गुरुवार : चौबीस दिसम्बर

मुम्बई सुनामपुर 'जलपरी'
होटल सी-व्यू के सिक्योरिटी चीफ तिलक मारवाड़े का आवास हेनस रोड पर था जहाँ से कि वो आठ बजे के करीब अपनी एस्टीम खुद ड्राइव करता रवाना होता था और कहीं ट्रैफिक जाम न मिले तो कोई एक घण्टे की ड्राइव कर के तुलसी पाइप रोड, माहिम काजवे और वैस्टर्न एक्सप्रैस हाइवे से होता होटल सी-व्यू पहुँचता था। उस रोज चौबीस तारीख थी और होटल सी-व्यू के हर रेस्टोरेंट में क्रिसमस ईव का जश्‍न देर रात तक चलना अपेक्षित था इसलिये वो बीवी को बोल कर आया था कि हो सकता था कि वो रात को घर न लौट पाता।
जो कि उस की बीवी और दो बच्चों के लिए कोई नयी बात नहीं थी।
दादर स्टेशन से थोड़े पहले एक चौराहे की बत्ती तब लाल हो गयी जब कि बैस्ट की एक बस ने चौराहा पार करने की जगह एकाएक ब्रेक लगा दी। उसने बस के पीछे कार रोक दी।
रियर व्यू मिरर में उसने अपने पीछे एक काली मैटाडोर वैन को रुकते देखा।
स्टियरिंग थपथपाता वो बत्ती हरी होने की प्रतीक्षा करने लगा।
अखबार वाला एक छोकरा उसकी विंडो के करीब पहुँचा और उसके सामने अखबार हिलाने लगा।
बन्द खिड़की में से उसने इशारे से कहा कि उसको अखबार नहीं माँगता था।
छोकरा हटने लगा तो दो अखबार उस की बाँह के घेरे से फिसलकर नीचे जा गिरे। वो झुक कर उन्हें उठाने लगा तो एक खुल गया और उसके हाथ के धक्के से ही उसके वरके और परे सरक गये। फिर आजू बाजू खड़ी कारोंवाले लोगों ने सहज भाव से उसे अखबार बटोरते तो देखा लेकिन ये न देखा कि उसने मारवाड़े की एस्टीम के पिछले पहिये का वाल्व ढीला कर दिया था।
बत्ती हरी हुई।
मारवाड़े ने कार आगे बढ़ाई और बस के बाजू से निकाल कर उसे रफ्तार दी।
तीन किलोमीटर आगे आने तक उसे अहसास होने लगा कि कार ठीक नहीं चल रही थी।
और दो किलोमीटर बाद उसको कार रोक कर उसके पहिये चैक करने की जरूरत महसूस होने लगी।
उसने कार को फुटपाथ से लगा कर रोका और बाहर निकला। सब से पहले उसने ड्राइविंग सीट के नीचे वाले पहिये पर ही निगाह डाली। उस पहिये को चौकस पा कर वो उसी साइड के पिछले पहिये पर पहुँचा।
वो पहिया उसे आधा बैठा मिला।
तभी काली मैटाडोर वैन ऐन उसके पहलू में यूँ आकर रुकी कि सड़क की तरफ से उसकी कार उसकी ओट में आ गयी। वैन का पिछला दरवाजा खुला और चार हाथों ने मारवाड़े को वैन में घसीट लिया। दरवाजा तत्काल बन्द हुआ। बन्द होते दरवाजे के साथ ही आगे का पैसेंजर साइड का दरवाजा खुला और एक आदमी बाहर निकला। उसने अपने पीछे दरवाजे को धक्का दिया तो वैन ये जा वो जा। वो आदमी एस्टीम में सवार हुआ, उसने उसका इंजन आन किया और उसे चलाता करीबी पैराडाइज सिनेमा की तरफ ले गया जहाँ कि वो कार का बैठा हुआ पहिया तब्दील कर सकता था और फिर कार को कहीं भी ले जा सकता था।
“ये क्या बेहूदगी है?”—वैन में मारवाड़े गुस्से में अपने सामने बैठे दो आदमियों से सम्बोधित हुआ।
“अभी मालूम पड़ेगा न, बाप!”—एक जना बोला।
उसका नाम बापू बजरंगी था और बहुत सोच विचार के बाद दफेदार ने उसे अपने खास लेफ्टीनेंट के तौर पर चुना था।
उसके जोड़ीदार का नाम बोगस था और जो आगे गाड़ी चला रहा था, उसका नाम डाकी था।
पिछले रोज जुहू में उसके साथ जो बीती थी, उसकी वजह से दफेदार हिला हुआ था और बेवजह—या शायद इस वजह से कि अपनी किरकिरी का ठीकरा उसने किसी के सिर तो फोड़ना ही था—हैदर पर शक कर रहा था कि उसने शोहाब से मुलाकात के दौरान हालात को ठीक से हैंडल नहीं किया था।
“अगवा की सजा जानते हो?”—मारवाड़े गर्जा—“दस साल को नपोगे।”
“वान्दा नहीं, बाप, पण तू चुप बैठ।”
“तुम लोग क्या चाहते हो?”
“अभी दूसरा भीड़ू बोलेंगा न!”
“दूसरा भीड़ू कौन?”
“जो बोलेंगा।”
“अरे, कौन?”
“दूसरा भीड़ू।”
“है कौन वो?”
“मालूम पड़ेगा न!”
“तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो?”
“मालूम पड़ेगा न!”
“मैं अभी पुलिस को फोन करता हूँ।”
और मारवाड़े ने जेब से अपना मोबाइल निकाला।
“अरे, क्या गजब करता है, बाप!”
“गजब ही होगा। देखना।”
बापू बजरंगी ने बोगस को खामोश इशारा किया।
बोगस ने गन निकाल कर मारवाड़े की तरफ तान दी।
मारवाड़े के कस बल निकल गये।
बापू बजरंगी ने बड़े आराम से मोबाइल उसकी उँगलियों से निकाल लिया।
फिर वैन में खामोशी छा गयी।
वैन चलती रही, फासला कटता रहा, वक्त गुजरता रहा।
“अरे, कहाँ जा रहे हैं हम?”—मारवाड़े व्याकुल भाव से बोला।
“बस, पहुँच गये, बाप।”
वैन की रफ्तार घटी।
फिर वो गतिशून्य हुई।
एक शटर के उठने की आवाज आयी।
वैन लो गियर में थोड़ा आगे बढ़ी, फिर रुकी। इस बार उसका इंजन बन्द हो गया।
शटर के नीचे गिरने की आवाज हुई।
बोगस ने वैन का दरवाजा खोला और बाहर निकला।
बजरंगी ने पहले मारवाड़े को बाहर निकलने का इशारा किया और फिर खुद उसके पीछे बाहर निकला।
मारवाड़े ने अपने आप को एक बन्द गैरेज में पाया।
गैरेज के पिछवाड़े में एक दरवाजा था जिसे बोगस ने आगे बढ़ कर खोला। तीनों ने आगे पीछे वो दरवाजा पार किया तो मारवाड़े को अहसास हुआ कि आगे एक बहुत बड़ा गोदाम था जिस के दरवाजे के एक बाजू के खाली हिस्से में एक मेज और उसके गिर्द चार कुर्सियाँ पड़ी थीं।
एक कुर्सी पर दफेदार पसरा बैठा था।
बजरंगी ने मारवाड़े की बाँह पकड़ कर उसे दफेदार के सामने की एक कुर्सी पर बिठाया और फिर वो और उसका जोड़ीदार मेज से बहुत परे हट कर खड़े हो गये।
“खुशामदीद।”—दफेदार जबरन मुस्कराता बोला—“मेरे को पहचानता है, बिरादर?”
“नहीं।”—मारवाड़े भुनभुनाया।
“मैं दफेदार। इनायत दफेदार।”
“नाम सुना है।”
“मैं ‘भाई’ का खास।”
“मेरे को अगवा कर के यहाँ लाने का क्या मतलब है?”
“तुम्हेरे से बात करने का था, बिरादर।”
“ये कौन-सा तरीका है बात करने का?”
“मेरे को यहीच तरीका आता है।”
“क्या बात करना चाहते हो?”
“एक दरखास्त करना चाहता हूँ।”
“क्या?”
“बाप, तुम उधर होटल सी-व्यू में सिकोटरी का चीफ है। सिकोटरी को बहुत टाइट कर के रखता है। मेरे को सिकोटरी में थोड़ा ढील माँगता है।”
“क्यों?”
“है कोई वजह।”
“ताकि उधर कोई वारदात कर सको। जैसे मई के महीने में कोशिश की थी। सत्तरह तारीख थी शायद।”
“सतरह ही थी।”
“तो फिर वो तुम्हारा ही कारनामा था?”
“कौन-सा?”
“तुम्हारा एक आदमी सूट बूट डाट के औकात बना के होटल में पहुँचा था और रिसेप्शन पर आरडीएक्स से भरे दो सूटकेस सरका कर खिसक चला था जब कि मेरे जूनियर पवन डांगले ने उसे थाम लिया था। सूटकेसों में से चौदह किलो आरडीएक्स बरामद हुआ था जो फटता तो होटल में बहुत तबाही मचाता। पूछताछ पर उस आदमी ने अपना नाम बिलाल बताया था और जब पूछा गया था कि वो काम किसने उसके सुपुर्द किया था तो उसने इनायत दफेदार का नाम लिया था। इसलिये मैं नाम से वाकिफ हूँ। तो तुम हो वो इनायत दफेदार जो सी-व्यू को बारूद से उड़ाने के तमन्नाई थे?”
“अभी भी हूँ।”
“क्यों? ताकि तुम राजा साहब को हिट कर सको।”
“हाँ। यहीच माँगता है मैं।”
“और समझते हो कि इस काम में—इस वाहियात, जलील, बद्अखलाक काम में—मैं तुम्हारी मदद करूँगा?”
“समझता नहीं है, बाप, जानता है।”
“गलत जानते हो। मैं गद्दार नहीं हूँ, दगाबाज नहीं हूँ, बेगैरत नहीं हूँ, जमीरफरोश नहीं हूँ। मैं जिस थाली में खाता हूँ, उसमें छेद नहीं करता।”
“जान पर आ पड़े तो सब करना पड़ता है, बाप।”
“तुम मेरे से जोर जबरदस्ती करोगे? मेरी मर्जी के खिलाफ मेरे से कुछ करा पाओगे?”
“मुनहसर है।”
“किस बात पर?”
“ये जो बड़े बड़े लफ्ज अभी तुम बोला—गद्दार, दगाबाज, बेगैरत, जमीरफरोश कर के जो बोला—वो सब सच में तुम पर लागू हैं या नहीं, इस बात पर।”
“क्या? क्या मतलब?”
“नौकरीपेशा लोग डिरयामा बहुत करते हैं, कादर खान का माफिक फिल्मी डायलाग बहुत बोलते हैं पण जो बोलते हैं, वो होते नहीं।”
“गलत खयाल है तुम्हारा।”
“पण...”
“तुम मूर्ख हो जो समझते हो कि जोर जबरदस्ती से मेरे से कोई काम करवा सकते हो। तुम होटल की सिक्योरिटी में ढील चाहते हो, ऐसा तुम मुझे यहाँ गिरफ्तार रख के नहीं करवा सकते। इसके लिए तुम्हें मेरे को छोड़ना पड़ेगा। मैं एक बार होटल पहुँच जाऊँगा तो तुम्हारा मेरे पर क्या जोर रह जायेगा?”
“जोर मैं बना सकता है—फैमिली वाला भीड़ू पर जोर बनाना कोई मुश्‍किल काम नहीं होता—पण मैं पियार से, राजी में, अपना काम होना माँगता है।”
“अच्छा! वो कैसे होगा?”
“हमेरा काम करो, बाप, और अपना कीमत बोलो।”
“तुम सच में मूर्ख हो।”
“काहे?”
“तुम समझते हो मेरे करने से तुम्हारा काम हो जायेगा?”
“नहीं होगा?”
“अरे, मैं एडमिनिस्ट्रेटिव सिक्योरिटी चीफ हूँ, असल सिक्योरिटी वाले तो इरफान और शोहाब हैं जो घाघ की तरह हर बात पर निगाह रखते हैं।”
“दोनों हमेशा होटल में नहीं मौजूद हो सकते।”
“एक हमेशा होता है...”
“नहीं। नहीं होता। अभी सोमवार को चैम्बूर में तुका के घर पर दोनों थे।”
“ऐसा बहुत कम बार होता है, और बहुत थोड़ी देर के लिए होता है।”
“लेकिन होता है।”
“अब मैं क्या बोलूँ!”
“हूँ।”
कुछ क्षण खामोशी रही।
“वो फाइव स्टार डीलक्स होटल है।”—फिर दफेदार बोला।
“हाँ।”
“नये निजाम में कैसे मेहमान वहाँ आते हैं?”
“तकरीबन विदेशी बिजनेसमैन। टूरिस्ट, जिन की ग्रुप बुकिंग होती है।”
“और इधर के लोग?”
“फैमिलीमैन या ग्रुप बुकिंग वाले टूरिस्ट।”
“इक्का दुक्का शख्स कोई नहीं ठहरता?”
“ठहरता है लेकिन उस की पूरी पड़ताल की जाती है। पड़ताल तसल्लीबख्श न निकले तो उसको बोला जाता है होटल बुक है, कमरा खाली नहीं है।”
“हूँ। सिकोटरी वालों को क्या मालूम कि किसी मेहमान के सामान में क्या है! क्या सूटकेस खोल के दिखाने को बोला जाता है? जैसे कि बिलाल को बोला?”
“ऐसा नहीं होता। बिलाल को इसलिये बोला क्योंकि वो सूटकेस लॉबी में छोड़कर खिसका जा रहा था। रिसैप्शन पर पहुँच कर किसी रिसैप्शन क्लर्क से रूम बुकिंग की कोई बात तो उसने की ही नहीं थी। उसने तो मनी चेंजर के बारे में दरयाफ्त किया, उससे हजार डालर के रुपये लिये और बार में घुस गया जहाँ से वो अपना आर्डर अनछुआ छोड़ के खिसक रहा था जब कि पवन डांगले ने उसे थामा था।”
“ठीक। मेरे को कबूल कि बिलाल की अकल में लोचा, पण मेरा सवाल मेहमान लोगों के सामान की बाबत था।”
“जेनुइन मेहमान—मौजूदा विजिलेंस के दौर में मेहमान जेनुइन ही होते हैं—अपना सामान खुद हैंडल नहीं करते। उन का सामान बैल ब्वायज उन के रूम में पहुँचाते हैं, और नये इन्तजाम के तहत सामान ढोने वाली लिफ्टें अलग हैं। यूँ जब तक सामान मेहमान के रूम में पहुँचता है, एक्सरे मशीन से उसकी एयरपोर्ट जैसी फुल स्क्रीनिंग हो चुकी होती है।”
“कुछ सामान फिर भी मेहमान के साथ उसके हाथ में हो तो?”
“हैण्ड बैगेज?”
“यही बोलते होंगे!”
“उसकी बाबत भी चैम्बरमेड्स को, रूम सर्विस के वेटरों को, हिदायत है कि वो पहला मौका हाथ आते ही उसे टटोलें।”
“और होटल चलाने के लिए जो माल आता है? जैसे तौलिये, चादरें? उनकी धुलाई? दारू, सब्जियाँ, मटन, चिकन, फिश वगैरह?”
“लांड्री होटल की अपनी है और कोई सप्लायर अपना माल ले कर होटल के भीतर नहीं जाता। सब को हिदायत है कि उन्होंने जो डिलीवर करना है, पिछवाड़े के कम्पाउण्ड में करें।”
“बेसमेंट में पार्किंग है!”
“होटल के अपने वाहनों के लिए है। या उन मेहमानों के लिए है जो होटल के जाने पहचाने होते हैं और जिनके वाहन होटल के जाने पहचाने होते हैं। और उन वाहनों को भी लॉबी से बेसमेंट तक होटल का स्टाफ हैंडल करता है।”
“मतलब?”
“लॉबी में वालेट पार्किंग का इन्तजाम है। मेहमान गाड़ी फ्रंट डोर पर छोड़ देता है, आगे उसे बेसमेंट की पार्किंग में होटल का ड्राइवर पहुँचाता है।”
“किसी को उस डिरेवर को गाड़ी सौंपना मंजूर न हो तो?”
“तो उसको बोला जाता है कि बेसमेंट की पार्किंग फुल है।”
“फिर वो क्या करता है?”
“जो उसके जी में आये। होटल के सामने की पार्किंग में जगह ढूँढ़े या बाहर सड़क पर ले जा कर गाड़ी खड़ी करे।”
“होटल की सिकोटरी का बड़ा दिलतोड़ खाका खींचा, बाप!”
मारवाड़े खामोश रहा।
“ऐसे कैसे बीतेगी?”
“तुम क्या चाहते हो?”—मारवाड़े बोला।
“वो मैं अभी बोला तो! मैं होटल की सिकोटरी में थोड़ा ढील माँगता है।”
“ताकि तुम वहाँ कोई वारदात कर सको?”
“साला किस्सा ही खत्म कर सकूँ।”
“कहना आसान है।”
“बरोबर बोला, बाप। पण मैं करने को भी आसान बनाने का है। कोई तो तरीका होगा!”
“ढूँढ़ो।”
“ढूँढ़ा तो। बरोबर ढूँढ़ा। मेरे सामने बैठेला है।”
“नानसेंस। मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।”
“क्यों नहीं कर सकता?”
“करना तो दूर, मैं करने का खयाल नहीं कर सकता।”
“क्योंकि इस्ट्रेट भीड़ू है? मालिक का वफादार है?”
“सब को ऐसा ही होना चाहिये।”
“पण होता किधर है? ये साला, इण्डिया। इधर साला सब बिकाऊ। खाली कीमत पर बहस। इसी वास्ते बोला, अपना कीमत बोलो।”
“तुम...तुम पागल हो।”
“बाप, खाली माँगता नहीं है, फिरयाद करता है, हमेरा काम करो और अपना कीमत बोलो।”
“मैं बिकाऊ नहीं।”
“फेंको मत, बाप, मगज से काम लो।”
“उसी से काम लिया है।”
“तुम्हेरे को बीवी का खयाल नहीं? चिल्लर का खयाल नहीं?”
“उन के पास भी फटकने की तुम्हारी मजाल नहीं हो सकती।”
“काहे? अभी तुम्हेरे पास फटका कि नहीं?”
मारवाड़े से जवाब देते नहीं बना।
“अभी तुम पवन डांगले करके एक नाम लिया था। क्या बोला था तुम? कौन था वो?”
“मेरा जूनियर है। सैकण्ड इन कमाण्ड है। मैं चीफ सिक्योरिटी आफिसर है, वो डिप्टी चीफ सिक्योरिटी आफिसर है।”
“फिर तो ऐन तुम्हेरा माकिफ जिम्मेदार आदमी हुआ?”
“हाँ। मेरी गैरहाजिरी में सब वो ही सँभालता है।”
“पवन डांगले!”
“हाँ। क्यों पूछ रहे हो?”
“कोई खास वजह नहीं। तो ये तुम्हारा आखिरी फैसला है कि तुम हमारा मदद नहीं करेंगा?”
“भई, करने वाला काम किया जाता है...”
“हाँ या न में जवाब दो।”
“नहीं।”
“ठीक है फिर।”
“तो मैं जाऊँ?”
“नहीं, नहीं। ऐसा कैसे होयेंगा? बाप, अभी तो तुम इधर ही टिकेंगा।”
इरफान विमल के पास पहुँचा।
“आज मारवाड़े साहब नहीं आया।”—वो बोला।
“तो क्या हुआ?”—विमल सहज भाव से बोला—“कोई काम पड़ गया होगा!”
“खबर भी न किया।”
“अरे मियाँ, तो क्या हुआ?”
“घर से हमेशा की तरह हमेशा वाले टेम पर रवाना हुआ, इधर नहीं पहुँचा।”
विमल तत्काल सीधा हो कर बैठा।
“कहाँ गया?”—उसके मुँह से निकला।
“क्या बोलेगा! कार समेत गायब है।”
“कहीं कोई एक्सीडेंट...?”
“अक्खे रूट पर मालूम किया। कोई एक्सीडेंट नहीं।”
“पता कैसे चला?”
“दो बजने को है। पवन डांगले ने फिक्रमन्द होकर उसके घर पर फोन लगाया। मालूम पड़ा सुबू आठ बजे निकला, पण इधर नहीं पहुँचा। उसके मोबाइल पर फोन लगाओ तो बजता है, पण जवाब नहीं मिलता।”
“क्या मतलब हुआ इसका?”
“मेरे भेजे में तो एकीच घण्टी बजती है।”
“क्या?”
“दफेदार।”
“उसने हमारे सिक्योरिटी चीफ पर हाथ डाला?”
“बोले तो, हाँ।”
“किसलिये?”
“क्या पता उसके कूढ़ मगज में अब क्या आया है!”
“पता तो लगेगा। हरकत का कोई नतीजा तो सामने आयेगा।”
“वो तो है।”
“उस के घर आखिरी बार कब फोन किया था?”
“मैंने ग्यारह बजे। डांगले का पता नहीं।”
“अभी फोन कर।”
“किस वास्ते? मारवाड़े की बाबत पूछने के वास्ते?”
“उसके बीवी बच्चों की सलामती की बाबत दरयाफ्त करने के वास्ते।”
“ओह! बाप, तेरा मतलब है दफेदार उन पर भी हाथ डाल सकता है?”
“मैं तेरा ही जवाब तेरे को देता हूँ। क्या पता उस कूढ़ मगज के मन में क्या है!”
“ठीक।”
“वाहे गुरु की मेहर से अगर वो लोग सलामत हों तो उन्हें बोलना कि वो घर को लॉक करें और टैक्सी करके फौरन यहाँ के लिए रवाना हों।”
“मैं खुद जाता हूँ।”
“कोई फायदा नहीं होगा। एक घण्टे में पहुँचेगा, उतने में कुछ का कुछ हो सकता है। अभी वो लोग सलामत हैं तो उनका वहाँ से कूच कर लेना ही मुनासिब कदम है।”
इरफान ने फोन लगाया।
विमल को उसकी सूरत से ही अहसास हो गया कि वो मारवाड़े की बीवी से बात कर रहा था।
इरफान ने विमल की हिदायत फोन पर दोहराई और लाइन काट दी।
“दफेदार की तलाश तेज कर।”—विमल बोला—“उसको काबू करने की कोई जुगत कर वर्ना, मेरा दिल गवाही दे रहा है कि, ये आदमी हमें बहुत नुकसान पहुँचायेगा।”
“उसने मारवाड़े पर ही क्यों हाथ डाला?”
“एक तो इसीलिये कि वो ईजी टार्गेट था—कोई गार्ड, कोई गनमैन तो साथ होता नहीं उसके—दूसरी वजह इस बात में छुपी हो सकती है कि मारवाड़े होटल का सिक्योरिटी चीफ है।”
“मतलब?”
“मारवाड़े को काबू में करके वो यहाँ की सिक्योरिटी को भेदने की कोई जुगत सोच रहा होगा।”
“मुँह की खायेगा। मारवाड़े अखलाक वाला आदमी है, अपने ईमान से नहीं डिग सकता।”
“इरफान, अभी ये महज हमारा अन्दाजा है कि उसके गायब होने के पीछे दफेदार का हाथ है। हो सकता है बात कुछ और ही हो।”
“और क्या?”
“शाम तक इन्तजार कर, शाम तक उसकी कोई खबर न आयी तो पड़ताल करेंगे।”
“शायद बीवी को कुछ मालूम हो?”
“वो तब होटल में ही होगी। उससे भी बात करेंगे।”
“ठीक।”
क्रिसमस ईव के उस दिन सुनामपुर के हडसन रोड के पौश इलाके में, जहाँ कि काफी सारे क्रिश्‍चियन आबाद थे, एक भारी भरकम सांता क्लाज अपनी पीतल की घण्टी बजाता फुटपाथ पर टहल रहा था। वो सफेद फर वाली, सफेद फुँदने वाली लाल टोपी पहने था जिस के नीचे से उस के सफेद बाल बाहर दिखाई दे रहे थे। उसके चेहरे पर वैसी ही सफेद, घनी भवें थीं, मूँछ थी और लम्बी दाढ़ी थी। उसकी बाकी ड्रैस भी सफेद किनारी से मढ़ी लाल थी और उसकी कमर का घेरा इतना विशाल था कि वो उसमें फँसा जान पड़ता था। वो सांता क्लाज का टिपीकल बहुरूप था जो कि भारी भरकम लोगों पर ही फबता था। वहाँ की शिनाख्त क्योंकि नगर के क्रिश्‍चियन इलाके के तौर पर होती थी इसलिये तब से नये साल तक ऐसा सांता क्लाज वहाँ दिखाई देना सहज और स्वाभाविक बात थी।
“सांता! सांता!”—एक बच्चा बोला—“टाफी दो।”
“हेयर, माई सन!”—सांता ने मुस्कराते हुए अपनी पोशाक की झोले जैसी लम्बी जेब में हाथ डाला और टाफी निकाल कर बच्चे को पेश की।
“सांता! सांता! बैलून दो।”—दूसरा बच्चा बोला।
सांता ने पूर्ववत् मुस्कराते हुए दूसरी जेब से गुब्बारा निकाला और उसे फुलाकर डोरी से बाँध कर बच्चे को सौंपा।
“बच्चा लोग!”—बच्चों के माँ बाप बोले—“सांता को थैंक्यू बोलो।”
“थैंक्यू, सांता!”—बच्चे सम्वेत स्वर में बोले।
“गॉड ब्लैस यू, माई चिल्ड्रन!”—सांता बोला।
यूँ ही बच्चों में कैंडी, बैलून और खुशियाँ बाँटता सांता क्लाज गार्जियन बैंक की ओर बढ़ रहा था जिसके मुख्यद्वार पर खड़ा सशस्त्र दरबान बड़े विनोदपूर्ण भाव से उसे देख रहा था।
“वाचमैन!”—दरबान के करीब पहुँचकर सांता मधुर स्वर में बोला—“तुम को भी टॉफी माँगता है?”
दरबान ने मुस्कराते हुए इंकार में सिर हिलाया।
“क्या? क्रिसमस ईव पर तुम को गॉड का गिफ्ट नहीं माँगता?”
दरबान ने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया और खुला हाथ आगे बढ़ाया।
सांता ने उसकी हथेली पर चार टाफियाँ रखीं।
“मैरी क्रिसमस।”—वो बोला।
“मैरी क्रिसमस।”—दरबान बोला।
“ब्लैस यू, माई डियर, गॉड का बेटा तुम्हारी सब ख्वाहिश पूरी करेगा।”
“शुक्रिया।”
अपने आप को मोटा बनाने के लिए जगमोहन ने जिस्म पर ढेर सारा पैकिंग में काम आने वाला फोम बाँधा हुआ था जिस की वजह से उसे बहुत असुविधा हो रही थी। उसकी सफेद दाढ़ी मूँछ—सांता क्लाज के बहुरूप में जिनका नकली लगना जरूरी था—कान के पीछे तार से बन्धी हुई थी और वो बार बार सरकी जाती थी। सिर के सफेद बालों और भवों के साथ अलबत्ता ऐसी प्राब्लम नहीं थी क्यों कि बाल टोपी की पकड़ में थे और भवें असली भवों पर रबड़ सोल्यूशन से चिपकी हुई थीं—ऊपर से बच्चे तमाशाबीनी पर उतर आये थे और टॉफी और गुब्बारों का गिफ्ट ले कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे।
उस काम में उसने दरबान को शरीक करने का फैसला किया।
“बच्चे लालच कर रहे हैं।”—वो दरबान से बोला—“इन्हें भगाओ वर्ना शाम होने से पहले ही सांता की झोली खाली हो जायेगी।”
दरबान ने संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया और बच्चों को भगाया।
दाढ़ी मूँछ उसके चेहरे पर नकाब का काम कर रही थीं जो कि कितनी भी तकलीफ देतीं, सरकनी नहीं चाहिये थीं। उसने ऐसी कई बैंक डकैतियों की बाबत पढ़ा सुना था जिन में डकैत इसीलिये पकड़े गये थे क्यों कि किसी के चेहरे से नकाब सरक गया था और आइन्दा शिनाख्त के लिए उस की सूरत पहचान ली गयी थी।
जिस बैंक को लूटने के इरादे से वो उसके सामने खड़ा था, उस में आटोमैटिक डोर क्लोजर, बर्गलर अलार्म और सर्वेलेंस कैमरों जैसे आधुनिक उपकरण लगे हुए थे। एक भी कदम गलत उठ जाने पर या तो वो पिंजरे में फँसे चूहे की तरह वहाँ कैद होता या सशस्त्र दरबान की रायफल की गोली का शिकार हुआ वहीं मरा पड़ा होता।
लेकिन सिक्योरिटी के मामले में बैंकों का ओवरकंफीडेंस उसके हक में रोल अदा करने वाला था। आधुनिक बैंक चलाने वालों को अपने सिक्योरिटी सिस्टम पर इतना अभिमान होता था कि चमचम वर्दी पहन कर रायफल थाम कर बैंक के गेट पर खड़ा होने वाला दरबान भी अपने आप को बैंक की शोभा बढ़ाने वाला सजावटी सामान समझता था।
फिर भी एहतियात तो बराबर जरूरी थी।
अपने कारनामे के लिए क्रिसमस ईव का वो दिन उसने खास तौर से चुना था। दिन दहाड़े नकाब ओढ़कर बैंक में घुसना या बैंक में घुस कर नकाब ओढ़ना दोनों ही मौत को दावत देने जैसे काम थे इसलिये दाढ़ी मूँछ की सूरत में वो नायाब नकाब उसके चेहरे पर थी, क्रिसमस ईव पर जिस पर कोई शक करने वाला नहीं था। उस नकाब के साथ उस का सर्वेलेंस कैमरों में रिकार्ड हो जाना भी कोई मानी नहीं रखता था क्यों कि एक बार वो बहुरूप त्याग देने के बाद कोई सात जन्म न बूझ पाता कि उस बहुरूप के पीछे किस का चेहरा था।
किसी पुराने खिलाड़ी का—आदी मुजरिम का या नौसिखिये का?
“कहाँ खो गये?”—दरबान बोला।
“कहीं नहीं।”—जगमोहन हड़बड़ा कर बोला—“आसमानी बाप की भेड़ अपने गडरिये की याद के अलावा और कहाँ खो सकती है!”
