करीब डेढ़ बजे उनके दरवाजे पर थपथपाहट हुई।
जगमोहन और नगीना की नजरें मिलीं।
“पुलिस होगी।” नगीना ने कहा- "मैं देखती डूं- ।"
इसके साथ ही वो दरवाज़े की तरफ बढ़ी | दोनों इस वक्त हिप्पी के हलिये में थे।
“कौन है?” दरवाजे के पास पहुंचकर नगीना ने पूछा।
“पुलिस-।"
नगीना ने दरवाजा खोला।
सामने एक इन्स्पैक्टर को दो हवलदारों के साथ खड़े पाया। होटल का असिस्टैंट मैनेजर भी साथ था।
“कहिये - ।" नगीना ने शांत भाव में उन्हें देखा।
“कहने ही आये हैं।” इन्स्पैक्टर ने भीतर प्रवेश करते हुए नगीना को घूरा- “तुम हिप्पियों ने गोवा को बदनाम कर रखा है। गोवा को ड्रग्स का ठिकाना बनाते जा रहे हो।"
“क्या मतलब?" जगमोहन ने तीखे स्वर में कहा।
इन्स्पेक्टर ने जगमोहन को घूरा।
तभी असिस्टैंट मैनेजर आगे बढ़ता हुआ मुलायम स्वर में कह उठा।
“सर! वे कहते हैं कि आप दोनों ड्रग्स का धंधा करते हैं। आप लोगों के पास ड्रग्स है। मैंने बहुत समझाया कि आप शरीफ लोग हैं लेकिन माने नहीं ये मुझे इनके साथ आना पड़ा।"
“पागल है ये पुलिस वाला।" जगमोहन ने इन्स्पैक्टर को घूरा- "हम नशा करने वाले हिप्पी नहीं हैं। हम-।”
“सुना।” इन्स्पैक्टर ने दोनों हवलदारों से व्यंग्य से कहा- "ये नशा करने वाले हिप्पी नहीं हैं।"
“ठीक ही तो कह रहा है सर !" हवलदार कड़वे स्वर में कह उठा- “ये नशा करने वाला नहीं, कराने वाला हिप्पी है। गोवा के वाहर से ड्रग्स लाकर ऊंची कीमत पर बेचता है। धंधा करता है ये।"
"बकवास मत करो। हम घुमक्कड़ हिप्पी हैं।" नगीना कह उठी - "शरीफ हिप्पी हैं।"
"सर !" दूसरा हवलदार मुस्कराया-“ये तो शरीफ हिप्पी हैं। हमें गलत खबर मिली है।”
"लगता है तलाशी लेनी ही पड़ेगी।” इन्स्पैक्टर व्यंग्य से बोला- “अच्छी तरह तलाशी लेना।"
दोनों हवलदार तुरन्त कमरे की और सामान की तलाशी में लग गये ।
इन्स्पैक्टर ने असिस्टैंट मैनेजर को देखा।
"तुम्हारा क्या ख्याल है? इनके पास ड्रग्स मिलेगी ?”
“मुझे तो नहीं लगता इन्स्पैक्टर साहब। मैं चेहरे देखकर बता सकता हूं कि ये शरीफ लोग हैं।”
“देखते रहो।" इन्स्पैक्टर ने कड़वे स्वर में कहा- "मैंने बड़े-बड़े शरीफों से ड्रग्स बरामद कर ली है। ये दोनों तो कुछ भी नहीं।" इसके साथ ही इन्स्पैक्टर कमरे में टहलने लगा। तलाशी जारी थी।
जगमोहन और नगीना अपनी जगह पर खड़े थे ।
“तुम दोनों के कपड़ों की भी तलाशी ली जायेगी। हो सकता है ड्रग्स तुम लोगों ने अपने पास ही छिपा रखी हो। एक बार तो मैंने एक हिप्पी के पेट से सील बंद ड्रग्स के छोटे-छोटे पैकिट निकाले थे। वो तुम दोनों से भी शरीफ लग रहा था। देखते जाओ। सब सामने आ जायेगा ।"
इन्स्पैक्टर टहलते हुए जगमोहन के पास जाकर ठिठका और ऊपरी जेब से छोटा-सा लिफाफा निकाला। उसमें चम्मच भर पाउडर स्पष्ट नजर आ रहा था ।
जगमोहन की आंखें सिकुड़ीं।
इन्स्पेक्टर की असिस्टेंट मैनेज़र की तरफ पीठ थी। वो नहीं देख पाया ।
“ये है ड्रग्स, जो तुम्हारे पास से मिलने जा रही है।" इन्स्पैक्टर ने धीमे स्वर में कहा ।
“क्या मतलब?"
