पावली ने सुन्हा के साथ झोंपड़े में प्रवेश किया।
मोना चौधरी कुर्सी पर आराम से बैठी थी। दूसरी कुर्सी पर बैठी बेरी कुछ काम कर रही थी। वो पावली को देखते ही फौरन खड़ी हो गई। आदर भाव से हौले से सिर हिलाया।
मोना चौधरी की निगाह पावली पर पड़ी तो होंठ सिकुड़े फिर गहरी सांस लेकर कह उठी।
“हैलो। मैं यहां जानवरों में फंस गई हूं। मुझे आशा नहीं थी कि इधर कोई इंसान मिलेगा। लेकिन तुम मिल गए। अफीम खरीदने आए होंगे। जो भी करो। लेकिन मुझे यहां से निकाल सको तो बहुत मेहरबानी होगी। इस जंगल से मैं बाहर निकलना चाहती हूं। जाते वक्त मुझे भी साथ ले...।”
“जानती हो तुम किससे बात कर रही हो।” सुन्हा ने टोका।
“किससे?”
“ये हमारी बस्ती का सरदार है।”
“पावली?” मोना चौधरी के होंठों से हैरानी भरा स्वर निकला।
“हां।”
“असम्भव।” मोना चौधरी के होंठों से निकला –वो खड़ी हो गई –“ये इस बस्ती का सरदार नहीं हो सकता। ये तो शहरी है। यहां का नहीं।”
“मैंने बरसों दिल्ली में रहकर पढ़ाई की है।” पावली ने शांत स्वर में कहा –“एम.ए. किया है। विकास पुरी में मेरा बंगला है। तुम समझ सकती हो कि मैं किस स्थिति में यहां खड़ा हूं।”
“मुझे विश्वास नहीं आ रहा तुम्हारी बात पर।”
पावली खामोश रहा।
सुन्हा अजीब-सी नजरों से पावली को देखने लगा। जैसा उसने पावली को देखा था। आज वो वैसा नहीं लग रहा था। बकम से भी अजीब सी बातें की और अब मोना चौधरी से भी बेहद सामान्य ढंग से बात कर रहा था।
“तुम कहां रहती हो?” पावली ने पूछा।
“दिल्ली।”
“ओह।” पावली मुस्कराया –“मैंने दिल्ली बहुत देखी है। वहां सब कुछ मुझे बहुत अच्छा लगता है। सड़कों पर दौड़ती कारें। रात को चमकती लाइटें। अच्छे-अच्छे लोग। खाने को कितना अच्छा मिलता है।”
मोना चौधरी उसे गहरी निगाहों से देखने लगी थी।
“ऐसी बात है तो फिर वापस क्यों आ गए। वहीं क्यों नहीं रह गए?”
“आना पड़ा। कबीले की सरदारी हासिल करने के लिए मैं पढ़ने दिल्ली गया था। यहां भी तो आना था। कबीले के रीति-रिवाजों को मैं नहीं छोड़ सकता। मेरे मां-बाप यहां है।” पावली ने कहा और आगे बढ़कर कुर्सी पर बैठकर सिगरेट सुलगा ली –“मैं तुम्हें अपने पास बुलाकर बात कर सकता था। लेकिन मैं खुद आया। शायद ये दिल्ली रहने का ही असर है कि मैं इंसान को इंसान समझने लगा हूं।”
मोना चौधरी के चेहरे पर व्यंग्य के भाव उभरे।
“इंसान को इंसान समझते हो तुम और बाहरी लोग यहां आ जाएं तो उनकी जान ले ली जाती है। अफीम की पैदावार का काम करते हो, जिसके नशे से लोग बरबाद...।”
“ठीक कहती हो तुम।” पावली कह उठा –“लेकिन बीते डेढ़ बरस से, जब से मैं यहां का सरदार बना हूं, किसी की जान नहीं ली गई कि कोई हमारी बस्ती में आ गया। हमारी दुश्मनी सिर्फ काकू तक ही सीमित होकर रह गई है।”
“काकू –ये कौन है?”
“यहां से दूर, हमारी ही तरह की बस्ती है। वो लोग भी अफीम की पैदावार करते हैं। अफीम के खरीददारों को लेकर उनके और हमारे बीच झगड़ा रहता है। लेकिन अब मैं उस झगड़े को भी खत्म करना शुरू कर रहा हूं।”
“वो कैसे?”
“काकू का साला, रात बस्ती के आदमियों के हाथ पड़ गया। बस्ती के पुराने रिवाजों के मुताबिक चलें तो उसकी जान ले ली जाएगी। परन्तु मैं उसे छोड़ दूंगा। शायद इस बात का प्रभाव काकू पर पड़े और वो भी दुश्मनी छोड़ दे।”
“ऐसा क्यों कर रहे हो तुम?”
“मैं चाहता हूं कि मेरी बस्ती वाले जंगल में पैदा होकर, यहीं अपनी जिन्दगी खत्म न करें। शहरों में रहें। वहां पढ़ें और दुनिया को समझे। अच्छे इंसान बने। यहां हम सदियों से गलत जिन्दगी गुजार रहे हैं।”
सुन्हा गम्भीर निगाहों से, पावली को देख रहा था।
“सरदार।” सुन्हा धीमे स्वर में बोला –“बस्ती के बड़े आपकी बात नहीं मानेंगे।”
“मैं सरदार हूं। उन्हें मेरी बात माननी पड़ेगी।”
“वो पुराने रीति-रिवाजों को नहीं छोड़ेंगे।” सुन्हा गम्भीर था।
“गलत रिवाज छोड़ने पड़ेंगे। अगर उन्हें मेरी बात समझ नहीं आई तो, मैं यहां से चला जाऊंगा। लेकिन कोशिश करूंगा कि बस्ती वालों को अपनी बात समझा सकूं। उन्हें अच्छे-बुरे का एहसास करा सकूं।” पावली ने गम्भीर स्वर में कहा –“मैं तो ये कोशिश भी करूंगा कि काकू की बस्ती को भी ये सब करने को तैयार कर सकूँ।”
“असम्भव है ये। काकू तो ये बात...।”
“मत माने। लेकिन कोशिश मैं अवश्य करूंगा सुन्हा।”
सुन्हा पावली को देखता रहा फिर कह उठा।
“डेढ़ बरस से आप सरदार बने हैं। पहले तो ये बात नहीं कही। अब...।”
“कभी इन बातों का मौका नहीं मिला। अब इसलिए मौका मिल गया कि बकम पकड़ा गया। मोना चौधरी बस्ती में आ फंसी। पुराने रिवाजों के मुताबिक मुझे इनकी हत्या का आदेश देना है। जो कि नहीं दूंगा। यानी कि इन बातों के लिए खुलकर सामने आने का मौका मुझे अब मिला है।”
सुन्हा ने कुछ नहीं कहा।
“तुम मेरे साथ आओ।” पावली ने मोना चौधरी से कहा –“पहले की तरह अब बस्ती में आने वाले बाहरी लोगों की हत्या नहीं की जाएगी। बस्ती वालों ने अगर मेरी बात नहीं मानी तो मैं ये बस्ती छोड़कर चला जाऊंगा।”
कोई कुछ न बोला।
“गौरी को मेरे झोंपड़े में भेजो सुन्हा।”
“जी।”
“आओ।”
पावली, मोना चौधरी के साथ सुन्हा के झोंपड़े से निकला और अपने झोंपड़े में पहुंचा।
“बैठो मोना चौधरी।” पावली खुद भी बैठता हुआ शांत स्वर में बोला –“बताओ मुझे कि तुम यहां कैसे पहुंची? तुम तो उस विमान में थी जो आसमान में विस्फोट में टुकड़े-टुकड़े हो गया था। क्या हुआ था –तुम्हारे साथ?”
सब कुछ सुना पावली ने।
मोना चौधरी ने बिना कुछ छिपाये सब कुछ बता दिया था।
“किस्मत वाली निकली तुम जो बच गई।” पावली ने सिर हिलाया –“लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि तुम क्या काम करती हो।”
“बाद में समझ लेना अभी जल्दी क्या है?”
पावली ने कुछ न कहकर सिगरेट सुलगाई फिर सोच भरे स्वर में कह उठा।
“उधर पैराशूट से जो दो लोग उतरे। उनमें से एक तुम्हारा साथी है?”
“हां। वो मुझे कैसे मिल पाएगा?”
“मालूम नहीं। उधर काकू की बस्ती है। बाहर वालों को वो भी जिन्दा नहीं छोड़ते। उसे काकू की बस्ती वालों ने पकड़ लिया होगा।” पावली ने गम्भीर स्वर में कहा।
कुछ देर उनके बीच खामोशी रही।
मोना चौधरी ही बोली।
“तुमने बताया कि काकू का साला तुम्हारी पकड़ में है। तुम उसे छोड़ने वाले हो।”
“हां।”
“अगर चाहो तो उसे छोड़ने के बदले, मेरे साथी को वापस मांग सकते हो।” मोना चौधरी ने कहा।
“ठीक कहती हो। ऐसा हो सकता है, लेकिन ऐसा मैं करूंगा नहीं।” पावली ने इंकार में सिर हिलाया।
“क्यों?”
“मैं काकू की बस्ती से दुश्मनी खत्म करना चाहता हूं। सौदेबाजी नहीं करना चाहता। तभी तो बकम को बिना किसी शर्त रिहा करूंगा कि उससे शायद काकू को कुछ समझ आ...।”
“उधर अगर उन्होंने मेरे साथी को मार दिया तो?” मोना चौधरी का स्वर सख्त हो गया।
पावली ने उसे देखा।
“तुम अपनी शराफत की बुनियाद मेरे साथी की लाश पर रखने जा रहे हो। ये गलत है। अच्छा बनना चाहते हो तो अच्छे बनो। एक के लिए नहीं, सबके लिए अच्छे बनो।” मोना चौधरी अपने शब्दों पर जोर देते कह उठी –“बकम को जिन्दा छोड़कर अच्छा कर रहे हो, लेकिन काकू की कैद में मौजूद मेरे साथी को मरने के लिए छोड़कर और भी बुरा कर रहे हो। क्योंकि तुम उसे बचा सकते हो।”
पावली व्याकुलता भरे अंदाज में जल्दी-जल्दी कश लेने लगा। वो बहुत बेचैन नजर आ रहा था। रह-रहकर परेशानी से, मोना चौधरी को भी देख लेता।
मोना चौधरी होंठ भींचे उसे देख रही थी।
“अब क्या हो गया है तुम्हें?” मोना चौधरी बोली।
“तुम जो कह रही हो, ठीक कह रही हो।” पावली परेशानी से बोला –“मैं जो करना चाहता हूं, बस्ती वालों के लिए, वो राह आसान नहीं है। ऐसी परेशानियां रह-रहकर मेरे सामने आएंगी।”
“तुम अच्छा काम करने जा रहे हो। ऐसे में तुम्हें परेशानियों से डरना नहीं चाहिए।”
तभी झोंपड़े के बाहर आहट हुई और सुन्हा ने गौरी के साथ भीतर प्रवेश किया।
गौरी की उम्र बीस बरस थी। वो कबीले वालों से बिल्कुल जुदा थी। गोरा रंग। खूबसूरत नैन-नक्श। यहां की औरतों के हिसाब से भी लम्बी। उसके गोरे रंग की वजह से ही उसका नाम बचपन में गौरी रख दिया गया था। चूंकि वो बस्ती की सबसे खूबसूरत लड़की थी। इसलिए उसका ब्याह पावली से होने जा रहा था।
गौरी ने शरीर पर साफ-सुथरा लहंगा-चोली पहन रखा था।
जाने क्यों यहां आकर वो दबी-दबी सी, सहमी सी लग रही थी।
पावली मुस्कराया।
“कैसी हो गौरी?”