“भई, बात समझ में तो नहीं आयी लेकिन जब तुम्हारी जुबान से निकली है तो बढ़‍िया ही होगी।”
“मानने वाले पर निर्भर करता है। जो बिलीवर है, उसके लिए बढ़‍िया है, जो नानबिलीवर है, उसके लिए बेकार है।”
“ठीक।”—गार्ड बोला, वस्तुत: उसकी समझ में न पहले कुछ आया था, न तब आया—“बच्चे भाग गये।”
“शुक्रिया। क्या नाम है तुम्हारा?”
“हीरामन।”
“जरा घण्टी पकड़ो।”
दरबान के एक हाथ में टाफियाँ थीं और दूसरे में रायफल थी जिस की नाल पर उसका हाथ था और कुन्दा नीचे गेट की सीढ़ी पर टिका हुआ था। बड़े स्वाभाविक भाव से उसने नाल को दीवार के साथ टिकाया और घण्टी की तरफ हाथ बढ़ाया।
जगमोहन ने घण्टी हाथ से निकल जाने दी।
“जीसस!”—वो वितृष्णापूर्ण भाव से बोला—“मैं इतना मोटा हूँ कि मेरे से तो झुका भी नहीं जायेगा।”
दरबान हँसता हुआ घण्टी उठाने नीचे को झुका। घण्टी के साथ जब वो सीधा हुआ तो उसने सांता को चैनल गेट के भीतर दीवार के साथ लग कर खड़े हाँफते पाया।
उस वक्त चार बजने को थे और, जगमोहन को पहले से मालूम था कि, वहाँ पब्लिक डीलिंग चार बजे तक चलती थी जब कि और बैंकों में ऐसा दो बजे तक होता था। समय की उस विसंगति की वजह से ही भीतर ग्राहकों की कोई खास भीड़ नहीं थी।
दरबान घण्टी के साथ उसके करीब पहुँचा। उसने घण्टी उसकी तरफ बढ़ायी।
जगमोहन ने घण्टी की तरफ हाथ न बढ़ाया, उसके चेहरे पर बड़ी मधुर, ऐन सांता क्लाज जैसी, मुस्कराहट आयी।
“नाम हीरामन बोला न?”—वो बोला।
“हाँ।”
“दिल कैसा है तुम्हारा?”
“क्या मतलब?”
“मजबूत है न! एकाएक कोई बुरी खबर सुनने पर बैठ तो नहीं जायेगा?”
“बुरी खबर?”
“ये बैंक लुटने वाला है।”
“क्या!”
“मैं इसे लूटने वाला हूँ।”
“तुम! हा हा हा। मजाक अच्छा कर लेते हो। क्यों न करो। आखिर कारोबार है तुम्हारा बच्चे बहलाना।”
“इस वक्त यहाँ बच्चे कहाँ हैं! इस वक्त तो यहाँ तुम हो!”
“और तुम मुझे भी बच्चों की जमात में रख रहे हो?”
कोई देखता तो यही समझता कि टाइम पास के लिए सांता बना व्यक्ति दरबान से बतिया रहा था इसलिये जगमोहन ने अपने चेहरे से मुस्कराहट तो न पुँछने दी लेकिन उसका लहजा हिंसक हो उठा।
“मेरी बात गौर से सुन, गावदी।”—वो साँप की तरह फुँफकारा—“मैं सांता क्लाज नहीं हूँ। मैं एक लुटेरा हूँ जो ये बैंक लूटने वाला है। मेरे लबादे के नीचे मेरे सारे जिस्म पर बारूद बँधा हुआ है और ये ही मेरे मोटे दिखने की वजह है। बारूद के डिटोनेटर पर मेरी उँगली है। मैं एक बटन दबाऊँगा और पलक झपकते मैं, तू, बैंक का स्टाफ, बैंक के ग्राहक, ये सारी की सारी इमारत सब कुछ हवा में उड़ जायेगा। आसपास की इमारतें भी नहीं बचेंगी। आयी बात समझ में?”
दरबान के मुँह से बोल न फूटा, उसने व्याकुल भाव से परे दीवार के साथ लगी खड़ी अपनी रायफल की तरफ देखा और अपनी कोताही पर मन ही मन माथा पीटा।
“मैं टर्मिनल इलनेस का शिकार हूँ”—जगमोहन पूर्ववत् मुस्कराता फुँफकारता बोला—“ब्रेन में ये बड़ा ट्यूमर है, चन्द महीनों में वैसे ही मर जाने वाला हूँ इसलिये मुझे अपनी जान की परवाह नहीं लेकिन तुझे तो होगी? अपनी जान की, अपने स्टाफ की जान की, अपने ग्राहकों की जान की और इस इमारत में और आसपास मौजूद और बेशुमार लोगों की जान की? क्या तू इतनी बड़ी तबाही की वजह बनना चाहता है?”
“त-तुम एक बेहूदा म-मजाक कर रहे हो। म-मुझे तुम्हारी ब-बात पर विश्‍वास नहीं।”
“ऐसा है तो हौसले से क्यों नहीं बोलता? हकला क्यों रहा है? रायफल की तरफ हाथ क्यों नहीं बढ़ाता? मैं तो तेरे सामने निहत्था खड़ा हूँ। देख, सिवाय इस रिमोट कण्ट्रोल के मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है।”
दरबान ने एक सशंक निगाह नन्हे से रिमोट पर डाली जिसके एक, लाल रंग के, बटन पर सांता की उँगली थी और अपने एकाएक सूख आये होंठों पर जुबान फेरी।
“दरवाजा बन्द कर।”—जगमोहन ने आदेश दिया—“वैसे जैसे कि चार बजे बन्द करता है।”
“ग्राहक भीतर हैं।”—दरबान फँसे स्वर से बोला—“अभी चार नहीं बजे।”
“परवाह नहीं।”
दरबान अनिश्‍चित-सा अपनी जगह खड़ा रहा।
“मुझे मालूम है दरवाजे की ओट में एक अलार्म बटन है जिसे दबाया जाये तो घण्टी नजदीकी पुलिस स्टेशन पर बजती है। तू चाहे तो उसे बजा सकता है, मेरी तरफ से तुझे खुली छूट है लेकिन अलार्म के जवाब में यहाँ पुलिस पहुँचे या मिलिट्री, मुझे रिमोट का बटन दबाने से कोई नहीं रोक सकेगा। अब बोल, बटन दबायेगा?”
दरबान ने इंकार में सिर हिलाया।
“दरवाजा बन्द करेगा?”
दरबान ने हामी भरी।
“शाबाश!”
दरबान ने हाथ में थमी घण्टी की तरफ देखा—यूँ जैसे कि मरा हुआ साँप थामे हो—और फिर उसे करीब पड़े एक स्टूल पर रख दिया, उस ने वहीं टाफियाँ फेंकीं और शीशे की आब्जरवेशन विंडो वाला दरवाजा बन्द कर के उसमें चाबी फिराई। जगमोहन ने हाथ बढ़ाकर चाबियों का गुच्छा उसकी उँगलियों में से निकाल लिया। उन के साथ जेब में पहुँचा हाथ जब बाहर निकला तो उस में एक गन थी।
तब तक कस्टमर्स काउण्टर्स के सामने खड़े दो तीन जनों की निगाह उधर पड़ चुकी थी।
“खबरदार!”—वो तीखे स्वर में बोला—“कोई अपनी जगह से न हिले।”
सांता क्लाज को ऐसा कहते देख वो लोग मुस्कराये।
अच्छा मजाक हो रहा था क्रिसमस ईव पर।
जगमोहन ने गन का रुख छत की ओर करके घोड़ा खींचा।
बन्द हाल में गोली चलने की आवाज जोर से गूँजी।
छत पर से ढेर सारा पलस्तर उखड़कर नीचे गिरा।
खलबली मच गयी।
“इन्हें बता।”—गन की नाल से दरबान को टहोकता जगमोहन हिंसक भाव से बोला।
“ये आदमी मानव बम है।”—दरबान उच्च स्वर में बोला—“अपनी लाल पोशाक के नीचे ये अपने बदन से बारूद लिपटाये है जिसका रिमोट कंट्रोल इसके पास है। आप इस की मनमानी नहीं होने देंगे तो ये सारी इमारत उड़ा देगा। हम में से कोई जिन्दा नहीं बचेगा।”
सन्नाटा छा गया।
एक वृद्ध व्यक्ति काउण्टर के करीब जहाँ खड़ा था, वहीं बैठ गया और बार बार दोहराने लगा—“हे भगवान! हे भगवान!”
“खामोश!”—जगमोहन दहाड़ा।
वो खामोश हो गया लेकिन उसके होंठ ‘हे भगवान, हे भगवान’ कहते हिलते रहे।
“सारा स्टाफ काउण्टर के पीछे से निकल कर सामने हाल में आये।”
रिवाल्वर थामे खुद वो काउण्टर के पीछे पहुँच गया।
उस के करीब से गुजरता एक चमड़े की जैकेटधारी व्यक्ति तनिक ठिठका और फिर बोला—“तुम बच नहीं सकते। अलार्म खड़काया जा चुका है। अभी यहाँ पुलिस पहुँच जायेगी।”
जगमोहन ने खा जाने वाली निगाहों से उस की तरफ देखा।
वो तत्काल परे देखने लगा।
“कौन हो तुम? क्या करते हो?”
“कैशियर हूँ। कैश हैंडल करता हूँ।”—जवाब मिला।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“मनोहर जैन।”
“इंचार्ज कौन है?”
“के. एन. मेहरा।”
“के. एन. मेहरा कौन है?”
“मैं हूँ।”—सूटबूटधारी एक व्यक्ति बोला।
“अभी इस शख्स ने कहा कि मैं बच नहीं सकता। अलार्म खड़काया जा चुका है। अभी यहाँ पुलिस पहुँच जायेगी।”
“ठीक कहा।”—के. एन. मेहरा, जो कि ब्रांच मैनेजर था, बोला।
“मुझे ऐसा होना कबूल है लेकिन जब तक पुलिस यहाँ नहीं पहुँच जाती, सब को समझाओ ये मेरा कहना मानें वर्ना अंजाम बुरा होगा।”
“तुम्हारा और भी बुरा होगा।”
“मैं अपने अंजाम के लिए तैयार हूँ। लेकिन क्या तुम लोग भी तैयार हो? तैयार हो तो मैं रिमोट का बटन दबाता हूँ।”
“ये ब्लफ है।”
“क्या बोला?”
“हमें यकीन नहीं कि तुम मानव बम हो, अपने जिस्म पर डायनामाइट बाँधे हो।”
“करीब आओ।”
मेहरा झिझकता हुआ करीब आया।
जगमोहन ने अपना रिमोट वाला और गन वाला, दोनों हाथ ऊपर किये।
“यकीन करो।”—वो बोला।
मेहरा ने झिझकते हुए उसकी सांता क्लाज की पोशाक का घेरा उठा कर नीचे झाँका।
नीचे कमर के साथ गोल दायरे में बँधी डायनामाइट की जो छड़ें उसने देखीं, वो और लोगों ने भी देखीं।
सब के प्राण काँप गये।
मेहरा पोशाक का घेरा छोड़ कर यूँ पीछे हटा जैसे चार सौ चालीस वोल्ट का करण्ट लगा हो।
“अब बोलो।”—जगमोहन बोला।
“ये आदमी वाकेई मानव बम है।”—मैनेजर थरथराती आवाज से बोला—“हर कोई इसके हुक्म पर अमल करे।”
सब लोग हाल में इकट्ठे हो गये।
“पीठ दीवार के साथ।”—जगमोहन ने आदेश दिया—“हाथ सिर पर।”
“तुम हम लोगों को मजबूर कर सकते हो”—आगे बढ़ता मैनेजर बोला—“लेकिन हमारी मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठा सकते।”
“अच्छा!”—जगमोहन भवें उठाता बोला।
“अभी तक बाहर पुलिस पहुँच चुकी होगी। यहाँ से बाहर कदम रखना मौत को दावत देना होगा। और हमेशा तुम यहाँ न खुद बैठे रह सकते हो न हमें बिठाये रख सकते हो।”
“देखना।”
“तुम भी देखना।”
“गार्ड कहाँ हैं?”
“गार्ड!”
“दो। जो यहाँ होने चाहियें लेकिन दिखाई नहीं दे रहे!”
“यहाँ एक ही गार्ड है—हीरामन—जो तुम्हें गेट पर मिला था।”
“मैं बैंक के गार्ड की बात नहीं कर रहा, मैं उन दो गार्डों की बात कर रहा हूँ जो बैंक की बख्तरबन्द गाड़ी के साथ होते हैं और जिन्हें इस वक्त भीतर होना चाहिये।”
मैनेजर के चेहरे पर विस्मय के भाव आये।
“जवाब दो।”—जगमोहन दांत पीसता बोला।
“वाल्ट में।”—मैनेजर कठिन स्वर में बोला।
“और कौन?”
“असिस्टेंट मैनेजर त्रिवेदी।”
“और?”
“वाल्ट इंचार्ज राजाराम।”
“और?”
“कोई नहीं।”
“वाल्ट कहाँ है?”
“बेसमेंट में।”
“रास्ता किधर से है?”
उसने हाल के एक बन्द दरवाजे की तरफ इशारा किया।
“जा कर दरवाजा बाहर से बन्द करो।”
सहमति में सिर हिलाता मैनेजर आगे बढ़ गया।
उस के भीतर कदम डाले अभी पाँच मिनट हुए थे कि बैंक का नजारा यूँ था :
बैंक मैनेजर और दरबान समेत दस कर्मचारी काउण्टर की लकड़ी की दीवार के साथ पीठ लगाये, हाथ सिर पर रखे फर्श पर बैठे हुए थे।
लगभग उतने ही ग्राहक काउण्टर से विपरीत दिशा की दीवार के साथ पीठ लगाये वैसे ही बैठे हुए थे।
काउण्टर के पीछे मौजूद जगमोहन एक कैशियर के पिंजरे में पहुँचा, उसने वहाँ से नोटों की कुछ गड्डियाँ उठाईं।
“मेरा पैसा!”—एक ग्राहक कराहता-सा बोला—“मेरा पैसा! साढ़े चार लाख रुपया!”
“बैंक का पैसा इंश्‍योर्ड होता है।”—जगमोहन आश्‍वासनपूर्ण स्वर में बोला।
“अभी बना कहाँ था ये बैंक का पैसा! कैशियर ने ठप्पा लगाकर साइन करके कैश वाउचर का अधपन्ना अभी मुझे कहाँ दिया था!”
“च च च। क्या नाम है तुम्हारा?”
“मोहन लाल।”
“क्या काम करते हो?”
“हार्डवेयर का बिजनेस है।”
“पैसा हाथ का मैल है, मोहन लाल, और आ जायेगा। आ जायेगा न?”
मोहन लाल ने जवाब न दिया।
“जान है तो जहान है, मोहन लाल। है न?”
“है।”
“फिर क्यों कलपता है?”
मोहन लाल फिर न बोला।
किसी को मालूम नहीं था कि दरबान हीरामन जब जगमोहन के कहे मानव बम की घोषणा कर रहा था और यूँ जता रहा था कि बैंक लुटने वाला था तो कैशियर मनोहर जैन ने तभी ग्राहक मोहन लाल का सारा पैसा अपनी जेबों में भर लिया था। लिहाजा जगमोहन के हाथ तो कुछ आते आते आता, उसके हाथ आ भी चुका था।
लुटेरा अपने कुकर्म में कामयाब हो जाता तो उसकी चाँदी थी, कामयाब न होता—गिरफ्तार हो जाता या मारा जाता—तो वो जेबों के हवाले किया सारा पैसा चुपचाप वापिस कैश बाक्स में रख देता और मोहन लाल को पावती की रसीद जारी कर देता।
लुटेरे के कामयाब होने की सूरत में अभी एक अन्देशा उसे था।
लुटेरा वहाँ मौजूद तमाम लोगों को भी लूटने की कोशिश कर सकता था।
ऐसा होता तो उसकी जेबों में भरा रुपया लुटेरे के कब्जे में पहुँच जाता और उस की पोल भी खुलती कि उसने कस्टमर का पैसा हज्म करने की कोशिश की थी।
देखा जायेगा—वो मन ही मन बोला।
जगमोहन ने पोशाक के भीतर से एक झोला बरामद किया और उसमें कैशियरों के पिंजरों में मौजूद सारे बड़े नोट भरने लगा।
“मुझे ठण्ड लग रही है।”—कोई बोला।
“कौन बोला?”—जगमोहन ने सिर उठा कर पूछा।
“मैं।”—ग्राहकों में से एक बोला जो कि उम्र में पचासेक साल का था।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“कपिल सक्सेना।”
“हट्टे कट्टे आदमी हो, ढेर कपड़े पहने हो, क्यों ठण्ड लग रही है?”
“अब क्या बोलूँ? देख तो रहे हो काँप रहा हूँ।”
“खौफ से।”
आगे उसने जो हरकत की, उससे सच में ही साबित हो गया कि वो खौफ से ही काँप रहा था।
“मुझे जाने दो।”—वो बच्चों की तरह बिलखता बोला—“मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”
“मैंने भी तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”—जगमोहन एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“फिलहाल।”
“मुझे जाने दो, प्लीज, मुझे जाने दो।”
“थोबड़ा बन्द। बुलेट गाड़ दूँगा।”
वो सहम कर चुप हो गया।
हाल के सड़क की ओर वाले पहलू में एक विशाल खिड़की थी जिस पर पड़े पर्दों से पार तो नहीं देखा जा सकता था लेकिन उन पर पड़ती रोशनियों से अन्दाजा लगाया जा सकता था कि बाहर पुलिस की लाल फ्लैशर वाली गाड़ियाँ पहुँच चुकी थीं और शोर शराबे की आवाजों से पता चलता था कि बाहर भीड़ जमा होने लगी थी।
“बैंक की इमारत को खाली कर दिया जाये।”—बाहर लाउडस्पीकर पर पुलिस की घोषणा हो रही थी—“इमारत के और दफ्तरों के सब लोग बाहर निकल आयें क्यों कि इमारत को विस्फोट से नुकसान होने का अन्देशा है।”
उस घोषणा का मतलब था कि बैंक से पुलिस को खबरदार करने के लिए अलार्म ही नहीं बजाया गया था, किसी के पास हैंड फ्री मोबाइल था जिस के जरिये वो पुलिस को सूरतअहवाल बताने में कामयाब हो गया था।
उसने बारी बारी स्टाफ के एक एक सदस्य पर निगाह डालनी शुरू की तो केवल ब्रांच मैनेजर ने निगाह चुराई।
“पुलिस को फोन किया?”—जगमोहन अपलक उसे देखता सहज भाव से बोला।
“न-न-नहीं।”—मैनेजर के. एन. मेहरा हकलाया।
“किया। बराबर किया। लेकिन अच्छा किया।”
“क-क्या?”
“मेरा काम किया। मैंने भी तो पुलिस को भीतर के हालात से वाकिफ कराना ही था!”
“क-कमाल है!”
“अब अपने फोन से उन को बोलो कि अगर किसी ने इस इमारत की तरफ कदम बढ़ाया तो मैं डिटोनेटर का बटन दबा दूँगा।”
“लेकिन...”
“ठीक है, फोन मुझे दो, मैं बोलता हूँ और तुम्हें शूट करके खिड़की से बाहर फेंकता हूँ।”
“म-मैं...बोलता हूँ।”
“शाबाश!”
मैनेजर ने मोबाइल के स्पीकर में जगमोहन के निर्देश दोहराये।
“वो लोग तुम से बात करना चाहते हैं।”—फिर वो बोला।
“मैं खुद उन से बात करना चाहता हूँ।”—जगमोहन बोला—“लेकिन अभी नहीं। फोन में बोलो ऐसा।”
उसने बोला।
“कट करो और खिड़की पर पहुँचो। पर्दे के पीछे से झाँक कर देखो बाहर क्या हो रहा है!”
उसने आदेश का पालन किया।
“इमारत को घेरा जा रहा है।”—वो बोला—“लोकल पुलिस के अलावा पूरी तरह से हथियारबन्द सीआरपीएफ के जवान और बम डिस्पोजल स्क्वायड भी पहुँचा हुआ है। दक्ष निशानेबाज सामने की इमारतों की छतों पर पोजीशन ले रहे हैं।”
“बढ़‍िया।”
“हम सब मारे जायेंगे।”—एक युवती सुबकती हुई बोली।
“शट अप!”
“कोई नहीं बचेगा। मैं अपने घर बात करना चाहती हूँ, मरने से पहले मैं ममी से बात करना चाहती हूँ।”
“आई सैड, शट अप!”
“ममी जी, मैं जा रही हूँ, मैं हमेशा के लिए जा रही हूँ। मुझे माफ करना, ममी जी।”
जगमोहन ने हवा में गोली दागी।
फिर सन्नाटा छा गया।
“कोई अपनी जगह से न हिले।”
खामोशी!
“तुम!”—वो मैनेजर से बोला—“वाल्ट के दरवाजे पर चलो।”
मैनेजर ने आदेश का पालन किया।
दोनों बन्द दरवाजे के सामने पहुँचे।
“इस के ऐन पीछे क्या है?”—तसदीक के लिए जगमोहन ने पूछा।
“एक बड़ा कमरा”—जवाब मिला—“जो कि एक तरह से वाल्ट का रिसैप्शन रूम है।”
“फर्नीचर?”
“एक आफिस टेबल, एक एग्जीक्यूटिव चेयर, दो विजिटर्स चेयर।”
“बड़े कमरे से आगे?”
“दरवाजा, और नीचे वाल्ट को जाती सीढ़‍ियाँ।”
“खोलो।”
मैनेजर ने दरवाजा खोलने के लिए हाथ आगे बढ़ाया।
“एक बात ध्यान में रखना।”—जगमोहन चेतावनीभरे स्वर में बोला।
मैनेजर का हाथ रास्ते में ठिठका।
“यहाँ चली गोलियों की आवाज सुनकर वो लोग ऊपर आ गये हो सकते हैं, दरवाजा खुलते ही गार्ड अँधाधुँध गोलियाँ चलाना शुरू कर सकते हैं जिन का निशाना तुम बनोगे।”
“ऊपर की आवाजें वाल्ट में नहीं पहुँचतीं।”
“फिर भी। अगर वो ऊपर हों तो उन्हें हालात समझाने हैं और हथियार डालने को बोलना है, ऊपर न हों तो सब को ऊपर बुलाना है। समझ गये?”
मैनेजर ने सहमति में सिर हिलाया।
“खोलो।”
मैनेजर ने दरवाजे को धक्का दिया।
जगमोहन दरवाजे के पहलू में दीवार से सट कर खड़ा हो गया।
बड़ा कमरा—वाल्ट का कथित रिसैप्शन—खाली था, उससे आगे का दरवाजा बन्द था।
“जाओ”—जगमोहन ने आदेश दिया—“चारों को ऊपर बुला के लाओ। लौटने में दो मिनट से ज्यादा लगे तो...”
“तो क्या?”
जगमोहन ने पोशाक से निकाल कर एक हैण्ड ग्रेनेड उसे दिखाया।
“तो ये हैण्ड ग्रेनेड”—वो बोला—“सीढ़‍ियों से लुढ़कता नीचे बेसमेंट में। नतीजतन तुम्हारे समेत सब की समाधि वहीं।”
“मैं...मैं जाता हूँ।”
दो मिनट से पहले सब जने ऊपर मौजूद थे।
गार्ड निहत्थे थे।
“कोई एक जना”—जगमोहन दीवार के साथ लगे बैठे ग्राहकों से सम्बोधित हुआ—“इधर आओ।”
सब एक दूसरे का मुँह देखने लगे। कोई अपनी जगह से न हिला।
“तुम!”—जगमोहन ने ग्राहक मोहन लाल की तरफ उँगली उठाई—“तुम इधर आओ।”
वो बगलें झाँकने लगा।
“सुना नहीं!”
वो उठा और भारी कदमों से चलता जगमोहन के करीब पहुँचा।
“इन सब की बारी बारी तलाशी तो।”—जगमोहन बोला—“किसी के पास कोई हथियार हो तो निकाल कर फर्श पर डालो।”
मोहन लाल ने उस काम को अंजाम दिया, किसी के पास कोई हथियार न निकला।
अलबत्ता एक गार्ड के पास एक रेडियो टेलीफोन था।
“इससे बख्तरबन्द गाड़ी से सम्पर्क होता है?”—जगमोहन ने पूछा।
उसने सहमति में सिर हिलाया।
“ड्राइवर को भीतर बुलाओ।”
“वो...वो भीतर ही है।”
“भीतर है?”—जगमोहन हैरानी से बोला—“कहाँ?”
“टायलेट में जाने को बोल रहा था, वहीं होगा।”
“अभी तक?”
गार्ड खामोश रहा।
“ड्राइवर हथियारबन्द है?”
“नहीं।”—गार्ड बोला।
“छुप के बैठा होगा।”—वो असिस्टेंट मैनेजर त्रिवेदी की तरफ घूमा—“बुला के आओ।”
“मैं!”—त्रिवेदी हड़बड़ाया।
“हाँ, तुम। उलटे पाँव ड्राइवर के साथ यहाँ लौटना है वर्ना, मैनेजर साहब ने बताया ही होगा कि, क्या होगा!”
वो एक मिनट में ही लौटा।
बद्हवास ड्राइवर के साथ।
फिर जगमोहन ने वाल्ट की सीढ़‍ियों का दरवाजा लॉक कर के चाबी अपने पास रख ली, मेज कुर्सियों को दरवाजे के सामने सरका दिया और बाहर हाल में मौजूद बाकी सब लोगों को भी भीतर बुला लिया। वो खुद बाहर निकला और दरवाजा भिड़काता चेतावनीभरे स्वर में बोला—“सब को ताकीद है, कोई बाहर निकलने या झाँकने की कोशिश न करे।”
“दम घुट जायेगा।”—कोई बोला—“मर जायेंगे।”
उसने दरवाजा चौखट से एक तिहाई परे सरका दिया।
“अब हवा के लिए रास्ता है।”—“वो बोला—“लेकिन दरवाजा इस से ज्यादा खुला, इस में जरा-सी भी हरकत हुई तो मैं हैण्ड ग्रेनेड चालू कर के भीतर डाल दूँगा। मेरा किसी की जान लेने का इरादा नहीं है लेकिन तब कोई भी नहीं बचेगा।”
सन्नाटा छा गया।
तभी हाल के एक फोन की घण्टी बजने लगी।
जगमोहन ने फोन के करीब जा कर उसका रिसीवर उठाया और उसे कान से लगाया।
“कौन?”—वो सतर्क भाव से बोला।
“पुलिस सुपरिंटेंडेंट यदुनाथ सिंह।”—रौबदार आवाज आयी—“तुम कौन?”
“वही।”
“मेरा भी यही खयाल था। क्या नाम है तुम्हारा?”
“सांता क्लाज।”
“असली नाम बोलो।”
“श्रीमती इन्दिरा गाँधी।”
“जो कोई भी तुम हो, अपनी खैरियत चाहते हो तो हाथ सिर से ऊपर उठाये बाहर निकल आओ।”
“मैं अपनी खैरियत नहीं चाहता। अब क्या हुक्म है?”
“देखो, तुम...”
“तुम देखो। और जो मैं कहूँ, उस की तरफ तवज्जो दो।”
“क्या कहना चाहते हो?”
“नीचे सुर में बात करो। अदब से बात करो। मुझे सर कह कर पुकारो वर्ना...”
“वर्ना क्या?”
“मैं बन्धकों में से एक को शूट कर के उसकी लाश बाहर फेंकता हूँ, वर्ना ये।”
लाइन पर खामोशी छा गयी।
“फिर भी बड़े दारोगा साहब के धमकाऊ मिजाज में तबदीली न आयी तो बारी बारी सब को शूट कर दूँगा। बैंक के स्टाफ और ग्राहकों को मिला कर तेइस लोग है यहाँ। सब का खून तुम्हारे सिर होगा। मेरा भी। लेकिन मेरी बारी आखिर में आयेगी।”
“तुम...पागल हो।”
“एकदम ठीक पहचाना। अब सोचो, पागल को समझा सकोगे?”
“तुम क्या चाहते हो?”
“अभी बस चाहता हूँ।”
“बिल्कुल दुरुस्त फैसला किया तुमने। देर सवेर तुम्हें अक्ल आनी ही थी कि बस चाहने में भी तुम्हारी गति थी।”
“अहमक!”
“कौन?”
“तुम, और कौन! अरे, मुझे बस चाहिये। चलने वाली बस। गैट अवे व्हीकल!”
“ओह!”
“मेरे लिये बस का इन्तजाम करो।”
“हो जायेगा। और क्या चाहते हो?”
“दस मिनट बाद फोन करना, बोलूँगा।”
“लेकिन...”
“और तुम लोगों का हुजूम बैंक से परे रहे। कोई बैंक की तरफ बढ़ने की हिम्मत न करे। मैं जब बाहर झाँकूँ, मुझे बैंक के सामने की सड़क खाली दिखाई दे। बैंक के मेन डोर के करीब मुझे किसी की परछाई भी दिखायी दी तो मैं ये इमारत उड़ा दूँगा। नतीजतन जो तबाही मचेगी, जो जान माल का नुकसान होगा, उसके जिम्मेदार तुम होगे। सुपर साहब, मैंने खाली एक बटन दबाना है जो मैं मरता मरता भी दबा जाऊँगा। ताकीद रहे।”
“एक बात बताओ। तुम अकेले हो या तुम्हारे साथ कोई संगी साथी भी हैं?”
“जिसने मोबाइल से काल लगायी, उसने कुछ न बताया?”
“वो तो कहता है कि तुम अकेले हो?”
“उसकी बात पर शक की कोई वजह?”