“तुम दोनों खुद को गिरफ्तार समझो। मतलब थाने में पहुंचकर समझना।"
“तुम हमें गिरफ्तार नहीं कर सकते।" जगमोहन के दांत भिंच गए।
इन्स्पैक्टर ने होंठ सिकोड़कर उसे देखा फिर धीमे स्वर में कह उठा।
"जार्ज कह रहा था कि तुम बहुत समझदार हो। लेकिन मुझे तो बेवकूफ लग रहे हो।"
जगमोहन गहरी सांस लेकर रह गया।
“क्या इरादा है। ज़बरदस्ती नहीं करूंगा। जार्ज को बोल दूंगा कि तुमने ऐसा करने से मना कर दिया । "
“जो मन में आये करो।" जगमोहन ने बेमन से कहा। "ड्रग्स बरामद करूं?"
“कर लो ।”
“फौरन मान लेना कि ड्रग्स तुम्हारी है। बात को लम्बी खींचने की कोशिश मत करना । "
जगमोहन ने कुछ नहीं कहा। इन्स्पैक्टर हथेली में पैकिट दबाये उसके पास से हट गया।
“ये देखो।” कहने के साथ ही इन्स्पैक्टर जल्दी से आगे बढ़ा और उसके सामान में हाथ मारकर कह उठा- “ये रही ड्रग्स ।”
इसके साथ ही उसने हाथ में पकड़ा छोटा सा लिफाफा सबको दिखाया। फिर लिफाफा खोलता हुआ बोला- "मैं तो पहले ही कहता था कि ड्रग्स बरामद कर लूंगा।"
लिफाफा खोलकर उसे सूंघा फिर कह उठा- “उम्दा किस्म की स्मैक है। ले चलो इन्हें । बाकी की बात थाने में पूछेंगे कि कहां से ये ड्रग्स लाते हैं और किन लोगों को बेचते हैं।”
“ये गलत है।” नगीना कह उठी- “मैं-।"
"चुप रहो तुम ।” इन्स्पैक्टर ने उसे घूरा- “तुम्हारा साथी मान चुका है कि ये उसकी है। "
नगीना ने जगमोहन को देखा।
“अपने इस्तेमाल के लिये ये मैंने रखी थी।" जगमोहन ने धीमे स्वर में कहा ।
इन्स्पैक्टर होटल के असिस्टैंट मैनेजर की तरफ पलटा ।
“भविष्य में तुम कभी भी ये मत कहना कि तुम चेहरे देखकर शरीफों को पहचान जाते हो। तुम्हारे होटल में लोग ड्रग्स के साथ ठहरते हैं, सुबह की अखबार में ये बात छप गई तो ?"