“ठी...ठीक हूं।” वो सिर हिलाकर कह उठी। नजरें न मिलाई।
“तेरा-मेरा ब्याह होने वाला है।”
गौरी कुछ न बोली।
“करेगी मेरे साथ ब्याह?” पावली ने उसी लहजे में पूछा।
गौरी खामोश रही।
सुन्हा कह उठा।
“जवाब क्यों नहीं देती। सरदार तेरे से क्या पूछ रहे हैं।”
गौरी की निगाहें झुकी रही। कहा फिर भी कुछ नहीं।
पावली ने मुस्करा कर नई सिगरेट सुलगाई और हौले से हंसकर बोला।
“रतिया से ब्याह करना चाहती है।”
गौरी ने चौंककर पावली को देखा। चेहरे पर घबराहट नाच उठी थी।
“घबरा मत। मैं जानता हूं तू रतिया से छिपकर मिलती है। बहुत पहले से पता है मुझे। लेकिन तेरे मुंह से सुनना है।”
गौरी ने पुनः नजरें झुका ली।
“रतिया से प्यार है तेरे को?” पावली ने पूछा।
“हां सरदार। मैं माफी चाहती हूं कि...।”
“प्यार किसी से भी हो जाता है। ये कोई गलत बात नहीं है। शादी करेगी रतिया से?”
“हां। अगर सरदार की इजाजत हो तो।” गौरी धीमे स्वर में बोली।
“मेरी इजाजत है। तैयारी कर। रतिया को भी बोल दे। ब्याह करो दोनों। पूरी बस्ती में हंगामा होगा। खुशी होगी।”
गौरी हैरानी से, पावली को देखने लगी।
“हैरान हो रही है।” पावली हौले से हंसा।
“हां सरदार। मैं तो सोच रही थी कि मुझे और रतिया को सजा मिलेगी और...।”
“कोई सजा नहीं देगा तुम्हें। मैं सरदार हूं बस्ती का। मेरा हुक्म चलेगा। जा ब्याह की तैयारी कर।”
गौरी का चेहरा खिल उठा। वो खुशी-खुशी पलटी और बाहर निकल गई।
सुन्हा गम्भीर स्वर में कह उठा।
“सरदार पावली आपका फैसला किसी को पसन्द नहीं आएगा।”
“मैं सरदार हूं। मेरा फैसला ही अन्तिम होगा।” पावली ने उसे देखा।
“माना कि आप सरदार हैं, लेकिन बस्ती वालों की निगाह में आप हर फैसला गलत करने जा रहे हैं। गौरी का रतिया के साथ ब्याह की इजाजत देना। काकू के साले बकम को जिन्दा छोड़ देने की सोचना। ये बाहरी मोना चौधरी को मौत की सजा न देकर, मेहमानों की तरह व्यवहार करना। बस्ती के बड़ों को पसन्द नहीं आएगा।”
“सरदार होने के नाते मुझे हर तरह का फैसला करने का अधिकार है। किसी को फैसला पसन्द नहीं आया तो वो मुझसे बात कर लेगा। मुझे सरदार बनने का लोभ नहीं है। बस्ती के बड़ों ने मेरी बातें नहीं मानी तो मैं सरदारी छोड़ दूंगा।”
सुन्हा खामोश रहा। चेहरे पर गम्भीरता थी।
“बकम को देखो, वो क्या कर रहा है। फुर्सत पा ले तो उसे मेरे पास ले आना।”
सुन्हा चला गया।
पावली व्याकुलता से कश लेने लगा।
मोना चौधरी की सोच भरी निगाह उस पर थी।
“तुमने मेरे साथी के बारे में क्या सोचा, जो काकू के पास कैद है। उसे कैसे बचाओगे?”
“मालूम नहीं। उसे बचाने का कोई रास्ता सोच रहा हूं।”
“बकम के बदले काकू से मेरे साथी नीलू महाजन को मांग लो।”
पावली ने मोना चौधरी को देखा।
“मुझे खुद नहीं पता मैं क्या करूंगा। लेकिन उसे बचाने की कोशिश करूंगा।” पावली होंठ भींचे कह उठा।
“तुम यहां बैठे बातें कर रहे हो। उधर काकू की बस्ती वालों ने महाजन को मार दिया तो?”
“हो सकता है, अब तक उसे खत्म भी कर दिया हो। कुछ भी हो सकता है।” पावली ने मोना चौधरी को देखा –“ये काम आसान नहीं है। शहरों की तरह यहां फोन नहीं है कि दूर वाले से फौरन बात हो जाए। काकू की बस्ती यहां से दूर है। जो भी बात होगी। वैसे ही होगी, जैसे की जाती है। तुम्हें सब्र के साथ चलना होगा।”
मोना चौधरी होंठ भींचे पावली को देखने लगी।
“सच मानो। मेरे बस में होता तो मैं अभी कुछ कर देता। लेकिन यहां जंगल में मैं मजबूर हूं। यहां के कायदों के ढंग से ही भाग-दौड़ हो सकेगी।”
मोना चौधरी उसे देखती रही। खामोश रही फिर आंखें बंद कर ली।
☐☐☐
महाजन के सिर पर पट्टी जैसा कपड़ा बंधा हुआ था। अब जख्म और दर्द पहले से ठीक था और चल फिर सकता था। दोपहर हो रही थी। काकू के आदेश पर उसे झोंपड़े में काकू के सामने पेश किया गया।
काकू कुछ गुस्से में, कुछ उखड़ा हुआ लग रहा था।
महाजन ने उसे सिर से पांव तक पहचानने वाली निगाहों से देखा।
“काकू?” महाजन के होंठों से निकला।
“हां। ठीक बोला।”
महाजन ने अपने पास खड़े दोनों आदमियों को देखा फिर काकू को देखकर बोला।
“मैं तुम लोगों का बहुत एहसानमंद हूं कि मेरी जान बचाई। मैं इतना घायल था कि अगर मेरा इलाज न किया जाता तो शायद मैं बचता नहीं। मुझे समझ नहीं आता कि कैसे मैं तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं।”
“कह चुके।” काकू तीखे स्वर में बोला।
“हां।” महाजन ने उसे गहरी निगाहों से देखा।
“तो अब मेरी सुन। क्या नाम है तेरा?”
“महाजन। नीलू महाजन।”
“महाजन।” काकू शब्दों को चबाकर बोला –“तुम्हारा हमारी बस्ती में आना मुसीबत से कम नहीं। दूसरा जो व्यक्ति उधर दूर, पावली की बस्ती में पैराशूट से उतरा था। उसे देखने मेरा साला बकम गया और पावली की बस्ती के लोगों के हाथों में पड़ गया। अपने रिवाज के मुताबिक वो बकम को मार देंगे।”
“इसमें मेरा क्या कसूर?” महाजन ने सामान्य स्वर में कहा।
“अगर तुम और तुम्हारे साथी पैराशूट से न कूदते तो...।”
“वो मेरे साथी नहीं हैं। विमान में बम फटने से पहले, वो लोग नीचे कूदे तो मैंने एक की टांग पकड़ ली कि शायद पैराशूट मुझे बचा ले। ऐसा ही हुआ। लेकिन जमीन पर पहुंच कर वो मुझे चोट मारकर, बेहोश करके चला गया।”
काकू उसे घूरता रहा फिर शांत-ठंडे स्वर में बोला।
“जोगल ने तुम्हें अपनी सोचों के कारण बचाया है। तुम्हारा अंत हमारी बस्ती के रिवाज के मुताबिक मौत ही है। हम किसी बाहरी व्यक्ति को जिन्दा नहीं जाने देते कि वो शहर जाकर किसी को बताए कि यहां अफीम की खेती होती है और शहर से कुछ खास लोग यहां अफीम खरीदने आते हैं।”
महाजन मुस्करा पड़ा।
“मुझे तो मालूम ही नहीं यहां अफीम की खेती भी होती है। तुम ही बता रहे हो।”
“अब तो जान लिया?”
“हां।”
“जल्दी ही तुम्हें मार दिया जाएगा।”
“जो रिवाज सबके लिए है। वो ही मेरे लिए।” महाजन बोला –“नीचे आते वक्त देखा था मैंने कि ये जंगल कितना बड़ा और गहरा है। मैं यहां से भाग भी जाऊं, तब भी बच नहीं सकता। जंगल के अनजान रास्तों में भटक कर भूख-प्यास से दम तोड़ दूंगा।”
काकू महाजन को देखता रहा।
“तुम्हें कहीं जाने की जल्दी है?” महाजन ने पूछा।
“मुझे? नहीं-मुझे कहीं नहीं जाना है।”
“तो बैठकर बात करते...।”
“मैंने तुम्हें बिठाने के लिए नहीं बुलाया।” काकू का स्वर उखड़ गया –“ये बताने के लिए बुलाया है कि तुम्हारी जिन्दगी तब तक की ही है, जब तक जोगल वापस नहीं आता।”
“कहां गया है जोगल?”
“पावली की बस्ती में बात करने-बकम को छुड़ाने...।”
“पावली की बस्ती वाले जोगल को भी पकड़कर...”
