लियाकत अली ने अलार्म को फुल वॉल्यूम पर सेट करके मोबाइल को उस शख्स के कान के पास रख दिया, जो रजाई में मुँह छुपाये हुए इत्मीनान की नींद सो रहा था। अपनी उक्त हरकत का अंजाम देखने के लिए वे कमर पर हाथ रखे हुए वहीं खड़े रहे। करीब एक मिनट गुजरा और अलार्म ने जो चीखना शुरू किया तो रजाई में घुसे उस शख्स को उठाकर ही दम लिया।
“हद करते हो यार अब्बू!” नींद से बाहर आये शख्स ने रजाई से सिर निकालकर बुरा सा मुँह बनाया और अलार्म बंद करके फिर से रजाई घुसने का उपक्रम करने लगा लेकिन लियाकत ने इस बार पूरी रजाई ही उसके बदन से खींच ली।
“सुबह के नौ बज रहे हैं थानेदार साहब!” उन्होंने सेलफोन का डिस्प्ले बेटे की उनींदी आँखों आगे रखते हुए कहा।
“खुदा के लिए रहम कीजिए इस गरीब पर।” थानेदार साहब ने बेड पर चित्त लेटे हुए कहा- “रात भर पेट्रोलिंग करके आया हूँ। सुबह पाँच बजे तो बिस्तर की शक्ल देखी है।”
“हाँ तो चार घंटे हो गए न?” लियाकत ने लिहाफ़ समेटते हुए कहा- “बाकी के चार घंटे थाने में सो लेना।”
“कमाल है।” थानेदार साहब ने हैरानी से दीदे फाड़ी- “आपको एक एस.एच.ओ. की नौकरी में और किसी सरकारी दफ्तर के क्लर्क की नौकरी में कोई फर्क नहीं नजर आता?”
“हाँ, मालूम है कितने मेहनतकश हैं आप फाह्याज़ मियां। इलाके का क्राइम ग्राफ फ़र्ज़ के प्रति आपकी वफादारी का नंगा सबूत देता है।”
“आपसे बहस करने से अच्छा है मैं बिस्तर से ही उठ जाऊं। जब मुँह खुलता है आपका, ताने ही निकलते हैं।” फाह्याज़ ने चिढ़कर कहा और बिस्तर से उतरकर सीधा अटैच्ड बाथरूम की ओर बढ़ गया।
“फ्रेश होकर सीधे नाश्ते की टेबल पर आना।”
जवाब में फाह्याज़ ने कुछ कहने के बजाय बाथरूम का दरवाजा जोर से बंद करके आधी नींद से उठ जाने की एवज में आये गुस्से का इजहार किया। लियाकत बेटे की चिढ़ पर मुस्कुराकर कमरे से बाहर निकल गए।
करीब चालीस मिनट बाद यूनिफार्म में सजा-धजा फाह्याज़ जब डाइनिंग टेबल पर पहुँचा तो वहाँ लियाकत पहले से मौजूद थे।
“पुलिस स्टेशन के लिए निकल रहे हो?” उन्होंने भवें उंचकाई।
“हम्म!” एक कुर्सी पर तशरीफ़ टिकाते हुए और ब्रेड व बटर की प्लेटें अपनी ओर खींचते हुए उसने कहा- “इलाके के क्राइम ग्राफ की लम्बाई को छोटा करना है और आपको फ़र्ज़ के प्रति अपनी वफ़ादारी का सबूत भी तो देना है, वरना बाहर कुछ लोग हमें गद्दार तो कहते ही हैं, जल्द ही आप भी कहने लगेंगे।”
“दैट्स लाइक अ गुड बॉय।”
फाह्याज़ खामोश होकर ब्रेड की स्लाइस पर बटर लगाने लगा।
“हसन स्कूल गया?” थोड़ी देर बाद उसने पूछा।
“हाँ, बाप की तरह नौ बजे तक सोने वाला लड़का नहीं है। पाँच बजे ही उठ जाता है और मेरे साथ नमाज के लिए भी जाता है।”