“कोई वजह नहीं। यानी कि अकेले हो। फिर तो, भई, मैं तुम्हारी दिलेरी की दाद देता हूँ।”
“सुपर साहब, मुझे बातों में लगा कर मेरी तवज्जो को भटकाने की कोशिश कर रहे हो तो कोशिश बेकार गयी समझो।”
उसने रिसीवर वापस क्रेडल पर रख दिया।
पुलिस को ऐसा लगता था, बन्धकों को ऐसा लगता था कि एक अकेला आदमी उस लूट को अंजाम देने में लगा था लेकिन हकीकतन वो अकेला नहीं था—अकेले आदमी के बस का वो काम था ही नहीं—बहरहाल हर किसी का ये भरम बना रहना निहायत जरूरी था कि वो अकेला था।
और पता नहीं अभी तक किसी को अहसास हुआ था या नहीं हुआ था कि उसका निशाना बैंक का कैश नहीं, वो सोना था जो कि उस रोज बैंक की बख्तरबन्द गाड़ी ने राजधानी तक ढोना था।
पचास करोड़ रुपये मूल्य का आठ सौ किलो सोना।
बैंक के हाल की छत अट्ठारह फुट ऊँची थी और उसके चारों कोनों में छत के करीब चार कैमरे फिट थे जिन का कंट्रोल बाहर कहीं था और जहाँ से वहाँ के हर कोने खुदरे की निगरानी मुमकिन थी। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वो कण्ट्रोल इमारत से बाहर कहाँ था क्यों कि जब कैमरे काम करने लायक न रहते तो कण्ट्रोल का होना न होना एक बराबर था।
कैमरों के अलावा वहाँ पन्द्रह जगह अलार्म बटन फिट थे जिन में से एक तो एक कलमदान में फिट था और जो कलम को कलमदान से बाहर खींचते ही बोल पड़ता था। जगमोहन की स्कीम के तहत अलार्म सिस्टम से उसे कोई खतरा नहीं था क्योंकि अलार्म सिस्टम से खबरदार होने वाले हाकिमों से उसे कोई खतरा नहीं था। बाहर उन का कितना भी बड़ा समूह क्यों न जमा हो जाता, जगमोहन को उस से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। लेकिन कैमरों से उसको खतरा था जो कि स्कीम के आइन्दा चरणों की पोल खोल सकते थे।
आटोमैटिक डोर क्लोजर भी उसके लिए कोई समस्या नहीं बनने वाले थे क्योंकि ऐसे बन्द हुए किसी दरवाजे को उसके लिए खोल कर देना खुद बन्द करने वालों के हित में होता।
उसने गन से चारों कैमरे फोड़ दिये।
ऐसा करने के लिए उसे गन में दो बार गोलियाँ भरनी पड़ी। कैमरे बहुत ऊँचे लगे होने की वजह से उसका कई बार निशाना चूका।
कैमरे ऊँचे लगाये जाने के पीछे सिक्योरिटी वालों की मुराद ये थी कि उनके लैंसों को ढंक देने की नीयत से कोई उन तक पहुँच न पाता। मसलन लैंसों पर कोई पेंट स्प्रे करके कैमरों को निष्क्रिय किया जा सकता था लेकिन स्प्रे अट्ठारह फुट ऊँची छत तक नहीं पहुँच सकता था।
कई राउन्ड गोलियाँ चलने की आवाज ने वाल्ट में तो खलबली मचाई ही, वो बाहर भी सुनी गयी।
पहले वाला फोन फिर बजा।
उसने फोन रिसीव किया।
“सुपरिंटेन्डेंट यदुनाथ सिंह बोलता हूँ।”—आवाज आयी।
“मैंने दस मिनट बाद फोन करने को बोला था।”—जगमोहन सख्ती से माउथपीस में बोला।
“एकाध मिनट ही बाकी है। गोलियाँ क्यों चल रही हैं? कौन चला रहा है?”
“मैं चला रहा हूँ और कौन चला रहा है!”
“क्यों?”
“सर्वेलेंस कैमरे तोड़ रहा हूँ। जो कि तुम्हारे लिये गुड न्यूज है।”
“क्यों?”
“इतनी गोलियों से मैं यहाँ सब को शूट कर सकता था। बोलो तो करूँ?”
“नहीं! खबरदार!”
“मेरा ऐसा कोई इरादा भी नहीं है। होता तो...”
“ठीक। ठीक। देखो, बेटा... क्या नाम है तुम्हारा?”
“बेटा!”
“तुम्हें मेरे बेटा कहने से एतराज है तो नहीं कहता।”
“दिखाई दे गया बेटा?”
“नहीं। कैसे दिखाई देगा? मैंने तो तुम्हारी उम्र का सिर्फ अन्दाजा लगाया... ये सोच कर कि ऐसा डेयरडैविल काम कोई नौजवान ही कर सकता था। बोलो तो मैं भैय्या बोलता हूँ। अंकल बोलता हूँ।”
“आगे बढ़ो।”
“मैं तुम्हें ये बताना चाहता हूँ कि तुम चारों तरफ से ब्लैक कैट कमाण्डोज से घिरे हुए हो और वो कैसे शार्प शूटर्स होते हैं, ये तुम्हें मालूम ही होगा!”
“मुझे ऐसी बातों से कोई लेना देना नहीं क्यों कि तुम्हारे ऐसे किसी भी इन्तजाम से मुझे कोई खतरा नहीं। चाहो तो तोपखाना भी मँगवा लो।”
“इस बड़े बोल की वजह?”
“मैंने तमाम खिड़कियों, दरवाजों के आगे बारूद बिछाया हुआ है। बाहर से जो भी गोली चलेगी वो उस बारूद को एक्टीवेट करने के ही काम आयेगी।”
लाइन पर खामोशी छा गयी।
“तुम एयरकंडीशनिंग के डक्ट के रास्ते बेहोशी की गैस भीतर छोड़ने की कोशिश कर सकते हो लेकिन ऐसा करना भारी नादानी होगा क्यों कि मेरे पास गैस मास्क है। मेरे गैस मास्क इस्तेमाल करने की नौबत आयी तो यहाँ मौजूद तेइस जने बेहोश नहीं होंगे, जान से जायेंगे।”
“सब सोचे बैठे हो।”
“सब से ज्यादा।”
“जरूर ये सब पहले भी कर चुके हो।”
“अभी आगे भी करूँगा। बहरहाल ताकीद रहे।”
“ऐसा कुछ नहीं होगा।”
“अब बोलो, बाहर सब से जिम्मेदार आदमी तुम्हीं हो?”
“हाँ।”
“मोबाइल रखते हो?”
“हाँ।”
“नम्बर बोलो।”
“क्या करोगे नम्बर का?”
“आइन्दा काल मैं करूँगा।”
“ओह!”
उसने जगमोहन को एक नम्बर बताया।
“अब एक हैलीकॉप्टर का इन्तजाम करो।”
“क्या! बस नहीं चाहिये?”
“बस भी चाहिये। हैलीकॉप्टर भी चाहिये। दोनों का इन्तजाम करो। अपने मूड के मुताबिक मैं अपना गैट अवे व्हीकल चुनूँगा। कोई एतराज?”
“नहीं।”
“दो ब्लॉक आगे एक स्कूल है जिसके खेल के मैदान में हैलीकॉप्टर उतर सकता है। एक घण्टे के अन्दर अन्दर वहाँ मेरे लिये एक हैलीकॉप्टर उपलब्ध होना चाहिये।”
“पायलट तुम्हें जहाँ छोड़कर आयेगा, क्या वो उस जगह को भूल जायेगा?”
“मुझे पायलट की जरूरत नहीं।”
“क्या बोला?”
“मुझे हैलीकॉप्टर उड़ाना आता है। इसलिये हैलीकॉप्टर या उसके इर्द गिर्द कोई दिखाई न दे। समझ गये?”
“हाँ।”
“मेरी यही हिदायत बस पर भी लागू होती है।”
जगमोहन ने सम्बन्धविच्छेद कर दिया और फिर नोट इकट्ठे करने में जुट गया।
बाहर अफरातफरी का माहौल था।
कोई कुछ नहीं जानता था कि क्या किया जाना था और क्या होने वाला था।
तभी एक सफेद इन्डिका कार वहाँ पहुँची जिसे सड़क पर आननफानन बनाये गये बैरियर पर रोक दिया गया।
“मैं बैंक का डिप्टी जनरल मैनेजर सलिल घोष हूँ।”—कार में पीछे बैठा एक सूटबूटधारी व्यक्ति बोला—“मेरे को आगे जाने दो।”
“उतर कर जाइये।”—एक हवलदार बोला—“कार आगे नहीं जा सकती।”
“पुलिस का कोई बड़ा अफसर यहाँ है?”—कार से उतरता डीजीएम घोष बोला।
“एसपी साहब हैं।”
“यदुनाथ सिंह?”
“जी हाँ।”
“मुझे उन के पास ले के चलो।”
हवलदार ने उसे एसपी तक पहुँचाया।
घोष को एसपी को अपना परिचय न देना पड़ा, वो दोनों एक दूसरे से पूर्वपरिचित थे।
“क्या पोजीशन है?”—घोष बोला।
“हमारे काबू में नहीं है।”—एसपी चिन्तित भाव से बोला—“अभी तो उस दीवाने की ही चल रही है जो मानव बम बना भीतर घुसा बैठा है।”
“ये छोटी ब्रांच है, यहाँ बहुत ज्यादा कैश नहीं होता, वो कैश लूटना चाहता है तो उसे लूट लेने दो।”
एसपी ने हैरानी से घोष की तरफ देखा।
“मैं हालात से बेखबर नहीं हूँ। इसलिये मेरा खयाल है कि बन्धकों की जान को खतरे में डालने के हक में तुम लोग भी नहीं होगे।”
“ये भी कोई कहने की बात है! जैसे आप को बन्धकों की फिक्र है वैसे क्या हमें...”
“मेरी फिक्र का फोकस, एसपी साहब, कहीं और है।”
“कहीं और है? कहाँ?”
“जरा इधर आ के सुनिये।”
दोनों पुलिस के अमले से और तमाशबीनों की भीड़ से तनिक परे सरक गये।
“एसपी साहब”—घोष संजीदगी से बोला—“इस वक्त यहाँ हमारे एक कस्टमर का आठ सौ किलो सोना मौजूद है जिसकी कीमत पचास करोड़ रुपये होती है।”
“क्या!”
“कस्टमर एनआरआई है जो कि स्थायी रूप से इन्डिया शिफ्ट कर रहा है। इंगलैड में बड़ा ज्वेलरी का धँधा था। वो सोना वो डिक्लेयर कर के शिप से यहाँ लाया था।”
“यहाँ क्यों?”
“इधर जमीन सस्ती है, लेबर सस्ती है, ज्वेलरी मैनूफैक्चरिंग का कारखाना खड़ा करना चाहता था लेकिन फिर खयाल बदल गया। अब उसका सोना ढो कर राजधानी पहुँचाने की जिम्मेदारी हमारे पर है।”
“आप ने ये जिम्मेदारी क्यों ली?”
“भारी कमीशन की एवज में ली। प्राइवेट बैंकिंग में ऐसे काम होते हैं। दूसरे, हमारे पास एक इलैक्ट्राॅनिक कण्ट्रोल वाली बख्तरबन्द गाड़ी है जिसे कोई नहीं खोल सकता। उस गाड़ी की वजह से ये ट्रांसपोर्टेशन हमारे लिये कोई मुश्‍किल नहीं।”
“अरे, घोष साहब, आप कहीं ये तो नहीं कहना चाहते कि सोना बैंक में है?”
“सोना बख्तरबन्द गाड़ी में है। वो गाड़ी में लादा जा चुका था जब कि ये वाकया हुआ था, जब कि उस शख्स ने बैंक पर कब्जा कर लिया था।”
“शुक्र है। गाड़ी कहाँ है?”
“बैंक की इमारत के पिछवाड़े में। उधर बैंक का एक दरवाजा खुलता है और बैंक की लोडिंग अनलोडिंग के लिए हमेशा उसे ही इस्तेमाल किया जाता है।”
“फिर क्या प्राब्लम है?”
“प्राब्लम ये है कि बख्तरबन्द गाड़ी का क्रियु—एक ड्राइवर, दो सशस्त्र गार्ड और एक असिस्टेंट मैनेजर—बैंक के अन्दर हैं। सोना लोड हो चुकने के बाद वो लोग कागजी कार्यवाही के लिए भीतर थे जब कि बैंक मानव बम बने लुटेरे के कब्जे में पहुँच गया था।”
“आप को कैसे मालूम?”
“असिस्टेंट मैनेजर त्रिवेदी के पास मोबाइल है, उसने चुपचाप मुझे फोन लगाया और हालात की खबर दी। आप की जानकारी के लिए भीतर मौजूद तमाम के तमाम लोग इस वक्त बैंक के वाल्ट में हैं और उन्हें वहाँ से बाहर झाँकने तक की मनाही है।”
“अब आप की प्राब्लम क्या है?”
“प्राब्लम सोने से लदी बख्तरबन्द गाड़ी है जो पिछवाड़े में खड़ी है।”
“जब उसे कोई खोल नहीं सकता तो...”
“कोई नहीं खोल सकता, क्रियु खोल सकता है। और क्रियु भीतर लुटेरे के कब्जे में है।”
“तो क्या हुआ? उसे क्या बख्तरबन्द गाड़ी की या उसमें मौजूद सोने की खबर होगी? घोष साहब, अगर उसका निशाना सोना होता तो जो हरकत उसने चार बजे के करीब की, वो थोड़ा पहले की होती। जहाँ तक हालात को मैं समझता हूँ उससे मुझे नहीं लगता कि लुटेरे को सोने की या बख्तरबन्द गाड़ी की या उसके इस घड़ी बैंक में भीतर फँसे क्रियु की कोई खबर है।”
“फिर भी गाड़ी को पिछवाड़े से हटाया जाना जरूरी है।”
“जब उसका ड्राइवर भीतर बन्द है और दूसरा कोई उसे खोल नहीं सकता तो ऐसा क्योंकर मुमकिन होगा?”
“उसे धकेल कर बैंक से परे कहीं पहुँचाना होगा।”
“धकेल कर?”
“इस काम का खामोशी से होना जरूरी है। लुटेरे को उस की भनक लग गयी तो वो चुटकियों में समझ जायेगा कि भीतर बेशकीमती माल बन्द था, वो भले ही ये न जान पाये कि माल क्या था, किस किस्म का था। फिर उसकी कोशिश क्रियु को कब्जे में कर के गाड़ी खुलवाने और माल पर काबिज होने की होगी।”
“बख्तरबन्द गाड़ी धकेलना कोई हँसी खेल है!”
“बतौर तमाशबीन यहाँ बहुत खलकत जमा है और और जमा होती जा रही है। लोगों को खामोशी से समझाया जायेगा तो धक्का देने के लिए तैयार वालण्टियरों का तोड़ा नहीं होगा।”
“गाड़ी हैण्ड ब्रेक पर होगी। फौलादी गाड़ी की हैण्ड ब्रेक भी तो फौलादी होगी!”
“हो सकता है हैण्ड ब्रेक न लगी हो, लगी हो तो पूरी मजबूती से न लगी हो। फिर धक्का देने वाले लोग ढेर हों तो गाड़ी हैण्ड ब्रेक लगे लगे भी सरक सकती है।”
“न सरकी तो?”
“तो टो-ट्रक का इन्तजाम करना पड़ेगा।”
“हूँ।”
“एसपी साहब, मौजूदा विस्फोटक हालात में पचास करोड़ का सोना उस लुटेरे की पहुँच के करीब मौजूद होना गलत है, भले ही वो बख्तरबन्द गाड़ी में बन्द है।”
“हूँ। टो से या धक्के से आप की वो बख्तरबन्द गाड़ी सरकाना मुमकिन हुआ तो उसे कहाँ पहुँचाना होगा?”
“बैंक की इमारत से परे कहीं भी चलेगा। वक्त की फौरी जरूरत ये है कि उस गाड़ी की तरफ लुटेरे की तवज्जो न जाये, उसका रिश्‍ता बैंक से न जुड़े।”
“गाड़ी जहाँ चुपचाप पहुँचाई जायेगी, वहाँ उसको गार्ड करने के लिए अमला लगाना पड़ेगा।”
“एक आदमी, सिर्फ एक आदमी काफी होगा रूटीन वाच के लिए। वो भी नहीं होगा तो चलेगा, क्यों कि, मैं ने बोला न, कि वो गाड़ी नहीं खुल सकती, किसी सूरत में नहीं खुल सकती।”
“हूँ। ठीक है, मैं करता हूँ कुछ।”
“शुक्रिया।”
“प्लीज, सुनिये। सुन लीजिये जरा, प्लीज।”
जगमोहन ने सिर उठाकर उस जनाना आवाज की दिशा में देखा तो पाया कि वाल्ट के अधखुले दरवाजे की चौखट पर वो युवती खड़ी थी जो बैगी जीन्स के साथ ढीला ढाला कुर्ता और कार्डीगन पहने थी। वो खुद चौखट से भीतर थी लेकिन ध्यानाकर्षण के लिए उसने अपना हाथ दरवाजे से बाहर निकाला हुआ था।
“हट पीछे।”—जगमोहन हिंसक भाव से बोला।
उसने तत्काल हाथ पीछे खींच लिया और चौखट पर से गायब हो गयी।
वो दरवाजे पर पहुँचा, उसने भीतर झाँका तो पाया कि सब दरवाजे से परे वाल्ट के फर्श पर यूँ एक दूसरे में गड्ड मड्ड बैठे हुए थे जैसे एक दूसरे में पनाह तलाश कर रहे हों।
“क्या है?”—वो कुर्ते-कार्डीगन-जीन्स वाली युवती से बोला।
“मेरे को कुछ नहीं है।”—वो दबे स्वर में बोली, उसने ठण्ड की शिकायत करने वाले उस ग्राहक की तरफ इशारा किया जिस ने अपना नाम कपिल सक्सेना बताया था—“इसे है।”
“इसको क्या है?”
“इसको टायलेट जाने का है।”
“तू इसकी वकील है? और इसके मुँह से जुबान कहाँ गयी?”
“मेरे को टायलेट जाने का है।”—कपिल सक्सेना कराहता-सा बोला।
“टायलेट जाने का है? ये प्रायमरी स्कूल है?”
“मेरे को डायबटीज है। इसलिये...”
“टायलेट...”
“हाल के परले सिरे पर है।”—मैनेजर मेहरा बोला।
“शट अप!”
“खाली बताया।”
“मालूम है मेरे को।”
मेहरा खामोश हो गया।
“इधर आ।”—जगमोहन कपिल सक्सेना से बोला।
डरता झिझकता सक्सेना उठ कर उसके करीब आया। उसने हाथ में थमी गन की नाल सक्सेना के गाल में खुबोई। सक्सेना के चेहरे पर वेदना के भाव आये।
“क्यों पंगा करता है?”—जगमोहन डपटता-सा बोला।
“क्या करूँ?”—उसने फरियाद की—“मजबूरी है। मैं डायबटिक...”
“कण्ट्रोल कर। वर्ना शूट कर दूँगा।”
“मैं झूठ नहीं बोलता, मैं...”
जगमोहन ने उसके चेहरे पर झांपड़ रसीद किया।
“ये जुल्म है।”—मेहरा बोला।
जगमोहन उस के करीब पहुँचा, उसने उसकी पसलियों में ऐसी जोर की ठोकर जमाई कि मेहरा के आँसू छलक आये।
“दाता! दाता!”—एक क्लर्क कुनमुनाया—“ये हम सब को मार डालेगा।”
“मैं और सस्पेंस नहीं झेल सकता।”—कैशियर मनोहर जैन बोला—“मुझे तो मार ही डाले...”
जगमोहन ने नाल का रुख छत की तरफ करके गोली चलाई। बन्द माहौल में गोली की आवाज असाधारण रूप से जोर से गूँजी।
“मार!”—एक दूसरा क्लर्क बोला—“मेरे को मार! अभी! अभी! भेजा उड़ा दे। प्लीज।”
“मिश्रा!”—मेहरा ने उसे डपट—“चुप कर।”
“मेरा मकसद लूटना है, कत्ल करना नहीं है।”—जगमोहन भड़के स्वर में बोला—“मुझे मजबूर नहीं करोगे तो किसी की जान को कोई खतरा नहीं है।”
“कहने की बात है।”—मिश्रा बोला—“खून खराबा किये बिना तुम यहाँ से नहीं निकल पाओगे।”
“खून खराबा करके भी कैसे निकल पाऊँगा?”
मिश्रा को जवाब न सूझा।
“कैसे निकलोगे?”—मेहरा ने तनिक उत्सुक भाव से पूछा।
“तुम में से किसी को ढाल बना कर निकलूँगा।”
“ओह!”
“यूँ पुलिस मेरे को नहीं रोकेगी। रोकेगी तो पहले ढाल की जान जायेगी जो कि पुलिस नहीं चाहेगी।”—जगमोहन एक क्षण ठिठका और फिर बोला—“पुलिस से मेरा भाव ताव, सौदेबाजी हो के रहेगी। तब उन्होंने कोई बेजा मिजाज दिखाया तो अपने मंसूबे की मजबूती का अहसास दिलाने के लिए हो सकता है मुझे किसी को शूट करना पड़े। वो नौबत आने पर मेरा पहला शिकार ये ही बड़बोला होगा जो ‘मेरे को मार, मेरे को मार’ भज रहा है।”
मिश्रा अपने आप में सिकुड़ कर रह गया।
“अभी मैं तुम लोगों में से किसी एक जने को रिलीज करूँगा ताकि वो बाहर जा कर यहाँ के हालात की गम्भीरता पुलिस को समझा सके, उन्हें यकीन दिला सके कि उन का एक गलत कदम कई लोगों की जान जाने की वजह बनेगा।”
“मुझे जाने दो।”—तत्काल दरबान हीरामन गिड़गिड़ाता-सा बोला—“मेरे पाँच बच्चे हैं।”
“मैं प्रेग्नेंट हूँ।”—एक क्लर्क युवती बोली।
“चेतना जी, क्यों झूठ बोलती हो?”
“मैं सच कह रही हूँ।”—क्लर्क चेतना ने अपने पेट पर हाथ रखा—“और ये मेरा पहला बच्चा है।”
“मैं तुम से ढाई गुना बड़ी उम्र का हूँ। ऐसे हालात में हमेशा बूढ़ों और बच्चों का लिहाज किया जाता है, नौजवानों का नहीं।”
“हीरामन!”—मैनेजर मेहरा तिरस्कारभरे स्वर में बोला—“डूब मर चुल्लू भर पानी में! कमीने, पहले तो ड्यूटी न की गयी और अब दुम दबा कर भागने का जरिया तलाश रहा है!”
“मैं क्या करता, साहब जी...”
“अपनी ड्यूटी करता और क्या करता! मारता या मरता।”
“मौका ही न लगा। ये तो...”
“घण्टी बज रही है।”—कैशियर मनोहर जैन बोला।
जगमोहन की हाल में बजते फोन की तरफ तवज्जो गयी।
“मैं यहाँ इन सब को खामोश रखने की जिम्मेदारी लेता हूँ।”—ग्राहक मोहन लाल व्यग्र भाव से बोला।
जगमोहन ने सन्दिग्ध भाव से उसकी तरफ देखा।
“हम आपस में ये भी फैसला कर लेंगे कि छोड़े जाने के लिए कौन मुनासिब कैण्डीडेट होगा।”
“हाँ।”—मैनेजर मेहरा व्यग्र भाव से बोला।
“डायबटीज भजते इसको”—जगमोहन ने कपिल सक्सेना की ओर संकेत किया—“सँभाल लोगे?”
“ये अब जुबान नहीं खोलेगा।”—मोहनलाल बोला—“बहुत जरूरी समझेगा तो जो करना है, यहीं करेगा।”
सहमति में सिर हिलाता जगमोहन वाल्ट से निकला और हाल में बजते फोन की ओर बढ़ चला।
उसने काल रिसीव की तो उसे एसपी यदुनाथ सिंह की आवाज सुनायी दी—“तुम्हीं बोल रहे हो न?”
“हाँ।”—जगमोहन सहज भाव से बोला।
“उम्मीद है कि अब तक तुम्हें अहसास हो चुका होगा कि तुम अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सकते इसलिये अब ये ड्रामा खत्म करो।”
“ड्रामा!”
“हाँ, ड्रामा।”
“मैं ड्रामा शुरू करता हूँ।”
“क्या!”
“असल ड्रामा तो अब शुरू होगा। जब कि मैं एक बन्धक को शूट करूँगा।”
“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”
“मैंने एक बलि का बकरा छाँट भी लिया है। बल्कि बकरी।”
“बकरी?”
“नौजवान लड़की।”
“खबरदार! अब अगर एक भी गोली चलने की आवाज आयी तो हमारा वज्र ट्रक सामने की दीवार तोड़ता बैंक में घुस आयेगा।”
“उससे बहुत पहले ये इमारत आसमान में उड़ जायेगी। सुपर साहब, जिस नौजवान लड़की को मैंने शूट करने के लिए चुना है, वो प्रेग्नेंट है, लिहाजा एक साथ दो जानें जायेंगी। और मैं वाल्ट में गोली चलाऊँगा तो आवाज बाहर नहीं सुनायी देगी।”
“तुम... तुम पागल हो।”
“वो तो मैं हूँ। इस में क्या शक है?”
“देखो, तुम...”
“बाहर मीडिया वाले पहुँचे हैं?”
“क्यों पूछते हो?”
“मैं मीडिया से बात करना चाहता हूँ।”
“ये नहीं हो सकता।”
“ठीक है। नहीं हो सकता तो नहीं हो सकता। शूट करता हूँ।”
“सुनो, सुनो।”
“क्या सुनूँ?”
“मैं ये कहना चाहता था कि तुम्हारी मीडिया से बात इस लिये नहीं हो सकती क्यों कि यहाँ मीडिया है ही नहीं। ये छोटी जगह है। मीडिया वाले यहाँ पहुँचते पहुँचते पहुँचेंगे।”
“यानी कि अभी कोई नहीं पहुँचा?”
“एक लोकल अखबार का—जो कि इस इलाके में ही बँटता है—एक आदमी यहाँ मौजूद है। तुम चाहो तो मैं उस से तुम्हारी बात करा सकता हूँ।”
“नहीं, उससे नहीं। मैं उस मीडिया की बात कर रहा था जो कि आजकल लाइव टैलीकास्ट के लिए मौकायवारदात पर पहुँचता है।”
“क्या कहने! तुम क्या अपने आप को चार्ल्स शोभराज समझते हो?”
“ओहो। आपने तो मुझे पहचान लिया! ये तो बहुत बुरा हुआ! अब तो मैं पकड़ा जाऊँगा!”
“तुम मजाक छोड़ो और संजीदगी से मेरी बात सुनो।”
“सुनता हूँ। सुनाइये।”
“वो प्रेग्नेंट लड़की...क्या नाम है उसका?”
“चेतना।”
“उसको आजाद करो।”
“क्या?”
“ताकि मुझे यकीन आये कि तुम खूनी दरिन्दे नहीं हो, तुम मोल तोल करना चाहते हो।”
“मेरी बस आ गयी? हैलीकॉप्टर आ गया?”
“बस आने ही वाली है, हैलीकॉप्टर में अभी थोड़ा टाइम लगेगा।”
“उनके साथ मुझे एक बुलेट प्रूफ एम्बैसेडर भी चाहिये। मैं बाहर निकलूँ तो मुझे बस एक बाजू खड़ी मिले और बुलेट प्रूफ एम्बैसेडर दूसरे बाजू खड़ी मिले।”
“तुम्हारी माँग बढ़ती जा रही हैं।”
“और एक दमदार मोटरसाइकल भी।”
“इतने वाहन माँगने का मतलब है कि तुम भीतर अकेले नहीं हो, तुम्हारे साथ तुम्हारे कोई जोड़ीदार भी हैं।”
“मतलब कुछ भी निकालिये। जो कहा है, कीजिये, प्रेग्नेंट लड़की सही सलामत आप के पास पहुँच जायेगी।”
“ठीक है, हो जायेगा, लेकिन कबूल करो कि भीतर तुम कम से कम चार आदमी हो।”
“कमाल! कैसे जाना?”
“तुम्हारी चार वाहनों की माँग से जाना। तुम चार जने चार दिशाओं में भागना चाहते हो।”
“सुपर साहब!”
“बोलो।”
“आप मूर्ख हैं।”
“क्या!”
“बल्कि महामूर्ख हैं।”
“क्या बकते हो?”
“और उस ओहदे के काबिल बिल्कुल नहीं हैं जिस पर काबिज हैं। एक तो आप अहमकाना सवाल करते हैं, फिर उम्मीद करते हैं कि मैं उसका दुरुस्त जवाब दूँगा।”
“तुम ये कहना चाहते हो कि तुम जो कर रहे हो, अकेले कर रहे हो?”
“पहले कह नहीं चुका? मैं भी और आप को फोन करने वाला भी?”
“फिर तुम्हें इतने वाहन क्यों चाहियें?”
“क्यों कि मैं ये फैसला ऐन वक्त आने पर करूँगा कि गैट अवे व्हीकल के तौर पर मेरी पहली पसन्द हैलीकॉप्टर होगा, बस होगी, कार होगी या मोटरसाइकल होगी।”
“मैं समझ गया।”
“बधाई।”
“तुम बन्धकों को अपने जैसा सांता क्लाज बना कर बाहर निकालोगे। एक एक कर के सांता क्लाज बाहर निकलेंगे और उसी कनफ्यूजन में तुम भी खिसक जाओगे।”
“मैं आपकी दूरन्देशी की दाद देता हूँ और आपके मूर्ख होने की बाबत अपने पहले अल्फाज वापिस लेता हूँ। अब बोलिये, वाहनों का इन्तजाम होने में कितना टाइम लगेगा?”
“हैलीकॉप्टर में अभी आधा घण्टा लगेगा। बस अभी किसी भी वक्त पहुँचने वाली होगी, कार और मोटरसाइकल के लिए बोलना पड़ेगा।”
“बोलिये। साथ में ये ताकीद भी जारी कीजिये कि सारे वाहन ऐन फिट कंडीशन में होने चाहियें और पैट्रोल से पूरे, लबालब भरे होने चाहियें। इस सिलसिले में कोई चालाकी न हो, कोई चालबाजी न हो।”
“नहीं होगी।”
“मेरे पास खुद किसी वाहन तक पहुँचने से पहले इन बातों को चैक करने का जरिया है इसलिये आप लोगों की कोई भी बेजा हरकत खेल बिगाड़ने का काम करेगी।”
“कोई बेजा हरकत नहीं होगी।”
“शुक्रिया।”
“लेकिन तुम्हें उस प्रेग्नेंट लड़की को छोड़ना होगा।”
“मंजूर। बाहर बस की आमद पर मैं उसे छोड़ दूँगा। हैलीकॉप्टर की आमद पर एक और बन्धक को रिहा कर दूँगा। एम्बैसेडर कार और मोटरसाइकल पहुँचने पर दो और को।”
“सब को रिहा करो।”
“ये नहीं हो सकता। आप जानते हैं ये नहीं हो सकता। मैं अपनी हर माँग पूरी होने पर अभी कहे मुताबिक बन्धकों को रिहा करूँगा, इससे बेहतर मैं कुछ नहीं कर सकता।”
“तुम्हारी बातों से लगता है कि तुम्हारी अभी और भी माँगें हैं!”