“'ऐसा कुछ नहीं होगा। ड्रम बजाते हुए गया है जोगल। उन्हें जोगल के आने की खबर पहले मिल जाएगी। वो समझ जाएंगे कि जोगल झगड़ा करने नहीं आया। ऐसे में उससे ठीक तरह पेश आएंगे।”
महाजन ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया।
“तुम पैराशूट से कैसे कूदे। विमान क्यों फट गया था?” काकू ने पूछा।
“मैं खड़े-खड़े थकने लगा हूं।” महाजन बोला –“अभी शरीर में कमजोरी है।”
“बैठ जाओ।”
महाजन मुस्कराया। आगे बढ़ा और बैठ गया फिर काकू से कहा।
“मुझे यहां लाने वाले इन दोनों की जरूरत नहीं है। भेज दो इन्हें। जब जरूरत होगी। बुला लेना। अगर तुम्हें डर है कि मैं तुम्हारे साथ कुछ बुरा कर दूंगा तो बेशक इन्हें...।”
“मुझे कोई डर नहीं। मैं तुम जैसे दस को एक साथ संभाल सकता हूं।” काकू ने कड़वे स्वर में कहा फिर उन दोनों व्यक्तियों को देखकर बोला –“तुम दोनों जाओ यहां से।”
“इनसे व्हिस्की मंगवा लो।” महाजन ने फौरन टोका।
“व्हिस्की?” काकू ने उसे देखा।
“शराब।”
“हूं। शराब को बस्ती में नशीला पानी कहा जाता है।” काकू ने उन दोनों व्यक्तियों को जाने का इशारा किया तो वे बाहर निकल गए। फिर वो एक दरवाजे के पार गया और मिनट भर में ही लौट आया। एक हाथ में जग जैसा बड़ा-सा बर्तन था तो दूसरे हाथ में गिलास –“लो-पी लो। शहरी शराब से बढ़िया है ये नशीला पानी। हम खुद बनाते हैं।”
“धन्यवाद।” महाजन ने वो बर्तन और गिलास थाम लिया।
काकू अपनी जगह पर जा बैठा।
“क्या हुआ था विमान में जो...।”
महाजन ने उसकी दी शराब को गिलास में डालकर घूंट भरते हुए सारी बात बता दी।
“इस तरह मैं नीचे, तुम्हारी बस्ती के पास आ गिरा।”
“तभी तो मरोगे। कहीं और गिरते तो...।”
“तो शायद अब तक मर चुका होता।” महाजन मुस्कराया –“वहां दवा-दारू कहां मिलती। यहां मेरी देख-रेख तो हो रही है। खैर, तो तुम कह रहे थे कि मुझे मार दिया जाएगा।”
“हां। ये हमारे यहां का रिवाज है।”
“मुझे मार कर क्या मेरे शरीर को पकाकर, तुम लोग खा जाओगे।”
“कैसी बातें करते हो। हम क्या जानवर हैं जो इंसान को खाएं।” काकू तीखे स्वर में कह उठा –“जंगल में अवश्य रहते हैं, लेकिन बाहरी दुनिया से ज्यादा दूर नहीं हैं हम। बस्ती के खास-खास लोग शहरों में जाते हैं। कुछ दिन रहकर वापस आते हैं। अच्छी बातें सीखते हैं। तुम बस्ती वालों में कोई गलत बात नहीं देखोगे।”
“कैसे नहीं देखूंगा। देख रहा हूं मैं –तुम्हारी और पावली की बस्ती में भी...।”
“क्या?”
महाजन ने दूसरा गिलास भर लिया।
“इतना पानी मत पियो। तेज नशा हो जाएगा।”
“मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता। जैसे पानी से बैटरी चार्ज होती है, वैसे ही मैं व्हिस्की से चार्ज होता हूं।”
“क्या मतलब?”
“जंगल में बैठकर, बैटरी के बारे में नहीं समझ पाओगे।”
महाजन ने घूंट भरा।
काकू घूरता रहा महाजन को।
“मैं गलत बात की बात कर रहा था।” महाजन ने जैसे उसे याद दिलाया।
“करो।”
“शहरों में कोई मेहमान आता है तो उसकी इज्जत की जाती है और तुम आने वाले की जान ले लेते हो। ये कहां की शराफत है। जंगलीपन ही तो हुआ ये सब।” महाजन ने गम्भीर स्वर में कहा।
काकू महाजन को देखता रहा।
“गलत कहा मैंने क्या?” महाजन पुनः बोला।
“हो सकता है, ये सब करना गलत हो। परन्तु ये पुराना रिवाज चला आ रहा है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि अफीम की खेती की बात शहर वाले न जान लें। वो हमें लूटने न आ...।”
“अफीम तो शहर वालों को ही बेचते हो।”
“हां।”
“तो फिर छिपाव कहां रहा। शहर में जो बात सबके कान में डालनी हो, वो एक को बता दो। पांच घंटों में सैकड़ों लोगों को ये बात पता चल जाएगी। जो लोग तुमसे अफीम खरीदते हैं, क्या वो दूसरों को बताते नहीं कि अफीम कहां से लाते हैं वो। कौन देता है उन्हें। तुम क्या समझते हो कि तुम्हारे बारे में बाहरी लोग नहीं जानते। बहुत जानते हैं। वो भी जानते होंगे, जिन्होंने आज तक अफीम की शक्ल नहीं देखी होगी।”
महाजन के खामोश होते ही वहां चुप्पी छा गई।
काकू महाजन को देखे जा रहा था।
“तुम लोगों को सबसे ज्यादा खतरा देश के कानून से है। सरकार से है।” महाजन ने पुन: कहा –“तुम क्या समझते हो कि सरकार नहीं जानती कि इन जंगलों में दो कबीले रहते हैं और वो अफीम की पैदावार करते हैं। सरकार सब कुछ जानती है। लेकिन सरकार का काम करने का अपना ढंग है। वो प्यार से तुम लोगों को राह पर लाएगी। लेकिन जब सरकार देखेगी कि तुम लोग प्यार से नहीं मानते तो टांगों में रस्सियां बांधकर, घसीटकर तुम लोगों को यहां से शहर तक ले जाएगी।”
काकू बेचैन नजर आया।
“दो बार सरकारी लोग यहां तक आए थे।” काकू बोला।
“तो फिर?”
“हमने उन्हें मार कर भगा दिया।”
“कोई बात नहीं। दो बार फिर भगा देना। पांचवीं बार सरकार बन्दूकों वालों को साथ लेकर आएगी और तुम लोगों का वो बुरा हाल करेगी कि अपने रिवाज तो छोड़ो, अपने को भी भूल जाओगे।”
काकू सख्त परेशान-सी निगाहों से महाजन को देखने लगा।
“विश्वास करो या न करो। मैं सच कह रहा हूं। एक बात तो बताओ काकू?”
“क्या?”
“अफीम के बदले क्या लेते हो उन लोगों से?”
“अनाज, पैसा, जरूरत की चीजें।”
“माना। अनाज खा लिया। जरूरत की चीजें इस्तेमाल कर ली लेकिन पैसे का क्या करते हो?” महाजन बोला।
काकू की निगाह महाजन के चेहरे पर जा टिकी।
महाजन ने नशीले पानी का घूंट भरा।
“पैसा, तुम्हारे लिए तब तक बेकार है, जब तक तुम इस बस्ती को छोड़कर शहर में नहीं बस जाते और शहर में तुम जाओगे नहीं यानी कि तुम्हारी जिन्दगी का मकसद सिर्फ पेट भरना है। पैसे को इस्तेमाल करना नहीं। यूं ही ये सब करते-करते मर जाओगे और पैसा पड़ा रह जाएगा। बोलो, ठीक कहा या गलत?”
“ठीक...ठीक कहा।” काकू दांतों से होंठ काटता हुआ, धीमे स्वर में बोला।
अगर सरकार ने तुम्हारे कबीले पर घेरा डाल लिया तो, यहां मिलने वाली हर चीज सरकार जब्त कर लेगी। पैसा भी और सबको जानवरों की तरह हांक कर शहर में ले जाकर बड़े से कमरे में बंद कर देगी। अपने कागजों में लिखेगी कि तुम लोग जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोग हो । जिन्हें दुनिया से परिचित कराना है। खाने को दाल रोटी और काम की जगह मजदूरी कराई जाएगी। इसी तरह दुनिया परिचित होते-होते जीवन बिता दोगे।”
काकू, महाजन को देखे जा रहा था।
महाजन ने दो-तीन घूंट एक साथ भरे।
“क्या कहना चाहते हो?”
“तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आएगा। ऐसे में मेरा कुछ भी कहने का फायदा नहीं।” महाजन ने गम्भीर स्वर में कहा –“फिर भी इतना अवश्य कहूंगा कि अभी तक जो दौलत तुमने कमाई है, उसे लेकर पास के शहर में खिसक जाओ। वहां पर दूसरे लोगों की भांति जीवन बिताओ। पैसे और जिन्दगी का मजा लो। बस्ती के बाकी लोगों को भी शहर का रास्ता दिखा दो। वो भी वहां जाकर काम करें और जीवन को सामान्य बनाकर जी सकें। अगर सरकार के आदमी आते हैं तो उनसे ढंग से पेश आओ। जब वो देखेंगे कि तुम लोग जंगलों की पैदाइश हो, परन्तु शहरों के रहने के काबिल हो तो वे तुम लोगों को शहर में जाकर बसा देंगे। काम-धंधा भी शुरू करवा देंगे। वो अच्छी जिन्दगी होगी सबके लिए। तब अफीम से कमाया पैसा भी चुपके से तुम खर्च कर सकोगे। यहां कुछ नहीं रखा। इधर तुम सरदार कहे जाते हो। मेरी नजरों में तुम पागलों के सरदार हो। पास में ढेरों रुपया और पहनने को कपड़ा नहीं। आखिर तुम कर क्या रहे हो। कैसा जीवन बिता रहे हो। भविष्य में क्या करना चाहते हो। मेरी नजरों में तो तुम्हारे जीवन का कोई मकसद नहीं है।”
काकू दांत भींचे महाजन को देखे जा रहा था।
“बच्चे हैं तुम्हारे?”
काकू ने सहमति से सिर हिलाया।
“कितने?”
“चार।”
“चार।” महाजन ने सिर हिलाकर चेहरा आगे किया –“अपने चार बच्चों को तुम क्या दे रहे हो?”
“दो शहर में पढ़ते हैं। दो छोटे हैं।”
“जो शहर में पढ़ते हैं, वो पढ़कर क्या करेंगे?”