फाह्याज़ ने आलू का पराठा उठाया और हर बाइट के साथ चाय की चुस्कियाँ लेने के इरादे से उसका रोल बनाने लगा।
“परफैक्टमैचडॉटकॉम पर मैंने कुछ लड़कियाँ देखी हैं।” लियाकत ने सेलफोन के डिस्प्ले पर उंगलियाँ फिराते हुए कहा।
“इस उम्र में शादी करेंगे आप?” फाह्याज़ ने चेहरे पर बनावटी हैरानी जाहिर की। चाय का कप उठाने के लिए आगे बढ़ा उसका हाथ भी रुक गया।
“मैंने तुम्हारे लिए देखी है इडियट।”
“लेकिन मैंने तो कह रखा है कि शादी को लेकर हमारे बीच कोई बात नहीं होगी।” फाह्याज़ ने पराठे का रोल प्लेट में रख दिया और बहस की मुद्रा अख्तियार किये हुए पिता पर नजर डाली- “बाकायदा डील हुई थी हमारे बीच।”
“जिद छोड़ दो फाह्याज़।” लियाकत ने जूस का गिलास खाली करके मेज पर रखा और संजीदा लहजे में कहा- “जिंदगी बहुत लम्बी है। अकेले काटनी मुश्किल है।”
“लेकिन आपने तो काट ली, बगैर दूसरी शादी किये।”
“वो सिचुएशन अलग थी। जब तुम्हारी अम्मी का इंतकाल हुआ, तुम बड़े हो गए थे, तुम्हारी दोनों बहनों की शादी भी हो चुकी थी।”
फाह्याज़ ने कुछ नहीं कहा और होंठ चबाते हुए पहलू बदलने लगा। जब उसके हाव-भाव से लियाकत को लगा कि वह टेबल से उठकर जाने ही वाला है तो वे उसके बगल वाली कुर्सी पर आकर बैठ गए और कंधे पर हाथ रखते हुए बोले- “हसन अभी केवल सात साल का है। शबनम के जाने के एक साल बाद भी वह लड़का नींद में अपनी माँ को ढूँढता है। तुम ट्वेंटी फोर सेवन की अपनी नौकरी की मशरूफियत में अपना गम तो गलत कर लेते हो लेकिन तुम्हारा बेटा अंदर ही अंदर घुटता रहता है। तुम खुद भी उसे वक्त नहीं दे पाते हो। कभी उसकी खामोशी को महसूस की है तुमने? तुम्हें याद भी है, तुम कितने महीने पहले उसे अम्यूजमेंट पार्क लेकर गए थे?”
“तो आपके सिर पर ये फितूर सवार हो गया है कि आप ऑनलाइन शॉपिंग के जरिये जिस पताका गुड्डी को बहु के रूप में लाएंगे, वह मेरी जिंदगी में, इन फैक्ट हसन की जिन्दगी में शबनम की कमी पूरी कर देगी?”
“ऑफ़कोर्स कर देगी।”
“इट्स एनफ अब्बू।” फाह्याज़ ने उकताकर कहा- “शादी जुए का खेल है। इस खेल में एक बार किस्मत ने मेरा साथ दिया था और मुझे शबनम जैसी बीवी मिली थी लेकिन हर बार किस्मत साथ देगी, जरूरी तो नहीं? मैं हसन को किसी सौतेली माँ के पल्ले नहीं बाँधने वाला हूँ। वह अभी जैसा है, वैसा ही ठीक है।”
“वह तुम्हें ठीक लगता है लेकिन ठीक है नहीं। कभी बैठो उसके पास तो तुम्हें पता लगेगा कि वह किस कदर आम लड़कों से अलग होता जा रहा है।”
“हाँ तो आप हैं न उसके साथ। क्यों नहीं बनाते उसे आम लड़कों के जैसा?”
“और जब मैं नहीं होऊंगा तब?”