"ऐसा मत कीजियेगा इन्स्पैक्टर साहब, मैं- ।"
“चुप कर। इस मामले में तेरे बयान भी दर्ज करने हैं। फुर्सत में आऊंगा बात करने। मुझे तो लगता है कि तुम लोग ही होटल में ड्रग्स का काम करवाते हो।” इन्स्पैक्टर ने सख्त स्वर में कहा- फिर हवलदारों से कहा- "इन दोनों के साथ-साथ इनका सामान भी ले चलो। अब ये यहां, कहां आ पायेंगे। हथकड़ी डाल दो इन्हें ।”
***
जगमोहन और नगीना थाने के लॉकअप में बन्द थे। शाम के चार बज रहे थे। इन्स्पैक्टर ने हवलदार के हाथ, लॉकअप में ही लंच भिजवा दिया था। अभी तक उनसे न तो किसी तरह की पूछताछ की गई थी और न ही कोई रिपोर्ट वगैरह लिखी गई थी। यूं थाने में सामान्य हलचल थी। बातें करने वालों की मध्यम-सी आवाजें बराबर सुनाई दे रही थीं। बगल के लॉकअप में कोई शराबी बंद था। जो कि रह-रह कर नशे का झटका लगते ही,
चीखना-चिल्लाना शुरू कर देता था ।
शाम को पांच बजे उन्हें यहां लाने वाला इन्स्पैक्टर उनके पास आया ।
“मजे कर रहे हो।” इन्स्पैक्टर ने मुस्कराकर दोनों को देखा।
जगमोहन और नगीना ने उसे देखा। कहा कुछ नहीं।
“डेविड से तुम लोगों की क्या दुश्मनी है?” इन्स्पैक्टर पुनः बोला ।
“डेविड ?” जगमोहन की आंखें सिकुड़ीं ।
“हां। गोवा में तो जाना-पहचाना नाम है उसका ।" इन्स्पैक्टर के चेहरे पर छाई मुस्कराहट हट गई- “वो मेरे को पचास हजार रुपया देने को कह रहा था कि, तुम लोगों को पुलिस स्टेशन से बाहर निकाल दूं। मैं जानता हूं कि वो पचास हजार तुम दोनों को छुड़ाने के नहीं दे रहा। उसकी आवाज से ये बात तो जाहिर हो रही थी ।”
जगमोहन और नगीना की नजरें मिलीं।
“क्या दुश्मनी पाल ली डेविड से - ?”
“ ऐसी कोई बात नहीं कि तुम्हें बताने की जरूरत पड़े।" जगमोहन ने शांत स्वर में कहा ।
“जार्ज ने मुझे यही कहा था कि तुम लोगों ने डेविड से पंगा ले लिया है। होटल के बाहर वो और उसके आदमी तुम दोनों के बाहर निकलने का इन्तजार कर रहे हैं। इसलिये दिन भर के लिये तुम्हें थाने में रख लूं । "
“तुम जो भी जानना चाहते हो, जार्ज से पूछ लेना। वो जो ठीक समझेगा । तुम्हें बता देगा ।"
इन्स्पैक्टर होंठ सिकोड़े जगमोहन को देखने लगा । “ये काम करने के बदले तुमने जार्ज से क्या लिया ?"