“जो सबसे ज्यादा पढ़ा होगा, वो बस्ती का सरदार बन जाएगा।”
काकू ने शब्दों को चबाकर कहा।
“सरदार बन जाएगा। खूब। क्या करेगा वो। अफीम की खेती। अफीम बेचेगा। अनाज, जरूरत की चीजें और पैसे शहर के लोगों से लेगा। जीवन भर यही करता रहेगा। तुम सोचो-तुम्हारा इतना जीवन बीत गया, क्या किया तुमने। क्या जीवन जिया। यहां से बाहर निकल कर देखो, दुनिया कहां जा रही है और तुम कहां बैठे बरसों पुरानी घास काटे जा रहे हो।”
उनके बीच देर तक खामोशी छाई रही।
महाजन ने गिलास खाली करके टेबल जैसी शक्ल वाले फट्टे पर रख दिया।
“शहरों की जिन्दगी देखी है तुमने?” महाजन उठते हुए बोला।
“हां। बहुत अच्छी तरह से देखी है।”
“फिर तो तुम्हें मेरी बातें जल्दी समझ में आ जानी चाहिए।”
महाजन ने कड़वे स्वर में कहा –“जानवरों वाले रिवाज बना रखे हैं कि बाहरी आदमी यहां पहुंच जाए तो उसे जान से मार दो। सारी जिन्दगी अफीम बेच-बेचकर जाने कितना, बेहिसाब पैसा इकट्ठा कर लिया है और चवन्नी खर्च करने के लिए पास में कहीं पान का खोखा भी नहीं। भगवान जाने तुम लोग दांत भी साफ करते हो या नहीं।” कहने के साथ ही महाजन बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गया फिर ठिठक कर पलटा और बोला –“मैंने जो कहा, वो तुम्हारा दिल दुखाने के लिए नहीं कहा। बल्कि ये समझाने के लिए कहा है कि तुम लोग गलत, घटिया, बेकार जिन्दगी जीकर अपना जीवन बेकार कर रहे हो। चाहो तो शहरों में, लोगों के बीच बसकर बहुत अच्छा जीवन बिता सकते हो। अपनी दौलत खर्च करके मजेदार, ऐशो-आराम की जिन्दगी जी सकते हो, वो जिन्दगी, जिसका कुछ मतलब होता है।” महाजन पलटा और बाहर निकल गया।
☐☐☐
बीती रात की बात।
रात का अंधेरा घिर आया था।
वो हैलीकॉप्टर बे-आवाज था। उसकी आवाज इतनी कम थी कि हैलीकॉप्टर से लटकाई सीढ़ी पकड़ कर लटका जसबीर वालिया भी, उस आवाज को ठीक से सुन नहीं पा रहा था। करीब एक घंटे से जसबीर वालिया सीढ़ी पकड़ कर लटका हुआ था। वो जंगल में, खुले में पहुंच गया था। जहां से आसमान साफ नजर आ रहा था। वहां से उसने मोबाइल फोन पर बख्तावर सिंह से बात की कि वो खुले में आ गया है तो बख्तावर सिंह ने कहा कि उसे और राजू को लेने के लिए हैलीकॉप्टर रवाना हो चुका है।
जसबीर वालिया इन्तजार करता रहा।
शाम के बाद, जब अंधेरा घिरने वाला था तो वो व्याकुल हो उठा था। हैलीकॉप्टर अभी तक नहीं पहुंचा था। अंधेरा घिर गया तो हैलीकॉप्टर में मौजूद लोग उसे देख नहीं पाएंगे। रात भर उसे जंगल में रहना पड़ेगा। यहां जाने कैसे खतरे होंगे, रात के अंधेरे में।
बख्तावर सिंह ने हैलीकॉप्टर भेजा भी है या नहीं?
ठीक अंधेरा घिरने से पहले उसे वो बे-आवाज हैलीकॉप्टर दिखा। जसबीर वालिया ने फौरन अपनी कमीज उतारी और जोर-जोर से हिलाकर उन्हें अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगा।
हैलीकॉप्टर वालों ने भी उसे देख लिया था।
हैलीकॉप्टर ने उस जगह के आसपास दो चक्कर काटे और फिर नीचे आकर वहां से सीढ़ी लटकाने लगा। वालिया ने जल्दी से कमीज पहन ली।
सीढ़ी नीचे आई तो उसे सावधानी से पकड़ कर, दो पायदान चढ़कर, हाथ से ऊपर वालों को इशारा किया कि अब वो उड़ान भर सकते हैं।
हैलीकॉप्टर वहां से रवाना हो गया।
जसबीर वालिया ने मजबूती से सीढ़ी पकड़े रखी।
अंधेरा कब का घिर गया। फिर भी नीचे जंगल होने का एहसास होता रहा। हैलीकॉप्टर को रोशनियां बंद थीं। घंटे भर बाद जसबीर वालिया को दूर रोशनियां दिखाई देने लगी तो वो समझ गया कि हैलीकॉप्टर उसे जंगली इलाके से बाहर ले आया है। सच में घना और गहरा जंगल था।
एकाएक हैलीकॉप्टर नीचे होने लगा।
जसबीर वालिया ने फौरन गर्दन घुमाकर नीचे देखा।
नीचे जमीन सी नजर आई। अंधेरा होने की वजह से वो कुछ भी स्पष्ट न देख पाया। कुछ मिनट बाद हैलीकॉप्टर इतना नीचे आ गया कि जमीन पांच-छ: फीट नीचे रह गई। वो समझ गया कि हैलीकॉप्टर वाले उसे नीचे उतारना चाहते हैं। तभी हैलीकॉप्टर से चिल्लाती आवाज उसके कानों में पड़ी।
“सीढ़ी छोड़ दो।”
जसबीर वालिया ने सीढ़ी छोड़ दी। दोनों पांव जमीन से टकराए। वो लड़खड़ाया फिर तुरन्त ही संभल गया। उसी पल सीढ़ी वापस खींची जाने लगी और देखते ही देखते हैलीकॉप्टर ने उड़ान ऊंची भरी और पलों में ही वो अंधेरे में गुम होता चला गया।
जसबीर वालिया ने खुद को गहरे अंधेरे से भरी जगह में खड़े पाया। कुछ भी समझ न पा रहा था कि रास्ता किधर को है। वो खुद को थका-सा महसूस कर रहा था। उसने जेब से सिगरेट निकाली और सुलगा कर नीचे बैठ गया। उसे विश्वास था कि हैलीकॉप्टर ने उसे जहां उतारा है, वो सही जगह होगी। मन में तसल्ली थी कि वो उस घने जंगल से बाहर आ गया है। रात यहां बिता देने में उसे परहेज नहीं था। दिन का उजाला निकल आने पर वो यहां से रास्ता तलाश करके पास के शहर में पहुंच सकता है, जहां की रोशनियां उसे नजर आ रही थी।
सिगरेट समाप्त किए उसे पांच मिनट ही हुए थे कि एकाएक उसकी आंखें सिकुड़ी। होंठ भी कुछ भिंच से गए। मन ही मन वो सतर्क हो उठा। दूर बहुत दूर उसे रोशनी चमकती नजर आई। जो कि हिलती-सी महसूस हो रही थी और शायद इधर ही आ रही थी।
वो कार या अन्य कोई वाहन लगा उसे।
इधर घुप्प अंधेरा था। जसबीर वालिया चाहकर भी कहीं छिप नहीं सकता था। अगर वो वाहन इधर आ रहा था तो उससे लिफ्ट ले सकता है, पास के शहर तक।
एकाएक वो रोशनियां नजर आनी बंद हो गई।
फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया।
जसबीर वालिया उधर ही नजरें टिकाये रहा। दो मिनट बीत गए। परन्तु फिर वो रोशनियां न नजर आईं। वालिया समझ गया कि वो जो भी वाहन था, किसी अन्य रास्ते पर निकल गया था।
तभी उसका पूरा शरीर उन दो तेज रोशनियों में नहा उठा। शायद पास ही मोड़ था। आने वाला वाहन एकाएक वहां से मुड़ा था। वो कार थी। जिसे अचानक करीब पाकर जसबीर वालिया ठगा सा रह गया था। कार की रोशनी में ही उसने देखा कि वो कच्ची-पक्की सड़क पर खड़ा है। सड़क की हालत बता रही थी कि आमतौर पर वहां से न के बराबर ही वाहन निकलते थे। आने वाली कार उससे
दस कदम पहले रुक गई।
उस सन्नाटे में इंजन की आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।
हेड लाइट की तेज रोशनी में उसकी आंखें चौंधिया रही थी। रोशनी के पार उसे कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। कार से बाहर भी कोई नहीं निकला। कुछ पल यूं ही बीत गए ।
जसबीर वालिया सावधानी से कार की तरफ बढ़ने लगा। रिवॉल्वर पास न होने की वजह से वो परेशानी महसूस कर रहा था। रिवॉल्वर के बिना वो खुद को हमेशा ही अधूरा महसूस करता था।
हेडलाइट की रोशनी पार करके वो ड्राइविंग सीट वाली खिड़की के पास पहुंचा। अभी भी उसकी आंखें ठीक से देखने के काबिल नहीं हो पाई थी।
“बैठ जाओ।” आदमी की आवाज कानों में पड़ी।
दो पलों की चुप्पी के बाद वालिया बोला।
“कौन हो तुम?”
“बख्तावर सिंह ने तुम्हें पास के शहर तक पहुंचाने का काम मेरे हवाले किया है।” वो ही आवाज कानों में पड़ी।
जसबीर वालिया ने गहरी सांस ली और कार में बैठ गया। पीछे वाली सीट पर कार पुन: तेजी से आगे बढ़ गई। कार में ड्राइवर के अलावा और कोई नहीं था।
“मेरे बारे में क्या जानते हो?” जसबीर वालिया बोला।
“कुछ नहीं।”
“मेरा नाम?”
“नहीं जानता। मैं सिर्फ अपने काम से मतलब रखता है और काम के पैसे लेता हूं। बख्तावर सिंह ने कहा कि इस सड़क पर तुम्हें जो भी अकेला इंसान मिले, उसे लिफ्ट देकर पास के शहर में पहुंचा देना।”
“मेरे अलावा कोई और भी तुम्हें मिल सकता था।”
“इस सड़क पर दिन में भी कोई आना पसन्द नहीं करता। इस वक्त तो रात हो चुकी है।” वो बोला –“ऐसे में मुझे वो ही मिलना था, जिसे बख्तावर सिंह पास के शहर में पहुंचाना चाहता है।”
जसबीर वालिया कार की पीछे वाली सीट पर बैठा, कार ड्राइव करने वाले को देखता रहा। अंधेरा होने के कारण, ड्राइव करने वाले के चेहरे को न देख पाया।
कार दौड़ती जा रही थी। कच्ची-पक्की सड़क का रास्ता खतरनाक था। रह-रहकर एक तरफ खाई नजर आने लगी। परन्तु उसने कार की रफ्तार तेज ही रखी। शायद वो इन रास्तों से वाकिफ था।
“मेरे ख्याल में तुम इस सड़क पर पहले भी कार चला चुके हो।” जसबीर वालिया बोला।
कार ड्राइव करने वाला खामोश रहा।
“बख्तावर सिंह ने तुम्हें ये नहीं कहा कि इस सड़क पर दो आदमी मिलेंगे।” वालिया पुनः बोला।
“दूसरा कौन?”
“राजू। मेरा साथी।”
“मुझे सिर्फ एक के बारे में कहा गया था। इससे आगे मुझे कुछ पता नहीं।” वो बोला।
“मैं कहां से आया हूं-मालूम होगा?”
“नहीं और न ही इच्छा रखता हूं मालूम करने की। तुम बातें बहुत करते हो।”
“रिवॉल्वर है तुम्हारे पास?”
“हां।”
“जाते वक्त मुझे दे देना। रिवॉल्वर की जरूरत मैं हर वक्त महसूस करता हूं। मेरी रिवॉल्वर खो गई है।”
दो पलों की खामोशी के बाद वो बोला।
“ले लेना।”
“शहर कितनी दूर है यहां से?”