“तब मैं उसे बोर्डिंग स्कूल में छोड़ दूंगा।”
“जब तुम एक छोटे बच्चे के लिए माँ की अहमियत समझते ही नहीं तो आगे तुमसे बात करना ही बेकार है।”
“जानते हैं तो फिर आज शादी नाम का ये शगूफा छेड़कर क्यों बैठ गये?”
इससे पहले कि लियाकत कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते, फाह्याज़ का फोन रिंग करने लगा। उसने कॉल अटेंड की और संक्षिप्त बातचीत के बाद गहरी साँस लेकर डिसकनेक्ट दी।
“मुँह क्यों लटक गया?” लियाकत ने पूछा।
“सब इंस्पेक्टर का फोन था। चेतना अपार्टमेंट के बी ब्लॉक की बिल्डिंग के एक फ्लैट में किसी के मरने की खबर है।” फाह्याज़ ने पराठे का रोल जल्दी-जल्दी मुँह में ठूँसते हुए कहा।
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हसीनाबाद, सन 1975।
पशुपति ने ओस से गीली उन घासों और जंगली पौधों पर नजर डाली, जो यूँ सूखे हुए थे जैसे लम्बे अरसे से कड़ी धूप में रहे हों जबकि इसके विपरीत आस-पास की घासें और पौधे सामान्यत: हरे-भरे थे। सुबह के आठ बज चुके थे लेकिन पिछली रात से ही वातावरण में काबिज कुहरे की सफ़ेद चादर अभी तक नहीं हटी थी। स्टेशन से आते वक्त बग्घी में जमुना की कही हुई बातें पशुपति के जेहन में ताजा थीं इसलिए उसने सूखी हुई घासों का अनुसरण करते हुए जब निगाहों का रुख सामने किया तो पाया कि घासों का वह सिलसिला जंगल के भीतर काफी दूर तक चला गया था और इस बात का सबूत पेश कर रहा था कि गुज़री हुई सर्द रात को वह रहस्यमय परछाईं वाकई उस इलाके में टहल रही थी। न जाने क्यों पशुपति की आँखों में एक बार फिर वही तीक्ष्ण चमक उभरी, जो तब उभरी थी, जब जमुना ने उसे पहली दफ़ा महल के बारे में बताया था।
कुछ देर तक वह उन घासों और पौधों को घूरता रहा तत्पश्चात ओवरकोट की जेब टटोलकर एक पुराना कागज़ बाहर निकाला, जिस पर अरबी के कुछ शब्द लिखे हुए थे और अँधकार की दुनिया से ताल्लुक रखने वाली अनगिनत रहस्यमयी आकृतियाँ खिंची हुई थीं। कागज़ का पीलापन उसके सैकड़ों साल पुराना होने की गवाही दे रहा था। पशुपति काफ़ी देर तक उन अरबी शब्दों और आकृतियों में खोया रहा इसके बाद उसने गहरी साँस लेकर चेहरा ऊपर उठाया और आस-पास देखकर ये सुनिश्चित किया कि किसी की निगाहों में तो नहीं है। जब आश्वस्त हो गया तो सूखी हुई घासों के साथ-साथ चल पड़ा।
तकरीबन एक घंटे की पदयात्रा के बाद वे घासें उसे जंगल से बाहर एक खुले स्थान पर लेकर पहुँची, जो तीन ओर पहाड़ों से और चौथे ओर उसी जंगल से घिरा हुआ था, जिसके छोर पर खड़ा पशुपति इस क्षण उसकी शून्यता को निरख रहा था। यूँ निरख रहा था जैसे उसकी सदियों पुरानी किसी तलाश का अंत अभी-अभी हुआ हो।
