोहन की हैरानी भरी आवाज उनके कानों में पड़ी।

“य-ये कौन है, ये...जिसकी तस्वीर नीचे दी हुई है।”

सोहनलाल फौरन पास पहुंचा। नीचे वाली तस्वीर के नीचे लिखी लाईन पढ़ी फिर बोला।

“जीवनलाल है ये। डकैती के वक्त जो बारूद मैन बनकर बाहर खड़ा था। इसे पुलिस ने वक्त से पहले पकड़ लिया। रिमोट का बटन दबाकर, खुद को बारूद के साथ नहीं उड़ा सका और…”

“ये-ये वो नहीं है, जिसे हमने इस काम के लिये तैयार किया था।” जगमोहन के होंठों से निकला।

“क्या?” सोहनलाल चौंका।

“ये तो और ही कोई है।” जगमोहन ने उलझे स्वर में कहते हुए देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान के चेहरे पर अभी तक कड़वे भाव मौजूद थे।

“तुम्हारी बात सही है कि हमने जिन दो लोगों के हवाले, नकली बारूद मैन बनकर खड़े होने का काम किया था। उन दोनों में से ये नहीं है। ये कोई और है।” देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबाकर कहा।

“तो-तो वो दोनों कहां गये? ये दोनों कहां से आ गये?”

जगमोहन का चेहरा कठोर होने लगा।

खामोशी-सी छा गयी वहाँ।

“ये हमारे साथ क्या-क्या गड़बड़ हो रही है।” जगमोहन बोला- “हमारी डकैती के वक्त पर कोई और डकैती कर गया। तब तो हमने यही सोचा कि गोदरा, रूपा ईरानी या शर्मा ने गद्दारी करके हमारी खबर बाहर निकाली होगी। परन्तु हमने जिन दो व्यक्तियों को नकली बारूद मैन बनकर बाहर खड़े होने को तैयार किया था, वो कैसे बदल गये। किसी को नहीं पता कि ये दोनों काम कौन दो लोग करने वाले हैं। यहां तक कि सोहनलाल भी नहीं जानता। सिर्फ हम दोनों ही जानते हैं। ऐसे में हमारे तय किये आदमी कैसे बदले गये? किसी को कैसे पता चला कि वो हमारे लिये क्या करेंगे?”

अब समझा था सोहनलाल मामला।

जगमोहन के चेहरे के भाव देखने लायक थे।

जगमोहन की तेज आवाज सुनकर गोदरा और शर्मा भी उठ बैठे। ये और मामला समझने की चेष्टा करने लगे थे। कुछ न समझ आने पर शर्मा बोला।

“सब ठीक तो है?”

“तुम” जगमोहन, देवराज चौहान से अजीब से स्वर में कह उठा- “समझ रहे हो ना कि मैं क्या कह रहा हूं।”

“मैं पहले ही समझ गया था, जब अखबार पढ़ा, लेकिन असल बात तुम्हें ही समझ जानी चाहिये कि कोई हम पर शुरू से ही नजर रख रहा था। तब से नजर रख रहा था, जब से हमने डकैती की तैयारी शुरू की। हम पर नज़र रखते-रखते वो उन दो के बारे में भी जान गया था कि डकैती के वक्त बाहर उन्होंने नकली बारूद मैन बनकर, काम को किस तरह अंजाम देना है। उन दोनों में से किसी से ही ये बात पूछ ली होगी। उनका क्या किया, ये बाद की बात है, लेकिन हम पर नज़र रखने वाले ने मौके पर अपने बारूद मैन भेजे। हमारे वाले नहीं आये।” देवराज चौहान के होंठ सिकुड़ गये- “कहां गये हमारे वाले बारूद मैन, जिनके हवाले हमने वक्त पर पहुंचकर ड्रामा करने को कहा था कि...”

“ठीक कहते हो तुम। कोई हम पर शुरू से ही नजर रख रहा था। हमारी पूरी तैयारी से वाकिफ था। तभी तो वो ठीक मौके पर, तुम्हारे नाम पर डकैती कर गया।” जगमोहन गुर्रा उठा- “इधर हम तैयारी करते रहे। उधर हम पर नजर रखते हुए वो तैयारी करता रहा डकैती की। यहां तक कि वो ये भी जान गया था कि रूपा ईरानी रिवॉल्वरें और नकाबें होटल के उस हॉल के बाथरूम के फ्लश टैंक में रखी जा रही है।

सोहनलाल की समझ में सारा मामला आ गया था। वो भी सकते की सी हालत में रह गया था।

कुछ-कुछ प्रवेश गोदरा और शर्मा की बात को समझे।

“सच में हमारे साथ मजेदार बात हुई।” देवराज चौहान के चेहरे पर सख्त और खतरनाक मुस्कान उभरी- “शुरू से ही कोई हम पर नजर रख रहा है और हम पूरे तौर पर अंजान रहे। मौके पर उसने हमें अपनी मौजूदगी का एहसास दिला दिया। खूब-ऐसे इन्सान से तो मैं जरूर मिलना चाहूंगा। ढूंढ के रहूंगा उसे।”

“शुरू में ही किसी को कैसे मालूम हो गया कि तुम लोग डकैती की तैयारी करने जा रहे हो।” सोहनलाल बोला।

जगमोहन के दांत भिंच गये। फिर वो बोला।

“ये कमाल रनवीर भंडारी का हो सकता है।”

“किसी भी नतीजे पर पहुंचने की जल्दी मत करो। गोदरा और शर्मा भी तो शुरू से जानते थे कि हम क्या तैयारी...”

“हम पर शक मत करो।” गोदरा हड़बड़ाकर बोला।

“शक नहीं कर रहा। बात कर रहा हूं।” देवराज चौहान ने कहते हुए जगमोहन को देखा- “रनवीर भंडारी के अलावा कोई और भी हो सकता है, जो हम सबसे वाकिफ हो। मामले से वाकिफ हो, लेकिन हम उसे न जानते हों। हमने उसे देखा ही न हो। देखा हो तो, तब हमें क्या मालूम कि वो हमारी योजना को काटते हुए, अपनी योजना तैयार कर रहा है। तीस अरब के जेवरातों की डकैती, मेरे नाम पर करने की तैयारी में है।”

जगमोहन, मुंह खोले देवराज चौहान को देखता रहा।

बरबस ही सोहनलाल के होंठों पर अजीब सी मुस्कान उभर आई। इसमें कोई शक नहीं कि डकैती करने वाले ने उन्हें चोट पर चोट दी थी। खामोशी से उनकी योजना के हर अंग काटता रहा और वे बे-खबर रहे।

“ये तो नया ही मामला तैयार हो गया हमारे लिये।”

जगमोहन बोला- “तीस अरब तो गया ही गया, अब भागदौड़ में

खामखाह का खर्चा और वक्त की खराबी। मुसीबतें अलग। योजना बनाते वक्त भी काफी खर्चा हो चुका है। एक करोड़ तो गोदरा की झोली में डाल दिया। हर तरफ से नुकसान...।”

“एक करोड़ नहीं। अस्सी-चौरासी लाख था। जेवरातों की कीमत कम थी।” गोदरा जल्दी से बोला।

जगमोहन ने गोदरा के चेहरे को देखा।

“क्या हुआ?” गोदरा ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा।

“अस्सी-चौरासी लाख भी नहीं है।” जगमोहन ने मुंह बनाकर कहा।

“क्या मतलब?”

“तू जेवरातों का पारखी है। इसलिए जेवरात असली दिए थे तेरे को। पैंतीस लाख के जेवरात थे वो।”

“हां। वो असली थे। मैंने चैक किये थे, लेकिन तुम कहना क्या चाहते हो?”

“यही कि जेवरातों के अलावा नोट, नकली थे।”

“क्या?” गोदरा का मुंह खुला का खुला रह गया।

“ये तो धोखा हुआ।” कमल शर्मा के होंठों से निकला।

सोहनलाल ने तीखी नजरें से दोनों को देखा फिर गोदरा से कहा।

“और तुम लोगों ने हमारे साथ क्या किया था?”

“क्या?” गोदरा ने कहना चाहा।

“साले। तू हमें ब्लैकमेल कर रहा था। तूने पुलिस की धमकी दी कि सब जानता है, डकैती नहीं होने देगा। मुंह बंद रखने की तगड़ी सी डिमांड रखी। ये तो हमारी समझदारी रही कि तेरे को थोड़ा-बहुत देकर, तेरे को अरबों का लालच देकर साथ मिला लिया। मैं तो तेरी गर्दन काटने को तैयार था। देवराज चौहान ने रोक लिया।”

प्रवेश गोदरा के चेहरे पर हड़बड़ाहट के भाव आ ठहरे।

“सिर्फ पैंतीस लाख।” गोदरा ने कमल शर्मा को देखा- “मैं तो सोच रहा था कि आते वक्त करोड़ के करीब का माल देवी के हवाले करके आया हूं।” ये सब जानने के लिये पढ़ें अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘डकैती तेरे नाम की’।

“घर में ही रख आया है। सारा माल।” जगमोहन बोला।

“ह-हां।”

“भगवान करे, पीछे से तेरे घर पर चोर पड़ गये हों। मेरा दिल दुखा कर तूने मेरे से वो माल खींचा।”

गोदरा से कहते न बना।

कमल शर्मा ने सहानुभूति भरे ढंग से गोदरा को देखा।

“गोदरा। अभी भी तू फायदे में है। पैंतीस लाख तो है। वरना अभी तक किसी को इतना भी नहीं मिला।”

“मेरे पल्ले से तो माल गया है।” जगमोहन ने उखड़े स्वर में कहा- “मैं...”

“जगमोहन।” देवराज चौहान ने टोका।

जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।

देवराज चौहान की निगाह बारी-बारी सब पर गयी।

“मेरे पास काम ज्यादा है। कई काम है मेरे सामने। जिसमें सब की जरूरत नहीं है।” देवराज चौहान बोला- “जगमोहन ही मेरे साथ रहेगा। तुम तीनों अपनी-अपनी जगह पर चले जाओ।”

“क्या।” गोदरा के होंठों से निकला- “हम जायें?”

“हां! तुम, शर्मा और सोहनलाल तुम भी।” देवराज चौहान ने सोहनलाल को देखा।

सोहनलाल ने सहमति से सिर हिला दिया।

“तुम क्या करोगे?” कमल शर्मा बेचैन हो उठा।

“क्या तेरे को पता नहीं। सुना नहीं तूने कि हमने क्या करना है।” जगमोहन ने उसे घूरा।

“मेरा मतलब है।” शर्मा हड़बड़ाया- “हम तो तुम्हारे साथ होंगे नहीं। तुम दोनों को भागदौड़ में तीस अरब के वो सारे जेवरात मिल गये तो क्या होगा।”

“क्या होगा?” जगमोहन के दांत भिंच गये।

“हमें हिस्सा नहीं मिलेगा। तब तुम्हें हमारी याद कहां से आयेगी।” गोदरा कह उठा।

जगमोहन कहते-कहते रुक गया था कि तुम लोगों को हिस्सा देने का शुरू में ही हमारा प्रोग्राम नहीं रहा। क्योंकि हमें ब्लैकमेल करके, डकैती में हमारे साथ मिले थे। तब हमें भी एक-दो लोगों की जरूरत थी। डकैती में साथी बना लिया। परन्तु तब ही तय हो गया था कि हिस्से के नाम पर तुम लोगों को कुछ नहीं दिया जायेगा।

“याद आयेगी।” सोहनलाल ने शांत स्वर में कहा- “मैं भी तो तुम्हारी तरह इस वक्त इनका साथ छोड़ रहा है। क्योंकि जैसी भागदौड़ ये करना चाहते हैं। उसमें अभी हमारी जरूरत नहीं। जरूरत पड़ेगी तो ये हमें बुला लेगे। अगर जेवरात हाथ लग गये तो वो हमें हिस्सा भी देंगे। हम सब मेहनत कर रहे थे।”

गोदरा और कमल शर्मा क्या कहते। चुप रहने के रूप में सहमत ही रहे।

देवराज चौहान ने दोनों को देखा।

“इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े को तो तुम दोनों ही देख चुके हो। जब उसे मदनलाल की कैद में पहुंचाया था तो उसे फांसने में हम सब साथ ही थे। वो ये जान चुका है कि तुम दोनों मेरे साथ इस डकैती पर काम कर रहे थे, लेकिन डकैती कोई कर गया। मेरा कहने का मतलब ये है कि वानखेड़े तुम दोनों पर हाथ डाल सकता है।”

गोदरा और शर्मा के चेहरों पर घबराहट नज़र आने लगी।

“लेकिन वानखेड़े के पास इस बात का कोई पक्का सबूत नहीं है। ये सब उसे रूपा ईरानी से पता चला है। तुम्हें बचाने के लिये रूपा ईरानी अपनी बात से पीछे भी हट सकती है। न भी पीछे हटे, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर तुम दोनों इस बात पर अड़े रहो कि हमसे तुम्हारा कोई वास्ता नहीं। वानखेड़े कोई सबूत नहीं ढूंढ पायेगा।”

“समझ गये। वानखेड़े कुछ भी करे-कहे, हमें डरना नहीं है।” शर्मा बोला।

“ठीक समझे। अब तुम तीनों एक-एक करके यहां से निकलोगे।” देवराज चौहान ने कहा।

“ये फ्लै...” शर्मा बोला- “मेरी पहचान वाले का है। इसे बंद भी तो करना है।”

“ठीक है हम यहां से निकलते हैं। आओ जगमोहन।”

उनके देखते-ही-देखते देवराज चौहान और जगमोहन बाहर निकल गये।

सोहनलाल ने गोली वाली सिग्रेट सुलगाई।

गोदरा ने बेचैनी से कमल शर्मा से कहा।

“मुझे फौरन घर पहुंचना है।”

“क्यों?”