“दो घंटे लगेंगे।”
जसबीर वालिया ने कुछ न कहा और सीट की पुश्त से सिर टिकाकर आंखें बंद कर ली।
☐☐☐
सुन्हा जब बकम को झोंपड़े में लेकर आया तो बकम सामान्य लग रहा था। उसे नहाने को पानी दिया गया था। खाने को बढ़िया चीजें दी गई थी। उसके आराम का पूरा ध्यान रखा गया था। परन्तु इस वक्त उसके चेहरे पर इस बात को लेकर उलझन थी कि दुश्मन बस्ती के लोग, उससे प्यार भरा सलूक क्यों कर रहे हैं।
पावली मुस्कराया उसे देखकर।
“बैठो बकम।”
बकम हिचकिचाया।
“बैठ जाओ। मन से डर हटा दो। तुम्हें जो हैरानी हो रही है, वो तो होनी ही चाहिए। मेरी और काकू की बस्ती वाले मौका मिलते ही एक-दूसरे के लोगों को खत्म करने की कोशिश करते हैं और अब तुम हमारी ही बस्ती में घूमते पकड़े गए तो तुम्हें हम इज्जत दे रहे हैं। जान नहीं ले रहे।”
“बात तो हैरानी की है ही।” हिम्मत करके बकम बोला।
‘अवश्य। हैरान होना भी चाहिए।” मुस्कराते हुए पावली ने सिगरेट सुलगा ली –“जब भी कुछ नया होता है तो हैरानी अवश्य लाता है। बैठ जाओ। हम बातें करेंगे।”
बकम ने मोना चौधरी पर निगाह मारी फिर आगे बढ़कर बैठता हुआ बोला।
“काकू की बस्ती का कोई भी व्यक्ति इस बात का विश्वास नहीं करेगा कि मैं पावली के साथ झोंपड़े में बैठा। मुझे नहाने को पानी और खाने को बढ़िया रोटी दी गई। मेरे से दोस्तों की तरह बात की गई।”
पावली मुस्कराया फिर कह उठा।
“तुम देखने आए थे कि पैराशूट से नीचे आने वाला कौन है।”
पावली ने मोना चौधरी की तरफ इशारा करते हुए कहा –“ये है जो पैराशूट से हमारी बस्ती के पास उतरी थी।”
बकम ने मोना चौधरी पर निगाह मारी फिर पावली से कहा।
“तुम लोगों ने इसे अभी तक जिन्दा रखा हुआ है।”
“जिन्दा तो तुम्हें भी रखा हुआ है बकम।” पावली ने गम्भीर स्वर में कहा।
बकम के चेहरे पर घबराहट उभरी।
“फिक्र मत करो। तुम हमारे पास वैसे ही सुरक्षित हो। जैसे अपनी बस्ती में सुरक्षित रहते हो। मैं बेवकूफों वाले कानून कायदे तोड़कर उन्हें खत्म करते हुए तुम्हें वापस भेज रहा हूं। ये सब देख-महसूस करके शायद काकू को समझ आ सके कि इस तरह किसी की जान लेना गलत है। अगर नहीं समझ आई। उसने अपने पुराने रिवाज जारी रखे तो भी, हम काकू की बस्ती के उन लोगों की जान नहीं लेंगे, जो हमारे हाथ लग जाते हैं।”
बकम अजीब-सी निगाहों से उसे देखने लगा।
“विश्वास नहीं आ रहा।” उसके होंठों से निकला।
“आ जाएगा। जब अपनी बस्ती में, मेरा दिया उपहार लेकर पहुंचोगे तो, अच्छी तरह यकीन आ जाएगा।”
बकम ने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर पहलू बदला।
“सुन्हा।”
“हां सरदार।”
“नशीला पानी पिलाओ बकम को। हम इसे हर तरफ से खुश करके भेजना चाहते हैं । इसे यहां से भेजने से पूर्व तोहफा देना है। याद दिला देना मुझे। तोहफे में वो कमीज-पैंट दूंगा, जो मैं पहनता हूं। ताकि अपनी बस्ती में जाकर सबको और काकू को बता सके कि पावली ने अपनी कमीज-पैंट तोहफे में दी है।”
बकम के चेहरे पर अविश्वास नाच रहा था।
सुन्हा ने नशीले पानी का गिलास भरकर बकम को थमाया। बकम जल्दी से आधा गिलास एक ही सांस में खाली कर गया। बाकी पकड़े रहा।
तभी मोना चौधरी बोली।
“तुम्हारी बस्ती में पैराशूट से दो व्यक्ति उतरे थे। उनका क्या हुआ?”
“हमने दूर से दो को उतरते देखा था, परन्तु पास जाने पर एक ही बेहोश मिला। एक-दूसरे को चोट मारकर बेहोश करके चला गया।” बकम ने मोना चौधरी से कहा।
मोना चौधरी के दांत भिंच गए।
“तुमने बेहोश व्यक्ति को देखा?”
“हां। मैं भी तब वहीं था।”
“देखने में वो कैसा था?” मोना चौधरी के होंठ भिंचे हुए थे।
“क्या बताऊं, देखने में वो कैसा था। इंसान ही था। हम जैसा...।”
“उसने कैसे कपड़े पहन रखे थे?”
बकम के चेहरे पर सोच के भाव नजर आने लगे। फिर बोला।
“सफेद रंग की कमीज और गले में लाल से रंग का कुछ बांध...”
“पावली।” मोना चौधरी तेज स्वर में कह उठी –“वो महाजन ही है। मेरा साथी...”
बकम ने बारी-बारी दोनों को देखा।
पावली ने गम्भीर स्वर में बकम से कहा।
“वो आदमी इसका साथी है। इससे पहले कि काकू उसे मार दे। तुम अपनी बस्ती में जाओ बकम और काकू से कहो उसे छोड़ दे। इस तरह किसी की जान लेना ठीक नहीं।”
बकम ने हाथ में पकड़ा गिलास खाली किया और टेबल जैसी जगह पर रखकर बोला।
“मैं अभी यहां से चल देता हूं और...”
तभी झोंपड़े के बाहर कदमों की आहट गूंजी और तीन आदमियों ने जोगल के साथ भीतर प्रवेश किया।
जोगल को देखकर बकम चौंका।
“जोगल! तुम यहां?” उसके होंठों से निकला।
जोगल की आंखें सिकुड़ी।
“मुझे हैरानी है कि तुम पावली के साथ दोस्तों की तरह बैठे हो। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि...।”
“जोगल! पावली बहुत अच्छा इंसान है। मेरी इज्जत की। खाने-नहाने को दिया। नशीला पानी पीने को दिया और अब मुझे वापस बस्ती में भेज रहा है, मेरी जान नहीं ले रहा।”
पावली ने उन दोनों व्यक्तियों को देखा जो जोगल को लाए थे।
“ये कैसे इधर आया?”
“ड्रम बजाकर अपने आने की खबर पहले ही दे दी थी। इसके साथ तीन व्यक्ति थे। एक ड्रम बजाने वाला और दो अन्य। जोगल को हम आपके पास ले आए।”
पावली ने इशारा किया तो वो दोनों वहां से चले गए।
“बैठो जोगल।” पावली ने कहा।
जोगल भी बकम की तरह हैरान हुआ। कुछ कह न सका।
“मैं भी तुम्हारी तरह हैरान हुआ था।” बकम कह उठा –“मुझे भी विश्वास नहीं आया था। ये मजाक नहीं हो रहा जोगल। बैठ जाओ। पावली हमें अपने साथ बैठने का मौका दे रहा है।”
“क्यों?” जोगल की आंखों में सन्देह था।
“इस क्यों का जवाब, रास्ते में बकम से पूछ लेना।” पावली ने कहा –“पैराशूट से उतरे, जिस व्यक्ति को तुम लोगों ने पकड़ा है, वो इस मोना चौधरी का साथी है। काकू से कहो कि अच्छा इंसान बनकर उसे छोड़ दे। उसकी जान नहीं ले।”
जोगल ने मोना चौधरी को देखा।
“उसका नाम महाजन है।” जोगल बोला।
“हां।” मोना चौधरी का चेहरा चमका।
“हमें मालूम हो गया था उन दोनों से, जो बकम के कैद होने से पहले भाग आए थे। महाजन को भी पता है कि तुम यहां हो। उसने कहा था कि बेबी को, मोना चौधरी को बता देना कि मैं ठीक हूं।”
मोना चौधरी ने गहरी सांस ली।
“काकू पीछे से उसकी जान ले...।”
“मेरे वापस पहुंचने तक नहीं लेगा।” जोगल गम्भीर स्वर में बोला –“महाजन का मामला मैं देख रहा हूं।”
“बैठ जाओ।”
जोगल आगे बढ़ा और बैठ गया।
“सुन्हा। नशीला पानी पिलाकर जोगल का स्वागत करो।” पावली बोला।
सुन्हा ने फौरन गिलास भरकर जोगल को थमा दिया।
“तुम यहां क्यों आए जोगल?” पावली ने पूछा।
“काकू ने भेजा है। वो चाहता है कि तुम लोग बकम को मत मारो। जैसे भी हो, इसकी जान बचा लूं।”
“इसकी जान बची हुई है। ये अपनी बस्ती वापस जाने वाला था।” पावली ने कहा।
जोगल ने पावली को देखा।
“बकम को छोड़ने का फैसला तुमने कैसे ले लिया ?” जोगल ने पूछा।
“शहर से जीना सीख कर आया हूं। हमें किसी की जान लेने का हक नहीं है। ये पाप होता है।” पावली ने गम्भीर स्वर में कहा –“हमने दुश्मनी और जान लेना छोड़ दिया है। मैं अपनी बस्ती वालों का जीने का ढंग बदल रहा हूं। कोशिश करूंगा कि हम ये जगह छोड़कर शहर में बस जाएं। इस काम में सरकार हमारी मदद करेगी।”
“तुम्हारी बातें मेरी समझ से बाहर है।”
“काकू की समझ में शायद आ जाए। उसे जाकर ये बात बताना।”
दो पल खामोश रहकर जोगल बोला।
“अगर बस्ती वालों के साथ शहर में जाकर बस गए तो अफीम के खेतों का क्या होगा?”
“वो तुम ले लेना। मैं शहर जाकर बस्ती वालों को अच्छी जिन्दगी देना चाहता हूं।” पावली ने कहा –“मैं तो चाहूंगा कि काकू भी ऐसा ही करे। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे जोर नहीं दूंगा। अपना अच्छा-बुरा वो खुद समझेगा।”
“तुम महाजन की बात करो।” मोना चौधरी कह उठी –“मैं उसे सही-सलामत वापस पाना चाहती...”
“इस बात का अन्तिम फैसला तो काकू ही करेगा। वो हमारा सरदार है।” जोगल बोला –“मैं कोशिश करूंगा कि वो महाजन को ठीक-ठाक वापस भेजकर पावली की तरह दोस्ती का सबूत दे।”
“मैं तुम्हारे साथ चलूं?”
“नहीं।” पावली ने टोका –“तुम्हारा जाना ठीक नहीं होगा। काकू तुम्हें भी बंदी बना सकता है।”
मोना चौधरी होंठ भींचकर रह गई। फिर बोली।
“मेरे साथी के साथ पैराशूट में जो दृसरा आदमी था, उसका क्या हुआ?”