“मिल गया...।” आँखों में पूर्ववत् तीक्ष्ण और रहस्यमयी चमक लिए हुए उसने खुद से कहा- “आखिरकार मिल ही गया।”
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राजनगर, वर्तमान।
विनायक की वीभत्स लाश बैठक में पड़ी हुई थी। उसके बदन पर चाकू से काटे जाने के बेशुमार जख्म थे और कपड़े भी तार-तार व खून से सने हुए थे। लाश के इर्द-गिर्द लहू का तालाब बना हुआ था, जो अब सूख चला था। हत्यारे ने अपने शिकार के चेहरे को भी नहीं बख्शा था, आँखें तक निकाल ली थी उसकी और शरीर के उन हिस्सों के साथ भी दरिंदगी से पेश आया था, जिसे नाजुक अंगों की फेहरिस्त में शुमार किया जाता है। आला-ए-क़त्ल के तौर पर सब्जी काटने वाला रक्तरंजित चाकू करीब ही पड़ा हुआ था।
फाह्याज़ ने बैठक में चारों ओर निगाहें घुमाई और पाया कि वहाँ संघर्ष के कोई निशान नहीं थे, सिवाय इसके कि सेंटर टेबल और एक सोफ़ा अपनी जगह से खिसका हुआ था। पोर्टेबल लैंप भी जमीन पर पड़ा हुआ था, जो अभी तक जल रहा था लेकिन बेहद धीमा, शायद डिस्चार्ज होने की कगार पर था। सेलफोन सेण्टर टेबल पर था। फॉरेंसिक एक्सपर्ट अपने काम में जुटे हुए थे।
“ये अजीब नहीं है....।” फाह्याज़ ने एस.आई. सुबोध आचार्य से मुखातिब होकर कहा- “कि इस काम को सब्जी काटने वाले चाकू से अंजाम दिया गया? जबकि देखकर ऐसा लगता है कि मरने वाले को कसाई के छूरे से जिबह किया गया है।”
“फिलहाल तो बतौर वेपन हमारे सामने यही है सर। किचन में आधी कटी हुई सब्जी भी पड़ी हुई है। मरने वाले ने शायद ही सोचा रहा होगा कि जिस चाकू से वह सब्जियां काट रहा है, उसी चाकू से कुछ ही देर में उसे भी काट दिया जायेगा।”
“ये पोर्टेबल लैंप ऑन क्यों था? कल रात सोसाइटी की लाइट नहीं थी क्या?”
फाह्याज़ के सवाल की प्रतिक्रिया में सुबोध ने एक कांस्टेबल को कुछ इशारा किया। इशारा पाकर कांस्टेबल बाहर खड़े लोगों से इस बाबत पूछताछ करने चला गया।
“हत्या की खबर कैसे लगी?”
“दूधवाला आया था। उसी ने सबसे पहले ड्राइंग रूम में लाश देखी और शोर मचाकर सबको सूचना दी।”
“यानि कि दरवाजा अंदर से खुला हुआ था।” फाह्याज़ की नेत्र संकुचित हुए।
“दूधवाले ने अपने बयान में यही कहा है।”
फाह्याज़ ने दरवाजे पर एक नजर डाली और फिर टहलते हुए बाल्कनी की ओर बढ़ा। सुबोध भांप गया कि उसका सीनियर किस फ़िराक में है।
“फोर्स्ड एंट्री के कोई साइन नहीं हैं।” उसने कहा- “और न ही कोई सामान गायब लगता है। सब कुछ एज इट इज है।”
“सोसाइटी में लगे सारे कैमरों की फुटेज निकलवाओ।”
“इस काम के लिए पहले ही एक आदमी को भेज रखा है।”
“और पड़ोसियों के बयान?”
“कुछ के लिए हैं।” सुबोध ने सेलफोन बाहर निकाला- “सुनेंगे?”