“हो सकती हैं।”
“तुम बच नहीं सकते।”
जवाब में जगमोहन ने सम्बन्धविच्छेद कर दिया।
वो वापिस वाल्ट के दरवाजे पर पहुँचा।
उसने सावधानी से दरवाजा खोल कर पहले भीतर के माहौल का जायजा लिया और फिर भीतर कदम रखा।
“सब ठीक है?”—उसने खामखाह सवाल किया।
“हाँ।”—ढीले कुर्ते और कार्डीगन वाली लड़की बोली—“सिवाय इसके।”
उसने कपिल सक्सेना की तरफ इशारा किया।
“अब क्या कहता है?”
“कहता है उलटी आ रही है।”
“तौबा!”
“करेगा।”—प्रेग्नेंट क्लर्क चेतना बोली।
“शूट कर दूँगा।”
“म-मैं...मैं”—कपिल सक्सेना कम्पित स्वर में बोला—“अब ठीक हूँ।”
“ठीक ही रहना। अब बहुत थोड़ी देर की जहमत बाकी है, इसलिये वार्निंग है। समझे?”
“मेरी भी तबियत खराब हो रही है।”—चेतना बोली—“पेट में एकाएक लहरें उठने लगी हैं।”
“सब बहानेबाजी है।”—दरबान हीरामन बोला—“तुम्हारे फोन पर बात करने की आवाज यहाँ आ रही थी। यहाँ सबको मालूम है कि अपनी कुछ शर्तें मनवाने के लिए तुम कुछ बन्धकों को छोड़ने वाले हो इसलिये ये प्रेग्नेंसी का बहाना कर रही है और वो शूगर में ऊँच-नीच हो जाने की वजह से तबीयत खराब होने का बहाना कर रहा है।”
“मेरा दम घुट रहा है।”—कोई बोला।
“लो! एक और केस तैयार हो गया!”
“हीरामन!”—मैनेजर मेहरा बोला—“जुबान को लगाम दे। जानता है सब तेरी कोताही से हुआ, फिर भी सब से ज्यादा कतरनी तेरी चल रही है।”
“अरे, साहब जी”—हीरामन ने प्रतिवाद करना चाहा—“बोला तो...”
“और अपनी नौकरी तो तू गयी समझ।”
हीरामन ने होंठ भींच लिये।
“तुम्हारी कितनी माँगें हैं?”—मेहरा जगमोहन से सम्बोधित हुआ।
“पाँच।”—जगमोहन बोला—“या शायद छ:। क्यों?”
“लिहाजा तुम पाँच या छ: बन्धकों को रिहा करोगे?”
“यही समझ लो।”
“पहले चेतना को जाने देना। वाचमैन की बकवास को खातिर में लाये बिना पहले चेतना को जाने देना। प्लीज।”
“मैं सोचूँगा इस बाबत।”
कपिल सक्सेना के ऐन बगल में एक सूटबूटधारी अधेड़ व्यक्ति मौजूद था। उसने कपिल सक्सेना से कुछ कहने के लिए कई बार मुँह खोला लेकिन हर खयाल बदल दिया।
“मुँह खोल कर”—आखिरकार वो बोला—“गहरी गहरी साँसें लेने पर भी उलटी रुक जाती है।”
कपिल सक्सेना ने संजीदगी से सहमति में सिर हिलाया और फिर जैसे सलाहकार को खुश करने के लिए उसकी हिदायत पर अमल किया।
“अब कैसी तबियत है?”
“पहले से बेहतर है। सलाह का शुक्रिया।”
“मेरा नाम बेनीवाल है, जर्मनी में नौकरी करता हूँ। बीवी बच्चे इधर हैं लेकिन साल में एक ही बार आना होता है।”
“हूँ।”
“लुटेरे ने बैंक का कैश तो लूट लिया, अब हम लोगों की बारी भी आती ही होगी।”
“जी!”
“औरतों के जेवर, मर्दों की घडियाँ, अँगूठियाँ, सब धरवा लेगा।”
“ऐसी चीजें डिस्पोज करना मुश्‍किल होता है।”
“कैश तो हरगिज नहीं छोड़ेगा। जेबें तो जरूर सब की खाली करायेगा।”
“हो सकता है।”
“आप की बिगड़ती तबीयत की वजह से आपका रिहा हो जाना तो निश्‍चित जान पड़ता है!”
“निश्‍चित कुछ कहाँ है, जनाब! निश्‍चित तो बस एक ही चीज है।”
“क्या?”
“मौत।”
“अरे! शुभ शुभ बोलिये।”
“आ के रहेगी।”
“उसने बोला था उस का किसी की जान लेने का कोई इरादा नहीं था।”
“बोलने से क्या होता है!”
“खामखाह क्यों बोलेगा?”
“झूठी तसल्ली देकर हम लोगों को शान्त रखने के लिए।”
“हूँ।”—वो कुछ शण खामोश रहा और फिर बोला—“मेरा दिल गवाही देता है कि उस प्रेग्नेंट लड़की को और आपको तो वो न सिर्फ छोड़ देगा, सबसे पहले छोड़ेगा।”
“आप के मुँह में घी शक्कर।”
“आप चाहें तो मेरा एक काम कर सकते हैं।”
“क्या?”
“मैं यहाँ फॉरेन एक्सचेंज ट्रांसफर कराने आया था। मेरे पास पाँच सौ यूरो के साठ नोट हैं। वो नोट मैं आपको सौंपना चाहता हूँ ताकि आप उसे मेरी बीवी तक पहुँचा सकें।”
“क्या फायदा! वो मेरी भी तो तलाशी लेगा?”
“मुझे उम्मीद नहीं कि बन्धक रिहा करते वक्त वो बन्धक की तलाशी लेगा।”
“आप की उम्मीद पूरी न हुई तो?”
“तो रकम वो कब्जा लेगा, जो कि मेरे पास रही तो भी वो ही कब्जायेगा।”
“उसने मुझे रिहा न किया तो?”
“तो आप भी यहीं हैं, मैं भी यहीं हूँ।”
“कहाँ रहती है आपकी बीवी?”
अपने एक जर्मनी के विजिटिंग कार्ड के पीछे उसने अपनी बीवी का नाम पता और फोन नम्बर लिख कर कार्ड उसे सौंपा। फिर चुपके से, छुपाकर, पाँच पाँच सौ यूरो के साठ नोट उसे सौंपे।
पाँच सौ यूरो के साठ नोट—सक्सेना ने मन ही मन सोचा—यानी कि तीस हजार यूरो। आजकल यूरो शायद बावन रुपये का था। पचास का भी हो तो मतलब हुआ पन्द्रह लाख रुपये।
बड़ी रकम थी।
जरूर वो शख्स—बेनीवाल—जर्मनी में कोई बढ़‍िया नौकरी करता था।
“ठीक है।”—प्रत्यक्षत: वो बोला—“आप की सोच के मुताबिक अगर मैं रिहा कर दिया गया तो बाहर जा कर सब से पहले मैं आपका ये काम ही करूँगा।”
“शुक्रिया। बहुत बहुत शुक्रिया।”
“कपिल सक्सेना नाम है मेरा। मैं...”
पाँच मिनट बाद जगमोहन के पास बस की आमद की खबर पहुँची।
जगमोहन ने प्रेग्नेंट क्लर्क चेतना को रिहा कर दिया।
उसने उसे खास तौर से हिदायत दे कर रिहा किया था कि वो भीतर की किसी भी बात का बाहर जिक्र न करे, पुलिस या प्रेस द्वारा कोई भी सवाल पूछे जाने पर एक ही जवाब दे—नो कमेंट्स।
लेकिन वो तो बाहर पहुँचते ही मीडिया की हीरोइन बन गयी। और टीवी कैमरों के सामने गा गा कर एक की आठ लगाने लगी।
मैनेजर मेहरा के केबिन में एक टेलीविजन था, उसने जाकर उसे ऑन किया तो पाया कि उस पर बाहर के हालात का सीधा प्रसारण आ रहा था। उसके टेलीविजन खोलने के वक्त स्क्रीन पर एसपी यदुनाथ सिंह आ रहा था।
“सब कुछ काबू में है।”—वो कह रहा था—“उस शख्स ने कई माँगें पेश की हैं, बन्धकों की सलामती के मद्देनजर जिन को हम पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं। हमारी टॉपमोस्ट प्रायर्टी बन्धकों को छुड़ाना है और इसके लिए हम हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।”
फिर ध्वनि पर रिहा बन्धक चेतना दिखाई दी जो कि बढ़ बढ़कर अपना ज्ञान बघारने लगी।
लुटेरा सांता क्लाज के भेष में है और खूब मोटा है।
हथियारबन्द है।
जिस्म के साथ सच में डायनामाइट बँधे हैं जिस का रिमोट उसके पास है।
अभी भीतर सब सलामत हैं।
नहीं, मुझे नहीं मालूम वो हैलीकॉप्टर का या बस का या कार का या मोटर साइकल का क्या करना चाहता है, इस बाबत वो भीतर कुछ नहीं बोला था।
हो सकता है सिरफिरा हो लेकिन बातों से नहीं लगता था और सूरत से क्या लगता था कहना मुहाल था क्यों कि वो दाढ़ी मूँछ के नीचे छुपी हुई थी।
साली!—जगमोहन के मुँह से निकला।
तब तक बाहर सूरज डूब चुका था और दिन का उजाला धीरे-धीरे गायब होने लगा था।
फिर हैलीकॉप्टर पहुँच गया होने की खबर आयी।
उसने जाकर वाल्ट का बाहरी दरवाजा खोला और एक बन्धक और रिहा करने की घोषणा की।
“इसको जाने दो।”—मैनेजर ने ग्राहक मोहन लाल की तरफ इशारा किया।
“चुपचाप बैठो।”—जगमोहन डपट कर बोला—“मुझे तुम्हारे मशवरे की जरूरत नहीं। पहले तुम्हारी बात मानी, खता खायी। तुम्हारी साथी प्रेग्नेंट क्लर्क बाहर एक सैकण्ड चुप न रह सकी।”
“ये बाल बच्चेदार आदमी है...”
“होगा। मैंने रिहा किये जाने के लिए इसे चुना है।”—जगमोहन ने कपिल सक्सेना की ओर संकेत किया—“उठ के खड़ा हो, बे।”
वो खड़ा हुआ।
जगमोहन ने उसे बाहर निकलने देकर वाल्ट का दरवाजा फिर बन्द कर दिया।
कपिल सक्सेना बाहर निकलते ही सड़क पर ऐसा ढेर हो गया कि उसे स्ट्रेचर पर लिटा कर पुलिस के बैरियर के पार की सुरक्षा में ले जाना पड़ा। थोड़ी देर बाद वो उठ बैठने के काबिल हुआ तो पुलिस के वैसे ही सवालों की बौछार उस पर भी होने लगी जैसे कि पहले रिहा हुई बन्धक चेतना पर हुई थी।
क्या उस शख्स का दिमागी तवाजन खराब था?
हाँ। जो कुछ वो कर रहा था, वो कोई सिरफिरा ही कर सकता था।
क्या उसने सच में खिड़कियों और दरवाजों के आगे बारूद बिछाया हुआ था?
हाँ। उसके जिस्म के साथ जितना डायनामाइट लिपटा हुआ था, उससे कहीं ज्यादा खिड़कियों और दरवाजों के आगे था।
इतना डायनामाइट कहाँ से आया?
जो पोशाक वो पहने था उसकी झोलों जैसी बड़ी बड़ी जेबों में से।
सूरत से नहीं तो क्या वो आवाज से पहचाना जा सकता था जो कि कईयों ने सुनी थी?
नहीं। वो हर बार आवाज बदल-बदल कर बोलता था।
बीस मिनट बाद—बुलेट प्रूफ एम्बैसेडर और हारले डेविडसन की मोटर साइकल पहुँच जाने के बाद—जो दो बन्धक और रिहा किये गये, उन में एक स्त्री थी और एक पुरुष था।
तब तक बाहर से दिन की रौशनी मुकम्मल तौर से गायब हो चुकी थी।
उन बन्धकों की रिहाई के वक्त बैंक के सामने की खाली सड़क पर एक बाजू बस और दूसरी बाजू एम्बैसेडर कार और मोटरसाइकल खड़ी थी। तीनों वाहनों की चाबियाँ उसके इग्नीशन में थीं और बस और कार के सब दरवाजे खिड़कियाँ खुले थे ताकि इस बात की तसदीक हो जाती कि भीतर कोई नहीं था।
अलबत्ता पुलिस का ये इन्तजाम मुकम्मल था कि जो कोई भी उन तीन वाहनों में से किसी का सवार बनता, नजदीकी इमारतों की छतों पर पोजीशन लिये बैठे क्रैक शाट कमाण्डोज उसे भून कर रख देते।
वैसे ही नजदीकी स्कूल की इमारत के टॉप फ्लोर से हैलीकॉप्टर पर टेलीस्कोपिक साइट वाली रायफलें तनी हुई थीं।
एसपी यदुनाथ सिंह को कोई अन्देशा था तो ये था कि लुटेरा अपनी तरह किसी बन्धक को—या किन्हीं बन्धकों को—सांता क्लाज बना कर साथ ला सकता था। वो ऐसा करता तो निशानेबाजों के लिए ये निर्णय करना मुहाल होता कि कौन-सा सांता क्लाज लुटेरा था और कौन-सा—या कौन से—सांता क्लाज बन्धक था।
पुलिस के एक्सपर्ट्स ने जो और फन्दे लगाये थे वो ये थे कि बस, कार और मोटरसाइकल में ऐसे गवर्नर फिट थे जो कि उन वाहनों के तीन चार किलोमीटर चलने के बाद ही इंजन को पैट्रोल की सप्लाई बन्द कर देते और फिर सवार की लाख कोशिशों के बावजूद वाहन आगे न बढ़ पाता। हैलीकॉप्टर में ऐसा इन्तजाम था कि उसके भीतर बैठते ही लुटेरे को बिजली का करारा झटका लगता और वो मरता नहीं तो अधमरा जरूर हो जाता।
लेकिन अभी वैसा कुछ नहीं होने वाला था क्यों कि तब जो बन्धक छोड़े गये थे, वो एक स्त्री और पुरुष थे। वो पुलिस के सुरक्षा घेरे में पहुँच गये तो उन पर भी सवालों की बौछार होने लगी।
एस पी यदुनाथ सिंह ने देखा कि पुरुष एक कोई तीस बत्तीस साल का मामूली शक्ल सूरत और दरम्याने कद काठ वाला व्यक्ति था। उसकी नाक पर आधुनिक स्टाइल का निगाह का चश्‍मा था और चेहरे पर बड़ी नफासत से तराशी गयी फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ थी। वो एक कार्डुराय की पैंट और कोट और हाईनैक का पुलोवर पहने था और बड़े नर्वस भाव से सिग्रेट के कश लगा रहा था।
स्त्री बीसेक साल की निहायत खूबसूरत लड़की थी जो बैगी जींस के साथ ढीला-ढाला कुर्ता और उसके ऊपर कार्डीगन पहने थी। उस का रंग गोरा था और नयन नक्श सुथरे वे। अपने भूरे बालों को वो पोनीटेल की सूरत में कस कर बाँधे थी। आँखों पर वो भी बिना रिम वाला निगाह का बड़ा नाजुक-सा चश्‍मा लगाये थी।
एसपी ने देखा उसके कुर्ते के तमाम बटन टूटे हुए थे और वो बार बार नर्वस भाव से उसके दोनों सिरों को एक दूसरे से जोड़ती थी लेकिन उसके हाथ हटाते ही गिरहबान फिर खुल जाता था।
“ये”—एसपी सहानुभूतिपूर्ण स्वर में बोला—“उसने किया?”
“हाँ।”—स्त्री बड़ी कठिनाई से बोल पायी।
“यानी वो एक सिरफिरा लुटेरा ही नहीं, सैक्स मैनियाक भी है?”
“नहीं, नहीं। मैंने ही कुछ किया था जिस की वजह से उसका हाथ मेरे गिरहबान पर पड़ा था और कुर्ते के बटन टूट गये थे।”
“तुमने क्या किया था?”
“दहशत में भाग खड़ी हुई थी। इरादा टायलेट में पहुँच कर खुद को भीतर बन्द कर लेने का था लेकिन...”
“कामयाब न हो सका?”
“हाँ। वो बहुत फुर्तीला निकला था।”
“सारी फुर्ती ड्रग्स की थी।”—पुरुष बोला।
“क्या?”—एसपी के मुँह से निकला।
“मैंने खुद उसे इंजेक्शन वाली एक सिरिंज अपनी बाँह में घुसेड़ कर पिस्टन दबाते देखा था।”
“सत्यानाश! ड्रग एडिक्ट्स तो कतई भरोसे के काबिल नहीं होते, कभी भी आपा खो सकते हैं। उसके मिजाज से ऐसा लगता था?”
“कैसा?”
“जैसे वो कभी भी आपा खो सकता हो?”
“लगता तो था!”
एसपी ने स्त्री की तरफ देखा।
“बिल्कुल लगता था।”—वो बोली—“कितनी ही बार मेरी निगाह उसके हाथ में थमे रिमोट कण्ट्रोल पर पड़ी थी और हर बार मुझे लगा था कि उसका बटन उसने दबाया कि दबाया।”
“ओह!”
“उसका मिजाज बहुत अजीब था। एक मिनट में शान्त लगने लगता था, एक मिनट में आँखों से वहशत टपकने लगती थी। एक मिनट में सब को तसल्ली दे रहा होता था कि किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा, एक मिनट में धमका रहा होता था कि किसी को जिन्दा नहीं छोड़ेगा।”
“इस बाबत कुछ न बोला कि वो क्योंकर बच निकलने वाला था?”
“नहीं।”
“अपने एस्केप के तरीके का कभी कोई हिंट न दिया?”
“न।”
“वो खौफजदा था”—पुरुष बोला—“मेरे को तो साफ लगा था कि उसे पूरा पूरा अन्देशा था कि वो पकड़ा जाने वाला था।”
“कैसे लगा था?”
“बैंक का फर्नीचर खिड़कियों के आगे सरका रहा था और बार बार कहता था कि वो बन्धकों को अपनी ढाल बनायेगा। हमें बाहर निकालते वक्त बड़ी खिड़की के आगे उसने पाँच बन्धकों को कतार में खड़ा किया हुआ था। आप लोग बैंक पर एकाएक हमला करके उसे थामने की कोशिश करेंगे तो पहले और ही लोग जान से जायेंगे।”
“ओह! वो अभी भी सांता क्लाज के बहुरूप में ही है?”
“हाँ।”
“तुम लोगों के निकलने तक बन्धक किस हालत में थे?”
“सब ठीक थे।”
“शारीरिक रूप से।”—स्त्री बोली—“लेकिन कुछ पर मनोवैज्ञानिक दबाव था। जैसे एक लड़की तो यकीनन समझती थी कि वो मर जाने वाली थी, माँ को याद कर कर के माफियाँ माँग रही थी। एक बुजुर्गवार यूँ थर थर काँप रहे थे कि पैरों पर खड़े नहीं हो पा रहे वे। बैंक का एक क्लर्क...”
“आई अन्डरस्टैण्ड। उसकी उम्र का क्या अन्दाजा है आप लोगों का?”
“उसका चेहरा दाढ़ी मूँछ से ढँका हुआ था...”
“मुकम्मल तो नहीं। दाढ़ी मूँछ के बावजूद पेशानी, आँख, नाक वगैरह दिखाई देते हैं।”
“वो तो है।”
“उम्र का अन्दाजा और तरीकों से भी हो जाता है।”
“मेरे खयाल से”—पुरुष बोला—“वो पचपनेक साल का था।”
“पचास।”—स्त्री बोली।
“बहरहाल नौजवान नहीं था!”—एसपी बोला।
दोनों ने उस बात का अनुमोदन किया।
“जैसा गेटअप वो अपना बनाये था, वैसा कोई एक्स्ट्रा सामान भी उसके पास था?”
“क्या मतलब?”—पुरुष बोला।
“वो कुछ बन्धकों को देखने में अपने जैसा बनाना चाहता तो क्या बना सकता था? बहुरूप का और साजोसामान उसके पास था?”
“अच्छा, वो! एसपी साहब, हमने देखा तो नहीं लेकिन वो तो तम्बू जैसी पोशाक पहने था, क्या पता भीतर वो क्या-क्या छुपाये था!”
“ठीक।”
“अब हम जा सकते हैं?”—स्त्री बोली।
एसपी ने उसके फटे हुए कुर्ते की तरफ देखा और फिर बोला—“हाँ। उधर एक सब-इन्स्पेक्टर मौजूद है, वो आप लोगों का नाम पता, फोन नम्बर वगैरह लिखेगा, आइडेण्टिटी का प्रूफ चैक करेगा और फिर आप को चला जाने देगा।”
“थैंक्यू।”—दोनों सम्वेत स्वर में बोले।
कपिल सक्सेना मौकायवारदात से दो सड़कें परे फुटपाथ पर चल रहा था और उस वक्त बिल्कुल भी वैसा कमजोर, बीमार और भोलाभाला शख्स नहीं लग रहा था जैसा कि वो बैंक के भीतर लगता रहा था और बैंक से रिहा होने पर बाहर सड़क पर आते लगा था। लगता भी क्यों, जब कि वो कपिल सक्सेना था ही नहीं, जबकि वो दिलीप चौधरी था।
इसी वजह से पुलिस को दिया गया उस का बयान भ्रामक और गुमराह करने वाला था।
उस घड़ी सुनसान पड़ी सड़क पर वो तन कर चल रहा था और आगे लावारिस खड़ी बख्तरबन्द गाड़ी की तरफ बढ़ रहा था जिसके पहलू से लगा पुलिस का एक सिपाही खड़ा था।
वो गाड़ी से दस कदम दूर रह गया तो सिपाही की तवज्जो उसकी तरफ गयी।
“परली तरफ से जाओ।”—वो कर्कश स्वर में बोला।
“परली तरफ किधर से?”—चौधरी फुटपाथ पर ठिठकता सहज भाव से बोला।
“अरे, दूसरे फुटपाथ पर से।”
“इधर क्या है?”
“बोला न! सरकारी हुक्म है।”
“दूसरे फुटपाथ से मैं गाड़ी तक कैसे पहुँचूँगा?”
“क्या?”
“मैं इसका ड्राइवर हूँ, इसे यहाँ से ले जाने आया हूँ।”
“अच्छा!”
“हाँ।”
“तुम तो भीतर बन्द थे!”
“छूट गया। लुटेरा एक एक करके बन्धकों को छोड़ रहा है। मेरी बारी जल्दी आ गयी।”
“ओह! आई कार्ड है?”
“है।”
“दिखाओ।”
“इतनी दूर से कैसे दिखाऊँ?”
“पास आओ।”
चौधरी उसके करीब पहुँचा।
“दिखाओ।”
सहमति में सिर हिलाते हुए उसने जेब में हाथ डाला जिसे उसने बाहर निकाला तो उसमें साइलेंसर लगी गन थी।
उसने निसंकोच सिपाही को शूट कर दिया।
गाड़ी की इलैक्ट्राॅनिक सैंट्रल लाकिंग खोलने के लिए अपनी ईजाद का लाल बटन वो उस सड़क पर कदम रखते ही तीन बार दबा चुका था। उसने गाड़ी की ड्राइविंग साइड का दरवाजा खोला तो वो निशब्द खुल गया। मन ही मन खुशी से नाचता वो उसके पृष्ठ भाग में पहुँचा। पिछला दरवाजा भी उसे खुला मिला।
उसने उसे खोलकर भीतर झाँका तो भीतर पेटियाँ ही पेटियाँ लदी पायीं। गन की मूठ के प्रहारों से उसने एक पेटी का लकड़ी का ढक्कन खोला और भीतर झाँका।
भीतर सोने की ईंटें भरी हुई थीं।
दाता! इतना सोना और उसके सामने लावारिस मौजूद। जमा पान में लौंग की तरह तीस हजार यूरो, पन्द्रह लाख रुपये खामखाह हासिल हो गये।
उसने दरवाजा बन्द किया, गेंद की तरह फुदकता अग्रभाग में पहुँचा और ड्राइविंग सीट पर सवार हुआ।
इंजन के इग्नीशन का कंट्रोल इलैक्ट्राॅनिक था जो कि पैनल पर लगा बटन दबाने से स्टार्ट हो गया। उसने गाड़ी को गियर में डाला और उसे निशब्द सड़क पर लुढ़काया।
कोई रोकने वाला नहीं। कोई टोकने वाला नहीं।
वाह!
दस मिनट गुजर चुके थे।
उन दस मिनटों में नया कुछ नहीं हुआ था, जो कि एसपी यदुनाथ सिंह के लिए चिन्ता का विषय था।
उसने बैंक के नम्बर पर काल लगाई।
तत्काल घण्टी बजने का सिग्नल मिलने लगा।
दूसरी तरफ से फोन न उठाया गया।
क्या माजरा था?
उसने लाइन काटकर फिर घण्टी की।
फिर वही नतीजा।
“जवाब नहीं दे रहा।”—परेशान एसपी अपने मातहत इन्स्पेक्टर से बोला—“फोन नहीं उठा रहा। लाउडस्पीकर पर अड्रैस करो।”
“यस, सर।”
तभी एसपी के मोबाइल की घण्टी बजी।
उसने इन्स्पेक्टर को रुकने का इशारा किया और काल रिसीव की।
“मैं बोल रहा हूँ, एसपी साहब।”
एसपी की जान में जान आयी।
लाइन पर लुटेरा था।
“कहाँ मर... कहाँ चले गये थे, भई?”—वो बोला।
“कहाँ जा सकता था?”—जगमोहन बोला—“आप का बन्दोबस्त ऐसे जाने देता है?”
“इतनी देर खामोश क्यों रहे?”
“सोच रहा था।”
“क्या?”
“अपना अगला कदम, और क्या?”
“और बन्धक तुम सोचते हुए भी छोड़ सकते थे।”
“आपको और बन्धक चाहियें?”
“ये भी कोई पूछने की बात है? तुम्हारी सोच ने इतना टाइम जाया किया और खामखाह सस्पेंस फैलाया। औरतों को छोड़ो।”
“हुक्म दे रहे हैं?”
“तमाम औरतों को एक साथ छोड़ो। कितनी हैं?”
“एक... दो... वो तीन... चार। चार हैं।”
“चारों को एक साथ बाहर करो।”
“ये नहीं हो सकता।”
“देखो, अब तक तुमने अपनी माँगें मनवाई हैं, अब ये हमारी माँग है। चारों महिला बन्धकों को एक साथ छोड़ो वर्ना...”
“वर्ना क्या?”
“तुम्हारे लिये मंगाये गये सारे वाहन हटा लिये जायेंगे।”
“आप ऐसा नहीं कर सकते।”
“ऐसा ही होगा। दो मिनट में हमें चारों महिलायें बाहर सड़क पर दिखाई न दीं तो अंजाम गम्भीर होगा।”
“लिहाजा अब आप को बन्धकों की परवाह नहीं रही!”
“तो अंजाम गम्भीर होगा।”
“कोई स्ट्रेटेजी सूझ गयी जान पड़ती है!”
“दो मिनट।”
“ठीक है लेकिन दस मिनट इन्तजार करना होगा।”
“दो मिनट।”
“पाँच मिनट वर्ना भाड़ में जाइये।”
“ठीक है, पाँच मिनट। इतने में औरतों में औरत बनकर निकल सकते हो तो कोशिश कर देखो।”
“अब क्या फायदा! अब तो आपको मेरी चाल सूझ गयी।”
“पाँच मिनट।”
लाइन कट गयी।
एसपी ने काल लाउडस्पीकर मोड पर रिसीव की थी और उसके साथ ऐसा प्रबन्ध था कि एक अत्याधुनिक टेप रिकार्डर पर दोनों तरफ का वार्तालाप साथ-साथ रिकार्ड होता जाता था।
उस बार के वार्तालाप के दौरान उसे हर क्षण कुछ खटकता रहा था लेकिन सूझा नहीं था कि उसे क्या खटकता रहा था।
उस बार के वार्तालाप में कोई फर्क था, कोई जुदा कुछ था।
क्या?
क्या फर्क था?
क्या जुदा था जो पहले नहीं था?
यही सोचते पाँच मिनट गुजरे।
कोई बन्धक सड़क पर प्रकट न हुआ।
बैंक की तरफ मुकम्मल सन्नाटा था।
“जरा लास्ट कन्वर्सेशन का टेप रीवाईंड करके फिर चलाओ।”—उसने आदेश दिया।
तत्काल आदेश का पालन हुआ।
टेप में से एसपी और लुटेरे के बीच हुआ हालिया वार्तालाप सुनायी देने लगा।
“ये आवाज कैसी है?”—एकाएक एसपी बोला।
“कौन-सी आवाज?”—इन्स्पेक्टर बोला।
“जो वार्तालाप के साथ मुतवातर सुनायी दे रही है। जैसे बैकग्राउन्ड में कुछ बज रहा हो।”
“रेडियो! टेलीविजन!”
“नहीं। ये तो कुछ और ही आवाज है। घर्रर्रर्रर्र जैसी। पहले तो लुटेरे के साथ वार्तालाप के दौरान ऐसी कोई आवाज हमें कभी सुनायी नहीं दी थी। ये घर्रर्रर्रर्रर्र...”
“साहब जी”—करीब खड़ा एक हवलदार उत्तेजित भाव में बोला—“मैं कुछ बोलूँ?”
एसपी ने अप्रसन्न भाव से उसकी तरफ देखा।
वृद्ध हवलदार अपने आप में सिकुड़ कर रह गया। दोबारा बोलने की जगह उसने यूँ हाथ उठाया जैसे स्कूल में कोई बच्चा मास्टर से कोई इजाजत चाहता हो।
“क्या कहना चाहते हो?”—एस पी बोला।
“साहब जी”—हवलदार बोला—“ये मोटरसाइकल की आवाज है।”
“क्या!”
“आजकल जो मोटर साइकलें स्कूल कालेजों के लड़के दौड़ाये फिरते हैं, ये उन में से किसी की आवाज है।”
“क्या बकते हो! बैंक में मोटर साइकल का क्या काम?”
