आंटी के घर शनिवार शाम को जो मीटिंग हुई उसमें रूपचन्द जगनानी भी शामिल था । विमल के निर्देशानुसार वह अपने साथ एक और नक्शे की कापी लेकर आया था । वह नक्शा जौहरी बाजार के इलाके की सब-सॉयल (Sub-Soil) के बारे में जानकारी देता था ।
रूपचन्द की वहां मौजूदगी पर किसी ने भवें न उठाई । वास्तव में उन लोगों में यह पहले से ही फैसला हो चुका था कि रूपचन्द को अभियान का सक्रिय सदस्य बनाना उन्हीं के हक में फायदेमन्द था ।
रूपचन्द वहां कतई इत्मीनान से नहीं बैठा हुआ था । वह बड़े नर्वस भाव से बार-बार पहलू बदल रहा था और सिगरेट के कश लग रहा था ।
आनन्द उसकी दशा को समझ रहा था इसलिए बार-बार उसका कन्धा थपथपाकर उसे आश्वासन दे रहा था ।
विमल ने एक नक्शा अपने सामने फैलाया और सबका ध्यान एक उस स्थान की ओर आकर्षित किया जहां उसने एक तीर का निशान लगाया हुआ था और फिर उससे आगे एक दोहरी लकीर खींची हुई थी ।
“दोस्तो” - वह बोला - “यह वह सीवर रूट है जो वाल्ट की इमारत के सबसे करीब से गुजरता है और इस तीर के निशान से इस दोहरी लकीर के सिरे तक हमने सुरंग खोदनी है जोकि पचास फुट लम्बी होगी । इतना छोटा रूट निर्धारित करना सिर्फ और सिर्फ जगनानी साहब द्वारा मुहैया कराए गए नक्शों की वजह से सम्भव हो सका है । आधुनिक उपकरणों की सहायत से पचास फुट लम्बी और चार फुट व्यास की अपने मतलब की सुरंग हम बड़ी हद पांच दिन में खोद सकते हैं ।”
“सुरंग के रास्ते में” - मुबारक अली बोला - “ईंट-पत्थर-चट्टानें क्या आएगा, हमें क्या मालूम ?”
“हमें नहीं मालूम । फिर भी मेरा अन्दाजा है कि हम पांच दिन में यह सुरंग खोद सकते हैं । सुरंग के सिरे पर वाल्ट की दीवार, जो कि यकीनन री-एनफोर्सड कंक्रीट की होगी, में छेद करने में हमें वक्त लग सकता है लेकिन अगर कोई अनहोनी न हुई तो कुल मिला कर एक हफ्ते में हम वाल्ट में छेद करने में कामयाब हो चुके होंगे ।”
जगनानी ने उस वक्त का अपने पास उपलब्ध वक्त से हिसाब लगाया और फिर हिम्मत करके बोला - “माल को रोकड़े में तब्दील करने में कितना वक्त लगेगा ?”
विमल ने खांडेकर की तरफ देखा ।
“दो दिन ।” - खांडेकर निसंकोच बोला ।
“वहां से नोट हासिल होने की कतई कोई उम्मीद नहीं ?”
“पूरी उम्मीद है लेकिन तब जब कि लॉकर जामवन्तराव की डुप्लीकेट चाबियों से खुलें । अगर लॉकरों के दरवाजों को गला कर खोलना पड़ा तो लॉकर खुलने से पहले ही एसिटिलीन टार्च का हाई टैम्प्रेचर भीतर मौजूद नोटों को फूंक चुका होगा ।”
“ओह !”
“मैंने एक लिस्ट बनाई है उस सामान की” - विमल ने एक लम्बा कागज सबके सामने लहराया - “जिसकी कि हमें अपने काम में जरूरत होगी । मैं लिस्ट पढता हूं, आप लोग जरा इस पर गौर फरमाएं । मैंने सीवर को भीतर से देखा है । जैसा कि अपेक्षित ही था, वहां गन्दगी, बदबू और चूहों का बोलबाला है जिसकी वजह से हमारी सबसे अहम जरूरत है घुटनों तक आने वाले गमबूट, वाटरप्रूफ बरसातीनुमा ओवरआल, रबड़ के दस्ताने और बैटरी संचालित हैडलाइट लगे ऑक्सीजन के गैस मास्क । हम सात जनों में से क्योंकि छ: जने सीवर के भीतर काम कर रहे होंगे, इसलिए कम-से-कम छ:-छ: अदद ये चीजें हमें चाहिए ।”
“और ?” - मुबारक अली उतावले स्वर में बोला ।
“जैसा कि जगनानी साहब द्वारा आज लाए नक्शे से जाहिर होता है” - विमल बोला - “जिस जगह हमने सुरंग खोदनी है, वहां की सब-सायल कमजोर है ।”
“तो क्या हुआ ?”
“तो यह हुआ कि जो सुरंग हम खोदेंगे उसकी छत एकाएक, बिना किसी वार्निंग के, भरभराकर हमारे ऊपर ढेर हो सकती है और वहीं हमारी कब्रें तैयार हो सकती हैं ।”
मुबारक अली हड़बड़ाया ।
“इसलिए खोदी गई सुरंग की छत को सपोर्ट देने के लिए काफी सारे फट्टे और बल्लियों की जरूरत होगी, सीमेंट और रेत की जरूरत होगी । उनके इस्तेमाल से ही हम निश्चिन्त हो सकेंगे कि छत भराभरा हमारे ऊपर नहीं आ पड़ेगी ।”
“बाप” - मुबारक अली प्रशंसात्मक स्वर में बोला - “तू सोहल है । तू निरा सोहल है । तू एकदम खालिस सोहल है ।”
“सोहल न हुआ” - वागले व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “डालडे का डिब्बा हो गया ।”
सब हंसे ।
“आगे सुनिए” - विमल हाथ उठाकर सबको चुप कराता हुआ बोला - “आगे हमारी जरूरत है खुदाई से निकला मलबा ठिकाने लगाने के लिए बोरे और हाथ से धकेली जाने वाली वैसी ट्रालियां जो कमेटी के सफाई कर्मचारी इस्तेमाल करते हैं, विभिन्न आकारों के हथौड़े और छेनियां, बाल्टियां, तसले, गेंतियां, फावड़े, लोहे की लम्बी छड़ें, पेचकस । इनमें से कौन-सी चीज कितनी-कितनी चाहिए यह मैंने लिस्ट में लिख दिया है । इसमें आप लोग कोई घटबढ करना चाहें तो खुशी से कर सकते हैं ।”
“वो बाद की बात है ।” - आनन्द बोला - “पहले मुकम्मल लिस्ट सुन लें ।”
“हां ।” - जामवन्तराव बोला ।
“मैं वही सुना रहा हूं ।” - विमल बोला - “आगे हमें चाहिए ऑक्सी-एसिटिलीन टार्च, उनको फीड करने वाले गैस सिलेंडर, मसाले की राडें, वैल्डरों द्वारा काम में लाए जाने वाले एन्टीग्लेयर गागल्स, कुछ डायनामाइट की स्टिक्स, भले ही वे इस्तेमाल न हों, छ: सैल वाली शक्तशाली टार्चें, बिजली की केबल ।”
“वो किसलिए ?” - मुबारक अली बोला ।
“सीवर में रोशनी करने के लिए । इलैक्ट्रिक ड्रिल चलाने के लिए । धुआं निकालने के लिए एग्जास्ट फैन चलाने के लिए ।”
“वहां कनैक्शन कहां से मिलेगा ?”
“सीवर में से ही मिलेगा और कहां से मिलेगा ! बिजली की केबलें भी तो सीवर में से ही दौड़ रही हैं । मैंने एक जगह उनका जंक्शन बाक्स देखा था । उसी जंक्शन बाक्स से हम अपनी जरूरत के लिए कनैक्शन टेप कर सकते हैं ।”
“हूं ।”
“बिजली की केबल पानी में न डूबे इसके लिए हमें सीवर की दीवार में हुक ठोककर उसे ऊंचा टांगना होगा । इसके लिए हमें काफी सारे हुक चाहिए होंगे । इस सारे सामान को मैनेहोल से लेकर सुरंग के साइट तक ढोने के लिए हमें एक रबर की, हवा से फूलने वाली किश्ती चाहिए होगी । इसी किश्ती को हम मलबे के बोरे मैनहोल तक ढोने के लिए इस्तमाल कर सकते हैं । इस तरीके से हमारी काफी लेबर बच जाएगी ।”
“किश्ती तैर जाएगी ?” - आनन्द सन्दिग्ध भव से बोला ।
“क्यों नहीं तैरेगी ? आखिर सीवर में घुटनों-घुटनों पानी है ।”
“आगे ।” - मुबारक अली उतावले स्वर में बोला - “आगे बढो, बाप ।”
“सुरंग खोदने में काम आने वाला सामान तो बस इतना ही है लेकिन इसके अलावा हमें और भी चीजें चाहिएं ।”
“और क्या ?”
“जैसे खाने-पीने का डिब्बाबन्द इतना सामान कि वो एक हफ्ता चल सके । आखिर हमें रात-रात-भर सीवर में काम करना होगा ।”
“वो तो है ।” - जार्ज सैबेस्टियन बोला ।
“उसके अलावा एक मिट्टी के तेल का स्टोव । मिनरल वाटर की बोतलें । नमक । ग्लूकोस । फर्स्ट एड किट । ट्रांक्विलाइजर, हर्ट दवायें, तौलिए और किसी इमरजेन्सी से दो-चार होने के लिए एक स्टैन्डबाई डॉक्टर ।”
“इमरजेन्सी कैसी ?” - जामवन्तराव बोला ।
“किसी को गम्भीर चोट लग सकती है । किसी का दम घुट सकता है । कोई सुरंग के बन्द माहौल का खौफ खाकर क्लास्ट्रोफोबिया (Claustrophobia) का शिकार हो सका है । ऐसा कोई हादसा हो जाने पर हम मरीज को हस्पताल नहीं ले जा सकते ।”
“मैं समझ गया तुम्हारी बात ।” - आनन्द एकाएक बोला - “ऐसा डॉक्टर मेरे जिम्मे रहा ।”
“कौन है वो ?”
“मेरा पड़ोसी । मेरी दोस्त है । मेरा राजदां है । तुम फिक्र न करो । मैंने कहा न, ऐसा डॉक्टर और उसकी सेवाएं मेरे जिम्मे ।”
“गुड । अगली आइटम है हैवी ड्यूटी हाइड्रालिक लिवर ।”
“वो किसलिए ?” - जामवन्तराव बोला ।
“जब हम सुरंग खोद चुके होंगे, उसके रास्ते वाल्ट की दीवार में छेद कर चुके होंगे, तो भी छेद के सामने लगी किसी लॉकर केबिनेट की वजह से भीतर घुसना सम्भव न होगा । उस केबिनेट को धक्का देकर सरकाना नामुमकिन होगा कयोंकि तंग सुरंग में उसके पीछे हम सब जने न खड़े हो सकेंगे और न छ: आदमी कैबिनेट धकेलने के लिए काफी होंगे । इस काम को हमने हाइड्रालिक लिवर से अन्जाम देना है । हम वह लिवर, या जैक कह लीजिए, कैबिनेट के पिछे लगाकर चलायेंगे तो कैबिनेट यूं छेद से परे सरकती जाएगी जैसे पहिया बदलने के लिए ट्रक को जैक लगाते हैं तो ट्रक उठता चला जाता है ।”
“वैरी गुड ।” - आनन्द बोला ।
बाकी लोगों की गरदनें भी सहमति में हिलीं ।
“अब एकाध चीज ऐसी है जो मिल जाए जो अच्छा है लेकिन उसके न मिलने से हमारा काम नहीं अटकने वाला ।”
“मसलन ?” - मुबारक अली बोला ।
“मसलर दो वायरलैस टेलीफोन जिनसे सीवर के भीतर और बाहर मैनहोल के ऊपर खड़े हमारे ट्रक में सम्पर्क बना रहे सके । इस तरीके से अगर ऊपर सड़क पर हमारे लिए कोई खतरे का आलम पैदा हो रहा होगा तो हमें भीतर सीवर में एडवांस वार्निंग मिल जाएगी ।”
“इसके मिलने में क्या दिक्कत है, बाप ?”
“ऐसे वायरलैस टेलीफोनों के प्राइवेट इस्तेमाल पर पाबन्दी है ।”
“तो क्या हुआ ?”
“इसकी खरीद पर खरीददार से सवाल हो सकते हैं ।”
“चोर बाजार में कौन साला सवाल करेगा !”
“ये टेलीफोन सैट चोर बाजार में मिलेंगे ?”
“मैंने पूछा नहीं लेकिन, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, ऐसी कौन-सी चीज है जो चोर बाजार में नहीं मिलती ?”
“कोई चीज नहीं ।” - जार्ज सैबेस्टियन बोला ।
“देखा !”
“गुड ।” - विमल बोला ।
“तुम और बोलो ।”
“एक स्पैशल ब्लो टार्च होती है जो लेसर बीम (Laser Beam) से चलती है, वो प्रति मिनट, चार इंच री-एनफोर्सड कंक्रीट को गला सकती है । अगर लेसर हमें मिल जाए तो हमारा काम बेहद आसान हो जाएगा ।”
“वैसे मिलती है ?”
“मिलती तो होगी ।”
“ऐसी आइटम तो” - खांडेकर पहली बार बोला - “बहुत महंगी होगी !”
“हां । तीस-पैंतीस हजार से कम की आइटम तो क्या होगी !”
“यह हमारा खर्चे का बजट बढा देगी ।”
“लेकिन काम भी तो देखो कितना आसान कर देगी !”
“मालूम करेंगे, बाप !” - मुबारक अली बीच में बोल पड़ा - “मिलती होगी तो लेंगे । तुम आगे बढो ।”
“जो सुरंग हम खोदेंगे, उसके दहाने को इस प्रकार ब्लॉक करने का प्रबन्ध करना होगा कि दिन के वक्त अगर कोई सीवर में घुस आए तो उसे सुरंग के अस्तित्व का पता न लगे ।”
“ये कैसे होएंगा, बाप ?”