“इंस्पेक्टर वानखेड़े मेरे बारे में जान चुका है। वो कभी भी घर पहुंच सकता है। देवी उसे संभाल नहीं पायेगी। घर की तलाशी लेने पर वो पैंतीस लाख के जेवरात और बाकी के नकली नोटों को ढूंढ लेगा। तब तो मेरा बचना सम्भव हो ही नहीं सकेगा। वो पकड़कर मुझे सीधा जेल में डाल देगा। फिर तो बाकी बातें भी मेरे मुंह से निकलवा लेगा।”

“बात तो ठीक है तुम्हारी।” शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा।

“मैं जाता हूं। घर से जेवरात और नकली नोट हटा दूं कि...”

“मैं भी तुम्हारे साथ ही चलता हूं। मैंने यहां क्या करना है।”

कमल शर्मा, उठता हुआ बोला।

सोहनलाल भी खड़ा हो गया।

“मैं जा रहा हूँ?” वो बोला।

दोनों ने सोहनलाल को देखा।

“हमें याद रखना।” गोदरा ने कहा।

“क्यों-मैंने याद रखकर क्या करना है।”

“मेरा मतलब है कि देवराज चौहान को जेवरात मिल जाये तो हमारा हिस्सा”

“चिन्ता मत कर। फौरन खबर देने आ जाऊंगा।”

सोहनलाल ने कहा और बाहर निकल गया।

☐☐☐

प्रवेश गोदरा, कमल शर्मा के साथ अपने घर पहुंचा।

दस बारह दिनों बाद वो घर लौटा था।

दरवाजे पर बाहर से सिटकनी लगी हुई थी। ताला नहीं लगा था।

“देखा। देखा शर्मा तूने।” उखड़े स्वर में कह उठा- “देवी कितनी लापरवाह हो गयी है। घर के भीतर कीमती सामान पड़ा है और बाहर से सिटकनी लगाकर जा कहां चली गयी है। खुला पड़ा है घर।”

“आसपास ही होगी।”

“फिर भी उसे नहीं जाना चाहिये।” गोदरा ने उखड़े स्वर में कहते हुए सिटकनी खोली- “देवी को अब बहन कहने का मन नहीं करता। बहुत प्यार से पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया। लेकिन जब से लड़कियों का धंधा करने वाले विनोद खुराना से शादी करने को कहने लगी है तो तब से बोझ सी महसूस होने लगी है।”

“बहन के लिये ऐसे विचार मन में नहीं लाते।” कमल शर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा- “उसे समझाता रह। तेरी बात मानेगी उस विनोद को छोड़ देगी। भूल जायेगी वो। देर-सवेर में अक्ल आ जायेगी।”

दरवाजे के पल्ले धकेलकर दोनों भीतर प्रवेश कर गये।

गोदरा ने पलटकर दरवाजा बंद किया। कमरे में नज़रें दौड़ाई। सब कुछ वैसा ही था। जैसा वो छोड़कर गया था। यहां तक कि उस दिन के नाश्ते के बर्तन भी सामने टेबल पर पड़े नजर आ रहे थे। वो धोखा नहीं खा सकता था। ये बारह दिन पहले के ही नाश्ते के बर्तन थे उसके। जल्दी से पास पहुंचकर देखा। बर्तनों के भीतर की हालत बता रही थी कि ये बारह दिन पहले वाले ही बर्तन थे। देवी ने बर्तन उठाये नहीं। दिल धड़क उठा गोदरा का बुरी आशंका से।

“देवी।” गोदरा ने पुकारा।

शर्मा ने गोदरा के फक्क, चेहरे को देखा।

“क्या हुआ गोदरा?”

गोदरा जल्दी से दूसरे कमरे की तरफ दौड़ा।

“देवी...”

देवी दूसरे कमरे में भी नहीं थी।

“तुम्हारी बहन घर पर कैसे हो सकती है। दरवाजा तो बाहर से बंद था।” कमल शर्मा बोला- “लेकिन बात क्या है।”

“वो नाश्ते के बर्तन, वहीं है, जिनमें मैं बारह दिन पहले नाश्ता करके गया था। देवी ने दिया था नाश्ता।” गोदरा की हालत अजीब सी हो रही थी- “इसका-इसका मतलब देवी बारह दिन से ही घर पर नहीं है। बर्तन वैसे ही पड़े।”

“गोदरा।” शर्मा के होंठों से निकला- “वो जेवरात, वो रुपये तुम देवी के हवाले कर गये थे।”

दोनों की नज़रें मिली।

“देखो वो जेवरात घर पर हैं या नहीं?”

दूसरे ही पल दोनों घर की तलाशी लेने लगे।

गोदरा की हालत अजीब सी हो रही थी।

पीछे वाले कमरे से उन्हें चादर में बंधी नोटों की गड्डियां मिली। करीब पचास लाख रुपये की गड्डियां। जगमोहन के कहे मुताबिक वो नकली थी। परन्तु पैंतीस लाख के खरे जेवरात कहीं भी नहीं थे। देवी भी नहीं थी। घर की हालत बता रही थी कि कई दिन से यहां पर कोई भी नहीं है। और तब तो गोदरा को अपने होश उड़ते महसूस हुए जब उसने एक सूटकेस और देवी के अधिकतर कपड़ों को घर में नहीं पाया।

गोदरा सिर थामें कुर्सी पर बैठ गया।

“जेवरात घर पर नहीं हैं। तुम्हारी बहन भी घर पर नहीं है।” कमल शर्मा गम्भीर स्वर में कह उठा।

“एक सूटकेस और देवी के कपड़े भी घर पर नहीं है।”

वैसे ही सिर थामें गोदरा थके स्वर में कह उठा।

“ओह!” शर्मा के होंठ भिंच गये।

“देवी घर से चली गयी है।” गोदरा ने नज़रें उठाकर शर्मा को देखा- “वो उसी हरामी विनोद खुराना के साथ, पैंतीस लाख के जेवरात लेकर भाग गयी है। अब मुझे समझ में आया कि वो ऐसा क्यों कर सकी। मैं जब-जब डकैती के बारे में फोन पर रूपा ईरानी से तुमसे-देवराज चौहान से, बात करता। वो सुनती रहती। उसे मालूम हो गया था। कि मैं किस फेर में हूं। सब कुछ जान गयी थी वो। उधर मैंने उसे सख्ती से दो टूक जवाब दे दिया था कि विनोद खुराना जैसे हरामी से उसकी शादी नहीं होने दूंगा। मेरे जाते ही उसे, बढ़िया मौका लगा होगा। पैसा सामने था। रोकने वाला कोई न था। भाग गई विनोद खुराना के साथ।”

देर तक उनके बीच खामोशी सी छा गयी थी।

“गोदरा।” शर्मा का स्वर गम्भीर-धीमा था।

“हां।”

“एक बात समझ में नहीं आई।”

गोदरा ने नज़रें उठाकर कमल शर्मा को देखा।

“तेरी बहन और खुराना जेवरात ले गये। लेकिन पचास लाख के नकद नोट क्यों छोड़ गये?”

“जगमोहन ने तेरे सामने बोला कि नोट नकली हैं।”

“ये बात तो उसने अब बोली। देवी तो नहीं जानती होगी।”

“उस हरामी विनोद खुराना को क्यों भूल रहे हो। मैंने मालूम किया था उसके बारे में वो घिसा हुआ बंदा था। उसने नोटों को पहचान लिया होगा कि नकली हैं। तभी छोड़ गया।”

“अगर ऐसी बात है तो वो तेरी बहन को बरबाद कर देगा।” शर्मा का स्वर गम्भीर था- “या तो अब तक वो तेरी बहन से पैंतीस लाख के जेवरात लेकर उसका गला काट चुका होगा। या उसे छोड़कर जेवरातों सहित भाग गया होगा या फिर तेरी बहन को वो धंधे में डाल देगा। उसके साथ जाकर देवी ने अपनी जिन्दगी बरबाद कर ली।”

प्रवेश गोदरा ने होंठ भींच लिए।

“जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ।” शर्मा बोला।

“देवी से मेरा रिश्ता उस वक्त ही खत्म हो गया था, जब उसने मेरे को धोखा देने की सोची। जब वो जेवरातों को लेकर, यहां से बाहर निकली। उसके साथ क्या होता है। अब मुझे परवाह नहीं। अपनी जिन्दगी भी देखनी है मुझे।”

कमल शर्मा ने सिग्रेट सुलगाई।

“इधर देवी भाग गयी, तेरे को खाली करके, उधर डकैती कोई दूसरा कर गया। वहीं के वहीं खड़े रह गये हम।”

गोदरा फौरन उठा।

“जो हुआ, उसका अफसोस तो बाद में करेंगे। इस वक्त हमें पुलिस से बचना है।” प्रवेश गोदरा ने शर्मा को देखा- “यहां पड़े नकली नोट हमें फंसा सकते हैं। तू मेहरबानी कर। इन्हें किसी चीज में डालकर ले जा, और कहीं फैंक दे।”

“मैं...तू नहीं चलेगा।”

“मेरे में हिम्मत नहीं रही। आराम करने दे। फिर से हिम्मत इकट्ठी कर लेने दे।”

कमल शर्मा, कई पलों तक गोदरा को देखता रहा फिर सिर हिलाकर रह गया। पन्द्रह मिनट बाद वो गठरी थामें कमरे में आया।

“सब नोटों को ले लिया?”

“हाँ।”

“कार में रख। दूर फेंक कर आ। तब तक मैं पड़ोसियों से देवी के बारे में पूछता हूं। शायद उन्हें उसके आने-जाने की कोई जानकारी हो।” प्रवेश गोदरा भारी स्वर में कह उठा।

कमल शर्मा ने सिर हिलाया और आगे बढ़ा। दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।

“आप कहां थे प्रवेश जी।” पड़ोसी बसन्त लाल कह उठा- “बहुत दिनों से आपको देखा नहीं भीतर आईये।”

प्रवेश गोदरा पड़ोस के दरवाजे पर खड़ा था।

“मैं टूर पर गया हुआ था। अभी लौटा हूं। देवी घर पर नहीं है। बाहर से सिटकनी...”

“वो ही तो मैं अपनी बीबी के साथ रोज कुंडी लगी देखता था। ताला नहीं लगा। मैं अपनी बीवी को रोज येई कहता कि ताला क्यों नहीं लगा।” बसन्त लाल ने सिर हिलाकर कहा- “कोई बाहर जाता है तो ताला लगाकर जाता है।” बीबी बोलती देवी को ससुराल जाने की जल्दी होगी। भूल गयी ताला लगाने को।”

“ससुराल?” गोदरा के होंठों से निकला।

“तुम्हारे को नेईं मालूम।”

“क्या?”