“वो भी चालू इंजन के साथ?”—इन्स्पेक्टर बोला।
“खता माफ, साहब जी”—हवलदार बोला—“मोटरसाइकल न चल रही हो तो चालू इंजन की आवाज और तरह की होती है। इंजन और मोटरसाइकल दोनों चल रहे हों तो उसी मोटरसाइकल की आवाज और तरह की होती है। साहब जी, ये चलती मोटरसाइकल की आवाज है।”
“लेकिन ये कैसे हो सकता है?”—एसपी बोला—“बैंक के भीतर बन्द लुटेरा चलती मोटर साइकल पर सवार कैसे हो सकता है?”
“खता माफ, साहब जी, जो मेरे को सूझा, मैंने बोल दिया। मैं छोटा आदमी बड़े बड़े नतीजे तो नहीं निकाल सकता न! वो तो आप ही निकालेंगे। लेकिन यूँ आवाज तभी आ सकती है जब कि मोटरसाइकल पर सवार उसे चलाता बोलने वाला हैण्ड फ्री मोड पर मोबाइल लगाये हो।”
एसपी खामोश हो गया।
जो नतीजा निकलता था, वो दिल हिला देने वाला था।
टेप को रिवर्स करके फिर सुना गया।
इस बार एसपी को कबूल करना पड़ा कि वार्तालाप की पृष्ठभूमि में होती आवाज चलती मोटरसाइकल के इंजन की थी।
लेकिन उससे जो नतीजा निकलता था, उसका दिलोदिमाग उसे कबूल करने को तैयार नहीं था।
जिस नम्बर से काल आयी थी, उसने वो वापिस बजाया।
“... दि फोन यू आर डायलिंग इज टैम्परेरिली स्विच्ड ऑफ।”
उसने फोन बन्द कर दिया।
“किसी को बोलो”—एसपी निर्णायक स्वर में बोला—“खिड़की पर पहुँच कर बैंक के भीतर झाँके।”
“गोली खा जायेगा।”—इन्स्पेक्टर दबे स्वर में बोला।
“बाजू में परे जाये और दीवार के साथ लगा लगा खिड़की तक पहुँचे और फिर भीतर झाँके।”
“आगे पर्दे हैं।”
“शीशा काटने वाली हीरे की कलम मँगाओ। उससे शीशे का टुकड़ा काट कर उसे सक्शन पम्प से काबू में करो ताकि वो भीतर गिर कर आवाज न करने पाये। फिर छेद में डण्डी डालकर पर्दे को थोड़ा-सा अपनी जगह से सरकाया जा सकेगा और भीतर झाँका जा सकेगा।”
“लेकिन...”
“ये मेरा हुक्म है। फौरन तामील हो।”
उस हुक्म की तामील में पन्द्रह मिनट लगे।
फिर यूँ भीतर झाँक कर आया नौजवान सब-इन्स्पेक्टर अपने आला अफसर के पास वापिस लौटा।
“क्या देखा?”—एसपी ने व्यग्रभाव से पूछा।
“कुछ नहीं।”—जवाब मिला।
“कुछ नहीं क्या मतलब?”—एसपी डपट कर बोला—“कुछ तो देखा होगा?”
“कुछ नहीं देखा, साहब। बिल्कुल...बिल्कुल खाली हाल देखा।”
“भीतर कोई नहीं?”
“जी नहीं।”
“न कोई लुटेरा या लुटेरे, न कोई बन्धक?”
“जी हाँ।”
“खिड़की दरवाजों के साथ साथ लगा बारूद?”
“जी नहीं।”
“बैंक का कोई फर्नीचर खिड़कियों के आगे सरकाया गया हुआ था?”
“जी नहीं। फर्नीचर की कोई आइटम आउट आफ प्लेस, आउट ऑफ आर्डर नहीं थीं।”
“लुटेरा कहीं किसी फर्नीचर आइटम के पीछे छुपा होता तो वो तुम्हें दिखाई देता?”
“हाल में होता तो जरूर दिखाई देता।”
“इतने लोग कहाँ गये?”
“वाल्ट में।”—करीब खड़ा बैंक का डीजीएम सलिल घोष बोला।
“तोड़ फोड़ किये बिना खामोशी से बैंक में दाखिल होने का कोई जरिया आप सुझा सकते हैं?”
“मेरे पास मेन डोर की डुप्लीकेट चाबी है।”
“चाबी इन्स्पेक्टर को दीजिये।”
डीजीएम ने तत्काल ऐसा किया।
मोटर साइकल पर सवार रिहा होस्टेस नम्बर तीन और चार अपनी मंजिल की ओर उड़े जा रहे थे।
जो कि मौकायवारदात से छ: किलोमीटर दूर उजाड़ पायर था।
बैगी जींस-ढीले कुर्ते और कार्डीगन वाली युवती वास्तव में मुग्धा चौधरी थी और उसके साथ रिहा हुआ फ्रेंचकट दाढ़ी मूँछ और निगाह के चश्‍मे वाला, कार्डुराय की पैंट, हाइनैक के पुलोवर और कार्डुराय के कोट वाला पुरुष जगमोहन था।
सब कुछ उनकी अपेक्षा के अनुसार हुआ था।
उधर का रुख करने से पहले वो ये भी सुनिश्‍चित कर आये थे कि बख्तरबन्द गाड़ी बैंक के आसपास उस इलाके में कहीं मौजूद नहीं थी।
यानी कि दिलीप चौधरी उर्फ रिहा बन्धक नम्बर दो कपिल सक्सेना के कब्जे में थी।
और सबसे बड़ी खुशी की बात ये थी कि इब्राहीम शेख का ‘जलपरी’ नाम का स्टीमर निर्धारित स्थान पर मौजूद था। शेख और उस का क्रियु उन के इन्तजार में डैक पर हाजिरी भर रहा था। निर्देश के मुताबिक पायर और स्टीमर के बीच टैम्परेरी लेकिन निहायत मजबूत—बख्तरबन्द गाड़ी का बोझ सँभाल सकने के काबिल—ब्रिज पहले ही सैट कर लिया गया हुआ था।
उस पुल पर मोटरसाइकल चलाता जगमोहन डैक पर पहुँचा।
उसके मोटरसाइकल एक ओर रोकते ही मुग्धा ने उसे गन थमा दी।
“इसकी कोई जरूरत नहीं, बिरादर।”—इब्राहीम शेख बोला।
“तुम्हें क्या पता?”—जगमोहन बोला।
दिखावे के लिए शेख ने असहाय भाव से कन्धे उचकाये।
“तुम्हारा ट्रक कहाँ है?”—फिर वो बोला।
“आ जायेगा।”—जगमोहन बोला—“तब तक इंजन गर्म करो।”
“ठीक है। मैं भेजता हूँ इन लोगों को।”
“तुम भी जाओ।”
“क्या बोला?”
“तुम भी जाओ। यहाँ तुम्हारा कोई काम नहीं है।”
“तुम भूल रहे हो कि ये हिंडोला मेरा है।”
“तुम्हारा ही रहेगा। अभी व्हील हाउस में पहुँचो। वहाँ तुम्हारा काम है। नीचे इंजन रूम में तुम्हारे आदमियों का काम है। हिलो।”
“वो गड्डी जो...”
“ट्रक पहुँचने दो, मिल जायेगी।”
“रवानगी से पहले।”
“पहले ही मिलेगी।”
सब डैक पर से रुखसत हो गये।
“हल्लो, सोनावती!”—पीछे जगमोहन मुग्धा की तरफ घूमा और मुस्कराता हुआ बोला—“कैसी हो?”
“सोनावती!”—मुग्धा मुदित भाव से हँसी—“हल्लो, सोनाराम!”
जगमोहन भी हँसा।
अपने निगाह के चश्‍मे को—जो कि उसके बहुरूप का हिस्सा था और असल में उसके लिए गैरजरूरी था—वो पहले ही तिलांजलि दे चुका था। पहली फुरसत में वो दाढ़ी मूँछ भी मूँड देने वाला था।
उस सिलसिले में मुग्धा की तैयारी भी काफी समझदारीभरी थी। चश्‍मे को वो उसकी तरह तिलांजलि दे भी चुकी थी, बालों को उसने जानबूझकर, बेहद कस कर पोनीटेल की सूरत में बाँधा था जिस की वजह से माथा बहुत बड़ा लगने लगा था और भवों की बनावट में फर्क आ गया था। अब पहली फुरसत में वो बाल खोलती उन्हें फैशनेबल ढंग से यूँ संवारती कि वो माथे पर बिखरे-बिखरे जान पड़ते तो वो इतने से ही कुछ की कुछ लगने लगती। उसकी बैगी जींस और ढीले-ढाले कुर्ते की वजह से किसी को न उसके कद का ठीक अन्दाजा हो पाता और न फिगर का—ये तक न मालूम पड़ता, मोटी थी या पतली थी—आधुनिक पोशाक के साथ अब चार इंच की हील पहनती तो बन्धक युवती की परछाईं भी न जान पड़ती।
लेकिन कमाल की, ईनाम के काबिल, सूझबूझ उसने खड़े पैर दिखाई थी। बैंक से निकलने से पहले उसने खुद अपने कुर्ते के बटन तोड़ लिये थे और ब्रा का स्ट्रैप ढीला कर लिया था। यूँ वो कुर्ते को गिरहबान से पकड़ कर नहीं रखती थी तो वो सामने से आजू बाजू खुल जाता था और उसके उन्नत वक्ष का बड़ा दिलकश नजारा होने लगता था। जगमोहन ने तमाम तमाशबीनों और पुलिसियों को क्या, खुद एसपी को चोरी छुपे उसके गिरहबान में झाँकते देखा था।
जिस लड़की की नौजवान छातियाँ नुमाया हों, उस की सूरत की तरफ कौन तवज्जो देता था!
सूरत के मामले में वैसी कोई सावधानी सिर्फ चौधरी ने नहीं बरती थी। एक तो वक्त रहते वैसी कोई तैयारी करने का उसे खयाल ही नहीं आया था दूसरे, बकौल उसके, माल हाथ में आते ही वो मौकायवारदात से हजारों मील दूर निकल जाने वाला था। उसने ऐसा संकेत भी दिया था कि माल समेत नेपाल के रास्ते आगे योरोप में कहीं निकल जाने का इन्तजाम उसके पास था।
“अंकल नहीं आये!”—मुग्धा बोली।
जगमोहन अपने खयालों से उबरा, उसने हड़बड़ा कर उसकी तरफ देखा।
“क्या?”—वो बोला।
“अंकल नहीं आये!”—मुग्धा ने दोहराया।
“आ जायेंगे। मोटरसाइकल तो उड़ती हुई आयी, बख्तरबन्द गाड़ी ऐसी रफ्तार तो नहीं पकड़ सकती न!”
“पहले भी तो चले!”
“हमें क्या मालूम? हमें क्या मालूम ट्रक पर काबिज होते वक्त उनके सामने कैसे हालात थे?”
“ठीक। लेकिन ट्रक होगा तो सही उनके कब्जे में?”
“क्यों नहीं होगा? बराबर होगा। कैसी लड़की हो तुम! अभी सोने के खयाल में सोनावती बन रही थीं, मुझे सोनाराम बना रही थीं, और अब हमारी कामयाबी पर ही सवालिया निशान लगा रही हो!”
“आई एम साॅरी। बात बस ये है कि मैं...मैं अंकल के लिए... फिक्रमन्द हूँ।”
“फिक्र छोड़ो। तुम्हारा अंकल बस पहुँचता ही होगा।”
“हूँ।”
“जब हाथी निकल गया तो दुम नहीं फँसने वाली।”
“गुस्ताखी माफ, दुम ही फँसती है।”
“हमारे साथ ऐसा नहीं होने वाला। खासतौर से मेरे साथ। मेरा खुदा मुझे पहले ही बहुत सजायें दे चुका है—इतनी कि मेरी सजाओं का कोटा पूरा हो गया है—अब और सजा कर खुदा नाइंसाफी नहीं कर सकता।”
वो खामोश रही।
दोनों खामोशी से दिलीप चौधरी की आमद का इन्तजार करने लगे।
पुलिस का दाखिला बैंक के हाल में हुआ।
हाल मसान की तरह वीरान पड़ा था।
कहीं कोई हरकत नहीं। कहीं कोई आहट नहीं।
“कमाल है!”—एसपी के मुँह से निकला।
“वाल्ट के दहाने का दरवाजा बन्द हो तो वहाँ से आवाज ऊपर नहीं आती।”—डीजीएम सलिल घोष बोला—“वो लोग अगर अभी भी बैंक में हैं...”
“अगर का क्या मतलब? हमारी जानकारी में आये बिना यहाँ से परिन्दा बाहर पर नहीं मार सकता।”
“... तो वो लोग वाल्ट के अलावा कहीं नहीं हो सकते। मैंने पहले ही बोला था कि...”
“मुझे याद है आपने पहले क्या बोला था।”—एसपी तनिक झुँझलाये स्वर में बोला—“किधर है वाल्ट?”
घोष ने एक तरफ इशारा किया।
वाल्ट पर पहुँचने से पहले पुलिस के आदमी सारे बैंक में फिरे, उन्होंने वहाँ का हर कोना खुदरा टटोला। कहीं कोई नहीं था, कहीं कुछ नहीं था।
आखिर वे वाल्ट के रिसैप्शन रूम पर पहुँचे।
वो भी खाली था।
वाल्ट की सीढ़‍ियों के दहाने का दरवाजा बन्द था और उस के आगे मेज कुर्सियाँ लगी हुई थीं।
फर्नीचर सरकाया गया, वो दरवाजा खोला गया।
भय से अधमरे हुए तमाम के तमाम बन्धक—बैंक के कर्मचारी और ग्राहक—वाल्ट में से बरामद हुए।
सब को ऊपर हाल में लाया गया, सब की शिनाख्त की गई।
हर बैंक कर्मचारी बैंक कर्मचारी निकला, हर ग्राहक जेनुइन ग्राहक निकला।
वो कहाँ गया?
सब का एक ही जवाब था। उस लोगों को वाल्ट में बन्द करने के बाद उन्हें नहीं मालूम कि सांता क्लाज कहाँ गया?
उन्हें तो ये भी तभी पता चला था कि वो ऊपर बैंक में नहीं था।
“कैश चैक करो।”—एकाएक डीजीएम घोष बोला।
मैनेजर मेहरा कैशियर मनोहर जैन और दो क्लर्कों ने वो काम किया।
कैश अपने स्थान पर नहीं था।
लेकिन गायब नहीं था।
वो उस झोले में मौजूद था जो कि कैशियर के पिंजरे की छत के साथ बने एक कबर्ड में से बरामद हुआ।
उसी में से सांता क्लाज का बहुरूप बरामद हुआ।
कैश को आनन फानन चैक किया गया तो मोटे तौर पर वो चौकस पाया गया।
“कमाल है!”—एसपी उलझनपूर्ण भाव में बोला—“जब कुछ चुराना ही नहीं था तो इतना हाई टेंशन ड्रामा किसलिये?”
“सोना!”—डीजीएम के मुँह से निकला।
“क्या?”
“बख्तरबन्द गाड़ी!”—बद्हवास डीजीएम बोला—“लुट गयी!”
“क्या कहते हैं?”
“सोना लुट गया। बहुत बड़ा धोखा हुआ। लुटेरों का असल निशाना बैंक का कैश नहीं, गाड़ी में बन्द सोना था।”
“नानसेंस! जब आपने खुद दावा किया था कि बख्तरबन्द गाड़ी किसी सूरत में नहीं खुल सकती तो...”
“मुझे गाड़ी दिखाओ।”
सब बाहर निकले और उस सड़क पर पहुँचे जहाँ कि बख्तरबन्द गाड़ी को धकेल कर पहुँचाया गया था।
गाड़ी वहाँ से गायब थी।
फुटपाथ पर उसका रखवाला पुलिसमैन छाती में गोली खाये मरा पड़ा था।
एसपी ने अपना माथा पीट लिया।
आधा घण्टा गुजर गया।
तब बार-बार घड़ी देखता जगमोहन भी फिक्रमन्द दिखाई देने लगा।
“पकड़े गये।”—मुग्धा कम्पित स्वर में बोली—“या एनकाउण्टर में शूट कर दिये गये।”
“मैं...मैं देखने जाता हूँ।”
“गलती करोगे। तुम्हारा भी वही हाल होगा। या पकड़े जाओगे या शूट कर दिये जाओगे।”
“मैं सावधान रहूँगा। वर्ना ये सस्पेंस और कैसे दूर होगा?”
तभी सस्पेंस वैसे ही दूर हो गया।
बिना रोशनी के चलती बख्तरबन्द गाड़ी अँधेरे में से प्रकट हुई और टैम्परेरी पुल पर से होती हुई स्टीमर के डैक पर पहुँच गयी।
जगमोहन और मुग्धा उसकी तरफ लपके।
इंजन बन्द हुआ और ड्राइविंग सीट पर से चौधरी बाहर कूदा।
“क्या हुआ, अंकल?”—मुग्धा व्यग्र भाव से बोली—“इतनी देर क्यों लगी?”
“वो हुआ जो नहीं होना चाहिये था।”—चौधरी हाँफता-सा बोला—“साला शहर में ही इंजन बन्द हो गया। प्राण काँप गये। इस गाड़ी के साथ देखा जाना ही अपनी हालत आ बैल मुझे मार वाली करने जैसा था, मैंने तो हुड खोल कर इंजन चैक करना था। वो भी अँधेरे में। तकदीर तो समझो रूठ ही चली थी लेकिन फिर साथ दिया उसने कि आखिरकार इंजन बोल पड़ा और मैं बहुत सस्पेंस में, कि फिर बन्द न हो जाये, धीमी रफ्तार से इसे चलाता यहाँ पहुँचा।”
“अन्त भला सो भला।”—जगमोहन बोला।
“तुम तो सोच रहे होगे कि चौधरी सोना ले के भाग गया!”
“अरे, नहीं।”
जब कि असल में जगमोहन यही सोच रहा था।
“मेरा ऐसा इरादा होता तो मेरी भतीजी तुम्हारे साथ न होती, मेरे साथ होती।”
“अब छोड़ो भी वो किस्सा। मैं क्या जानता नहीं कि तुम कैसे आदमी हो! मुझे तुम्हारी नीयत पर शक होता तो क्या मेरी तुम्हारे साथ जुगलबन्दी होती!”
चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया।
“मोटरसाइकल।”—फिर जगमोहन बोला—“लुढ़का दूँ नीचे?”
“अभी नहीं।”—चौधरी बोला—“बीच समुद्र में फेंकेंगे। जल्दी क्या है?”
“ठीक।”
व्हील हाउस के बाहर सीढ़‍ियों के दहाने पर इब्राहीम शेख प्रकट हुआ।
“अब चलें?”—वो उच्च स्वर में बोला।
“हाँ, चलो।”—जगमोहन बोला—“लेकिन पहले एक बात बताओ।”
“पूछो।”
“स्टीमर चलेगा, रफ्तार पकड़ेगा तो हिचकोलों से ट्रक डैक पर से लुढ़ककर समुद्र में तो नहीं जा गिरेगा?”
शेख कुछ क्षण सोचता रहा और फिर बोला—“लुढ़क सकता है।”
“तो?”
“इसके पहियों को डैक पर फिक्स करने का इन्तजाम करना होगा।”
“करो।”
“अभी। वो मेरा रोकड़ा...”
“वो भी ले जाओ।”
वो सीढ़‍ियों के दहाने से गायब हो गया।
“ये कोई गुल खिलाये बिना नहीं मानेगा।”—नीचे चौधरी चिन्तित भाव से बोला।
“उम्मीद तो नहीं कि अभी भी इस की मजाल होगी”—जगमोहन बोला—“फिर भी हमें सावधान रहना होगा।”
“वो हम से ज्यादा हैं।”
“हम दो जने हथियारबन्द हैं, देख लेंगे।”
“तीन जने।”
“मतलब?”
“गाड़ी में एक एके फार्टी सेवन पड़ी थी। मैं रायफल सँभालता हूँ और अपनी गन मुग्धा को दे देता हूँ।”
“बढ़‍िया।”
पुलिस का अमला वापिस मेन रोड पर बैंक के सामने पहुँचा।
एसपी ने एक सब-इन्स्पेक्टर को तलब किया और पूछा—“बन्धक कहाँ हैं?”
“बन्धक!”—सब-इन्स्पेक्टर के चेहरे पर उलझन के भाव आये—“वो सब तो अभी बैंक में ही...”
“अरे, वो नहीं”—एसपी झल्लाया—“वो जो लुटेरे ने रिहा किये थे! पहले एक औरत फिर एक मर्द, फिर एक औरत और एक मर्द। मुझे पूरा यकीन है कि उन्हीं दो मर्दों में से कोई सांता क्लाज बना भीतर मौजूद था और बाकी के तीन जने भी उस के जोड़ीदार थे। कहाँ हैं वो?”
“वो तो चले गये!”
“चले गये! कहाँ चले गये?”
“अपने अपने घर।”
“क्यों जाने दिया?”
“क्यों जाने दिया? साहब जी, आपका ही हुक्म था कि नाम पता फोन नम्बर लिखा कर, प्रूफ आफ आइडेण्टिटी चैक करा कर वो लोग जा सकते थे!”
कुछ क्षण एसपी के मुँह से बोल न फूटा।
“क्या लिखा! क्या चैक किया?”—फिर वो बोला—“रिकार्ड पेश करो।”
रिकार्ड की पड़ताल हुई तो पहली बन्धक चेतना का ही नाम पता दुरुस्त पाया गया। बाकी के तीनों नाम और पते फर्जी निकले।
फोन पर चेतना को मौकायवारदात पर वापिस तलब किया गया।
“इन्होंने प्रूफ आफ रेजीडेंस के तौर पर तुम्हें क्या लिखाया था?”—एसपी ने बाकी तीन के बारे में सवाल किया।
“दूसरे बन्धक ने वोटर आइडेण्टिटी कार्ड दिखाया था जिस पर उसकी और तसवीर और नाम, पता दर्ज था। आखिरी दो में से मर्द ने ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया था।”
“और उसके साथ की कुर्ते कार्डीगन वाली औरत ने?”
“कुछ नहीं लेकिन वो ड्राइविंग लाइसेंस वाले की बीवी थी न, इसलिये उसकी अलग से शिनाख्त की कहाँ जरूरत थी!”
“ऐसा कौन बोला कि वो दोनों मियाँ बीवी थे?”
“दोनों बोले।”
“आप ये बातें छोड़िये।”—डीजीएम घोष उतावले स्वर में बोला—“ये साँप निकल जाने के बाद लकीर पीटने जैसी बातें हैं जो बाद में भी हो सकती हैं। मुझे ये बताइये कि आपने बैंक की गाड़ी की क्या हिफाजत की?”
“क्यों पूछते हैं?”—एसपी गुस्से से बोला—“आप तो कहते थे वो गाड़ी अपनी हिफाजत खुद कर सकती थी! आप तो कहते थे कि उसे कोई खोल ही नहीं सकता था! उस को गार्ड करने के लिए हम ने अमला लगाने की पेशकश की थी तो एक आदमी काफी बता दिया था और बोला कि वो भी नहीं होगा तो चलेगा। इतना बड़ा बोल बोल चुकने के बाद आप हम से क्यों पूछते हैं कि हम ने गाड़ी की क्या हिफाजत की?”
घोष के मुँह से बोल न फूटा।
“घोष साहब, आप का माल गाड़ी की बाबत आप लोगों के ओवरकंफीडेंस की वजह से लुटा जिस को कि लुटेरों ने अपने हक में इस्तेमाल किया और गाड़ी ले उड़े।”
“लेकिन कैसे? कैसे?”
“क्या कैसे?”
“कैसे ले उड़े? लुढ़का के ले गये, टो कर के ले गये या गाड़ी खोल ली?”
“मेरे खयाल से तो खोल ली।”
“लेकिन ये नामुमकिन...”
“हद है आप वाली भी। एक ही रट पकड़े हैं।”
“खैर, जाने दीजिये। मैं अपनी रट छोड़ता हूँ, आप अपनी कहिये। इतनी बड़ी वारदात हुई, पचास करोड़ रुपये का सोना लुट गया, अब आप इस बाबत क्या करेंगे।”
“गाड़ी की चौतरफा तलाश शुरू करेंगे। बहुत जल्द गाड़ी भी पकड़ी जायेगी और लुटेरे भी पकड़े जायेंगे। मैं उनके लिए आल प्वायंट बुलेटिन जारी करवाता हूँ। इत्तफाक से यहाँ एक हैलीकॉप्टर उपलब्ध है, मैं उसे भी आप की गाड़ी की एरियल सर्च में लगाता हूँ। अब आप बाजू हटिये और मुझे अपना काम करने दीजिये।”
स्टीमर के व्हील हाउस में व्हील पर जाकिर था, इब्राहीम शेख टेबल के पीछे बैठा हुआ था और असलम उस के पहलू में खड़ा था।
अख्तर और अयूब नीचे इंजन रूम में थे।
स्टीमर मन्थर गति से काले, अँधेरे समुद्र की छाती पर दौड़ रहा था।
“वो हथियारबन्द हैं।”—असलम चिन्तित भाव से बोला।
“मालूम।”—शेख बोला।
“मैं ने एक ए के फाॅर्टी-सेवन भी देखी, वो अकेली ही हमारे पुर्जे उड़ा देगी।”
“मालूम।”
“उस अकेली की धमकी से वो हमारे हथियार धरवा लेंगे।”
“मालूम।”
“अरे, बॉस, क्या मालूम मालूम लगा रखा है! कोई मतलब की बात बोलो।”
“हमें होशियारी से काम लेना होगा। हमारी अहमतरीन कोशिश यही होनी है कि वो हमारे हथियार न धरवा लें। तू अपनी गन चार्ट टेबल के दराज में छुपा। जाकिर की भी वहीं छुपा। फिर नीचे इंजन रूम में जा और अख्तर और अयूब को समझा के आ कि अपने हथियार वो अपने पास न रखें, इंजन रूम में किसी सहूलियत की ऐसी जगह छुपा दें जहाँ से कि वो बावक्तेजरूरत फौरन उन के हाथ में आ सकें।”
“तुम क्या करोगे?”
“मैं! मैं अपनी गन अपने पास रखूँगा।”
“वो किसलिये?”
“ताकि जब वो लोग हमारी तलाशी लें तो कुछ तो उन के कब्जे में आये और वो समझें कि मुझे निहत्था करके उन्होंने बड़ा तीर मारा।”
“बात तो बढ़‍िया है, बॉस, लेकिन चल जायेगी?”
“क्यों नहीं चलेगी? हमारी तलाशी की नौबत एकाएक आयेगी। एके फाॅर्टी-सेवन की नोक पर। तब गन जब सिर्फ मेरे पास से—कैप्टन के पास से—बरामद होगी तो वो क्यों नहीं समझेंगे कि हथियारबन्द सिर्फ मैं था। क्रियु का हथियारों से क्या लेना! उन्हें क्या मालूम कि तुम आम क्रियु नहीं हो, मेरे भी बाप हो!”
असलम हँसा।
“बढ़‍िया।”—वो बोला—“हम अपनी चाल कब चलेंगे?”
“अभी बहुत टाइम है। अभी तो सफर बस शुरू हुआ है। मौका ताड़कर चलेंगे और जरूर चलेंगे। मियाँ, चाहे कुछ हो जाये, ये ट्रक मैं अपने हाथ से नहीं निकल जाने देने वाला...”
एसपी के सामने रिहा बन्दियों के बयान लिये गये और उन्हें क्रॉस चैक किया गया तो इस बात की तसदीक हुई कि भीतर ग्राहक और बैंक कर्मचारियों को मिला कर कुल जमा तेइस बन्धक मौजूद थे जिस में से तीन किस्तों में चार छोड़ दिये गये थे तो बाकी उन्नीस बचने चाहिये थे। लेकिन वाल्ट में से निकाले गये बन्धक बीस थे।
ये बात अपने आप में सबूत थी कि शुरुआती चार बन्धकों में एक लुटेरा था जिस ने अपना सांता क्लाज का बहुरूप त्यागा था और बन्धक बन कर वहाँ से निकल गया था।
उन चार बन्धकों में पुरुष बन्धक दो थे इसलिये लुटेरा उन पुरुष बन्धकों में से कोई एक था।
पुरुष बन्धकों में से एक वो था जिसे कि चेतना के बाद—तब तक स्थापित हो चुका था कि वो जेनुइन बन्धक थी—रिहा किया गया था, जो अपना नाम कपिल सक्सेना बताता था और जो यूँ गिरता पड़ता बैंक से बाहर तक पहुँचा था कि उसे स्ट्रेचर पर लिटा कर बैरियर से पार की सुरक्षा में लाना पड़ा था। उसकी दुर्दशा उस का ड्रामा हो सकती थी लेकिन वो लुटेरा नहीं हो सकता था क्योंकि उस के बाद एसपी की बैंक में मौजूद लुटेरे से बात हुई थी; हैलीकॉप्टर पहुँच गया था, इस बात की खबर उसे बैंक का फोन खड़का कर दी गयी थी। उसने वो काल रिसीव की थी और ये अपने आप में सबूत था कि दूसरे बन्धक की रिहाई तक वो बैंक में मौजूद था।
इस लिहाज से लुटेरा यकीनन वो फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ और फैंसी चश्‍मे वाला नौजवान था जो कुर्ते और कार्डीगन वाली युवती के साथ बाहर निकला था।
अब यकीन के साथ कहा जा सकता था कि लुटेरे तीन थे, वो तीन बन्धक लुटेरे थे जो कि फर्जी नाम पता लिखा कर, फर्जी प्रूफ ऑफ रेजीडेंस दिखा कर वहाँ से खिसक गये थे और फिर चौकसी पर तैनात सिपाही को शूट कर के बख्तरबन्द गाड़ी उड़ा ले गये थे।
डीजीएम घोष गाड़ी के इलैक्ट्राॅनिक कण्ट्रोल के लाख कसीदे पढ़ता, हालात का इशारा साफ इस तरफ था कि उन लोगों ने किसी तरीके से गाड़ी खोल ली थी और उसे चला कर वहाँ से ले कर गये थे।
तीनों नहीं, क्योंकि एक तो—लुटेरा, उन का सरगना—मोटरसाइकल पर था और उसने ये भरम बनाये रखने के लिए कि वो तब भी बैंक के भीतर था मोटर साइकल पर फरार होने की अपनी प्रक्रिया में एसपी को फोन किया था। उसकी उस चालाकी की वजह से ही उन लोगों को मौकायवारदात से दूर निकल जाने का ज्यादा से ज्यादा वक्त मिला।
“सर!”