"कुछ भी नहीं।" इन्स्पैक्टर ने मुंह बनाया- "वो मुझे कभी कुछ नहीं देता। अपना काम करवा लेता है। मैंने उसकी बहन से शादी कर रखी है। अब तो दो बच्चे भी हो गये। लेकिन तुम लोग सतर्क रहना। डेविड की आवाज से लग रहा था कि वो तुम लोगों को छोड़ने वाला नहीं।" इसके साथ ही इन्स्पेक्टर चला गया।
नगीना के होंठों पर शांत मुस्कान नाच उठी।
“गोवा से निकल गये तो डेविड का मामला यहीं खत्म हो जायेगा ।” नगीना बोली- “वो सिर्फ बंसीलाल के कहने पर काम कर रहा है। मेरे ख्याल से आज रात गोवा से निकल जायेंगे।"
“सब कुछ जार्ज के ऊपर निर्भर है कि इस काम में वो कितनी सतर्कता इस्तेमाल करता है।" जगमोहन ने कहा।
“जार्ज, सारे हालातों से वाकिफ है।” नगीना ने जगमोहन देखा- "मेरे ख्याल में वो सोच-समझ कर काम करेगा।”
“थापर भी अजीब-सी मुसीबत ले आया है, हमारे सामने। वो आया और हमारा चैन उड़ गया।"
जगमोहन के चेहरे के भाव देखकर नगीना के होंठों पर गहरी मुस्कान छा गई।
रात के ग्यारह बज रहे होंगे जब इन्स्पैक्टर उनके पास पहुंचा उसके चेहरे पर थकान स्पष्ट नजर आ रही थी। उसके हाव-भाव बता रहे थे कि अगर उसे नींद लेने का मौका मिला तो दस घंटे से पहले उठेगा नहीं।
“मैं तो आठ बजे ही घर चला जाता हूं। फिर सुबह ही आता नींद के बाद- ।" इन्स्पैक्टर ने गहरी सांस लेकर कहा- "आज तुम लोगों के कारण मुझे यहां पड़े रहना पड़ा। पुलिस स्टेशन के बहार डेविड के आदमी फैले हैं। तुम लोगों का इन्तजार है उन्हें । डेविड की एक लाख रुपये की ऑफर मुझ तक आ चुकी है कि तुम दोनों को जेल से बाहर निकाल दूं। कोई और वक्त होता तो मैंने उसकी बात पचास हजार में ही मान लेनी थी।”
“अब इसलिये नहीं मान रहे कि हमारे पीछे जार्ज है।" जगमोहन उठा।
“हां-1” कभी-कभी समझदारी की बात कर देते हो । इन्स्पैक्टर ने गहरी सांस ली- “जार्ज का फोन आया था अभी कि तुम दोनों को यहां से बाहर निकालकर, बिग फायर पर पहुंचा दूं- ।"
“बिग फायर - ?”
“हां। उस जगह को बिग फायर ही कहा जाता है। अंग्रेजो के जमाने में, पुर्तगालियों के खिलाफ, उस जगह पर छः दिन लगातार देश के जियालो ने उनसे टक्कर ली थी। अब उस जगह का नाम बिगड़ते-बगड़ते बिग फायर हो गया। पहले जाने क्या था। सुनो- अभी हवलदार आकर ये ताला खोलता है। तभी वहां लाईट चली जायेगी। वो ही हवलदार तुम लोगों को पुलिस स्टेशन के कम्पाऊण्ड में खड़ी जिप्सी तक ले जायेगा। तुम दोनों जिप्सी के फर्श पर लेट जाना सिर उठाकर बाहर झांकने की कोशिश मत करना । वरना मेरी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी। डेविड के आदमी बाहर हैं। समझदारी से काम लेना। इस काम के लिये सिर्फ डेढ़-दो मिनट मिलेंगे तुम दोनों को लाईट में ये काम बीस-पच्चीस सैकिण्ड से ज्यादा का नहीं है । "
“समझ गया।"
“फिर लाईट आ जायेगी। यूं समझो कि चालू कर दी जायेगी।" इन्स्पैक्टर समझाने वाले ढंग से कहे जा रहा था - "उसके बाद दस मिनट तक जिप्सी तक कोई नहीं आयेगा। ऐसा सिर्फ सावधानी के नाते किया जायेगा। देखने वालों को सब कुछ सामान्य लगेगा। फिर वो ही हवलदार अकेला आयेगा । जिप्सी में बैठेगा और ड्राइव करके तुम लोगों को भी जिप्सी के साथ बाहर लेता चला जायेगा। समझ गये ?”