“हमें वो नहीं दिखा। तुम्हारे साथी के सिर पर चोट पहुंचाकर वो जंगल में भाग गया था। हम बाद में वहां पहुंचे। लेकिन इस जंगल से वो बाहर नहीं निकल सकेगा। भटक कर...।”
“अब तक वो जंगल से कब का बाहर निकल चुका होगा।” मोना चौधरी ने दांत भींचकर कहा।
“असम्भव...वो...।”
“कल जो हैलीकॉप्टर आसमान में मंडरा रहा था। वो उनकी ही तलाश में यहां आया था। वो हैलीकॉप्टर उसे जंगल से ढूंढ़ कर ले गया होगा। जो उसके पीछे है, उसके हाथ बहुत लम्बे हैं।” मोना चौधरी ने दृढ़ता से कहा।
जोगल उसे देखता रहा। सोचता रहा।
“पावली के साथ बैठकर मुझे अच्छा लग रहा है। ये बहुत अच्छा इंसान है। मैं काकू से बात करूंगा कि वो महाजन को छोड़ दे। आओ जोगल, हम वापस बस्ती में पहुंचकर काकू से बात करते हैं।”
जोगल ने नशीले पानी का गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ।
☐☐☐
रात का वक्त था।
काकू की बस्ती।
काकू के झोंपड़े के बाहर जगह-जगह मशालें लगा रखी थी। पर्याप्त रोशनी थी। वहां एक कुर्सी पर काकू बैठा था और छोटी कुर्सी पर महाजन। जोगल-बकम के अलावा बस्ती के आठ-दस बूढ़े लोग भी वहां थे। दो घंटे से उनके बीच बातें हो रही थी।
बातों का मुद्दा था पावली।
बकम को छोड़ दिया जाना।
इसके अलावा जो काम वो लोग कर रहे हैं, उससे बस्ती के लोगों का फायदा क्या है। अफीम की पैदावार करके, उसे बेचना, मात्र इसलिए कि पेट भर सकें। पेट तो वैसे भी भरा जा सकता था। काकू की समझ में महाजन की बातें आ गई थीं। जिन्हें वो बस्ती के बड़े-बूढ़ों के सामने रख रहा था। सलाह-मशवरा कर रहा था। या यूं कह लें कि उन्हें दिमागी तौर पर तैयार कर रहा था कि बिना किसी विरोध के उसकी बातें मान ली जाएं।
काकू की आवाज उन सबके कानों में पड़ रही थी।
“पावली ने बकम को जिन्दा छोड़कर, हमें समझाया है कि हम आज तक गलत चल रहे थे। दुश्मनी अच्छी चीज नहीं होती और यूं ही किसी की जान ले लेना भी ठीक नहीं है। मेरे बेटे की उम्र का है पावली। दिल्ली में पढ़ के आया है। समझ के आया है कि दुनिया कैसे चल रही है और हमारे पुराने रिवाज गलत हैं। बकम को छोड़कर उसने हमें मौका दिया है कि दोनों बस्तियां दुश्मन नहीं दोस्त बनकर रहें।”
“काकू।” एक बूढ़े ने कहा –“पावली बाद में धोखा नहीं देगा तो उससे दोस्ती कर लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। लेकिन अफीम के खरीदारों का बंटवारा ठीक ढंग से हो। इस बात का ध्यान रख लेना।”
महाजन ने हाथ में पकड़े गिलास से नशीले पानी का घूंट भरा। वो खामोशी से बैठा, इन लोगों की बातें सुन रहा था। वो स्पष्ट तौर पर समझ चुका था कि काकू धीरे-धीरे किन बातों की तरफ आ रहा है।
कुछ पलों की खामोशी के बाद काकू पुनः गम्भीर स्वर में बोला।
“आज बातें हो रही हैं तो मैं एक बात और सामने रखूंगा।”
“कहो काकू।”
“हम लोग अफीम की पैदावार करते हैं। उसे बाहरी लोगों को बेचते हैं। अनाज के साथ हमें पैसा मिलता है। हम सिर्फ अपना पेट ही भरते हैं। पैसे को हम इस्तेमाल नहीं कर सकते। क्योंकि पैसे का इस्तेमाल शहरों में करते हैं। यहां पर तो हम सिर्फ पेट भरते हैं। वो भी ठीक तरह से नहीं। हम...”
“शहर में पैसों का क्या इस्तेमाल होता है काकू?”
“शहर में पैसा ही कमाल दिखाता है। हम अपने बच्चों को अच्छे ढंग से पढ़ा सकते हैं। जरूरत की चीजें खरीद सकते हैं। बढ़िया कपड़े डाल सकते हैं। चलने की अपेक्षा मोटर कारों में घूम सकते हैं। बढ़िया घर में रह सकते हैं। और भी बहुत चीजे हैं, जिनके बारे में मैं बता नहीं सकता।” काकू ने गम्भीरता से कहा।
तभी महाजन बोला।
“वहां जिन्दगी है। रोशनी है। सूर्य के ढलते, यहां की तरह अंधेरे में नहीं बैठना पड़ता। सूर्य की तरह ही दूसरी रोशनी जल जाती है। वहां लोग दिन में भी काम करते हैं और रात को भी तुम लोग सिर्फ रोटी खाते हो। वो भी बे-स्वाद आधी-अधूरी। लेकिन शहर में खाने को ऐसी-ऐसी चीजें मिलती हैं कि जिनके बारे में तुम सोच भी नहीं सकते। हम शहरी लोग तुम लोगों को जंगली और पागल कहकर बुलाते हैं। क्योंकि सभ्यता के कायदों से तुम लोग वाकिफ नहीं हो। इसे मार दो। उसे मार दो। इंसान की जिन्दगी की कोई कीमत नहीं समझते। जिस अफीम की तुम लोग पैदावार करते हो, वो कानून की नजरों में जुर्म है। उसे हम लोग बुरा मानते...।”
“ये कानून क्या होता है?”
“जैसे ये तुम लोगों का सरदार है।” महाजन ने कहा –“उसी तरह शहरों में कानून सरदार होता है। वो इस बात का ध्यान रखता है कि कोई गलत काम न करे। किसी के काम से दूसरों को तकलीफ न हो।”
“ये शहरी बातें क्यों बता रहे हो काकू?”
“इसलिए कि मैं बस्ती वालों के भले की सोच रहा हूं। इस तरह जंगल में रहकर जिन्दगी बिता देना ठीक नहीं: यहां के बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे। कुछ भी नहीं। हमारी तरह ही रहेंगे। लेकिन शहर में रहकर नए-नए काम करेंगे। क्या जाने कोई बड़ा होकर, क्या बन जाए।” काकू ने कहा।
कोई कुछ न बोला।
मशालों की रोशनी में सबके चेहरे चमक रहे थे फिर एक बूढ़ा कह उठा।
“काकू, कहने-सुनने में तो ये सब अच्छा लगता है। हम जंगल में ही ठीक हैं।”
“क्यों?”
“हम लोग शहर में बसने के काबिल नहीं। वहां खुद को खुश नहीं रख सकते। हमें यहां की आदतें ही...।”
“तुम ठीक कहते हो।” काकू बोला –“शुरू में कुछ परेशानी अवश्य आएगी, लेकिन बाद में सब ठीक होना शुरू हो जाएगा।”
“हमारी समझ से तो बाहर है तुम्हारी बातें।”
“तुम कहते हो कि पावली समझदार है।”
“हां। वो शहर से पढ़कर आया है। समझदार क्यों नहीं होगा।”
“तो ये बात उसने क्यों नहीं कही। तुम हमें शहर ले जाने को क्यों उतावले हो रहे हो?”
“मैं पावली से मिला नहीं। मुझे क्या मालूम वो क्या कर रहा है। इस बारे में क्या सोचता है?”
“जीजू।” बकम बोला –“पावली से मिल क्यों नहीं लेते?”
“पावली से।” काकू के होंठों से निकला।
“हां। ये तो बढ़िया मौका है दोनों बस्तियों में दोस्ती हो जाने का। उसने मेरे को जिन्दा वापस भेज दिया। दुश्मनी खत्म करने को कहा है। महाजन को वो लड़की मोना चौधरी वापस मांग रही है। पावली भी ऐसा ही कह रहा था। महाजन को लेकर हम लोग चल पड़ते हैं पावली के पास। दोस्ती भी हो जाएगी, बात भी...।”
काकू का चेहरा गम्भीर हो उठा।
“चुप क्यों हो गए जीजू?”
“क्या मेरा इस तरह पावली के पास पहुंच जाना ठीक होगा। वो छोटा है मेरे से और...।”
“छोटे और बड़े की बात इसमें कहां से आ गई। ये तो दो बस्तियों के सरदारों की बात है। मन साफ है तो चले जाओ पावली के पास।” एक बूढ़े ने सामान्य स्वर में कहा।
देर तक चुप रहा काकू फिर जोगल को देखा।
“तू क्या कहता है जोगल?”
“सच कहूं सरदार।”
“हां।”
“मेरा तो कब से मन है शहर में रहने का। शहर में जाता हूं तो आने का दिल नहीं करता।” जोगल ने कहा –“ये बात इसलिए नहीं कही कि कोई नाराज न हो जाए। शहर की जिन्दगी सच में बहुत मजेदार है। यहां तो कुछ भी नहीं।”
काकू उठ खड़ा हुआ।
“किसी को पावली की बस्ती में भेजो। कहो कि सरदार काकू कल महाजन को लेकर आएगा। जवाब लेकर आना।”
“मैं अभी किसी को भेज देता हूं। सुबह तक वो जवाब लेकर आ जाएगा।” जोगल ने कहा और वहां से चला गया।
कुछ पल खामोशी रही।
“सोच लेना काकू।” एक बूढ़े ने कहा –“शहर में बसने का इरादा आसान काम नहीं है।”
काकू जवाब में सिर हिलाकर रह गया।
☐☐☐
“बेबी।” मोना चौधरी पर निगाह पड़ते ही महाजन का स्वर कांप उठा। आंखों में आंसू चमक उठे।
दूर खड़ी मोना चौधरी ने उसे देखा तो उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
पावली की बस्ती में खुशी का माहौल था। बहुत रौनक थी। उत्सव जैसा माहौल लग रहा था। काकू का बस्ती में आना कोई मामूली बात नहीं थी। बस्ती को उन्होंने अपने तौर पर सजाने को चेष्टा की हुई थी। हर तरफ साफ-सफाई बहुत अच्छे ढंग से की गई थी। पावली का झोंपड़ा तो बहुत ज्यादा अच्छा लग रहा था।
दोपहर का एक बज रहा था।
पावली की बस्ती का हर व्यक्ति काकू के आने पर खुश था।
काकू के साथ बकम, जोगल, चार बूढ़े और आठ अन्य व्यक्ति पावली और काकू गले मिले।
उधर मोना चौधरी और महाजन पास आ गए।
“बेबी।” महाजन का स्वर खुशी में कांप रहा था –“मैं...मैं तो समझा था कि तुम विमान विस्फोट में ही...।”
“कुछ नहीं हुआ मुझे। आसानी से बच गई।” मोना चौधरी हौले से हंसी –“जसबीर वालिया का साथी राजू विमान विस्फोट में मारा गया। मैं उसका पैराशूट लेकर विमान से कूद गई।”
“बच गई तुम, मेरे लिए यही बहुत है। जब मुझे मालूम हुआ कि तुम यहां हो तो मैं कुछ ठीक हुआ, वरना...।”
“जसबीर वालिया कहां गया?” एकाएक मोना चौधरी के जबड़ों में कसाव आ गया।
“मालूम नहीं। जब पैराशट ने जमीन को छुआ तो, जसबीर वालिया मेरे सिर पर गहरी चोट पहुंचाकर भाग गया। बेहोश हो गया था मैं। जोगल ने मुझे बचाया। मेरा इलाज...।”
“जसबीर वालिया जंगल से निकल चुका है। कल जो हैलीकॉप्टर आए थे। वो वालिया को ले गए होंगे। जसबीर वालिया जैसे हिम्मती व्यक्ति को बख्तावर सिंह खोना नहीं चाहेगा।” मोना चौधरी भिंचे दांतों से कह उठी –“कुछ मालूम पड़ा कि जसबीर वालिया किस शहर का है?”