“इसके लिए हमें कुछ स्पेशल बोर्ड तैयार करने होंगे जिनका रंग एकदम सीवर की दीवारों के रंग से मिलता-जुलता होगा । फिर उन बोर्डो को सुरंग के दहाने पर युं फिट करने का प्रबन्ध किया जाएगा कि दीवार में और उन बोर्डों में फर्क नहीं महसूस होगा । इससे सुरंग तो छुपेगी ही, साथ ही हमारे इस्तेमाल का सारा सामान भी हम रोज उसके पीछे छुपा सकेंगे ।”
“वैरी गुड ।” - आनन्द बोला, उसे वह बात बहुत जंची - “यानी कि रात को हम खाली हाथ सीवर में घुसेंगे और सुबह खाली हाथ ही सीवर से निकलेंगे ।”
“बिल्कुल ।” - विमल बोला ।
“भाई साहब, इलैक्ट्रिक ड्रिल और हथौड़े वगैरह चलाने की आवाज रात के सन्नाटे में सीवर के बाहर भी तो सुनाई दे सकती है !”
“नहीं सुनाई दे सकती ।” - विमल बोला - “पिछली रात मैं और वागले यह तजुर्बा करके देख भी चुके हैं कि ऐसी आवाजें बाहर नहीं पहुंचतीं ।”
“वैरी गुड ।”
“और ?” - मुबारक अली बोला ।
“और बस !” - विमल बोला - “अब जो अहम काम हमारे सामने है, वो साजो-सामान की खरीददारी का है ।”
“वो क्या मुश्किल काम है ! दो घण्टे में सारा सामान खरीदा जा सकता है । मैं एक ही ठिकाने से...”
विमल ने इनकार में सिर हिलाया ।
“नहीं खरीदा जा सकता ?” - मुबारक अली हैरानी से बोला ।
“खरीदा जा सकता है, लेकिन हमने खरीदना नहीं है । खास तौर से एक ही ठिकाने से हरिगज नहीं खरीदना है । हमने कोई एक आइटम तक एक ही ठिकाने से नहीं खरीदनी । जैसे अगर हमें तीन एसिटिलिन टार्चों का जरूरत है तो वे हम तीन ऐसे इलाकों में स्थित तीन दुकानों से खरीदेंगे जिनमें आपस में कम-से-कम दस मील का फासला होगा । अगर हमने बीस हथौड़े खरीदने हैं तो हम वे दो-दो करके दस दुकानों से खरीदेंगे । अगर हमने पांच टार्चें खरीदनी के वो हम एक-एक करके पांच दुकानों से खरीदेंगे ।”
“फायदा ?”
“इसमें हमारी सेफ्टी है । काम हो चुकने के बाद हमने वापसी में माल ढोना है, न कि इसतेमाल हो चुका सामान । वो सब सामान, जाहिर है कि, हमने पीछे ही छोड़ देना है । सारी रात तो हम लॉकर खोलने में लगा देंगे । सुबह हम वो सामान नहीं ढो सकते । काम हो चुकने के बाद आने वाली रात को महज सामान की खातिर हम सीवर में नहीं घुस सकेंगे क्योंकि तब तक वाल्ट लुट चुका होने की खबर आम हो चुकी होगी और हर किसी की, खासतौर से पुलिस की, तवज्जो सीवर की तरफ से वाल्ट तक खोदी गई सुरंग की तरफ पहुंच चुकी होगी । सामान तो हमें पीछे छोड़ना ही पड़ेगा और इस बात का खास ख्याल रख कर छोड़ना पडे़गा कि किसी भी चीज पर हम में से किसी की उंगलियों के निशान न रह जाएं ।”
“वो तो हम, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, दस्ताने पहने होंगे, बाप । तुम तो हमें यह बताओ कि सामान एक ही ठिकाने से खरीदने में क्या वान्दा है ?”
“डकैती के बाद जब वो सामान बरामद होगा तो सबसे पहले पुलिस इसी बात की पड़ताल करेगी कि वो सामान कहां से आया ! अगर हमने एक ही ठिकाने से सारा सामान खरीदा तो दुकानदार को हम में से किसी के बारे में कोई ऐसी बात, मसलन सूरत या विशिष्ट हाव-भाव, याद रह सकता है जिसके माध्यम से बाद में पुलिस हमें ट्रेस कर सकती है । हम मीलों में फैली हुई छोटी-छोटी दुकानों से इक्का-दुक्का नग करके सामान खरीदेंगे तो दुकानदार की हरिगज भी खरीदार की तरफ तवज्जो नहीं जाएगी । वक्त जरूर ज्यादा, कम-से-कम दो दिन का, लग जाएगा लेकिन हमारी सेफ्टी इसी में है ।”
दो दिन और - रूपचन्द ने मन-ही-मन सोचा - एक दिन पहले ही गुजर चुका था, हफ्ता सुरंग खोदने में लग जाना था, दो दिन माल ठिकाने लगाने के लिए चाहिए थे, यूं अगर कहीं और ज्यादा वक्त लग गया तो उसका तो काम हो जाना था ।
“विमल ठीक कह रहा है ।” - आनन्द पुरजोर लहजे में बोला - “हम में से जो आदमी लेसर जैसी गैरमामूली चीज खरीदने जाएगा, दुकानदार क्या आसानी से उसकी सूरत भूल जाएगा ! कोई आदमी तीन-तीन ऑक्सी-एसिटिलीन टार्च और ढेरों गैस सिलेन्डर इकट्ठे खरीदेगा तो दुकानदार सवाल नहीं करेगा कि खरीदार की वैल्डिंग की दुकान कहां थी ! जब जवाब मिलेगा कि वैल्डिंग की दुकान थी ही नहीं तो वो हैरान नहीं होगा ! आसपास का कोई फर्जी पता बताया जाने पर हो सकता है कि दुकानदार उस इलाके से इतना वाकिफ हो कि उसे तभी शक हो जाए और कोई दूर का पता बताने पर दुकानदार यह सोचकर हैरान होगा कि पड़ोस की दुकान को छोड़कर ग्राहक इतनी दूर उसके पास क्यों आया !”
“तुम मेरा प्वायन्ट समझ गए हो ।” - विमल बोला ।
“मैं भी समझ गया हूं ।” - मुबारक अली तुरन्त बोला - “मैं क्या, वो क्या कहते है अंग्रेजी में...”
“ईडियट !” - जार्ज तुरन्त बोला ।
“चुप बे ।” - मुबारक अली घुड़ककर बोला - “हां, तो मैं क्या कह रहा था ? हां, मैं क्या मूर्ख हूं ! ठीक है । हम सामान धीरे-धीरे करके, थोड़ा-थोड़ा करके, छोटी-छोटी कई दुकानों से खरीदेंगे । बरोबर !”
विमल ने सहमति में सिर हिलाया और फिर बोला - “कोई साहब कुछ कहना चाहते हों ?”
कोई कुछ न बोला ।
“तो फिर मैं कहना चाहता हूं ।” - विमल बोला - “मैं ट्रक के बारे में कुछ कहना चाहता हूं ।”
“क्या ?” - सवाल खांडेकर ने किया, आखिर ट्रक का इन्तजाम उसने करके देना था ।
“ट्रक चोरी का है ?”
“नहीं । जेनुइन खरीद है ।”
“किसकी ?”
“मेरी ।”
“ट्रक ने जौहरी बाजार में एक हफ्ता हर रात को एक ही ठिकाने पर खड़ा रहना है ।”
“तो क्या हुआ ? रात आठ बजे से लेकर सुबह आठ बजे तक वहां पार्किंग की इजाजत है ।”
“मैं यह नहीं कह रहा । मैं यह कह रहा हूं कि इतने दिन रोज ट्रक के वहां खड़ा होने से ट्रक के नम्बर की तरफ किसी की तवज्जो जा सकती है । वारदात के बाद वो नम्बर पुलिस को मालूम हो सकता है । फिर उन्हें डकैती में ट्रक का कोई रोल सूझ सकता है और वे ट्रक के मालिक पर - तुम पर - चढ दौड़ सकते हैं ।”
खांडेकर हड़बड़ाया । उसने बारी-बारी सब की सूरतों पर निगाह दौड़ाई ।
प्रत्यक्षत: वो बात किसी को नहीं सूझी थी ।
“तो क्या किया जाए ?” - खांडेकर बोला - “उस पर नकली नम्बर प्लेट लगाई जाएं ?”
“वो तो लगाई ही जाएं । साथ ही उसको रोज एक नए रंग से पेंट किया जाए । यह काम इतने बड़े स्क्रेप यार्ड में पूरी गोपनीयता के साथ बाखूबी हो सकता है ।”
“ठीक है । हो जाएगा ।”
“और हमारे पास एक गाड़ी और होनी चाहिए ।”
“वो किसलिए ?”
“एक रात में ट्रक को मलबा फेंकने तीन-चार बार जाना पड़ेगा । फर्ज करो जब पहले फेरे के बाद वह वापस लौटता है तो वह मैनहोल के ऊपर कोई और गाड़ी खड़ी पाता है तो वह उस गाड़ी को वहां से कैसे हटाएगा और कैसे अपनी जगह क्लेम करेगा ?”
विमल की निगाह एक बार पैन होती हुई तमाम चेहरों पर फिरी और फिर वह बोला - “ऐसा न हो, हमारी जगह कोई और न काबू में कर ले, इसके लिए हमारे पास एक गाड़ी और होनी चाहिए जो हमारे ट्रक की रवानगी के बाद उसकी जगह ले ले और तब तक वहां खड़ी रहे जब कि ट्रक वापस न लौट आए ।”
“कैसी गाड़ी ?” - मुबारक अली बोला ।
“कैसी भी । कार, टैक्सी, स्टेशनवैगन, कुछ भी चलेगा । मकसद तो ट्रक के लिए उसकी जगह महफूज रखने से है ।”
“ऐसे तो बजट और भी ज्यादा बढ जाएगा ।” - खांडेकर असंतोषपूर्ण स्वर में बोला ।
“तो क्या हुआ ?” - विमल अपलक उसे घूरता हुआा सख्ती से बोला - “इन्हीं बातों का तो तुम्हें बराबर का हिस्सा मिलना है । हम लोग इतना खून-पसीना एक करेंगे, इतना खतरा मोल लेंगे; हम गम्भीर रूप से घायल हो सकते हैं, हममें से कोई दम घुटने से मर सकता है, सुरंग की छत ढह सकती है और हम सब मर सकते हैं, बावजूद वाल्ट में घुस चुकने के ऐन मौके पर हम शूट किए जा सकते हैं, पकड़े जा सकते है । जब हम इन दुश्वरियों से जूझ रहे होंगे, तब तुम घर में बैठे चैन की नींद सो रहे होंगे । बावजूद इसके तुम बराबर के हिस्से के हकदार हो । किसलिए ? एक्सपीडीशन को फाइनान्स करने के लिए और तुम उसमें भी बार-बार बजट की दुहाई दे रहे हो । क्यों भला ? बेवकूफ समझते हो हमें ?”
खांडेकर जिसे विमल से ऐसी फटकार की अपेक्षा नहीं थी, विमल से निगाह मिलाए रहने की ताब न ला सका । उसने शिकायतभरी निगाहों से मुबारक अली की तरफ देखा और फिर बोला - “भई, मियां यह तो...”
“क्या यह तो ?” - विमल का स्वर एकाएक बेहद हिंसक हो उठा - “जो कहना है मेरे से कहो ।”
“तु... तुम्हारे से क्यों ?”
“क्योंकि मैं ऐसा बोला ।”
खांडेकर ने मुबारक अली की तरफ देखा लेकिन तभी मुबारक अली परे देखने लगा ।
वातावरण एकाएक ब्लेड की धार की तरह पैना हो उठा ।
“अगर” - विमल बोला - “तुम्हारे को खर्चे से एतराज है तो साफ बोलो ।”
“तो तु.. तुम” - खांडेकर के गले की घण्टी जोर से उछली - “क्या करोगे ? कोई दूसरा फाइनान्सर ढूंढोगे ?”
“हां । लेकिन फौरन नहीं । पहले तेरा और तेरी मां का पेट फाड़कर आतें बाहर निकालने के बाद ।”
“क.. क्या ?”
“लगता है मुबारक अली ने ठीक से नहीं बताया तुझे कि मैं कौन हूं ?”
“ठीक से क्या !” - मुबारक अली दबे स्वर में बोला - “मैं तो गलत से भी नहीं बताया । मैं तो सिर्फ तुम्हेरा नाम बोला, बाप । ‘विमल’ ।” - फिर वह खांडेकर की तरफ घूमा - “अबे, खांडेकर के घोड़े, यह सोहल है ।”
“सोहल !” - खांडेकर हड़बड़ाया - “कौन सोहल ?”
“सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल । सात, वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में, राज्यों में...”
“स्टेट्स में ।” - जार्ज बोला ।
“...घोषित इश्तिहारी मुजरिम । सरकार इसकी खोपड़ी पर दो लाख रुपए का इनाम लगायेली है ।”
“जो” - विमल विषभरे स्वर में बोला - “अब यह हासिल करने की कोशिश करेगा ।”
लेकिन खांडेकर के चेहरे का रंग उड़ चुका था और वह थर-थर कांपने लगा था ।
तभी भड़ाक से पिछला दरवाजा खुला और ड्रम की तरह लुढकती आन्टी ने भीतर कदम रखा । वह हांफते हुई उन लोगों के करीब पहुंची और भयभीत भाव से बोली - “लड़का नादान है । इसे कुछ न कहना । तुम जो कहोगे, वही होगा । जैसे कहोगे, वैसे होगा । इसे नहीं मालूम था कि तुम...”
“तुम” - विमल उसे घूरता हुआ बोला - “दरवाजे के पीछे बैठी सब कुछ सुन रही थीं ?”
“हां । मैं कह रही थी कि...”
“दोबारा फिर कभी ऐसी हरकत न हो । आगे से हमारे बीच में आकर बैठा करो ।”
“बरोबर । बरोबर । लेकिन मैं कह रही थी...”
“मुझे मालूम है तुम क्या कह रही थीं । लेकिन जो कह रही हो, उसे समझो भी । अगर कुछ समझ गई हो तो अपने लड़के को भी समझाओ ।”
“लड़का समझ गया है । लड़का दोबारा शिकायत का मौका नहीं देगा ।”
“मुझे तो यह कुछ समझाता या ऐसा कहता दिखाई नहीं दे रहा ।”
“मैं” - खांडेकर फंसे कंठ से बोला - “दोबारा शिकायत का मौका नहीं दूंगा ।”
“तो फिर एक और गाड़ी का इन्तजाम...”