“समराइज कीजिए, जरूरत महसूस हुई तो सुन लूंगा।”
“मकतूल का नाम विनायक शुक्ला है। सिंगल था। ‘राजर्षि हायर सेकेंडरी
स्कूल’ में क्लर्क था। सोशल नहीं था सो लोगों से बहुत ज्यादा कांटेक्ट नहीं रखता था। किसी से लड़ाई-झगड़ा या झड़प छोडिए, मामूली बातचीत के अलावा सोसाइटी में किसी से इसका कोई राबता भी नहीं था। वर्कप्लेस और फॅमिली मैटर की बाबत अभी कोई जानकारी हमारे पास नहीं है। अलग-बगल के लोगों ने कल रात ऐसा कोई संकेत नहीं भाँपा था, जिससे उन्हें एहसास हो पाता कि पड़ोस के फ्लैट में कोई हलचल हो रही है। दूधवाले के आने तक किसी को नहीं पता था कि विनायक इज नो मोर।”
“कुछ चोरी नहीं हुआ है, फोर्स्ड एंट्री का कोई साइन नहीं है, स्ट्रगल के कोई निशान नहीं, दरवाजा खुला हुआ था, क़त्ल वहशियाना तरीके से हुआ है, साधारण चाकू से हुआ है।” फाह्याज़ अपनी धुन में बड़बड़ाता हुआ बोला- “कौन कर सकता है?”
“रंजिश या किसी दूसरे मोटिव के तहत क़त्ल की तमाम वारदातें होती हैं लेकिन ऐसी वीभत्सता और ऐसा तरीका शायद ही देखने में आता है।”
“पर अब हमारे देखने में आ गया है तो देखना तो होगा ही न आचार्य जी।” फाह्याज़ ने काम पर लगे फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट पर दृष्टिपात करते हुए कहा- “रिपोर्ट्स आने तक शुक्ला जी की कुण्डली निकालिए, फिर देखते हैं।”
“श्योर सर।”
सहसा फाह्याज़ लाश में कुछ नोटिस करके ठिठका तत्पश्चात सुबोध की ओर अपनी हथेली फैला दी।
प्रतिक्रिया में सुबोध ने जेब से लेटेक्स ग्लव्स निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया। फाह्याज़ ने उसे हाथ पर चढ़ाया और लाश के पास पाँव के पंजों के बल बैठ गया। हालाँकि शर्ट के चिथड़े हो चुके थे लेकिन फिर भी हत्प्राण के सीने पर उसे जो नजर आया था, उसे पूरा देखने के लिए वहाँ मौजूद शर्ट के हिस्से को इधर-उधर खिसकाना पड़ा। और फिर जो कुछ नजर आया, उसने फाह्याज़ के साथ-साथ उसके मातहत को भी ये एहसास करा दिया कि मामला आम क़त्ल से अलग था।
“व्हाट द हेल इज दिस?” सुबोध ने आँखों में हैरत लिए हुए बुरा सा मुँह बनाया। लाश के सीने पर जख्म की शक्ल में एक अजीब सा निशान बना हुआ था, जिस पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।

“टैटू तो नहीं लग रहा है।” फाह्याज़ उस निशाननुमा जख्म का बारीक निगाहों से मुआयना करता हुआ बोला- “हत्यारे ने ही अपने सिगिल के तौर पर ये ठप्पा लगाया है क्योंकि चाकू से ये निशान इतनी नफासत से बनने से तो रहे।”
“हाँ मैंने भी एक बार गाँव के मेले में एक रुपया देकर हथेली पर मेंहदी का ठप्पा लगवाया था।”
सुबोध के उदाहरण पर फाह्याज़ ने उसे घूरा।
“मेरा मतलब है कि ये देखकर उसी की याद आ गयी।”
“हाँ वैसा ही।” फाह्याज़ ने सहमति में सिर हिलाया और फिर सेलफोन निकालकर उस निशान की कई फोटो क्लिक कर डाली।
“ये किसी कल्ट का मेम्बर तो नहीं था?”