“मालूम तो होगा। मजाक करता है।” वो मुस्कराया- “सच बात तो ये हैकि मेरी बीवी तुम लोगों से बोत नाराज है। बोलती है पुराने पड़ोसी हैं। सुख-दुःख में काम आते रहे। शादी की तो हमें खबर तक नहीं दी। बुलाना तो दूर रहा। मैंने बहुत कहा कि कोई बात नहीं। सब चलता है, लेकिन वो नाराज ही ही है। भीतर आ जाओ। बैठकर...”

“शादी?” गोदरा के होंठों से निकला।

“देवी की बात कर रहा हूं। तेरे को नेईं मालूम क्या। मेरी बीवी ने खिड़की से देखा। उसके सामने देवी किसी बांके मर्द के साथ कार से उतरकर घर में आई। देवी ने सिन्दूर लगा रखा था। बीवी को तो बहुत गुस्सा आया कि उसे शादी के बारे में देवी ने बताया भी नहीं। वैसे भाभी-भाभी कहती रहती थी। बीबी बोलती है कि मन्दिर में सादा ब्याह किया होगा। क्योंकि देवी ने पुराना सूट ही पहन रखा था। नया नहीं सिलवाया था। उसके बाद वो एक-आध घंटा ही भीतर रहे। जाने क्या करते रहे होंगे। बीवी तो खिड़की पर खड़ी ही देखती रही। फिर दोनों सूटकेस थामें बाहर निकले और कार में बैठकर चले गये।”

प्रवेश गोदरा, बसन्त लाल को देखता रहा।

“क्या हुआ प्रवेश बाबू आप-परेशान क्यों हो गये।

“मुझे आपसे पता चला कि देवी ने शादी कर ली है।”

गोदरा ने फौरन खुद को संभाला।

बसन्त लाल कई पलों तक उसे समझने वाले ढंग में देखता रहा।

“क्या बोला-देवी के शादी होने की आपको खबर नहीं।”

“नहीं।”

“देवी ने बताया भी नहीं?”

“नहीं।” गोदरा ने गम्भीर स्वर में कहा- “एक बार देवी ने कहा था कि वो किसी से शादी करना चाहती है। जिससे शादी करना चाहती हूं। वो मुझे ठीक आदमी नहीं लगा तो मैंने उससे शादी करने को मना कर दिया था।”

“फिर तो पक्का उसी के साथ ही उसने शादी की होगी।”

बसन्त लाल ने समझने वाले भाव से सिर हिला उठा- “ये तो बोत बुरा  किया देवी ने। उसे ऐसा नहीं करना चाहिये था। मेरी बीवी को शादी के बारे में नहीं बताया तो कोई बात नहीं। तेरे को तो बताना ही चाहिये था बुरा किया देवी ने। खैर, ये बात सुनकर मेरी बीवी का गुस्सा उतर जायेगा। जो अपने भाई की नहीं हुई, वो पड़ोसी की कहां से होगी। एक बात तो बताओ।”

“क्या?”

“घर का सब सामान ठीक है ना। घर में पड़ा माल-पत्ता लेकर तो नहीं भाग गई।” बसन्त लाल बोला- “क्या भरोसा किसी का। बहुत खराब है जमाना। सगे ही, लूटते हैं। तुम ठीक रहे क्या?”

प्रवेश गोदरा उसे देखता रहा फिर धीमे स्वर में कह उठा।

“आप तो जानते ही हैं कि किसी तरह थोड़ा-बहुत कमाकर, काम चलाता हूं। हाथ तंग नहीं रहता। इतना ही कमा लेता हूं। ऐसे के घर में क्या पड़ा होगा। हजार-पांच सौ।”

“हां। ये बात तो ठीक कहीं। दो-चार सौ की जरूरत हो तो बोलो। दे देता हूं।”

“मेहरबानी।”

“देवी का पता करना कि वो कहां है।” बसन्त लाल बोला।

गोदरा ने उसे घूरा फिर तीखे स्वर में बोला।

“क्यों पता करूं।”

“हां। ये बात भी ठीक है। उसने शादी की। भाई को धोखा दिया। बिना बताये चली गयी। वो तो दोबारा लौटे, तब भी उसे घर में नहीं घुसने देना। शराफत का तो जमाना ही नहीं रह गया।”

प्रवेश गोदरा पलटा और अपने घर के दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

“चाय तो पीते जाईये।” बसन्त लाल की आवाज कानों में पड़ी।

गोदरा देवी के बारे में सोच रहा था। पैंतीस लाख के जेवरातों के साथ, विनोद खुराना से शादी करके, घर से गई है। अब वो नहीं लौटेगी। वापस आने की हिम्मत ही नहीं होगी उसकी।

दरवाजा खोलकर भीतर कदम रखा कि फोन की बेल बज उठी। वो ठिठका। कई पलों तक फोन को देखता रहा फिर आगे बढ़कर रिसीवर उठाया।

“हैलो।”

“पति परमेश्वर जी नमस्कार।” रूपा ईरानी का खिलखिलाता स्वर कानों में पड़ा- “मैं तो बोर हो रही थी। सोचा दो-चार बातें देवी से ही कर लूंगी। तुम्हारे बारे में यूं ही पूछ लूंगी कि तुम कहां हो। लेकिन तुम तो घर पर हो। हैरानी हुई। खैर कहो-क्या गड़बड़ हो गयी जो।”

“कहां पर हो?” गोदरा ने गहरी सांस ली।

“वहीं। होटल में। पुलिस मुझ पर शक कर रही है कि...”

“फोन पर कोई बात मत करो। पुलिस बीच में सुन रही हो सकती है।” गोदरा जल्दी से बोला।

“सुनने दो। मैंने या तुमने कोई गलत काम किया है क्या। मैंने तुम्हें दिल से अपना पति माना है, हम दोनों जो भी बात करें किसी को क्या। पुलिस कौन होती है। तुम घर पर ही हो।”

“हां”

“मैं आऊंगी। कभी भी आ सकती हूं।”

कुछ पलों की चुप्पी के बाद वो बोला।

“आ जाना।”

“मालूम है, क्या करने आना है मैंने?” रूपा ईरानी की हंसती

आवाज कानों में पड़ी।

“क्या करने?”

“शादी की तारीख पक्की करने। वायदे के मुताबिक हमें शादी कर लेनी चाहिये। क्यों ठीक कहा मैंने?”

“पता नहीं।” प्रवेश गोदरा ने उखड़े स्वर में कहा और रिसीवर रख दिया। फोन के पास खड़ा ही फोन को देखता रहा। जिन्दगी के जो सपने देखे थे। वो सब मिट्टी में मिल गये। सोचा था डकैती होते ही भारी रकम उसके पास आ जायेगी। जिन्दगी के सारे आराम उसके कदमों में होंगे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सारी मेहनत बेकार गयी। जो पास था, वो देवी ले गयी। जिसे बच्चों की तरह पाला था। पैंतीस लाख के वो जेवरात भी पास में होते तो शायद जिन्दगी में कुछ कर लेता। परन्तु कुछ भी नहीं बचा था उसके पास। आहट से पाकर, प्रवेश गोदरा सोचो से निकला। दरवाजे की तरफ से आहट आई थी। उसने गर्दन घुमाकर उधर देखा तो देखता ही रहा।

दरवाजे पर रनवीर भंडारी खड़ा था।

“मैं कई दिनों से तुम्हें फोन कर रहा हूं।” रनवीर भंडारी प्रवेश करते हुए कह उठा- “फोन की बेल होती रहती है लेकिन उठाता कोई नहीं। आज सोचा घर पर होकर आता हूं।”

प्रवेश गोदरा के होंठों पर फीकी सी मुस्कान उभरी।

“बैठिये भंडारी साहब।”

“तुम बहुत दिनों से मेरे पास आये नहीं।” आगे बढ़कर

रनवीर भंडारी बैठता हुआ बोला- “तुमने मेरा हाथ शायद तब तक ही थाम रखा था, जब तक मेरे पास दौलत रही। मैं दीवालिया हो गया तो तुमने मिलना भी छोड़ दिया।”

“ऐसी बात नहीं भंडारी साहब।” खुद को संभालता, कुर्सी पर बैठता गोदरा बोला- “मैं अपनी ही परेशानी में था।”

“क्या हुआ?”

“मेरी बहन देवी, मेरा सारा माल लेकर भाग गयी है। शादी कर ली किसी आवारा लड़के के साथ।”

“ओह!” रनवीर भंडारी ने गहरी सांस ली- “बहुत बुरा हुआ।”

“यही वजह रही मेरी परेशानी की।” गोदरा धीमे स्वर में

बोला- “अब कठिनता से खुद को संभाला है। आप बताइये। कहीं से रास्ता निकला कि बाजार का उधार चुका कर, शो-रूम और बंगले की नीलामी से बच सकें?”

“नहीं। कोई रास्ता नहीं निकला। लेनदारों ने कोर्ट के द्वारा मेरे खातों पर रोक लगवा दी है कि मैं बैंकों से सारा पैसा न निकाल लूं।” रनवीर भंडारी ने दुखी स्वर में कहा- “मेरा दिल तो कर रहा है कि आत्म-हत्या कर लूं।”

“ऐसा मत कहिये।”

रनवीर भंडारी ने बैचेनी से पहलू बदला।

“मुझे कंगाल हुआ पाकर मेरी पत्नी नयना ने दूसरे के साथ रिश्ता बांध लिया है। वो बच्चों को लेकर, शादी करके उसके पास जा रही है। कल तलाक के पेपर्स तैयार करके वो मेरे पास आई थी साईन करवाने। मैंने साईन कर दिए। दौलत थी तो सब अपने थे। दौलत नहीं तो सब रिश्ते खत्म हो गये। मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा। तुमसे तो कुछ भी नहीं छिपा है।” रनवीर भंडारी ने दुखी होकर आंखें बंद कर ली।

कुछ पलों की चुप्पी के बाद गोदरा थोड़ा-सा आगे झुककर धीमें स्वर में बोला- “देवराज चौहान वाले मामले का क्या हुआ?”

रनवीर भंडारी ने आंखें खोली।

दोनों की नज़रें मिली।

“अखबारों में आज पढ़ा कि डकैती हो गयी है।” रनवीर भंडारी की आवाज बेहद धीमी थी- “बस वो एक आशा है कि देवराज चौहान के मन में बेईमानी न आये। कहे मुताबिक, वायदे के अनुसार मेरा दो अरब का हिस्सा दे दे। मैं तो कहता हूं भगवान करे, वो मेरे को सिर्फ पचास करोड़ दे दे। मार्किट का उधार चुकाकर अपनी हालत को थोड़ा सा ठीक कर सकू। सिर पर बोझ नहीं होगा तो, धीरे-धीरे सारा बिजनेस ठीक हो जायेगा।”

“बिजनेस ठीक करने में तो मैं आपके साथ हूं। उसकी फिक्र न करें।” गोदरा अपनापन दिखाता हुआ बोला- “लेकिन ये सब बात तो तभी बनेगी, जब देवराज चौहान आपको डकैती में से माल देगा।”

“यही सोचते-सोचते तो परेशान हो रहा हूं कि वो देगा कि नहीं। वायदे से पीछे हट गया तो मैं बरबाद...”

“ऊपर वाले पर भरोसा रखिये। भगवान ने चाहा तो....”