“बराबर होगा । फौरन होगा । डुप्लीकेट नम्बर प्लेटों के साथ होगा ।”
“समझ लो कि हो भी गया ।” - आन्टी बोली ।
“गुड ।”
“उसे चलाएगा कौन ?” - एकाएक जामवन्तराव बोला ।
“यही मैं कहने जा रहा था ।” - आनन्द बोला ।
“क्या ?” - विमल बोला ।
“जो एक और गाड़ी हमारे प्लान में दाखिल हो रही है” - जामवन्तराव बोला - “उसे कौन चलाएगा ?”
“हममें से ही कोई ।” - विमल बोला - “उसे चलाना नहीं, सिर्फ उसमें बैठना है । जो कोई सुरंग में काम करता थक जाएगा, उसे ऊपर दूसरी गाड़ी हैंडल करने के लिए भेज दिया जाएगा । जब ट्रक लौट आएगा तो वह भी दूसरी गाड़ी कहीं और पार्क करके नीचे चला आएगा । ठीक ?”
जामवन्तराव और आनन्द दोनों ने सहमति में सिर हिलाया ।
“मैं” - रूपचन्द झिझकता हुआ बोला - “बूढा आदमी मलबा ढो लूंगा ?”
“आपने मलबा ढोना नहीं” - विमल सख्ती से बोला - “ट्रक चलाना है । ट्रक को चलाकर एक उजाड़ जगह पर ले जाना है जो कि आपको दिखा दी जाएगी और वहां सिर्फ मलबे से भरे बोरे पलट आने हैं । मुश्किल काम मलबा उठाना होता है गिराना नहीं । आपने सिर्फ बोरों का मुंह ट्रक से बाहर की तरफ करना है और उन्हें उलट देना है । मेरे ख्याल से बड़ी सहूलियत से कर लेंगे आप यह काम !”
रूपचन्द को यह काम बड़ा सख्त लग रहा था, खास तौर से अपनी वर्तमान घायलावस्था में, लेकिन उसकी गरदन अपने आप ही सहमति में हिल गई । विमल के बात कहने के ढंग में कुछ ऐसा रोब था कि चाह कर भी उससे विरोध में कुछ कहते न बना ।
उस रोज जब मीटिंग बर्खास्त हुई तो हर कोई अपने आप को विमल के सामने बौना महसूस कर रहा था और हर कोई यह याद करने की कोशिश कर रहा था कि कब वो क्षण आया था जब विमल यूं सब पर हावी हो गया था ।
कोई ऐसे किसी एक क्षण को याद न कर सका ।
***
इन्सपेक्टर फाल्के कमिश्नर के सामने पेश हुआ ।
“सर” - फाल्के ने रिपोर्ट दी - “डॉक्टर दस्तूर की बीवी और बेटी सही-सलामत घर में मौजूद हैं लेकिन बेटी बीमार है और पलंग के हवाले है । पूछने पर बताया गया कि उसका बायां हाथ घर के एक दरवाजे में आया गया था ।”
“यानी कि” - कमिश्नर बोला - “सब कुछ नार्मल है ? कोई असाधारण बात नहीं ?”
“जी नहीं, बशर्ते कि आप...”
“हां, हां । बोलो ।”
“इस बात को असाधारण न मानें कि लड़की स्कूल से छुट्टी होने के बाद स्कूल बस पर घर नहीं लौटी थी ।”
“लड़की कितनी उम्र की है ?”
“पन्द्रह साल की ।”
“फिर क्या बात है ! छुट्टी के बाद सहेलियों के साथ कहीं घूमने-फिरने चली गई होगी ।”
“लेकिन एक पड़ोसी का कहना है कि वो रात को अन्धेरा होने के बाद टैक्सी पर घर लौटी थी, वह तब भी उसके बायें हाथ पर पट्टी बंधी हुई थी ।”
“तो क्या हुआ ?”
“सर, उसकी मां ने यह झूठ क्यों बोला कि लड़की का हाथ घर के एक दरवाजे में आ गया था ?”
“हाथ उसके स्कूल रवाना होने से पहले आया होगा !”
“जितनी बीमार हाथ घायल होने की वजह से वो बताई जाती है, उतनी बीमारी की हालत में वो स्कूल कैसे गई होगी, सर ?”
“तुम यह कहना चाहते हो कि लड़की के घायल हाथ की बाबत उसकी मां झूठ बोल रही है ?”
“बाप भी ।”
“हूं ।”
“और सर, मैंने यह भी मालूम किया है कि लड़की का हाथ स्कूल में घायल नहीं हुआ था ।”
“और वो स्कूल बस में भी नहीं सवार हुई थी ?”
“जी हां ।”
“तो फिर छुट्टी के बाद और घर आने से पहले जरूर उसने कोई ऐसी गलत और गैरजिम्मेदाराना हरकत की होगी जिसकी वजह से उसका हाथ घायल हुआ होगा और जिसे उसके इज्ज्तदार मां-बाप शर्म का बायस मानते होंगे । शायद किसी ब्वायफ्रेंड के साथ झगड़ा-बखेड़ा...”
“सर, वो सिर्फ पन्द्रह साल की है ।”
“आज की परमिसिव हाई सोसायटी में इससे कम उम्र की लड़कियां ब्वायफ्रेंड बनाकर छोड़ चुकी होती हैं । बहरहाल किसी की जाती जिन्दगी से हमें कुछ लेना-देना नहीं । मेरे लिए इतनी ही खबर काफी है कि डॉक्टर दस्तूर की फैमिली अपने घर पर सही-सलामत मौजूद है । डॉक्टर दस्तूर की फैमिली की वजह से उन पर कोई ऐसा प्रैशर नहीं पड़ा जो उनको डोंगरे की शिनाख्त की बाबत झूठ बोलने पर मजबूर करता ।”
फाल्के ने उत्तर न दिया । प्रत्यक्षत: वह उस मामले में अपने आला अफसर जितना आश्वस्त नहीं दिखाई दे रहा था ।
“और ?” - कमिश्नर बोला ।
“वो सब-इन्स्पेक्टर हाजिर है जिसने शनिवार की रात की डोंगरे का ड्रंकन ड्राइविंग का चलान किया था ।”
“अब उससे मुलाकात करना कोई जरूरी तो नहीं रह गया... खैर, बुलाओ उसे ।”
एक सब-इन्स्पेक्टर कमिश्नर के हुजूर में पेश हुआ ।
इन्स्पेक्टर फाल्के ने डोंगरे के चालान की रसीद की ओरीजनल कापी कमिश्नर को सौंप दी ।
“क्या नाम है तुम्हारा ?” - कमिश्नर बोला ।
“मुश्ताक अली, सर ।” - सब-इन्स्पेक्टर बोला ।
“मुश्ताक अली, यह चालान देखो” - कमिश्नर रसीद सब-इन्स्पेक्टर को थमाता हुआ बोला - “ये तुम्हारे साइन हैं ? यह तुमने काटा था ?”
“जी हां ।” - सब-इन्स्पेक्टर आशंकित स्वर में बोला ।
“इसकी कार्बन कापी तुम्हारी चालान बुक में है ?”
“होगी, साहब ।”
“निकालो ।”
सब-इन्स्पेक्टर ने जेब से अपनी चालान बुक निकाली और डोंगरे की रसीद का सीरियल नम्बर देखकर उस नम्बर पर अपनी चालान बुक को खोला ।
कमिश्नर ने अनमने भाव से ओरीजनल और कार्बन कापी का मिलान किया ।
दोनों हूबहू एक जैसी निकलीं ।
यानी कि डोंगरे द्वारा पेश की गई रसीद जाली नहीं थी, जाली नहीं हो सकती थी ।
यानी कि शी हान के कत्ल के वक्त के आसपास वाकेई वह हस्पताल से मीलों दूर चालान कटवा रहा था ।
“जिस शख्स का यह चालान तुमने काटा था” - कमिश्नर हाथों में चालान बुक को उलटता-पलटता हुआ बोला - “तुम उसे जानते थे ?”
“जी नहीं ।” - सब-इन्स्पेक्टर बोला ।
“चालान की नौबत कैसे आई थी ?”
“वह बहुत गलत तरीके से गाड़ी चला रहा था । मेरे देखते-देखते वह एक बार अपनी गाड़ी फुटपाथ पर चढाने लगा था और एक बार एक मोटरसाइकिल वाले को हिट करने लगा था । मैंने उसे रोका तो पाया कि वह भरपूर नशे में था और गाड़ी चलाने के कतई काबिल नहीं था । मैंने उसका ड्रंकन ड्राइविंग का चालान काट दिया ।”
“और उसे गाड़ी पर जाने दिया ?”
“गाड़ी पर नहीं, सर । गाड़ी तो मैंने खड़ी करवा ली थी ।”
“गुड ।”
“वो टैक्सी पर गया था । बाद में उसका कोई आदमी आकर गाड़ी ले गया था ।”
“गुड, गुड ।”
एकाएक चालान बुक को उलटते-पलटते कमिश्नर के हाथ रुके । उसने अपने सामने आए पन्ने पर निगाह डाली, फिर उसका पिछला वरका पलटा ।
“सब-इन्स्पेक्टर !” - फिर वह उसे घूरता हुआ बोला ।
“सर !” - कमिश्नर के बदले स्वर में सब-इन्स्पेक्टर बौखलाया ।
“तुम्हारी चालान बुक में पांच तारीख से पहले छ: तारीख कैसे दर्ज है ?”
“जी !”
“इधर आओ ।”
सब-इन्स्पेक्टर झिझकता हुआ कमिश्नर के करीब पहुंचा ।
“यह... डोंगरे वाला चालान... तुमने शनिवार पांच तारीख को रात के दस बजे काटा । ठीक !”
“ज... जी हां । जी हां ।”
“अब यह इससे पिछला वरका देखो । इस पर छ: तारीख दर्ज है । इससे पिछले वरके पर, इससे भी पिछले वरके पर छ: तारीख दर्ज है । पांच तारीख तो पीछे कोई बारह चालान दूर है जबकि आखिरी चालान तुमने तुम रात के ग्यारह बजे काटा दिखाया है । यह छ: तारीख के बारह चालानों के बाद पांच तारीख फिर कैसे आ गई ?”
“प-पता नहीं कैसे आ गई, सर ?”
“क्या बकते हो ?”
“सर, क-कापी बेध्यानी में कहीं बीच से खुल गई होगी पांच तारीख का यह चालान काटते वक्त । बाद में अगले दिन मुझे यह बात दिखाई दी होगी तो मैंने कापी वहां से शुरु कर दी होगी जहां से आगे कि वो शुरु होनी चाहिए थी ।”
कमिश्नर कुछ क्षण खामोश रहा । वह बात तो हो सकती थी ।
“तुम खुद भी तो कोई नशा-पानी नहीं करते ?” - फिर वह सब-इन्स्पेक्टर को घूरता हुआ बोला ।
“ड्यूटी पर नहीं करता, सर ।”
“वैसे करते हो ?”
सब-इन्स्पेक्टर का सिर झुक गया ।
“ठीक है । तुम जा सकते हो । अपनी चालान बुक सम्भालो ।”
चालान बुक लेकर सब-इन्स्पेक्टर ने जमकर सैल्यूट मारा और फौरन वहां कूच कर गया ।
उसके पीछे दरवाजा बन्द हो गया तो कमिश्नर ने इन्स्पेक्टर फाल्के को अपने करीब बुलाया ।
“मुझे कुछ घोटाला दिखाई दे रहा है ।” - वह धीरे से बोला - “छ: तारीख के बाद पांच तारीख उस वजह से भी आयी हो सकती है जो सब-इन्स्पेक्टर ने बयान की है लेकिन यह रिश्वत का भी कमाल हो सकता है और चालान असल में ही छ: तारीख को, उस मवाली को एलीबाई देने के लिए, काटा गया हो सकता है ।”
“सर, तब तो हमें सब-इन्स्पेक्टर पर सच कबूलने के लिए दबाव डालना चाहिए था ।”
“उससे कुछ फायदा न होता । वह हरगिज भी अपनी वह हठ न छोड़ता कि ऐसा गलत वरका पलटा जाने की वजह से बेध्यानी में हो गया था ।”
“फिस भी, सर...”
“सुनो, सुनो । उसको यूं छोड़ देने का यह फायदा है कि जब वो समझेगा कि उसकी एक्सप्लेनेशन चल गई है और वह निश्चिंत हो जाएगा लेकिन हकीकत हम किसी और तरीके से जानने की कोशिश करेंगे ।”
“वो कैसे, सर ?”
“उसकी चालान बुक में पांच तारीख के बाद फिर छ: तारीख आ गई थी, इसका यह मतलब हो सकता है कि बोगस चालान के लिए छ: तारीख को तब उससे सम्पर्क किया गया था जबकि वह डयूटी पर था और चालान काट रहा था । ऐसी ड्यूटी सब-इन्स्पेकटर अकेले नहीं भुगताता. उसके साथ एक हवलदार भी होता है । फाल्के, तुम इसके रविवार छ: तारीख वाले मातहत हवलदार को ट्रेस करो और उस पर दबाव डालकर, उससे कुबुलवाने की कोशिश करो हकीकतन क्या हुआ था ! वैसे अगर मामला रिश्वत का होगा तो रिश्वत उसने भी खाई होगी । लेकिन हवलदार को अभयदान देकर सब-इन्स्पेक्टर के खिलाफ जुबान खोलने के लिए तैयार किया जा सकता है । यू अन्डरस्टैण्ड माई प्वायन्ट ?”