एसपी अपने खयालों से उबरा, उसने सिर उठा कर देखा तो पाया उसका इन्स्पेक्टर उस से मुखातिब था।
“यस?”—एसपी बोला।
“ये साहब”—उसने अपने पहलू में खड़े सूटबूटधारी अधेड़ की तरफ इशारा किया—“कुछ कहना चाहते हैं।”
एसपी की निगाह उस व्यक्ति की तरफ घूमी।
“फरमाइये?”—वो बोला।
“मेरा नाम बेनीवाल है।”—वो बोला—“मैं वाल्ट में बन्द बन्धकों में से एक हूँ।”
“क्या कहना चाहते हैं?”
“यहाँ सुनने में आ रहा है कि दूसरे नम्बर पर छोड़ा गया कपिल सक्सेना नाम का बन्धक असल में बन्धक नहीं, सांता क्लाज बने लुटेरे का साथी था।”
“आपने ठीक सुना है। हमारी सोच यही कहती है कि उसके बाद छोड़े गये दो कथित बन्धकों में जो मर्द था, वो खुद लुटेरा था और उसके साथ की औरत उस की जोड़ीदार थी।”
“वो कपिल सक्सेना अब भाग गया?”
“जब लुटेरे का जोड़ीदार था तो क्या यहीं बैठा रहेगा?”
“पकड़ा नहीं जायेगा?”
“कभी तो पकड़ा ही जायेगा। आप क्यों पूछते हैं?”
“वो मेरे तीस हजार यूरो ले गया।”
“क्या?”
“पाँच पाँच सौ यूरो के साठ नोट।”
“कैसे? कैसे ले गया?”
बेनीवाल ने किस्सा बयान किया।
“कमाल है!”—एसपी बोला—“इतनी नाउम्मीदी!”
“वो लुटेरा था, लूटने के लिए बैंक में मौजूद था। तीस हजार यूरो इन्डियन करेंसी में पन्द्रह लाख रुपये से ज्यादा होते हैं। ये कोई छोटी मोटी रकम तो नहीं।”
“फिर भी वो रकम एक अजनबी को सौंप देना...”
“सर, ही हैड ऐन ऑनेस्ट फेस।”
“क्या कहने!”
“फिर उसके रिहा होने की मुझे गारण्टी जान पड़ रही थी।”
“आपने जिस फेस पर से आनेस्टी पढ़ी, जाहिर है कि गौर से तो आपने उसे देखा ही होगा?”
“जी हाँ।”
“फिर तो आप उसका हुलिया बयान कर सकते हैं।”
“वो तो मैं कर ही सकता हूँ लेकिन मैं उस से बेहतर भी कुछ कर सकता हूँ।”
“वो क्या?”
“पाँच पाँच सौ यूरो के नोटों के नम्बर रनिंग सीरियल में थे, मैं आपको वो नम्बर बता सकता हूँ।”
एसपी की तबीयत बाग बाग हो गयी।
उसकी निगाह में वो उस वारदात का पहला मेजर क्लू था।
स्टीमर चलते एक घण्टा हो चुका था।
तब तक माहौल शात था; न कोई अप्रिय घटना हुई थी और न होने का कोई अन्देशा सामने आया था।
लगता था कि दोनों पक्ष एक दूसरे के सब्र का इम्तहान ले रहे थे।
“अब।”—फिर एकाएक जगमोहन बोला।
चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया।
“तुम गाड़ी में बैठो।”—फिर वो भतीजी से बोला—“हमारे लौटने तक वहीं रहना।”
मुग्धा ने सहमति में सिर हिलाया, वो ड्राइविंग केबिन में पैसेंजर सीट पर जा बैठी।
जगमोहन और चौधरी डैक पर चलते व्हील हाउस को जाती सीढ़ी के करीब पहुँचे।
“पहले मैं जाता हूँ।”—जगमोहन गन हाथ में लेता बोला—“तुम मुझे कवर करके रखना।”
“ठीक है।”—चौधरी बोला, उसने मुस्तैदी से रायफल थाम ली।
जगमोहन निर्विघ्न ऊपर पहुँचा।
वो व्हील हाउस के दरवाजे पर पहुँच गया तो चौधरी भी ऊपर पहुँचा लेकिन वो वहाँ जगमोहन से परे सीढ़‍ियों के दहाने पर ही ठिठका खड़ा रहा। खिड़की के शीशे में से उसे भीतर मौजूद इब्राहीम शेख, असलम और जाकिर दिखाई दे रहे थे। उन में से कोई भी कोई बेजा हरकत करता तो यकीनन रायफल की गोली खाता।
जगमोहन ने घूम कर चौधरी की तरफ देखा, उसे अपनी जगह लेने का इशारा किया और खुद भीतर दाखिल हुआ।
मुस्तैद चौधरी चौखट पर आ खड़ा हुआ। उसके हाथ में थमी रायफल पैन होती दायें से बायें, बायें से दायें फिरने लगी।
जगमोहन शेख के पास पहुँचा।
“अब कान कैसा है?”—वो मीठे स्वर में बोला।
“बड़ी जल्दी पूछना याद आ गया!”—शेख भुनभुनाया।
“कैसा है?”
“ठीक है।”
“मुझे मालूम था। मैंने बोला था, कुछ नहीं हुआ था। खाली नक्का झड़ा था।”
“क्या चाहते हो?”
“खास कुछ नहीं। जरा-सी तुम्हारी तलाशी लेना चाहता हूँ।”
“खामखाह!”
“खामखाह ही तो! अब टिक के खड़े होवो।”
तलाशी में एक अड़तीस कैलीबर की रिवाल्वर बरामद हुई।
“च च च!”—जगमोहन बोला।
“मैं कैप्टन हूँ।”—शेख बोला—“भूल गये क्या?”
“ये दोनों भी हथियारबन्द हैं?”
“मैं ‘नहीं’ कहूँगा तो यकीन कर लोगे?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
उसने असलम और जाकिर की तलाशी ली। जाकिर के पास से कुछ बरामद न हुआ, असलम के पास से एक चाकू बरामद हुआ जो कि जगमोहन ने समुद्र में फेंक दिया।
“बाकी दो जने कहाँ हैं?”—उसने शेख से सवाल किया।
“नीचे इंजन रूम में।”—शेख बोला।
“जरा चल के मुलाकात कराओ। व्हील वाले को व्हील पर छोड़ो, दढ़‍ियल को साथ में ले कर चलो।”
सब सीढ़‍ियाँ उतर कर डैक पर पहुँचे।
वहाँ व्हील हाउस से नीचे गैंगवे से आगे एक संकरा गलियारा था जिस के दोनों तरफ बन्द दरवाजे थे और जिस में से एक पर टायलेट लिखा था।
जगमोहन ने उस दरवाजे को धक्का दे कर भीतर झाँका तो पाया भीतर बहुत कम जगह में कमोड, वाश बेसिन और शावर फिट थे। शावर के आगे एक प्लास्टिक का पर्दा था जो उस वक्त एक तरफ सरका हुआ था।
“स्टीमर पर बस ये एक ही टायलेट है?”—उसने पूछा।
“मास्टर केबिन में एक और है।”—शेख बोला—“लेकिन वो खाली मेरे लिए है।”
“बाकी दरवाजे कैसे हैं?”
“क्रियु के लिए केबिन हैं।”
जगमोहन ने उन के भीतर भी बारी बारी झाँका, सब कबूतर के दड़बों जैसे तंग और बदबूदार थे।
“यहाँ सफाई का रिवाज नहीं जान पड़ता।”—वो बोला।
शेख ने जवाब न दिया।
“इंजन रूम कहाँ है?”
“वो सिरे पर जो बन्द दरवाजा है, उसके पीछे।”
“चलो।”
सब उस दरवाजे पर पहुँचे।
शेख ने दरवाजे को धक्का दिया तो चलते इंजन की गड़गड़ की आवाज बन्द गलियारे में बड़े जोर से गूँजी।
आगे चार सीढ़‍ियाँ थी जिन्हें तय करके उन्होंने इंजन रूम के फ्लोर पर कदम रखा जहाँ अख्तर और अयूब इंजन में जगह जगह तेल दे रहे थे। उन्हें आया देख कर वो ठिठके।
“सब ठीक चल रहा है?”—शेख ने पूछा।
“हाँ।”—अयूब बोला।
“हमारे मेहमान तुम लोगों की तलाशी लेना चाहते हैं।”
दोनों की भवें उठीं।
“मेहमान हैं, इसलिये हुज्जत नहीं।”
दोनों ने तलाशी दी।
कुछ बरामद न हुआ।
“चलो।”—आखिरकार जगमोहन बोला।
सब वापिस लौटे।
समुद्र तब तक और उफनने लगा था जिस की वजह से स्टीमर दायें बायें भारी हिचकोले लेता चल रहा था। तब तक धुँध छाने लगी थी जो कि गहराती जा रही थी।
अब जगमोहन को अहसास हो रहा था कि बख्तरबन्द गाड़ी के पहियों को डैक पर मजबूती से फिक्स करना भारी समझदारी का काम था; जैसे समुद्र उस घड़ी उफन रहा था, उसमें गाड़ी का डैक पर टि‍के रहना मुमकिन नहीं था, वो यकीनन लुढ़क कर समुद्र में जा गिरती।
सब वापिस व्हील हाउस में पहुँचे।
“जिस रूट पर चल रहे हैं”—वहाँ चौधरी इब्राहीम शेख से बोला—“मैं उस से बाखूबी वाकिफ हूँ।”
“तो?”
“तो ये कि मुझे मालूम है कि अभी और एक घण्टे बाद रास्ते में मोरगन आइलैंड आयेगा जिस पर बने लाइट हाउस के साउथ से हम गुजरेंगे। कप्तान साहब, अगर वो लाइट हाउस मुझे दिखाई नहीं दिया तो तुम्हारी और तुम्हारे क्रियु की खैर नहीं।”
“क्यों दिखाई नहीं देगा?”
“दूसरी बात मैं ये कहना चाहता हूँ कि मेरे पास मैरीन कम्पास है जिसके जरिये मुझे रूट की खबर लगती रहेगी। अगर कभी भी मुझे लगा कि हम अपनी मंजिल की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं तो...”
“अरे, बाप! क्यों गलाटा करते हो! ऐसा कुछ नहीं होने वाला।”
“फिर भी ताकीद रहे।”
“ताकीद ही ताकीद है। आखिर अभी मैंने चार लाख रुपये कमाने हैं।”
चौधरी खामोश हो गया।
“अब आगे बोलो। तुम लोगों की रातगुजारी के लिए मैं कोई केबन ठीक करा दूँ?”
“जरूरत नहीं।”—जगमोहन बोला—“हम ट्रक में ही रात गुजारेंगे।”
“बैठे बैठे?”
“कैसे भी।”
“मर्जी तुम्हारी।”
“ये पकड़ो।”
“ये क्या है?”
“रेडियो फोन है, वायरलैस का रिसीवर है। ऐसा एक दूसरा फोन ट्रक में हमारे पास होगा। आइन्दा बातचीत इस टू वे रेडियो सिस्टम के जरिये होगी।”
“कहने का मतलब ये है”—चौधरी बोला—“कि तुम लोगों में से किसी ने ट्रक के पास नहीं फटकना है, कुछ कहना है तो रेडियो फोन के जरिये कहना है।”
शेख के नेत्र सिकुड़े, लेकिन वो मुँह से कुछ न बोला।
“और...”—जगमोहन बोला।
“अभी और भी?”
“... तुम्हारा एक आदमी इस जगह के नीचे डैक पर मौजूद होना चाहिये।”
“वो किसलिये?”
“ताकि तुम्हारी कोई बेजा हरकत हमारे नोटिस में आये तो हम उसे शूट कर सकें। इब्राहीम शेख, यहाँ किसी खूनखराबे का माहौल बना तो उसके जिम्मेदार तुम होगे। अपने बनाने वाले के रूबरू पहुँच कर अपने चार आदमियों की शहादत की जवाबदारी तुम्हें करनी होगी।”
“कुछ नहीं होगा, बिरादर।”
“बढ़‍िया।”
जगमोहन और चौधरी वहाँ से रुखसत हो गये।
“बॉस”—पीछे असलम हताश भाव से बोला—“सारे बड़े पत्ते उन्हीं लोगों के हाथ में हैं, लगता है तुम को भाड़े से ही सब्र करना पड़ेगा।”
“अबे, काली जुबान, क्यों बद््दुआ देता है!”
“यानी कि अभी उम्मीद है?”
“उम्मीद पर तो दुनिया कायम है, मियाँ।”
“क्या करोगे?”
“अभी कुछ नहीं लेकिन अभी बहुत रात बाकी है, बहुत टाइम बाकी है, मुझे पूरा यकीन है अल्लाह हमें कोई रास्ता सुझायेगा।”
“आमीन!”
“अभी वो बहुत मुस्तैद बन रहे हैं लेकिन रात के तीसरे पहर के सिरे पर या उसके बाद जरूर गाफिल होंगे। तब हम अपनी चाल चलेंगे।”
“क्या?”
“आने वाला वक्त बतायेगा क्या!”
“फिर भी?”
“इतना रफ समुट्री सफर हर किसी के बस का नहीं होता। उन में से कोई—अल्लाह ने चाहा तो तीनों—सी-सिकनेस का शिकार जरूर होगा। फिर देखेंगे।”
“हाँ।”—तब असलम के हताश भाव में भी तब्दीली आयी, वो जोश से बोला—“बराबर देखेंगे।”
तभी रेडियो फोन खड़का।
उसने काल रिसीव की।
“तुम्हारा आदमी डैक पर नहीं पहुँचा?”
“अभी पहुँचता है।”—शेख बोला—“हौसला रखो।”
“कौन? नाम बोलो।”
“असलम।”
“वो दढ़‍ियल!”
“तमीज से बोलो। वो बहुत खतरनाक आदमी है...”
“शक्ल से ही लगता है।”
“...भाव खा गया तो...”
“रो रो के जान दे देगा।”
“...ठोक देगा।”
“दिखेगा तो ठोकेगा न?”
“आता है।”
उसने फोन वापिस मेज पर रखा और असलम से बोला—“तू नीचे जा।”
“मैं!”—असलम हड़बड़ाया।
“हाँ। दो घण्टे के लिए।”
“ओह! दो घण्टे के लिए।”
“फिर जाकिर तेरी जगह लेने पहुँच जायेगा। यूँ ही शिफ्ट में ये सिलसिला चलेगा।”
“ठीक है।”
“बारिश फिर शुरू हो गयी है, बरसाती ले के जा और अब निकल ले। वो साला मोहन बाबू उतावला हो रहा है।”
इकलौती जेनुइन बन्धक चेतना को एसपी के रूबरू पेश किया गया।
“रिहा होने के बाद आप कब तक यहाँ ठहरी थीं?”
“दूसरे बन्धक की रिहाई तक।”—जवाब मिला।
“लिहाजा बाद में जो दो बन्धक इकट्ठे रिहा हुए थे, उन्हें आपने नहीं देखा था?”
“हाँ।”
“उन में से एक एक नौजवान लड़की थी जो बैगी जींस, ढीला ढाला कुर्ता और कार्डीगन पहने थी...”
“हाँ। ऐसी एक लड़की भीतर थी, उसी ने तब भीतर रिहाई पाये दूसरे बन्धक कपिल सक्सेना को सँभाला था और लुटेरे से उसके लिए दया की सिफारिश की थी जब कि डायबटिक होने की वजह से उसकी तबीयत खराब हो गयी थी।”
“हमारी तफ्तीश कहती है कि वो सब ड्रामा था। उस शख्स को कुछ नहीं हुआ था। वो दोनों लुटेरे के जोड़ीदार थे और यूँ उन दोनों ने बतौर बन्धक उस कथित बीमार सक्सेना की अर्ली रिहाई की बुनियाद बनाई थी। सब से पहले एक जेनुइन बन्धक को—आप को—भी आइन्दा छोड़े जाने वाले बन्धकों के जेनुइन होने की बुनियाद बनाने के लिए छोड़ा गया था।”
“ओह!”
“बहरहाल मैं ये कह रहा था कि इकट्ठे छोड़े गये दो—तीसरे और चौथे—बन्धकों में एक नौजवान लड़की थी और दूसरा एक कोई तीस-बत्तीस साल का आदमी था जिस का कद दरम्याना था और शक्ल सूरत आम थी। अपनी नाक पर वो बड़े माडर्न स्टाइल का निगाह का चश्‍मा लगाये था, फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ रखे था और कार्डुराय की पतलून कोट और हाइनैक का पुलोवर पहने था। सिग्रेट के कश लगाने के ढंग से हैबिचुअल स्मोकर जान पड़ता था।”
“ऐसा तो कोई आदमी भीतर नहीं था!”
“पक्की बात?”
“हाँ।”
“शायद कोई बेहोश हो गया हो और कहीं किसी मेज के नीचे लुढ़का पड़ा हो और वो आप को दिखाई न दिया हो!”
“ऐसा नहीं हो सकता। बैंक के स्टाफ में तो फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ और निगाह के चश्‍मे वाला इस उम्र का कोई शख्स है नहीं—होता तो मैं उसे जानती होती—और जो ग्राहक थे, वो शुरू से आखिर तक मेरे साथ थे, मेरी मौजूदगी में उन में कोई घट बढ़ नहीं हुई थी।”
“मुझे आप से इसी जवाब की उम्मीद थी। लिहाजा अब हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि वो फ्रेंच कट दाढ़ी वाला शख्स ही सांता क्लाज बना लुटेरा था, या यूँ कहो कि लुटेरों का सरगना था।”
“ओह!”
“यहाँ एक लोकल पत्रकार मौजूद था जिसके पास कैमरा था लेकिन वो लुटेरे की तसवीर निकालने का तमन्नाई था, बन्धकों की तसवीरों की उसकी निगाह में कोई अहमियत नहीं थी। सच पूछो तो हमारी निगाह में भी नहीं थी; तब हमें क्या मालूम था कि बन्धक ही लुटेरे थे! बहरहाल हमारा बुलाया एक आर्टिस्ट इस वक्त यहाँ मौजूद है जो कि गवाहों की मदद से लुटेरों की तसवीरें बनाने की कोशिश कर रहा है...”
“आर्टिस्ट! लेकिन यहाँ मीडिया वाले लाइव टेलीकास्ट भी तो कर रहे थे!”—चेतना बोली।
“हाँ। पर अफसोस कि उनका प्रसारण भी उस वक्त किन्हीं तकनीकी खराबियों के कारण बन्द था।”
“ओह!”
“बन्धक नम्बर दो को—कपिल सक्सेना को—भीतर बाहर कई लोगों ने देखा था—उन लोगों में आप भी शामिल हैं—और फ्रेंचकट दाढ़ी मूँछ वाले को बाहर कई लोगों ने देखा था। आप वो तसवीरें तैयार होने तक रुकिये, उसके बाद पुलिस की गाड़ी आप को घर छोड़ आयेगी।”
“उसकी जरूरत नहीं, मैं अपने हसबैंड के साथ मोटरसाइकल पर आयी हूँ।”
“ठीक है फिर।”
दो घण्टे निर्विघ्न गुजरे।
उस घड़ी डैक पर असलम की जगह जाकिर ले चुका था और वो व्हील हाउस को जाती लोहे की सीढ़ी के बाजू में बरसाती ओढ़े बारिश का मुकाबला करता उस वाहियात ड्यूटी को मन ही मन कोसता खड़ा था।
जनमोहन, चौधरी और मुग्धा ट्रक के ड्राइविंग केबिन में मौजूद थे।
आधा घण्टा पहले इब्राहीम शेख ने उन्हें काफी की पेशकश की थी जो कि जगमोहन ने ठुकरा दी थी। वो जानता था शेख उन्हें काफी क्यों पिलाना चाहता था। काफी में बेहाशी की दवा होती और वो तीनों केबिन में ही लुढ़के पड़े होते। फिर उन के जिस्म समुद्र में होते और मछलियों का भोजन बन रहे होते।
वैसी ही पेशकश ब्रांडी की हुई तो वो भी ठुकरा दी गयी।
“कोशिशों से बाज नहीं आ रहा।”—चौधरी चिन्तित भाव से बोला।
“उसकी मजबूरी है।”—जगमोहन बोला—“ऐन उसकी नाक के नीचे पचास करोड़ का माल मौजूद है, कैसे वो उसके सपने लेना छोड़ सकता है?”
“कभी तो बाज आयेगा!”
“उम्मीद नहीं। देख लेना, अपनी आखिरी—करो या मरो जैसी—कोशिश वो तब करेगा जब कि हम मंजिल के करीब पहुँचने वाले होंगे। तब सारी रात जागते रहने की थकावट हम पर हावी होगी। कोई बड़ा कदम वो तभी उठायेगा। इसलिये उस घड़ी पूरी तरह से चौकस रहने के लिए हम में से एक को रैस्ट करना चाहिये।”
“बैठे बैठे जो रैस्ट हो सकता है, वो हम कर ही रहे हैं।”
“ट्रक के पिछवाड़े में बहुत जगह होगी, वहाँ जाके सो रहो, मैं तुम्हें तीन बजे जगा दूँगा।”
“नहीं। हम यहीं बैठेंगे।”
“वजह?”
“ट्रक खोलना उनके लालच की आग में घी डालने जैसा होगा। वो समझेंगे कि उन का बड़ा काम तो हमने कर दिया, फिर वो सब के सब मिलकर कोई आत्मघाती हरकत कर सकते हैं।”
“उन की मजाल नहीं हो सकती।”
“तुम नौजवान हो, लालच की ताकत को नहीं समझते हो, लालच चूहे को शेर बना देता है।”
वो ठीक कह रहा था—जगमोहन ने मन ही मन कबूल किया—वो भी तो लालच के ही हवाले था—भले ही कहने को उसने उसे जरूरत का नाम दिया था—जब कि उसने अमरीकी डिप्लोमैट सिडनी फोस्टर के अपहरण के कथित असम्भव काम में शिरकत की थी और कामयाब होके दिखाया था।
“मेरे को टायलेट जाने का है।”
जगमोहन ने हड़बड़ा कर सिर उठाया।
“क्या?”—वो बोला।
“टायलेट।”—मुग्धा पशेमान लहजे से बोली—“टायलेट जाने का है। मितली आ रही है...”
“इसे सी-सिकनेस ने पकड़ लिया जान पड़ता है।”—चौधरी चिन्तित भाव से बोला।
“अगर उलटी करनी है”—जगमोहन बोला—“तो ट्रक से बाहर गर्दन निकालो और डैक पर कर लो।”
“और भी बहुत कुछ हो रहा है। टायलेट ही जाना होगा।”
“मैं इन्तजाम करता हूँ।”
जगमोहन ने रेडियो फोन उठाया और व्हील हाउस में इब्राहीम शेख से सम्पर्क किया।
“क्या है?”—शेख की आवाज आयी।
“लड़की ने टायलेट जाना है।”—जगमोहन बोला।
“जाये। किसने रोका है?”
“मैं उसके साथ जाऊँगा...”
“कोई फायदा नहीं होगा। तुमने देखा ही था कि वो टायलेट बहुत छोटा है। चाहो तो मेरे केबिन में...”
“बकवास मत करो। डैक पर जो तुम्हारा आदमी इस वक्त मौजूद है, उसका क्या नाम है?”
“जाकिर।”
“मैं उसे साथ ले के जाऊँगा ताकि पीछे मेरे साथी को ट्रक में अकेला जान कर तुम जोश न खा जाओ। आयी बात समझ में?”
“आयी। ठीक है।”
गन हाथ में लिये जगमोहन ट्रक से नीचे उतरा और डैक पर चलता जाकिर के करीब पहुँचा।
“लड़की को टायलेट जाने का है।”—वो बोला—“तू पहले मेरे साथ चलेगा।”
“मुझे कैप्टन को बोलना होगा।”—जाकिर बोला।
“उसको मालूम है। ये भी मालूम है कि मैं क्यों तुझे साथ ले जा रहा हूँ। हिल।”
जाकिर हिला। उसने आगे बढ़ कर गैंगवे का दरवाजा खोला और संकरे गलियारे में कदम रखा।
जगमोहन ने तब तक ट्रक से नीचे उतर आयी मुग्धा को इशारा किया। फिर वो जाकिर को गन से कवर किये टायलेट के दरवाजे से थोड़ा परे पहुँचा और फिर वहाँ ठिठक गया।
मुग्धा करीब पहुँची और टायलेट का दरवाजा खोल कर भीतर दाखिल हो गयी।
पाँच मिनट उसने भीतर लगाये।
उस दौरान जगमोहन की गन जाकिर पर तनी रही और उस की निगाह एक क्षण को भी उस पर से न हटी।
फिर मुग्धा बाहर निकली।
“पहले तू चल।”—जगमोहन उसे रुके रहने का इशारा करता जाकिर से बोला।
भारी कदमों से चलता जाकिर आगे बढ़ा और डैक पर वापिस अपनी पुरानी पोजीशन पर पहुँच गया।
उसके बाद जगमोहन मुग्धा के साथ वापिस ट्रक में पहुँचा।
“अब कैसा लग रहा है?”—चौधरी ने भतीजी से पूछा।
“ठीक।”—मुग्धा बोली।
“मौसम तो तबाही का आलम पेश कर रहा है!”
“मौसम इससे ज्यादा खराब नहीं होने वाला।”—जगमोहन बोला—“अब आगे आगे ठीक ही होगा। नहीं भी होगा तो अब तक झेल लिया तो आगे भी झेल लेंगे।”
“हूँ। एक बात बताओ।”
“पूछो।”
“तुम्हें यकीन है कि कैप्टन के पास से बरामद हुई गन के अलावा यहाँ स्टीमर पर और कोई हथियार नहीं होगा?”
“नहीं।”
“इन्होंने और हथियार कब्जाये और एकाएक गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी तो?”
“तो हमारा क्या बिगड़ेगा! हम बख्तरबन्द गाड़ी में हैं।”
“उन को ये बात मालूम होगी?”
“नहीं मालूम होगी तो पहली गोली चलाते ही मालूम पड़ जायेगी।”
वार्तालाप आगे न बढ़ा।
खामोशी में आधी रात गुजरी।
उसके बाद डैक पर ड्यूटी देने के लिए फिर असलम पहुँच गया। जाकिर की जगह बरसाती ओढ़े अब फिर वो खड़ा था।
तब तक मौसम के मिजाज में कोई तब्दीली नहीं आयी थी। तेज हवायें चल रही थीं, समुद्र उफन रहा था, स्टीमर डोलता हुआ आगे बढ़ रहा था, बारिश हो रही थी अलबत्ता कभी धीमी हो जाती थी, कभी तेज हो जाती थी तो कभी और तेज हो जाती थी।
एकाएक जगमोहन ने ट्रक का अपनी ओर का दरवाजा खोला।
चौधरी की भवें उठीं।
जगमोहन ने अपनी कनकी उँगली उठाई।
चौधरी ने सहमति में सिर हिलाया।
जगमोहन ट्रक से नीचे उतर कर उसकी ओट में पहुँचा और लघुशंका से निवृत होने लगा।
डैक पर खुला बरसाती पानी बह रहा था। क्या फर्क पड़ता था!
वो बात चौधरी को भी जँची कि लड़की की तरह उनका टायलेट में ही जाना जरूरी नहीं था। जगमोहन वापिस भीतर आ सवार हुआ तो वही हरकत ट्रक से उतर कर चौधरी ने भी की।
व्हील हाउस की खिड़की पर खड़ा शेख गौर से वो तमाम नजारा कर रहा था। एकाएक उसने जोर से चुटकी बजाई और खुशी से झूमता बोला—“अल्लाह! अब हमारी तुरुप चाल चलेगी।”
“क्या हुआ, बॉस?”—व्हील पर मौजूद जाकिर उत्सुक भाव से बोला।
“अभी नहीं हुआ। होगा। व्हील मैं सँभालता हूँ, तू नीचे असलम के पास पहुँच, जा के उसकी जगह ले और उसे ऊपर भेज।”
“लेकिन अभी तो...”
“बहस न कर। कहना मान। फौरन जा।”
वो चला गया।
दो मिनट बाद असलम व्हील हाउस में पहुँच गया।
“क्या बात है?”—असलम बोला—“अभी तो मुझे नीचे आधा घण्टा ही गुजरा था।”
“छोड़ वो किस्सा और गौर से मेरी बात सुन। मेरे को लगता है कि हमारी पेश चलने वाली है।”
“कैसे?”
“उस लड़की को—सी-सिकनेस की वजह से या किसी भी वजह से—दोबारा टायलेट जाने की जरूरत पड़ के रहेगी। खाली बैठे बैठे हाजत वैसे भी ज्यादा लगती है। उन दोनों मर्दुओं को तो सी-सिकनेस हुई भी नहीं, फिर भी ट्रक के पहलू में ही धार मार रहे थे।”
“तो क्या हुआ?”
“वो लड़की जब टायलेट गयी थी तो मोहन बाबू ने जाकिर पर गन तान कर रखी थी और वो जाकिर को तब तक यूँ ही कवर किये रहा था जब तक कि लड़की सेफ वापिस ट्रक में नहीं पहुँच गयी थी। ठीक?”
“हाँ।”
“लड़की टायलेट में अकेली गयी थी?”
“और कैसे जाती?”
“उसके दोबारा जाने की नौबत आने से पहले हम में से कोई गन हाथ में ले कर टायलेट में छुपा हो तो सोच आगे क्या होगा?”
“वो लड़की उसके कब्जे में होगी।”—असलम उत्तेजित भाव से बोला।
“फिर जब वो लड़की की खोपड़ी से गन की नाल सटाये बाहर निकलेगा तो वो बड़ा तीस मार खां अल्लामारा मोहन बाबू क्या करेगा? उसका जोड़ीदार क्या करेगा? वो दोनों लड़की को शहीद हो जाने देंगे?”
“नहीं।”
“नहीं तो फिर जो आगे होगा, वो बताने की जरूरत है?”
“नहीं।”
“मैंने गलत बोला कि हमारी पेश चलने वाली है?”
“नहीं।”—प्रत्याशा से उतावला होता असलम बोला—“तो मैं पहुँचूँ टायलेट में?”