"हां"
“जिप्सी थाने के बाहर भी निकल जाये तो बैठे रहना। मुसीबत का कभी पता नहीं चलता कि कब आ जाये।”
“अगर तुम अपना दिमाग, कानून के हक में लगाओ तो देश को कितना फायदा हो।” नगीना बोली ।
इन्स्पैक्टर ने नगीना को देखा फिर मुस्करा पड़ा।"
“अगर हम कुछ करके न दिखायें तो सरकार ये वर्दी उतार लेती है।” इन्स्पैक्टर कह उठा- “आसान नहीं है, इस वर्दी को पहन कर, संभाले रखना। काम करने पर ही वर्दी संभली रहती है। हवलदार भर्ती हुआ था। आज इन्स्पैक्टर हूं। यूं ही इन्स्पैक्टर की कुर्सी पर नहीं पहुंच गया। बहुत कुछ करना पड़ता है। बच्ची हो । नहीं समझ पाओगी, पुलिस वालों के काम को - ।"
जवाब में नगीना मुस्कराकर रह गई।
“हवलदार को भेजो कि लॉकअप का ताला खोले।" जगमोहन ने कहा - "वैसे तुम लोगों ने अपने बारे में नहीं बताया कि तुम लोग कौन हो, नाम और.... ।”
“जार्ज से ये बात नहीं पूछी ?"
"नहीं - ।"
"उससे पूछना। वो बता देगा।" जगमोहन ने सामान्य स्वर में कहा। इन्स्पैक्टर ने जगमोहन को घूरा फिर पलटकर, खामोशी से चला गया ।
***
सड़क के किनारे खड़े जगमोहन और नगीना पुलिस जिप्सी को तब तक देखते रहे, जब तक कि पुलिस जिप्सी नजरों से ओझल नहीं हो गई। सब ठीक रहा था। वो दोनों बिग फायर पर पहुंच गये थे । इन्स्पैक्टर ने उन्हें बहुत सावधानी और अच्छे तरीके से पुलिस स्टेशन से निकाला था।
“जार्ज ने अच्छा काम किया।" जगमोहन बोला ।
नगीना की नजरें अंधेरे में फिरने लगीं।
“जार्ज, खुद नजर नहीं आ रहा ।” नगीना ने कहा ।
जगमोन ने भी हर तरफ देखा ।
ये चौराहे जैसी जगह थी, लेकिन तंग सड़कें थीं। स्पष्ट था कि वो इस वक्त पुराने गोवा में थे। दूर फुटपाथ पर एक चाय वाला नजर आ रहा था। वहां दो-तीन लोग बैठे चाय पी रहे थे। पास में ही पान वाले का टूटा-फूटा सा खोका था। उसने मोमबत्ती जला रखी थी। बंद दुकानों में से किसी-किसी दुकान के बाहर बल्ब जल रहा था। वरना यहां तो स्ट्रीट लाईट भी गुम थी। इतनी देर में उनके सामने से अभी तक एक पुरानी सी कार निकली थी ।
“हमें सतर्क रहना चाहिये।" नगीना बोली- “जार्ज नजर नहीं आ रहा। उसे यहीं होना चाहिये। अगर वो यहां नहीं है तो समझो खतरा हमारे सिर पर है।"
“फिक्र मत करो भाभी।” जगमोहन का हाथ जेब में पड़ी रिवाल्वर पर जा पहुंचा-“मैं—।”
तभी उनके कानों में जूतों की मध्यम-सी आवाज पड़ी। दोनों फर्ती से पलटे। जगमोहन के हाथ में रिवाल्वर आ चुकी थी ! लेकिन दूसरे ही पल जिस्म में उठा तनाव ढीला पड़ता चला गया। अंधेरे में भी उसने स्पष्ट पहचाना। पास आने वाला जार्ज ही था। जो कि पीछे के गहरे अंधेरे से निकल कर उनके पास आ पहुंचा था।
“कौन है ये?” नगीना बोली ।
“जार्ज- ।"
करीब पहुंचकर जार्ज ठिठका।
“तुम दोनों को ठीक पाकर मुझे खुशी हुई।" जार्ज ने गम्भीर स्वर में कहा।
“अंधेरे में क्यों छिपे हुए थे?” जगमोहन ने रिवाल्वर जेब में डालते हुए पूछा ।
“ये देखने के लिये कि डेविड या उसके आदमी पीछे-पीछे तो नहीं आ गये।” जार्ज ने पहले जैसे स्वर में कहा- "मेरे ख्याल में सब ठीक है डेविड को नहीं पता कि तुम लोग यहां हो। "
“ ये सब तुम्हारी वजह से हुआ।"
“देवराज चौहान ने एक बार बचाया था मुझे। उसकी एवज में मैं ऐसा काम बीस बार भी कर सकूं तो कम हैं ।"
“मेरे ख्याल से दोबारा तुम्हें ऐसी तकलीफ उठाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।" जगमोहन ने गहरी सांस ली।
“जरूरत न ही पड़े तो अच्छा है। देवराज चौहान कहां है ?”