“अब तो बात देवराज चौहान पर है। भगवान पर नहीं।”

रनवीर भंडारी उखड़े स्वर में बोला- “देवराज चौहान ने चाहा तो तभी मुझे दौलत मिल पायेगी। मैं अपना कर्जा उतार पाऊंगा। नहीं तो मेरा वजूद ही खत्म हो जायेगा।”

प्रवेश गोदरा, रनवीर भंडारी के फक्क चेहरे को देखता हुआ सोच रहा था कि इसे कैसे कहे कि देवराज चौहान ने डकैती नहीं की। वो कर ही नहीं पाया। इससे पहले ही कोई दूसरा कर गया।

गोदरा देखता रहा रनवीर भंडारी को।

लम्बी होती खामोशी को तोड़ा रनवीर भंडारी ने ही।

“इन सब बातों के अलावा, सबसे बड़ी तकलीफ तो मुझे ये हो रही है कि नयना भी मेरे से तलाक ले रही है।”

“भंडारी साहब। आपने सबसे बड़ी गलती की जो उस हिरोईन के चक्कर में पड़ गये। उसके लिये फिल्म बना डाली कि उसका करीबीपन हासिल हो सके और हुआ भी। लेकिन फायदा क्या हुआ। फिल्म पिट गयी। हिरोईन आपसे पैसा लेती रही। आपको खाली करती रही। पचास करोड़ के कर्जाई हो गये आप। जेवरातों का धंधा भी चौपट हो गया। मेरे जैसे जाने कितने थे जो आपके सहारे अपना घर चलाते थे। हम भी बेकार हो गये। मुझे दूसरी जगह देखनी पड़ेगी।”

“तुम तो दूसरी जगह देख लोगे।” रनवीर भंडारी के चेहरे पर फीकी सी मुस्कान उभरी- “मेरे पास तो कोई जगह भी नहीं बची। अपना कोई भी नहीं बचा। किस्मत का खेल है सब।”

प्रवेश गोदरा कुछ न कह सका।

“लेनदार अब जोर देने लगे हैं।”

गोदरा चुप ही रहा।

“देवराज चौहान तक तुमने मुझे पहुंचाया था।” रनवीर भंडारी ने कहा।

“हां। मेरी पहचान थी किसी से। वो किसी तरह देवराज चौहान को जानता था।” गोदरा बोला।

“तो तुम किसी तरह देवराज चौहान से बात करो कि...”

“मैं उससे कैसे बात करूं।”

“तो उस तक खबर ही पहुंचाओ कि भंडारी बरबादी के किनारे पर बैठा है। अगर उसे पचास करोड़ न मिला तो वो बरबाद हो जायेगा। उसका सब कुछ बिक जायेगा। फुटपाथ पर आयेगा तो आत्महत्या कर लेगा।” रनवीर भंडारी रो देने वाले स्वर में कह उठा- “तीस अरब की डकैती डाली है उसने। दो अरब न सही, पचास करोड़ तो दे दे। मैं-मैं बच जाऊंगा।”

प्रवेश गोदरा ने बैचेनी से पहलू बदला।

“मैं-मैं कोशिश करूंगा कि-कि देवराज चौहान तक किसी तरह आपका मैसेज पहुंचा...।”

“कोशिश नहीं गोदरा। मेरा ये काम करो।” रनवीर भंडारी का स्वर कांप उठा- “नहीं तो मैं...”

“करूंगा। पूरी कोशिश करूंगा।” प्रवेश गोदरा ने धीमे गम्भीर स्वर में कहा।

सिर झुकाये रनवीर भंडारी खामोशी से बैठा रहा फिर गहरी सांस लेकर, उसे देखा।

“देख लिया है मैंने। दौलत से यारी, बहुत जरूरी है। नहीं तो सब साथ छोड़ देते हैं। अब तो लोगों ने भी मुंह फेरना शुरू कर दिया है। जो मेरे रास्ते पर बिछने को तैयार रहते थे, वो आज मुझे देखकर, रास्ता ही बदल लेते हैं।”

प्रवेश गोदरा उसे क्या कहता है। वो तो खुद परेशान था।

जिन्दगी में पहली बार डकैती जैसे काम में हाथ डालकर, दौलत से यारी करने की कोशिश की थी, परन्तु यारी नहीं हो सकी थी। निकल गयी दौलत आगे। किसी और के पास। जाने किसकी ‘यारी दौलत से’ हुई होगी। कौन किस्मत वाला होगा।

“तुम देवराज चौहान तक ये बात पहुंचाओगे कि भंडारी डूबने की कगार पर बैठा है।”

“हां।” गोदरा के होंठ खुले।

रनवीर भंडारी खड़ा हो गया।

गोदरा अपनी जगह पर बैठा उसे देखता रहा। कोई और वक्त होता तो भंडारी को बाहर तक छोड़ने के लिये फौरन उठ जाता। शहर का नामी ज्वैलर्स था वो। परन्तु अब वो कंगाल था।

दौलत उसके लिये बीते वक्त की बात हो गयी थी। उसकी हालत सामान्य इन्सान से भी बुरी हो गयी थी। खुद भी वो परेशान था कि दौलत हाथ नहीं आ सकी। अपनी जगह पर ही बैठा रहा वो।

गोदरा ने उसे देखते हुआ गम्भीर भाव में सिर हिला दिया।

“शो-रूम नीलाम होने तक, वहीं बैठता हूं। उसी केबिन में। आना। चक्कर लगाना कभी...”

“आऊंगा।” प्रवेश गोदरा ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया और उठ खड़ा हुआ।

“चलता हूं गोदरा।”

रनवीर भंडारी जाने के लिए पलटा तो उस पल रूपा ईरानी ने भीतर प्रवेश किया।

रनवीर भंडारी उसे देखकर ठिठका।

रूपा ईरानी ने भी सवालिया नजरों से उसे देखा।

“ये भंडारी साहब हैं। शहर के मशहूर ज्वैलर्स।” गोदरा जल्दी से कह उठा- “और ये रूपा। हम जल्द ही शादी करने जा रहे हैं।”

रनवीर भंडारी ने सिर हिलाया और खामोशी से बाहर निकल गया।

गोदरा ने आगे बढ़ कर दरवाजा बंद किया।

“ये यहां क्या करने आया था?”

गोदरा पलटा तो रूपा ईरानी को कुर्सी पर बैठे पाया।

“मुझसे ये कहने आया था कि मैं देवराज चौहान से इसे उसका हिस्सा दिलवा दूं।” प्रवेश गोदरा उखड़े स्वर में बोला- “मेरे सोर्स द्वारा ही ये डकैती के लिये देवराज चौहान से बात कर सका था।”

“तुमने इसे बताया नहीं कि देवराज चौहान के बदले कोई दूसरा ही डकैती...”

“बेवकूफों वाली बातें मत करो। ये नहीं जानता कि इस काम में मैं देवराज चौहान के साथ हूँ। ये यही समझता है कि मैं इसकी बातें जानता हूँ। बस”

रूपा ईरानी सिर हिलाकर रह गयी।

दोनों की नज़रें मिली।

“मैंने तुम्हें समझाया था कि डकैती जैसे काम में हाथ मत डालो। ये खतरनाक काम है। लेकिन तुम नहीं माने।”

गोदरा ने रूपा ईरानी के खूबसूरत चेहरे को घूरा।

“बुरा क्या किया मैंने? सब ठीक तो रहा। बात तो यहां बिगड़ी कि कोई और ही डकैती कर गया।”

“तकलीफ हो रही है कि माल हाथ नहीं आया।”

“होगी ही। तुम्हें नहीं हुई क्या? तुम्हारा भी तो एक अरब का हिस्सा था।”

“कुएं में जाये। डकैती जैसे नाम से शुरू से ही मुझे नफरत रही है।” रूपा ईरानी कड़वे स्वर में कह उठी- “मैं तो पहले ही तैयार नहीं थी, इस मामले में आने के लिये, लेकिन तुम्हें इन्कार नहीं कर सकी। मुझे दौलत की जरूरत नहीं है। तुम जानते ही हो। मेरे पास अपने लिये बहुत है। परेशानी तो तुम्हें होनी चाहिये। वैसे तुम नुकसान में नहीं रहे।”

गोदरा प्रश्न भरी निगाहों से उसे देखने लगा।

“एक करोड़ तो, देवराज चौहान से तुम्हें मिल ही गया...”

“हां।” गोदरा का स्वर कड़वा हो गया- “एक करोड़ की पचासी लाख की रकम निकली। जिसमें से पचास लाख के नोट नकली थे। शर्मा किसी नाले में फैंकने गया है उन नोटों को।”

“मजाक तो नहीं कर रहे।” रूपा ईरानी के होंठों से निकला।

“मैं तुम्हें मजाक करता लगता हूं।” गोदरा खीझकर बोला।

“नहीं। लगते तो नहीं।”

गोदरा कुर्सी पर बैठा। गुस्से से भरे ढंग में सिग्रेट सुलगाई।

“मतलब कि सिर्फ पैंतीस लाख ही हाथ आया। वो भी बुरा नहीं।” रूपा ईरानी गहरी सांस लेकर कह उठी।

“मैं देवराज चौहान के साथ डकैती में लगा रहा। पीछे से देवी ने उस हरामी विनोद खुराना के साथ शादी कर ली?”

“क्या?” रूपा ईरानी चौंकी- “देवी ने उससे शादी कर ली?”

“शादी करके, पैंतीस लाख के वो जेवरात लेकर चलती बनी। कुछ नहीं मिला मुझे।”

“ओह। तुम्हारे साथ सच में बहुत बुरा हुआ।”

खामोशी सी आ ठहरी उनके बीच।

“अब देवराज चौहान कहां है?”

“मालूम करने की कोशिश कर रहा है कि डकैती किसने की?”

“और तुम यहां आ गये?”

“मैं क्या करता उसके साथ रहकर। जेवरात उसके हाथ लगे। वो ईमानदार रहा तो हिस्सा पहुंचा देगा मुझे।”

“जगमोहन मेरे पास आया था। कहने लगा...।”

“मालूम है मुझे। बताया था जगमोहन ने।” कहते-कहते प्रवेश गोदरा ठिठका। उसने रूपा ईरानी को घूरा- “तुमने उस पुलिस वाले को क्यों सब कुछ बता दिया। मेरे बारे में भी बता दिया कि...”

“कोई फर्क नहीं पड़ता।” रूपा ईरानी बरबस ही मुस्करा पड़ी- “खामखाई की फिक्र मत करो।”

“मतलब कि फिलहाल तो मामला खत्म।”

“सब कुछ खत्म।”

“क्या मतलब?”

“मैंने जो इंस्पेक्टर वानखेड़े को कहा है, उस बात से पीछे भी हट सकती हूं। मेरी कही बात पत्थर की लकीर तो है नहीं। वैसे भी उस वक्त मैंने ड्रग्स ले रखी थी। कह सकती हूं कि मुझे तो कुछ याद ही नहीं कि मैंने क्या कहा। उस वक्त उसे ये सब बताकर बहलाना जरूरी था।” रूपा ईरानी गम्भीर हो गयी- “उसके पास इस बात का पक्का सबूत है कि रिवॉल्वरें और नकाबें मैंने ही वहां पहुंचाई थी। जो डकैती में इस्तेमाल हुई। वो मुझे गिरफ्तार कर सकता था।”

“तो तुमने सबका नाम ले लिया।”

“कोई फर्क नहीं पड़ता। पुलिस वाले कुछ भी साबित नहीं कर सकते। दोबारा मेरा बयान भी बदल जायेगा।”

“और जो सबूत इंस्पेक्टर वानखेड़े के पास हैं कि तुमने।”

“उसका भी कोई रास्ता निकल आयेगा कि वो उस सबूत के दम पर कुछ न कर सके। मत भूलो कि मैं हिन्दुस्तान की मशहूर मॉडल हूं। मेरे पास हर तरह की पहुंच है। मुझ पर हाथ डालना आसान काम नहीं है गोदरा।”

गोदरा गहरी सांस लेकर रह गया।

“छोड़ो इन बातों को। ये बीती बातें हो गयी। शादी की बात कर रहे हो।” रूपा ईरानी ने उसे देखा।

“अभी मैं कुछ नहीं कह सकता।” गोदरा उखड़ा पड़ा था- “मेरे पास पैसे के नाम पर कुछ भी नहीं है।”

“शादी में पैसे की बात कहां से आ गई। मेरा पास इतना है कि हम आराम से गुजारा कर सकें। अभी तो मैंने और भी पैसे कमाने हैं। कोरिया में शो की बात चल रही है। तीस-चालीस लाख तो मुझे उस शो से ही मिल जाने हैं। पहले से भी बहुत है तुम पैसे की फिक्र क्यों करते हो। मेरी एक मुस्कान एक लाख की है।”

प्रवेश गोदरा, रूपा ईरानी को देखने लगा।

“क्या हुआ?” वो मुस्कराई।

“प्लीज़। अभी मेरे से कोई बात मत करो।” गोदरा ने कश लेते हुए मुंह फेर लिया।

“मूड खराब है। कोई बात नहीं। मैं ठीक कर दूंगी। रात को आना। प्यार किए बहुत दिन हो गये। अभी मैं होटल में ही हूं। कल तक सारी माडल्स को पुलिस तफ्तीश से छुट्टी मिल जायेगी। फिर अपने फ्लैट में ही मिलूंगी।”