“तू नहीं। तू नहीं। तूने वापिस डैक पर पहुँचना है। ऐसा न हुआ तो वो शक करेंगे। तू इंजन रूम में जा और इस काम के लिए अख्तर को तैयार कर और अयूब को समझा कि कुछ अरसा उसने इंजन को अकेले सँभालना है।”
“अख्तर अपनी गन निकाले और जा कर टायलेट में छुप के बैठे?”
“और मैं क्या बोला?”
“कितनी देर?”
“कितने देर क्या मतलब? तक तक जब तक मतलब हल न हो जाये। अब जा।”
आखिरकार, आर्टिस्ट के लम्बे अनथक परिश्रम के बाद, कई स्कैच बनाने मिटाने के बाद, तीनों लुटेरों की ऐसी कम्पोजिट पिक्चर्स तैयार हुईं जिन पर अधिकतर उन लोगों की सहमति हुई जिन्होंने उन की सूरतों की तरफ तवज्जो दी थी।
बन्धक नम्बर दो यानी कि कथित कपिल सक्सेना का स्कैच तैयार करने में आर्टिस्ट की सबसे ज्यादा मदद बेनीवाल ने की।
क्यों न करता! आखिर उसकी मोटी रकम की रिकवरी का सवाल था।
फिर तमाशबीनों में स्कैच दिखा कर पूछताछ का सिलसिला इस उम्मीद के साथ शुरू हुआ कि शायद कोई उन्हें लोकल बाशिन्दों के तौर पर पहचान पाता।
लेकिन ऐसा न हो सका।
अलबत्ता ये कहना मुहाल था कि वो लोग लोकल नहीं थे या उन के स्कैच एक्यूरेट नहीं बने थे।
लुटेरों के सरगने के—सांता क्लाज बने शख्स के—स्कैच को लेकर पुलिस वालों में एक नयी बहस छिड़ी कि क्या उसकी फ्रेंच कट दाढ़ी मूँछ नकली हो सकती थी!
खुद एसपी का—जिसने कि उससे काफी देर बात की थी—विचार था कि दाढ़ी मूँछ नकली नहीं थीं। जिस शख्स को मालूम था कि बन्धक बन कर बैंक से निकलने के बाद निश्‍चित रूप से जिसका आमना सामना पुलिस के अफसरान से होना था, वो नकली दाढ़ी मूँछ इस्तेमाल में लाना अफोर्ड नहीं कर सकता था।
फिर जो नतीजा वो बाद में नकली दाढ़ी मूँछ को तिलांजलि देकर हासिल कर सकता था, वो दाढ़ी मूँछ मूँड कर भी हासिल कर सकता था।
इस सम्भावना से एसपी को नया खयाल आया।
“हमें इस शख्स के स्कैच को कम्प्यूटर पर स्कैन करके इस की दाढ़ी मूँछ और चश्‍मा इरेज कराना होगा और एक नया, क्लीनशेव्ड प्रिंट निकलवाना होगा।”
“ये स्कैच हम प्रैस को रिलीज करेंगे?”—इन्स्पेक्टर ने पूछा।
“आखिरकार तो करेंगे। अभी तो हमारा होम वर्क ही मुकम्मल नहीं है।”
“बैंक में फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट काम कर रहे हैं, उसके बाद तो यहाँ हमारा कोई काम नहीं!”
“इत्तफाक से कल बैंक की छुट्टी है इसलिये अपनी पड़ताल के लिए हमें खुला वक्त हासिल है।”
“हम उसका पूरा फायदा उठायेंगे।”
“हाँ। यही चाहता हूँ मैं।”
डेढ़ बजे के करीब मुग्धा बेचैनी से पहलू बदलने लगी।
जगमोहन ने प्रश्‍नसूचक भाव से उसकी तरफ देखा।
“टायलेट।”—वो संकोच से बोली।
“अभी।”
जगमोहन ने इब्राहीम शेख को रेडियो फोन खड़काया, दूसरी तरफ से उत्तर मिला तो वो बोला—“लड़की को फिर टायलेट जाने का है।”
अल्लाह!—खुशी से झूमता शेख मन ही मन बोला—आखिर आयी वो घड़ी।
“सिलसिला वैसे ही चलेगा जैसे पिछली बार चला था।”
“ठीक है।”
उसने फोन आफ कर के मेज पर फेंका, चार्ट टेबल के दराज में छुपा कर रखी दोनों गन निकाली और एक आगे जाकिर को थमा दी।
“व्हील को एक पोजीशन पर लॉक कर दे।”—वो बोला।
“इस मौसम में?”—जाकिर सकपकाया।
“थोड़ी देर के लिए। बहुत थोड़ी देर के लिए। इतने में कुछ नहीं होगा।”
“लेकिन...”
“अरे, अहमक, तेरा फारिग होना जरूरी है।”
“ठीक है।”
बापू बजरंगी अच्छी शक्ल सूरत वाला इकहरे बदन का नौजवान था, क्लीनशेव्ड था, शाहरुख जैसे बाल रखता था और जब अच्छे फैशनेबल कपड़े पहने हो और मुँह न खोले तो कोई नहीं कह सकता था कि टपोरी था। होटल सी-व्यू की पहली मंजिल पर स्थित झंकार नाम के डिस्को में वो बहुत औकात बना कर आया था, उसके साथ एक खूब सजी-धजी लड़की थी जो कि असल में बाई थी और उसने कैनेडी ब्रिज के इलाके से पकड़ी थी क्योंकि झंकार में अकेले शख्स के दाखिले पर पाबन्दी थी। जिस मकसद से वो वहाँ पहुँचा था, वो रात के डेढ़ बजे पूरा हुआ जब कि डिस्को में मैरी क्रिसमस की बधाइयों का लेन-देन चलते डेढ़ घण्टा हो चुका था और लोगों को चेताया जा रहा था कि डिस्को दो बजे हर हाल में बन्द हो जाने वाला था।
पवन डांगले उसे डिस्को के प्रवेश द्वार पर वहाँ के सिक्योरिटी गार्ड्स के इंचार्ज से बतियाता मिला।
“तू जा के गाड़ी में बैठ।”—वो साथ की लड़की से बोला—“दो बजे तक मैं वहाँ न पहुँचूँ तो गाड़ी ले के चली जाना।”
लड़की ने सहमति में सिर हिलाया और एडियाँ ठकठकाती वहाँ से चली गयी।
बापू बजरंगी पवन डांगले के करीब पहुँचा और हौले से खाँसा।
डांगले ने घूम कर उसकी तरफ देखा।
“क्रिसमस मुबारक, बाप।”—बजरंगी दांत निकालता बोला।
“आपको भी। आपको भी।”—उसने गौर से बजरंगी की तरफ देखा—“आप मुझे जानते हैं?”
“हाँ। तुम इधर सिक्योरिटी का बॉस पवन डांगले है और टॉप बॉस तिलक मारवाड़े के अन्डर में चलता है।”
“मैं तो आ... तुम्हें नहीं जानता।”
“अब जान जाओगे।”
“अच्छा!”
“हाँ। मेरे को दो मिनट तुम से बात करने का है।”
“इत्तफाक से यहाँ दिखाई दे गया, इसलिये?”
“अरे भीड़ू आयाईच तेरी फिराक में।”
उसके लहजे में एकाएक आयी तब्दीली से डांगले का माथा ठनका, पर उसने मन के भाव चेहरे पर न आने दिये।
“क्या बात करना चाहते हो?”—वो बोला।
“बोलेगा न किधर पिराइवेट में चले तो।”
“फिर भी?”
“बहुत खास बात है।”
“किसके लिए?”
“दोनों के लिए।”
“करो।”
“पिराइवेट में बोला न!”
“आओ।”
डिस्को के भीतर आफिस के बाजू में एक छोटा-सा क्यूबीकल था जिस में एक छोटी-सी टेबल के आर-पार पर दो जने ही बैठ सकते थे। दोनों वहाँ जाकर बैठे। डांगले के दरवाजा बन्द करते ही डिस्को की आवाजें वहाँ आनी बन्द हो गयीं।
“बोलो।”—डांगले बोला।
“बाप, मैं बहुत हौसला करके इधर तेरे सामने बैठेला है।”—बजरंगी बोला—“तू चाहे तो इधर मजे से मेरे को ठोक सकता है।”
“मैं ऐसा क्यों करूँगा?”
“क्यों कि मैं दुश्‍मन के पाले का भीड़ू है।”
“कौन दुश्‍मन?”
“ ‘भाई’।”
“तुम्हें इधर ‘भाई’ ने भेजा?”
“इनायत दफेदार ने भेजा जो कि ‘भाई’ का खास है।”
“क्यों भेजा?”
“मदद माँगता है।”
“किस काम में?”
“इधर की सिक्योरिटी कमजोर बनाने के काम में।”
“पागल हुए हो! अव्वल तो ये काम हो नहीं सकता, फिर भी हो सकता है तो इसे सिर्फ तिलक मारवाड़े कर सकता है जो कि—तुम्हें मालूम है, अभी खुद ही बोला—टॉप बॉस है, चीफ सिक्योरिटी आफिसर है।”
“वो गायब है।”
“तो क्या हुआ? नमूदार हो जायेगा।”
“क्या बोला, बाप?”
“आ जायेगा।”
“अभी मैं बोले कि नहीं आयेगा तो?”
डांगले ने घूर कर उसे देखा।
“एक मिनट फर्ज कर, बाप, खाली फर्ज कर, कि उसकी वापसी नामुमकिन...”
“क्यों भला?”
“होगी कोई वजह। मैं फर्ज करने को बोला न! क्या!”
“ठीक है। फिर?”
“तो इधर उसकी जगह कौन लेगा? तूहीच न! क्योंकि तू उसके अण्डर में चलता है। और उसके बाद तेरा ही नम्बर है।”
“मैं उसकी जगह लूँगा तो ये काम टैम्परेरी होगा। होटल का मैनेजमेंट तिलक मारवाड़े की जगह किसी और को चीफ सिक्योरिटी आफिसर अप्वायंट कर सकता है।”
“बाप, वो भीड़ू तू भी तो हो सकता है!”
“मैं हो सकता हूँ?”
“जब तक कोई नवां बिग बॉस तेरे ऊपर में बैठने को नहीं आ जाता, तब तक तो हो ही सकता है न?”
“हाँ, तब तक तो हो ही सकता हूँ।”
“नवां चीफ बाहर से आये, जल्दी से जल्दी आये तो भी टेम तो लगेगा न?”
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि पोस्ट निकाली जायेगी, इण्टरव्यू के लिए लोगों को बुलाया जायेगा, फिर किसी एक को चुना जायेगा, उस के नाम अप्वायंटमेंट लेटर जारी किया जायेगा, वो हो सकता है जायन करने के लिए टाइम माँगे...”
“बरोबर। बरोबर। ऐसे कम से कम भी होगा तो कितना टेम खोटी होगा?”
“दो हफ्ते।”
“तो बोले तो अपने बॉस की जगह लेने के वास्ते तेरे को चुना जाये या न चुना जाये, दो हफ्ते तक तो तूहीच चीफ?”
“हाँ।”
“बढ़‍िया। अभी ये काबू में कर।”
बजरंगी ने खाकी कागज में लिपटा और खाकी टेप से कसा एक बंडल उसके सामने रखा।
“ये क्या है?”—डांगले बोला।
“दस पेटी। बोले तो दस लाख रुपया।”
“क्या?”
“बोहनी। आगे जो तू बोले। एक खोखा तो दफेदार ने पक्की किया।”
“एक करोड़।”
“तेरे को दो खोखा माँगता है, तीन खोखा माँगता है तो मुँह से बोल।”
“करना क्या होगा?”
“वहीच जो तेरे बॉस को करना मंजूर न हुआ।”
“वो...वो तुम लोगों के कब्जे में है?”
“थोड़ा टेम वास्ते था। अभी आजाद है। हवा का माफिक। कोई थाम नहीं सकता।”
“तुमने कैसे सोच लिया कि जो काम मारवाड़े को करना नाकबूल था, वो मुझे कबूल होगा?”
“बोले तो वो अक्खा ईडियट। ढीठ। मगज में जाला। तू भी ऐसीच है?”
“नहीं।”
“दफेदार यहीच बोला।”
“काम क्या है?”
“बोला तो...”
“सिक्योरिटी को कमजोर बनाने को बोला। ऐसा नहीं हो सकता।”
“क्यों नहीं हो सकता?”
“क्यों कि ये छुपने वाला काम नहीं।”
“मेरे को कबूल तेरी बात। पण थोड़ा झोल तो दे सकता है, कभी थोड़ी देर का वास्ते कहीं लोचा तो पैदा कर सकता है!”
“अगर मारवाड़े सिर पर न हो तो वो तो कर सकता हूँ।”
“वो नहीं होगा। मैं गारण्टी करता है।”
“क्या लोचा? क्या झोल?”
“इधर मटन चिकन फिश का रोजाना सप्लाई है जो पिलास्टिक के बक्सों में होती है। ठीक?”
“हाँ।”
“वो सप्लाई सुबह नौ बजे से पहले आती है?”
“हाँ।”
“किधर?”
“पिछले कम्पाउण्ड में। वहाँ सप्लायर का ट्रक आता है और वहीं क्रेट उतारता है।”
“टिरक भीतर नहीं जाता?”
“नहीं। सख्त हुक्म है जिसके मुताबिक सप्लाई का हर माल पिछले कम्पाउण्ड में उतारा जाता है जिसे हमारा सिक्योरिटी स्टाफ चैक करता है और फिर किचन का स्टाफ उसे भीतर पहुँचाता है।”
“बढ़‍िया। ‘भाई’ को लोचा ये माँगता है कि परसों जो सप्लाई इधर पहुँचे, उसको चैक न किया जाये।”
“ऐसा कैसे होगा?”
“बाप, तू करेगा तो होगा न! मारवाड़े गायब, उसकी वजह से तुम लोग खबरदार, इस वास्ते सिक्योरिटी के चीफ का—जो कि मारवाड़े की गैरहाजिरी में तू होगा, बाप—फुल चौकसी फर्ज। इस वास्ते वो सप्लाई तू खुद चैक करेगा। क्या वान्दा है?”
डांगले ने कुछ क्षण सोचा।
“कोई वान्दा नहीं।”—फिर वो बोला।
“बढ़‍िया। जब वो सप्लाई भीतर पहुँच जाये तो बोलने का है फिश खराब, बास मारता है, सब वापिस जायेगा इसलिये कोई किसी किरेट को खोलने का नहीं है...”
“नहीं चलेगा।”
“काहे?”
“फिश खराब हो तो इस बाबत तभी पता चलना चाहिये जब कि क्रेट बाहर कम्पाउण्ड में चैक किये जा रहे हों। खराब फिश के क्रेट भीतर नहीं पहुँच सकते।”
“ओह! तो क्या बोलने का है?”
“बाद में शैफ के बताये पता चला कि सप्लाई गलत थी। शनिवार, इतवार को सालमन आती है, हैडॉक आ गयी थी इसलिये लौटाना जरूरी।”
“बढ़‍िया। बाप, रुक्के पर लिख के दे।”
“क्या?”
“फिश के जो नाम तू अभी बोला। मैं तो कभी ये नाम सुना नहीं।”
“फाॅरेन की फिश हैं। इंग्लैण्ड से आती हैं।”
“लिख के दे।”
डांगले ने कागज के एक पुर्जे पर कलम घसीटी और पुर्जा उसे सौंपा।
“क्रेटों में असल में क्या होगा?”—फिर वो उत्सुक भाव से बोला।
“फिश होगी।”
“अरे, भई, उसके नीचे क्या होगा?”
“देखना। अभी मालूम पड़ जायेंगा तो नाहक सोच सोच के हलकान होयेंगा।”
“इन चीजों के लिए हमारा रेगुलर सप्लायर है, वो इधर के सारे बड़े होटलों को ये चीजें सप्लाई करता है। मुझे उम्मीद नहीं कि वो तुम लोगों को अपनी सप्लाई में हेर-फेर करने देगा।”
“ ‘भाई’ को भी नहीं है।”
“तो?”
“उसका टिरक दहिशर से आता है। परसों जब इधर के लिए चलेगा तो किधर और ही पहुँच जायेगा।”
“और उसकी जगह तुम लोगों का, वैसा ही, ट्रक इधर होगा?”
“बरोबर।”
“बाद में जब असली ट्रक भी पहुँच गया तो पोल नहीं खुलेगी?”
“नहीं खुलेगी। ट्रक इधर नहीं पहुँचेगा। पहुँचेगा तो इधर डिलीवरी लेने वाला कोई नहीं होगा। ये बताने वाला कोई नहीं होगा कि डिलीवरी तो पहले ही पहुँचेला था।”
डांगले मुँह बायें उसे देखने लगा।
“तू फिकर नक्को कर, बाप। सब ऐन फिट होगा। तेरे को खाली इतना करने का है कि फिश के किरेट खुद चैक करने का है और बाद में ये पक्की करने का है कि उन किरेटों को कोई छेड़े नहीं, कोई खोले नहीं।”
“आखिर कौन खोलेगा? वापस तो वो जाने नहीं होंगे!”
“कम्पनी का आदमी आके खोलेगा। ये तसदीक करने के वास्ते कि सप्लाई गलत था। भीतर जो सामान होगा, उसका जो करना होगा, वो ही करेगा।”
“सामान होगा क्या?”
“खुद देखना। तेरे को चौकस राय दिया मैं। अभी मालूम पड़ जायेंगा तो सोच सोच के हलकान होयेंगा।”
“सूझ तो मेरे को रहा है कि क्या होगा! लेकिन छोड़ो, मैं जिद नहीं करता जानने की।”
“बढ़‍िया।”
“अब जरा रोकड़े की बात हो जाये।”
“बरोबर। वान्दा नहीं। एक खोखा कबूल?”
डांगले ने इंकार में सिर हिलाया।
“दो माँगता है?”
“नहीं।”
“तो?”
“ड्रम।”
“दस करोड़। माथा फिरेला है?”
“जोखम का काम है। बाद में बॉस लोगों को समझते देर नहीं लगेगी कि सब मैंने सैट किया।”
“कोई बचेगा तो सवाल करेगा न?”
“कोई-न-कोई तो जरूर बचेगा। और कोई बचे न बचे, मैं तो बचूँगा। फिर मेरे से सवाल नहीं होगा कि मैं कैसे बच गया?”
“वो सवाल रकम की घट-बढ़ से कैसे टलेगा?”
“पैसे में बड़ी ताकत होती है। जब मेरे पास दस करोड़ रुपया होगा तो मैं बहुत कुछ टाल लूँगा, बहुत कुछ झेल लूँगा।”
“ ‘भाई’ नहीं मानेगा।”
“बात करो उस से।”
“कैसे करेंगा? वो दुबई में है।”
“जो इधर है, उस से बात करो।”
“किस से?”
“दफेदार से।”
“फैसला तो ‘भाई’ ने करना है।”
“शायद दफेदार ने करना हो! या शायद तुम्हीं ने करना हो!”
“मैं किया न! डिरम—दस खोखा—ज्यास्ती।”
डांगले ने लापरवाही से कन्धे उचकाये।
“लालच न कर, बाप। कोई बीच का फैसला कर।”
“तुम बोलो।”
“तीन।”
“अरे, तीन तक तो तुम्हारी खुद की ही आफर थी!”
“चार।”
“आठ।”
“पाँच।”
“सात।”
“पाँच।”
“छ:।”
“पाँच। फाइनल।”
“ढाई एडवांस।”
“कबूल।”
“बाकी काम हो जाने के फौरन बाद।”
“कबूल।”
“फिर कभी इधर नहीं आने का है।”
“तो एडवांस कैसे...”
“दोपहर को मेरे को डोमेस्टिक एयरपोर्ट के अराइवल लाउन्ज में मिलना।”
“बरोबर। कोई बात करने का हो तो?”
“होटल के जनरल नम्बर्स में से किसी पर भी फोन लगाना। कोई प्राब्लम नहीं होगी।”
“बढ़‍िया। अभी जाता है।”
डांगले ने सहमति में सिर हिलाया।
अख्तर शावर के प्लास्टिक के मोटे पर्दे के पीछे छुपा हुआ था जब कि मुग्धा ने टायलेट में कदम रखा।
वो सावधान हो गया और साँस रोके प्रतीक्षा करने लगा।
थोड़ी देर बाद फ्लश चलने की आवाज आयी।
उसने सावधानी से पर्दे के सिरे से पार झाँका।
वो वाश बेसिन के सामने खड़ी हाथ धो रही थी।
छलाँग मार कर वो उसके पीछे पहुँचा, बिजली की फुर्ती से उसने उसकी एक बाँह पकड़ कर पीठ पीछे मरोड़ दी, गन की नाल उसकी गर्दन में खुबोई और साँप की तरह उसके कान में फुँफकारा—“खबरदार! आवाज न निकले!”
मुग्धा के नेत्र फट पड़े।
हे भगवान! ये कहाँ से टपका!
“दरवाजा खोल।”—अख्तर ने हुक्म दिया।
मुग्धा ने आदेश का पालन किया।
साथ ही चिल्लाई—“मोहन बाबू! सावधान!”
“ठहर जा, साली!”
उसने मुग्धा को अपने सामने धकेला और उसकी बाँह छोड़ दी। लेकिन गन तब भी मजबूती से उसकी गर्दन के साथ सटी रही।
“अपनी गन असलम को दे।”—अख्तर हिंसक भाव से जगमोहन से बोला।
“नहीं! नहीं!”—मुग्धा बोली—“गोली चलाओ। दोनों को शूट कर दो। मेरी परवाह न करो।”
“पहले लड़की का मगज बाहर होगा।”—अख्तर बोला—“अल्लाह कसम, फोड़ दूँगा।”
“ऐसा न करना।”—नये हालात के सदमे से उबरता जगमोहन बोला।
“तो गन असलम को दे।”
“देता हूँ।”
उसने गन असलम को सौंपी।
गन हाथ में आते ही असलम की बाछें खिल उठीं। उसने पीछे हट कर इंजन रूम के दरवाजे पर दस्तक दी और अपनी जगह वापिस लौट आया।
गन हाथ में थामे अयूब चौखट पर प्रकट हुआ।
“मैं आ गया, बिरादरान!”—अयूब बोला।
केवल एक क्षण के लिए अख्तर की तवज्जो मुग्धा पर से हटी और अयूब की तरफ गयी, उतने में ही मुग्धा ने नीचे को झुकाई दी, बिजली की फुर्ती से जींस की बैल्ट से अपनी गन खींची और उसे अख्तर के पेट में सटा कर दो बार ट्रीगर खींचा।
जगमोहन नीचे को झुका—उसने यूँ जाहिर किया कि गोली उस पर चली थी और रिफ्लेक्स एक्शन में उसने ऐसा किया था—और अपने दायें टखने के साथ बन्धे होल्स्टर में से बाइस कैलीबर की खिलौना-सी पिस्तौल खींची और फायर किया।
गोली असलम के कन्धे में लगी।
उसने फिर ट्रीगर खींचा।
तब तक असलम हरकत में आ चुका था इसलिये दूसरी गोली उस के कान को हवा देती गुजर गयी।
इंजन रूम के दरवाजे पर से अयूब ने फायर किया।
असलम की बद्किस्मती कि उसका हरकत में आया जिस्म अयूब की चलाई गोली के रास्ते में आ गया और जो गोली जगमोहन को लगनी थी, वो उसकी गर्दन में धँस गयी।
जगमोहन ने अयूब पर गोली चलाई जो कि सिर्फ उसका कन्धा ही छील पायी। तत्काल वो पीछे हटा और दरवाजे पर से गायब हो गया।
जगमोहन ने पिस्तौल वापिस टखने से बन्धे होल्स्टर में पहुँचाई और असलम के हाथ से छिटक कर गिरी अपनी गन वापिस उठा ली।
“तुम ठीक हो?”—फिर वो बोला।
“हाँ।”—मुग्धा नर्वस भाव से हँसी—“बिल्कुल।”
“बहुत दिलेरी दिखाई! बहुत बड़ा रिस्क लिया!”
“ये सोच के लिया कि वैसे भी तो इन लोगों ने मार ही डालना था।”
“ठीक।”
जगमोहन ने दोनों हत्प्राण अभागों की गन भी उठा लीं।
“चलो।”
गलियारा पार करके दोनों वहाँ से निकले और गैंगवे पर पहुँचे।
“क्या हुआ?”—उस पर निगाह पड़ते ही चौधरी व्यग्र भाव में बोला।
“खास कुछ नहीं हुआ।”—जगमोहन बोला—“उन लोगों ने एक बड़ी चाल चली लेकिन नाकाम रही।”
“ओह!”
“हम ट्रक की तरफ आ रहे हैं। हमें कवर करके रखना।”
“ठीक।”
“तुम मेरे पीछे रहना।”—वो मुग्धा से बोला।
मुग्धा ने सहमति में सिर हिलाया। जगमोहन आगे बढ़ा तो उसने उसके पीछे ओट ले ली।
जगमोहन व्हील हाउस पर निगाह रखे आगे बढ़ा। उसे उधर खिड़की के पीछे हरकत का आभास हुआ तो उसने वार्निंग के तौर पर हवा में दो गोलियाँ दाग दीं।
फिर वो निर्विघ्न ट्रक तक पहुँच गये।
“क्या हुआ?”—चौधरी व्यग्र भाव से बोला।
“वही, जिस का अन्देशा था। साले सब के सब हथियार छुपाये बैठे थे, घात लगाने में कामयाब भी हो ही गये थे, तुम्हारी भतीजी की दिलेरी और होशियारी की वजह से पासा पलटते-पलटते बचा।”
अयूब संकरे गलियारे में पहुँचा जहाँ कि फर्श पर असलम और अख्तर औंधे मुँह लुढ़के पड़े थे। गलियारे के परले सिरे पर पहुँच कर वो डैक पर इंच-इंच रेंगता आगे बढ़ा और यूँ आखिरकार व्हील हाउस के नीचे पहुँचा। वो उसके पृष्ठ भाग में जा कर खड़ा हुआ और उधर की रेलिंग में कमन्द डाल कर—जिसे कि वो साथ ले कर आया था—रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ा और यूँ आखिरकार व्हील हाउस में अपने बॉस के पास पहुँचा।
वहाँ रोशनी में उसने देखा कि उसके कन्धे पर से उस की चमड़े की जैकेट उधड़ गयी थी और खाल छिल गयी थी। उसने जैकेट उतार कर एक ओर डाली और रूमाल निकाल कर कन्धे से लपेटा।
“क्या हुआ?”—इब्राहीम शेख व्यग्र भाव से बोला—“कैसे हुआ?”
“वो साली छोकरी भी हथियारबन्द थी।”—अयूब हाँफता हुआ बोला—“अख्तर को खयाल करना चाहिये था। उसी ने बाजी पलट दी। अख्तर को उसने शूट कर दिया। असलम को मोहन बाबू की चलाई एक गोली लगी लेकिन जान उसकी मेरी गोली से गयी जो मैंने मोहन बाबू पर चलाई थी लेकिन ऐन वक्त पर वो बीच में आ गया।”
“पक्का है दोनों मर गये?”
“हाँ। बॉस, अब क्या होगा?”
“क्या पता क्या होगा! लेकिन कुछ न कुछ होगा जरूर।”
“क्या?”
“छोड़ूँगा मैं भी नहीं सालों को।”
“क्या करोगे?”
“अभी देखना।”
उसने व्हील हाउस की बत्तियाँ बुझा दीं और डैक की ओर की खिड़की पर पहुँचा। उसने सावधानी से बाहर झाँका।
उस घड़ी दोनों मर्द ट्रक से बाहर थे और उसके खुले अगले दरवाजों की ओट में थे। वो ओट उनके धड़ों को तो हासिल थी लेकिन उन की टाँगें घुटनों तक दरवाजों के नीचे से दिखाई दे रही थीं।
वो सोचने लगा।
अगर वो सावधानी से निशाना लगाता और वो उन दोनों की टाँगों को हिट करने में भी कामयाब हो जाता तो आगे की गन बैटल बराबर की न रहती; पैरों पर खड़े होने से लाचार दो अपाहिज और एक लड़की उन तीन जनों का मुकाबला न कर पाते।
“दोनों इधर आओ।”—वो बोला।
अयूब और जाकिर खिड़की पर उसके करीब पहुँचे।
“वो दोनों किसी वजह से ट्रक से बाहर हैं।”—शेख बोला—“वो ट्रक के दरवाजों की ओट में हैं लेकिन उन की टाँगें दिखाई दे रही हैं। मैं क्या बोला?”
“टाँगें दिखाई दे रही हैं।”—दोनों बोले।
“हम तीनों ने उनकी टाँगों को निशाना बनाकर गोलियाँ चलानी हैं, मुझे गारण्टी है यूँ चली इतनी गोलियों में से कुछ उन को जरूर लगेंगी। तैयार!”
उन्होंने गोलियाँ चलायीं लेकिन नतीजा वो न निकला जिसकी शेख को अपेक्षा थी। व्हील हाउस से पहला राउण्ड चलते ही दूसरी तरफ से भी गोलियों की बाढ़ आयी और व्हील हाउस की शीशे की खिड़कियों के परखच्चे उड़ाने लगीं। शेख और अयूब तो तत्काल फर्श पर छाती के बल लेट गये लेकिन जाकिर वैसी फुर्ती न दिखा सका।
गोलियों की बौछार उसके जिस्म से टकराई।
फिर सन्नाटा छा गया।
फिर रेडियो फोन खड़खड़ाया।
शेख ने फोन उठाकर स्विच ऑन किया।
“क्या हाल है?”—उसे मोहन बाबू की आवाज सुनायी दी।
“बढ़‍िया हाल है।”—शेख अपने स्वर को भरसक सन्तुलित रखता बोला—“तुम लोगों से बेहतर हाल है।”
“यानी कि सब सलामत हो!”
“तुम्हारी बद्किस्मती से।”
“अब बाज आओगे या नहीं?”
“बाज तुम ने आना है, कमबख्तमारो।”
“अच्छा!”
“हाँ। हमें तुम्हारी नहीं, तुम्हें हमारी जरूरत है। हम तीन जने शहीद हो गये तो इस तूफानी मौसम में तुम में से किसी का बाप स्टीमर नहीं सँभाल सकेगा। ये डूब के रहेगा।”
“तो क्या करें?”
“खुद सोचो। लेकिन एक बात ध्यान में रखना सोचते वक्त।”
“कौन-सी बात?”