“यस, सर । मैं मालूम करवाता हूं कि उस रोज कौन-सा हवलदार इस सब-इन्स्पेक्टर के साथ ड्यूटी पर निशाना अपने महकमे का कोई कर्मचारी नहीं, वो शीशे की आंख वाला मवाली है जो अपना नाम श्याम डोंगरे बताता है ।”
“यस, सर ! आई अन्डरस्टैण्ड सर ।”
“गुड ।”
***
रविवार को शहर की तकरीबन मेन मार्केट बन्द होती थीं, इसलिए फैसला हुआ कि जरूरत का सामान मुम्बई के उपनगरों की छोटी-मोटी मार्केटों और कुछ खास सामान मुम्बई से बाहर के शहरों से खरीदा जाए ।
लेसर बीम की खरीद का काम जामवन्तराव के हिस्से आया ।
वायरलैस टेलीफोन खरीदने के लिए सतीश आनन्द को कहा गया ।
टार्च और सिलैन्डरों की खरीद का काम मुबारक अली ने अपने जिम्मे लिया ।
दूसरी गाड़ी की खरीद के लिए विमल ने अपनी सेवाएं प्रस्तुत कीं ।
बकौल खांडेकर एक मैटाडोर वैन कल्याण में उपलब्ध थी । गाड़ी वहां छत्रपति मोटर वर्क्स के गैराज में खड़ी थी और उसके मालिक से फोन पर साठ हजार रूपये में मैटाडोर का सौदा तय हो चुका था ।
विमल ने खांडेकर से साठ हजार रुपये लिए और दोपहर तक कल्याण पहुंच गया ।
वह गैराज के मालिक छत्रपति से मिला और उसने बताया कि खांडेकर का भेजा वह मैटाडोर के लिए आया था ।
“रोकड़ा लाये हो ?” - छत्रपति संदिग्ध भाव से बोला ।
“हां ।” - विमल सहज स्वर में बोला ।
“साठ में बात हुई थी ।”
“मालूम है ।”
“पूरी रकम कैश में । यही बात हुई थी ।”
“गाड़ी दिखाओ ।”
“गाड़ी पीछे यार्ड में है ।”
दोनों इमारत के पीछे बने विशाल यार्ड में पहुंचे ।
वहां एक सायबान के नीचे मैटाडोर वैन खड़ी थी ।
“यह है ?” - विमल हतोत्साहित स्वर में बोला ।
“हां ।” - छत्रपति यूं बोला जैसे उसे ताजमहल दिखा रहा हो ।
विमल ने गर्दन हिलाई । वैन बहुत खस्ताहाल थी और साठ हजार के काबिल तो किसी सूरत में नहीं थी । गाड़ियों के बारे में उसे खुद बहुतेरा ज्ञान था । आखिर वह जयपुर में कितना ही अरसा बसन्त कुमार के नाम से मोटर मैकेनिक गैराज चलाता रहा था ।
विमल वैन का दरवाजा खोलकर उसकी ड्राइविंग सीट पर बैठा ! चाबी इग्नीशन में ही लगी हुई थी । उसने इग्नीशन आन किया । इंजन फौरन स्टार्ट हुआ । उसने ऑफ करके फिर इग्नीशन आन किया । इंजन फिर फौरन स्टार्ट हुआ । उसने हैडलाइटस ट्राई कीं, केवल एक हैडलाउट जली । पार्किंग लाइट एक भी न जली ।
उसने इंजन का हुड उठाकर भीतर झांका ।
इंजन पर ढेरों ग्रीज और मिट्टी चढी हुई थी । तारें चिड़ियों का घोंसला मालूम हो रहीं थीं । रेडियेटर का हौज कई जगह से लीक कर रहा था ।
उसने हुड गिराया और इंजन फिर स्टार्ट किया । उसने गाड़ी को गियर में डालकर थोड़ा आगे बढाया । गाड़ी हिचकोले खाती हुई आगे बढी । उसने उसे तिरछा किया और पीछे झांका ।
जहां से उसने गाड़ी हटाई थी, वहां जमीन पर तेल का एक बड़ा-सा धब्बा दिखाई दे रहा था ।
उसने यार्ड का एक चक्कर लगाया ।
तीसरा गियर फंस कर लगता था, स्पीड पर गाड़ी की सीटें हिलती थीं और आवाज करती थीं ।
उसने गाड़ी वापस सायबान में लाकर खड़ी की और बाहर निकला ।
“गाड़ी का तो बुरा हाल है ।” - वह बोला ।
“कीमत भी तो देखो कितनी कम है ।” - छत्रपति बोला - “सिर्फ साठ हजार रूपये ।”
“लेकिन...”
“आओ भीतर ऑफिस में बैठकर बात करते हैं ।”
वह उसे ऑफिस में ले आया रास्ते में उसने एक क्लीनर का चाय लाने को बोला ।
दोनों एक बन्द केबिन में आ बैठे ।
छत्रपति ने उसे सिगरेट पेश किया जो कि विमल ने न लिया । वह जेब से अपना पाइप निकालकर उसमें तम्बाकू भरने लगा ।
“सैकेंडहैंड गाड़ी है ।” - छत्रपति उसे समझाता हुआ बोला - “नवीं का मुकाबला तो नहीं कर सकती न ! तुम उसकी सूरत पर मत जाओ । गाड़ी दौड़ती बढिया है । तुमने खुद देखा है ।”
विमल ने उत्तर न दिया । उसने पाइप सुलगाया और लम्बा कश लगाया ।
तभी एक छोकरा दो मटमैले से गिलासों में चाय ले आया ।
“चाय पियो ।” - छत्रपति एक गिलास उसकी तरफ सरकाता हुआ बोला ।
विमल ने गिलास की तरफ हाथ न बढाया । एकाएक वह उठा और केबिन से बाहर की तरफ चल दया ।
“अरे,अरे !” - छत्रपति हड़बड़ाया ।
विमल ने उत्तर न दिया । जब तक छत्रपति अपनी मेज के पीछे से निकला, तब तक वह इमारत से बाहर था ।
वह फिर पीछे यार्ड में पहुंचा ।
मैटाडोर से दो मैकेनिक उलझे हुए थे । एक उसकी नई बैटरी निकालकर नीचे जमीन पर रख चुका था और उसकी जगह पुरानी बैटरी लगा रहा था और दूसरा वैन का अगला पहिया उतार रहा था । उसके करीब पुराने घिसे हुए टायरों वाले दो पहिये पड़े थे ।
छत्रपति हांफता हुआ उसके करीब पहुंचा ।
विमल ने उसे घूर कर देखा ।
“वो... वो” - छत्रपति ने कहना चाहा - “क्या है कि...”
“गाड़ी चोरी की है ?”
“नहीं, बाप । पूरे कागज है । एकदम चौकस ।”
“नम्बर प्लेट गुजरात की है । मुझे क्या पता कागज चौकस हैं कि जाली !”
“बाप, कागज एकदम चौकस हैं ।”
“जैसे बैटरी चौकस है ! दो टायर चौकस हैं ! “
“वो... वो...”
“नई बैटरी वापस लगवाओ । पिछले दो टायर भी बदलवाओ । चारों ट्यूबें निकालकर दिखाओ । रेडियटर का होज बदलो । आयल बदलो । सारी बत्तियां जलाकर दिखाओ । गियरबॉक्स चैक करवाओ, तीसरा गियर फंस कर लगता है ।”
“मेरी खांडेकर से इतनी सारी बात नहीं हुई थी” - वह नर्वस भाव से बोला - “साठ हजार में जैसी गाड़ी खड़ी है, वैसी की ही बात हुई थी ।”
“तो चार चीजें और निकाल लो । टायरों और बैटरी के अलाव भी अभी काफी चीजें होंगी बेईमानी दिखाने के काबिल ।”
“मैं नवीं बैटरी वापस लगवा देता हूं । अबे श्रीपत, पहियों को मत छेड़ ।”
“बाकी काम भी करवाओ ।”
“लेकिन सौदा...”
“उसके बिना कोई सौदा नहीं ।”
और विमल घूमकर बाहर की ओर बढा ।
“अरे, सुनो, सुनो । कहां जा रहे हो !”
“घर ।”
“जरा रुको तो । रुको तो, बाप ।” - वह लपकता हुआ उसके करीब पहुंचा - “रुको तो ।”
विमल ठिठका, उसकी तरफ घूमा ।
“जो कुछ तुम कह रहे हो, सब कुछ हो जाएगा । लेबर और पार्टस के पैसे तो दोगे न ?”
“विमल ने इनकार में सिर हिलाया ।”
“सिर्फ पार्ट्स ?”
“नहीं । सब काम दो घन्टे में हो जायें ।”
“बाप, यह तो अक्खी दिहाड़ी का काम है ।”
“दो घन्टे । ढाई बजे गाड़ी तैयार मिल जाए तो पैंतालीस हजार रूपये तुम्हारे और गाड़ी मेरी ।”
“प.. पैंतालीस ! लेकिन बात तो साठ की हुई थी ।”
“बात का क्या है ? वो तो अस्सी की भी हुई हो सकती है ।”
“लेकिन...”
“वक्त जाया न करो । जो कहा है वो करवाओ ।
“लेकिन बाप कीमत...”
“पैंतालीस ।”
“पचपन से कम नहीं ।”
“पचास ।”
“ठीक है, पचास । लेकिन बैटरी नवीं नहीं होगी । वैसे जो मिस्त्री अभी लगाने जा रहा था, उससे बढिया होगी और तकलीफ नहीं देगी । रेडियेटर होज नया नहीं लगेगा लेकिन यूं टेप कर दिया जाएगा कि लीक नहीं करेगा । सीटें कस दी जाएंगी, जहां वैल्डिंग की जरूरत है, कर दी जाएगी । टायर जो दिख रहे हैं, वही रहेंगे । आयल नवां डाल देंगे । बत्तियां सब जल जाएंगी । गियर ठीक हो जाएगा ।”
“आयल लीक भी तो सकता है ।”
“नहीं करेगा ।”
“गुड ।”
“सारा काम छ: घन्टे में होगा ।”
“तीन घन्टे में ।”
“अगर काम अर्जेन्ट कराना है तो...”
“मैंने काम तीन घन्टे में कराना है । अर्जेन्ट मुझे नहीं पता ।”
“लेकिन...”
“मुर्गी बनने वाला ग्राहक पीछे आ रहा है ।
उसने आहत भाव से विमल की तरफ देखा, लेकिन विमल पर कोई असर होता न पाकर बोला - “मैं कोशिश करता हूं काम तीन घण्टे में मुक्कमल कराने की ।”
“गारन्टी करो ।”
“ठीक है, बाप । मैं चार मकैनिक लगाता हूं ।”
“गुड ।”
“आओ, ऑफिस में चलकर बैठें ।”
विमल ने इनकार में सिर हिलाया ।
“बाप, विश्वास करो । अब कोई घपला नहीं होगा । छत्रपति ने जो बोल दिया, बोल दिया ।”
“जिस छत्रपति की जुबान भरोसे के लायक थी वो सैकेण्ड हैण्ड कारों का धन्धा नहीं करता था ।”
“छत्रपति ने जोर से थूक निगली ।”
“ठीक है ।” - फिर वह बोला ।
फिर चार मकैनिक कार की वांछित मरम्मत करने में जुट गए ।
***
रविवार दोपहर को इन्स्पेक्टर फाल्के को रिपोर्ट मिली कि जो हवलदार पांच तारीख को सब-इन्स्पेक्टर मुश्ताक अली के साथ डयूटी पर था, उसका नाम भीकाराम था और वह उस रोज छुट्टी पर था ।
फाल्के ने उसके घर का पता पूछा जोकि रिकार्ड ट्रेस करके उसे बता दिया गया ।
हवलदार भीकाराम बोरीवली के इलाके में रहता था ।
फाल्के ने पहले उसे अपने ऑफिस में तलब करने का ख्याल किया लेकिन फिर कुछ सोचकर उसने चुपचाप खुद बोरीवली जाने का फैसला किया ।
पुलिस की एक जीप खुद चलाता हुआ वह अकेला बोरीवली पहुंचा । थोड़ी-सी पूछताछ के बाद उसे उस गली की खबर लग गई जिसमें भीकाराम का घर था । उसने गली में जीप मोड़ी तो पाया कि आगे रास्ता बन्द था ।
गली में थोड़ा आगे एक मकान के सामने भारी भीड़ जमा थी ।
वह जीप से निकला और पैदल आगे बढ़ा ।
“क्या हुआ ?” - भीड़ के करीब पहुंचकर उसने पूछा ।
किसी ने उत्तर न दिया ।
“हवलदार भीकाराम का घर कौन-सा है ?”
किसी ने उसी मकान की ओर उंगली उठा दी जिसने सामने भीड़ जमा थी ।
मकान के भीतर से औरतों के रूदन की आवाजें आ रही थीं ।
“यहां क्या हो गया है ?”
कोई उत्तर न मिला।
फाल्के ने एक सूरत से पढ़ा-लिखा लगने वाले युवक की बांह पकड़ी और उसे अपनी तरफ घुमाता हुआ बोला - “मेरा नाम फाल्के है । मैं इन्स्पेक्टर हूं । पुलिस के महकमें में ।”
“आप भीकाराम के अफसर हैं ?” - युवक बोला ।
“हां ।”
“खबर जानकर आए होंगे ।”
“कैसी खबर ?”
“भीकाराम की मौत की खबर ।”
“क्या ! भीकाराम मर गया ?”
“आपको नहीं मालूम ?”
“कैसे मर गया ?”
“लोकल से गिर गया । पहिए के नीचे आ गया । दो टुकड़े हो गए बेचारे के ।”
“कैसे गिर गया ?”
“क्या पता कैसे गिर गया ?”
“गया कहां था लोकल पर ?”
“महालक्ष्मी मन्दिर । जहां कि वह हर छुट्टी वाले दिन जाता था । आज भी गया था हमेशा की तरह । लौटकर नहीं आया बेचारा । रेल से कटकर मर गया ।”
“तुम उसी भीकाराम की बात कर रहे हो न जो पुलिस के महकमे में हवलदार है ?”
“हां ।”
“यह गारण्टी है कि मरा वही है ?”
“हां । उसकी जोरू ने लाश की शिनाख्त की है ।”
“लाश कहां है ? भीतर ?”
“नहीं । लाश अभी नहीं मिली । अभी वो चीड़-फाड़ के लिए सरकारी हस्पताल गई है ।”
“ओह !”