“अभी कुछ दिन मुझे कुछ मत कहो।”

रूपा ईरानी ने उसे घूरा फिर उठते हुए बोली।

“जब मूड ठीक हो, तब आ जाना मेरे पास। सोच लेना। हमारे विचार मिलते हैं। अच्छी पटेगी हमारी शादी के बाद। वैसे तुम अच्छी तरह जानते हो कि, मेरे से शादी करने वालों की लाईन लगी हुई है, लेकिन तुम मुझे अच्छे लगते हो। मैं तुम्हें पसन्द करती हूं। इसलिये मेहरबान हूं तुम पर।” रूपा ईरानी कहकर हंस पड़ी।

गोदरा उठा और मुस्कराने की कोशिश की।

“मैं अभी ठीक नहीं हूं बात करने के लिये। परेशान हूं।”

“जब खुश हो, तब बता देना।” रूपा ईरानी ने कहा और आगे बढ़कर दरवाजा खोला फिर पलट कर गोदरा को देखा- “आना-इन्तजार करूंगी।”

गोदरा मुस्कराया।

रूपा ईरानी बाहर निकल गयी।

गोदरा के चेहरे पर ठहरी जर्बदस्ती की मुस्कान गायब हो गयी। वहां थकान-परेशानी आ ठहरी थी। सोचों में देवराज चौहान, तीस अरब के जेवरात और देवी के ख्याल बार-बार आते रहे।

☐☐☐

देवराज चौहान और जगमोहन ने एक तंग गली में प्रवेश किया और आगे-पीछे होकर आगे बढ़ने लगे। अन्य लोग भी जा रहे थे। दिन के ग्यारह बज रहे थे। दोनों के चेहरों पर सामान्य भाव थे। वो यहां तक टेक्सी पर पहुंचे थे। टैक्सी बाहर सड़क पर ही छोड़ दी थी।  वो गली आगे जाकर मुड़ी तो वे दोनों भी मुड़ गये। पतली गली के दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे मकान बने हुए थे। एक के ऊपर एक कमरे चढ़ा रखे थे।

आगे देवराज चौहान था। वो एक दरवाजे के सामने ठिठका।

बेहद घटिया इलाका था दरवाजे पर चादर को पर्दा बनाकर लटका रखा था। हाथ से पर्दा हटाते हुए देवराज चौहान ने भीतर प्रवेश किया। पीछे जगमोहन।

ये दारूखाना था।

छोटे से कमरे में बैंचों पर तीन चार लोग बैठे गिलासों में दारू पी रहे थे। स्मैल उसकी नाकों से टकराई। पीने वाले बातें कर रहे थे। सुबह के इस वक्त भीड़ नहीं थी।

छोकरा फौरन पास पहुंचा।

“बैठो। साब-बोत बढ़िया दारू।”

“मानक सिंह कहां है?

“अपने को नेई पता। सूरते से पूछो।” छोकरा बोला।

“सूरता किधर है?”

“भीतर बैठा है।” छोकरे ने एक दरवाजे की तरफ इशारा किया।

देवराज चौहान और जगमोहन आगे बढ़े और भीतर प्रवेश कर गये।

साधारण सा दम छोटू कमरा था। लकड़ी की टेबल-कुर्सी के अलावा लोहे की पुरानी अलमारी थी पास में। देवराज चौहान ने सूरता को पहचाना। जब मानक सिंह से बात करने आया था तब इससे भी बात हुई थी। वो इस वक्त एक आदमी को कोई पुड़िया दे रहा था।

सूरते ने देवराज चौहान और जगमोहन को देखा। होंठ सिकुड़े सिर हिलाया।

“पांच जल्दी निकाल। साले पहले ही हाथ में पकड़ लिया कर।” सूरते ने उखड़े स्वर में सामने वाले से कहा।

“सब्र भी रखा कर।” उस व्यक्ति ने पुड़िया जेब में डाली और पांच सौ का नोट उसे दिया।

“तेरे से पहले का भी पांच सौ लेना है।” सूरते ने उससे कहा।”

“दे दूंगा। मरता नहीं अभी।”

“दफा हो।”

वो व्यक्ति बाहर निकल गया।

सूरते ने देवराज चौहान को देखा।

“तुम दोनों पहले भी आये थे। मानक सिंह से बात की थी तुमने-ठीक बोला मैं...”

“हां।”

“क्या बात की थी। क्या काम बोला करने को उसे?”

“क्यों?”

“तेरे काम बोलने के चार दिन बाद किसी ने उसको गोली मार दी। लफड़ा क्या है।”

देवराज चौहान और जगमोहन की नज़रें मिली।

“किसने मारी गोली?”

“मेरे को क्या-सुना मैंने गोली मारी किसी ने। मर गया वो। पीछे उसकी बीवी का रो-रो कर बुरा हाल है। तीन बच्चे हैं। कैसे पालेगी उन्हें।” सूरते ने सिर हिलाया- “तेरे काम की वजह से वो मरा?”

“पता नहीं।” देवराज चौहान गम्भीर था- “कहां मारी उसे गोली?”

“उसके घर के पास ही। वो सड़क के किनारे जा रहा था कि पास में कार रुकी। काली शीशे थे कार के। नम्बर नहीं लगा था आगे-पीछे। उस पर पांच-छ: गोलियां चलाई। एक सिर में लगी। कार चली गयी। लोग देखते रहे। वो अच्छा आदमी था। उसकी पत्नी तो उजड़ गयी।”

देवराज चौहान होंठ भींचे पलटने लगा तो सूरता खड़े होते हुए बोला।

“तेरे को पता है कि मानक सिंह मेरा दोस्त था। मेरे से बात कर लिया करता था। पर ये नेई बताया कि तेरा क्या काम उसने करना है। मरने से एक दिन पहले उसने मेरे से बात की।” सुरता गम्भीर था।

देवराज चौहान ठिठका।

“क्या?”

“बोला जो काम तूने उसे करने को कहा है, उसके लिये कोई आदमी उसको मिला। उसने, मानक सिंह को बोला कि तुम्हें काम करने को हां करता रहे, लेकिन करे नहीं, घर बैठा रहे। इस लिये वो लाख रुपया उसे देगा।”

“कौन था वो?”

“मेरे को क्या पता। मानक सिंह ने जो बताया, वो तेरे को बता रहा हूं। मानक सिंह भी उसे नहीं जानता था। मानक सिंह ने मुझे बताया कि उसने, उसे मना कर दिया कि धन्धे में मैं धोखे बाजी नहीं करता। उसने धमकी दी कि अगर उसकी बात नहीं मानेगा तो वो उसे गोली मार देगा। वो ही हुआ। लग गयी उसे गोली।”

“कब मरा वो?”

“परसों शाम को।”

देवराज चौहान और जगमोहन की नज़रें मिली।

कल डकैती हुई थी। यानि कि डकैती से एक दिन पहले उसे मार दिया गया। तभी तो उन्हें खबर नहीं लगी उसके मरने की। क्योंकि उससे फाईनल बात हो चुकी थी। उसने डकैती के वक्त बारूद मैन बनने का नाटक करने के लिये तय जगह पर पहुंच जाना था। वो न पहुंचे इसके लिये उसे खत्म कर दिया गया।

“तुम्हें नहीं पता कि उसे किसने गोली मारी?” देवराज चौहान बोला।

“नहीं। मुझे तो ये भी नहीं पता कि उसने क्या काम करना था।” सूरता गम्भीर स्वर में बोला- “जुबान का बहुत पक्का था मानक सिंह। इधर की बात उधर करने की उसकी आदत नहीं थी। बुरा हुआ उसके साथ। पर गलती तेरी नहीं। उसकी किस्मत खराब थी। ये बता अब त इधर किस वास्ते आया है?”

“मानक सिंह के बारे में ही पूछना था।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “उसके वक्त पर न पहुंचने के कारण काम में गड़बड़ हो गयी। मेरे को नहीं मालूम था कि वो इस तरह मर गया।”

देवराज चौहान और जगमोहन बाहर निकल आये।

कठोर था देवराज चौहान का चेहरा।

“मानक सिंह को हमारे काम की वजह से ही मारा गया। जो हमारे पीछे-पीछे डकैती की अपनी योजना की तैयार कर रहा था। वो नहीं चाहता था कि मानक सिंह, होटल में बारूद मैन बनकर पहुंचे। क्योंकि हमारा बारूद मैन नकली था। जबकि वो वहां जिस बारूद मैन को खड़ा करना चाहता था, वो असली मैन होना था, लेकिन उसके कहने पर मानक सिंह नहीं का तो उसे गोली मार दी। डकैती से ठीक एक दिन पहले।”

“वो जो भी है, ठीक हमारी योजना पर अपनी योजना बनाता गया।” जगमोहन के दांत भिंचे हुए थे।

“हां। तभी तो वो सफल रहा।” देवराज चौहान ने सर्द स्वर में कहा- “ये इत्तफाक ही रहा कि उससे बात फाईनल हो गयी। डकैती से एक दिन पहले उससे मिलना नहीं हुआ। मिलना होता तो मालूम हो जाता कि उसे गोली मार दी गयी है।”

दूसरा-राम भाई?” जगमोहन के होंठों में भिंचा स्वर निकला।

“उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा।” देवराज चौहान पूर्ववत् स्वर में बोला- “मालूम करते हैं उसके बारे में।”

☐☐☐

देवराज चौहान और जगमोहन ने साधारण से बने मकान का दरवाजा खटखटाया।

फौरन ही दरवाजा खुला। बूढ़ी औरत थी दरवाजा खोलने वाली।

“नमस्कार मां जी।” देवराज चौहान ने हाथ जोड़कर कहा- “राम भाई घर में है क्या?”

“राम तो अस्पताल में है।” बूढ़ी औरत ने दोनों को देखते हुए कहा।

“अस्पताल में?”

“क्या हुआ उसे?”

“किसी ने उसे गाड़ी के नीचे देकर मारने की कोशिश की। वो अस्पताल में...”

“कौन से अस्तपाल में है राम भाई?”

“मेरे को नाम नहीं पता। उधर पान वाला है। वो जानता है अस्पताल का नाम।”

देवराज चौहान और जगमोहन उस पान वाले से मिले।

“राम भाई को गोली मारी किसी ने।” पान वाला बोला- “यही सुना मैंने। पहली गोली से बच गया। दूसरी गोली से बचने के वास्ते भागा तो जिस कार से गोली चलाई गयी, उस कार ने उसे कुचल कर मारने की कोशिश की। मेरे को कुछ नहीं पता। जो लोग बता जाते हैं, वो ही बताया है।”

“उस कार के बारे में कुछ पता चला?” जगमोहन बोला।

“मेरे को क्या पता। लोग बताते हैं कि कार के शीशे काले थे। नम्बर भी नहीं था कार पर।”

“कब हुआ ये सब?”

“परसों शाम को।”

यानि कि डकैती से पहली शाम।

मानक सिंह को भी उस दिन, दिन में गोली मारी गयी।

“अब क्या हालत है उसकी?”

“मुझे क्या पता। लोग बताते हैं कि कोई भरोसा नहीं।”

“कौन से अस्पताल में है वो?”