“यहाँ खिड़कियों के शीशे ही टूटे हैं, और कुछ नहीं हुआ। हम ने सिर्फ इतनी एहतियात बरतनी है कि खिड़कियों के पास नहीं फटकना। लिहाजा फासले से तुम हमें निशाना नहीं बना पाओगे और करीब फटकने की तुम्हारी मजाल नहीं हो सकती। ट्रक की ओट छोड़ के जो कोई भी इधर का रुख करेगा, डैक पर मरा पड़ा होगा।”
“तो फिर?”
“तो फिर खुद सोचो। तुम्हारा जोड़ीदार मुझे धमकाता था कि अगर मैंने रूट बदला तो हमारी खैर नहीं। अब उससे पता कर लेना कि कैसे वो मुझे रूट बदलने से रोकेगा।”
“तुम्हारा रूट बदलने का इरादा है?”
“हो सकता है। ठण्डे दिमाग से सोचना इस बाबत और फिर बात करना।”
उसने फोन बन्द कर दिया।
“क्या कहता है?”—चौधरी ने सशंक भाव में पूछा।
जगमोहन ने बताया।
“ओह!”—सुन कर चौधरी के मुँह से निकला।
“पिटाई उन लोगों की हुई है, चाल उन की पिटी है”—जगमोहन बोला—“लेकिन फिर भी हालात ऐसे बन गये हैं कि अपर हैण्ड उनका है। हम उनको काबू में नहीं कर सकते। वो ठीक कहता है कि हम व्हील हाउस के पास भी नहीं फटक सकते। ट्रक की ओट में से डैक पर खुले में निकल कर हम सीढ़‍ियों की तरफ कदम भी बढ़ायेंगे तो गोली खा जायेंगे।”
“उन के साथ भी तो ऐसा ही है! उन की भी तो डैक पर कदम रखने की मजाल नहीं हो सकती!”
“दुरुस्त। अपनी-अपनी जगह हम भी सेफ हैं, वो भी सेफ हैं। लेकिन स्टीमर पर कण्ट्रोल हमारा नहीं, उनका है। वो लोग सच में ही इसे कहीं का कहीं ले जा सकते हैं।”
“वो ऐसा करेंगे?”
“क्या मालूम? तुम अपने कम्पास पर निगाह रखो, ताकि वो ऐसा करें तो कम से कम मालूम तो पड़ जाये!”
“ठीक।”
आखिरकार बैंक के सामने की घण्टों से चल रही हलचल खत्म हुई।
बैंक के ग्राहक, कर्मचारी, तमाशबीन सब धीरे-धीरे वहाँ से रुखसत हो गये। पीछे सिर्फ पुलिस का अमला रह गया।
या फिर बैंक का डीजीएम घोष रह गया।
एसपी ने प्रश्‍नसूचक नेत्रों से उसकी तरफ देखा।
“मैं बख्तरबन्द गाड़ी की बाबत कोई गुड न्यूज सुनने के लिए रुका हुआ हूँ।”
“घोष साहब”—एसपी बोला—“वो गुड न्यूज फौरन आती तो आती, अब तो अपनी मर्जी से, अपनी रफ्तार से ही आयेगी। वजह ये है कि हैलीकॉप्टर कब का लौट आया है। एरियल सर्वेलेंस से कोई नतीजा निकलता तो फौरन निकलता।”
“क्या मतलब हुआ इसका? अब आप बख्तरबन्द गाड़ी की तलाश नहीं करेंगे?”
“बराबर करेंगे। अभी भी तलाश जारी है। उसकी बाबत दूर दूर तक हिदायत जारी कर दी गयी हुई है। हर डिस्ट्रिक्ट की पुलिस उस गाड़ी की ताक में होगी लेकिन आपकी उस गाड़ी ने हमारी तलाश के बिना भी मिल के रहना है।”
“क्या मतलब?”
“जिन लोगों के पास आप की करामाती गाड़ी के फूलप्रूफ इलैक्ट्राॅनिक कण्ट्रोल का तोड़ है, उन को गाड़ी खोल कर उसमें से सोना निकाल लेने में क्या देर लगी होगी?”
“ओह!”
“देख लीजियेगा, गाड़ी जब भी मिलेगी, किसी वीरान जगह पर लावारिस खड़ी मिलेगी।”
“और सोना?”
“सोने के बारे में अभी कुछ कहना मुमकिन नहीं।”
“कब मुमकिन होगा?”
“जब लुटेरे सोने को कैश में तब्दील करने की कोशिश करेंगे। मिस्टर बेनीवाल के यूरो के नोटों की बाबत और सोने की बाबत हम चौतरफा निर्देश जारी करेंगे। मुझे यकीन है बहुत जल्द हमें कहीं-न-कहीं से कोई-न-कोई गुड न्यूज हासिल होगी।”
“सोना लुट जाने की खबर मीडिया के पास नहीं पहुँचेगी?”
“फौरन नहीं पहुँचेगी।”
“ऐसा कैसे मुमकिन होगा?”
“आप सहयोग करेंगे, आप का क्लायंट सहयोग करेगा तो क्यों नहीं मुमकिन होगा?”
“हम सहयोग क्यों नहीं करेंगे? हम तो अपने माल की रिकवरी के लिए कुछ भी करेंगे।”
“सो देयर।”
“फिर तो अब यहाँ मेरा कोई काम नहीं।”
“मैं भी ये ही कहने लगा था।”
डीजीएम ने अनमने भाव में एसपी से हाथ मिलाया और वहाँ से रुखसत हो गया।
पन्द्रह मिनट बाद इब्राहीम शेख की तरफ से रेडियो फोन बजा।
“मोहन बाबू!”—शेख की आवाज आयी।
“क्या है?”
“क्या सोचा तुमने?”
“तुमने क्या सोचा?”
“सवाल मैंने किया है।”
“मैंने क्या सोचना है! मैं तो तुम्हें एक नेक मशवरा ही दे सकता हूँ।”
“क्या?”
“अपने करार पर खरे उतर कर दिखाओ। स्टीमर को कैसाना पहुँचाओ और अपनी बाकी की रकम खरी करो।”
“चार लाख?”
“और क्या?”
“जोकि तुम हमारे कैसाना पहुँचते ही यूँ चुपचाप मुझे अदा कर दोगे जैसे यहाँ अभी पीछे कुछ हुआ ही नहीं था?”
“हाँ। क्यों नहीं?”
“मुझे तुम्हारी बात पर एतबार नहीं। हमारे किनारे पर जा कर लगते ही तुम बदला उतारने पर उतर आओगे।”
“मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं।”
“हो भी तो क्या है?”
“क्या मतलब?”
“मैं स्टीमर को घुमा रहा हूँ और इसको वापिस वहीं ले जा रहा हूँ जहाँ से इसे लाया था।”
“क्या फायदा होगा?”
“ट्रक में चोरी का माल है। माल समेत ट्रक चोरी का है। वापिस सुनामपुर पहुँचने पर मुझे ट्रक की मिल्कियत की बाबत भी मालूम हो जायेगा और इसके साथ क्या हादसा गुजरा था, ये भी मालूम हो जायेगा।”
“फिर क्या होगा?”
“तुम्हें मालूम है क्या होगा ! नहीं मालूम तो सुन तो। चोरी के माल की बरामदी कराने वाले को माल की कीमत के दस फीसदी के बराबर की रकम का इनाम मिलता है। पचास करोड़ का दस फीसदी पाँच करोड़ होता है।”
“जिस चोरी में तुम खुद शरीक हो, उसका तुम्हें इनाम मिलेगा?”
“बराबर मिलेगा। अहम मसला माल की बरामदी होगा, बाकी कहानी मैं सैट कर लूँगा। सोच लो इस बाबत। मैं तुम्हें वक्त देता हूँ सोचने के लिए।”
लाइन कट गयी।
ट्रक में फिर मन्त्रणा शुरू हुई।
“अब हमारे पास एक ही रास्ता है।”—आखिरकार जगमोहन बोला।
“क्या?”—चौधरी बोला।
“मैं सीढ़‍ियों की तरफ लपकता हूँ तुम मुझे कवर करके रखना।”
“पागल हुए हो! डैक पर खुले में कदम रखते ही मारे जाओगे।”
“तुम्हारी गोलियों की बौछार मुझे कवर देगी।”
“कोई चाँस नहीं। तुम यकीनन मारे जाओगे। ये आत्मघाती कदम मैं तुम्हें नहीं उठाने दूँगा।”
“तो फिर और क्या करें?”
“सोचते हैं।”
“तुम्हारी बाँह कैसी है?”—व्हील हाउस में इब्राहीम शेख ने अयूब से पूछा।
“ठीक है।”—अयूब बोला—“सिर्फ चमड़ी कटी है। खून बहना बन्द हो गया है। दुखती है लेकिन चलेगा।”
“शुक्र है।”
“तुम्हारा वाकेई सुनामपुर लौटने का इरादा है?”
“नहीं। हम दो जने कैसाना तक का बाकी रास्ता ही काट लें तो गनीमत समझो। तुम्हारी इंजन रूम में हाजिरी जरूरी है, यहाँ मुझे अकेले को व्हील सँभालना होगा।”
“फिर?”
“मैंने उन्हें सोचने का वक्त दिया था। उम्मीद है उन्होंने हमारे लिये मुफीद कुछ सोचा होगा। मैं फिर बात करता हूँ।”
उसने रेडियो फोन खड़काया।
“मोहन बाबू!”—वो फोन में बोला—“क्या सोचा तुमने?”
“तुम्हारा ब्लफ नहीं चलने वाला। तुम सिर्फ दो जने बाकी हो...”
“तीन।”
“बकवास। तीन हो तो जैसे दो साये दिखाई देते हैं, वैसे तीसरा क्यों नहीं दिखाई देता?”
“तुम्हारी निगाह का कसूर है।”
“तीसरे से बात कराओ।”
“मैं जरूरी नहीं समझता।”
“तो पड़े भौंकते रहो कि तुम तीन जने हो।”
“कहना क्या चाहते हो?”
“तुम दो जने स्टीमर को सुनामपुर वापिस नहीं पहुँचा सकते।”
“तो?”
“तुम्हारी अपनी भलाई भी कैसाना पहुँचने में ही है।”
खामोशी छा गयी।
“मैं क्या जानता नहीं?”
जवाब न मिला।
“हल्लो! मर गये क्या?”
“मेरी भलाई”—आखिरकार शेख बोला—“एक दूसरे तरीके में भी है।”
“कौन-सा दूसरा तरीका?”
“मैं थोड़ी देर और कैसाना की तरफ बढ़ूँगा और फिर स्टीमर को गोल गोल घुमाना शुरू कर दूँगा।”
“क्या!”
“और तब तक घुमाता रहूँगा जब तक कि डीजल खत्म नहीं हो जायेगा। उसके बाद में एसओएस सिग्नल जारी करूँगा तो कोस्ट गार्ड्स तफ्तीश के लिए पहुँच जायेंगे।”
“तब तुम्हें क्या फायदा होगा?”
“तुम्हें तो नुकसान होगा! मौजूदा हालात में तुम्हारा नुकसान भी मेरा फायदा है। अल्लाहमारो, मेरे तीन आदमी मार गिराये...”
“ये जज्बाती होने का वक्त नहीं है। दूसरे, ये भूल गये कि तुम लोगों का खुद का इरादा क्या था?”
“मैं तुम से बहस नहीं करना चाहता।”
“तो फिर प्रैक्टिकल बनो और कोई बीच का रास्ता सोचो।”
“तुम सोचो।”
“तुम्हारी निगाह माल पर है इसलिये जाहिर है कि तुम हिस्सा चाहते हो।”
“ठीक।”
“ठीक है, मिल जायेगा। अब जब हिस्से की बात कर रहे हो तो जाहिर है कि उस की बाबत सोचे भी बैठे होगे!”
“सोचे बैठा हूँ।”
“तो बोलो कितना हिस्सा चाहते हो?”
“सारा।”
“क्या!”
“ट्रक इधर छोड़ के चलते बनो। माल के बदले जान का सौदा है ये।”
“चलते बनें! कैसे चलते बनें?”
“तुम्हारे पीछे डैक की रेलिंग के साथ एक रेस्क्यू मोटरबोट फिक्स है। तीनों उस में सवार हो जाओ और स्टीमर छोड़ दो। किनारा यहाँ से सिर्फ चार किलोमीटर दूर है। अब मौसम भी सुधर गया है इसलिये आराम से किनारे पहुँच जाओगे।”
“असल में तुम चाहते हो कि इस बहाने हम खुले में निकलें और तुम हमें शूट कर दो।”
“उस बोट में और व्हील हाउस के बीच में तुम्हारे ट्रक की ओट है। तुम परली तरफ से ट्रक से उतर कर बोट की तरफ बढ़ोगे तो व्हील हाउस से तुम में से किसी को निशाना बनाना हमारे लिये मुमकिन नहीं होगा। मैं तुम्हें दस मिनट का वक्त देता हूँ।”
“ये ब्लफ है। हमें क्या मालूम कि यूँ व्हील हाउस से हम पर गोली नहीं चलाई जा सकती! असल में तुम चाहते हो कि...”
“असल में या नकल में, मैंने जो बोलना था बोल दिया। जान के बदले में माल के सौदे की हामी भरो वर्ना भाड़ में जाओ।”
लाइट कट गयी।
“अब क्या करें?”—परेशानहाल चौधरी बोला।
“लगता नहीं”—वैसे ही लहजे में जगमोहन बोला—“कि हमारे पास कोई दूसरी चायस है।”
“ऐसी बेचारगी की उम्मीद नहीं थी।”—मुग्धा बोली।
“इतनी जहमतों के बाद हाथ आये माल से अब यूँ हाथ धोने पड़ेंगे!”
“मजबूरी है।”—जगमोहन बोला—“अपनी चाल का उसने जो खाका खींचा है, उस में माल तो हाथ से जायेगा ही, हम पकड़े भी जायेंगे।”
“वो लोग भी तो?”
“उन का कुछ नहीं बिगड़ने वाला। शेख का यही दावा होगा कि उसको मजबूर किया गया था। सबूत के तौर पर अपने क्रियु के तीन आदमियों की लाशें पेश कर देगा।”
“गुनाह बेलज्जत।”—मुग्धा बोली।
“मजबूरी है।”
“अभी नहीं।”—चौधरी एकाएक बोला।
जगमोहन और मुग्धा दोनों ने उसकी तरफ देखा।
“हम ऐसा कुछ कर सकते हैं”—चौधरी बोला—“कि माल हमारे हाथ न लगे तो उनके हाथ भी न लगे।”
“कैसे?”
चौधरी ने बताया।
“भई वाह!”—सुनकर जगमोहन बोला—“मैं तो सांता क्लाज बना था, तुम तो बने बनाये सांता क्लाज हो! तुम्हारी झोली में तो अजूबे ही अजूबे हैं, हाथ डालते हो निकाल लेते हो, हाथ डालते हो निकाल लेते हो।”
वो बड़ी संजीदगी से मुस्कराया, फिर बोला—“बात करो।”
जगमोहन ने रेडियो फोन खड़काया।
“हमें तुम्हारी बात मंजूर है।”—वो फोन में बोला।
“बढ़‍िया।”
“लेकिन पहले हम तसदीक करेंगे कि वाकई व्हील हाउस से ट्रक की ओट की वजह से तुम बोट को नहीं देख सकते।”
“शौक से करो। जब कर चुको तो बोलना।”
“ठीक है।”
“हमारी चल गयी।”—व्हील हाउस में फोन बन्द करता इब्राहीम शेख प्रसन्न भाव से बोला।
“बॉस, कुछ ज्यादा ही आसानी से नहीं चल गयी?”—अयूब बोला।
“क्या मतलब?”
“इतने चोखे माल का मोह कोई यूँ चुटकियों में छोड़ देता है?”
“छोड़ देता है। जब कोई चारा न बन पड़े तो छोड़ देता है।”
“फिर भी...”
“अरे, मियाँ, हाथ कंगन को आरसी क्या! और पढ़े लिखे को फारसी क्या! अभी सामने आ जाता है कि हमारी चली या नहीं चली!”
“उन्होंने खाली जाहिर किया कि वो स्टीमर छोड़ चले हैं लेकिन न गये तो? ट्रक की ओट में ही छुपे रहे तो?”
“बोट यहाँ से दिखाई देती है। अपनी पोजीशन से उतारी जाती वो हमें दिखाई देगी।”
“उन्होंने बोट ही उतारी, खुद उसमें सवार न हुए तो?”
“अबे, तो तो, क्यों पकी पकाई खीर में मक्खी डाल रहा है?”
“मैंने तो खाली एक बात की थी।”
“ऐसी बात मत कर। मेरा दिल हिलता है।”
“जो हुक्म।”
तभी फोन खड़का।
“शेख, हमने अपनी तसल्ली कर ली है।”—फोन पर जगमोहन की आवाज आयी—“हम जा रहे हैं।”
“खुदा हाफिज!”
उसने फोन मेज पर फेंका और खुशी से हाथ मसलने लगा।
“पिट गये, साले।”—वो बोला—“हथियार डाल गये। अब सारा माल मेरा।”
“बॉस, तुम्हारा मतलब है हमारा।”
शेख सकपकाया, उसने अपलक अयूब की तरफ देखा, फिर जबरन मुस्कराया।
“जाहिर है कि हमारा।”—वो बोला—“ये भी कोई कहने की बात है! मैं अकेला क्या कर सकता हूँ? तू अकेला क्या कर सकता है? अब जब तक हम भी किनारे जा कर नहीं लगते, तेरा मेरा चोली दामन का साथ है।”
जगमोहन ने रेस्क्यू मोटरबोट की रस्सी खोल कर उसे उसकी पुल्ली पर से नीचे सरकाना शुरू किया और तब तक सरकाया जब तक कि बोट डैक के लेवल पर न पहुँच गयी। उसने बोट को वहाँ स्थिर किया और फिर उस में सवार होकर उसकी आउट-बोर्ड मोटर को आजमाया।
मोटर तत्काल स्टार्ट हुई।
उसकी सन्तुलित आवाज से साफ जाहिर हो रहा था कि वो चौकस हालत में थी।
उसने मुग्धा को इशारा किया।
वो बोट में सवार हो गयी।
जगमोहन ने पीछे ट्रक की ओर देखा जहाँ चौधरी अभी भी अपनी कारगुजारी में व्यस्त था।
“जल्दी करो।”—जगमोहन ने उसे आवाज दी।
“अभी। अभी। बड़े मियाँ का तोहफा तैयार है, बस जरा डिलीवर कर लूँ।”
चौधरी के हाथ में आपस में बँधी डायनामाइट की छ: स्टिक थीं और उन के साथ एक टाइमर बँधा हुआ था। उसने टाइमर पर पाँच मिनट बाद का टाइम सैट किया और ट्रक के नीचे घुस कर डायनामाइट को डैक पर यूँ आगे लुढ़काया कि वो व्हील हाउस के नीचे जा कर रुका।
फिर वो ट्रक के नीचे से निकला और उसने जगमोहन को इशारा किया।
जगमोहन बोट में सवार हो गया, उसने रस्सी को फिर पुल्ली पर से सरकाना शुरू किया, बोट स्टीमर की बॉडी के साथ-साथ नीचे सरकने लगी।
समुद्र की सतह से वो अभी आधे रास्ते में थी कि चौधरी भी उस में आ सवार हुआ।
“जल्दी करो।”—वो बोला।
बोट पानी पर उतरी और लहरों के साथ हिचकोले लेने लगी।
“चलाओ।”—चौधरी बोला—“जल्दी से जल्दी स्टीमर से ज्यादा से ज्यादा परे पहुँचने की कोशिश करो वर्ना हवा में उड़ता मलबा हमारे ऊपर आकर गिरेगा।”
जगमोहन ने बोट को समुद्र की छाती पर दौड़ाया।
पीछे अँधेरे में स्टीमर पर भीषण विस्फोट हुआ। उसके परखच्चे उड़ गये। स्टीमर के डैक का बचा खुचा पिछला हिस्सा नीचे पानी में झुकने लगा। उन के देखते देखते ही वो समुद्र में विलीन हो गया। जहाँ वो डूबा, वहाँ थोड़ी देर गहरा काला धुँआ उठता रहा, फिर वो भी गायब हो गया।
सुबह के पाँच बजे वो किनारे जा के लगे।
किनारा एक उजाड़ बीच था जिस की रेत के आगे दरख्तों के झुरमुट थे।
बोट को तिलांजलि दे कर वो पानी में उतरे।
चौधरी ने बोट को समुद्र की ओर काफी आगे तक धकेला और फिर गन निकाल कर उस पर गोलियाँ दागीं जिन की वजह से उस में कई छेद हो गये।
“अभी डूब जायेगी।”—वो बोला।
जगमोहन ने सहमति में सिर हिलाया।
तीनों किनारे पर पहुँचे।
“हम कहाँ हैं?”—मुग्धा आशंकित भाव से बोली।
“पता नहीं।”—चौधरी बोला—“लेकिन अहम और तसल्लीबख्श बात ये है कि सलामत हैं।”
“इस में तो कोई शक नहीं।”
चौधरी जगमोहन की तरफ घूमा।
“अब क्या इरादा है?”—वो बोला।
“इरादा अलविदा कहने का है।”—जगमोहन बोला।
“अच्छा!”
“जैसे तकदीर ने उलट पलट दिया, उसकी रू में अपनी-अपनी राह लगने में ही भलाई है।”
“हमारी राह कौन-सी है? फिलहाल वापस सुनामपुर तो हम जा नहीं सकते!”
“इकबालपुर चले जाओ।”
“नहीं, वहाँ भी नहीं।”
“वजह?”
“जब तक सब कुछ शान्त नहीं हो जाता, मैं किसी ऐसी जगह नहीं जाना चाहता जहाँ मेरी मौजूदगी अपेक्षित हो।”
“ओह!”
“हम तुम्हारे साथ रह सकते हैं?”
“नहीं।”
“वजह?”
“मेरी कुछ अपनी प्राब्लम हैं। ऐसी जो कि जानलेवा साबित हो सकती हैं। उसके लिए भी जो कि मेरे साथ होगा।”
“ओह!”—चौधरी एक क्षण चुप रहा और फिर बोला—“हमारा ग्राहक कैसाना में हमारा इन्तजार करता होगा।”
“कोई बात नहीं। वो एक वक्त तक ही इन्तजार करेगा, उसके बाद समझ जायेगा कि पंगा पड़ गया।”
“ठीक।”
“और ये”—जगमोहन ने जेब से हजार हजार की दो गड्डियाँ निकाल कर उसे सौंपी—“इब्राहीम शेख की फीस में तुम्हारी कंट्रीब्यूशन तुम्हें वापिस।”
चौधरी ने खामोशी से नोट ले लिये।
जगमोहन ने दोनों से हाथ मिलाया और उन से पहले वहाँ से रुखसत हो गया।
नाकामी का बोझ अपने दिल पर महसूस करता हुआ।
किसी ने ठीक ही कहा था कि इतिहास अपने आप को जरूर दोहराता था।
इस बार भी ऐन वैसा ही हुआ था जैसा कि ढाई साल पहले सिडनी फोस्टर के अपहरण के मामले में हुआ था।
सब कुछ ठीक ठीक हो चुकने के बाद सब कुछ गलत हो गया था।
और उसके साथ उसकी ढाई साल की मुतवातर कामयाबियों की चेन भी टूट गयी थी।
रेत और दरख्तों के झुरमुटों के आगे एक सड़क थी जो कि कोई हाइवे जान पड़ता था।
दोनों ठिठके।
“आसपास कहीं आबादी जरूर होगी।”—चौधरी बोला—“तुम यही ठहरो, मैं पता करता हूँ।”
“अंकल, अभी रुकिये।”—मुग्धा गम्भीरता से बोली।
“क्या बात है?”
“क्या वाकेई पता नहीं लगाया जा सकता कि स्टीमर कहाँ डूबा था?”
“कैसे लगाया जा सकता है? हमें तो उसके डूबने की दिशा तक का ज्ञान नहीं!”
“होना तो चाहिये!”
“कैसे?”
“मोहन बाबू ने आप को सांता क्लाज कहा। सांता क्लाज अपने झोले की एक आइटम भूल गया जान पड़ता है।”
“कौन-सी?”
“मास्टर नेवीगेटर। जिसे आप सुनामपुर से रवाना होने से पहले ही हमारे पूरे समुद्री सफर के लिए प्रोग्राम कर लेने वाले थे। जो खूबियाँ आपने उस उपकरण की गिनाई थीं, उन्हें अगर मैं भूल नहीं गयी हूँ तो मेरे खयाल से तो आप जब चाहें समुद्र में ऐन उस जगह पर पहुँच सकते हैं जहाँ कि स्टीमर डूबा था।”
चौधरी कुछ क्षण खामोश रहा और फिर बोला—“मैं कुछ नहीं भूला हूँ। और अच्छा हुआ तूने मास्टर नेवीगेटर का जिक्र मोहन बाबू के सामने न किया।”
“मतलब?”
“अब हमें उसकी जरूरत नहीं।”
“जी!”
“जब उसने खुद ही फैसला कर लिया कि हमारी अपनी अपनी राह लगने में भलाई थी, आइन्दा साथ बने रहने की जरूरत को नकार गया और अलविदा बोल गया तो अब हमारा उस का क्या वास्ता?”
“वो सब उसने मौजूदा हालात की रू में किया। अगर उसे मालूम होता कि आपके पास उस जगह का पता लगा लेने का जरिया था जहाँ कि स्टीमर डूबा था तो तब वो भला ऐसा क्यों कहता?”
“अब जो हो गया सो हो गया।”
“ये तो धोखा है!”
“क्या बकती है?”
“वो गैजेट—मास्टर नेवीगेटर—है तो सही आप के पास?”
“है।”—उसने जेब में हाथ डाल कर डिजिटल डायरी के साइज से जरा बड़ा एक उपकरण निकाला—“ये देखो।”
“ये इतना-सा आला इतनी बड़ी जानकारी देगा?”
“हैरान कर देने जितनी एक्युरेसी से देगा। ऐन कील ठोक कर बतायेगा कि स्टीमर कहाँ डूबा था!”
“कब बतायेगा?”
“जब पूछेंगे।”
“कब पूछेंगे?”
“जब मामला ठण्डा पड़ जायेगा।”
“आप ऐसा कब तक होने की उम्मीद करते हैं?”
“तीन महीने तक। एहतियात के तौर पर एक महीने का इन्तजार और।”
“हूँ।”
“वक्त की जरूरत हमें एक और वजह से भी है। हमें फिर किसी इब्राहीम शेख जैसे दगाबाज शख्स से माथा न फोड़ना पड़े, इस वास्ते इस अरसे में इस काम के लिए हमें साधन जुटाने होंगे ताकि जब हम सोना समुद्र से निकाल लें तो फिर कोई भांजी न मार जाये।”
“नेवीगेशन और गोताखोरी के अपने साधन जुटाने में तो बहुत ज्यादा पैसा खर्च होगा?”
“होगा लेकिन जितना हमारे पास है, उससे ज्यादा नहीं होगा। स्टीमर किराये पर मिलता है, गोताखोरी का साजोसामान सैकण्ड हैण्ड मिलता है और इतने अरसे में गोताखोर तुम बन सकती हो, मैं बन सकता हूँ, हम दोनों बन सकते हैं।”
“कैसे?”
“बाकायदा ट्रेनिंग लेकर।”
“फिर भी सारे काम हम दो जने कैसे कर सकेंगे? स्टीमर को हैण्डल करना अपने आप में बड़ा काम है और किसी एक आदमी का काम भी नहीं; कैसे होगा? गोताखोरी से समुद्र में सोना लोकेट हो जाने के बाद वो ऊपर स्टीमर में कैसे पहुँचेगा? वो भी क्या आप और मैं ही कर लेंगे?”
“वक्त आने दो”—चौधरी झुँझलाकर बोला—“मैं सारा इन्तजाम कर लूँगा।”
“आपने मोहन बाबू से पल्ला झाड़ के गलती की। वो इन कामों को हम से कहीं बेहतर आर्गेनाइज कर सकता था।”
“मुर्गा बांग न दे तो क्या सवेरा नहीं होता?”
“फिर भी...”
“तुम नादान हो, नहीं समझती हो कि मैंने एक हिस्सेदार से पल्ला झाड़ा। अब माल जब सिर्फ मेरी पहुँच में है तो हिस्सेदारी का क्या मतलब?”
“ठीक है, आप कहते हैं तो...”
“मैं कहता हूँ।”
मुग्धा ने एक गहरी साँस ली।
“अब क्या हुआ?”—चौधरी अप्रसन्न भाव से बोला।
“मुझे एक कहावत याद आ गयी।”—मुग्धा बोली।
“कहावत! कौन-सी कहावत?”
“आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी मिली न पूरी पाये।”
“क्या अनाप शनाप बोल रही है?”
“बैंक में इतना पैसा था। सब हमारे कब्जे में था। उसी से सब्र कर लेते तो भी मालामाल होते।”
“सोने के सामने वो पैसा कुछ भी नहीं था। दूसरे, तू फिक्र न कर, बैंक से हासिल हुई एक मोटी रकम मेरे कब्जे में है।”
“अच्छा! कैसे?”
“है किसी तरह से। हमारे आइन्दा अभियान में वो भी हमारे बहुत काम आयेगी।”
“अब हम जायेंगे कहाँ?”
“राजनगर। वहाँ कूपर रोड के इलाके में एक फ्लैट मैंने पहले से ठीक किया हुआ है। वो हर तरह से फर्निश्‍ड फ्लैट है, वहाँ हमें कोई दिक्कत नहीं होगी।”
“आप भी कमाल के हैं, अंकल।”
“अब चल, तू भी साथ ही चल। राजनगर पहुँचने का कोई जरिया हम इकट्ठे तलाश करते हैं।”
मुग्धा ने सहमति में सिर हिलाया, फिर दोनों पेड़ों की ओट छोड़ कर आगे सड़क की ओर चल दिये।
चाचा भतीजी निगाह से ओझल हो गये तो जगमोहन उस पेड़ की ओट से बाहर निकला जिसके पीछे खड़ा वो उन दोनों का वार्तालाप सुन रहा था।
“वाह भई, चाचा चौधरी!”—वो प्रशंसात्मक स्वर में बोला—“जवाब नहीं तेरा भी। लेकिन मैं भी देखता हूँ कैसे तू पूरा माल खुद हज्म करता है!”
फिर वो उन से विपरीत दिशा में आगे बढ़ चला।
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