उस संयोग पर विस्मित होता इन्स्पेक्टर फाल्के वहां से लौटा ।
***
मैटाडोर तैयार होने में तीन की जगह चार घण्टे लगे लेकिन फिर भी विमल सन्तुष्ट था।
उसने पचास हजार रूपए के नोट छत्रपति के सामने उसकी मेज पर डाल दिए ।
छत्रपति नोट गिनने की जगह बड़ी बारीकी से उनका मुआयना करने लगा।
“मैं उस धन्धे में नहीं हूं ।” - विमल बोला ।
“क्या पता लगता है !” - छत्रपति लापरवाही से बोला ।
विमल चुप रहा ।
“आजकल सौ-सौ के जाली नोट बहुत सर्कुलेशन में हैं ।”
विमल ने पाइप का कश लगाया ।
“और फिर चौकसी बरतने में हर्ज क्या है ! तुमने भी तो गाड़ी की खरीद में इतनी चौकसी बरती है ।”
“जो करना है, जल्दी करो । पहले ही मेरा एक घण्टा जाया चुके हो ।”
छत्रपति ने नोटों को चैक किया, गिना और फिर उन्हें मेज की दराज में बन्द कर लिया ।
फिर उसने मैटाडोर के कागजात विमल को सौंप दिए और सेल डीड साइन कर दिया ।
और पांच मिनट बाद मैटाडोर वैन पर सवार होकर विमल मुम्बई की तरफ उड़ा जा रहा था ।
***
मुबारक अली को एसीटीलीन टार्च और उसके ईंधन के सिलेन्डर खरीदने के लिए बीस हजार रुपए सौंपे गए थे । मुफ्त में हो सकने वाले उस काम पर बीस हजार रूपए खर्च उसे मूर्खता लग रहा था । जूहू-विलेपार्ले स्कीम के इलाके में एक बहुत बड़ा सरकारी काम चल रहा था जहां के खुले यार्ड में वैसे सिलेन्डर और टार्चें सैकड़ों की तादाद में पड़ी होती थीं । उन चीजों का जो एक गोदाम-सा यार्ड के एक कोने में था, उसके इर्द-गिर्द लोहे की तारों की सिर्फ जाली लगी हुई थी । उस जाली को काटकर भीतर का सामान चुरा लेना मामूली काम था । वहां सिर्फ एक चौकीदार होता था जोकि पूरे यार्ड के लकड़ी के फाटक पर बैठा ऊंघता रहता था । उसका शार्गिद जाकर उसे बातों में लगाए रह सकता था और वह जाली काटकर भीतर से जितने चाहे सिलेन्डर और टार्चें निकाल सकता था ।
आखिर सोहल को एतराज थोक की खरीद से था । थोक की खरीद तो वह नहीं कर रहा था ।
उस वक्त मुबारक अली खुश था कि उसने बड़ी सहूलियत से बीस हजार रूपए की कमाई का जुगाड़ कर लिया था । उस वक्त उसे ख्याल तक नहीं आया था कि जिस शख्स को निकट भविष्य में चालीस लाख रूपए की विपुल धनराशि मिलने वाली हो, उसे बीस हजार की मामूली रकम का लालच नहीं करना चाहिए था ।
***
विमल ने दस हजार रूपए आन्टी और खांडेकर के सामने डाल दिए ।
“यह क्या ?” - खांडेकर बोला ।
“गाड़ी चालीस के काबिल थी ।” - विमल बोला - “वक्त की कमी की वजह से पचास देने पड़े ।”
“लेकिन वो तो साठ कहता था ।”
“कहता था । कहने और मिलने में फर्क होता है ।”
“वो पचास में बेचने को मान गया ?”
“राजी से तो नहीं मान गया । मनाना पड़ा ।”
“यह बाकी रकम तुम हमें वापस कर रहे हो ?”
“और क्या करूं ?”
खांडेकर और आंटी ने एक नए सम्मान के साथ विमल को देखा ।
“बाकी माल की क्या खबर है ?” - विमल ने पूछा ।
“लेसर बीम” - खांडेकर बोला - “और वैल्डिंग वाले सामान के अलावा सब कुछ यहां पहुंच चुका है । ट्रक भी तैयार है । उसके तले में ढाई फुट व्यास का छेद किया जा चुका है और उसके लिए नकली नम्बर प्लेटें तैयार करवाई जा चुकी हैं ।”
“बाकी सामान कब आएगा ?”
“कल । लेसर बीम की बातचीत अभी चल रही है और मुबारक अली को सिलेन्डर ढोने के लिए गाड़ी चाहिए ।”
“ट्रक ले जाता ?”
“ट्रक वो नहीं ले जाना चाहता ।”
“वो वैन ले जाए ।”
“ठीक है । मैं उसे खबर कर दूंगा ।”
***
श्याम डोंगरे वैस्ट्रन एक्सप्रैस हाइवे पर पहुंचा ।
सब-इन्स्पेक्टर मुश्ताक अली उसे वहीं ड्यूटी देता मिला जहां वह उसे पिछले रविवार मिला था ।
मुश्ताक अली उसे देखकर सकपकाया ।
“या इधर बाजू में आकर मेरी बात सुनो” - डोंगरे धीरे से बोला - “या अपने हवलदार को थोड़ी देर के लिए कहीं चलता करो ।”
“क्यों ?” - मुश्ताक अली बोला ।
“सुना नहीं ! “ - डोंगरे घुड़ककर बोला ।
उस घुड़की से तुरन्त मुश्ताक अली के चेहरे पर क्रोध के भाव प्रकट हुए लेकिन डोंगरे को विचलित होता न पाकर वह खुद विचलित हो गया ।
“जोशी ।” - वह हवलदार से बोला - “जा, कहीं से चाय का इन्तजाम कर ।”
जोशी सहमति में सिर हिलाता वहां से चला गया ।
चाय का खोखा वहां से बहुत दूर इमारतों के पीछे कहीं था ।
जोशी काफी दूर निकल गया तो मुश्ताक अली बोला - “क्या है ?”
“कल तुम्हें,कमिश्नर ने बुलाया ?” - डोंगरे उसे घूरता हुआ बोला ।
“हां । तुम्हें कैसे मालूम ?”
“क्यों ?”
“तुम्हारे चालान के बारे में पूछ रहा था । मैंने बहुत गलती की जो तुम्हारा वो चालान काटकर तुम्हें दिया ।”
“दस हजार रूपए में काटा । फोकट में नहीं काटा । फोकट में नहीं काटा । उस वक्त तो नोटों की गड्डी देखकर लार घुटनों तक टपक रही थी ।”
“बकवास मत करो ।” - वह तिलमिलाया - “मैं फंसते-फंसते बचा हूं ।”
“क्या हुआ था ?”
मुश्ताक अली ने तारीखों के घालमेल की बात उसे बताई ।
“यह तो अच्छा हुआ” - वह बोला - “कि मुझे ऐन मौके पर एक बढ़िया एक्सप्लेनेशन सूझ गई और वह कमिश्नर को हज्म हो गई ।”
“तुम्हें कैसे पता है कि वो कमिश्नर को हज्म हो गई थी ?”
“न हज्म हुई होती तो वो मुझे यूं आसानी से जाने देता ?”
“बेवकूफ, तेरे को यूं आसानी से चले जाने दिया जाना ही इस बात का सबूत है कि कमिश्नर तेरी सफाई से जरा भी मुतमईन नहीं हुआ था ।”
“क-क्या ?”
“दस हजार रूपए में से अपने उस रोज वाले जोड़ीदार हवलदार को कितने पैसे दिए ?”
“क्यों ?”
“कितने पैसे दिए ?” - डोंगरे सख्ती से बोला ।
“प- पांच सौ रूपए ।”
“शाबाश ! तुम्हारी करतूत का गवाह पांच सौ रूपए में अपनी जबान को ताला लगाकर रखेगा ।”
“भीकाराम मेरे खिलाफ जुबान नहीं खोल सकता ।”
“कौन कहता है ?”
“मैं कहता हूं । आखिर उसने भी तो रिश्वत खाई है ।”
“बराबर की नहीं । चिड़िया के चुग्गे जैसी । भूल जाने के लायक ।”
“तुम कहना क्या चाहते हो ?”
“मियां, तुमने अपनी करतूत में उसे बराबर का शरीक बनाया होता तो उसका रवैया तुम्हारी तरफदारी का और तुम्हारे लिए वफादारी का होता लेकिन मौजूदा हालात में वह मामूली दबाव में ही सब कुछ बक देगा । उसे जब अभयदान देकर तुम्हारे खिलाफ किया जाएगा तो वह एक की चार लगाएगा ।”
मुश्ताक अली के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं ।
“मैं” - फिर वह बोला - “अभी उसके घर जाता हूं और उसे समझता हूं कि वो अपना मुंह न फाडे़ ।”
“उसकी जरूरत नहीं ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि इत्तफाक से अब वो तुम्हारे खिलाफ या किसी के भी खिलाफ मुंह फाड़ने के काबिल नहीं रहा ।”
“क्यों ? क्या हुआ उसे ?”
“खुदा को प्यारा हो गया बेचारा ।”
“क्या !”
“लोकल पर घर जा रहा था । दरवाजे पर खड़ा था । पता नहीं किसी का धक्का लगा या खुद का ही बैलेन्स बिगड़ गया । नीचे रेलवे लाइन पर जाकर गिरा । कटकर मर गया ।”
मुश्ताक अली मुंह बाये उसकी तरफ देखने लगा ।
“ऐसा बैलेन्स” - डोंगरे सांप की तरह फुंफकारा - “तुम्हारा बिगड़ सकता है, मुश्ताक अली ।”
“क्या !”
“सुना नहीं !”
“तुम मुझे धमकी दे रहे हो ?”
“हां । एक बात कान खोल के सुन ले, सब-इन्स्पेक्टर के बच्चे । मेरे चालान की जो एक्सप्लेनेशन तूने कमिश्नर की दी है अगर तू उस पर टिका न रहा, अगर तू तोते की तरह उसे ही न रटता रहा, अगर तू अपनी जबान से फिरा तो मैं तेरा ही नहीं, तेरे सारे कुनबे का बैलेन्स बिगाड़ दूंगा ।”
“साले हलकट ! मवाली !” - मुश्ताक अली हिम्म्त करके बोला - “तू मुझे यूं धमकी नहीं दे सकता ।”
“नहीं दे सकता !” - डोंगरे कहरभरे स्वर में बोला - “मैं दे रहा हूं । कहे तो तेरे हवलदार के आने से पहले अभी यहीं तेरा पेट फाड़कर दिखाऊं और फिर जाऊं चिंचपोकली तेरी खूबसूरत बीवी और तेरे पांचों बच्चों की खबर लेने ! बोल ! क्या कहता है ?”
“अबे, मैं कमिश्नर को कही अपनी बात से भला क्यों फिरूंगा !” - मुश्ताक अली बोला पहले की तरह रोब से ही लेकिन असल में उसके चेहरे से खून निचुड़ा जा रहा था - “मैंने जो कह दिया से कह दिया ।”
“इसी में तेरी भी भलाई है । हवलदार भीकाराम की मौत के बाद तुझे झूठा करार नहीं दिया जा सकता । तेरे आला अफसर तेरी नीयत पर बदस्तूर शक करते रहे सकते हैं लेकिन अगर तू इस बात से नहीं हिलेगा कि चालान बुक का वरका गलती से आगे से खुल गया था तो वो तेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकेंगे । समझा ?”
“समझा ।”
“तेरा हवलदार चाय लेकर आ रहा है । बेखौफ होकर चाय पी । इस इम्तहान में अगर तू पास हो गया तो पिछले इतवार जैसी सौ-सौ के नोटों की एक और गड्डी बतौर इनाम तुझे ‘कम्पनी’ से मिलेगी ।”
“एक और गड्डी ! “
“हां । और उसमें तेरा कोई हिस्सेदार भी नहीं होगा ।”
फिर सब-इन्स्पेटर मुश्ताक अली पर आखिरी, चेतावनीभरी, निगाह डालकर हवलदार जोशी के वहां पहुंचने से पहले ही डोंगरे वहां से विदा हो गया ।
***
इन्स्पेक्टर फाल्के कश्मिनर के ऑफिस में पहुंचा ।
कमिश्नर वहां उपलब्ध नहीं था ।
वह अपने ऑफिस में आकर बैठ गया, कुछ क्षण वह सोच-विचार करता रहा, फिर उसने टेलीफोन अपनी तरफ सरका लिया । उसने सरकारी हस्पताल का नम्बर डायल किया और डॉक्टर दस्तूर के बारे में पूछा । मालूम हुआ कि डॉक्टर दस्तूर उस वक्त एक इमरजेन्सी ऑपरेशन में मशगूल था इसलिए फोन पर नहीं आ सकता था । उससे उसका नाम वगैरह पूछा गया तो उसने सम्बन्ध-विच्छेद कर दिया ।
उसने डॉक्टर दस्तूर की कोठी र फोन किया ।
जबाव में एक बड़ी सभ्य, सुसंस्कृत आवाज उसे सुनाई दी ।
“मिसेज दस्तूर ?” - वह सख्ती से बोला ।
“हां । कौन ?”
“आपने मुझे नहीं पहचाना ?” - उसका स्वर कर्कश हो उठा ।
“क- कौन ?”
“यानी कि नहीं पहचाना ! बेटी कैसी है अब आपकी ?”
“ओह ! जालिमों, मेरी बेटी ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा ?” - मिसेज दस्तूर ने आर्तनाद किया - “क्यों उसकी उंगली काट दी तुमने ?”
“वजह आपको मालूम है ।” - फाल्के सावधानी से बोला ।
“डॉक्टर साहब का आप लोगों से बाहर जाने का कोई इरादा नहीं था ।”
“उनका इरादा बदल सकता था ।”
“नहीं बदल...”
“उनका इरादा अभी भी बदल सकता है ।”
“नहीं !”
“मैंने वही जानने के लिए फोन किया है कि अब डॉक्टर साहब का क्या इरादा है ?”
“दोबारा मेरी बच्ची को हाथ न लगाना । मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि डॉक्टर साहब आपके किसी आदमी के खिलाफ कोई गवाही नहीं देगे ।”
“आपको मालूम है उन्हें कौन-सी गवाही नहीं देनी है ?”
“हां, मालूम है । उन्हें उस शीशे की आांख वाले मवाली की शिनाख्त नहीं करनी है जिसे कमिश्नर साहब के ऑफिस में उनके रूबरू करवाया गया था ।”
“जिसका नाम श्याम डोंगरे है !”