पान वाले ने अस्पताल का नाम बताया।

दोनों वहां से हटे और तेजी से टैक्सी की तलाश में आगे बढ़ गये।

“पीठ पर बारूद-नकली बारूद लगाकर, मैंने जिन दो लोगों को चुना, उन दोनों को मारने की कोशिश की गयी। एक मर गया दूसरा अस्पताल में जीने-मरने के बीच है। जिस दिन दोनों को काम करना था। उससे ठीक एक दिन पहले दोनों को रास्ते से हटा दिया गया कि, डकैती करने वाला, अपने आदमियों को असली बारूद के साथ वहां खड़ा कर सके।” कठोर स्वर में देवराज चौहान कह रहा था- “वो ठीक मेरी योजना को ले रहा था। उस पर ही चल रहा था। लेकिन बेहद कठोर अंदाज में। वो दौलत चाहता था। इस डकैती में बेशक कोई मरे। उसे कोई परवाह नहीं थी। मेरी योजना में वो जिस बात को कमजोर समझ रहा था, उस कमजोरी को वो अपनी समझ से दूर करता जा रहा था।”

“वो हमारे हर कदम पर नजर रख रहा था।”

“हां।” देवराज चौहान के दांत भिंच गये- “यही वजह रही कि डकैती कर जाने में वो सफल रहा।”

“रामभाई जिन्दा है। वो खतरे में है। उसे फिर मारने की कोशिश।”

“नहीं। अब उसे खतरा नहीं है।” देवराज चौहान ने सिर हिलाया- “क्योंकि इस मामले के पीछे जो है, उसका मकसद सिर्फ डकैती करना था। डकैती हो चुकी है। अब वो अपने पीछे के निशानों के करीब नहीं आना चाहेगा। बल्कि वो अब इन सब बातों से दूर होना चाहेगा, क्योंकि उसने तीस अरब की दौलत भी संभालनी है।”

“आखिर ये है कौन?” जगमोहन झुंझला उठा।

“यही तो जानना है हमें।”

सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड के एक बेड पर राम भाई पड़ा था। उसका आधा शरीर पट्टियों से ढका हुआ था। बुरे हाल में नजर आ रहा था वो। जनरल वार्ड का हॉल तो उससे भी बुरा था। पास ही में उसकी पत्नी स्टूल पर एक ओर छोटे से बच्चे को गोद में उठाये बैठी थी। दूसरा बच्चा करीब ही खेल रहा था। वो कुछ बड़ा था। राम भाई होश में था। वो चालीस बरस का था। उसे ढूंढने में उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई।

देवराज चौहान को करीब पाकर राम भाई की आंखें फैल गयी।

“घबराओ मत।” देवराज चौहान धीमे स्वर में बोला- “मैं तुम्हारा हाल पूछने आया हूं।”

वो सूखे होंठों पर जीभ फेरकर रह गया।

“ये तुम्हारी पत्नी है?”

“ह-हां।”

“इसे कुछ देर के लिये बाहर भेज दो।”

राम भाई ने उसे बाहर जाने का इशारा किया। वो बच्चों के साथ बाहर निकल गयी।

“क्या हुआ था?” देवराज चौहान सामान्य स्वर में बोला- “ये हाल किसने किया?”

“मैं उसे नहीं जानता।”

“देखा था उसे?”

“हां।” राम भाई ने कुछ पलों के लिये आंखें बंद की फिर खोल ली- “पागल सा लगता था वो। मेरे पास आया और बोला कि...सुनो-तुम्हारा नाम क्या है?”

“क्यों?”

“बोलो-कुछ बात है तभी पूछ रहा हूं। देवराज चौहान नाम है तुम्हारा?”

“हां।” देवराज चौहान की आंखें सिकुड़ी।

“समझा। तो मैं बता रहा कि वो पागल-सा आदमी मेरे पास आकर बोला कि देवराज चौहान ने तुम्हें जो काम करने को कहा है, वो तुम नहीं करोगे। मस्त होकर बैठ जाओ। मैंने उसके बारे में पूछा कि वो कौन है-देवराज चौहान कौन है तो वो मुझे गालियां देने लगा। बोला मुझे जवाब दो कि तुम वो काम करोगे कि नहीं। मैं बोला करूंगा तो ये कहकर वो चला गया कि अब तुम उस काम को करने के लिये जिन्दा नहीं रहोगे।”

“फिर?”

कुछ पल खामोश रहकर राम भाई पुनः कह उठा।

“इस बात के घंटे भर बाद मैं सड़क के किनारे जा रहा था कि मुझे गोली मारी गयी। भरी-पूरी सड़क थी। लोग आ-जा रहे थे। अच्छा रहा कि गोली किसी को नहीं लगी। पास ही मैंने कार देखी। उसके भीतर उसी आदमी को बैठे देखा, जिसने मेरे से बात की थी। ये काम करने को मना किया था। उसके हाथ में रिवॉल्वर था। मैं भागा। तब वो दूसरी गोली चलाने वाला था। घबराहट में सीधा ही भाग लिया। जब कि मुझे किसी गली में घुस जाना चाहिये था। मुझे भागते पाकर उसे मौका अच्छा दिया होगा। उसने मुझ पर कार चढ़ा दी। ये तो अच्छा रहा कि बच गया। हाथ-पैर ही टूटे।” लम्बी सांस ली राम भाई ने।

“तुम उसे अच्छी तरह पहचान सकते हो, जिसने तुम्हें मारने की चेष्टा की?” देवराज चौहान ने पूछा।

“क्यों नहीं पहचानूंगा। जरूर पहचान लूंगा। उसने मेरे से बात की थी। मैंने उसे दो बार देखा।”

जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।

“तुम कहना क्या चाहते हो?”

“इसे सबकी तस्वीरें दिखाऊंगा कि इससे बात करने वाला, उनमें से न कोई हो।” देवराज चौहान कठोर स्वर में कह उठा- “इसे अब कोई खतरा नहीं। फिर भी तुम यहीं रहो। इसके पास।”

“तुम तस्वीर लेने जा रहे हो सबकी?”

“हां सबकी तस्वीरें तलाश करना भी आसान नहीं। भागदौड़ करनी पड़ेगी। तब तक तुम इसे आज की अखबार दिखाओ। अखबार में तीन तस्वीरें छपी हैं। त्रिखा की, जो मर चुका है। दूसरा राजेश गुलाटी और तीसरा जीवनलाल, जो बारूद  मैन बना था। शायद ये उन तीनों में से किसी को जानता हो।”

जगमोहन ने सहमति से सिर हिलाया।

“सुनो।” राम भाई सूखे होंठों पर जीभ फेरकर कह उठा- “मैं तुम्हारा काम नहीं कर पाया इसमें मेरी कोई गलती नहीं। वो...”

“जानते हैं हम।”

“तुमने जो दो लाख दिया था। वो वापस ले लो। मुझे कोई एतराज नहीं। घर पर रखा है वो...”

“हमें नहीं चाहिये। तुम घायल हो। उस पैसे को अपनी दवा-दारू पर खर्च करो। घर का खर्च भी चलता रहेगा। तुम्हारे ठीक होने तक।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा- “हम तो सिर्फ उसे तलाश करने की चेष्टा कर रहे हैं, जिसने तुम्हें हमारे काम से रोकने की चेष्टा की...”

राम भाई, देवराज चौहान को देखता रहा फिर बोला।

“तुमने बताया था कि जब मैं वहां पहुंचूंगा तो एक आदमी और भी होगा वहां, जो पीठ पर अखबारों का भरा थैला बांधकर मेरी ही तरह सबको वैसे ही खड़े रहने की धमकी...”

“जिसने तुम्हारा ये हाल किया, उसने उस दूसरे को गोलीमार दी।”

“ओह!” सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए उसने आंखें बंद कर ली- “इसका मतलब कोई तुम्हारा काम नहीं होने देना चाहता था। कोई तुम पर नज़र रख रहा था कि तुम क्या कर रहे हो। किस-किस से मिल रहे हो।”

“ठीक समझे। उसी कोई को तो ढूंढ रहा हूं।” देवराज चौहान ने कहा फिर जगमोहन से बोला- “मैं दूसरों की तस्वीरें लेकर आता हूं। तुम इसके पास ही रहना।”

“मैं यहीं हूं।”

देवराज चौहान पलटा और बाहर निकलता चला गया।

☐☐☐

भोपाल सिंह, विकास नारंग, अभिनव कालरा और राजेश गुलाटी ने खुद को उसी मकान में बंद कर रखा था। कमरे में एक तरफ तीस अरब के जेवरातों से भरी गठरी पड़ी थी। विकास नारंग और राजेश गुलाटी हसरत भरी निगाहों से छिपे तौर पर बार-बार गठरी को देख लेते थे। मिनट भर पहले ही अभिनव कालरा लंच पैक करा कर लाया था और साथ में लाया था आज का अखबार। वो हड़बड़ाया सा लग रहा था। उसके भीतर प्रवेश करते ही गुलाटी ने दरवाजा बंद किया।

“क्या हुआ तेरे को?” भोपाल सिंह उसकी घबराहट भांप गया।

खाना टेबल पर रखकर, सोफे पर बैठता हुआ बोला।

“आज का अखबार लाया हूं। गजब हो गया। पुलिस त्रिखा और गुलाटी के घर तक पहुंच गयी। अखबार में दोनों की तस्वीरें छपी हैं। त्रिखा की लाश तो पुलिस को मिल गयी, उसे पहचान भी लिया गया कि वो डकैती में शामिल था। गुलाटी की भी तस्वीर छपी है अखबार में। अब इसका बाहर जाना खतरे से खाली नहीं। कहीं पुलिस धीरे-धीरे हम तक न पहुंच जाये।”

“बकवास बंद करो।” भोपाल सिंह ने दांत भींचकर कहा और आगे बढ़कर उसके हाथ से अखबार लेना चाहा। परन्तु तब तक राजेश गुलाटी ने उसके हाथ से झपटकर अखबार ले लिया था और खोलकर, आंखें सिकोड़े, पहले पेज पर वो देखने लगा। विकास नारंग और भोपाल सिंह भी पास आ पहुंचे थे।

अभिनव कालरा परेशान सा उन्हें देखे जा रहा था।

दो मिनट बाद ही गुलाटी अखबार को टेबल पर फेंकता हुआ बोला।

“मुझे समझ नहीं आता कि काम होने के बाद हमें यहां क्यों रखा हुआ है। डकैती कर ली हमने। हमें हमारा हिस्सा दिया जाये ताकि पुलिस के खतरे से हम दूर हो सकें। पुलिस का खतरा बढ़ता जा रहा है।”

भोपाल सिंह ने दांत भींचकर उसे देखा।

“बढ़ नहीं रहा। कम हो रहा है।” स्वर धीमा था भोपाल सिंह का।”

“कैसे?”

“शुरू-शुरू में पुलिस काम करने में बहुत तेजी दिखाती है। उसके बाद हर दिन पुलिस की कार्यवाही ठण्डी होती चली जाती है। पुलिस की काम करने की रफ्तार कम हो जाती है। वो थक जाती है।” भोपाल सिंह गम्भीर था- “हम यहां आराम से रह रहे हैं। हमें कोई डर नहीं। अब तक पुलिस का थकना शुरू हो गया होगा। अगले पांच-चार दिनों में पुलिस अपने काम में ढीली पड़ने लगेगी। हम पर कसा पुलिस का अदृश्य शिकंजा ढीला होता चला जायेगा।”

गुलाटी दांत भींचे भोपाल सिंह को देखता रहा।

“जिसने हमसे डकैती करवाई है, उसने सोच-समझकर ही हमें यहां बिठा रखा है।” भोपालसिंह ने कहा- “कैद नहीं कर रखा हमें। दरवाजे खुले हैं। अरबों के जेवरात सामने पड़े हैं हम जा सकते हैं।”

“कैसे जा सकते हैं। वो हम पर नजर रख रहा है। हमारे बातें भी जान लेता है। कोई बड़ी बात नहीं कि बाहर उसके आदमी हम पर नजर रख रहे हों।” राजेश गुलाटी ने दांत भींचकर कहा।

तभी विकास नारंग गम्भीर स्वर में बोला।

“गुलाटी की ये बात तो ठीक है कि हमारी मर्जी के बिना हमें यहां रखा हुआ है। हमें हमारा हिस्सा दे दिया होता तो हम कब के इस शहर से पुलिस के डर से दूर निकल गये होते।”

“इस बात से तो मैं भी सहमत हूँ।” अभिनव कालरा बोला- “हम लोग अपना-अपना हिस्सा लेकर निकल जाते हैं। हम एक दूसरे को नहीं जानते। ऐसे में कोई पुलिस के हाथ लग भी गया तो दूसरे के बारे में नहीं बता पायेगा। यानि कि किसी को किसी से खतरा नहीं। सब अपने-अपने रास्ते पर।”

“ठीक बोलता है अभिनव।” विकास नारंग बोला।

गुलाटी ने, भोपाल सिंह के गम्भीर चेहरे को देखा।

“भोपाल। तुम उसे फोन करो, जिसने डकैती करवाई है। उससे कहो कि...।”

“कितनी बार कहूं कि मुझे नहीं मालूम वो कौन है। तो उसका फोन नम्बर कैसे होगा मेरे पास।”

“तूने ही तो हम चारों को इकट्ठा किया।” अभिनव कालरा बोला।

“मैंने जो किया। उसके कहने पर किया। फोन पर बात होती थी। खर्चे पानी की रकम कोई मुझ तक पहुंचा देता था।” भोपाल सिंह दांत भींचकर बोला- “जितना तुम्हारा उसके साथ रिश्ता है, उतना ही मेरा।”

पलों की चुप्पी उभरी।

“तो-फिर क्या किया जाये।” गुलाटी का स्वर तीखा था- “हम तीनों अपना हिस्सा लेना चाहते हैं। यहां से चले जाना चाहते हैं। इस बारे में किससे बात करें।”

भोपाल सिंह ने दोनों को देखा।

“गुलाटी की बात से तुम दोनों सहमत हो?”