“जरूर रहा हो सकता है क्योंकि जो ऊपर से शांत नजर आते हैं, जाहिर तौर पर किसी से संपर्क नहीं रखते हैं, वो अक्सर अपने अंदर गहरे राज़ समेटे होते हैं।”
बिजली गुल होने से सम्बंधित तफ्तीश करने गया कांस्टेबल लौटा तो सुबोध ने उस पर सवालिया निगाह डाली।
“सोसाइटी की बिजली बराबर थी सर।”
कांस्टेबल का जवाब सुनकर फाह्याज़ की निगाहें बरबस ही फ्लैट के दरवाजे के पास दीवार में बने छोटे से चैम्बर पर चली गयीं, जहाँ एमसीबी इन्स्टाल्ड था और जिसके दरवाजे पर ताला था।
“इन्हें ताकीद कर देना....।” उसने काम में लगे फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट्स की ओर संकेत करते हुए कहा- “कि एमसीबी बॉक्स के पास ट्रेसेज मिल सकते हैं।”
“श्योर सर।”
“काम ख़त्म करके लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाइए।”
सुबोध ने सहमति में सिर हिलाया और बाकी की औपचारिकताओं को पूरा करने में मशरूफ हो गया।
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कामरान ने दरवाजे को बंद किया और उससे पीठ टिकाकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा। उसकी विफलता उसके चेहरे के जर्रे-जर्रे पर इबारत की शक्ल में लिखी हुई दिखाई दे रही थी। वह अभी-अभी राजनगर से इस मालूमात के साथ लौटा था कि विनायक शुक्ला अब इस दुनिया में नहीं था। वह उसे चाहकर भी नहीं बचा पाया था, इसीलिए इस अफ़सोस के साथ वह काफी देर तक दरवाजे से लगा खड़ा रहा कि अगर विनायक की पिछली रात सकुशल गुजर गयी होती और आज उससे उसकी मुलाक़ात हो जाती तो वह उसे ये यकीन दिलाने में कामयाब हो जाता कि उसके साथ कुछ अनहोनी होने वाली है। तब शायद आने वाले दिनों की तस्वीर कुछ और होती लेकिन कामरान ये नहीं जानता था कि विनायक बगैर मुलाकात के ही उसकी बातों पर यकीन करने लगा था। ये बात जुदा थी कि कोशिशों के बावजूद वह अपनी मौत को टाल नहीं पाया था।
“पहली बार मुझे मौक़ा मिला था लेकिन मैंने गँवा दिया।” वह बेचैन लहजे में बड़बड़ाते हुए कमरे में इधर-उधर विचरने लगा- “मैं अपने शाप से हार गया। मैं ही वजह हूँ इन मौतों की। ना मैं चित्रकार होता, ना कुछ बदनसीब लोगों की शक्लें बनाता और ना ही वो समय से पहले मरते।”
वह दोनों कुहनी स्टडी टेबल पर टिकाकर, सिर थामकर बैठ गया। काफी देर तक उसी अवस्था में बैठा रहा लेकिन इस अपराधबोध से उबर नहीं पाया कि विनायक की मौत उसके कारण हुई है। इस बीच किसी क्लाइंट की कॉल भी आयी लेकिन उसने अटेंड नहीं की। जब लम्बा वक्त गुजर गया तो वह उस ईजल की ओर बढ़ा, जिस पर दस दिन पहले बनाई हुई विनायक की तस्वीर अभी भी लगी हुई थी। उसने तस्वीर को उतारा, रोल किया और उस जगह पर रख दिया, जहाँ पहले से ही कई पेंटिंग्स रोल करके रखी हुई थीं।
“क्या करूँ मैं?” कामरान पर बेचैनी फिर से तारी हो गयी- “कैसे पीछा छुडाऊँ इस मनहूसियत से?”