“कैसे मालूम होता?”
“शायद उसके मुंह से कुछ निकला हो अपने बारे में। शहर का नाम या...”
“नहीं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। जसबीर वालिया के बारे में मुझे कुछ नहीं पता।” कहने के साथ ही महाजन ने पैंट में फंसा रखी बोतल निकाली, जिसमें बस्ती से नशीला पानी भरकर चला था। घूंट भरा। मोना चौधरी के चेहरे पर नजर मारी तो ठिठक कर रह गया। धधक रहा था उसका चेहरा।
“क्या हुआ बेबी?”
जसबीर वालिया मुझे आतंक का चेहरा दिखाना चाहता था। सच में वो आतंक ही था। आसमान में विमान में विस्फोट होना और सबका मर जाना। लेकिन उसकी बदकिस्मती कि मैं उस आतंक के चेहरे से बच निकली। नहीं देखा मैंने आतंक का चेहरा। जिन्होंने देखा, वो मासूम मर गए।” दहक रहा था मोना चौधरी का स्वर –“लेकिन आतंक क्या होता है, वो मैं दिखाऊंगी जसबीर वालिया को। अब वो आतंक से रू-ब-रू होगा।”
महाजन ने बोतल से घूंट भरा। चेहरे पर गम्भीरता थी।
मोना चौधरी के दांत भिंचे हुए थे।
“हम नहीं जानते जसबीर वालिया कहां रहता है।” महाजन धीमे स्वर में बोला।
“ढूंढेंगे उसे।”
“आसान नहीं है ये काम...।”
“विशाल सिंह उसके बारे में बताएगा कि वो कहां रहता है।”
महाजन की आंखें सिकुड़ी।
“विशाल सिंह?”
“हां। उसी के काम से हम जा रहे थे असम। उसी ने दो दिन पहले ही विमान में हमारी सीटें बुक करा दी थी। लेकिन वो ये सब बख्तावर सिंह के इशारे पर कर रहा था। उसी ने बख्तावर सिंह को बताया कि ये सब उसने किया है तो बख्तावर सिंह ने योजना को आगे अंजाम देते हुए पैराशूट और वालिया-राजू को विमान में पहुंचा दिया। अब ये विशाल सिंह की बुरी किस्मत कहो या जसबीर वालिया या बख्तावर सिंह की कि हम दोनों ही बच गए। वरना उन्होंने तो अपनी तरफ से ऐसी योजना बनाकर हमें घेर लिया था कि हम बच ही नहीं सकते थे।”
महाजन का चेहरा भी कठोर हो गया था।
“तुम ठीक कहती हो बेबी कि विशाल सिंह ने बख्तावर सिंह के इशारे पर ही हमें विमान में पहुंचाया। हमें विमान में यात्रा करवाने का काम, बख्तावर सिंह की योजना का पहला कदम था।”
तभी सुन्हा पास आ पहुंचा। वो खुश नजर आ रहा था। परन्तु मोना चौधरी के चेहरे के भावों को देखकर वो चौंका। फिर संभलकर बोला।
“क्या हुआ, तुम इतने गुस्से में क्यों हो-किसी ने कुछ कहा क्या?”
मोना चौधरी ने उसे देखा फिर अपने पर काबू पाया।
“क्या हुआ?” सुन्हा ने पुनः परेशानी से पूछा।
“कुछ नहीं।” मोना चौधरी अभी भी सामान्य नहीं हो पाई थी –“पुरानी बात याद आ गई। शहर की...।”
सुन्हा ने गहरी निगाहों से मोना चौधरी को देखा फिर धीमे स्वर में कह उठा।
“तुम्हें शायद उस पर गुस्सा आ रहा है, जिसने विमान में बम लगाकर तुम लोगों को मारना चाहा।”
“हां।” महाजन ने सिर हिलाया –“ठीक समझे तुम।” फिर वो मोना चौधरी से बोला –“ये कौन है?”
“पावली का खास आदमी।” कहने के साथ ही मोना चौधरी ने सुन्हा से पूछा –“पावली और काकू में क्या हो रहा है।”
सुन्हा का चेहरा खिल उठा।
“दोस्ती ही हुई है। सब खुश हैं इस दोस्ती से ये सब तुम लोगों का ही कमाल है। वरना दुश्मनी जाने कब तक चलती रहती। कितनों की जान जाती। दोनों बस्तियां अब एक हो गईं।”
मोना चौधरी मुस्कराई।
“काकू रात भी यहीं बिताएगा। पावली और काकू में अभी ये बात होनी है कि दोनों बस्तियां शहर में जाकर बस जाएं। काकू थका हुआ है। वो अब आराम करेगा। शाम को इस बारे में बात होगी।” सुन्हा बच्चों की तरह खुश था।
“तुमने शहर देखा है?” महाजन ने पूछा।
“हां। कई बार।”
“तो शहर में रहना पसन्द है या यहां।”
“शहर में। वहां बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यहां अपने लोगों को भी नहीं छोड़ा जा सकता। सब चलने को तैयार हों तो मैं भी चल पडूंगा। यहां क्या रखा है। कुछ भी तो नहीं। चलता हूं। तुम लोग उधर जाकर कुछ खा लो। आज तो खाने का सामान भी बहुत अच्छा बना है। काकू आया है ना, इसलिए।”
सुन्हा के जाने के बाद दोनों की नजरें मिली।
“मेरे ख्याल में ये लोग शहर में बसने को तैयार हो जाएंगे। जंगल छोड़ देंगे।” महाजन ने सोच भरे स्वर में कहा –“काकू को बहुत समझाया मैंने। असर हुआ है मेरी बात का उस पर।”
मोना चौधरी की निगाह बस्ती की हलचल पर जाने लगी।
“तुमने पावली को समझाया होगा कि...।”
“नहीं। वो दिल्ली से एम.ए. करके आया है। कई साल दिल्ली में रहा है। मेरे ख्याल में वो तो कब से मौका ढूंढ़ रहा था कि ऐसा कुछ हो और वो बस्ती को शहर में ले जाकर बसाने की बात कहे। अगर उसकी बात नहीं मानी गई, तो वो बस्ती छोड़कर दिल्ली चला जाएगा। वहां उसने बंगला ले रखा है। नौकर हैं।” मोना चौधरी ने कहा-”स्पष्ट है कि जो शहर में रह आएगा। वो यहां कैसे रह पाएगा। मन ही नहीं लगेगा।”
महाजन सिर हिलाकर रह गया।
“लेकिन ये सब हमारे मसले नहीं हैं।” मोना चौधरी बोली।
“ठीक कहती हो।” महाजन ने घूंट भरा –“हमें यहां से निकलना है। उस हरामी जसबीर वालिया को ढूंढकर उसे बुरी मौत देनी है। हम दोनों की जान लेने में तो वो कामयाब नहीं हो सका। लेकिन सौ से ज्यादा मासूम विमान यात्रियों को बुरी मौत दे दी।” महाजन का चेहरा सुलग उठा –“अब आतंक का चेहरा हम उसे दिखाएंगे।”
मोना चौधरी की आंखों में दरिन्दगी उभरी।
“असली जड़ बख्तावर सिंह है। लेकिन उस तक पहुंचना आसान नहीं महाजन। वो...।”
“बेबी। जड़ हाथ न आए तो शाखाओं पर आरी चलाते रहो। शाखाएं ही नहीं पनपेंगी तो जड़ भी बेकार हो जाएगी।”
“ये आसान काम नहीं । शाखाओं को ढूंढ पाना असम्भव है।” मोना चौधरी ने भिंचे स्वर में कहा।
“जो सामने है, उस शाखा को तो हम काट ही सकते हैं।” महाजन की आवाज में सर्द भाव आ गए थे।
मोना चौधरी और महाजन की नजरें मिली।
“जसबीर वालिया और विशाल सिंह नाम की दो शाखाएं तो हमारे सामने है ही।” गुर्रा उठा महाजन –“इन्हें काट देना बहुत जरूरी है। वरना ये फिर किसी अन्य जगह बड़ा कारनामा करके आतंक फैलाएंगे।”
मोना चौधरी का सिर हिला और सख्त अंदाज में होंठ हिले।
“यहां से निकलने के लिए मैं पावली से बात करूंगी। वो हमें जंगल से बाहर पहुंचा देगा।”
☐☐☐
मोना चौधरी की पावली से बात हुई। शाम के चार बज रहे थे। वो अपने झोंपड़े में आराम कर रहा था। सोचों में था और थका-सा लग रहा था। तख्त पर लेटा था।
“आराम कर रहे हो।” मोना चौधरी ने झोंपड़े में प्रवेश करते हुए कहा।
पावली ने लेटे ही लेटे गर्दन घुमाकर उसे देखा फिर मुस्करा कर बोला।
“आओ मोना चौधरी। बैठो।”
मोना चौधरी बैठी।
“काकू के साथ क्या बात हुई?”
“अच्छा रहा सब कुछ।” पावली ने कहते हुए सिगरेट सुलगा ली –“काकू में और मेरे में दोस्ती हो गई है। दोनों बस्तियां एक हो गई हैं। दुश्मनी खत्म। लेकिन काकू ने दोनों कबीलों के बड़ों के बीच वो बात मेरे सामने रखी, जो मैं चाहता था।”
“क्या?”
“जंगल छोड़कर शहर में बस जाना। शहर में अच्छे ढंग से जिन्दगी बिताई जा सके।” पावली ने कश लिया –“हैरानी है कि काकू के दिमाग में ये ख्याल कैसे आ गया?”