“नाम मुझे नहीं मालूम ।”
“अब याद कर लीजिए । भूलिएगा नहीं ।”
“नहीं भूलूंगी ।”
फाल्के ने लाइन काट दी ।
अब डॉक्टर की लड़की की बीमारी और डॉक्टर की चुप्पी की वजह उसकी समझ में आ चुकी थी ।
***
आधी रात के करीब मुबारक अली ने बड़ी सहूलियत से लोहे की तारों की जाली काटकर इतना रास्ता बना लिया कि सिलेन्डरों के गोदाम के भीतर कदम रखा जा सकता ।
दूर लकड़ी के फाटक पर जार्ज सैबेस्टियन यार्ड के चौकीदार को बातों में उलझाए था । वह स्वयं को एक ऐसा चौकीदार बता रहा था जो आधी रात तक उसी इलाके में कहीं चौकीदार की ड्यूटी भुगताकर घर जा रहा था ।
वहां तक वे लोग खांडेकर द्वारा उपलब्ध कराई मैटाडोर वैन में पहुंचे थे । वह मैटाडोर वैन, जिसकी पिछली दोनों सीटें उखाड़ दी गई थीं, उस घड़ी मुबारक अली से कोई तीस गज परे सड़क पर खड़ी थी । सड़क और गोदाम के बीच की जमीन कच्ची और भुरभुरी थी, इस वजह से मुबारक अली वैन को ऐन गोदाम की जाली तक नहीं लाया था । वहां वैन का पहिया कहीं फंस सकता था और एक ऐसी नई मुसीबत खड़ी हो सकती थी जिससे अकेले दो-चार होना उसके बस की बात न होता ।
वह निर्विघ्न गोदाम मे दाखिल हुआ । फिर एक-एक करके उसने वैन तक सिलेन्डर ढोने शुरु कर दिए । जितनी गणना सोहल ने उसे बताई थी, उतनी वैन में लद चुकने तक वैन का लगभग सारा पृष्टभाग सिलेन्डरों से लद गया ।
आखिरी फेरे में उसने एक साथ तीन ऑक्सी-एसीटीलीन टार्च उठाई और वैन के करीब पहुंचा । उसने वैन के पृष्टभाग का दरवाजा बन्द किया और जाकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया । उसने वैन आगे बढ़ाई । वैन लकड़ी के फाटक के आगे से गुजरी ।
जार्ज ने कनखियों से वैन को और वैन की ड्राइविंग सीट पर बैठे अपने उस्ताद को देखा ।
मुबारक अली ने आगे सड़क पर मोड़ काटा और वैन को रोक दिया ।
वह प्रतीक्षा करने लगा ।
थोड़ी देर बाद जार्ज वहां पहुंचा ।
“फिट ?” - उसने पूछा ।
मुबारक अली ने सहमति में सिर हिलाया और ड्राइविंग सीट से परे सरक गया । जार्ज ड्राइविंग सीट पर बैठ गया । तुरन्त मैटाडोर वैन उसने आगे बढ़ा दी ।
“आज तेरा अद्धा दिखाई नहीं दे रहा !” -,एकाएक मुबारक अली बोला ।
“है न, बाप !” - जार्ज जैकेट की जेब से आधा भरा अद्धा निकालकर उसे दिखाता हुआ बोला ।
“हूं । मैं तो समझा था कि तू सुधर गया ।”
“एक घूंट मारो न, बाप ।”
“चल बे, साले । अपुन, वो क्या कहते हैं अग्रेजी में, विलायती पीता है ।”
“स्काच ।”
“वही ।”
“रोड ब्लाक !” - एकाएक जार्ज बोला ।
“क्या ?”
“आगे रोड ब्लाक दिखाई दिएला है, बाप ।”
“तो क्या वान्दा है ? वो हमारे लिए थोड़े ही है ! “
“लेकिन...”
“अबे मूर्ख, आजकल माहिम काजवे पर रोज रात को रोड ब्लाक होता है । साले, टैक्सी चलाता है, इतना भी नहीं जानता ।”
“यह रोज वाली बात मेरे कू नहीं मालूम थी । ऐसा क्यूं, बाप ?”
“आजकल पुलिस फोर्स, वो क्या कहते हैं अंगेजी में, दहशतगर्दो को...”
“टैरेरिस्ट्स को ।”
“...बहुत ढूंढेला है । देख लेना वो हमेरे कू कुछ नहीं बोलने वाला ।”
एक सिपाही ने मैटाडोर वैन की तरफ टार्च चमकाई ।
जार्ज ने उसके करीब लाकर वैन रोकी ।
सिपाही ने टार्च की रोशनी बारी-बारी दोनों के चेहरों पर डाली ।
“मुबारक अली ।” - फिर सिपाही बोला ।
मुबारक अली सकपकाया । उसने आंखें मिचमिचाई ।
“कौन हो, भाई ?” - फिर वह बोला - “जरा टार्च तो बन्द करो ।”
“मैं करीमबख्श ।” - सिपाही जलती टार्च का रूख सड़क की ओर करता हुआ बोला - “सलामालेकम ।”
“वालेकमसलाम ।”
“आज इस खड़खड़ वैन में कैसे ?”
“अपनी गाड़ी बिगड़ गई । टैक्सी मिली नहीं । ये छोकरा बन्दरगाह जा रहा है, मेरे कू फोर्ट तक लिफ्ट दियेला है ।”
“तुम्हारा जानने वाला नहीं ?”
“नहीं । लेकिन शरीफ लड़का मालूम होता है ।”
सिपाही ने जार्ज पर टार्च की रोशनी डाली ।
कभी मुबारक अली करीमबख्श के साथ ही धोबी तालाब के झोंपडे में रहता था । करीमबकख्श आज भी वहीं झोंपड़पट्टे में आबाद था जबकि मुबारक अली फोर्ट के इलाके में एक फ्लैट हासिल कर चुका था ।
जहां मुबारक अली को यह बात बड़ी नागवार गुजरी थी कि इतनी रात गए यूं चेक पोस्ट पर उसे कोई अपना पहचानने वाला मिल गया था वहीं वह इस बात से खुश भी था कि करीमबख्श जार्ज सैबेस्टयन को नहीं जानता था और उसकी लिफ्ट वाली कहानी चल गई थी ।
“लाइसेंस है ?” - करीमबख्श जार्ज से सम्बोधित हुआ ।
“है ।” - जार्ज बोला ।
“दिखाओ ।”
जार्ज ने जैकेट की जेब की तरफ हाथ बढाया ।
तभी पीछे सड़क पर एक एम्बेसेडर प्रकट हुई ।
“ठीक है । ठीक है ।” - करीमबख्श बोला, ड्राइविंग वाली साइड से ही उसने वैन के पृष्ठभाग में टार्च की रोशनी डाली ।
“सरकारी माल है, बाप ।” - जार्ज बोला - “बन्दरगाह पर छोड़कर आने का है ।”
“आगे बढो ।” - करीमबख्श मुबारक अली की सलाम करता हुआ बोला ।
जार्ज ने कार आगे बढाई ।
बैरियर पार करते समय उसने नोट किया कि एक दूसरा सिपाही एक रजिस्टर में मैटाडोर का नम्बर दर्ज कर रहा था ।
“वो नम्बर नोट कर रहा है ।” - जार्ज दबे स्वर में बोला ।
“तो क्या हुआ ?” - मुबारक अली आश्वासनपूर्ण स्वर में बोला - “वो तो, वो क्या कहते है अंग्रेजी में, इन लोगों की रुटीन है । रिकार्ड की तरफ कोई ध्यान तक तो देता नहीं । ध्यान देगा भी तो साले के हाथ क्या आएगा ! नम्बर तो नकली है ।”
जार्ज फिर न बोला ।
बाकी, आंटी के स्क्रैप बार्ड तक का, फासला उन्होंने निर्विघ्न तय किया ।
***
दिन चढा तो किसी का ध्यान कटी हुई जाली की तरफ गया ।
तुरन्त फौरमैन को सूचित किया गया ।
फोरमैन ने पुलिस को फोन किया ।
तफ्तीश में पुलिस के हाथ कोई भी क्लू न लगा ।
सिवाय बारह नम्बर के जूतों के निशानों के जो कटी हुई जाली और सड़क के दरम्यान जगह-जगह पाए गए थे ।
प्लास्टर कास्ट द्वारा घटनास्थल से दोनों पैरों के निशान उठाए गए ।
उस जानकारी को रिकार्ड सैक्शन को भेजा गया ।
शाम तक खबर आई कि पुलिस के रिकार्ड में ऐसा कोई नोन क्रिमिनल नहीं था जो कि उस असाधारण आकार का जूता पहनता हो ।
भेदियों की मदद से इलाके के जरायमपेशा लोगों की पड़ताल शुरु हुई ।
कोई नतीजा सामने न आया ।
***
दस बजे इन्स्पेक्टर फाल्के की कमिश्नर से मुलाकात हुई ।
पहले उसने कमिश्नर को हवलदार भीकाराम की मौत की खबर सुनाई ।
“बड़ा उम्दा वक्त चुना उसने लोकल से गिर कर जान देने का !” - कमिश्नर धीरे से बोला ।
“उसने या किसी और ने ।” - फाल्के बोला ।
“हमारे पास कोई ऐसा सबूत है कि उसकी मौत कोई हादसा नहीं थी ?”
“जी नहीं ।”
“फिर ?”
“सर, कई इत्तफाक एक साथ होना भी तो शक का बायस होता है । इत्तफाक से ऐन उसी वक्त डोंगरे का चालान हुआ जबकि हस्पताल में शी हान का कत्ल हुआ । इत्तफाक से चालान करने वाले इन्स्पेक्टर मुश्ताक अली ने अपनी चालान बुक का पन्ना गलत पलट दिया । इत्तफाक से वो हवलदार लोकल से गिरकर मर गया जो यह बता सकता था कि पन्ना इत्तफाक से गलत पलटा गया था या चालान अगले दिन काटा गया था । इत्तफाक से जिस शीशे की आंख वाले की खुद डॉक्टर दस्तूर ने हमें खबर दी थी, डॉक्टर दस्तूर अब उसे नहीं पहचानता ।”
“तुम्हारी बात ठीक है, इतने इत्तफाक एक साथ नहीं होने चाहियें थे ।”
“मैने कुछ किया है ।”
“क्या ?”
“मुझे कल से ही डॉक्टर दस्तूर की बेटी का घायल और बीमार होना बड़ा रहस्यपूर्ण लग रहा था । मुझे लग रहा था कि डॉक्टर दस्तूर की बेटी की उस दशा के पीछे किसी आततायी का हाथ था ।”
“तो ?”
“सर, मैने डॉक्टर दस्तूर के घर फोन करके उसकी बीवी से बात की और जाहिर किया कि मैं ही वो आततायी था ।”
कमिश्नर ने हैरानी से अपने मातहत इन्स्पेक्टर की तरफ देखा ।
“नतीजतन मुझे यह मालूम हुआ” - फाल्के बोला - “कि डॉक्टर दस्तूर की लड़की को गुन्डे उठाकर ले गए थे और डॉक्टर दस्तूर को वार्निग के तौर पर उन्होने लड़की की एक उंगली काट दी थी । कहने की जरूरत नहीं कि वार्निग कारगर साबित हुई । डॉक्टर दस्तूर ने अपनी जुबान को ताला लगा लिया ।”
“वो ताला खुलवाना होगा । इन्स्पेक्टर, दस्तूर को फिर यहां तलब करो ।”
“यस, सर ।”
शाम तक डकैती की तामम तैयारियां मुकम्मल हो गई । केवल लेसर बीम का इन्तजाम उस रोज भी न हो सका लेकिन उसकी तरफ से अभी पूरी नाउम्मीदी नहीं हुई थी । जामवन्तराव ने बताया कि अगले रोज उसके बारे में कोई अच्छी खबर मिलने की उम्मीद थी ।
बहरहाल लेसर के बिना उनका काम रुकने वाला नहीं था ।
एक चीज बड़ी मेहनत से विमल ने खुद मुहैया की ।
वह हाथ में लेकर इस्तेमाल किया जाने वाला एक मेटल डिटेक्टर था ।
फिर रात को निर्धारित समय पर जौहरी बाजार पहुंचने की पेशकश के साथ विमल और वागले आंटी के घर से विदा हुए ।
हमेशा की तरह वागले ड्राइविंग सीट पर बैठा और विमल उसके पहलू में सीट पर अधलेटा-सा बैठा पाइप के कश लगता ऊंघने लगा ।
विमल की निगाह में फिलहाल सब कुछ बहुत सुचारू ढंग से चल रहा था ।
लेकिन जहां विमल का दख्ल हो वहां सब कुछ सुचारु ढंग से चलने देना शायद वाहे गुरु को मंजूर न था ।
एक नया, सर्वदा अप्रत्याशित, व्यवाधान सामने आया ।
चैम्बूर से कार अभी काफी दूर थी कि एकाएक विमल बोला - “हमारा पीछा हो रहा है ।”
“तुम्हारा इशारा दोरंगी स्टेशनवैगन की तरफ है ?” - वागले बोला ।
“हां । और मेरे ख्याल से मैं इस स्टेशनवैगन को पहचानता हूं ।”
“कैसे पहचानते हो ?”
“तुम दाएं मोड़ काटो । देखें यह हमारे पीछे मुड़ती है ?”