सवाल कई थे लेकिन जवाब किसी का नहीं था उसके पास।
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हसीनाबाद, सन 1975।
जब जमुना पशुपति के कमरे की चौखट पर पहुँचकर थमा तो वह एक लिफ़ाफ़े को बंद कर रहा था। ‘रूपांतरण’ मेज पर रखा हुआ था।
“आपने बुलाया था साहब?” जमुना ने पूछा।
“इस लिफ़ाफ़े को पोस्ट कर दीजिए।” पशुपति ने जमुना की ओर देखे बगैर कहा।
जमुना भीतर दाखिल हुआ और लिफ़ाफ़े को थामने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया मगर पशुपति ने उसे तुरंत लिफ़ाफ़ा नहीं थमाया। लिफ़ाफ़े को सील करने के बाद कई दफे उसे घुमा-फ़िराकर देखा और जब इस बात के प्रति आश्वस्त हो गया कि बगैर उसे खोले उसमें मौजूद ख़त की झलक तक नहीं पायी जा सकती तो उसे जमुना की ओर बढ़ा दिया।
“ध्यान रहे..।” उसने कठोर मुखाकृति लिए हुए सख्त लहजे में कहा- “किसी भी सूरत में ये खुलना नहीं चाहिए। पोस्ट होने तक अपनी जान से भी बढ़कर
इसकी हिफ़ाजत कीजिएगा।”
पशुपति का बदला हुआ तेवर देख जमुना थोड़ा हकबकाया। मन में ये ख्याल भी आया कि ख़त अगर इतना ही गोपनीय है तो सामने वाला उसे खुद पोस्ट करने क्यों नहीं चला जाता लेकिन प्रत्यक्ष में उसने सेवक सुलभ शालीनता के साथ ‘जी साहब’ कहकर लिफ़ाफ़ा थाम लिया।
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उस इंसान की उम्र पचास साल से अधिक थी, जो सिटी मोर्ग हाउस के सामने खड़ा होकर साइनबोर्ड पर लिखे हर्फों को पढ़ रहा था। उसने घुटनों तक लटकता सफ़ेद कुर्ता और पायजामा पहन रखा था। उसकी मूंछ सफाचट थी और सफ़ेद दाढ़ी गले तक लटक रही थी। उसके चेहरे पर काबिज सख्ती के कारण न्यून आत्मविश्वास वाला इंसान शायद ही बिना हकलाये उससे बात कर सकता था। उसके माथे पर एक निशान था, जो पाँचों वक्त का नियमित नमाज अदा करने वाले मोमिनों को स्वत: ही हासिल हो जाता है। उसके हाव-भाव में एक अजनबियत थी। मोर्ग के साइनबोर्ड को निरखते हुए वह देश-दुनिया से बेखबर हो गया मालूम पड़ता था। कुछ देर तक वह उसी अवस्था में खड़ा रहा और फिर दाढ़ी सहलाता हुआ मोर्ग के एंट्रेंस की ओर बढ़ गया।
अंदर पहुँचकर वह थमा। किस दिशा में जाना चाहिए; ये निर्धारित करने के लिए इधर-उधर देखने लगा।
“क्या काम है मियाँ?”
आदमी की गर्दन उस दिशा में घूम गयी, जिस दिशा से उपर्युक्त सवाल आया था। सवाल करने वाला लापरवाह सा दिखने वाला एक गार्ड था, जो दांतों तले खैनी दबाए हुए था। मोर्ग में दाखिल हुआ आदमी उसके सवाल का जवाब देने के बजाय उसे ध्यान से घूरता रहा।
“आपसे ही पूछ रहे हैं साहब, कोई बॉडी क्लेम करने के लिए आये हैं?”
“एक मरहूम के बारे में पूछताछ करनी है।” आदमी ने सर्द लहजे में कहा।
उसकी आवाज और भाव-भंगिमाओं को देख आदमी सशंकित हुआ, अपनी जगह से उठकर उसके करीब पहुँचा।
“मरने वाले के क्या लगते हैं आप?” उसने दोनों हाथ कमर पर टिकाते हुए पूछा।
“कुछ नहीं।” बूढ़े ने भावहीन उत्तर दिया।
“फिर वास्ता क्या है उस मरहूम से?”
“वास्ता है।” इस बार बूढ़े का लहजा पत्थर की भांति सख्त था- “क्या है, ये
तुम नहीं समझोगे।”
“लाश किस मामले में यहाँ लाई गयी है?”
“तुम लोगों ने उसके मामले को क़त्ल के मामलों में दर्ज किया होगा।” इस जवाब ने गार्ड को और भी आशंकित कर दिया जबकि बूढ़े ने आगे कहा- “उसका जिस्म चाकुओं से छलनी होगा। बहुत दर्द झेलने के बाद इस दुनिया से रुख्सत हुआ होगा।”
“आयी है।” गार्ड ने एकदम से मुँह खोला- “दो घंटे पहले ही आयी है। चेतना अपार्टमेंट में क़त्ल हुआ है उसका। अब पूछिए, क्या पूछना है?”