“मेरे साथी महाजन ने उसे समझाया था।” मोना चौधरी ने कहा।
“ओह, समझा!” पावली ने सिर हिलाया –“तभी काकू ने अक्लमंदी वाली बात की। शाम को सब बैठेंगे। इस बारे में बात करेंगे। मेरे ख्याल में ये बात भी ठीक हो जाएगी। काकू अपनी बस्ती के साथ शहर में बसने को तैयार है। मैं अपनी बस्ती के साथ शहर में बसने को तैयार हूं तो जो दो-चार लोग एतराज करेंगे। वो भी आखिरकार तैयार हो जाएंगे। तुम्हारे पांव, मेरे लिए, बस्ती के लिए बहुत अच्छे रहे। इस काम के बारे में मैं अक्सर सोचा करता था कि कैसे करूं और तुम्हारे यहां पहुंचने पर इस काम की शुरुआत हो गई।”
मोना चौधरी मुस्कराई। फिर बोली।
“मुझे खुशी है कि तुम्हारी बातें ठीक होती जा रही हैं। मैं तुमसे बात करने आई हूं।”
“कहो।”
“मैं, महाजन के साथ यहां से जाना चाहती हूं।” मोना चौधरी उसे देख रही थी।
“अभी?” पावली उठकर बैठ गया।
“हां। हमारा यहां कोई काम नहीं। हमें यहां से चले जाना चाहिए। शहर में हमारे कई काम पड़े हैं।”
“जल्दी मत करो। यहां रुको। मुझे मेहमान नवाजी का मौका दो। हम...”
“पावली।” मोना चौधरी की आवाज में सख्ती आ गई –“मुझे शहर जाकर उस इंसान को तलाश करना है, जिसने विमान में विस्फोट करके सौ से ज्यादा मासूम लोगों की जान ली। हैलीकॉप्टर उसे जंगल से निकाल कर ले गया है। उसे उसके किए की सजा देना बहुत जरूरी है। वरना वो जाने कितने मासूम लोगों को और मारेगा।”
पावली गम्भीर नजर आने लगा।
पलों की खामोशी रही वहां फिर पावली कुछ कहने लगा कि तेजी से किसी ने भीतर प्रवेश किया।
मोना चौधरी और पावली की निगाह आने वाले पर गई।
वो तेईस-चौबीस बरस का सेहतमंद युवक था। गर्दन तक लम्बे बाल। होंठों पर मूंछे। उसने तहमद और कुर्ता पहन रखा था। इस वक्त वो कुछ व्यग्र-सा लग रहा था।
मोना चौधरी और पावली ने साफ-साफ उसकी व्यग्रता को पहचाना।
“आओ भोमा।” पावली ने शांत स्वर में कहा।
“सरदार।” भोमा का स्वर धीमा किन्तु तीखा सा था –“मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं।”
“कहो।”
“काकू के कबीले के साथ दोस्ती हो जाना खुशी की बात है।” भोमा बोला।
उसे देखते हुए पावली ने हौले से सिर हिलाया।
“लेकिन ये बात मुझे जरा भी पसन्द नहीं कि हम शहरों में जाकर बस जाएं।” उसकी आवाज में उखड़ापन था।
“क्यों-शहरों में रहना क्या बुरा है। वहां तो हमें फायदा है कि...।”
“सरदार।” भोमा ने उसी लहजे में टोका –“आपको वहां रहना है तो रहो। बस्ती का जो भी व्यक्ति शहर में जाकर बसना चाहता है, वो चला जाए। लेकिन बस्ती में बहुत से लोग ऐसे भी होंगे, जिनका मन शहर जाने का नहीं होगा।”
पावली ने सिर हिलाया। कश लिया। चेहरा गम्भीर था।
मोना चौधरी खामोशी से बैठी दोनों को देख रही थी।
“बात तो तुम्हारी सही है भोमा। बैठ जाओ। आराम से बताओ कि तुम कहना क्या चाहते हो?”
भोमा आगे बढ़ा और कुर्सी पर बैठ गया।
“नशीला पानी पिओगे?” पावली ने सामान्य स्वर में पूछा।
“नहीं। मैं बात कहने आया हूं।”
“कहो।”
“आप जो करना चाहते हो करो। मुझे क्या, किसी को भी एतराज नहीं होगा। काकू भी जो मन में आए करे। इस बस्ती में तुम्हारे बाद, मैं सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा हूं। जो लोग शहर में नहीं बसना चाहेंगे, यहां मैं उनका सरदार बनकर रहूंगा। काकू की बस्ती के जो लोग शहर नहीं जाना चाहेंगे। उनका सरदार मैं बनूंगा। तुम लोगों के जाने के बाद, दोनों बस्तियों के बचे लोग, एक होकर, इसी तरह यहां रहेंगे।”
पावली ने सिर झुका लिया। सोचों में डूब गया था वो।
भोमा, पावली को देख रहा था।
जबकि मोना चौधरी की निगाह भोमा पर थी।
पावली ने सिर उठाया, भोमा को देखा। चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
“क्या तुमने बस्ती वालों से बात की कि वे शहर जाना चाहते हैं या नहीं?”
“नहीं। सबसे पहले मैंने तुमसे ही बात की है सरदार।”
“भोमा।” पावली ने सिर हिलाया –“तुम ठीक कहते हो कि कुछ ऐसे भी होंगे जो शहर नहीं जाना चाहेंगे। इस बारे में तो मैंने सोचा भी नहीं था। सच में, हमारे जाने के बाद तुम उनका सरदार बनने की काबलियत रखते हो।”
ये सुनकर भोमा के चेहरे पर खुशी से भरी चमक आ गई।
“अच्छे वक्त पर तुमने ये बात मुझसे कही।” पावली शांत भाव में मुस्कराया –“आज शाम काकू के और अन्य लोगों के साथ शहर जाकर बसने के बारे में बात होनी है। ये बात हो जाने दो। कल बस्ती वालों से पूछ लिया जाएगा कि कौन शहर जाना चाहता है और कौन तुम्हारी सरदारी में यहां रहना चाहता है।”
“शुक्रिया सरदार।” भोमा का चेहरा खिल उठा –“शहर जाने के बाद तुम जब कभी भी बस्ती में आया करोगे तो मैं तुम्हारा बहुत अच्छा स्वागत किया करूंगा। मैं तुम्हें कोई कमी नहीं होने दूंगा।”
“अब जाओ भोमा। हम इस बारे में कल बात करेंगे।” पावली ने कहा।
भोमा उठकर बाहर निकल गया।
मोना चौधरी और पावली की नजरें मिली।
“जानती हो मोना चौधरी, अब क्या होगा?”
“क्या होगा?”
“भोमा बस्ती के लोगों में फूट डलवा देगा। शहर जाने को लेकर। कुछ हमारे साथ शहर में बसना पसन्द करेंगे और कुछ यहीं रह जाना चाहेंगे। यहां के लोग ना-समझ हैं। वो नहीं जानते कि जंगल की अपेक्षा उनका भविष्य शहर में बढ़िया है। भोमा उन्हें अपनी बातों में ले लेगा। मेरी सारी कोशिश बेकार हो जाएगी। मैं चाहता हूं कि पूरी बस्ती को शहर में ले जाकर बसा दूं। वो अच्छा जीवन जिएं। लेकिन भोमा की हरकत मेरी मेहनत पर पानी फेर देगी।”
“तुम यहां के सरदार हो और...।”
“शहर जाने की बात पक्की होते ही मुझे सरदारी छोड़नी पड़ेगी। बस्ती के रिवाज के मुताबिक, मेरे से कम पढ़ा-लिखा जो भी व्यक्ति बस्ती में होगा। उसे कबीले का सरदार बना दिया जाएगा। भोमा कबीले का सरदार बनने के लालच में, बहुतों को समझा देगा कि शहर से बढ़िया जंगल में रहना ठीक है। समझी तुम...।”
“हां।”
“इस तरह भोमा बस्ती के उन लोगों का भविष्य खत्म कर देगा, जो यहीं रह जाएंगे।” पावली गम्भीर था –“इस वक्त भोमा बहुत चालाकी से काम लेते हुए, मौके का फायदा उठाने की फिराक में है और वो मेरी योजना खराब करके फायदा उठा भी ले जाएगा। मैं जो कर रहा हूं, दूसरों के भले के लिए कर रहा हूं और वो अपने भले के लिए, लालच के लिए...।”
“तुम भोमा के कदमों को पीछे हटा सकते हो पावली।” मोना चौधरी ने टोका।
“नहीं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कर सकता।”
मोना चौधरी थोड़ा आगे को झुकी और पावली की आंखों में झांककर बोली।
“तुम भोमा को खत्म कर सकते हो।”
“नहीं। मेरे पास कोई वजह नहीं है कि मैं भोमा की जान लूं। वैसे भी बस्ती के लोग उसकी इज्जत करते हैं। अगर किसी को मालूम हो गया कि मैंने बिना वजह के भोमा को मार दिया है तो, बस्ती वाले मेरे खिलाफ हो जाएंगे। वैसे भी ये वक्त नाजुक है। काकू से बात हो रही है। दोनों बस्तियों के बड़े भी बीच में बैठे हैं। ऐसे में, ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए कि उसका प्रभाव शहर में बसने की बात पर पड़े।”
मोना चौधरी होंठ सिकोड़े पावली को देखती रही। कहा कुछ नहीं।
पावली ने उसे देखा। आंखों में खतरनाक भाव थे।
“अगर तुम चाहो तो बस्ती वालों के भले के लिए ये काम कर सकती हो।” वो बोला।
मोना चौधरी की आंखें सिकुड़ी।
“भोमा को मार दूं।”
“हां। लेकिन उसकी लाश नहीं मिलनी चाहिए। ये ही लगे कि वो कहीं चला गया है।”
मोना चौधरी कुछ नहीं बोली। पावली को देखती रही।
“तुम पर दबाव नहीं डालूंगा।” पावली ने धीमे स्वर में कहा –“मैं जो कर रहा हूं, वो तुम्हारे सामने है। भोमा जो करना चाहता है। वो भी तुम्हारे सामने है अगर तुम्हें लगता है कि भोमा बस्ती वालों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है तो उसे खत्म करने में तुम्हें हिचक नहीं होनी चाहिए।”
“तुम मुझे खामख्वाह इस मामले में घसीट रहे हो।” मोना चौधरी बोली।
“अगर तुम्हें ऐसा लगता है तो फिर मेरी बात न मानना।” पावली मुस्करा पड़ा।
मोना चौधरी कुछ पल खामोश रहकर बोली।
“तुम मुझे और महाजन को जंगल से बाहर निकाल दो।”
“आज की रात निकल जाने दो। कल सुबह किसी को तुम दोनों के साथ रवाना कर दूंगा।” पावली बोला –“शाम तक तुम लोग जंगल से निकलकर, ऐसी जगह पहुंच जाओगे, जहां से आसानी से शहर तक पहुंच सको।”
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