स्टेशनवैगन उनके पीछे ही मुड़ी ।
“अब बायें मोड़ काटो ।” - विमल बोला ।
“उधर वन वे ट्रेफिक का बोर्ड लगा हुआ था ।”
“मैने देखा है । उधर मुड़ने से ही तसदीक होगी कि स्टेशन वैगन हमारे पीछे लगी हुई है, इत्तफाक से हमारे वाले मोड़ नहीं काट रही ।”
वागले ने वन वे स्ट्रीट में कार मोड़ी ।
स्टेशनवैगन भी वन वे स्ट्रीट में दाखिल हुई ।
वागले ने उसकी तरफ देखा ।
विमल ने बड़ी संजीदगी से गर्दन हिलाई और बोला - “थोड़ी रफ्तार बढाओ । आगे बाएं मोड़ है । उसको काटते ही कार को रोक देना । मैं उतर जाऊंगा । फिर तुम कार को आगे बढाकर ले जाना और कोई दो सौ गज परे रोक देना । ओके ।”
वागले ने सहमति में सिर हिलाया ।
मोड़ काटने के बाद कार अभी पूरी तरह से गतिशून्य भी नहीं हुई थी कि विमल उसमें से निकलकर फुटपाथ पर आ गया । कार आगे बढ गई । वह एक खम्बे की ओट में हो गया ।
वह सड़क आगे से बन्द थी और उस वक्त सुनसान थी ।
स्टेशनवैगन उसके करीब से गुजरी तो विमल ने उसे और उसके ड्राइवर को ठीक से देखा ।
विमल सड़क पर आ गया और सिर नीचा किए आगे बढा । कुछ कदम आगे चलने के बाद वह फुटपाथ से नीचे उतर आया और सड़क के मध्य में हो गया । यूं ही चलता हुआ वह स्टेशनवैगन के दाएं पहलू के करीब पहुंचा तो एकाएक ठिठका । उसने हाथ बढाकर स्टेशनवैगन का ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोला ।
भीतर स्टियरिंग के पीछे बैठा आदमी हड़बड़ाया । फिर उसके हाथ में बिजली की फुर्ती से एक रिवाल्वर प्रकट हुई । उसने रिवाल्वर को खुले दरवाजे को थामे विमल की तरफ तान दिया ।
“खबरदार !” - वह फुंफकारा ।
“हल्लो, सोलंकी ।” - विमल सहज भाव से बोला ।
“खबरदार !”
“वो तो मैं हो गया । लेकिन यह तो बताओ कि तुम मुझे खबरदार करना क्यों चाहते हो और तुम यहां मुम्बई में क्या कर रहे हो और...”
“शटअप !”
“अरे ! इतनी बेअदबी ! इतनी बद्सलूकी !”
“शनिवार को कहां थे तुम ?”
“परसों ! परसों यहीं था मैं ।”
विमल ने कनखियों से देखा कि वागले कार से बाहर निकल आया हुआ था और अब दबे पांव स्टेशनवैगन की दिशा में बढ रहा था ।
“परसों नहीं । पिछले शनिवार ! पांच तारीख वाले शनिवार !”
“क्यों पूछ रहे हो ?”
“जवाब दो ।”
“वजह तो पता लगे ऐसी जवाबतलबी की ?”
“शनिवार पांच तारीख को शाम चार बजे डॉक्टर स्लेटर का कत्ल हो गया है जोकि तुम्हीं हरामजादों में से किसी ने किया हैं जिन्होंने कि डॉक्टर स्लेटर से नया चेहरा हासिल किया था ।”
“तुम समझते हो कि डॉक्टर स्लेटर का कत्ल मैंने किया है ?”
“तुमने भी किया हो सकता है ।”
“मैं तो यहां था । मुम्बई में ।”
“शनिवार पांच तारीख को ? शाम चार बजे ?”
“हां ।”
“साबित कर सकते हो ?”
तभी वागले ने एक झटके से स्टेशनवैगन का परला दरवाजा खोला और सोलंकी की रिवाल्वर वाले हाथ पर हाथ डाल दिया । सोलंकी की पीठ उसकी तरफ फिरने से पहले ही रिवाल्वर वागले के हाथ में थी । उसने रिवाल्वर सोलंकी की कनपटी से सटा दी ।
“बाहर निकल !” - विमल बोला ।
सोलंकी ने अपनी जगह से हिलने का भी उपक्रम न किया ।
“जिसके हाथ में रिवाल्वर है, वो कोई गैर नहीं, मेरा साथी है ।” - विमल बोला - “वो तेरा भेजा उड़ा देगा ।”
“पछताओगे ।”
“क्यों ?”
“मैं मर गया तो तुम्हारे नए चेहरे का राज भक्क से उड़ जाएगा ।”
“मतलब ?”
“हेल्गा को अगर मेरी राजी-खुशी की खबर न लगी तो वो तुम्हारे नए चेहरे की पोल खोल देगी ।”
“कैसे ?”
“वो बमय चिट्ठी तुम्हारे नए चेहरे की तस्वीरें सारे हिन्दोस्तान के पुलिस-प्रमुखों को भेज देगी ।”
“ओह ! ओह !”
विमल कुछ क्षण खामोश रहा और फिर नर्मी से बोला - “तुम बाहर तो निकलो ।”
सोलंकी बाहर निकला । वागले पहले ही बाहर था । वह स्टेशनवगैन का सामने की तरफ से घेरा काटकर सोलंकी के करीब पहुंच गया ।
विमल स्टेशनवैगन की ड्राइविंग सीट पर बैठा । उसने इंजन स्टार्ट किया । इंजन के स्टार्ट होकर जोर पकड़ने से पहले सारी गाड़ी छाज की तरह हिली ।
“इसी पर सोनपुर से वहां तक आए हो ?” - वह बोला ।
“हां ।” - सोलंकी बोला - “यह देखने में खड़खड़ लगती है लेकिन है एकदम चौकस ।”
विमल ने गाड़ी को फुटपाथ पर चढाकर खड़ा कर दिया, फिर गाड़ी बन्द करके चाबियां सोलंकी को सौंप दीं ।
“आओ ।” - वह सोलंकी से बोला ।
“कहां ?” - सोलंकी सशंक स्वर में बोला ।
“पास ही । अपना मकान है । वहां बैठकर इत्मीनान से बातें होंगी ।”
सोलंकी हिचकिचाता हुआ आगे बढा ।
तीनों कार में सवार हुए ।
“तुम डॉक्टर स्लेटर के बॉडीगार्ड थे ।” - कार रवाना हुई तो विमल बोला - “तुम्हारे होते उनका कत्ल कैसे हो गया ?”
सोलंकी ने उत्तर न दिया लेकिन उसकी सूरत से साफ जाहिर हो रहा था कि यही बात उसे भी साल रही थी ।
“मेरे सामने तो तुम बड़े नारे लगाकर दिखा रहे थे कि जो कोई सोनपुर का रुख करेगा, तुम उससे उसका नया चेहरा छीन लोगे ?”
“मैं गच्चा खा गया ।” - वह शोकपूर्ण स्वर में बोला - “मुझे नहीं पता लगा कि हत्यारा कब आया और कब अपना काम कर गया । किसी को भी हत्यारे की भनक नहीं लगी थी ।”
“चार बजे तुम कहां थे ?”
“गैरेज में डॉक्टर साहब की कार धो रहा था ।”
“हूं !”
कार चैम्बूर पहुंची ।
तीनों ड्राइंगरूम में पहुंचे ।
“यह सोलंकी है ।” - विमल बोला - “यह जानना चाहता है कि पिछले शनिवार को मैं कहां था ?”
“तुम पहले यहां थे और फिर आंटी के घर थे ।” - वागले बोला !
“आंटी को फोन करो और उसकी सोलंकी से बात कराओ । उसे कहो कि मैं चाहता हूं कि आंटी इसे बताए कि शनिवार मैं कहा था !”
वागले ने फोन किया, उत्तर मिला तो उसने विमल का निर्देश दोहराया और फिर टेलीफोन सोलंकी को थमा दिया ।
सोलंकी झिझकता हुआ फोन सुनने लगा ।
“हां” - वह बोला - “शनिवार पांच तारीख । ...कितने बजे ?...यह जगह कहां है ?...शुक्रिया ।”
उसने रिसीवर वापस वागले को थमा दिया ।
“वो कहती है” - सोलंकी बोला - “कि शनिवार रात आठ से नौ बजे तक तुम बन्दरगाह के इलाके में उसके घर पर थे ।”
“हो गई तसल्ली ?”
“डॉक्टर साहब का कत्ल शाम चार बजे के करीब हुआ था ।”
“फिर भी कातिल मैं नहीं हो सकता । मैं आठ बजे यहां था । चार घन्टों में सोनपुर से यहां तक उड़कर भी नहीं पहुंचा जा सकता ।”
“तुमने इस औरत को पहले से ही सिखाया-पढाया हो सकता है कि पूछे जाने पर वो यही कहे कि तुम शनिवार को यहां थे ।”
“वो किसलिए ? मुझे क्या सपना आना था कि तुम मेरी तलाश में यहां पहुंच जाओगे और यूं मुझे खोज निकालोगे ?”
“तुम्हें ऐसा कोई खतरा मेरी तरफ से रहा हो सकता था ।”
“मैं तुम्हारी तरफ से कोई खतरा महसूस करता होगा तो तुम्हें जिन्दा ही क्यों छोड़ता ? मैं डॉक्टर स्लेटर के साथ-साथ तुम्हारा और हेल्गा का भी कत्ल न कर आया होता ? क्या मुश्किल काम होता यह मेरे लिए ?”
वह सोच में पड़ गया ।
“बोलो !” - विमल उसे घूरता हुआ बोला - “बोलते वक्त मेरी असलियत याद कर लेना । सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल होता हूं मैं । मैं वहां गया होता तो डॉक्टर स्लेटर के साथ-साथ तुम्हारे सारे नर्सिंग होम को तबाह करके आया होता । मैं सिर्फ डॉक्टर स्लेटर की जुबान बन्द करके तसल्ली न कर लेता । मैं सारा रिकार्ड तबाह करके आता । मैं वहां के चूहे-बिल्लियों तक को मौत के घाट उतार कर आता ।”
सोलंकी कुछ क्षण जो सुना था, उस पर मनन करता रहा और फिर बोला - “ठीक है । डॉक्टर स्लेटर के कातिल तुम नहीं हो । मेरी रिवाल्वर वापस दिलावाओ ताकि मैं जाऊं ।”
“अभी बैठे रहो । अभी हमने और बातें करनी हैं ।”
“अब और क्या बातें करनी हैं ?”
“तुमने कहा था कि डॉक्टर स्लेटर के कत्ल का शक तुम्हें मेरे जैसों में से किसी और पर भी है ।”
“हां । दो जने और भी हैं तुम्हारे जैसे । अब मैंने उनके पीछे लगना है ।”
“दो ही और क्यों ? डॉक्टर स्लेटर ने तो दर्जनों लोगों को नया चेहरा दिया है । वो खुद ऐसा कहता था ।”
“इस साल में अब तक उन्होंने सिर्फ तीन आपरेशन किये थे । एक तुम्हारा और दो जनों का । हमने बहुत सोच-विचारकर नतीजा निकाला था कि अगर डॉक्टर स्लेटर का कत्ल किसी नये चेहरे ने किया था तो वह इन तीनों में से ही एक था । तुम पर हमें सबसे ज्यादा शक था क्योंकि तुम ताजातरीन केस थे । इसलिऐ सबसे पहले मैं तुम्हारे पीछे आया था ।”
“इस साल से पहले के किसी केस ने कत्ल क्यों नहीं किया हो सकता ?”
“क्योंकि कत्ल के लिए किसी ने इतना लम्बा इन्तजार न किया होता । पिछले साल का या उससे पिछले साल का कोई केस अगर डॉक्टर स्लेटर के कत्ल का ख्वाहिशमंद होता तो वह ऐसी कोई कोशिश कब की कर चुका होता ।”
“यह विचारधारा तुम्हारे अपने दिमाग की उपज है !” - विमल अचरज से बोला ।
“मेरे और हेल्गा के । ज्यादातर हेल्गा के ।”
“यानी कि हेल्गा तुम्हारे से ज्यादा समझदार है !”
उसने उत्तर न दिया ।
“तुम वापस नहीं लौटोगे तो हेल्गा क्या करेगी ?”
“बताया तो । वो नये चेहरों का राज पुलिस के सामने खोल देगी ।”
“सब नए चेहरों का ?”
“नहीं । सिर्फ इस साल के तीन नये चेहरों का । मैंने कहा न कि अगर कत्ल किसी ने किया होगा तो इस साल वाले तीन में से ही किसी ने किया होगा ।”
“अब तो दो कहो । मुझे तो तुमने बरी कर दिया है ।”
“हां । बाकी दो बचे ।”
“लेकिन हेल्गा को क्या पता कि तुम मुझे बरी कर चुके हो ! अब तुम्हें कुछ हो जाये और तुम वापस न लौटो तो उसके पास तो यह जानने का कोई साधन नहीं होगा कि किसने तुम्हारे पर हाथ डाला ! वो तो तीनों की ही खबर पुलिस को कर देगी । क्यों ?”
वह सकपकाया ।
उसकी सूरत से साफ जाहिर हो रहा था कि ऐसी किसी सम्भावना पर उन लोगों ने विचार नहीं किया था ।
“फर्ज करो अब सस्पेक्ट नम्बर एक को - मुझे - बरी करके तुम नम्बर दो के पीछे पड़ते हो । फर्ज करो वही डॉक्टर स्लेटर का हत्यारा है लेकिन इससे पहले कि तुम उसे खत्म कर सको, वह तुम्हें खत्म कर देता है । तुम वापस नहीं लौटते । हेल्गा को क्या पता कि तुम्हें नम्बर दो ने मारा ? वो तो तीनों की पोल खोल देगी !”
“तुम फिक्र न करो । नम्बर दो मुझे खत्म नहीं करेगा, मैं उसे खत्म करूंगा ।”
वागले हंसा ।
सोलंकी ने हड़बड़ाकर उसकी तरफ देखा ।
“जैसे तुमने अभी सोहल को खत्म किया था ।” - वागले बोला ।
सोलंकी के चेहरे पर झुंझलाहट के भाव आये ।
“अगर तुम” - विमल विचारपूर्ण स्वर में बोला - “हेल्गा को यहां से फोन लगाओ और उसे मेरी बेगुनाही की बाबत बताओ तो...”
सोलंकी पूरी बात सुन चुकने के पहले ही इनकार में सिर हिलाने लगा ।
“क्यों ?” - विमल के माथे पर बल पड़ गये - “क्या हुआ ?”
“हमारे में यह फैसला हो चुका है कि हेल्गा ऐसी फोन काल का विश्वास नहीं करेगी ।”
“क्यों ? कोई तुम्हारी आवाज की नकल कर लेगा ?”