“हां। हमें यहां रहने का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा।”

विकास नारंग ने फौरन सिर हिलाया।

“ठीक तो है। हमें हमारे हिस्से का दो-दो अरब दो।”

अभिनव कालरा बोला- “हम यहां से चलें।”

“दो-दो अरब नहीं।” गुलाटी ने कहा- “त्रिखा अब हमारे बीच नहीं रहा। उसका हिस्सा भी हम चारों में बंटेगा।”

“हां।” विकास नारंग कह उठा- “ये तो मैंने सोचा ही नहीं था।”

“अच्छी बात है।” भोपाल सिंह सोच भरे स्वर में बोला- “जब उसका फोन आयेगा तो इस बारे में बात करूंगा किक्या करना है। तब तक खाना खा लें तो बढ़िया रहेगा।”

कोई कछ न बोला।

कुछ ही पलों में गम्भीरता ओढ़े वो खाना खा रहे थे।

“पुलिस ने तेरे बारे में कैसे जान लिया?” अभिनव कालरा ने गुलाटी से पूछा।

“त्रिखा की लाश मिलने की वजह से ये गड़बड़ हुई। त्रिखा और मैं अक्सर एक साथ ही रहते थे। पुलिस को कुछ हाथ लगा होगा कि वो समझ गयी, डकैती में मैं और त्रिखा भी हैं।”

गुलाटी होंठ भींचे कह उठा।

“पहले क्यों नहीं सोचा ऐसा।” भोपाल सिंह बोला- “त्रिखा की लाश का चेहरा बिगाड़कर उसे फेंकते।”

गुलाटी ने उखड़े स्वर में कहा।

“मेरे को क्या पता था कि बात यहां तक पहुंच जायेगी।”

भोपाल सिंह कुछ कहने लगा कि फोन की बेल बज उठी। खाते-खाते सब ठिठके।

“उसी का फोन होगा।” विकास नारंग के होंठों से निकला।

“और किसका फोन आयेगा।” गुलाटी ने भोपाल सिंह को देखा- “तू जा। बात कर। ठीक से बात करना उससे। हम यहां नहीं रहना चाहते। अपना हिस्सा लेकर चले जाना चाहते हैं।”

“तू ही बात कर ले।” भोपाल सिंह ने उसे देखा।

“तू ज्यादा जानता है उसे उससे बात करते हुए तेरी-उसकी पटती है।” गुलाटी ने उसे घूरा।

“तुम लोग खाना खाओ।” भोपाल सिंह ने कहा और उठकर कुछ कदमों की दूरी पर मौजूद फोन की तरफ बढ़ गया।

बेल बजे जा रही थी।

“हैलो।” भोपाल सिंह ने रिसीवर उठाया।

“भोपाल।” वो ही आवाज उसके कानों में पड़ी।

“आप...”

“मैंने इन सब की बातें सुनीं। पागल हो गये हैं ये तीनों। समझा इसे?”

भोपाल सिंह से कुछ कहते न बना।

“सुना नहीं।”

“ये काम मेरे बस का नहीं है।” भोपाल सिंह धीमे स्वर में बोला- “तीनों टेड़े हैं।”

“मैं कहता हूं समझा उन्हें कि यहां से बाहर निकलना भी खतरे से खाली नहीं। पूरे शहर में नाके बंदी है। शिकारी कुत्तों की तरह पुलिस तुम सबको ढूंढ रही है। हर शक वाली जगह पर रेड कर रही है। ऐसे में क्या ये निकलकर बच सकेंगे। गलती से किसी ने छोटा-सा जेवरात भी बेचने की गलती कर दी तो सीधा जेल में जायेंगे।”

“बेचेंगे। खर्चे-पानी के लिये तो जेवरात बेचेंगे ही।”

“तू सब समझता है तो समझाता क्यों नहीं इन्हें।”

“मेरी बात इन्हें समझ नहीं आयेगी। आप समझा।”

“मैं फोन पर नहीं समझा...।”

“मेरी बात ये नहीं मानेंगे।” भोपाल सिंह ने टोका- “आपकीबात शायद मान जाये। त्रिखा का हिस्सा भी ये बांटने को रहे हैं। सब बातें तो आपने ही संभालनी हैं।”

उधर से कुछ पलों के लिये आवाज नहीं आई।

तीनों खा रहे थे। परन्तु इधर ही देख रहे थे। भोपाल सिंह का कोई शब्द कान में पड़ जाता तो कोई नहीं। पूरी बात वे नहीं समझ रहे थे।

“हैलो।” भोपाल सिंह ने खामोशी लम्बी होते देखकर कहा।

“बताईये, क्या करना है।”

“भोपाल सिंह।” इस बार कानों में पड़ने वाला स्वर बेहद शांत था- “ये तीनों बेवकूफ हैं। नहीं जानते कि किसी बड़ी डकैती की वो बात भी इनके मुंह से निकलवा लेगी जो ये नहीं जानते होंगे। पुलिस का काम करने का अपना ही ढंग होता है। इस केस को इंस्पेक्टर पवन कुमार वानखेड़े देख रहा है। सुना है वो बहुत खतरनाक पुलिस वाला है।”

“मैं उसे नहीं जानता।”

“मैं भी नहीं जानता। लेकिन सुना है उसके बारे में।”

भोपाल सिंह गम्भीर नजर आ रहा था।

“भोपाल। मैं कोई खतरा नहीं लेना चाहता। तीस अरब की डकैती करना बच्चों का खेल नहीं। कर ली जाये तो दौलत को संभाल कर ठिकाने लगाना बहुत मेहनत का और खतरनाक काम है। क्यों?”

“ठीक कह रहे हैं आप।”

“ये तीनों अपना हिस्सा लेकर यहां से चले जायेंगे। मुसीबतें खड़ी होगी। हमारे लिए खतरा पैदा होगा। पुलिस के हाथ चढ़ेंगे।

ऐसे में पुलिस को कोई न कोई रास्ता मिल जायेगा, हम तक का। तुम भी फंसोगे भोपाल सिंह।”

भोपाल सिंह के होंठ भिंच गये।

“सुन रहे हो?”

“हां”

“समझ रहे हो कि ये तीनों हमारे लिये खतरा पैदा कर देंगे। यहां से बाहर जाकर।”

“हाँ। ये बात तो सच है।”

“बातों से ये नहीं समझेंगे। बातों से समझने वाले ये हैं ही नहीं। तुम्हे क्या लगता है?”

“शायद आप ठीक कह रहे हैं।”

“शायद नहीं पक्का मैं ठीक कह रहा हूं। तुम दस अरब के मालिक बनना चाहते हो?”

“द-दस...।”

“मुंह बंद रखो। दूसरों को क्यों सुनाते हो। मैं तुम्हारी बात कर रहा हूँ। तुम समझदार हो। तरक्की करोगे। दस अरब की दौलत कितनी होती है। सोचो-क्या इतनी बड़ी दौलत का मालिक बनना पसन्द करोगे।”

“लेकिन ये दस अरब आयेगा कहां से?”

भोपाल सिंह खामोश रहा।

“दो अरब तो तुम्हारा हिस्सा भी है। दो त्रिखा का तुम्हें मिल जायेगा, जो मर चुका है बाकी का छ: तुम्हें ही तैयार करना होगा। तभी तो दस पूरा होगा। छ: का इन्तजाम तुमने कैसे करना है।”

“इन तीनों का छ: ही तुम्हें मिल सकता है। मेहनत करो। गोली की आवाज नहीं आनी चाहिये। बाहर वालों ने सुन ली तो पुलिस आ जायेगी। खेल खत्म हो जायेगा। चाकू वगैहरा है तुम्हारे पास?”

“हां” भोपाल सिंह का चेहरा सख्त हो उठा था।

“चाकू के साथ-साथ अपने दिमाग का भी इस्तेमाल करना।

तीनों को खत्म करो और दस अरब के मालिक बन जाओ। वैसे भी जितने राजदार कम होंगे भविष्य में हमें खतरा कम होगा।

मैंने ठीक कहा कि गलत?”

“ठीक कहा।”

“जल्दी से काम निपट देना। देर हुई तो ये गड़बड़ करेंगे।”

इसके साथ ही दूसरी तरफ से लाइन कट गयी।

भोपाल सिंह रिसीवर थामें खड़ा रहा। चेहरे पर से सोच के कई रंग गुजर रहे थे। फिर उसने रिसीवर रखा। खुद पर काबू पाया और वापस आ बैठा। उसके साथ खाना खाने लगा।

“क्या हुआ?” अभिनव कालरा बोला।

“बात की?” गुलाटी ने पूछा।

“हां।” भोपाल सिंह ने खाना शुरू कर दिया।

“क्या बोलता है वो?” विकास नारंग ने उसे देखा।

“उसका कहना है कि एक-दो दिन में आकर हिस्से कर देगा। हिस्से करते वक्त उसका पास होना जरूरी है। त्रिखा के हिस्से की बात की। मान गया वो।” भोपाल सिंह के कहा- “उसका कहना है कि मैंने तो कुल दस अरब देना है। दस अरब को हममें से एक ले ले या सब, इससे उसे कोई मतलब नहीं।”

“मतलब कि सवा दो-सवा दो अरब-नहीं ढाई-ढाई अरब के जेवरात हमें मिलेंगे।” गुलाटी मुस्कराया।

भोपाल सिंह हंसा।

“क्यों हंसा?”

“मैं सोच रहा हूं कि त्रिखा के बाद तू डकैती के माल को यहां पहुंचा कर मर जाता तो तेरा हिस्सा भी हमें मिल जाता। साला तू मरा ही नहीं। जिन्दा रहा।” भोपाल सिंह की आवाज सामान्य थी।

राजेश गुलाटी ने खा जाने वाली नजरों से उसे घूरा।

“तू जब त्रिखा की लाश ठिकाने लगाने गया था। तब तू पुलिस की गोली से मर जाता। तेरा हिस्सा मैं ले लेता।”

“मजाक बंद।” भोपाल सिंह बोला- “वो जो भी है। कल-परसों में आयेगा। हम सब को हिस्सा देकर, अपने बीस अरब के जेवरात ले जायेगा। उसके बाद हम अपने-अपने रास्ते पर चले जायेंगे।”

“मुझे सोचने दो कि इतना बड़ा माल लेकर मैंने क्या करना है। कहां जाना है।” अभिनव कालरा कह उठा।

“तु मेरे साथ चलना।” विकास नारंग ने कहा।

“तेरे साथ?” अभिनव कालरा ने उसे देखा- “तूने कहां जाना है। क्या करना है।”

“वो तो तय कर लूंगा। तेरे को साथ रखने में फायदा है। रात को तेरा गला दबा दूंगा। तेरा वारिस बनकर तेरा माल हड़प लूंगा।”

“तेरा गला दब गया तो?” अभिनव कालरा ने उसे घूरा।

“तो मेरा वारिस तू।”

“बेकार की बातों को छोड़ो।” गुलाटी बोला- “खाना खाओ। हमें भविष्य के बारे में सोचना चाहिये।”

बातों के बीच वो खाना भी खाते जा रहे थे।

विकास नारंग की छिपी निगाह बार-बार, भोपाल सिंह पर जा रही थी।

खाना खाने के बाद सब उस बड़े कमरे में इधर-उधर लेट गये।

भोपाल सिंह एक कोने में लेटा, आंखें बंद किए, सिग्रेट के कश ले रहा था कि विकास नारंग खामोशी से उसके पास आ गया। भोपाल सिंह ने उसे देखा। विकास नारंग मुस्कराया।

“क्या सोच रहे हो?” नारंग बोला।

“यही कि पैसा लेकर कहां जाऊं?” भोपाल सिंह मुस्कराया।

“तेरे को न पता हो तो बता दूं कि मैं सामने वाले के चेहरे को बा-खूबी पढ़ लेता हूं। जब हम खाना खा रहे थे और तू अपने बाप से फोन पर बात कर रहा था तो मैं तेरे को ठीक से सुन तो नहीं सका लेकिन तेरे चेहरे को पढ़ा।”

भोपाल सिंह ने लापरवाही से उसे देखा।

“पढ़ लिया।”

“मजाक मत कर।” विकास नारंग गम्भीर होकर बोला- “तब मैंने तेरे चेहरे पर पढ़ा कि तू कोई हरामीपन करने वाला है। करेगा। उधर से तेरे को क्या बोला उसने?”