“वो दिन में ही मुम्बई चला गया है। काम खास आ गया था।" जगमोहन ने कहा- “मैंने ही लंच पर तुमसे मिलना था।”
“ये लड़की कौन है ? "
“इसके बारे में कोई सवाल मत पूछो जार्ज-।"
“अच्छी बात है।” कहते हुए जार्ज ने सिर हिलाया- "डेविड और उसके आदमी शिकारी कुत्तों की तरह तुम लोगों के पीछे हैं। डेविड मौका नहीं चूकना चाहता और बंसीलाल को दिखा देना चाहता है कि उसने उसके लिये कुछ किया है। ऐसे में अच्छा यही है कि तुम लोग फौरन गोवा से निकल जाओ। डेविड कभी भी जान सकता है कि तुम लोग पुलिस स्टेशन से निकल गये हो ।”
“हमारे यहां से निकलने का इन्तजाम कर दो जार्ज- ।”
“इन्तजाम हुआ पड़ा है। आओ।” कहने के साथ ही जार्ज पलट गया ।
जगमोहन और नगीना उसके पीछे चल पड़े।
जार्ज उन्हें लेकर एक गली में प्रवेश कर गया। गली ज्यादा चौड़ी नहीं थी। उनके चलने की मध्यम- सी आवाजें वहां गूंज रही थीं। गली के दोनों तरफ छोटे-छोटे मकान बने थे। जब गली समाप्त हुई तो सामने सड़क नजर आई। वहां से इक्का-दुक्का ट्रेफिक निकल रहा था । वैसे अंधेरा था ।
“वो सामने कार खड़ी है।" डेविड और उसके आदमी तुम दोनों को इसी रूप में पहचानेंगे। राधेश्याम असली रूप में भी तुम लोगों को पहचान सकता है। लेकिन उसके सामने पड़ने के चांसिस कम हैं। कार में तुम दोनों के लिये कपड़े हैं। मेकअप उतारकर चेंज कर लो। फिर इसी कार में मुम्बई निकल जाना। कार कहीं भी छोड़ देना। चोरी की है।
जगमोहन ने नगीना को देखा।
“भाभी! पहले तुम चेंज कर लो। मेकअप उतार लो।” नगीना बिना कुछ कहे कार की तरफ बढ़ गई। और उसने कार में बैठकर दरवाजा बंद कर लिया।
“तुम्हारा कोई भाई भी है?” जार्ज ने पूछा।
"क्यों?”
“तुमने इस लड़की को भाभी बोला ।” जार्ज ने अंधेरे में उसे देखा। जगमोहन के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई। “आदत है।”
“क्या?"
“भाभी बोलने की आदत है ।”
“मतलब कि तुम सब लड़कियों को भाभी बोलते हो।” जार्ज के स्वर में तीखापन आ गया।
“सब को नहीं, किसी-किसी को ।”
जार्ज ने अंधेरे में जगमोहन को घूरा फिर मुस्करा पड़ा। वो समझ गया कि जगमोहन बात को टाल रहा है। उसकी बात का स्पष्ट जवाब नहीं देना चाहता।
***
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