“वह भी हो सकता है और फोन मेरे से जबरन भी करवाया जा सकता है । उस तक तुम्हारी बाबत कोई बात पहुंचाने के लिये मेरा उससे रूबरू मिलना जरूरी है ।”
“दाता !”
“यह चला जाए सोनपुर” - वागले बोला - “और जाकर बता आये अपनी उस... उस औरत को - हेल्गा को - तुम्हारे बारे में ।”
“मेरे कहने-भर से यह सोनपुर नहीं चला जाने वाला । इसके वहां जाने की गारन्टी तभी है जब मैं इसके साथ जाऊं । यह यहां से तो यह हामी भरकर छूट जाएगा कि यह सोनपुर जा रहा है लेकिन जायेगा यह अपने सस्पैक्ट नम्बर दो के ही पीछे जोकि पता नहीं हिन्दोस्तान के किस कोने में पाया जाता है । इसे मेरी सलामती से मतलब नहीं, डॉक्टर स्लेटर के हत्यारे की सजा से मतलब है ।”
“ऐसा हरामी है ये ?”
“ऐसा मूर्ख है ये ।”
“लेकिन तुम कैसे जा सकते हो ! आज रात से ही तो हमने...”
“मालूम है । मालूम है । एक हफ्ता मैं कहीं नहीं जा सकता । अपने अभियान के लिए इतनी मेहनत से की तैयारी को अब एकाएक मंझधार में नहीं छोड़ा जा सकता ।”
“मैं पहले सोनपुर चला जाता हूं ।” - सोलंकी व्यग्र भाव से बोला ।
“मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास नहीं ।” - विमल बोला ।
“लेकिन...”
“बको मत । तुम्हारे माथे पर लिखा है कि ऐसा तुम मौके का फायदा उठाने के लिए कह रहे हो ।”
उसने जोर से थूक निगली । पहले नहीं तो तब उसकी सूरत से लगने लगा कि विमल ने उसका इरादा ठीक भांपा था ।
“तुमने मुझे ढूंढा कैसे ?” - विमल बोला ।
“तुम्हारी इस चिट्ठी की मदद से जो सोनपुर में नर्सिंग होम के पते पर आई थी । डॉक्टर स्लेटर ने वह चिट्टी मेरे सामने खोली थी । चिट्ठी में तुकाराम का भेजने वाले की जगह नाम लिखा था और उस पर मुम्बई - 400071 की मोहर थी । मुम्बई - 400071 चेम्बूर का इलाका पड़ता है । यहां मामूली पूछताछ से ही मुझे मालूम हो गया था कि तुकाराम कहां रहता था !”
“तुकाराम कोई मन्त्री या नेता है जो मामूली पूछताछ से ही तुम्हें यहां का पता लग गया !”
“दादा लोग अण्डरवर्ल्ड में मन्त्री, नेताओं से ज्यादा मशहूर होते हैं । हमारे पास तुकाराम की फाइल है जिसकी वजह से मुझे उसकी हस्ती की वाकफियत थी । मैंने तुकाराम की बाबत किसी सफेदपोश बाबू से नहीं, इलाके के गुण्डे-बदमाशों से पूछा था ।”
“हूं । तो तुम्हें उम्मीद थी कि मैं तुकाराम के यहां होऊंगा ?”
“चिट्ठी तो यही कहती थी । तुम निकले भी यहीं थे । मैं यहां से तुम्हारा पीछा करता बन्दरगाह के उस कबाड़खाने तक पहुंचा था । वापसी मैं तुम पर हाथ डालने की मैं कोई तरकीब सोच ही रहा था कि तुमने मेरे पर हाथ डाल दिया ।”
“अगर मैंने डॉक्टर स्लेटर का कत्ल किया होता तो तुम्हारे पूछने-भर से मैं यह बात कबूल कर लेता ?”
“पूछने-भर से नहीं कबूल करते । लेकिन अगर तुम अकेले मेरे हत्थे चढ़ गए तो इसलियत तो मैं तुमसे कुबुलवा कर ही मानता ।”
“उसके बाद क्या करते ?”
“यह भी कोई पूछने की बात है । उसके बाद मैं तुम्हें तुम्हारे करतूत की सजा देता । मैं तुम्हें जान से मार डालता ।”
“बल्ले !”
सोलंकी ने आंखें तरेरकर उसकी तरफ देखा ।
“डैडलाइन कब की है ?” - विमल ने पूछा ।
“कौन-सी लाइन ?” - सोलंकी हड़बड़ाया ।
“डैडलाइन ! तुमने हेल्गा से वापसी की कोई तारीख भी तो मुकर्रर की होगी ! ऐसा कुछ भी तो कहा होगा कि अगर फलां तारीख तक या इतने अरसे तक तुम वापस उसके पास न लौटो तो यह मेरे समेत तीनों नये चेहरों की पोल खोल दे !”
“हां ! वो ! पन्द्रह दिन का वक्त तब हुआ है हमारे बीच में ।”
“कब से ?”
“कल से ।”
“कल तेरह तारीख थी । यानी कि अट्ठाइस तारीख तक हेल्गा तुम्हारा इन्तजार करेगी और फिर तीन लेटेस्ट नये चेहरों की बाबत पुलिस को खबर कर देगी ?”
“हां ।”
“वाहेगुरु सच्चे पातशाह !” - विमल के मुंह से निकला - “तेरे रंग न्यारे ।”
कुछ क्षण खामोशी रही ।
“सोलंकी !” - अन्त में विमल ने ही खामोशी भंग की - “मेरे लिए सबसे ज्यादा सहूलियत का तरीका तो यह है कि मैं अभी तुझे शूट करके तेरी लाश समुद्र में फेंकवा दूं और फिर अट्ठाइस तारीख होने से पहले सोनपुर जाऊं और जाकर हेल्गा का गला काट आऊं ।”
“तुम मेरा खून कर सकते हो ।” - सोलंकी बोला - “क्योंकि इस वक्त मैं तुम्हारे कब्जे में हूं लेकिन हेल्गा का खून करना इतना आसान नहीं होगा ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि वो वहां अकेली नहीं है ।”
“कौन है वहां उसके साथ ?”
“उसका भाई । उसका ब्वायफ्रेंड ।”
“ब्वायफ्रेंड ! उस ड्रम का !”
“दोनों खतरनाक दादे हैं । उनके होते तुम हेल्गा के करीब भी नहीं फटक पाओगे ।”
“हूं ।”
“हमें पता था कि हेल्गा की यूं जान लेने की कोशिश हो सकती है इसलिए उन दो जनों को मेरे वहां से रवाना होने से पहले हेल्गा ने खासतौर से बुलाया था । जब तक मैं नहीं लौटूंगा, वो वही रहेंगे और जी-जान से हेल्गा की हिफाजत करेंगे ।”
“तुम बहुत बुरे वक्त मुम्बई में टपके, सोलंकी । खामखाह एक प्राब्लम खड़ी कर दो मेरे सामने ।”
वह खामोश रहा ।
“अब कुछ दिन मुझे तुम्हारे को गिरफ्तार करके रखना होगा ।”
“क्या !”
“यहां मेरा एक काम है जो एक हफ्ते में निपटेगा । उसके बाद में तुम्हारे साथ सोनपुर चलूंगा । मेरा काम निपटने तक मुझे तुम्हारे को कहीं गिरफ्तार करके रखना होगा ।”
“तुम ऐसा नहीं कर सकते ।”
“अच्छा ! कौन रोकेगा मुझे ?”
सोलंकी ने जवाब न दिया । उसने अपने एकाएक सूख आए होंठों पर जुबान फेरी ।
“इसे रखोगे कहां ?” - वागले धीरे से बोला ।
“फिलहाल तो मुझे आंटी का स्क्रैप यार्ड ही सूझ रहा है । आगे की आगे देखेंगे ।”
ठीक है ।”
“उठकर खड़े हो जाओ, सोलंकी ।”
“मैं कहीं नहीं जाऊंगा । तुम मुझे जबरदस्ती कहीं नहीं ले जा सकते ।”
“वागले, यह तो बहस कर रहा है ।”
वागले उसके करीब पहुंचा । उसने रिवाल्वर की नाल से उसके घुटने पर दस्तक दी और मीठे स्वर में बोला - “तुम्हारा घुटना कैसा है ? एकदम चौकस ! तन्दुरुस्त !”
सोलंकी इशारा समझ गया । वह फौरन उठ खड़ा हुआ ।
आंटी पर विमल का कुछ ऐसा रोब गालिब हो चुका था कि उसने न केवल सोलंकी को अपने यहां रखने से इन्कार न किया, बल्कि उसने उन्हें एक बहुत ही बढिया जगह भी सुझाई ।
स्क्रैप वार्ड के पिछवाड़े में एक स्टोरनुमा इमारत थी जिसके नीचे एक तहखाना था । उस तहखाने की सीढिया वहां बनी एक कोई तीन फुट गहरी अलमारी से होकर गुजरती थी जो अगर बंद होती थी तो बहुत बारीक जांच-पड़ताल पर भी दिखाई नहीं देता था कि सीढियों का दहाना अलमारी के भीतर कहां था । वह तहखाना आंटी उन स्मगलरों और चोरों को छुपाने के लिए इस्तेमाल करती थी जोकि उसके पास ठिकाने लगाने के लिए चोरी का माल लाते थे । उस तहखाने की एक बड़ी खूबी यह भी थी कि वह साउण्डप्रूफ था । यानी कि सोलंकी को वहां हाथ-पांव और मुंह बांधकर रखने की जरूरत नहीं थी । वह गला फाड़-फाड़कर भी चिल्लाता तो उसकी आवाज वहां से बाहर नहीं सुनाई देने वाली थी ।
विमल को वह जगह बहुत पसन्द आई । अनायास ही उसकी बहुत बड़ी समस्या हल हो गई थी ।
सोलंकी को उस तहखाने में बन्द कर दिया गया ।
***
शाम को डॉक्टर दस्तूर कमिश्नर के ऑफिस में पहुंचा ।
“अब कैसे याद फरमाया, कमिश्नर साहब ?” - वह पस्तीभरे स्वर में बोला - “क्या फिर मैंने किसी एक आंख वाले मवाली की शिनाख्त करनी है ?”
“वो शिनाख्त तो आप कर चुके हैं ।” - कमिश्नर धीरे से बोला - “अलबत्ता शिनाख्त का नतीजा आपने हमसे छुपाकर रखा ।”
“क्या मतलब ?”
“आपकी बेटी की अब कैसी तबीयत है ?”
“क्यों, क्या हुआ है मेरी बेटी की तबीयत को ?”
“मेरा सवाल उसकी कटी हुई उंगली की बाबत था !”
डॉक्टर सकपकाया, उसका चेहरा पीला पड़ गया ।
“आपको कोई गलतफहमी हुई मालूम होती है । मेरी बेटी सही-सलामत है । उसकी कोई उंगली नहीं कटी है ।”
“यह कोई छुपने वाली बात है, डॉक्टर साहब ? कल को वो स्कूल जाएगी तो...”
“मेरी बेटी सही-सलामत है और स्कूल अब वो मुम्बई में नहीं जाएगी ।”
“मतलब ?”
“मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है जोकि दो-चार दिन में मंजूर हो जाएगा । फिर मैं रहने के लिए दिल्ली जाने वाला हूं ।”
“आप गुण्डे-बदमाशों से खौफ खाकर यह शहर छोड़ रहे हैं ?”
“मुझे यहां से बढिया नौकरी मिल गई है, इसलिए यह शहर छोड़ रहा हूं ।”
“जब आप यहां से हमेशा के लिए जा ही रहे हैं तो फिर आप यह कबूल करके क्यों नहीं जाते कि श्याम डोंगरे ही वो शख्स था जो नकली एक्सीडेंटल केस बनकर आपके पास हस्पताल में आया था ?”
“श्याम डोंगरे कौन है ?”
“श्याम डोंगरे उस शीशे की आंख वाले मवाली का नाम है जिसकी शिनाख्त के लिए पिछले शुक्रवार आप यहां पधारे थे ।”
“मैंने उसकी शिनाख्त नहीं की थी ।”
“नहीं की थी लेकिन असल में वो वही आदमी था जो...”
“वो वो आदमी नहीं था ।”
“डॉक्टर साहब मैं आपकी मनोदशा को समझता हूं ।”
“लेकिन...”
“कमिश्नर साहब, मैं आपके साथ बहस-मुबाहसे में नहीं उलझना चाहता । मैंने अपना जवाब आपके दे दिया है । अब मैं जा सकता हूं ?”
“डॉक्टर साहब, आपको ऐसा रवैया शोभा नहीं देता । आप एक जिम्मेदारी शहरी हैं और...”
“किसने कहा है मैं एक जिम्मेदार शहरी हूं ?” - एकाएक डॉक्टर दस्तूर भड़क उठा - “कहीं सरकारी गजट में छपा है ऐसा या मैंने कभी ऐसा दावा किया है ?”
कमिश्नर हड़बड़ाया । प्रत्यक्षत: उसे ऐसा जवाब मिलने की उम्मीद नहीं थी ।
“मैं अपनी फैमिली के लिए पहले जिम्मेदारी दिखाऊं या आपके इस नामुराद शहर के लिए जिस पर गुण्डे-बदमाशों का एकछत्र राज हो गया मालूम होता है ? मैं आपको पहले भी कह चुका हूं, फिर कहता हूं, फिर पूछा जाएगा तो फिर भी यही जवाब दूंगा कि मैं उस शख्स को नहीं पहचानता । मेरा बयान बदलने की खातिर अगर आप मेरे साथ ऐसी कोई जोर-जबरदस्ती नहीं करना चाहते जिसके लिए कि पुलिस फेमस है तो मुझे इजाजत दीजिए ।”
“लेकिन...”
“अभी भी लेकिन ।” - डॉक्टर दस्तूर खड़ा हुआ - “मैं जा रहा हूं । अगर आप अभी भी मुझे रोके रखना चाहते हैं तो आपको मुझे गिरफ्तार करना होगा ।”
“नहीं, नहीं । हम भला ऐसा क्यों करेंगे ?”
“दैन गुड नाइट ।”
डॉक्टर दस्तूर वहां से कूच कर गया ।
पीछे कमिश्नर और इंस्पेक्टर फाल्के हकबकाए से एक-दूसरे का मुंह देखते रहे ।
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