भोपाल सिंह उसे देखने लगा।

“बता, मेरे को क्या देखता है।” विकास नारंग ने उसे घूरा- “मैं तो पक्का उसी समय समझ गया था कि तेरे को उधर से कुछ खास बात कही गयी है। तभी चेहरे की सुईयां तेजी से उल्टी-उल्टी घूमने लगी थी।”

भोपाल सिंह ने गुलाटी और कालरा पर निगाह मारी।

कालरा नींद में आता महसूस हो रहा था। जबकि गुलाटी नींद लेने की कोशिश में करवटें ले रहा था।

“क्या कहूं तेरे से?” भोपाल सिंह ने गहरी सांस ली।

“कह दे।”

“मैं तो ये सोच रहा हूं कि अगर त्रिखा गया तो हिस्सा दो का ढाई अरब हो गया। अगर एक-दो और चले गये तो हिस्सा पांच-पांच अरब हो सकता है।” भोपाल सिंह का स्वर धीमा था।

“मतलब कि पांच अरब तेरा, पांच मेरा।”

“अपने काम की बात तू जल्दी समझ जाता है।” भोपाल सिंह ने उसे देखा।

दोनों में खामोशी रही।

एक-दूसरे को देखते रहे।

“ये बात तेरे को उसने कही, जिसका फोन आता है।” नारंग बोला।

“त्रिखा का हिस्सा अपने पल्ले आया तो, ये सोचा। क्या इरादा है, बात जंची।”

“बुरा क्या है।” नारंग का स्वर कड़वा हो गया- “इनमें अपना रिश्तेदार तो कोई है नहीं। हो भी तो तब भी कोई बात नहीं। दौलत से ज्यादा तो नहीं होता रिश्तेदार। क्यों, मैंने गलत कहा क्या?”

“ठीक कहा। लेकिन शोर नहीं होना चाहिये गोली चलने का।” भोपाल सिंह की आंखों में वहशी भाव चमके।

“बिना शोर के कैसे जमेगा मामला। गोली से सालों का भेजा उड़ा देते हैं।”

“चाकू से काम लेना पड़ेगा। गोली से शोर होगा। बाहर किसी ने सुना तो पुलिस को फोन जायेगा। पुलिस आयेगी। हम पकड़े जायेंगे। अरबों की दौलत भी हाथ से जायेगी।” भोपाल सिंह दांत भींचकर कह उठा।

“बात तो तेरी ठीक है।” विकास नारंग ने खतरनाक निगाहों से अभिनव कालरा और गुलाटी को देखा।

“दोनों खाना खाकर सुस्त हैं। कालरा तो नींद में चला गया लगता है। मौका अच्छा है।”

नारंग ने भोपाल सिंह को देखा।

“चाकू से काम करना है?”

“हां। मेरे पास तो गुलाटी वाला चाकू है। त्रिखा की लाश से निकाला था। तेज चाकू है। गुलाटी को मैं संभाल लूंगा।”

“मेरे पास चाकू नहीं है।”

“किचन में मैंने चाकू देखा था सब्जी काटने वाला।”

“उससे क्या होगा?”

“कालरा के गले में घुसेड़ देना। मुंह दबा देना। कालरा कठिन नहीं है। आसानी से संभाला जा सकता है उसे। तब तक मैं गुलाटी से फुर्सत पा लूगा। तेरे काम में हाथ बंटा दूंगा।” भोपाल सिंह शब्दों को चबाते हुए कह रहा था।

“समझ गया।”

“लापरवाह मत होना। उसकी चीख नहीं निकलनी चाहिये।”

“नहीं निकलेगी।” विकास नारंग के होंठों से दबी-दबी गुर्राहट निकली- “मैं चाकू लेकर आता हूं।” कहने के साथ ही वो आहिस्ता से उठा और किचन की तरफ बढ़ गया।

भोपाल सिंह ने कालरा और गुलाटी को देखा।

मौका अच्छा था। उसने चाकू निकाला और खोल लिया। दो नहीं वो तीनों को ही साफ कर देना चाहता था। दोनों के बाद उसका इरादा फौरन विकास नारंग को भी खत्म कर देने का था।

दबे पांव विकास नारंग वापस आया। उसके हाथ खाली थे। परन्तु आते ही उसने अपनी जेब की तरफ इशारा किया कि सब ठीक है चाकू ले आया है।

भोपाल सिंह उठा।

आंखों ही आंखों में इशारे हुए। नारंग दबे पांव नींद में डूबे कालरा की तरफ बढ़ा। भोपाल सिंह चाकू थामें गुलाटी के सिर पर जा पहुंचा। आंखों में वहशी भाव नजर आ रहे थे। गुलाटी आंखें बंद किए लेटा था। बहुत ही ज्यादा फुर्ती दिखाई भोपाल सिंह ने।

एक हाथ उसने गुलाटी के बंद होंठों पर टिकाया। चौंककर गुलाटी ने आंखें खोली कि उसी पल, चाकू के दांतों वाली साईड गुलाटी के गले पर तेजी से फेर दी। गुलाटी जोरों से तड़पा। उसका शरीर उछलने को हुआ। भोपाल सिंह ने उसके होंठों पर हथेली टिकाई रखी और चाकू का दूसरा वार ठीक उसके दिल वाले हिस्से पर किया। आखिरी तड़पन हुई, गुलाटी के शरीर में, फिर वो शांत पड़ गया। आंखें फटी हुई थी गुलाटी की। वो उस पर झुका हुआ था तो उसे लग रहा था, जैसे गुलाटी उसे ही घूर रहा हो। भोपाल सिंह ने उसके दिल में धंसा चाकू खींचकर बाहर निकाला। चाकू का फल खून में डूबा लाल सुर्ख हो रहा था। दरिन्दा बना हुआ था भोपाल सिंह । चाकूक खून से सने फल से ही उसने गुलाटी की खुली-फटी आंखों को बंद किया। दिल वाले हिस्से से तेजी खून बाहर निकलने लगा था। गला खून से इस तरह लाल सुर्ख हो गया था कि पता नहीं चल रहा था कि गले के किस हिस्से से को काटा गया है।

पीछे मध्यम सी आहट हुई।

भोपाल सिंह फुर्ती से पलटा।

अभिनव कालरा को खत्म करने के बाद विकास नारंग उसके सिर पर आ पहुंचा था। हाथ में छोटा सा चाकू, जो कि खून में डूबा था, चाकू वाला वो हाथ उसने सिर से ऊपर उठा रखा था। अगर भोपाल सिंह को पलटने में दो पलों की भी देरी हो जाती तो वो छोटा चाकू उसके जिस्म के किसी हिस्से में प्रवेश कर जाना था। लेकिन बचाव हो गया। अभी तो नारंग के हाथ में दबे चाकू का नीचे आना शुरू ही हुआ था।

भोपाल सिंह ने बायां हाथ ऊपर उठाया और फौरन उसकी चाकू वाली कलाई थाम ली।

दोनों ने पागलों के से अंदाज में एक-दूसरे को देखा।

भोपाल सिंह के चेहरे पर दरिन्दगी से भरी मुस्कान उभरी।

“क्यों।” भोपाल सिंह ने मौत से भरे भाव में कहा- “पूरे दस अरब का मालिक बनना चाहता है। साले वो तो मैं बनूंगा। मेरे को मारता है। मेरी जान लेना चाहता था।” इसके साथ ही उसके हाथ में दबा खून से सना चाकू पूरा का पूरा विकास नारंग के पेट में धंसता चला गया।

विकास नारंग की आंखें फैल गयी।

तीव्र झटके के साथ भोपाल सिंह ने चाकू बाहर निकाला और दूसरा वार उसके गले पर किया। गले में चाकू का वार इस तरह किया कि चाकू का फल पीछे से निकलकर नज़र आने लगा। भोपाल सिंह ने उसकी चाकू वाली कलाई छोड़ी तो वो पीठ के बल नीचे जा गिरा। वहीं खड़ा भोपाल सिंह उसे देखता रहा।

पागलों जैसा लग रहा था इस वक्त वो।

कुछ देर तड़पने वाले ढंग से विकास नारंग का शरीर हौले-हौले हिलता रहा फिर शांत पड़ गया।

“हरामजादा।” भोपाल सिंह ने आगे बढ़कर नारंग के मृत शरीर को ठोकर मारी- “मेरे को मार कर दस अरब पा लेना चाहता था। मर साले। तुम सब का हिस्सा मेरा है। दस अरब-राजाओं की जिन्दगी होगी अब मेरी।” होंठों ही होंठों में जाने क्या बड़बड़ाता रहा वो। बाथरूम में गया। खून में डूबे हाथ धोने लगा।

जहां-जहां खून के छींटे पड़े थे। वो भी साफ करने लगा। अब पहले की तरह दरिन्दा नहीं लग रहा था। वो बहुत हद तक सामान्य था। उसका चेहरा आवेश के तूफान से बाहर आ चुका था वो दस मिनट बाद बाथरूम से बाहर आ गया।

तीनों लाशों पर नजर मारते हुए उसने सिग्रेट सुलगाई। कमरे में हर तरफ खून ही खून बिखरा नजर आ रहा था। सिग्रेट सुलगाते हुए उसने महसूस किया कि उसके हाथ कांप रहे हैं लेकिन वो जानता था कि ऐसा होता है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा। इन लाशों को देखने की अभी आदत पड़ जायेगी।

तभी फोन की बेल बजी।

भोपाल सिंह चौंका। तेजी से सांसें दौड़ने लगी। जब विश्वास हुआ कि फोन की बेल बज रही है तो राहत सी महसूस की। आगे बढ़ा और फोन के पास पहुंचकर रिसीवर उठाया।

“हैलो।” भोपाल सिंह को अपनी आवाज पराई सी लगी।

“गुड।” उसके कानों में शांत हंसी वाली आवाज पड़ी- “तुमने तो बहुत तेजी दिखाई।”

“म-मैंने तीनों को खत्म...।”

तुम लोगों की आवाज सुनी थी मैंने और समझ गया कि तुमने काम कर दिया है।”

“दस अरब मेरे।”

“हां तुम्हारे खरे। मैं मिलूंगा तुमसे।”

“कब?”

“आज ही। आज ही आऊंगा तुमसे मिलने। दस अरब तुम्हें दूंगा। बाकी मैं ले जाऊंगा। तुम सच में बहुत काम के आदमी हो। भोपाल सिंह इज ग्रेट मैन।”

“थ-बैंक्यू साहब जी।” भोपाल सिंह की आवाज अपने काबू में नहीं थी।

“तुमने कितनी आसानी से साढ़े सात अरब कमा लिए। जानते हो ये कितनी बड़ी दौलत होती है।”

“हां”

“नहीं जानते। हां तो कह रहे हो, लेकिन जानते नहीं। जब हाथ में आयेगी इस्तेमाल करोगे, तब तुम्हें पता चलेगा कि ये कितनी बड़ी दौलत होती है। मैं आज ही तुमसे मिलने आऊंगा।”

घबराहट थी। परन्तु उसकी हालत काबू में थी। वो आगे बढ़ा कहने के साथ ही उधर से फोन बंद कर दिया गया।

भोपाल सिंह ने रिसीवर रखा। चेहरे पर थकान और और कुर्सी पर बैठने के बाद उंगलियों में फंसी सिग्रेट से कश लेने लगा।

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