खामोश होने के बाद गार्ड ने अपनी निगाहें बूढ़े के नूरानी चेहरे पर टिका दीं। बूढ़ा पहले उसे घूरता रहा, फिर बोला- “उस लाश को देखना है हमें।”
“ऐसा कैसे हो सकता है मियाँ? क़त्ल का मामला है। ऊपर से मरने वाले के साथ आपका कोई वास्ता भी नहीं है।”
“उस मुर्दे से वास्ता नहीं है...।” बूढ़े ने दांत पर दांत जमाते हुए सर्द लहजे में कहा- “लेकिन उससे जुड़े कई मामलात में हमारी दखल है। हमें देखने दो उसे वरना कुछ ऐसा होगा, जो तुमने या किसी और ने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा होगा।”
“आप...आप हैं कौन?” इस बार गार्ड हकलाये बिना नहीं रह सका।
जवाब में बूढ़े ने कुछ नहीं कहा, बस उसे घूरता रहा। उसकी भूरी आँखों में ऐसे अजनबी भाव थे कि गार्ड को अपना हलक शुष्क होता महसूस होने लगा।
“कोई पीर फ़कीर तो नहीं हैं?” कुछ देर बाद उसने नए ढंग से पुराना सवाल दोहराया।
बूढ़े ने गर्दन को हल्की सी जुम्बिश दी और पलकों को धीरे से झपकाया। उसका जवाब ‘नहीं’ था।
गार्ड फिर से तरद्दुद में दिखाई देने लगा।
“कहाँ रखे जाते हैं मुर्दे?” बूढ़े ने पूछा।
“देखिए....आप ऊपर से कुछ लिखवाकर लाइए, ये मेरे अख्तियार से बाहर की बात है।”
“ऊपर जाने की सीढ़ी कहाँ है?” बूढ़े ने इधर-उधर निगाहें घुमाईं।
“मेरा मतलब है कि इस मामले से जुड़े किसी साहब से परमिशन लेकर आइए।”
“जैसे?” बूढ़े के नेत्र संकुचित हुए।
“जैसे कि तहकीकात कर रहे पुलिस इंस्पेक्टर।”
बूढ़े ने कुछ नहीं कहा। उसकी निगाहें गार्ड के चेहरे पर जमी रहीं।
“या फिर आप पोस्टमार्टम तक रुक जाएँ। रिपोर्ट तैयार हो जाने के बाद मैं लाश परिजनों को सौंपे जाने से पहले आपको सूचित कर दूंगा, आप जी भरकर देख लीजिएगा। इससे ज्यादा मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकता।”
“हमें फ़र्ज़ के प्रति ईमानदार लोग बेहद पसंद हैं मगर हमारा यकीन करो, हम ऐसी किसी भी हरकत को अंजाम नहीं देंगे, जो तुम्हारी नौकरी के जाने का सबब बन सके।”
“आप...आप पोस्टमार्टम तक रुक क्यों नहीं सकते?”
“तब तक देर हो चुकी होगी।”
“तो फिर आप इजाजत क्यों नहीं लेकर आते?”
“कुछ राज़ परदे के पीछे रहते हैं तो ही अच्छे लगते हैं।” यकायक बूढ़े का लहजा रहस्यमयी हो गया- “बाहर आने पर खौफ़ और दहशत की वजह बन जाते हैं।”
गार्ड मुट्ठियाँ खोलने बंद करने लगा, होंठ चबाते हुए इधर-उधर देखने लगा।
“मुर्दे कहाँ रखे जाते हैं?”
बूढ़े के सवाल से उसकी तन्द्रा भंग हुई।
“आ...आइए...मेरे साथ।” गार्ड ने राहदारी की ओर इशारा करते हुए कहा।
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